आँख तरेरती दोपहरी, भूख, प्यास, बदहवासी और बेवसी के बीच कोरोना के डर से पटना मीठापुर बस स्टैंड लोगों से पटा रहा. दिन के डेढ़ बज रहे हैं. बस स्टैंड खाली कराया जा रहा है. सैकड़ों की संख्या में दूसरे राज्यों से आए लोगों को पुलिस खदेड़ रही है. महिला-पुरुष और बच्चे बाइपस की तरफ भाग रहे हैं. तभी एक बस आती है और कुछ ही मिनटों में खचाखच भर जाती है. बसों के ऊपर भी बैठने की जगह नहीं है. मानों कोरोना के डर के आगे, ओवर लोडेड बसों में बैठकर जाना ही बेहतर है. लोग बसों में भेड़-बकरियों की तरह ठूँसे जा रहे हैं. अपनी जान की परवाह किए बगैर लोग सिर्फ अपने घर पहुँचने की आस में भीड़ का हिस्सा बनने को मजबूर दिख रहे हैं. न तो वहाँ पीने का पानी है और न ही बैठने की जगह. कुछ लोग बसों की इंतजार में धूप से बचने के लिए पुल के नीचे, पेड़ों की छाँव में अपनी-अपनी बसों के इंतजार में खड़े हैं. क्योंकि 2 बचे आने वाली बस, सुबह नौ बजे तक नहीं आई थी.बसों से जाने वाले अधिकतर लोग उत्तर बिहार के थे.जो कोरोना के कारण काम न मिलने पर अपने-अपने गाँव लौट रहे थे.

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