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सैकंड हैंड: शाहीन ने अपने पति से क्यों तलाक लिया था?

मेरे मोबाइल फोन पर ईमेल सुविधा नहीं है, इसलिए मैं ने मित्र के कंप्यूटर पर ही अपना ईमेल अकाउंट सेट कर रखा है. मैसेज बड़ौदा से आया था. वहां मेरा छोटा भाई है. घर की देखभाल करते हुए वह वहीं पढ़ भी रहा है. कहीं उसे कुछ हुआ तो नहीं? 2 वर्ष पहले जब कोरोना फैला था शिक्षकों को कोचिंग क्लासों से निकाल दिया गया था, परिणामत: मैं अहमदाबाद चला आया और वहां छोटामोटा काम करने लगा. अहमदाबाद में मकानों की तंगी के कारण छोटे भाई को वहीं छोड़ आया.

पासवर्ड डाल कर मैसेज पढ़ा, शब्दों पर नजर पड़ते ही चेहरे का रंग पीला पड़ गया. बरबस ही होंठों पर मुसकान आ गई. संक्षिप्त सा मैसेज था, ‘‘भाभी आ गई हैं. जल्दी आ जाओ.’’

मैसेज पढ़ने के पहले चिंता के जो गहरे बादल चेहरे पर छा गए थे, वे हट गए. मैं सोच में पड़ गया. यह अभी कैसे आ गई? उसे गए अभी डेढ़ वर्ष ही तो हुआ है. हमेशा कहा करती थी, ‘देखना, अब की जाऊंगी तो कभी लौट कर नहीं आऊंगी. मैं अपने भाइयों के पास जिंदगी काट लूंगी.’

वैसे भी उस के जो मैसेज इधरउधर आते थे, उन से पता चलता था कि वह अभी एक वर्ष तक नहीं आएगी. मुझे तो उस ने ब्लौक कर रखा था. शायद उस के पास स्मार्टफोन था, पर मैं बिना इंटरनैट वाला फोन ही इस्तेमाल करता था. अब यह अचानक कैसे आ टपकी? सोचा, इतवार की छुट्टी में जाऊंगा. लेकिन वहां जाने पर सुख भी क्या मिलेगा? जब वह गई थी, शादी हुए 6 वर्ष हो गए थे. मैं ने उसे प्रसन्न रखने के लिए क्या नहीं किया? उस की ख्वाहिश का खयाल रखा. हर तरह से सुखी रखने का प्रयत्न किया, मगर बेगम साहिबा थीं कि बस गुमसुम, न हंसना, न बोलना. पर, इतना तो मानना पड़ेगा ही कि उस में एक प्रशंसनीय खूबी जरूर है. उस ने मेरे हर शारीरिक आराम का खयाल रखा. वक्त पर हर काम तैयार. मुझे कभी शिकायत का मौका ही नहीं दिया, लेकिन यह भी कोई जिंदगी है. बस मशीन की तरह काम किए जा रहे हैं. कई मर्तबा मैं ने उस को हंसाने का प्रयत्न किया. खुश रहना सिखाना चाहा. लेकिन हंसना तो दरकिनार, क्या मजाल कि होंठों पर मुसकराहट तो आ जाए. खुदा ने न जाने किस मिट्टी से बनाया है उस औरत को कि मुझे भी गंभीर मनोवृत्ति का बना कर रख दिया.

डेढ़ साल पहले वह मुझे बस इतना कह कर चली गई थी कि वह अपने मांबाप और भाई के पास दुबई जा रही है, जहां वे 2 साल पहले जा बसे थे.

मैं आंखें बंद कर अपने बिस्तर पर लेट सबकुछ भूल जाने का प्रयत्न करने लगा. विचारों की श्रृंखला में मेरे दोनों नन्हेमुन्ने आ गए. मेरी पुत्री रेहाना अब बड़ी हो गई होगी. 4 साल की थी, जब वह यहां से गई थी. और फरहान वह शायद मुझे भूल ही गया होगा. दो साल का ही तो था. जब तक मैं घर में रहता था दोनों मेरे आसपास ही चक्कर लगाया करते थे.

उन का खिलखिलाना, फुदकना याद हो आया. पत्नी से जो सुख मुझे न मिल सका था, वह उन दोनों बच्चों ने पूरा किया था. मैं फौरन बिस्तर से खड़ा हो गया. घड़ी में देखा 5 बजे थे. मैं ने फौरन कागज उठा कर छुट्टी की अर्जी लिख डाली और मित्र को थमाते हुए बोला, ‘‘स्कूल पहुंचा देना. श्रीमतीजी दुबई से आ गई हैं, जरा मिल आऊं.’’ बोल कर बसस्टैंड की ओर चल पड़ा.

जब मैं ने बड़ौदा वाले घर में प्रवेश किया तो रात के 9 बजे थे. श्रीमतीजी पलंग पर बैठी कुछ पढ़ रही थी और बच्चे फर्श पर खेल रहे थे. मुझे देखते ही बोली, ‘‘देखो, तुम्हारे पापा आ गए.’’

बच्चों ने मुझे देखा और मेरी तरफ लपके. रेहाना तो मेरे पैरों से लिपट गई. मैं ने उसे प्यार से थपथपाया, लेकिन फरहान, पहले तो दौड़ा, फिर ठिठक कर खड़ा रह गया. वह कभी मेरी सूरत देखता तो कभी रेहाना की तरफ ताकने लगता. मैं ने लपक कर उसे गोद में उठा लिया और चूम लिया.

उस ने अपनी दोनों नन्हीनन्हीं बांहें मेरे गले में डाल दीं और चिपक गया.

इस कोमल प्यार की अनुभूति ने मेरे सफर की थकान दूर कर दी. आरामकुरसी पर बैठ कर कुछ देर तक उन के साथ अठखेलियां करता रहा. बच्चों की भोलीभाली बातों से हृदय गदगद हो गया. नजर श्रीमतीजी की तरफ भी उठ जाती थी. बस वह मुसकरा रही थी और शोख नजरों से मेरी तरफ देखे जा रही थी.

मैं ने बैग में से निकाल कर रेहाना को चाकलेट थमाई और चिप्स के पैकेट व संतरे फरहान के सामने रख कर कहा, ‘‘ले जाओ अपनी मां के पास. वह तुम्हें बांट देंगी,’’ फिर उस तरफ मुखातिब हो कर बोला, ‘‘कहिए, क्या हाल हैं आप के?’’ वह उत्साह से बोली, ‘‘खूब मजे में हूं.’’ और खिलखिला दी.

मैं ने कहा, ‘‘चलो खुदा का शुक्र है, दुबई ने तुम्हें हंसना तो सिखाया.’’

वह तुनक कर बोली, ‘‘दुबई क्या हंसना सिखाएगा, वहां तो लोगों को बात करने की ही फुरसत नहीं.’’

‘‘खूब मजे उड़ाए वहां रह कर. अच्छा, अब बताइए क्या हाल है वहां के? कौनकौन मिले? उन का कैसा सुलूक रहा तुम्हारे साथ? तुम्हारे तो बहुत से घर वाले खाड़ी के देशों में हैं.”

‘‘मजे और वहां…? हुब्बे वतन, प्यारा वतन. भई, मजे तो अपने ही वतन में है. जहां जीवनसाथी हो वहीं मजे आ सकते हैं. हां, तफरीहन एक अच्छी जगह है. वहां के लोगों में न तो मुरब्बत है और न ही खुलूस है. वे खुद ही दूसरों के मुल्क में हैं.’’

‘‘भई, यह तो हर जगह होता है. इनसान तो हर जगह एक सा ही होता है. चाहे वह दुबई हो या हिंदुस्तान. आप अपने अजीजों की बात कीजिए.’’

‘‘मैं भी उन्हीं की बात कर रही हूं. मुझे दूसरे लोगों से क्या मतलब…? सब लोग मजे में हैं. आप को खूब याद करते हैं, खासकर आप की एक फूफी. हां, एक बड़े मजे की मुलाकात हुई,’’ कहते हुए वह फिर खिलखिला पड़ी. मेरे फूफा भी शारजाह में हैं, पर कभी न बुलाया और जब से गए हैं, कभी नहीं मिलने आए.

मेरी उत्सुकता बढ़ी और मैं ने पूछा, ‘‘ऐसी कौन सी मुलाकात ने आप को कमल के फूल की तरह खिला दिया. जरा हम भी तो सुनें.’’

‘‘ओह, मजा आ गया,’’ कहते हुए वह पलंग से उठी और मेरे ही नजदीक आ कर आरामकुरसी पर बैठ गई. उस की आंखों में शरारत नाच रही थी. जिस को देखने की मुद्दत से आरजू थी, मिलने की तमन्ना थी, आखिर वह मिल ही गई. उस के चेहरे पर सुर्खी दौड़ आई थी. उस के चेहरे पर ऐसी आभा मैं ने पहले कभी नहीं देखी थी.

मैं ने हिचकिचाते हुए पूछा, ‘‘आखिर कौन सी है वह बात, जरा हम भी तो सुनें.’’

मैं ने सोचा कि वह अपनी बचपन की किसी सहेली की बात करेगी. औरतों की आदत होती है कि जब अपनी किसी सहेली को अचानक पा लेती है तो फिर जब तक उस की चर्चा दूसरों के सामने न करे उन्हें चैन ही नहीं पड़ता.

‘‘क्या करेंगे सुन कर?’’ मेरे चेहरे के भाव पढ़ते हुए उस ने टालने की कोशिश की. पर मुझे असमंजस में पड़ा देख उस ने कहा, ‘‘आप की चहेती और कौन?’’

यह सुन कर मैं तिलमिला उठा. यह सरासर झूठा आक्षेप मैं कैसे सहन कर सकता था. मैं ने बौखला कर कहा, ‘‘मेरी चहेती और वह भी दुबई में…? तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया.’’

‘‘अजी, बिगड़ते क्यों हैं, जरा सुनिए तो,’’ उस ने हलकी सी प्यारभरी चुटकी लेते हुए कहा, ‘‘वह आप की राजकोर्ट वाली दुलहन मिल गई थी.’’

मुझे करंट जैसे लगा. सारे शरीर में झनझनाहट का राज. मेरे जख्मों पर नमक छिड़कने के लिए ये चुटकियां ली जा रही थीं.

जिस दर्द को मैं सीने में छिपाए बैठा था, जिसे भूल जाने की लाख कोशिश की, आखिर वही राख में छिपी हुई चिनगारी फिर से सुलग उठी.

शाहीन मेरी जिंदगी में बिजली की कौंध की तरह आई और जिस दुनिया से आई थी उसी में हमेशा के लिए अदृश्य हो गई. आई थी जिंदगी में बहार बनने के लिए, लेकिन अंत में खिजां छोड़ गई.

मैं ने बीए पास किया ही था कि मातापिता हाथ धो कर पीछे पड़ गए. जैसा कि हर मांबाप की ख्वाहिश होती है कि बच्चा अब पैरों पर तो खड़ा हो ही गया है, चलो जल्दी से बहू ले आएं.

नौकरी मुझे देहात के एक स्कूल में मिल ही गई थी. खुद जोरशोर से शादी के लिए लड़की की दूरदूर तक तलाश जारी हो गई. इस मामले में सब से आगे हमारी दूर के रिश्ते वाली फूफी थीं. उन्होंने अपनी रिश्ते की भांजी शाहीन से रिश्ता तय कर लिया. टोंक में हमारा एक टूटाफूटा सा घर था, उसी में हम रहते थे. थोड़े से बरातियों को ले कर हम राजकोट पहुंच गए और शाहीन को ब्याह कर ले आए. साल 2002 के दंगों के बाद हम सब शादीब्याह संभल कर करते थे कि कहीं कोई बवाल न खड़ा हो जाए.

साल 2002 के दंगों में हमारा मकान जला दिया गया था और बड़ी मुश्किल से जिंदगी पटरी पर आई थी. अब तक वे लोग भारत में ही थे.

एक कमरे का हमारा छोटा सा घर था. उस में हर तरह का सामान भरा था. कमरे के सामने एक बरामदा था, जो सोनेबैठने के काम आता था. एक छोटा सा बावरचीखाना, गुसलखाना व पाखाना और बीच में छोटा सा दालान. उसी में जो मकान से लाए सामान को सजा कर रखते थे.

सुहागरात को मुझे उस छोटे से कमरे में भेजा गया, जहां दुलहन एक पलंग पर छुईमुई सी बैठी थी. पहले तो कुछ हिचकिचाहट महसूस हुई, पर धीमे कदमों से जा कर उस के पास बैठ गया. दिल में उमंगे और हृदय में तूफान लिए झिझकते हुए बातचीत का सिलसिला शुरू किया.

बातों के दौरान ही शाहीन जरा उद्विग्न हो कर बोली, ‘‘क्या आप के घर में दुलहन का इसी तरह इस्तकबाल किया जाता है?’’

मैं उस की यह बात सुन कर भौचक्का सा रह गया. उस के शरीर से अठखेलियां करने के लिए आगे बढ़ते हाथ वहीं रुक गए. मैं ने सवालिया निगाह से उस की ओर देखा. उस ने कहा, ‘‘गरमी के दिन हैं, और इस छोटे से कमरे में बंद कर दिया. कब से अकेली बैठी हूं, पसीने से मरी जा रही हूं. कोई हाल पूछने वाला ही नहीं. और कुछ तभी तो जो मैं अपने साथ कूलर लाई हूं वहीं लगा दिया होता.’’

‘‘ओह,’’ मुझे एकदम खयाल आया. ठीक ही तो कहती है बेचारी. शादी के हंगामे में किसी को खयाल ही नहीं आया. मैं उठा और कूलर निकाल कर चालू किया तो जरा राहत मिली.

मैं ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा, ‘‘माफ करना, किसी को खयाल ही नहीं रहा इस बात का.’’

‘‘खयाल भी कैसे आए. घर में कभी एसी, कूलर लगाया हो तब न.’’

उस के इस कटाक्ष पर मेरे काटो तो खून नहीं. मैं तो अवाक ही रह गया. गरीब मांबाप का गरीब बेटा जरूर सही, लेकिन गैरत तो मुझ में है. मुझे खामोश देख कर उस ने रोआंसी हो कर कहा, ‘‘अब आप ही देखिए न, इस छोटे से पलंग पर मुझे ला कर बिठा दिया है. एक तो शादी के हंगामे में मैं वैसे ही तीनचार रातें जगी हूं. अब इस पुराने से पलंग पर सोऊं तो कमर ढीली हो जाए. आखिर मेरे घर से फोम के गद्दे, तकिए, चादरें वगैरह किस दिन के लिए आई हैं? हमें आए दोतीन घंटे हो गए, अगर किसी को मेरी फिक्र होती तो अभी तक सब तैयार हो जाता.’’

मैं ने कमरे में चारों ओर नजर दौड़ाई, कमरा सामान से खचाखच भरा हुआ था. बाहर आंगन में सब घरवाले व मेहमान खापी कर थकेहारे सो गए थे. हम दोनों को इस कमरे में बंद कर के सब निश्चिंत पड़े थे.

मेरी गंभीरता को भंग करते हुए उस ने कहा, ‘‘यह सुहागरात, छोटा सा कमरा वह भी सामान से भरा हुआ. और यह छोटा सा पुराना पलंग, जिस में आग के निशान भी दिख रहे हैं.’’

मैं फौरन उठा और सामान के ढेर के नीचे से कार्टन निकाला और उसे बनाने के लिए बरामदे में ले गया. मुझे घरवालों पर क्रोध आ रहा था कि उन्हें यह छोटी पर मुख्य बात भी याद नहीं आई. आखिर ये मेहमान कोई मौजमजे करने तो आए नहीं हैं. आए हैं शादी में मदद करने. किसी से भी यह काम लिया जा सकता था. मैं आवाज किए बिना कार्टन खोल मसहरी के सब भाग बैठाने की कोशिश की. लेकिन पाए काटनेपीटने में ठोंकने पर आवाज तो होगी ही. थोड़ी ही देर में अच्छाखासा हंगामा हो गया. आखिर दो घंटे की मेहनत के बाद हमारा कमरा तैयार हुआ. और सुहागरात का पलंग भी तैयार हुआ.

इसी में रात के 3 बज गए. शाहीन ने इस पर बैठ कर राहत की सांस ली. मेरे अहं को धक्का लगा. इन सब लोगों ने क्या सोचा होगा? सब रोमांटिक मूड खराब हो गया और उस के स्थान पर हृदय में भर गया उद्वेग और घृणा.

मैं बरामदे में आ कर बेंत की कुरसी पर पड़ गया और थोड़ी ही देर में नींद के आगोश में मधुर स्वप्न देखने लगा. शादी तय करते समय फूफी कहती थीं, ‘‘अरे देखना, मैं कैसी जगह ब्याहती हूं अपने मम्मू को. आखिर उस ने बीए किया है. फिर खानदान भी धनीमानी. उस के 4 भाई हैं. सब ऊंचऊंचे ओहदों पर हैं. अकेली बहन को जोकुछ दे, वह कम है. अरे, जानपहचान वाला जो भी देखेगा रश्क करेगी. मम्मू की किस्मत पर और दुलहन तो चांद सी है, देखते ही नजर लग जाएगी. कुछ रिश्तेदार शरजाह में हैं तो कुछ सऊदी में. 2-3 तो अमेरिका में भी हैं.’’

सुबह से ही अच्छाखासा हंगामा शुरू हो गया. हमारे कमरे में अटैच्ड बाथरूम नहीं था. नाश्ता और चाय तैयार हो गई. हम दोनों को साथसाथ नाश्ते के लिए बिठाया गया. नाश्ते के समय वह चोरीछिपे शोख नजरों से मेरी तरफ देख लेती और फिर नजरें नीची कर लेती.

नाश्ते के पश्चात बरामदे में एक तरफ सोफासेट सजाया गया. एक टेबल पर कूलर था. घर वाले देखदेख कर खुश हो रहे थे. महल्ले की कुछ औरतें दुलहन को मिलने पूछने आने वाली थीं कि मुंहदिखाई तो क्या यों कहना चाहिए दहेज में क्या मिला.

दोपहर के खाने के समय उस ने मुझ से कहा, ‘‘आप का घर इतना छोटा है कि मेरा डाइनिंग टेबल वैसे ही पड़ा रह गया. घर इतना तो बड़ा हो कि मेरे पापा ने जो सामान दिया है उन का इस्तेमाल हो सके. ये सब आप की इज्जत बढ़ाने और हमारी सुविधा के लिए ही तो है.’’

‘भाड़ में जाए ऐसी इज्जत,’ मैं अंदर ही अंदर झल्ला उठा. चाहा कि कह दूं अभी घर में कदम ही रखा है कि अपनी अमीरी की शान दिखाने लगी. साथ में दहेज क्या लाई, अपने को बहुत ऊंचा समझने लगी. लेकिन एक अच्छे शिक्षक की तरह मैं ने सहनशीलता का दामन नहीं छोड़ा. धैर्य ही तो शिक्षक की संपत्ति है. जब धैर्य से टेढ़े से टेढ़े विद्यार्थी को सीधा किया जा सकता है, तो वह तो पत्नी थी. सोचा, आ जाएगी धीरेधीरे रास्ते पर. दूसरी रात हमारे सोने का इंतजाम उसी छोटे से कमरे में था. यह सोच कर कि ख्वाहमख्वाह कुछ कहासुनी हो जाएगी. मैं बाहर बरामदे में ही फोल्डिंग पलंग बिछा कर सो गया. शादी के लिए वह फोल्डिंग पलंग किराए पर लाए गए थे.

थोड़ी रात गए उस ने मुझे आ कर जगाया, ‘‘ओजी, क्या, आप सो गए क्या?’’

मैं ने सुनीअनसुनी कर दी, तो उस ने मुझे झिंझोड़ते हुए कहा, ‘‘क्यों, नाराज हो गए मुझ से? अंदर नहीं आओगे,’’ कहते हुए वह पलंग पर बैठ गई.

मैं ने सहज ही कहा, ‘‘देखो, बेगम, कमरे में इतना सामान भरा है कि मेरा दम घुटने लगता है.’’

‘‘यह तो पहले ही सोचसमझ कर लेना था न. कम से कम शादी से पहले अच्छे मकान का इंतजाम कर लेते.’’

‘‘अब की बार आप को लाने से पहले इंतजाम कर के रखूंगा. तब तक के लिए अलविदा.’’

मेरा रूखा सा जवाब सुन कर वह उठ कर अंदर चली गई.

दूसरे दिन वलीमा दावत थी. उस के घर वाले राजकोट से उसे लेने आ गए थे. जाते समय उस ने मेरी बहन को बुला कर कहा, ‘‘जरा अपने भाईजान को तो बुला दो.’’

मैं अंदर गया तो उस ने कहा, ‘‘मुझे लेने आने के पहले मकान का इंतजाम जरूर कर लीजिएगा. और हां, जरा मेरे पापा के दिए सामान का खयाल रखना.’’

मैं ने स्वीकृति में गरदन हिला दी और बाहर निकल गया. राजकोट पहुंचने पर उस का एक व्हाट्सएप मैसेज आया, प्यार भरा. उस ने अपनी हरकत की माफी चाही थी. लेकिन मकान की याद दिलाना वह नहीं भूली थी. मैं ने भी बैंक से 50 हजार रुपए का कर्ज लिया और उसी मकान में एक कमरा और लगा दिया. मैं ने सोचा कि अब जोकुछ हुआ है उसे तो निभाना ही पड़ेगा, पढ़ीलिखी है, जानती है कि जमाना क्या है. अपनेआप संभल जाएगी.

कुछ दिनों बाद ही अम्मी ने रट शुरू कर दी, ‘‘बहू को ले आ.’’

मैं कुछ दिन तक तो टालता रहा, मगर अम्मी ने बहन के मोबाइल से मैसेज भिजवा ही दिया कि मम्मू लेने आ रहा है. तैयार रहना.

एक सप्ताह में ही राजकोट से मेरे मोबाइल पर मैसेज आया. उस ने खुशी का इजहार किया था कि वह बेचैनी से मेरा इंतजार करेगी. लेकिन साथ ही यह भी लिखा था, ‘‘मेहरबानी कर के शेरवानी पहन कर न आएं. यहां वाले हंसी उड़ाते हैं. जरा कोटपैंट में आइएगा.’’

हद हो गई शराफत की भी. शेरवानी पहन कर न आएं. और यहां इन्हें अच्छी नहीं लगती. सोचेसमझे बगैर मैम साहब और्डर झाड़ने लगी हैं. वह मुझे बुद्धू समझती हैं क्या? मैं ने सोचा, जरा दिमाग ठिकाने आ जाए, तब ले जाऊंगा. दोचार माह ऐसे ही बीत गए. अम्मी बीमार पड़ गईं. उन की बीमारी बढ़ती ही गई. अब आग्रह करने लगीं कि मैं जा कर बहू को ले आऊं, ताकि बुढ़िया मां की तीमारदारी तो अच्छी तरह हो सके. मैं ने भी हठ छोड़ दी और जा पहुंचा लेने. खूब आवभगत हुई. उसी समय में उस की बहन भी आबूधाबी से आई हुई थी. मैं ने कहा, ‘‘अम्मी घर में बीमार हैं. तुम्हें बहुत याद करती हैं. हमें जल्दी ही यहां से रवाना होना चाहिए.’’

उस ने छूटते ही कहा, ‘‘अच्छा, तो अपनी अम्मी की खिदमत के लिए ले जा रहे हैं मुझे. अब खयाल आया मेरा. यहां बरसों के बाद बहन आबूधाबी से आई है. उन के साथ तो थोड़े दिन रह लूं.’’

यह सुन कर मेरा हृदय ही धक से रह गया. सुन कर उस की बहन और भाभी ने समझाया, ‘‘शाहीन, तुम्हें ऐसी बेतुकी बातें नहीं करनी चाहिए. शौहर की इताअत बीवी का सब से बड़ा फर्ज है. तुम फौरन चली जाओ.’’

लेकिन उस ने अपनी हठ के सामने किसी की न चलने दी और कहा, ‘‘15 दिन बाद लेने आइए, खुशी से चलूंगी.’’

आखिर अपना सा मुंह ले कर मैं स्टेशन पर आ पहुंचा. इतने में हमारे छोटे साले साहब दौड़ते आए, ‘‘चलिए, आप को बाजी बुला रही हैं. वह आप के साथ जाना चाहती हैं.’’

‘‘आप बाजी से कहना कि अगर वह किसी शहंशाह की शहजादी होती तो अच्छा होता. अब उन्हें जब आना हो आ जाएं. घर तो उन्हीं का है.’’

जब अम्मी ने देखा कि दुलहन नहीं आई है और मैं मुंह लटकाए वापस आ गया हूं तो उन की आंखों से आंसू निकल आए. कुछ दिन बाद इसी सदमे में उन्होंने दम तोड़ दिया.

अम्मी की मृत्यु के बाद उस का खत आया कि मैं उसे ले जाऊं, पर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत.

4 माह बाद हमारे सब से बड़े साले सूचना दिए बगैर ही आ धमके. साथ में शाहीन की चिट्ठी भी लाए. चिट्ठी में शाहीन ने खूब शिकवेशिकायत लिखे थे और साथ ही तलाक की मांग की थी. मुझे तो इस से खुशी ही हुई. हम ने काजी साहब के पास जा कर तलाक के कागजात तैयार कर दिए और रस्म अदा हो गई. मेरी छाती पर जो एक बड़ा सा बोझ लदा हुआ था, वह उतर गया.

मैं ने एक ट्रक किराए से करवा दिया और दहेज का सब सामान उस में भरवाना शुरू किया. मियां अपने साथ एक लिस्ट बना कर लाए थे. उसी समय मियां के मोबाइल पर एक मैसेज आया. साले साहब ने खोल कर पढ़ा और अपना करम पीट कर बैठ गए. हम सब घबरा गए, पूछा, ‘‘क्या हुआ? कैसा मैसेज है?’’

कहने लगे, ‘‘शाहीन का मैसेज है. लिखा है, तलाक मत लो.’’

अब हंसने की मेरी बारी थी. मेरे मुंह से एक जोर का ठहाका निकल गया. वह क्रोधित हो कर बोले, ‘‘अजीब अहमक आदमी हो. यहां मेरी जान पर बन आई है और तुम्हें हंसी आ रही है.’’

मैं ने कहा, ‘‘भाई साहब, बिना सोचेसमझे औरतों को हठ पर काम करने वालों का यही अंजाम होता है. वह आप लोगों की लाडली बहन है. जो गुल न खिलाए, कम ही है.’’

कुछ समय उन के रोनेधोने में गया. जब सब सामान लद गया तो वह रंजीदा मन से ट्रक में जा बैठे. मैं ने हंसतेहंसते आखिरी सलाम करते हुए कहा, ‘‘भाई साहब, अगर कोई सामान बाकी रह गया हो तो खुशी से लिख दीजिएगा. मैं पार्सल से भेज दूंगा.’’

उस के बाद कितनी ही बहारें आईं और चली गईं. समय ने अंगड़ाई ली. मैं ने एमए पास कर लिया. बहनों की शादियां कर दीं, पर साथ ही अब्बा का साया भी सिर से उठ गया. साल 2002 के घाव भी भरने लगे थे. हालांकि हर समय पूरी कौम पर खौफ का साया रहता था.

इस के कुछ दिन बाद एक दौर फिर ऐसा आया कि लोग खाड़ी की तरफ दौड़ लगाने लगे. मुझे से भी कहा गया, ‘‘चलो, खाड़ी में वहीं नौकरी ढूंढ़ो. यहां रखा ही क्या है? वहां पढ़ेलिखे लोगों की बहुत जरूरत है. कहीं अच्छी जगह मिल जाएगी.’’

मैं ने कहा, ‘‘भाई, मुझे तो अपने वतन से प्यार है. अगर जाना चाहते तो वालिद 1948 में न चले जाते. अब खराब दिन हैं, पर मैं तो यहीं रहूंगा.’’

‘‘अरे मियां, वहां चलोगे तो माल खाओगे, माल. यहां भूखे भी मरोगे और न जाने क्याक्या सहोगे.’’

मैं ने कहा, ‘‘अच्छा, तो माल खाने दौड़ रहे हो वहां?’’ वतन की खिदमत का कोई खयाल नहीं? याद रखना, माल खातेखाते एक दिन ऐसी मार खाओगे कि नानी याद आ जाएगी और दुनिया वाले सुनेंगे कि माल के लालच से दौड़ लगाने वालों का क्या अंजाम होता है? किसी दिन इराक जैसा हाल न हो कि न यहां के रहो, न वहां के.”

एक दिन टाइम्स औफ इंडिया में पढ़ा कि अहमदाबाद के किसी कालेज में लैक्चरर की जरूरत है. मैं ने भी अर्जी डाल दी और अहमदाबाद में आ गया. मेरे अधिकतर रिश्तेदार दुबई वगैरह चले गए थे. मेरे लिए तो गुजरात हो या बड़ौदा सब जगह एक सी थी.

मेरे एक दूर के रिश्ते के फूफा थे. एक दिन जामनगर से उस का एक पत्र आया, जिस में उन्होंने शादी कर लेने का आग्रह किया था. लिखा था, “लड़की मेरी देखीभाली है. गरीब घराने की है. बहुत ही सुशील और नेक है. उम्मीद है, तुम्हें जरूर पसंद आएगी. अब की छुट्टियों में यहां आ जाओ.’’

मैं भी अकेला कहां तक रहता. शादी की अनुमति दे दी. जब छुट्टियों में रायबरेली पहुंचा तो मैं ने साफसाफ सुना दिया, ‘‘मुझे बीवी के अलावा दहेज के नाम पर एक फूटी कौड़ी भी नहीं चाहिए.’’

फूफा ने कहा, “लड़की देखभाल लो. उस के बाद तुम्हें जोकुछ पूछताछ करनी हो, इतमीनान से कर लो तो शादी की बात तय हो जाए.’’

मैं ने कहा, ‘‘फूफाजान, लड़की और घरबार आप का देखाभाला है न?’’

‘‘जी हां.’’

‘‘तो फिर इस में क्या देखना है. बिसमिल्लाह कीजिए.’’

मैं ने सोचा पहले भी देखभाल कर कौन सा सुख पाया है.

‘‘नहीं बेटे, आजकल का जमाना और है, तुम लड़की देख कर पसंद कर लो, वरना बाद में जब कभी पछताना पड़े तो फूफा को कोसोगे. हां, लड़की के चालचलन और सलीका वगैरह की जवाबदारी मेरी.’’

इन बेगम को देखा, पसंद आ गई. फूफा ने हमारे ससुर के सामने ही मुझ से पूछा, ‘‘भैया, तुम्हें दहेज नहीं चाहिए, पर लड़की के साथ सोनेचांदी के जेवर तो चाहिए न?’’

‘‘नहींजी, अगर हमारे हाथपैर सलामत हैं, तो अपनी जरूरत की चीजें हम खुद बना लेंगे.’’

मेरी बातों से ससुर साहब इतने प्रभावित हुए कि जोश में आ कर उन्होंने मुझे गले से लिपटा लिया. उन की आंखों में आंसू भर आए. कहने लगे, ‘‘बेटा, तुम ने मुझ गरीब को उबार लिया.’’

मैं ने कहा, ‘‘अब्बाजान, बस आप की शफाकत का साया सिर पर चाहिए. यह दहेज से ज्यादा कीमती सरमाया है.’’

आखिर, मैं इन बेगम साहिबा को ले आया. कितना बड़ा अंतर है दोनों में. एक थी और एक यह है कि आदेश माने जा रही है. शाहीन के सामने में मूक रहता था, पर अंदर ही अंदर घुटे जाता था.

इधर यह है कि मेरी हर ख्वाहिश को मूक रह कर पूरा किए जा रही है और माथे पर कोई शिकन तक नहीं, चूंकि शाहीन के सामने मैं अंदर ही अंदर घुटे जा रहा था, इसीलिए मैं यह महसूस करता आ रहा था कि जरूर इन बेगम साहिबा को भी कुछ अंदर ही अंदर खाए जा रहा है. मैं ने देखा, बेगम अपने दोनों बच्चों को सुला रही थीं. मैं ने मुसकरा कर पूछा, ‘‘अच्छा तो यह मुलाकात कैसे हो गई?’’

बेगम ने फरहान को थपकी देते हुए कहा, ‘‘फूफीजान के इसरार पर मैं 15-20 दिन वहां मेहमान के रूप में रही थी. इसी दौरान आप की चहेती भी आ टपकीं.’’

‘बड़ी खुशकिस्मत हो तब तो. खुदा भी शक्करखोर को शक्कर दे ही देता है,’’ मैं ने हंस कर कहा.

‘‘एक दिन दोपहर को मैं फरहान के लिए पास्ता बना रही थी. फूफी भी पास में बैठी थीं कि शाहीन आ धमकी. सिर से पैर तक जेवर, गालों पर पाउडर व लाली थी. बस छमकछल्लो छमछमाती आई. न अदब, न लिहाज. आते ही एसी चला कर बिस्तर पर लेट गई.

फूफी ने पूछा, ‘कहो कैसे आना हुआ?’

‘‘कहने लगी, ‘जरा खाला के यहां आई थी. सोचा कि फूफीजान से भी मिलती चलूं’.’’

‘‘फूफी बोली, ‘बड़ी नवाजिश की गरीब पर. खैर, हम याद तो आए. और क्या हालचाल हैं?’

“वह बोली, ‘ठीक हैं, यह है दुलहन?’”

‘‘‘हां भई, यह हमारी दुलहन है. अहमदाबाद से आई है.’”

‘‘‘अच्छा, तो आप का अहमदाबाद में भी कोई है?’”

‘‘‘अरे भई, हमारा कहां और कौन नहीं है? हम तो जिधर भी नजर डालते हैं, अपने ही अपने पाते हैं.’”

‘‘सुनते ही शाहीन जो अभी तक इतरा कर खिलखिला रही थी, उस के चेहरे का रंग ही उड़ गया. चेहरे पर पसीना आ गया. फूफी ने पूछा, ‘ खैरियत तो है?’ उस ने हकलाते हुए कहा, ‘फूफीजान, जरा एक काम याद आ गया. मैं फिर आऊंगी.’ और वह जूते पहन कर तेजी से चलती बनी. जीने से उतर कर टैक्सी ली और गायब… मैं तो भौंचक्की देखती ही रह गई.

‘‘उस के जाने के बाद मैं ने पूछा, ‘फूफीजान, कौन थी, यह साहिबा?’’’

‘‘यह शाहीन थी. तुम्हारे खाविंद की पहली बीवी…

अब दुबई से आ कर पहले तो भाई के पास रही, पर फिर अलग रह रही है. 2 सहेलियों के साथ एक पैकिंग फैक्टरी में काम करती थी. चूंकि और कोई खर्च नहीं है, इसलिए बनठन कर रहती है, पर अकड़ अभी तक गई नहीं इसलिए न हिंदुस्तान का, न ही पाकिस्तान का कोई शादी करने को तैयार हो रहा है.’’

‘‘अच्छा तो यह है, वह. मैं अवाक हो कर बोली, ‘और इस ने तलाक क्यों ली थी?’

‘‘‘अरे, औरतें जब तलाक लेती हैं तो उन के पास एक ही तो बहाना होता है, खाविंद नामर्द है.’

‘‘सुनते ही मुझे हंसी आ गई. हंसतेहंसते पेट दुखने लगा. यह सोच कर कि नामर्द और तुम?”

‘‘थोड़ी देर खामोश रह कर फूफी बोलीं, ‘और देखा, जब उस ने देखा कि मम्मू की दोनों औलादें हैं तो मुंह चुरा कर किस तरह भाग खड़ी हुई.’ फिर बोली, ‘‘फूफी ने यह भी बताया कि मेरे आने के बाद लोगों को गलतफहमी भी दूर हो गई कि तलाक तो बहाना था. अब शायद कोई मर्द उस से आसानी से शादी करने को राजी न हो.’’

उस की ये बातें सुन कर मैं भी हंस पड़ा. मैं ने एक आह भरी और जबान से अपनेआप ही निकल पड़ा, ‘‘जाने वो कैसे लोग थे जिन को, प्यार से प्यार मिला. लेकिन हम तो सब तरफ से तरसते ही रहे.’’

‘‘अच्छाजी, तो आप को किसी का प्यार ही नहीं मिला?’’ उस ने बड़े ही शोख अंदाज में कहा.

‘‘तरसते रहे.’’

‘‘और ये दोनों निशानियां किस बात की नजीर पेश कर रही हैं?’’ उस ने बच्चों की तरफ संकेत कर के कहा.

‘‘इसे प्यार की निशानी कहती हो? अरे, ये तो सैक्स की निशानी हैं. सैक्स तो हर एक इनसान में होता ही है. हम भूल से सैक्स को प्यार समझ बैठते हैं.’’

वह पलंग से उठी और आ कर मुझ से लिपट गई. वह रोआंसी हो कर बोली, ‘‘माफ करना. मैं आज तक आप को नहीं समझ सकी थी. मैं ने आप को…’’

‘‘तो क्या समझा था अभी तक मुझे?’’ मैं ने उस की चिबुक हाथ से ऊंची करते हुए पूछा.

मेरे झलकते भावों को पढ़ते हुए उस ने मेरी छाती में चेहरा गड़ाते हुए धीमे से कहा, ‘‘सैकंड हैंड.’’

मैं उछल पड़ा, “सैकंड हैंड.’’

उस के दोनों कंधे पकड़ कर उस के चेहरे पर आंखें गड़ाते हुए मैं ने कहा, ‘‘हम ने स्कूल और कालेजों में सैकंड हैंड किताबों के लिए तो खूब सुना है. लेकिन इनसान भी सैकंड हैंड होते हैं, यह आज ही सुना,’’ बोल कर मैं मुसकरा पड़ा.

‘‘माफ करना, सरताज,’’ उस ने मुझे आलिंगन में भरते हुए कहा, ‘‘अब मेरी आंखें खुल गई हैं. आज महसूस हो रहा है कि आप मेरे हैं, सिर्फ मेरे.’’

‘‘अच्छाजी, तो यह गम खाए जा रहा था अब तक कि हम पराए हैं?” इस के साथ ही हम दोनों हंस पड़े.

…………..पहली पत्नी शाहीन को ले कर रेहाना के मन में कई शंकाएं थीं, आखिर अच्छेभले व्यक्ति से तलाक लेने का रहस्य क्या था? पर एक दिन जब परदा हट ही गया तो रेहाना मेरे कदमों में झुक गई.

कितने पास मगर दूर: यशोदा का बेटा कौन था?

कल नानी गुजर गई थीं. मम्मी और पापा को जाना पड़ा था. मैं और नीता पढ़ाई की वजह से आंटी के घर रुक गए थे. आंटी के घर में हमारा अच्छा आनाजाना था. उस समय आंटी के दूर के रिश्तेदार का लड़का आया हुआ था. हम तीनों एकदूसरे के साथ घुलमिल गए थे.

एक दिन की बात है. काफी रात तक हम आपस में बातें कर रहे. अंकलआंटी भी सो चुके थे. ठंड बहुत पड़ रही थी. उस रात वह हुआ जो नहीं होना चाहिए था. मैं भी यह समझ नहीं पाई कि यह क्यों हुआ और जो हुआ अनजाने में और शायद गलत हुआ. मुझे कुछ समझ में ही नहीं आया और न ही उसे. दूसरे दिन हम सामान्य रहे और अपनी गलती को भूल कर अपनेआप को संभाल लिया. पर कुदरत ने तो कुछ और ही लिख कर रखा थ. 2-3 दिन के बाद मम्मीपापा भी आ गए और हम अपने घर चले गए.

समय बीत रहा था मगर मुझे क्या हो रहा था मैं समझ ही नहीं पा रही थी. एक दिन सिर भारी होने लगा और मैं चक्कर खा कर गिर पड़ी. मम्मी घबरा गईं. वे मुझे डाक्टर के पास ले कर गईं. डाक्टर ने चैक किया और मम्मी को बताया कि मैं प्रैगनैंट हूं. 2-3 महीने हो चुके हैं. मम्मी घबरा गईं. उन्हें खुद पर गुस्सा आ रहा था और मुझ पर भी. शायद वे सोच रही थीं कि न वह मुझे छोड़ कर जातीं और न ऐसा होता? मैं रोने लगी और मम्मी सोच रही थीं  कि अब क्या किया जाए? उन्होंने सोचा कि हम गांव जाएंगे. उन की सहेली डाक्टर है. उन के पास जा कर मेरा गर्भपात करवा देंगी. लेकिन यह पापा को मंजूर नहीं था. पापा ने बहुत डांटा कि तुम जीव हत्या नहीं कर सकतीं. जीव हत्या करना पाप है. और फिर देर भी हो चुकी है.

मम्मीपापा को कुछ समझ में नहीं आ रहा था इसलिए उस साल मैं और मम्मी गांव में ही रहे. 9 महीने तक वहीं रुके रहे और बेटा होने के बाद उसे अनाथालय में दे दिया और हम शहर लौट आए. सालभर मेरी तबीयत खराब होने की वजह से मैं कोई ऐग्जाम नहीं दे पाई फिर दूसरे साल प्राइवैट ऐग्जाम दे कर पास की और कालेज में चली गई… उस के बाद जिंदगी बहुत ही मुश्किल थी. सबकुछ भूल जाना था और बस पढ़ाई और पढ़ाई में लग जाना था. अब 24 घंटे में से अधिक समय सिर्फ पढ़ाई होती थी और इस तरह मुझे नर्सिंग कालेज मैं ऐडमिशन मिल गया था. मम्मीपापा बहुत खुश थे और शायद मैं ने भी उन को जो दुख दिया उस को कुछ कम कर पाई थी.

मुझे आज भी वे दिन याद आते तो जैसे जिंदगी से नफरत हो जाती. ऐसा क्यों हो जाता है कि जिंदगी ऐसी जगह पर ला कर हमें रख खङी कर देती है जहां से निकल पाना बहुत मुश्किल होता है… लेकिन अब मैं अपने काम में बिजी हो चुकी थी. मेरी पढ़ाई पूरी हुई और ट्रैनिंग के बाद मुझे एक क्लीनिक में नौकरी मिल गई. कुछ दिन गुजर गए और फिर मां भी गुजर गईं. नीता, पापा और मैं ही घर में थे अब. नीता की पढ़ाई पूरी हुई तो उस के लिए अच्छा सा लड़का देख कर शादी कर दी. मम्मी की कमी को घर पूरा नहीं कर पा रहा था और पापा बहुत दुखी रहते थे. मुझे हिम्मत कर के घर को संभालना था.

अनाथालय से अमित (यही नाम रखा था उस का) को दिल्ली के एक परिवार ने गोद लिया था. वहां उस की बहुत अच्छी परवरिश हुई. वह पढ़लिख कर इंजीनियर बन गया था. उस को मुंबई में जौब मिल गई थी. अमित के मम्मीपापा उस के पास आए हुए थे. हमारा क्लीनिक उन के सोसाइटी के बाहर ही था. कहने को तो क्लीनिक अस्पताल के समान था और वहां बड़ेबड़े डाक्टर आते थे और लगभग हर इलाज की व्यवस्था थी. जब अमित के पिता को हार्ट अटैक आया तब उन्हें हमारे ही अस्पताल में लाया गया. उस समय सीमाजी ड्यूटी पर थीं. उस दिन अमित का विश्वास डाक्टर पर और बढ़ गया. फिर 2-3 दिनों में अमित के पापा की तबीयत में सुधार हो गया लेकिन एक दिन उन्होंने अमित को बताया कि बेटा, तुम ने मेरी बहुत सेवा की. अब मैं ज्यादा नहीं रहूंगा लेकिन एक बोझ अपने मन पर ले कर नहीं मरूंगा. बेटा, मेरे जाने के बाद तुम्हें और कोई बताए कि तुम हमारे बेटे नहीं हो इस के पहले मैं ही तुम्हें बता देता हूं कि हम ने तुम्हें अनाथालय से गोद लिया था.

अमित ने कहा,”पर पापा, कहां से?”

तब उन्होंने सबकुछ बताया. अमित के मन में पिता के प्रति और भी सम्मान बढ़ गया. दूसरे ही दिन वे

चल बसे. लेकिन अमित के मन में यह बात बैठ गई और वह सोचने लगा कि मां की क्या मजबूरी रही होगी जो उन्हें मुझे अनाथालय में देना पड़ा.  एक बार मैं उन से मिलना चाहूंगा और शायद उन के मन में भी यही तड़प होगी.

फिर कुछ दिन बीत गए. अमित की खोजबीन चलती रही. लेकिन मां का पता नहीं मिला. इतनी बड़ी दुनिया में ढूंढ़ पाना मुश्किल था. पर वह कुदरत से हमेशा मांगता था कि एक बार मां से मिल सकूं.

कुछ दिन बीत गए फिर अमित की शादी हो गई. सबकुछ अच्छा चल रहा था. मांपिताजी के जाने के बाद मैं  टूट गई थी. एक दिन अमित की मां को पक्षाघात पड़ा और उस के बाद तो वे बिस्तर से उठ नहीं सकीं. उन के लिए एक नर्स की तलाश थी क्योंकि अमित और नेहा दोनों ही सुबह से शाम तक बाहर रहते थे. मम्मी की देखभाल के लिए फुलटाइम कोई होना चाहिए. इसलिए अमित ने डाक्टर से पूछा तो डाक्टर ने उसे नंबर दिया और कहा कि आप इस नंबर पर फोन कर के पूछ लीजिए. आप को हमारे अस्पताल की एक सिस्टर, जो पिछले महीने रिटायर हुई हैं, यह उन का नंबर है.

अमित ने पूछा तो मैं ने तुरंत हां बोल दिया. धीरेधीरे अमित की मम्मी की तबीयत में सुधार होने लगा. वे मुझे दिल ही दिल में बहुत आशीर्वाद देतीं और कहती थीं कि बहन, तुम्हारा और मेरा पिछले जन्म का क्या नाता है जो तुम इतनी अच्छी तरह से देखभाल करती हो वरना आजकल तो पैसे दे कर भी कोई नहीं करता. शायद कुछ रिश्ता रहा हो.

उन की एक आदत थी. वे रोज रात को अपनी डायरी लिखती थीं. उन से कुछ पूछो तो वे कुछ नहीं बताती थीं. बस कहतीं कि एक ही तो जन्म मिला है जिस में जितनी सेवा की जाए उतनी कम है.

एक दिन बातों ही बातों में उन्होंने  बताया कि मेरा बेटा कितना खयाल रखता है, मेरा भी और आप का भी. ऐसा बेटा कुदरत सब को दे. वे बोलीं,”देखो, मैं रहूं या नहीं रहूं, तुम मेरे बेटे का ध्यान रखना.”

मैं समझ नहीं पाई कि वे ऐसा क्यों बोल रही हैं. उस दिन उन्होंने मुझे अमित के बारे में सबकुछ बताया कि हम उसे अनाथालय से लाए थे. मैं ने पूछा कहां से? मतलब किस अनाथालय से तो उन्होंने जो बताया उसे सुन कर मेरे पैरों के नीचे की जमीन ही खिसक गई. मैं जान गई कि अमित मेरा ही बेटा है. वह मुझे बहुत अपना सा तो लगता था लेकिन समझ में नहीं आता था कि मैं जो सोच रही हूं सही है क्या? या मेरा वहम जो मेरा हर इंसान में अमित को खोजना…

ऐसे लग रहा था जैसे यहां से बहुत दूर चली जाऊं. लेकिन बेटे की ममता ने मेरे पैरों को रोक दिया. मैं ने तो सिर्फ जन्म दिया. जिस यशोदा ने मेरे बेटे को पालपोस कर बड़ा किया वह धन्य है. मेरे बेटे को जिंदगी दी उस देवी ने, उस देवी की सेवा करने का मौका मिला है. उसे छोड़ कर मैं कैसे जा सकती हूं… मैं मेरे बेटे की अपराधी हूं.

शायद मेरे अपराध की सजा पूरी हुई. कुदरत का लाखलाख शुक्रिया जो उन्होंने मेरे बेटे से मिलाया. वरना मैं तो अधूरी आस लिए इस दुनिया से चली जाती. पर मैं बेटे की जिंदगी पर अपने इस मनहूसियत की छाया नहीं आने दूंगी और उसे पता नहीं चलने दूंगी कुछ.

यशोदा के गुजर जाने के बाद मैं ने कहा कि बेटा, अब मुझे जाना होगा तब अमित ने रोक लिया,”आंटी, आप हमारे पास रहो न.”

यशोदा के गुजर जाने के बाद जब मैं ने उन की डायरी पढ़ी तब मुझे पता चला कि अमित यशोदा की नहीं मेरा बेटा था, जो इतने पास रहते हुए भी इतना दूर था.

कुदरत का लाखलाख शुक्र है जो मुझे मेरे बेटे से मिला दिया… कहते हैं न कि दिल से जिस को मांगो वह जरूर मिलती है, चाहे वह वस्तु हो या इंसान. बस, मांगना आना चाहिए और मिलने पर उसे पहचानने की नजर होनी चाहिए. अब मैं और मेरा बेटा साथ थे. बस एक कसक सी थी कि एक मां की तरह प्यार करने के बावजूद भी उसे हकीकत बता कर उस के दिल में मेरे लिए नफरत पैदा करना नहीं चाहती थी. अगर उसे जन्म दिया तो पालनेपोसने की जिम्मेदारी भी मेरी ही होनी चाहिए थी.

मेरी चिन और अपरलिप पर बाल हैं, कोई घरेलू उपाय बताएं जिससे बाल स्थाई रूप से हट जाएं?

सवाल

मेरी चिन और अपरलिप पर बाल हैं, जिन्हें मुझे हर थोड़े दिन बाद थ्रैडिंग या वैक्सिंग से हटवाना पड़ता है. लेकिन वे फिर जल्दी बढ़ जाते हैं और चेहरा खराब दिखने लगता है. ऐसा कोई घरेलू उपाय बताएं, जिस से चिन व अपरलिप के बाल स्थाई रूप से हट जाएं?

जवाब

सामान्यतौर पर चेहरे पर अवांछित बाल हारमोनल असंतुलन के कारण होते हैं. इन अवांछित बालों को आप ब्यूटी ट्रीटमैंट जैसे ब्लीचिंग, वैक्सिंग, लेजर ट्रीटमैंट यानी हेयर रिमूवल क्रीम द्वारा हटवा सकती हैं. इन में लेजर ट्रीटमैंट स्थाई उपाय है बाकी सभी अस्थाई उपाय हैं. आप घरेलू उपाय के तौर पर हलदी का गाढ़ा पेस्ट बनाएं व अवांछित बालों पर लगाएं और फिर सूखने दें. सूखने पर रगड़ कर हलदी छुड़ा लें व चेहरे को धो लें. ऐसा

4-5 हफ्तों तक लगातार करें. हलदी प्राकृतिक ब्लीच का काम करेगी और धीरेधीरे बालों की ग्रोथ को जड़ से खत्म करने में मदद करेगी. इसी तरह नीबू व चीनी का पेस्ट भी चेहरे के अवांछित बालों को हटाने में मदद करेगा.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

KKK12: मगरमच्छ को Kiss करने के बाद ऐसा हुआ इस एक्ट्रेस का हाल, देखें Video

खतरों के खिलाड़ी 12 (Khatron Ke khiladi 12) की शूटिंग शुरू हो चुकी हैं. दर्शकों को इस शो का बेसब्री से इंतजार है. सेलिब्रिटी शो में खतरों का सामना करने के लिए  केपटाउन पहुंच चुके हैं. जी हां, शो से जुड़ा वीडियो आए दिन वायरल होता रहता है. इसी बीच बीच सृति झा (Sriti Jha) की एक वीडियो तेजी से वायरल हो रही है. आइए बताते है, क्या है इस वीडियो में…

इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि सृति झा अपनी बस में झूमझूम कर नाचती दिख रही है. सृति झा का ये अंदाज देखकर बाकी कंटेस्टेंट्स हैरत में पड़ गए हैं. बता दें कि इससे पहले सृति झा मगरमच्छ को किस करती नजर आई थीं. सृति झा का ये वीडियो फैंस को काफी पसंद आ रहा है.

 

इस शो में कई टीवी सितारे स्टंट करते समय घायल हुए हैं. कनिका मान ने एक तस्वीर शेयर की थी. इस तस्वीर में कनिका मान के हाथ और पैर पर काफी चोट के निशान दिखे थे.

 

तो वहीं स्टंट करते समय रुबीना दिलाइक के भी पैर में चोट लगी थी. चोट की वजह से रुबीना दिलाइक की हालत खराब हो गई थी.

 

वनराज से बदतमीजी करेगी पाखी, बरखा को धमकी देगा अनुज!

टीवी सीरियल अनुपमा में इन दिनों बड़ा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो में नयी एंट्री से कहानी में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि अनुपमा के घर से शाह परिवार बिना खाना खाये लौट जाता है. इससे अनुपमा काफी निराश होती है. शो के आने वाले एपिसोड में एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिल रहा है. आइए बताते हैं, शो के आने वाले एपिसोड के बारे में…

शो में आप देखेंगे कि पाखी वनराज से बदतमीजी करेगी. वह कहेगी कि उसे अपने पापा पर शर्म आती है वह अपनी मम्मी के घर में रहना चाहती है. पाखी वनराज को सुना देगी कि वह आधा दिन शाह हाउस और आधा दिन अपनी मां के बड़े घर में रहकर बिताएगी.

 

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समर और काव्या पाखी को समझाने की कोशिश करेंगे लेकिन बात और भी बढ़ जाएगी. वनराज अपना आपा खा बैठेगा और पाखी को जमकर खरी खोटी सुनाएगा. तो वहीं बा भी उसे सुनाएंगी.

 

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तो दूसरी तरफ काव्या और वनराज एक-दूसरे से प्यार से बात करेंगे.  वनराज भी काव्या के बदले-बदले अंदाज को देखकर खुश होगा और उसे शुक्रिया कहेगा.

 

शो में ये भी दिखाया जाएगा कि अनुज बरखा के कमरे में जाएगा और उसे समझाएगा कि अगर अनुपमा के साथ कुछ गलत हुआ तो वह बर्दाश्त नहीं कर पाएगा.

 

तो वहीं दूसरी तरफ बरखा चौखट के बाहर तुलसी का पेड़ देखेगी और उसे गुस्सा आएगा कि डेकॉर के साथ हुई छेड़खानी हुई है. लेकिन अंकुश उसे समझाएगा कि वह इस बात को लेकर ना लड़े.

सिमरिया मौब लिंचिंग: हिंदू न मानने की सजा

गौमांस बहाना है. असल मकसद आदिवासियों को डराना है ताकि वे खुद को कट्टर हिंदू मानने लगें. कट्टर हिंदूवादियों की यह जिद और कोशिश आजादी के बाद से ही मुहिम की शक्ल में परवान चढ़ने लगी थी. इस बैर की कहानी महज दो लफ्जों की है कि आदिवासी हिंदू हैं या नहीं.

‘‘घटना के दिन मैं अपने घर में सोया हुआ था. रात के कोई 2 बजे होंगे, गांव से मारोमारो की आवाजें आईं. मैं कुछ सोचसम?ा पाता, इस के पहले ही भीड़ मेरे घर में भी घुस आई और मु?ो मारने लगी. पहले कुछ थप्पड़ मारे, फिर घर के बाहर घसीट कर मारने लगे. वे

20-25 लोग थे जो लातघूंसों के अलावा डंडों से भी मार रहे थे. मेरे घर वालों ने मु?ो उन से बचाने की कोशिश की लेकिन वे नहीं रुके. भीड़ में शामिल लोग चिल्लाचिल्ला कर कह रहे थे कि हम बजरंग दल के आदमी हैं, तुम ने गाय की हत्या की है. जबकि, इस बारे में मु?ो कुछ मालूम ही नहीं था.

‘‘मेरे घर के ही बाहर वे लोग संपत और धनशा को भी ले आए थे जिन की पिटाई मु?ा से पहले की गई थी और मु?ा से ज्यादा भी हुई थी. वे लोग हमें पुलिस के हवाले करने ले जा रहे थे. तभी किसी गांव वाले ने कहा कि अगर थाने ले जाते रास्ते में इन्हें कुछ हो गया तो इस का जिम्मेदार कौन होगा. इस पर उन्हीं लोगों में से किसी ने पुलिस को फोन कर दिया. एकडेढ़ घंटे बाद पुलिस आई और हमें थाने ले जाने लगी.

‘‘वे लोग बारबार गौमांस रखने का इलजाम लगा रहे थे. यह आरोप सरासर ?ाठा है. अगर गौमांस होता तो वे मु?ो दिखाते. मु?ो नहीं पता गौमांस रखने का ?ाठा आरोप किस ने मु?ा पर लगाया. यह बजरंग दल वालों की ही कोई चाल लगती है. धनशा और संपत को इतना मारा गया था कि वे ठीक ढंग से गाड़ी में बैठ भी नहीं पा रहे थे. वे पहले ही अधमरे हो चुके थे. दोनों बादलपुरा पुलिस चौकी पर भी नहीं उतर पा रहे थे. वहां से उन्हें कुरई अस्पताल भेज दिया गया. सुबह कोई 8 बजे पता चला कि पहले धनशा और उस के 10 मिनट बाद संपत ने भी दम तोड़ दिया.’’

पेशे से मजदूर 28 साला बृजेश बट्टी बच गया तो इसे उस का समय भी कहा जा सकता है और यह भी कहा जा सकता है कि राक्षसों सा कहर बरपा रहे बजरंगी इतना थक चुके थे कि बृजेश को ज्यादा मारने का दम उन में नहीं बचा था और अहम बात यह कि दहशत फैलाने का उन का मकसद तो संपत और धनशा की धुनाई से ही पूरा हो गया था. बृजेश तो बेचारा बोनस में पिटा.

ये दोनों आदिवासी रास्ते में ही मर गए थे या पुलिस चौकी में मरे या फिर इलाज के दौरान मरे, इन बातों के अब कोई माने नहीं हैं क्योंकि वे आदिवासी थे जिन की जिंदगी और हैसियत हिंदुओं की नजर में मवेशी सरीखी ही होती है. फिर 2 अदिवासियों की मौतों पर हंगामा क्यों? मर गए तो मर गए. गाय के गोश्त की तस्करी करेंगे या खुद घर में पका कर खाएंगे तो उन के इस पाप की सजा मौत ही धार्मिक किताबों में लिखी है. मामला अदालत जाता तो भी उन्हें थोड़ीबहुत सजा होती जो बजरंगियों और श्रीराम सेना वालों को मंजूर नहीं थी. लिहाजा, उन्होंने 2 मई की रात सिमरिया पहुंच कर अपना इंसाफ कर दिया. इस भगवा अदालत के मुंशी, पेशकार, वकील और जज भी यही थे.

यह है घटना

महाकौशल इलाके के सिवनी जिले के गांव सिमरिया, जहां साजिश के तहत एक बड़ी वारदात को अंजाम दिया गया, में आदिवासियों की तादाद ज्यादा है. बृजेश की रिपोर्ट पर पुलिस ने पहले 3 और फिर 6 लोगों को गिरफ्तार किया. ये सभी सवर्ण हिंदू हैं जिन में से अधिकतर की गिनती पिछड़ी जातियों में होती है. इन फुरसतिए नौजवानों ने हिंदू धर्म की ठेकेदारी लेते गायों की हिफाजत का भी जिम्मा उठा रखा है.

सिमरिया से ले कर दिल्ली तक पिछड़े युवा हिंदू इन दिनों धरनेप्रदर्शनों और दंगों में हाथ धोते धर्म की ही रक्षा कर रहे हैं. सिवनी के बजरंगियों के सपने में शायद विष्णु आ कर बता गया था कि गांव सिमरिया में अमुक आदिवासियों ने गौमाता की हत्या कर उस का मांस निकाला है, इसलिए हे शूरवीरो, धर्म और गौ रक्षको, हथियार उठाओ और जाओ पापियों को दंड दो.

इस हुक्म की तामील आधी रात को किस बर्बर, नृशंस और हैवानियतभरे तरीके से हुई, यह शायद शंकर की कृपा से बच गए. बृजेश की बातों से उजागर होता है कि तीनों को मवेशियों की तरह धुना गया. जादू के जोर से इन्हें पता चल गया था कि दलितों और मुसलमानों के बाद ये जंगली गंवार आदिवासी भी गौमांस खाने लगे हैं और पैसों के लिए उस की तस्करी भी करने लगे हैं.

चूंकि ये भी हिंदू नहीं हैं, इसलिए गाय की अहमियत नहीं सम?ाते कि वह (गाय) वैतरणी पार लगाने वाली होती है. उस के शरीर में 33 करोड़ देवीदेवता रहते हैं और ये पापी उसे काट रहे हैं. अगर आज इन्हें नहीं रोका गया तो हिंदू धर्म खतरे में पड़ जाएगा और एक दिन खत्म भी हो जाएगा.

धनशा और संपत की मौत के बाद बजरंगी छू हो गए लेकिन सिवनी से भोपाल होते दिल्ली तक इतना हल्ला मच चुका था कि अब हत्यारों को खुलेआम घूमने देना जंगलराज या रामराज्य, कुछ भी कह लें, का खुला ऐलान होता जिस के लिए यह वक्त मुनासिब नहीं.

हां, हालत यही रहे और केंद्र व मध्य प्रदेश में भगवा सरकारें रहीं तो जरूर इन देवदूतों और गौरक्षकों को फूलमाला पहना कर स्वागत किया जाएगा और इन की जगहजगह शोभायात्राएं भी निकाली जाएंगी. मुमकिन है इन्हें सरकारी नौकरियों से नवाजा जाने लगे या फिर उद्योगधंधे, दुकान या कारोबार चलाने के लिए इन्हें सरकारी खजाने से पैसा दिया जाने लगे.

खैर, कहने को ही सही, राज संविधान का है और देश थोड़ाथोड़ा लोकतंत्र के मुताबिक चलता है, इसलिए शेर सिंह राठौर, अजय साहू, वेदांत चौहान, दीपक अवधिया, वसंत रघुवंशी, रघुनंदन रघुवंशी, अंशुल चौरसिया, रिंकू पाल और शिवराज रघुवंशी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया जहां उन की खातिर दामादों सरीखी ही हुई होगी.

मौका ताड़ते कांग्रेस ने हल्ला मचाया तो आदिवासी जाम लगाने लगे. इस से भाजपा सरकार की किरकिरी होने लगी और गुस्साए तमाम आदिवासी उस के खिलाफ लामबंद होने लगे तो सरकार ने मृतकों के परिजनों को 8.25-8.25 लाख रुपए की राहत राशि देने का ऐलान कर बजरंगियों के पाप का पश्चात्ताप कर डाला. भाजपा की जांच टीम सिमरिया पहुंची तो आदिवासियों ने उस की हायहाय की, जिस से घबराए भाजपाई उलटे पांव भोपाल लौट आए.

सियासत भी, मजहब भी

देश में ऐसा यानी सिमरिया जैसा हर कभी हर कहीं होता रहता है लेकिन बात आईगई हो जाती है क्योंकि मामला दलित आदिवासियों का होता है जिन की गिनती ही धर्म के लिहाज से जानवरों में होती है. सिमरिया की मौब लिंचिंग भी आईगई हो जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए जिस की जांच का जिम्मा एसआईटी को सौंप दिया गया है. यह एजेंसी वही जांच रिपोर्ट तैयार करती है जिस से भगवा गैंग की नाराजगी का सामना उसे न करना पड़े.

पुलिस कह रही है कि उस ने पीडि़तों के घर से 12 किलो गौमांस बरामद किया है तो बेचारे बृजेश का नपना जरूर तय दिख रहा है, जिस की शादी रीमा नाम की लड़की से डेढ़ महीने पहले ही हुई है. इस आदिवासी दुलहन की हथेलियों से अभी मेहंदी का रंग छूटा नहीं है. दरिंदगी पर उतारू बजरंगियों के सामने वह गिड़गिड़ाई थी कि मेरे पति को छोड़ दो, उस ने कुछ नहीं किया है. इस पर जवाब यह मिला था कि तू बीच में मत पड़, वरना तेरा और बुरा हाल होगा.  रीना उन की मंशा सम?ा गई, इसलिए चुप रहने में ही उस ने अपनी भलाई सम?ा.

रहे संपत और धनशा तो उन्हें उन के किए की सजा जिस्म से नापाक रूह को आजाद कर दी जा चुकी है. उन के बीवीबच्चे बिलखबिलख कर इमदाद के बजाय इंसाफ मांग रहे हैं. जब बजरंगी बृजेश को शहीद करने घर से बाहर ले जा रहे थे तब रीना की ?ाड़प उन से हुई थी.

पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ लाख हल्ला मचाते रहें, उस का कोई असर शिवराज सरकार पर नहीं होता. सियासी तौर पर हालफिलहाल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जरूर दिक्कतों से घिर गए हैं जो 17 महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर आदिवासियों को तरहतरह से लुभाने में लगे थे.

मध्य प्रदेश में सत्ता उसी दल को मिलती है जिस की तरफ आदिवासी समुदाय ?ाक जाता है. राज्य में डेढ़ करोड़ से भी ज्यादा आदिवासी वोटर हैं. साल 2018 के विधानसभा चुनाव में इन्होंने कांग्रेस का साथ दिया था, इसलिए वह सरकार बनाने में कामयाब हो गई थी. आदिवासियों के लिए 230 में से 47 सीटें रिजर्व हैं. इन में से महज 16 पर ही भाजपा जीत पाई थी. बाकी 31 कांग्रेस के खाते में गई थीं. 2013 के चुनाव में आदिवासी वोटरों ने भाजपा पर भरोसा जताते उसे 31 सीटों पर जिताया था जिस से शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बन गए थे.लेकिन हालात ये रहे शिवराज सिंह के राज में दलितआदिवासियों पर जुल्मोसितम, जिन्हें कानून की जबान में अत्याचार और प्रताड़ना कहा जाता है, बेतहाशा बढ़े. खुद सरकारी आंकड़े इस की गवाही देते हैं. पिछले साल दिसंबर में राज्य सरकार ने माना था कि राज्य में अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत 33 हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए गए थे.

उग्र हिंदूवादी तेवरों वाले गृहमंत्री पंडित नरोत्तम मिश्रा ने एक तरह से मंजूर किया था कि मार्च 2020 में कांग्रेस से सत्ता छीनने के बाद इन तबकों पर हुए अत्याचारों में भारी इजाफा हुआ है. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के पेश किए आंकड़ों के मुताबिक साल 2020 में 6,889 मामले इन तबकों पर अत्याचार के दर्ज किए गए थे जबकि 2019 में ऐसे दर्ज मामलों की तादाद 5,300 थी जबकि 2018 में 4,753 मामले दर्ज हुए थे. यानी भाजपा राज में इन में 30 फीसदी का इजाफा हुआ.

शिवराज सिंह चौहान आदिवासी अत्याचारों को ले कर कभी संजीदा नहीं रहे, जबकि इन इलाकों की हकीकत वे बेहतर जानते हैं कि कैसेकैसे आदिवासियों का आर्थिक और सामाजिक शोषण होता है और कौन लोग करते हैं. यह खामोशी शह ही साबित हुई जिस का नतीजा था सिमरिया मौब लिंचिंग, जिस में रोज कुआं खोद कर पानी पीने वाले 2 गरीब आदिवासी बेमौत मारे गए.

उन का गुनाह गौमांस कथित रूप से रखना नहीं था बल्कि उन का असल गुनाह खुद को हिंदू न मानना था. आदिवासी हिंदू नहीं हैं.

गौमांस तो लगता है बहाना था, मकसद आदिवासियों को डराना था कि खुद को हिंदू मानने लगो नहीं तो यों ही मारे जाते रहोगे और परेशान किए जाते रहोगे. कट्टर हिंदूवादियों की यह जिद और कोशिश आजादी के बाद से ही मुहिम की शक्ल में परवान चढ़ने लगी थी. इस बैर की कहानी महज इन दो लफ्जों की है कि आदिवासी हिंदू हैं या नहीं हैं.

जवाब दोटूक और बेहद साफ है कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं वे तो चूंकि देश में रहते हैं, इसलिए उन्हें सरकारी कागजों में जबरिया हिंदू बनना पड़ रहा है. संविधान के अनुच्छेद 366 (25) के तहत अनुसूचित जनजाति के लोग हिंदू माने गए थे.

संविधान तो उन्हें हिंदू करार देता है लेकिन हैरत की बात यह है कि हिंदू के लिए बने कानून उन पर लागू नहीं होते हैं. मसलन हिंदू विवाह अधिनयम 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिंदू दत्तकता और भरणपोषण अधिनियम 1956 की धारा 2 (2) और हिंदू वयस्कता और संरक्षता अधिनियम 1956 की धारा 3 (2) के मुताबिक आदिवासियों पर ऊपर बताए कानून लागू नहीं होते. सवाल बड़ा अजीब और दिलचस्प है कि आदिवासी संविधान के मुताबिक तो हिंदू हैं लेकिन कानूनन नहीं. इस खामी पर न तो कभी किसी का ध्यान गया और न ही किसी ने इसे हल करने के बारे में सोचा.

बारीकी से देखें तो क्या आदिवासियों का कोई धर्म ही नहीं है? वे शुरू से ही प्रकृति यानी कुदरत को मानते रहे हैं. जल, जंगल और जमीन से जज्बाती लगाव रखने वाले अदिवासी किसी देवीदेवता की पूजा नहीं करते हैं. वे हिंदुओं की तरह मूर्ति पूजने वाले भी नहीं हैं और न ही दूसरे कर्मकांडों को मानते हैं. आदिवासियों की शादीविवाह के रीतिरिवाज भी हिंदुओं से अलग हैं. वे हिंदुओं में पसरी वर्णव्यवस्था को भी नहीं मानते और न ही इस के दायरे में आते हैं. लेकिन एक साजिश के तहत उन्हें शुरू से ही शूद्रवर्ण का माना जाता रहा है.

आदिवासी न तो राम, कृष्ण और विष्णु, शंकर को मानते हैं और न ही हनुमान को जिन्हें वनवासी कहा जाता है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजस्थान विधानसभा चुनावप्रचार के दौरान हनुमान को शूद्र कहा था तो खासा बवंडर देशभर में मचा था. उन की मंशा ऊंची जाति वाले तमाम हिंदुओं की तरह यह जताने की थी कि आदिवासी गंवार, गुलाम और जाहिल हैं. मौजूदा दौर का सच भी यही है.

आदिवासियों के हिंदू न होने की एक बड़ी वजह यह भी कि वे न तो पितरों का श्राद्ध करते हैं और तीर्थयात्रा पर भी नहीं जाते. हिंदुओं से नजदीकियों के चलते इतना जरूर हुआ है कि वे अब तंत्रमंत्र और भूतप्रेत को मानने लगे हैं जो उन के लिए नुकसानदेह ही साबित हो रहा है. उन में भी ज्ञानियों, ओ?ाओं और गुनियों की फौज तैयार होने लगी है जो उन्हें तरहतरह के डर दिखा कर लूटतीखसोटती है.

सवर्णों ने कभी नहीं चाहा कि आदिवासी पढ़ेंलिखें, जागरूक बनें और सभ्य समाज का हिस्सा बनें. इसलिए हमेशा उन्हें लतियाया गया. अव्वल दर्जे के सीधे आदिवासी कभी अपने साथ हो रही जोरज्यादती का विरोध भी नहीं कर पाए. हालांकि उन का शुरू से ही मानना है कि वे देश के सब से पुराने और पहले नागरिक हैं, बाकी सब तो बाद में आए और उन्हें गुलाम सा बना लिया, उन की जमीनें छीन लीं, जंगलों पर हक जमा लिया और देखतेदेखते ही उन्हें अछूतों की जमात में शामिल कर दिया.

इसलिए परेशान हैं आदिवासी

हिंदुओं की इस मनमानी से आजिज आए आदिवासियों ने ईसाई बनना शुरू कर दिया तो हिंदूवादी संगठनों का माथा ठनका क्योंकि इस से हिंदुओं की तादाद कम हो रही थी और मुफ्त का गुलाम उन के हाथ से फिसल रहा था. ईसाई भी आदिवासियों का हित कहीं से नहीं कर पा रहे लेकिन ईसाई मिशनरियां उन्हें पढ़ाती हैं जिस से वे अपने हक सम?ाने लगे तो फसाद भी शुरू हो गए जो आएदिन आदिवासी बहुल इलाकों में दिखते भी रहते हैं.

हिंदूवादी उन की घरवापसी का

ड्रामा करते रहते हैं. इस बाबत गांवगांव जा कर आरएसएस, बजरंगदल और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों के कार्यकर्ता घरघर जा कर त्रिशूल और हनुमान चालीसा जैसी किताबें बांटा करते हैं. आदिवासी अगर हिंदू होते तो इन चीजों को उन्हें बांटने की नौबत ही न आती. ये तो पहले से ही उन के पास होतीं.

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने कई फैसलों में माना है कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं. भाजपा छोड़ दूसरे राजनीतिक दलों के नेता भी आदिवासियों को हिंदू कहने पर एतराज जताते रहे हैं. हेमंत

सोरेन के ?ारखंड का मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद इस संवाददाता ने रांची में उन से बात की थी. तब उन्होंने साफ कहा था कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं. यह इंटरव्यू सरिता पत्रिका में प्रमुखता से छपा था.

सिवनी के सिमरिया में आदिवासियों की मौब लिंचिंग की एक बड़ी वजह हिंदू युवाओं की यही खी?ा दिखती है कि आदिवासी खुद को सीधे से हिंदू क्यों नहीं मान लेते. नहीं मानते तो उन्हें भी गौकशी के नाम पर खुलेआम बेरहमी से मारा जाने लगा है ठीक वैसे ही जैसे मुसलमानों और दलितों को मारा जाता है.

भगवा गैंग का आदिवासी प्रेम कितना बड़ा धोखा और पाखंड है, यह भी सिमरिया कांड से उजागर हुआ है कि वह आदिवासियों के वोटों के जरिए हिंदू राष्ट्र बनाने का ख्वाव देख रहा है. इस के लिए सीधी उंगली से घी नहीं निकल रहा तो उंगली टेढ़ी की जाने लगी है जो कम से कम आदिवासियों के भले की बात तो नहीं.

Satyakatha: इश्क का जहरीला जुनून

संगीता को महेंद्र से बेपनाह मोहब्बत थी. वे सजातीय नहीं थे, इसलिए शादी नहीं हो पाई. किंतु उन की चाहत का जुनून बना रहा. इसी दौरान महेंद्र की शादी सरिता से हो गई. लेकिन इस बीच ऐसी घटना घटी कि

महाशिवरात्रि का त्यौहार था. तारीख थी 28 फरवरी, 2022. मलीहाबाद के एक मंदिर की सजावट देखने और पूजा करने के लिए लोग उमड़ पड़े थे. कोरोना से उबरने के 2 साल बाद भव्यता के साथ शिवरात्रि का पर्व मनाया जा रहा था.

महेंद्र पूजा खत्म होने का इंतजार कर रहा था, ताकि प्रसाद ले कर जल्द घर जा सके. उस की पत्नी सरिता घर पर अकेली थी. वह उसे 2 महीने पहले ही ब्याह कर लाया था.

नवविवाहिता सरिता को भी अपने पति के आने का बेसब्री से इंतजार था. रात के 11 बज चुके थे. उसे नींद भी आ रही थी, किंतु बारबार आंखें धो कर नींद को भगा देती थी. मंदिर के लाउडस्पीकर से भजन की तेज आवाजें आ रही थीं. कुछ समय में जब घंटे और घडि़याल बजने लगे तब उस ने समझ लिया कि मंदिर की पूजाअर्चना अंतिम दौर में आ गई है.

वह अपने बैड से उठी और रसोई में जा कर 2 थालियों में खाना परोसने लगी. तभी पीछे से उस के कंधे पर किसी ने हाथ रख दिया. वह चौंक पड़ी, क्योंकि घर का मेन दरवाजा भीतर से बंद था. मुड़ कर देखा, पीछे संगीता थी. आश्चर्य से पूछ बैठी, ‘‘अरे तुम! इस वक्त? अंदर कैसे आई? दरवाजा तो बंद था? महेंद्र आ गए क्या?’’

‘‘मैं तो कहीं भी, कभी भी पहुंच सकती हूं. महेंद्र के दिल की रानी जो ठहरी.’’ यह कहती हुई संगीता ने उसे अपनी ओर एक झटके में खींच लिया.

जोर से खींचे जाने पर सरिता लड़खड़ा गई. बड़ी मुश्किल से गिरतेगिरते बची. वह बोली, ‘‘अरेअरे, ये क्या करती हो मैं गिरने वाली थी. चोट लग जाती तो?’’

‘‘तुम्हें गिराने ही तो आई हूं, ऐसा गिराऊंगी कि कभी उठ ही नहीं पाओगी.’’ इसी कड़वे बोल के साथ संगीता ने एक हाथ से उस की चोटी कस कर पकड़ ली और दूसरे हाथ से कमरे की कुंडी लगा दी.

संगीता क्या करने वाली थी, सरिता को न तो कुछ समझने का समय मिला और न ही विरोध करने का मौका. संगीता ने उस के सिर को पास रखे लकड़ी के स्टूल पर दे मारा. स्टूल के कोने से सिर टकराने से खून निकलने लगा. वह चीखी, लेकिन उस की चीख बंद कमरे से बाहर नहीं निकल पाई. वैसे भी बाहर लाउडस्पीकर का काफी शोर था.

सरिता चोट खा कर जमीन पर गिर गई थी. इस के बाद संगीता ने उस पर स्टूल से ही ताबड़तोड़ हमला कर दिया. दोनों के बीच कुछ देर तक हिंसक मारपीट का दौर चलता रहा.

आखिर में संगीता के आक्रामक तेवर के आगे सरिता ही पस्त पड़ गई. वह बुरी तरह से जख्मी हो गई. कराहने लगी. फिर संगीता ने कमर में छिपा कर लाए बांके से उस के शरीर पर लगातार कई हमले किए. गरदन पर हुए हमले से सरिता एकदम से निढाल हो गई, जिस से खून निकल कर जमीन पर फैल गया.

संगीता ने एक नजर उस पर डाली और भुनभुनाती हुई बोलने लगी, ‘‘अब मर हरामजादी यहीं पर. कुतिया कहीं की. याद रख कि महेंद्र मेरा नहीं तो तू भी महेंद्र की नहीं.’’

उस ने मरणासन्न सरिता को एक जोरदार लात मारी. लात की चोट खा कर वह औंधे मुंह पलट गई. उस के बाद संगीता मकान के पिछले दरवाजे से निकल कर अंधेरी गली और फिर खेतों से होते हुए फरार हो गई.

महेंद्र थोड़ी देर में मंदिर से पूजा का प्रसाद ले कर घर आ गया. बंद दरवाजे की कुंडी खटखटाई. दरवाजा नहीं खुलने पर सोचा, शायद सरिता सो रही होगी. फिर दीवार फांद कर अपने मकान में दाखिल हो गया. वह बैडरूम में गया. सरिता वहां नहीं दिखी तो उसी के साथ लगे दूसरे कमरे की ओर आगे बढ़ा, जो रसोई से जुड़ा था. किंतु यह क्या, जब उस ने अंदर का मंजर देखा तो हक्काबक्का रह गया.

उसे तनिक भी यकीन नहीं हो रहा था, 2 महीने पहले ही बयाह कर लाई गई पत्नी इस हाल में होगी. पूरी तरह खून से लथपथ. वह जमीन पर निढाल पड़ी हुई थी. चारों तरफ फैले खून के बीच औंधी पड़ी पत्नी को उठाने के लिए उस ने हाथ बढ़ाया.

उस के कराहने की आवाज सुनाई दी तो तुरंत पूछा, ‘‘कैसे हुआ यह सब, कौन आया था यहां?’’

सरिता धीमी सांस ले कर कराहते हुए बोली, ‘‘चुड़ैल संगीता…’’ इतना कहने के बाद वह बेहोश हो गई.

तब तक घर में पड़ोस में रह रहे दूसरे परिजन भी आ चुके थे. सब ने सरिता की हालत देखी. डाक्टर के पास ले जाने की बात कही लेकिन जहां महेंद्र का घर था, वहां से आधी रात के वक्त उपचार के लिए शहर ले जाना आसान नहीं था.

महेंद्र सरिता के सिर को अपनी गोद में लिए था. उस के गालों को थपकी दे कर होश में लाने की कोशिश कर रहा था, जबकि एकदो औरतें उस के शरीर से बह रहे खून को रोकने का घरेलू उपाय करने लगी थीं.

कुछ देर में ही महेंद्र ने पाया कि सरिता की अटकती सांसें एकदम से थम गईं. उस के बाद तो घर में चीखपुकार मच गई. मातम का माहौल बन गया.

सुबह होते ही सूर्योदय से पहले सरिता के पति महेंद्र ने मोबाइल से इस घटना की सूचना अपनी ससुराल फूलचंद खेड़ा निवासी ससुर रामसनेही को दे दी. यह गांव लखनऊ जिलांतर्गत मलीहाबाद थाने में आता है.

सूचना पाते ही रामसनेही चौंक गए. उन्होंने दहेज हत्या का मामला समझा और बदहवासी की हालत में कुछ लोगों को साथ ले कर पहले  पुलिस चौकी कसमंडी गए. वहीं सरिता ब्याही थी. उन्होंने महेंद्र और उस के घर वालों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और हत्या की शिकायत दर्ज करवा दी.

यह पुलिस चौकी भी मलीहाबाद थाने में आती है. रामसनेही की शिकायत की सूचना चौकीप्रभारी ने तुरंत मलीहाबाद थानाप्रभारी नित्यानंद सिंह को भेज दी गई. इस तरह पहली मार्च, 2022 को एक घंटे के भीतर ही एसएसआई नसीम अहमद सिद्दीकी और बीट प्रभारी कुलदीप सिंह घटनास्थल पर पहुंच गए.

उन के साथ हैडकांस्टेबल नृपेंद्र सिंह, लेडी कांस्टेबल सुरमिला यादव, कांस्टेबल अवनीश सिंह भी थे. वहां पहले से ही पुलिस चौकी कसमंडी पर तैनात हैडकांस्टेबल मदन सिंह और कांस्टेबल राघवेंद्र सिंह पहुंचे हुए थे.

सभी ने सरिता के शव और घटनास्थल का मुआयना किया. उस के पति महेंद्र, घर वालों और ग्रामीणों से आवश्यक पूछताछ की गई. उन्हें केवल यह मालूम हुआ कि सरिता की किसी ने बेरहमी से हत्या कर दी है. मारने वाली संगीता नाम की महिला हो सकती है.

सरिता की लाश का पंचनामा तैयार कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. उस के पिता राम सनेही द्वारा दी गई लिखित शिकायत के आधार पर भादंवि की धारा 120बी एवं 498, 3/4 डीपी ऐक्ट के अंतर्गत एफआईआर दर्ज कर ली गई.

मुख्य आरोपी उस के पति महेंद्र को बनाया गया. महेंद्र मधवाना गांव के निवासी रामेश्वर दयाल का बड़ा बेटा था. परिवार में भाई रामचंदर और महेश हैं. उन्हें भी आरोपी बनाया गया. इस जांच के बारे में सीओ नबीना शुक्ला को भी जानकारी दे दी गई.

पूछताछ में महेंद्र ने खुद को निर्दोष बताते हुए संगीता के बारे में भी कई बातें बताईं. किंतु दावे के साथ वह भी नहीं कह पाया कि सरिता की हत्या संगीता ने की होगी. चश्मदीद कोई नहीं था. पुलिस के सामने हत्यारे तक पहुंचने की चुनौती थी.

महेंद्र ने पुलिस से कुछ नहीं छिपाया. संगीता से अपने प्रेम संबंध के बारे में भी साफसाफ सब कुछ बता दिया. उस के अनुसार एक समय में वह संगीता से बेपनाह मोहब्बत करता था. वह उस की प्रेमिका थी, उस के सौंदर्य और मदमस्त कर देने वाली अदाओं का वह दीवाना था.

लेकिन सरिता से शादी के बाद उस की यादों को जहन से निकाल चुका था. इस में वह कितना सफल हो पाया था, ठीक से नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि सरिता के साथ उस के मधुर संबंध नहीं बन पा रहे थे.

संगीता महेंद्र के गांव से सटे दूसरे गांव डीहा की रहने वाली थी. उस ने जिस स्कूल से मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी, महेंद्र भी वहीं पढ़ता था. इसी दौरान उन के बीच दोस्ती हो गई.

आगे की पढ़ाई के लिए संगीता लखनऊ में एक रिश्तेदार के यहां रहने चली गई.

इधर महेंद्र ने हाईस्कूल के बाद आगे की पढ़ाई नहीं की. रोजगार के लिए उस ने ड्राइविंग सीख ली. उसे भी लखनऊ में ही ड्राइविंग का काम मिल गया. एक दिन दोनों लखनऊ की सड़क पर अचानक टकरा गए.

उस रोज दोनों के बीच फिर से नई जानपहचान की शुरुआत हुई. दोनों ने एक होटल में साथ खाना खाया. एकदूसरे के कामकाज और ठौरठिकाने पर भी बातें हुईं. दोनों दोबारा मिलते रहने के वादे के साथ विदा हुए.

उन के बीच प्रेमालाप का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह लगातार परवान चढ़ने लगा. एक दिन संगीता ने महेंद्र से कह दिया कि वह उस के बगैर और अकेली नहीं रह सकती. हमेशा के लिए उस के साथ लखनऊ में ही बस जाना चाहती है. उस का भी काम लखनऊ में ही है तो फिर क्यों न वे दोनों शादी कर लें.

संगीता के प्रस्ताव पर छूटते ही महेंद्र ने भी हामी भर दी. साथ ही आश्वासन दिया कि उस के परिवार की तरफ से शादी में कोई बाधा नहीं आएगी. वह भी अपने मातापिता को राजी कर ले. तभी उन की शादीशुदा जिंदगी मजे में कटेगी.

इसी बीच उन के प्रेम संबंध के छिटपुट किस्से की भनक संगीता के परिवार में कुछ लोगों को लग चुकी थी. एक दिन संगीता के पिता शिवप्रसाद रावत रिश्ते के लिए महेंद्र के पिता रामेश्वर दयाल से मिलने गए.

रामेश्वर दयाल ने गांव, गोत्र और जाति का हवाला देते हुए शादी से इनकार कर दिया. उन्होंने साफसाफ कह दिया कि वह परिवार में दूसरी जाति की बहू किसी भी कीमत पर नहीं लाएंगे.

उस के बाद संगीता और महेंद्र का दिल टूट गया. महेंद्र को अपने परिवार पर भरोसा था, लेकिन वही मुकर गए थे. संगीता इस का उलाहना देने लगी थी. वह जबरन शादी करने की जिद भी कर बैठी.

उस ने तो एक बार महेंद्र को धमकी तक दे डाली थी, ‘‘मैं नहीं तो कोई और नहीं.’’

इसे महेंद्र ने हल्के में लिया था. तड़प दोनों तरफ थी, लेकिन इस समस्या का कोई समाधान नहीं निकल पा रहा था. महेंद्र ने खुद को ड्राइविंग के काम में व्यस्त कर अपने दिल को समझा लिया था, लेकिन संगीता ऐसा नहीं कर पा रही थी. नतीजा उस ने शराब की मदद लेने की ठानी.

वह लखनऊ में जिस रिश्तेदारी में रह रही थी, वहीं शिवबरन से भी उस की अच्छी पटती थी. वह भुलभुलाखेड़ा गांव का रहने वाला था, लेकिन संगीता के दूर का रिश्तेदार भी था. आए दिन उस से छोटीमोटी मदद ले लिया करती थी.

उस की भी नजर संगीता के यौवन पर थी, लेकिन पहली बार वह शिवबरन के काफी पास बैठी शराब का गिलास थामे हुए थी. संगीता शराब का घूंट धीरेधीरे लगा रही थी. शिवबरन ने पूछा, ‘‘कड़वी लग रही है? थोड़ा और पानी मिला दूं.’’

‘‘अरे नहीं रे शिवबरन, सुना है शराब पीने से गम दूर हो जाता है, इसलिए पी रही हूं. किसी को मत बताना इस बारे में.’’ संगीता लड़खड़ाती आवाज में बोली.

‘‘क्या गम है तुम्हें? तुम तो इतनी हंसमुख और खुशमिजाज हो.’’ शिवबरन ने यह पूछ कर संगीता के जख्म को कुरेद दिया था.

फिर उस ने अपनी प्रेम कहानी से ले कर शादी में बाधा तक की कहानी सुना डाली. इस के साथ उस ने शिवबरन से मदद करने का वादा लिया.

शिवबरन की जानपहचान महेंद्र से थी. उस ने ड्राइवरी का काम दिलवाने में उस की मदद की थी. इसलिए उसे लगा कि वह उस की बात को नहीं टालेगा.

इसी उम्मीद के साथ वह महेंद्र से मिला. उसे समझाया कि अगर उस के पिता नहीं मान रहे हैं तो वह कोर्ट में शादी कर ले.

बातोंबातों में उस ने संगीता के शराब पीने की भी बात उसे बता दी. उस ने यह भी बता दिया कि घंटों साथ बैठ कर शराब पीती है. नशे की हालत में उसे उठा कर बैड तक ले जाना पड़ता है. उस की हालत देखी नहीं जाती. इसलिए उस के शादी करने से संगीता की जिंदगी संवर जाएगी.

शिवबरन संगीता की बात कह कर चला गया, लेकिन महेंद्र के दिमाग में कुलबुलाने वाला एक कीड़ा भी डाल गया कि वह उस के साथ घंटों बैठ कर शराब पीने लगी है.

उस के दिमाग में संगीता के शिवबरन के साथ यौनसंबंध कायम होने की बात घर कर गई. इस की सच्चाई जाने बगैर महेंद्र ने संगीता से हमेशा के लिए संपर्क खत्म करना ही सही समझा.

एक हफ्ते बाद महेंद्र को संगीता मिल गई. महेंद्र ने उसे दोबारा समझाया कि वह उसे भूल जाए और अपने परिवार के कहे अनुसार शादी कर ले. क्योंकि उस की भी कुछ दिनों में शादी होने वाली है.

महेंद्र की शादी की बात सुन कर संगीता और तिलमिला गई. पैर पटकती हुई गुस्से में चली गई. पूछा तक नहीं कि कब उस की शादी है? कहां तय हुई है? होने वाली पत्नी का नाम क्या है? जातेजाते अंगुली दिखाई. मानो संगीता पर चढ़ा इश्क का जुनून खतरनाक इरादे में बदलने वाला हो.

महेंद्र की 30 जनवरी, 2022 को सरिता के साथ शादी संपन्न हो गई. उस के पिता ने अपनी हैसियत के मुताबिक पैसे, जेवर और दहेज का सामान दे कर विदा किया था. शादी के बाद संगीता एक दिन महेंद्र की नवविवाहिता सरिता को बधाई देने उस के घर गई.

चंद पल में ही उस से दोस्ती बना ली. सरिता को भी लगा कि कोई तो नई जगह में दोस्त मिला. उस के जाते ही महेंद्र ने सरिता को डांट लगाते हुए हिदायत दी कि उस के साथ संपर्क बनाने की कोई जरूरत नहीं है.

जबकि संगीता हर दूसरे तीसरे दिन सरिता के पास पहुंच जाती थी. सरिता को उस का आना बुरा नहीं लगता था, क्योंकि वह घर में अकेली रहती थी. उस के ससुराल के लोग पास के दूसरे मकान में रहते थे.

महेंद्र अपने काम के सिलसिले में लखनऊ चला जाता था. सच तो यह था कि संगीता को महेंद्र की पत्नी सरिता से नफरत थी. उस के दिमाग में सिर्फ एक ही बात घूमती रहती थी कि उस के सिवाय महेंद्र की जिंदगी में कोई और न आने पाए.

महेंद्र द्वारा पुलिस को संगीता के बारे में मिली जानकारी से उसे गिरफ्तार करने की योजना बनाई गई. साथ ही उस के खिलाफ सबूत भी जुटाए जाने लगे.

आखिर पुलिस ने संगीता को मोबाइल फोन सर्विलांस की ट्रैकिंग और मुखबिरों के बिछाए जाल के जरिए गिरफ्तार कर लिया गया. उस की गिरफ्तारी  3 मार्च, 2022 को हुई.

उसे गिरफ्तार कर सीओ नबीना शुक्ला के सामने पेश किया गया. सीओ नबीना शुक्ला ने उस से कहा कि सरिता की हत्या के बारे में अगर तुम सच बता दोगी तो इसी में तुम्हारी भलाई है.

सीओ साहिबा का इतना कहना था कि संगीता फफक पड़ी. रोती हुई बोली, ‘‘बताऊंगी मैडमजी, सब कुछ बताऊंगी. मैं प्यार में अंधी हो गई थी, उसी के चलते यह सब हो गया.’’

उस के बाद संगीता ने सरिता की हत्या का सिलसिलेवार राज खोलते हुए अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

संगीता के बयान के अनुसार हत्याकांड में उस के एक रिश्तेदार शिवबरन ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उस ने घटना के एक दिन पहले शिवबरन से महेंद्र के घर की रेकी करवाई थी.

महेंद्र का मकान गांव में गली के अंदर है, जो पीछे के खेतों से होते हुए  दूसरे रास्ते से जा मिलता है. यानी घर के पिछवाड़े से भी मकान में घुसा जा सकता है. वहां लगा दरवाजा हमेशा बंद रहता है. घर में आनाजाना आगे के रास्ते से ही होता था.

संगीता ने शिवबरन को महेंद्र के गली स्थित मकान पर रात में छिप कर आने को कहा था, क्योंकि उसे महेंद्र के घर के बारे में अच्छी जानकारी थी. सरिता के घर में अकेली होने की सूचना पाने के बाद घर में पिछले दरवाजे से घुस गई थी.

सरिता का काम तमाम करने के बाद वह शिवबरन की मदद से फरार हो गई थी. हत्या में इस्तेमाल किया गया बांका भी शिवबरन ने ही मुहैया करवाया था. इस के बदले में संगीता ने उस के साथ शारीरिक संबंध बनाने की हामी भरी थी. घटना के दिन महेंद्र काम पर लखनऊ नहीं गया था, लेकिन उस रोज शिवरात्रि होने के कारण मंदिर गया हुआ था.

संगीता के बयान के बाद पुलिस ने शिवबरन को भी गिरफ्तार कर लिया. उस ने संगीता हत्याकांड में साथ देने की बात मान ली. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार सरिता के शरीर पर 13 घाव पाए गए.

सरिता हत्याकांड का खुलासा होने के बाद संगीता और शिवबरन आरोपी बनाए गए. उस के बाद थानाप्रभारी द्वारा महेंद्र और उस के घर वालों के खिलाफ दहेज एक्ट के अंतर्गत दर्ज किए गए मुकदमे को बदल कर संगीता और शिवबरन के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 201 एवं 120बी के अंतर्गत बदल दिया गया.

संगीता ने हत्या में प्रयोग में लाए गए बांका, स्टूल, बांस की फट्टी व बेलचा बरामद करवा दिया.

कथा लिखे जाने तक संगीता और शिवबरन को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया था. जबकि पुलिस ने अपनी जांच में सरिता के पति महेंद्र को आरोप की सभी धाराओं से मुक्त कर दिया गया था.

GHKKPM: पाखी बनेगी विराट के बच्चे की मां? देखें Photos

टीवी  सीरियल गुम है किसी के प्यार में (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) में इन दिनों हाईलवोल्टेज ड्रामा दिखाया जा रहा है. जिससे दर्शकों को एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिल रहा है. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि सम्राट की मौत हो जाती है. तो वहीं पाखी चौहान निवास छोड़कर अपनी मां के घर चली जाती है. शो के अपकमिंग एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए जानते हैं, शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो में आपने ये भी देखा कि सई  पाखी को रोकने की कोशिश करती है, लेकिन वह उसकी नहीं सुनती है. शो के अपकमिंग एपिसोड में दिखाया जाएगा कि सई विराट से कहती है कि वो उससे अपने दिल की बात शेयर करे क्योंकि वो भी उसी दुख से गुजर रही है.

 

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इतना ही नहीं सई फूट-फूट कर रोने लगती है और कहती है कि विराट को उसकी बहुत जरूरत है औऱ इसलिए वो उससे बात करें.

 

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सई पुरानी बातें याद करती है. वह कहती है प्रेगेंनसी में विराट उसका  बहुत ख्याल रखता था. वह कहता था कि वह एक अच्छी मां बनेगी. सई, विराट को डॉक्टर की सलाह के बारे में याद दिलाती है कि या तो बच्चा गोद लें या सरोगेसी की मदद ले.

 

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इसी बीच ऐश्वर्या शर्मा (पाखी) ने अपने इंस्टाग्राम पर अपनी कुछ तसवीरें पोस्ट की है. इसमें वो व्हाइट साड़ी में दिख रही है और बेबी बंप फ्लॉन्ट कर रही है. पाखी अपने बेबी बंप को देख रही है. इस फोटो को शेयर करते हुए एक्ट्रेस ने कैप्शन में लिखा, क्या कभी पूरा होगा पाखी का सपना?

इन फोटोज पर यूजर्स पूछ रहे हैं कि क्या वो विराट के बच्चे की मां बनेगी. शो के आने वाले एपिसोड में पता चलेगा कि पाखी का ये सपना पूरा होता है या नहीं?

वनराज बना अनुज, अनुपमा के साथ किया रोमांस

स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाला रिएलिटी शो रविवार विद स्टार परिवार में शाह परिवार जमकर धमाल मचा रहा है. शो के बिते एपिसोड ‘अनुपमा’ स्टार्स छाये रहे. शो के आने वाले एपिसोड में शाह परिवार दर्शकों एंटरटेनमेंट का डबल डोज देने वाले है. आइए बताते है, शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो के अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि अनुपमा-अनुज और वनराज खूब धमाल मचाने वाले हैं. दरअसल अनुज और वनराज अपना किरदार बदलने वाले हैं. वनराज अनुज के किरदार में नजर आएगा तो वहीं अनुज वनराज के किरदार में नजर आएगा.

 

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जी हां, रविवार विद स्टार परिवार में एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिलने वाला है. अनुज और वनराज का किरदार बदलते ही अनुपमा नई आफत में फंस जाएगी.

 

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शो से जुड़ी सोशल मीडिया पर तस्वीरे वायरल हो रही है.  अनुज मूंछे लगाकर वनराज बनने की कोशिश कर रहा है. तो वहीं वनराज, अनुज बनकर अनुपमा के साथ रोमांस करता दिखाई देगा.

 

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तस्वीर में आप देख सकते हैं कि वनराज चश्मा लगाकर अनुपमा के हाथ पर किस करता दिख रहा है. तो दूसरी तरफ वनराज बनकर अनुज सबकी क्लास लगाने वाला है. शो में ये भी दिखाया जाएगा कि अनुपमा को परेशान करते समय अनुज की नकली मूंछ गिर जाएगी. अनुज का चश्मा लगते ही वनराज के तेवर ही बदल गए.

 

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सोशल मीडिया पर ये तस्वीरें जमकर वायरल हो रही है. फैंस सीरियल अनुपमा के सितारों की जमकर तारीफ कर रहे हैं.

छोटी सी जिंदगी- भाग 1: रोहित को कौन-सी बीमारी हुई थी?

आरती और सनाया दोनों सहेलियां बचपन से ही सगी बहनों की तरह रहती हैं. आरती के परिवार में सिर्फ उस के पापा हैं जो प्रतिष्ठित उद्योगपति हैं. उस के पापा ने उसे मां और पापा दोनों का प्यार दिया है. आरती में उन की जान बसती है. जबकि सनाया के परिवार में उस के बड़े भैया व भाभी हैं. उस के भैया एक कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं. उन की कोई संतान नहीं है. वे सनाया को ही अपनी संतान सम?ाते हैं.

दोनों सहेलियां एक ही यूनिवर्सिटी से पढ़ाई कर रही हैं. रोहित, आरती का मंगेतर, भी उसी यूनिवर्सिटी में पढ़ता है. वह एक मध्यवर्गीय परिवार का लड़का है. उस के मातापिता दिनरात एक कर के अपने बेटे के सपने पूरे करने में लगे रहते हैं. इस के बावजूद वह बहुत ही रंगीनमिजाज है.

एक दिन आरती और सनाया यूनिवर्सिटी की कैंटीन में बैठे बतिया रही थीं. अचानक उन की नजर एक कोने में बैठे एक जोड़े पर पड़ी और वे सकते में आ गईं. आरती के तो होश ही उड़ गए. वह लड़का रोहित ही था जो किसी और लड़की के साथ बांहों में बांहें डाले बैठा था. कुछ क्षण वह उन दोनों की बेशर्मी को एकटक निराश मन से देखती रही. फिर थोड़ा रुक कर वह रोहित के पास गई और उसे एक जोर का तमाचा जड़ दिया. साथ ही, उस से अपने सारे रिश्ते तोड़ लिए.

आरती आगेआगे और रोहित उस के पीछेपीछे. ‘‘आरती सुनो तो, तुम ने जो भी कुछ देखा वह गलतफहमी है और कुछ नहीं.’’ आरती बिना कुछ सुने कार में बैठ घर को चल दी.

रात के खाने पर उस के पापा को आरती के चेहरे पर उदासी दिखाई दे रही थी. उन्होंने नोटिस किया कि वह उन से नजरें चुरा रही है. उस के होंठ कुछ कहना चाह रहे हैं, पर जबान साथ नहीं दे रही.

‘‘कोई बात हुई है बेटा, तुम ठीक तो हो?’’ आरती के पापा ने पूछा.

‘‘नहीं पापा, कुछ नहीं. बस, यों ही, थोड़ी थकान हो रही है,’’ आरती ने दबी सी आवाज में जवाब दिया.

‘‘ठीक है, खाना खा कर आराम करना बेटा,’’ कह कर उस के पापा चुप हो गए, पर मन ही मन वे आरती को ले कर चिंता से घिर गए.

देररात आरती के पापा का मोबाइल बजता है. उन के कौल रिसीव करते ही आवाज आई, ‘‘जी, हैलो, अंकल मैं होस्टल से बोल रहा हूं. रोहित ने आत्महत्या करने की कोशिश की है. उसे सिटी हौस्पिटल ले कर आए हैं, आप तुरंत आएं यहां,’’ और फोन कट जाता है. आरती और उस के पापा हौस्पिटल जाते है. आरती मन ही मन अपराधबोध से भरी होती है, कांपती हुई रोहित के पास जाती है. रोहित के पास होते हुए भी वह खामोश ही रहती है. यूनिवर्सिटी के दृश्य उस की आंखों के सामने घूम रहे होते हैं.

कुछ देर की खोमोशी को तोड़ते हुए रोहित बोल पड़ता है, ‘‘तुम्हें अब भी मु?ा पर यकीन नहीं आरती. वह सब छलावा था और तुम सच. आरती, तुम अभी आराम करो, इतना मत सोचो. छोड़ो ये सब, भूल जाओ सबकुछ. मैं तुम से नाराज नहीं.’’ इतने में आरती के पापा आ जाते हैं, ‘‘बेटा रोहित, मैं आरती को घर छोड़ कर वापस आता हूं तुम्हारे पास.’’ वे सारी बातों से अनजान थे.

‘‘आरती, चलें बेटा?’’

‘‘जी पापा.’’

रोहित को जाने का इशारा कर आरती अपने पापा के साथ वहां से चल देती है. उस के अंदर कशमकश चल रही होती है- दिल रोहित पर भरोसा करना चाहता है, तो दिमाग बिलकुल नहीं.

अस्पताल से बाहर आते ही उसे याद आता है कि वह अपना मोबाइल कमरे में ही भूल आई है.

‘‘पापा, मैं अपना मोबाइल तो अंदर ही भूल आई हूं.’’

‘‘कोई बात नहीं बेटा, फिर चल के ले आते हैं.’’

वे दोनों वापस अंदर जाते हैं. तभी रोहित और उस का दोस्त बातें कर रहे होते हैं, ‘‘वाह यार, क्या आइडिया दिया तू ने आरती को फिर से यकीन दिलाने का. अब तो ऐश ही ऐश होंगे, एक तरफ घरवाली तो दूसरी तरफ बाहरवाली.’’

आरती और उस के पापा ये सब सुन कर दंग रह जाते हैं. कोई इतना भी गिर सकता है भला. आरती के पापा के सामने अब सबकुछ साफ हो जाता है. वे अपनी बेटी की परेशानी की वजह सम?ा जाते हैं और उसे हाथ पकड़ कर वहां से ले जाते हैं.

‘‘गाड़ी में बैठो बेटा.’’

?‘‘जी पापा,’’ नजरें ?ाकाए आरती इतना ही कह पाती है और गाड़ी में बैठ जाती है. वह बहुत शर्मिंदा रहती है, उसे याद आता है, कैसे उस ने अपने पापा को दुखी कर के रोहित से रिश्ता जोड़ा था और उस के पापा ने अपनी बेटी की खुशी के सामने घुटने टेक दिए थे.

आज वही बेटी अपने पिता से अपनी नजरें चुरा रही है. आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. बापबेटी दोनों चुप रहते हैं. चारों ओर सन्नाटा सा पसरा हुआ होता है. दोनों ही मन की उधेड़बुन में लगे होते हैं. तभी घर आ जाता है.

‘‘पापा, वो…’’

‘‘बेटा, अभी तुम आराम करो, सुबह बात करते हैं.’’

इतनी बातचीत के बाद दोनों ही खामोशी से अपनेअपने कमरे में चले जाते हैं.

जब रोहित और उस का वही दोस्त अगले दिन सुबह आरती के घर आते हैं तो देखते हैं कि वहां बहुत भीड़ जमा है और खामोशी छाई हुई है. वहीं, लोगों का एक समूह एक अर्थी को फूलों से सजा रहा होता है. आरती के पापा और सनाया खामोशी से उस अर्थी को देखे जा रहे हैं. उन की आंखों से अश्रु की धारा मानो रुकने का नाम ही नहीं ले रही.

‘‘जहां रोहित खड़ा होता है वहीं पास ही में 2 लोग आपस में बात कर रहे होते हैं कि सुना है पंखे से लटक कर जान दी है लड़की ने. जरूर दाल में कुछ काला है भाई.’’ यह सुन कर रोहित के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. मारे डर के वह अपने दोस्त को साथ ले वहां से भाग खड़ा होता है.

‘‘जिंदगीभर तुम्हें बेइंतहा प्यार करने के बावजूद मैं तुम्हें दर्द सहना नहीं सिखा पाया, बेटा. तुम्हारे इस तरह से जाने के बाद एक पल भी चैन से जी न सकूंगा मैं. मैं तुम्हारी यादों को इस शहर में अकेला छोड़ कर जा रहा हूं या यों कहो कि इस भरी दुनिया में तुम ने मु?ो अकेला छोड़ दिया, बेटा.’’ आरती के पापा एक तसवीर से बातें कर रहे हैं.

अब उन्होंने बेसहारा लड़कियों को आसरा देने के लिए एक एनजीओ बनाने का निर्णय ले लिया.

साहिल रोहित का रूममेट है और उस का जिगरी दोस्त भी. रोहित साहिल की हरेक चीज हक से उपयोग भी करता है. पर साहिल का चरित्र बिलकुल श्वेत है और दिल एकदम सोने सा. उस के अलावा घर में परिवार के नाम पर उस की मां और चाचा हैं. उस की मां का नाम मुंबई के नामी उद्योगपतियों की गिनती में आता है.

रोहित साहिल को आरती के बारे में सबकुछ बताता है.

रोहित बोलता है, ‘‘यार, वह आरती…’’

साहिल कहता है, ‘‘क्या, आरती ने तु?ा से सारे रिश्ते तोड़ लिए, यही न. अच्छा ही हुआ. और कितनी लड़कियों के साथ फ्लर्ट करोगे तुम, कब तक सब को धोखा दोगे? जिंदगी में कभी तो सीरियस हुआ करो, मेरे भाई.’’

रोहित बोला, ‘‘वह बात नहीं है, यार.’’

‘‘तो क्या बात है, अब कौन सा कांड कर दिया तुम ने?’’ साहिल ने हैरत

से पूछा.

‘‘आरती ने सुसाइड कर लिया है,’’  रोहित ने साहिल को गले लगाते हुए जवाब दिया.

‘‘क्या… हाथ नहीं लगाना मु?ो,’’ साहिल ने रोहित को धक्का देते हुए कहा.

‘‘ऐसे मत बोल यार, मैं बहुत शर्मिंदा हूं.’’

‘‘तु?ो अंदाजा भी है कि तू ने एक मासूम लड़की की जान ले ली है. दूर हो जाओ मेरी नजरों से,’’ कहते हुए साहिल बैग निकाल सामान पैक करने लगता है.

रोहित अब कहता है, ‘‘मैं जानता हूं कि मैं आरती का गुनाहगार हूं.’’

साहिल बोला, ‘‘तुम सिर्फ आरती के ही नहीं, उस के पापा के भी गुनाहगार हो. तुम ने उन्हें एक जिल्लतभरी जिंदगी दे दी है.’’

अब रोहित बोला, ‘‘मु?ो माफ कर

दे, यार.’’

साहिल ने कहा, ‘‘तुम मु?ा से क्यों माफी मांग रहे हो. माफी मांगनी है आरती के पापा से मांगो.’’

रोहित कहने लगा, ‘‘तू मेरा सब से अच्छा दोस्त है. हम ने पूरे 4 साल साथ में बिताए हैं. ऐसे मु?ो छोड़ कर मत जा. जिंदगी बहुत बो?िल हो गई है यार. इन दोचार दिनों में ऐसा लग रहा है मानो कई सालों का दर्द ?ोल लिया हो मैं ने.’’

‘‘अभी तो शुरुआत है, तुम जैसे बदकिरदार और बेशर्म लड़के को मैं अपना दोस्त नहीं मानता. अब तो मैं यही चाहूंगा कि तुम्हें भी आरती की तरह ही दर्दनाक मौत मिले. तुम मौत मांगो और तुम्हें मौत नसीब न हो,’’ कह कर साहिल हमेशा के लिए यूनिवर्सिटी छोड़ कर चला जाता है.

‘‘चाचा, मैं घर आ रहा हूं, मेरी पढ़ाई पूरी हो गई है. बिजनैस में अब आप का साथ देना चाहता हूं,’’ साहिल रोते हुए फोन पर बात करता है.

‘‘हां बेटा, पर यों अचानक यह डिसीजन? तुम तो आगे पढ़ाई जारी रखना चाहते थे, क्या हुआ साहिल, सब ठीक तो है?’’ चाचा ने पूछा.

‘‘नहीं चाचा, वह मेरी एक अच्छी दोस्त की डैथ हो गई है.’’ साहिल ने जवाब दिया.

चाचा बोले, ‘‘ओह, बहुत अफसोस

है बेटा.’’

साहिल ने आगे कहा, ‘‘मैं घर आ कर बात करता हूं.’’

चाचा बोले, ‘‘ठीक है बेटा.’’ उन के फोन रखते ही साहिल की मां वहां आ जाती है. ‘‘क्या हुआ भैया, क्या कह रहा था साहिल?’’

‘‘कुछ नहीं भाभी, बस, उस की एक दोस्त की डैथ हो गई है और अब वह वापस घर आना चाहता है.’’

‘‘मेरा तो कलेजा कांप जाता है यह सुन कर भैया. जवान बच्चों की मौत उन के मांबाप पर क्या कहर ढाती होगी. मैं अभी साहिल को फोन करती हूं.’’

‘‘नहीं भाभी, अभी नहीं. घर आए तो आराम से बात कीजिएगा. आप तो जानती हैं, बहुत सैंसिटिव लड़का है.’’

‘‘जी भैया, आप सही कह रहे हो.’’

साहिल अपने घर लौट घर का बिजनैस संभालने लगता है. गायत्री देवी (साहिल की मां) और साहिल साथ में किसी प्रोजैक्ट पर डिस्कशन कर रहे होते हैं. साहिल बारबार अपनी नाक को टिश्यू पेपर से साफ कर रहा होता है.

यह देख कर गायत्री बोलीं, ‘‘मैं देख रही हूं बेटा, तुम जब से होस्टल से आए हो, ठीक नहीं रहते हो. मैं भैया से कहती हूं कि तुम्हें अभी डाक्टर के पास ले जाएं.’’

साहिल हंसते हुए बोला, ‘‘अभी… ऐसी कोई बात नहीं है मां, बस, थोड़ा फ्लू है, शायद कोई डस्ट एलर्जी है.’’

गायत्री ने कहा, ‘‘अरे, टैंपरेचर भी तो रहता है.’’

साहिल बोला, ‘‘फ्लू में टैंपरेचर तो नौर्मल रहता ही है न मां.’’

‘‘नहींनहीं, ऐसे नहीं चलेगा,’’ कहते हुए गायत्री अनुपमजी (साहिल के चाचा) को आवाज लगाती हैं.

शाम को घर लौटते वक्त अनुपमजी साहिल को फैमिली डाक्टर के पास ले जाते हैं. डाक्टर साहब साहिल का चैकअप करते हैं.

‘‘अनुपमजी ने डाक्टर को बताया कि साहिल को डस्ट इन्फैक्शन वाला जुकाम हरारत के साथ लगभग रहता ही है और पेट भी खराब रहता है.’’

वहीं, साहिल ने कहा, ‘‘हां, कुछ गलत खा लूं तो पेट खराब हो जाता है और फ्लू 10-15 दिनों में फिर से हो ही जाता है.’’

‘‘यह कब से हो रहा है?’’ डाक्टर ने पूछा.

‘‘करीबन एक साल से.’’

डाक्टर साहिल को लिटा कर चैकअप करते हुए बोले, ‘‘जरा तेज सांस लो. हम्म… कुछ नहीं, बस, साधारण सा जुकाम ही है, दवाई लिख देता हूं. यदि कोई और परेशानी हो तो वापस आ जाना  दवाइयां खरीद कर.’’ चाचा और भतीजा दोनों ही घर लौट जाते हैं.

‘‘क्या हुआ? क्या कहा डाक्टर ने?’’ गायत्री पूछती हैं.

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