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ऑनलाइन पेमेंट कितना सही

एक बार एक व्यक्ति ने फोन पर एक क्यूआर कोड भेज कर कहा कि आप की इंश्योरैंस कंपनी ने आप को एक रिवार्ड दिया है. आप इस क्यूआर कोड को स्कैन करें तो आप को मिले रिवार्ड के पैसे आप के अकाउंट में चले जाएंगे. जिस के फोन पर कौल आया, वह पहले तो सोच में पड़ गया कि मेरी कौन सी ऐसी पौलिसी है जो मु झे रिवार्ड दे रही है, फिर उस ने क्यूआर कोड को जूम किया तो उस पर बहुत बारीकी से लिखा था कि आप को 2 हजार रुपए मिलेंगे और अकाउंट से 6 हजार रुपए कट जाएंगे.

असल में फोन करने वाले से गलती यह हुई थी कि उस ने जिस से क्यूआर कोड स्कैन करने को कहा, वह व्यक्ति बैंक में काम करता है, इसलिए उस ने इसे अच्छी तरह से देखा. जबकि साधारणतया व्यक्ति इन बातों पर अधिक ध्यान नहीं देते और बहुत सारा पैसा बैंक अकाउंट से निकल जाता है. बाद में इस फ्रौड व्यक्ति को पकड़ना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में औनलाइन पेमेंट को अच्छी तरह जानना क्या जरूरी नहीं?

इस बारे में पंजाब नैशनल बैंक के चीफ मैनेजर अमिताभ भौमिक कहते हैं, ‘‘डिमोनेटाइजेशन के बाद से देश कैशलैस सिस्टम की तरफ तेजी से बढ़ रहा है लेकिन अभी इस देश में इतनी संख्या में ग्राहक नहीं हैं जितना सरकार सोच रही थी क्योंकि छोटे गांव और शहरों में वयस्क और महिलाएं पूरी तरह से कैशलैस ट्रांजैक्शन करने के तरीके को जानती नहीं हैं. वे औनलाइन पेमेंट से डरते हैं लेकिन कोरोना वायरस की वजह से औनलाइन का ट्रैंड काफी बढ़ गया है. आजकल लोग बैंक जाने से बच रहे हैं.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘अधिकतर पेमेंट और मनी ट्रांसफर औनलाइन ही हो रहे हैं. किसी जानने वाले को या फैमिली मैंबर को पैसे भेजने या कुछ घरेलू सामान मंगवाने हों तो व्यक्ति औनलाइन मनी ट्रांसफर कर देता है. डिजिटल पेमेंट को सही मानने की एक वजह यह भी है कि ये अपने ग्राहकों को निर्बाध रूप से पेमेंट के औप्शन और कई प्रकार के डिस्काउंट देते हैं. इस से कस्टमर की कैश पर निर्भरता में कमी, फास्ट मनी ट्रांसफर और आसानी से किसी ट्रांजैक्शन को किया जा सकता है. इस तरह के ट्रांजैक्शन को अधिक से अधिक प्रयोग करने के पीछे कैशलैस और पेपरलैस लेनदेन को बढ़ाना है और इंडिया की इकोनौमी को कैशलैस सोसाइटी बनाने से है.’’

औनलाइन पेमेंट के कई औप्शन हैं और व्यक्ति अपनी सहूलियत के अनुसार ट्रांजैक्शन कर सकता है-

बैंकिंग कार्ड्स ग्राहकों को अधिक सुरक्षा, आसानी और मनी कंट्रोल करने की सुविधा व बाकी सभी पेमेंट फैसिलिटीज देते हैं. इस में कई प्रकार के कार्ड होते हैं, मसलन क्रैडिट कार्ड या डैबिट कार्ड, प्रीपेड कार्ड पेमेंट आदि में कई फ्लैक्सिबिलिटीज होती हैं. साथ ही, इस में पेमेंट की गारंटी ‘पिन’ या ‘ओटीपी’ से की जाती है. इस के द्वारा व्यक्ति कहीं भी, किसी भी माध्यम से शौपिंग कर सकता है.

यूएसएसडी नए तरह की पेमेंट सर्विस है. इसे मोबाइल बैंकिंग ट्रांजैक्शन, मोबाइल फोन द्वारा किया जाता है. इस में मोबाइल इंटरनैट डेटा की कोई जरूरत नहीं होती. बैंक में खाताधारक इस का प्रयोग आसानी से कर सकता है. इस में फंड ट्रांसफर, बैलेंस इन्क्वायरी, मिनी स्टेटमैंट आदि सभी की सुविधा होती है. ऐसी सर्विस की सुविधा देश के 51 बड़े बैंकों में 12 भाषाओं में उपलब्ध कराई गई है.

एईपीएस बैंक द्वारा बनाया गया एक औप्शन है. यह औनलाइन अंतर-संचालित फाइनैंशियल ट्रांजैक्शन होता है, जिस में पौइंट औफ सैल या माइक्रो एटीएम द्वारा बिजनैस कोरेस्पौडैंट के साथ जुड़ जाता है, जिस की प्रामाणिकता आधार कार्ड द्वारा की जाती है.

यूपीआई सिस्टम में कई बैंकों के अकाउंट को एक मोबाइल ऐप्लीकेशन के तहत जोड़ा जाता है. इस से पेमेंट करना और बैलेंस को चैक करना आसान होता है. हर बैंक का यूपीआई ऐप अलगअलग होता है जिसे बैंक देता है.

मोबाइल वौलेट्स एक भुगतान सेवा है जिस के माध्यम से व्यवसाय और व्यक्ति मोबाइल उपकरणों से लेनदेन कर सकते हैं. ये ईकौमर्स का एक मौडल है जिसे सुविधा और आसान पहुंच की वजह से प्रयोग किया जा सकता है. मोबाइल वौलेट को मोबाइल मनी, मोबाइल ट्रांसफर मनी भी कहा जाता है. इस में फोनपे, गूगलपे, पेटीएम आदि कई हैं जिन का आजकल खूब प्रयोग होता है.

प्रीपेड क्रैडिट कार्ड बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा जारी किए जाते हैं और क्रैडिट कार्ड के सामान ही लेनदेन के लिए उपयोग किए जा सकते हैं. खरीदारी करने, बिलों का भुगतान करने या एटीएम से नकद प्राप्त करने में इन का प्रयोग किया जाता है.

प्रीपेड कार्ड दिखने में डैबिट और क्रैडिट कार्ड जैसे ही प्लास्टिक कार्ड मैगनेटिक स्ट्रिप के साथ होते हैं. अंतर केवल इतना है कि प्रयोग से पहले इस में कुछ फंड जोड़ना पड़ता है, ताकि इस से खर्च कर सकें. प्रीपेड कार्ड कस्टमर को उतनी सुरक्षा नहीं देते जितनी डैबिट और क्रैडिट कार्ड में मिलती है. अगर कोई प्रीपेड के साथ फ्रौड करने की कोशिश करता है तो भी उतनी सुरक्षा नहीं मिलेगी जितनी डैबिट और क्रैडिट कार्ड में मिलती है. इस के अलावा प्रीपेड कार्ड प्रदाता बहुत अधिक फीस चार्ज करते हैं.

पौइंट औफ सैल (पीओएस) में एक मशीन द्वारा पेमेंट की जाती है. इस में दुकान या खुदरा स्टोर से जब ग्राहक सामान खरीदता है तो डैबिट या क्रैडिट कार्ड को मशीन में सरका कर भुगतान करता है. राशन की दुकान, पैट्रोल पंप, मौल्स आदि जगहों पर इस से पेमेंट किया जाता है.

इसे स्वाइपिंग मशीन भी कहते हैं. इस का काम 2 प्रकार से होता है, मसलन कार्ड को स्वाइप करना या फिर कार्ड को लगा कर छोड़ देना, जिस में कार्ड व्यक्ति के अकाउंट से सीधा जुड़ जाता है. पेमेंट हो जाने के बाद मशीन से 2 पर्चियां निकलती हैं जिन में से एक अपने पास तो दूसरी ग्राहक को दे दी जाती है. हर दिन व्यवसाय खत्म होने के बाद दुकानदार उस मशीन को बैच प्रोसैसिंग के लिए भेजता है जिस में से दुकानदार के पैसे उस के खाते में जमा हो जाते हैं. यह मशीन बैंकों द्वारा दी जाती है, इसलिए बैंक का उस में कुछ कमीशन होता है, जिसे दुकानदार ग्राहक से ही वसूलता है. इसे पौइंट औफ परचेज भी कहा जा सकता है.

इंटरनैट बैंकिंग को औनलाइन बैंकिंग, ईबैंकिंग या वर्चुअल बैंकिंग कहा जाता है. यह एक इलैक्ट्रौनिक पेमेंट सिस्टम है जो ग्राहक को उस के नैट बैंकिंग अकाउंट से वित्तीय और गैरवित्तीय ट्रांजैक्शन करने की सुविधा प्रदान करता है. इंटरनैट बैंकिंग की सुविधा बैंकों के माध्यम से प्रदान की जाती है और ग्राहक को उस के लिए उपलब्ध सुविधा प्राप्त करने के लिए किसी भी बैंक में खाताधारक होना चाहिए. बैंक खाताधारक इंटरनैट पर जा कर नैट बैंकिंग अकाउंट में औनलाइन ट्रांजैक्शन, नैशनल इलैक्ट्रौनिक फंड ट्रांसफर या रियल टाइम ग्रौस सैटलमैंट कर सकते हैं. यह काम मोबाइल, लैपटौप या कंप्यूटर द्वारा किया जा सकता है.

इस की विशेषताएं निम्न हैं-

ग्राहक अकाउंट स्टेटमैंट देख सकता है.

ग्राहक संबंधित बैंक द्वारा किसी निश्चित अवधि में हुए ट्रांजैक्शन की जानकारी जान सकता है.

बैंक, स्टेटमैंट, विभिन्न प्रकार के फौर्म, एप्लिकेशन डाउनलोड किए जा सकते हैं.

ग्राहक फंड ट्रांसफर कर सकता है, किसी भी तरह के बिल का भुगतान कर सकता है.

मोबाइल डीटीएच कनैक्शन इत्यादि का रिचार्ज कर सकता है.

ग्राहक ईकौमर्स प्लेटफौर्म पर खरीद और बेच सकता है.

ग्राहक व्यापार का निवेश और संचालन कर सकता है.

ग्राहक परिवहन, यात्रा पैकेज और मैडिकल पैकेज बुक कर सकता है. इस के अलावा ग्राहक तुरंत और सुरक्षित ट्रांजैक्शन भी कर सकता है.

मोबाइल बैंकिंग एक सेवा है, जो बैंक या किसी फाइनैंशियल इंस्टिट्यूशन द्वारा खाताधारक को दी जाती है. यह मोबाइल डिवाइस (सैलफोन, टेबलेट आदि) पर वित्तीय लेनदेन करने का कार्य करती है. इस में प्रयोग किए जाने वाले सौफ्टवेयर ऐप बैंक देता है जिस से व्यक्ति अपना लेनदेन का काम आसानी से कर सके.

माइक्रो एटीएम एक छोटी मशीन है जो कार्ड स्वाइपिंग मशीन की तरह दिखती है और मूलभूत बैंकिंग सुविधा प्रदान करने में सक्षम होती है. इस तरह के एटीएम बहुत फायदेमंद हैं क्योंकि जहां सामान्य एटीएम स्थापित नहीं किए जा सकते, वहां इसे लगाया जाता है. ग्राहक की पहचान करने के लिए इस में एक फिंगरप्रिंट स्कैनर भी लगा होता है.

माइक्रो एटीएम में आधार नंबर दर्ज करने और अंगूठे या उंगली से पहचान सत्यापित होने के बाद यह आप के बैंक अकाउंट के डिटेल ले लेता है. इस के बाद उस अकाउंट से पैसों का भुगतान कारोबारी के अकाउंट में हो जाता है और वह ग्राहक को उस रकम का भुगतान कर देता है. यह अधिकतर लोकल किराना में प्रयोग होता है.

ये सभी औनलाइन लेनदेन व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार कर सकता है. इस में दिए गए निर्देशों का पालन करने पर व्यक्ति की लेनदेन की प्रक्रिया पूरी तरह से सुरक्षित रहती है. थोड़ी सी लापरवाही ग्राहक को भारी पड़ती है, इसलिए सोचसम झ कर औनलाइन पेमेंट करें.

मीडिया प्रोपगंडा की ठग

ऐक्टिंग के क्षेत्र में देशविदेश में मशहूर अभिनेता शाहरुख़ खान के पुत्र आर्यन खान को मुंबई क्रूज ड्रग्ज केस में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) की एसआईटी ने क्लीन चिट दे दी है, यानी, वे ड्रग्स केस मामले में पूरी तरह बेकुसूर पाए गए हैं. एनसीबी को आर्यन खान के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला. ऐसे में उन सारे दावों की हवा निकल गई जो इस मामले के शुरू होने के बाद किए जा रहे थे. 22 दिन जेल और 238 दिनों लंबे चले ट्रायल के बाद आर्यन खान बेदाग निकले हैं. आर्यन के बेदाग निकलने के बाद एनसीबी और मीडिया की भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं.

इस में कोई शक नहीं है कि आर्यन खान को जबरदस्ती बलि का बकरा बनाया गया था ठीक वैसे ही जैसे कुछ समय पहले रिया चक्रवर्ती को बनाया गया. आर्यन खान मामले की जांच करने वाले एनसीबी के डीडीपी संजय सिंह ने जांच में यह पाया कि आर्यन के पास ड्रग्स नहीं था. आर्यन द्वारा ड्रग्स के सेवन करने का प्रमाण भी उन्हें नहीं मिला. जो व्हाट्सऐप चैट्स निकली गईं वो इस मामले से लिंक नहीं करतीं. वहीं, एनसीबी के डीजी एस एन प्रधान ने कहा कि जिस तरह के सुबूत सामने आए हैं उन से यह साफ है कि यह कोई अंतर्राष्ट्रीय साजिश का मामला नहीं था. पर सवाल ये कि जो दाग मीडिया और नारकोटिक्स ने इन दिनों आर्यन खान पर लगाए क्या वे आसानी से धुल पाएंगे? 24 वर्षीय एक युवा को जिस तरह के तनावों से गुजरना पड़ा क्या उस की भरपाई हो पाएगी?

आर्यन खान का मामला 2 अक्टूबर, 2021 को उछला था जब एनसीबी ने मुंबई से गोवा जा रहे क्रूज पर रैड डाली थी. उस रैड में 13 ग्राम कोकीन, 21 ग्राम चरस और एमडीएमए की 22 गोलियां मिलने की बात सामने आई थी. इस मामले ने सनसनी तब फैला दी थी जब फिल्मस्टार शाहरुख़ खान के बेटे आर्यन खान को उन के दोस्तों के साथ क्रूज से एनसीबी ने हिरासत में ले लिया. उस के बाद उन्हें अदालत में पेश किया गया. आर्यन को हिरासत में लेने के बाद से मानो मीडियारूपी गिद्धों को परोसा हुआ शिकार मिल गया. वे इस मामले पर टूट पड़े, क्योंकि इस मामले में उन्हें एकसाथ ग्लैमर, सिनेमा, स्कैंडल, ड्रग्स, क्राइम का ही नहीं बल्कि धर्म का भी छौंका मिल रहा था.

मसलन, कोर्ट कार्यवाही एक तरफ चल रही थी दूसरी तरफ मीडिया ट्रायल का खेल शुरू हो चुका था. जब आर्यन खान पर आरोप लगाए गए तब मीडिया ने उन्हें नशेड़ी, तस्कर, पैडलर और न जाने क्याक्या कहा. हर रोज सुबहशाम टीवी चैनलों पर आर्यन खान की लाइव लिंचिंग की गई. चैनलों द्वारा ऐसे सनसनीखेज दावे किए गए जो ‘गुप्त सूत्रों’ के हवाले से हुआ करते थे. ये कौन से गुप्त सूत्र थे और कहां से थे, ये तो वो ही जानें पर उन गुप्त सूत्रों की आड़ में हदों की सीमाएं लांघी गईं.

 यह कैसा मीडिया ट्रायल

इस पूरे मसले में आर्यन खान की विच हंटिंग की गई. गिरफ्तारी के दिन उन्होंने कौन से रंग की टीशर्ट, जैकेट, मास्क, जींस पहनी थी, इसे बारीकी से बताया जाने लगा. जमानत के दिन वे किस कार में, कौन सी सीट में, कैसे, कहां से जाएंगे, घर जाएंगे या होटल आदि फुजूल बातें रिपोर्टिंग का हिस्सा थीं. सिर्फ हवाई बातों और झूठेबेबुनियाद या आधेअधूरे तथ्यों से ही चैनलों द्वारा कई प्रकार के दावे किए गए. इस ड्रग्स मामले में आर्यन खान के खिलाफ कोई सुबूत न मिलने पर एनसीबी और मीडिया ने इसे अंतर्राष्ट्रीय तारों से जुड़ा हुआ बताया. इस के लिए चैट्स का हवाला दिया, ताकि दर्शकों को लगे कि देश के खिलाफ यह बहुत बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है.

उन दिनों मीडिया की कवरेज एकतरफा, हवाहवाई और धूर्त किस्म की थी. बड़ी चालाकी से न्यूज चैनल शीर्षकों का चयन करते, उदाहरण के लिए, जी न्यूज ने अपने प्राइमटाइम शो ‘ताल ठोक’ कार्यक्रम में ‘बौलीवुड के नशेबाज बच्चे’ शीर्षक से शो चलाया, जिस पर आर्यन खान की बड़ी फोटो चस्पां की गई. अंत में दर्शकों के कन्फ्यूजन के लिए क्वेश्चन मार्क डाला. साथ में, हैशटैग दिया गया ‘बौलीवुड ड्रग्स पार्टी’. शीर्षक में शब्दों का चयन ही आरोपी को अपराधी घोषित कर देने वाला था. इस में तथ्य न के बराबर थे. चैनलों में, बस, एंकरएंकरनियों व बेतुके पेनलिस्टों की चीखमचिल्ली और तेज दनदनाते साउंड इफैक्ट्स थे.

ऐसे ही अपने एक और शो में ‘आर्यन ड्रग्स और डील’ नाम से शो चलाया. इस में भी अधिकतर जानकारियां सूत्रों के हवाले थीं. व्हाट्सऐप चैट के सामने आने के बाद चरित्र हनन के लिए चैनलों ने ‘आर्यन खान के फोन में आपत्तिजनक तसवीरें’ वाले शीर्षक चलाए. रिपोर्टर खबरें देने की जगह सड़कों पर कारों का पीछा कर रहे थे. मीडिया ट्रायल के नाम पर बगैर तथ्यों या आधेअधूरे तथ्यों से वे वह सब कहने के लिए आजाद थे जो भड़ासी हो, सनसनीखेज हो और आर्यन खान को कैसे अपराधी साबित किया सके, इसी के इर्दगिर्द था.

जी हिंदुस्तान चैनल के एक शो में कहा गया, ‘आर्यन खान से एमडीएमए की 22 गोलियां बरामद हुईं.’ चैनल को यह खबर भी सूत्रों से मिली. चैनल के अनुसार, अगर 22 गोलियां मिलीं तो आर्यन बरी कैसे हो गया. सिर्फ आर्यन नहीं, आर्यन के जरिए बौलीवुड को बदनाम किया जाने लगा. ‘आज तक’ में ऐसे कई शो चलाए गए. ‘आज तक’ के प्राइम टाइम ‘दंगल’ शो में ‘उड़ता बौलीवुड’ शीर्षक दिया गया, जिस में फ्रंट पर शाहरुख़ खान की बड़ी तसवीर लगाई गई. शाहरुख़ खान की छवि को खराब करने वाले शो भी चलाए गए, जैसे, शो ‘राष्ट्रवाद’ में शीर्षक दिया ‘खुल गया ‘मन्नत’ में ‘जन्नत का गेम’. यह शीर्षक सी ग्रेड भोजपुरी फिल्मों के टाइटल जैसा सुनाई पड़ता है.

इसी प्रकार रिपब्लिक चैनल ने अपने एक शो में शीर्षक दिया, ‘शिकंजे में बादशाह का बेटा’. हिरासत और शिकंजा क्या होता है, शायद चैनल वाले जानते नहीं थे, या आर्यन को अपराधी मान कर बैठे थे. ‘शिकंजे’ शब्द को बारीकी से पढ़ने की जरूरत है, गड़बड़ यहीं समझ आ जाएगी. ‘शिकंजा’ शब्द कब और किन परिस्थितियों में उपयोग होता है? क्या आर्यन खान को किसी बहुत बड़ी क्रिमिनल एक्टिविटी में पकड़ा गया? क्या वे पुलिस से बच कर भाग निकलना चाह रहे थे? क्या उन्होंने पुलिस या एनसीबी से बचने के लिए पलटवार किया? नहीं, यकीनन नहीं. तो फिर शिकंजा किस बात का? शिकंजा शब्द तो घोषित अपराधियों के लिए उपयोग किया जाता है जो भागने की कोशिश कर रहे हों, या हत्थे न चढ़े हों. आर्यन तो महज आरोपी थे, जिन्हें ‘हिरासत’ में लिया गया.

आर्यन खान पर शुरू हुए मीडिया ट्रायल में किसी न किसी तरह से हर रोज घंटों उन के ड्रग्स कनैक्शन को साबित करने की कोशिश की जा रही थी. बौलीवुड का ‘काला सच’, ‘ड्रग्स कनैक्शन’, ‘नशेबाज बेटा’, ‘बिगडैल बेटा’ जैसे शब्दों से न्यूज चलाई जा रही थीं. तथाकथित व्हाट्सऐप चैट्स का इस्तेमाल कर उन की इमेज को खराब किया गया. साथ ही, मीडिया उन्हें फंसाने में लगे लोगों को बचाने और उन्हें हीरो के रूप में पेश करने में लगा रहा.

एक तरफ जहां मीडिया आर्यन खान का गुनाह साबित होने से पहले उन्हें गुनाहगार मान कर बैठा था, वहीं उन की रिपोर्टिंग में ख़बरों के नाम पर चौबीसों घंटे लोगों को कूड़ा परोसा जा रहा था. जितने दिन आर्यन जेल में रहे, मीडिया ‘गुप्त स्रोतों’ से भीतरखाने की खबरें लाता रहा. खबरें चलाई गईं कि ‘शाहरुख़ खान के बेटे आर्यन जेल में पारले जी बिस्कुट को पानी में डुबो कर खा रहे हैं, और इस के बाद उन्हें कब्ज की शिकायत भी हो गई है.’ ‘आर्यन खान के चलते गौरी खान और शाहरुख़ खान के झगड़े चल रहे हैं.’ ‘आर्यन खान 4 साल से ड्रग्स लेते रहे हैं, जिस की खबर उन के पेरैंट्स को थी.’

इस तरह की खबरें जानबूझ कर दर्शकों को परोसी गईं और दर्शक भी चटकारे ले कर इन ख़बरों का भोग करते रहे. मीडिया ट्रायल के नाम पर चलाई जा रही खबरों ने न सिर्फ एक युवा के जीवन और उस के कैरियर को तबाह करने की कोशिश की बल्कि आम लोगों को भी भ्रमित करने का काम किया. आर्यन ख़ान के पक्ष में एनसीपी के नेता नवाब मलिक, जो पहले दिन से ही आवाज उठा रहे थे, के औफिस ने भी ट्वीट किया, उन्होंने लिखा, “’अब जबकि आर्यन खान और 5 अन्य लोगों को क्लीन चिट मिल गई है तो क्या एनसीबी समीर वानखेड़े की टीम और उन की निजी सेना के खिलाफ कार्रवाई करेगी? या फिर अपराधियों को बचाने का काम होगा?”

गलती होना और जानबूझ कर गलती करना 2 अलगअलग चीजें हैं. सवाल यह है कि अब जब आर्यन खान निर्दोष साबित हुए हैं तो सिर्फ समीर वानखेड़े ही क्यों, मीडिया पर भी आपराधिक मुकदमा क्यों न चलाया जाए जो जानबूझ कर केस को भ्रमित करता रहा? आखिर मीडिया ट्रायल के नाम पर कब तक मीडिया अपनी बेशर्मी व अपराधों पर परदा डालता रहेगा?

एसएसआर और रिया चक्रवर्ती प्रकरण

यह सिर्फ आर्यन खान का मसला नहीं. पिछले कुछ समय से मीडिया का रवैया ‘मीडिया ट्रायल’ के नाम पर एकतरफ़ा और सांप्रदायिक हो चला है. इस में कोई संदेह नहीं कि शाहरुख़ खान के बेटे को भी इसी चलते रडार पर लिया गया, क्योंकि शाहरुख़ खान उन अभिनेताओं में से रहे हैं जो भाजपा-आरएसएस की पसंद नहीं रहे हैं.

इस के साथ भाजपा के बड़े नेता पहले भी शाहरुख खान को ले कर आपत्ति जता चुके हैं. ऐसे में यह पूरा मामला बौलीवुड को डराने और ‘खानों’ के मान को हानि पहुंचाने का दिखाई देता है. इस के इतर, बौलीवुड में ‘खानों’ के दबदबे को ख़त्म करने और एंटरटेनमैंट को किसी ख़ास सोच में तबदील किए जाने का मसला भी है, जिस के आगे बौलीवुड फिलहाल रोड़ा है.

यही कारण है कि मीडिया के साथ ही, एनसीबी को ले कर केंद्र सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं. इस से पहले सुशांत सिंह राजपूत केस में भी मीडिया ट्रायल और एनसीबी का एजेंडा विवादों में था. रिया चक्रवर्ती का मामला भी महाराष्ट्र का था. पर जानबूझ कर एक केस बिहार में दर्ज करवा कर जांच अपने हाथों में ली गई. मनमाने ढंग से गिरफ़्तारियां की गईं. फिर मीडिया ट्रायल के नाम पर वही खेल शुरू हुआ जो आर्यन खान के मामले में देखने को मिला.

गौर करने वाली बात यह है कि उस दौरान बिहार में चुनाव होने थे और भाजपा व उस का सहयोगी दल जेडीयू कठोर जांच और बिहार प्राइड के नाम पर इस मामले को भुनाने में लगे थे. एसएसआर और रिया चक्रवर्ती प्रकरण को तब तक भुनाया गया जब तक बिहार चुनाव नहीं हो गए. रिया चक्रवर्ती ने सुप्रीम कोर्ट में उस दौरान इस बात का जिक्र भी किया कि उन्हें बिहार चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक एजेंडे के तौर पर बलि का बकरा बनाया जा रहा है. वे अपने पर हो रहे मीडिया ट्रायल को ले कर नाखुश थीं.

नाखुश हों भी क्यों न, उन दिनों चैनल हर रोज एक महिला का चीरहरण जो किया करता था. उस के कुछ उदाहरण आप भी देखिए, जैसे एबीपी न्यूज ने अपने खबर में शीर्षक दिया, “रिया का अंडरवर्ल्ड कनैक्शन सामने आया”, “हत्या से पहले मिटाए सुबूत… रिपब्लिक भारत चैनल का शीर्षक- “सुपारी गैंग की साथी है रिया?”, “बेनकाब हो गए रिया के रक्षक”. न्यूज़ 18 का शीर्षक- “रिया का तंत्रमंत्र और तिजोरी”, न्यूज़ 24 का शीर्षक- “इश्क का काला जादू.”

इस मीडिया ट्रायल के नाम पर टीवी चैनल रोज रात को यही सब चीखमचिल्ली करते रहे, फुजूल की गपबाजी में लोगों को मुर्ख बनाते रहे. बाबा, साधुओं और ज्योतिषियों को बैठा कर आरोपप्रत्यारोप करते रहे. रिया चक्रवर्ती की कार का पीछा करना, उन के ड्राइवर, नौकर, गार्ड को रोकरोक कर पूछापाछी करना आदि सामान्य होने लगा. रिया को ‘काला जादू’ करने वाली कहा गया. रिया का दोष साबित होने से पहले उसे दोषी बना दिया गया. यह बात फैलाई गई कि उस ने पैसों के लालच में सुशांत की हत्या की या करवाई और उसे ड्रग्स दिए, अपने यौवन के जाल में फंसा कर सुशांत को फुसलाया, फिर ब्लैकमेल किया.

उस दौरान भी तमाम केंद्रीय एजेंसियां सीबीआई, ईडी, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ऐसे सक्रिय हो गई थीं मानो मामले के जर्रेजर्रे का सच सामने ला देंगी. महीनों यह सब चलता रहा. लेकिन हाथ खाली रहे. सवाल यह कि इतने दिन यह सब चलता रहा, लोगों को इन ख़बरों में दिनरात जबरन बांधे रखा गया, आखिर इस से हुआ क्या? क्या सच सामने आया? एसएसआर का क्या हुआ?

किसान आंदोलन और तबलीगी जमात के समय

यह बात किसी से छिपी नहीं रह गई है कि मीडिया के एक बड़े धड़े की भूमिका खुल कर भाजपा समर्थक और सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने की बन गई है. इस के लिए वह दिनरात गैरजरूरी मुद्दों को हवा देता है और जन मुद्दों को दबाता है. पिछले साल किसान आंदोलन के शुरू होने पर यह बात किसान समझ चुके थे, तभी उन्होंने मीडिया के कुछ ख़ास समूहों, जिन्हें गोदी मीडिया कहा जाता है, को धरना स्थलों में घुसने पर पाबंदी लगा दी थी. वे जानते थे कि इन्हें घुसने भी दिया जाए तब भी ये उन का पक्ष दिखाएंगे नहीं, उलटा उन्हें ही बदनाम करेंगे, जैसा हुआ भी.

किसान आंदोलन के दौरान किसानों को क्याक्या नहीं कहा गया. सब से पहले उन्हें किसान मानने से ही इनकार किया गया. उन के आंदोलन को कुछ लोगों का ही आंदोलन कहा गया. जैसेजैसे किसानों की संख्या बढ़ती गई वैसेवैसे उन्हें देशद्रोही, खालिस्तानी औए न जाने क्याक्या कहा गया. जब वे बड़ी संख्या में बौर्डरों पर जमा होने लगे तो उन्हें ‘भटके हुए किसान’ कहा गया. सरकार का अड़ियल और जिद्दी रवैया होने के उलट किसानों को जिद्दी और अड़ियल कहा गया. पूरे 1 साल 6 दिन किसानों ने दिल्ली के बौर्डर पर सर्दीगरमीबरसात झेली. जिन के आगे आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा. पर जैसे ही सरकार ने नए कृषि कानून वापस लिए वैसे ही किसानों की जीत न कह कर सरकार का उदार और ऐतिहासिक फैसला बताया गया. फिर कृषि कानूनों में वही मीडिया नुक्स निकालता दिखा जो कल तक उन के फायदे गिना रहा था.

मीडिया, खासकर टीवीचैनल, आज जन मुद्दों को सिर्फ दबा ही नहीं रहा, इस का हालिया अतीत दिखाता है कि यह खुल कर सांप्रदायिक भी हो चला है. बढ़चढ़ कर लोगों में उन्माद भरने का काम टीवी चैनलों का हो गया है. कोरोनाकाल में तबलीगी जमात प्रकरण कौन भूल सकता है. सरकारी लापरवाही और प्रवासी मजदूरों के प्रति सरकार की बदइंतजामी को ढंकने के लिए तबलीगी जमात के मुद्दे को उठाया गया. मामले की गंभीरता को समझने की जगह चैनलों ने हिंदूमुसलमान की बहस चलाई. मुसलमानों को कोरोनावाहक कहा गया. हर किसी के मन में एकदूसरे के धर्म को ले कर शंका और डर का वातावरण फैलाया गया. ‘कोरोना जिहाद’, ‘थूक जिहाद’ जैसे कार्यक्रम परोसे गए. देश के माहौल को सांप्रदायिक बनाया गया. इस का असर यह हुआ कि गरीब, ठेलेपटरी वाले पीटे जाने लगे, सरकार की सारी जवाबदेहियां ख़त्म हो गईं, सारा दोष मुसलिमों पर मढ़ा गया.

भावुक दर्शकों को लपेटे में लेते चैनल

‘आर्यन खान ने ड्रग्स ली या नहीं?’ इस सवाल का जवाब आज 7 महीने बाद आ गया है. अब जाहिर है इस जवाब के बाद एनसीबी की साख पहले जैसे नहीं रही, लोगों का भरोसा इस संस्था से जरूर टूटा है. अब सवाल यह कि तकरीबन 7 महीने बाद मिले इस जवाब से आम आदमी को क्या सीखने को मिला? मीडिया ने जिस तरह दर्शकों को महीनों इसी गपबाजी में फंसाए रखा उस से उन्हें क्या हासिल हुआ? सवाल यह भी कि आर्यन खान, रिया चक्रवर्ती, एसएसआर के अनसुलझे या सुलझे जवाब से आम आदमी को क्या हासिल हुआ? कौन सा रोजगार बढ़ा? कितनी महंगाई कम हुई? कितने भूखों को खाना मिला?

हालिया प्रैस फ्रीडम रिपोर्ट बताती है कि भारत का रैंक पिछले साल के मुकाबले 8 अंक और नीचे गिर कर 150 पर पहुंच गया है. यह इसीलिए क्योंकि अधिकतर मीडिया प्लेटफौर्म सरकार की चाटुकारिता कर रहे हैं और जो सचाई बयान कर रहे हैं उन्हें तरहतरह से परेशान किया जा रहा है. क्या यह आंकड़ा नहीं बताता कि हमारी मीडिया किस हद तक कपटी बन चुका है.

आज अधिकतर टीवी चैनल पिछले कई वर्षों से शाम 5 बजे शाम से ले कर रात 10 बजे तक भूल कर भी ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं करते जिस में ‘ब्रैंड मोदी’ को जरा सा भी नुकसान पहुंचे. दिनभर का थका, नौकरीपेशा इंसान जब शाम को घर पहुंच कर टीवी खोलता है तो उसे ‘ब्रैंड मोदी’ के गुणगान से ओतप्रोत भक्त प्रजाति के न्यूज चैनल ही देखने को मिलते हैं. उसे अपने काम की खबरें नहीं मिलतीं.

आज आम आदमी अपनी परेशानियों से थका और महंगाई से पिटा अपने काम की ख़बरों के बजाए लगातार एकजैसे कंटैंट को सुनता रहता है. जिस से उस में भक्ति जगे, फिर चाहे वह मोदी के प्रति हो या भगवानों के प्रति. उस के दुख और हताशों को ये चैनल सही मार्गदर्शन देने की जगह दूसरे धर्म के प्रति नफरत और हिंसा के उकसावे से भर रहे हैं. जो लोग गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई की मार झेल रहे हैं उन्हें बताया जा रहा है कि धर्म का पालन करो, सच्चे हिंदू यानी कट्टर हिंदू बनो. इस कारण, वह अपनी तकलीफों के कारणों को खुद में सरकारी नीतियों में न ढूंढ कर गैरधर्मियों के वजूद में खोज रहा है.

बीते सभी मामले बताते हैं कि टीवी चैनल बड़ी चालाकी से लोगों के दिमाग पर कब्जा कर लेते हैं, या इसे ऐसा कहना ज्यादा उचित होगा कि सबकुछ जानते हुए हम खुद उन्हें हमारे दिमाग पर कब्जा करने का न्योता देते हैं. वे जनता कि भावुकता का इस्तेमाल करते हैं. हर बार चैनल भ्रम फैलाने वाले मुद्दे उछालते हैं और जनता उसे लपक लेती है. तथ्य यही है कि इतना सब घटित होने के बाद भी हम सोचनेसमझने को तैयार नहीं हैं. वरना, आर्यन खान के बेबुनियाद मामले की जगह गौर तो इस पर भी किया जा सकता था कि जिस दौरान मीडिया पर आर्यन खान मामला तूल पकड़ रहा था, उसी दौरान भाजपा नेता केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी की कार से 4 किसानों को लखीमपुर में बेरहमी से कुचला गया, आरोप है कि जिसे उन के बेटे अजय मिश्र टेनी चला रहे थे.

अरबों की ठगी: पिरामिड स्कीमें

भारतीय समाज की बिडंबना ही है कि वह आएदिन ठगों, धोखाखड़ी करने वालों के जाल में फंसता रहता है. शौर्टकट तरीके से करोड़पति बनने का ख़्वाब किस कदर हमें कंगाली की राह पर धकेल देता है, यह जगजाहिर है. ठगी, धोखाधड़ी की घटनाएं आएदिन सामने आती रहती हैं. जनता को जागरूक करने के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन लालच ऐसी बला है जो आएदिन लोगों को अपने जाल में फंसा लेती है.

हर आम से ले कर खास तक इस बात को अच्छी तरह समझता है कि डेढ़ साल में कोई भी रकम दोगुनी नहीं हो सकती. इस के बाद भी अति महत्त्वाकांक्षा हिलोरे मारने लगती है और जब निवेश के बाद हकीकत का पता चलता है तो निवेशक न घर के रहे पाते हैं, न घाट के.

एक मामले में कुछ लोगों ने एक कंपनी का रजिस्ट्रेशन करवाया. इस कंपनी ने स्कीमों के जरिए लोगों को फंसाना शुरू किया. पहली स्कीम में 6 हजार रुपए के निवेश पर 1,63,800 रुपए, दूसरी स्कीम में 22,920 रुपए के निवेश पर 6 लाख रुपए, तीसरी स्कीम में 1.20 लाख के निवेश पर एक करोड़ 78 लाख रुपए और चौथी स्कीम में 6 लाख के निवेश पर करीब 10 करोड़ रुपए देने का झांसा दिया गया.

सभी स्कीमों में डेढ़ साल के दौरान रकम लौटाने का वादा किया गया था. कंपनी की ओर से निवेशकों को बताया गया कि वे निवेश के पैसे को गोल्ड में लगा रहे हैं और समयसमय पर गोल्ड की कीमतों में तेजी से आ रहे उछाल के कारण वे अपने निवेशकों को इतना पैसा आसानी से दे सकेंगे. इस कंपनी ने अपने कार्यालय विभिन्न शहरों में धड़ाधड़ खोले. कंपनी ने अपना नैटवर्क बैंकौक, दुबई और थाईलैंड में भी बना लिया.

ज्यादा से ज्यादा निवेशकों को अपने जाल में फंसाने के लिए चैन सिस्टम बनाया गया. चैन विकसित करने वाले निवेशकों को अतिरिक्त लाभ देने का भी झांसा दिया गया. कुछ को यह लाभ मिला भी. अपने सहयोगियों व नैटवर्क मार्केटिंग के बड़े लीडरों को अपने साथ जोड़ा. इन लोगों को कंपनी ने उपहार के तौर पर कारें, मकान व अन्य सुविधाएं दीं. कुछ ऐसी कंपनियों के मैनेजर भी इन के साथ जुड़े जो अपने कर्मचारियों को इस कंपनी से जोड़ सकें. इस से लोगों का विश्वास जमता गया.

इतना ही नहीं, कंपनी के एजेंट के रूप में आईपीएस अधिकारी और आरएएस अधिकारी की पत्नी को भी जोड़ लिया. इसी तरह कुछ अन्य अधिकारियों के परिजनों को भी एजेंट के रूप में कंपनी से जोड़ लिया है. करीब 2 साल तक चैन सिस्टम से निवेशकों से निवेश कराए गए. फिर चैन सिस्टम विकसित करने वालों के चेक भी रोक दिए गए.

इस पर कुछ निवेशकों ने कार्यालय पहुंच कर जानकारी चाही तो उन्हें भरोसा दिया गया कि उन का पैसा डूबने नहीं पाएगा. लेकिन एकाएक कंपनी में ताला लग गया. जब यह बात आम निवेशकों तक पहुंची तो वे कंपनी कार्यालयों में पहुंचे. कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारी गायब थे और गेटों पर ताले लगे थे. ठगी का शिकार लोगों का कहना है कि वे जब भी रुपए मांगने जाते तो निदेशक जल्दी से क्लोजिंग होने का झांसा दे कर टरका देते.

मामला पुलिस तक पहुंचा तो सही, पर पैसा तो पहले ही गायब हो चुका था. कुछ को गिरफ्तार किया गया. बैंक खाते फ्रीज किए गए. जब पुलिस ने शहरों में स्थित कंपनी के कई मंजिला शोरूमों के ताले खोले तो वहां न ही सोना मिला और न रुपया. न पूरा रिकौर्ड पता चला कि इस कंपनी में निवेश करने वालों में मामूली लोग ही नहीं, बल्कि कुछ बड़े वरिष्ठ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल हैं. यह बात सामने आई कि कंपनी के डायरैक्टर बैंकौक भाग गए.

कंपनी संचालकों ने जमीनों में भी पैसा निवेश किया था. उन्होंने कई स्थानों पर बेनामी फौर्महाउस व कोठियां खरीदीं. यह भी जानकारी सामने आई कि करीब 225 लोगों के बीच 54.96 करोड़ रुपए कमीशन के रूप में बांटे गए. कंपनी की ओर से 5 लाख से अधिक रुपए तक का कमीशन दिया गया. मोटा कमीशन मिलने के एवज में लोगों ने ज्यादा से ज्यादा निवेश करने के लिए आम लोगों को उकसाया. 8 एजेंटों को निवेश कराने के एवज में एक करोड़ रुपए कमीशन के रूप में दिया गया. जाहिर सी बात है कि जब लोगों को यह समझाया गया कि जितना अधिक निवेश होगा, उतना ही अधिक कमीशन मिलेगा तो लोग ज्यादा निवेश कराते रहे.

एक और कंपनी ने इसी तरह की ठगी की. कंपनी ने 11 माह में 1780 लोगों को कंपनी का सदस्य बनाकर करीब ढ़ाई करोड़ रुपए की ठगी कर ली.इसी तरह चैन सिस्टम के तहत राजधानी में एक कंपनी के ठिकानों पर भी पुलिस ने छापेमारी की. लोगों की शिकायत पर मुकदमा दर्ज किया और जांच की गई पर निकला कुछ नहीं. इन सभी कंपनियों में एजेंटों के संचालक मोटे कमीशन के लालच में वे निवेशकों को झांसा देते रहे और कंपनी में निवेश करवाते रहे.

 दुनियाभर में हैं इन के नैटवर्क

मल्टीलैवल मार्केटिंग (एमएलएम) बिजनैस दुनिया में तकरीबन 100 से ज्यादा देशों में चल रहा है. अमेरिका में भी इस पर कोई रोक नहीं है लेकिन वहां फैडरल ट्रेड कमीशन ने स्पष्ट कर रखा है. सभी मल्टीलैवल मार्केटिंग कंपनियां वैध नहीं होतीं. कुछ पिरामिड स्कीम होती हैं. जब आप की आय प्रमुख तौर पर आप द्वारा जोड़े गए सदस्यों और उन्हें बेचे गए प्रोडक्ट पर निर्भर करती है तो यह ठीक नहीं है.

अगर स्कीम के बाहर भी आप प्रोडक्ट बेच कर कमाने के लिए स्वतंत्र हैं तो ही वह कंपनी सैद्धांतिक तौर पर सही एमएलएम कहलाएगी. इसी तरह बंगलादेश में भी कई एमएलएम कंपनियां लाखों लोगों के हजारों करोड़ रुपए ठग कर रफूचक्कर हो चुकी हैं. फिलहाल वहां सरकार जांच में जुटी है.

दिखावे सपने

गोल्ड सुख कंपनी ने निवेशकों को लुभाने के लिए कई हसीन सपने दिखाए. इस कंपनी से जुड़े लोग निवेशकों को लुभाने के लिए काफी आकर्षक ब्रोशर व पंपलेट पेश करते थे. कंपनी के रंगारंग ब्रोशरों में अलीशान कोठियों के फोटो छापे गए थे जिस में कहा गया कि यदि निवेशक खुद के साथ ही दूसरे लोगों को भी निवेश करवाता है तो उसे इन कोठियों में रहने का मौका मिलेगा.

इसी तरह कंपनी के सदस्य बनते ही केरल, गोवा, स्विटजरलैंड  के उन रिजौर्ट्स में रहने का मौका मिलेगा जिन के फोटो इन ब्रोशर्स में छपे हैं. ब्रोशर में कई ऐसे प्रमाणपत्र भी छापे गए थे जिन के जरिए कंपनी के रजिस्टर्ड होने एवं विभिन्न विदेशी संस्थाओं से जुड़े होने की जानकारी मिलती थी. निवेशकों को लुभाने के लिए कंपनी संचालकों ने कई स्थानों पर गोल्ड शोरूम भी खोले. कंपनी का प्रचारप्रसार बहुत ही व्यापक स्तर पर किया गया. विभिन्न स्थानों पर होर्डिंग लगाने के साथ ही एक अखबार भी निकाला गया.

इस के अलावा, अखबार को वैबसाइट के जरिए भी लौंच किया गया. इतना ही नहीं, इस कंपनी ने यह भी बताया कि उस के विदेशों में भी रिजौर्ट व शोरूम हैं. यही वजह थी कि निवेशक आसानी से इस कंपनी से जुड़े लोगों की बात पर विश्वास कर लेते.

एक के बाद एक खुले मामले

भारत में ऐमवे कंपनी ने खूब नाम कमाया, खूब लोगों को भरमाया, पिरामिड स्कीम में लोगों को शहरों की सैर कराई, एजेंटों को पैसा दिया. आज इस के 57 करोड़ रुपयों के घपले की जांच हो रही है पर कुछ निकलेगा नहीं. 2011 से कंपनी की हरकतें जांच एजेंसियों की नजरों में थीं पर अभी भी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है. लाखों लोग अपनी मेहनत की कमाई खो चुके हैं.

मार्च 2022 में आंध्र प्रदेश की एक कंपनी अक्षय गोल्ड फर्म्स विलाज इंडिया लिमिटेड ने कम से कम 857 करोड़ रुपए इस तरह के धोखे से जमा कर लिए थे और जब भंडा फोड़ हुआ तो मुश्किल से 260 करोड़ की संपत्तियां मिलीं जिन्हें बेचने में और मिलने वाले पैसे को बांटने में न जाने कितने और धोखे होंगे. 20 लाख लोग पूजापाठ के तरीके तो जानते थे पर वे इन ठगों को नहीं जान पाए.

निवेश से पहले निवेशक बरतें सावधानी

इस तरह के मामले सामने आने के बाद हर निवेशक के मन में एक शंका पैदा हो जाती है. फिर भी निवेशक जरा से लालच में निवेश करने लगते हैं. औरतें इस का ज्यादा शिकार होती हैं क्योंकि वे पति से छिपा कर रखे पैसे को लगाती हैं.

  • यदि आप के पास कोई भी व्यक्ति आकर्षक स्कीम ले कर आता है और वह अपनी कंपनी का सदस्य बनाना चाहता है तो प्रलोभन के बजाय स्कीम की व्यावहारिकता का ध्यान रखें. सौ से डेढ़ सौ गुना तक लाभ अल्प समय में मिलना संभव नहीं है. इस की विश्वसनीयता की बारीकी से जानकारी हासिल करें.
  • इस बात का ध्यान रखें कि संबंधित कंपनी रिजर्व बैंक के एनबीएफसी डिवीजन में पंजीकृत है या नहीं. बिना पंजीयन वाली कंपनी में कभी भी निवेश न करें. वैसे, यह जानकारी अच्छेअच्छे लोग नहीं जुटा सकते.
  • कंपनी यदि भारतीय मानक ब्यूरो या ऐसी कोई अन्य संस्था से प्रमाणपत्र प्राप्त करने का दावा करती है तो इस के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल कर लें. पंजीयन नंबर का ब्यूरो से मिलान करने के बाद ही निवेश करें. इस के लिए लो पृष्ठभूमि की जानकारी होनी चाहिए. वह उन में बिलकुल नहीं होती जो बचपन से चमत्कारों में विश्वास करते हैं. चमत्कारों की कहानियां धर्मग्रंथों में भरी हैं.

लाउडस्पीकर पर रार

उत्तर प्रदेश की सरकार ने लाउडस्पीकरों के नियमों को न मानने की वजह से 10,900 लाउडस्पीकर हटवा दिए हैं जो आबादी को नाहक परेशान करते थे.

वैसे तो इस का मकसद मसजिदों से लाउडस्पीकर हटाना था जहां से अजान कही जाती थी पर देश में अभी इतना लोकतंत्र बचा हुआ है कि वहां मंदिरों से भी लाउडस्पीकरों को हटाया गया है. जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस की आर्थिक नाकाबंदी करने के लिए उस के विदेशी लेनदेन बंद कर देने से यूरोप को गैस का संकट ?ोलना पड़ रहा है वैसे ही मसजिदों के लाउडस्पीकर उतरवाने के चक्कर में मंदिरों और गुरुद्वारों के लाउडस्पीकर भी ‘फिलहाल’ उतरवा दिए गए हैं.

‘फिलहाल’ शब्द बहुत जरूरी है क्योंकि धर्म के दुकानदार अपना प्रचार किसी भी हालत में कम नहीं होने देंगे और उन के लिए इस नियम को तोड़मरोड़ कर फिर लागू कर दिया जाएगा. पुलिस की इजाजत के नाम से मंदिरों और गुरुद्वारों को, विशेष अवसरों की आड़ में, 100-200 दिन की इजाजत मिल ही जाएगी लेकिन मसजिदों को किसी भी हालत में ऐसी इजाजत नहीं दी जाएगी.

लाउडस्पीकर धर्म के धंधे का पहला हथियार है. हर प्रवाचक आजकल बढि़या साउंड सिस्टम लगवाता है ताकि उस की कर्कश आवाज भी मधुर हो कर देश के कोनेकोने में पहुंच जाए. कनफोड़ू लाउडस्पीकरों की जरूरत इसलिए

होती है क्योंकि पूजापाठ के ?ाठे फायदों को घरघर पहुंचाया जाए और भक्तों की गिनती बढ़ाई भी जाए व उन से उन की जेबें भी खाली कराई जा सकें.

हनुमान चालीसा के पाठ का जो नया शिगूफा भारतीय जनता पार्टी ने शुरू किया है वह लाउडस्पीकरों पर ही तो आधारित

है. लाउडस्पीकर न हो तो चाहे जितनी रामायण, महाभारत, हनुमान चालीसा, आरतियां गाइए, जनता को फर्क नहीं पड़ेगा. जिस युग में लाउडस्पीकर नहीं थे, उस में धर्म के दुकानदार आमतौर पर फटेहाल ही होते थे क्योंकि खुले मैदान में अपनी कपोलकल्पित कहानी 10-20 लोगों को ही सुनाई जा सकती थी. लाखों की भीड़ के लिए तो लाउडस्पीकर चाहिए ही.

धर्म का धंधा एकतरफा बात के आधार पर चलता है जिस में आप कहें लेकिन सुनने वाला न सवाल पूछे, न अपनी बात कहे और न ही आप की बात को काट सके. लाउडस्पीकर के युग में तर्क और तथ्य की बात बंद करना बहुत ही आसान है.

उत्तर प्रदेश सरकार को अभी तो मुसलिम समाज को संदेश देना था, जो उस ने दे दिया. भविष्य में वह मंदिरों और गुरुद्वारों से कैसे निबटती है, देखना होगा. यह मुसीबत सारे देश की है और सारे देशवासियों की है जो धर्मप्रचारकों के लाउडस्पीकरों के सामने चुप रहने को मजबूर रहते हैं.

धार्मिक पोलपट्टी यानी देशद्रोह

जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार देश में आई है, देशद्रोह गंभीर हो गया है. जहां 2014 में 30 मामलों में 73 लोगों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया और सींखचों के पीछे डाल दिया गया वहां 2019 तक यह संख्या बढ़ कर

93 मामले और 98 गिरफ्तारियां हो गई. वर्ष 2020 व 2021 में कोविड महामारी के कारण सरकार उस में विशेष व्यस्त रही पर गिरफ्तार, आमतौर पर, बिना जमानत के जेलों में रहे.

देशद्रोह का मतलब होता है देश के प्रति कुछ ऐसा करना जिस से देश के अस्तित्व को आंच आए और उस के टुकड़े होने की आशंका हो, पर असल में आज देशद्रोही, नई परिभाषा के अनुसार, हर वह हो गया है जो पौराणिक हिंदू मान्यताओं के आगे सिर न ?ाकाए और भेदियों के साथ राजाओं के आगे सिर ?ाका कर न चले.

देश की जनता को यह पाठ पढ़ा दिया गया है कि देश के शासक, उस का ज्ञान, उस का इतिहास, उस की गरिमा इतनी महान है कि उस के बारे में किसी तरह का तर्क, तथ्य या प्रश्न करना सीधा धर्म और देश के विरुद्ध विद्रोह है और प्रश्न करने वालों को जेल में डाल देना सही है चाहे उन की संख्या कितनी भी हो. देश की जनता के एक हिस्से का विश्वास है कि देश की 80 फीसदी जनता देशद्रोही है, जी हां, दोतिहाई से ज्यादा. और, वे ही देशभक्त हैं जो ‘यह जय वह जय…’ के नारे सुबह, दोपहर, शाम, रात को लगाते हों. सरकार ने तो यह नीति बनाई और जनता के प्रभावशाली वर्ग को यह इतनी भाई कि उस ने तुरंत इसे लपक लिया और वह पैसा मिलने या न मिलने पर भी इस दुष्प्रचार को फैलाने में लग गया.

देशभर में समाचारपत्र, टीवी चैनल, ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सऐप ग्रुप देशद्रोहियों के प्रचार से भर गए हैं. इस का परिणाम यह हुआ कि देश में सामाजिक सुधार बंद ही नहीं हुए, उलटे, पुरातन विचार फिर से कैक्टसों की तरह पनपने लगे हैं. देश जातियों में बंटने लगा है. हर जाति अपना ?ांडा ले कर खड़ी हो गई है. हरेक ने अपने देवीदेवता ढूंढ़ लिए हैं. विवाह, प्रेम अपनी ही जाति में होंगे क्योंकि हर जाति अपने त्योहार अपने प्राचीन तरीकों से मनाएगी.

देशद्रोह यह सब था और है. जिन्होंने अलग जातियों, संप्रदायों, देवीदेवताओं, जातियों, उपजातियों, नामों के आगे जाति लगाई वे देशद्रोही हैं. जो एक की मूर्तिपूजा कर दूसरे को अपना विरोधी मानते हैं, वे देशद्रोही हैं, पर देशद्रोह का आरोप उन पर लगाया जा रहा है जो यह बता रहे हैं कि कैसे सत्ता व प्रभाव में बने रहने के लिए लगातार देशद्रोह के कानून, भारतीय दंडसंहिता की धारा 124 ए के साथ दूसरी धाराओं व दूसरे कानूनों की धाराओं को मिला कर सुधारकों का मुंह बंद किया जा रहा है.

अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है. लेकिन जब जनता का दोतिहाई हिस्सा गद्दार माना जाए, तो आप क्या कहेंगे, क्या करेंगे आप.

यूके्रन, यूक्रेनी और जेलेंस्की

रूस-यूक्रेन युद्ध एक छोटे देश के अस्तित्व की लड़ाई का ही मामला नहीं है, इस का व्यापक असर हर समाज पर पड़ेगा जैसे द्वितीय विश्व युद्ध का पड़ा था. यह लड़ाई एक छोटे देश के एक विशाल देश की फौज के सामने खड़े होने की हिम्मत की है. इस का संदेश यह है कि हर देश का नागरिक अगर अपनी सही बात को मनवाना चाहता है या अपने हकों की रक्षा करना चाहता है तो उसे तन कर, सबकुछ जोखिम में डाल कर अड़ जाना चाहिए.

यूक्रेन यदि 20 मार्च को सरैंडर कर देता और कहता कि यह तो उस का भाग्य है तो रूस अब तक वहां की सरकार बदल चुका होता और उस के टैंक लिथुआनिया, कजाखिस्तान, किर्गिस्तान की ओर बढ़ रहे होते. यूक्रेन की जनता के घर बचे होते, 50-60 लाख लोग देश छोड़ कर पनाह न ले रहे होते. लेकिन एक यूक्रेन विशाल जेल में बदल चुका होता जिस के साढ़े 4 करोड़ निवासी 9 लाख की रूसी सेना के गुलाम होते.

हमारे अपने देश में क्या होता रहा है. हर संघर्ष में हर हक के लिए हमें यही पाठ पढ़ाया गया है कि आप को वही मिलेगा जो आप के भाग्य में है. गीता बारबार यही कहती है कि हर पल आप का पूर्व निर्धारित है. आप जो चाहे कर लें, आप का वर्तमान तो आप के पिछले जन्म के कर्मों से बनता है.

हमारी आज की सरकार हर मौके पर कांग्रेस को कोसती है कि उस के कर्मों के फल भारतीय जनता पार्टी की सरकार को भोगने पड़ रहे हैं. व्लोदीमीर जेलेंस्की ने न इतिहास का नाम लिया, न ईश्वर का. उन्होंने सिर्फ कहा कि हमें अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी है जान पर खेल कर. काफी कम साधन होने पर भी वे रूस से भिड़ गए. पूरा देश उन के पीछे हो गया. कुछ ही दिनों में पूरा यूरोप और अमेरिका उन के समर्थन में खड़े हो गए.

यूक्रेन को तुरंत सैनिक, शस्त्र मिलने लगे, खाना, दवाइयां मिलने लगीं. रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लग गए. लोकतंत्र की रक्षा यानी हर नागरिक के हकों की रक्षा तभी हो सकती है जब अपने हकों के लिए खड़ा होने का जोखिम लिया जाए और यह पाठ जेलेंस्की ने विश्व को पढ़ा दिया.

रूस-यूक्रेन युद्ध ने यह भी जता दिया है कि यूके्रनियों ने भी पश्चिमी देश, जो उत्पादन करते हैं, नारेबाजी नहीं, जो व्यक्ति के हकों का सम्मान करते हैं, तानाशाही का नहीं, जो अपने यहां विविधता अपनाते हुए और्थोडौक्स क्रिश्चियन होते हुए भी एक ज्यू को राष्ट्रपति बनाने की हिम्मत रखते हैं, वे अकेले के हकों का लाभ जानते हैं, जो समाज अपने चर्च के लिए नहीं बल्कि अपने लोकतांत्रिक हकों के लिए जान जोखिम में डालते हैं, उन्हें किसी से भी डरने की जरूरत नहीं.

यूक्रेन में चर्चों में घंटे नहीं बजे, पादरियों के प्रवचन नहीं हुए, चर्च को दान देना शुरू नहीं हुआ. वहां सब ने मिल कर विशाल रूस से दोदो हाथ करने का फैसला किया और हर सड़क को रोका गया, हर घर में बमों को बनाने की फैक्ट्री बना डाला गया. हर टैंक को मोलोटोव कौकटेल  या शराब की जलती बोतल का सामना करना पड़ा. शहर तहसनहस हो गए हैं पर यूक्रेनियों का दमखम पचासों मंजिल और ऊंचा हो गया है.

यूक्रेन जीते या हारे, रूस को एक सबक मिल गया है. रूसियों को यूक्रेन पर आक्रमण की उसी तरह बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी जैसे अफगानिस्तान की जनता को कट्टरपंथी इसलामी तालिबानी शासकों को घर में और सिर पर बैठाने की पड़ रही है.

रूसी अपने धार्मिक, राजनीतिक तानाशाह के मनमाने फैसले का दुष्फल भोगेंगे जैसे अफगान (और उस जैसे दूसरे कई देशों के निवासी) अपने धार्मिक तानाशाहों के कुकर्म के फल भोग रहे हैं. फल पिछले जन्म के कर्मों से नहीं, इसी जन्म के कर्मों से मिलता है. यूक्रेन का यह पाठ सम?ा लें.

प्रेमी जोड़ों की शादी

पुलिस वालों से शादी तुड़वाने का काम तो बहुत आसान व आम दिखता है पर अब पुलिस युवाओं की बढ़ती आत्महत्याओं के मामलों से चिंतित हो कर अपनी तरह जांचपड़ताल कर उन की शादी करा रही है. आमतौर पर प्रेमी जोड़ों को शादी करने की इजाजत जाति, उपजाति, धर्म, पैसे, रसूख, औकात के कारणों में से एक या ज्यादा रहे कारणों से नहीं दी जाती.

पुलिस वाले अगर वयस्क जोड़े को सुरक्षा दे दें तो वे अपनेआप शादी कर लें. होता क्या है कि जैसे ही लड़की शादी के लिए भागी नहीं कि मातापिता लड़के पर अपहरण जैसा गंभीर आरोप लगा देते हैं. पुलिस वाले लड़के के मांबाप, दोस्तों को गिरफ्तार कर लेते हैं कि वे अपहरण के अपराध में सा?ादार हैं.

जेल में बंद न होने के डर से बहुत से जोड़े मातापिता की ओर से इनकार किए जाने पर भागते नहीं, आत्महत्या करने का फैसला कर लेते हैं. वे जानते हैं कि न पुलिस उन्हें सुरक्षा देगी और न समाज अपनाएगा.

आजकल प्रेमी जोड़ों को व्यावहारिकता की भी सम?ा आ गई है. प्रेम कर लेना तो आसान है पर जब तक लड़के या लड़की के पिता के घर में रहने को जगह न मिले, नए जोड़े के पास इतने पैसे भी नहीं होंगे कि वे किराए पर अपना घर बसा सकें. वैसे भी, मकान मालिक अब पुलिस के चक्करों में फंसने के डर से भागे हुए,

चाहे शादीशुदा ही क्यों न हों, जोड़ों को घर देने से हिचकिचाते हैं. इसलिए पुलिस ने अगर शादियां करवानी शुरू कीं तो यह अच्छा होगा. हां, पंडित जरूर बेचैन हो उठेंगे कि उन की रोजीरोटी का क्या होगा.

मैं बचपन से ही एक युवक से प्यार करती हूं लेकिन हमारा रिश्ता जाति की वजह से अटका हुआ है?

सवाल

मैं 22 वर्षीय युवती हूं. मेरी कहानी कुछ ऐसी है जिस की कोई मंजिल न हो. मैं बचपन से ही एक युवक से प्यार करती हूं. वह भी मुझे प्यार करता है  से परंतु मेरी कहानी जातिबिरादरी पर आ कर अटकी हुई है. आप बताएं हमारी शादी कैसे होगी?

जवाब

यह अच्छी बात है कि आप अपने बचपन के प्रेम को ताउम्र जीना चाहती हैं तभी तो आप ने उस युवक के साथ शादी के बारे में सोचा. लेकिन हमारे देश में जातिबिरादरी, धर्म आदि को कुछ ज्यादा ही अहमियत दी जाती है बनिस्पत प्यार के. आप के मामले में स्पष्ट नहीं है कि अटकाव किस पक्ष की ओर से है.

बहरहाल, आप खुद अपनी शादी की बात न कर के अपने किसी हितैषी द्वारा अपनी बात आगे पहुंचाएं, जिस की बात आप के पेरैंट्स भी मानते हों. उन्हें समझाएं कि जातिबिरादरी सब मनुष्य के बनाए हुए हैं. असली रिश्ता तो प्रेम का है, मानवता का है, जिस से सब बंधे हैं. जब दोनों ओर से पेरैंट्स यह समझ जाएंगे तो आप की शादी का अटकाव खुदबखुद दूर हो जाएगा.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

मेरे अपने- भाग 1: उसके अपनों ने क्यों धोखा दिया?

मातंगी बूआ ने घर में घुसते ही प्रश्नों की बौछार कर दी थी.

‘‘अरी अंबिका, यह मैं क्या सुन रही हूं, तू ने शादी करने का फैसला किया है? चलो, देरसवेर तु?ो सम?ा तो आई. बस, एक ही बात का अफसोस है कि तेरे पिता को यह दिन देखना बदा न था,’’ कह कर वे बैठक में पालथी मार कर बैठ गईं और बोलीं, ‘‘अब बता, लड़का कौन है, कैसा है? है तो अपनी ही जातबिरादरी का न?’’

‘‘नहीं बूआ,’’ अंबिका की छोटी बहन राधिका बोली, ‘‘महेन उत्तर भारत का रहने वाला है. उस के परिवार के लोग कई पुश्त पहले सिंगापुर में जा बसे थे.’’

‘‘ये लोग,’’ बूआ ने मुंह बनाया, ‘‘एक तो करेला उस पर नीम चढ़ा. क्यों अंबिका, तु?ो अपनी जात में कोई लड़का नहीं मिला जो इस सिंगापुरिया को जा पकड़ा. तेरा भी काम जग से निराला ही होता है. खैर, तू जाने तेरा काम. अब तू बच्ची तो रही नहीं कि कोई तु?ो उंगली पकड़ कर चलना सिखाए. फिर भी एक बात मैं जरूर कहूंगी कि लड़के के बारे में भलीभांति जांचपड़ताल कर लेना. ऐसा न हो कि आगे चल कर पछताना पड़े. लड़कों के बारे में पहले ही तू 2 बार धोखा खा चुकी है.’’

अंबिका का चेहरा मलीन हो गया. बूआ ने उस की दुखती रग पर हाथ जो धर दिया था.

क्या यह उस का अपराध था कि वह 2 बार शादी के लिए ठुकराई जा चुकी थी? उस ने उफनते मन से सोचा, ‘उस में क्या कमी थी, क्या वह सुंदर न थी, सुयोग्य न थी जो पहले प्रकाश फिर अविनाश, उसे ठुकरा कर चल दिए थे.’

अंबिका को उन के द्वारा दिए गए आघात से उबरने में सालों लग गए थे. कुछ दिन तो वह विक्षिप्त सी हो गई थी. लगता था, आंसुओं के सैलाब में वह खुद भी बह जाएगी, पर धीरेधीरे तटस्थ हुई. फिर भी उस के अंदर एक हीनभावना ने घर कर लिया था. वह अंतर्मुखी हो गई थी. घर और कालेज दोनों के बीच उस की दुनिया सिमट कर रह गई थी.

बूआ और राधिका कुछ जरूरी खरीदारी के लिए चल दीं. अंबिका घर के पिछवाड़े जा बैठी.

मन में तरहतरह के विचार उमड़नेघुमड़ने लगे. बूआ की बातों ने अंबिका के मन में एक तरह के भय का संचार कर दिया था. सच तो कह रही थीं बूआ कि वह महेन के बारे में जानती ही क्या थी? बस, थोड़े दिनों की पहचान के बाद ही वह उस के हृदय के निकट आ गया था और अब वे दोनों विवाह बंधन में बंधने जा रहे थे.

अंबिका को उस की पहली मुलाकात याद हो आई. वह सड़क पर पानी में भीगती हुई खड़ी थी कि सहसा एक कार उस के पास आ कर रुकी और ड्राइवर ने उस से पूछा, ‘मैडम, क्या मैं आप को कहीं छोड़ सकता हूं? इस आंधीपानी में आप को रिकशा मिलने वाला नहीं है.’

अंबिका को हिचकिचाते देख वह व्यक्ति फिर बोला, ‘घबराइए नहीं, मैं इसी सामने वाले बैंक में अधिकारी हूं. मेरा नाम महेन भारद्वाज है.’

‘मैं अंबिका अय्यर हूं,’ उस ने

कहा था.

घर पहुंच कर अंबिका ने शिष्टाचारवश महेन को कौफी पीने के लिए आमंत्रित किया. महेन आंख फाड़े उस के मकान को देख रहा था.

‘आप इस हवेली में रहती हैं?’ महेन ने पूछा.

अंबिका की हंसी छूट गई, ‘हवेली तो क्या है, एक पुराना मकान है. मेरे पिता ने इसे अपने किसी परिचित से मिट्टी के मोल खरीद लिया था.’

‘आप इसे मकान कहती हैं, यह तो अच्छाखासा महल है. वाह, क्या नक्काशी है, जरा फर्श की टाइल की डिजाइन तो देखिए, लगता है कोई ईरानी कालीन बिछा है, देख कर तबीयत खुश हो गई.’ फिर कौफी का घूंट भर कर वह बोला, ‘वाह, आप की तरह आप की कौफी भी लाजवाब है. मु?ो पुरानी वस्तुओं को संग्रह करने का बड़ा शौक है. करीब 200 तो गौतम बुद्ध की मूर्तियां हैं मेरे पास. कभी मेरे घर आइए तो दिखाऊंगा. लेकिन कभी क्यों, इसी रविवार को आइए, मैं आप को चाइनीज चाय पिलाऊंगा.’

वह अभी बैठा बातें कर ही रहा था कि राधिका आ गई थी. अंबिका ने उस का परिचय महेन से कराया.

महेन के जाने के बाद राधिका ने नाकभौं सिकोड़ कर कहा था, ‘दीदी, तुम भी कमाल करती हो, एक अनजान आदमी को घर में घुसा लिया. यदि वह चोरडाकू या ठग होता तो?’

महेन से शादी तय होने के बाद एक दिन अंबिका ने हंस कर उस से कहा था, ‘महेन, राधिका ठीक ही कहती थी, तुम चोर, डाकू व ठग निकले.’

‘मैं चोर? वह कैसे?’ आश्चर्य का भाव लिए महेन बोला.

‘तुम ने मेरा दिल जो चुराया.’

‘ओह, और डाकू?’

‘तुम ने मेरे मन पर डाका डाला.’

‘और ठग?’

‘नहीं, वह शायद तुम नहीं हो,’ अंबिका ने उस की बांहों में सिमटते हुए कहा था.

लेजर लैंड लैवलर से करें खेत को समतल, पाएं ज्यादा पैदावार

ई. वरुण कुमार, (कृषि अभियंत्रण)
कृषि विज्ञान केंद्र, जौनपुर
डा. सौरभ वर्मा, (शस्य विज्ञान)
कृषि विज्ञान केंद्र, सुलतानपुर
दिनेश कुमार, (मृदा विज्ञान)
कृषि विज्ञान केंद्र, जौनपुर

भूमि समतलीकरण फसल, मिट्टी एवं जल के उचित प्रबंधन की पहली जरूरत है. अगर भूमि के समतलीकरण पर ध्यान दिया जाए, तो उन्नत कृषि तकनीकें और ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती हैं. इसलिए किसान अपने खेतों को समतल करने के लिए उपलब्ध साधनों का पर्याप्त रूप से उपयोग
करते हैं.

इतना ही नहीं, भूमि के समतलीकरण की पारंपरिक विधियां बहुत ही कठिन और अधिक समय लेने वाली हैं. धान की खेती करने वाले किसान अपने खेतों में पानी भर कर समतल करते हैं. लगभग 20-25 फीसदी पानी का नुकसान खेतों के असमतल होने के चलते ही होता है.

असमतल होने की वजह से धान के खेतों में इस वजह से भी ज्यादा नुकसान होता है. असमतलीकरण से सिंचाई जल के नुकसान के अलावा जुताई और अन्य फसल उत्पादन प्रक्रियाओं में देरी होती है.

असमतल खेतों में फसल एकसमान नहीं होती है. उन का फसल घनत्व अलगअलग होता है. फसल एक समय में नहीं पकती है. इन सभी वजहों से फसल की उपज पर काफी बुरा असर पड़ता है और उन की क्वीलिटी भी गिर जाती है. साथ ही साथ किसानों को अपनी फसल के दाम भी बहुत कम मिलते हैं.
भूमि समतलीकरण के काम समतल भूमि में फसल प्रबंधन का काम कम हो जाता है. साथ ही, पानी की बचत होती है. फसल के उत्पादन एवं गुणवत्ता में वृद्धि होती है. भूमि समतलीकरण के निम्न फायदे हैं :

 अधिक फसल उत्पादन

भूमि समतलीकरण से 20 फीसदी तक उपज में बढ़ोतरी संभव है. भूमि जितनी अधिक समतल होगी, उतनी ही उत्पादन में अधिक वृद्धि होगी.

खरपतवार पर नियंत्रण

समतल भूमि में खरपतवार का नियंत्रण अच्छी तरह से किया जा सकता है. धान के खेतों में अधिक भूमि क्षेत्रों में पानी भरा होने से खरपतवार 40 फीसदी तक कम हो जाते हैं. साथ ही साथ निराई में कम मजदूर लगते हैं और लागत भी कम हो जाती है.

उत्पादन में वृद्धि

अच्छी तरह समतल भूमि में पानी का समान वितरण होता है, जिस से पोषक तत्त्वों का नुकसान नहीं होता है. जड़ सड़न और तना सड़न जैसे रोग कम लगते हैं और लगभग 10 से
15 फीसदी तक उत्पादन बढ़ जाता है.

समय और पैसों की बचत

समतल भूमि में सिंचाई करने में कम समय लगता है और क्यारियां और बरहें 50 से 60 फीसदी कम बनाने पड़ते है, जिस से समय व पैसों की बचत होती है

सिंचाई में पानी की बचत

समतल भूमि में 10 से 15 फीसदी पानी की बचत होती है, जिस से जल संरक्षण में मदद मिलती है और मिट्टी की सेहत में सुधार होता है.

भूमि समतलीकरण की विधियां

भूमि समतलीकरण पशुचालित, ट्रैक्टरचालित और बुलडोजर के द्वारा भिन्नभिन्न समतलन (लैवलर) यंत्रों के उपयोग के द्वारा किया जा सकता है. पहले हल व हैरो द्वारा जुताई और फिर पटेला चला कर समतल किया जाता है. समतल किए खेतों में पूरी तरह से पानी भर कर (5 सैंटीमीटर या उस से अधिक) भी किया जाता है.

ट्रैक्टर द्वारा लैवलिंग ब्लेड या डग बकेट यंत्रों का उपयोग कर के भूमि को समतल किया जाता है. इस काम में 4 से 8 घंटे लगते हैं, जो ट्रैक्टर यंत्र व हटाए जाने वाले भूमि के आयतन और भरने वाले स्थान की दूरी पर निर्भर करता है. लेजर पद्धति में ट्रैक्टर द्वारा बकेट या लैवलर ब्लेड का उपयोग कर के भूमि को समतल किया जाता है. इस में भूमि का तल बिलकुल समतल या एकजैसी ढाल देने के लिए लेजर किरण का उपयोग किया जाता है. लेजर पद्धति द्वारा भूमि 50 फीसदी तक अधिक समतल होती है.

लेजर पद्धति द्वारा भूमि समतलीकरण से लाभ

लेजर पद्धति का उपयाग उन्नत देशों जैसे जापान, अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि में भूमि समतलीकरण के लिए किया जाता है. हमारे देश में इस पद्धति का उपयोग सीमित तौर पर शुरू हो रहा है. इस का ज्यादा से ज्यादा उपयोग हो, इस के लिए किसानों को इस का महत्त्व समझाना जरूरी है. इस के मुख्य लाभ निम्न हैं :
* अधिक समतल एवं चिकनी भूमि सतह.
* खेतों की सिंचाई में लगने वाले पानी की मात्रा एवं समय में कमी.
* सिंचाई में पानी का समान वितरण.
* भूमि में नमी का समान वितरण.
* अधिक अच्छा अंकुरण व फसल की बढ़वार.
* बीज, खाद, रसायन व डीजल और बिजली की बचत.
* यंत्रों सहित खेतों में चलनाफिरना आसान.

लेजर लैवलर की कार्य प्रणाली

लेजर लैवलर समतलीकरण की एक ऐसी मशीन है, जो ट्रैक्टर की मदद से ऊंचेनीचे खेतों को एक समतल सतह में बराबर करने के लिए इस्तेमाल की जाती है. इस मशीन के द्वारा किरणों के निर्देशन से चलने वाली स्वचालित धातु का बग ब्लेड होता है, जो हाइड्रोलिक पंप के दबाव से काम करता है और ऊंचे स्थानों से खुद मिट्टी काट कर निचले स्थान पर गिरा देता है, जिस से खेत बराबर हो जाता है.

लेजर संप्रेषण
लेजर संप्रेषण बैटरी से चलने वाला एक किरण निकालने वाला छोटा यंत्र होता है, जिस को खेत के बाहर एक स्थान पर निर्धारित कर रख दिया जाता है, जो चालू करने पर एक सीधी रेखा में चारों तरफ किरणें निकालता है. किरणों के स्तर पर खेत समतल होता है.

लेजर ग्राही
लेजर ग्राही ब्लेड के ऊपर लगाया जाता है, जो लेजर संप्रेषण द्वारा भेजी गई किरणों को प्राप्त कर नियंत्रण बौक्स को सूचना देता है, जिस से नियंत्रण बौक्स काम करता है.

नियंत्रण बौक्स
नियंत्रण बौक्स एक छोटे से डब्बे जैसा यंत्र है जिस से छोटेछोटे बल्ब लगे होते हैं. ट्रैक्टर ड्राइवर के पास इस को लगाया जाता है, जिस से ड्राइवर की नजर उस पर पड़ती रहे. यह पूरी तरह से स्वसंचालित होता है. खेत को जिस सतह पर समतल करना होता है, उस की सूचना नियंत्रण बौक्स में निर्धारित कर दी जाती है. यह हाइड्रोलिक यूनिट को चलाता है.

हाइड्रोलिक यूनिट
हाइड्रोलिक यूनिट ट्रैक्टर के हाइड्रोलिक से जुड़ी रहती है, जो नियंत्रण बौक्स के सूचना देने पर ब्लेड को ऊपरनीचे करने में सहयोग करते हुए संचालित करती है, जिस से मिट्टी काटी या गिराई जाती है और खेत समतल होता है.

लेजर लैवलर का संचालन

इस मशीन को संचालित करने के लिए कम से कम 50-60 हौर्सपावर के ट्रैक्टर की जरूरत पड़ती है. इस मशीन से खेत को समतल करने के लिए सब से पहले उसे किस लैवल पर समतल करना है, इस के लिए इस मशीन के विशेष फोल्डिंग मीटर एवं लेजर संप्रेषक की मदद से खेत में सर्वे कर लैवलिंग सतह का निर्धारण कर लिया जाता है.

यही निर्धारण सतह लेजर लैवलर नियंत्रण बौक्स में निर्धारण कर देते हैं और इस मशीन को ट्रैक्टर से जोड़ कर खेत में एक तरफ से चलना शुरू कर देते हैं, जो लेजर संप्रेषक द्वारा भेजी जा रही किरण को प्राप्त कर नियंत्रण बौक्स के माध्यम से हाइड्रोलिक यूनिट द्वारा दबाव से चलने वाले ब्लेड के द्वारा मिट्टी काट कर या गिरा कर खेत को समतल कर देता है.

भारत भूमि युगे युगे: रोजगार या संस्कार

रोजगार देने में नाकाम साबित हो रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संस्कारों की बात करने लगे हैं  क्योंकि उन के पास देने को कुछ और है भी नहीं. देश के नौजवान रोजगार से नहीं बल्कि संस्कारों से ही महान बन सकते हैं. उन का महान बनना जरूरी है क्योंकि देश को महान बनना है और वह देश कभी विश्वगुरु बन ही नहीं सकता जिस के युवा पकौड़े की दुकान खोलने का मशवरा अनसुना कर मुंह लटकाए हाथ में कटोरा और कटोरे में डिग्री लिए रोजगार की भीख मांगें.

बडोदरा के स्वामीनारायण मंदिर में वीडियो कौन्फ्रैंस के जरिए युवा शिविर को उपदेशों की वैक्सीन देते हुए नरेंद्र मोदी ने संस्कार के 6 मतलब भी गिना डाले जो जाहिर है धर्मग्रंथों से उड़ाए गए थे. उन्होंने साबित कर दिया कि संस्कार हैं तो सबकुछ है, इसलिए रोजगार के मसले पर युवाओं को निराश होने की कोई जरूरत नहीं है. शुक्र तो इस बात का है कि अभी रोजगार मांगना राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में नहीं रखा गया है.

एक थप्पड़ दो टारगेट

सत्ता से बाहर होते हुए भी राजद बिहार का सब से बड़ा दल है जिस के जनक वृद्ध लालू यादव आएदिन जेल के अंदरबाहर होते रहते हैं. सीबीआई उन के दर पर बिन बुलाए मेहमान की तरह हर कभी सुबहसुबह आ धमकती हैं. ताजा आरोप लालू का रेलमंत्री रहते जमीन ले कर नौकरी देने के आइडिए का है. भारी अफरातफरी और तनाव के बीच उन की पत्नी व पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी कार्यकर्ताओं को मुखिया की कमी नहीं अखरने देतीं.

इस कमी को मनोवैज्ञानिक तरीके से दूर करने के लिए उन्होंने अपने ही एक कार्यकर्ता को जोरदार प्रायोजित थप्पड़ जड़ दिया क्योंकि कई कार्यकर्ता उस वक्त उन के समर्थन में नारे लगा रहे थे जब सीबीआई वाले दिल्ली से आ कर उन का पहले से खंगालाखंगलाया घर और खंगाल रहे थे. कार्यकर्ता तो इस प्रसाद से प्रसन्न हो गया लेकिन सीबीआई वाले सहम गए और यही राबड़ी की मंशा भी थी.

जिल्दबंद चाटुकारिता

भाजपा के शीर्ष नेता कुछ और करें न करें, पौराणिक पात्रों की तर्ज पर एकदूसरे की तारीफ जरूर किया करते हैं. बड़े नेता छोटे की करें तो इसे आशीर्वाद और छोटा बड़े की करे, तो इसे खुशामद कहा जाता है. मंचों से मुंहजबानी की गई तारीफ व्हाट्सऐप के मैसेज की तरह डिलीट हो जाती है. इसलिए इन नेताओं ने चापलूसी को स्थायी बनाने को किताबें लिखना और लिखाना शुरू कर दिया है. हाल ही में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने उन के गुरु नंबर 2 पर लिखी किताब ‘अमित शाह और भाजपा की यात्रा’ के मराठी संस्करण का विमोचन किया.

विमोचन के मौके पर स्मृति वही बोलीं जो भक्तिकाल में  मीरा बाई ने कृष्ण के बारे में पद्य रूप में कहा है. इस भक्ति की अतिशयोक्ति इस कथन के साथ समाप्त होती है कि अमित शाह ने महज 13 साल की उम्र में शास्त्रों और उपनिषदों का पूर्ण ज्ञान हासिल कर लिया था.

बुढ़ापे को बनाया हथियार

भगवा गैंग में शामिल हो कर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने वक्त से पहले उस के तौरतरीके सम?ा लिए हैं. अब वे हर कभी आरएसएस के दफ्तर में साष्टांग हो जाते हैं, छोटेमोटे कार्यकर्ताओं से हाथ मिला लेते हैं. और तो और, कभी कालीन से नीचे पांव न रखने वाले श्रीमंत अपनी नाजुक हथेलियों से सफाईकर्मियों के खुरदुरे पैर भी धुला देते हैं जिस से

उन का कांग्रेस को धोखा देने का पाप

20-25 फीसदी ही धुल जाए. यह गिल्ट उन का पीछा आसानी से नहीं छोड़ रहा है. अशोकनगर के एक सरकारी आयोजन में उन्होंने अपना ताजा दर्द बयां करते हुए कहा, ‘अब मैं बूढ़ा हो गया हूं’ तो मौजूद लोग उन के चिकनेचुपड़े गैर?ार्रीदार गुलाबी चेहरे में बुढ़ापे की निशानियां ढूंढ़ने लगे जो कि, चूंकि हैं नहीं इसलिए, दिखीं नहीं. बात असल में कुछ और थी जिस का सीधा ताल्लुक उन्हें मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने की आएदिन की अटकलों से है. सिंधिया जो इशारों में कह गए वह यह था कि मैं तो अभी 51 का ही हूं और कुरसी पर 63 के शिवराज सिंह चौहान बैठे हैं.

लव जेहाद का नारा

देश की सामाजिक समस्या ङ्क्षहदूमुसलिम से ज्यादा ङ्क्षहदू ङ्क्षहदू है पर उसे बड़ी सावधानी से ढक़ कर रखा जाता है. जातियों में बंटे ङ्क्षहदू समाज में एकदूसरी जाति के प्रति ज्यादा अलगाव है बजाए ङ्क्षहदूमुसलिम अलगाव के ङ्क्षहदू समाज की जातियों को साथसाथ बराबरबराबर रहना पड़ता है और मुसलमानों ने कुछ सुरक्षा की दृष्टि से और कुछ व्यावहारिक कारणों से अलग सी बस्तियां बना ली है ताकि ङ्क्षहदूओं से नाहक मुठभेंड न हो जो धाॢमक दंगों में बदल जाएं.

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में लोहार जाति ने एक घर में मां और 2 बेटियों व भाई के अंतिम सप्ताह में जहर खा कर आत्महत्या कर ली क्योंकि उन का बेटा एक दलित लडक़ी से प्रेम करता था और उस के साथ भाग गया. दलित पिता ने शिकायत की और पुलिस ने लडक़े के घर छापा मारा और परिवार पर दबाव डालना शुरू किया कि वे लडक़े-लडक़ी को पेश करें.

इस दबाव में लडक़े की मां और 2 बहनों ने आत्महत्या कर ली.

पिछले 8-10 सालों से जो लव जेहाद का नारा देश पर थोपा गया है उस का असर ङ्क्षहदू जातियों पर  भी पडऩा स्वाभाविक ही है. देश और समाज ने 2 लाइनें हर गांव, कस्बे, स्कूल, दफ्तर में खींची जाएंगी तो ये लाइनें अपनेआप खिचती हुई अनेक लाइनों में परिवॢतत हो ही जाएंगी. विभाजन कोरोना वायरस की तरह है, या तो पूरा समाज एक साथ रहेगा, खाएगा, खुशियां बांटेंगा या पूरा समाज अलगथलग होगा. आप मनचाहा बंटवारा कर ही नहीं सकते. विषाणु तो हरेक को डसेंगे. यह असर घृणा को मान्यता देने का है.

आज ङ्क्षहदू औरतों को जता कर घृणा का पाठ पढ़ाया जा रहा है. हमारे मंदिर हर लिए गए की बातें केवल विद्यर्मी तक नहंं रह जाएंगी, यह विजातीय तक भी जाएंगी, ङ्क्षहदूओं की हर जाति को अपने मंदिर दिए जा रहे हैं, हरेक को दूसरे से घृणा करना सिखाया जा रहा है, जातियों पर आधारित पाॢटयां बनी हैं, जातियों पर आधारित नौकरियां है, कालेजों में प्रवेश है. पहले सिर्फ थोड़ा आक्रोश था अब आक्रोश बढ़ गया है, यह घृणा और दुश्मनी में बदल रहा है.

ङ्क्षहदू जातियों में जो थोड़ा बहुत लेनदेन साथ शिक्षा के कारण पैदा होने लगता था वह अब टूट रहा है क्योंकि अलगाव की शिक्षा कर स्कूलकालेज में जम कर दी जा रही है. यह भी कोर्स का एक हिस्सा बन चुका है. हर लडक़ी को वह दिया जाता है कि प्रेम कर लो पर जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र देख कर करना. लडक़े के प्यार करने वाले विजातीय लडक़ी को विद्यर्मी लडक़ी की तरह घर में नहीं घुसने देते. हर घर में देवीदेवताओं के ऐसे चिह्नï लगने लगे हैं कि जाति भी स्पष्ट हो जाए.

यह अफसोस की बात है पर इस का इलाज आज संभव नहीं दिखता.

Top 10 Best Father’s Day Story In Hindi: टॉप 10 बेस्ट फादर्स डे कहानियां हिंदी में

माँ के बाद अगर कोई हमसे सच्चा प्रेम करता है तो वो हैं पिता. मां अपने बच्चों को सीने से लगा कर रखती है तो पिता का दिल बच्चों के लिए धड़कता है. कहते है बेटियां हमेशा अपने पिता जैसा जीवनसाथी चाहती है. तो इस Father’s Day पर आपके लिए लेकर आए है, सरिता की Top 10 Father’s day Story In Hindi.

  1. स्मिता: बेटी के पैदा होने के बाद सारा और राजीव क्यों परेशान थे

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सारा ने प्रतिक्रिया में कुछ नहीं कहा. उस ने कौफी का मग कंप्यूटर के कीबोर्ड के पास रखा. राजीव इंटरनेट पर सर्फिंग कर रहा था. सारा ने एक बार उस की तरफ देखा, फिर उस ने मौनिटर पर निगाह डाली और वहां खडे़खडे़ राजीव के कंधे पर अपनी ठुड्डी रखी तो उस की घनी जुल्फें पति के सीने पर बिखर गईं.

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2. दूरियां: क्यों हर औलाद को बुरा मानता था सतीश?

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हाथ का अखबार पास पड़ी कुरसी पर पटक कुछ जोर से बोले सतीश, ‘‘क्या हो रहा है? मैं ने कल की खबर तुम्हें सुनाई थी कि पिता के पैसों के लिए बेटे ने उस की हत्या की सुपारी अपने ही एक दोस्त को दे दी. देखा, कलियुगी बच्चों को…बेटाबेटी ने मिल कर अपने बूढ़े मातापिता को मौत के घाट उतार दिया, ताकि उन के पैसों से मौजमस्ती कर सकें.

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3. सांझ का साथी: दीप्ति क्यों नही समझ पाई पापा का दर्द?

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‘‘पापा, यह क्या किया आप ने? इतना बड़ा धोखा वह भी अपने बच्चों के साथ, क्यों किया आप ने ऐसा? आखिर क्या कमी थी हमारे प्यार में, हमारी देखभाल में, जो आप ने ऐसा कदम उठा लिया? एक ही पल में सारे रिश्तों को भुला दिया. चकनाचूर कर दिया उन सारी यादों को, उन सारी बातों को, जिन्हें याद कर के हम खुशी से पागल हुआ करते थे.

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4. डियर पापा: क्यों पिता से नफरत करती थी श्रेया?

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सुजौय ने मुसकरा कर अपना ब्रीफकेस मुझे थमा दिया और दोनों बच्चों को बांहों में भर कर भीतर आ गए. तीनों के कहकहे सुन कर दिल को सुकून सा मिल रहा था. सुजौय को चाय दे कर मैं भी वहीं उन तीनों के पास बैठ गई. दोनों बच्चे बड़े प्यार से अपने पापा को दिन भर की शरारतें और किस्से सुना रहे थे.

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5.पिता का दर्द-: सुकुमार के बेटे का क्या रहस्य था?

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टैलीफोन की घंटी से सुकुमार का ध्यान भंग हुआ. रिसीवर उठा कर उन्होंने कहा, ‘‘हैलो.’’ ‘‘बाबा, मैं सुब्रत बोल रहा हूं,’’ उधर से आवाज आई. ‘‘हां बेटा, बोलो कैसे हो? बच्चे कैसे हैं? रश्मि कैसी है?’’ एक सांस में सुकुमार ने कई प्रश्न कर डाले. ‘‘बाबा, हम सब ठीक हैं. आप की तबीयत कैसी है?’’ ‘‘ठीक ही है, बेटा. अब इस उम्र में तबीयत का क्या है, कुछ न कुछ लगा ही रहता है.

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6. पिता की पगड़ी-: अनुज के पिता के साथ क्या हुआ?

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‘‘मेरी ही कमाई है यह, जो तुम सब खा रहे हो…’’ बडे़ चाचा ने हाथ नचा कर कहा तो सहसा अनुज के दिमाग में दादाजी का चेहरा कौंध गया. शक्लसूरत बड़े चाचा की दादाजी से बहुत मेल खाती है और हावभाव भी. दादाजी अकसर इसी तरह हाथ नचा कर कहा करते थे, ‘मेरी ही कमाई हुई इज्जत है, जो तुम से लोग ढंग से बात करते हैं वरना कौन जानता है तुम्हें यहां.’

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7. वो पिताजी ही थे: रति के पति के साथ क्या हुआ?

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रति के पति विशाल 2 दिनों से सिर में दर्द व थकावट की शिकायत कर रहे थे. उन्होंने कहा कि “शायद नींद पूरी नहीं हुई है.” “आराम कीजिए आप, सारे दिन लैपटौप में आंखें गड़ाए काम भी तो करते हैं,” रति के कहने पर विशाल ने सिरदर्द की दवा ली और दूसरे कमरे में जा कर सो गए.रति मन ही मन चिंतित थी कि इन्हें तो आराम करने को कह रही हूं पर कहीं इन्हें… उफ़, मैं भी न क्या फालतू की बात सोचने लगी हूं.

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8. बेबस आंखें: केशव अपनी बेटी से आंखें क्यों नहीं मिला पा रहा था?

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‘डियर डैड, गुड मौर्निंग. यह रही आप के लिए ग्रीन टी. आप रेडी हैं मौर्निंग वौक के लिए?’’‘‘यस, माई डियर डौटर.’’ वह दीवार पर निगाह गड़ाए हुए बोली, ‘‘डैड, यह पेंटिंग कब लगवाई? पहले तो यहां शायद बच्चों वाली कोई पेंटिंग थी.’’‘‘हां, यह कल ही लगाई है. मैं पिछली बार जब मुंबई गया था तो वहां की आर्ट गैलरी से इसे खरीदा था. क्यों, अच्छी नहीं है क्या?’’

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9. आई लव यू पापा: पापा की बिटिया

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उन दिनों मैं अपनी नई जौब को लेकर बड़ी खुश थी. ग्रेजुएशन करते ही एक बड़े स्कूल में मुझे ऑफिस असिस्टेंट के रूप में काम मिल गया था. छोटे शहर में एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की के लिए यह उपलब्धि बहुत बड़ी थी. जहां आमतौर पर ग्रेजुएशन करते ही लड़कियों को शादी कर ससुराल भेजने की रवायत हो, वहां मुझे सुबह-सुबह तैयार होकर बैग लटका कर रिक्शे से नौकरी पर जाता देख मोहल्ले में कईयों के सीने पर सांप लोट जाता था.

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10. लव यू पापा: तनु उसे अपना पिता क्यों नहीं मानती थी?

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‘‘अरे तनु, तुम कालेज छोड़ कर यहां कौफी पी रही हो? आज फिर बंक मार लिया क्या? इट्स नौट फेयर बेबी,’’ मौल के रेस्तरां में अपने दोस्तों के साथ बैठी तनु को देखते ही सृष्टि चौंक कर बोली. फिर तनु से कोई जवाब न पा कर खिसियाई सी सृष्टि उस के दोस्तों की तरफ मुड़ गई.

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