शृंगारमेज के आगे खड़ी हम दोनों अपनीअपनी प्रथम ‘डेट’ के लिए शृंगार कर रही थीं. अदिति अपने मंगेतर रीतेष के लिए आकांक्षाओं से भरा दिल लिए, कंपकंपाते हाथों से अपेक्षाओं को सहेजती हुई और मैं पीयूष के लिए आशंकाओं भरा दिल लिए, थरथराते हाथों से अनिश्चितता का दामन पकडे़.

हम दोनों के होंठ यदाकदा कुछ बुदबुदा देते थे. एकदूसरे के आमनेसामने खड़े हो बात करने का साहस दोनों ही नहीं जुटा पा रही थीं. दर्पण की छवि ही बिना एकदूसरे का सामना किए कभीकभार कुछ बोल देती थी.

चेहरे पर पाउडर लगाते हुए अदिति ने ही पूछा, ‘‘कौन सी साड़ी पहन रही  हो, मां?’’

‘‘शायद नीली, हलकी सी जरी वाली...नहींनहीं...’’ वातावरण में गूंजे शब्द खुद को ही अजीब लगे और बोल पड़ी, ‘‘पिं्रटेड सिल्क वाली, क्यों, ठीक रहेगी न? और हां, मेकअप कैसा है?’’ और पूछते ही उस विचार ने कौंध कर अधरों पर थोड़ी सी मुसकराहट छिटका दी कि एक किशोरी से बेहतर सलाह ‘डेट्स’ के शृंगार पर और कौन दे सकता है.

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मेरी मुसकराहट ने अदिति को भी अछूता न छोड़ा. वह बोली, ‘‘नहीं, नीली जरी वाली...कुछ तो ‘ग्लैमरस’ होना चाहिए न,’’ और उस ने मेरे गालों को हलके से मल कर रूज को हलका कर दिया और ‘आईशैडो’ को करीबकरीब मिटा ही दिया.

मैं ने दर्पण में देखा तो भौंहें अपनेआप ही सिकुड़ गईं, ‘‘अरे, यह तो मेकअप करने से पहले जैसी हो गई हूं.’’

‘‘हां, मां, यह तुम्हारा असली रूप ही है. आप ही ने तो हमें हरदम यह सिखाया है कि अंदर का रूप वास्तविक होता है, बाहर का नहीं. यह एक महत्त्वपूर्ण भेंट है... उस पर गलत प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए.’’

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