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क्या आप भी हैं अनिद्रा के शिकार?

एक बार अकबर ने बीरबल से पूछा कि दुनिया में सबसे प्यारी चीज क्या है? तो बीरबल ने जवाब दिया कि दुनिया में सबसे प्यारी चीज है, नींद. अगर नींद ठीक से न मिले तो दुनिया की किसी चीज में कोई रस नहीं आता. वास्तव में नींद केवल प्यारी ही नहीं है, बल्कि जीवन के लिए अति आवश्यक चीज भी है. लेकिन यह प्यारी चीज सबके हाथ लगती कहां है? किसी को पत्थर पर सोने से ही आ जाती है, तो कोई मखमली बिस्तर पर भी पूरी रात करवटें बदलता रहता है. दुनिया में सैकड़ों ऐसे लोग हैं, जो नींद के लिए तरसते हैं. नींद न आने की शिकायत लेकर डौक्टरों के वहां चक्कर काटते हैं. अनिद्रा सिर्फ रात आंखों में काट देने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसके चलते कई दूसरे मानसिक और शारीरिक रोग भी पैदा हो जाते हैं. यहां तक कि कभी-कभी इन्सान डिप्रेशन की हालत में आत्महत्या के लिए भी प्रेरित हो जाता है.

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वर्ष 2008 की बात है जब मैं पहली बार कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के बेटे रोहित शेखर और उनकी मां उज्जवला तिवारी से मिली थी. उन दिनों रोहित शेखर खुद को नारायण दत्त तिवारी का जैविक पुत्र घोषित करने की कानूनी दांवपेंच में फंसे थे. मैं उनके केस की स्थिति जानने के लिए बात कर रही थी. मैंने महसूस किया कि रोहित बिना रुके लगातार बोले जा रहे थे, यहां तक कि वे बीच में इंटरप्ट करने के लिए अपनी मां उज्जवला तक को डांट देते थे. उज्जवला तिवारी उनके आगे बार-बार खामोश हो जाती थीं. करीब चार घंटे अपने केस के बारे में लगातार बोलते रहने के बाद रोहित तब रुके, जब मैं मजबूरन वहां से जाने के लिए उठ खड़ी हुई. उनकी इतनी बातों से मेरा सिर दर्द से झनझनाने लगा था. इतनी देर में मैं यह समझ चुकी थी कि रोहित का बिहेवियर एक नौर्मल आदमी के बिहेवियर से मैच नहीं करता है. वे बहुत तनावग्रस्त और अग्रेसिवनेस के शिकार थे. उनकी यह हालत उनके जीवन में बचपन से जवानी तक चलने वाली कानूनी कार्रवाई, खुद के लिए पिता के नाम की चाह, सामाजिक अपमान, उपेक्षा, कष्ट, दुख और तनाव की वजह से थी. इसके अलावा रोहित अनिद्रा यानी इनसोमिया बीमारी के शिकार थे. वे रात-रात भर जागते रहते थे. चिन्ता में डूबे रहते थे. अपने केस की तैयारियों में जुटे रहते थे. रोहित का रात को देर तक जागना, नींद की ढेरों गोलियां खाना, आधी रात को उठ कर नहाना और दूसरे दिन दोपहर तक सोते रहना गम्भीर बीमारी के लक्षण थे, जिन्हें अनदेखा करना उनके जीवन के लिए बेहद खतरनाक साबित हुआ. आज रोहित शेखर इस दुनिया में नहीं हैं. 16 अप्रैल 2019 की  रात उनकी पत्नी अपूर्वा ने गला दबा कर उनकी हत्या कर दी. अपूर्वा उनकी हत्यारिन है मगर इस हत्या के कारणों में छिपा हुआ एक कारण रोहित की अनिद्रा और उससे उत्पन्न उनकी मानसिक हालत भी जिम्मेदार है, जिसने उन्हें उनकी पत्नी के साथ कभी एक नौरमल जीवन नहीं जीने दिया और उनके व्यवहार से तंग आकर आखिरकार उनकी पत्नी अपूर्वा को ऐसा खतरनाक कदम उठाना पड़ा.

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बदलती जीवनशैली, तनाव और भागदौड़ भरी जिन्दगी के बीच आजकल इनसोमिया लोगों को मानसिक रोगी बना रही है. पर्याप्त और अटूट नींद नहीं मिलने से शरीर और दिमाग को आवश्यक विश्राम नहीं मिल पाता है, जिससे मनुष्य के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है. चिकित्सकों के अनुसार 18 से 40 वर्ष तक आठ घंटे की नींद और 40 से 50 वर्ष तक स्वस्थ मनुष्य के लिए 6 घंटे की नींद बहुत जरूरी है. 50 वर्ष से अधिक उम्र होने पर नींद कम आने लगती है. अनिद्रा दुनिया भर की आम स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है, जो हर उम्र के पुरुषों और महिलाओं में हो रही है.

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अगली कड़ी में पढ़ें: अनिद्रा के कारण

4 टिप्स: स्किन के लिए ऐसे करें चावल के आटे का इस्तेमाल

डेली लाइफ में कुछ चीजें ऐसी हैं, जिन्हें हम सिर्फ खाने के लिए इस्तेमाल करते हैं. लेकिन खाने की कुछ चीजें ऐसी भी हैं जिसे खाते तो हैं पर उन्हें हम अपनी स्किन के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं. चावल भी उन्हीं चीजों में शामिल है. चावल हर घर में होता है और अगर हम उन्हीं चावल को पाउडर बनाकर स्किन पर लगाते हैं तो यह हमारी स्किन के लिए भी काफी फायदेमंद होता है. उन्हीं फायदों के बारे में आज हम आपको बताएंगे जिससे आप बिना कोई पैसे खर्च करे घर पर ट्राई कर सकते हैं…

1. फेस क्लीन करने के लिए बेस्ट है राइस पाउडर

चावल के आटे (राइस पाउडर) का इस्तेमाल अपने फेस पर करने के लिए आप 1 चम्मच कार्नफ्लार के साथ, 1 चम्मच चावल के आटे को अच्छी तरह मिला लें. फिर इस पेस्ट को अपने चेहरे पर लगाएं. ये चेहरे की गंदगी को साफ कर नेचुरल ग्लो देता है.

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2. चावल पाउडर से करें बौडी स्क्रब

चावल के आटे का इस्तेमाल स्किन पर करने से ये स्किन की गंदगी को साफ करके, उसे नया रंग प्रदान करता है. इससे स्किन के डेड सेल्स अलग होकर स्किन को सौफ्ट और ब्यूटिफुल बनाते हैं. इसका इस्तेमाल करने के लिए आप एक बड़ा चम्मच राइस पाउडर उसमें शहद और नारियल के तेल को मिलाकर पेस्ट तैयार करें और इसे पूरे शरीर में रगड़ते हुए लगा लें, ये स्किन के लिए सबसे अच्छा स्क्रब है.

3. नेचुरल डियोड्रेंट के रूप में राइस पाउडर करें ट्राई

चावल पाउडर का इस्तेमाल स्किन के साथ-साथ अंडरआर्म्स में करने से ये पसीने की बदबू को दूर करने का काम करता है.

4. एक टोनर के रूप में राइस पाउडर का करें इस्तेमाल

राइस पाउडर औयली स्किन के लोगों के लिए बेस्ट है. इसका इस्तेमाल करने के लिए आप चावल पाउडर के आटे में पानी मिलकर रात भर के लिए रख दें. सुबह इसमें थोड़ा सा पानी और आधा नींबू निचोड़ कर पेस्ट तैयार करें, अब इस पेस्ट को पूरे चेहरे पर लगा लें. कुछ समय के बाद साफ पानी से चेहरे को धो लें.

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विपक्ष कैसे देगा नरेन्द्र मोदी को कड़ी चुनौती

सत्रहवीं लोकसभा में सरकार के सामने आधिकारिक रूप से विपक्ष का नेता नहीं होगा. एनडीए ने लोकसभा की कुल 353 सीटों पर कब्जा किया, वहीं कांग्रेस की अगुआई वाला यूपीए 92 सीटों पर सिमट कर रह गया. कांग्रेस को काफी खींचतान के बाद महज 52 सीटों पर सफलता मिली है. ऐसे में भारतीय राजनीति में विपक्ष का संकट गहरा है. सदन में सरकार के सामने कई विपक्षी पार्टियां होंगी, लेकिन विपक्ष का नेतृत्व कौन करेगा? विपक्ष का नेता कौन होगा?

आधिकारिक तौर पर उस पार्टी को विपक्ष का नेता बनाने का मौका मिलता है जिसके पास कम से कम 10 फीसदी सीटें हों. यानी 543 सीटों वाले लोकसभा में विपक्ष का नेता उस पार्टी का होगा, जिसके पास कम से कम 55 सीट हों, मगर कांग्रेस तो इस आंकड़े को छू पाने में असफल रही है. उसके पास मात्र 52 सांसद हैं. बिना विपक्ष के तो सरकार बेलगाम होगी. बड़ा सवाल यह कि ऐसे में भारतीय लोकतंत्र किस ओर जाएगा?

शक्ति सत्ता का स्वभाव होती है. अगर इस स्वभाव से जवाबदेही और आलोचना हट जाएं तो यह स्वभाव तानाशाह बन जाता है. किसी भी लोकतंत्र की सफलता  के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि उसमें कड़ी आलोचना और जवाबदेही की गुंजाइश हमेशा बनी रहे. पांच साल के कार्यकाल के बाद एक बार फिर नरेन्द्र मोदी को ही सत्ता संभालने का जनादेश मिला है, मगर अबकी बार विपक्षी पार्टियों की करारी हार की वजह से एक बात तो तय है कि संसद के भीतर हालत पहले से भी ज्यादा बदतर होने वाली है. यह स्थिति न तो नरेन्द्र मोदी के लिए अच्छी है और न ही लोकतंत्र के लिए. लोकतंत्र के लिए कमजोर विपक्ष या विपक्षी नेता की अनुपस्थिति घातक सिद्ध होगी. संशय नहीं कि आने वाले वक्त में यह स्थिति मोदी की तानाशाही-प्रवृत्ति को बल देगी. मोदी के अति आत्मविश्वास का कारण भी केवल यही है कि उन्हें पता है कि विपक्ष नदारद है.

मोदी सरकार की छवि अब वैसी नहीं रही, जैसी कि 2014 के शुरुआत में थी. 2014 में वह विकास-पुरुष के रूप में उभरे थे, जबकि अब वे अतिविश्वासी, अहंकारी और आक्रामक हिन्दू नेता के रूप में देखे जा रहे हैं. उस वक्त हिन्दू राष्ट्र, हिन्दुत्व या मंदिर जैसे मुद्दों को पीछे रख कर ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा दिया गया और देश को विकास के पथ पर ले जाने का सपना दिखाया गया था. तब ऐसा करना मोदी एंड कम्पनी की मजबूरी थी. पता था कि देश के विकास, युवाओं को रोजगार, शिक्षा आदि के नाम पर वे जो योजनाएं, जो नीतियां सदन के पट पर रखेंगे, विपक्ष उनका विरोध नहीं कर सकेगा. विपक्ष की ताकत के आंकलन के लिए समय चाहिए था, विरोध नहीं. लिहाजा खूब सपने दिखाये. जनता और विपक्ष दोनों ने आंखें मूंद कर सपने देखे. किसी ने कोई सवाल नहीं किया. पांच साल मोदी ने विपक्ष को तौला. कहना गलत न होगा कि इन पांच सालों में विपक्ष की कमजोरी को मोदी एंड पार्टी पूरी तरह भांप चुकी है. अबकी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस समेत अन्य दलों को जिस बुरी हार का मुंह देखना पड़ा है, उससे उनकी रही-सही हिम्मत और ताकत भी जवाब दे चुकी है. ऐसे में सदन के भीतर सरकार के सामने घुटने के बल बैठे विपक्षी नेताओं का सरकार की सही-गलत योजनाओं-घोषणाओं के खिलाफ चूं तक कर पाना मुमकिन नहीं होगा, और यही बात लोकतंत्र को कंपा रही है.

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कौन नहीं जानता कि बीते सालों में मोदी-सरकार के समर्थक तत्व देश भर में दलित और अल्पसंख्यक विरोधी हरकतों में मुब्तिला रहे. माब लीचिंग में सैकड़ों मुसलमान सरेआम कत्ल किये गये. लोगों में भय जारी रहा, मन बंट गये, आपसी रिश्तों में शंका और घृणा पसर गयी. गौरक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों की हत्याएं भी हुई और उनके कामधंधे भी छीन लिये गये. सरकार की नीतियां लगातार गरीब और मजदूर विरोधी रहीं.

नोटबंदी देश की अर्थव्यवस्था के लिए जहर साबित हुई. पढ़े-लिखे युवाओं के लिए रोजगार के अवसर घटते चले गये. कामगारों की स्थिति दयनीय हो गयी. सरकार पूंजीपतियों के हित साधने में लगी रही. काला धन वापस लाने का वादा करके सत्ता पर आसीन सरकार की नाक के नीचे से लाखों-करोड़ रुपया लेकर पूंजीपति देश से फरार हो गये मगर मोदी सरकार पर आंच नहीं आयी क्योंकि विपक्ष कमजोर था.

मोदी-सरकार की नाकामियों की फेहरिस्त बहुत लम्बी है. इसमें भी सन्देह नहीं है कि सरकार को अपनी विफलता का पूरा-पूरा अनुमान है. नरेन्द्र मोदी, अरुण जेटली और अमित शाह ऐसे नेता नहीं हैं जिन्हें वास्तविकता का पता न हो. मोदी को तो प्रशासनिक अफसर भी गुमराह नहीं कर सकते. अपनी विफलताओं का आभास होने के बावजूद अगर मोदी का आत्मविश्वास कभी कमजोर नहीं पड़ा, तो इसका एकमात्र कारण विपक्ष की कमजोरी रही. बिखरे हुए विपक्ष के ज्यादातर नेता 2019 में भाजपा को हारता हुआ देखना चाहते थे, लेकिन प्रधानमंत्री कौन बनेगा, इस सवाल पर वह अलग-अलग राग अलाप रहे थे.

नरेंद्र मोदी के सामने विपक्ष विकल्पहीन खड़ा था. विपक्ष के पास मोदी की टक्कर का कोई नेता नहीं था. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी के सामने कमतर नजर आते थे. बंटा हुआ विपक्ष मोदी के सामने चुनौती नहीं बन पाया. विपक्ष में अंदरूनी टूट मोदी के सामने कभी चुनौती पेश नहीं कर पायी और विपक्ष की यही कमजोरी मोदी की ताकत बनी. विपक्ष की इसी कमजोरी को देखते हुए ही मोदी सरकार ने अपनी लगभग सभी योजनाओं की पूर्ति का लक्ष्य 2022 रखा. जबकि कोई भी सरकार जो पांच वर्ष के लिए चुनी जाती है वह पांच वर्षों के अनुरूप ही अपने लक्ष्य निर्धारित करती है, ताकि पांच साल बाद जनता के सामने यह बताने लायक रहे कि जो वादे उसने किये थे, उन्हें पांच साल में पूरा भी किया, मगर यह पहली सरकार है जिसने अपने सभी लक्ष्य 2022 के लिए निर्धारित किये. इसकी वजह यही थी कि भाजपा आश्वस्त थी कि कमजोर विपक्ष के चलते 2019 में भी उसी की सरकार बनेगी, चाहे वह आम जनता को कितना भी परेशान कर दे.

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पांच साल तक मोदी के सामने चुनौती पेश करने में विफल विपक्ष की हालत तो अबकी चुनाव के बाद इतनी पतली हो गयी है कि अब जनता से जुड़े मुद्दे संसद के भीतर कभी पुरजोश उठाये जा सकेंगे, ऐसा सोचना भी खाम-ख्याली होगी. राजनीति की बिसात पर अब रोजी-रोटी के मोहरे पिट चुके हैं और धर्म के मोहरे आगे बढ़ रहे हैं. अबकी एनडीए सरकार में मन्दिर और हिन्दुत्व की बातें आगे बढ़ेंगी, इसमें दोराय नहीं है. मोदी के हाथ सत्ता सौंपने के बाद आम जनता को अब उनकी ओर से जो भी खैरात मिले, मिले या न मिले, उसमें ही संतोष करना होगा. भूखे पेट भजन करने की मजबूरी भी सामने होगी मगर उसकी आवाज अब सत्ता के कानों तक नहीं पहुंचेगी क्योंकि विपक्ष नदारद है. विपक्ष का कोई चेहरा नहीं है. विपक्ष की सबसे बड़ी हार ये है कि भले ही उसमें तमाम दल हों, मगर विपक्ष के रूप में किसी एक दल की पहचान नहीं है. आज छवियों की राजनीति है. आप आंखें बंदकर बीजेपी के बारे में सोचें तो इस पार्टी का झंडा तक आपके जेहन में नहीं आएगा, अगर कुछ दिखेगा तो सिर्फ नरेन्द्र मोदी का चेहरा. पर विपक्ष के बारे में सोचें तो सब गडमड. कोई एक चेहरा नहीं. कभी राहुल गांधी दिखते हैं, कभी ममता बनर्जी, कभी मायावती, कभी केजरीवाल, कभी कोई अन्य, मगर सब डरे-सहमे, कमजोर और लाचार से. विपक्ष का मतलब होता है विकल्प. मजबूत विकल्प. विपक्ष की परिभाषा ही विकल्प से शुरू होती है. लोकतंत्र के स्थायित्व के लिए जरूरी है कि प्रखर और मुखर विपक्ष हो, जिसका एक मजबूत चेहरा हो. एक मजबूत नेतृत्व हो.

अफसोस, कि संसद में कोई मजबूत विपक्ष ही नहीं है. भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा संकट अगर कुछ है तो यही है. लोकतंत्र को बचाये रखने के लिए एक विश्वसनीय विपक्ष की और उसके एक विश्वसनीय नेता की सबसे ज्यादा जरूरत है. आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार इतनी ताकतवर हो गयी है कि उनकी नीतियों की आलोचना करने की साहस किसी में नहीं है. नरेन्द्र मोदी, नि:संदेह इंदिरा गांधी के बाद देश के सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री बन कर उभरे हैं. अपनी पार्टी और सरकार पर नियंत्रण के मामले में सिर्फ इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू से ही उनकी बराबरी हो सकती है. लेकिन जहां नेहरू और इंदिरा को बड़े विपक्षी नेताओं का सामना करना पड़ा था, जवाबदेह बनना पड़ा था, वहीं मोदी के सामने फिलहाल कोई ऐसा नेता नहीं है.

नेहरू को तो 1947 और 1950 के बीच अपनी ही पार्टी और सरकार में एक समानांतर सत्ता केन्द्र का सामना करना पड़ा था. वल्लभभाई पटेल के सामने कांग्रेस अध्यक्ष या देश के राष्ट्रपति के चुनाव जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर नेहरू को झुकना पड़ा था. जब सरदार पटेल की दिसम्बर 1950 में मृत्यु हो गयी, तो नेहरू के लिए पार्टी और सरकार में कोई चुनौती नहीं रही, लेकिन संसद में उनकी नीतियों का प्रभावशाली विरोध करने वाले कई नेता थे. दक्षिणपंथी श्यामाप्रसाद मुखर्जी से लेकर वामपंथी हीरेन मुखर्जी और ए.के. गोपलन तक. उनके सबसे प्रभावशाली विरोधी पूर्व कांग्रेसी नेता भी थे. इनमें लोकलुभावन नीतियों वाले जे.बी. कृपलानी, समाजवादी राममनोहर लोहिया और स्वतंत्र पार्टी के नेता सी. राजगोपालाचारी. नेहरू इन्हें बहुत गम्भीरता से लेते थे, क्योंकि उनके राष्ट्रवादी रुझान नेहरू जितने ही विश्वसनीय थे. जे.बी. कृपलानी गांधी जी के साथ चम्पारण के उनके आंदोलन के साथी थे. सी. राजगोपालाचारी को गांधी जी का दक्षिणी सेनापति कहा जाता था और गांधीजी उन्हें अपने विवेक का रखवाला बताते थे. लोहिया ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के बड़े नेता थे. ये तीनों बहुत चमकदार, मुखर और ईमानदार थे. ये प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की जिस तरह तीखी आलोचना करते थे, उससे प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षा और अहंकार पर लगाम लगती थी और लोकतंत्र को मजबूती मिलती थी.

इंदिरा गांधी भी एक ताकतवर प्रधानमंत्री थीं, लेकिन फिर भी उनका राज चुनौतियों से मुक्त नहीं था. जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी और माकपा के. पी. राममूर्ति और ज्योतिर्मय बसु संसद में उतने ही प्रभावशाली थे, जितने श्यामा प्रसाद मुखर्जी या गोपालन थे. समूचे देश में मोरारजी देसाई और के. कामराज अपनी ईमानदारी, काबलियत और कांग्रेस के पुराने उसूलों के प्रति निष्ठा के लिए माने जाते थे. इन सबके अलावा जयप्रकाश नारायण थे, जिनसे इंदिरा की रूह कांपती थी. वह चाहते, तो नेहरू के बाद प्रधानमंत्री बन सकते थे, लेकिन उन्होंने नि:स्वार्थ भाव से कश्मीर और नागालैंड के सीमावर्ती इलाकों और मध्य भारत के अपराधग्रस्त इलाकों में काम करना पसंद किया. जयप्रकाश नारायण ने ही इंदिरा गांधी के खिलाफ सन् 1974-75 में राष्ट्रव्यापी आंदोलन का नेतृत्व किया था. इससे तिलमिला कर इंदिरा ने उन्हें जेल में डाल दिया था और अपने कई अन्य आलोचकों को भी जेल की हवा खिलायी थी. मगर इस कृत्य से इंदिरा गांधी की विश्वसनीयता बहुत घट गयी और यही वजह थी कि सन् 1977 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी बुरी तरह हारी थी.

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नरेन्द्र मोदी खुद को बड़ा समझने के मामले में जवाहरलाल नेहरू की तरह हैं और लोकतंत्र के संस्थानों की स्वायत्तता के प्रति उनका उपेक्षित और दम्भपूर्ण रवैय्या बिल्कुल इंदिरा गांधी जैसा है. लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेता में ऐसी प्रवृत्तियों का होना खतरनाक है. यह उनके लिए तानाशाही के रास्ते तैयार करता है. लोकतंत्र के लिए खतरे पैदा करता है. इसे रोकने के लिए विश्वसनीय और सक्षम विपक्ष चाहिए. नेहरू को कृपलानी और राजगोपालाचारी ने, तो इंदिरा गांधी को जयप्रकाश नारायण ने चुनौती दी, लेकिन आज नरेंद्र मोदी को प्रभावशाली चुनौती दे सकने की ताकत रखने वाला संसद के भीतर कौन है?

बिग बौस 13: इस सीजन में होगा बड़ा बदलाव

बिग बौस सीजन 13 के मेकर्स ने इस शो की तैयारियां जोरों से शुरू कर दी हैं. दर्शकों को इस शो का बेसब्री से इंतजार रहता है. तो आज आपके लिए इस शो से जुड़ी नई जानकारियां लेकर आए हैं. इस शो की थीम क्या होगी, इसमें कंटेस्टेंटेस के तौर पर कौन-से सेलेब्स शामिल होंगे, इस शो का लोकेशन क्या होगा. वैसे आपको बता दें, इस शो को हमेशा की तरह बौलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान होस्ट करते दिखाई देंगे. ये हाल ही में सलमान खान के खुद बातों बातो में कंफर्म किया है.

आपको ये भी बता दें, कि मेकर्स इस बार इस शो को लोनावला के बजाय मुंबई के फिल्म सिटी में बड़ा सेट लगाने के बारे में सोच रहे हैं. लेकिन अब इस शो के थीम को लेकर बड़ी खबर सामने आई है.

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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसबार दर्शकों को शो में हौरर थीम देखने मिल सकती है. आपको ये भी बता दें, मेकर्स इस थीम को लेकर सोच-विचार कर रहे हैं. अभी तक इस थीम को मेकर्स ने फाइनल नहीं किया है. वैसे अगर ये कौन्सेप्ट फाइनल होता है तो दर्शकों को अलग थीम देखने मिलेगी. आपको बता दें, पिछले सीजन में बिग बौस 12 के घर में विचित्र जोड़ी दिखाई दी थी.

दर्शकों को इन दिनों डायन-चुड़ैल, तंत्र-मंत्र वाले सुपरनैचरल शोज काफी पसंद आ रहे हैं. इस समय टीवी पर नागिन 3, कवच 2, डायन से लेकर नजर जैसे कई सुपरनैचुरल शो दर्शकों के दिल लुभाते नजर आ रहे हैं. इन सभी शो की टीआरपी रेटिंग भी बाकी शो के मुकाबले काफी अच्छी भी है.

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‘हंसा-एक संयोग’ किन्नरों के दर्द व उनकी व्यथा का चित्रण करती है: सुरेश शर्मा

सिनेमा में आ रहे बदलाव के चलते अब बौलीवुड में कई नए फिल्मकार तेजी से आ रहे हैं, जिन्होंने जमीन से जुड़ी और सामाजिक सरोकार वाली कहानियां अपनी फिल्मों के माध्यम से पेश करने का बीड़ा उठा लिया है. ऐसे ही एक फिल्मकार हैं सुरेश शर्मा. मूलतः रोहतक (हरियाणा) में जन्मे वे पले बढ़े तथा 35 वर्ष (कुछ साल दिल्ली और कुछ साल छत्तीसगढ़़ राज्य के रायपुर शहर में) तक एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी में नौकरी करने के बाद फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कूदे हैं. पहले ‘वेदना’नामक डाक्यूमेंटरी बनायी और अब किन्नरों की व्यथा व दर्द को व्यक्त करने वाली एक मानवीय फिल्म ‘हंसा-एक संयोग’ लेकर आ रहे हैं, जो कि 31 मई को देश के सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने जा रही है. सुरेश शर्मा ने ‘‘चित्रागृही फिल्मस” के बैनर तले फिल्म ‘‘हंसा-एक संयोग” का निर्माण करने के साथ साथ इसमें एक अहम किरदार भी निभाया है.

2014 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किन्नरों को समान धारा के साथ जोड़ने और उन्हें कई अधिकार दिए जाने के आदेश के बाद केंद्र व राज्य सरकारें किन्नरों के हित में कई योजनाएं शुरू कर चुकी हैं. सुप्रीम कोर्ट ने किन्नर समुदाय को ‘बैकवर्ड इकोनौमी क्लास’’ में रखा है. इतना ही नहीं गत वर्ष मुंबई में किन्नरों के लिए सौंदर्य प्रतियोगिता का आयोजन भी हुआ था. कुछ माह पहले प्रयागराज में संपन्न ‘‘कुंभ मेले’’ के दौरान पहली बार तमाम विरोधों के बावजूद ‘किन्नर अखाड़ा’ भी मौजूद रहा.

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तो वहीं फिल्म‘हंसा-एक संयोग’ का निर्माण करने वाले सुरेश शर्मा ने‘चित्रागृही फिल्मस’ के ही तहत रायपुर, छत्तीसगढ़ में 30 मार्च 2019 को 15 किन्नरों को अपनी बेटी बनाकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री व अन्य सम्मानित लोगों की मौजूदगी में पूरे रीति रिवाज के साथ 15 युवा पुरूषों के साथ उनका व्याह करवाया. सभी विवाहित जोड़े को एक लाख रूपए भी दिए. इनमें से सात किन्नर छत्तीसगढ़ की हैं. और बाकी देश के अलग अलग राज्यों की है. इसके लिए इन्हें पूरे विश्व से प्रशंसा पत्र मिले. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी बधाई संदेश भेजा. इस तरह सुरेश शर्मा व फिल्म ‘हंसाःएक संयोग’ ने विश्व रिकार्ड बना डाला.

प्रस्तुत है सुरेश शर्मा से हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश…

35 साल की नौकरी छोड़कर फिल्म निर्माण की तरफ मुड़ने की वजह क्या रही?

मेरे संबंध बौलीवुड के साथ साथ छत्तीसगढ़ की अदालतों मे भी रहे हैं. हमारा संबंध न्यायालय के न्यायाधीशों के साथ भी बना रहता था. पहली बार छत्तीसगढ़ में एक फिल्म फेस्टिवल का आयोजन हुआ था,  जिसका नाम था- ‘लीगल अवेयरनेस फिल्म फेस्टिवल’. उस वक्त छत्तीसगढ़ के कुछ मेरे मित्र व मंत्री वगैरह ने मुझसे निवेदन किया कि मैं भी इस फिल्म फेस्टिवल के लिए कोई फिल्म या डाक्यूमेंट्री बना कर दूं. तब मैने‘वेदना’ नामक एक डाक्यूमेंट्री बनायी थी. इसमें मैंने गरीब प्रदेशों के गांवों से पूरे परिवार को पंजाब जैसे संपन्न राज्यों में ले जाया जाता है और उनसे वहां पर मजदूरी कराई जाती है, उनसे ईंट भट्टों पर काम कराया जाता है. वहां पर उनके साथ अन्याय व अत्याचार किया जाता है. कम पैसे दिए जाते हैं. नौकरी करते हुए छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में मुझे इस तरह की कई कहानियां सुनने को मिली थी. मैंने उन्ही पर चार घंटे की डाक्यूमेंटरी बनायी थी, जिसे काट कर संक्षिप्त कर इस फेस्टिवल में दी. फिल्म की प्रशंसा हुई, तो मुझे लगा कि अब कुछ समाज के लिए सकारात्मक काम फिल्म माध्यम में किया जाना चाहिए. फिर नौकरी छोड़कर मुंबई चला आया. अब मेरी फिल्म‘हंसा -एक संयोग’ प्रदर्शन के लिए तैयार है. यूं तो हम पहले एक दूसरी फिल्म बना रहे थे, पर उसमे धोखा मिला. उसके बाद मुझे लेखक संतोश कष्यप ने किन्नरों पर यह कहानी सुनायी, जिस पर मैंने ‘हंसा-एक संयोग’बनायी.

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कहानी में ऐसा क्या था कि आपको लगा कि इस पर फिल्म बननी चाहिए?

-हम लोग रोहतक से हैं. रोहतक में हमारी मां किन्नरों की बड़ी इज्जत करती थी. बचपन में हम किन्नरों को मौसी कहा करते थे.तो बचपन से उनकी तरफ रूझान था. फिर कहानी में जब उनकी व्यथा को सुना, तो मुझे लगा कि सुप्रीम कोर्ट ने इसी के चलते इनके पक्ष में निर्णय सुनाया है और हमें सबसे पहले अब इसी पर फिल्म बनानी चाहिए. मुझे अहसास हुआ कि इनके प्रति नाइंसाफी होती आ रही है. यह बच्चे हमारे ही घरों में पैदा होते हैं. किन्नर किसी किन्नर को पैदा नही करती. क्योंकि किन्नर किसी पुरूष को औरत का सुख तो दे सकती है, पर किन्नर बच्चे पैदा नहीं कर सकती. किन्नर तो एक पुरूष व महिला ही अपने मिलन से पैदा करते हैं. यानी कि यह बच्चे हमारे अपने घरों के हैं, तो फिर इन्हें इनके अधिकार से वंचित क्यों किया जाता है. इनका बचपना छीन लिया जाता है. इन्हे घर से निकाल दिया जाता है. इन्हे स्कूल में पढ़ने नहीं दिया जाता. हर चैराहे पर इन पर छींटाकशी होती है. यदि हमारे साथ ऐसी घटना घटे, तो हम सभ्य इंसान की बजाय गुंडा या मवाली ही बनेंगे. काफी कुछ सोचा. फिर भारत सरकार व कई राज्य सरकारों की गतिविधियों का अवलोकन किया. मैंने पाया कि इनकी मदद करने के मकसद से समाज कल्याण मंत्रालय भी काम कर रहा है. तो मेरे दिमाग में आया कि यदि मैं भी इनकी धारा में जुड़ जाता हूं तो इन्हें मदद मिलेगी और मुझे दुआएं.

क्या इस पर रिसर्च करने की जरुरत पड़ी?

लेखक के पास सिर्फ एक कहानी थी. पर पहली फिल्म के अनुभव से मैं काफी कुछ सीख चुका था. इसलिए मैने स्वयं इस पर रिसर्च करने का निणर्य लिया. मैं छत्तीसगढ़ व हरियाणा सहित देश के कई राज्यों में गया और वहां पर किन्नरों से मिला. किन्नरों के मंडलेश्वरों से मिला. उनकी कहानियां सुनी. कई तरह की जानकारियां इकट्ठा करके लेखक को दी. जिस पर उसने पटकथा लिखी, फिर मैंने लेखक संतोश कश्यप के साथ ही धीरज वर्मा को निर्देशक के तौर पर लेकर यह फिल्म बनायी. रिसर्च के दौरान मुझे पता चला कि सिर्फ भारत में किन्नरों की आबादी लगभग छह करोड़ है. अब तक सैकड़ों किन्नर मुझे ‘पिता’बुलाने लगी हैं. हमने अपनी फिल्म में छत्तीसगढ़ के कई किन्नरों के साथ साथ शबनम मौसी से भी अभिनय करवाया.

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किन्नरों की क्या प्रतिक्रिया मिल रही थी?

-जब हम किन्नरों से मिले और उन्हें बताया कि हम इस तरह की फिल्म बना रहे हैं, तो उत्साहित हुई और हमें कई किन्नरों से मिलवाया. अपनी कहानी सुनायी. कहानी सुनाते हुए वह भी रो रही थीं और हम भी कहानी सुनते हुए रो रहे थे. उनकी आंखों में अपने मां बाप को खोने व अपने घर न जा पाने का दर्द था.

यानी कि आप किन्नरों की व्यथा से प्रभावित हुए? 

जी हां! मैं तो उनके दर्द से इतना प्रभावित हुआ कि मैंने उन्हे समान धारा में लाने के लिए सोचना शुरू किया. तो मुझे याद आया कि 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश देते हुए ट्रांसजेंडर यानी कि किन्नरों को भी सामाजिक जीवन जीने और समानता का अधिकार दिया.  मैंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को एक कदम आगे बढ़ाते हुए उनके दर्द व वयथा को सिनेमा के परदे पर लाने के साथ ही उसे सार्थक भी किया है.कुछ किन्नरों को अपनी बेटियां भी बनाया है. फिल्म निर्माता की हैसियत से पूरे भारत में मैंने ही इस तरह का काम किया है. हमने 15 किन्नरों की शादी किन्नर नहीं बल्कि पुरूषों से करवायी है. हमने फिल्म में बच्चे के प्रति मां की ममता और बच्चे के लिए मां की बगावत को भी दिखाया है.

हमने अपनी इस फिल्म में समाज के डर का चित्रण करते हुए हर इंसान को संदेश देने का प्रयास किया है कि समाज के डर को दूर कर अपने बच्चे के बारे में सोचना चाहिए. तभी समानता का अधिकार सही मायनों में आएगा.

आपकी फिल्म क्या संदेश देती है?

हम अपनी फिल्म के माध्यम से यही कहना चाहते हैं कि हमने अपने घरों से जिन बच्चों को बाहर कर दिया, अब उन्हें तो हम वापस ला नहीं सकते, पर हम उन्हें रिश्तों में बांध सकते हैं. मैं समाज से कहना चाहूंगा कि यदि किसी के घर में इस तरह का बच्चा पैदा होता है, तो वह उसे सड़कों पर भटकने के लिए घर से बाहर न करें. समाज से न डरे. समाज तो खुद कहता है- ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना.’ समाज की बातो को नजरंदाज कर अपने बच्चे पर ध्यान दें, उसे पढाएं व लिखाएं. सरकार भी आपका साथ देगी. हम फिल्म के माध्यम से इस बात को प्रचारित करने का काम करते रहेंगे. हम अपनी तरफ से समाज में एक सकारात्मक बदलाव लाने का काम करते रहेंगे.

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फिल्म ‘हंसाः एक संयोग’ की खासियत?

फिल्म इस बात की ओर इशारा करती है कि यह समाज ऐसा जहां इंसान जीना चाहता है, पर समाज उसे जीने नहीं देता. किन्नर तो अर्धनारीष्वर है. उसके अंदर आधा पुरूष और आधा स्त्री तत्व है. भारतीय संस्कृति में किन्नर और गंधर्व तो ईश्वर की श्रेणी में आते हैं. हमारे देश में आम धारणा है कि किन्नर के आशिर्वाद से काम सफल हो जाता है. एक तरफ आप किन्नर में इतनी सकारात्मकता देखते हैं, तो दूसरी तरफ जब आपके घर कोई किन्नर पैदा होता है, तो उसके जन्म लते ही आप उसे घर से बाहर कर सारे रिश्ते खत्म कर देते हैं.

आपने फिल्म के लिए कलाकारों का चयन कैसे किया?

हमारी फिल्म की कहानी छत्तीसगढ़ की है. फिल्म में मास्टर रामानुज यानी कि बाल किन्नर के किरदार में बाल कलाकार आयुष, बड़े रामानुज यानी कि किन्नर हंसा के किरदार में आयुश श्रीवास्तव है. यह दोनो कलाकार रायपुर,छत्तीसगढ़ से हैं. उसकी माता सुमित्रा देवी के किरदार में वैष्णवी मैकडोनल्ड,पिता जसवंत सिंह के किरदार में सयाजी शिंदे, दादा बलवंत सिंह के किरदार में शरत सक्सेना, हंसा की किन्नर गुरू अमीना बानो के किरदार में अखिलेंद्र मिश्रा, मंत्रा पाटिल के किरदार में राधिका, वकील भुदड़िया के किरदार में अमन वर्मा, सोनिया के किरदार में दीपशिखा नागपाल व सोनिया के पति सेठ धरमदास के किरदार को मैंने स्वयं निभाया है. अन्य कलाकार हैं-इशित्याक खान, बच्चन पचेरा, गोपाल सिंह, पंकज अवधेश शुक्ला हैं.

आगे की योजना क्या है?

किन्नरों को समान धारा में लाने के लिए मैं निरंतर प्रयास रहत रहूंगा. यह किन्नर कला या सुंदरता के मसले पर किसी से कम नहीं है. इसलिए अब हम इनसें अपनी अगली फिल्मों में अभिनय करवाने के अलावा इस बात के लिए प्रयास कर रहा हूं कि कुछ कंपनियां बड़ी बड़ी हीरोईनो की बनिस्बत इन्हें अपने प्रोडक्ट की मौडल के रूप में लेकर विज्ञापन फिल्में बनाएं.

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आपने जिन 15 किन्नरों की शादी कराई, यह शादियां टिकेंगी?

-जरूर देखिए,यह पहले से ही रिश्ते में हैं. समाज इन्हें शादी के बंधन में नहीं देखना चाहता था. अब हम इन्हे बच्चे एडौप्ट करने की सलाह देने वाले हैं. क्योंकि किन्नर अपने पति रूपी पुरूष को औरत का सुख दे सकती है, पर बच्चे नहीं पैदा कर सकती. इससे देश के अनाथलयों में पल रहे बच्चों को मां बाप मिल सकेंगे.

दूसरी फिल्म की योजना क्या है? 

जी हां! दो फिल्मों पर काम कर रहा हूं. जिसमें से एक छत्तीसगढ़ी भाषा की फिल्म ‘कर्मभूमि है. यह ऐसी फिल्म है जो कि हर किसान को प्रेरणा देगी और उन्हें एक ऐसी राह बताएगी, जिससे उन्हें कभी भी पानी के अभाव में खेतों के सूखने का डर नहीं सताएगा. बाद में इसे देश की अलग अलग भाषाओं में डब करके रिलीज करुंगा. हमारी इस फिल्म को देखकर वह पद्धति व तकनिक की जानकारी मिलेगी, जिससे वह पानी के लिए नहीं तरसेंगे.

दोस्ती की कोख से जन्मी दुश्मनी

गोरखपुर के थाना शाहपुर में किसी अज्ञात व्यक्ति ने फोन कर के सूचना दी कि रेलवे डेयरी कालोनी के पास 2 लोगों की लाशें पड़ी हैं.

यह बात 23/24 जनवरी, 2019 की रात के साढ़े 12 बजे की है. थानाप्रभारी नवीन कुमार सिंह उस समय रात्रि गश्त पर थे.

2 लाशों की खबर पा कर वह सीधे घटनास्थल पर पहुंच गए. इस की सूचना उन्होंने आलाअधिकारियों को भी दे दी थी. एसपी (सिटी) विनय कुमार सिंह, सीओ (कैंट) प्रभात राय भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

लाशों की तलाशी लेने पर उन की जेब से मिले आधारकार्ड की वजह से दोनों की पहचान रमेश यादव निवासी कुशीनगर, हनुमानगंज और अरविंद कुमार सिंह निवासी शाहपुर के रूप में हुई. कुशीनगर वहां से दूर था इसलिए पुलिस ने उसी रात अरविंद के घर वालों को सूचना दे कर मौके पर बुला लिया.

अरविंद के पिता राजेश सिंह मौके पर पहुंचे और उन्होंने उन में से एक लाश की पहचान अपने बेटे अरविंद कुमार सिंह उर्फ रानू के रूप में कर दी. राजेश सिंह ने दूसरे मृतक को बेटे के दोस्त रमेश सिंह के रूप में पहचाना. पुलिस ने घटनास्थल से 4 खाली खोखे बरामद किए. सुबह को रमेश के घर वाले भी शाहपुर पहुंच गए.

पहचान होने के बाद पुलिस ने दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए बाबा राघवदास मैडिकल कालेज, गुलरिहा भिजवा दीं. राजेश सिंह ने बेटे की हत्या के लिए 12 नामजद और 4 अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया. सभी आरोपी रुद्रपुर, देवरिया के थे. मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी. चूंकि रिपोर्ट नामजद थी इसलिए पुलिस ने नामजद आरोपियों को हिरासत में ले कर पूछताछ की. लेकिन उन का इस घटना में कहीं कोई हाथ नहीं पाया गया.

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एसएसपी डा. सुनील गुप्ता ने इस दोहरे हत्याकांड के खुलासे के लिए पुलिस की 4 टीमें बनाईं. छानबीन में पुलिस को पता चला कि इस हत्याकांड में रमेश के दोस्त शेरू आदि का हाथ हो सकता है. क्योंकि दोनों की आपस में नहीं बनती थी. दुर्गेश यादव उर्फ शेरू गोरखपुर के गांव जमीन भीटी का रहने वाला था.

इस प्रकार की भी जानकारी मिली कि वारदात में उस का भाई बृजेश यादव उर्फ मंटू भी शामिल रहा हो. पुलिस ने दुर्गेश और बृजेश के घर पर दबिश दी, लेकिन दोनों भाई घर से फरार मिले. काफी कोशिश के बाद भी जब बृजेश और दुर्गेश नहीं मिले तो  आईजी (जोन) जयनारायण सिंह ने उन पर 25-25 हजार रुपए का ईनाम घोषित कर दिया. पुलिस टीमें अपने स्तर से दोनों आरोपियों को तलाशने लगीं.

इसी दौरान 29 जनवरी को शाहपुर थानाप्रभारी नवीन सिंह को एक मुखबिर से खबर मिली कि दोहरी हत्या की घटना में शामिल मुख्य आरोपी दुर्गेश यादव उर्फ शेरू अपने साथी राशिद खान के साथ हनुमान मंदिर बिछिया से मोहद्दीपुर की तरफ आने वाला है.

इस सूचना के बाद नवीन कुमार सिंह, कौआबाग चौकी प्रभारी राजाराम द्विवेदी और स्वाट टीम प्रभारी दीपक कुमार के साथ मोहद्दीपुर ओरवब्रिज के पास पहुंच गए और उन दोनों के आने का इंतजार करने लगे.

थोड़ी देर बाद एक काले रंग की मोटरसाइकिल पर 2 व्यक्ति आते दिखे तो मुखबिर के इशारे पर पुलिस ने मोटरसाइकिल रोकने का इशारा किया. पुलिस को देख दोनों ने मोटरसाइकिल मोड़ कर भागने की कोशिश की, लेकिन हड़बड़ाहट में मोटरसाइकिल फिसल कर गिर गई. तभी पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया.

तलाशी लेने पर दोनों के पास से .32 बोर की 1-1 पिस्टल और 5-5 जिंदा कारतूस बरामद हुए. पूछताछ में उन में से एक युवक ने अपना नाम दुर्गेश यादव और दूसरे ने राशिद खान निवासी गांव चेरिया थाना बेलीपार, जनपद गोरखपुर बताया. पुलिस दोनों को शाहपुर थाने ले आई. उन की गिरफ्तारी की जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी दे दी गई.

सूचना मिलते ही एसएसपी डा. सुनील गुप्ता, एसपी (सिटी) विनय कुमार सिंह और क्षेत्राधिकारी प्रभात राय शाहपुर थाने पहुंच गए. दुर्गेश यादव उर्फ शेरू और राशिद खान से सख्ती से पूछताछ की गई तो दोनों ने दोहरे हत्याकांड का अपराध स्वीकार कर लिया.

पूछताछ में पता चला कि आरोपी दुर्गेश उर्फ शेरू और मृतक रमेश यादव दोनों गहरे दोस्त थे. उन के बीच दांतकाटी रोटी जैसी दोस्ती थी. दोनों एकदूसरे के हमराज भी थे. फिर उन के बीच ऐसा क्या हुआ कि वे एकदूसरे के खून के प्यासे बन गए. पूछताछ के बाद आरोपियों के बयानों से कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

24 वर्षीय रमेश यादव मूलरूप से उत्तर प्रदेश के शहर कुशीनगर के धोबी छापर का रहने वाला था. वह 4 भाईबहनों में दूसरे नंबर पर था. बेहद स्मार्ट रमेश पढ़लिख कर जीवन में कुछ बड़ा बनना चाहता था.

हनुमानगंज के धोबी छापर इलाके में जहां वह रहता था, वह इलाका आज भी पिछड़ा माना जाता है. वहां रह कर वह अपने सपनों का महल खड़ा नहीं कर सकता था इसलिए उस ने गांव छोड़ने का फैसला कर लिया. उस के सपनों को साकार करने के लिए घर वालों ने भी उसे पूरी आजादी दे दी थी.

जीवन में आगे बढ़ने के लिए रमेश को जिस चीज की जरूरत होती घर वाले पूरी करते थे. रमेश गोरखपुर शहर आ गया और शाहपुर इलाके में पादरी बाजार मोहल्ले में किराए का कमरा ले कर रहने लगा. यहीं रह कर वह पढ़ता भी था.

इसी मोहल्ले में दुर्गेश यादव उर्फ शेरू भी रहता था. यहां उस का अपना निजी मकान था. उस के परिवार में एक छोटा भाई बृजेश कुमार यादव उर्फ मंटू और मांबाप रहते थे. दुर्गेश के पिता बलवंत यादव प्राइवेट जौब करते थे. हालांकि बलवंत यादव मूलरूप से गगहा थाने के जमीनी भीटी गांव के रहने वाले थे. गांव में उन की खेती की जमीन भी थी.

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चूंकि, रमेश और दुर्गेश पास में रहते थे. दोनों हमउम्र भी थे इसीलिए जल्द ही दोनों के बीच दोस्ती हो गई. धीरेधीरे उन की दोस्ती घनिष्ठ से भी घनिष्ठतम हो गई. दुर्गेश से दोस्ती से पहले रमेश का एक और भी बचपन का दोस्त था- अरविंद कुमार सिंह उर्फ रानू. रानू शाहपुर के गीता वाटिका इलाके की आवास विकास कालोनी में मांबाप के साथ रहता था.

उस के पिता राजेश सिंह सरकारी मुलाजिम थे तो चाचा आरपीएफ में दारोगा थे. रानू के परिवार के लोग बड़े ओहदे पर थे और इज्जतदार भी थे. गोरखपुर के अलावा रानू का देवरिया के रुद्रपुर में पुश्तैनी घर और संपत्ति थी. उस के दादादादी गांव में ही रहते थे, इसलिए वह अकसर गांव आताजाता रहता था.

दुर्गेश से दोस्ती के बाद रमेश ने अपने घर पर एक पार्टी दी. पार्टी में रानू और दुर्गेश भी आए थे. वहीं पर रमेश ने दुर्गेश और रानू का आपस में परिचय कराया था. इस के बाद रानू भी दुर्गेश का दोस्त बन गया था. जितनी गहरी रानू की रमेश से छनती थी, पता नहीं क्यों उतनी रमेश से उस की नहीं बनती थी और न ही उस की दोस्ती उसे रास आ रही थी. इसलिए रानू दुर्गेश से कम ही मिलताजुलता था.

देखने में रमेश जितना मासूम और स्मार्ट दिखता था दरअसल, वो वैसा था नहीं. रमेश किसी बात को ले कर कभीकभी दुर्गेश उर्फ शेरू से नाराज हो जाता था तो उस का रौद्र रूप देख कर वह भीतर तक सहम जाता था.

इस कारण दुर्गेश पर वह भारी पड़ता था. उस समय शेरू अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता था, जब कभी दुर्गेश एकांत में होता था तो वह जरूर सोचता कि आखिर रमेश उस के साथ ऐसा क्यों करता है.

दरअसल, रमेश के चेहरे पर एक और चेहरा था. उस चेहरे के पीछे एक गंभीर राज छिपा था. उस राज को उस के बचपन के दोस्त रानू के अलावा कोई तीसरा नहीं जानता था. रमेश यादव एक शातिर अपराधी था और पुलिस का मुखबिर भी.

हनुमानगंज थाने में उस पर कई आपराधिक मुकदमे दर्ज थे, पुलिस का मुखबिर होने की वजह से उस के सिर पर थानेदार और अन्य पुलिसकर्मियों का हाथ था. इसीलिए वह किसी से न दबता था और न ही डरता था. मुखबिर होने की वजह से पुलिस भी उस के छोटेमोटे अपराधों को नजरअंदाज कर देती थी.

दुर्गेश रमेश की दबंगई से तंग आ चुका था. दबंगई के साथ ही वह उस से छोटीछोटी बात पर भिड़ जाता और मारपीट करने पर उतर आता था. आखिर दुर्गेश यह कब तक सहन करता, यहीं से उन की दोस्ती में दरार आ गई.

खुद को कमजोर समझने वाला दुर्गेश धीरेधीरे रमेश से अलग हो गया और उस ने अपनी एक अलग मंडली बना ली. इस मंडली में शामिल थे राशिद खान, संदीप यादव, मनीश साहनी, नवनीत मिश्रा उर्फ लकी, अंगेश सिंह और बृजेश यादव उर्फ मंटू.

अब दुर्गेश यादव रमेश से ताकतवर बन कर उस के सामने आना चाहता था ताकि रमेश से अपने अपमान का बदला ले सके. लेकिन यह इतना आसान नहीं था. क्योंकि रमेश अपने साथ हमेशा लोडेड पिस्टल ले कर चलता था. दुर्गेश यही सोचता था कि काश मेरे पास भी पिस्टल होती तो सारी की सारी गोलियां उस के सीने में उतार कर उस से अपना बदला ले लेता.

दोस्त से जानी दुश्मन बने दुर्गेश और रमेश एकदूसरे को देख लेने के लिए दुश्मनी के मैदान में बड़ी लकीर खींच चुके थे.

इस बीच एक और रोमांचक कहानी ने जन्म ले लिया. रोमांचक कहानी की मूल कड़ी थी दुर्गेश की प्रेमिका रूपाली. दुर्गेश और रूपाली दोनों एकदूसरे को दिलोजान से मोहब्बत करते थे.

बात दिसंबर 2018 की है. रूपाली कैंट थाना क्षेत्र स्थित व्हील पार्क में दुर्गेश से मिली. उस दिन वह बेहद उदास थी. उस की उदासी देख कर दुर्गेश तड़प उठा. जब उस ने रूपाली से उस की उदासी का कारण पूछा तो वह फफक कर रो पड़ी. वह बोली, ‘‘तुम्हारा दोस्त रमेश पिछले कई दिनों से मेरे साथ बदतमीजी कर रहा है. जातेआते रास्ते में छेड़ता है. ऊलजलूल फब्तियां कसता है.’’ यह सुन कर गुस्से से दुर्गेश की आंखें सुर्ख हो गईं.

रूपाली की बातें सुन कर दुर्गेश बोला, ‘‘उस कमीने से मैं ने कब की दोस्ती तोड़ दी है. अब वह मेरा दोस्त नहीं, दुश्मन है. तुम्हें छेड़ना उसे बहुत महंगा पड़ेगा. तुम चिंता क्यों करती हो. मैं उसे इस की ऐसी सजा दूंगा जिस की उस ने कल्पना तक नहीं की होगी.’’

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दरअसल दुर्गेश उर्फ शेरू से 36 का आंकड़ा होने के बाद रमेश का दिल दुर्गेश की प्रेमिका रूपाली पर आ गया था. रमेश उस से एकतरफा प्यार करने लगा था. लेकिन रूपाली दुर्गेश के प्रति वफादार थी. उस ने रमेश को कभी लिफ्ट नहीं दी. रूपाली के कठोर व्यवहार से तमतमाया रमेश रूपाली को आतेजाते रास्ते में छेड़ने लगा था.

दुर्गेश यादव जानता था कि वह कभी अकेले दम रमेश से मुकाबला नहीं कर सकता. बदले के जुनून में दुर्गेश ने रमेश को मात देने के लिए आखिरकार रास्ता निकाल ही लिया. इस खेल में उस ने महराजगंज जिले में तैनात सिपाही विकास यादव को शामिल कर लिया. सिपाही विकास यादव दुर्गेश का दूर का रिश्तेदार था. उस के बूते पर दुर्गेश खुद को रमेश से ताकतवर समझने लगा था.

दुर्गेश ने रमेश यादव को ठिकाने लगाने के लिए अपने दोस्तों राशिद खान, संदीप यादव, मनीष साहनी, नवनीत मिश्रा उर्फ लकी, अंगेश सिंह व अपने भाई बृजेश यादव उर्फ मंटू के साथ मिल कर एक योजना बनाई. इस योजना में उस ने सिपाही विकास यादव को भी शामिल कर लिया था. योजना को अंजाम देने के लिए उस ने 23 जनवरी, 2019 की तारीख पक्की कर दी थी.

इस के एक दिन पहले यानी 22 जनवरी को रूपाली को ले कर दुर्गेश और रमेश के बीच हाथापाई हुई थी. इस में रमेश फिर से दुर्गेश पर भारी पड़ गया था.

योजना के अनुसार, 23 जनवरी की रात शाहपुर इलाके की रेलवे डेयरी कालोनी के पास दुर्गेश उर्फ शेरू ने दोस्तों को मीट और लिट्टी की दावत दी थी. दावत में राशिद खान, संदीप यादव, मनीष साहनी, नवनीत मिश्रा, अंगेश सिंह, बृजेश यादव के अलावा सिपाही विकास यादव भी शामिल हुआ था.

दावत में मीट और लिट्टी के साथ शराब भी चली. जब शराब रंग दिखाने लगी तो दुर्गेश ने रमेश को फोन कर दावत खाने के बहाने रेलवे डेयरी कालोनी बुलाया.

उस समय रमेश गोरखपुर रेलवे स्टेशन के बाहर अपने दोस्त अरविंद उर्फ रानू के साथ खड़ा था. दुश्मनी के बावजूद रमेश दुर्गेश के कहने पर रानू के साथ रेलवे डेयरी कालोनी पहुंच गया. उस समय रात के साढ़े 11 बज रहे थे.

रमेश और रानू के पहुंचते ही दुर्गेश और उस के दोस्त चौकन्ने हो गए. रमेश को देखते ही दुर्गेश को रूपाली वाली बात याद आ गई और उस का खून खौल उठा. दुर्गेश ने रमेश और रानू को बैठने के लिए बोला तो रमेश ने पूछा, ‘‘तुम ने मुझे यहां क्यों बुलाया?’’

दुर्गेश ने कहा कि तुम बैठो तो सही तुम्हें बताता हूं कि मैं ने तुम्हें क्यों बुलाया है. तब तक दुर्गेश का भाई बृजेश यादव उर्फ मंटू पीछे से रमेश पर टूट पड़ा. रमेश समझ गया कि यहां रुकना खतरे से खाली नहीं है. जैसे ही रमेश वहां से वापस जाने के लिए पीछे मुड़ा तभी दुर्गेश ने पिस्टल निकाल कर रमेश की खोपड़ी से सटा कर गोली चला दी. गोली लगते ही रमेश का भेजा उड़ गया.

दोस्त को गोली लगी देख रानू सन्न रह गया और जान बचाने के लिए वह तेजी से भागा. रानू को भागते देख दुर्गेश का छोटा भाई बृजेश और राशिद खान उस के पीछे भागे और 15 मीटर की दूरी पर उसे भी गोली मार दी.

गोली लगते ही रानू ने भी मौके पर दम तोड़ दिया. हालांकि रानू की रमेश और दुर्गेश की दुश्मनी के बीच कोई भूमिका नहीं थी. वह घटनास्थल पर मौजूद था और हत्या का एकमात्र गवाह भी, इसलिए दुर्गेश ने उसे भी मार दिया.

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दुर्गेश यादव व राशिद खान से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड के सभी आरोपियों को एकएक कर के गिरफ्तार कर लिया. सिपाही विकास यादव को इस घटना से अलग कर के उस के खिलाफ विभागीय जांच कराई जा रही है. फिलहाल पुलिस का कहना है कि उस का इस घटना से कोई लेनादेना नहीं था. यदि जांच में वह दोषी पाया गया तो उस के खिलाफ भी मुकदमा पंजीकृत किया जाएगा.

4 टिप्स: जाने क्यों झड़ते है आपके बाल…

हेयर फौल आज के इस पोल्युशन भारे टाइम में कोई नई बात नहीं है. आम तौर पर महिलाओं के साथ देखी जाने वाली हेयर फौल की प्रोब्लम पुरुषों में भी देखी जाने लगी हैं. लेकिन बड़े बालों के कारण पुरुषों की तुलना में महिलाएं इससे अधिक रूप से प्रभावित होती हैं. औस्ट्रेलियन जर्नल औफ जनरल प्रैक्टिस में प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ताओं में खुलासा किया कि करीब 49 फीसदी महिलाएं अपने जीवन में बालों के झड़ने की समस्या से परेशान होती हैं.

हेयर फौल के कारण

जेनेटिक, हार्मोनल असंतुलन और दूषित पर्यावरण, कई अध्ययनों में कहा गया कि रोजाना 50 से 100 बालों का टूटना सामान्य है लेकिन अगर संख्या निरंतर अंतराल पर बढ़ती है तो आपको इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए डॉक्टर से बात करनी चाहिए. इसलिए आज हम आपको ऐसी 4 स्वास्थ्य स्थितियों के बारे में बता रहे हैं, जो बालों के झड़ने की गंभीर समस्या का कारण बन सकते हैं.

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1.गर्भावस्था में बालों का झड़ना

गर्भावस्था एक ऐसी स्थिति है, जिसके दौरान महिलाओं को बहुत सा तनाव हो सकता है और इसलिए बालों का झड़ना अधिक होता है. तनाव बालों की कमजोर का मुख्य कारण होता हैं. इसलिए डिलीवरी के बाद भी आपकी कंघी पर बालों की संख्या आपको बढ़ी हुई दिखाई दे सकती है.

2.हाइपो-थायरायडिज्म

हाइपोथायरायडिज्म की स्थिति में आपका थायराइड हार्मोन स्तर नीचे चला जाता है. इन हार्मोन का स्तर गिरने से आपके बाल कमजोर हो सकते हैं और इसके कारण बाल झड़ सकते हैं.

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3.ल्यूपस से होते है बाल कम

ये एक स्व-प्रतिरक्षित बीमारी है, जिसमें आपका इम्यून सिस्टम आपके शरीर के भीतर स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला कर देता है. आपके शरीर के भीतर सूजन व जलन भी बालों के झड़ने के पीछे के प्रमुख कारकों में से एक है.

4.हाइपर टेंशन

किसी भी बड़ी घटना के बाद आप में चिंता विकसित हो सकता है, जिसे हाइपर टेंशन के रूप में भी जाना जाता है और पोषक तत्वों की कमी के कारण यह विकार बढ़ सकता है, जिसके कारण लोगों में बालों के बढ़ने की स्थिति में असंतुलन हो सकता है. इस प्रक्रिया के कारण लोगों में बालों के झड़ने की शुरुआत हो सकती है.

प्लकर से बाल निकालना : सही या गलत?

प्‍लकर से बाल निकालना या ट्वीजिंग एक ऐसी तकनीक है जिससे आमतौर पर अतिरिक्त बालों को हटाया जाता है. ट्वीजिंग बाल को जड़ से हटा देता है. इसका इस्तेमाल लड़कियां आइब्रो, ठुड्डी, ऊपरी होंठ, निचले होंठ और गाल के बालों को हटाने के लिए करती हैं. ट्वीजिंग दरअसल बालों को तोड़ने की एक विधि है, जिसके अपने फायदे और नुकसान हैं. आइए हम आपको बालों को हटाने के लिए ट्वीजर के इस्तेमाल की अच्छाई और बुराई के बारे में बताते हैं.

इसलिए अच्छा है ट्वीजिंग

आसान : अगर आप अनावश्यक बालों को अस्थाई तौर पर हटाना चाहती हैं तो ट्वीजिंग सबसे आसान विकल्प है. नौन—प्रोफेशनल लोग भी ट्वीजिंग का इस्तेमाल आसानी से कर सकते हैं. इससे ट्वीजिंग महिलाओं के लिए बालों को हटाने का सबसे अच्छा विकल्प बन जाता है.

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कम खर्चीला : अगर आप एक ट्वीजर खरीद लेते हैं तो बालों को हटाना आपके लिए खर्चीला नहीं रह जाता है. एक बार जब आप ट्वीजर के इस्तेमाल में एक्सपर्ट बन जाते हैं तो फिर आपको बालों को हटाने के लिए ब्यूटी सैलून जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. आप घर पर ही ट्वीजिंग कर सकती हैं.

कम तकलीफदेह : ट्वीजिंग अच्छा है या बुरा, इस सवाल पर विचार करते समय आप इससे होने वाले दर्द के बारे में भी सोचती होंगी. पर ट्वीजिंग में थ्रेडिंग की तुलना में कम दर्द होता है, क्योंकि इसमें आप अपनी सुविधा के हिसाब से सिंगल हेयर स्ट्रैंड को हटाती हैं.

विशेषज्ञ होने की जरूरत नहीं : ट्वीजिंग करने के लिए आपको ब्यूटी प्रोफेशनल होने की जरूरत नहीं है. एक बार जब आप इस तकनीक से परिचित हो जाएंगी तो​ फिर आप पूरी बारीकी से ट्वीजिंग कर सकती हैं. यही वजह है महिलाओं में ट्वीजिंग काफी लोकप्रिय है.

इसलिए बुरा है ट्वीजिंग

इनग्रोन हेयर :​ थिक हेयर फालिकल का ट्वीजिंग करना अच्छा नहीं माना जाता है. इससे इनग्रोन हेयर की समस्या आ सकती है. साथ ही इससे त्वचा पर लाली, सूजन और निशान भी आ सकता है.

पिंचिंग स्किन : ट्वीजर के इस्तेमाल के दौरान पिंचिंग स्किन की समस्या सबसे बड़ी होती है. सिर्फ सावधानी से ही इस समस्या से निजात पाया जा सकता है. इस तकनीक से परिचित हो जाने के बाद आपको इस परेशानी से नहीं जूझना पड़ेगा.

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समय : बालों को हटाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दूसरी विधि की तुलना में ट्वीजिंग में ज्यादा समय लगता है. ट्वीजिंग में लगने वाला समय इस बात पर निर्भर करता है कि बाल कितने बड़े हिस्से पर निकले हैं. चूंकि ट्वीजिंग बालों को हटाने का अस्थाई तरीका है, इसलिए नियमित अंतराल पर इसे दोहराना पड़ता है.

ऊबाउ : अगर आप बहुत बड़े​ हिस्से के बाल को हटाने के बारे में विचार कर रही हैं तो यह एक ऊबाउ काम साबित होगा. चूंकि ट्वीजिंग एक समय में ज्यादा बालों को नहीं हटा सकता है, इसलिए आपको बहुत ज्यादा धैर्य की जरूरत होगी.

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आज ही से शुरू करें ये काम, बुढ़ापे में अच्छी रहेगी याद्दाश्त

एक खास उम्र के पड़ाव पर आ कर शरीर की बहुत सी चीजें कमजोर पड़ने लगती हैं. एक खास उम्र में  कर हमारे शारीरिक और मानसिक विकास में काफी कमजोरी देखी जाती है. हाल ही में हुए एक शोध में ये बात सामने आई कि बढ़ते उम्र के साथ मानसिक तौर पर आने वाली कमजोरी को ठीक किया जा सकता है. इसके लिए जरूरी है कि आप शारीरिक और मानसिक तौर पर अधिक सक्रिय रहें. इसके लिए आप पढ़ने की आदत डाल सकते हैं. इसके अलावा वाद्ययंत्र बजाना, सामूहिक गायन, बागवानी करना, विभिन्न कार्यक्रमों में जाना जैसी चीजें कर सकते हैं. इससे आपका याद्दाश्त अच्छी रहेगी.

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स्वीडन में हुए इस शोध में जानकारों का मानना है कि अधेड़ उम्र में होने वाली मानसिक कमजोरियों को दूर करने के लिए मानसिक और शारीरिक तौर पर सक्रिय रहना बेहद जरूरी है. इससे बुढ़ापे में याद्दाश्त का कमजोर होने को कम किया जा सकता है.

जानकारों की माने ते ये तरीका काफी कारगर और बेहतरीन है. इसमें खुद को स्वस्थ करने के लिए लोगों को बहुत पैसा खर्च करने की भी जरूरत नहीं है. बिना पैसा खर्च किए आम चीजों में खुद को लगा कर याद्दाश्त जैसी बेहद जरूरी चीज को अच्छा किया जा सकता है. स्वीडन में 800 महिलाओं पर यह अध्ययन किया गया जिनकी औसत उम्र 47 थीं.

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और तो सब ठीकठाक है

दरबार जमा हुआ था. सबकुछ निश्चित कर लिया गया था. अब किसी को कोई परेशानी नहीं थी. पंडित गिरधारीलाल की समस्या का समाधान हो चुका था. रजब मियां के चेहरे पर भी संतुष्टि के भाव थे.

हां, कल्लू का मिजाज अभी ठीक नहीं हुआ था. उस ने भरे दरबार में चौधरी साहब की शान में गुस्ताखी की थी. नरेंद्र तो आपे से बाहर भी हो गया था, किंतु चौधरी साहब ने सब संभाल लिया था.

चौधरी जगतनारायण खेलेखाए घाघ आदमी थे. जानते थे कि वक्त पर खोटा सिक्का भी काम आ जाता है. फिर दूध देने वाली गाय की तो लात भी सही जाती है. उन्होंने बड़ी मीठी धमकी देते हुए कल्लू को समझाया था, ‘‘कल्लू भाई, थूक दो गुस्सा. धंधे में क्रोध से काम नहीं चलता. हम तो तुम्हारे ग्राहक हैं. ग्राहक से गुस्सा करना तो व्यवसाय के नियमों में नहीं आता.’’

‘‘लेकिन चौधरी साहब, मैं अपने इलाके का शेर हूं, कुत्ता नहीं. कोई दूसरा गीदड़ मेरी हद में आ कर मेरा हक छीने, यह मुझे बरदाश्त नहीं होगा. वह रशीद का बच्चा, उस का तो मैं पोस्टमार्टम कर ही दूंगा.’’

‘‘कल्लू के मुंह से कौर छीनना इतना आसान तो नहीं है, जितना आप लोगों ने समझ लिया है. आज का फैसला आप के हाथ में है. लेकिन आगे का फैसला मैं अपनी मरजी से लिखूंगा. और हां, यह भी आप लोगों को बता दूं कि अपना आदमी जब बागी हो जाता है तो कहीं का नहीं छोड़ता.’’

‘‘तू क्या कर लेगा? तीन कौड़ी का आदमी. जानता नहीं जुम्मन की लंबी जबान काट कर फेंक दी थी. हरिशंकर आज भी जेल की चक्की पीस रहा है. कृपाराम मतवाला कुत्ते की मौत मरा था. आखिर, तू समझता क्या है अपनेआप को? चिड़ीमार कहीं का.

‘‘दोचार चूहे इधरउधर मार लिए तो बड़ा भेडि़या समझने लगा है अपनेआप को. सुन, हम राजनीति करते हैं. कोई भाड़ नहीं झोेंकते. तुझ जैसे तीन सौ पैंसठ घूमते हैं झाडू लगाते हुए. चल फूट यहां से,’’ नरेंद्र ने एक फूहड़ सी गाली बकी.

चौधरी साहब ने उसे रोक दिया, ‘‘नहीं नरेंद्र, कहने दो उसे, जो वह कहना चाहता है. उसे भी अपनी बात कहने का हक है. भई, देश में लोकतंत्र है. लोकतंत्र के तहत किसी को उचितअनुचित कुछ भी कहने से रोका नहीं जा सकता. बोलने दो इसे. यह समाजवाद का जमाना है. इसे कुछ गलत लगा है. इसे अपने दर्द को कहने का पूरापूरा हक है. फिर यह हमारा आदमी है. यह हमारे लिए कुछ भी सोचे, हम इस का बुरा नहीं सोच सकते.’’

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‘‘हां, हरीश. तुम ध्यान रखना कल्लू भाई का. इसे जब भी कोई जरूरत हो तो उसे पूरी करना. इस समय इसे गुस्सा है. जब यह शांत हो जाएगा तो समझ जाएगा कि कौन अपना है, कौन पराया,’’ चौधरी साहब गांधीवादी मुद्रा में बुद्धआसन लगाए हुए थे.

लेकिन कल्लू एकदम चिकना घड़ा था. वह अपनी हैसियत जानता था. वह यह भी जानता था कि चौधरी साहब के बिना उस का गुजारा नहीं और यह भी मानता था कि अपनेआप को अधिक सस्ता और सुगम बनाने से इनसान की औकात घटती है.

अब चौधरी साहब का दबदबा था. जिस का दबदबा हो उसी के साथ रहने में लाभ था. फिर कल्लू तेजी से घूम कर बाहर निकल गया.

इधर नरेंद्र चौधरी साहब को राजनीति समझा रहा था, ‘‘आप ने बहुत मुंह लगा रखा है उस घटिया आदमी को. उसे न तो बोलने का शऊर है, न ही उठनेबैठने की तमीज. उस दिन धर्मदास को ही दरवाजे पर धक्का मार दिया और फिर पिस्तौल भी निकाल ली. वह तो अच्छा हुआ कि मनोहरलालजी आ गए और बात संभल गई. नहीं तो गजब हो जाता.’’

‘‘अरे, कुछ भी गजब नहीं होता. इंदिरा गांधी को गोली मार दी गई तो मारने वालों पर कौन सा गजब टूट पड़ा? वही अदालत- कचहरी के चक्कर, वकीलों की तहरीरें, न्यायविदों की दलीलें. मुलजिम आनंद करते रहे. उन की रक्षा और देखभाल पर लाखों रुपया पानी की तरह बहाया जाता रहा. अब उच्चतम न्यायालय ने उन में से एक को बरी भी कर दिया है. बाकी को फांसी पर लटका दिया जाएगा. इस से क्या होगा? क्या पंजाब में अब शांति है.

‘‘जुलियस रिबेरो को पद्मश्री से अलंकृत कर दिया गया तो क्या उन की राइफलों में नई गोलियां आ गईं? पंजाब सरकार बरखास्त हो गई तो क्या आतंकवाद दब गया. सबकुछ वैसा ही चल रहा है.

‘‘राजनीति की शतरंज की चालें चली जाती रहेंगी और घाघ मुहरों के घर बदलते रहेंगे, पर मुहरे वही रहेंगे. धर्मनिरपेक्ष समाजवाद, लोकतंत्रीय संविधान, बीस सूत्री कार्यक्रम सब अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन हम भी अपनी जगह ठीक हैं.

‘‘कल्लू भाई की अपनी राजनीति है, अपना पैंतरा है, लेकिन वह हमारे लिए काम का आदमी है. बड़ा जीवट वाला आदमी है. देखो, उस दिन कालीप्रसाद को बुलाने भेजा तो उसे गिरेबान पकड़ कर घसीटता हुआ ले आया. कालीप्रसाद जैसे धाकड़ और झगड़ालू आदमी के गिरेबान पर हाथ डालना कोई हंसीखेल नहीं है, नरेंद्र.’’

चौधरी साहब आ गए नेताओं वाली भाषण मुद्रा में. लेकिन तभी चपरासी बुद्धा अंदर आया. बोला, ‘‘साहब, दिल्लीपुरा के ठाकुर लोग आए हैं.’’

चौधरी साहब ने उन्हें अंदर भेजने का संकेत किया. कीमती खादी के कपड़ों में झकाझक तड़कभड़क के साथ 5 विशिष्ट व्यक्तियों ने प्रवेश किया.

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चौधरी साहब का इशारा समझ कर सभी साथी बाहर खिसक गए. कुछ देर तक कुशलक्षेम चलता रहा.

‘‘साहब, वह आप का पुलिसिया कुत्ता था, अब वह कैसा है?’’

‘‘अरे भाई, किस पुलिसिए कुत्ते की बात कर रहे हो. उस के बाद तो मैं 7 कुत्ते बदल चुका.’’

अभ्यागतों में रमन नामक सदस्य भी था. वह सोचने लगा, ‘कुत्ते नहीं हुए, चप्पलें हो गईं. 1 साल में 7 कुत्ते बदल डाले.’

उधर चौधरी साहब पूछताछ करने लगे, ‘‘हरदयालजी, वह आप के भतीजे की बहू का कुछ चक्कर था… मामला सिमट गया कि नहीं?’’

‘‘नहीं, साहब. उस में कुछ गड़बड़ हो गई. हम समझे थे कि बलात्कार का मामला दर्ज कराएंगे. बहू पढ़ीलिखी है. साहस के साथ कह देगी कि दुर्गा ने उस के साथ जबरदस्ती की.

‘‘लेकिन बहू पहले दिन ही अदालत में घबरा गई और रोने लगी. वकीलों ने जिरह कर उसे और भी बौखला दिया. फिर बाद में कुछ मामला बना भी तो गवाह बिक चुके थे.

‘‘मुरली बाबू ने कुछ टुकड़े फेंक कर उन्हें खरीद लिया, लेकिन चौधरी साहब, एक बाजी जिच भी हो गई तो क्या अगली मात तो हम ही देंगे.’’

‘‘वह कैसे?’’ चौधरी साहब ने दोनों पैर सोफे पर खींच लिए. तभी अवधनारायण ने उठ कर उन की धोती ठीक कर दी.

हरदयाल अपना नक्शा समझाने लगे, ‘‘ ‘अपनी धरती’ अखबार का संपादक है न, शंभूप्रसाद. वह अपना यार है. कुछ मामला उस से बना है. उसी के आदमियों ने कुछ तसवीरें खींची हैं. गुलजार रेस्तरां में शराब पीते हुए, मालतीमाधवी के साथ रंगरलियां मनाते हुए, मार्क्सवादी नेता अर्जुनकुमार के साथ शतरंज खेलते हुए. बस, उन्हीं सब तसवीरों के आधार पर एक कहानी बन गई. यही फिल्म उस की असलियत खोल कर रख देगी.’’

हरदयाल अपनी योजना और भी विस्तार में समझाता, लेकिन तभी चौधरी साहब ने उसे टोक कर मुख्य मुद्दे पर बात करना जरूरी समझा.

आने वालों में अध्यापक ज्ञानेंद्र, वकील सुरेंद्रनाथ, सरपंच मोतीलाल, नेता ज्वालाप्रसाद और रमन उपस्थित थे. हरदयाल एक दूसरे सिलसिले में वहां आया था.

बात रमन ने ही शुरू की, ‘‘चौधरी साहब, अब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा है. हम ने पूरे जिले की नाका चुंगियों का ठेका लिया है. ट्रैफिक से चुंगी वसूल करते हैं. 10 प्रतिशत पार्टी के दफ्तर को देते हैं…’’

‘‘रुकिए, सारी बातें समझदारी के साथ स्पष्ट करनी चाहिए. ऐसा करते हैं, हरदयालजी, आप सब 11 तारीख को हम से मिलना, जो भी उचित होगा, तय कर लेंगे,’’ चौधरी साहब ने रमन की बात बीच में ही काट दी.

हरदयाल चुपचाप उठ कर बाहर चला गया.

‘‘अरे भाई, तुम लोगों में इतनी भी बुद्धि नहीं है कि कोई अन्य बाहरी आदमी बैठा है. ठीक है, आगे कहो.’’

‘‘आगे क्या कहें? 20 प्रतिशत आप के खाते में डाल देते हैं. 20 प्रतिशत सरकारी कामकाज के लिए, खानेपिलाने के लिए रख छोड़ते हैं. बकाया 50 प्रतिशत में हम 4 लोग भागीदार हैं.’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या? वह ज्ञानीशंकर का लड़का नर्मदा अकड़ रहा है. 100-50 लड़के इकट्ठे कर लिए हैं और लड़नेमरने को आमादा है.’’

‘‘ठीक है, ठीक है, कुछ फूल उसे भी भेंट कर दो.’’

‘‘नहीं, चौधरी साहब, वह हरिश्चंद्र की औलाद बनता है. ऐसे लेनेदेने से तो नहीं टूटेगा. और भी जलील करेगा सब के आगे.’’

‘‘चांदी का जूता बहुत भारी होता है, नरेंद्रजी.’’

‘‘चौधरी साहब, नर्मदा अक्खड़- मिजाज और सनकी नौजवान है. उस ने अपना बहुमत बना लिया है. तब तो एक ही उपाय है. उसे साफ कर दिया जाए.’’

‘‘छि:छि:, कैसी छोटी बातें करते हो. ऐसे सनकी और जिद्दी आदमियों की हमें बहुत जरूरत है. मैं कल तहसील आऊंगा खुद नर्मदा से बातें करूंगा. और कुछ?’’

अध्यापक ज्ञानेंद्र ने अपनी बात कही, ‘‘चौधरी साहब, हम ने जिले के परमिट आप की राय के अनुसार ही वितरित किए थे. सेठ भगवानदास को सीमेंट का परमिट दिया गया. मुंशी प्यारेलाल भजनलाल फर्म को मिट्टी का तेल, गोवर्धनप्रसाद को सौफ्ट कोक, अली मुहम्मद को गैस आदि के ठेके दिए गए. हम ने वसूली के लिए चक्कर भी लगाए, लेकिन अधिकांश ने कहा कि उन्होंने अपना धन आप को दे दिया है. यदि ऐसा है तो हमारा हिस्सा दिलवा दीजिए.’’

‘‘देखो, मास्टर ज्ञानेंद्रजी. जब तुम एक निजी पाठशाला में मास्टरी करते थे तो चेहरे पर झुर्रियां थीं, आंखों में गड्ढे थे और कुरतापाजामा में पैबंद लगे थे. तुम्हारी पत्नी क्षयरोग की मरीज लगती थी और बच्चे ऐसे लगते थे जैसे सीधे अनाथाश्रम से आए हों.

‘‘तुम 350 रुपए और मुट्ठीभर इज्जत ले कर बीमार जिंदगी से लड़ रहे थे. मैं ने तुम्हें सड़क से उठा कर  मकान में रखा, मकान में दुकान लगवाई, दुकान में चक्की लगवाई, चक्की की कमाई से तुम्हारी रोटियां चल रही हैं.

‘‘चुनाव में तुम्हें विधान सभा का सदस्य बनाने के लिए 1 लाख रुपए खर्च किए हमारे 2 आदमी किशन और रमेश चुनाव युद्ध में काम आ गए. हम ने उन्हें तालाब में फिंकवा कर मामला रफादफा कर दिया. तुम अच्छे वोटों से जीते, तुम्हारा नाम भी हुआ.

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‘‘अब रही हिसाबकिताब की बात. भाई मास्टर, पहले मुझे अपने 1 लाख रुपए निकालने हैं. 20-20 हजार  रुपए मृत व्यक्तियों के रिश्तेदारों को देने हैं. अभी तो सिर्फ 80 हजार ही वसूल हुए हैं. आप लोग 60 हजार रुपए का प्रबंध कर के मुझे दिलवा दो. फिर चाहो तो मेरा हिस्सा भी तुम खा जाना.

‘‘गांधी, नेहरू जैसे बड़े नेता भी तो चुपचाप सब देखते थे. हिस्सेपट्टे से दूर रहते थे. मेरे पास तो ईमानदारी की कमाई ही बहुत है,’’ चौधरी साहब ने पैर सोफे से नीचे लटका दिए.

‘‘चौधरी साहब, यह तो ठीक है कि अब मेरा पक्का मकान है, लोगबाग इज्जत से देखते हैं, सेहत सुधर गई है, लेकिन राजनीति से इस का कुछ लेनादेना नहीं है.

‘‘हाउसिंग बोर्ड का मकान कर्ज पर लिया है. राजवैद्य चक्रपाणिजी के आयुर्वेदिक उपचार से मुझे स्वास्थ्य लाभ हुआ है. चुनाव में भी लोगों को मेरे चरित्र पर विश्वास था. मैं समझता हूं कि इस चुनाव में किसी का कुछ खर्च नहीं हुआ. क्या प्रमाण है आप के पास? क्या खर्च किया है आप ने?’’

‘‘छि:छि:, उग्र होने से स्वास्थ्य बिगड़ता है, मेरे भाई. सुनो, जिन लोगों को चुनाव से पहले वारुणी की बोतलें वितरित कीं, उन की रसीदें चाहिए क्या? 3 महल्लों में हैंडपंप लगवाए हैं, उन की रसीद चाहिए क्या? 3 हजार कंबल खरीद कर बांटे गए, उन की रसीद चाहिए क्या? कैसी बच्चों जैसी बातें करते हो? बिना खर्चपानी के कोई चुनाव नहीं जीतता. एक प्राइमरी स्कूल के मास्टर की इतनी हस्ती नहीं होती कि वह विधान सभा का चुनाव जीत ले. क्या तुम्हारी सात पुश्तों में भी किसी ने ऐसा सम्मान प्राप्त किया था?

‘‘भाई मेरे, अब तुम सरकार हो, कानून हो, शहर के मालिक हो. तुम किसी को भी जेल में बंद करा सकते हो. किसी को भी जेल से छुड़वा सकते हो. शहर के जुए के अड्डे, रंडियों के कोठे, शराब की भट्ठियां सब तुम्हारी मरजी से चलती हैं.

‘‘मुगल शासनकाल में बादशाह विभिन्न प्रांतों के लिए अलगअलग सूबेदार नियुक्त करता था. वह सूबेदार अपने इलाके का राजा होता था. तुम भी अपने इलाके के राजा हो. किसी का भी तबादला करा सकते हो, नियुक्ति करा सकते हो, निलंबित करा सकते हो. तुम्हारे एक इशारे पर कोई भी पिट सकता है, हवालात में बंद हो सकता है या भगाया जा सकता है. क्या मदरसे की मास्टरी में तुम्हारा यही रोब था?’’

‘‘लेकिन चौधरी साहब, पेट बड़ा हो जाने से खुराक भी ज्यादा हो जाती है. आप ने हमारा पेट बड़ा किया है तो हमें खुराक भी बड़ी चाहिए.’’

‘‘पुलिस विभाग आप के लिए छोड़ दिया है. खाओ और खाने दो. शहर के गुंडेबदमाशों का दोहन करो, लाटरी, जुआ, शराब, चिट आदि की सदाबहार खेती को संभालो.’’

‘‘फिर भी आप को हम सब का हिस्सा तो देना ही होगा. आप जबरदस्ती हमारा हिस्सा हजम नहीं कर सकते.’’

‘‘फिर ठीक है, समझ लो, मैं ने सब कुछ हजम कर लिया. अब आप को जो करना है कर लेना.’’

‘‘समझ लीजिए, चौधरी साहब. आप को यह सौदा महंगा पड़ेगा.’’

‘‘जाओ, मास्टर. राजनीति में ऐसी धमकियां तो हमारा नाश्तापानी हैं. हां, लेकिन हाथपैर संभाल कर वार करना.’’

सभी लोग उत्तेजित से निकल गए. नेताजी ने चपरासी से कहा, ‘‘अंदर कोई नहीं आए. जरा रामदुलारी को भेज देना. कंठ बड़ा चटक रहा है.’’

दूसरे दिन तहसील में होहल्ला मचा हुआ था. वकील सुरेंद्रनाथ, नेता ज्वालाप्रसाद और नरेंद्र का कत्ल हो गया था. रात में 8-10 डाकू आए थे गांव में.

सब से पहले गल्ला फकीर मरा. वह पागल था. पुराने कुएं की जगत पर सोया था. होहल्ला सुन कर डाकुओं के सामने सीना तान कर खड़ा हो गया. एक घोड़े की लगाम भी पकड़ ली. तभी आग के एक शोले ने उसे जमीन पर लिटा दिया. एक ही चीख में ठंडा हो गया वह पागल. उस की कहीं चर्चा भी नहीं हुई.

फिर डाकुओं ने ढूंढ़ढूंढ़ कर तीनों व्यक्तियों को मारा. संयोगवश मास्टर ज्ञानेंद्र किसी काम से शहर गए थे. सरपंच होतीलाल को पेचिश लग गई थी. वह सरकारी अस्पताल का लाल पानी पीने के लिए गांव से बाहर ही थे. शायद इसीलिए शहीद होतेहोते बच गए.

सरकारी टेलीफोन की घंटियां घनघना उठीं. नेता, अभिनेता, पत्रकार, फोटोग्राफर आदि की लाइनें लगने लगीं. पुलिस हरकत में आ गई.

दूरदूर तक डाकुओं का पीछा किया गया. उन की धूल भी हाथ न लगी, लेकिन पुलिस को तो कुछ न कुछ करना ही था. 30 आदमियों को गिरफ्तार किया गया. गांवतहसील में कुछ नारेबाजियां हुईं. फिर सबकुछ शांत हो गया.

दूसरे दिन शाम को मास्टर ज्ञानेंद्र चुपचाप आए डरेसहमे से. चौधरी साहब ने उन का स्वागत किया. अंदर के निजी कक्ष में कुछ भेद की बातें हुईं. कुछ देर बाद मास्टर ज्ञानेंद्र कुछ संतुष्ट से, कुछ खुश से बाहर निकले.

ज्ञानेंद्र ने गांव संभाल लिया था. अब उन के मकान की दूसरी मंजिल का काम संगमरमर से हो रहा था. कुछ नई शक्लसूरतें गांव में दिखाई दे रही थीं.

फिर एक दिन चौधरी साहब गांव में आए. सब को आश्वस्त किया. लोग उन से सहमे हुए थे, डरे हुए थे. और तो सब ठीकठाक था. सब जगह शांति थी. लोग अपनेअपने कामों में लग गए थे.

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