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धमाकों से जुड़े कुछ सवाल

शहर में रहरह कर सिलसिलेवार बम धमाके हो रहे थे. चारों तरफ अफरातफरी का माहौल था. मैं टेलीविजन पर नजरें गड़ाए बैठा था. मुन्ना भी वहीं बैठा अपना होमवर्क कर रहा था. अचानक उस ने पूछा, ‘‘पापा, बहुत देर से कोई ब्लास्ट नहीं हुआ है, अगला ब्लास्ट कब होगा?’’

‘‘मैं कैसे बता सकता हूं बेटा?’’

‘‘क्यों पापा, आप इतना टेलीविजन जो देखते हैं.’’

‘‘बेटा, टेलीविजन देखने से ब्लास्ट का पता नहीं चलता.’’

‘‘तो फिर टेलीविजन पर ब्लास्ट कैसे दिखाते हैं?’’

‘‘ब्लास्ट होने पर टेलीविजन वाले वहां पहुंच जाते हैं और उस का फोटो खींचते हैं.’’

‘‘क्या टेलीविजन वाले कहीं भी पहुंच सकते हैं?’’ मुन्ना ने पूछा.

‘‘हां.’’

‘‘नहीं, पापा.’’

‘‘क्यों नहीं, बेटा?’’

‘‘कल हम सुपरमार्केट गए थे न.’’

‘‘हां बेटा, गए तो थे.’’

‘‘वहां कोने में एक भिखारी मर गया था न.’’

‘‘हां, हां.’’

‘‘वहां टेलीविजन वाले क्यों नहीं थे?’’

‘‘बेटा, टीवी वाले तभी पहुंचते हैं जब कोई बड़ा आदमी मरता है या बहुत सारे लोग एकसाथ मरते हैं.’’

तभी टेलीविजन पर प्रधानमंत्री आ गए. वह बम धमाकों के बारे में अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे.

‘‘देखो, यह बहुत बडे़ आदमी हैं,’’ मैं ने टेलीविजन की तरफ इशारा किया.

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‘‘यह कौन हैं, पापा?’’

‘‘यह हमारे पी.एम. यानी प्राइम मिनिस्टर हैं.’’

‘‘पर पापा, यह इतने दुबले हैं, बोलते भी इतना धीरेधीरे हैं, तो बड़े आदमी कैसे हुए?’’

‘‘देखो, मैं बताता हूं. तुम स्कूल में धीरे बोलते हो या जोर से?’’

‘‘धीरे से, पापा.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘जोर से बोलने पर मैडम बहुत डांटती हैं, पर पापा, पी.एम. को कौन मैडम डांटती है?’’

मैं कुछ बोलता तभी ब्रेकिंग न्यूज में एक और ब्लास्ट की खबर आई.

‘‘पापा, पापा, देखो, एक और ब्लास्ट हो गया,’’ मुन्ना उछल कर ताली बजाते हुए बोला.

‘‘मुन्ना बेटा, ऐसा नहीं करते. देखो, कितने लोग मर रहे हैं, सब को कितनी चोटें आई हैं. देखो, सब अंकलआंटी कैसे रो रहे हैं.’’

इतने में टेलीविजन पर गृहमंत्री का इंटरव्यू आने लगा.

‘‘पापा, सब लोग रो रहे हैं पर ये क्यों नहीं रो रहे हैं?’’ मुन्ना ने गृहमंत्री के बारे में पूछा.

‘‘इन्हें शरम आती है, बेटे.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बेटा, तुम्हें याद है. तुम ने एक बार स्कूल में पैंट में शूशू कर दिया था?’’

‘‘हां.’’

‘‘तुम ने यह बात किसी से बताई थी?’’

‘‘बहुत शरम लगी थी न पापा, इसलिए घर आ कर सिर्फ मम्मी को बताई थी.’’

‘‘देखो, मंत्रीजी भी शरम के मारे सब के सामने रो नहीं पा रहे हैं.’’

‘‘तो फिर यह किस के पास जा कर रोते हैं?’’

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‘‘पी.एम. के पास, बेटे.’’

तभी एक और धमाके की खबर आई.

‘‘पापा, एक एपीसोड में कितने ब्लास्ट होते हैं?’’ मुन्ने ने पूछा.

‘‘बेटा, यह कोई सीरियल थोड़े ही न चल रहा है.’’

‘‘तो फिर टेलीविजन पर सीरियल ब्लास्ट क्यों लिखा है?’’

‘‘अपना होमवर्क मन लगा कर क्यों नहीं करता?’’ मैं ने मुन्ने को हलके से डांटा.

‘‘पापा, बताओ न…बम कौन फोड़ रहा है?’’

‘‘आतंकवादी अंकल, बेटा.’’

‘‘ये अंकल कहां रहते हैं?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘दीवाली में उन्हीं से पटाखे खरीदने हैं.’’

‘‘बेटा, वह पटाखे नहीं, बम बनाते हैं.’’

‘‘वह इतना अच्छा बम बनाते हैं तो फिर पटाखा क्यों नहीं बनाते?’’

‘‘मुझे नहीं पता.’’

‘‘पापा, अंकल एक ही साथ इतने सारे बम क्यों फोड़ते हैं?’’

‘‘लोगों को डराने के लिए.’’

‘‘पापा, क्या उन से पुलिस अंकल भी डरते हैं?’’

‘‘बेटा, पुलिस तो बम से भी खतरनाक है.’’

‘‘कैसे, पापा?’’

‘‘बम तो एक ही बार फटता है पर पुलिस जिसे पकड़ती है उसे बारबार फोड़ती है.’’

‘‘क्या पुलिस अंकल भी बम फोड़ते हैं?’’

‘‘नहीं, अच्छा बताओ तुम्हें कौन सा चौकलेट पसंद है?’’

‘‘चुइंगम.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘चुइंगम बहुत बार चबाने से भी खत्म नहीं होता.’’

‘‘ठीक बताया तुम ने, पुलिस भी जिसे पकड़ती है उसे चुइंगम की तरह बहुत बार चबाती है.’’

मुन्ना ने अचानक मेरे हाथ से रिमोट छीन कर कार्टून चैनल लगा दिया. उस में टौम एंड जेरी के बीच निरंतर खींचतान जारी थी. टौम जेरी के पीछे भागता है पर जेरी बारबार चकमा दे कर निकल जाता.

‘‘वह देखो, पापा,’’ मुन्ना बोला, ‘‘बम वाले अंकल के पीछे पुलिस अंकल कैसे भाग रहे हैं,’’ इतना कह कर मुन्ना खिलखिला कर हंस रहा था.

कोई किसी की डेस्टिनी बदल नहीं सकता: इनामुलहक

बहुमुखी प्रतिभा के धनी इनामुलहक कई सफल सीरियलों व कुछ कौमेडी शो का लेखन करने के बाद फिल्म ‘‘फिल्मिस्तान’’ से बतौर अभिनेता चर्चा में आए. उसके बाद उन्होंने अक्षय कुमार के साथ ‘‘एअरलिफ्ट’’ और ‘‘जौली एलएलबी 2’’ जैसी फिल्में की. अब पहली बार वह जैगम इमाम निर्देशित फिल्म ‘‘नक्काश’’ में हीरो बनकर आ रहे हैं. 31 मई को प्रदर्शित हो रही फिल्म ‘‘नक्काश’’ के लिए ‘‘वाशिंगटन डी सी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’ में इनामुलहक को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार से नवाजा जा चुका है.

प्रस्तुत है उनसे हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश

आपने 2009 में पहली फिल्म ‘‘फिराक’’ की थी. उसके बाद आप अभिनय से दूरी बनाकर लेखन में व्यस्त हो गए. 2014 तक लेखन करते रहे. आपको नही लगा कि इस तरह आपने स्वयं अपने अभिनय करियर में रोड़ा डाला?

मुझे ऐसा नहीं लगता. मैं नहीं समझता कि मैने करियर में रोड़ा डालने का प्रयास किया. मैं आपको बताउं कि बौलीवुड की कार्यशैली ही कुछ अलग है. यह एक तय पैटर्न पर चलता है. यहां फिल्मकार एक फिल्म में जिस रूप में आपको देखता हैं, बार बार उसी तरह के किरदार का आफर देता रहता हैं. उसी रूप में आपको खरीदना या आगे बढ़ाना या इस्तेमाल करना चाहता हैं. आपने एकदम सही कहा कि मेरी पहली फिल्म‘फिराक’थी.‘फिराक’ में मेरा किरदार कुछ ऐसा था कि मैं उसमें सपोर्टिंग कास्ट का हिस्सा था.तो उसके बाद मेरे पास सभी उसी तरह के फिलर किस्म के किरदार के ही आफर आए.मैने सैकड़ो आफर ठुकराए. यहां फिल्मकार कभी विज्युअलाइज नही करता कि यह कलाकार किसी अन्य ब्रैकेट यानी किसी अन्य तरह के किरदार में भी फिट हो सकता है. मैं हमेशा उसके विपरीत सोचता हूं. मैं खुद को दोहराने में बिलकुल यकीन नहीं करता. मुझे कुछ अलग तलाश करना पड़ता है. ‘‘फिराक’’ के बाद अच्छे कंटेंट वाली फिल्म व अच्छे किरदार की मेरी तलाश जारी रही.पूरे तीन वर्ष बाद 2012 में ‘‘फिल्मिस्तान’’ बनी. जो कि 2014 में रिलीज हुई.

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आपने अक्षय कुमार सहित कुछ बड़े कलाकारों के साथ मल्टीस्टारर फिल्में की. उन्हें करते हुए डर नहीं था कि सारा श्रेय तो यह बड़े कलाकार ही लूट ले जाएंगे. आपकी तरफ लोगों का ध्यान नहीं जा पाएगा? प्रमोशन में भी अवाइड किया जाता है?

आपकी बात कुछ हद सच है. पर मेरा मानना है कि आपने अपना काम इमानदारी से बेहतर किया है, तो कोई चाहे जितना अवाइड कर ले, आपका काम अवाइड नहीं हो सकता. मसलन फिल्म‘ एअरलिफ्ट’ के रिलीज से एक दिन पहले मेरी प्रेस रिलीज भी फाड़कर फेंक दी गयी होगी. पर रिलीज के दूसरे दिन से सारे फोन आने लगे थे कि वह मुझे छापना चाहते हैं. तो मेरा काम बोल रहा था. आप यहां एक हद तक ही उसे रोक सकते हैं, पर यदि उसमें और उसके काम में दम है, तो उसे सामने आने से कोई नहीं रोक सकता. इसके अलावा कोई किसी की डेस्टिनी बदल नहीं सकता. मैं डेस्टिनी में बहुत यकीन करता हूं. अपने काम को पूरी इमानदारी के साथ करता हूं. मुझे जहां पहुंचना होगा, पहुंच जाउंगा. मैं बिना डर के काम कर रहा हूं. पर इंसान हूं, तो कभी कभी मलाल होता है, कि मैं भी इस फिल्म का हिस्सा होता या इस फिल्म के प्रमोशन का हिस्सा होता. पर आपने महसूस किया होगा कि हर फिल्म में फिल्म आलोचकों ने मेरे काम के बारे में एक दो लाइन जरूर लिखी. किसी ने भी मेरे काम को नजरंदाज नहीं किया. यही मेरी यही कमायी है. जबकि हर फिल्म में मेरे जैसे 10-12 कलाकार होते होंगे, पर उनके हिस्से वह एक दो लाइन भी नहीं आती होगी. तो यदि मेरे एक हाथ से कुछ छिन रहा है, तो दूसरे हाथ से कुछ मिल भी रहा है. फिलहाल में फिल्म ‘‘नक्काश’’ को लेकर अति उत्साहित हूं

‘‘नक्काश’’ क्या है?

इस फिल्म की विषयवस्तु वक्त आज की जरुरत है. यह फिल्म वाराणसी के एक नक्काश अल्ला रक्खा की कहानी है. जो मंदिरों में नक्काशी का काम करता है. बनारस में सदियों से मंदिरों की नक्काषी मुस्लिम नक्काश ही करते रहे हैं. जैसा कि आप अयोध्या चले जाएं, तो अयोध्या में फूलों का व्यापार मुस्लिम करते नजर आएंगे. मुस्लिमों के हाथ से होते हुए गंदे के फूल राम जी तक पहुंचते हैं. हमारे देश कि यह सबसे बड़ी खूबसूरती है. अब तक किसी ने भी इन बातों पर एतराज नहीं जताया. लेकिन बीच में कुछ लोगों ने निजी स्वार्थ के चलते या अपनी राजनीति के लिए हिंदू और मुस्लिम शब्दों का उपयोग किया. हमारी फिल्म में अल्ला रक्खा सिद्दिकी भी राजनीति का षकार बढ़ता है.

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 ‘‘नक्काश’’ के अपने किरदार को लेकर क्या कहेंगे?

मैने नक्काश अल्ला रक्खा सिद्दिकी का किरदार निभाया है. अल्ला रक्खा मंदिर में नक्का का काम करता है. मंदिर के बड़े पुजारी का उसे पूरा समर्थन है. अल्ला रक्खा व यह पुजारी दोनों ही मानवता और इंसानियत में यकीन करते हैं. उसका मानना है कि कला का कोई धर्म नहीं होता. कलाकार का कोई धर्म नहीं होता. तो फिल्म में पुजारी जी इस नक्काश से मंदिर में नक्काशी का काम करवाना चाहते हैं. अल्ला रक्खा सिद्दिकी करना भी चाहता हैं, लेकिन इन दोनों के बीच के जो लोग हैं, वह किस तरह के बवाल करते हैं. वही सब फिल्म का हिस्सा हैं.

‘नक्काश’ हिंदू और ‘मुस्लिम’ धर्म पर बात करती है?

बिलकुल नहीं…इसमें चरित्र जरूर हिंदू और मुस्लिम हैं, पर कहानी मानवता की है. यह कहानी है कि हम कब अनजाने में ही एक लाइन को क्रौस कर जाते हैं. मैं फिल्म के रिलीज से पहले कहानी को खुलकर नही बता सकता. इसलिए मुझे संकेत में ही बात करना पडे़गा. लेकिन फिल्म देखने के बाद दर्शकों को खुद इस बात का जवाब मिलेगा कि यह फिल्म आज के वक्त में जरूरी क्यों है?  फिल्म के अंदर यदि हम हिंदू और मुस्लिम शब्द बोल कर इन आवाजों को बढ़ा रहे हैं, तो इसके पीछे हमारा मकसद सही है.

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फिल्म सिर्फ समस्याओं का जिक्र करती है या हल भी बताती है?

मेरी फिल्म कोई हल नहीं बताती है. मेरी राय में सिनेमा का मकसद उपदेश देना नही होना चाहिए. सिनेमा का काम समस्या को लोगों के सामने रखना है ना कि उसका हल बताना है. फिल्म देखकर हर इंसान अपने हिसाब से उसका हल निकालेगा. मेरी राय में समस्या का हल ढूंढ़ने से भी ज्यादा जरूरी है कि समस्या को पहचाना जाए. अमूमन हम अपनी जिंदगी में समझ नहीं पाते हैं कि असली समस्या क्या है? इसलिए हल भी नही ढूंढ़ पाते. पर जब समस्या नजर आती है, तो हम स्वयं उसका हल ढूंढ़ने लगते हैं. तो हमने अपनी फिल्म की कहानी के माध्यम से लोगों तक यह बात पहुंचायी हैं कि समस्या क्या है? हमने फिल्म में कुछ सवाल उठाए हैं और यदि दर्शकों को लगता है कि इन सवालों के जवाब ढूंढ़े जाने चाहिए, तो वह ढूंढ़ेगा. यदि आपको सवालों के जवाब ढूंढ़ने की जरूरत महसूस नही होती है, तो फिल्म देखकर मनोरंजन पाएं और आगे बढ़ जाएं. हम किसी के पीछे डंडा लेकर नही पड़ने वाले हैं कि वह कितने जिम्मेदार नागरिक हैं. सिनेमा की जिम्मेदारी सिर्फ सवाल उठाना है, तभी तो कहा जाता है कि सिनेमा समाज का दर्पण है.

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अपने किरदार के लिए आपका अपना रिसर्च वर्क क्या रहा?

मैं अपने हर किरदार को अलग अलग सोच के साथ करता हूं. हर किरदार को करने से पहले मैं अपनी तरफ से तैयारी जरूर करता हूं. फिल्म ‘नक्काश’ के अल्ला रक्खा सिद्दिकी के किरदार को निभाने से पहले मुझे कुछ अलग तरह की तैयारी करनी पड़ी. नक्काशी एक कारीगीरी, एक कला है. जिससे मैं वाकिफ नहीं था. मैं सहारनपुर से हूं, जहां पर लकड़ी का काम होता है, जिसे टकाई कहा जाता है. नक्काषी के अलग अलग रूप हैं. कश्मीर में इसे कुछ और नाम देते हैं. बनारस में मंदिर के अंदर मेटल पर जो कारीगरी की जाती है,  उसे नक्काशी कहा जाता है. इसलिए इसे समझना जरूरी था. शूटिंग शुरू होने से 15 दिन पहले मैं बनारस में था. मैंने एक कारखाना ज्वाइन किया, जहां मैं उन मजदूरों के साथ रहता भी था.फिर कुछ दिनों तक उसी तरह के कपड़े पहनकर बनारस की गलियों में घूमता रहा. मैंने एक नक्काश की बौडी लैंग्वेज, उसका रहन सहन, उसके बातचीत करने का अंदाज वगैरह समझकर उसे आत्मसात करने की कोशिश की. इसी के साथ यह भी समझने का प्रयास किया कि जब वह लोगों के बीच जाता है, तो लोग उसके साथ किस तरह से व्यवहार करते हैं. मेरे लिए यह बहुत ही नया मसला था. मैं पहली बार बनारस गया था.

देखिए, उत्तर प्रदेश में दो तरह के कल्चर हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कल्चर व रहन सहन में काफी फर्क है. हमारा सहारनपुर हरियाणा के नजदीक है, तो वहां थोड़ा सा कल्चर अलग है. जबकि बनारस धर्म की नगरी है, गंगा नदी है.

नसिरूद्दीन शाह ने कहीं कहा था कि, ‘अभिनेता एक निकम्मा मजदूर है, पर वह मजदूर है, तो निकम्मा नहीं हो सकता. ’यह विरोधा भास है. मैं हमेशा कहता हूं कि जितने भी ‘र’ वाले प्रोफेसर हैं, डौक्टर, लौयर, डांसर, राइटर यह सभी हर दिन रियाज करते हैं. एक डौक्टर कहता है कि, ‘मैं फलां अस्पताल में प्रैक्टिस करता हूं. ’लौयर कहता है कि, ‘मैं पटियाला हाउस कोर्ट में प्रैक्टिस करता हूं. पर एक एक्टर क्या कहता है? क्योंकि उसकी कहीं प्रैक्टिस होती ही नही है. अभिनेता की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह समझता है कि एक्टर होने की वजह से उसे सब कुछ आता है. इसी के चलते फिल्मों की संख्या बढ़ती जाती है. पर लोग याद नहीं रखते.

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फिल्म फेस्टिवल में दर्शकों की क्या प्रतिक्रिया रही?

देखिए,वाशिंगटन डीसी फिल्म फेस्टिवल में मैं नहीं गया था. सिंगापुर फिल्म फेस्टिवल में मैं गया था. फिल्म खत्म होने पर लोगों ने खड़े होकर तालियां बजाकर हमारा स्वागत किया और हर जगह तारीफ हुई. मेरा मानना है कि फिल्म ‘नक्काश’ की असली परीक्षा तो भारतीय दर्शकों के बीच ही होगी. क्योंकि इस फिल्म में जो समस्या है, वह भारतीय दर्शक ही समझ सकता है. सिंगापुर में फिल्म देखने के बाद लोगों ने बडी गर्मजोशी से हमें गले लगाया और प्रशंसा की.

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इसके अलावा क्या कर रहे हैं?

दो वेबसीरीज कर रहा हूं. एक वेब सीरीज निखिल आडवाणी की ‘‘हंसमुख’’ है.यह नेटफिलिक्स पर आएगी. दूसरी है ‘क्रूड अप’. ‘हंसमुख क्रौमिक थ्रिलर है, दूसरी थ्रिलर है. इसके अलावा, मैंने एक सीरियल लिखा है, ‘‘ महाराज की जय हो.’, जो कि स्टार प्लस पर आने वाला है.

भाई सनी देओल की जीत पर सौतेली बहन ईशा ने दी ऐसे बधाई

लोकसभा चुनाव 2019 सनी देओल बीजेपी के टिकट से पंजाब के गुरुदासपुर से चुनावी मैदान में उतरे और पहला लोकसभा चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उनकी जीत  हुई. वें एक सफल एक्टर के साथ-साथ एक सफल नेता भी बन गए हैं. इस जीत पर पूरे बौलीवुड और उनके फैंस में खुशी की लहर है.

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इसी बीच की इस जीत पर बहन ईशा देओल ने उन्हें बधाई देते हुए ट्वीट किया. ‘बधाई, आपको मेरी ओर से हमेशा शुभकामनाएं. इसी के साथ ईशा ने अपनी मां हेमा मालिनी की जीत पर भी बधाई दी हैं. उन्होंने लिखा, ‘आपने फिर कर दिखाया. दूसरी पारी के लिए बधाई और मेरी शुभकामनाएं. ड्रीमगर्ल, आप पर गर्व है.

हालांकि सनी देओल अपने पापा धर्मेंद्र देओल के बेहद करीब हैं, लेकिन हेमा मालिनी और उनके बच्चों से सनी की दूरियां अभी तक कम नहीं हुई है. सनी अहाना और ईशा देओल की शादी में भी नहीं पहुंचे थे. बल्कि ईशा की शादी में सनी के न आने पर जब मीडिया ने धर्मेंद्र से सवाल किया था तो वो काफी नाराज भी हुए थे. आशा करते हैं कि बदलते वक्त के साथ इनके रिश्तों में भी बदलाव आए.

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मिसेज चोपड़ा मीडिया और न्यूज

लंबा कद, गोरा रंग, सलीके से   बंधा हुआ जूड़ा, कलफ लगी बढि़या सूती साड़ी और साड़ी के रंग से मेल खाते गहने पहने मिसेज चोपड़ा पूरे दफ्तर में अलग ही दिखती थीं. मैं जिस दफ्तर में काम करती थी वहां काम कम ही होता था. यों समझ लीजिए, अकसर लोग गरमगरम चाय और गरमागरम बहस से टाइम पास करते थे. कुछ ही दिनों में दफ्तर का यह माहौल देखदेख कर मेरा धैर्य जवाब दे गया.

मैं ने अपने एन.जी.ओ. के कोआर्डिनेटर से एक दिन बातों ही बातों में पूछ लिया, ‘‘यह मिसेज चोपड़ा मुझे आफिस में सब से अलग दिखती हैं, यह कैसा काम करती हैं. मैं अभी नई हूं इसलिए इन के बारे में ज्यादा जानती नहीं हूं.’’

सामने बैठे मिस्टर शर्मा बोले, ‘‘यह यहां पी.आर.ओ. के पद पर हैं. पब्लिक और प्रेस से डीलिंग करना ही इन का काम है. यह किसी मजबूरी में नौकरी नहीं कर रही हैं. मिसेज चोपड़ा जैसी हाइक्लास सोसाइटी की औरतें जब अपनी किटी पार्टियों से बोर हो जाती हैं और उन्हें अपना समय बिताना होता है तो वे किसी एन.जी.ओ. से जुड़ जाती हैं. समय भी बीत जाता है, नाम भी मिल जाता है. मिसेज चोपड़ा भी इसी रंग में रंगी हैं.’’

मैं थोड़ी देर में अपनी जगह पर वापस आ कर काम में जुट गई. चूंकि मेरे ऊपर अपनी विधवा मां की जिम्मेदारी थी इसलिए मैं अपना काम बड़ी ईमानदारी से करती थी. मैं कुछ दिनों से यह भी अनुभव कर रही थी कि मिसेज चोपड़ा मुझे पसंद नहीं करती हैं. मेरे हर काम में उन्हें सिर्फ कमी ही नजर आती थी.

मिसेज चोपड़ा ने धीरेधीरे मुझे सताना शुरू कर दिया. मेरी किसी भी रिपोर्ट को रद्द कर देतीं और फिर से नए ढंग से बनाने को कहतीं. कभी आफिस के काम से हटा कर फील्ड वर्क पर लगा देतीं तो कभी अचानक फील्ड वर्क से आफिस भेज देतीं.

एक दिन उन्होंने मुझ से पूछ ही लिया, ‘‘मिस बेला, आप इतना कम क्यों बोलती हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैडम, ऐसा तो नहीं है. बस, मैं बोलने से ज्यादा काम करना पसंद करती हूं. फिर हम जो काम कर रहे हैं अगर उस में हम अपने बारे में ही सोचेंगे तो दूसरों के दुख कब शेयर करेंगे.’’

वह अचानक बौस के ढंग में बोलीं, ‘‘मिस बेला, इस केस की डिटेल्स पढि़ए. नेहा के घर वालों का बयान लीजिए और गवाहों से बात कीजिए. पुलिस से भी मिलिए. आजकल बहुत कंपीटीशन है. मैं मीडिया से बात कर के रखती हूं. हम पहले केस सुलझा लेंगे तो हमारा नाम होगा. हमारी बढि़या न्यूज तैयार होगी.’’

मैं सिर झुकाए बोली, ‘‘किसी के दुख पर सफलता की सीढ़ी लगाना अच्छा तो नहीं लगता, मैडम.’’

उन की नजरें मुझ पर जम गईं. अच्छा स्टेटस, पैसा और अच्छे संबंध यही दुनिया में जीने के उन के सिद्धांत थे.

मैं अपने गु्रप के साथ घटनास्थल पर जाने को निकल गई. वह एक बौस की तरह मेरे साथ थीं. मैं ने नेहा के घर वालों से बहुत से सवाल पूछे. नेहा को उस के ससुराल वालों ने जला कर मार दिया था. नशे की हालत में उस के पति ने उस पर तेल छिड़क कर आग लगा दी थी. मिसेज चोपड़ा बहुत खुश थीं कि अगर मीडिया यह न्यूज अच्छी तरह से पेश करता है तो उन का बहुत नाम होगा. उन्होंने प्रेस कान्फ्रेंस बुला कर मीडिया में इस मामले पर हलचल मचा दी.

उन की इस हरकत से मैं बहुत बेचैन थी. अपनी उस बेचैनी को कम करने के लिए मैं उन के केबिन में जा कर फट पड़ी, ‘‘मैडम, इस प्रेस कान्फ्रेंस से नेहा को क्या फायदा पहुंच रहा है? उस की मौत को भुना कर हमें क्या मिलेगा?’’

मेरे अंदर सवालों का ढेर लगा था. उन्हें मुझ पर गुस्सा आ गया, ‘‘मिस बेला, आप को क्या लगता है कि हमारी संस्था सिर्फ नाम कमाने के लिए दूसरों के दुख अपने पास जमा करती है? क्या हम उन के लिए कुछ नहीं करते? अगर किसी की मदद के साथ मीडिया वाले हमें भी कैमरे के सामने ला कर न्यूज बना देते हैं तो इस में बुरा क्या है?’’

मैं ने अपनी आवाज को संतुलित करते हुए जवाब दिया, ‘‘मैडम, हम क्या करते रहे हैं महिलाओं के लिए? जो बात सिर्फ घर वाले जानते हैं हम उन्हें सब के सामने ला कर दुखी लोगों को और दुखी कर देते हैं. थोड़ी सी जबानी सहानुभूति या कभीकभी कुछ आर्थिक सहायता. हमारी संस्था औरत को कभीकभी एक तमाशा बना देती है. मीडिया को तो खबरें ही चाहिए. मैडम, मैं यहां नौकरी नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘हां, यही अच्छा रहेगा. जहां काम में रुचि न हो वहां इनसान को काम नहीं करना चाहिए. आप जा सकती हैं.’’

मैं अपना बैग उठा कर आफिस से बाहर आ गई. मैं हर उस नौकरी को बुरा समझती हूं जिस में किसी के दुख को भुनाया जाता है.

मैं ने कुछ दिन बाद एक स्कूल में नौकरी ज्वाइन कर ली लेकिन मिसेज चोपड़ा और उन की संस्था के बारे में मुझे खबर मिलती रहती थी. नेहा का केस उन्होंने सुलझा लिया था, उन की संस्था की धूम मची हुई थी.

जीवन अपने ढर्रे पर चल रहा था कि एक दिन अचानक सुबह उठने पर पेपर पढ़ा तो रोंगटे खडे़ हो गए. मिसेज चोपड़ा की बेटी आकृति के साथ कुछ दरिंदों ने रेप किया था. वह अपने कालिज से घर आ रही थी कि सुनसान सड़क पर कुछ लड़के कार में उसे उठा कर ले गए थे.

इस खबर को पढ़ने के बाद मैं अपने को वहां जा कर उन से मिलने से रोक नहीं पाई. उन के घर पहुंची तो वह मासूम सी लड़की कमरे में बंद थी और बारबार बेहोश हो रही थी. बहुत ही हृदयविदारक दृश्य था. पूरा स्टाफ वहां था. सब को आकृति पर तरस आ रहा था. मिसेज चोपड़ा का विलाप दिल को चीर रहा था. चोपड़ा साहब विदेश में थे. उन मांबेटी से सब को सहानुभूति हो रही थी. कुछ देर वहां ठहर कर मैं वापस घर आ गई लेकिन अगले दिन भी उन दुखियारी मांबेटी के पास कुछ देर बैठने के लिए मैं गई. फिर कई दिनों तक रोज ही जाती रही. सब को आकृति के सामान्य होने का इंतजार था.

एक दिन अचानक एक प्रसिद्ध एन.जी.ओ. की महिलाएं मीडिया के साथ मिसेज चोपड़ा के घर पहुंच गईं. हर तरफ कैमरे की रोशनियां और उन की बेटी का रोना, मिसेज चोपड़ा बारबार उन लोगों से जाने की प्रार्थना करते हुए सिसक उठीं, लेकिन संस्था की महिलाएं, हाथ में पेपर, पैन लिए मीडिया के लोग, मांबेटी से सवाल पर सवाल पूछे जा रहे थे और अपनी संस्था की शान में कमेंट भी किए जा रहे थे कि हम आप की बेटी को न्याय दिलवाएंगे. मैडम, आप तो खुद एक संस्था चलाती थीं. आज आप आम आदमी की जगह खड़ी हैं. आप को कैसा लग रहा है? मैडम, आप कुछ जवाब दें. आप इस केस में क्या कहना चाहेंगी.

मिसेज चोपड़ा ने कुछ कहने की कोशिश की लेकिन उन के शब्द अंदर ही रह गए और वे गिर पड़ीं.

आफिस के कुछ लोगों के साथ मैं उन को अस्पताल ले गई. आकृति को मैं ने अपनी मां के पास भेज दिया. मिसेज चोपड़ा को हार्टअटैक पड़ा था. उन की देखरेख मैं ने एक दोस्त की तरह की, क्योंकि मेरी मां ने मुझे यही सिखाया था. उन के दिए गए संस्कार मेरे अंदर खून बन कर बहते थे. स्कूल से मैं ने छुट्टियां ली हुई थीं. मिसेज चोपड़ा जब तक अस्पताल से घर आने लायक हुईं हम एक अच्छे दोस्त बन चुके थे.

घर आ कर वह अपने काम में व्यस्त हो गईं और मैं अपने में. जीवन निर्बाध गति से चल रहा था. एक दिन मैं ने टेलीविजन चलाया तो मिसेज चोपड़ा अपने साक्षात्कार में कह रही थीं, ‘‘अगर हम किसी बहन या बेटी की इज्जत करते हैं तो क्या हमें उस को हजारों लोगों के सामने खड़ा कर देना चाहिए. हमें यदि किसी की मदद करनी है तो क्या हम चुपचाप नहीं कर सकते. मैं एक नई संस्था बना रही हूं जिस का मीडिया से बहुत ही कम लेनादेना होगा. हम चुपचाप दुखी जनता के आंसू पोंछेंगे.’’

आज मुझे लगा कि मिसेज चोपड़ा ने अब जो रास्ता चुना है वह सही है. मुझे उन की इस बदली हुई सोच पर खुशी हुई और मैं उन को इस नए कदम के लिए शुभकामनाएं देने को फोन मिलाने लगी, साथ ही मुझे उन को यह भी बताना था कि मैं उन की नई संस्था में काम करने आ रही हूं.

4 टिप्स: हेल्दी और शाइनी स्किन के लिए जरूरी है किशमिश

गरमियों में तेज धूप और पसीने के कारण स्किन को कईं प्रौब्लम्स का सामना करना पड़ता है, जो हमारी खूबसूरती को कम कर देती है. हर घर में ड्राई फ्रूट्स होते हैं, लेकिन हम उसका इस्तेमाल खाने में या किसी अच्छी टेस्टी डिश में करते हैं. आज हम आपको स्किन के लिए किशमिश खाने के कुछ ऐसे फायदों के बारे में बताएंगे, जो आपकी तेज धूप और पसीने से डैमेज स्किन को दोबारा खूबसूरत बना देगा.

  1. स्किन को हाइड्रेट करने का काम करता है किशमिश

कम उम्र में ही स्किन पर पड़ने वाली झुर्रियों को ठीक करने के लिए आप किशमिश का सहारा ले सकते हैं. किशमिश विटामिन-ए और ई से समृद्ध होती है, जो स्किन की बाहरी परतों में नई कोशिकाओं के विकास को बढ़ावा देते हैं. इसके अलावा, विटामिन-ई स्किन को हाइड्रेट करने का काम करता है, जिससे स्किन जवां और खूबसूरती दिखती है. किशमिश का नियमित सेवन कर आप स्किन को आकर्षक बना सकते हैं.

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  1. क्लीन और हेल्दी स्किन के लिए इस्तेमाल करें किशमिश

किशमिश न सिर्फ एंटी-एजिंग के रूप में काम करती है, बल्कि यह स्किन को क्लीन और हेल्दी बनाने का काम भी करती है. किशमिश में रेस्वेराट्रोल नामक तत्व होता है, जो स्किन को हेल्दी बनाए रखने में भी मदद करता है, यह खून को साफ कर रेड ब्लड सेल्स को बढ़ाने में मदद करती है. स्किन को क्लीन और शाइनी बनाने के लिए आप रोजाना किशमिश का सेवन कर सकते हैं.

  1. सूरज की हानिकारक तेज किरणों से बचाव करता है किशमिश

सूर्य की हानिकारक किरणों से प्रभावित स्किन का इलाज भी किशमिश से किया जा सकता है. इसमें मौजूद फाइटोकेमिकल्स स्किन की कोशिकाओं को सूरज की तेज किरणों से होने वाले नुकसान से बचाते हैं. किशमिश में मौजूद अमीनो एसिड स्किन के नवीकरण को बढ़ावा देता है और सूरज की क्षति के खिलाफ एक सुरक्षात्मक कवच बनाता है. यह स्किन के कैंसर को रोकने के लिए उपयोगी है.

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  1. शाइनी स्किन के लिए बेस्ट है किशमिश

काली किशमिश का सेवन करने से लिवर की कार्यप्रणाली बेहतर होती है, जिससे बौडी डिटौक्स होती है. यह स्किन को क्लीन और शाइनी बनाने के लिए बौडी से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करती है. आप रोज नाश्ते में 10 से 15 काली किशमिश का सेवन कर सकते हैं.

जिंदगी के रंग

भाग-1

‘‘बीबीजी…ओ बीबीजी, काम वाली की जरूरत हो तो मुझे आजमा कर देख लो न,’’ शहर की नई कालोनी में काम ढूंढ़ते हुए एक मकान के गेट पर खड़ी महिला से वह हाथ जोड़ते हुए काम पर रख लेने की मनुहार कर रही थी.

‘‘ऐसे कैसे काम पर रख लें तुझे, किसी की सिफारिश ले कर आई है क्या?’’

‘‘बीबीजी, हम छोटे लोगों की सिफारिश कौन करेगा?’’

‘‘तेरे जैसी काम वाली को अच्छी तरह देख रखा है, पहले तो गिड़गिड़ा कर काम मांगती हैं और फिर मौका पाते ही घर का सामान ले कर चंपत हो जाती हैं. कहां तेरे पीछे भागते फिरेंगे हम. अगर किसी की सिफारिश ले कर आए तो हम फिर सोचें.’’

ऐसे ही जवाब उस को न जाने कितने घरों से मिल चुके थे. सुबह से शाम तक गिड़गिड़ाते उस की जबान भी सूख गई थी, पर कोई सिफारिश के बिना काम देने को तैयार नहीं था.

कितनों से उस ने यह भी कहा, ‘‘बीबीजी, 2-4 दिन रख के तो देख लो. काम पसंद नहीं आए तो बिना पैसे दिए काम से हटा देना पर बीबीजी, एक मौका तो दे कर देखो.’’

‘‘हमें ऐसी काम वाली की जरूरत नहीं है. 2-4 दिन का मौका देते ही तू तो हमारे घर को साफ करने का मौका ढूंढ़ लेगी. ना बाबा ना, तू कहीं और जा कर काम ढूंढ़.’’

‘आज के दिन और काम मांग कर देखती हूं, यदि नहीं मिला तो कल किसी ठेकेदार के पास जा कर मजदूरी करने का काम कर लूंगी. आखिर पेट तो पालना ही है.’ मन में ऐसा सोच कर वह एक कोठी के आगे जा कर बैठ गई और उसी तरह बीबीजी, बीबीजी की रट लगाने लगी.

अंदर से एक प्रौढ़ महिला बाहर आईं. काम ढूंढ़ने की मुहिम में वह पहली महिला थीं, जिन्होंने बिना झिड़के उसे अंदर बुला कर बैठाते हुए आराम से बात की थी.

‘‘तुम कहां से आई हो? कहां रहती हो? कौन से घर का काम छोड़ा है? क्याक्या काम आता है? कितने रुपए लोगी? घर में कौनकौन हैं? शादी हुई है या नहीं?’’ इतने सारे प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी उन्होंने एकसाथ ही.

बातों में मिठास ला कर उस ने भी बड़े धैर्य के साथ उत्तर देते हुए कहा, ‘‘बीबीजी, मैं बाहर से आई हूं, मेरा यहां कोई घर नहीं है, मुझे घर का सारा काम आता है, मैं 24 घंटे आप के यहां रहने को तैयार हूं. मुझ से काम करवा कर देख लेना, पसंद आए तो ही पैसे देना. 24 घंटे यहीं रहूंगी तो बीबीजी, खाना तो आप को ही देना होगा.’’

उस कोठी वाली महिला पर पता नहीं उस की बातों का क्या असर हुआ कि उस ने घर वालों से बिना पूछे ही उस को काम पर रखने की हां कर दी.

‘‘तो बीबीजी, मैं आज से ही काम शुरू कर दूं?’’ बड़ी मासूमियत से वह बोली.

‘‘हां, हां, चल काम पर लग जा,’’ श्रीमती चतुर्वेदी ने कहा, ‘‘तेरा नाम क्या है?’’

‘‘कमला, बीबीजी,’’ इतना बोल कर वह एक पल को रुकी फिर बोली, ‘‘बीबीजी, मेरा थोड़ा सामान है, जो मैं ने एक जगह रखा हुआ है. यदि आप इजाजत दें तो मैं जा कर ले आऊं,’’ उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘कितनी देर में वापस आएगी?’’

‘‘बस, बीबीजी, मैं यों गई और यों आई.’’

काम मिलने की खुशी में उस के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. उस ने अपना सामान एक धर्मशाला में रख दिया था, जिसे ले कर वह जल्दी ही वापस आ गई.

उस के सामान को देखते ही श्रीमती चतुर्वेदी चौंक पड़ीं, ‘‘अरे, तेरे पास ये बड़ेबड़े थैले किस के हैं. क्या इन में पत्थर भर रखे हैं?’’

‘‘नहीं बीबीजी, इन में मेरी मां की निशानियां हैं, मैं इन्हें संभाल कर रखती हूं. आप तो बस कोई जगह बता दो, मैं इन्हें वहां रख दूंगी.’’

‘‘ऐसा है, अभी तो ये थैले तू तख्त के नीचे रख दे. जल्दी से बर्तन साफ कर और सब्जी छौंक दे. अभी थोड़ी देर में सब आते होंगे.’’

‘‘ठीक है, बीबीजी,’’ कह कर उस ने फटाफट सारे बर्तन मांज कर झाड़ूपोंछा किया और खाना बनाने की तैयारी में जुट गई. पर बीबीजी ने एक पल को भी उस का पीछा नहीं छोड़ा था, और छोड़तीं भी कैसे, नईनई बाई रखी है, कैसे विश्वास कर के पूरा घर उस पर छोड़ दें. भले ही काम कितना भी अच्छा क्यों न कर रही हो.

उस के काम से बड़ी खुश थीं वह. उन की दोनों बेटियां और पति ने आते ही पूछा, ‘‘क्या बात है, आज तो घर बड़ा चमक रहा है?’’

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मिसेज चतुर्वेदी बोलीं, ‘‘चमकेगा ही, नई काम वाली कमला जो लगा ली है,’’ यह बोलते समय उन की आंखों में चमक साफ दिखाई दे रही थी.

‘‘अच्छी तरह देखभाल कर रखी है न, या यों ही कहीं से सड़क चलते पकड़ लाईं.’’

‘‘है तो सड़क चलती ही, पर काम तो देखो, कितना साफसुथरा किया है. अभी तो जब उस के हाथ का खाना खाओगे, तो उंगलियां चाटते रह जाओगे,’’ चहकते हुए मिसेज चतुर्वेदी बोलीं.

सब खाना खाते हुए खाने की तारीफ तो करते जा रहे थे पर साथ में बीबीजी को आगाह भी करा रहे थे कि पूरी नजर रखना इस पर. नौकर तो नौकर ही होता है. ऐसे ही ये घर वालों का विश्वास जीत लेते हैं और फिर सबकुछ ले कर चंपत हो जाते हैं.

यह सब सुन कर कमला मन ही मन कह रही थी कि आप लोग बेफिक्र रहें. मैं कहीं चंपत होने वाली नहीं. बड़ी मुश्किल से तो तुझे काम मिला है, इसे छोड़ कर क्या मैं यों ही चली जाऊंगी.

खाना वगैरह निबटाने के बाद उस ने बीबीजी को याद दिलाते हुए कहा, ‘‘बीबीजी, मेरे लिए कौन सी जगह सोची है आप ने?’’

‘‘हां, हां, अच्छी याद दिलाई तू ने, कमला. पीछे स्टोररूम है. उसे ठीक कर लेना. वहां एक चारपाई है और पंखा भी लगा है. काफी समय पहले एक नौकर रखा था, तभी से पंखा लगा हुआ है. चल, वह पंखा अब तेरे काम आ जाएगा.’’

उस ने जा कर देखा तो वह स्टोररूम तो क्या बस कबाड़घर ही था. पर उस समय वह भी उसे किसी महल से कम नहीं लग रहा था. उस ने बिखरे पड़े सामान को एक तरफ कर कमरा बिलकुल जमा लिया और चारपाई पर पड़ते ही चैन की सांस ली.

पूरा दिन काम में लगे रहने से खाट पर पड़ते ही उसे नींद आ गई थी, रात को अचानक ही नींद खुली तो उसे, उस एकांत कोठरी में बहुत डर लगा था. पर क्या कर सकती थी, शायद उस का भविष्य इसी कोठरी में लिखा था. आंख बंद की तो उस की यादों का सिलसिला शुरू हो गया.

आज की कमला कल की डा. लता है, एस.एससी., पीएच.डी.. उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के कितने बड़े घर में उस का जन्म हुआ था. मातापिता ने उसे कितने लाड़प्यार से पाला था. 12वीं तक मुरादाबाद में पढ़ाने के बाद उस की जिद पर पिता ने उसे दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए भेज दिया था. गुणसंपन्न (मेरिटोरिअस) छात्रा होने के कारण उसे जल्द ही हास्टल में रहने की भी सुविधा मिल गई थी.

लता ने बी.एससी. बहुत अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की. फिर वहीं से एस.एससी. बौटनी कर लिया. पढ़ाई के अलावा वह दूसरी गतिविधियों में भाग लेती थी. भाषण और वादविवाद के लिए जब वह मंच पर जाती थी तो श्रोताओं के दिलोदिमाग पर अपनी छाप छोड़ जाती थी. उस के अभिनय का तो कोई जवाब ही नहीं था, यूनिवर्सिटी में होने वाली नाटकप्रतियोगिताओं में उस ने कई बार प्रथम स्थान प्राप्त किया था. बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय से ही लता ने एम.फिल और पीएच.डी. भी कर ली थी.

पीएच.डी. पूरी करने के बाद उस ने मुंबई विश्वविद्यालय में लेक्चरर पद के लिए आवेदन किया था. वह इंतजार कर रही थी कि कब साक्षात्कार के लिए पत्र आए, तभी एक दिन अचानक घटी एक घटना ने उसे आसमान से जमीन पर पटक दिया.

एक रात घर में सभी लोग सोए हुए थे कि अचानक कुछ लोगों ने हमला बोल दिया. उस की आंखों के सामने उन्होंने उस के मातापिता को गोलियों से भून डाला. भाई ने विरोध किया तो उसे भी गोली मार दी गई. वह इतना डर गई कि अपनी जान बचाने के लिए पलंग के नीचे छिप गई.

अपने सामने अपनी दुनिया को बरबाद होते देखती रही, बेबस लाचार सी, पर कुछ भी नहीं बोल पाई थी वह. ये लोग पिता के किसी काम का बदला लेने आए थे. पिता की पुश्तैनी लड़ाई चल रही थी. कितने ही खून हो चुके थे इस बारे में.

6 लोगों के सामने वह कर भी क्या सकती थी. पलंग के नीचे छिपी वह अपने आप को सुरक्षित अनुभव कर रही थी. पिता ने कभीकभार सुनाई भी थीं ये बातें. अत: उसे कुछ आभास सा हो गया था कि ये लोग कौन हो सकते हैं. उस के जेहन में पिता की कही बातें याद आ रही थीं.

डर का उस ने अपने को और सिकोड़ने की कोशिश की तो उन में से एक की नजर उस पर पड़ गई और उस ने पैर पकड़ कर उसे पलंग के नीचे से खींच लिया और चाकू से उस पर वार करने जा रहा था कि उस के एक साथी ने उस का हाथ पकड़ कर मारने से रोक दिया.

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‘लड़की, हम क्या कर सकते हैं यह तो तू ने देख ही लिया है. इस घर का सारा कीमती सामान हम ले कर जा रहे हैं. चाहें तो तुझे भी मार सकते हैं पर तेरे बाप से बदला लेने के लिए तुझे जिंदा छोड़ रहे हैं कि तू दरदर घूम कर भीख मांगे और अपने बाप के किए पर आंसू बहाए. हमारे पास समय कम है. हम जा रहे हैं पर कल इस मकान में तेरा चेहरा देखने को न मिले. अगर दिखा तो तुझे भी तेरे बाप के पास भेज देंगे,’ इतना कह कर वे सभी अंधेरे में गुम हो गए.

अब सबकुछ शांत था. कमरे में उस के सामने खून से लथपथ उस के परिवार के लोगों की मृत देह पड़ी थी. वह चाह कर भी रो नहीं सकती थी. घड़ी पर नजर पड़ी तो रात के सवा 3 बजे थे. लता का दिमाग तेजी से चल रहा था. उस के रुकने का मतलब है पुलिस के सवालों का सामना करना. अदालत में जा कर वह अपने परिवार के कातिलों को सजा दिला पाएगी. इस में उसे संदेह था क्योंकि भ्रष्ट पुलिस जब तक कातिलों को पकड़ेगी तब तक तो वे उसे मार ही डालेंगे.

उस ने अपने सारे सर्टिफिकेट और अपनी किताबें, थीसिस, 4 जोड़ी कपड़े थैली में भर कर घर से निकलने का मन बना लिया, पापा और मम्मी ने उसे जेब खर्च के लिए जो रुपए दिए वे उस ने किताबों के बीच में रखे थे. उन पैसों का ध्यान आया तो वह कुछ आस्वस्त हुई.

किसी की हंसतीखेलती दुनिया ऐसे भी उजड़ सकती है, ऐसी तो उस ने कल्पना भी नहीं की थी. फिर भी चलने से पहले पलट कर मांबाप और भाई के बेजान शरीर को देखा तो आंखों से आंसू टपक पड़े. फिर पिता के हत्यारे की कही बातें याद आईं तो वह तेजी से निकल गई. चौराहे तक इतने सारे सामान के साथ वह भागती गई थी. उस में पता नहीं कहां से इतनी ताकत आ गई थी. शायद हत्यारों का डर ही उसे हिम्मत दे रहा था, वहां से दूर भागने की.

लता ने सोचा कि किसी रिश्तेदार के यहां जाने से तो अच्छा है, जहां नौकरी के लिए आवेदन कर रखा है वहीं चली जाती हूं. आखिर छात्र जीवन में की गई एक्ंिटग कब काम आएगी. किसी के यहां नौकरानी बन कर काम चला लूंगी. जब तक नौकरी नहीं मिलेगा, किसी धर्मशाला में रह लूंगी. मुंबई जाते समय उसे याद आया कि उस की रूम मेट सविता की मामी मुंबई में ही रहती हैं.    -क्रमश

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क्या करें, जब घर का खाना लगे आउट औफ फैशन

होटल या रैस्टोरैंट में खाने की मात्रा कम करें. मेगा साइज की जगह रैगुलर साइज और्डर करें. घर से बाहर अधिक मसालेदार और वसायुक्त खाद्य पदार्थों से परहेज करें.नाश्ते में सीरियल या पैक्ड फूड की जगह पोहा या इडली खाएं.

चौकलेट का सेवन कम करें व दूसरे लोगों को भी चौकलेट उपहार के रूप में न दें. बच्चों को बहलाने के लिए आइस्क्रीम या चौकलेट देने की जगह कुछ सेहतमंद खिलाएं. टिफिन में घर का बना खाना ही भेजें. कोल्ड ड्रिंक्स की जगह ताजा नीबू पानी या नारियल पानी पिएं.

नान के स्थान पर तंदूरी रोटी और्डर करें. बच्चों में बचपन से ही सागसब्जियां खाने की आदत डालें.  ‘‘राहुल, क्या लाया है टिफिन में?’’ ‘‘गोभी के परांठे, तू क्या लाया है?’’ ‘‘मेरी मम्मी ने तो दालरोटी दी है.’’

‘‘करण, तेरी मम्मी ने क्या भेजा है?’’ ‘‘मेरे टिफिन में तो मम्मी ने छोलेपूरी रखी हैं.’’

‘‘यम्म…यम्म…’’

‘‘राहुल, देख, मेरी मम्मी ने मुझे बर्गर बना कर दिया है.’’

‘‘इस में पालक तो नहीं दिया छिपा कर?’’

‘‘अरे, बिलकुल नहीं, आलू की टिक्की और रैड मैयोनीज भी हैं.’’

‘‘मुझे मम्मी ने पालक की सब्जी दी है, मुझे नहीं खाना. इसे तो रास्ते में गाय को डालते हुए जाऊंगा.’’

‘‘चल यार, बर्गर ही शेयर कर लेते हैं.’’

बस, कुछ इसी तरह हम ने अपने जीवन में कई पहलुओं से घर के खाने को बाहर कर दिया है. दावतें कोल्ड ड्रिंक्स और पिज्जा के बिना अधूरी हैं. लोगों की जबान पर होटलों के महंगेमहंगे पकवान हैं, घर का सादा खाना कहीं सुर्खियां नहीं बटोरता.

लंच में बर्गर और पास्ता खाना है क्योंकि दोस्तों को अपनी शान दिखानी है. शाम की चाय के साथ पकौड़ों की जगह अब डब्बाबंद कुकीज और फ्राइड आइटम्स ने ले ली है. युवाओं के लिए तो घर के खाने का अर्थ है ‘डिनर’, क्योंकि केवल डिनर ही है जिस में वे मुंह बना कर घर का खाना खा लेते हैं. उन की सुबह तो सीरियल और कौर्नफ्लैक्स तथा लंच व शाम का नाश्ता इंस्टाग्राम पर पोस्ट करने लायक जंकफूड से होती है. घर का खाना सचमुच आउट औफ फैशन हो गया है.

आज के समय में जंकफूड युवाओं की पहली पसंद है, इस के फायदे कम और नुकसान अधिक हैं जिन से वे अपरिचित हैं.

अधिकतर जंकफूड और पैक्डफूड में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है और बहुत कम या न के बराबर फाइबर होते हैं. जब ये कार्बोहाइड्रेट पाचनतंत्र में प्रवेश करते हैं तो इन से ग्लूकोज यानी शुगर निकलती है, जो रक्त में मिल जाती है. अग्नाशय यानी पेनक्रियाज ग्लूकोज से प्रभावित हो कर इंसुलिन रिलीज करता है. इंसुलिन शुगर को शरीर के अन्य हिस्सों तक पहुंचाता है तथा शुगर अपने गंतव्य स्थान तक पहुंचती है जिस से शरीर का शुगर लैवल सामान्य हो जाता है. लेकिन कार्बोहाइड्रेट की अधिकतम मात्रा ग्रहण करने पर यह क्रिया बिगड़ जाती है और व्यक्ति डायबिटीज से ग्रस्त हो जाता है. जंकफूड में वसा, शुगर और सोडियम की मात्रा अधिक होती है जिस से खाने का स्वाद बढ़ता है, लेकिन सोडियम की अधिक मात्रा शरीर में वाटर रिटैंशन को बढ़ाती है जिस से व्यक्ति फूलाफूला महसूस करने लगता है. कहने का मतलब है कि पूरा शरीर सूज जाता है.

20 वर्षीया स्मिता जंकफूड की बड़ी शौकीन है. दोस्तों के साथ जब भी बाहर निकलती है तो मोमोज खाए बिना नहीं लौटती. शाम को अकसर मम्मी समोसे और कचौड़ी तो ले ही आती हैं.

स्मिता कक्षा 10वीं तक तो पतली थी पर कालेज तक आतेआते उस का वजन काफी बढ़ गया. अब थुलथुले शरीर के साथ न दौड़भाग कर सकती है और न ही खेलकूद पाती है.

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वजन 90 किलो है तो चाल भी उस की धीमी है. उसे इस मोटापे के कारण अकसर मनपसंद कपड़े नहीं मिलते, कभी आउट औफ साइज हो जाते हैं तो कभीकभी उस के साइज के होते हुए भी उसे पसंद नहीं आते. अकसर पेट फूला रहता है और पेट में दर्द भी होता है. उसे पीरियड्स भी दोढाई महीने के अंतराल में आते हैं. चेहरा हमेशा दानों से भरा रहता है और पीठ पर काले धब्बे भी पड़ गए हैं. पर मजाल है कि वह जंकफूड खाना छोड़ दे.

24 वर्षीय निखिल हर सुबह औफिस के लिए निकलने से पहले इंसुलिन का इंजैक्शन लगा कर जाता है. उसे टाइप 1 की डायबिटीज है. आज से 4 वर्षों पहले जिस तरह की मनमौजी जिंदगी वह जी रहा था, आज उस के बिलकुल विपरीत मोड़ पर उस की जिंदगी चल रही है.

सुबह से शाम तक 3-4 बार तो बाहर का कुछ न कुछ तो वह खा ही लेता था. सुबह ब्रेकफास्ट नहीं किया तो औफिस में समोसे या सैंडविच खा लिए, लंच में खाना अच्छा नहीं लगा तो पिज्जा या चाऊमीन खा ली, शाम की चाय के साथ थोड़े चिप्स और पकौड़ों में हर्ज ही क्या. और औफिस से निकल कर एक बर्गर तो बनता है. लेकिन वर्तमान अतीत से बहुत अलग है.

दिन में 8-10 बार ब्लडशुगर चैक करना उस की आदत बन चुकी है. प्रतिदिन उसे इंसुलिन के 3 इंजैक्शन लेने पड़ते हैं, एक सुबह नाश्ते से पहले, एक दोपहर लंच से पहले और एक डिनर से पहले. घर से काम पर जाने, जिम जाने या कहीं घूमने जाने से पहले उसे अपनी दवाइयों की पूरी किट साथ रखनी होती है, जिस में इंसुलिन के इंजैक्शन या पैन, ग्लूकोमीटर, टैस्ट स्ट्रिप्स, लांसिक डिवाइस, टैबलेट्स, ग्लूकोज जेल और हार्ड कैंडी शामिल हैं. इन सभी चीजों को ले जाने के लिए उसे एक अलग बैग कैरी करना पड़ता है, खेलनेकूदने या डांस से पहले अपने शुगर लैवल को ध्यान में रखना होता है.

यदि वह फास्टफूड के सेवन को नियंत्रित रखता तो आज उसे अपने शुगर लैवल को नियंत्रण में रखने की आवश्यकता न होती.

अन्य प्रभाव अतिरिक्त कैलोरी ग्रहण करने से शरीर का भार बढ़ता है जिस से ओबेसिटी हो सकती है. ओबेसिटी श्वसन तंत्र को प्रभावित करती है जिस से सांस लेने में परेशानी व अस्थमा की बीमारी हो सकती है, जो व्यक्ति फास्टफूड व प्रोसैस्ड पेस्ट्री का अधिक सेवन करते हैं, सामान्य व्यक्तियों के मुकाबले उन्हें डिप्रैशन होने की संभावना 51फीसदी अधिक होती है.

आजकल की युवतियों व किशोरियों को इस बात का ज्ञान नहीं है कि जंकफूड आगे चल कर उन की फर्टिलिटी पर प्रभाव डालता है. जंकफूड में पाए जाने वाले थैलेट महिलाओं को बांझपन जैसी समस्याओं से ग्रसित कर सकते हैं.

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युवा, जो फास्टफूड का हफ्ते में 3 या उस से अधिक बार सेवन करते हैं, उन्हें एक्जिमा होने की संभावना अधिक होती है.

कार्बोहाइड्रेट और शुगर से युक्त खाद्य पदार्थ व्यक्ति के मुंह में अम्लीय तत्त्वों को बढ़ाते हैं. यह अम्ल (एसिड) दांतों की ऊपरी परत को तोड़ देता है जिस से बैक्टीरिया दांतों को खोखला कर देते हैं व दांतों में कैविटी हो जाती है. ओबेसिटी बोन डैंसिटी को भी कम करती है जिस से व्यक्ति के बारबार गिरने व हड्डी के टूटने का खतरा बढ़ जाता है.

‘‘यार राहुल, आज तो कोई लैक्चर ही नहीं है.

चलो कहीं बाहर चलें, बहुत भूख भी लगी है.’’

‘‘हां चल, पिज्जा खाने चलें.’’

‘‘यह सही है, पास्ता भी ले लेंगे.’’

‘‘हां बढि़या, चलो चलें.’’

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ब्रैस्ट शेपिंग: खुद को बनाएं अट्रैक्टिव

जिन लड़कियों के ब्रैस्ट का आकार छोटा होता है या ज्यादा बड़ा होता है वे परेशान रहती हैं. उन के मन में यह डर रहता है कि ब्रैस्ट का आकार पति के साथ संबंधों में परेशानी का सबब तो नहीं बन जाएगा. शादी के बाद हनीमून और वहां पहनी जाने वाली सैक्सी ड्रैस में बहुत छोटे या बहुत बड़े ब्रैस्ट बाधा बनते हैं. शादी के पहले इस तरह की परेशानी ले कर तमाम लड़कियां डाक्टरों के पास पहुंचती हैं. इन लड़कियों को इस बात की चिंता होती है कि वे पति को फर्स्ट नाइट में खुश रख पाएंगी या नहीं.

ब्रैस्ट शेपिंग को ले कर दूसरी बड़ी चिंता क्लीवेज होती है. फैशनेबल ड्रैस पहनने वाली लड़कियों को लगता है कि अगर उन की क्लीवेज नहीं दिखेगी तो उन को सैक्सी, बोल्ड और ब्यूटीफुल नहीं माना जाएगा. क्लीवेज दोनों ब्रैस्ट के बीच दिखने वाली गहराई को कहा जाता है.

आज के दौर में क्लीवेज के शेप को सब से खूबसूरत माना जाता है. हर लड़की की यह इच्छा होती है कि उस की क्लीवेज सुंदर दिखे. इस के लिए वह ब्रैस्ट शेपिंग का हर उपाय करना चाहती है.

ग्लो एस्थैटिक क्लिनिक, लखनऊ की प्रमुख डा. प्रभा सिंह कहती हैं, ‘‘शादी के पहले केवल लड़कियां ही नहीं, उन की मां तक ब्रैस्ट शेपिंग की समस्या का समाधान कराने आती हैं. कई लड़कियां कहती हैं कि उन की होने वाली सास चाहती हैं कि उन का ब्रैस्ट शेप में सुंदर लगे.’’

सर्जरी ब्रैस्ट इंप्लांट

ब्रैस्ट शेपिंग के 2 तरीके होते हैं. पहला तरीका ब्रैस्ट इंप्लांट होता है. यह सामान्य रूप से नहीं किया जाता. जब ब्रैस्ट बहुत ही छोटे होते हैं तो इस सर्जरी को अपनाया जाता है. ब्रैस्ट का साइज कपसाइज के ऊपर निर्भर करता है. महिलाओं के ब्रैस्ट का साइज ‘ए’ से शुरू हो कर ‘एच’ तक बढ़ता रहता है. ‘सी’ और ‘डी’ साइज को भारतीय ब्यूटी में सब से खूबसूरत माना जाता है. खूबसूरत ब्रैस्ट का पैमाना उम्र और लंबाई के हिसाब से जो खूबसूरत लगे उसी को माना जाता है. सब से छोटे साइज को हाइपोमेस्टिया और बहुत बड़े साइज को जिंगटोमेस्टिया कहते हैं. ये दोनों ही साइज औरतों या युवतियों में हीनभावना को बढ़ावा देने वाले होते हैं. बड़े साइज के ब्रैस्ट से फैट निकाल कर उस का साइज ठीक किया जाता है.

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ब्रैस्ट का छोटा होना कुदरती बात होती है. आज के दौर में युवतियां या औरतें इस को स्वीकार नहीं कर पातीं. वे इस को दूर करने के उपाय करने की कोशिश में लगी रहती हैं. बहुत सारे मामलों में शादी और बच्चा पैदा होने के बाद ब्रैस्ट के साइज में बदलाव होता है. कभीकभी ऐसा नहीं भी होता. इस तरह के मामलों में कौस्मैटिक सर्जरी के जरिए ब्रैस्ट का इंप्लांट कर के मनचाहा आकार हासिल किया जा सकता है. कभीकभी युवतियों या औरतों में एक ब्रैस्ट छोटा और दूसरा बड़ा भी होता है.

आमतौर पर यह फर्क इतना मामूली होता है कि किसी को पता नहीं चलता. अगर साइज का यह फर्क दूर से दिखाई देने वाला हो तो ब्रैस्ट इंप्लांट के जरिए दोनों का साइज बराबर भी किया जा सकता है.

ब्रैस्ट इंप्लांट के लिए सिलिकौन इंप्लांट का ही प्रयोग किया जाता था. आधुनिक तकनीक से ब्रैस्ट इंप्लांट में बहुत से बदलाव आ गए हैं. इस से ब्रैस्ट नैचुरल सा लुक देने लगता है. ब्रैस्ट इंप्लांट के लिए मैमरीग्लैंड के नीचे सर्कयुमैरियोलर, आर्मपिट या ट्रांसुबिलिकल में चीरा लगा कर सिलिकौन पैड को डाला जाता है. नीचे चीरा लगने के कारण इस का निशान छिप जाता है और धीरेधीरे यह खत्म भी हो जाता है.

औपरेशन के बाद त्वचा में खिंचाव पैदा होने के कारण कुछ दिनों तक दर्द बना रह सकता है. इस को दूर करने के लिए दवाएं दी जाती हैं. अलगअलग साइज के इंप्लांट बाजार में मिलते हैं. जिन की कीमत 30 से 35 हजार रुपए के आसपास होती है.

इस के अलावा लगभग इतना ही खर्च दवाओं और सर्जरी का भी आता है. 70 से 75 हजार रुपए के बीच का कुल खर्च ब्रैस्ट इंप्लांट में आता है. कुछ अस्पतालों में यह खर्च एक लाख रुपए के आसपास होता है. यह औपरेशन लगभग एक घंटे का होता है.

आमतौर पर औपरेशन के बाद कोई परेशानी नहीं आती. अगर एक माह कुछ नहीं होता है तो मरीज को भी भूल जाना चाहिए कि उस का औपरेशन हुआ है. पति को बिना बताए, पता नहीं चल सकता. मां बनने के बाद बच्चे को दूध पिलाने में कोई परेशानी नहीं आती है. जब चाहे इसे निकाला भी जा सकता है.

ब्रैस्ट शेपिंग मसाज

ब्रैस्ट को सही आकार देने के लिए कुछ ऐसे भी तरीके होते हैं जिन में सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती. डा. प्रभा सिंह कहती हैं, ‘‘आमतौर पर 20 से 22 साल की उम्र में जब ब्रैस्ट का आकार 30 ब्रा साइज से कम होता है तो उसे छोटा और 34 से ज्यादा होता है तो बड़ा माना जाता है. छोटे ब्रैस्ट वाली लड़कियां ज्यादा परेशान रहती हैं.

‘‘कई बार जब उन को यह बताया जाता है कि शादी के बाद सैक्स ऐक्टिविटी से ब्रैस्ट का साइज बढ़ता जाता है और मां बनने के बाद भी यह बढ़ता है. ऐसे में ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं होती है. अब लड़कियां इस के लिए तैयार नहीं होतीं. उन के मन में फर्स्ट नाइट इंप्रैशन का सवाल रहता है. ऐसे में मसाज द्वारा ब्रैस्ट के आकार को बढ़ाने का सहारा लिया जा सकता है.’’

शादी के बाद जब ब्रैस्ट का आकार बढ़ता है उस का भी कारण ब्रैस्ट मसाज ही होता है. सैक्स ऐक्टिविटी के समय ब्रैस्ट की मसाज सी हो जाती है. जिस का प्रभाव उस के आकार

पर पड़ता है. यह मसाज अगर लड़की खुद भी 5-6 माह तक भी अच्छे बौडी औयल से करे तो ब्रैस्ट का आकार 30 से 32 हो सकता है.

कई क्लिनिक भी इस तरह की मसाज देने का काम करते हैं. क्लिनिक में ट्रेंड नर्स इस तरह की मसाज देती हैं जिस से फर्क कम समय में ही दिखने लगता है. कुछ क्लिनिक्स में हाथ के बजाय मशीन से मसाज की जाती है. यह प्रोसीजर भी कारगर होता है. ब्रैस्ट के आकार को बढ़ाने के लिए मसाज थेरैपी के साथ ही साथ डाइट पर भी ध्यान देना चाहिए. अच्छी डाइट होने से शरीर पर प्रभाव पड़ता है जिस से ब्रैस्ट का आकार भी ठीक हो जाता है.

कई लड़कियों में छोटे ब्रैस्ट की आनुवंशिक समस्या होती है. वहां मसाज कम असरदार होती है. ऐसे में हार्मोंस की दवाएं देने से ब्रैस्ट के आकार को बड़ा किया जाता है. शादी से पहले ब्रैस्ट के आकार को बड़ा करने या छोटा करने के लिए सर्जिकल प्रोसीजर का प्रयोग नहीं करना चाहिए जब तक कि कोई दूसरा उपाय न हो. अगर बड़े ब्रैस्ट को छोटा करना है तो डाइट का ध्यान दे कर शरीर के बढ़ते फैट को कम कर के ब्रैस्ट के आकार को ठीक किया जा सकता है.

कई लड़कियों में ब्रैस्ट के ढीलेपन की परेशानी भी होती है. इस को भी मसाज और ऐक्सरसाइज से ठीक किया जा सकता है.

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ब्रैस्ट शेपिंग से बढ़ती क्लीवेज की खूबसूरती

आज के समय में लड़कियों में अपनी क्लीवेज दिखाने का फैशन चल पड़ा है. शादी में भी ऐसी ड्रैस तैयार होती है जिस से क्लीवेज दिखती रहे. हनीमून और नाइट ड्रैस में भी इस बात का खास खयाल रखा जाता है क्रि ब्रैस्ट की खूबसूरती दिखती रहे.

ब्रैस्ट को ब्रा का सपोर्ट दे कर उस के क्लीवेज को उभारने का काम किया जाता है. इस के लिए पैडेड ब्रा, अंडरवायर ब्रा, डबल पैडेड ब्रा का सहारा लिया जाता है. ब्रा से ब्रैस्ट के साइज को ज्यादा और क्लीवेज को सुंदर दिखाया जा सकता है.

पति के साथ करीबी क्षणों में ब्रा के सहारे ब्रैस्ट के साइज को उभारना संभव नहीं हो पाता. नाइटी में भी पैडेड ब्रा अपना असर नहीं डाल पाती. ऐसे में लड़कियों को नैचुरल ब्रैस्ट साइज की जरूरत होती है. इस के लिए शादी से पहले वे हर तरह के उपाय करने को तैयार रहती हैं. इन में खाने की गोलियां, लगाने की क्रीम कुछ भी हो सकती हैं.

ब्यूटी प्रोडक्ट्स में ब्रैस्ट की शेपिंग और साइज को बढ़ाने के नाम पर बहुत सारे प्रोडक्ट्स बाजार में मौजूद हैं. लड़कियां ब्रैस्ट के साइज को ले कर मानसिक कुंठा से बाहर निकलें तो उन को लगेगा कि करीबी पलों में साइज नहीं, ऐक्टिविटी मैटर करती है. जहां तक क्लीवेज की बात है, उन को ब्रा के सहारे उभारा जा सकता है. इस तरह की ब्रा का प्रयोग उतने ही समय के लिए करें जितना जरूरी हो.

खूबसूरती के लिए पुशअप

अगर ब्रैस्ट का आकार सही नहीं है, उन में ठीक से उभार नहीं है या फिर बैकलैस पोशाक पहननी है तो पुशअप का प्रयोग किया जा सकता है. यह पुशअप अलगअलग आकार के आते हैं. इन को पानी के सहारे ब्रैस्ट से चिपका लिया जाता है. इन का प्रयोग ज्यादा  से ज्यादा 2 बार ही किया जा सकता है. इस की कीमत 200 से 500 रुपए तक होती है.

ब्रैस्ट के उभार को दिखाने के लिए पुशअप ब्रा भी आती है. इस में ब्रा के दोनों कप्स में निचले हिस्से में एक वायर पड़ा होता है. चाहें तो इस को निकाल भी सकते हैं. इस के प्रयोग से ब्रैस्ट में मनचाहा उभार दिख सकता है. उभार दिखाने के लिए ब्रा के अंदर रखे जाने वाले पैड भी आते हैं. ये इतने कोमल होते हैं कि इन का पता ही नहीं चलता है. इन की कीमत 300 रुपए से शुरू हो जाती है. ये अलगअलग आकार के आते हैं.

निप्पल कवर

कभीकभी ब्रैस्ट के निप्पल का साइज कपड़ों के ऊपर अजीब सा दिखता है. इन परेशानियों को दूर करने के लिए निप्पल कवर भी आते हैं जो पुशअप की तरह चिपक जाते हैं. द्य

छोटे-बड़े ब्रैस्ट से न घबराएं

ब्रैस्ट का साइज कभी भी एकजैसा नहीं होता है. दोनों ब्रैस्ट के साइज में थोड़ाबहुत अंतर अवश्य होता है. यह अंतर ऐसा होता है जो आसानी से समझ ही नहीं आता. बहुत कम औरतों में यह अंतर ऐसा होता है जो आसानी से पता चल जाता है. यह अंतर इतना ज्यादा होता है कि इस को आसानी से छिपाया भी नहीं जा सकता. अगर अंतर इतना ज्यादा है तो डाक्टर से मिलना जरूरी हो जाता है. ज्यादातर मामलों में यह अंतर सामान्य होता है. माहवारी के पहले यह अंतर दिखाई देता है, बाद में अपनेआप सही हो जाता है. जिन ब्रैस्ट के साइज में फर्क सामान्य वजहों से होता है उन को दबाने से दर्द नहीं होता. अगर ब्रैस्ट को दबाने से न सहने वाला दर्द हो तो डाक्टर से मिल कर उस की जांच जरूर करानी चाहिए.

इनरवियर में ऐक्सेसरीज का जलवा

ब्रैस्ट औरत की खूबसूरती का सब से अहम हिस्सा होता है. इस के लिए तरहतरह के डिजाइनर इनरवियर तो बहुत पहले से बाजार में बिक रहे थे. आज का दौर बदल गया है. अब हर औरत अपने को सुंदर दिखाने के लिए इनरवियर में भी ऐक्सेसरीज का प्रयोग करने लगी है. ब्रा और ब्रैस्ट में लगने वाली ये ऐक्सेसरीज कम दामों से ले कर महंगे दामों तक खूब बिक रही हैं.

खूबसूरत स्ट्रैप्स

ब्रैस्ट सौंदर्य को निखारने के लिए औरतें डिजाइनर ब्रा का प्रयोग करती रही हैं. इस में अब ऐसे स्ट्रैप्स का प्रयोग किया जा रहा है जो देखने में खूबसूरत हों. स्किन कलर के स्ट्रैप्स भी चलन में आ गए हैं जिस से टौपलैस पोशाक पहनने पर ब्रा के स्ट्रैप्स दूर से दिखाई न दें.

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रंगबिरंगे स्ट्रैप्स

अपनी पोशाक से मैच करते हुए स्ट्रैप्स का प्रयोग ब्रा में कर सकते हैं. इन के लिए अलगअलग रंगों में स्ट्रैप्स मिलते हैं. कुछ में पोशाक से मैच करती हुई इंब्रौयडरी भी होती है. इन स्ट्रैप्स की कीमत 100 रुपए से शुरू हो कर 300 रुपए तक होती है.

ज्वैलरी स्ट्रैप्स

गले में पहने गए नैकलेस के डिजाइन से मैच करते हुए ब्रा के स्ट्रैप्स रखने हैं तो बाजार में वे भी उपलब्ध हैं. ये आर्टिफिशियल डिजाइन के तैयार किए जाते हैं. कुछ शौकीन लोग चांदी और सोने में भी इस को तैयार करवाते हैं. इन स्ट्रैप्स के लिए सब से जरूरी यह होता है कि स्ट्रैप्स अलग करने वाली ब्रा के साथ ही लगाए जा सकते हैं.

दोस्ती की अधूरी कहानी

बीते 6 मार्च की सुबह की बात है. होटल माही-7 के रूम अटेंडेंट ने कमरा नंबर 107 के दरवाजे की कुंडी खटखटाई. लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आई. उस ने 1-2 बार फिर कुंडी बजाई. फिर भी कमरे के अंदर कोई हलचल सुनाई नहीं दी.

परेशान हो कर रूम अटेंडेंट ने होटल के रिसैप्शन पर जा कर मैनेजर और अन्य कर्मचारियों को यह बात बताई. इस पर होटल के कर्मचारियों ने उस कमरे के बाहर पहुंच कर कई बार कुंडी खटखटाई. साथ ही तेज स्वर में आवाजें भी दीं. लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया. कर्मचारी समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर बात क्या है.

होटल कर्मचारियों ने खिड़की से अंदर झांक कर देखा तो उन्हें मामला कुछ गड़बड़ नजर आया. कमरे में ठहरा हुआ दिव्यांग युवक ओमप्रकाश जाखड़ फर्श पर पड़ा था. होटल कर्मचारी ओमप्रकाश जाखड़ को जानते थे. लग रहा था जैसे वह अचेत हो. कमरे में बैड पर एक युवती पड़ी दिख रही थी. खिड़की से देखने पर न तो युवक में कोई हलचल नजर आ रही थी और न ही युवती में. होटल कर्मचारियों ने इस बारे में पुलिस को सूचना देना मुनासिब समझा.

फोन पर मिली सूचना के आधार पर पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस ने होटल के कमरे का दरवाजा खुलवाया. कमरे के अंदर बैड पर एक युवती पड़ी थी, जिस का मुंह कंबल से ढका हुआ था. गले पर गहरे निशान थे. साथ ही गले में कपड़ा भी बंधा हुआ था. उस की सांसें थम चुकी थीं.

पुलिस अधिकारियों ने उस की नब्ज देखी, लेकिन उस में जीवन के लक्षण नजर नहीं आए. लग रहा था कि वह घंटों पहले मरी होगी. मौके के हालात से यह स्पष्ट नहीं हो रहा था कि युवती के साथ दुष्कर्म या सहवास तो नहीं हुआ था.

कमरे में फर्श पर पड़े दिव्यांग युवक ओमप्रकाश जाखड़ की सांसें चल रही थीं, वह अचेत था. पुलिस अधिकारियों ने ओमप्रकाश को तत्काल अस्पताल भिजवाया. युवती के शव को भी पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया गया. होटल के कमरे में युवती का शव और बेहोश युवक मिलने की बात सुन कर बड़ी संख्या में आसपास के लोग एकत्र हो गए. पुलिस ने होटल के कमरे की तलाशी ली. तलाशी में युवकयुवती के शैक्षणिक दस्तावेज और 2-3 जोड़ी कपड़े मिले.

इस के अलावा सब्जियों पर छिड़कने वाला जहरीला कैमिकल भी मिला. इस से अंदाजा लगाया गया कि युवक ने जहरीला कैमिकल खा लिया होगा, जिस से वह अचेत हो गया था. यह बात साफ नहीं हो सकी कि युवती ने भी जहरीला कैमिकल खाया था या नहीं.

होटल वाले ओमप्रकाश को पहचानते थे, लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि वह कहां का रहने वाला है. वहां मिले दस्तावेजों के आधार पर पता चला कि ओमप्रकाश जाखड़ सीकर में दासा की ढाणी निवासी हरलाल जाखड़ का बेटा था. युवती का नाम कल्पना (बदला हुआ नाम) था. वह भी सीकर की रहने वाली थी.

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पुलिस ने होटल कर्मचारियों से युवकयुवती के ठहरने के संबंध में पूछताछ की. पता चला कि ओमप्रकाश इसी होटल के पास डीजे की दुकान चलाता था. इसलिए होटल मालिक और होटल के सभी कर्मचारी उसे खूब अच्छी तरह जानते थे.

वह उस युवती के साथ 5 मार्च की शाम को अपने दोस्त श्रवण के साथ अर्टिगा कार से होटल आया था. होटल के कर्मचारियों ने उसे ठहरने के लिए कमरा नंबर 107 दिया था.

कमरे में ठहरने के बाद ओमप्रकाश ने अपने दोस्त श्रवण से बातें की थीं. बाद में उस ने अपने बिजनैस पार्टनर मनोज को बुला कर उस से भी कुछ बातें की थीं. मनोज को उस ने करीब 70 हजार रुपए भी दिए थे. 1-2 अन्य लोगों से भी उस ने मुलाकात की थी.

6 मार्च की सुबह करीब 7 बजे ओमप्रकाश ने अपने कमरे में चाय मंगा कर पी थी. बाद में उस ने अपने दोस्त श्रवण को होटल बुलाया. होटल से श्रवण और ओमप्रकाश कहीं गए थे. कुछ देर बाद दोनों वापस लौट आए थे. आपस में कुछ बातें करने के बाद ओमप्रकाश होटल के कमरे में चला गया और श्रवण वहां से लौट गया था.

काफी देर बाद जब होटल कर्मचारियों ने ओमप्रकाश के कमरे के दरवाजे की कुंडी खटखटाई तो अंदर से कोई हलचल सुनाई नहीं दी. इस पर पुलिस को सूचना दे दी गई थी. पूछताछ में यह बात सामने आई कि होटल में ठहरे ओमप्रकाश और कल्पना के बीच कई साल से प्रेम संबंध थे.

यह घटना राजस्थान के सीकर की है. होटल माही-7 जयपुर-झुंझुनू रोड पर है. कल्पना की मौत का पता चलने पर उस के घर वाले भी होटल पहुंच गए. कल्पना का शव देख कर उस का भाई गश खा कर जमीन पर गिर गया. वहां मौजूद लोगों ने उसे संभाला. काफी देर बाद वह होश में आया.

घर वालों ने पुलिस को बताया कि उन्होंने एक दिन पहले यानी 5 मार्च को उद्योग नगर थाने में कल्पना की गुमशुदगी की सूचना दी थी. उस के परिजनों ने होटल मालिकों और कर्मचारियों पर संदेह जताते हुए पुलिस को बताया वे 5 मार्च की शाम को होटल आए थे और होटल में ओमप्रकाश की स्कूटी खड़ी देखी थी. स्कूटी वहां खड़ी देख कर उन्होंने कल्पना और ओमप्रकाश के बारे में पूछताछ की थी, लेकिन होटल वालों ने कहा था कि यहां कोई नहीं ठहरा है.

होटल में शव मिलने पर कल्पना के घर वालों ने थाना उद्योग नगर में दिव्यांग ओमप्रकाश जाखड़, होटल संचालक मनफूल जाखड़, अरविंद, सोनू जाखड़ और अन्य लोगों के खिलाफ अपहरण, सामूहिक ज्यादती और हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

परिजनों ने पुलिस को बताया कि एमए फाइनल में पढ़ने वाली कल्पना पड़ोस में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने जाती थी. वह 5 मार्च की शाम को भी घर से स्कूटी पर ट्यूशन पढ़ाने के लिए निकली थी, लेकिन वापस घर नहीं लौटी तो उन्होंने पुलिस में गुमशुदगी दर्ज करा दी थी.

उन्होंने पुलिस को यह भी बताया कि करीब 6 महीने पहले कल्पना ने उन्हें बताया था कि ओमप्रकाश उसे फोन कर परेशान करता है. इस पर घर वालों ने ओमप्रकाश को समझाया था.

इस के बावजूद ओमप्रकाश ने कहा था कि एक दिन वह कल्पना को उठा ले जाएगा. लेकिन कल्पना के घर वालों ने इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया था. ओमप्रकाश कई साल पहले 8वीं कक्षा में कल्पना के साथ पढ़ा था.

उधर अचेत अवस्था में अस्पताल में भरती कराए गए दिव्यांग ओमप्रकाश की हालत नाजुक बनी हुई थी, इसलिए डाक्टरों ने सीकर से उसे जयपुर रैफर कर दिया.

कल्पना के परिजनों ने शव का पोस्टमार्टम मैडिकल बोर्ड से कराने और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग करते हुए शव लेने से इनकार कर दिया. करीब 7 घंटे तक चली समझाइश में पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ जल्द काररवाई का आश्वासन दिया. इस के बाद पोस्टमार्टम करवा कर कल्पना का शव उस के परिजनों को सौंपा गया.

इस दौरान पुलिस ने होटल के कमरे से घटना से संबंधित तथ्य जुटाए. प्रारंभिक जांच पड़ताल के साथसाथ होटल के सीसीटीवी कैमरों की डीवीआर जब्त कर ली गई. होटल के 2 कर्मचारियों को भी पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया. पुलिस को होटल परिसर में दिव्यांग युवक ओमप्रकाश की स्कूटी भी खड़ी मिल गई.

पुलिस ने जो जांचपड़ताल शुरू की, लेकिन जांच से कई सवाल ऐसे उठे, जिन के जवाब मिलने पर ही जांच आगे बढ़ सकती थी. पहला सवाल तो यह था कि जब होटल के पास ही ओमप्रकाश की डीजे की दुकान थी, तो उसे युवती के साथ होटल वालों ने कमरा कैसे और किस आधार पर दिया.

दूसरे कमरे में ओमप्रकाश को जहरीला पदार्थ किस ने दिया और कब ला कर दिया. युवती का ओमप्रकाश से संपर्क कैसे और कब हुआ और वह घर से होटल तक कैसे पहुंची.

ओमप्रकाश दिव्यांग था, उसे उतारनेचढ़ाने के लिए आमतौर पर

किसी के सहारे की जरूरत पड़ती थी. फिर उस ने युवती की हत्या कैसे की होगी.

इन सवालों के जवाब पुलिस को ओमप्रकाश से ही मिल सकते थे, लेकिन दूसरे दिन 7 मार्च को अस्पताल में उस की मौत हो गई. हालांकि इस से पहले 6 मार्च की शाम को कुछ देर होश में आने पर उस ने पुलिस को बयान दे दिए थे. इन बयानों में उस ने कल्पना की हत्या की बात स्वीकार की थी. ओमप्रकाश ने भले ही पुलिस को बयान दे दिए थे, लेकिन विस्तृत पूछताछ नहीं होने से कई सवालों के जवाब पुलिस को अभी नहीं मिल सके थे.

अपने बयानों में ओमप्रकाश ने बताया कि वह कल्पना से प्रेम करता था और उस से शादी करना चाहता था. इस के लिए उस ने दासा की ढाणी के रहने वाले अपने दोस्त श्रवण के साथ मिल कर योजना बनाई थी. लेकिन कल्पना शादी के लिए तैयार नहीं थी.

कल्पना को समझाने के लिए वह उस के साथ होटल आ कर वहां ठहरा था. कल्पना के शादी से इनकार करने की बात पर दोनों के बीच काफी देर बहस चलती रही. इस बीच दोनों में झगड़ा हो गया. इस से वह तनाव में आ गया.

वह काफी देर तक सोचता रहा. कल्पना भी होटल के कमरे में बैड पर पड़ी रोती रही. आधी रात के बाद ओमप्रकाश ने होटल के कमरे में बैड पर बिछी बैडशीट को फाड़ कर अपने हाथों से कल्पना का गला घोंट दिया. वह तब तक उस के गले को दबाए रहा, जब तक उस की आंखें बाहर नहीं निकल आईं.

कल्पना की मौत हो जाने पर ओमप्रकाश उसी बैड पर लाश के पास बैठा रहा. वह आगे की बातें सोचने लगा. उसे होटल वालों से रात को ही यह पता चल गया था कि कल्पना के घर वाले उन्हें ढूंढ रहे हैं. उसे पता था कि यह मामला पुलिस में जाएगा तो पुलिस उसे तलाश करेगी. इसलिए उस ने भी अपनी जान देने का फैसला कर लिया.

सुबह उस ने होटल वालों से मंगा कर चाय पी. फिर अपने दोस्त श्रवण को फोन कर के होटल बुलाया. श्रवण कुछ ही देर में होटल आ गया. ओमप्रकाश ने उसे कल्पना की हत्या के बारे में बता दिया. साथ ही यह भी बता दिया कि अब वह भी जीवित नहीं रहेगा. ओमप्रकाश ने जहरीला पदार्थ खा कर अपनी जान देने की बात कही.

श्रवण ने उसे समझाने की कोशिश की लेकिन ओमप्रकाश नहीं माना. श्रवण और ओमप्रकाश जहरीला पदार्थ लाने के लिए बाजार गए. वहां से लौट कर ओमप्रकाश होटल के कमरे में चला गया और श्रवण अपने घर लौट गया. ओमप्रकाश ने होटल के कमरे में जा कर जहरीला पदार्थ खा लिया. इस से वह अचेत हो गया.

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पुलिस के लिए अब सब से पहले श्रवण को ढूंढना जरूरी था. उसी से ओमप्रकाश और कल्पना के बारे में सारी बातें पता चल सकती थीं. पुलिस ने श्रवण की तलाश में उस के घर दबिश दी, लेकिन वह नहीं मिला.

पुलिस ने अपनी जांच आगे बढ़ाते हुए मृतक ओमप्रकाश के बिजनैस पार्टनर मनोज और होटल मालिक अमित से पूछताछ की. मृतका कल्पना के घर वालों से भी पूछताछ कर पुलिस ने मामले की तह में जाने का प्रयास किया.

इस बीच पुलिस ने ओमप्रकाश के मोबाइल की जांचपड़ताल की, जिस से ओमप्रकाश और कल्पना की प्रेम कहानी सामने आ गई. पता चला कि दोनों के बीच लंबे समय से बातचीत हो रही थी. कल्पना की मौत से पहले 5 दिनों के भीतर दोनों के बीच करीब 6 घंटे से ज्यादा समय तक बातचीत हुई थी.

जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने 10 मार्च को वह अर्टिगा कार जब्त कर ली, जिस से ओमप्रकाश और श्रवण कल्पना के साथ होटल पहुंचे थे. यह कार दिनेश पंवार की थी. दिनेश कार को किराए पर चलाता था. श्रवण 5 मार्च को यह कार दिनेश से ले गया था. दिनेश के बारे में पता लगने पर पुलिस उस की तलाश में जुट गई थी.

कई दिनों तक तमाम लोगों से पूछताछ और भागदौड़ के बाद पुलिस ने 15 मार्च को होटल माही-7 के संचालक अमित कुमार उर्फ सोनू को गिरफ्तार कर लिया. वह भी दासा की ढाणी का रहने वाला था.

कई दिनों से फरार चल रहा दासा की ढाणी का ही रहने वाला श्रवण भी पुलिस की गिरफ्त में आ गया. पुलिस ने श्रवण और अमित उर्फ सोनू से पूछताछ की तो होटल में कल्पना की हत्या और उस के प्रेमी ओमप्रकाश के जहर खा कर जान देने की अधूरी प्रेम कहानी सामने आ गई.

सीकर के दासा की ढाणी में रहने वाला ओमप्रकाश दिव्यांग था. वह पैरों से चलने में लाचार था, लेकिन उस का बदन मजबूत था. कल्पना सीकर की रहने वाली थी. कल्पना और ओमप्रकाश एक स्कूल में पढ़े थे. इसी दौरान ओमप्रकाश मन ही मन कल्पना से प्यार करने लगा.

कल्पना की नजर में ओमप्रकाश उस का सहपाठी था. वह उस से हंसबोल लेती थी. स्कूली पढ़ाई छोड़ने के बाद कल्पना तो पढ़ाई में आगे बढ़ती गई. लेकिन ओमप्रकाश आगे नहीं पढ़ सका.

उस ने कुछ साल पहले अपने दोस्त मनोज के साथ मिल कर शादीब्याह में डीजे बजाने का काम शुरू कर दिया था. इस के लिए उन्होंने होटल माही-7 के पास ही दुकान ले रखी थी. ओमप्रकाश और मनोज का डीजे का काम अच्छा चल रहा था. इस से दोनों को अच्छी कमाई हो जाती थी.

इस बीच कल्पना ग्रैजुएशन करने के बाद एमए की पढ़ाई करने लगी थी. पढ़ाई के साथ वह बच्चों के घर जा कर उन्हें ट्यूशन भी पढ़ाती थी. ओमप्रकाश उसे फोन करता रहता था. कल्पना उसे दोस्त समझ कर उस से बात कर लेती थी. कभीकभी ओमप्रकाश प्रेम प्यार की बातें भी करता था, लेकिन कल्पना उस की बातों को तवज्जो नहीं देती थी.

कुछ महीने पहले ओमप्रकाश ने कल्पना को फोन कर के प्यार की पींगें बढ़ाने की कोशिश की तो कल्पना ने अपने परिवार वालों से उस की शिकायत कर दी. इस पर कल्पना के घर वालों ने ओमप्रकाश को समझाया था, लेकिन वह समझने के बजाए उल्टीसीधी बातें करने लगा.

बाद में ओमप्रकाश ने जब कई बार मोबाइल पर काल की तो कल्पना ने उस से बात नहीं की. एक दिन गलती से कल्पना ने उस का फोन उठा लिया तो ओमप्रकाश अपनी गलती के लिए माफी मांगने लगा. इस पर कल्पना ने भी पुरानी बातों को भुला दिया.

फिर न जाने ऐसा क्या हुआ कि ओमप्रकाश और कल्पना दोबारा मोबाइल पर बातें करने लगे. उन की रोजाना कई बार बातें होने लगीं. ओमप्रकाश कल्पना से शादी रचाने के सपने संजोने लगा था. कल्पना की उस के साथ सहानुभूति तो थी, लेकिन उस ने ओमप्रकाश के साथ शादी के बारे में कभी नहीं सोचा था.

ओमप्रकाश के लिए भी यह काम आसान नहीं था. इसलिए उस ने कल्पना को झांसे में ले कर सीकर से बाहर ले जा कर शादी करने की योजना बनाई.

इस काम में ओमप्रकाश ने अपने दोस्त श्रवण की मदद ली. श्रवण को उस ने अपनी पूरी योजना बता दी थी. श्रवण ने इस बारे में टैक्सी का काम करने वाले अपने दोस्त दिनेश पंवार से बात की. दिनेश ने एक प्रेमी जोड़े को देहरादून ले जा कर अपने परिचित दलाल के माध्यम से उन की शादी करवाई थी.

दिनेश ने श्रवण की देहरादून के अपने परिचित दलाल से बात भी करा दी. साथ ही सीकर से देहरादून जाने के लिए किराए पर अपनी अर्टिगा कार भी भेजने की बात पक्की कर ली. श्रवण ने ओमप्रकाश से बात कर 5 मार्च को गाड़ी भेजने की बात तय कर ली.

योजना के अनुसार, ओमप्रकाश ने 4 मार्च को ही कल्पना को कह दिया कि वह अगले दिन तैयार रहे, कहीं बाहर चलेंगे. ओमप्रकाश ने कल्पना को अपनी मार्कशीट और शैक्षणिक योग्यता के दस्तावेज के अलावा 2-3 जोड़ी कपड़े भी साथ लाने को कह दिया था. कल्पना ने थोड़ी नानुकुर के बाद साथ चलने की हामी भर ली. उस समय तक ओमप्रकाश ने कल्पना को शादी के बारे में नहीं बताया था.

6 मार्च को ओमप्रकाश और श्रवण अर्टिगा कार ले कर कल्पना के घर के पास पहुंच गए. कल्पना अपने घर से स्कूटी पर आई तो उस की स्कूटी को उन्होंने रास्ते में खड़ी करवा दी. फिर कल्पना को साथ ले कर ओमप्रकाश और श्रवण अर्टिगा कार से दिल्ली की ओर रवाना हो गए.

सीकर से कुछ आगे चलने पर ओमप्रकाश ने कल्पना को बताया कि वे कहीं बाहर चल कर शादी करेंगे. शादी की बात सुन कर कल्पना नाराज हो गई. इस पर ओमप्रकाश और उस के बीच विवाद होने लगा. दोनों के बीच काफी देर तक विवाद होता रहा.

इस पर ओमप्रकाश ने रास्ते में एक जगह गाड़ी रुकवा कर कल्पना को समझाने की कोशिश की, लेकिन कल्पना किसी भी कीमत पर ओमप्रकाश से शादी को तैयार नहीं हुई.

कल्पना के विरोध को देखते हुए ओमप्रकाश और श्रवण ने वापस सीकर लौटने का मन बना लिया. उन्होंने ड्राइवर से गाड़ी वापस सीकर ले चलने को कहा. सीकर पहुंच कर ओमप्रकाश ने कल्पना को किसी होटल के कमरे में बैठ कर बातें करने के लिए राजी कर लिया.

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ओमप्रकाश, कल्पना और श्रवण 6 मार्च की शाम को अर्टिगा कार से होटल माही-7 पहुंच गए. ओमप्रकाश को होटल के सभी कर्मचारी जानते थे. वह भी होटल मालिकों से ले कर सभी कर्मचारियों को जानता था. इसलिए होटल स्टाफ ने उसे कमरा नंबर 107 दे दिया.

रात होने पर कल्पना अपने घर जाने को कहने लगी. ओमप्रकाश उसे समझाने की कोशिश करता रहा. कल्पना ने उस से शादी करने से साफतौर पर इनकार कर दिया तो दोनों में फिर विवाद शुरू हो गया. रात गहराने के साथ दोनों के बीच विवाद बढ़ता गया. अंतत: ओमप्रकाश ने कल्पना की हत्या करने का फैसला कर लिया.

आधी रात के बाद जब कल्पना बैड पर दूसरी ओर मुंह कर लेटी हुई अपनी गलतियों के बारे में सोच रही थी, तब ओमप्रकाश ने होटल के कमरे में बैड पर बिछी बैडशीट फाड़ कर उस से कल्पना का गला घोंट दिया. इस से कल्पना की आंखें बाहर निकल आईं और उस की सांसें थम गईं.

कल्पना की हत्या करने के बाद ओमप्रकाश अपने भविष्य के बारे में सोचने लगा. उसे अपना भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा था. निस्संदेह पुलिस और कल्पना के घर वालों को सब कुछ पता चल जाना था. ओमप्रकाश ने सोचा कि पुलिस उसे गिरफ्तार करेगी तो उस की और परिवार की बदनामी होगी.

यह सोच कर उसे अपनी करतूत पर पछतावा होने लगा. लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था. काफी सोचविचार के बाद ओमप्रकाश ने फैसला किया कि वह भी अपनी जान दे देगा. उस ने मन ही मन सोचा कि जब कल्पना उस की नहीं हो सकी तो वह भी जी कर क्या करेगा.

सुबह होने पर ओमप्रकाश ने होटल स्टाफ से चाय मंगा कर पी. फिर अपने दोस्त श्रवण को फोन कर के होटल बुलाया. श्रवण को उस ने कल्पना की हत्या की बात बता दी और अपनी जान देने के फैसले के बारे में भी बता दिया. श्रवण ने उसे काफी समझाया, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ा रहा.

आखिर श्रवण उसे बाजार ले जाने को तैयार हो गया. ओमप्रकाश और श्रवण होटल से स्कूटी द्वारा बाजार गए, जहां ओमप्रकाश ने बीज भंडार की एक दुकान से 360 रुपए में सब्जियों पर छिड़कने वाला कीटनाशक खरीदा.

वहां से दोनों वापस होटल आ गए. श्रवण के वापस लौट जाने के बाद ओमप्रकाश ने होटल के कमरे में जा कर कीटनाशक खा लिया. कुछ घंटों तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद ओमप्रकाश ने भी दम तोड़ दिया.

पुलिस ने बाद में कल्पना के अपहरण में सहयोगी मानते हुए अर्टिगा कार के मालिक दिनेश पंवार को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने वे 70 हजार रुपए भी बरामद कर लिए, जो ओमप्रकाश ने 5 मार्च की शाम को अपने बिजनैस पार्टनर मनोज को दिए थे. मनोज ने यह रकम होटल स्टाफ को रखने के लिए दे दी थी.

हत्या से पहले युवती से दुष्कर्म हुआ या नहीं, इस की स्लाइड जांच के लिए भेज दी गई. पुलिस की जांच में यह बात सामने आई कि ओमप्रकाश और कल्पना के बीच दिन में 10 से 15 बार तक बातें होती थीं.

यह तय है कि अगर श्रवण और होटल वालों ने गलतियां नहीं की होतीं तो शायद कल्पना और ओमप्रकाश आज जीवित होते. होटल वालों ने 5 मार्च की शाम को सच्चाई छिपा ली थी.

कल्पना के घर वाले जब पूछताछ करने होटल पहुंचे तो उन्होंने उस के वहां होने की बात कही, जबकि उस समय ओमप्रकाश और कल्पना होटल के कमरे में ही थे. श्रवण ने भी सब कुछ पता होने के बावजूद किसी को इस की जानकारी नहीं दी.

विडंबना यह रही कि ओमप्रकाश ने एकतरफा प्यार किया. कल्पना से कभी उस के दिल की बात नहीं पूछी. कल्पना भी उसे अपना दोस्त मानती रही. दोनों की नासमझी ने दोस्ती की कहानी को अधूरा छोड़ कर उस के पन्ने ही फाड़ दिए.

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अपहरण

नीरव शांति भी कितनी जानलेवा हो सकती है इस का ऋचा को रायन दंपती के कमरे में जा कर ही आभास हुआ था. बडे़ से सजेधजे ड्राइंगरूम में 20-25 लोग बैठे थे पर किसी के पास कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं था. बीचबीच में बज रही फोन की घंटी ही इस घोर शांति को भंग कर रही थी. ऋषभ और सारंगी रायन शहर के धनवान दंपती थे.

ऋषभ रायन की व्यापारिक कामयाबी का लोहा सभी मानते थे. उधर सारंगी के हर हावभाव से झलकता था कि वह अभिजात्य वर्ग से हैं. कई समाजसेवी और गैरसरकारी संगठनों से वह जुड़ी थीं. उन के समाज सेवा के कार्यों की तो सराहना होती ही थी, मीडिया व समाचारपत्रों में  भी उन की अच्छीखासी पैठ थी.

ऐसे नामीगिरामी परिवार के इकलौते पुत्र आर्यन का अपहरण कर लिया गया था. दिनरात मित्रों से घिरे रहने वाले आर्यन का भला कौन शत्रु हो सकता है? ऋचा की आंखों के सामने आर्यन का हंसता चेहरा तैर गया था. आर्यन के अपहरण के बाद सारंगी का रोरो कर बुरा हाल था. ऋषभ उसे सांत्वना देने के अलावा कुछ नहीं कह पा रहे थे. बीचबीच में उन्हें पुलिस वालों के सवालों का उत्तर भी देना पड़ता था. शहर में जो भी सुनता दौड़ा चला आता. कब? क्या? कैसे हुआ? इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए ऋषभ पस्त हो गए थे.

अपने  लाड़ले पुत्र का अपहरण, ऊपर से पुलिस और मीडिया वालों के तीखे सवाल…वह बहुत कठिनाई से खुद पर संयम रख पा रहे थे. उन के मित्रों व संबंधियों ने यह भार अपने कंधों पर उठा लिया था. वह केवल दोनों हाथ जोड़ कर मुसकराने की असफल कोशिश क रते थे.

काफी देर तक निरुद्देश्य बैठे रहने के बाद ऋचा और रोमेश ने रायन दंपती से विदा ली थी. वैसे उस तनाव में किसी से विदा लेना न लेना अर्थहीन था. बातबात पर ठहाके  लगाने, चुटकुले सुनाने वाले ऋषभ रायन सामान्य व्यवहार में भी स्वयं को असमर्थ पा रहे थे.

कार में बैठते समय ऋचा को अपनी पिछली किटी पार्टी याद आ गई. पार्टी में सारंगी बड़े उत्साह से आर्यन के जन्मदिन के बारे में क्लब के सदस्यों को बता रही थी :

‘अगले माह अपनी पार्टी सारंगी के यहां होगी,’ ऋचा ने रुपए गिन कर सारंगी की ओर बढ़ाते हुए कहा था.

‘क्या? मेरे यहां? नहींनहीं. अगले माह मैं अपने यहां पार्टी नहीं रख पाऊंगी. आर्यन का जन्मदिन है न. बड़ी तैयारी करनी है. किसी को चाहिए तो इस माह चिट ले ले, मुझे कोई आपत्ति नहीं है,’ सारंगी अपना पर्स खोल छोटे से आईने में अपनी छवि निहारती और लिपस्टिक ठीक करती हुई बड़ी अदा से बोली थी.

‘मुझे नहीं लगता कि यह इतनी बड़ी समस्या है?’ तवांगी बोली, ‘आर्यन का जन्मदिन जून के अंत में है. आज तो पहली मई है. जन्मदिन क्या 2 माह तक मनाओगी?’

उस की इस बात पर ऋचा के साथ रूपा और मीना भी खिलखिला पड़ीं तो सारंगी का चेहरा तमतमा गया था.

‘मेरे इकलौते बेटे का जन्मदिन है. उस के लिए 2 माह तो क्या 2 वर्ष भी कम हैं,’ सारंगी रूखे स्वर में बोली थी.

‘कोई बात नहीं, इस माह की किटी पार्टी मैं अपने यहां रख लेती हूं, पर उस में आने के लिए तो समय निकाल लेना,’ रूपा ने सारंगी को शांत करने का प्रयत्न किया था.

‘देखूंगी, कोई वादा नहीं करती,’ सारंगी का उत्तर था.

‘पार्टी में तो आना ही पड़ेगा. यह बात तो पहले दिन ही तय हो गई थी कि चाहे कितनी भी व्यस्तता हो, कोई सदस्या पार्टी में आने से मना नहीं करेगी,’ रूपा अड़ गई थी.

‘छोड़ो न इस बहस को, चलो, अपना पत्ता फेंको, सारंगी को तुम्हारे यहां पार्टी में लाने का जिम्मा मेरा रहा,’ ऋचा ने चर्चा पर वहीं विराम लगाया था.

‘क्या उपहार दे रही हो आर्यन को?’ अचानक ही ऋचा ने बात का रुख मोड़ दिया था.

‘ऋषभ ने मर्सीडीज मंगवाई है. आर्यन की यही मांग थी. छोेटीमोटी वस्तुओं पर तो वह हाथ रखता ही नहीं. वैसे भी हमारा एक ही बेटा है और इस बार ऐसी शानदार पार्टी देंगे कि शहर  में उस की चर्चा साल भर होती रहेगी.’

‘लेकिन सारंगी, 14 साल के बच्चे को कार का उपहार, तुम्हें डर नहीं लगता?’ ऋचा ने प्रश्न किया तो वहां बैठी सभी महिलाओं की प्रश्नवाचक निगाहें सारंगी पर टिक गई थीं.

‘14 वर्षीय? आर्यन तो पिछले 2 सालों से कार चला रहा है,’ सारंगी ने गर्वपूर्ण स्वर में बताया था.

‘लाइसेंस का कैसे करोगी? 14 साल के बच्चे को ड्राइविंग  लाइसेंस कौन देगा?’

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‘इन छोटीछोटी बातों की चिंता मिडिल क्लास के लोग करते हैं हम नहीं. आर्यन का लाइसेंस तो 2 साल पहले ही बन गया था. वैसे भी उस की सहायता के लिए एक ड्राइवर हमेशा उस के साथ रहेगा,’ अपनी बात पूरी करते हुए सारंगी मुसकराई थी. अपनी सहेलियों के चेहरों पर आए प्रशंसा और ईर्ष्या के भाव देख कर सारंगी पुलक उठी थी.

किटी पार्टी समाप्त होने तक चर्चा आर्यन और उस के जन्मदिन के इर्दगिर्द ही घूमती रही थी.

‘अच्छा, अब मैं चलूंगी,’ सारंगी अचानक उठ खड़ी हुई और बोली, ‘आज अपने मित्रों के साथ वह छुट्टियां बिताने मालदीव जा रहा है. मैं जरा जल्दी में हूं.’

‘अच्छा, अब हमें भी चलना चाहिए,’ रूपा और मीना भी उठ खड़ी हुई थीं.

‘बैठो न कुछ देर, अब तो सारंगी चली गई है, वह जब तक यहां रहती है केवल अपना गुणगान करती रहती है. हम तो खुल कर हंसबोल भी नहीं सकते,’ ऋचा और कुछ अन्य सहेलियां बोली थीं.

‘मैं ने तो मना किया था पर सारंगी ने ऐसी जिद पकड़ी कि उसे शामिल करना पड़ा. पर आप लोग नहीं चाहतीं तो अगली चिट में साफ मना कर देंगे. मुझे भी लगता है कि सारंगी का दंभ बढ़ता ही जा रहा है.’ ऋचा ने आश्वासन दिया था.

उस का बेटा प्रसाद, जो आर्यन का सहपाठी था, बोर्ड की परीक्षा में सारे प्रांत में प्रथम आया था और अब फोन पर बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ था.

सारंगी का स्वर सुनते ही ऋचा को लगा कि प्रसाद की कामयाबी पर उसे बधाई देने के लिए ही फोन किया है. पर सारंगी तो दूर की हांक रही थी. छुट्टियां मनाने आर्यन गया था पर उस का असर सारंगी पर दिख रहा था. वह चटखारे लेले कर आर्यन की मालदीव में छुट्टी का विस्तार से वर्णन कर रही थी पर एक बार भी प्रसाद की उपलब्धि का नाम तक नहीं लिया था.

‘कल ही प्रसाद का परीक्षाफल आया है,’ ऋचा बोली, ‘‘मेरा बेटा पूरे प्रांत में प्रथम आया है. आजकल तो कालिज में दाखिले के लिए भी प्रवेश परीक्षा देनी होती है. प्रसाद उसी की तैयारी में जुटा है.’

‘ओह हां, मैं तो भूल ही गई थी. आर्यन बता रहा था. आर्यन ने भी अच्छा किया है. वह तो पूरे 10 हजार रुपए ले कर अपने मित्रों के साथ मस्ती करने गया है. उसे कालिज में दाखिले के लिए दिनरात एक करने की आवश्यकता नहीं है.’

‘क्यों? अभी से पढ़ाई छोड़ कर पिता के साथ बिजनेस करने का इरादा है क्या?’

‘क्या कह रही हो? ऋषभ रायन का बेटा इतनी सी आयु में क्या बिजनेस करेगा? वह आगे की पढ़ाई के लिए स्विट्जरलैंड जा रहा है. मुझे तो मध्यवर्गीय बच्चों पर बड़ा तरस आता है. आधा जीवन तो किताबों में सिर खपाए रहते हैं. शेष आधा 10 से 5 हजार की नौकरी में,’ सारंगी ने सहानुभूति जताते हुए कहा था पर ऋचा के कानों में मानो किसी ने पिघला सीसा उडे़ल दिया था.

‘समझती क्या है अपनेआप को? मेरे प्रसाद से तुलना करेगी आर्यन की?’ फोन रखते ही चीख उठी थी ऋचा.

‘क्या हुआ? बड़े क्रोध में हो? किस से बात कर रही थीं?’ समाचारपत्र पढ़ते रोमेश ने चौंक कर सिर उठाया था.

‘सारंगी थी. कभीकभी ऐसी बेहूदा बातें करती है कि सहन नहीं होतीं.’

‘तुम्हारी प्यारी सहेली है सारंगी. पता नहीं कैसे सहन कर लेती हो उसे,’ रोमेश तल्खी से बोले थे.

‘दिल की बुरी नहीं है. बस, कभीकभी…’ ऋचा हकला गई थी.

‘हांहां कहो न…चुप क्यों हो गईं? कभीकभी दौलत के नशे में ऊटपटांग बातें करने लगती हैं तुम्हारी सारंगी जी…’

‘छोड़ो यह सब, प्रसाद पूरे प्रांत में प्रथम आया है. चलो, कहीं बाहर चलते हैं,’ ऋचा ने किताबों में सिर गड़ाए बैठे प्रसाद को देख कर कहा था.

‘क्या हुआ, मां?’ प्रसाद ने चौंक कर सिर उठाया था.

‘कुछ नहीं, तुम्हारी इस कामयाबी से हम बहुत खुश हैं. तुम जल्दी से तैयार हो कर आ जाओ. आज बाहर जाने का बहुत मन है,’ ऋचा ने आग्रह किया था.

‘ठीक है मां, पर कल हम कुछ मित्र मिल कर पार्टी दे रहे हैं यह भूल मत जाना,’ प्रसाद ने याद दिलाया था.

‘मुझे अच्छी तरह याद है, मैं तुम्हें रोकूंगी नहीं. इतनी कड़ी मेहनत के बाद वैसे भी यह तुम्हारा अधिकार बनता है,’ ऋचा ने प्रसाद को दुलारते हुए कहा था.

रोमेश चुपचाप बैठे मांबेटे के संवाद को सुन रहे थे. प्रसाद तैयार होने चला गया तो उन्होंने ऋचा पर गहरी नजर डालते हुए निश्वास ली थी.

‘क्या है? ऐसे क्यों देख रहे हो? जाना है, तैयार नहीं होना क्या?’ ऋचा ने प्रश्न किया था.

‘मैं सोच रहा था कि अपने अहं की तुष्टि के लिए मातापिता अपने बच्चों को भी नहीं बख्शते हैं.’

‘क्या मतलब?’

‘यही कि प्रसाद को उस के पुराने स्कूल से निकाल कर जीनियस इंटरनेशनल में डालने की जिद तुम ने ही की थी, क्योंकि वहां तुम्हारी सहेली सारंगी का पुत्र पढ़ता था. तुम ने इसे सम्मान का प्रश्न बना लिया था.’

‘तो इस में बुरा क्या था. आजकल छात्र स्कूल में केवल पढ़ने ही नहीं जाते, संपर्क सूत्र विकसित करने भी जाते हैं. इस का लाभ प्रसाद को बाद में मिलेगा. वैसे भी बच्चों के विद्यालय के स्तर से ही मातापिता के स्तर का पता चलता है,’ ऋचा ने अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा था.

‘हां, पर प्रसाद इन वर्षों में किस तनाव से गुजरा है इस का तुम्हें थोड़ा सा भी आभास नहीं है. आर्यन और उस के मित्रों ने प्रसाद और उस के जैसे बच्चों को उपहास का पात्र बना कर रख दिया. अधिकतर शिक्षक भी आर्यन और उस के मित्रों का ही पक्ष लेते थे. यह तो प्रसाद की पढ़ाई में लगन ने उसे बचा लिया, नहीं तो पता नहीं क्या हो जाता.’

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‘जो भी हुआ अच्छा ही हुआ. यहां पढ़ कर प्रसाद पूरे प्रांत में प्रथम आया है. पुराने स्कूल में होता तो न जाने क्या हाल होता.’

‘हां, मैं तुम्हें भी सलाह दूंगा. मित्रता अपने स्तर के लोगों में ही शोभा देती है. अपनी क्षमता से अधिक तेजी से दौड़ोगी तो मुंह के बल गिरोगी.’

तभी प्रसाद तैयार हो कर आ गया तो ऋचा और रोमेश की बहस को वहीं विराम लग गया. पूरे परिवार ने पहले फिल्म देखने और फिर क्लब जा कर भोजन करने का निर्णय लिया था. वहीं भोजन करते समय उन्हें आर्यन के अपहरण का समाचार मिला था. टीवी पर आर्यन का छायाचित्र देख कर यह संशय भी जाता रहा था कि वह आर्यन रायन ही था.

ऋचा, रोमेश और प्रसाद का खाना बीच में ही अधूरा रह गया. तीनों चुपचाप भोजन कक्ष से बाहर आ गए थे. ऋचा वहां से सीधे जाना चाहती थी जबकि रोमेश, प्रसाद के साथ वहां जाने के पक्ष में नहीं थे. उन्हें डर था कि प्रसाद के वहां जाने पर न केवल ऋषभ और सारंगी बल्कि पुलिस और मीडिया भी उस से पूछताछ प्रारंभ कर देंगे.

प्रसाद पिता का रुख देख कर चुप रह गया था. ऋचा ने भी दोचार बार जोर डाला था पर रोमेश के कहने पर मान गई थी.

रायन कैसल यानी ऋषभ के घर पहुंच कर ऋचा को लगा कि शायद रोमेश की बात ही सही थी. सदा मित्रों से घिरे रहने वाले आर्यन का एक भी मित्र वहां नहीं था. दबे स्वर में लोग यह भी बात कर रहे थे कि आर्यन के तथाकथित मित्रों ने ही उस का अपहरण कर लिया और अब 10 करोड़ की फिरौती की मांग की थी.

कार रुकी तो ऋचा की तंद्रा टूटी, वह कार से उतर कर घर में आ गई.

प्र्रसाद की अपने मित्रों के साथ सफलता की पार्टी धरी की धरी रह गई थी. उस के अन्य मित्रों के मातापिता ने अपनेअपने पुत्र को न केवल किसी पार्टी में जाने से मना कर दिया, उन के घर से निकलने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था.

रोमेश 2-3 बार ऋचा के साथ रायन कैसल गए थे पर अब उन्हें वहां बारबार जाने की कोई तुक नजर नहीं आती थी. हां, ऋचा जरूर दिन में 3-4 चक्कर लगाती, सारंगी को सांत्वना देती पर समझ नहीं पाती थी कि बुरी तरह टूट चुकी सारंगी से क्या कहे.

‘‘धीरज रखो सारंगी, मुझे पूरा विश्वास है कि आर्यन सहीसलामत लौट आएगा. कोई उस का बाल भी बांका नहीं कर सकता,’’ बहुत सोचविचार कर एक दिन बोली थी ऋचा.

‘‘तुम सारंगी की सहेली हो न बेटी,’’ तभी अचानक ऋषभ की मां पूछ बैठी थीं.

‘‘जी.’’

‘‘तो तुम ने समझाया नहीं कि बेटे की हर इच्छा पूरी करना ही मां का धर्म नहीं होता. मैं ने हर बार मना किया कि आर्यन के हाथ में इतना धन मत दो. पर सारंगी को तो अपनी शानोशौकत के सामने कुछ नजर ही नहीं आता था. मैं तो पुराने जमाने की हूं, नए जमाने के रंगढंग क्या समझूं. जाओ, अब जा कर मेरे आर्यन को ले आओ,’’ एक ही सांस में बोल कर वह बिलख कर रोने लगी थीं.

ऋषभ और कुछ अन्य संबंधी उन्हें उठा कर ले गए थे पर बड़े से हाल में सन्नाटा छा गया था और ऋषभ की मां की सिसकियां देर तक गूंजती रही थीं.

ऋचा कुछ देर तक सारंगी को सांत्वना देती रही थी, फिर चुपचाप उठ कर चली आई थी. उस ने रोमेश को सारी बात बताई तो वह भी सोच में डूब गए थे.

पति रोमेश को गंभीर देख ऋचा बोली, ‘‘एक सप्ताह होने को आया पर आर्यन का कहीं पता नहीं है. पुलिस भी हाथ पर हाथ रख कर बैठी है.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है, ऋषभ बहुत प्रभावशाली व्यक्ति हैं. कल तो रायन दंपती की अपहरणकर्ताओं के नाम अपील भी प्रसारित की गई थी. पुलिस भी पूरा प्रयत्न कर रही है,’’ रोमेश ने मत व्यक्त किया था.

‘‘मेरे मित्र कह रहे थे कि रायन अंकल ने फिरौती के रुपए भी दे दिए हैं पर आर्यन का अभी तक पता नहीं है,’’ प्रसाद ने रहस्योद्घाटन किया था.

कुछ देर तक आर्यन के बारे में चिंता कर के पूरा परिवार सो गया था.

रात में दरवाजे की घंटी के स्वर से ऋचा की नींद खुल गई. झांक कर देखा तो कोई नजर नहीं आया. घबरा कर उस ने रोमेश को जगाया.

रोमेश ने दरवाजा खोला तो कोई नीचे गिरा पड़ा था. उठा कर मुंह देखा तो दोनों चौंक कर पीछे हट गए. फटे कपडे़ में आर्यन जमीन पर पड़ा था जिस के शरीर पर जहांतहां चोट के निशान थे. फिर तो प्रसाद की सहायता से उसे उठा कर वे अंदर ले आए. आननफानन में रायन दंपती को खबर की और आर्यन को अपनी गाड़ी में डाल कर अस्पताल ले गए.

आर्यन वहां तक कैसे पहुंचा यह सभी के लिए एक पहेली थी. उधर बेहोश पडे़ आर्यन के होश में आने की प्रतीक्षा थी. पहली बार रोमेश ने निरीह पिता की मजबूरी देखी थी. आज ऋषभ की सारी दौलत बेमानी हो गई थी.

‘‘आर्यन ठीक हो जाएगा न,’’ उन्होंने रोमेश से पूछा था. उन्होंने उन का हाथ दबा कर मौन आश्वासन दिया था.

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