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मैंने सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्म से अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा है: संदीप सोपारकर

मशहूर भारतीय लैटिन और बौल रूम डांसर तथा बौलीवुड के मशहूर नृत्य निर्देशक संदीप सोपारकर ने अपने 18 वर्ष के नृत्य निर्देशन के करियर में काफी उपलब्धियां हासिल की हैं. वह एक मात्र भारतीय नृत्य निर्देशक व डांसर हैं, जिनकी तस्वीर और उनकी मुहीम ‘फार एक कौज’’ के ‘लोगों’ के साथ भूटान सरकार ने डाक टिकट जारी किया. हर क्षेत्र में कलाकारों का हौसला आफजाई करने वाली संस्था ‘‘इंडिया फाइन आर्ट कौंसिल’’ के अध्यक्ष हैं. वह पहले भारतीय हैं, जिन्हें जर्मनी के ‘बाल रूम डांस ट्रेनिंग स्कूल’ से बालरूम डांसर के रूप में प्रमाणित किया गया. उन्हें भारत सरकार की तरफ से भी तीन पुरस्कार दिए जा चुके हैं.  वह टीवी के रियालिटी शो में जज बनकर आ चुके हैं. उनकी लोकप्रियता का आलम यह है कि अब वह चंदा पटेल निर्मित और जैनेंद्र बख्शी निर्देशित अंतरराष्ट्रीय फिल्म ‘‘आई  एम  नाट ए पौर्न स्टार’’ में हीरो बनकर आ रहे हैं.

प्रस्तुत है संदीप सोपारकर के साथ हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश..

डांस में आ रहे बदलाव को आप किस तरह से देख रहे हैं?

मेरे हिसाब से डांस फैशन की तरह हैं. वह हमेशा एक सर्कल में घूमता रहता है. अगर हम बौलीवुड की बात करें, तो 70 के दशक में हेलन जी ने या शम्मी जी ने काफी ‘रौक एन रोल’ जैसे डांस किए थे. फिर ट्रेंड बदला और डिस्को डांस हो गया. फिर ब्रेक डांस आया. अब हिप हौप डांस काफी पौपुलर हो गया है. मेरा मानना है कि डांस के नए नए ट्रेंड आते रहते हैं. लेकिन जो क्लासिकल डांस हैं, वह स्थाई हैं. मेरा डांस बाल रूम डासिंग है, जो कि पश्चिम का क्लासिक डांस फार्म है. जबकि भारत में कत्थक व भरत नाट्यम क्लासिकल डांस है. यह हमेशा रहेंगे, नए डांस आएंगे व जाएंगे, पर क्लासिक डांस हमेशा रहेंगे. देखिए, वेस्टर्न क्लासिकल हो या इंडियन क्लासिकल डांस हो यह सदैव जिंदा रहेंगे. फिर चाहे वह फिल्म ‘देवदास’ का गाना हो या ‘कलंक’ का गाना हो, देखिए, क्लासिकल गाने और क्लासिकल डांस हमेशा सफल होंगे. क्योंकि इस तरह के डांस में हमारी अपनी सभ्यता संस्कृति का अंश होता है. जिस तरह से मैं वेस्टर्न डांस करता हूं, वह भी हमेशा रहेंगे.

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आपने वेस्टर्न क्लासिकल डांस को ही क्यों चुना?

इसकी वजह यह है कि मैं उन दिनों जर्मनी में था और वहां मुझे वेस्टर्न क्लासिकल डांस के अलावा करने के लिए और कुछ नहीं मिला. काश… उस वक्त मैं भारत में होता, तो मैं भारतीय क्लासिकल डांस को ही चुनता. मेरी मां मशहूर भरतनाट्यम डांसर रही हैं. लेकिन हम जहां रह रहे थे, वहां हमें इस तरह के डांस करने का मौका नहीं मिला. मेरे पिता आर्मी में थे, जहां हमेशा लाइव बैंड होते हैं. वहां ब्रिटीश डांस बहुत होते थे. पर मुझे कभी भी भारतीय क्लासिक डांस करने का मौका नहीं मिला. जिस तरह के डांस करने का मौका मिला, वह मैंने किया. जब मैं छोटा था, तो मैंने अपनी मम्मी से कहा था कि मुझे भरतनाट्यम सीखना है, पर उस वक्त जर्मनी में भारतीय क्लासिकल नृत्य सिखाने वाला कोई स्कूल नहीं था. मैं आपको चालीस साल पहले की बात बता रहा हूं. अब तो वहां भी इस तरह के कई स्कूल खुल गए हैं.

बतौर नृत्य निर्देशक क्या आप सिर्फ निर्देशक की बात को ही तवज्जो देते हैं या उसमें अपनी तरफ से कुछ जोड़ते हैं?

आपने तो बहुत मुश्किल सवाल पूछ लिया है. देखिए, जब हम स्क्रिप्ट सुनते हैं, तो निर्देशक अपनी तरफ से हमें ब्रीफ करता है कि उसे क्या चाहिए. क्योंकि वह सिच्युएशन वगैरह सारी चीजें बताते हैं. लेकिन उसके बाद उसमें हम क्या भरते हैं, यह हमारी अपनी जिम्मेदारी होती है. निर्देशक सिर्फ हमें बाहर का ढांचा बताता है, पर उसके अंदर का सारा मसाला हम डालते हैं. पर मैं हर चीज सोचने के बाद निर्देशक की राय जरूर ले लेता हूं. मैं कभी भी अपनी सोच पर अडिग नहीं रहता. क्योंकि मेरा मानना हैं कि निर्देशक का वीजन पूरी फिल्म को लेकर होता है. यानी कि फिल्म किस तरह से बननी हैं यह निर्देशक के दृष्टिकोण पर निर्भर करता है. फिल्म हमारी नही होती है. फिल्म तो उनकी होती है. हम तो सिर्फ उसे बिल्ड करने में मदद करते हैं. इसलिए मेरा काम यह नही होता है कि मैं जिद पकड़ लूं कि यही स्टेप्स होने चाहिए. यदि कोई स्टेप्स कलाकार को नहीं आ रहे हैं, तो मैं उसमें थोड़ा बदलाव करने को गलत नही मानता. यदि कोई कलाकार अच्छा डांसर नही है, तो हम उसे सिखाते भी हैं. कई बार हमें कैमरा चीटिंग भी करनी पड़ती हैं.

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कई बार गाना और डांस अच्छा होता है, पर फिल्म असफल हो जाती है.. ऐसे में आप क्या सोचते हैं?

मेरी राय में यदि पूरी फिल्म संगीत और नृत्य के साथ सफलता पाए, तो ही उसका मजा है. यदि मेरा गाना व मेरे डांस के स्टेप हिट हो गए, पर फिल्म फ्लौप हो जाए, तो मुझे अच्छा नहीं लगता. मैं मतलबी इंसान नही हूं. मेरा मानना है कि फिल्म एक टीम वर्क है. यदि फिल्म के बनने के बाद किसी को समस्या होती है, तो हमें भी समस्या होनी चाहिए. मैं यह नहीं सोचता कि मेरे गाने हिट हो गए, फिल्म असफल हो गई, तो क्या फायदा. जब फिल्म हिट हो, गाने हिट हों, डांस हिट हो, तो हम अपने आप हिट हो जाते हैं. मुझे पता है कि बौलीवुड में कई बार ऐसा हुआ है कि गाने व नृत्य हिट हुए, पर फिल्म फ्लौप हुई.

टीवी पर डांस के जो रियालिटी शो आ रहे हैं. क्या उनसे डांस को फायदा हो रहा है?

देखिए, डांस को अब जो नया मुकाम मिला है, उसकी मूल वजह टीवी के डांस रियालिटी शो हैं. इसे यूं कह सकते हैं कि डांस को लोकप्रिय बनाने में रियालिटी शो ने बहुत बड़ा योगदान दिया है. अब लोग डांस को गंभीरता से लेने लगे हैं. हर बच्चा कई तरह के डांस फार्म सीखना चाहता है, फिर चाहे लैटिन अमेरिकन फार्म हो या इंडियन फार्म हो. अब देखिए, कितने तरह के हिप हौप डासं आ गए हैं. लोग डांस की क्लास जाते हैं अथवा टीवी पर डांस देखकर पै्रक्टिस करते हैं अथवा यूट्यूब पर जाकर डांस सीखते हैं. इन दिनों डांस सीखने के लिए गूगल भी गुरू बना हुआ है. हां! यदि आप रियालिटी शो को रीयल मानते हैं, तो यह आपकी गलती है. क्योंकि रियालिटी शो की टीआरपी के लिए कई कहानी गढ़ी जाती हैं. टीवी के डांस रियालिटी शो मनोरंजन का जरिया हैं.

आपकी डांस अकादमी में जो बच्चे डांस सीखने आते हैं, उनका मकसद सिर्फ डांस रियालिटी शो का विजेता बनना होता है या कुछ और?

दुर्भाग्य की बात है कि पिछले दो तीन साल के दौरान ज्यादातर बच्चे यही कहकर आते हैं कि उन्हें टीवी के डांस रियालिटी शो में जाना है या फिल्मों में जाना हैं. वह कहते हैं कि, ‘सर हमारी मदद कीजिए. हमें टीवी के डांस रियालिटी शो का विजेता बनना है. हमें स्टेज पर शो भी करने हैं. ’’मेरे हिसाब से इस तरह की वजहों के चलते जो बच्चे हमारी डांस अकादमी में आ रहे हैं, वह गलत है. मैं कभी भी इसका समर्थन नही कर सकता. मैं हमेशा हर बच्चे से यही कहता हूं कि आप डांस क्लास में इसलिए आएं, क्योंकि आपको डांस करना है. पर यदि आप टीवी शो में जाने के मकसद से हमारी डांस क्लास में आते हैं, तो यह गलत है. डांस के प्रति इज्जत होनी चाहिए. मैं डांसर हूं. मैं डांस की पूजा करता हूं. यदि आप मेरे डांस की पूजा करने किसी मकसद से आते हैं, तो गलत है. आप डांस अपनी जिंदगी के लिए सीखिए. हां! बीच में यदि आपको डांस के रियालिटी शो में जाने का मौका मिल गया, तो अलग बात है. डांस तो जिंदगी भर सीखने वाली कला है. मैं तो आज भी डांस सीखता हूं. फिर डांस के रियालिटी शो तो 10-12 साल से आए है. उससे पहले तो नही थे. हो सकता है कि यह डांस के रियालिटी शो 10-12 साल बाद न रहें. उसके बाद कुछ और आ जाए. यह तो जिंदगी का एक फेज है.

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उम्र के इस पड़ाव पर अभिनय के क्षेत्र में कदम रखने की कोई खास वजह?

मेरे पास पिछले 5-6 वर्षो के दौरान कई नृत्य प्रधान फिल्मों में अभिनय करने के औफर आए, पर यह आफर ठुकरा दिए. क्योकि मैं नृत्य प्रधान फिल्म में अभिनय नहीं करना चाहता. एक दो नौन डांस फिल्मों के भी औफर दे आए थे. पर उसकी कहानी मुझे पसंद नही आयी. इसलिए मना कर दिया था. लेकिन जब मेरे पास फिल्म ‘‘आई एम नौट ए पौर्न स्टार’’ का आफर आया तो मैं इसकी विषयवस्तु के चलते इंकार नहीं कर पाया.

फिल्म ‘‘आई एम नाट ए पौर्न स्टारः नजर संभाल के’’ किस तरह की फिल्म है?

यह एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म है, जो कि सत्तर प्रतिशत अंग्रेजी में है. इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार को ध्यान में रखकर ही बनाया गया है. यह काफी रियालिस्टिक फिल्म है. इस फिल्म की कहानी हमारे व आपके बारे में बात करती है. हम जिस तरह से किसी भी इंसान को देखकर उसके बारे में अनुमान लगाते हैं कि महंगे कपड़े व महंगी गाड़ी में घूमने वाला इंसान अमीर होगा. ऐसा हर जगह होता है कि इंसान को देखकर उसको जज किया जाता है. हमारी फिल्म का मकसद यह बताना है कि आप किसी भी देखकर बिना विस्तृत रूप से उसके बारे में जानें, उसे जज ना करें. हर इंसान का स्वभाव व उसका दिल बहुत मायने रखता है.

महिलाओं को मुफ्त सफर का ऐलान तो कर दिया, पर कैसे होगा पूरा?

अरविंद केजरीवाल ने 5 साल तक राजसुख भोग लिया हैं, पर कहीं यह राजसुख छिन न जाए, इसीलिए अब वे छटपटा रहे हैं और ऐलान दर ऐलान किए जा रहे हैं. उन का नया ऐलान यही है कि मेॆट्रो के अलावा  डीटीसी व क्लस्टर बसों में महिलाओं को किराया नहीं देना पड़ेगा. वैसे फिलहाल 30 से 33 फीसदी ऐसी महिलाएं हैं जो मेट्रो और सरकारी बसों में सफर करती हैं.

भले ही इस व्यवस्था को लागू करने में कुछ महीने का समय लगे, पर कुछ लोग इसे चुनावी स्टंट मान रहे हैं तो कुछ लोग आम जनता के पैसों का दुरुपयोग. बहुत से तो इसे आम जनता से वसूला गया टैक्स इस तरह की योजनाओं पर भेंट चढ़ा हुआ मान रहे हैं.

मुफ्त सेवाएं दे कर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भले ही महिलाओं की वाहवाही और आने वाले विधानसभा चुनाव में उन के वोट बटोरने की तलाश में हों, पर यह जुमला भी कहीं उन की बदनामी की वजह न बन जाए.

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इस के अलावा और भी कई घोषणाएं हैं. मसलन सभी स्कूलों में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे. अस्पतालों व बसों में मार्शल तैनात किए जाएंगे और पोस्टर भी लगाए जाएंगे कि इस बस में मार्शल तैनात हैं. इस व्यवस्था को शुरू करने में जो भी खर्चा आएगा वह दिल्ली सरकार देगी. मोटेतौर पर इस में 700 से 800 करोड़ तक का खर्चा होगा.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि आम परिवारों की बेटियां जब कालेज के लिए निकलती हैं, महिलाएं नौकरी के लिए निकलती हैं तो लोगों का दिल धकधक करता रहता है. उन की सुरक्षा की चिंता बनी रहती है. उस को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सरकार ने फैसला किया है कि डीटीसी की बसों, मैट्रो और क्लस्टर बसों में महिलाओं को किराया नहीं देना होगा. सरकार का एक ही मकसद है कि महिलाएं ज्यादा से ज्यादा पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल कर सकें. पर साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जो महिलाएं किराया देने में सक्षम हैं, वह सब्सिडी का प्रयोग न करें.

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इस पर दिल्ली भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी कहते हैं कि वे इस योजना का विरोध तो नहीं कर रहे हैं लेकिन जो काम 52 महीनों में केजरीवाल नहीं कर सके उसे वे 3 महीने में कैसे कर सकते हैं. वे केवल लोगों को गुमराह कर रहे हैं. दिल्ली में 20,000 बसें चाहिए, लेकिन प्रदेश सरकार के पास सड़क पर चलाने के लिए महज 3,300 बसें हैं. उन्हें  इस ओर ध्यान देना चाहिए था.

वैसे, लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को पूरी तरह बहुमत मिल जाने पर अरविंद केजरीवाल को अपनी कुरसी खिसकती नजर आ रही है, तभी तो वे लोकलुभावन ऐलान किए जा रहे हैं. चुनाव होने से पहले ही लोगों को घोषणाओं के जाल में फंसाने की कोशिशें शुरू हो गई हैं. अभी कई और घोषणाएं होंगी. संभव है कि यह घोषणा भी कर दी जाए कि सभी के घर के बाहर एक बस खड़ी रहेगी. जब लोग चाहें तब सवारी कर सकते हैं.

यदि अरविंद केजरीवाल कुछ कर सकते हैं तो वह आयुष्मान भारत योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना लागू करें. आयुष्मान योजना से गरीबों को दिल्ली, पश्चिम बंगाल और केरल में वंचित रखा जा रहा है. यहां भी हमारी सरकार बनने के बाद यह योजना दिल्ली में लागू हो जाएगी.

मनोज तिवारी ने इस समस्या की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि पहले बसों में मार्शल तैनाती की बात कही गई थी, अब उस पर बात नहीं हो रही है. नए स्कूल बनाने के वादे पूरे नहीं हुए. पेयजल, अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने, यमुना को साफ करने को ले कर किए गए वादों पर अब वे कुछ नहीं बोल रहे हैं.

मनोज तिवारी का कहना है कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली को नंबर वन बनाने की घोषणा की थी और प्रदूषण में नंबर वन बना दिया. अब फिर से ऐसी घोषणा कर दी जिस पर लोगों की हंसी नहीं रुक रही है. केजरीवाल, जो बिना बोले खाल उधेड़ रहे हैं. बच्चों को मास्क लगा कर चलने और गंदा पानी पीने के लिए मजबूर कर दिया हैं.

अपना मकसद साधने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री ऐसी घोषणाएं कर तो रहे हैं, पर अमलीजामा पहनाने में अधिकारियों को तमाम तरह के पसीने बहाने पड़ेंगे. अब देखना यह होगा कि आम जनता अरविंद केजरीवाल पर कितना भरोसा कर पाती है.

मेरे रिश्तेदार मुझे पुनर्विवाह करने की सलाह देते हैं, मैं क्या करूं?

सवाल

मेरी आयु 38 वर्ष है और मैं एक प्रतिष्ठित सरकारी पद पर कार्यरत हूं. मेरा एक 8 वर्षीय बेटा है. पति के देहांत के बाद जीने का और कोई सहारा नहीं है. मेरे रिश्तेदार मुझे पुनर्विवाह करने की सलाह देते हैं. दूसरा, सास की बिना घर का बंटवारा किए ही मृत्यु हो गई. ससुर मेरे दिए जेवर मुझे वापस नहीं लौटाते, जो मैं ने शादी होने के बाद उन्हें सुरक्षित रखने के लिए दिए थे. वे और मेरे एक जेठ भी इसी घर में रहते हैं. क्या पुनर्विवाह करने के बाद मैं इस घर से अपना हिस्सा पा सकूंगी?

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जवाब

आप की उम्र अभी छोटी है और ऊपर से बेटे की जिम्मेदारी, जो भले ही आप अच्छी नौकरी करते हुए बखूबी निभा सकती हैं, लेकिन फिर भी जीवन में हमसफर की जरूरत पड़ती ही है. इसलिए अगर आप को ऐसा जीवनसाथी मिलता है जो आप के साथसाथ आप के बेटे को भी अपना बनाने के लिए तैयार हो तो ऐसे इंसान से विवाह करने में कोई हर्ज नहीं. रही बात जेवरों व घर में आप के हिस्से की, तो इस के लिए आप को जद्दोजेहद तो करनी ही पड़ेगी. इसलिए मन को पक्का कर ठोस निर्णय लें और जिस से शादी करें, उसे पहले ही पूरी स्थिति से अवगत करा दें, ताकि बाद में कोई दिक्कत न हो.

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दूध भी हो सकता है नुकसानदेह

दूध को पूर्ण आहार कहा जाता है. दूध में प्रौटीन, फैट, कार्बोहाइड्रेट के साथ ही कई विटामिन और मिनरल भी होते हैं जो अच्छी सेहत के लिए जरूरी हैं.

इन्हीं फायदों की वजह से बच्चों को दूध पीने की सलाह दी जाती है. हाल ही में हुए एक अध्ययन के अनुसार, हर रोज एक गिलास गरम दूध पीने से स्वास्थ्य बेहतर रहता है और वह लोग जो दूध पीते हैं वे दूध न पीने वालों की तुलना में चाय, कौफी और शराब का सेवन कम करते हैं. लेकिन दूध का पूरा फायदा पाने के लिए जरूरी है कि इसे सही समय पर लिया जाए. दूध का गलत मात्रा में और गलत तरीके से इस्तेमाल करने से अपचन, खट्टी डकारें, गैस, सीने में जलन और यहां तक की स्किन एलर्जी जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

सही समय : रात के समय दूध का सेवन करना सब से ज्यादा फायदेमंद होता है क्योंकि दूध में (ट्रिप्टोफेन) ञ्जह्म्4श्चह्लशश्चद्धड्डठ्ठ नाम का एमिनो एसिड पाया जाता है जो दिमाग को शांत कर के अच्छी नींद दिलाने में बहुत मदद करता है. रात में दूध पीने से शरीर को इस में मौजूद कैल्शियम लेने में आसानी होती है.

मसल्स या बौडी बनाना चाहते हैं तो रात में दूध पीना चाहिए. दूध में मौजूद प्रौटीन इस से ज्यादा फायदा देता है. अगर वजन बढ़ाना हो तो दिन में दूध पीने की सलाह दी जाती है.

अगर दूध को पचाने में दिक्कत हो तो इसका सेवन सुबह के समय करना चाहिए. हालांकि ऐक्सरसाइज के बाद सुबह दूध पीने से एसिडिटी हो सकती है.

जिन लोगों को लैक्टोज से एलर्जी है और अकसर कब्ज, अपचन और गैस की समस्या रहती है उन्हें खाली पेट दूध का सेवन बिलकुल नहीं करना चाहिए क्योंकि दूध पचने में थोड़ी देर लगती है और हमारे पाचन तंत्र को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.

दूध ठंडा या गरम: अकसर लोगों को यह समझ नहीं आता है कि गरम दूध पीना सेहतमंद होता या फिर ठंडा.

इस प्रश्न का उत्तर है, दूध हमेशा हलका गरम ही पीना चाहिए. ठंडा दूध ठीक से पच नहीं पाता जिस की वजह से दूध में मौजूद पोषक तत्त्वों का पूरा फायदा हमारे शरीर को मिल ही नहीं पाता.

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दूध किन चीजों के साथ मिला कर पीने से क्या फायदे और नुकसान है?

दूध हमें जीवित प्राणी से मिलता है इसलिए इस में हार्मोंस, एंजाइम्स और ऐमीनो एसिड की मात्रा अधिक होती है इसलिए दूध ज्यादातर खाने के साथ केमिकल रिएक्शन भी जल्दी करने लगता है जिस से दूध ठीक से पच नहीं पाता और दूध से मिलने वाले फायदे भी जीरो हो जाते हैं.

दूध एक वक्त के खाने के बराबर होता है इसलिए अगर खाना खाने के तुरंत बाद दूध पी लेते हैं तो इस का मतलब है एक ही समय में दो वक्त का खाना. खाना खा लेना, जिस से भारीपन, एसिडिटी, पेट फूलना और अपचन जैसी समस्या शुरू होने लगती है. अत: खाना खाने के 2 घंटे बाद और सोने से आधे घंटे पहले दूध पीएं. दूध के साथ, पहले या बाद में खट्टे फल, नमकीन और ज्यादा चटपटी चीजों का सेवन बिलकुल नहीं करना चाहिए.

दूध के साथ दही का सेवन करने से पाचन क्रिया में समस्या आ जाती है. दही में लाक्टोबेसिलेस नाम का बैक्टीरिया दूध को दही में जमाता है और जब हम दूध और दही का एक साथ सेवन कर लेते है तो दूध के दही जमने की प्रक्रिया पेट में ही शुरू हो जाती है.

बैंगन और कच्चे प्याज खाने के पहले या बाद में भी दूध का सेवन करना नहीं करना चाहिए. जिन लोगों के शरीर पर कोई बड़ा जख्म है या कोईर् हाल में सर्जरी हुई हो तो ठंडा दूध का सेवन कुछ दिनों तक बिलकुल भी नहीं करना चाहिए.

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जिन्हें रुड्डष्ह्लशह्यद्ग से एलर्जी या चेहरे पर एक्नेंव पिंपल की समस्या है उन्हें दूध कम मात्रा में लेना होता है.गाय और भैंस के दूध में अंतर, भैंस के दूध में गाय के दूध के मुकाबले फैट और कैलोरीज दोनों ही ज्यादा होते हैं. इसलिए जो लोग वजन बढ़ाना चाहते हैं उन्हें भैंस का ही दूध पीना चाहिए.

गाय के दूध में फैट कम मात्रा में होता है. इसलिए पचने में आसान होता है. सेहत और ताकत के नजरिए से भी गाय का दूध काफी अच्छा होता है. इसलिए जो लोग वजन बढ़ाना नहीं चाहते बल्कि वजन घटना चाहते हैं तो उन्हें गाय के दूध का सेवन करना चाहिए.

हलदीयुक्त दूध पिएं

दूध में थोड़ी सी हलदी मिलाते हैं तो इस के एंटी इंफ्लामेटरी, जीवाणुरोधी, और उपचार शक्तियों के कारण दूध की शक्ति को और अधिक बढ़ावा मिल सकता है. दर्द और सूजन को कम करने में मदद मिलती है, जिस से यह रूमेटोइड (ह्म्द्गह्वद्वड्डह्लशद्बस्र) या पुरानी पीड़ा जैसी सूजन संबंधी बीमारियों वाले व्यक्ति के लिए फायदेमंद हो जाता है.

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 किरण आहूजा

फिर नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों या मुख्यमंत्रियों की सहायता केअकेले धुआंधार प्रचार और रैलियां कर के एक बार फिर बहुमत हासिल कर अपने पर लगाए गए सारे आरोपों और अपनी प्रशासनिक व नीतिगत नीतियों की गलतियों पर आम वोटरों के समर्थन का मोटा लेप लगा लिया है. आम वोटर नोटबंदी व जीएसटी की तकलीफों और दलित उत्पीड़न व किसान आत्महत्याओं की घटनाओं के बीच एक सुरक्षित, परंपरावादी हुकूमत चाहता है क्योंकि उसे जो उन की कीमत देनी पड़ रही है वह महसूस ही नहीं हो रही.

नरेंद्र मोदी को पिछले एक साल से काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था. कई राज्यों के विधानसभा चुनाव हार गए थे. कई लोकसभा उपचुनाव भी हार गए थे. प्रेस से बात करने से कतराते थे. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की आक्रामक होती शैली उन्हें परेशान कर रही थी. पर उन्होंने ये सब अपनी वाककला से बुरी तरह धो डाला कि अब कोई भी विपक्षी दल अपने गढ़ में सुरक्षित नहीं रह पाएगा.

इतिहास में ऐसे समय बहुत आए हैं जब राजाओं ने लंबे समय तक राज किया और उन के स्थिर स्थायी राज में चाहे उन्नति हुई या न हो, जनता अपना आम काम करती रही है. आज भी दुनिया के कई देश एक ऐसा शासक पसंद कर रहे हैं जो सामाजिक स्थायित्व दे चाहे वैयक्तिक स्वतंत्रताएं हों या न हों. रूस के व्लादिमीर पुतिन, तुर्की के रजब तैयब इरदुगान, चीन के शी जिनपिंग उन शासकों में से हैं जो जबरन बंदूक के बल पर शासक नहीं बने हैं, पर खासे स्वीकार किए जाते हैं.

मौलिक स्वतंत्रता, संस्थाओं की स्वायत्तता, नियमोंकानूनों का पालन, नई सोच आदि हो या न हो, जब तक एक सा शासन मिले, जनता को सहज स्वीकार हो जाता है. और यहां तो साथ में धर्म की मुहर भी लगी मिल रही है. जब धर्म को देश की गरीब व अमीर जनता ही नहीं, अल्पसंख्यक भी अपना अस्तित्व मानते हों तो स्वाभाविक है कि धर्मनिष्ठ सरकार के पीछे भागा जाएगा.

नरेंद्र मोदी के सामने अब राजनीतिक चुनौतियां न के बराबर रह गई हैं. यह पक्का है कि विपक्षी दल हताशा के शिकार हो जाएंगे क्योंकि इन चुनावों में उन्होंने अपना पूरा जोर लगा दिया था. राज्यों के आने वाले चुनावों में जब तक कोई चमत्कार न हो, भारतीय जनता पार्टी की सरकारें बनेंगी. देश की जनता ने लोकतंत्र के जानेपहचाने तरीके से यह फैसला लिया है.

धर्म की धाक धमेगी

भारतीय जनता पार्टी की विजय का एक अर्थ यह भी है कि अब देश में तार्किक, वैज्ञानिक और विश्लेषणवादी लोगों की कोई जगह नहीं. पिछले

100-150 वर्षों से देश जहां एक तरफ विज्ञान, फिलौसफी, तर्क, मौलिक स्वतंत्रताओं की निरंतर खोज में लगा था वहीं दूसरी तरफ सुनियोजित ढंग से देश पर पुरातनवादी सोच लादी जा रही थी. कहा जा रहा है कि भारतीय सोच विश्व में अनूठी है, अकेली है और अंतिम सत्य है.

कर्मकांडों, पूजापाठों, ध्यानों, मंत्रोच्चारणों वाली उबाऊ, निरर्थक प्रक्रियाएं पूरे देश पर लादी जा रही हैं. लोगों का पहनावा धार्मिक आदेशों के अनुसार बदला जा रहा है. तर्क की जगह आस्था ले रही है. कुछ मामलों को छोड़ दें तो आज फिर इस देश के लोग मानसिक रूप से 18वीं शताब्दी से पहले वाले तरीके से जीने को मजबूर हैं.

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भारतीय जनता पार्टी का उद्देश्य केवल संसद और विधानसभाओं में बैठ कर शासन करना नहीं है, वह जीवन के हर हिस्से में परोक्षअपरोक्ष रूप से दखल दे रही है. असल में उस की सफलता का राज ही यह है कि उस ने वोटरों पर राजनीतिक प्रभुत्व के साथ भावनात्मक प्रभुत्व भी स्थापित किया है. लोगों को यह विश्वास दिला दिया गया है कि वे चाहे मर्सिडीज गाड़ी खरीदें या हवाई जहाज, जब तक विधिवत पूजापाठ न होगा, शुभ न होगा. इसे हर रोज कहने वाले ही पार्टी के सब से बड़े प्रचारक हैं.

इन के मुकाबले तर्क और स्वतंत्रता की बात करने वाले अपनी बात लिख कर या इधरउधर कहीं बोल कर इतिश्री कर लेते हैं. अब तक तर्क की जगह थी, पर क्या अब यह रहेगी? खिंची लकीर पर चलना सब से सुगम होता है क्योंकि उस में सोचविचार नहीं करना पड़ता. नियत प्रक्रियाएं यानी रीतिरिवाज निभाने पर सामाजिक समर्थन मिलता है. आदमी अकेला नहीं पड़ता. उसे कुछ नया करने के लिए प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं होती जिस में 100 में से एक ही सफल होता है.

क्या इस देश में अब अलग सोच रखने वालों की जरूरत नहीं रहेगी? चाहे अपनेअपने धर्मों के अनुष्ठानों को मानने की छूट हो पर क्या अपने धर्म या समाज की सड़ीगली मान्यताओं से हटने की छूट होगी?

चेहरारहित विपक्ष हारा

भाजपा को मिली जीत की एक वजह यह भी है कि दूसरे दल पूरे देश में एक झंडे के नीचे राज देने की बात करने में मतदान के समय सफल नहीं हो पाए. व्यक्तिपूजा करने की आदी देश की जनता को नरेंद्र मोदी के सामने एक चेहरा चाहिए था, जो साफ न था.

ममता बनर्जी अपने अहंकार में थीं. मायावती अपने कोकून में बंद थीं. जगन मोहन रेड्डी और चंद्रबाबू नायडू अपनेअपने रोब में थे. नवीन पटनायक को लग रहा था उन्हें कोई छू नहीं पाएगा. भाजपा का सुनियोजित पैसे और साधनों से लैस संगठन तितरबितर विपक्ष पर बुरी तरह हावी रहा. अगर विपक्षी दल एकतरह की बातें कर रहे थे तो एकसाथ काम करने में उन्हें क्या मुश्किल थी. सो, अब भुगतो 5 साल और.

पुलिस की मरजी

दिल्ली की सड़कों पर एक नजारा आम है. चौराहों पर जहां ट्रैफिक जाम लगा होगा वहां वरदीधारी ट्रैफिक पुलिस वाला न होगा. पर इंडिया इंटरनैशनल सैंटर या शंगरीला होटल के सामने, जहां ट्रैफिक सामान्य होता है,

4-5 सफेद वरदी वाले ट्रैफिक सबइंस्पैक्टर के साथ दिख जाएंगे जो वाहन रोक कर कभी किसी कारण  तो कभी किसी वजह के चलते ट्रैफिक  में रोकटोक करते रहते हैं. उन के हाथ में इंस्टैंट चालान करने वाली हैंड हैल्ड मशीन होती है जो पूरा डाटा ऐक्सैस कर सकती है.

ये अगर दहशत पैदा कर के ट्रैफिक सैंस लाते हों तो भूल जाएं. जहां ये खड़े होते हैं वहां से आधा किलोमीटर की दूरी पर अफरातफरी रहती है. पटरियों पर बाइक, बीच सड़क पर सवारियां भरती बसें, चौराहे पर सवारियों का इंतजार करते औटो देखे जा सकते हैं. पर ये ट्रैफिक कौंस्टेबल वहां पर नहीं दिखेंगे. कारण साफ है, हर बार गाड़ी रोकने पर कुछ झटका जाता है. 5-7 वाहनों का चालान किया.

10-15 लोगों से 100-500 रुपए ले कर जेब में रखे. दरअसल, चौराहे पर टै्रफिक कंट्रोल करना टेढ़ा काम है. नोएडा पुलिस ने इसी तर्ज पर 4 मई को नोएडा के एक फार्महाउस पर 40-50 जवान जमा कर युवाओं की रेव पार्टी पर रेड मारी. क्या वे हुड़दंग मचा रहे थे? किसी को परेशान कर रहे थे? डाका डालने की योजना बना रहे थे? नहीं, वे कुछ अनैतिक लगने वाला काम कर रहे थे जिस के लिए पुलिस वालों के पास समय था व जवान खाली बैठे थे. कारण यहां भी स्पष्ट है. रेव पार्टी पर रेड मार कर

कुछ लाख रुपए वसूलने आसान हैं. कानूनव्यवस्था सुचारु बनाए रखने में परेशानी होती है. नोएडा कोई अपराधमुक्त शहर नहीं कि पुलिस को भटके युवाओं को राह पर लाने का काम करने की फुरसत हो.

यह देशभर में होता है. सरकार अपनी शक्ति का दंभ वहां दिखाती है जहां सामने वाला कमजोर हो, अकेला हो. जहां भीड़ हो, वहां सरकार चुप रहती है. कांवडि़ए रास्ता रोक लें, तो मजाल है पुलिस वाले कुछ कह सकें. जरा सा ओवरलोड ट्रक हो, कानून टूट जाता है. सड़क पर गड्ढे कर के तंबू लगा कर निर्जला एकादशी को प्रसाद बांटा जाए, यह पुलिस को न दिखेगा. मकानमालिक ने 50 ईंटें रख लीं अपना मकान ठीक करने के लिए, आननफानन पुलिस वाले पहुंच जाएंगे.

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रेव पार्टी करना न गुनाह है, न गुनाह माना जाना चाहिए. यह गलत हो सकता है पर जब तक इस से किसी को नुकसान न हो, इस पर आपत्ति न हो, तब तक पुलिस के दखल का सवाल भी नहीं उठता. हमारी पुलिस अपनी जेब भरती है. उसे बहाना चाहिए, वह साबित कर ही देगी कि आप गलत हैं.

नकल पर अनजाना जोर

परीक्षाओं के मौसम में नकल कराने के लिए बिहार के उस फोटो, जिस में बीसियों लोग परीक्षा केंद्र की खिड़कियों से लटके अपने अजीजों को परचियां देते दिखे थे, की तर्ज पर सब राज्यों में वैसा ही हो रहा है. परीक्षा का मखौल उड़ाया जा रहा है. किसी तरह अंक आ जाएं, इस के लिए विद्यार्थियों को उन के मातापिता व अभिभावक जम कर हर तरह की बेईमानी करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, क्योंकि कुछ परीक्षाएं ऐसी होती हैं जो भविष्य का दरवाजा खोलती हैं.

परीक्षाओं में पढ़ कर अच्छे नंबर लाना हरेक के लिए संभव नहीं है. इसलिए कुछ को तो बेईमानी करनी ही पड़ेगी. पूरा सिस्टम ऐसा बन गया है, या बना डाला गया है कि नकल को जैसे पूरी तरह संस्थागत मान लिया जाए और कम से कम प्रमाणपत्रों तक हरेक को योग्य मान लिया जाए. सरकारी फैसले इस के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार हैं जो निर्धारित करते हैं कि कुछ पदों के लिए न्यूनतम आधार मैट्रिक, बीए या एमए है. अब यह आधार पाना है तो जैसेतैसे डिगरी या सर्टिफिकेट तो चाहिए ही न.

देश की बहुत सी नौकरियों में लंबीचौड़ी शिक्षा की नहीं बल्कि मेहनत, लगन और ईमानदारी की जरूरत होती है. कुछ में अनुभव चाहिए. कुछ में जोखिम लेने की क्षमता की आवश्यकता होती है. तो कुछ में शारीरिक बल ही जरूरी होता है.

ऐसी नौकरियों में न्यूनतम शिक्षा का प्रावधान कर डाला गया है. वैसे, यह हमारी वर्णव्यवस्था की सोच के आधार पर किया गया है जिस में शिक्षा का मौलिक अधिकार तो ब्राह्मण को ही था. अब चूंकि 5वीं पास अछूत जाति के भी आने लगे हैं, सो, ये प्रमाणपत्र उन्हें रिजैक्ट करने का काम करते हैं. सफाई इंस्पैक्टरों को किसी भी शहर में देख लें. उन्होंने कभी झाड़ू तक नहीं उठाई होगी. वे प्रमाणपत्रों के बल पर इंस्पैक्टर बने, जबकि यह नौकरी मिलनी चाहिए केवल उन को जो सफाई का काम 8-10 साल कर चुके हैं.

परीक्षाओं में नकल करने के पीछे लालच भी है. अच्छी नौकरी यदि नकल कर के मिल जाए तो पौबारह. सरकारी नौकरी मिलने के बाद ऊपरी कमाई से कोई भी नकल पर किया खर्च निकाल सकता है. वैसे भी यहां ज्ञान की आवश्यकता किसे है? यहां ज्ञानी व विद्वान तो वह होता है जो 2 घंटे तक 2000 साल पुराने निरर्थक संस्कृत श्लोक सुना सके. वह ज्ञान नहीं है जो भारत की जरूरत के अनुसार एक साइकिल ईजाद कर सके. यहां के टाटा, अंबानी, अडानी, बिड़ला की कोई चीज विश्वभर में नहीं बिकती. इन का सारा पैसा नकल पर ही आधारित है.

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 7 टिप्स: कौफी का ऐसे करें इस्तेमाल तो बढ़ेगी खूबसूरती

कई लोगों की पसंदीदा ड्रिंक कौफी होती हैं. ये सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कौफी सिर्फ सेहत के लिए ही नहीं बल्कि आपकी खूबसूरती को भी बरकरार रखने में काफी फायदेमंद है.

  1. कौफी को शहद के साथ मिक्स कर के स्क्रब के रूप में इस्तेमाल करने से चेहरे पर मौजूद डेड स्किन साफ हो जाती है. साथ ही यह स्किन को मौइस्चराइज कर के ड्राइनेस की समस्या को दूर करती है.

2. कौफी के पाउडर में टी-ट्री-औयल मिलाकर चेहरे पर मसाज करने से बढ़ती उम्र के लक्षण कम हो जाते हैं और चेहरे पर चमक भी आती है.

3. झड़ते और रूखे बालों से परेशान हैं तो कौफी का इस्तेमाल करना फायदेमंद होगा. कौफी के इस्तमेाल से बालों का झड़ना कम हो जाता है. मेंहदी में कौफी को मिक्स कर के बालों में लगाएं. इससे झड़ते बालों की समस्या दूर होती है.

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4. चेहरे पर कौफी से मसाज करने से औयली स्किन और ब्लैकहेड्स की समस्या दूर होती है.

5. कौफी में मौजूद एंटी-औक्सीडेंट्स स्किन में निखार लाने का काम करते हैं. आप चाहें तो इससे चेहरे पर मसाज कर सकते हैं या इसे फैस पैक के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

6.  चेहरे पर कौफी का पेस्ट लगाने से स्किन में काफी ग्लो आता है.

7. कौफी में एंटी इंफ्लेमैटरी गुण पाए जाते हैं, इससे आंखों के आस पास होने वाले डार्क सर्कल्स की समस्या खत्म हो जाती है. इसके साथ ही ये आंखों की सूजन को भी कम करती है.

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आराम हराम है

आज मेरी जो हालत है इस के जिम्मेदार पूरी तरह नेहरूजी हैं. कहना तो मुझे चाचा नेहरू चाहिए था पर क्या है कि जब मैं बच्ची थी तब भी वह मुझे चाचा नहीं लगते थे. वह हमारे दादा की उम्र के थे और हमारे सगे चाचा सजीले नौजवान थे, उन के केश पंडित नेहरू की तरह सफेद न थे.

यहां गौर करने की एक बात यह भी है कि चाचा नेहरू हमें बता गए हैं कि आराम हराम है और हमारे पिताजी ने इसे पत्थर की लकीर समझा. खुद तो सुबह उठते ही हमें भी उठा देते कि उठ जाग मुसाफिर भोर भई. उसी के साथ हमारे सामने वह पोथियां खुल जातीं जिन्हें पढ़ कर कोई पंडित नहीं बनता और जिस ढाई आखर को पढ़ कर इनसान पंडित हो सकता है वह भरे पेट का चोंचला है.

प्रेम के लिए फुरसत होनी चाहिए कि बैठे रहें तसव्वुरएजानां किए हुए. सुबह 4 बजे से रात 11 बजे तक की इस समय सारिणी में प्रेम के लिए हमारे पास कोई घंटा ही न बचा था. पढ़ोलिखो, नौकरीचाकरी, घरगृहस्थी, चौकाचूल्हा, बालबच्चे, और फिर पांव की लंबाई का एडजस्टमेंट, इन सब के साथ लिफाफा चंगा दिखाई दे, यह भी काम बड़ा था. जब तेजतेज गाड़ी हांकतेहांकते यह पता चला कि अब तो सफर खत्म ही हो चला है तो इस में आराम का समय न था, इसलिए आराम का अभ्यास भी न रहा.

जैसे हर कोई प्रेम नहीं कर सकता, एवरेस्ट पर नहीं चढ़ सकता, ऐसे ही हर कोई आराम भी नहीं कर सकता. आराम करना हुनर का काम है. हम चाहें तोे भी आराम नहीं कर सकते. आता ही नहीं है. पिताजी ने सिखाया कि सुबह से रात तक कुछ न कुछ करते ही रहो. अम्मां ने देखा कि लड़की खाली तो नहीं बैठी है, सब काम हो गए तो पुराने स्वेटर को उधेड़ कर फिर से बुन लो. परदे पुराने, बदरंग हो गए तो उन से गद्दे का कवर बना डालो.

दिमाग खाली न था  इसलिए शैतान उस में न रहा और भरा था इसलिए भगवान उस में न समा सके. भगवान का निवास यों भी दिमाग में नहीं दिल में होता है. हमारे यहां दिल वाले आदमी ही होते हैं, औरतें दिलविल की लग्जरी में नहीं पड़तीं. दिल होता नहीं, विल उन की कोई पूछता नहीं. एक दिल वाली ने विल कर दी तो देखा  कैसे कोर्टकचहरी हुई.

जब कहा गया है कि आराम हराम है तो इस का अर्थ है कि सुख न मिलेगा. हाथों में हथकड़ी, पैरों में छाले होंगे, आगे होगा भूख और बेकारी का जीवन, हड़तालें होंगी, अभाव यों बढे़ंगे जैसे दु्रपद सुता का चीर.

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मान लीजिए चाचा नेहरू ने काम हराम कहा होता तो मुल्क सुख के हिंडोले में झूलता. किसान काम न करते, मजदूर काम न करते. सब ओर दूध की नदियां बहतीं. अप्सराएं नृत्य करतीं. आप ने कभी स्वर्ग में देवताओं को काम करते सुना है, पढ़ा है. कोई काम करे तो उन के सिंहासन हिलने लगते हैं. वह उत्सवधर्मी हेलीकाप्टरों की तरह  होते हैं जो केवल पुष्पवर्षा करते हैं. उन्हें तो बस अपना गुणगान सुनना अच्छा लगता है और यज्ञ भाग न पहुंचे तो नाराज हो जाते हैं. यह खुशी की बात है कि हमारे अधिकारी देवतुल्य होते हैं. उन्हें भी देवताओं की तरह आराम चाहिए होता है. दोनों ही उसे दारुण दुख देने को तैयार रहते हैं, जो दुष्ट उन की भक्ति नहीं करता. गरीबों को सताने का अपना आनंद जो ठहरा.

आराम हराम है का राग अलापने वाले यह भी जानते हैं कि जितने आदमी उतने ही हरामखोर. आखिर इस धरती पर कौन इतना फरमाबरदार है कि आराम का मौका मिले तो उसे हाथ आए बटेर की तरह छोड़ दे. जनगणना वालों के पास आंकड़े उपलब्ध बेशक न हों लेकिन सब को पता है कि सौ में से 10 काम करते हैं, शेष हरामखोरी कर के ही काम चलाते हैं. पूरे आलम में कुछ नहीं चलता फिर भी शासन प्रशासन चलते हैं, राजधर्म निभते हैं और तख्त भी पलटते हैं. देखा जाए तो यह सब भी एक तरह से काम  ही है. भूख और बाढ़ से मरने वालों को लगता बेशक हो पर यह काम नहीं होता. काम होता है इस की समीक्षा, कारण, दौरे और रिपोर्ट.

जिन्हें आराम करना आता है वे जानते हैं कि कब और कैसे आराम किया जाता है. उस के लिए समय कैसे निकाला जाए, इस की भी एक तकनीक होती है. आप कैसे ‘रिलैक्स’ कर सकते हैं, तनाव से कैसे छुटकारा पा सकते हैं, इस के लिए भी विशेषज्ञ सलाह देते हैं. इधर सुबह की सैर के दौरान जगहजगह ऐसे प्रशिक्षक होते हैं जो नियम के अनुसार 3 बार हंसाते हैं. हंसो, हंसो जोर से हंसो, हंसो हंसो दिलखोल कर हंसो, लोग हंसने में भी शरमाते हैं, सकुचाते हैं, हम कैसे हंसें, हमें तो हंसना ही नहीं आता.

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अभी वह समय भी आएगा जब आराम करना सिखाने के लिए भी टें्रड प्रशिक्षक होंगे. आंखें बंद कीजिए, शरीर को ढीला छोडि़ए और गहरी सांस लीजिए.

ऐसे में मेरी जैसी कोई लल्ली पूछेगी, ‘‘एक्सक्यूज मी, यह सांस क्या

होती है?’’

हैप्पी बर्थडे

दादाजी को सोता देख दादीमां के होंठों पर मुसकान दौड़ गई. आश्वस्त हो कर फिर से आंखें बंद कर लीं. थोड़ी देर में उन्हें फिर से झपकी आगई.

अचानक गाल पर गीलेपन का एहसास हुआ. आंख खोल कर देखा तो श्वेता पास खड़ी थी.

गाल पर चुंबन जड़ते हुए श्वेता ने कहा, ‘‘हैप्पी बर्थडे, दादीमां.’’

‘‘मेरी प्यारी बच्ची,’’ दादीमां का स्वर गीला हो गया, ‘‘तू कितनी अच्छी है.’’

‘‘मैं जाऊं, दादीमां? स्कूल की बस आने वाली है.’’

श्वेता ने दादाजी की ओर देखते हुए कहा, ‘‘कैसे सो रहे हैं.’’

दादीमां को लगा कि सच में दादाजी बरसों से जाग रहे थे. अब कहीं सोने को मिला था.

सचिन ने प्रवेश किया. हाथ में 5 गुलाबों का गुच्छा था. दादीमां को गुलाब के फूलों से विशेष प्यार था. देखते ही उन की आंखों में चमक आ जाती थी.

चुंबन जड़ते हुए सचिन ने फूलों को दादीमां के हाथ में दिया और कहा, ‘‘हैप्पी बर्थडे.’’

‘‘हाय, तू मेरा सब से अच्छा पोता है,’’ दादीमां ने खुश हो कर कहा, ‘‘मेरी पसंद का कितना खयाल रखता है.’’

सचिन ने शरारत से पूछा, ‘‘दादीमां, अब आप की कितनी उम्र हो गई?’’

‘‘चल हट, बदमाश कहीं का. औरतों से कभी उन की आयु नहीं पूछनी चाहिए,’’ दादीमां ने हंस कर कहा.

‘‘अच्छा, चलता हूं, दादीमां,’’ सचिन बोला, ‘‘बाहर लड़के कालिज जाने के लिए इंतजार कर रहे हैं.’’

दादीमां आहिस्ता से उठीं, खटपट से कहीं दादाजी जाग न जाएं. वह बाथरूम गईं और आधे घंटे बाद नहा कर बाहर आ गईं और कपड़े बदलने लगीं.

बेटे तरुण ने नई साड़ी ला कर दी थी. दादीमां वही साड़ी पहन रही थीं.

‘‘हाय मां,’’ तरुण ने अंदर आते हुए कहा, ‘‘हैप्पी बर्थडे. आज आप कितनी सुंदर लग रही हैं.’’

‘‘चल हट, तेरी बीवी से सुंदर थोड़ी हूं,’’ दादीमां बहू के ऊपर तीर छोड़ना कभी नहीं भूलती थीं.

‘‘किस ने कहा ऐसा,’’ तरुण ने मां को गले लगाते हुए कहा, ‘‘मेरी मां से सुंदर तो तुम्हारी मां भी नहीं थीं. तुम्हारी मां ही क्यों, मां की मां की मां में भी कोई तुम्हारे जैसी सुंदर नहीं थीं.’’

‘‘चापलूस कहीं का,’’ दादीमां ने प्यार से चपत लगाते हुए कहा, ‘‘इतना बड़ा हो गया पर बात वही बच्चों जैसी करता है.’’

‘‘अब तुम्हारा तो बच्चा ही हूं न,’’ तरुण ने हंस कर कहा, ‘‘मैं दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहा हूं. पापाजी को क्या हो गया? अभी तक सो रहे हैं.’’

‘‘सो कहां रहा हूं,’’ दादाजी ने आंखें खोलीं और उठते हुए कहा, ‘‘इतना शोर मचा रहे हो, कोई सो सकता है भला.’’

‘‘पापाजी, आप बहुत खराब हैं,’’ तरुण ने शिकायती अंदाज में कहा, ‘‘आप चुपकेचुपके मांबेटे की खुफिया बातें सुन रहे थे.’’

‘‘खुफिया बातें कान में फुसफुसा कर कही जाती हैं. इस तरह आसमान सिर पर उठा कर नहीं,’’ दादाजी ने चुटकी ली.

‘‘क्या करूं, पापाजी, सब लोग कहते हैं कि मैं आप पर गया हूं,’’ तरुण ने दादाजी को सहारा देते हुए कहा, ‘‘अब आप तैयार हो जाइए. वसुधा आप लोगों के लिए कोई विशेष व्यंजन बना रही है.’’

‘‘क्यों, कोई खास बात है क्या?’’ दादाजी ने प्रश्न किया.

‘‘पापाजी, कोई खास बात नहीं, कहते हैं न कि सब दिन होत न एक समान. इसलिए सब के जीवन में एक न एक दिन तो खासमखास होता ही है,’’ तरुण ने रहस्यमयी मुसकान से कहा.

‘‘तू दर्शनशास्त्र कब से पढ़ने लगा,’’ दादाजी ने कहा.

‘‘चलता हूं, पापाजी,’’ तरुण की आंखें मां की आंखों से टकराईं.

क्या सच ही इन को याद नहीं कि आज इन की पत्नी का जन्मदिन था जिस ने 55 साल पहले इन के जीवन में प्रवेश किया था? अब बुढ़ापा न जाने क्या खेल खिलाता है.

डगमगाते कदमों से दादाजी ने बाथरूम की तरफ रुख किया. दादीमां ने सहारा देने का असफल प्रयत्न किया.

दादाजी ने झिड़क कर कहा, ‘‘तुम अपने को संभालो. देखो, मैं अभी भी अभिनेता दिलीप कुमार की तरह स्मार्ट हूं. अपना काम खुद करता हूं. काश, तुम मेरी सायरा बानो होतीं.’’

दादाजी ने बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. अंदर से गाने की आवाज आ रही थी, ‘अभी तो मैं जवान हूं, अभी तो मैं जवान हूं.’

दादीमां मुसकराईं. बिलकुल सठिया गए हैं.

बहू वसुधा ने कमरे में आते ही कहा, ‘‘हाय मां, हैप्पी बर्थडे,’’ फिर उस की नजर साड़ी पर गई तो बोली, ‘‘तरुण सच ही कह रहे थे. इस साड़ी में आप खिल गई हैं. बहुत सुंदर लग रही हैं.’’

‘‘तू भी कम नहीं है, बहू,’’ यह कहते समय दादीमां के गालों पर लाली आ गई.

जातेजाते वसुधा बोली, ‘‘मां, मैं खाना लगा रही हूं. आप दोनों जल्दी से आ जाइए. गरमागरम कचौरी बना रही हूं.’’

दादीमां का बचपन सीताराम बाजार में कूचा पातीराम में बीता था. अकसर वहां की पूरी, हलवा, कचौरी और जलेबी का जिक्र करती थीं. जिस तरह दादीमां बखान करती थीं उसे सुन कर सुनने वालों के मुंह में पानी आ जाता था.

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वसुधा मेरठ की थी और उसे ये सारे व्यंजन बनाने आते थे. दादीमां को अच्छे तो लगते थे लेकिन उस की प्रशंसा करने में हर सास की तरह वह भी कंजूसी कर जाती थीं. शुरूमें तो वसुधा को बुरा लगता था. लेकिन अब सास को अच्छी तरह पहचान लिया था.

थोड़ी देर बाद दादाजी और दादीमां बाहर आ कर कुरसी पर बैठ गए. उन के आने की आवाज सुन कर वसुधा ने कड़ाही चूल्हे पर रख दी.

सूजी का मुलायम खुशबूदार हलवा पहले दादीजी ने खाना शुरू किया. कचौरी के साथ वसुधा ने दहीजीरे के आलू बनाए थे.

दादाजी 2 कचौरियां खा चुके थे.

दादीमां ने दादाजी से हलवे की तारीफ में कहा, ‘‘शुद्ध घी में बनाया है न… बना तो अच्छा है लेकिन हजम भी तो होना चाहिए.’’

‘‘अरे वाह, तुम ने तो और ले लिया,’’ दादाजी ने निराश स्वर में कहा.

उन दोनों की बातें सुन कर वसुधा हंस पड़ी, ‘‘पापा, मैं फिर बना दूंगी.’’

दिल का दौरा पड़ जाने से दादाजी को काफी परहेज करना व करवाना पड़ता था.

दिन में दादीमां की दोनों बहनों व उन के परिवार के लोग फोन पर जन्मदिन की बधाई दे रहे थे. उन के भाईभाभी का कनाडा से फोन आया. बहुत अच्छा लगा दादीमां को. वह बहुत खुश थीं और दादाजी मुसकरा रहे थे.

रात को तो पूरा परिवार जमा था. बेटी और दामाद भी उपहार ले कर आ गए थे. खूब हल्लागुल्ला हुआ. लड़के-लड़कियां फिल्मी धुनों पर नाच रहे थे. तरुण अपने बहनोई से हंसीमजाक कर रहा था तो वसुधा अपनी ननद के साथ अच्छेअच्छे स्नैक्सबना कर किचन से भेज रही थी. बस, मजा आ गया.

‘‘दादीमां, आप का बर्थडे सप्ताह में कम से कम एक बार अवश्य आना चाहिए,’’ सचिन ने दादीमां से कहा, ‘‘काश, मेरा बर्थडे भी इसी तरह मनाया जाता.’’

दादीमां ने अचानक कहा, ‘‘आज मुझे सब लोगों ने बधाई दी. बस, एक को छोड़ कर.’’

‘‘कौन, मां?’’ तरुण ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘यह गुस्ताखी किस ने की?’’ सचिन ने कहा.

‘‘इन्होंने,’’ दादीमां ने पति की ओर देख कर कहा.

दादाजी एकदम गंभीर हो गए. ‘‘क्या कहा? मैं ने बधाई नहीं दी?’’

दादाजी अभी तक गुदगुदे दीवान पर सहारा ले कर बैठे थे कि अचानक पीछे लुढ़क गए. शायद धक्का सा लगा. ऐसे कैसे भूल गए. सब का दिल दहल गया.

‘‘हाय राम,’’ दादीमां झपट कर दादाजी के पास गईं. लगभग रोते हुए बोलीं, ‘‘आंखें खोलो. मैं ने ऐसा क्या कह दिया?’’

दादाजी को शायद फिर से दिल का दौरा पड़ गया, ऐसा सब को लगा. दादीमां की आंखें नम हो गईं. उन्होंने कान छाती पर लगा कर दिल की धड़कन सुनने की कोशिश की. एक कान से सुनाई नहीं दिया तो दूसरा कान छाती पर लगाया.

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‘‘हैप्पी बर्थडे,’’ दादाजी ने आंखें खोल कर मुसकरा कर कहा, ‘‘अब तो कह दिया न.’’

‘‘यह भी कोई तरीका है,’’ दादीमां ने आंसू पोंछते हुए कहा. अब उन के होंठों पर हंसी लौट आई थी.

सब हंस रहे थे.

‘‘तरीका तो नहीं है,’’ दादाजी ने उठते हुए कहा, ‘‘लेकिन याद तो रहेगा न.’’

‘‘छोड़ो भी,’’ दादीमां ने शरमा कर कहा.

‘‘वाह, इसे कहते हैं 18वीं सदी का रोमांस,’’ सचिन ने ताली बजाते हुए कहा.

फिर तो सारा घर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

कौलसेंटर: ठगी के ठिकाने

इंटरनेट पर दुनिया भर की जानकारियां एकत्र हैं, जो चाहिए कुछ बटन दबा कर हासिल कर लीजिए. इन जानकारियों से हर विधा बहुत आसान तो हो गई है, लेकिन इंटरनेट का दुरुपयोग करने वालों ने नएनए उपकरणों के माध्यम से जानकारियां एकत्र कर के देशविदेश के लोगों को ठगने के रास्ते भी निकाल लिए हैं. ये लोग हर महीने करोड़ों…

सूचना प्रौद्योगिकी में आई क्रांति ने हर इंसान की जिंदगी को आसान बना दिया है. महानगरों से ले कर छोटेबडे़ शहरों में रहने  वाले अब जेब में ज्यादा नकदी नहीं रखते. इन की जेब में रखे पर्स अब कई तरह के कार्ड से भरे होते हैं. इन में डेबिट क्रैडिट कार्ड से ले कर और भी न जाने कितनी तरह के कार्ड होते हैं.
इस के अलावा लोगों में औनलाइन बैंकिंग और औनलाइन शौपिंग का भी प्रचलन तेजी से बढ़ा है. औनलाइन लेनदेन में और खरीदारी ने भले ही लोगों को एक नई सुविधा दी है, लेकिन कई मायनों में इस से उन की परेशानियां भी बढ़ गई हैं. एटीएम और क्रैडिट कार्ड से धोखाधड़ी के रोजाना नएनए मामले सामने आते रहते हैं. जालसाज एटीएम कार्ड हैक कर ग्राहकों का डेटा चुरा रहे हैं.
एटीएम कार्ड के क्लोन बना कर ठगी की जा रही है. पिछले कुछ सालों से औनलाइन शौपिंग करने वाले ग्राहकों के डेटा भी चोरी किए जाने लगे हैं. बैंक व बीमा उपभोक्ताओं के डेटा भी गुपचुप तरीकों से चुराए जा रहे हैं. यही कारण है कि अब हत्या, लूट और डकैती से ज्यादा साइबर अपराध के मामले सामने आ रहे हैं.

बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में तो कुछ जगहों पर साइबर अपराध के बाकायदा अघोषित स्कूल भी चल रहे हैं. इन स्कूलों में युवाओं को साइबर अपराधों के नित नए पैंतरे सिखाए और बताए जाते हैं. साइबर अपराधों के मास्टरमाइंड आम जनों से ठगी करने के रोजाना नए तरीके ईजाद कर रहे हैं.
पिछले कुछ सालों से देश में कालसेंटरों की बाढ़ सी आ गई है. इन में तीनचौथाई कालसेंटर किसी न किसी तरह का फरजीवाड़ा कर रहे हैं. ग्राहकों के चुराए गए डेटा इन्हीं फरजी कालसेंटर चलाने वालों को बेचे जाते हैं.

ऐसा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के अधिकांश विकसित देशों में हो रहा है. विभिन्न तरीकों से ग्राहकों के डेटा चुरा कर दूसरे देशों को बेचे जा रहे हैं. हालात यह हैं कि भारत के ग्राहकों के डेटा अमेरिका, इंग्लैंड, चीन, आस्ट्रेलिया, मलेशिया, फिलिपींस, सिंगापुर, यूक्रेन, रोमानिया, फ्रांस, बेल्जियम, पोलैंड आदि देशों तक पहुंच रहे हैं.

दूसरी तरफ तमाम देशों के डेटा भारत में आ रहे हैं. इन डेटा के जरिए भारत में बैठ कर फरजी कालसेंटर से अमेरिका, ब्रिटेन सहित अन्य देशों में नएनए तरीकों से ठगी की जा रही है. वहीं, अमेरिका और ब्रिटेन के साइबर ठग भारत सहित अन्य देशों के लोगों से ठगी कर रहे हैं.

हैरानी की बात यह है कि भारत में फरजी कालसेंटरों पर काम करने वाले 10वीं-12वीं पास युवक लिखी हुई स्क्रिप्ट के आधार पर फर्राटेदार अंगरेजी बोल कर अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों के नागरिकों को ठग रहे हैं. हालांकि इन कालसेंटरों में काम करने वाले युवक केवल मोहरे होते हैं. जबकि फरजी कालसेंटरों के संचालक मास्टरमाइंड होने के साथसाथ आईटी में तकनीकी रूप से दक्ष होते हैं.

इसी साल मार्च के तीसरे सप्ताह की बात है. राजस्थान पुलिस मुख्यालय की राज्य विशेष शाखा से जयपुर के पुलिस कमिश्नरेट के अधिकारियों को सूचना मिली कि जयपुर में कई जगह फरजी कालसेंटर चल रहे हैं.

इन सेंटरों के संचालक अवैध रूप से विदेशी नागरिकों का डेटा हासिल कर उन से संपर्क करते हैं. फिर उन नागरिकों को या तो टैक्स जमा कराने के नाम पर धमकाया जाता है या लोन स्वीकृत कराने का प्रलोभन दिया जाता है. इस तरह विदेशियों से ठगी की जा रही है.
इस सूचना पर जयपुर पुलिस कमिश्नरेट के तेजतर्रार अधिकारियों की टीम गठित कर ऐसे फरजी कालसेंटरों का पता लगाने की जिम्मेदारी सौंपी गई. जांच में सूचना सही मिलने पर पुलिस मुख्यालय की इंटेलीजेंस टीम और पुलिस कमिश्नरेट के अधिकारियों के नेतृत्व में 4 टीमें बनाई गईं. इन टीमों ने 27 मार्च की रात को सादे कपड़ों में निजी वाहनों से पहुंच कर एक साथ 4 जगह दबिश डाली.

पहली टीम ने जयपुर में स्वेज फार्म स्थित दीप नगर में एक मकान पर रेड डाली तो दूसरी टीम ने गुर्जर की थड़ी पर मैट्रो पिलर नंबर 67 और 68 के बीच न्यू सांगानेर रोड पर रेड डाली. तीसरी टीम ने श्यामनगर थाने के पास एक गेस्टहाउस पर और चौथी टीम ने न्यू सांगानेर रोड पर लजीज होटल के सामने चल रहे फरजी कालसेंटर पर रेड डाली.

चारों रेड में 2 युवतियों सहित 34 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इन चारों कालसेंटर के सरगना हार्दिक पटेल, राहुल बादल, विवेक राणा और भोपा भाई गुजरात के अहमदाबाद के निवासी थे, जबकि गौरव जांगिड़ जयपुर का रहने वाला था.

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गिरफ्तार आरोपियों में 20 युवक गुजरात के अहमदाबाद के और 2 जामनगर के रहने वाले निकले. 2 युवतियों सहित 4 युवक मेघालय, 4 नागालैंड, एक पश्चिम बंगाल, एक त्रिपुरा और 2 युवक जयपुर के रहने वाले थे. पुलिस ने इन कालसेंटरों से बड़ी संख्या में कंप्यूटर, 10 लैपटौप, 33 मोबाइल फोन, राउटर, मोडम, विशेष उपकरण मैजिक जैक, डायलर एवं नेटवर्किंग के उपकरण, अमेरिकी बैंक टौम मारेना के फरजी चैक और बिटकौइन के दस्तावेज जब्त किए.
इन फरजी कालसेंटरों के संबंध में आरोपियों के खिलाफ महेश नगर और श्याम नगर थाने में 2-2 मुकदमे दर्ज किए गए.

आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि अमेरिका के लोगों को लोन के लिए बैंक खाते की लिमिट बढ़ाने का झांसा दे कर और बकाया इनकम टैक्स के नाम पर धमका कर ये लोग 4 महीने से ठगी कर रहे थे. इन 4 महीनों में ये करीब ढाई करोड़ रुपए की ठगी कर चुके थे. गिरफ्तार आरोपियों में कई 10वीं और 12वीं पास थे. कुछ युवक सौफ्टवेयर इंजीनियर भी थे. संचालक द्वारा कालसेंटर में काम करने वाले युवाओं को 12 से 15 हजार रुपए महीने के हिसाब से वेतन दिया जाता था.

इस गिरोह का नेटवर्क अमेरिका, चीन, हांगकांग सहित कई देशों में फैला हुआ था. भारत में इस गिरोह ने जयपुर के अलावा गुजरात, मेघालय व त्रिपुरा में अपना नेटवर्क बना रखा था.

कालसेंटरों के संचालकों ने विदेशी लोगों से बात करने के लिए अपने कर्मचारियों को पहले बाकायदा ट्रेनिंग दी थी. विदेशियों को फंसाने के लिए कालसेंटर संचालक पहले स्क्रिप्ट तैयार करते थे. इसी स्क्रिप्ट के आधार पर कालसेंटर के कर्मचारी विदेशियों को काल कर उन से बात करते थे.

विभिन्न देशों के समय के अनुसार कालसेंटर पर अलगअलग शिफ्टों में कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाती थी. भारत और अमेरिका के समय में करीब साढ़े 10 घंटे का अंतर रहता है. ऐसे में भारत में इन कालसेंटरों में काम करने वाले कर्मचारी दोपहर 12 बजे की शिफ्ट में काम पर आते थे. उस समय अमेरिका में रात के साढ़े 10 बज रहे होते थे. कोई अमेरिकी नागरिक सुबह उठ कर अपना कंप्यूटर या लैपटौप चैक करता, तब उसे इन ठगों का ईमेल मिलता था.

कालसेंटर संचालक अमेरिका के लोगों को ठगने के लिए वहां के निवासियों के डेटा औनलाइन खरीदते थे. यह डेटा .95 डौलर प्रति व्यक्ति के हिसाब से खरीदा जाता था. इस डेटा में अमेरिका के लोगों के नाम, मोबाइल नंबर व ईमेल आदि होते थे.

फरजी कालसेंटरों से अमेरिका के लोगों को जो ईमेल भेजा जाता था, उस में लिखा होता था कि सस्ती दर पर लोन चाहिए तो नीचे लिखे नंबर पर फोन करें. कुछ जरूरतमंद लोग उस ईमेल में लिखे मोबाइल नंबर पर फोन करते थे.

फोन पर बातचीत के दौरान कालसेंटर में बैठे कर्मचारी उस विदेशी की बैंक की डिटेल्स ले लेते थे. कालसेंटर के लोग जल्दी ही रिटर्न काल करने की बात कहते थे. फिर उस विदेशी को फोन कर बैंक खाते में क्रैडिट स्कोर कम होने की बात कह कर क्रैडिट लिमिट बढ़ाने का झांसा देते थे. इस के लिए ये लोग कमीशन मांगते थे.

सौदा तय हो जाने पर ये लोग उस विदेशी के खाते में फरजी चैक भेज देते और चैक की फोटो उस के खाते में अपलोड कर देते थे. जयपुर के पुलिस अधिकारियों का दावा है कि अमेरिका में औनलाइन चैक भेजने पर एक बार संबंधित ग्राहक के खाते में उस चैक की राशि की एंट्री हो जाती है. बाद में अगर चैक में कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो उस ट्रांजैक्शन को निरस्त कर दिया जाता है.

बैंक में पैसा जमा होने की एंट्री होने पर ये लोग कमीशन के एवज में वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांसफर, आईट्यून गिफ्ट कार्ड, मनीग्राम वालमार्ट कार्ड, बिटकौइन आदि के रूप में धनराशि लेते. यह रकम अमेरिकी बैंकों के खातों में ही ली जाती थी. फिर उस राशि को विदेशों में बैठे दलालों के माध्यम से हवाला से भारत में मंगवा लेते थे. इस तरह इन के द्वारा जयपुर में बैठ कर अमेरिका के लोगों से ठगी की जा रही थी.

ये लोग ठगी का दूसरा तरीका भी अपनाते थे. जयपुर में कालसेंटर में बैठे लोग मैजिक जैक की मदद से अमेरिका में लोगों को फोन करते. मैजिक जैक के जरिए अमेरिका में बैठे लोगों के मोबाइल पर अमेरिका का नंबर ही प्रदर्शित होता था.

ये लोग अमेरिका के व्यक्ति को इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में टैक्स बकाया होने की बात कह कर गिरफ्तारी वारंट जारी होने की धमकी देते थे. फिर गिरफ्तारी से बचाने के लिए ये लोग उस अमेरिकी नागरिक से मोटी रकम वसूलते थे. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के मामले में ये लोग फरजी ईमेल करते थे.
मैजिक जैक एक हार्डवेयर है, जिसे कंप्यूटर से जोड़ा जाता है. इस के जरिए यह ऐप मोबाइल में डाउनलोड हो जाता है. ऐप डाउनलोड होने पर एक नंबर मिल जाता है.

अमेरिका के लोगों से बात करने के लिए ये लोग इस ऐप को डाउनलोड कर के यूनाइटेड स्टेट का नंबर ले लेते थे. इस से अमेरिका में काल होने पर अमेरिका का नंबर ही प्रदर्शित होता था. इस ऐप से फ्री इंटरनैशनल कालिंग हो सकती है.

डेटा बेचने वालों की कहानी भी हैरतंगेज है. नोएडा में एसटीएफ ने इसी साल मार्च महीने के आखिरी दिन फरजी कालसेंटरों को आम लोगों का डाटा बेचने वाले गिरोह के सरगना नंदन राव पटेल को गिरफ्तार किया.

वह बिहार के कैमूर जिले के भभुआ का रहने वाला था. एसटीएफ ने नंदन राव के पास से विभिन्न औनलाइन शौपिंग कंपनियों से संबंधित 14 लाख ग्राहकों का डेटा बरामद किया था. इस के अलावा कई मोबाइल फोन, 4 डेबिट कार्ड, 6 चैकबुक आदि भी बरामद की गईं. राव का गिरोह करीब 200 करोड़ रुपए की ठगी कर चुका है.

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नंदन राव ने एनिक वर्ल्ड नामक कंपनी खोल रखी है. वह इस कंपनी का डायरेक्टर है. यह कंपनी औनलाइन प्रमोशन, डिजिटल मार्केटिंग, वेबसाइट डेवलपमेंट व बल्क एसएमएस सुविधा उपलब्ध कराती है. नंदन राव ने कई शौपिंग कंपनियों के कर्मचारियों से सांठगांठ कर रखी थी.

राव का गिरोह औनलाइन शौपिंग करने वाले लोगों के डेटा इन कर्मचारियों के माध्यम से 3 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से खरीदता था. फिर वह इस डेटा को 5-6 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से फरजी कालसेंटरों को बेच देता था.

यह डेटा दिल्ली-एनसीआर सहित राजस्थान, बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र आदि राज्यों के कालसेंटरों को बेचा जाता था. भारत के अलावा वह सिंगापुर के कालसेंटर संचालकों को भी यह डेटा बेचता था. कालसेंटरों से विभिन्न माध्यमों से लोगों को झांसा दे कर उन के बैंक और डेबिट कार्ड की डिटेल्स हासिल कर ली जाती थी. इस के बाद उन के खाते से रकम ट्रांसफर कर ठगी की जाती थी.

गिरफ्तार नंदन राव ने एसटीएफ को पूछताछ में बताया था कि गिरोह कैश ट्रांजैक्शन के लिए बैंक कर्मचारियों के साथ मिल कर फरजी नामपते से खोले गए बैंक खाते किराए पर लेता था. मिलीभगत के कारण बैंक कर्मचारी अपना कमीशन काट कर खातों में जमा रकम निकलवा देते थे.
इसी तरह पेटीएम क्यूआर कोड, फोन पे, तेज और भीम ऐप पर भी किराए के एकाउंट ले कर उन में ठगी की रकम ट्रांसफर की जाती थी.

नंदन राव औनलाइन शौपिंग वेबसाइट फ्लिपकार्ट, अमेजन, मिंट्रा, पेटीएम, स्नैपडील जैसी 18 कंपनियों की वेबसाइट से एप्लीकेशन व साफ्टवेयर को हैक करवा कर भी उन के ग्राहकों का डेटा चोरी कराता था.
कुछ महीने पहले नोएडा में कालसेंटरों की धरपकड़ होने पर पुलिस से छिपने के लिए नंदन राव सिंगापुर चला गया था. बाद में वह वापस आ कर नोएडा से ही डेटा बेचने और खरीदने का काम करने लगा.

एसटीएफ ने उसे साइबर क्राइम थाना सैक्टर-36 नोएडा को सौंप दिया. पुलिस ने नंदन राव से बरामद मोबाइल व लैपटौप फोरैंसिक जांच के लिए भेज दिए.

उस के गिरोह के सदस्यों के नामपते पुलिस को मिल गए हैं. उन्हें पकड़ने की कोशिश की जा रही है. नंदन राव से उस के भारतीय और विदेशी ग्राहकों के बारे में पता लगाया जा रहा है. औनलाइन शौपिंग कंपनियों के उन कर्मचारियों का भी पता लगाया जा रहा है, जो ग्राहकों के डेटा चोरी कर नंदन को बेचते थे.
पिछले साल दुनिया की नामी सौफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसौफ्ट के नाम पर ठगी करने के मामले भी सामने आए थे. इस में कंपनी के अधिकारियों ने गुरुग्राम और नोएडा पुलिस में शिकायत की थी. पुलिस में जाने से पहले माइक्रोसौफ्ट कंपनी ने उपभोक्ताओं की शिकायत की जांच कराई थी. जांच में पता चला कि माइक्रोसौफ्ट का सौफ्टवेयर उपयोग करने वाले कंप्यूटर उपभोक्ताओं को उन के कंप्यूटर स्क्रीन पर वार्निंग का मैसेज भेजा जा रहा है. मैसेज में उन के कंप्यूटर में वायरस आने और इस का समाधान करवाने की बात कही जाती थी. इस के लिए माइक्रोसौफ्ट कंपनी का हेल्पलाइन नंबर भी दिया जाता था. जैसे ही उपभोक्ता इस नंबर पर संपर्क करता तो उस के कंप्यूटर को रिमोट पर ले लिया जाता था.

रिमोट लाइन से जोड़ते ही कालसेंटर में बैठे कर्मचारी उस कंप्यूटर से उपभोक्ता की निजी जानकारी निकाल लेते थे. फिर उस जानकारी को वापस करने के एवज में मोटी रकम की मांग की जाती थी.
नोएडा से कालसेंटरों के जरिए विदेशी नागरिकों के कंप्यूटर स्क्रीन पर पौपअप मैसेज भेजा जाता था. इस मैसेज को ऐसा बनाया जाता था कि यह वायरस की तरह लगता था. इस के बाद उसी मैसेज में दिए गए चैट औप्शन के जरिए लोगों से रकम मंगवाई जाती थी. माइक्रोसौफ्ट कंपनी की शिकायत पर गुरुग्राम पुलिस ने ऐसे 8 कालसेंटरों का भंडाफोड़ कर 8 लोगों को गिरफ्तार किया था. नोएडा पुलिस ने भी 9 कालसेंटरों का परदाफाश कर 27 लोगों को गिरफ्तार किया था.

राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से फरजी कालसेंटरों के संबंध में की गई छापेमारी के बाद जांचपड़ताल में यह बात उभर कर सामने आई कि इन का नेटवर्क यूएई से चल रहा था. यूएई में काम कर रहे गिरोह का नेटवर्क अमेरिका सहित कई देशों में है.

यह नेटवर्क अलगअलग गिरोह के लोग चला रहे हैं. ये लोग ठगी की रकम मंगाने के लिए भारत के बैंक एकाउंट नंबर नहीं देते. ये लोग अमेरिका के गेटवे से उसी देश के बैंक खातों में विदेशियों से रकम मंगवाते हैं, पीडि़त नागरिक जिस देश का रहने वाला होता है. अमेरिका व अन्य देशों के बैंक खातों में आई रकम 2 तरीकों से भारत में मंगवाई जाती है. एक तरीका यह है कि अमेरिका या अन्य देश के एजेंट उस रकम को पहले यूएई और फिर भारत भेजते हैं. दूसरा तरीका है हवाला के जरिए यह रकम दिल्ली पहुंचती है.

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पुलिस की जांच में सामने आया है कि भारत में ऐसे करीब 40 फरजी कालसेंटर अलगअलग शहरों में चल रहे हैं. इन कालसेंटरों के जरिए हर महीने 8 से 15 करोड़ रुपए तक की ठगी की जा रही है. हर 2-4 महीने में कुछ फरजी कालसेंटरों का भंडाफोड़ भी होता है. इस में सेंटर संचालक और कर्मचारी पकड़े जाते हैं.

कुछ दिन बाद ये लोग जमानत पर छूट कर फिर किसी दूसरे शहर में अपना ठिकाना बना कर कालसेंटर शुरू कर देते हैं. हर बार ये लोग विदेशियों से ठगी के नए तरीके अपनाते हैं. नोएडा को छोड़ कर बाकी उत्तर भारत में इन फरजी कालसेंटरों के संचालक गुजरात के रहने वाले लोग हैं.

ईद पार्टी के लिए ट्राई करें ये 5 मेकअप टिप्स

हर त्योहार या शादी में ब्यूटीफुल दिखना हर किसी की चाहत होती है, लेकिन वह खूबसूरत दिखने के साथ-साथ सिंपल भी दिखना चाहती हैं. ईद पर भी हर महिला सुंदर पर सिंपल दिखना चाहती है. मौसम के हिसाब से और खुद पर सूट करता हुआ मेकअप करना महिलाएं पसंद करती हैं, लेकिन जब बात गरमी के मौसम की हो तो चिलचिलाती धूप में टपकते पसीने की वजह से मेकअप को बचाए रखना सचमुच महिलाओं के लिए एक चुनौती होती है. जिसके लिए आज हम आपको कैसे ईद पर सिंपल मेकअप करके खुद को कैसे सजाएं…

1. समर में ट्राई करें ये मेकअप बेस टिप्स

किसी भी तरह के मेकअप की शुरुआत मेकअप बेस से होती है इसलिए समर मेकअप के लिए भी पहले मेकअप बेस तैयार किया जाता है. गरमी के मौसम में फाउंडेशन लगाने से चेहरा थोड़ा हैवी दिख सकता है. अत: फाउंडेशन की जगह कंसीलर का प्रयोग करें. यह चेहरे के दागधब्बों को मिटाता है और बेदाग खूबसूरती को सामने लाता है. अगर सिंपल दिखना है, तो लिक्विड कंसीलर का प्रयोग करें. ध्यान रहे चेहरे पर कंसीलर किसी ठंडी जगह ही लगाएं. इस से मेकअप करते समय पसीना नहीं आएगा और कंसीलर सही तरह लग जाएगा.

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2. समर में ड्राई कौंपैक्ट पाउडर का करें इस्तेमाल

कंसीलर लगाने के बाद नाक, चिन और जौ लाइंस के आसपास की त्वचा पर डस्ट वाला कौंपैक्ट पाउडर लगाएं. कौंपैक्ट पाउडर लगाते समय त्वचा को हलका सा स्ट्रैच कर लें. इससे कौंपैक्ट पाउडर पूरे चेहरे पर अच्छी तरह लग जाएगा. ज्यादा कौंपैक्ट पाउडर के इस्तेमाल से बचें क्योंकि यह चेहरे के पोर्स को बंद कर देता है.

3. पाउडरयुक्त ब्लशर का करें इस्तेमाल

गरमी के मौसम में पाउडरयुक्त ब्लशर का प्रयोग करें. ब्लशर लगाते समय अपनी स्किनटोन का ध्यान रखें. अपनी स्किनटोन के अनुसार गुलाबी या लाइट ब्राउन कलर का ब्लशर लगाएं. लाइट समर लुक के लिए मेकअप को बिलकुल सिंपल रखें. सिर्फ ऊपर के गालों पर ब्लशर लगाएं. चेहरे पर पाउडर वाला ब्लशर लगाएं. क्रीमयुक्त ब्लशर के प्रयोग से बचें, क्योंकि इसे लगाने से चेहरे पर जल्दी पसीना आता है.

4. लिपस्टिक के न्यूड कलर ही पसंद करें

होंठों को लिपलाइनर से आकार देकर मैट लिपस्टिक लगाएं. फिर इस के ऊपर लिप सीलर लगाएं. हलके और खिले हुए रंग इन दिनों काफी अच्छे लगेंगे, इसलिए न्यूड कलर ही पसंद करें. वैसे इस समर में नियौन कलर्स भी ट्रैंड में हैं. अत: आप अपनी ड्रैस से मैच करता हुआ कलर भी चुन सकती हैं. गरमी में होंठों से लिपस्टिक बहुत जल्दी उतर जाती है. अत: इसे देर तक टिकाए रखने के लिए आप होंठों पर प्राइमर प्रयोग कर सकती हैं. इस मौसम में लिपग्लौस न लगाएं, क्योंकि यह टिकाऊ नहीं होती है और फैल जाती हैं.

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5. डार्क काजल के इस्तेमाल से बचें

अगर आप मेकअप हलका कर रही हैं तो डार्क काजल के प्रयोग से बचें. खासकर दिन के समय हलका काजल ही लगाएं. अगर रात में किसी पार्टी या फंक्शन में जा रही हैं तो डार्क काजल लगा सकती हैं. अगर आप चाहती हैं कि आप का आईलाइनर व आईशैडो लंबे समय तक आंखों पर टिका रहे, तो इस के लिए आप वैक्सयुक्त आईशैडो प्राइमर यूज कर सकती हैं.

ध्यान रखें काजल लगाने से पहले आंखों के नीचे कौंपैक्ट पाउडर लगाएं, फिर काजल लगाएं, इस से काजल फैलेगा नहीं. आंखों में लिक्विड आईलाइनर का प्रयोग न करें. इस की जगह पैंसिल वाला आईलाइनर लगाएं.

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