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माया के अवसरवादी दांव में फंसें अखिलेश

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का महागठबंध टूटने की कगार पर
है़ं. बसपा प्रमुख मायावती ने अपना अवसरवादी दांव चलकर राजनीतिक उठापटक किया हैं. बसपा नेता
मायावती ने लोकसभा चुनाव में हार का ठिकरा समाजवादी पार्टी के उपर फोड़ दिया है. मायावती को कहना है कि यादव वोट महागठबंध को ट्रांसफर नहीं हुआ जिसकी वजह से उनकी हार हुई.
मायावती ने कहा कि यादव वोट शिवपाल यादव ने भाजपा को ट्रांसफर कर दिये जिससे भाजपा को उम्मीद से बड़ी जीत हासिल हो गई. उत्तर प्रदेश में विधनसभा के 11 उपचुनाव होने वाले हैं.
बसपा प्रमुख ने यह सभी चुनाव अकेले लड़ने की बात भी कही है.अपने स्वभाव के विपरीत मायावती ने व्यक्तिगत स्तर पर अखिलेश यादव की तारीफ करते कहा कि ‘अखिलेश और डिम्पल बहुत इज्जत
दी. हमारे रिश्ते कभी भी खत्म नहीं होंगे. हमारी राजनीतिक विवशता है. जिसकी वजह से यह फैसला
करना पडा. यादव वोट ट्रांसफर नहीं हुआ. यादवो ने अखिलेश से भितरघात किया. कन्नौज, फिरोजाबाद की हार सोचने योग्य है. वोट ट्रांसफर होता तो हार नहीं होती.

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समाजवादी पार्टी से बसपा के लाभ पर मायावती ने कहा कि ‘खुद नहीं जीत पाएं, तो हमारे लिए क्या किया होगा सोंचा जा सकता है. सपा के मजबूत धर्मेंद्र, अक्षय और डिम्पल चुनाव हारे गये. सपा को बहुत सीखने की जरूरत है. मायावती ने कहा कि हम आगे मिलकर चुनाव लड़ सकते है’. अखिलेश अपने लोगों को मिशनरी बनाएं तभी आगे साथ साथ चुनाव लड़ा जा सकता है. अभी उपचुनाव अलग लड़े़गे.’

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मायावती के इस फैसले को उत्तर प्रदेश के विधनसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है.
मायावती को लगता है कि 2022 के विधनसभा चुनाव में भाजपा को हराने में बसपा ही सफल होगी. ऐसे में मुस्लिम वर्ग का साथ बसपा को मिलेगा. अब अगर सपा को विधनसभा चुनाव बसपा के साथ
लड़ना है तो मायावती की शर्त पर चुनाव लडे. बसपा इस चुनाव में बराबर की हिस्सेदारी नहीं चाहती
है. उत्तर प्रदेश के 11 उपचुनाव अकेले लडकर मायावती अपनी ताकत को परखना भी चाहती है.

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मायावती ने बहुत चतुराई से हार को ठिकरा सपा और उसके यादव वोट बैंक पर डाल चुकी है.
हकीकत में दलित वर्ग भी कर्मकांड और पूजापाठ के नाम पर बसपा से अलग भाजपा के साथ खडा है.
मायावती इस बात को स्वीकार नहीं कर रही. 2014 से लेकर 2019 तक के हर चुनाव में बसपा को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है. 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा को 10 लोकसभा सीटे मिलने की
प्रमुख वजह गठबंध ही था.

Edited By- Neelesh Singh Sisodia

बेटे जुनैद और रानी मुखर्जी की दोस्ती से हैरान हुए आमिर खान, जानें क्यों

मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान ने सोशल मीडिया पर अपने बेटे की एक प्यारी सी तस्वीर शेयर की हैं. आपको बता दें, आज इनके बेटे जुनैद खान का बर्थडे है. इस तस्वीर में जुनैद के साथ रानी मुखर्जी भी हैं. आमिर ने  इस फोटो को शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा हैं  कि मैं हैरान हूं, वह रानी को खुश करने में किस तरह से कामयाब रहा… मैं कभी नहीं कर पाया! हैप्पी बर्थडे जुनसी.

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आपको बता दें, आमिर ने इस तस्वीर को इंस्टाग्राम और ट्विटर पर शेयर किया हैं. तस्वीर में जुनैद,  रानी मुखर्जी के बगल में खड़े हैं. दोनो काफी खुश लग रहे हैं. इस तस्वीर में रानी जुनैद की ओर देखकर मुस्कुराते हुए दिखाई दे रही हैं.

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बता दें कि आमिर खान ‘लाल सिंह चड्ढ़ा’ में नजर आने वाले हैं. इस फिल्म के निर्देशक अद्वैत चंदन हैं और निर्देशक अतुल कुलकर्णी हैं. यह फिल्म साल 1994 में आई हौलीवुड ब्लौकबस्टर ‘फौरेस्ट गम्प’ की रीमेक है.

‘बिग बौस 13’ में हो सकती है नेहा कक्कड़ के एक्स बौयफ्रेंड की एंट्री

कलर्स टीवी पर प्रसारित होने वाला रियल्टी शो ‘बिग बौस’ का तेरहवा सीजन शुरू होने वाला है. इस बार कौन-कौन हिस्सा लेगा, इसकी भी खबरें आने लगी हैं. आपको बता दें कि  हिमांश कोहली  इस शों में एंट्री कर सकते हैं. ये फिल्म ‘यारियां’ से बौलीवुड में डेब्यू कर चुके हैं.

फिल्म  स्वीटी वेड्स एनआरआई, रांची डायरीज और दिल जो न कह सका जैसी फिल्में कर चुके हैं. इसके अलावा वो फिल्म हमसे है लाइफ जैसा टीवी शो भी कर चुके हैं. लेकिन हिमांश को सबसे ज्यादा चर्चा मिली ब्रेकअप के किस्सों से.

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दरइसल हिमांश कुछ सालों से सिंगर नेहा कक्कड़ को डेट कर रहे थे. लेकिन कई दिनों पहले खबरे  आईं कि दोनों का रिश्ता टूट चुका है. इसके बाद खुद नेहा कक्कड़ ने भी ऐलान कर दिया कि हिमांश के साथ उनका ब्रेकअप हो गया है. इसके बाद नेहा काफी टूट गई थी. एक्स बौयफ्रेंड को यादकर  नेहा कक्कड़ रोईं भी थी. रिएलिटी शो के सेट से वीडियो वायरल हुआ था.

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अब हिमांश कोहली ‘बिग बौस 13’ में नजर आ सकते हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इन्हें भी इस टीवी रियल्टी शो में हिस्सा लेने का औफर दिया गया है. यह शो 29 सितंबर से प्रसारित हो सकता है.

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पाकिस्तान ने दिखाया दम, इंगलैंड हुआ बेदम

लगातार 11 वनडे मैच हारने वाली पाकिस्तान टीम ने अपने पहले मैच में वेस्टइंडीज के हाथ करारी हार झेली थी. और चूंकि इंगलैंड लगातार 17 बार रनों का पीछा करते हुए जीत चुकी थी इसलिए जब दूसरे मैच में पाकिस्तान के बल्लेबाज पहले बल्लेबाजी करने मैदान पर उतरे तब उन के मन में यही था कि बोर्ड पर इतने रन लगा दिए जाएं ताकि अंगरेजों को उन्हीं के घर में मात दी जा सके.

दूसरी ओर इंगलैंड की टीम ने टौस जीत कर पहले फील्डिंग इसलिए ली थी कि अगर उस के गेंदबाज कामयाब रहे तो वह भी पाकिस्तान को सस्ते में निबटा देगी और आसानी से मैच जीत कर अपने विजयी रथ को आगे बढ़ाएगी.

पर क्रिकेट को अनिश्चितताओं का खेल ऐसे ही नहीं कहा गया है. 3 जून को ट्रेंट ब्रिज के मैदान पर ऐसा ही कुछ हुआ. पाकिस्तान ने सधी शुरुआत की. इमाम उल हक और फकर जमान ने 14.1 ओवर में 82 रन की साझेदारी की. फकर जमान के आउट होने के बाद क्रीज पर आए बाबा आजम स्कोर को और आगे पहुंचाया. 111 के स्कोर पर इमाम उल हक के रूप में पाकिस्तान की दूसरी विकेट गिरी थी लेकिन पाकिस्तानियों की रन बनाने की रफ्तार कम न हुई. बाबा आजम और मोहम्मद हफीज ने उम्दा शॉट लगाते हुए इंगलैंड के गेंदबाजों पर दबाव बना दिया. 32वें ओवर की 5वीं गेंद पर जब बाबा आजम आउट हुए तब तक पाकिस्तान ने 199 बना लिए थे.

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मोहम्मद हफीज ने शानदार खेल दिखाते हुए 62 गेंदों पर 8 चौकों और 2 छक्कों की मदद से 84 रन बनाए. उन के अलावा कप्तान सरफराज अहमद ने भी 44 गेंदों पर 55 रन बनाए. पाकिस्तान की तरफ से 80 रन से ज्यादा की 3 साझेदारियां निभाई गईं. नतीजतन, पाकिस्तान ने 50 ओवर में 348 रन का विशाल स्कोर खड़ा कर दिया.

इतने बड़े स्कोर का पीछा करने मैदान पर उतरे इंगलैंड के बल्लेबाजों की शुरुआत खराब रही और 9 ओवर के अंदर उस के दोनों सलामी बल्लेबाज जेसन रौय (8) और जौनी बेयरस्टा (32) पविलियन में लौट चुके थे. कप्तान इयोन मार्गन (9) भी पता नहीं क्यों शुरू से दबाव में दिखे और मोहम्मद हफीज की गेंद पर बोल्ड हो गए. शोएब मलिक ने बेन स्टोक्स (13) को विकेट के पीछे कैच कराया.

जब स्कोर 4 विकेट पर 118 रन था तब जो रूट और जोस बटलर ने जिम्मेदारी संभाली और 5वें विकेट के लिए 130 रन जोड़े. इंगलैंड को आखिर के 20 ओवरों में 166 रन की दरकार थी. जो रूट अपने 15वें वनडे शतक तक 97 गेंदों का सामना करके पहुंचे, लेकिन इस के तुरंत बाद वे 107 के निजी स्कोर पर आउट हो गए. जोस बटलर ने मोहम्मद आमिर पर चौका लगा कर वनडे मैचों में अपना 9वां शतक पूरा किया, लेकिन वे भी 103 रन बना कर मोहम्मद आमिर की गेंद पर कैच आउट हो गए.

उस समय इंगलैंड को 33 गेंदों पर 61 रन की जरूरत थी पर कुछ समय के बाद वहाब रियाज ने मोईन अली (19) और क्रिस वोक्स (21) को लगातार गेंदों पर आउट कर के इंगलैंड की रहीसही उम्मीद भी खत्म कर दी. इस तरह वह 14 रन से यह मैच हार गया.

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जानें, सुबह में क्यों जरूरी है पानी पीना

सुबह में पानी पीना सेहत के लिए काफी लाभकारी होता है. इसके कई फायदे होते हैं. आम तौर पर लोग पानी को ले कर लापरवाह होते हैं. जिसके कारण शरीर में कई तरह की बीमारियां पैदा होती हैं. क्योंकि पूरे दिन हम अपनी जरूरत के हिसाब से पानी पीते रहते हैं. पर सोने के बाद शरीर में पानी नहीं जाता और सुबह तक हमें दोबारा से हाइड्रेट होने की जरूरत होती है. इस लिए जरूरी है कि सुबह में जागते ही पानी पी लें. इसके अलावा और भी कई जरूरी कारण हैं जिसके लिए सुबह उठते ही पानी पीना जरूरी है, इस लेख में हम उन कारणों पर बात करेंगे. तो आइए शुरू करें.

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  1. अच्छी होती है पाचन क्रिया

सुबह में जागते ही एक गिलास पानी पीने से पाचन क्रिया काफी अच्छी होती है. जानकारों का मानना है कि इससे पाचन क्रिया 1.5 घंटे तक 24 फीसदी बढ़ जाती है.

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2. गंदे पदार्थ होते हैं बाहर

किडनी खून में पाई जाने वाली गंदगी साफ करता है. और फिर उसे बाहर निकालता है. इसका प्रमुख कार्य खून की अशुद्धियों को दूर करना है. इस काम के लिए अत्यधिक मात्रा में तरल पदार्थ की जरूरत होती है. सुबह में पानी पीना परोक्ष रूप से आपके खून की अशुद्धियों को दूर करने का भी काम करता है.

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3. बढ़ती है शरीर की प्रतिरोधक क्षमता

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पानी आपके लसिका के ढांचे को अच्छा बनाए रखने के लिए जरूरी है. इससे आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रहती है.

4. त्वचा में रहती है नमी

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त्वचा को सुंदर बनाए रखने के लिए जरूरी है कि आप पर्याप्त मात्रा में पानी लें. इससे त्वचा में नमी बनी रहेगी जिससे वो कोमल और साफ दिखेंगी.

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5. अंदरूनी अंगों के लिए है फायदेमंद

दिन भर पर्याप्त मात्रा में पानी ना पीने से मलाशय अवशिष्ट पदार्थों से पानी सोख लेता है, जो शरीर के लिए ठीक नहीं है. अच्छे से पानी पीने से मलाशय सुचारू ढंग से काम करेगा.

4 टिप्स: देर तक टिकेगा आपका मेकअप

परमानैंट मेकअप के समय सौंदर्य प्रसाधनों का सही इस्तेमाल जहां आप की खूबसूरती बढ़ाता है, वहीं रोजरोज मेकअप करने में लगने वाला समय भी बचाता है.

चेहरे में सब से ज्यादा महत्त्वपूर्ण आंखें होती हैं और बड़ी-बड़ी आंखें किसी का भी ध्यान आकर्षित कर लेती हैं. घबराएं नहीं, छोटी आंखों को भी मेकअप के द्वारा बड़ा, खूबसूरत और आकर्षक बनाया जा सकता है. बस, निम्न मेकअप टिप्स की जानकारी होनी चाहिए:

  1. पर्मिंग किट: आजकल बाजार में रैडीमेड पर्मिंग किट मिलते हैं, जिन में पर्मिंग का पूरा सामान होता है. अलग से कुछ भी नहीं लेना होता है. इस में आंखों में लगाने के लिए दोनों आंखों के रोलर और 4 लोशन होते हैं. साथ में इयर बड्स व ग्लू भी लगाने के लिए होता है. पहला लोशन पिंक कलर, दूसरा व्हाइट, तीसरा यलो और चौथा ट्रांसपेरैंट लोशन होता है.

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यह लोशन आईलैशेज को परमानैंट कर्ल करता है, जिस से छोटी आंखें खूबसूरत और बड़ी दिखती हैं.

2.आईलैशेज पर्मिंग के प्रकार

आईलैशेज पर्मिंग टैंपरेरी और परमानैंट 2 तरीके से होती है.

टैंपरेरी तरीका: इस में आईलैशेज को कर्ल करने के लिए उन्हें आईलैशेज मशीन से कर्ल करते हैं. इस में आईलैशेज को मशीन में रख कर हलका सा दबाया जाता है. मगर यह कर्ल कुछ समय के लिए ही होता है. इस में बड़ी आईलैशेज अच्छी तरह से कर्ल हो जाती हैं और इस में ज्यादा समय भी नहीं लगता है. इसे जब चाहें तब कर सकती हैं.

परमानैंट तरीका: यह तरीका छोटी आईलैशेज के लिए बैस्ट है, क्योंकि इस से छोटी आईलैशेज में अच्छा कर्ल आता है. अगर आईलैशेज को रोजरोज मशीन से कर्ल करने से बचना है, तो परमानैंट तरीका एकदम सही है. इस में थोड़ा समय ज्यादा लगता है पर  आईलैशेज हमेशा के लिए कर्ल हो जाती हैं और वे देखने में बेहद खूबसूरत लगती हैं.

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कैसे करें आईलैशेज पर्मिंग

3. परमानैंट आईलैशेज पर्मिंग के लिए सब से पहले कौटन में ऐस्ट्रिंजैंट ले कर आईलैशेज को साफ करें. अगर आंखों के आसपास मेकअप लगा है तो उसे क्लींजिंग मिल्क से अच्छी तरह साफ कर फिर आईलैशेज को 2-3 बार ऐस्ट्रिंजैंट से साफ करें.

अब आंखें बंद कर के आईलैशेज के ऊपर जहां लाइनर लगाते हैं, वहां फिड से निकाल कर रोलर चिपकाएं. इस में ग्लू लगा होता है, जिस से चिपकाने में आसानी होती है. फिर उस रोलर के ऊपर इयर बड्स की सहायता से एक से दूसरे कोने तक ग्लू लगाएं. अब आईलैशेज को इसी रोलर के ग्लू पर इयर बड्स से चिपकाएं. आईलैशेज के 1-1 केश को चिपकाने के बाद लैशेज पर इयर बड्स की सहायता से नंबर वन यानी पिंक लोशन लगाएं. 10-10 मिनट के अंतराल में इसे

2 बार लगाएं. फिर 10 मिनट बाद व्हाइट लोशन लगाएं. इसे भी 2 बार और 10-10 मिनट के अंतराल पर लगाएं. ऐसे ही यलो लोशन लगाएं. सब से अंत में ट्रांसपेरैंट लोशन से आईलैशेज को साफ करें. यह एक क्लींजर लोशन होता है, जिस से आईलैशेज साफ होती हैं. अब धीरेधीरे रोलर पर से आईलैशेज के केशों को हटाएं और रोलर निकाल दें. इस प्रक्रिया में लगभग 1 घंटे का समय लगता है. इसे करने के बाद आंखों का मेकअप कर सकती हैं. इसे 1 महीने के बाद दोबारा किया जा सकता है.

परमानैंट मेकअप

4. परमानैंट मेकअप में परमानैंट रूप से लिपस्टिक, आईलाइनर और आईब्रोज बनवा सकती हैं. यह प्रक्रिया उन के लिए है, जो रोजरोज लिपस्टिक व लाइनर नहीं लगा सकती हैं, जिन की आईब्रोज हलकी हैं या फिर आईब्रो पर कोई कट का निशान है.

इस प्रक्रिया में मशीन में कलर डाल कर स्किन में लगाया जाता है. इस से कलर स्किन के अंदर जाता है और जल्दी हटता नहीं है. लाइट पिंक कलर मशीन में डाल कर मशीन से ही लिप एरिया पर लगाएं. ब्राउन या ब्लैक कलर मशीन में डाल कर आईब्रोज पर लगाएं और ब्लैक कलर से लाइनर लगाएं. यह जल्दी टूटता नहीं है.

मेकअप का तरीका: पहले चेहरे को क्लींजर से क्लीन करें. जिन की आईब्रोज नहीं हैं, उन की आईब्रोज पैंसिल से ड्रा करें. जिस जगह पर मशीन से कलर लगाना है उस एरिया पर प्रिलौक्स ट्यूब लगाएं. यह उस एरिया को नम कर के 15 मिनट तक स्किन को सुन्न कर देती है. इस से स्किन पर मशीन चलने पर दर्द नहीं होता है और आसानी से मेकअप किया जा सकता है.

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आईब्रोज बनाने के लिए ब्लैक या ब्राउन कलर मशीन में डालें. प्रिलौक्स ट्यूब स्किन पर लगा कर मशीन चलाएं और तुरंत कौटन को ठंडे पानी में डुबो कर उसे पोंछती जाएं. फिर उस पर सोफरामाइसिन ट्यूब लगा कर मसाज करें. यह कलर 15 साल तक रहेगा. ऐसा ही लिप एरिया पर करें. ऐसा करने से आप के लिप्स लंबे समय तक पिंक रहेंगे और आईब्रोज भी बनी रहेंगी.

5 टिप्स: इन कौस्मेटिक प्रोसिजर से पाएं ब्यूटीफुल स्किन

बिजी लाफस्टाइल में अपनी खूबसूरती को बरकरार रखने के लिए नए-नए तरीके आ गए हैं, जो हमारी स्किन को ब्यूटीफुल दिखाने के साथ-साथ यंग भी दिखाते हैं. एंटीएजिंग प्रोसीजर के जरिए न सिर्फ स्किन पर पड़ने वाले बढ़ती उम्र के प्रभाव को कम किया जा सकता है, बल्कि इससे एजिंग से स्किन पर होने वाले असर की मेन वजह पर भी टारगेट किया जाता है ताकि दोबारा एजिंग का प्रभाव न दिखे. आज हम आपको 10 कौस्मैटिक प्रोसीजर के बारे में बताएंगे जिसे अपनाकर आप यंग और ब्यूटिफुल स्किन को पा सकते हैं.

1. कैमिकल पील से हटाएं डैड सैल्स

चेहरे के ढलने व स्किन की चमक के लगातार कम होने की एक वजह डैड होते स्किन सैल्स भी हैं. ऐसे में कुछ खास किस्म के ट्रीटमैंट जैसे कि माइक्रोडर्माबे्रसन और कैमिकल पील्स के जरीए चेहरे के डैड सैल्स को हटाया जा सकता है. इस के अलावा डायमंड पौलिशिंग के जरीए भी डैड सैल्स, स्कार्स और टैनिंग को दूर किया जा सकता है.

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2. चेहरे के लिए मैसोबोटोक्स को अपनाएं

यह चेहरे के फेशियल का एक अलग तरीका है, जिस में चेहरे पर माइक्रोबोटोक्स इंजैक्ट कराए जाते हैं. इस में बोटोक्स के कम डोज फेस के अलगअलग हिस्सों में लगाए जाते हैं. इस से फेस की स्किन चमकदार और  झुर्रियांरहित नजर आती है.

3. फेस के पोर्स को टाइट कराने के लिए इस्तेमाल करें लेजर थेरैपी

अगर चेहरे के पोर्स फैल जाएं, तो ये आप के लुक को खराब कर देते हैं. ऐसे में लेजर थेरैपी के जरीए फेस के पोर्स को टाइट करा सकती हैं.

4. बोटोक्स ट्रीटमैंट से दूर करें एजिंग प्रौब्लम

बढ़ती उम्र के चलते माथे पर पड़ी लकीरें और झुर्रियां थकान, तनाव और उम्रदराज होने के संकेत देती नजर आती हैं. इन्हें बोटोक्स के जरीए आसानी से दूर किया जा सकता है. बोटुलिनम टौक्सिटी जिसे आमतौर पर बोटोक्स के नाम से जाना जाता है, एक ऐसा नौनसर्जिकल प्रोसीजर है, जिस में बोटोक्स को इंजैक्ट कर के मसल्स को रिलैक्स मोड पर लाया जाता है. इस प्रक्रिया द्वारा चेहरे की झुर्रियों और लकीरों को खत्म किया जाता है. जैसे ही मसल्स में बोटोक्स को इंजैक्ट किया जाता है, यह एक खास मसल को अन्य मसल्स के साथ कौंटैक्ट करने को रोक देता है. जिस मसल पर बोटोक्स का असर होता है वह रिलैक्स हो जाती है. इसे चेहरे के अलगअलग हिस्सों पर इंजैक्ट करा कर फेस को बिलकुल फ्रैश लुक दिया जाता है. बोटोक्स का इस्तेमाल ब्रो लिफ्ट के लिए भी किया जाता है. इस में कुछ ही मिनटों के अंदर आईब्रोज को हाईलाइट कर के आकर्षक शेप में बदला जा सकता है. इस से चेहरा बिलकुल नए लुक में नजर आता है.

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5. ओजोन थेरैपी से स्किन को करें रिपेयर

बालों की ग्रोथ और रिपेयर के लिए शरीर के किसी भी हिस्से में औक्सीजन के प्रवाह को ओजोन थेरैपी के नाम से जाना जाता है. औक्सीजन के ये फ्री रैडिकल्स शरीर में मौजूद हानिकारक तत्त्वों को शरीर से बाहर करने में सहायक होते हैं. ऐसे ही तत्त्व सिर की सतह पर भी होते हैं, जो ओजोन थेरैपी के जरीए सतह से बाहर निकल जाते हैं. इस थेरैपी के असर से बालों का गिरना पूरी तरह बंद हो जाता है और नए बाल उगने शुरू हो जाते हैं.

गुड़ का चीनी बन जाना

गुड़ अब पहले जैसा नहीं रहा. उस में मिलावट होने लगी है. वह अपना रंग छोड़ रहा है. उसे गोरेपन की क्रीम ने डस लिया है. सफेद हो चला है. इसलिए उस के औषधि गुण कम हो रहे हैं. पहले वह दवा के रूप में भी जाना जाता था. अब ट्रे में महंगी क्रौकरी में बैठा मुसकराता है. जमाना भी तो बदला है. पहले से कहा जाता रहा है, ‘गुरु गुड़, चेला शक्कर.’

आज का गुरु अब पहले जैसा नहीं रहा. एकदम बदल गया है. पहले वह गुड़ बन कर चेलों को शक्कर बनाता था, अब तो वह खुद ही शक्कर हो चला है. कैमिकल में नहा कर गोरा हो गया है और ड्राइंगरूम में पहुंच गया है. अब वह डली या ढेली में नहीं, बल्कि चम्मच से जाना जाता है.

पहले गुरु को गोविंद तक पहुंचने का जरिया माना जाता था. इसीलिए कबीर ने उसे गोविंद से बड़ा माना है. किताबों में तो आज भी यही लिखा है. कुछ लोग इसे शाश्वत सत्य मानते हैं. पर अब गुरु का काम गोविंद से मिलाना नहीं रहा, बल्कि आज का गोविंद ही गुरु को आदेश देता है, जाओ आदमी व औरत गिनो. जानवर गिनो. नालियां गिनो. शौचालय गिनो. मलेरिया की गोलियां बांटो. डेंगू की दवा बांटो. सैनिटरी नैपकिन बांटो. मैं जिसे कहूं उसे परीक्षा में पास करो. उसे टौपर बनाओ. और गुरु ‘जो हुक्म मेरे आका’ कह कर कोर्निश बजाता है.

गुरु अब सिर्फ सरकारी मुलाजिम ही नहीं रहा. चंदे की चाह में सरकार ने शिक्षा को पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया. गुरु सरस्वती छोड़ लक्ष्मी की वंदना करने लगा है. अब वह कौर्पोरेट गोविंद के दरबार का सैल्समैन है. उस का काम शिक्षा बेचने के लिए ग्राहकों को पकड़ना है. कौर्पोरेट गोविंद उसे ग्राहकों का टारगेट देता है. हर ग्राहक पर उसे कमीशन मिलता है और वह उसे पूरा करने में जुट जाता है. जैसे, सरकारी शिक्षक ज्ञान देने के बजाय जानवर, नालियां और शौचालय ढूंढ़ता फिरता है.

गुरु आजकल एकदो पट्ठों को अपना असिस्टैंट सेल्सपर्सन बनाता है और उन्हें टारगेट बांट देता है. चूंकि वह शिक्षा अंडरवर्ल्ड जगत का जरा सा कण है, इसलिए महल्लों का सर्वे करवाता है, रिपोर्ट बनाता है और लैपटौप पर बौस को प्रेजैंटेशन देता है. टारगेट पूरा होने पर उसे एक साल का ऐक्सटैंशन मिलता है. अगले साल का अलग टारगेट. जैसा, आज के फाइवसेवन स्टार अस्पतालों में डाक्टरों का टारगेट और भविष्य मरीजों की संख्या व मरीज को अस्पताल में रोके रखने पर तय होता है.

आज कबीर होते तो लिखते, ‘गुंडे गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय.’ गुरु आज न तो ब्रह्मा रहा है न विष्णु रहा है और न ही कोई अन्य देव. उसे गोविंद तक पहुंचने के लिए गुंडों की जरूरत पड़ने लगी है. लेकिन गोविंद भी तो अब पहले जैसे कहां रह  गए हैं? उसे गुरु की जरूरत नहीं रही. उसे तो बिना तर्क लगाए मुंडी हिलाने वाले बैल चाहिए. मध्य प्रदेश को ही लें. पशुपतिनाथ के गांव में हाल ही में गुरु ने समय की आहट पहचान कर गुंडे के पैर पड़े और चेलेगीरी का मान बढ़ाया. अपनी तत्काल बुद्धि की तारीफ कर कहा, ‘बलिहारी गुंडेजी आप की, नौकरी दी बचाए.’

शिक्षक दिवस पर शिष्यों से पैर पड़वाने और पादपूजन करवाने वाले गुरुओं की देशभर की गुरु मंडलियों ने नौकरी को विद्या से बड़ी बताने वाले गुरु को खामोश बधाइयां दीं. उन्होंने मराठी कहावत की याद दिलाई कि वक्त पड़ने पर गधे के भी पैर पड़ना चाहिए. गुरु जगत पैर पड़ने के लिए गधे ढूंढ़ रहा है. एक ढूंढ़ो, हजार मिलते हैं.

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कुछ साल पहले मध्य प्रदेश के ही सांदीपनि आश्रम वाले शहर में चेलों ने गुरु की जम कर ‘पूजा’ की और उस की जान ले कर विजय पर्व मनाया. चूंकि विजेता सरकारी छात्र एजेंसी के वीर थे, इसलिए जांच में गुरु को बीमार बता कर चेलों को क्लीन चिट दी गई. सरकार को भी तो अपनी गद्दी बचानी थी.

विक्रमादित्य के न्याय के नाम पर अपनी मूंछें ऐंठने वाले अपना मुंडन करवा कर सूतक में बैठ गए. अब गुरु ने ज्ञान को झाड़ू मार कर कोने में कर दिया है. जब नौकरी ही नहीं रहेगी तो ज्ञान किस काम का? उस दिन गुरु ने चेले की चरणपूजा की, अच्छा किया. कब तक ज्ञान देने वाले बने रहेंगे? नए जमाने से कुछ सीखना चाहिए ना. कब तक गुरुब्रह्मा रटाते रहेंगे?

आज गुरु के चरणों में ज्ञान नहीं रहा. उस के तो दिमाग में भी नहीं है. अब नई गुरुशिष्य परंपरा पनपेगी. गुरु अपने शिष्य के पैर पड़ेगा. हो सकता है पैर धोए भी. शुरुआत हो चुकी है. गुरु बदल गया है. सचमुच.      ऐसा भी होता है.

मेरे घर के सामने एक बुजुर्ग महिला रहती हैं. एक दिन वे अपने दरवाजे पर खड़ी थीं कि एक टैंपो वाले ने एक कुत्ते को ठोकर मार दी. टैंपो वाला चला गया. उस कुत्ते के पैर में चोट लग गई थी. सो, वह चलफिर नहीं पा रहा था.

बुजुर्ग महिला ने कुत्ते को पानी पिलाया. उस के घाव को धोया और साफ कर के दवा लगा दी. अब वे सुबहशाम कुत्ते को रोटी देतीं तथा समयसमय पर घाव पर दवा भी लगा देतीं.

एक हफ्ते बाद उन का लड़का मुंबई से उन के पास आया. लड़का बहुत ही बीमार था. 15 दिनों से बुखार आ रहा था. सो, लड़का इलाज व उचित देखरेख के लिए अपनी मां के पास आया. उन बुजुर्ग महिला ने बेटे को डाक्टर को दिखाया. लड़के के मर्ज की जांच करवाई और दवा आदि की व्यवस्था की. बेटा उन की देखरेख में ठीक होने लगा.

एक महीने बाद लड़का ठीक हो गया और वापस नौकरी पर जाने लगा. कुत्ता भी ठीक हो कर चलनेफिरने लगा. कुत्ता तो उन बुजुर्ग महिला का पालतू हो गया और उन्हीं के दरवाजे पर बैठा रहता. लड़का जो ठीक हो कर मुंबई गया तो मां का हालचाल पूछना तो दूर, उस ने अपना हालचाल भी देने का कष्ट नहीं किया. यह देख कर लगता है जानवर इंसान से बेहतर है.   उपमा मिश्रा (सर्वश्रेष्ठ)

हमारी ननद नेहा को शारीरिक रूप से जब भी कोई दिक्कत होती, तो उन के पति, यह कह कर गांव से शहर हमारे पास मायके छोड़ जाते कि गांव में उचित इलाज संभव नहीं.

एक बार दीदी अपने पति और ससुर के साथ आईं. चायनाश्ते के बाद दीदी के ससुर बोले, ‘‘नेहा, घर में कुछ काम नहीं करवा पाती, बीमार रहती है. परिवार बड़ा होने के कारण आनाजाना लगा रहता है. गांव में उचित इलाज न होने के कारण हम नेहा को कुछ दिनों के लिए यहीं छोड़ कर जा रहे हैं. जब यह ठीक हो जाए, बता देना, हम ले जाएंगे.’’

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यह सुन कर मेरी आंखों में आंसू आ गए. घर के सब लोग शांत खड़े रहे. उन की नजर में औरत जब तक स्वस्थ है, घर का काम करने के लायक है, तभी तक वह ससुराल में रहने के काबिल है.

प्रीति गुप्ता

मां, मां होती हैं

उस दिन सोशल नैटवर्किंग साइट पर जन्मदिन का केक काटती हुई प्रज्ञा और कुसुम का अपनी मां के साथ फोटो देख कर मुझे बड़ा सुकून मिला. नीचे फटाफट कमैंट डाल दिया मैं ने, ‘‘आंटी को स्वस्थ देख कर बहुत

अच्छा लगा.’’

सालभर पहले कुसुम अपने पति के लखनऊ से दिल्ली स्थानांतरण के समय जिस प्रकार अपनी मां को ऐंबुलैंस में ले कर गई थी, उसे देख कर तो यही लग रहा था कि वे माह या 2 माह से ज्यादा नहीं बचेंगी. दिल्ली में उस की बड़ी बहन प्रज्ञा पहले से अपनी ससुराल वालों के साथ पुश्तैनी घर में रह कर अपनी गृहस्थी संभाल रही थी. जब कुसुम के पति का भी दिल्ली का ट्रांसफर और्डर आया तो 6 माह से बिस्तर पर पड़ी मां को ले कर वह भी चल पड़ी. यहां लखनऊ में अपनी 2 छोटी बेटियों के साथ बीमार मां की जिम्मेदारी वह अकेले कैसे उठाती. बड़ी बहन का भी बारबार छुट्टी ले कर लखनऊ आना मुश्किल हो रहा था.

प्रज्ञा और कुसुम दोनों जब हमारे घर के बगल में खाली पड़े प्लौट में मकान बनवाने आईं तभी उन से परिचय हुआ था. उन के पिता का निधन हुए तब 2 वर्ष हो गए थे. उन की मां हमारे ही घर बैठ कर बरामदे से मजदूरों को देखा करतीं और शाम को पास ही में अपने किराए के मकान में लौट जातीं. वे अकसर अपने पति को याद कर रो पड़तीं. उन्हीं से पता चला था कि बड़ी बेटी प्रज्ञा 12वीं में और छोटी बेटी कुसुम छठवीं कक्षा में ही थी जब उन के पति को दिल का दौरा पड़ा. जिसे वे एंग्जाइटी समझ कर रातभर घरेलू उपचार करती रहीं और सुबह तक सही उपचार के अभाव में उन की मौत हो गई.

वे हमेशा अपने को कोसती रहतीं, कहतीं, ‘प्रज्ञा को अपने पिता की जगह सरकारी क्लर्क की नौकरी मिल गई है, उस का समय तो अच्छा ही रहा. पहले पिता की लाड़ली रही, अब पिता की नौकरी पा गई. छोटी कुसुम ने क्या सुख देखा? उस के सिर से पिता का साया ही उठ गया है.’

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दरअसल, अंकल बहुत खर्चीले स्वभाव के थे. महंगे कपड़े, बढि़या खाना और घूमनेफिरने के शौकीन. इसीलिए फंड के रुपयों के अलावा बचत के नाम पर बीमा की रकम तक न थी.

प्रज्ञा हमेशा कहती, ‘मैं ही इस का पिता हूं. मैं इस की पूरी जिम्मेदारी लेती हूं. इस को भी अपने पैरों पर खड़ा करूंगी.’

आंटी तुनक पड़तीं, ‘कहने की बातें हैं बस. कल जब तुम्हारी शादी हो जाएगी, तो तुम्हारी तनख्वाह पर तुम्हारे पति का हक हो जाएगा.’

किसी तरह से 2 कमरे, रसोई का सैट बना कर वे रहने आ गए. अपनी मां की पैंशन प्रज्ञा ने बैंक में जमा करनी शुरू कर दी और उस की तनख्वाह से ही घर चलता. उस पर भी आंटी उसे धौंस देना न भूलतीं, ‘अपने पापा की जगह तुझे मिल गई है. कल को अपनी ससुराल चली जाएगी, फिर हमारा क्या होगा? तेरे पापा तो खाने में इतनी तरह के व्यंजन बनवाते थे. यह खाना मुझ से न खाया जाएगा.’ और भी न जाने क्याक्या बड़बड़ाते हुए दिन गुजार देतीं.

कुसुम सारे घर, बाहर के काम देखती. साथ ही अपनी पढ़ाई भी करती. बड़ी बहन सुबह का नाश्ता बना कर रख जाती, फिर शाम को ही घर लौट कर आती. वह रास्ते से कुछ न कुछ घरेलू सामान ले कर ही आती.

दोनों बहनें अपने स्तर पर कड़ी मेहनत करतीं, पर आंटी की झुंझलाहट बढ़ती ही जा रही थी. कभी पति, तो कभी अपना मनपसंद खाना, तरहतरह के आचार, पापड़, बडि़यां सब घर में ही तैयार करवातीं.

छुट्टी के दिन दोनों बहनें आचार, पापड़, बडि़यां धूप में डालती दिख जातीं. मेरे पूछने पर बोल पड़तीं, ‘पापा खाने के शौकीन थे तभी से मां को भी यही सब खाने की आदत हो गई है. न बनाओ, तो बोल पड़ती हैं, ‘जितना राजपाट था मेरा, तेरे पिता के साथ ही चला गया. अब तो तुम्हारे राज में सूखी रोटियां ही खानी पड़ रही हैं.’

उन दोनों बहनों को दिनरात मेहनत करते देख बहुत दुख भी होता. समय गुजरता गया, जल्द ही छोटी बहन की एमए की शिक्षा पूरी हो गई. प्रज्ञा 30 साल की हो गई. जब आंटी पर चारों तरफ से दबाव पड़ने लगा कि ‘प्रज्ञा की शादी कब करोगी?’ तो उन्होंने उलटा लोगों से ही कह दिया, ‘मैं अकेली औरत कहां जाऊंगी, तुम लोग ही कहीं देखभाल कर रिश्ता बता देना.’

दरअसल, उन्हें बेटियों की शादी की कोई जल्दी नहीं थी जबकि दोनों बेटियां विवाहयोग्य हो गई थीं. ज्यादातर रिश्ते इसी बात पर टूट जाते कि पिता नहीं, भाई भी नहीं, कौन मां की जिम्मेदारी जिंदगीभर उठाएगा. आखिर, प्रज्ञा की शादी तय हो ही गई.

पता चला कि लड़का बेरोजगार है और यों ही छोटेमोटे बिजली के काम कर के अपना खर्चा चलाता है. महेश का परिवार दिल्ली के पुराने रईस लोगों में से एक था, 4 बड़े भाई थे, सभी अच्छे पद पर नियुक्त थे. सो, सब से छोटे भाई के लिए कमाऊ पत्नी ला कर उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया.

महेश अब घरजमाई बन कर रहने लखनऊ आ गया. आंटी का बहुत खयाल रखता. मगर आंटी उसे ताना मारने से न चूकतीं. कुसुम ने प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना और घर में ट्यूशन ले कर घरखर्च में योगदान देना शुरू कर दिया था.

नवविवाहितों को 2 कमरों के घर में कोई एकांत नहीं मिल पाता था, ऊपर से मां की बेतुकी बातें भी सुननी पड़तीं. प्रज्ञा ने कभी भी इस बात को ले कर कोई शिकायत नहीं की, बल्कि वह जल्द से जल्द कुसुम के रिश्ते के लिए प्रयासरत हो उठी.

अपनी ससुराल की रिश्तेदारी में ही प्रज्ञा ने कुसुम का रिश्ता तय कर दिया. रमेश सरकारी दफ्तर में क्लर्क था और उस के घर में बीमार पिता के अलावा और कोई जिम्मेदारी नहीं थी. उस से बड़ी 2 बहनें थीं और दोनों ही दूसरे शहरों में विवाहित थीं. कुसुम की विदाई लखनऊ में ही दूसरे छोर में हो गई. सभी ने प्रज्ञा को बहुत बधाइयां दीं कि उस ने अपनी जिम्मेदारियों को बहुत ही अच्छे ढंग से निभाया.

अब आंटी का दिलोदिमाग कुसुम के विवाह की चिंता से मुक्त हो गया था. कोई उद्देश्य जिंदगी में बाकी नहीं रहने से उन के खाली दिमाग में झुंझलाहट बढ़ने लगी थी. वे अकसर अपने दामाद महेश से उलझ पड़तीं. बेचारी प्रज्ञा औफिस से थकीमांदी आती और घर पहुंच कर सासदामाद का झगड़ा निबटाती.

धीरेधीरे आंटी को सफाई का मीनिया चढ़ता ही जा रहा था. अब वे घंटों बाथरूम को रगड़ कर चमकातीं. दिन में 2 से 3 बार स्नान करने लगतीं. अपने कपड़ों को किसी के छू लेने भर से दोबारा धोतीं. अपनी कुरसी, अपने तख्त पर किसी को हाथ भी धरने न देतीं.

वे अपने खोल में सिमटती जा रही थीं. पहले अपने भोजन के बरतन अलग किए, फिर स्नानघर के बालटीमग

भी नए ला कर अपने तख्त के नीचे

रख लिए.

प्रज्ञा के पूछने पर बोलीं, ‘मेरा सामान कोई छुए तो मुझे बहुत घिन आती है, बारबार मांजना पड़ता है. अब मैं ने अपने इस्तेमाल का सारा सामान अलग कर लिया है. अब तुम लोग इसे हाथ भी मत लगाना.’ प्रज्ञा को अपने पति महेश के समक्ष शर्मिंदगी उठानी पड़ती. हर समय घर में शोर मचा रहता, ‘बिना नहाए यह न करो, वह न करो, मेरी चीजों को न छुओ, मेरे वस्त्रों से दूर रहो’ आदिआदि.

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दामाद तानाशाही से जब ऊब जाता तो 2-4 दिनों को अपने घरपरिवार, जोकि दिल्ली में था, से मिलने को चल देता. प्रज्ञा अपनी मां को समझाए या पति को, समझ न पाती. किसी तरह अपनी गृहस्थी बचाने की कोशिश में जुटी रहती. इन 4 सालों में वह 2 बच्चों की मां बन गई. खर्चे बढ़ने लगे थे और मां अपनी पैंशन का एक पैसा खर्च करना नहीं चाहतीं. वे उलटा उन दोनों को सुनाती रहतीं, ‘यह तनख्वाह जो प्रज्ञा को मिलती है अपने बाप की जगह पर मिलती है.’ उन का सीधा मतलब होता कि उन्हें पैसे की धौंस न देना.

आंटी आएदिन अपने मायके वालों को दावत देने को तैयार रहतीं. वे खुद भी बहुत चटोरी थीं, इसीलिए लोगों को घर बुला कर दावत करातीं. जब भी उन्हें पता चलता कि इलाहाबाद से उन के भाई या बनारस से बहन लखनऊ किसी शादी में शामिल हो रहे हैं तो तुरंत अपने घर पर खाने, रुकने का निमंत्रण देने को तैयार हो जातीं.

घर में जगह कम होने की वजह से जो भी आता, भोजन के पश्चात रुकने के लिए दूसरी जगह चला जाता. मगर उस के लिए उत्तम भोजन का प्रबंध करने में प्रज्ञा के बजट पर बुरा असर पड़ता. वह मां को लाख समझाती, ‘देखो मम्मी, मामा, मौसी लोग तो संपन्न हैं. वे अपने घर में क्या खाते हैं क्या नहीं, हमें इस बात से कोई मतलब नहीं है. मगर वे हमारे घर आए हैं तो जो हम खाते हैं वही तो खिलाएंगे. वैसे भी हमारी परेशानियों में किस ने आर्थिक रूप से कुछ मदद की है जो उन के स्वागत में हम पलकपांवड़े बिछा दें.’ लेकिन आंटी के कानों में जूं न रेंगती. उन्हें अपनी झूठी शान और अपनी जीभ के स्वाद से समझौता करना पसंद नहीं था.

आंटी को आंखों से कम दिखने लगा था. एक दिन रिकशे से उतर कर भीतर आ रही थीं, तो पत्थर से ठोकर खा कर गिर पड़ीं. अब तो अंधेरा होते ही उन का हाथ पकड़ कर अंदरबाहर करना पड़ता. अब उन्होंने एक नया नाटक सीख लिया. दिनरात टौर्च जला कर घूमतीं. प्रज्ञा अपने कमरे में ही अपने छोटे बच्चों को भी सुलाती क्योंकि उस की मां तो अपने कमरे में बच्चों को घुसने भी न देतीं, अपने तख्त पर सुलाना तो दूर की बात थी. आंटी को फिर भी चैन न पड़ता. रात में उन के कमरे का दरवाजा खटका कर कभी दवा पूछतीं तो कभी पानी मांगतीं.

आंटी के कमरे की बगल में ही रसोईघर है, मगर रसोईघर से पानी लेना छोड़, वे प्रज्ञा और महेश को डिस्टर्ब करतीं. ऐसा वे उस दिन जरूर करतीं जब उन्हें उन के कमरे से हंसीमजाक की आवाज सुनाई देती. प्रज्ञा अपनी मां को क्या कहती, लेकिन महेश का मूड औफ हो जाता. आंटी उन की शादीशुदा जिंदगी में सेंध लगाने लगी थीं. इस बीच आंटी की दोनों आंखों के मोतियांबिंद के औपरेशन भी हुए. उस समय भी दोनों पतिपत्नी ने पूरा खयाल रखा. फिर भी आंटी का असंतोष बढ़ता ही गया.

उधर, कुसुम के बीमार ससुर जब चल बसे तब जा कर उस के मायके  के फेरे बढ़ने लगे. ऐसे में आंटी कुसुम से, प्रज्ञा की खूब बुराई करतीं और अपना रोना रोतीं, ‘वे दोनों अपने कमरे में मग्न रहते हैं. मेरा कोई ध्यान नहीं रखता. मेरी दोनों आंखें फूट गई हैं.’ कुसुम समझाबुझा कर चली जाती. इधर महेश का मन ऊबने लगा था. एक तो उस की आमदनी व काम में कोई इजाफा नहीं हो रहा था, ऊपर से सास के नखरे. प्रज्ञा और उस के बीच झगड़े बढ़ने लगे थे. प्रज्ञा न तो मां को छोड़ सकती थी, न ही पति को. दोनों की बातें सुन वह चुप रहती.

प्रज्ञा का प्रमोशन और ट्रांसफर जब दिल्ली हो गया तो उस ने चैन की सांस ली और अपनी मां से भी दिल्ली चलने को कहा तो उन्होंने साफ मना कर दिया. वे अपनी सत्संग मंडली छोड़ कर कहीं जाना नहीं चाहती थीं. प्रज्ञा के खर्चे दिनोंदिन बढ़ ही रहे थे. महेश की कोई निश्चित आमदनी नहीं थी. प्रज्ञा ने कुसुम को बुलाया कि वह मां को समझाबुझा कर साथ में दिल्ली चलने को तैयार करे. मगर वे अपना घर छोड़ने को तैयार ही न हुईं. अंत में यह फैसला हुआ कि प्रज्ञा अपने परिवार के साथ दिल्ली चली जाए और कुसुम अपने पति के साथ मायके रहने आ जाएगी. अपनी ससुराल के एक हिस्से को कुसुम ने किराए पर चढ़ा दिया और अपनी मां के संग रहने को चली आई. आखिर वे दोनों अपनी मां को अकेले कैसे छोड़ देतीं, वह भी 70 साल की उम्र में.

कुसुम मायके में रहने आ गई. किंतु अभी तक तो वह मां से प्रज्ञा की ढेरों बुराइयों को सुन दीदी, जीजाजी को गलत समझती थी. अब जब ऊंट पहाड़ के नीचे आया तो उसे पता चला कि उस की मां दूसरों को कितना परेशान करती हैं. उस की 2 छोटी बेटियां भी थीं और घर में केवल 2 ही कमरे, इसीलिए वह अपनी बेटियों को मां के साथ सुलाने लगी.

मां को यह मंजूर नहीं था, कहने लगीं, ‘प्रज्ञा के बच्चे उस के साथ ही उस के कमरे में सोते थे, मैं किसी को अपने साथ नहीं सुला सकती.’ कुसुम ने 2 फोल्ंिडग चारपाई बिछा कर अपनी बेटियों के सोने का इंतजाम कर दिया और बोली, ‘पति को, बच्चों को अपने संग सुलाना पसंद नहीं है. और अगर कोई तुम्हारा सामान छुएगा तो मैं घर में ही हूं, जितनी बार कहोगी मैं उतनी बार धो कर साफ कर दूंगी.’ उस की मां इस पर क्या जवाब देतीं.

आंटी प्रज्ञा को तो अनुकंपा नौकरी के कारण खरीखोटी सुना देती थीं, मगर कुसुम से जब पैसों को ले कर बहस होती तो उस के सामने पासबुक और चैकबुक ले कर खड़ी हो जातीं और पूछतीं, ‘कितना खर्चा हो गया तेरा, बोल, अभी चैक काट कर देती हूं.’ कुसुम उन का नाटक देख वहां से हट जाती.

प्रज्ञा तो अपनी जौब की वजह से शाम को ही घर आती थी और घर में बच्चे महेश के संग रहते थे. शाम को थकीहारी लौटने के बाद किसी किस्म की बहस या तनाव से बचना चाहती. सो, वह अपनी मां की हर बात को सुन कर, उन्हें शांत रखने की कोशिश करती. मगर कुसुम घरेलू महिला होने के कारण दिनभर मां की गतिविधियों पर नजर रखती. वह आंटी की गलत बातों का तुरंत विरोध करती. आंटी ने प्रज्ञा को परेशान करने के लिए जो नाटक शुरू किए थे, अब वे उन की आदत और सनक में बदल चुके थे.

कुछ दिन तो आंटी शांत रहीं, मगर फिर कुसुम के सुखी गृहस्थ जीवन में आग लगाने में जुट गईं. कुसुम रात में आंटी को दवा खिला व सिरहाने पानी रख और अपनी बेटियों को सुला कर ही अपने कमरे में जाती. लेकिन आंटी को कहां चैन पड़ता. रात में टौर्च जला कर पूरे घर में घूमतीं. कभी अचानक ही दरवाजा खटका देतीं और अंदर घुस कर टौर्च से इधरउधर रोशनी फेंकतीं. उन से पूछो, तो कहतीं, ‘मुझे कहां दिखता हैं, मैं तो इसे रसोईघर समझ रही थी.’

रमेश को अपनी निजी जिंदगी में

दखलंदाजी बिलकुल पसंद नहीं थी.

अपनी बीवी के कहने से वह यहां रहने तो आ गया था मगर उस का छोटे से घर में दम घुटता था. साथ ही, उसे दिनभर सास के सौ नखरे सुनने को मिलते ही, रात में भी वे उन्हें चैन से सोने न देतीं. कुसुम मां को छोड़ नहीं सकती थी और प्रज्ञा से भी क्या कहती. अब तक वह ही तो इतने वर्षो तक मां को संभाले रही थी.

दोनों बहनों में केवल फोन से ही बातें होतीं. कुसुम मां की खाने की फरमाइशें देख कर हैरान हो जाती. अगर कुछ कहो तो मां वही पुराना राग अलापतीं, ‘तुम्हारे पापा होते तो आज मेरी यह गत न होती.’ यह सब सुन कर वह भी चुप हो जाती. मगर रमेश उबलने लगा था. उस ने पीना शुरू कर दिया. अकसर देररात गए घर आता और बिस्तर पर गिरते ही सो जाता.

कुसुम कुछ समझानाबुझाना चाहती भी, तो वह अनसुना कर जाता. दोनों के बीच का तनाव बढ़ने लगा था. मगर आंटी को सिर्फ समय से अपनी सफाई, पूजा, सत्संग और भोजन से मतलब था. इन में कोई कमी हो जाए, तो चीखचीख कर वे घर सिर पर उठा लेतीं. अब हर वक्त प्रज्ञा को याद करतीं कि वह ऐसा करती थी, महेश मेरी कितनी सेवा करता था आदिआदि.

यह सब सुन कर रमेश का खून खौल जाता. असल में महेश अपने भाइयों में सब से छोटा होने के कारण सब की डांट सुनने का आदी था. लेकिन रमेश 2 बहनों का एकलौता भाई होने के कारण लाड़ला पुत्र था. उस के बरदाश्त की सीमा जब खत्म हो गई तो एक रात वह वापस घर ही नहीं आया.

सब जगह फोन कर कुसुम हाथ पर हाथ धर कर बैठ गई. सुबह ननद

का फोन आया कि वह हमारे घर में

है. कानपुर से लखनऊ की दूरी महज

2-3 घंटे की तो है, सारी रात वह कहां था? इस का कोई जवाब ननद के पास भी नहीं था. फिर तो वह हर 15 दिन में बिना बताए गायब हो जाता और पूछने पर तलाक की धमकी देने लगा. कभी कहता, ‘कौन सा सुख है इस शादी से, अंधी लड़ाका सास और बेवकूफ बीवी, न दिन में चैन न रात में.’

कुसुम के शादीशुदा जीवन में तलाक की काली छाया मंडराने लगी थी. वह अकसर मेरे सामने रो पड़ती. आंटी किसी की बात सुनने को तैयार ही नहीं थीं. उस दिन उन की चीखपुकार सुन कर मैं उन से मिलने चली गई. पता चला कुसुम की छोटी बेटी रिनी की गेंद उछल कर उन के कमरे में चली गई. बस, इतने में ही उन्होंने घर सिर पर ले रखा था. पूरा कमरा धोया गया. दरवाजे, खिड़की, परदे, चादर सब धुलने के बाद ही उन्हें संतुष्टि हुई.

कुसुम ने बताया, ‘वह अपनी बेटियों को सिर्फ सोते समय ही मां के कमरे में ले जाती है. बाकी समय वह अपना कमरा बंद कर बैठी रहती है ताकि रिनी और मिनी उन के सामान को हाथ न लगा सकें. वैसे, मिनी 6 साल की हो गई है और बहुत समझदार भी है. वह दिन में तो स्कूल चली जाती है और शाम को दूसरे कमरे में ही बैठ कर अपना होमवर्क करती है, या फिर बाहर ही खेलती रहती है. लेकिन रिनी थोड़ी शैतान है. उसे नानी का बंद कमरा बहुत आकर्षित करता है. वह उस में घुसने के मौके तलाश करती रहती है.

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‘रिनी दिनभर घर में ही रहती है और स्कूल भी नहीं जाती है. आज जब मां रसोई तक उठ कर गईं तो दरवाजा खुला रह गया. रिनी ने अपनी गेंद उछाल कर नानी के कमरे में डाल दी. फिर भाग कर उठाने चली गई. क्या कहूं इसे? 3 साल की छोटी बच्ची से ऐसा क्या अपराध हो गया जो मेरी मां ने हम दोनों को इतने कटु वचन सुना दिए.’

तभी आंटी कमरे से निकल कर मुझ से उलझ पड़ीं, ‘तुम्हारी मां ने तो तुम लोगों को कोई साफसफाई सिखाई नहीं है. मैं ने प्रज्ञा और कुसुम को कैसे काम सिखाया, मैं ही जानती हूं. मगर अपनी औलादों को यह कुछ न सिखा सकी. मैं मर क्यों नहीं जाती. क्या यही दिन देखने बाकी रह गए थे. बेटियों के रहमोकरम पर पड़ी हूं. इसी बात का फायदा उठा कर सब मुझे परेशान करते हैं. कुसुम, तेरी भी 2 बेटियां हैं. तू भी जब मेरी स्थिति में आएगी न, तब तुझे पता चलेगा.’

मैं यह सब सुन कर सन्न रह गई. ऐसा अनर्गल प्रलाप, वह भी अपनी बेटी के लिए. कुसुम अपनी बेटी को गोद में ले कर मुझे छोड़ने गेट तक आ गई.

‘ऐसी मां देखी है कभी जो सिर्फ और सिर्फ अपने लिए जी रही हो?’

मैं क्या जवाब देती?

‘रमेश भी परेशान हो चुका है इन की हरकतों से, हमारे दांपत्य जीवन में भी सन्नाटा पसरा रहता है. जरा भी आहट पा, कमरे के बाहर मां कान लगा कर सुनने को खड़ी रहती हैं कि कहीं हम उन की बुराई तो नहीं कर रहे हैं. ऐसे माहौल में हमारे संबंध नौर्मल कैसे रह सकते हैं? अब तो रमेश को भी घर से दूर भागने का बहाना चाहिए. पता नहीं अपनी बहनों के घर जाता है या कहीं और? किस मुंह से उस से जवाब तलब करूं. जब अपनी मां ही ऐसी हो तो दूसरे से क्या उम्मीद रखना.’

आंटी का सनकीपन बढ़ता ही जा रहा था. उस दिन रिनी का जन्मदिन था, जिसे मनाने के लिए कुसुम और उस की मां में पहले ही बहुत बहस हो चुकी थी. आंटी का कहना था, ‘घर में बच्चे आएंगे तो यहांवहां दौड़ेंगे, सामान छुएंगे.’

कुसुम ने कहा, ‘तुम 2-3 घंटे अपने कमरे को बंद कर बैठ जाना, न तुम्हें कोई छुएगा न ही तुम्हारे सामान को.’

जब आंटी की बात कुसुम ने नहीं सुनी तो वे बहुत ही गुस्से में आ गईं. जन्मदिन की तैयारियों में जुटी कुसुम की उन्होंने कोई मदद नहीं की. मैं ही सुबह से 2-3 बार उस की मदद करने को जा चुकी थी. शाम को सिर्फ 10-12 की संख्या में बच्चे एकत्रित हुए और दोढाई घंटे में लौट गए.

आंटी कमरे से बाहर नहीं आईं. 8 बज गए तो कुसुम ने आंटी को डिनर के लिए पुकारा. तब जा कर वे अपने कोपभवन से बाहर निकलीं. शायद, उन्हें जोरों की भूख लग गई थी. वे अपनी कुरसी ले कर आईं और बरामदे में बैठ गईं. तभी रमेश अपने किसी मित्र को साथ ले कर घर में पहुंचा. उन्हें अनदेखा कर कुसुम से अपने मित्र का परिचय करा कर वह बोला, ‘यह मेरा बचपन का मित्र जीवन है. आज अचानक गोल मार्केट में मुलाकात हो गई. इसीलिए मैं इसे अपने साथ डिनर पर ले कर आ गया कि थोड़ी गपशप साथ में हो जाएगी.’

कुसुम दोनों को खाना परोसने को उठ कर रसोई में पहुंची ही थी कि बरामदे से पानी गिराने और चिल्लाने की आवाज आने लगी. आंटी साबुन और पानी की बालटी ले कर अपनी कुरसी व बरामदे की धुलाई में जुट गई थीं.

दरअसल, जीवन ने बरामदे में बैठ कर सिगरेट पीते समय आंटी की कुरसी का इस्तेमाल कर लिया था. आंटी रसोई से खाना खा कर जब निकलीं तो जीवन को अपनी कुरसी पर बैठा देख आगबबूला हो गईं. और फिर क्या था. अपने रौद्र रूप में आ गईं. जीवन बहुत खिसियाया, रमेश और कुसुम भी मेहमान के आगे शर्म से गड़ गए. दोनों ने जीवन को मां की मानसिक स्थिति ठीक न होने का हवाला दे कर बात संभाली.

दरअसल, आंटी अपने पति की मृत्यु के बाद से खुद को असुरक्षित महसूस करने लगी थीं. वे ज्यादा पढ़ीलिखी न होने के कारण हीनभावना से ग्रस्त रहतीं. दूसरे लोगों से यह सुनसुन कर कि तुम्हारा कोई बेटा ही नहीं है, उन्होंने अपनी पकड़ बेटियों पर बनाए रखने के लिए जो चीखपुकार और धौंस दिखाने का रास्ता अख्तियार कर लिया था, वह बेटियों को बहुत भारी पड़ रहा था.

एक दिन आंटी रात में टौर्च जला कर घूम रही थीं कि किसी सामान में उलझ कर गिर पड़ीं. उन के सिर में अंदरूनी चोट आ गई थी. उस दिन से जो बिस्तर में पड़ीं तो उठ ही न पाईं. 6 महीने गुजर गए, लगता था कि अब गईं कि तब गईं. इसी बीच रमेश का भी तबादला दिल्ली हो गया. कुसुम ने अपनी मां को ऐंबुलैंस में दिल्ली ले जाने का फैसला कर लिया. जब वे जा रही थीं तब यही कह रही थीं, ‘पता नहीं वे दिल्ली तक सहीसलामत पहुंच भी पाएंगी या नहीं.’

मौका पाते ही मैं ने कुसुम को फोन लगाया और हालचाल पूछे. उस ने बताया, ‘‘यहां दीदी के ससुराल वालों का बहुत बड़ा पुश्तैनी घर है. मैं ने भी इसी में एक हिस्से को किराए पर ले लिया है. अब हम दोनों बहनें मिल कर उन की देखभाल कर लेती हैं अपनीअपनी सुविधानुसार.’’

‘‘और तुमहारे पति का मिजाज कैसा है?’’

‘‘उन की तो एक ही समस्या रहती थी हमारी प्राइवेसी की, वह यहां आ कर सुलझ गई. मैं भी अपने पति और बच्चों को पूरा समय दे पाती हूं.’’ उस की आवाज की खनक मैं महसूस कर रही थी.

‘‘और आंटी खुश हैं कि नहीं? या हमेशा की तरह खीझती रहती हैं?’’

‘‘मां को तो अल्जाइमर रोग लग गया है. वे सबकुछ भूल जाती हैं. कभीकभी कुछ बातें याद भी आ जाती हैं तो थोड़ाबहुत बड़बड़ाने लगती हैं. वैसे, शांत ही रहती हैं. अब वे ज्यादा बातें नहीं करतीं. बस, उन का ध्यान रखना पड़ता है कि वे अकेले न निकलें घर से. यहां दीदी के ससुराल वालों का पूरा सहयोग मिलता है.’’

‘‘तुम्हारी मां धन्य हैं जो इतनी समझदार बेटियां मिली हैं उन को.’’

‘‘मैं तो हमेशा मां की जगह पर खुद को रख कर देखती थी और इसीलिए शांत मन से उन के सारे काम करती थी. मेरी भी 2 बेटियां हैं. मां पहले ऐसी नहीं थीं. पापा का अचानक जीवन के बीच भंवर में छोड़ जाना वे बरदाश्त न कर सकीं और मानसिक रूप से निर्बल होती चली गईं. शायद वे अपने भविष्य को ले कर भयभीत हो उठी थीं. चलो, अब सब ठीक है, जैसी भी हैं आखिर वे हमारी मां हैं और मां सिर्फ मां होती है.’’

और मैं उस की बात से पूरी तरह सहमत हूं.

अहम बैठक: मोबाइल फोन प्रतिबंधित

मोबाइल फोन केवल बात करने भर के लिये नहीं रह गये है. अब यह फोटो और वीडियो कैमरा का काम करने लगे है. इनसे सबसे बड़ी घबराहट राजनीतिक दलों में है. यह दल चाहे सरकार में हो या विपक्ष में अपनी मीटिंग में मोबाइल फोन को पसंद नहीं करते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि मोबाइल फोन के जरीये रिकार्डिंग करके सोशल मीडिया पर वीडियों को वायरल करना सहज हो गया है.

उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के सांसद और विधायक के बीच ‘जूते चलने’ का वीडियों वायरल हो गया जिसके कारण पार्टी को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. इस तरह के तमाम वीडियो पूरे देश के राजनीतिक दलों के लिये सीबत की वजह बनते जा रहे हैं. इससे निजात पाने के लिये राजनीतिक दलोें ने अपनी प्रमुख मीटिंग में मोबाइल और वीडियों कैमरा ले जाना प्रतिबंधित कर दिया गया है.

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने फैसला किया हैं कि प्रदेश सरकार की कैबिनेट मीटिंग में अधिकारी और मंत्री अब मोबाइल फोन लेकर नहीं जा सकेंगे. मीटिंग में जाने से पहले इन सभी को अपने मोबाइल फोन बैठक कक्ष के बाहर की जमा कराने होंगे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव की तरफ से इस आशय के निर्देश जारी किये गये हैं.

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केवल सरकार में ही नहीं विपक्ष में भी यह रोग तेजी से बढ रहा है. उत्तर प्रदेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी बहुजन समाज पार्टी ने अपनी कोआर्डिनेटर स्तर की मीटिग में सभी को निर्देश दिया कि वह अपने मोबाइल बैठक में ना लाये. बाकी दलो में भी यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है.

इसकी प्रमुख वजह यह है कि राजनीतिक दलों में अनुशासन की कमी आई है. गोपनीय बैठकों की बातें अब बड़ी तेजी से वायरल हो कर बाहर आने लगी है. राजनीतिक दल भले ही जाति, धर्म, क्षेत्र और बाहुबल की

आलोचना करते हो पर चुनाव को जीतने के लिये वह इन सबका ही सहारा लेते है. यह बातें पहले मीडिया में सूत्रों के हवाले से बाहर आती थी अब नेता इनको मोबाइल में रिकार्ड करके मीडिया तक में देने लगे थे. ऐसे में राजनीति दलों की सच्चाई बाहर आने लगी. इससे परेशान होकर अब राजनीतिक दलों ने मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगा दिया है.

केन्द्र की मोदी सरकार तो इससे एक कदम आगे निकल गई है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने सांसदों के साथ पहली मीटिंग में ही लसाफ की दिया कि सांसद ‘छपास’ और ‘दिखास’ से दूर रहे. नरेन्द्र मोदी ने सांसदों को बताया कि मीडिया उनको किस तरह से प्रभावित करके सच्चाई निकलवा लेती है. मोदी की सीख का असर उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री आवास में सांसदों की मीटिंग में साफतौर पर देखा गया.

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सरकारी आवास 5 कालीदास मार्ग पर मुख्यमंत्री ने सभी सांसदों के स्वागत में भोज का आयोजन किया. सांसदों ने वहां मौजूद मीडिया को देखकर कुछ बोलने से मना कर दिया.

राजनीति के जानकार इस तरह के प्रतिबंध को मीडिया सेंसरशिप से जोड़कर देखते हैं. नेताओं का मीडिया के साथ एक रिश्ता होता था. अब यह रिश्ता बंद करने का प्रयास किया जा रहा है. नेता यह चाहते है कि मीडिया केवल वह खबरें ही दिखाये जो उनके फेवर की हो. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने अपने प्रवक्ताओं को मीडिया से दूर रहने को कह दिया है. मीडिया से दूरी की बीमारी अब अपने पार्टी के भीतर भी पहुंच गई जिसके तहत मंत्री और बड़े पार्टी पदाधिकारी तक को मीटिग में फोन ले जाने से मना कर दिया गया है.

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