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होममेड टिप्स: चेहरे के अनचाहे बालों से ऐसे पाएं छुटकारा

आप अपनी खूबसूरती बनाए रखने के कई सारे टिप्स अपनाते हैं, जिससे आपकी खूबसूरती बरकरार रहे. कभी फेशियल, कभी आईब्रो तो कभी वैक्सिंग. ऐसे में आपके पैसे खर्च होते हैं और दर्द भी आपको सहना पड़ता है. इतना सब कुछ करने के बाद भी अगर आपके चेहरे पर अनचाहे बाल हो तो आपकी खूबसूरती फीकी पड़ जाती है.

चेहरे की त्वचा बहुत सेंसिटिव होती है. ऐसे में वैक्सिंग या ब्लीच के जरिए इन अनचाहे बालों से छुटकारा पाना आपकी स्किन के लिए नुकसानदेह हो सकता है. तो आइए बताते  हैं, आप कैसे चेहरे के अनचाहे बाल से छुटकार पा सकते हैं.

अंडे और चीनी के इस्तेमाल से

अंडे का सफेद भाग त्वचा की रंगत साफ करने का काम करता है. इसके अलावा इसका नियमित इस्तेमाल करने से त्वचा में कसाव आता है. जबकि चीनी का इस्तेमाल करने से त्वचा की डेड स्किन साफ होती है. जब आप इन दोनों चीजों का इस्तेमाल फेसपैक के रूप में करते हैं तो आपके चेहरे से सारे अनचाहे बाल आसानी से निकल जाते हैं.

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अंडे और चीनी का फेसपैक

सबसे पहले एक अंडे के सफेद भाग में दो चम्मच चीनी मिलाकर उसका पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को चेहरे पर लगाकर सूखने दें. फेसपैक सूखने पर चेहरे को हल्के हाथ से मसाज करते हुए धो लें. इस उपाय को हफ्ते में दो बार दोहराएं.

अगर आप चेहरे से अनचाहे बालों को हटाने के लिए अंडे का इस्तेमाल नहीं करना चाहते तो  अंडे की जगह नींबू रस का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके लिए 2 चम्मच नींबू के रस में 2 चम्मच चीनी और 10 चम्मच पानी मिलाकर उसका पेस्ट तैयार कर लें. इस पैक को चेहरे पर 15-20 मिनट लगाने के बाद मसाज करते हुए सादे पानी से धो लें. यह उपाय हफ्ते में दो से तीन बार जरूर अपनाएं. ऐसा करने से आपको अनचाहे बालों से छुटकारा मिल जाएगा.

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दुष्चक्र : भाग 2

‘कुछ नहीं,’’ मैंने संक्षिप्त सा जवाब दिया.

अभी मैं आगे कुछ कहती, इस से पहले ही जैसे श्याम को कुछ याद आ गया, वह बोले, ‘‘अरे, हां यार, घर में कुछ पैसे तो रख कर जाया करो. आज तुम्हारे जाने के बाद मुझे सिगरेट के लिए पैसों की जरूरत थी. पूरा घर छान मारा पर कहीं भी एक पैसा नहीं मिला. मजबूरन नुक्कड़ वाली पान की दुकान से मुझे सिगरेट उधार लेनी पड़ी. अभी कुछ रुपए दे देना तो शाम को मैं उस के रुपए चुका आऊंगा.’’

‘‘आप का उधार मैं ने चुका दिया है,’’ मैं ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और भोजन गरम करने में लग गई.

भोजन करते समय श्याम एक बार फिर शुरू हो गए, ‘‘यार, वंदना, यह तो बहुत ही गलत बात है कि सारे पैसे पर्स में रख कर तुम स्कूल चली जाती हो. ए.टी.एम. कार्ड भी तुम्हारे ही पास रहता है. ऐसे में अचानक यदि मुझे रुपयों की जरूरत पड़ जाए तो मैं क्या करूं, किस से मांगूं? जरा मेरी हालत के बारे में भी तो सोचो. मैं यहां पर घर की रखवाली करूं, सारी व्यवस्थाएं करूं, तुम्हारी देखभाल करूं, तुम्हारी सुरक्षा की चिंता करूं. ऐसे में यदि मेरी ही जेब खाली हो तो मैं कैसे ये सबकुछ कर पाऊंगा. पैसों की आवश्यकता तो पगपग पर होती है. अरे, तुम्हारे लिए ही तो मैं यहां पड़ा हूं.’’

‘‘आप को कुछ भी करने की जरूरत नहीं है. क्या करना है, कैसे करना है, मुझे सब पता है. और हां, रुपयों की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. कोई रुपए मांगते हुए यहां घर तक नहीं आएगा. मुझे सब का हिसाब करना आता है,’’ मैं ने तिक्त स्वर में कहा.

पिछला अनुभव मुझे अच्छी तरह याद है कि उधार तो चुकेगा नहीं, उलटे दोबारा भुगतान अलग से करना पड़ जाएगा. रायपुर का एक किस्सा मुझे अच्छी तरह याद है कि किस तरह मुझे दुकानदारों के सामने शर्मिंदा होना पड़ता था. किस तरह एक ही बिल का मुझे 2 बार भुगतान करना पड़ता था. एक बार तो एक दुकानदार ने पूछ भी लिया था, ‘मैडमजी, यदि बुरा न मानें तो एक बात पूछ सकता हूं?’

‘पूछिए, गुप्ताजी क्या पूछना चाहते हैं आप?’ मुझे कहना पड़ा था क्योंकि गुप्ता किराना वाले के मुझ पर बहुत से एहसान थे.

‘मैडम, श्याम भाई कुछ करते क्यों नहीं? आप कहें तो मैं उन के लिए कहीं नौकरी की बात करूं?’ गुप्ताजी ने कुछ संकोच से पूछा था.

‘गुप्ताजी, बेहतर होगा ये सब बातें आप उन्हीं से कीजिए. उन के बारे में भला मैं क्या कह सकती हूं? अपने बारे में वे स्वयं ज्यादा अच्छी तरह से बता पाएंगे,’ कहते हुए मैं ने घर की तरफ कदम बढ़ा दिए थे.

‘‘कुछ ले नहीं रही हो, तबीयत खराब है क्या?’’ रुके हुए हाथ को देख कर श्याम ने पूछा.

‘‘कुछ विशेष नहीं, बस थोड़ा सिरदर्द है,’’ कह कर मैं किसी तरह थाली में लिया भोजन समाप्त कर के बिस्तर पर आ कर लेट गई. अतीत किसी चलचित्र की तरह मेरी आंखों के सामने घूमने लगा था.

मातापिता और भाइयों के मना करने और सब के द्वारा श्याम के सभी दुर्गुणों को बताने के बावजूद मैं ने श्याम से प्रेम विवाह किया था. श्याम ने मुझे भरोसा दिलाया था कि शादी के बाद वह स्वयं को पूरी तरह से बदल लेगा और अपनी सारी बुराइयों को छोड़ देगा.

शादी के बाद जब श्याम ने मुझे नौकरी के लिए प्रोत्साहित किया तो श्याम की सोच पर मुझे गर्व हुआ था. श्याम का कहना था कि यदि हम दोनों नौकरी करेंगे तो हमारी गृहस्थी की गाड़ी और ज्यादा अच्छी तरह से चल निकलेगी. उस समय मुझे श्याम की चालाकी का जरा भी अनुभव नहीं हुआ था…लगा कि श्याम सच ही कह रहा है. यदि मैं पढ़ीलिखी हूं, प्रशिक्षित हूं तो मुझे अपने ज्ञान का सदुपयोग करना चाहिए. उसे यों ही व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए.

संयोग से हमारी शादी के कुछ दिनों बाद ही केंद्रीय विद्यालय समूह में नौकरी (शिक्षकों) की रिक्तियां निकलीं. श्याम के सुझाव पर मैं ने भी आवेदनपत्र जमा कर दिया. जिस दिन मुझे शिक्षिका की नौकरी मिली उस दिन मुझ से ज्यादा खुश श्याम था.

श्याम की आंखों की चमक ने मेरी खुशियों को दोगुना कर दिया था. मुझे तब ऐसा लगा था जैसे श्याम को पा कर मैं ने जिंदगी में सबकुछ पा लिया. मेरी जिंदगी धन्य हो गई. हां, एक बात मुझे जरूर खटकती थी कि मुझ से वादा करने के बाद भी श्याम ने अपनी सिगरेट और शराब की आदतें छोड़ी नहीं थीं. कई बार तो मुझे ऐसा लगता जैसे वह पहले से कहीं अधिक शराब पीने लगा है.

श्याम की नौकरी लगे मुश्किल से 8 महीने भी नहीं हुए थे कि अचानक एक दिन श्याम के आफिस से उस के निलंबन का पत्र आ गया. कारण था, शराब पी कर दफ्तर आना और अपने सहकर्मियों के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार करना. दफ्तर का काम न करना, लेकिन श्याम पर जैसे इस निलंबन का कोई असर ही नहीं पड़ा. उलटे उस पत्र के आने के बाद वह और अधिक शराब पीने लगा.

कभीकभी वह शराब के नशे में बड़बड़ाता, ‘करो, जो करना है करो. निलंबित करो चाहे नौकरी से निकालो या और भी कुछ बुरा कर सकते हो तो करो. यहां नौकरी की चिंता किसे है? अरे, चिंता करनी ही होती तो पत्नी को नौकरी पर क्यों लगवाता. चिंता तो वे करें जिन के घर में अकेला पति कमाने वाला हो. यहां तो मेरी पत्नी भी एक केंद्रीय कर्मचारी है. यदि मेरी नौकरी छूट भी गई तो एकदम सड़क पर नहीं आ जाऊंगा. मेरा घर तो चलता रहेगा. मैं नहीं तो पत्नी कमाएगी.’

वह दिन है और आज का दिन है. अकेली मैं कमा रही हूं. मुझे स्वयं ही नहीं मालूम कि कब तक अपने कंधों पर न केवल खुद का बल्कि अपने पति का भार भी ढोना पड़ेगा. अचानक मुझे अपने कंधों में दर्द का अनुभव होने लगा. दर्द के मारे मेरे कंधे झुकते चले गए.

Crime Story: फेसबुक की दोस्ती

सोशल मीडिया का फेसबुक एक तरफ जहां दोस्ती का, संबंधों का एक नया संसार प्रदान करता है, वहीं यह फेसबुक ठगी, लूट और दैहिक शोषण का माध्यम भी बनता जा रहा है. फेसबुक के माध्यम से जाने कितनी नादान लड़कियां  अपनी अस्मत लुटा कर यह आगाह कर रही हैं कि अब तो जाग जाओ- जी हां यह सच है कि फेसबुक आज ठगी और शोषण का माध्यम बनता जा रहा है. इस तरह की घटनायें  छत्तीसगढ़ के  बिलासपुर, दुर्ग, मुंगेली से आई है .यहां फेसबुक के माध्यम से प्यार फिर धोखे के तीन  मामले सामने आये हैं.

वही दुर्ग में 44 लाख की ठगी का मामला चर्चा में रहा है. सवाल सीधा सा है कि समझना होगा कि फेसबुक का उपयोग किस एहतियात के साथ किया जाना चाहिए. अगरचे आप फेसबुक की मायावी दुनिया को सच मान लेंगे तो आपका लूटना तय है.क्योंकि यह फेसबुक की दुनिया हमारे आसपास के लोगों से ही बुनी गई है. जिस तरह का क्राइम पूर्व में बिना फेसबुक के हुआ करता था अब फेसबुक के माध्यम से यह कई गुना बढ़ कर लोगों को पीड़ा और त्रासदी दे रहा है.

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महिलाएं बन रही शिकार

फेसबुक की मायावी दुनिया में लड़कियां,  महिलाएं सहजता से बहकावे में आ जा रही है.ऐसे अनेक उदाहरण हमारे आस-पास घटित हो चुके हैं. समझदारी का तकाजा तो यह है कि हम फेसबुक का इस्तेमाल बहुत सोच समझकर करें और इसमें मित्रता की एक सीमा देखा रखें अगर हमने मित्रता को आंख बंद करके स्वीकार किया तो हमारा किसी न किसी तरीके से बेवकूफ बन जाना दैहिक शोषण का शिकार हो जाना आर्थिक रूप से ठगी का शिकार होना संभव है आई आपको कुछ घटनाओं से रूबरू कराते हैं-

पहली घटना में शादी के कुछ  समय बाद  बाद पति की बीमारी से मौत के बाद विधवा हो चुकी एक महिला की ‘फेसबुक” पर एक युवक से दोस्ती हुई. कुछ दिनों में यह प्यार में बदल गयी. जबकि दूसरी दूसरी घटना में भी पहले प्यार फिर धोखा का मामला सामने आया है. प्रेमी ने प्रेमिका को झांसा देकर उसके खाते से 2.50 लाख रुपये भी निकाल लिये.  इस दौरान उसने शारीरिक संबंध भी बनाये और पीड़िता जब गर्भवती हो गई तो जबरन गर्भपात करा दिया. दो वर्षों तक प्रेम संबंध चलने के बाद अब युवक ने शादी से इनकार कर दिया है. फेसबुक  मे फ्रेंडशिप का सिला यह मिला कि

पीड़िता के पैसे से ही आरोपी ने  मारुति कार  खरीदी और अब जिंदगी के गुलचर्रे उड़ा रहा है स्थिति यह है कि  अब फोन भी रिसीव नहीं कर रहा है. किसी तरह की घटना बिलासपुर के तोरवा थाना क्षेत्र में घटित हुई जिसमें फेसबुक की मित्रता के बाद पीड़िता सीमा बदला हुआ नाम को युवक ने फेसबुक की मित्रता के पश्चात कई तरह की गिफ्ट देनी शुरू की और जब वह प्रभावित हो गई तो उसके साथ संबंध बना अब उसे छोड़ गायब हो गया है .

पुलिस की टाल मटोल

फेसबुक की दोस्ती में ठगी के शिकार यौन शोषण के शिकार लोगों की सुनवाई पुलिस भी जल्दी से नहीं करती क्योंकि यह एक पेचीदा मामला होता है और अभी पुलिस के पास बहुत से साधन ऐसे नहीं हैं जिनके माध्यम से वह इस क्राइम को डिटेक्ट कर सके इस संबंध में पुलिस अधिकारी ने बताया कि अभी छत्तीसगढ़ पुलिस साइबर क्राइम के मामले में अन्य राज्यों की पुलिस से बहुत पीछे चल रही है यही कारण है कि पुलिस जब तक स्पेशल प्रेशर ना हो फेसबुक आदि के क्राइम पर हाथ नहीं डालती ऐसी ही एक घटना छत्तीसगढ़ के दुर्ग में घटित हुई जहां 44 लाख रुपए की चपत फेसबुक के माध्यम से सुनीता आर्य नामक महिला को लग गई पुलिस इस मामले में सक्रिय हुई और दिल्ली से अपराधियों को पकड़ कर लाया गया इसी तरह मुंगेली में एक महिला फेसबुक दोस्ती के बाद अस्मत लूट जाने के पश्चात थाने पहुंची मगर उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई अंततः न्यायालय ने पीडिता के मामले  परपुलिस को प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया. बावजूद  पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की. पीड़िता पिछले  महीनों से कोतवाली  थाने का चक्कर लगा  रही है.  दूसरी घटना में फेसबुक पर बेमेतरा की युवती को झांसे में लेकर बिलासपुर के सुदेश  ने शादी करने का झांसा देकर  यौन शोषण किया. अब वह शादी करने से इनकार कर रहा है. युवक के धोखा देने पर मामला  थाने तक पहुंचा है. मामला दर्ज होते ही पुलिस ने जांच शुरू कर दी है.

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फेसबुक की अनंत कहानी

निसंदेह इसमें दो मत नहीं है कि सोशल मीडिया जागरूकता प्रसारित करने का अपने जीवन को बेहतर बनाने का एक बेहतर मंच है मगर इसके साथ ही सिक्के के दूसरे पहलू के रूप में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि फेसबुक के माध्यम से अपराधों की एक तरह  से बाढ़ आई हुई है. दरअसल फेसबुक या कोई भी माध्यम आपसे सामान्य समझदारी अपेक्षा रखता है अगर हम स्वयं सतर्क नहीं होंगे तो नुकसान हमारा है यह सूत्र वाक्य अगर समझ कर हम फेसबुक की मायावी दुनिया में प्रवेश करते हैं वह हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता फेसबुक में दोस्ती करते समय हमें अपनी सीमाओं को कभी नहीं भूलना चाहिए हां अगर हम स्वयं मानसिक रूप से मजबूत नहीं है तो नुकसान हमारा ही होगा. अन्य माध्यमों की भांति फेसबुक भी जहां बहुत कुछ बेहतर देता है वहीं कुछ नुकसान का बयास भी है कहां जा सकता है कि फेसबुक की गाथा भी हरि अनंत, हरि  कथा अनंता की तरह है.

अजब गजब: इस होटल में मेजबानी करता है डायनासोर

खबरों के अनुसार जापान में पूर्वी टोक्यो के एक होटल में आने वाले वाले महमानों का डायनासोर स्वागत करता है. हालांकि इसे  पढ़ कर आप जरूर चौंक गए होंगे. लेकिन आपको बता दें ये डायनासोर असली नहीं बल्कि रोबोट हैं.

हैरानी की बात ये है कि ये डायनासोर तब तक कुछ नहीं करता और कहता, जब तक होटल में आने वाले लोग खुद रिसेप्शन पर जा कर कोई सवाल नहीं करते या फिर कोइ जानकारी नहीं मांगते. तो आइए आपको इसकी वजह बता दें.

दरअसल इसकी वजह है कि इन रोबोटिक डायनासोर को आने वाले मेहमानों के बारे में तभी पता चलता है जब वो रिस्पेशन पर पहुंचते और वहां मौजूद सेंसर से उनकी गति की जानकारी होती है.इसके बाद ही वे कहते हैं, स्वागत है.कितनी हैरानी की बात है न.

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इस जापानी होटल का नाम है हेन ना जिसका अर्थ होता है विर्यड या अनोखा. ये जापान का  मशहूर होटल है.  यह पहला ऐसा होटल है जिसमें डायनासोर रोबोट काम कर रहा है.  खास बात ये है कि यह रोबोटिक डायनासोर आने वाले अतिथियों को उनकी भाषा चुनने का भी विकल्प देते हैं. इन रोबोट के पास एक टैबलेट सिस्टम मौजूद है जिसकी मदद से वे वह लोगों से जापानी, अंग्रेजी, चीनी, कोरियाई जैसी और भी कई भाषाओं में बातचीत कर सकते हैं.

होटल के रिसेप्शन पर मौजूद रोबोट डायनासोर की यह जोड़ी काफी आकर्षक लगती है. ये बड़े कद के हैं और इनके हाथ काफी लंबे हैं. होटल की खासियत यहीं खत्म नहीं होती बल्कि यहां के हर कमरे में एक मिनी रोबोट भी मौजूद रहता है. ये रोबोट मेहमान के कहने पर टीवी का चैनल बदलने से लेकर उनके और्डर प्लेस करने तक सब काम करने में मदद करता है. इसके साथ ही होटल की लौबी में ऐसा एक्वेरियम है जिसमें मछलियां बैटरी से तैरती हैं और  उनके शरीर में बिजली चमकती रहती है.

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फिल्म ‘पहलवान’ के एक्टर अपने कमाई का 40 प्रतिशत हिस्सा खर्च करते हैं इन कामों में

बौलीवुड में अक्षय कुमार, आमीर खान, अमिताभ बच्चन, सलमान खान से लेकर कई कलाकार अक्सर जरुरतमंद बच्चों की मदद करते रहते हैं. बौलीवुड के कलाकार जब भी किसी अच्छी मुहीम, फिर चाहे वह स्वच्छता मुहीम हो या पानी बचाने की मुहीम हो, से जुड़ते हैं, तो जमकर प्रचार होता है. बड़ी बड़ी प्रेस कौफ्रेंस तक हो जाती है. बौलीवुड से जुड़े कलाकार जब किसी की आर्थिक मदद करते हैं, तो वह भी जग जाहिर होता है. यहां तक कि रकम तक प्रचार माध्यमों का हिस्सा होती है.

जबकि दक्षिण भारत के कई कलाकार समाज सेवा का कार्य निरंतर निर्बाध गति से करते जा रहे हैं. मगर वह कभी भी अखबार की सूर्खियों में नही आते. जब फरवरी 2019 में तमिल व तेलगू भाषा की 25 फिल्मों की अदाकारा विजयलक्ष्मी अस्पताल में भर्ती हुई थी और उन्होंने मदद की गुहार लगायी थी, तो कई अन्य कलाकारों के साथ ही किचा सुदीप ने भी अपनी तरफ से एक लाख रूपए दिए थे, जिसे ‘‘कर्नाटक फिल्म चेम्बर्स आफ कामर्स’’ के सेक्रेटरी हरीश ने ट्वीट कर जगजाहिर किया था.

मगर हाल ही में जब सुदीप से फिल्म ‘‘पहलवान’’ के समय एक्सक्लूसिव बातचीत हुई, तो पता चला कि सुदीप के नाम से मशहूर अभिनेता किचा सुदीप हर वर्ष अपनी कमाई का चालिस प्रतिशत से अधिक राशि समाज सेवा के कार्यों में खर्च करते हैं.

वास्तव में इस एक्सक्लूसिव मुलाकात के दौरान हमने किचा सुदीप से जब पूछा कि आप अभिनय, फिल्म निर्माण, लेखन, निर्देशन व गायन से अच्छी कमायी कर रहे हैं, फिर भी आपने ‘‘स्टेज 360’’ जैसी कंपनी बनायी हुई है? आखिर आपकी यह कंपनी क्या करती है? इस पर बड़ी संजीदगी के साथ सुदीप ने कहा- ‘‘मैंने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया है. आप यकीन नही करेंगे मगर बतौर कलाकार संघर्ष के दौरान एक वक्त वह था, जब मैंने पांच सौ रूपए में पूरा माह गुजारा है. हम जब फिल्म उद्योग से जुड़े, तो हमारी मदद के लिए कोई नहीं था. यदि हम यहां हैं, हमारी वजह से चार लोगों को मदद मिल जाए, तो कुछ बुरा तो नहीं होगा. इसी सोच के साथ हम ‘स्टेज 360’ के माध्यम से युवा प्रतिभाओं को बढ़ावा देने का काम करते हैं.’’

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उसके बाद सुदीप चुप होकर कुछ सोच में पड़ जाते हैं. तब हमने उनसे कहा कि आप संकोच न करें, बताएं कि आप बाकी क्या कर रहे हैं. तब सुदीप ने कहा- ‘‘सर… मैंने बहुत कुछ किया है. मेरी सोच रही है कि मनोरंजन को और लोगों के जीवन को इम्प्रूव किया जाए. कुछ ऐसा काम किया जाए, जिससे लोगों का हौसला बढ़े. मैं बहुत कुछ करता रहता हूं. मैंने पश्चिमी बैंगलोर के शिवामोगा में 18 बच्चों को एडौप्ट किया है. दो स्कूल एडौप्ट किए है. 22 बुजुर्गों को एडौप्ट किया है. इसके लिए मैं सरकार से कोई अनुदान/मदद नहीं लेता. मैंने अनाथालय चला रखा है. मेरी कमाई का चालिस प्रतिशत से अधिक हिस्सा अनाथालय को जाता है. मुझे यह सब करना अच्छा लगता है. इसलिए जब हम सड़क पर उतरते हैं, तो अच्छा लगता है. मुझे सड़क पर पैदल चलने में कोई संकोच नही हेाता.’’

सुदीप के नाम से मशहूर किचा सुदीप मूलतः इंडस्ट्यिल एंड प्रोडक्षन इंजीनियर हैं. उनके पिता होटलेरियर थे. पर उन्होंने काफी संघर्ष कर फिल्म उद्योग में अपना एक अलग मुकाम बनाया है. वह अभिनेता, निर्माता,  निर्देशक, लेखक, गायक, समाजसेवी, बिजनेसमैन, क्रिकेटर सहित काफी काम कर रहे हैं.1997 से अब तक वह बतौर हीरो 54 कन्नड़, तमिल, हिंदी व तेलगू फिल्में,16 फिल्मों में कैमियो, टीवी शो, ‘फुंक’, ‘रक्तचरित्र 2’, ‘रन’ व ‘बाहुबली प्रथम’ ’जैसी हिंदी फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं. छह फिल्मों का लेखन व निर्देशन किया है. इन दिनों वह 12 सितंबर को प्रदर्शित हो रही फिल्म ‘‘पहलवान’ को लेकर चर्चा में हैं, जिसमें उनके साथ आकांक्षा सिंह और सुनील शेट्टी भी हैं. स्वप्ना कृष्णा निर्देशित फिल्म ‘‘पहलवान’’ मूलतः कन्नड़ फिल्म है, जिसे हिंदी, तमिल, तेलगू व मलयालम में डब करके रिलीज किया जा रहा है. तो वहीं वह बहुत जल्द सलमान खान के साथ फिल्म ‘‘दबंग 3’’ में भी नजर आएंगे. इतना ही नहीं अमिताभ बच्चन के साथ एक तेलगू फिल्म भी कर रहे हैं.

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सावधान! पिछले एक पखवाड़े से जल रहा है दुनिया का फेफड़ा

अमेजन के जंगल में आग लगे एक पखवाड़ा बीत गया. अभी तक हजारों जीव जन्तु आग में खाक हो चुके हैं लेकिन ये ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. पहले भी कई बार अमेजन के जंगलों में आग लग चुकी है लेकिन ऐसा बार-बार क्यों होता है. इन प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और सहेजने के लिए अभी से कड़े कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले कुछ सालों में इसके भयानक परिणाम देखने को मिलेंगे. दुनिया का फेफड़ा कहे जाने वाले अमेजन के जंगल में लगी आग और ग्लोबल वर्मिंग की वजह से पिघल रहे ग्लेशियर इस चिंता को और भी बढ़ा रहे हैं.

कहा जा रहा है कि पिछले एक दशक में अमेजन के जंगलों में पहली बार इतनी भीषण आग लगी है. देश के उत्तरी राज्य रोरैमा, एक्रे, रोंडोनिया और अमेजोनास इस आग से बुरी तरह प्रभावित हैं. दावा है कि हर मिनट एक फुटबौल मैदान के बराबर जंगल काटे जा रहे हैं. जनवरी में ब्राजील के नए राष्ट्रपति के तौर पर जेयर बोलसोनारो ने सत्ता संभाली थी तब से जंगलों के काटे जाने की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं.

धरती को 20 फीसदी औक्सीजन ब्राजील के वर्षावनों से मिलती है. हालांकि, सोशल मीडिया पर हैशटैग #PrayforAmazonas से आग की जो तस्वीरें साझा की जा रही हैं उनमें से कुछ दशकों पुरानी हैं या वो ब्राजील की हैं भी नहीं. ब्राजील की अंतरिक्ष एजेंसी के आंकड़े बताते हैं कि अमेजन के वर्षा वन में इस साल रिकौर्ड आग की घटनाएं हुई हैं.

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नेशनल इंस्टीट्यूट फौर स्पेस रिसर्च (इनपे) ने अपने सैटेलाइट आंकड़ों में दिखाया है कि 2018 के मुकाबले इसी दरम्यान आग की घटनाओं में 85 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल के शुरुआती आठ महीने में ब्राज़ील के जंगलों में आग की 75,000 घटनाएं हुईं. साल 2013 के बाद ये रिकौर्ड है. साल 2018 में आग की कुल 39,759 घटनाएं हुई थीं.

जुलाई से अक्टूबर के बीच सूखे मौसम में ब्राज़ील के जंगलों में आग की घटनाएं होना आम बात हैं. यहां प्राकृतिक कारणों से भी आग लगती है लेकिन साथ ही किसान और लकड़ी काटने वाले भी आग लगाते हैं. पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो की पर्यावरण विरोधी बयानबाजियों के चलते जंगल साफ़ करने की गतिविधियों में बढ़ोत्तरी हुई है.

पर्यावरण को लेकर लंबे समय से संशय रखने वाले जेयर बोलसोनारो ने गैर सरकार संस्थाओं (एनजीओ) पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उनकी सरकार को बदनाम करने के लिए खुद ही जंगलों में आग लगाई है. बाद में उन्होंने कहा कि आग को काबू करने में सरकार के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं.

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार आग की घटनाओं में रोराइमा में 141%, एक्रे में 138%, रोंडोनिया में 115% और अमेज़ोनास में 81% वृद्धि हुई है. जबकि दक्षिण में मोटो ग्रोसो डूो सूल में आग की घटनाएं 114% बढ़ी हैं.आग से बड़े पैमाने पर कार्बन डाई औक्साइड पैदा हो रहा है और कैम्स के अनुसार, इस साल अभी तक 228 मेगाटन के बराबर कार्बन डाई औक्साइड पैदा हुई, जोकि 2010 के बाद सर्वाधिक है.

अब सवाल ये उठता है कि बार-बार आग लगती क्यों है. ऐसा कहा जाता है कि मवेशियों के चरने के लिए जमीन को साफ करने के मकसद से चरवाहों और लकड़हारों द्वारा अमेजन वर्षावनों में लगाए जाने की आशंका जताई जा रही हैं. ब्राजील के पौप्युलिस्ट प्रो बिजनेस राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो का साथ भी इन लोगों को मिला हुआ है.

ब्राजील के जंगलों में लगी आग पर बोल्सोनारो दावा कर रहे हैं कि ये भीषण आग एनजीओ द्वारा उन्हें बदनाम करने के उद्देश्य से लगाई गई है. इन दो कयासों के बीच ब्राजील का बीफ मार्केट एक ऐसा मुद्दा है जो चर्चा का विषय बना हुआ है. जहां बीफ ब्राजील के किसानों के लिए व्यापार का मसला है तो वहीं दुनिया इसे डर भरी नजरों से देख रही है. साथ ही दुनिया को 20 प्रतिशत औक्सीजन देने वाले जंगलों को बचाने के लिए कम बीफ खाने की अपील कर रही है.

यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट औफ एग्रीकल्चर (USDA) की एक स्टडी से इसका कुछ और ही मतलब निकलता है. रिसर्च के मुताबिक ब्राजील दुनिया का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक है, जो कुल वैश्विक निर्यात का 20 प्रतिशत है. आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने की संभावना है. ब्राजील की 30 से ज्यादा मांस पैकिंग कंपनियों के संगठन ब्राजील बीफ एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (अबिक) के मुताबिक पिछले साल देश ने 1.64 मिलियन टन बीफ की शिपिंग की है, जो कि ब्राजील के इतिहास में सबसे ज्यादा है.

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ब्राजील के बीफ उद्योग में बढ़ोतरी का बड़ा कारण है एशिया की मजबूत मांग. जो कि ज्यादातर चीन और हौन्ग-कौन्ग से है. USDA के मुताबिक ब्राजील से साल 2018 में निर्यात होने वाले पूरे बीफ का 44 प्रतिशत सिर्फ इन दोनों देशों में ही गया.

साऊथ अमेरिका के कुछ देशों और यूरोपीय संघ के बीच जून में एक व्यापार सौदा हुआ था, जिससे ब्राजील के बीफ-पैकिंग उद्योग के लिए और भी ज्यादा बाजार खुल सकते हैं. एग्रिमेंट होने के बाद, अबीक के प्रमुख एंटोनियो कैमार्डेली ने कहा कि ये एग्रिमेंट EU की तरह मौजूदा भागीदारों के साथ बिक्री को बढ़ावा देते हुए, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे संभावित नए बाजारों तक पहुंच प्राप्त करने में ब्राजील की मदद कर सकता है.

और्गनाइजेशन फौर इकोनौमिक को-औपरेशन एंड डेवलपमेंट (OECD) के अनुसार, यह सौदा हो या न हो लेकिन फिर भी ब्राजील बीफ उद्योग को प्राकृतिक संसाधनों, घास की उपलब्धता और वैश्विक मांग के आधार पर विस्तार जारी रखने का अनुमान है. और इस वृद्धि की कीमत पर्यावरण को देनी होगी.

ब्राजील के अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (INPE) ने इस सप्ताह कहा कि ब्राजील में आग की संख्या पिछले साल की तुलना में 80 प्रतिशत ज्यादा है. उन्होंने बताया कि ये आपदा अमेजन के आधे से ज्यादा क्षेत्र में है. अगर दुनिया के फेंफड़े कहलाए जाने वाले अमेजन को बचाने के लिए कम मीट खाना कोई ठोस वजह नहीं है तो बीफ द्वारा उत्सर्जित की जाने वाली ग्रीन हाउस गैस शायद एक और बड़ी वजह हो सकती है.

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UN इंटरगवर्नमेंटल पैनल औन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की रिपोर्ट में पिछले साल जारी की गई एक खतरनाक रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्लोबल टेंपरेचर को 2 डिग्री बढ़ने से रोकने के लक्ष्य को हासिल करने में 20 प्रतिशत तक योगदान हम अपनी डाइट को बदलने मात्र से कर सकते हैं.

इन चेतावनीयों के बाद भी OECD और FAQ जैसी वैश्विक संस्थाओं ने दावा किया है कि बीफ की वैश्विक खपत अगले दशक में बढ़ने वाली है. एक संयुक्त रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वैश्विक उत्पादन 2017 और 2027 के बीच मांग को पूरा करने के लिए 16 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा. जिसमें बड़ा हाथ ब्राजील का होगा.

‘‘आसामी” होने के चलते देश के दूसरे राज्यों में भी करना पड़ा परेशानियों का सामना: लारिसा चौक्ज

असम में एनआरसी की फाइनल लिस्ट आने के बाद से असम के लगभग बीस लाख लोगों को अपनी जिंदगी तलवार के नीचे लटकी हुई नजर आ रही है. मगर असम से आने वाली कई कलाकार प्रतिभाओं का मानना है कि उन्हें आसामी होने के चलते भारत के दूसरे राज्यों में काफी कुछ झेलना पड़ता है. ऐसी ही एक अदाकारा हैं लारिसा चौक्ज. जो कि सनोज मिश्रा निर्देशित मर्डर मिस्ट्री फिल्म ‘‘लफंगे नवाब’’ में अभिनय किया है.

असम के तिनसुकिया जिले की निवासी लारिसा चौक्ज के पिता का बचपन में ही देहांत हो गया था. इसी के चलते लारिसा चौक्ज ने बहुत छोटी उम्र में नृत्य सीखकर अच्छे काम की तलाश में अपनी मां की नाराजगी के बावजूद असम से निकलकर दिल्ली रवाना हुई थी. पर उन्हें कड़वे अनुभवों से गुजरना पड़ा.

दिल्ली में असम की लड़की को लेकर गलत सोचः

अपने अनुभवों की चर्चा करते हुए लारिसा चौक्ज बताती हैं- ‘‘महज सोलह साल की उम्र में मैं घर से निकलकर सबसे पहले जून 2015 में दिल्ली पहुंची थी. मैंने सोचा था कि दिल्ली में मुझे कुछ काम मिल जाएगा. लेकिन दिल्ली में असम से आने वाली लड़कियों के प्रति सोच बहुत गलत है. जब उन्हें पता चलता है कि असम के एक गांव से आई हुई लड़की को काम चाहिए, तो वह बहुत ही गलत अंदाज में लेते हैं. फिर वह हमारे सामने कई तरह की फरमाइशें रखना शुरू करते हैं.

दिल्ली से मुबई, फिर गुजरात

वह आगे कहती हैं- ‘‘फिर मैं दिल्ली से मुंबई आयी. काफी संघर्ष किया. पर नृत्य या अभिनय करने का अवसर नही मिला. मैं संघर्ष करते हुए इतना थक चुकी थी कि एक दिन मैंने सोचा कि अभिनय करने की बजाय जो भी काम मिल जाए, वह करूंगी. क्योंकि जिंदगी में पैसा बहुत जरूरी है. मैंने सोचा कि सबसे पहले कुछ काम करके पैसा कमा लूं, जिससे संघर्ष करना आसान हो जाए. उसके बाद अभिनय के क्षेत्र में कदम रखूंगी. अब मेरे सामने समस्या थी कि मैं क्या काम करूं? मुझे नृत्य के अलावा कुछ आता नहीं था. मेरे दोस्त ने बताया कि गुजरात में फैशन शो होते हैं, जिसमें नृत्य का भी स्कोप है. तो मैं गुजरात गई.’’

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गुजरात के लोगों की निगाह गलतः

गुजरात के संदर्भ में वह कहती हैं- ‘‘मैं गुजरात के कई शहरों में रही.पर मुझे गुजरात के किसी भी शहर के लोगों की दिमागी सोच पसंद नहीं आई. शायद यही वजह है कि गुजरात में हर लड़की खुद को ऊपर से नीचे तक हमेशा ढंक कर रखती है. वहां के लोगों की निगाहें अच्छी नहीं है. पर सभी गलत नहीं है. कुछ लोगों की सोच बहुत गंदी है. उन्हें पता चला कि असम से आई है, तो समझ लिया कि यह लड़की तो सब कुछ कर लेगी. लेकिन मैं किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं थी. वहां कोई मदद नहीं कर रहा था. मैंने किसी से कुछ भी मुफ्त में कुछ नहीं मांगा था. मैं तो मेहनत करने के लिए तैयार थी. मैं काम मांग रही थी. वहां सभी एक दूसरे से कह रहे थे कि इस लड़की के साथ मेरी सेटिंग करवा दो. किसी तरह मैंने गुजरात में 4 माह गुजारे.’’

गुजरात से बंगलौरः

धारा प्रवाह बोलते हुए वह आगे कहती हैं- ‘‘उसके बाद मुझे बंगलोर की ‘सन इवेंट’ नामक एक इवेंट कंपनी के बारे में पता चला. मैंने उसके लिए औडीशन दिया और मेरा चयन हो गया. तब मैं बंगलोर रहने चली गई. इस कंपनी में हमारा डांस ग्रुप था. जिस इवेंट में डांस की जरूरत होती थी, वहां हमारा ग्रुप नृत्य किया करता था. मैंने वहां पर एक नहीं कई इवेंट में डांस किया. नृत्य करके मैंने अपनी आजीविका चलाई. जब आर्थिक स्थिति सुधर गयी, तो सोचा कि अब एक बार फिर अभिनय के क्षेत्र में किस्मत आजमानी है. इसलिए इवेंट कंपनी छोड़ कर कुछ दिन के लिए मां के पास असम अपने घर चली गई. मैंने सोच लिया था कि आप मुझे नए सिरे से अभिनय के क्षेत्र में संघर्ष करना है. जब मैं असम में थी, तभी मुझे फिल्म ‘‘लफंगे नवाब’’ के बारे में पता चला. मैंने औडीशन दे दिया. और मुझे इसमें अभिनय करने का अवसर मिल गया. मैं इस फिल्म के निर्माताओं व निर्देशक की शुक्रगुजार हूं कि मुझे किसी  भी तरह का कंप्रोमाइज नहीं करना पड़ा.’’

खुद को असमी नही भारतीय मानती हैं:

जब हमने लारिसा से पूछा कि क्या आसामी होने की वजह से उन्हें  काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है? तो लारिसा चैक्ज ने कहा- ‘‘नहीं.. ऐसा कहना ठीक नही होगा. मैं अपने आप को भारतीय मानती हूं. मेरा मानना है कि असम भी भारत में है. मुझे आसामी होने के चलते परेशानी नहीं हुई. पर देश के हर शहर में रहने वाले कुछ लोगों की सोच गलत होती है. अफसोस कि दिल्ली व गुजरात में मेरा साबका ऐसे ही गलत सोच वाले लोगों के साथ पड़ा. जबकि बंगलोर में तो मुझे अच्छा काम करने का मौका मिला.’’

क्यों सीखा नृत्य:

नृत्य सीखने की चर्चा करते हुए लारिसा चैक्ज ने कहा- ‘‘आपको पता होना चाहिए कि असम शुरू से ही कला के क्षेत्र में अग्रणी रहा है. असम से कई बड़े-बड़े संगीतकार निकले हैं. आसाम से आकर कई प्रतिभाएं बौलीवुड में अच्छा काम कर रही हैं. स्व.भूपेन हजारिका जी असम से थे. असम के संगीत को सबसे ज्यादा महत्त्व दिया जाता है. पर मेरे घर के हालात और मेरी दिमागी सोच ऐसी थी कि मैंने उस वक्त संगीत को ज्यादा तवज्जो नहीं दी. जबकि मेरी रूचि संगीत में है. हर तरह का संगीत सुनना मुझे पसंद है. मौका मिला तो शायद मैं कभी किसी फिल्म में भी गाना गा सकती हूं. पर मुझे नृत्य में अच्छा मौका मिल गया.’’

वह आगे कहती हैं- ‘‘मैंने आसाम में ही नृत्य सीखा. मेरे नृत्य के शिक्षक को मेरे नृत्य की प्रतिभा ने प्रभावित किया, तो उन्होंने नृत्य के स्टेज शो में मुझे नृत्य करने के लिए शामिल किया. उसके बाद मैंने असम में नृत्य के कई स्टेज शो किए. फिर मेरे शिक्षक ने मुझे अपना सहायक बना लिया. उसके बाद मैंने कुछ समय तक बच्चों को नृत्य सिखाया और सीखा. दूसरे बच्चों को नृत्य सिखाते सिखाते मेरी नृत्य प्रतिभा में भी निखार आता चला दिया. जिसके चलते मैंने बाद में नृत्य के कार्यक्रम देकर अपनी जीविका चलायी.’’

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भयावह है अमीर गरीब के बीच बढ़ती खाई

भारत में अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई बीते पांच सालों में और ज्यादा गहरी हो गयी है. आज देश की आधी सम्पत्ति देश के नौ अमीरों की तिजोरियों में बंद है और दूसरी ओर गरीब की थाली में मुट्ठी भर चावल भी बमुश्किल दिखायी देता है. यह गम्भीर चिन्ता का विषय है. केन्द्र सरकार की गलत नीतियों के कारण देश एक बड़े संकट से गुजर रहा है. गरीब और ज्यादा गरीब होता जा रहा है और अमीर तेजी से अमीर हो रहा है. यह आर्थिक विषमता अब चिन्ताजनक स्थिति तक बढ़ गयी है और गणतंत्र का स्थान अमीरतंत्र ने ले लिया है. अशिक्षा, बेरोजगारी और बढ़ती मंहगाई ने गरीब की कमर तोड़ दी है. दिल्ली के रमेशनगर इलाके में जलेबी का ठेला लगाने वाले रामभजन हलवाई की दस साल पहले अपनी एक छोटी मिठाई की दुकान हुआ करती थी, मगर इन दस सालों में मंहगाई ने उन्हें दुकान बेच कर ठेला लगाने के लिए मजबूर कर दिया. डिप्लोमा करने के बाद भी दोनों बेटों के पास नौकरी नहीं है. बड़ा बेटा किराये का ई-रिक्शा चला कर अपने परिवार को किसी तरह पाल रहा है. वहीं दोनों बेटियों की शादियों में रामभजन की सारी जमा-पूंजी खर्च हो गयी और दुकान भी बिक गयी. अब जीवन के आखिरी पड़ाव पर दो जून की रोटी के लिए रामभजन ठेला लगाने के लिए मजबूर हैं. रामभजन ही नहीं, इनके जैसे लाखों गरीब हैं, जिनके पास कभी अपना घर, अपनी कृषि भूमि, अपना कुआं, अपना पशुधन, अपनी दुकान हुआ करती थीं, मगर आज वे भुखमरी की कगार पर हैं. उनके बच्चों को खाने के लाले पड़े हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य की कौन कहे.

देश के हजारों किसानों की जमीनें कर्जे पाटने में बिक चुकी हैं. हजारों किसानी छोड़कर दूसरे शहरों में दिहाड़ी मजदूर बन चुके हैं. महानगरों में जाड़ा, गर्मी, बरसात रिक्शा खींच रहे हैं, अमीरों की गाड़ियां साफ कर रहे हैं या सड़क किनारे बने ढाबों में बरतन मांज रहे हैं, ताकि घर पर कुछ पैसा भेज सकें. दिल्ली में ही सुबह के वक्त जगह-जगह चौराहों पर जमा गरीबों की भीड़ को देखिए, जो सामने से गुजरने वाली हर मोटरगाड़ी को इस लालसा से ताकते हैं कि अभी यह उनके पास रुकेगी और ढाई सौ रुपये दिहाड़ी पर दिन भर के काम के वास्ते उन्हें ले जाएगी. इस भीड़ को हर दिन काम भी नहीं मिलता, कुछ ही खुशनसीब होते हैं जो दिहाड़ी पर ले जाए जाते हैं, बाकि दिन भर काम की बाट जोहते शाम को खाली हाथ ही लौटते हैं. इन मजदूरों से बात करें तो पता चलता है कि कभी इनके बाप-दादा के पास अच्छी-खासी खेती की जमीनें थीं, दुधारू पशु भी थे, गांव में घर-परिवार खुशहाल था, मगर सरकारी नीतियों, मंहगाई और कर्जे ने धीरे-धीरे सब कुछ छीन लिया. भारत एक ओर जहां दुनिया के तीसरे सबसे ज्यादा अरबपति धन कुबेरों का देश बन चुका है, वहीं इसके अंदर दुनिया की गरीब और भूखी आबादी का एक तिहाई हिस्सा निवास करता है.

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दिल्ली के कालकाजी मार्केट के पीछे एक किनारे झुग्गियों की लम्बी कतार है. यह तमिल बस्ती कहलाती है, जहां दरबेनुमा कोठरियों में गरीब तमिल परिवार अपने बच्चों सहित कीड़े-मकोड़ों सी जिन्दगी जी रहे हैं. तमिल बस्ती की औरतें इलाके की कोठियों में झाड़ू-बरतन का काम करती हैं, तो पुरुष ठेला लगाते हैं या रिक्शा खींचते हैं. अपनी जमीन से उजड़ कर यहां बसने को मजबूर इन लोगों के सामने भाषा का बड़ा संकट है. पीने का पानी, शौचालय, स्नान, जलावन, दवाई, अनाज, कपड़े के लिए इनकी औरतें दिन भर जूझती हैं और कमरतोड़ मेहनत करके दिन में सौ-दो सौ रुपये से ज्यादा नहीं कमा पाती. किसी कोठी से कुछ खाने का सामान मिल जाए तो उनके बच्चों के लिए उस दिन जैसे पार्टी हो जाती है.

इन गरीबों की खस्ताहाली देखिए और फिर नजर डालिये मुंबई में देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी की गगनचुम्बी रिहाइश पर. बीते साल अंबानी की बेटी ईशा की शादी में औन द रिकौर्ड 723 करोड़ रुपये खर्च किये गये हैं, औफ द रिकौर्ड यह रकम इससे कई गुना ज्यादा है. इतनी बड़ी रकम में एक गरीब की सात पुश्तें पल जाएं. देश के नागरिकों के बीच यह आर्थिक असमानता आज अपने विकराल रूप में है. देश में जहां एक ओर गगनचुंबी अट्टालिकाएं, बंगले, महल, विला, मल्टीप्लेक्स और बड़े-बड़े शोरूम हैं, वहीं दूसरी ओर झुग्गी-झोंपड़ियां, घास-फूस के कुटीर, खपरैल और कच्चे और अधकच्चे मकान, सड़कों के किनारे और फ्लाईओवरों के नीचे रहते लोग दिखायी देते हैं, जो देश की वास्तविक तस्वीर पेश करते हैं. हाल में आयी औक्सफैम की रिपोर्ट हर संवेदनशील इन्सान को बेचैन कर देने वाली है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के अरबपतियों की सम्पत्ति में पिछले वर्ष हर दिन 2200 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है. टॉप एक प्रतिशत अमीरों की सम्पत्ति में 39 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी हुई है, जबकि कम से कम पैसे वालों की 50 फीसदी आबादी की सम्पत्ति केवल 3 फीसदी बढ़ी है. देश के 9 अरबपतियों की कुल सम्पदा नीचे की 50 फीसदी जनसंख्या की सम्पदा के बराबर है और देश की करीब 60 फीसदी जनसंख्या के पास राष्ट्रीय सम्पदा का महज 4.8 फीसदी हिस्सा ही है. रिपोर्ट के अनुसार चिकित्सा, जनस्वास्थ्य, स्वच्छता और जलापूर्ति जैसे जनोपयोगी कार्य पर केन्द्र और राज्य सरकारों का कुल मिलाकर पूंजी व्यय 2,08,116 करोड़ रुपये है, जबकि इससे ज्यादा 2.8 लाख करोड़ रुपये की सम्पदा तो देश के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अम्बानी के ही पास है. पिछले वर्ष भारत में अरबपति क्लब में 18 नये लोग शामिल हुए हैं. डॉलर के लिहाज से अब देश में 119 अरबपति हैं, जिनकी कुल सम्पदा 440 अरब डौलर या 30 लाख करोड़ रुपये के आसपास है. वर्ष 2017 में इन अरबपतियों के पास 325.5 अरब डौलर थे. मुकेश अम्बानी और अन्य अरबपतियों की दौलत में इजाफा सोचने को विवश कर देता है.

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90 के दशक में जब देश में आर्थिक सुधार शुुरू हुए थे तो पूरी आबादी का एक छोटा सा हिस्सा तेजी से समृद्ध होने लगा था. ऐसा नहीं था कि बाकी लोगों को उसका फायदा नहीं मिल रहा था. करोड़ों लोग गरीबी रेखा से ऊपर चले गये, लेकिन अमीर-गरीब का फासला तेजी से बढ़ता ही गया. अब स्थिति यह है कि भारत आर्थिक असमानता के मामले में दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है. असमानता का इंडेक्स 1990 में जहां 45.18 था, वहीं यह बढ़कर 60 फीसदी होने को है. ऐसा नहीं है कि अन्य के पास धन नहीं आया, लेकिन वह उस अनुपात में नहीं आया, जो ऊपर के वर्ग में था. अमीर और अमीर होते गये जबकि गरीब वहीं खड़े रह गये या उससे भी नीचे चले गये. दुनिया में ऐसी असमानता कहीं और देखने को नहीं मिलती. नयी कापोर्रेट संस्कृति ने आर्थिक विषमता को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. देश की बड़ी आईटी कम्पनियों के सीईओ का वेतन उसी कंपनियों के एक औसत कर्मी से 400 गुना ज्यादा है. दौलत के थोड़े से लोगों के हाथों में सिमट जाने का असर देश की राजनीति पर भी पड़ा है क्योंकि पैसे के दम पर अरबपतियों ने राजनेताओं को अपना गुलाम बना लिया है और इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से देश की राजनीति और सरकार आज उद्योगपति चला रहे हैं. इन उद्योगपतियों को गरीबों के उद्धार से, उनकी समृद्धि से, उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार से कोई मतलब नहीं है. गरीब उनके लिए सस्ते मजदूर भर बने रहें, इसी में इन उद्योगपतियों की समृद्धि निहित है.

औक्सफैम  की सीईओ निशा अग्रवाल का कहना है कि यह अत्यंत चिंता का विषय है कि  देश की अर्थव्यवस्था में हुई वृद्धि का फायदा मात्र कुछ लोगों के हाथों के सिमटता जा रहा है. अरबपतियों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोत्तरी फलती-फूलती अर्थव्यवस्था की नहीं, बल्कि एक विफल अर्थव्यवस्था की निशानी है. जो मेहनत कर रहे हैं, देश के लिए भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं, मकानों व इमारतों का निर्माण कर रहे हैं, कारखानों में काम कर रहे हैं, वे अपने बच्चों को पालने के लिए, उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए, भोजन व दवाओं को खरीदने के लिए बेतरह संघर्ष कर रहे हैं. यह बढ़ती खाई, लोकतंत्र को खोखला कर रही है और भ्रष्टाचार, अपराध, अराजकता, हिंसा, उग्रता और पक्षपात को बढ़ा रही है.

गैर बराबरी की जब भी बात होती है तो यही सामने आता है कि किस तरह राजनीतिक ताकत अमीरों और रसूखदारों के हाथ की कठपुतली बन जाती है. रिजर्व बैंक औफ इंडिया के गवर्नर रघुराम राजन कहते हैं, ‘अमीर, ऊंचे रसूखदार और बड़ी पहुंच रखने वाले लोग गलत काम करने पर भी बच जाते हैं. भारत एक कमजोर देश है. हम प्रशासनिक तौर पर गलत काम रोकने की क्षमता नहीं रखते बल्कि यह भी कि हम गलत करने वाले को सजा भी नहीं देते, जब तक कि वह कमजोर और छोटा न हो. अगर हमें लगातार विकास करते रहना है तो इस संस्कृति को खत्म करना होगा.’ रघुराम राजन ने स्पष्टतौर पर यह कहा कि प्रशासनिक ताकतें कभी अमीरों के गलत कामों को रोकने का काम नहीं करतीं, बल्कि वह छोटे और कमजोर पर ही कार्रवाई का चाबुक चलाती है. रघुराम राजन की यह बात इसलिए भी अहम हो जाती है क्योंकि बैंकों के सामने बड़े-बड़े डिफौल्टर्स हैं जिनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी. उनसे नियमों का पालन करवाने में प्रशासन हमेशा नाकाम रहा. मोदी-माल्या जैसे रसूखदार देश का करोड़ों रुपया लेकर विदेश भाग गये. उन्हें निकल भागने के मौके उनके राजनीतिक आकाओं ने दिये, जबकि देश के छोटे कर्जदारों के साथ कड़ा सलूक हुआ. कितने किसानों ने ऋण न चुका पाने के डर से आत्महत्याएं कर लीं और लगातार कर रहे हैं.

दुनिया भर में बढ़ रही है आर्थिक असमानता

अमीर-गरीब के बीच की खाई सिर्फ भारत में ही नहीं गहरी हो रही है, बल्कि आर्थिक असमानता का दैत्य पूरे विश्व को निगलता जा रहा है. दुनिया में 62 ऐसे लोग हैं, जिनके पास इतनी दौलत है जितनी इस धरती पर मौजूद आबादी के आधे सबसे गरीब लोगों के पास भी नहीं है. दुनिया भर में विकास और खुशहाली के दावे सिर्फ कुछ लोगों को अमीर बनाने के लिए हैं. 62 लोग जो एक बड़ी बस में समा सकते हैं, के पास इतनी दौलत है जितनी दुनिया के साढ़े तीन अरब लोगों के पास कुल मिलाकर भी नहीं है. यह आंकड़े अंतरराष्ट्रीय एनजीओ ऑक्सफैम के हैं जो हर साल जनवरी के महीने में दुनिया में गरीबों की हालत को आंकड़ों के जरिए दिखाती है.

औक्सफैम 90 देशों में काम कर रही 17 संस्थाओं का एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका मकसद गरीबी, भुखमरी और अन्याय से लड़ना है. औक्सफैम के मुताबिक दुनिया का हर तीसरा आदमी भारी गरीबी में जी रहा है और औक्सफैम की कोशिश लोगों की सामूहिक शक्ति को जुटाकर गरीबी, भुखमरी के खिलाफ मुहिम छेड़ना है. इस सिलसिले में स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीतियों को प्रभावित करना है ताकि हर गरीब को उसका वाजिब हक मिल सके.

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औक्सफैम के आंकड़ों के मुताबिक आर्थिक गैर बराबरी पिछले कुछ सालों में बड़ी ही तेजी से बढ़ी है. सन् 2010 से लेकर 2015 के बीच दुनिया के आधे सबसे गरीब लोगों यानी 3.6 अरब लोगों की कुल सम्पत्ति में 41 फीसदी की गिरावट आयी है, यानी एक ट्रिलियन अमेरिकी डौलर. जबकि इसी दौर में दुनिया के 62 सबसे अमीर लोगों की दौलत 500 अरब डौलर से बढ़कर 1.76 ट्रिलियन अमेरिकी डौलर हो गयी है यानी करीब 250% ज्यादा. बीते बारह महीनों में दुनिया के सबसे अमीर और सबसे गरीब लोगों के बीच यह आर्थिक खाई सबसे ज्यादा बढ़ी है. ऐसी दुनिया में जहां हर नौ में से एक आदमी को रात में भूखा ही सोना पड़ता है वहां अमीरों को समृद्धि का इतना बड़ा हिस्सा नहीं दिया जा सकता.

2011 में दुनिया के 388 सबसे अमीर लोगों के पास आधी गरीब दुनिया के बराबर दौलत थी, जो 2012 में ये 177 अमीरों के पास सिमट गयी. 2014 में यह 80 लोगों के पास रह गयी और 2015 में 62 सबसे अमीर लोगों के पास. इन अमीरों में ज्यादा अमीर पुरुष ही हैं. महिलाएं बहुत कम हैं. 62 सबसे अमीर लोगों में से सिर्फ नौ महिलाएं शामिल हैं. महिलाओं का राजनीति में प्रतिनिधित्व कम होने की वजह से वे इस असमानता के खिलाफ ज्यादा कुछ कर भी नहीं पाती हैं.

पीकिंग विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार चीन में भी यही हाल है. वहां भी गरीब गरीब हो रहे हैं और अमीर सिर्फ अमीर. इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीस साल में चीन में आर्थिक असामनता काफी बढ़ी है. हैरानी की बात है कि इन्हीं तीस सालों में चीन ने काफी तेजी से तरक्की भी की है. इन तीस सालों के ज्यादातर हिस्से में जीडीपी की दर डबल डिजिट में रही है, तब यह हाल है. यही नहीं असमानता बढ़ने की दर भी पहले से तेज हो गयी है यानी गरीब और गरीब ही नहीं हो रहे बल्कि और तेजी से गरीब होते जा रहे हैं. चीन में एक प्रतिशत लोगों के पास पूरे मुल्क की एक तिहाई सम्पत्ति है.

दुनिया के गरीब देशों की हालत तो और भी खराब है. अनुमान है कि अफ्रीका के देशों की 30 फीसदी सम्पत्ति विदेशों में टैक्स हैवन्स में जमा की गयी है. यह पैसा दुनिया के सबसे गरीब लोगों का है. इससे अफ्रीकी देशों की सरकारों को टैक्स राजस्व में 14 अरब डॉलर के नुकसान का अनुमान है, जो इतने बच्चों और उनकी मांओं की सेहत की देखभाल के लिए इस्तेमाल हो सकता है जिससे हर साल 40 लाख बच्चों की जान बचायी जा सके. यही नहीं यह इतना पैसा है कि हर अफ्रीकी छात्र को स्कूल भेजा जा सके. अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस (दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति) की आय में 112 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वृद्धि दर्ज की गयी, जबकि इसका मात्र 1 प्रतिशत हिस्सा इथियोपिया की सम्पूर्ण आबादी यानी 115 मिलियन लोगों के स्वास्थ्य बजट के बराबर है. औक्सफैम के मुताबिक दुनिया के अमीर लोगों ने 7.6 ट्रिलियन डौलर सम्पत्ति दूसरे टैक्स हैवन्स देशों में छुपा रखी है. अगर इस सम्पत्ति से होने वाली आय पर टैक्स लगता तो दुनिया की सरकारों को 190 अरब डौलर हर साल मिल सकते थे.

औक्सफैम की रिपोर्ट की मुख्य बातें

  • भारत में रहने वाले 13.6 करोड़ लोग साल 2004 से कर्जदार बने हुए हैं. यह देश की सबसे गरीब 10 प्रतिशत आबादी है.
  • भारतीय अरबपतियों की सम्पत्ति में 2018 में प्रतिदिन 2,200 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है. इस दौरान, देश के शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों की सम्पत्ति में 39 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि 50 प्रतिशत गरीब आबादी की सम्पत्ति में महज तीन प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.
  • पिछले साल देश में 18 नये अरबपति बने. इसी के साथ अरबपतियों की संख्या बढ़कर 119 हो गयी है.
  • 2018 से 2022 के बीच भारत में रोजाना 70 नये करोड़पति बनेंगे.
  • सरकार स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसी सार्वजनिक सेवाओं का कम वित्तपोषण करके असमानता को बढ़ा रही है. वह कम्पनियों पर और अमीरों पर कम कर लगा रही है और कर चोरी को रोकने में नाकाम रही है.
  • चिकित्सा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और जल आपूर्ति के मद में केन्द्र और राज्य सरकारों का संयुक्त राजस्व और पूंजीगत खर्च 2,08,166 करोड़ रुपये है, जो कि देश के सबसे अमीर शख्स मुकेश अंबानी की कुल सम्पत्ति 2.8 लाख करोड़ रुपये से कम है.
  • औक्सफैम इंटरनेशनल की कार्यकारी निदेशक विनी ब्यानिमा का कहना है कि यह ‘नैतिक रूप से क्रूर’ है कि भारत में जहां गरीब दो वक्त की रोटी और बच्चों की दवाओं के लिए जूझ रहे हैं, वहीं कुछ अमीरों की सम्पत्ति लगातार बढ़ती जा रही है. यदि एक प्रतिशत अमीरों और देश के अन्य लोगों की सम्पत्ति में यह अंतर बढ़ता गया तो भारत की सामाजिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी.
  • आर्थिक असमानता से सबसे ज्यादा महिलाएं प्रभावित हो रही हैं.

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डेटिंग को बनाना चाहते हैं यादगार तो पढ़ें ये खबर

प्यार दीवाना होता है मस्ताना होता है .जी हां ये लाइन तो हर किसी ने सुनी होंगी. लेकिन यह  महज चंद पंक्ति नहीं है ये जीवन की सच्चाई है.अपने जीवन में हर किसी को एक न एक बार प्यार होता है. हमारा दिल किसी एक के लिये जरूर धड़कता  है. प्यार शब्द जुबान पर आते ही हर किसी को अपनी पहली डेट याद आती है.अपनी वो पहली खूबसूरत मुलाकात जब हम अपने पार्टनर  से पहली बार मिले थे .

बचपन के खेल कूद को छोड़ जब हम किशोर अवस्था मे आते हैं  तो हमारी बौडी मे हार्मोनल बदलाव भी आते है. जहां  हमारा दिल भी अपने से अपोजिट सेक्स की तरफ आकर्षित होता है. तभी शुरू होता है प्यार का सिलसिला. हमारा दिल किसी न किसी के लिये धड़कने लगता है और कहता है ‘बस  तुम साथ हो तो जिंदगी की हर खुशी साथ है’ ऐसे में उसे डेट पर लेकर जाना बेहद रोमांटिक होता है. डेटिंग ऐसा नहीं है कि युवा अवस्था में ही की जा सकती है. प्रौढावस्था में भी व्यक्ति अपनी शादी शुदा पार्टनर के साथ भी रोमांटिक डेट पर जा सकता है. किसी न सही कहा  है कि ‘दिल तो बच्चा है जी ‘.

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जानिये कुछ ऐसे बेहतरीन टिप्स जो बना देंगे नार्मल डेट को  भी खास-

बहुत जरूरी है एक दूसरे को जानना

सबसे पहले जरूरी है कि जानें  आपके पार्टनर की पसंद  और नापसंद क्या है ,क्योंकी अगर आपको उसके पसंद के बारे में नहीं पता होगा और आप बिलकुल उसकी पसंद से उल्टा काम करेंगे तो आपकी डेट खराब हो सकती है एक दूसरे कि हौबीज को जानना है बेहद जरूरी .

जब आप डेट पर जाये तो इधर उधर कि बात करने की बजाय एक दूसरे के बारे में ही बात करें क्योंकि डेटिंग का मतलब ही एक दूसरे का साथ है न कि फ़िजूल कि बातों  का .

जगह जो मन को लुभाये

डेटिंग के लिये जगह ऐसी पसंद करें जो आप दोनों को पसंद हो. कोई शोर शराबा न हो और न ही बीच में  कोई डिस्टर्बेंस हो .

या फिर किसी अच्छे से होटल में पहले से टेबल बुक करवा कर उसे अपने पार्टनर की पसंद के अकौर्डिंग डेकोरेट करवा कर डिनर पर ले जा सकते है.

स्पेशल दिन पर करें डेटिंग

कोई ऐसा दिन चुने जो आपके लिये ख़ास हो या कोई त्यौहार हो, इससे बाद मे भी उस दिन को हमेशा याद रखेंगे और अपनी खूबसूरत डेट को हर साल साथ में  सेलिब्रेट भी कर सकेंगे .

ड्रेस अप

लड़कियां अपनी  ड्रेस ऐसी पहने जो कम्फ़र्टेबल हो क्योंकी अगर आप अपने पहनावे से ही परेशान रहेंगी, तो आप अपने पार्टनर कि बातों पर ध्यान नहीं दे सकेंगी और बहुत ज्यादा मेकअप न करें और न ही तड़क भड़क वाली ड्रेस पहने. लड़के लेटेस्ट ट्रेंडिंग ड्रेस पहनें.

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बजट का रखे ध्यान

ऐसा नहीं है कि महंगे होटल मे खाना खाने  से डेट अच्छी हो जाएगी. अगर आप अपने पार्टनर से सच में प्यार करते हैं तो अपनी खूबसूरत बातों से भी अपने डेट को यादगार बना सकते हैं. जिसे आपकी पार्टनर कभी भूल नहीं पाएंगे. क्योंकी अपने बजट से ज्यादा खर्च करेंगे तो आपका ध्यान अपने पार्टनर पर नहीं पौकेट पर ही रहेगा .

दें  कोई तोहफा

आप चाहें तो अपनी डेट पर अपने पार्टनर  को एक प्यारी सी और उसकी पसंदीदा रंग की ड्रेस गिफ्ट करें और खुद के लिए भी उसी रंग की ड्रेस खरीदें. या  कोई और तोहफा एक दूसरे को दें. इससे आप जब भी वो तोहफा देखेंगे आपको अपनी पहली मुलाकात याद आएगी और आपके होठों पर एक प्यारी सी मुस्कान लाएगी. जो आपके रिश्ते में मजबूती लाएगी .

बात ऐसी करें जो सीधे दिल में उतर जाये

डेट पर आप मस्ती मजाक तो करें पर अपने दिल की बात थोड़ा सिरियस होकर कहें. अपने पार्टनर का हाथ अपने हाथों में लें और अपनी फीलिंग्स उसे जाहिर कर दे.  कहते हैं  दिल से निकली बात अक्सर दिल तक जरूर पहुंच जाती है तो कोशिश करे कि आप ज्यादा घुमा फिरा कर बात न करें  और उनकी आंखों मे आंखें डाल  कर उनसे हाल ए दिल बयान कर दें.

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पूजापाठ नहीं मेहनत से पैसे कमाए

ऐसी बेवकूफी करने वाला वही अकेला नहीं होता है, बल्कि उस फिल्म के और भी कई दूसरे नौजवान छात्र किरदार ऐसा ही करते नजर आते हैं. कोई गाय को चारा देता है, ताकि इम्तिहान नतीजों में बेचारा साबित न हो जाए तो कोई सांप के आगे दूध का कटोरा रखता है, ताकि फेल के बाद इंजीनियर बनाने के बजाय दूध बेचने के लिए तबेला न खोलना पड़ जाए.

वह तो खैर फिल्म थी लेकिन असल जिंदगी में भी आप को बहुत से ऐसे लोग मिल जाएंगे जो अपनी कड़ी मेहनत से ज्यादा पूजापाठ के भरोसे पैसा बनाने की सोच रखते हैं. इस में नई पीढ़ी भी काफी तादाद में शामिल दिखाई देती है. जिस का नतीजा कभीकभार तो इतना खतरनाक हो जाता है जो किसी की जान पर जा कर खत्म होता है.

साल 2017 की बात है. छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले में एक पिता ने जल्द से जल्द अमीर बनने के चक्कर में अपनी 4 साल की मासूम बेटी की बलि दे दी थी.

हत्या की यह वारदात बलौदा बाजार जिले के तिल्दा इलाके की थी जहां आरोपी दीपचंद ने रातोंरात अमीर बनने के लालच में एक तांत्रिक की बातों में आ कर अपनी बेटी लक्ष्मी की बलि चढ़ा दी थी.

पुलिस हिरासत में दीपचंद ने बताया कि उसे गांव के ही एक तांत्रिक ने अमीर बनने के लिए तंत्रमंत्र करने की सलाह दी थी. दीपचंद ने उस के कहने के मुताबिक ही अपनी बेटी का गला घोंट कर उसे मौत के घाट उतार दिया था. हत्या के बाद वह भगवान के सामने खड़े हो कर मंत्र जाप करने लगा था.

इस तरह किसी अपने की बलि दे कर जल्दी पैसा बनाने की यह हद ही मानी जाएगी, लेकिन हमारे देश की बहुत सारी आबादी अभी भी अपनी मेहनत के बजाय पूजापाठ के भरोसे ही पैसा बनाने की जुगत भिड़ाती रहती है और अपनी तमाम जिंदगी नकारा गुजार देती है, जिस का फायदा पंडेपुजारी और मुल्लामौलवी उठाते हैं.

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हिंदू धर्म में तो पैसे को लक्ष्मी का रूप कह दिया गया है और दिलचस्प बात तो यह है कि वह आप से रूठ भी सकती है. लक्ष्मी के रूठने का यही डर लोगों को भाग्यवादी बनाता है और वे मेहनत से ज्यादा पूजापाठ पर यकीन करने लगते हैं.

पंडेपुजारी इसी बात की ताक में रहते हैं. वे मंदिर में आए ऐसे लोगों को समझाते हैं कि जब तक भाग्य बलवान नहीं होगा तब तक हाथ आया पैसा भी किसी काम नहीं आएगा या काम में बरकत तभी होगी जब इस लक्ष्मी को रूठने से बचा लोगे.

ऐसे ठग लोगों का नैटवर्क इतना बड़ा हो गया है कि वे अब घरमहल्ले से ऊपर उठ कर सोशल साइट्स बना कर लोगों को ठगने के लिए तकनीक का भी सहारा लेने लगे हैं. वे बड़े ही शातिराना ढंग से लोगों की भावनाओं से खेलते हैं, उन्हें चमत्कारी यंत्र और दूसरे सामान का गुणगान कर के इस तरह गुमराह करते हैं कि सामने वाले को लगता है कि अगर उस के पास वही चमत्कारी चीज आ जाएगी तो उस की गरीबी छूमंतर हो जाएगी.

इस चक्कर में वह नासमझ अपनी जेब की गाढ़ी कमाई भी उन को सौंप देता है, जबकि उस की गरीबी में रत्तीभर भी फर्क नहीं आता है.

यह सब शुरू होता है घरघर, महल्लेमहल्ले, गांवगांव, शहरशहर में बने धार्मिक स्थलों से, जहां पहले से ही घर के बड़े लोग नई पीढ़ी के मन में बैठा देते हैं कि कर्म से बड़ा भाग्य होता है और अगर आप का भाग्य अच्छा है तो पैसा बिना मेहनत किए ही छप्पर फाड़ कर बरसता है.

‘अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सब के दाता राम’ जैसी बातों ने ही लोगों को भटकाया है जबकि ऐसा होता तो सीता को बचाने के लिए खुद राम को इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती.

अगर दुनिया के किसी भी अमीर देश को देखेंगे तो पता चलेगा कि वहां के लोगों ने अपनी कड़ी मेहनत से उसे इतना आगे बढ़ाया है.

अमेरिका द्वारा जापान के 2 शहरों पर परमाणु बम के हमले के बाद वह देश काफी पीछे चला गया था, पर वहां के लोगों ने हिम्मत नहीं हारी और ऊपर वाले के बजाय अपने हाथों, पढ़ाईलिखाई, नई तकनीक और कड़ी मेहनत पर भरोसा कर के जापान को दोबारा अमीर देशों में शुमार कर दिया. अगर वे उन हमलों को ऊपर वाले का कहर मान कर उस के चमत्कार के भरोसे बैठे रहते तो आज भी पिछड़े रहते.

दूर क्यों जाते हैं. आजादी के बाद पंजाब ने तरक्की में बाजी मार ली थी, जबकि भारत के हर राज्य के पास ऐसा करने का मौका था. इस की एक बड़ी वजह यह थी कि बंटवारे के बाद वहां सब से पहले तो सोशल सिस्टम टूट गया था. लोग दीनधर्म के चक्कर में न पड़ कर मेहनत पर ज्यादा ध्यान देने लगे थे. उन्हें यह भी साबित करना था कि भारत को मिली यह आजादी कोई खैरात नहीं है बल्कि उन की मेहनत का नतीजा है. इस बात को उन्होंने अपने खेतों में पसीना बहा कर सच भी कर दिखाया था. और जो काम करता है उस के पास पूजापाठ करने का समय ही नहीं होता है.

इस बात को हमेशा ध्यान में रखें कि मेहनत से बड़ा कोई ऊपर वाला नहीं है. जो इनसान इस बात को जितना जल्दी समझ लेता है, वह हर पल का सही इस्तेमाल कर के समय को ही पैसे में तबदील करने की कला जान जाता है.

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