धीरे धीरे ही सही पर भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र सरकार की तानाशाही के खिलाफ अब नेताओं में विरोध के स्वर उभरने लगे है. विरोधी नेताओं की मुश्किल यह है कि इनको मीडिया या दूसरे प्रचारतंत्र से सहयोग नहीं मिलता. विरोधी नेताओं के भाजपा पर आरोप से अधिक जगह भाजपा नेताओं की सफाई और आरोप प्रत्यारोप को दे दिया जाता है. विरोधी दलों के पास अपना खुद का भी मजबूत संगठन नहीं है जिसके जरीये यह अपनी बात को जनता तक पहुंचा सके.

सोशल मीडिया पर अभी भी विरोधी नेताओं को उनके बयानों को लेकर तोड़ मरोड़ कर ‘ट्रोल’ करने वाली हालत बनी हुई है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा के खिलाफ आवाज उठाई हैं. परेशानी की बात यह है कि अखिलेश यादव को लगता है कि जब प्रदेशवासी भाजपा से नाराज होकर वोट करेगे तो सपा की वैसे ही सरकार बन जायेगी. ऐसे में वह अपने संगठन पर ध्यान नहीं दे रहे. इस बात को लेकर बसपा नेता मायावती भी अखिलेश को सीख दे चुकी हैं.

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अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनाव के बाद कहा कि भाजपा के लोग ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग की मदद से भय का महौल बनाकर लोकतंत्र चलाना चाहते है. देश की संस्थाओं को नियंत्रित करना कोई भाजपा से सीख सकता है. भाजपा भय और नफरत फैलाकर देश को चलाना चाहती है. चुनाव को जीतने के लिये आपस में नफरत पैदा की. केन्द्र और प्रदेश सरकार दोनो ही भ्रष्टाचार, विकास, कानून व्यवस्था के मसले पर पूरी तरह से फेल हो चुकी है. अपराध की हालत इतनी बिगड गई है कि उत्तर प्रदेश हत्या प्रदेश बन गया है. बुलंन्दशहर हिंसा में इंसपेक्टर की जान लेने वालो की जमानत होने पर स्वागत और सम्मान किया जाता है. एटा में पति को मुठभेड में मारने का डर दिखाकर  महिला से बलात्कार किया गया.

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