भारत में अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई बीते पांच सालों में और ज्यादा गहरी हो गयी है. आज देश की आधी सम्पत्ति देश के नौ अमीरों की तिजोरियों में बंद है और दूसरी ओर गरीब की थाली में मुट्ठी भर चावल भी बमुश्किल दिखायी देता है. यह गम्भीर चिन्ता का विषय है. केन्द्र सरकार की गलत नीतियों के कारण देश एक बड़े संकट से गुजर रहा है. गरीब और ज्यादा गरीब होता जा रहा है और अमीर तेजी से अमीर हो रहा है. यह आर्थिक विषमता अब चिन्ताजनक स्थिति तक बढ़ गयी है और गणतंत्र का स्थान अमीरतंत्र ने ले लिया है. अशिक्षा, बेरोजगारी और बढ़ती मंहगाई ने गरीब की कमर तोड़ दी है. दिल्ली के रमेशनगर इलाके में जलेबी का ठेला लगाने वाले रामभजन हलवाई की दस साल पहले अपनी एक छोटी मिठाई की दुकान हुआ करती थी, मगर इन दस सालों में मंहगाई ने उन्हें दुकान बेच कर ठेला लगाने के लिए मजबूर कर दिया. डिप्लोमा करने के बाद भी दोनों बेटों के पास नौकरी नहीं है. बड़ा बेटा किराये का ई-रिक्शा चला कर अपने परिवार को किसी तरह पाल रहा है. वहीं दोनों बेटियों की शादियों में रामभजन की सारी जमा-पूंजी खर्च हो गयी और दुकान भी बिक गयी. अब जीवन के आखिरी पड़ाव पर दो जून की रोटी के लिए रामभजन ठेला लगाने के लिए मजबूर हैं. रामभजन ही नहीं, इनके जैसे लाखों गरीब हैं, जिनके पास कभी अपना घर, अपनी कृषि भूमि, अपना कुआं, अपना पशुधन, अपनी दुकान हुआ करती थीं, मगर आज वे भुखमरी की कगार पर हैं. उनके बच्चों को खाने के लाले पड़े हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य की कौन कहे.

देश के हजारों किसानों की जमीनें कर्जे पाटने में बिक चुकी हैं. हजारों किसानी छोड़कर दूसरे शहरों में दिहाड़ी मजदूर बन चुके हैं. महानगरों में जाड़ा, गर्मी, बरसात रिक्शा खींच रहे हैं, अमीरों की गाड़ियां साफ कर रहे हैं या सड़क किनारे बने ढाबों में बरतन मांज रहे हैं, ताकि घर पर कुछ पैसा भेज सकें. दिल्ली में ही सुबह के वक्त जगह-जगह चौराहों पर जमा गरीबों की भीड़ को देखिए, जो सामने से गुजरने वाली हर मोटरगाड़ी को इस लालसा से ताकते हैं कि अभी यह उनके पास रुकेगी और ढाई सौ रुपये दिहाड़ी पर दिन भर के काम के वास्ते उन्हें ले जाएगी. इस भीड़ को हर दिन काम भी नहीं मिलता, कुछ ही खुशनसीब होते हैं जो दिहाड़ी पर ले जाए जाते हैं, बाकि दिन भर काम की बाट जोहते शाम को खाली हाथ ही लौटते हैं. इन मजदूरों से बात करें तो पता चलता है कि कभी इनके बाप-दादा के पास अच्छी-खासी खेती की जमीनें थीं, दुधारू पशु भी थे, गांव में घर-परिवार खुशहाल था, मगर सरकारी नीतियों, मंहगाई और कर्जे ने धीरे-धीरे सब कुछ छीन लिया. भारत एक ओर जहां दुनिया के तीसरे सबसे ज्यादा अरबपति धन कुबेरों का देश बन चुका है, वहीं इसके अंदर दुनिया की गरीब और भूखी आबादी का एक तिहाई हिस्सा निवास करता है.

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दिल्ली के कालकाजी मार्केट के पीछे एक किनारे झुग्गियों की लम्बी कतार है. यह तमिल बस्ती कहलाती है, जहां दरबेनुमा कोठरियों में गरीब तमिल परिवार अपने बच्चों सहित कीड़े-मकोड़ों सी जिन्दगी जी रहे हैं. तमिल बस्ती की औरतें इलाके की कोठियों में झाड़ू-बरतन का काम करती हैं, तो पुरुष ठेला लगाते हैं या रिक्शा खींचते हैं. अपनी जमीन से उजड़ कर यहां बसने को मजबूर इन लोगों के सामने भाषा का बड़ा संकट है. पीने का पानी, शौचालय, स्नान, जलावन, दवाई, अनाज, कपड़े के लिए इनकी औरतें दिन भर जूझती हैं और कमरतोड़ मेहनत करके दिन में सौ-दो सौ रुपये से ज्यादा नहीं कमा पाती. किसी कोठी से कुछ खाने का सामान मिल जाए तो उनके बच्चों के लिए उस दिन जैसे पार्टी हो जाती है.

इन गरीबों की खस्ताहाली देखिए और फिर नजर डालिये मुंबई में देश के सबसे बड़े उद्योगपति मुकेश अंबानी की गगनचुम्बी रिहाइश पर. बीते साल अंबानी की बेटी ईशा की शादी में औन द रिकौर्ड 723 करोड़ रुपये खर्च किये गये हैं, औफ द रिकौर्ड यह रकम इससे कई गुना ज्यादा है. इतनी बड़ी रकम में एक गरीब की सात पुश्तें पल जाएं. देश के नागरिकों के बीच यह आर्थिक असमानता आज अपने विकराल रूप में है. देश में जहां एक ओर गगनचुंबी अट्टालिकाएं, बंगले, महल, विला, मल्टीप्लेक्स और बड़े-बड़े शोरूम हैं, वहीं दूसरी ओर झुग्गी-झोंपड़ियां, घास-फूस के कुटीर, खपरैल और कच्चे और अधकच्चे मकान, सड़कों के किनारे और फ्लाईओवरों के नीचे रहते लोग दिखायी देते हैं, जो देश की वास्तविक तस्वीर पेश करते हैं. हाल में आयी औक्सफैम की रिपोर्ट हर संवेदनशील इन्सान को बेचैन कर देने वाली है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के अरबपतियों की सम्पत्ति में पिछले वर्ष हर दिन 2200 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है. टॉप एक प्रतिशत अमीरों की सम्पत्ति में 39 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी हुई है, जबकि कम से कम पैसे वालों की 50 फीसदी आबादी की सम्पत्ति केवल 3 फीसदी बढ़ी है. देश के 9 अरबपतियों की कुल सम्पदा नीचे की 50 फीसदी जनसंख्या की सम्पदा के बराबर है और देश की करीब 60 फीसदी जनसंख्या के पास राष्ट्रीय सम्पदा का महज 4.8 फीसदी हिस्सा ही है. रिपोर्ट के अनुसार चिकित्सा, जनस्वास्थ्य, स्वच्छता और जलापूर्ति जैसे जनोपयोगी कार्य पर केन्द्र और राज्य सरकारों का कुल मिलाकर पूंजी व्यय 2,08,116 करोड़ रुपये है, जबकि इससे ज्यादा 2.8 लाख करोड़ रुपये की सम्पदा तो देश के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अम्बानी के ही पास है. पिछले वर्ष भारत में अरबपति क्लब में 18 नये लोग शामिल हुए हैं. डॉलर के लिहाज से अब देश में 119 अरबपति हैं, जिनकी कुल सम्पदा 440 अरब डौलर या 30 लाख करोड़ रुपये के आसपास है. वर्ष 2017 में इन अरबपतियों के पास 325.5 अरब डौलर थे. मुकेश अम्बानी और अन्य अरबपतियों की दौलत में इजाफा सोचने को विवश कर देता है.

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90 के दशक में जब देश में आर्थिक सुधार शुुरू हुए थे तो पूरी आबादी का एक छोटा सा हिस्सा तेजी से समृद्ध होने लगा था. ऐसा नहीं था कि बाकी लोगों को उसका फायदा नहीं मिल रहा था. करोड़ों लोग गरीबी रेखा से ऊपर चले गये, लेकिन अमीर-गरीब का फासला तेजी से बढ़ता ही गया. अब स्थिति यह है कि भारत आर्थिक असमानता के मामले में दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है. असमानता का इंडेक्स 1990 में जहां 45.18 था, वहीं यह बढ़कर 60 फीसदी होने को है. ऐसा नहीं है कि अन्य के पास धन नहीं आया, लेकिन वह उस अनुपात में नहीं आया, जो ऊपर के वर्ग में था. अमीर और अमीर होते गये जबकि गरीब वहीं खड़े रह गये या उससे भी नीचे चले गये. दुनिया में ऐसी असमानता कहीं और देखने को नहीं मिलती. नयी कापोर्रेट संस्कृति ने आर्थिक विषमता को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. देश की बड़ी आईटी कम्पनियों के सीईओ का वेतन उसी कंपनियों के एक औसत कर्मी से 400 गुना ज्यादा है. दौलत के थोड़े से लोगों के हाथों में सिमट जाने का असर देश की राजनीति पर भी पड़ा है क्योंकि पैसे के दम पर अरबपतियों ने राजनेताओं को अपना गुलाम बना लिया है और इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से देश की राजनीति और सरकार आज उद्योगपति चला रहे हैं. इन उद्योगपतियों को गरीबों के उद्धार से, उनकी समृद्धि से, उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार से कोई मतलब नहीं है. गरीब उनके लिए सस्ते मजदूर भर बने रहें, इसी में इन उद्योगपतियों की समृद्धि निहित है.

औक्सफैम  की सीईओ निशा अग्रवाल का कहना है कि यह अत्यंत चिंता का विषय है कि  देश की अर्थव्यवस्था में हुई वृद्धि का फायदा मात्र कुछ लोगों के हाथों के सिमटता जा रहा है. अरबपतियों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोत्तरी फलती-फूलती अर्थव्यवस्था की नहीं, बल्कि एक विफल अर्थव्यवस्था की निशानी है. जो मेहनत कर रहे हैं, देश के लिए भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं, मकानों व इमारतों का निर्माण कर रहे हैं, कारखानों में काम कर रहे हैं, वे अपने बच्चों को पालने के लिए, उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए, भोजन व दवाओं को खरीदने के लिए बेतरह संघर्ष कर रहे हैं. यह बढ़ती खाई, लोकतंत्र को खोखला कर रही है और भ्रष्टाचार, अपराध, अराजकता, हिंसा, उग्रता और पक्षपात को बढ़ा रही है.

गैर बराबरी की जब भी बात होती है तो यही सामने आता है कि किस तरह राजनीतिक ताकत अमीरों और रसूखदारों के हाथ की कठपुतली बन जाती है. रिजर्व बैंक औफ इंडिया के गवर्नर रघुराम राजन कहते हैं, ‘अमीर, ऊंचे रसूखदार और बड़ी पहुंच रखने वाले लोग गलत काम करने पर भी बच जाते हैं. भारत एक कमजोर देश है. हम प्रशासनिक तौर पर गलत काम रोकने की क्षमता नहीं रखते बल्कि यह भी कि हम गलत करने वाले को सजा भी नहीं देते, जब तक कि वह कमजोर और छोटा न हो. अगर हमें लगातार विकास करते रहना है तो इस संस्कृति को खत्म करना होगा.’ रघुराम राजन ने स्पष्टतौर पर यह कहा कि प्रशासनिक ताकतें कभी अमीरों के गलत कामों को रोकने का काम नहीं करतीं, बल्कि वह छोटे और कमजोर पर ही कार्रवाई का चाबुक चलाती है. रघुराम राजन की यह बात इसलिए भी अहम हो जाती है क्योंकि बैंकों के सामने बड़े-बड़े डिफौल्टर्स हैं जिनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी. उनसे नियमों का पालन करवाने में प्रशासन हमेशा नाकाम रहा. मोदी-माल्या जैसे रसूखदार देश का करोड़ों रुपया लेकर विदेश भाग गये. उन्हें निकल भागने के मौके उनके राजनीतिक आकाओं ने दिये, जबकि देश के छोटे कर्जदारों के साथ कड़ा सलूक हुआ. कितने किसानों ने ऋण न चुका पाने के डर से आत्महत्याएं कर लीं और लगातार कर रहे हैं.

दुनिया भर में बढ़ रही है आर्थिक असमानता

अमीर-गरीब के बीच की खाई सिर्फ भारत में ही नहीं गहरी हो रही है, बल्कि आर्थिक असमानता का दैत्य पूरे विश्व को निगलता जा रहा है. दुनिया में 62 ऐसे लोग हैं, जिनके पास इतनी दौलत है जितनी इस धरती पर मौजूद आबादी के आधे सबसे गरीब लोगों के पास भी नहीं है. दुनिया भर में विकास और खुशहाली के दावे सिर्फ कुछ लोगों को अमीर बनाने के लिए हैं. 62 लोग जो एक बड़ी बस में समा सकते हैं, के पास इतनी दौलत है जितनी दुनिया के साढ़े तीन अरब लोगों के पास कुल मिलाकर भी नहीं है. यह आंकड़े अंतरराष्ट्रीय एनजीओ ऑक्सफैम के हैं जो हर साल जनवरी के महीने में दुनिया में गरीबों की हालत को आंकड़ों के जरिए दिखाती है.

औक्सफैम 90 देशों में काम कर रही 17 संस्थाओं का एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसका मकसद गरीबी, भुखमरी और अन्याय से लड़ना है. औक्सफैम के मुताबिक दुनिया का हर तीसरा आदमी भारी गरीबी में जी रहा है और औक्सफैम की कोशिश लोगों की सामूहिक शक्ति को जुटाकर गरीबी, भुखमरी के खिलाफ मुहिम छेड़ना है. इस सिलसिले में स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीतियों को प्रभावित करना है ताकि हर गरीब को उसका वाजिब हक मिल सके.

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औक्सफैम के आंकड़ों के मुताबिक आर्थिक गैर बराबरी पिछले कुछ सालों में बड़ी ही तेजी से बढ़ी है. सन् 2010 से लेकर 2015 के बीच दुनिया के आधे सबसे गरीब लोगों यानी 3.6 अरब लोगों की कुल सम्पत्ति में 41 फीसदी की गिरावट आयी है, यानी एक ट्रिलियन अमेरिकी डौलर. जबकि इसी दौर में दुनिया के 62 सबसे अमीर लोगों की दौलत 500 अरब डौलर से बढ़कर 1.76 ट्रिलियन अमेरिकी डौलर हो गयी है यानी करीब 250% ज्यादा. बीते बारह महीनों में दुनिया के सबसे अमीर और सबसे गरीब लोगों के बीच यह आर्थिक खाई सबसे ज्यादा बढ़ी है. ऐसी दुनिया में जहां हर नौ में से एक आदमी को रात में भूखा ही सोना पड़ता है वहां अमीरों को समृद्धि का इतना बड़ा हिस्सा नहीं दिया जा सकता.

2011 में दुनिया के 388 सबसे अमीर लोगों के पास आधी गरीब दुनिया के बराबर दौलत थी, जो 2012 में ये 177 अमीरों के पास सिमट गयी. 2014 में यह 80 लोगों के पास रह गयी और 2015 में 62 सबसे अमीर लोगों के पास. इन अमीरों में ज्यादा अमीर पुरुष ही हैं. महिलाएं बहुत कम हैं. 62 सबसे अमीर लोगों में से सिर्फ नौ महिलाएं शामिल हैं. महिलाओं का राजनीति में प्रतिनिधित्व कम होने की वजह से वे इस असमानता के खिलाफ ज्यादा कुछ कर भी नहीं पाती हैं.

पीकिंग विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार चीन में भी यही हाल है. वहां भी गरीब गरीब हो रहे हैं और अमीर सिर्फ अमीर. इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीस साल में चीन में आर्थिक असामनता काफी बढ़ी है. हैरानी की बात है कि इन्हीं तीस सालों में चीन ने काफी तेजी से तरक्की भी की है. इन तीस सालों के ज्यादातर हिस्से में जीडीपी की दर डबल डिजिट में रही है, तब यह हाल है. यही नहीं असमानता बढ़ने की दर भी पहले से तेज हो गयी है यानी गरीब और गरीब ही नहीं हो रहे बल्कि और तेजी से गरीब होते जा रहे हैं. चीन में एक प्रतिशत लोगों के पास पूरे मुल्क की एक तिहाई सम्पत्ति है.

दुनिया के गरीब देशों की हालत तो और भी खराब है. अनुमान है कि अफ्रीका के देशों की 30 फीसदी सम्पत्ति विदेशों में टैक्स हैवन्स में जमा की गयी है. यह पैसा दुनिया के सबसे गरीब लोगों का है. इससे अफ्रीकी देशों की सरकारों को टैक्स राजस्व में 14 अरब डॉलर के नुकसान का अनुमान है, जो इतने बच्चों और उनकी मांओं की सेहत की देखभाल के लिए इस्तेमाल हो सकता है जिससे हर साल 40 लाख बच्चों की जान बचायी जा सके. यही नहीं यह इतना पैसा है कि हर अफ्रीकी छात्र को स्कूल भेजा जा सके. अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस (दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति) की आय में 112 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वृद्धि दर्ज की गयी, जबकि इसका मात्र 1 प्रतिशत हिस्सा इथियोपिया की सम्पूर्ण आबादी यानी 115 मिलियन लोगों के स्वास्थ्य बजट के बराबर है. औक्सफैम के मुताबिक दुनिया के अमीर लोगों ने 7.6 ट्रिलियन डौलर सम्पत्ति दूसरे टैक्स हैवन्स देशों में छुपा रखी है. अगर इस सम्पत्ति से होने वाली आय पर टैक्स लगता तो दुनिया की सरकारों को 190 अरब डौलर हर साल मिल सकते थे.

औक्सफैम की रिपोर्ट की मुख्य बातें

  • भारत में रहने वाले 13.6 करोड़ लोग साल 2004 से कर्जदार बने हुए हैं. यह देश की सबसे गरीब 10 प्रतिशत आबादी है.
  • भारतीय अरबपतियों की सम्पत्ति में 2018 में प्रतिदिन 2,200 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है. इस दौरान, देश के शीर्ष एक प्रतिशत अमीरों की सम्पत्ति में 39 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि 50 प्रतिशत गरीब आबादी की सम्पत्ति में महज तीन प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.
  • पिछले साल देश में 18 नये अरबपति बने. इसी के साथ अरबपतियों की संख्या बढ़कर 119 हो गयी है.
  • 2018 से 2022 के बीच भारत में रोजाना 70 नये करोड़पति बनेंगे.
  • सरकार स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसी सार्वजनिक सेवाओं का कम वित्तपोषण करके असमानता को बढ़ा रही है. वह कम्पनियों पर और अमीरों पर कम कर लगा रही है और कर चोरी को रोकने में नाकाम रही है.
  • चिकित्सा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और जल आपूर्ति के मद में केन्द्र और राज्य सरकारों का संयुक्त राजस्व और पूंजीगत खर्च 2,08,166 करोड़ रुपये है, जो कि देश के सबसे अमीर शख्स मुकेश अंबानी की कुल सम्पत्ति 2.8 लाख करोड़ रुपये से कम है.
  • औक्सफैम इंटरनेशनल की कार्यकारी निदेशक विनी ब्यानिमा का कहना है कि यह ‘नैतिक रूप से क्रूर’ है कि भारत में जहां गरीब दो वक्त की रोटी और बच्चों की दवाओं के लिए जूझ रहे हैं, वहीं कुछ अमीरों की सम्पत्ति लगातार बढ़ती जा रही है. यदि एक प्रतिशत अमीरों और देश के अन्य लोगों की सम्पत्ति में यह अंतर बढ़ता गया तो भारत की सामाजिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी.
  • आर्थिक असमानता से सबसे ज्यादा महिलाएं प्रभावित हो रही हैं.

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