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लौंग डिस्टेंस रिलेशनशिप को कैसे बनाएं स्ट्रौंग

हर रिलेशनशिप को कभी न कभी किसी न किसी तरह लौंग डिस्टेंस में आना ही पड़ता है, कभी काम के सिलसिले में तो कभी पारिवारिक मसलों के चलते. यह डिस्टेंस कभी कभार कुछ हफ़्तों का होता है तो कभी महीनों और सालों का. लेकिन, परेशानी तब महसूस होती है जब पार्टनर्स इस डिस्टेंस के कारण अपनी रिलेशनशिप हैंडल नहीं कर पाते और उन्हें अपने रिलेशनशिप को खत्म करने की ज़रुरत महसूस होने लगती है. कई बार तो होता यह है कि 2 -3 साल की रिलेशनशिप भी 2 महीनों की दूरी से कमजोर पड़ जाती है. ऐसे में कपल्स को अपने लोंग डिस्टेंस रिलेशनशिप को बनाए रखने के लिए कुछ एफर्ट्स करने ही पड़ते हैं. बिना एफर्ट्स कोई भी लोंग डिस्टेंस रिलेशनशिप कारगर नहीं हो सकती.

रिया और विनय पिछले 16 महीनों से रिलेशनशिप में थे. वे दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे जहां रिया विनय की जूनियर थी और विनय उस का सीनियर. विनय दिल्ली में पीजी था और ग्रेजुएशन खत्म करने के बाद उसे वापस अपने घर आजमगढ़ लौटना था. रिया और विनय ने फैसला किया कि अब वे दोनों लोंग डिस्टेंस रिलेशनशिप में रहेंगे और जबतब विनय दिल्ली आया करेगा वे मिलेंगे.

विनय वापस अपने घर गया तो अपने घरवालों के बीच अपनी पढ़ाई में काफी व्यस्त रहने लगा. यहां दिल्ली में रिया का थर्ड ईयर चल रहा था. जब भी वह बाकी कपल्स को देखती तो विनय को याद करने लगती. रिया विनय को मैसेज करती तो उस का रिप्लाई कभी समय पर नहीं आता. कभी कभी तो विनय दो तीन दिन लगाकर रिप्लाई करता. विनय ने रिया को साफ़ बता दिया था कि उस के पापा बहुत स्ट्रिक्ट हैं और इसलिए उसे दिन भर अपने कौम्पिटिटिव एग्जाम  के लिए पढ़ाई करनी पड़ती है जिस कारण वह फोन को हाथ तक नहीं लगा सकता. विनय कभी रिया को कौल तक नहीं करता. इतना सब तो रिया सह लेती लेकिन जब वह विनय को फेसबुक या इंस्टाग्राम पर एक्टिव देखती तो उस का खून खौल उठता.

रिया ने विनय से इन हरकतों का कारण पूछा तो विनय कहने लगा कि पापा हर समय घर ही होते हैं तो उन के सामने फेसबुक चला सकते हैं लेकिन गर्लफ्रेंड से बात नहीं कर सकते. विनय की रिया के प्रति इस उदासीनता ने रिया को यह रिलेशनशिप खत्म करने पर मजबूर कर दिया. उस ने विनय से ब्रेकअप कर लिया जिस का सब से बढ़ा कारण विनय का बदला हुआ व्यवहार और रिया के प्रति किसी भी तरह की जिम्मेदारी और एफर्ट का न होना था.

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लोंग डिस्टेंस रिलेशनशिप में सब से महत्वपूर्ण है अपने पार्टनर को अनचाहा महसूस न कराना. माना आप दोनों साथ नहीं लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि आप दूर होने की तकलीफ को भरने की जगह उसे बढ़ाते जाएं. निम्नलिखित कुछ ऐसे सुझाव हैं जिन के माध्यम से आप अपने लोंग डिस्टेंस रिलेशनशिप को बनाए रख सकते हैं.

कम्यूनिकेट करते रहें

रिलेशनशिप्स में कम्युनिकेशन बहुत महत्वपूर्ण है. आप के पार्टनर का दिन कैसा गया, उसे किसी बात का गम तो नहीं, उसे आज क्या क्या काम करने पड़े, दोस्तों के साथ कहां घूमे फिरे, कल क्या करने का प्लान है इत्यादि पूछना और बताना बहुत जरूरी है. यदि आप बात नहीं करेंगे तो आप दोनों के बीच की दूरियां गहराती जाएंगी, हां, इस बात का ध्यान रखें कि हर वक़्त सिर्फ बात ही न करते रहें, प्रेजेंट मोमेंट में जिएं. ऐसा न हो कि एकदूसरे से बात करने के चक्कर में आप अपने बगल में बैठे व्यक्ति को इग्नोर करते रहें.

पर्सनल स्पेस दें और सपोर्ट करें

एक दूसरे के पर्सनल स्पेस का ख्याल रखें और यदि वह कुछ नया करता है तो उसे सपोर्ट करें. ऐसा न हो कि आप का पार्टनर कुछ समय अकेला रहना चाहता है और आप उसे खुद से बातें करने के लिए कहते रहें. आप का पार्टनर यदि अपने लिए कोई नयी क्लास ज्वाइन करता है या कोई कार्य करता है तो उस में उसे सपोर्ट करें फिर चाहे आप को उन कार्यों में इंटरेस्ट न भी हो.

एकदूसरे को अपडेटेड रखें

लोंग डिस्टेंस रिलेशनशिप में पार्टनर्स का एकदूसरे के क्रियाकलापों के बारे में अपडेटेड रहना बहुत जरूरी है. आप ने नया टैटू बनवाया है, शौपिंग कर के आए हैं, औफिस, कालेज या घर में कुछ नया हो रहा है, आप ने कुछ अलग करना शुरू किया है या किसी नए व्यक्ति से मिले हैं, इन सब की  जानकारी अपने पार्टनर को देते रहें. इस से आप दोनों को लगेगा कि आप अब भी एकदूसरे के पास हैं और किसी बात से अनजान नहीं हैं.

सिर्फ चैटिंग ही करें

केवल चैटिंग करने से आप एकदूसरे के इमोशंस को अच्छी तरह नहीं समझ सकते. चैटिंग के अलावा वीडियो कौल, फोन कौल भी करें. जितना पौसिबल हो एकदूसरे से मिलते रहें. अगर महीनों तक नहीं मिल पाते तो कोई बात नहीं कम से कम हर दूसरे दिन कौल पर बात करते रहें. वीडियो कौल पर एकदूसरे के लिए गाने गाएं, ढेर सारी बातें करें और एक दूसरे को ऐसा फील कराएं जैसे आप दोनों पास हैं. अपने फेवरेट सोंग्स एकदसरे से शेयर करें, फिल्में देखें और उन पर चर्चा करें. सोशल मीडिया पर नया क्या हो रहा है इस बारे में बातचीत करें. रोमांटिक के साथ साथ फनी और सरकास्टिक चीज़ें भी शेयर करें.

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छोटीछोटी बातों को अंडररेस्टीमेट करें

रिलेशनशिप में छोटीछोटी बातों की बहुत बड़ी वैल्यू होती है. आप दोनों एक दूसरे से दूर भले हों लेकिन एकदूसरे को छोटीछोटी चीज़ों से खुश जरूर कर सकते हैं. आई लव यू जब तब कहते रहें, पार्टनर को कौम्पलिमेंट करें, तारीफ करें, कोई बात अच्छी लगती है तो उसे बताएं, सोशल मीडिया पर कमेंट करें, एकदूसरे को स्पेशल महसूस कराते रहें. हो सके तो एकदूसरे के लिए औनलाइन शोपिंग कर गिफ्ट्स भेजें, हाथ से लेटर्स और पोस्टकार्ड्स लिख कर भेजें. अपनी टीशर्ट या फेवरेट बुक एकदूसरे को भेजें.

परिवार और दोस्तों के बारे में बात करें

लोंग डिस्टेंस रिलेशनशिप में बहुत जरूरी है कि आप दोनों एकदूसरे से केवल एकदूसरे के बारे में ही बातें न करते रहें. एक दूसरे के परिवार और दोस्तों के बारे में बात करना भी जरूरी है. इस से पार्टनर को यह महसूस होगा कि आप उन से हर विषय पर बात कर सकते हैं और उन के जीवन में इम्पोर्टेंस रखते हैं केवल उन की रोमांटिक लाइफ में ही सिमटकर नहीं रह गए हैं.

सेक्सुअल डिजायर को बरकरार रखें

एक दूसरे के पास न होने पर पार्टनर्स सेक्सुअली फ्रीक्वेंट नहीं रह पाते. वे दोनों ही एकदूसरे को छूने के लिए और अपने पास महसूस करने के लिए तरस जाते हैं. जब वे किसी और कपल को अपने आसपास अंतरंग पल एंजोय करते देखते हैं तो अपने पार्टनर को हद से ज्यादा याद करने लगते हैं. ऐसे में बहुत जरूरी है कि आप दोनों अपनी सेक्सुअल डिजायर को बरकरार रखें और सेक्सुअली भी एक दूसरे से जुड़े रहें. सेक्सचैट करें, रोमांटिक बातें करें, फ़ोन पर एकदूसरे को बताएं कि जब भी आप मिलेंगे तो क्या करना पसंद करेंगे इत्यादि. एकदूसरे से मिलने पर रोमांस और सेक्स को महत्वता दें.

भरोसा बरकरार रखें

पार्टनर्स का लोंग डिस्टेंस रिलेशनशिप में इनसेक्योर होना आम है. ऐसे में बहुत जरूरी है कि आप दोनों एकदूसरे को यह यकीन दिलाएं कि आप उन्हें चीट नहीं कर रहे और न कभी करेंगे. लोंग डिस्टेंस रिलेशनशिप में पार्टनर आसानी से चीट कर सकता है इसलिए कोई मौका हाथ लगे तब भी चीट न करें. यदि आप अपने पार्टनर को छोड़ना चाहते हैं तो बेशक ब्रेकअप कर लें लेकिन कभी चीट न करें, उसे धोखा न दें. भरोसा बनाए रखने के लिए किसी भी नए व्यक्ति से मिलें तो अपने पार्टनर को उस के बारे में बताने से झिझके नहीं, अपने पार्टनर को जलाने की कोशिश न करें, कभी चीट करते हैं तो अपने पार्टनर को साफसाफ बता दें. जितना भरोसा आप चाहते हैं कि आप का पार्टनर आप पर करे उतना ही आप भी उस पर भरोसा करें.

इमोशनली एकदूसरे के लिए अवेलेबल रहें

किसी भी रिलेशनशिप में फिजिकल से ज्यादा इमोशनली अवेलेबल होना जरूरी है. आप का पार्टनर किसी चीज़ को ले कर परेशान है तो उसे उस के हाल पर छोड़ देने के बजाए पूछें कि आखिर हुआ क्या है. आप दोनों की लड़ाई हो तो अपने अहंकार को हवा देने की बजाए प्यार को महत्त्व दें और बात करें. इमोशनली कनेक्टेड रहना बहुत जरूरी है.

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हमेशा शिकायत करते रहें

अपने पार्टनर से उस के दूर होने पर हर समय शिकायत करने की बजाए उस के दूर होने के कारण की रिस्पेक्ट करें. वह आप से जानकर दूर नहीं है, उस के अपने भी कुछ कर्तव्य, लक्ष्य और जिम्मेदारियां हैं इस बात को समझें. हमेशा शिकायत कर के उसे गिलटी फील न कराते रहें.

घर पर बनाएं सेव टमाटर की सब्जी  

आज आपको एक खास रेसिपी के बारे में बताते हैं, जी हां आमतौर पर आपके घर में टमाटर और सेव तो होते ही है. आप इसकी स्पाइसी सब्जी भी बना सकते हैं. जो बहुत टेस्टी लगती है. आपको बता दें, एक ट्रेडिशनल गुजराती सब्जी है. तो आइए जानते हैं इस सब्जी बनाने की विधि.

सामग्री

2 टेबलस्पून रिफाइंड औइल

2 टीस्पून जीरा

1 टीस्पून हल्दी पाउडर

2 टीस्पून मिर्च पाउडर

2 टीस्पून धनिया पाउडर

100 ग्राम सेव

5 लहसनु की कलियां

3 हरी मिर्च

1 टीस्पून हींग

10 ग्राम गुड़ का पाउडर

2 चुटकी नमक

4 टीस्पून कटी हुई धनिया पत्तियां

1 कप पानी

250 ग्राम क्यूब साइज में कटे दमाटर

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 बनाने की वि​धि

एक पैन में तेल गर्म करें, अब इसमें जीरा और हींग डालें.

फिर लहसुन और हरी मिर्च डालें और एक मिनट के लिए चलाएं.

इसके बाद टमाटर और मिर्च पाउडर डालें और पानी डालकर पकने के लिए छोड़ दें.

अब इसमें गुड़ का पाउडर, धनिया पाउडर, हल्दी पाउडर और नमक डालकर मिलाएं.

पैन को ढक दें और गुड़ के पिघलने तक पकाएं.

गुड़ के घुल जाने के बाद इसमें सेव मिलाएं और थोड़ी देर तक उबलने दें.

इसे ग्रेवी की तरह बनने दें.

अब टमाटर सेव की सब्जी तैयार है और कटे धनिया से इसे सजा लें.

आप इसे चपाती या राइस के साथ सर्व कर सकते हैं.

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कहीं आप मेंटल डिसऔर्डर के शिकार तो नहीं?

मेंटल डिसऔर्डर को लेकर आज भी भारत में बहुत कम जागरूकता है. इस वजह से अक्सर इलाज तब शुरू हो पाता है, जब स्थिति काफी बिगड़ जाती है. हाल ही में हुए एक अध्ययन में यह सामने आया है कि घातक बीमारियों की तुलना में दिमागी तनाव ज्यादा खतरनाक है. इस अध्ययन में पाया गया कि लोग एचआईवी, टीबी और डायबिटीज जैसी घातक बीमारियों की वजह से कम, लेकिन डिप्रेसिव डिसऑर्डर के कारण ज्यादा बीमार पड़ रहे हैं और इससे उनकी मौत भी हो रही है. एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में बीमारियों की वजह से हो रही मौतों में से 40 प्रतिशत हिस्सेदारी दिमागी डिसऑर्डर से जुड़ी है.

दिमाग से जुड़े विकार विभिन्न प्रकार के होते है. आम व्यक्ति को भी कुछ छोटे-मोटे दिमागी विकार हो सकते हैं, जिसे आमतौर पर सामान्य मान कर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं कि वे सामान्य ही हों. कई बार कुछ सामान्य सी दिखने वाली आदतें भी मेंटल डिसऑर्डर की ओर इशारा करती हैं. भारत में हजारों-लाखों लोग मानसिक रोग का शिकार हैं और इसका असर उनके साथ- साथ उनके परिचितों पर भी पड़ता है. देखा गया है कि हर चौथे इंसान को कभी-न-कभी मानसिक रोग होता है. दुनिया-भर में इस रोग की सबसे बड़ी वजह है, तनाव और निराशा. मानसिक रोग किसी को भी हो सकता है, फिर चाहे वह आदमी हो या औरत, जवान हो या बुजुर्ग, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, या चाहे वह किसी भी संस्कृति, जाति, धर्म या तबके का हो. अगर मानसिक रोगी अच्छी तरह अपना इलाज करवाए, तो वह ठीक हो सकता है. वह एक अच्छी और खुशहाल जिन्दगी जी सकता है. लेकिन ज्यादातर केस में लोगों को लम्बे समय तक यह पता ही नहीं चल पाता कि वे मानसिक रोग का शिकार हैं. जब उन्हें पता चलता है तब वे काउंसलिंग करवाने से डरते हैं कि दूसरे लोग उन्हें पागल समझेंगे और इस तरह समस्या बढ़ जाती है. मानसिक रोग से जुड़ी एक संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल अमेरीका में 8 से 15 साल की उम्र के जिन बच्चों को मानसिक रोग था, उनमें से करीब 50 प्रतिशत बच्चों का इलाज नहीं करवाया गया और 15 से ऊपर की उम्र के करीब 60 प्रतिशत लोगों का इलाज नहीं हुआ.

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मेंटल डिसऔर्डर क्या हैै?

जब एक व्यक्ति लगातार तनाव और निराशा में रहता है, ठीक से सोच नहीं पाता, उसका अपनी भावनाओं और व्यवहार पर काबू नहीं रहता, तो ऐसी हालत को मेंटल डिसऔर्डर  कहते हैं. ऐसा रोगी आसानी से दूसरों को समझ नहीं पाता और उसे अपने रोजमर्रा के काम ठीक से करने में मुश्किल होती है. दिमागी रोग के लक्षण, हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं. ये इस बात पर निर्भर करते हैं कि उसे कौन-सी मानसिक बीमारी है. मानिसक रोग कई प्रकार के होते हैं, तनाव, डिप्रेशन, चिड़चिड़ापन, गुस्सा आदि. अगर मेंटल डिसऑर्डर के लक्षणों को शुरुआत में ही पहचान लिया जाए तो व्यक्ति को नॉर्मल होने व आम लोगों जैसा जीवन जीने में मदद मिलती है और उसके पूरी तरह ठीक होने के चांस भी काफी ज्यादा होते हैं.

हम आपको ऐसे संकेतों के बारे में बताते हैं, जो मेंटल डिसऔर्डर की ओर पहला इशारा करते हैं-

  1. दुखी महसूस होना और किसी चीज से खुशी न मिलना: कई लोग हमेशा दुखी ही नजर आते हैं. वे हमेशा नकारात्मक बातें करते हैं. दुखी गाने सुनते हैं, दुखी कहानियां, कविताएं आदि पढ़ते या लिखते रहते हैं. ऐसे लोग पार्टी-पिकनिक आदि जगहों पर भी बाकी लोगों से कटे-कटे रहते हैं, वे अकेले घूमते या किसी कोने में चुपचाप बैठे नजर आते हैं. वे लोगों से आसानी से घुलते-मिलते नहीं हैं. जिन बातों पर अन्य लोग ठहाके लगाकर हंसते हैं, वहीं ऐसे लोग एक हल्की सी मुस्कान ही देते हैं. स्पष्ट है कि वे गहरी निराशा या डिप्रेशन में हैं, जो मेंटल डिसऔर्डर का पहला इशारा है.
  2. किसी चीज पर ध्यान केन्द्रित करने में परेशानी होना : यदि आपका मन अपनी पढ़ाई या काम में नहीं लग रहा है, आपको हर वक्त बेचैनी महसूस होती है, आप एक काम को शुरू करके उसे अधूरा छोड़कर दूसरे काम में लग जाते हैं, या किसी काम को करते वक्त अन्य बातों के बारे में सोचने लगते हैं, तो यह दिमागी अस्थिरता की ओर इशारा है.
  3. छोटी-छोटी बातों पर बहुत ज्यादा डर लगना और चिंता होना : अकेले में डर लगना, घर से अकेले बाहर निकलने में डरना, किसी से बात करने में डरना, किसी काम को शुरू करने से डरना, रिश्तेदारी में जाने से डरना या आपसे वह काम हो पाएगा या नहीं इस चिन्ता में ग्रस्त रहना मेंटल डिसऑर्डर की निशानी है. कई बार इस बीमारी के कारण इंसान अपने करीबी लोगों से भी बात करने में डरने लगता है. उसे लगता है कि अगर उसने कुछ कहा तो उसको डांट पड़ेगी, या घर वाले उससे नाराज हो जाएंगे. उसका आत्मविश्वास खत्म हो जाता है और वह खुद को किसी काबिल नहीं समझता है.

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4. मूड में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव होना : मेंटल डिसऔर्डर के शिकार व्यक्ति का मूड पल-पल बदलता रहता है. कभी वह अच्छे मूड में होता है और कभी अचानक ही किसी छोटी सी बात पर चीखने-चिल्लाने लगता है. अन्य लोग उससे बात करने से कतराते हैं कि पता नहीं उनकी किस बात पर वह कैसा रिएक्शन दे. ऐसे लोग ‘फिकल माइंडेड’ या ‘अनप्रिडिक्टिबल’ कहलाने लगते हैं. वह एक काम करते-करते अचानक दूसरे काम में बिजी हो जाते हैं. ऐसे लोग बार-बार नौकरियां बदलते रहते हैं. कभी-कभी तो अपनी वर्क-लाइन ही चेंज कर देते हैं. वह कहीं भी टिक कर काम नहीं कर पाते हैं. ये वे लोग हैं जो अभी कहीं जाने की बात सोचते हैं, और अचानक कहीं और चल देते हैं या जाने का आइडिया ही ड्रॉप कर देते हैं. यह तमाम संकेत उसमें दिमागी गड़बड़ को प्रदर्शित करते हैं.

5. दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने का मन न करना : मेंटल डिसऔर्डर का शिकार व्यक्ति ज्यादातर वक्त अकेला ही रहता है. उसके दोस्तों की संख्या नगण्य होती है. कई बार दोस्त होते हैं, मगर वह उनसे मिलना-जुलना ही नहीं चाहता. वह अपने रिश्तेदारों से भी कटा-कटा रहता है. सामान्य व्यक्ति की भांति परिवार में होने वाले शादी समारोह या बर्थडे पार्टीज में भी उसका आना-जाना नहीं होता है. वह रिश्तेदारों से ज्यादा मेल-मुलाकात नहीं रखता, यहां तक कि आसपास रहने के बावजूद वह उनसे मिलने का इच्छुक नहीं होता है. अपनों से दूरी बना कर रखना दिमागी बीमारी का संकेत है.

6. सोने में परेशानी होना, बिना कुछ किये थकान महसूस होना और ऊर्जा में कमी आना : दिमागी रूप से कमजोर या मेंटल डिसऑर्डर के शिकार व्यक्तियों को आलस्य या थकान हर वक्त घेरे रहती है. सामने जरूरी काम पड़ा होने पर भी उसकी करने की इच्छा नहीं होती है. काम के प्रति उसको किसी प्रकार का उत्साह नहीं होता है. इसके अलावा वह रात में बिस्तर पर भी करवटें बदलता रहता है. मन की बेचैनी उसे ठीक प्रकार से नींद नहीं लेने देती है. देर रात तक जागते रहना दिमागी बीमारी की निशानी है.

7. रिऐल्टी से दूर कल्पनाओं में डूबे रहना: कुछ लोग असलियत से दूर सपनों की दुनिया में ही विचरण करते रहते हैं. वह सुन्दर जगहों, सैरसपाटे, मनोरंजन आदि के ख्याली पुलाव पकाते रहते हैं. चाहे उनके पास साइकिल न हो, लेकिन हवाईजहाज में उड़ने के विचार से वे निकल नहीं पाते. वे ऐसी तस्वीरें, फिल्में और टीवी शोज देखने के शौकीन होते हैं जिसमें वह अपने सपनों को पाते हैं. वे अपने साथी से भी उन रंगीनियों के सपने देखने के लिए कहते हैं. ऐसे लोग कल्पना में खुद को हीरो समझने हैं, जबकि असलियत में वह जीरो होते हैं.

8. दूसरों की स्थिति को समझने में परेशानी होना : मेंटल डिसऑर्डर के शिकार व्यक्ति कभी भी अपने साथ रहने वाले लोगों के मनोभावों, आदतों, व्यवहार और प्रेम को नहीं समझ पाता है. वह हरेक पर अपनी मर्जी चलाना चाहता है. उसको लगता है कि वह जो कह रहा है या कर रहा है, बस वही सही है. ऐसे लोग अपने घर वालों की दिक्कतों, बीमारियों, प्रेम या स्नेह को भी समझ पाने में अक्सर नाकाम रहते हैं.

9. ड्रग्स लेना या शराब का सेवन करना : मेंटल डिसऑर्डर का शिकार व्यक्ति हमेशा चिड़चिड़ा और बेचैन रहता है. उसका मन हमेशा अशांत बना रहता है, जिसका निवारण उसे शराब या ड्रग्स में दिखता है. ऐसे लोग जरूरत से ज्यादा नशा करते हैं. इसके लिए वे जगह और समय का भी ध्यान नहीं रखते हैं.

10. किसी भी बात पर बहुत ज्यादा गुस्सा आना : दिमागी बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को छोटी-छोटी सी बात पर तेज गुस्सा आता है. गुस्से की तीव्रता में वह घर की चीजों को तोड़ने-फोड़ने लगता है या चीजें उठा कर इधर-उधर फेंकता है. यहां तक कि वह सामने वाले व्यक्ति को मारने-पीटने पर भी उतारू हो जाता है. ऐसे लोगों की बातों का यदि जवाब देने लगें या उनको समझाने की कोशिश करें तो इससे उनका गुस्सा और ज्यादा बढ़ता है. वह सामने वाले व्यक्ति की बातों को सुनने के लिए कभी तैयार नहीं होता है, बल्कि गाली-गलौच या मारपीट करते हुए सामने वाले को खामोश करा देने में ही अपनी जीत समझता है.

11. आत्महत्या का ख्याल आना : अगर किसी व्यक्ति को बार-बार आत्महत्या का ख्याल आता है, या वह खुद को चोट पहुंचाने की कोशिश करता है तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि व्यक्ति दिमागी बीमारी से जूझ रहा है. खुद को नुकसान पहुंचाने की सोचना किसी सामान्य व्यक्ति का कृत्य नहीं है. डिप्रेशन की अवस्था में आत्महत्या का ख्याल आजकल युवा पीढ़ी को भी मौत की ओर ढकेल रहा है.

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दिमागी बीमारी से बचने के उपाय

मेंटल डिसऔर्डर को शुरुआती लक्षणों से ही पहचाना जा सकता है. दवाओं के साथ-साथ रोजमर्रा के जीवन में कुछ अहम बदलाव करके हम अपने मन-मस्तिष्क को रोग-मुक्त कर सकते हैं. हम आपको देते हैं कुछ टिप्स, जिनके जरिए आप दिमागी रूप से स्वस्थ और संतुलित रह सकते हैं –

  1. काम के बीच में खुद को थोड़ा सा ब्रेक दें. अगर आप किसी काम के कारण बहुत ज्यादा तनाव महसूस कर रहे हैं तो समझ लीजिए कि खुद को एक छोटा सा ब्रेक देने का समय आ गया है.
  2. लम्बी अवधि तक काम करने के बाद एक हफ्ते की छुट्टी लेकर कहीं बाहर घूमने चले जाएं. फिल्में देखें, क्लब जाएं, खेलकूद में हिस्सा लें या अपना पसंदीदा शौक पूरा करें. यह तमाम क्रियाएं आपको काम के प्रति पुन: उत्साह जगाने में सहायक होंगी.
  3. औफिस में लंच के बाद आधे घंटे आंख बंद करके झपकी जरूर लें. तनाव ज्यादा हो तो अपने कार्यस्थल पर ही थोड़ी देर का ब्रेक लीजिए, थोड़ी देर के लिए कुर्सी से उठकर कहीं और चले जाएं. तनाव को कम करने के लिए काम के बीच में ही 10-15 मिनट का वक्त खुद के साथ गुजारना जरूरी है, इसके लिए कैफेटेरिया या औफिस का टेरिस भी चुन सकते हैं.
  4. नियमित रूप से 20 से 30 मिनट शारीरिक व्यायाम (चलना, दौड़ना या उठना बैठना) करें. इससे आपके दिमाग को सोचने का वक्त मिलेगा.
  5. मेडिटेशन करें या राहत भरा संगीत सुनिए. 10-20 मिनट तक आंखें बंद करके शांति का अनुभव कीजिए. गहरी सांस लीजिए. दिमाग को शांत करें और तनाव भरी बातें दिमाग से निकाल दें.
  6. रोजाना अखबार या पत्रिका पढ़ने की आदत डालें या पड़ोसी से 15-20 मिनट गप्पें मारें. अपनी भावनाओं को कागज पर लिखने से, या किसी से बात करने पर आप ये जान पाएंगे कि आपके तनाव के कारण क्या है.
  7. बुरी आदतें छोड़ दें. रात देर से सोना या सुबह देर तक सोना गलत है. डॉक्टर भी मानते हैं कि देर से सोकर उठने वाले लोगों का मेटाबॉलिज्म ठीक नहीं रहता है जिससे उन्हें थकान, तनाव और उदासीनता अधिक सताती है. देर से उठने वाले लोग अक्सर सुबह का नाश्ता छोड़ते हैं जिससे उनका बॉडी-साइकिल गड़बड़ होता है और वे जल्द तनावग्रस्त होते हैं. यही तनाव आगे चल कर दिमागी बीमारी का कारण बनता है.
  8. घंटों टीवी देखना भी तनाव और अवसाद की स्थिति तक पहुंचाने के लिए काफी है. बजाय घंटों तक टीवी देखने के आप अपना समय परिवार के साथ बिताएंगे या सैर करेंगे तो तनाव से कोसों दूर रहेंगे. टीवी पर भी फैमिली ड्रामा या क्राइम सीरियल्स देखने के बजाए हंसी-मजाक वाले शोज देखें. हंसी हजार रोगों की दवा है.
  9. धूम्रपान आपका तनाव बढ़ाता है. धूम्रपान से धड़कन तेज हो जाती है जिससे तनाव बढ़ता है. लिहाजा धूम्रपान से दूर रहें. शराब या ड्रग्स का सेवन भी नाड़ीतंत्र को कमजोर करता है.
  10. अच्छे दोस्त बनाएं. अच्छे दोस्त आपको आवश्यक सहानुभूति प्रदान करते हैं और साथ ही साथ अवसाद के समय आपको सही निजी सलाह भी देते हैं.
  11. संतुलित आहार लें. फल, सब्जी, मांस, फलियां और कार्बोहाइड्रेट आदि का संतुलित आहार लेने से मन खुश रहता है. एक संतुलित आहार न केवल अच्छा शरीर बनता है बल्कि यह दुखी मन को भी अच्छा बना देता है.
  12. अपने जीवनसाथी और बच्चों से बातचीत करें. अपनी समस्याओं के सम्बन्ध में बात करना तनाव दूर करने का उत्तम जरिया है. हममें से अधिकतर लोग खुद तक ही सीमित रहते हैं. अंदर ही अंदर घुटते रहने से और भी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं.
  13. अपने लिए समय निकालें. यह बेहद महत्वपूर्ण है कि आप व्यस्तता के बावजूद अपनी जरूरतों और देखभाल के लिए भी कुछ समय निकालें. आराम करने के लिए भी पर्याप्त समय बचा कर रखें. अक्सर घर और दफ्तर के कामों में घिरी महिलाओं को अपनी देखभाल का समय नहीं मिलता है. वे पूरे वक्त काम के तनाव में घिरी रहती हैं जो आगे चल कर दिमागी बीमारी पैदा करता है.
  14. लिखना शुरू करें. अपनी रोजाना की गतिविधियों और भावनाओं को लिखने से आत्मनिरीक्षण और विश्लेषण करने में आपको मदद मिलती है. एक जर्नल या डायरी अपने पास रखें, जिसमें रोजाना लिखें कि आप अपने और अपने करीबी लोगों के बारे में क्या महसूस करते हैं. यह आपके अवसाद को दूर करने में सहायक होगा.
  15. मनोचिकित्सक से सलाह लें. अवसाद को दूर भगाने का सबसे मुख्य और आसान तरीका है कि आप मनोचिकित्सक की सलाह लें . इसमें हिचकिचाने की जरूरत नहीं है. मनोचिकित्सक की सलाह से आपको अवसाद की जड़ तक जाने और इसे दूर करने में मदद मिलेगी.

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5 टिप्स: पीरियड्स के दौरान ऐसे रखें अपनी स्किन का ख्याल

पीरियड्स के दौरान महिलाओं के शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिसका असर महिलाओं के बौडी पर  पड़ता है. इस बदलाव के कारण स्किन से जुड़ी भी कई समस्याएं होती  हैं, ऐसे में जरूरत है आपको इन कठिन दिनों में अपनी  स्क्नि का खासतौर पर ख्याल चाहिए. तो आइए जानते हैं कुछ ऐसे टिप्स जो आपके कठिन दिनों में स्किन के लिए मददगार साबित हो सकते हैं.

क्लीनअप 

पीरियड्स के दौरान चेहरे को साफ रखना बेहद जरूरी है. क्लीनअप  इसमें आपकी मदद करेंगे. इससे  आपकी त्वचा साफ होगी और  जरूरत के मुताबिक मसाज, मौइस्चर मिलने के साथ ही आपका स्ट्रेस लेवल भी कम होगा जो पिंपल को रोकने में मदद करेगा.

मेकअप से रहें दूर

मेकअप पोर्स को ब्लौक करता है, ताकि आपके फेस को स्मूद लुक मिले, लेकिन पीरियड्स के दिनों में यह अच्छा नहीं है. कोशिश करें कि मेकअप से दूरी बना सकें या ऐसे फाउंडेशन या बीबी, सीसी क्रीम का इस्तेमाल करें जो पोर्स ब्लौक नहीं करतीं.

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पिंपल या ऐक्ने

पीरियड्स के दिनों में पोर्स बड़े हो जाते हैं जिससे स्किन ज्यादा औइल प्रड्यूस करती है. वहीं कुछ मामलों में स्किन रूखी हो जाती है. इससे निपटने के लिए दिन में कम से कम दो बार गुनगुने पानी से फेस धोएं. कोशिश करें कि ऐसे फेसवाश का इस्तेमाल करें जो स्किन के लिए माइल्ड हो. इसके बाद चेहरे पर टोनर लगाएं और फिर मौइस्चराइज करें.

बौडी मौइस्चराइजिंग

पीरियड्स में बौडी को मौइस्चराइज करने की खास जरूरत होती है. इस दौरान स्किन ड्राई होने लगती है, जिससे स्ट्रेच मार्क्स होने का भी डर रहता है, ऐसे में यह सुनिश्चित करें कि आप बौडी को अच्छे से मौइस्चराइज करें.

डायट

पीरियड्स में डायट का ध्यान रखना काफी जरूरी है. खाने में ऐसी चीजों को शामिल करें जो ओमेगा-3 फैटी ऐसिड, विटमिन ई और ऐंटीऔक्सिडेंट प्रौपर्टीज से युक्त हैं. यह न सिर्फ त्वचा को ब्रेकआउट से बचाएंगे बल्कि उसे ग्लोइंग बनाए रखेंगे.

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लोबिया की खेती

दलहनी खेती के तहत लोबिया की फसल  आती है. यह प्रोटीन, शर्करा, वसा, विटामिन व खनिज से भरपूर होती है. इस की 2 तरह की किस्में होती हैं. पहली झाड़ीयुक्त बौनी प्रजाति व दूसरी लतायुक्त यानी फैल कर फली देने वाली प्रजाति. लतायुक्त प्रजाति की खेती मचान विधि से ही की जाती है.

उन्नतशील प्रजातियां

काशी कंचन : सब्जी के लिहाज से यह प्रजाति ज्यादा मशहूर है. बोआई के 40-45 दिनों बाद इस की फलियां तोड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं. इस की फलियों की लंबाई

30 सैंटीमीटर तक होती है. यह रोग प्रतिरोधी प्रजाति है. इस की औसत उपज 150-200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

काशी श्यामल : इस प्रजाति की बोआई के 50 दिन बाद फलियां तोड़ने लायक हो जाती हैं, जिन की औसत लंबाई 25-30 सैंटीमीटर होती है. इस की उपज तकरीबन 75-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

काशी गौरी : इस प्रजाति की बोआई के 45-50 दिन बाद फलियां तोड़ने लायक हो जाती हैं, जिन की औसत लंबाई 25 सैंटीमीटर होती है. इस की उपज 100-125 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

टा. 5269 : यह प्रजाति कम उत्पादन वाली है, जो बोआई के 50-60 दिन बाद फलियां देने लगती है. इस की औसत उपज 50-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

पूसा कोमल : इस की खेती खरीफ के लिए ज्यादा सही होती है. इस की फलियों की लंबाई 15-20 सैंटीमीटर होती है. इस की औसत उपज 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

काशी उन्नति : बोआई के 40-45 दिन बाद इस की फलियां तोड़ने लायक हो जाती हैं. इस की औसत उपज 125-150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

आईआईएमआर 16 : लोबिया की अगेती प्रजातियों में यह खास मानी जाती है.

इस की फलियों की लंबाई 15-18 सैंटीमीटर और औसत उपज 100-125 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

लोबिया : इस की खेती गरमी व बारिश दोनों मौसमों में की जाती है. इस की फलियां तकरीबन 20 सैंटीमीटर तक लंबी होती हैं. इस की उपज 120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

अर्का गरिमा :  यह एक फैलने वाली प्रजाति है. इस की फलियों की लंबाई

25 सैंटीमीटर तक होती है. यह विषाणु रोग प्रतिरोधी किस्म है. हरी फलियों की उपज 80-85 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

मिट्टी का चयन व खेत की तैयारी : लोबिया की खेती के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी जाती है. बोआई से पहले खेत की जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी कर लेते हैं.

बोआई का सही समय : बारिश के मौसम वाली फसल के लिए बोआई का सही समय जून से अगस्त तक होता है. गरमी के मौसम की फसल के लिए बोआई का सही समय फरवरी से मार्च तक होता है.

बीज की मात्रा : लोबिया की बौनी किस्म के लिए प्रति हेक्टेयर 20  किलोग्राम व लता वाली किस्म के लिए प्रति हेक्टेयर 15 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है.

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लोबिया की बोआई हमेशा मेंड़ों पर करनी चाहिए. बोआई में लाइन से लाइन की दूरी 60 सैंटीमीटर व बीज से बीज की दूरी 10 सैंटीमीटर रखें.

खाद व उर्वरक : दलहनी फसल  होने के कारण इस में खाद की बहुत कम जरूरत होती है. अच्छी उपज के लिए बोआई से 15 दिन पहले 8-10 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला देनी चाहिए.

इस के अलावा 25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई से पहले मिट्टी में मिला देनी चाहिए.

लोबिया की फसल जब एक महीने की हो जाए तो फसल की निराईगुड़ाई कर के तमाम खरपतवार निकाल देने चाहिए और पौधों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए.

सिंचाई : लोबिया के बीजों को बोते वक्त खेत में ठीकठाक नमी होना जरूरी है. बारिश के मौसम में फसल की सिंचाई की जरूरत नहीं होती है. गरमी में 5-7 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए.

कीट व बीमारियों का इलाज : कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया (बस्ती) के डाक्टर प्रेमशंकर का कहना है कि लोबिया में माहू कीट का प्रकोप ज्यादा होता है. यह कीट पत्तियों व शाखाओं का रस चूसता है, जिस से फसल की बढ़वार रुक जाती है. इस से बचाव के लिए डाईमिथोएट 30 ईसी या मिथाइल डेमेटान का छिड़काव करना चाहिए.

फलीछेदक : यह कीट लोबिया की फलियों में छेद कर बीजों को खा जाता है. इस से बचाव के लिए इंडोसल्फान या थायोडान का छिड़काव करना चाहिए. इस में नीम गिरी का अर्क भी असरकारक होता है.

हरा फुदका या लीफ माइनर : हरा फुदका पत्तियों की निचली सतह का रस चूस लेता है, जिस से पौधे की बढ़वार रुक जाती है. इस की रोकथाम के लिए मैलाथियान के घोल का छिड़काव करना चाहिए.

लीफ माइनर कीट पत्तियों के बीच सुरंग बनाता है, जिस से फसल की बढ़वार व पैदावार दोनों पर बुरा असर पड़ता है. इस की रोकथाम के लिए इंडोसल्फान या नीम गोल्ड का छिड़काव करना चाहिए.

प्रमुख रोग : लोबिया में स्वर्णपीत रोग का प्रकोप देखा गया है, जो माहू द्वारा विषाणु से फैलाया जाता है. इस रोग के असर से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और कलियों की बढ़वार रुक जाती है. इस रोग से बचाव के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना चाहिए. अगर रोग का असर दिखाई दे तो रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जमीन में दबा देना चाहिए.

लोबिया की तोड़ाई व लाभ : कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया के माहिर राघवेंद्र सिंह का कहना है कि लोबिया की अगेती किस्मों की फलियां 40-45 दिनों में तोड़ाई लायक हो जाती हैं.

उपज : लोबिया की अच्छी प्रजातियों से तकरीबन 150-200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिलती है, जबकि प्रति हेक्टेयर 50,000 से 60,000 रुपए लागत आती है. इस प्रकार किसान लोबिया की खेती से 3-4 महीने में ही अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं.

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‘सौरव गांगुली’ के कदम से देश की युवा पीढ़ी हीनग्रंथि से मुक्त हो गई थी: अभिनय देव

इतिहास हमें सिखाता है और इतिहास से प्रेरणा लेनी चाहिए. इस बात पर यकीन रखने वाले फिल्मकार अभिनय देव परिचय के मुहताज नहीं हैं. वे टीवी सीरियल ‘24’ के 2 सीजन निर्देशित करने के साथ ही ‘देल्ही बेली,’ ‘गेम,’ ‘फोर्स 2,’ ‘ब्लैकमेल’ जैसी फिल्में निर्देशित कर चुके हैं. इस बार अभिनव देव इतिहास के पन्ने यानी कि 2002 में सौरव गांगुली ने जो कृत्य किया था, उस पर डौक्यू फिक्शन फिल्म ‘दूसरा’ ले कर आ रहे हैं.

फिल्म ‘दूसरा’ को आप डौक्यू फिक्शन क्यों कह रहे हैं? इस सवाल पर अभिनव देव कहते हैं, ‘‘हम ने अपनी फिल्म को डौक्यू फिक्शन का रूप दिया है, जिस से 2002 में सौरव गांगुली ने जो इतिहास रचा था, उसे समाहित कर सकें. जो इतिहास घटा था, उस का डौक्यूमैंटेशन जरूरी है. 13 जुलाई, 2002 को इंग्लैंड में क्रिकेट का मक्का कहे जाने वाले लार्ड्स स्टेडियम पर नैटवैस्ट क्रिकेट सीरीज को जीतने पर भारतीय क्रिकेट टीम के तत्कालीन कैप्टन सौरव गांगुली ने अपनी टीशर्ट उतार कर उसे लहराते हुए खुशी का इजहार किया था, जिस का उस वक्त की युवा पीढ़ी पर काफी प्रभाव पड़ा और उस के बाद देश में कई सामाजिक व राजनीतिक बदलाव हुए.

जब वह इतिहास घट रहा था, उस वक्त एक युवा लड़की तारा अपनी जिंदगी में आगे बढ़ रही थी. 2002 में भारतीय क्रिकेट टीम के कैप्टन की हैसियत से मैच जीतने के बाद सौरव गांगुली ने जो कुछ किया था, उस का उस 10 साल की लड़की तारा (प्लाविता बोर ठाकुर) पर क्या प्रभाव पड़ा, यह फिक्शन है. इस घटना के चलते किस तरह उस लड़की का एटिट्यूड बदलने लगा, यह फिल्म में दिखाया गया है. तारा एक सामान्य लड़की है जो कि भारत के छोटे शहर जोधपुर, राजस्थान में रहती है. फिल्म में 10 साल की उम्र से ले कर 27 साल की उम्र तक की उस की यात्रा है.’’

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इस पर फिल्म बनाने का खयाल आप को कैसे आया? इस पर वे बताते हैं, ‘‘शिकागो में रोहन सजदेह और माशा नामक एक दंपती रहते हैं. उन्होंने ही मुझे इस फिल्म के लिए आइडिया दिया. उन्होंने कहा कि 2002 में इंग्लैंड में क्रिकेट के मैदान लार्ड्स स्टेडियम पर सौरव गांगुली ने मैच जीतने के बाद जिस तरह से अपनी शर्ट उतार कर स्टेडियम में लहराई थी, उस पर फिल्म बननी चाहिए. इन दोनों का मानना है कि 2002 का यह पल सिर्फ भारतीय क्रिकेट ही नहीं, बल्कि भारत के लिए भी बहुत महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि सौरव गांगुली ने स्टेडियम में जो कुछ किया था, उस के कई माने थे. उस से 9 माह पहले इंग्लैंड के क्रिकेटर एंडो क्ंिलटौप ने वानखेड़े स्टेडियम में टीशर्ट उतारी थी.

‘‘सौरव गांगुली ने सिर्फ उस का जवाब नहीं दिया था, बल्कि पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को जवाब दिया था. सौरव गांगुली का यह कदम भारतीय जनता की तरफ से ब्रिटिश साम्राज्य को जवाब था. सौरव गांगुली अपनी इस हरकत से पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को जताना चाहते थे कि आप ने हिंदुस्तान पर ढाई सौ साल राज किया और हमें क्रिकेट जैसा खेल अपने फायदे के लिए सिखाया था, अब हम ने आप के ही खेल में आप के ही घर यानी कि आप के देश की धरती पर जवाब दिया है.

‘‘मेरे हिसाब से सौरव गांगुली का यह बहुत बड़ा कदम था. यह अलग बात है कि उस वक्त तमाम लोगों ने कहा था- ‘सौरव गांगुली ने यह क्या किया?’ ‘एक क्रिकेटर को इस तरह की हरकत नहीं करनी चाहिए,’ ‘क्या क्रिकेट के मैदान पर टी शर्ट उतारनी चाहिए?’ यानी कि कुछ लोगों ने सौरव गांगुली के इस कदम की निंदा की थी.’’

2002 की इस घटना का आप जो सामाजिक व राजनीतिक प्रभाव फिल्म में दिखा रहे हैं, वह क्या है? इस पर उन का कहना है, ‘‘मेरे खयाल से इस घटना से उस वक्त की जो युवा पीढ़ी थी, उसे एहसास हुआ कि हम जो हैं, सही हैं. हमें दूसरे देश की तरफ देखने की जरूरत नहीं है. उस जीत और उस घटना का सब से बड़ा सामाजिक व राजनीतिक प्रभाव यह था कि हम कंधे से कंधा मिला कर दुनिया के साथ खड़े हो गए.

‘‘हम ने कहना शुरू किया कि हम भी उतने ही अच्छे हैं, जितना कि सामने वाला. शायद कुछ जगह हम बेहतर थे. कम से कम 2002 की क्रिकेट की घटना और सौरव गांगुली ने जो कुछ किया, उस से हमारे देश की उस वक्त की युवा पीढ़ी हीनग्रंथि से मुक्त हो गई थी. उस वक्त के 15 से 18 साल के भारतीय युवा आज पूरे विश्व को चला रहे हैं. यह फिल्म साहस, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अन्य चीजों के बीच सामाजिक पूर्वाग्रहों से लड़ने की बात करती है.

‘‘मेरी राय में समाज, राजनीति, खेल और फिल्म को अलग नहीं किया जा सकता. इन चारों को अलगअलग कर के बात करना मुश्किल है. क्रिकेट के माध्यम से हमें जीत का एहसास होता है, एनर्जी मिलती है, जो इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी, राजनीति व सामाजिक हालातों पर असर डालती है. हम पोलिटिकली जो कुछ करते हैं, हम जिस तरह से देश को दर्शाते हैं, उस का इंसान की रोजमर्रा की जिंदगी पर असर होता है.

आज की राजनीति जिस तरह से देश चला रही है, उस के प्रभाव से कोई भी इंसान अछूता नहीं है. पर मेरी निजी राय है कि खेल और राजनीति को जितना दूर रखें, उतना अच्छा है. पर अफसोस खेल में बहुत ज्यादा राजनीति घुसी हुई है. इसी तरह से शिक्षा और राजनीति को भी अलग रखना चाहिए. पर यह भी नहीं हो पा रहा है. राजनीति हर जगह है, चाहे वह देश की राजनीति हो या घर के अंदर सासबहू के बीच आपसी राजनीति हो.’’

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2002 के बाद ग्लोबलाइजेशन ने भी बहुतकुछ देश को बदला है. क्या यह मुद्दा भी आप की फिल्म का हिस्सा है? इस सवाल पर उन्होंने कहा, ‘‘जी हां, देखिए, ग्लोबलाइजेशन तो होना ही था. देश की तरक्की के लिए ग्लोबलाइजेशन जरूरी है. लेकिन मेरी फिल्म का मूल हिस्सा यह है कि जब ग्लोबलाइजेशन हो रहा था, तब हमारी सरकार ने पूरी दुनिया को हमारे देश में आने के लिए दरवाजे खोल दिए थे. पर उस में जरूरी यह था कि आप उन्हें किस तरह से अंदर आने दे रहे हैं.

‘‘क्या आप उन के घुटने पकड़ कर उन्हें ला रहे हो या उन के कंधे पर हाथ रख कर ला रहे हो? हमारी कहानी का यही मूल है कि क्रिकेट की जीत ने हम भारतीयों को मानसिक रूप से स्ट्रौंग बनाया. हमें ऐसा एटिट्यूड दिया कि हम झुक कर किसी देश को निमंत्रण देने के बजाय उस के कंधे पर हाथ रख कर बुलाने लगे.’’

आप के सीरियल ‘24’ के फर्स्ट सीजन को थोड़ीबहुत सफलता मिली थी, लेकिन दूसरे सीजन को सफलता नहीं मिली? इस सवाल पर चिंतित होते हुए वे बोले, ‘‘हकीकत यही है कि टीवी सीरियल  ‘24’ टीवी के लिए गलत था. पर अब जो इस का अगला सीजन आ रहा है, वह टीवी में जरूर काम करेगा. क्यों अब जो सीजन हम ले कर आ रहे हैं उस का दर्शक वर्ग अलग है. जब ‘24’ का पहला सीजन आया, तो दर्शकों को कुछ नईर् बात नजर आई, इसलिए थोड़े दर्शक मिल गए. लेकिन सैकंड सीजन के साथ दर्शक रिलेट नहीं कर पाए.

‘‘सैकंड सीजन बहुत ही बुद्धिमत्ता वाला था, जहां आप को टकटकी लगा कर देख कर चीजों को समझना था. एक मिनट के लिए भी आप ने अपनी निगाहें इधरउधर कीं तो आप सीरियल नहीं समझ पाएंगे. जबकि टीवी में ऐसा संभव नहीं है. दर्शक खाना भी खाएगा, चाय भी पिएगा, हाथ धोने भी जाएगा. इसीलिए ‘24’ के सैकंड सीजन को सफलता नहीं मिली थी.’’

आप ने एक फिल्म ‘देल्ही बेली’ निर्देशित की थी. आप को लगता है कि वर्तमान में यदि यह फिल्म आती, तो ज्यादा सफल होती? इस बात पर वे मुसकराते हुए कहते हैं, ‘‘जरूर, मेरी राय में यह एक ऐसी फिल्म है जो चाहे जब आती, बौक्सऔफिस पर अपना असर डालती. यह यंगस्टर्स की कहानी है जिस के साथ हर समय का यंगस्टर रिलेट करेगा. पर आज यदि यह फिल्म आती तो ज्यादा लोग रिलेट करते. हां, जब रिलीज हुई थी तब कम पौपुलर हुई थी क्योंकि फिल्म में जिस तरह की भाषा रखी गई थी, उस तरह की भाषा उस वक्त कम लोग बोलते थे.’’

‘‘फिल्मकार” मुझसे बाल कटवा देने के लिए कहते हैं, जो मैं कभी नहीं कर सकता: मंजोत सिंह

टीनएज में करियर की शुरूआत करने वाले अभिनेता मंजोत सिंह को बौलीवुड में बारह साल हो गए हैं. अब तक उन्होंने हर फिल्म में कौमिक किरदार ही निभाए हैं. 13 सितंबर को प्रदर्शित हो रही राज शौंडिल्य की फिल्म ‘‘ड्रीमगर्ल’’में भी वह आयुष्मान खुराना और नुसरत भरूचा के संग हास्य किरदार में ही नजर आएंगे. मंजोत सिंह को इस बात का मलाल है कि उन्हें इतर किरदार निभाने के मौके नहीं मिलते. जबकि वह फिल्मों में रोमांस के साथ एक्शन भी करना चाहते हैं. पर उन्हें मनचाहे  किरदार निभाने के अवसर महज इसलिए नहीं मिल रह हैं, क्योंकि वह सरदार हैं. उनके सिर पर टर्बन रहता है, जिसे वह हटाने के लिए किसी भी सूरत में तैयार नही हैं.

हाल ही में जब मंजोत सिंह से हमारी एक्सक्लूसिव मुलाकात हुई, तो हमने उनसे महज हास्य किरदारों तक सिमटे रहने को लेकर सवाल किया, तो उनके दिल का दर्द उभर कर बाहर आ गया… प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के अंश…

आप एक बार फिर फिल्म ‘‘ड्रीमगर्ल’’ में भी कौमेडी करते हुए ही नजर आने वाले हैं?

(दुःखी मन से मंजोत सिंह ने कहा) – ‘‘मैंने ‘ओए लक्की लक्की ओए’, ‘उड़ान’, ‘फुकरे’,‘फुकरे रिटर्न’, ‘अजहर’,‘जब हैरी मेट सेजल’, ‘सोनचिरैया’और‘ अर्जुन पटियाला’ सहित करीबन दस ग्यारह फिल्में कर ली. हम जो चाहते हैं, वह करने का मौका नहीं मिलता. मेरे पास सिर्फ हास्य किरदारों के ही आते हैं. जबकि मैं दूसरे अन्य कलाकारों की ही तरह परदे पर प्यार करना चाहता हूं. एक्शन करना चाहता हूं. गंभीर किरदार निभाना चाहता हूं.’’

मगर ऐसा क्यों है? हम देख रहे हैं कि पंजाबी फिल्मों में भी ज्यादातर फिल्में कौमेडी फिल्म में ही बनती हैं?

इसकी वजह यह है कि फिल्म निर्माता को लगता है कि एक सरदार सिर्फ कौमेडी कर सकता है और दर्शक उसे उसे सिर्फ कौमेडी करते हुए ही देखना चाहते हैं. जब तक लोगों की इस सोच में बदलाव नहीं आएगा, तब तक कुछ नहीं होगा. यह सोच दर्शकों की नहीं है. जिस दिन निर्माता और निर्देशक एक सरदार को भी गंभीर किरदार में दिखाएंगे, उस दिन से लोग हमें गंभीर किरदार में भी पसंद करेंगे.जिस दिन फिल्म निर्देशक यह दिखाना शुरू करेंगे सरदार भी गंभीर किस्म के किरदार निभा सकता है,उस दिन दर्शक भी इस बात को स्वीकार कर लेगा.

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क्या लोगों को आपके टर्बन से समस्या है?

जी हां! कई लोगों ने मुझसे कहा कि, आप अपने बाल कटवा लो, तो हम आपको कुछ अलग तरह का किरदार देने के बारे में सोच सकते हैं? उनकी बातें सुनकर मुझे बहुत बुरा लगता था. मेरा मानना है कि यह मेरे धर्म से जुड़ा मामला है. यदि मैं अपने धर्म का सम्मान नहीं कर सकती, अपने माता पिता का सम्मान नहीं कर सकती, अपने माता-पिता द्वारा सिखाई गई सीख की इज्जत न रख सकें ,तो फिर काम करने से क्या फायदा? हमारे फैंस समझते हैं कि फिल्म में कुछ सरदार ही नजर आ रहे हैं.फिर भी मैं अपने बाल हटा दूं, सिर्फ पैसा कमाने के लिए. यह तो उसको ठेस पहुंचाने वाली बात हो जाएगी. फिर मुझे जो प्यार मिल रहा है, वह प्यार नहीं मिलेगा. जब दर्शकों का, प्रशंसकों का प्यार नहीं मिलेगा, तो मैं कहां जाऊंगा? मेरी किस्मत है कि मुझे अच्छा काम मिल जाता है.

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अब आपके अलावा दिलजीत दोसांझ सहित कई कलाकार आ गए हैं.तो अब स्थितियां बदलनी चाहिए?

आपने एकदम सही फरमाया. जरूरत है कि हम अपने हक के लिए लड़ाई लड़े. मैंने इसीलिए कई फिल्में ठुकराई हैं. मैं उन फिल्मों या उन किरदारों को करने से साफ मना कर देता हूं, जिसमें किसी सरदार या हमारे धर्म को ठेस पहुंचाने वाली बात हो. मेरे पापा हर बार मुझे याद दिलाते हैं कि मुझे यह याद रखना चाहिए कि मुझे एक सरदार होने की वजह से कोई किरदार निभाने का मौका मिल रहा है,तो उसे आहत न किया जाए.

देखिए, मैंने तो पहली ही फिल्म मेन लीड की थी. भले ही वह अभय देओल के बचपन का किरदार था, पर वह फिल्म का हीरो था. तो अपनी स्थिति को बरकरार रखते हुए चल रहा हूं. मुझे कहीं भी पहुंचने की जल्दी नहीं है लेकिन मैं हर फिल्म में सिर्फ हास्य किरदार नहीं निभा सकता. मैं अपने आप को विभिन्न किरदार निभाने वाला कलाकार साबित करना चाहता हूं. हो सकता है कि आज मेरी जो लड़ाई है,या आज जो मैं मेहनत कर रहा हूं, उसका फायदा मेरी बजाए मेरी आने वाली पीढ़ी को मिले.

जब कई प्रशंसक मुझसे मिलते हैं और वह कहते हैं कि उन्हें भी मेरी तरह काम करना है, तो मेरा अंतर्मन कहता है कि मैं कुछ ऐसा काम करते जाऊं, जिसे जब यह फिल्मों से जुड़े इन्हें उसका फायदा मिले. लोगों को मेरी कला पसंद आती है. इसके अलावा फिल्म निर्देशक को समझना चाहिए कि फिल्मों का माहौल बदला है. दर्शकों की सोच बदली है. अब दर्शक सपनों में नहीं देखना चाहता. अब दर्शक सब कुछ रिजल्ट देखना चाहता है. तो पर्दे पर हमें भी रियालिटी पेश करनी चाहिए. लोग उन दृश्यों या किरदारों के साथ खुद को जुड़ा पाते हैं, जिन्हें उन्होंने अपने आसपास देखा होता है.

जब आप फिल्म निर्देशक से गंभीर किरदार की मांग करते हैं, तो उनका जवाब क्या होता है?

आपने बहुत सही सवाल पूछा है. मैं जब इस तरह की मांग करता हूं, तो कुछ फिल्म निर्देशक यह कहकर बात टाल जाते हैं कि वह इस पर विचार करेंगे.तो वहीं कुछ निर्देशक कह देते हैं कि अरे  आप सरदार हैं. और दर्शक, सरदार को इसी तरह के हास्य किरदारों में देखना पसंद करता है. आप इस गंभीर किरदार में जच नहीं सकते, यह थोड़ा हीरोइक किरदार है. बहुत ही कठिन किरदार है.

ईमानदारी की बात तो यह है कि अभी मैं बौलीवुड में इतना बड़ा कलाकार नहीं बना हूं कि मैं निर्देशकों पर अपनी मांग, अपनी पसंद थोप सकूं. इसलिए कई बार हमारे पास जो औफर आते हैं, उनमें से जो ज्यादा अच्छे होते हैं, उन्हें हम स्वीकार कर लेते हैं. लेकिन हास्य किरदार में भी भिन्नता लाने की जो मेरी लड़ाई है, वह बंद ना हुई है ना होगी. मेरी पूरी कोशिश होती है कि किसी भी निर्देशक के साथ मेरे रिश्ते खराब ना हो. मुझे ऐसी परवरिश दी गई है कि मैं किसी को भी गलत बात नहीं कह सकता. कई बार हम लोगों की बात सुनकर चुपचाप वापस भी आ जाते हैं. जबकि हम उन्हें जवाब दे सकते थे, लेकिन कई बातें सोचनी पड़ती हैं. वैसे एक कहावत है कि ‘‘डर के आगे जीत है.’’ इसी के चलते में अपनी बात कहता जरूर हूं. मैं धीरे-धीरे कोशिश कर रहा हूं. मुझे अपने अंदर के डर को भगाना है. शायद यही वजह है कि अब कुछ लोग मेरी बातों को सुनने लगे हैं. इसी के चलते मुझे फिल्म ‘‘ड्रीम गर्ल’’ में हास्य किरदार ही मिला है, पर थोड़ा ‘स्ट्रांग’ है. मुझे लगता है कि मेरे काम को देखकर दूसरे निर्देशक का मेरे उपर विश्वास बढ़ेगा. मैं भी लोगों को बताऊंगा कि देखिए, मैंने एक अलग तरह का काम किया है और उसका यह परिणाम है. अब आप भी मुझे कुछ अलग तरह का गंभीर किरदार निभाने का मौका दें, तो मैं उसे करके दिखाऊंगा.उम्मीद है कि मेरे हर काम को दर्शक पसंद करेगा. थोड़ा सा इंतजार कर रहा हूं कि किसी निर्देशक को मेरी प्रतिभा पर भरोसा हो जाए.

आपको नहीं लगता कि आप स्वयं अपनी अभिनय प्रतिभा को दिखाने वाला एक वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करें, जिस पर फिल्म निर्देशकों की नजर पड़ेगी और उन्हें एहसास होगा कि आप कौमेडी के अलावा भी कुछ कर सकते हैं?

आपने एकदम सही फरमाया. कई लोग खुलकर इसी तरह अपने मन की बात को सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को तक पहुंचा रहे हैं. पर मैंने अब तक ऐसा कुछ नहीं किया है. पर आपकी बात ने मेरा हौसला बढ़ा दिया. अब मैं भी ऐसा ही प्रयास करूंगा.

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आपने पंजाबी फिल्म करने के बारे में नहीं सोचा?

पंजाबी फिल्मों में भी हमें कौमेडी करने के लिए ही कहा जाता है. मुझे पंजाबी फिल्मों के औफर आते हैं, पर मैं बहुत चूजी हूं. मैंने 11 साल के करियर में सिर्फ 10 हिंदी फिल्में की हैं. इसी तरह पंजाबी फिल्में मिली पर मुझे पसंद नहीं आई. मैने सिर्फ एक पंजाबी फिल्म ‘पुरे पंजाबी’ 2012 में की थी. मैं सिर्फ फिल्मों की संख्या नहीं बढ़ाना चाहता. मैं अच्छा काम करना चाहता हूं. अधिक से अधिक फिल्में करके हम कितना पैसा कमा लेंगे? जब फिल्में असफल होंगी, तो काम मिलना बंद हो जाएगा. फिर उन पैसों का क्या? हम पूरी जिंदगी चला लेंगे, मेरा मानना है कि काम करना है, तो सिर्फ अच्छा करना है.

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पहचान : भाग 2

‘‘नीरद ढंग से बताता कुछ नहीं, आप लोग हैं कौन? धर्मजात क्या है आप की? आप की बेटी रोज कहां जाती है? नीरद ने किराया कुछ बताया भी है या नहीं? हम ने यह घर माली के लिए बनवाया था. अब जब तक आप लोग हो, मेरा बगीचा फिर से सही कर देना. वैसे, हो कब तक आप लोग?’’

अम्मी ने हाथ जोड़ दिए, कहा, ‘‘दीदी, नीरद बड़ा अच्छा बच्चा है. बाढ़ में हमारा घरबार सब डूब गया. समय थोड़ा सही हो जाए, चले जाएंगे.’’

सिर से पांव तक राबिया की अम्मी को नीरद की मां ने निहारा और कहा, ‘‘घरवालों के सीने में मूंग दल कर बाहर वालों पर रहमकरम कर रहा है, अच्छा बच्चा तो होगा ही.’’

नीरद की मां का इस तरह बोल कर निकल जाना अम्मी को काफी मायूस कर गया. अब चोरों की तरह अपनी ही नजरों से खुद को छिपाना भारी हो गया था. हमेशा बस यही डर कि किसी को पता न लग जाए कि वे सरकारी लिस्ट के बाहर के लोग हैं. जाने कितनी पुश्तों से इस माटी में रचेबसे अब अचानक खुद को घुसपैठिए सा महसूस करने लगे हैं. जैसे धरती पर बोझ. जैसे चोरी की जिंदगी छिपाए नहीं छिप रही.

भरोसा उन्हें इस अनजान धरती पर भले ही नीरद का था, लेकिन काम के सिलसिले में वह भी तो अकसर शहर से बाहर ही रहता. इस घटना को अभी 4-5 दिन बीते होंगे. नीरद अभी भी शहर से बाहर ही था और दूसरे दिन आने वाला था. राबिया ने शाम को अपनी रसोई की खिड़की से एक साया सा देखा. वह साया एक पल को खिड़की के सामने रुक कर तुरंत हट गया.

उस रात थोड़ा डर कर भी वह शांत रह गई, किसी से कुछ नहीं कहा. नीरद दूसरे दिन घर वापस आया और उन से मिला भी, लेकिन बात आईगईर् हो गई. नीरद 3 दिनों बाद फिर शहर से बाहर गया. शाम को रसोई की खिड़की के बाहर राबिया ने फिर एक आकृति देखी. एक पल रुक कर वह आकृति सामने से हट गई. राबिया दौड़ कर बाहर गई. कोई नहीं था. राबिया पसोपेश में थी. अम्मी खामख्वाह परेशान हो जाएंगी. यह सोच कर वह बात को दबा गई.

हां, राबिया को इन सब से छुट्टी नहीं मिली. खिड़की, एक आकृति, इन सब का डर और फिर बाहर झपटना और कुछ न देख पाना. राबिया मानसिक रूप से लगातार टूट रही थी.

अगले हफ्ते नीरद वापस आया तो उसे सारी बातें बताने की सोच कर भी वह डर कर पहले चुप रह गई.

दरअसल, राबिया का डर लाजिमी था. एक तो नीरद ने उन दोनों के आपसी रिश्ते पर अब तक बात नहीं की थी, दूसरे, अम्मी और अजीम की जिंदगी राबिया की किसी गलती की वजह से अधर में न लटक जाए. दरअसल, राबिया तो अब तक नीरद की चुप्पी देख खुद के एहसासों को भी खत्म कर लेने का जिगर पैदा कर चुकी थी.

खिड़की पर रोजरोज किसी का दिखना कोई छोड़ा जाने वाला मसला नहीं लगा राबिया को और उस ने हिम्मत कर ही ली कि नीरद को सारी बातें बताई जाएं.

नीरद समझदार था. उसे अंदेशा हुआ कि हो न हो कोई राबिया के लिए ही आता हो. गिद्दों की नजर पड़ने में देर ही कहां लगती है. एक परिवार को वह खुद के भरोसे उन की जमीन से उखाड़ लाया है. क्या वह राबिया के लिए कोई जिम्मेदारी महसूस करता है? क्या यह सिर्फ जिम्मेदारी ही है?

अजीम बाहर खेल रहा था, और अम्मी टेलर की दुकान से अभी तक नहीं लौटी थीं. नीरद को यह सही वक्त लगा. उस ने राबिया से कहा, ‘‘राबिया, मैं तुम से एक बात पूछना चाहता हूं.’’

राबिया की धड़कनें धनसिरी के उफानों से भी तेज चलने लगीं. आशानिराशा के बीच डोलती उस की आंखों की पुतलियां भरसक स्थिर होने की कोशिश में लगीं नीरद की आंखों से जा टकराईं.

नीरद ने कहा, ‘‘राबिया, तुम्हारा नाम मुझे लंबा लगता है, मैं तुम्हें ‘राबी’ कह कर बुलाना चाहता हूं. इजाजत है?’’

‘‘है, है, सबकुछ के लिए इजाजत है.’’

राबिया का दिल खुशी के मारे मन ही मन बल्लियों उछल पड़ा. मगर शर्मीली राबिया बर्फ की मूरत बनी एक ही जगह शांत खड़ी रही और जमीन की ओर देखती स्वीकृति में बस सिर ही हिला सकी.

नीरद ने धीरे से पूछा, ‘‘तुम्हारी पसंद में कोई लड़का है जिस से तुम शादी कर सको? मुझे बता दो, यहां मैं ही तुम सब का अपना हूं?’’

‘इस की बातें किसी पराए की तरह चुभती हैं. कभी इस ने मेरे मन को टटोलने की कोशिश नहीं की. जबकि मैं न जाने इसे कब से अपना सबकुछ…’ राबिया आक्रोश पर काबू नहीं रख सकी और नीरद के सामने अपनेआप को जैसे पूरा खोल कर रख दिया अचानक, ‘‘चूल्हे में जाए तुम्हारा अपनापन. आठों पहर दिल में कुढ़ती हूं, आंखों का पानी अब तेजाब बन गया है. अब सब्र नहीं मुझ में.’’

नीरद नजदीक आ कर उस की दोनों बांहें पकड़ उस की आंखों की गहरी झील में उतरता रहा. कितनी सीपियां यहां मोती छिपाए पड़ी हैं. वह कितना बेवकूफ था जो झिझकता ही रह गया.

राबिया प्रेम समर्पण और लज्जा से थरथरा उठी. धीरेधीरे वह नीरद के बलिष्ठ बाजुओं के घेरे में खुद को समर्पित कर उस के सीने से जा लगी.

नीरद ने उस पर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए पूछा, ‘‘शादी करोगी मुझ से?’’

‘‘पर कैसे? तुम कर पाओगे? मेरा तो कोई नहीं, लेकिन तुम्हारा परिवार और समाज?’’

‘‘तुम प्यार करती हो न मुझ से?’’

‘‘क्या अब और भी कुछ कहना पड़ेगा मुझे?’’

‘‘फिर तुम मेरी हो चुकी, राबी. कोईर् इस सच को अब झुठला नहीं सकता.’’

नीरद के मन की हूर अब नीरद के लिए सच बन कर जमीन पर उतर चुकी थी. लेकिन इस सच को परिवार और समाज की जड़बुद्धि को कुबूल करवाना कोई हंसीखेल नहीं था.

असम के ग्रामीण इलाकों में बाढ़ का प्रकोप कुछ कम हुआ तो एनआरसी यानी नैशनल रजिस्टर औफ सिटीजन्स का प्रकरण फिर शुरू हुआ.

राबिया का परिवार अपना घरबार, जमीन खो कर जड़ से कट चुका था. अभी के हालात में दो जून की रोटी और अमन से जीने की हसरत इतनी माने रखती थी कि अम्मी और राबिया फिर से उसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहती थीं.

इधर, नीरद चाहता था कि एनआरसी की दूसरी लिस्ट में उन का नाम आ जाए. अभी नीरद इसी मामले में बात कर अपने घर की सीढि़यों से ऊपर चढ़ा ही था, और बाहर तक उसे छोड़ने आई राबिया अपने घर की तरफ मुड़ी ही थी, कि शाम के धुंधलके वाले सन्नाटे में कोई राबिया का मुंह झटके से अपने हाथों में दबा, तेजी से पीछे जंगल की ओर घसीट ले गया. वह इतनी फुरती में था कि राबिया को संभलने का मौका न मिला.

राबिया के घर के पीछे घनी अंधेरी झाडि़यों में ले जा कर उस ने राबिया को जमीन पर पटक दिया और उस के सीने पर बैठ गया. उस के चेहरे के पास अपना चेहरा ले जा कर अपना मोबाइल औन कर के उस ने अपना चेहरा दिखाया और शैतानी स्वर में पूछा, ‘‘पहचाना?’’

राबिया घृणा और भय से सिहर उठी. उस ने अपना चेहरा राबिया के चेहरे के और करीब ला कर फुसफुसा कर कहा, ‘‘जो सोचा भी नहीं जा सकता वह कभीकभी हो जाता है. अब तुम्हारे सामने 3 विकल्प हैं. पहला, तुम रोज रात को इसी जगह मेरी हसरतें पूरी करो चाहे नीरद से रिश्ता रखो. दूसरा, अपने परिवार को ले कर चुपचाप यहां से चली जाओ, किसी से बिना कुछ कहे, नीरद से भी नहीं. अंतिम विकल्प, मुझ से बगावत करो, इसी घर में रहो, नीरद को फांसो और अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहो.

‘‘वैसे, अंजाम भी सुन ही लो. 3 जिंदगियां खतरे में होंगी. नीरद, अजीम और तुम्हारी अम्मी की. हां, तुम्हें आंच नहीं आने दूंगा जानेमन. तुम तो मेरी हसरतों की आग में घी का काम करोगी.’’

सन्नाटे पर चोट सी पड़ती उस की खूंखार आवाज से बर्फ सी ठंडी पड़ चुकी राबिया दहल गई थी. उस के शरीर को अश्लील तरीके से छूता हुआ वह परे हट बैठा और अपनी कठोर हथेली में उस के गालों को भींच कर बोला, ‘‘देखा, मैं कितना शानदार इंसान हूं. मैं तुम्हें आसानी से हासिल कर सकता था, लेकिन मैं चाहता हूं तुम खुद को खुद ही मुझे सौंपो. जैसे सौंपोगी नीरद को. उफ, वह क्या मंजर होगा. तुम मेरी आगोश में होगी- और वह पल, नीरद के साथ धोखा… कयामत आएगी उस पर.

‘‘लगेहाथ यह भी बता दूं, नीरद की शादी तय हो गई है, खानदानी लड़की से, सरकारी लिस्ट वाली.’’

राबिया बेहोशी सी हालत में घर पहुंची तो यथासंभव खुद को संभाले रही और नीरद के साथ बाहर चले जाने का बहाना बना दिया. लड़की जात ही ऐसी होती है, ड्रामेबाज. कभी मां से, कभी प्रेमी, पति, भाई या पिता से झूठ बोलती ही रहती है. अपना दर्द छिपाती है, डर छिपाती है ताकि अपने निश्चित रहें, शांत और खुश रहें.

सुबह हुई तो राबिया को फिर शाम का डर सताने लगा. इतने में नीरद आ गया. उस का व्यवहार उखड़ा सा था. आते ही वह कह पड़ा, चलो, अब और नहीं रुकूंगा. रजिस्ट्री मैरिज के लिए आज ही आवेदन दे दूंगा.’’

राबिया सकते में थी. ‘‘इतनी जल्दी? सब मानेंगे कैसे?’’ फिर रजिस्ट्री होगी कैसे? वह तो सब की नजर में घुसपैठिया है.

कागज का टुकड़ा जाने कब कहां किस बाढ़ में बह गया. वे तो बेगाने ही हो गए. नीरद ने अम्मी के पांव छू लिए. कहा, ‘‘अम्मी, आप बस आशीर्वाद दे दो, बाकी मैं संभाल लूंगा. रात को घर में मां और भाई ने खूब हंगामा किया.

‘‘मां ने मेरी शादी एक नामी खानदानी परिवार में तय कर रखी है. मोटी रकम देंगे वे. मुझे कल रात यह बात पता चली. मेरे पिता की मृत्यु के बाद से मैं ही घर की जिम्मेदारी उठा रहा हूं. पिता की पैंशन से मां मनमाना खर्च करती हैं और 32 साल के मेरे निकम्मे बड़े भाई को दे देती हैं. बड़ा भाई पहली शादी से तलाक ले कर आवारागर्दी करता है. पार्टी से जुड़ा है और पार्टी फंड के नाम पर उगाही कर के जेब गरम करता है. अब इन दोनों का मेरी निजी जिंदगी में दखल मैं कतई बरदाश्त नहीं करूंगा.’’

राबिया के दिल में तूफान उठा. वह अपने साथ हुए उस भयानक हादसे को जेहन में रोक कर न रख सकी. आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा, ‘‘नीरद,’’ कहते हुए उस की हिचकियां बंध गईं. अम्मी अजीम को ले कर बाहर चली गईं.

नीरद पास आ गया था. उस की आंखों में बेइंतहा प्रेम और हाथों में अगाध विश्वास का स्पर्श था. उस ने पूछा, ‘‘क्या हुआ है, राबी? बताओ मुझे. शायद कहीं मेरा अंदेशा तो सही नहीं? तुम ही बताओ राबी?’’

‘‘तुम्हारा बड़ा भाई,’’ सिर झुकाए हुए आंसुओं की धार में राबिया के सारे मलाल बाहर निकल आए. नीरद को गुस्से में होश न रहा, चिल्ला कर पूछा, ‘‘क्या कर दिया कमजर्फ ने?’’

राबिया सकते में आ गई. नीरद के हाथ पकड़ कर विनती के स्वर में कहा, ‘‘कुछ कर नहीं पाया, मगर जंगल में खींच कर ले गया था मुझे.’’ बाकी बातें सुनते ही नीरद आपे से बाहर हो गया, कहा, ‘‘चलो थाने, रिपोर्ट लिखाएंगे.’’

‘‘आप के परिवार की इज्जत?’’

‘‘तुम्हारे दुख से बड़ी नहीं. क्या तुम ने उस का चेहरा देखा था? उस ने जैसा तुम्हें धमकाया था, वैसा वाकई कर दिखाया?’’

‘‘साफसाफ देखा मैं ने उसे. वह खुद चाहता था कि मैं उसे पहचानूं, खौफ खाऊं.’’

नीरद उन तीनों को ले कर थाने तो गया लेकिन वहां उन की नागरिकता के प्रश्न पर उन्हें जलील ही होना पड़ा. पुलिस वालों ने कहा, ‘‘तब तो पहले एनआरसी में नाम दर्ज करवाओ, फिर यहां आओ. जब हमारे यहां के नागरिक हो ही नहीं, तो हमें क्या वास्ता?’’

न्याय, अन्याय और सुखदुख की मीमांसा अब इंसानियत के हाथों में नहीं थी. बाध्य हो कर नीरद ने अपने कद्दावर दोस्त माणिक का सहारा लिया. वह एक सामाजिक संस्था का मुखिया था और समाज व राजनीतिक जीवन में उस की गहरी पैठ थी.

उस ने उन लोगों को शरण भी दी और देखभाल का जिम्मा भी लिया. नीरद भी कुछ दिन माणिक के घर से औफिस आनाजाना करता रहा.

इस बीच, नीरद ने अपने बड़े भाई की हरकतों का उस की ही पार्टी के राज्य हाईकमान से शिकायत की और उसे काबू में रखने का इशारा करते हुए उन की पार्टी की बदनामी का जिक्र किया. हाईकमान को बात समझ आ गई. उसी शाम जब वह फिर राबिया को तहसनहस करने के मंसूबे बांध उस के खाली घर के पास बिना कुछ जाने मंडरा रहा था. पार्र्टी हाईकमान के गुर्गों ने राबिया के घर के पीछे की झाडि़यों में ले जा कर उस की सारी हसरतें पूरी कर दीं. साथ ही, हाईकमान का आदेश भी सुना दिया, ‘पार्टी बदनाम हुई तो वह जिंदा नहीं बचेगा.’

इधर, यह कहानी यहां रुक तो गई, लेकिन नीरद की जिंदगी की नई कहानी कैसे शुरू हो? रजिस्ट्री तो तब होगी जब राबिया खुद को असम की लड़की साबित कर पाएगी.

पर क्या नीरद का प्रेम इन बातों का मुहताज है? जब उस ने धर्मजाति नहीं देखी तो अब नागरिकता पर अपने प्रेम की बलि चढ़ा दे?

प्रेम तो मासूम तितली सा नादान, दूसरों के दर्द, दूसरों की खुशी का वाहक  है जैसे परागकणों को तितलियां ले जाती हैं एक से दूसरे फूलों में.

नीरद ने अपना तबादला दिसपुर कर देने की अर्जी लगाई. भले ही वहां काम ज्यादा हो, लेकिन राबिया को नजदीक पाने के लिए वह कुछ ज्यादा भी मेहनत कर लेगा.

सच कहते हैं, भला मानुष कभी अकेला नहीं पड़ता. चार दुश्मन अगर उस के हों भी, सौ दोस्त भी उस के हर सुखदुख में साथ होते हैं. नीरद भी ऐसा ही था. ज्यादातर वह लोगों से मदद लेता कम था, देता अधिक था. औफिस के सारे स्टाफ वाले उस की अच्छाई के कायल थे. इसलिए कानून भले ही अड़ंगा था, मगर इंसानों ने इंसानियत का तकाजा अपने कंधों पर संभाल लिया था. नीरद और राबिया के प्यार की मासूमियत को सभी दिल से महसूस कर रहे थे और औफिस में फाइलें आगे बढ़ाते हुए उस के दिसपुर स्थानांतरण की राह प्रशस्त कर दी थी.

दिसपुर पहुंच कर नीरद और नीरद की राबी ने गुवाहाटी और दिसपुर के कुछ लोगों के सामने एकदूसरे को अपना बना लिया.

देश अभी भी बड़ी अफरातफरी में था. इंसानों पर जाति, धर्म और नागरिकता के टैग लगाने की बड़ी रेलमपेल लगी थी. इधर, नीरद और राबी ने दुनिया की रीत पर लिख दी अपने प्यार की पहचान. इंसान की सब से बड़ी पहचान राबी और उस के परिवार को मिल गई थी.

कृषि में तकनीक से तरक्की

तकनीकी दौर में आज अनेक कृषि उत्पादों की प्रोसैसिंग कर गिनेचुने किसान और कंपनियां खासा मुनाफा कमा रही हैं. लेकिन ज्यादातर किसानों को इस बारे में जानकारी नहीं है या वे कर नहीं पाते. नतीजतन, अपनी फसल से बंपर पैदावार होने पर भी वे अपनी उपज को औनेपौने दामों पर मंडी में बेचने को मजबूर हो जाते?हैं. मंडी में भी कई दफा इतने कम दाम मिलते हैं कि वहां ले जाने का किराया भी नहीं मिल पाता. ऐसे में किसान अपनी उपज को जानवरों को खिलाता है या ऐसे ही सड़कों पर फेंक देता है. इस समस्या से निबटने के लिए किसान क्या करें.

इसी संदर्भ में हमारी बातचीत जैन फार्म फ्रैश फूड लिमिटेड के डायरैक्टर अथांग जैन से हुई. उन का कहना है कि आज हम फार्म फ्रैश के जरीए फलसब्जी की प्रोसैसिंग कर किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद कर रहे हैं.

उन्होंने बताया कि फार्म फ्रैश जैन इरिगेशन की सहयोगी इकाई है जिस में ड्रिप इरिगेशन में हमारा मुख्य उद्देश्य किसान कम पानी में खेती से अच्छी पैदावार ले सकें. किसान को पैदावार तो अच्छी मिलने लगी परंतु उपज का बाजार भाव कम मिलने लगा इसलिए हम किसानों से उन की उपज खरीदने लगे, फिर उन्हें प्रोसैस कर देशविदेश में बेचने लगे ताकि आमदनी से किसान को भी बेहतर फायदा मिल सके.

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अथांग जैन का मानना?है कि कृषि को अगर तकनीक से किया जाए तो मुनाफा निश्चित है. आज खेती में अनेक ऐसे रास्ते हैं जो आप को तरक्की की ओर ले जाते?हैं जिन में फूड प्रोसैसिंग, हाईटैक फार्मिंग, टिश्यू कल्चर फार्मिंग वगैरह खास हैं.

आप का कहना है कि आप किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद कर रहे?हैं. इस पर कुछ विस्तार से बताएं कि आप का किसानों से जुड़ने का जरीया क्या है, उन्हें किस तरीके से आप उन की पैदावार की अच्छी कीमत दे पाते हैं.

जी हां, यह हमारा गंभीर व सार्थक प्रयास भी है. इस को विस्तार से बताने से पहले मैं एक खास पृष्ठभूमिका से आप को अवगत कराना चाहूंगा कि इस कंपनी यानी जैन इरिगेशन व अन्य सहयोगी कंपनियों के संस्थापक पद्मश्री भंवरलाल जैन, मेरे दादा स्वयं एक किसान परिवार में जनमे थे और किसान थे. हमारे पूर्वज राजस्थान से रोजगार की तलाश में मरूभूमि से यहां जलगांव जिले के बाकोद गांव में बस गए. खेती व्यवसाय के साथ ग्रामीण हाट में व्यवसाय भी किया. शिक्षा पूरी करने के बाद उन का चयन राज्य प्रशासनिक सेवा में हुआ था. नौकरी स्वीकार करने के बजाय उन्होंने अपनी मां के सुझाव से कृषि एवं कृषक संबंधी उपकरणों, साधनों का व्यवसाय शुरू किया.

अब आप के मूल प्रश्न के जवाब की ओर आता हूं कि हम किस तरह से किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद करते?हैं. हमारी कंपनी किसानों को विभिन्न बागबानी फसलों के उन्नत और अधिक पैदावार देने वाली किस्मों के टिश्यू कल्चर पौधे मुहैया कराती?है और किसानों को उन से बेहतर पैदावार मिल सके, इस के लिए समयसमय पर हमारे विशेषज्ञ उन के फार्महाउस पर जाते हैं जो जरूरत के मुताबिक उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण दे कर उन की मदद करते?हैं. कंपनी का अपना 1,200 एकड़ में फैला अत्याधुनिक कृषि संशोधन व प्रदर्शन प्रक्षेत्र है जहां सालभर कृषि से जुड़ी जानकारी व विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण दिया जाता है.

हम जो भी नई तकनीक अपनाते हैं, जिस से किसानों को फायदा होता हो चाहे वह पौधे, बीज, खाद, सिंचाई, कीटनाशक के उपयोग वगैरह के बारे में हो, उसे हम किसानों तक पहुंचाते?हैं.

आप ने टिश्यू कल्चर पौधों के बारे में बात की?है, इन में केला, अनार, स्ट्राबेरी व अन्य फलों के मोडिफाई पौधे जैसे आम, चीकू, अमरूद, सीताफल, पपीता व ऐसे अनेक पौधे मुहैया कराते हैं. उन की फसल आने पर फलों को प्रोसैस कर उन से रस, पल्प वगैरह को बाजार में उपलब्ध कराते?हैं व कोकाकोला जैसी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कंपनियां इस उत्पाद को अपने लिए इस्तेमाल करती?हैं.

‘फार्म फ्रैश’ के तहत अन्य फसल प्याज, लहसुन, मिर्च, अदरक, हलदी, धनिया वगैरह मसाले और केला, अनार, आम वगैरह फलों के रस व पल्प खुदरा मार्केट में भी मौजूद होने लगे?हैं. चूंकि किसान को अपनी फसल की सही कीमत कंपनी से मिल जाती?है और किसानों को बाजार के भाव में तेजी, मंदी, मध्यस्थता के खर्च वगैरह में बचत होती?है.

अभी आप की पहुंच किनकिन इलाकों के किसानों तक?है जहां से आप किसानों की पैदावार खरीदते?हैं?

अभी हमारी पहुंच अलगअलग फसलों के लिए अलगअलग इलाकों में है जहां उन का उत्पादन बहुतायत होता है. उदाहरण के लिए प्याज के लिए नासिक, जलगांव, गुजरात के कुछ जिले, केले के लिए जलगांव के आसपास का?इलाका भारत में प्रसिद्ध है ही. स्वीट ओरैंज के लिए विदर्भ, महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश का छिंदवाड़ा, बैतूल इलाका, अनार के लिए महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, आम के लिए महाराष्ट्र, कोंकण, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, लहसुन के लिए मध्य प्रदेश के रतलाम, मंदसौर, नीमच जिले व राजस्थान के प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़ इलाका, अमरूद के लिए मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, स्ट्राबेरी के लिए नासिक, महाबलेश्वर व महाराष्ट्र के दूसरे जिले, मिर्च के लिए निमाड़?इलाका व आंध्र प्रदेश व हलदी के लिए महाराष्ट्र का सांगली, कोल्हापुर व दूसरे इलाकों में हमारी अच्छीखासी पहुंच है.

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फलों के अलावा क्या सब्जियों पर भी कुछ काम करने का इरादा है,

जी हां, आने वाले समय में सब्जियों के निर्जलीकरण व प्रसंस्करण की योजना है.

अभी जिन फलों को आप अपने उत्पाद में इस्तेमाल करते?हैं, क्या वह जैविक तरीके से उगाए गए होते?हैं?

यह अच्छी बात है कि किसानों का झुकाव भी अब जैविक खेती की ओर तेजी से हो रहा?है. कंपनी इस काम को बढ़ावा दे रही?है. हालांकि हमारी कोशिश यही है कि अधिकतम उत्पाद जैविक प्रणाली से उत्पादित हों. खाद, कीटनाशकों के उपयोग को सीमित करते हुए उस का विपरीत असर फसलों पर न हो, उस का खास ध्यान रखते?हैं.

अगर कोई किसान आप की संस्था से जुड़ना चाहे तो वह किस तरह से और कहां संपर्क करे?

जो भी किसान हमारी संस्था से जुड़ना चाहता?है तो वह कंपनी की तय शर्तों व नियमों के मुताबिक जुड़ सकता?है. उन का स्वागत है. उन के लिए वे हम से इस पते पर संपर्क कर सकते हैं:

गेट नंबर 139/2, जैन फूड पार्क, जैन व्हैली, सिरसोली, जलगांव-425001. फोन नंबर 0257-2260033/44

किसानों के लिए कोई ऐसा सुझाव देना चाहेंगे जिन से उन्हें पैदावार की बेहतर कीमत मिल सके?

बेहतर पैदावार, अधिक आमदनी, सही दाम हासिल करने के लिए हमारा खास सुझाव है कि किसान उत्पादन देने वाली अच्छी किस्म की फसलों का चयन करें और कृषि उत्पादन के प्रोटोकाल का ईमानदारी से पालन करें.

सिंचाई के सही साधन व प्रणाली अपनाते हुए फसल को जरूरत के मुताबिक प्रतिदिन पानी दें व विशेषज्ञों द्वारा की गई सिफारिशों का पालन करें.

एक बात और साफ करना चाहता हूं कि जमीन, सिंचाई व दूसरे कृषि उत्पाद के बाबत बहुत सी भ्रांतियां किसानों को हैं. उन सभी भ्रांतियों को दूर करने के लिए आधुनिक व नवाचारित खेती करने के तरीकों को देखने के लिए हमारे जलगांव स्थित प्रक्षेत्र पर पधारें, उन का स्वागत कर हमें बेहद खुशी होगी.

(अथांग जैन, डायरैक्टर, जैन फार्म फ्रैश फूड लिमिटेड)        

इंस्टेंट ग्लो के लिए ऐसे करें फेशियल

आप इंस्टेंट ग्लो के लिए स्टीम यानी भाप फेशियल कर सकते है. इस फेशियल की सबसे खास बात ये है कि आप आसानी से घर पर ही स्टीम  फेशियल कर सकते हैं और ये आपको चेहरे को देगा इंस्टेंट ग्लो.  तो आइए जानते हैं आप इसे घर पर  कैसे कर सकती हैं और इस फेशियल के क्या फायदे है.

भाप लेने के फायदे

रक्त संचार बेहतर

जब चेहरे पर हीट पड़ती है तो हमारा ब्रेन, रक्त धमनियों को संकेत देता है कि वे चेहरे पर खून के फ्लो को बढ़ाएं. फेस में ब्लड का सर्क्युलेशन बढ़ने से ऑक्सिजन और न्यूट्रिएंट्स ज्यादा मात्रा में चेहरे तक पहुंचते हैं और चेहरा ग्लो करने लगता है.

डेड स्किन सेल्स से छुटकारा

भाप लेने से स्किन की सतह सौफ्ट हो जाती है जिससे डेड स्किन सेल्स के साथ ही धूल, गंदगी और बैक्टीरिया को भी दूर करने में मदद मिलती है. एक बार स्किन की सतह साफ हो गई फिर आपकी स्किन आसानी से सांस ले पाएगी.

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स्किन पोर्स खुल जाते हैं

स्टीमिंग यानी भाप लेने से चेहरे से पसीना निकलने लगता है जिससे स्किन में मौजूद पोर्स खुल जाते हैं और स्किन के पोर्स में छिपे रहने वाले डेड सेल्स और टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मदद मिलती है.

ब्लैकहेड्स से छुटकारा

भाप लेने से चेहरे पर मौजूद ब्लैकहेड्स और वाइटहेड्स सॉफ्ट हो जाते हैं और उन्हें स्क्रब कर निकालना आसान हो जाता है. ब्लैकहेड्स से छुटकारा पाने के लिए भाप लेने के बाद चेहरे पर माइल्ड स्क्रब का इस्तेमाल भी करें.

घर पर ऐसे करें

– सबसे पहले चेहरे को फेसवॉश का इस्तेमाल कर ठंडे पानी से धो लें.

– फेस धोने के बाद चेहरे को तौलिए से पोंछकर सुखा लें.

– अब पानी को स्टीमर या किसी बर्तन में गर्म कर लें. पानी को उतना ही गर्म करें, जितना आपकी स्किन सह पाए.

– अब अपने फेस टाइप के हिसाब से कोई इसेंशियल ऑइल चुनें और उसकी कुछ बूंदें भाप वाले पानी में मिलाएं.

– अपने सिर के ऊपर तौलिया ओढ़ लें, ताकि आपके चेहरे के ऊपर एक टेंट जैसा बन जाए और अपने चेहरे को गर्म पानी के कटोरे या स्टीमर के ऊपर झुकायें.

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हर स्किन टाइप को सूट करता है ऑर्गैनिक फेशल

हर स्किन टाइप को सूट करता है ऑर्गैनिक फेशल

– करीब 10 मिनट तक अपना चेहरा ऐसे ही झुकाए रखें. अपनी आंखें बंद कर लें और गहरी सांस लें, ताकि भाप आपके चेहरे तक पहुंच सके और चेहरे के रोमछिद्र खुल जाएं.

– बहुत ज़्यादा देर तक चेहरे को भाप न दें और न ही चेहरे को पानी के बहुत नजदीक ले जाएं. यदि चेहरा देर तक भाप के ऊपर रहा तो चेहरे पर जलन हो सकती है.

– करीब 5 मिनट भाप लेने के बाद चेहरे पर फेस मास्क लगाएं, जो चेहरे के खुले रोमछिद्रों से गंदगी बाहर खींचेगा.

– यदि आपके पास क्ले-मास्क है, तो वह लगाएं, क्योंकि वह सबसे बेहतर होता है. इस मास्क को 15 मिनट तक लगाए रखें और फिर हल्के गर्म पानी से चेहरा धो लें.

– भाप लेने के बाद, टोनर का इस्तेमाल करने से आपका चेहरा ताज़ा और निखरा नजर आएगा. आप टोनर के लिए नींबू के रस का भी प्रयोग कर सकती हैं.

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