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पहाड़ की चोटी पर बना है ये शानदार होटल

आपने कई होटलों के नाम सुने होंगे. जहां दूसरे होटलों से अलग सुविधाएं मिलती होंगी. और अपने आप में अनोखा होगा. लेकिन आज आपको एक ऐसे  होटल के बारे में बताने जा रहे हैं वह होटल सभी होटलों से अलग है. क्योंकि ये होटल पहाड़ पर बना हुआ है. जहां पहुंचने के लिए आपको 60,000 सीढ़ियां पार करनी होगी.

जी हां ये होटल चीन के यलो माउंटेन पर बना हुआ है. जेड स्क्रीन नाम का ये होटल फोर स्टार है. जेड स्टार होटल जमीन से 1830 मीटर की ऊंचाई पर बना हुआ है. ऊपर पहुंचने पर हंगशन माउंटेन रेंज का सुंदर और शानदार नजारा देखने को मिलता है. ये होटल दुनिया का एक मात्र होटल है जो इतनी ऊंचाई पर बना हुआ है जहां पहुंचने के लिए लोगों को सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ता है. बता दें कि इतनी ऊंचाई पर होने के बावजूद इस होटल में सभी तरह की लग्जरी सुविधाएं मौजूद हैं.

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इस होटल में आपको स्पा और स्विमिंग पूल की सुविधा भी मिलेगी. अगर कोई होटल तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों का इस्तेमाल नहीं करना चाहता तो उसके लिए कुली का इंतजाम है. जो उन्हें कुर्सी पर बैठाकर ऊपर ले जाता है. यही नहीं पर्यटकों के लिए केबल कार की सुविधा भी मौजूद है.

ये कोई छोटा मोटा होटल नहीं है बल्कि इस होटल में 65 सुइट्स और कमरे हैं. जिनमें आपको वाई-फाई की सुविधा मिलेगी. इस होटल में पहुंचने की सबसे बड़ी समस्या ये है कि अगर आप सामान के साथ होटल में जाते हैं तो आपको अपना सामान अपने कंधों पर ही लटका कर ले जाना पड़ेगा.

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बुढ़ापे में बच्चों का साथ है जरूरी

बहुत दिनों के बाद मेरा कानपुर अपने मायके आना हुआ था. पहले मैं बनारस में थी तब तो महीने-दो महीने में आ जाती थी, मगर जबसे पति के साथ देहरादून शिफ्ट हुई तब से कानपुर आना-जाना बहुत कम हो गया था. भईया तो पढ़ने के लिए वियतनाम गये, तो फिर वहीं के होकर रह गये. शादी भी वहीं कर ली और घर भी वहीं ले लिया,  पीछे से मां और पिताजी कानपुर में अकेले रह गये.

भईया कभी पांच-छह साल में कुछ हफ्तों के लिए आते भी हैं, तो यहां के माहौल में रह पाना उनके लिए काफी कष्टकारी हो जाता है. धूल भरी टूटी-फूटी सड़कें, हर वक्त बिजली जाने की समस्या, प्रदूषित पानी और हवा, उनके लिए तो यहां हफ्ता काटना भी मुश्किल हो जाता है. मैं ही साल छह महीने में एकाध बार चक्कर लगा जाती थी. अक्सर फोन पर ही बात कर लेती थी मां से, मगर फोन पर वह अपना दुखड़ा क्या रोती. अकेलापन दोनों के जीवन में गहरे बस गया था. सत्तर साल की उम्र तो पार हो चुकी थी, बची हुई बस किसी तरह काट रहे थे.

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उन्हें अकेला देखकर मुझे बड़ा बुरा महसूस होता था. मैं भी यहां उनके पास ज्यादा दिन तो रह नहीं पाती थी. अपने घर में भी बूढ़े सास-ससुर थे. बच्चे थे, पति था, जिनकी सारी जिम्मेदारी मेरे ही कंधों पर थी. मगर अपने मां-पिता का अकेलापन भी मुझे सालता रहता था.

अबकी बार आयी तो देखा कि दोनों काफी दुबले और कमजोर हो गये हैं. पापा का शुगर काफी बढ़ा हुआ था और कमजोरी बहुत थी. मां की भी कमर झुक गयी थी. बड़ी मुश्किल से रसोई में कुछ काम कर पा रही थीं. एक नौकरानी थी जो सुबह आकर दोनों वक्त का खाना पका जाती और झाड़ू-बरतन कर जाती थी. जिस दिन नहीं आती थी, दोनों ब्रेड खाकर गुजारा करते थे.

पहले कितना अच्छा होता था बड़े-बड़े परिवार थे. संयुक्त परिवारों में ढेर सारे बच्चे, बेटियां-बहुएं और बूढ़े लोग होते थे. न अकेलापन, न खाने-पीने की चिन्ता और न ही हारी-बीमारी की फिक्र. हर कोई हर किसी का ध्यान रख लेता था. मगर अब एकल परिवारों में बूढ़ों का जीना दुश्वार हो गया है. मैं सोच रही थी कि यहां इन दोनों के साथ कोई घटना घट जाए तो मुझे कोई खबर देने वाला भी यहां नहीं है. अब अड़ोस-पड़ोस भी वैसा नहीं रहा. ज्यादातर घरों में अब बुजुर्ग तो रहे नहीं, जवान हैं जो अपने-अपने में ही मस्त रहते हैं. बगल के घर में क्या हो रहा है किसी को खबर नहीं. काश यहीं कहीं आसपास ही मेरी शादी हुई होती तो कम से कम जरूरत पड़ने पर तुंरत आ तो जाती. मैं पापा के पास बैठी उनका सिर सहला रही थी और यह बातें सोच ही रही थी कि किचेन में कुछ धड़ाम से गिरने की आवाज आयी. मैं भाग कर गयी तो देखा मां चौके में चारों खाने चित्त पड़ी हैं. चाय बनाने आयी थीं, दूध एक ओर बिखरा पड़ा था और पतीली अलग उलटी हुई थी. मैं घबरा कर उन्हें उठाने के लिए झुकी तो वह धीरे से बोली, ‘चक्कर आ गया था…’

मैं उन्हें सहारा देकर बिस्तर तक लायी. वह बिस्तर पर ढेर हो गयीं, जैसे शरीर में ताकत ही न हो. मैंने पूछा, ‘ये चक्कर कब से आने लगे? तुमने कभी बताया नहीं?’

उन्होंने धीरे से आंखें खोलीं और कमजोर लड़खड़ाती आवाज में बोलीं, ‘बेटा, काफी दिन से आ रहे हैं, तुमको क्या बताती, तुम्हारा भी तो परिवार है, उसे छोड़कर तो नहीं आ सकती न?’

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बस उसी पल मैंने फैसला ले लिया. मैं नहीं आ सकती तो तुमको तो ले जा सकती हूं. उसी शाम पति से फोन पर बात की. कानपुर वाला घर बेचकर उस पैसे से देहरादून में अपने घर के पास ही एक छोटा सा घर लेने की बात पर वह बड़ी मुश्किल से राजी हुए. मुझे झूठी धमकी देनी पड़ी कि मेरे मां-बाप को मेरी जरूरत है, इसलिए मैं बच्चों को लेकर इधर शिफ्ट हो जाऊंगी, तब कहीं जाकर माने. इधर मां-पापा भी देहरादून जाना नहीं चाहते थे, दरअसल मजबूर होने के बावजूद वे मुझ पर बोझ नहीं बनना चाहते थे. मेरे ससुराल वाले क्या कहेंगे, दामाद जी क्या सोचेंगे, समधी और दूसरे रिश्तेदार क्या राय बनाएंगे, फिर तुम अपना घर देखोगी या हमें देखोगी, तमाम सवालों की झड़ी लगा दी थी दोनों ने. मगर मैंने तय कर लिया था कि इस बार उन्हें यहां अकेला छोड़ कर नहीं जाऊंगी. फिर चाहे पति खफा हों या सास ससुर. अब मैं इस तन्हाई में उनको मरने के लिए नहीं छोड़ सकती थी.

घर का सौदा जल्दी ही तय हो गया. पुराने समय का घर था. काफी बड़ा था और चारों तरफ काफी खाली जमीन भी थी, इसलिए तुरंत एक बिल्डर से डील हो गयी. मैंने सामान पैक करना शुरू किया तो मां फिर बोली, ‘बेटा फिर सोच ले.’

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मैंने दृढ़ता से कहा, ‘सोच लिया, अब सौ बार नहीं सोचना है… ’ मैंने देखा उनके चेहरे पर सुकून और शांति थी, आंखें बंद थीं और होंठो पर महीन सी मुस्कुराहट थी, जो इतने वक्त में मुझे पहली बार नजर आयी थी. बुढ़ापे में बच्चों का साथ कितना जरूरी है यह बात मैं उस पल महसूस कर रही थी.

बीमारी से बचना है तो पिएं पानी

आप सभी इस बात से वाकिफ है कि पानी अनमोल है क्योंकि हमारी जीवन शैली पानी पर ही निर्भर करती है. एक व्यस्क पुरुष के शरीर में पानी उसके शरीर के कुल भार का लगभग 65 प्रतिशत और एक व्यस्क स्त्री शरीर में उसके शरीर के कुल भार का लगभग 52 प्रतिशत तक होता है. पानी से हमारे शरीर की अंदरूनी सफाई होती है व ज्यादा पानी पीने से शरीर को नुकसान पहुंचने वाले अनुपयोगी पदार्थ मूत्र व पसीने के जरिये बाहर निकल जाते हैं.

हमारी हड्डियों मे 22 % ,त्वचा में २० %मस्तिष्क में ७५.६ %और खून मे ८३% पानी की मात्रा होती है. लेकिन हम लोग पानी पीने में कई तरह से गलतियां करते हैं. जो कि हमारे स्वस्थ के लिये हानिकारक सिद्ध होती हैं. तो चलिए आपको बताते हैं, आपको कब पानी पीना चाहिए और कब नहीं.

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कब पिएं और कब न पिएं पानी

*कई लोग घंटो शौचालय मे बैठे रहते है. मलत्याग के समय ज्यादा जोर लगाना पड़ता है या दर्द होता है तो इस समस्या से छुटकारा पाने के लिये रोज सुबह एक बड़ा गिलास गुनगुना पानी पिये. पानी शरीर की अतिरिक्त चर्बी को घटाता है और शरीर में एसिड की मात्रा को कम करता है. व आपके चेहरे को चमक भी देता है .

*गर्मियों मे ज्यादा ठंडा पानी से हमारे शरीर के लिये काफी नुकसानदेह होता है. शरीर के तापमान से ज्यादा ठंडा पानी नहीं पीना चाहिये. इससे आपके शरीर मे कमजोरी आती है व साथ ही हार्ट अटैक, किडनी फेल आदि का खतरा बढ़ जाता है.

*भोजन करते समय पानी न पिये. या तो आधा घंटा पहले पानी का सेवन करें या आधा घंटा बाद पानी पीकर खाना अच्छे से पचता है और खाने के द्वारा लिया गया एसिड आदि भी डाइल्यूट हो जाता है.

*जब बीमार पड़ें तो खूब पानी पिएं.अगर पानी अच्छा नहीं लगे , तो अलग-अलग तरह के फ्लुइड्स जैसे जूस, छाछ, शर्बत, नारियल पानी आदि पियें. दिनभर में कम से कम 8 ग्लास पानी जरूर पिये .

*नहाने से आधा घंटा पहले पानी पियें जिससे की ब्लड प्रेशर की समस्या नहीं होगी .

*सोने से पहले पानी पिएं. ऐसा करने से हार्ट अटैक का खतरा कम होता है.

*वर्कआउट से पहले भरपूर पानी पिये. वर्कआइट के दौरान शरीर से पसीना ज्यादा निकलता है अगर इस दौरान शरीर में पानी की कमी हो जाती है तो आप डिहाइड्रेशन का शिकार हो सकते हैं. इसलिए वर्कआउट से पहले खूब पानी पिएं.

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*तांबे के बर्तन में रात को पानी भर कर रख दीजिए और सुबह होने पर इसे पिएं. 90 दिन लगातार ऐसा करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. साथ ही आगर आप मुंहासों, दानों या त्वचा संबंधी किसी भी रोग से निजात दिलाता है.

*एक बार मे ज्यादा पानी न पिएं व पानी गिलास मे कर के पिएं न की सीधे बोतल से. इससे आपके होठ भी नहीं फटेंगे व स्वास्थ भी ठीक रहेगा.

रिश्ते में न रखें ये उम्मीदें वरना टूट सकता है आपका रिश्ता

हर कोई अपने साथी से कुछ उम्मीद रखता है. जहां उम्मीदें आपको जोड़ती है वही रिश्तों को तोड़ने का एक बड़ा कारण भी होती हैं. जरुरत से अधिक उम्मीदें करने से आप निराशा की भावना महसूस करने लगते हैं और यह आपके रिश्तों में खटास पैदा करता है. एक हेल्दी रिलेशन बनाए रखने के लिए जरुरी है कि आप अपने साथी से ये उम्मीदें ना ही रखें.

कि वो खुद से आपको पढ़ ले

अगर आप अपने साथी से उम्मीद करते हैं कि वो आपको समझें और जानें तो यह सही है लेकिन अगर आप चाहते हैं कि आपका साथी आपका दिमाग पढ़ लें और आपकी हर बात को बिना बोले समझ जाए तो ऐसा नहीं हो सकता है. आपकी क्या जरुरते हैं ये समझना आसान है लेकिन आप किस वक्त क्या चाहते हैं ये पूरी तरह से समझना मुश्किल है. वो आपकी इच्छा के लिए अंदाजा जरुर लगा सकते हैं लेकिन हर वक्त उनका अंदाजा सही रहें ऐसा नहीं हो सकता.

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कि वो आपको हमेशा खुश रखेगा

बहुत से लोग किसी भी रिश्ते को जोड़ने से पहले सोचते हैं कि उनका साथी उन्हें हमेशा खुश रखेगा. बल्कि कुछ लोगों का मानना है कि वो तब तक खुश नहीं रह सकते हैं जब तक कि वो किसी रिलेशन में नहीं हैं. वास्तव में ऐसा नहीं है, आप किसी दूसरे इंसान से अपने लिए खुशी नहीं ढ़ूढ़ सकती हैं. खुशी वो चीज है जो आपको अपने अंदर मिलती है या खुद से मिलती है.

कि आपके साथी की धारणा आपकी तरह हो

इस उम्मीद के कारण सम्बंधों में अधिकतर झगड़े होते हैं. किसी भी चीज को लेकर आपकी धारणाएं आपके साथी से अलग हो सकती हैं. धारणाएं कई तरह की चीजों से बनती हैं. आप किसी भी विषय को लेकर धारणाएं अपने अनुभवों और साक्ष्यों के आधार पर बनाते हैं. जाहिर है कि आपके और आपके साथी के अनुभव आपसे अलग होंगे. तो आप दोनों की धारणाएं भी अलग होंगी.

आपने ये कहावत तो सुनी ही होगी कि अगर आप चाहते हैं कि हर काम सही तरीके से हो तो वो काम खुद करें. जो चीजें आपको खुश रखती हैं और आप चाहते हैं कि वो बिल्कुल उचित तरीके से हो तो बेहतर है कि आप खुद ही उस काम को कर लें. अपने पार्टनर से ये उम्मीद करना कि वो सभी काम बिल्कुल सही करें और उससे कोई गलती ना हो,  खुद एक गलती करने जैसा है. अगर आप ये उम्मीद कर रहे है और आपका साथी उस उम्मीद पर खरा नहीं उतरता है तो आपको निराशा होगी और आप सोचेंगे कि आपका साथी परफेक्ट नहीं है.

क्या उम्मीदें करनी चाहिएं

एक रिश्ते में खुश रहने के लिए बहुत ज्यादा उम्मीदें लगाना गलत है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि आप अपने पार्टनर से उम्मीद ही ना रखें. आप अपने साथी से वो उम्मीदें करें जो वास्तव में करनी चाहिए. कुछ उम्मीदें है जो आपको अपने पार्टनर से करनी चाहिए.

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  • आपका सम्मान करे.
  • आपसे प्यार करे.
  • आपके साथ ईमानदार हो.
  • सब्र और धैर्य की भावना हो.

‘चंद्रयान 2’: पाकिस्तान ने चंद्रयान को लेकर भारत पर कसा तंज

भले ही चंद्रयान-2 पूरी तरह सफल न रहा लेकिन इसरो के वैज्ञानिकों ने पूरी कोशिश की.मिशन चंद्रयान 2 का कुछ ही दूरी पर था विक्रम लैंडर जब इसरो के वैज्ञानिकों से उसका संपर्क टूट गया. इसरो के अध्यक्ष और सभी वैज्ञानिक बहुत हताश औऱ निराश हैं लेकिन इसरो पूरा भारत तुम्हारे साथ खड़ा है और आज नहीं तो कल कामयाबी जरूर मिलेगी.इसरो के अध्यक्ष के.सिवन ने जब घोषण कर बताया कि संपर्क टूट गया है तो वो काफी दुखी थें.उनके आंख में आंसू आ गया हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें अपने गले लगाते हुए सांत्वना भी दिया.

पूरा  देश काफी उत्साहित था. 978 करोड़ रुपये में मिशन चंद्रयान 2 चांद को छूने ही वाला था लेकिन तभी एक दुखद खबर आई कि विक्रम लैंडर योजना के अनुरुप ही चल रहा था लेकिन 2.1 किमी पहले ही उसका भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन से संपर्क टूट गया. जब इसरो ने इसकी आधिकारिक घोषणा की तो सभी देशवासियों की उम्मीदें टूट गई और सारे वैज्ञानिक भी परेशान हो गए प्रधानमंत्री ने वहां से जाने से पहले सबको शुभकामनाएं दी लेकिन इसरो के अध्यक्ष जब मोदी के गले लगे तो उनके आंखों में आंसू थे वो भावुक पल देखकर किसी को भी रोना आ जाएगा.

इस वक्त पूरा देश इसरो के वैज्ञानिकों के साथ खड़ा है और उन्हें पूरी उम्मीद है कि एक दिन हम जरूर सफल होंगे.भारत की कोशिश बेकार नहीं जाएगी.इसरो पर आज पूरे देश को गर्व है. हालांकि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आता है उसने भारत को ट्रोल करना शुरु कर दिया. पाकिस्तान के रेल मंत्री शेख रशीद ये कहते हैं कि उनके पास पाव भर के और आधे पाव के भी बम हैं. अब इस मंत्री की बात से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ये मंत्री कैसा है कुछ और कहने की जरूरत नहीं हैं और फिर भी पाक भारत को धमकी देता है और चंद्रयान के विफल होने पर भारत पर कटाक्ष करता है.पाकिस्तान के विज्ञान और तकनीकि मंत्री फवाद ने ट्वीट कर लिखा है कि “जो काम नहीं आता, पंगा नहीं लेते ना..डियर इंडिया” इस मंत्री के बड़बोले बोल से अबतक आप ये तो समझ ही गए होंगे ही पाकिस्तान हमेशा पाकिस्तान ही रहेगा. क्योंकि उसे दूसरे मुल्कों को ट्रोल करने के सिवा कुछ भी नहीं आता है अब भाई  पाक मंत्री फवाद की बातों से तो यही लगता है.लेकिन पाकिस्तान तुम देखना भारत इस कामयाबी को जरूर हांसिल करेगा.

अरे भारत तो वो देश है जिसने पाकिस्तान से बहुत बाद में 1969 में इंडियन स्पेस रिसर्च और्गेनाइजेशन (इसरो) बनाया और छह साल के अंदर ही 1975 में अपना पहला सेटेलाइट आर्यभट्ट अंतरिक्ष में भेजा था. हिंदुस्तान ने हमेशा वैज्ञानिकों का सम्मान किया है और हिंदुस्तान को पूरा भरोसा है कि भले ही इस बार संपर्क टूटा है लेकिन उम्मीद अभी बाकी है और एक दिन ये सफलता भारत को जरूर मिलेगी. हमें यकीन है इसरो ये कामयाबी जरूर हांसिल करेगा और ये साबित करेगा कि भारत किसी भी देश से कम नहीं है. भारत के अंदर हर काम को करने का हौसला है और भारत कभी भी पीछे नहीं हटेगा.

योगी के गले की फांस बन रहे स्वामी चिन्मयानंद

उन्नाव के विधायक कुलदीप सेंगर के बाद पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री और बीजेपी के नेता स्वामी चिन्मयानंद पर लगे आरोप उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गले की फांस बन गये है. उन्नाव और शाहजहांपुर की घटना के बहाने योगी आदित्यनाथ की जातीय घेराबंदी की जा रही है. दोनों मामले में मुख्यमंत्री की बदनामी का सबब बन रही है. असल में कुलदीप सेंगर और स्वामी चिन्मयानंद दोनो ही ठाकुर जाति के लोग है. कुलदीप सेंगर के मामले में योगी के साथ उत्तर प्रदेश के डीजीपी तक पर जातिगत आधार पर आरोप लगाये गये थे. स्वामी चिन्मयानंद के मामलें में जाति के साथ ही साथ संत की छवि और पहनावा भी आरोपों को हवा देने का काम कर रही है.

इस बारे में खुद स्वामी चिन्मयानंद ने कहा कि मेरी बदनामी की आड़े में मुख्यमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचाने की साजिश रची जा रही है. मैं पूरी तरह से निर्दोश हूं. उन्नाव कांड में भी विधायक कुलदीप सेंगर ने कहा कि लड़की के साथ हुई सडक हादसे से मेरा कोई मतलब नहीं है. कुलदीप मामले में पीड़ीता लडकी और उसके परिवार के साथ हुये सडक हादसे की जांच कर रही सीबीआई कोर्ट के आदेश के बाद भी 45 दिन में मामले की चार्जशीट दाखिल नहीं कर पा रही है. सीबीआई बारबार से कोर्ट से समय बढाने की मांग कर रही है.

खुद ही राजस्थान गई लड़की: 

जिस लड़की के गायब होने का आरोप स्वामी चिन्मयानंद पर लग रहा था वह खुद ही अपने दोस्त के साथ राजस्थान गई थी. एलएलएम यानि मास्टर औफ लौ की पढ़ाई करने वाली छात्रा ने 24 अगस्त 2019 को एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट करके पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री और बीजेपी के नेता स्वामी चिन्मयानंद पर शोषण का आरोप लगाया. इसके बाद लड़की गायब हो गई. 30 अगस्त को लड़की के पिता ने शाहजहांपुर कोतवाली में धारा 364 और धारा 506 के तहत मुकदमा दर्ज कराया. पुलिस ने चिन्मयानंद के खिलाफ धमकी और अपहरण की धाराओं में केस दर्ज कर लड़की तलाश शुरू कर दी. लड़की तलाश के लिये पोस्टर लगाये गये. जिसको लेकर लड़की की जानकारी उजागर करने आरोप पुलिस को झेलना पड़ा.

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इस दौरान उच्च न्यायलय ने मामले का संज्ञान लेते हुये सनुवाई शुरू कर दी. जस्टिस आर भानुमति और एएस बोपन्ना ने कहा कि लड़की को अकेला नहीं छोड सकते. कानून लड़की और उसके अधिकारों की रक्षा करेगा. लड़की और उसके भाई को सरकारी सुरक्षा में मनचाही जगह पर पढ़ने का अधिकार है. इस बीच छात्रा की बरामदगी राजस्थान से की गई. वहां से उसे दिल्ली ले जाया गया.

उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने बताया ‘बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद ने इस संबंध में एक एफआईआर दर्ज कराई थी. एफआईआर के मुताबिक लड़की (ला छात्रा) उनसे 5 करोड़ रुपये मांग रही थी और पैसे न देने पर मीडिया में जाने की धमकी दी थी. इस मामले में उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी. ‘ कुलदीप सेंगर और चिन्मयानंद मामले में जितनी जल्दी कोर्ट का फैसला आयेगा. सच्चाई पर से परदा उतनी जल्दी ही उठेगा. सच बाहर आने तक इसकी आड़ में राजनीतिक रोटियां भी सेंकी जाती रहेगी. राजनीतिक कारणों से ही यह मसले इतने उलझ गये है कि इनका सच बाहर आना सरल नहीं रह गया है.

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DID7: इस शो पर दिखी करीना और सोनम की खास बौन्डिंग, किया धमाकेदार डांस

जी टीवी पर प्रसारित होने वाले शो “डांस इंडिया डांस” में करीना कपूर जज कर रही हैं. करीना के इस शो में आए दिन सेलेब्स अपनी फिल्म को प्रमोट करने आते रहते हैं. हाल ही में सोनम कपूर अपनी फिल्म “द जोया फैक्टर” को प्रमोट करने डांस इंडिया डांस में पहुंचीं.

इस शो के मंच पर करीना कपूर और सोनम कपूर के बीच की  काफी अच्छी बौन्डिंग नजर आई. दोनों ने फिल्म “वीरे दी वेडिंग” के सौन्ग “तारीफें” पर जमकर डांस किया. करीना और सोनम कपूर का डांसिंग वीडियो सोशल मीडिया पर  खूब वायरल हो रहा है.

वीडियो में करीना कपूर खान ब्लू और सिल्वर ग्लिटरी लौन्ग गाउन में नजर आ रही हैं. जबकि सोनम कपूर पिंक कलर की ट्रैडिशन ड्रेस में काफी स्टनिंग लग रही हैं. करीना और सोनम के बीच की मस्ती देखते ही बनती है. दर्शकों को भी अपनी फेवरेट एक्ट्रेसेज का ये रूप काफी पसंद आ रहा है.

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इनके काम की बात करो तो करीना कई प्रोजेक्ट्स में बिजी चल रही हैं. करीना, इरफान खान के साथ फिल्म हिंदी मीडियम के सीक्वल में नजर आने वाली है. गुड न्यूज फिल्म में करीना, कियारा आडवाणी और दिलजीत दोसांझ जैसे सितारों के साथ नजर आएंगी.

इसके अलावा वे करण जौहर के प्रोजेक्ट तख्त का भी हिस्सा हैं. वे लंबे समय बाद अक्षय कुमार के साथ भी काम करने जा रही हैं. सोनम कपूर की फिल्म “द जोया फैक्टर” की बात करें तो ये जोया सोलंकी नाम की एक लड़की की कहानी है. यह फिल्म 20 सितंबर को रिलीज होने वाली है.

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‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’: कार्तिक के चाचा के एक्सट्रा मैरिटल अफेयर का होगा खुलासा

स्टार प्लस पर प्रसारित होने वाला  सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में जल्द ही दर्शकों को एक नया धमाकेदार ट्विस्ट देखने को मिलने वाला है. फिलहाल इस सीरियल की कहानी  नायरा, कार्तिक, वेदिका  और कैरव के इर्द गिर्द ही घूम रही है. पीछले एपिसोड में आपने देखा कि नायरा की खास दोस्त लीजा की रीएंट्री हुई है. और वो अपने रिलेशनशिप को लेकर काफी परेशान है,  लीजा ने नायरा को बताया है कि उसके बौयफ्रेंड ने उसे छोड़ दिया है. ये सुनकर नायरा सन्न हो जाती  है और वह लीजा से वादा करती है कि वह उसके बौयफ्रेंड से जरूर मिलवाएगी.

अगर आपने ये शो देखा है तो आपको पता ही होगा कि लीजा किसी और को नहीं बल्कि कार्तिक के चाचा और सुरेखा के पति आखिलेश को ही डेट कर रही है. जल्द ही इस सीरियल की कहानी  अखिलेश और लीजा के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर पर फोकस होने वाली है.

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पीछले एपिसोड में  आपने देखा  कि जब नायरा  इस मामले में सुवर्णा से मदद मांगती है तो वह उसे बताती है कि लीजा के बौयफ्रेंड का नम्बर गोयनका कम्पनी के ही किसी एम्प्लौई का है. इस सीरियल के अपडेट के अनुसार जैसे ही नायरा गोयनका कम्पनी में जाकर इस नम्बर के बारे में पता करने जाएगी, वह वहीं पर कार्तिक से टकरा जाएगी. जब कार्तिक को नायरा से लीजा के बारे में पता चलेगा तो वो उसे खूब खरी खोटी सुनाएगा कि आखिर वह उससे सारी चीजें क्यों छिपाने लगी है?

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लेकिन जब  कार्तिकको  पता चलेगा कि लीजा के बायफ्रेंड का नम्बर कम्पनी में ही मौजूद किसी शख्स है तो उसे काफी झटका लगेगा. इसके बाद कार्तिक नायरा की मदद करने के लिए कहेगा. रिपोर्ट के मुताबिक जल्द ही इस शो में अखिलेश का खुलासा होने वाला है. अब इस सीरियल में ये देखना दिलचस्प होगा कि  अखिलेश का सच सामने आने के बाद सुरेखा और बाकी परिवार वाले किस तरह से रिएक्ट करते है.

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चंदे का धंधा

  लेखक: सुनीत गोस्वामी

कोई भी धार्मिक काम बिना चंदे के नहीं होता. मेहनत की कमाई चंदे के माध्यम से ज्यादातर धार्मिक आयोजनों और अनुष्ठानों में जाती है. आम जनता चंदों से परेशान है, फिर भी धर्म के नाम पर अपनी जेब ढीली करने में कोताही नहीं बरतती. इसलिए चंदे का धंधा खूब फलफूल रहा है.

आगरा एक ऐतिहासिक शहर है. यहां मुगलकाल और ब्रिटिशकाल के कई स्मारक मौजूद हैं. आगरामथुरा राजमार्ग पर जिला मुख्यालय से लगभग 6-7 किलोमीटर दूर एक मुगल स्मारक है, अकबर का मकबरा यानी अकबर टौंब. जहां यह स्मारक स्थित है, उस क्षेत्र को सिकंदरा कहा जाता है.

सिकंदरा से उत्तर की तरफ यहां से दोढ़ाई किलोमीटर दूर एक गांव है कैलास. यमुना किनारे एक तरफ जंगल से घिरा यह स्थल मुख्यतया धार्मिक स्थल है. यहां शिव का एक प्राचीन मंदिर है. इस के बारे में कहा जाता है कि यहां स्थित 2 शिवलिंग परशुराम और इन के पिता जयदग्नि द्वारा स्थापित हैं. बाद में भक्तों ने यहां मंदिर बनवा दिया था.

बहरहाल, जो भी हो, कैलास का यह मंदिर काफी पुराना था, यह सच है. लेकिन 20-25 साल से यह नए स्वरूप में खड़ा है. यहां लाल पत्थर की जगह अब भव्य मार्बल और संगमरमर के पत्थर लगे हैं. मंदिर की ऊंचाई भी आकाश को छूती नजर आती है. और यह सारा कमाल हुआ है चंदे के धंधे से. ऐसा एक नहीं, कई मंदिर और हैं जो चंदे और चढ़ावे से आज विशाल रूप लिए हुए हैं. अब तो ट्रस्ट के नाम पर चंदा उगाही होती है जिस में एक नहीं, कई महंतपुजारियों का हिस्सा होता है जो बराबरबराबर बंटता है और बंटवारे में जहां तीनपांच हुआ, तो वहीं आपस में लड़ाईझगड़ा शुरू हो जाता है.

महंतपुजारी आने वाले भक्तों से रसीद काट कर चंदा वसूलते हैं. और शहर में घूमघूम कर धनपतियों से भी उन की धार्मिक भावनाओं का दोहन कर के चंदा वसूला जाता है.

कुल मिला कर बात यह है कि चाहे कैलास का शिव मंदिर हो या फिर देश के कोनेकोने में बने मंदिर, इन मंदिरों के नाम पर करोड़ों का चंदा वसूला जाता है. इस चंदे से मंदिरों का भव्य निर्माण तो होता ही है, साथ ही महंतोंपुजारियों की जीवनशैली भी भव्य हो जाती है. अब इन लोगों ने आमदनी के लिए दूसरे मंदिर भी बना लिए हैं. महंतपुजारी अब 4 पहियों की गाडि़यों में सफर करते हैं और भोगवादी जीवन जीते हैं.

तरीके और भी हैं

हमारे देश और समाज में कई ऐसे आयोजन होते हैं जिन का संचालन चंदे की रकम से होता है. कुछ धूर्त लोग एक कमेटी या संस्था बना कर ऐसे कामों का आयोजन करते हैं. सार्वजनिक मेले, मंदिर में मूर्ति स्थापना, भंडारों का आयोजन, होलिका दहन, धार्मिक कथाओं का आयोजन, कवि सम्मेलन, देवी जागरण आदि ऐसे कई काम हैं जो आम आदमी के आर्थिक चंदे से किए जाते हैं.

सवाल यह है कि आम आदमी किसी के दबाव में आ कर आखिर ऐसे कामों में सहयोग क्यों करे? कवि सम्मेलनों और मुशायरों को ही लें. यह बात अपनी जगह ठीक है कि एक अच्छी कविता हमें बहुत कुछ देती है. एक वैचारिक कविता हमें श्रेष्ठ होने के लिए प्रेरित भी करती है. कविताएं हमारा मनोरंजन भी करती हैं. लेकिन इस का अर्थ यह नहीं हो जाता कि कविता के नाम पर हम कुछ भी सुनने के लिए बाध्य किए जाएं. लेकिन कुछ मक्कार तथाकथित कवियों के दबाव में आ कर हमें यह सब झेलना पड़ता है.

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आज के कमाऊ माहौल में तमाम ऐसे कवि पैदा होने लगे हैं जो कविता के नाम पर फूहड़ हास्य और तुकबंदियां करते हैं. ऐसे ही कथित कवि और शायर कवि सम्मेलनों और मुशायरों का आयोजन करते हैं. इन की नजर कुछ धनसंपन्न लोगों पर होती है.

धूर्त कवि और शायर दबाव दे कर उन से चंदा वसूलते हैं. इतना ही नहीं, ये आयोजक साधारण लोगों से भी यथासंभव चंदा वसूलते हैं. आयोजन पर थोड़ाबहुत खर्च करने के बाद शेष बची रकम आयोजकसंयोजक की जेब में जाती है. और वे इस रकम को अपनी ऐयाशी के शौक पर खर्च करते हैं.

भंडारे का खेल

हमारे समाज में एक बड़ा आयोजन होता है भंडारे का. हमारे देश में हर साल कितने भंडारे होते हैं, इस का सहीसही आकलन कठिन है. आमतौर पर नवरात्रों में मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सार्वजनिक भोज अर्थात भंडारे का आयोजन होता है. फिर किसी धार्मिक कथा का आयोजन हो या किसी साधुमहात्मा की पुण्यतिथि वगैरह हो, तो भी भंडारों का आयोजन किया जाता है.

यह एक ऐसा काम है जिस से आवश्यकता से अधिक चंदा इकट्ठा कर लिया जाता है. किसी भंडारे में 500 लोगों ने भी भोजन किया तो प्रचार यही किया जाता है कि ढाईतीन हजार लोगों ने खाना खाया. और ऐसे ही झूठे आंकड़ों के आधार पर हर साल चंदा वसूली की जाती है.

चंदा वसूलते समय यह कह कर दबाव बनाया जाता है कि अरे, इतने हजार लोगों का खाना है, इतने पैसों से क्या होगा, और दो. और इस बात को सत्य ही समझिए कि धार्मिक भंडारों में दिया जाने वाला चंदा एक मोटा धंधा है. जितना बड़ा आयोजन, उतना ही तगड़ा चंदा.

कुछ बड़े भंडारों में तो लाखों का चंदा किया जाता है. आधा खर्च करने के बाद भी आधे की बचत हो जाती है. छोटेमोटे भंडारों में भी 10-20 हजार रुपए की बचत मामूली बात है. जो लोग कमेटी बना कर या किसी मंदिर से जुड़ कर भंडारे करवाते हैं, उन का मकसद यह कतई नहीं होता कि वे भूखों को खाना खिलाएं. यदि ऐसा होता तो ये लोग रोज ही अपने यहां किसी एक वंचित को तो भोजन करा ही सकते हैं. सार्वजनिक भोजन के नाम पर चंदा और चंदे के नाम पर कमाई ही इन का मुख्य मकसद होता है.

आम आदमी है त्रस्त

किसी मंदिर में किसी देवीदेवता की मूर्ति स्थापना करनी हो तो चंदा. होली जलाने के लिए लकडि़यां लानी हों तो चंदा. दशहरे पर रावण भी चंदे की रकम से पाटा जाता है. देवी जागरण और मेलों के आयोजनों में भी चंदा वसूली की जाती है. समाज के जो धूर्त लोग चंदे का धंधा करते हैं, वे कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देते. दरअसल, इस अवैध वसूली पर ही उन की शराबखोरी और ऐयाशी फलतीफूलती है.

कई मामलों में चंदा वसूली पूरी तरह से आर्थिक शोषण की तरह हो जाती है. कई बार यह देखा गया है कि 10-12 युवाओं का टोला आता है. ये लोग शराब पिए हुए होते हैं. पूरे अधिकार के साथ मुंहमांगी रकम की मांग करते हैं. अगर सामने वाला उतनी रकम नहीं देना चाहता, तो ये लोग बदतमीजी पर उतर आते हैं. यहां तक कि गालीगलौज करते हैं और धमकियां देते हैं.

जिन लोगों से इन्हें मनमाफिक चंदा नहीं मिलता है, उन्हें ये तरहतरह से परेशान करते हैं. राह चलते उस परिवार की लड़कियों को छेड़ते हैं. या फिर रात में उस आदमी के मकान के बाहर कीचड़ वगैरह फेंक देते हैं. मकान की दीवारों पर अश्लील गालियां लिख देते हैं. जो लोग कम चंदा देते हैं उसे यह चंदा मंडली सार्वजनिक तौर पर जलील करती है. उसे यह कह कर जलील किया जाता है कि यह तो नंगा है. बेचारा बहुत गरीब है. भीख मांगमांग कर तो खाना खाता है. एक आम और शरीफ आदमी के लिए यह जलालत असहनीय हो जाती है. इस तरह वह अपना पेट काट कर भी चंदा दे देता है.

राहजनी जैसा है यह

अब आप ही सोचिए कि इस तरह चंदावसूली क्या किसी राहजनी से छोटा काम है. लेकिन मजे की बात है कि कानून में इसे अपराध घोषित नहीं किया गया है. कायदे से चंदे के नाम पर जबरन वसूली को अपराध ही माना जाना चाहिए और इन मामलों में पुलिस में अभियोग भी पंजीकृत होने चाहिए. यह जरूरी नहीं है कि ब्लैकमेलिंग या हथियार के बल पर धनउगाही को ही क्राइम माना जाए. धमका कर अथवा धर्म और भगवान के नाम पर धन उगाहना भी एक जरायम पेशा है. और इस तरह पैसा वसूलना भी एक जरायम पेशा है. सरकार को आम आदमी के इस कष्ट पर ध्यान देना चाहिए.

चंदा वसूलने वालों से यह सवाल पूछना स्वाभाविक है कि आखिर धर्म और भगवान के ठेकेदार वे क्यों हैं. आखिर किस ने उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी है कि धार्मिक परंपराओं का निर्वाह करें. फिर अगर वे ऐसा चाहते हैं तो उन्हें यह सब अपनी कमाई में से क्यों नहीं करना चाहिए.

हकीकत यह है कि किसी भी आयोजन में चंदा वसूलने वाले उस में अपना एक रुपया भी नहीं लगाते. हां, बचत जरूर कर लेते हैं. मजे की बात यह भी है कि किसी आयोजन में कितना चंदा आया और कितना खर्र्च हुआ, इस का कोई हिसाबकिताब नहीं रखा जाता.

किसी भी आम आदमी को यह अधिकार है ही नहीं कि वह चंदे की रकम का हिसाबकिताब देख सके. जब सूचना के अधिकार के तहत हम सरकारी खर्च का ब्योरा देख सकते हैं, तो इन चंदे वालों का हिसाबकिताब देखने का अधिकार हमें क्यों नहीं होना चाहिए? लेकिन ऐसा करने की हिम्मत भी आम आदमी में नहीं है. क्योंकि इन गुंडे चंदेबाजों से कौन लड़ाई मोल ले. यह मामला सचमुच एक आम आदमी के लिए बेहद दयनीय हो जाने वाला है.

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महंगाई के दौर में चंदे का धंधा करने वालों ने अपनी धनराशि भी बढ़ा दी है. छोटे से छोटे आयोजन में भी वे 101 रुपए से कम लेते ही नहीं. बड़े आयोजनों में यह धनराशि 1000, 5,000 और 10,000 रुपए तक होती है. जो परिवार 15-20 हजार रुपए कमा कर अपनी औसत जिंदगी जीता है, उस के लिए साल में कईकई बार चंदा देना कितना बड़ा दर्र्द है, यह समझा जा सकता है.

मेरे एक परिचित को अपनी बच्ची की दवाई के पैसे चंदेबाजों को देने पड़े. अपना मानसम्मान बचाने की खातिर वह चंदा देने से मना कर ही नहीं सकता था. इस तरह के न जाने कितने लोग हैं, जो चंदेबाजों से परेशान रहते हैं.

धन हमारी जिंदगी के लिए बहुत कुछ माने रखता है. लेकिन बहुत कुछ खो कर भी धन कमाने के कोई माने नहीं हैं. और इस तरह चंदेबाजों को भी अपना बहुत कुछ खोना पड़ता है. उन्हें अपनी सहज मनुष्यता खोनी पड़ती है. उन्हें लोगों से मिलने वाला प्यार खोना पड़ता है. उन के लिए लोगों के दिलों में शुभकामनाएं नहीं उठतीं, बद्दुआएं निकलती हैं. इसलिए जहां सरकार को चाहिए कि वह जबरन चंदा वसूली पर प्रभावी रोक लगाए, वहीं चंदेबाजों को भी ऐसा गिरा हुआ धंधा करने से बाज आना चाहिए.     द्य

पाप कटाने का कारोबार

पाप मुक्ति का प्रमाणपत्र जारी करने वाले एक पंडित नंदकिशोर से बातचीत की तो उन्होंने जो बताया वह खालिस धार्मिक बकवास थी, जो हर जगह अलग तरीके से सुनने को मिल जाती है. कभी औरंगजेब ने गोतमेश्वर मंदिर की एक मूर्ति तुड़वा दी थी, नतीजतन, एकाएक ही भगवान के क्रोध से बेमौसम आंधीतूफान आ गया था, जंगली ततैयों ने औरंगजेब की सेना पर हमला कर दिया था. इस से घबरा कर उस  ने मंदिर बनवाने का संकल्प लिया, तब कहीं जा कर हालात सामान्य हो पाए.

मगर हकीकत में यह मंदिर भोलेभोले आदिवासियों को लूटने का अड्डा है, जिन्हें लगता है कि उन से पाप होते हैं और उन की सजा से बचने के लिए बेहतर यही है कि 11 रुपए दे दिए जाएं. आदिवासियों की गरीबी के लिहाज से पहले ये 11 रुपए बहुत हुआ करते थे. नकद दक्षिणा के साथसाथ लोग अनाज भी खूब चढ़ाते थे.

पंडित की मानें तो अब से कुछ साल पहले तक पाप मुक्ति प्रमाणपत्र में पाप का प्रकार भी वर्णित रहता था. मसलन, वध, चोरी, गर्भपात, बलात्कार, प्राणघातक हमला, गौहत्या और ब्रह्म अपमान वगैरह. आपराधिक मामलों में दोषी इस प्रमाणपत्र को अदालत में पेश करने लगे, तो समन पुजारियों को भी जारी होने लगे.

अदालती झंझटों से बचने के लिए प्रमाणपत्र से इस कौलम को हटा दिया गया. भगवान ने भी इस फेरबदल पर कोई एतराज नहीं जताया. किसे, कब, कितने पाप करने हैं, यह तो वह जन्म के साथ ही लिख चुका है. सो, मुक्ति और माफी के इस प्रावधान से धर्मग्रंथों का दोहरापन ही उजागर होता है.

दक्षिणा का फंडा : इस प्रतिनिधि ने गंदे पानी में नहाने से असमर्थता जाहिर की तो पंडितजी बोले, ‘कोई बात नहीं, मन में स्नान कर लो या फिर कुछ बूंदें सिर पर डाल लो, स्नान संपन्न हो जाएगा.’ इस धूर्तता के जवाब में यह कहने पर कि आप भी मन में मान लो कि 11 रुपए दे दिए और प्रमाणपत्र दे दो, तो पंडितजी भड़क उठे. प्रमाणपत्र उन्होंने तभी दिया जब 12 रुपए उन की हथेली में घूस की तरह रख दिए गए. दोष यानी पाप निवारण का शुल्क 10 रुपए है, एक रुपया गऊ मुख का और एक रुपया प्रमाणपत्र की छपाई का लिया जाता है.

गोतमेश्वर मंदिर से हर साल औसतन 50 हजार प्रमाणपत्र पाप मुक्ति के जारी होते हैं. यानी 6 लाख रुपए बैठेबिठाए पंडित को मिल जाते हैं. इस से दोगुनी राशि का अनाज भी दान में आता है.

विज्ञान के इस युग में इस तरह के मंदिर और प्रमाणपत्र सभ्यता व समझदारी पर सवालिया निशान लगाते हैं कि लोगों को क्यों अपने पापी होने का भ्रम है? और क्या मुक्ति इतनी सस्ती है कि महज 12 रुपए में वे नए पाप करने का लाइसैंस हासिल कर लें?

दरअसल, यह तामझाम बताता है कि हम अभी भी पिछड़े, असभ्य और कायर हैं. इसीलिए मुक्ति के नाम पर धर्मस्थलों और पंडों के मुहताज हैं. दिमागी दिवालिएपन की यह हद है कि ताजी हवा और तर्कों से लोग कोई वास्ता न रखते गंवार ही रहना चाहते हैं.

पंडों को यह हक है कि वे कागज का एक टुकड़ा जारी कर विभिन्न जातियों को मजबूर कर सकते हैं कि दोषी यानी मरजी से जिंदगी जीने वाले को वापस लिया जाए, तो जाहिर है कि यह अदालतों की बेबसी की भी एक बड़ी मिसाल है जिस पर सभी खामोश हैं. और यह खामोशी जातिवाद, कट्टरवाद, खाप पंचायतों और पंडावाद को बढ़ावा देने वाली साबित हो रही है. समाज अभी भी धर्म से नियंत्रित और संचालित हो रहा है. अदालतें तो धर्म के सामने बौनी सी लगती हैं जिस का प्रमाण गोतमेश्वर मंदिर का पाप मुक्तिप्रमाण पत्र है.

धर्म के दुकानदारों को हमेशा से ही पापियों की सख्त जरूरत रही है. इसलिए पाप की परिभाषा व उदाहरण आएदिन बदलते रहते हैं. छोटी जाति वाले को छू लेना पहले सा बड़ा पाप नहीं रहा. वजह, उस की जेब में आ गया पैसा है. लिहाजा, उसे भी धर्म के मकड़जाल में फंसा लिया गया है. नतीजा यह हुआ कि पढ़ालिखा कल का अछूत धर्मग्रंथों में वर्णित पाप से डरने लगा और बचने के लिए पैसा चढ़ाने लगा.

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फिल्म समीक्षाः ‘नेटवर्क’

बंगला फिल्म: ‘नेटवर्क’

रेटिंग: 4 स्टार

अवधिः 1 घंटा 52 मिनट

निर्माताः प्रीति बसु और सप्ताश्व बसु

लेखक व निर्देशकः सप्ताश्व बसु

लेखकः रिनी घोष और सप्ताश्व बसु

संगीतकारः डब्बू,राज डे, अविराज और चिरंतन

कलाकार: सास्वत चटर्जी, सव्यसाची चक्रवर्ती, रिनी घोष, इंद्रजीत मजुमदार, कार्तिकेय त्रिपाठी, भास्कर बनर्जी, इरानी घोष, सयोनी घोष,  सप्तरिशि रौय, अक्षय कपूर, रानू बसु ठाकुर

फिल्म व टीवी इंडस्ट्री की पृष्ठभूमि की रोमांचक फिल्म ‘‘नेटवर्क’’ वर्तमान समय में गोपनीयता   अतिक्रमण व निजिता हनन के मुद्दे को मनोरंजक तरीके से उठाती है. आज जब हम सभी कई तरह की निगरानी /सर्विलेंस में है, तब यह फिल्म निजिता हनन व गोपनीयता अतिक्रमण के ज्वंलत मुद्दे पर बात करती है.

कहानीः

फिल्म की कहानी के केंद्र में मशहूर फिल्मकार अभिजीत गांगुली (सास्वत चटर्जी) हैं, जिन्होंने अब अपनी प्रसिद्धि खो दी है. वास्तव में वह अपनी बेटी पूजा की मृत्यु के बाद एक चलती-फिरती परछाई बन कर रह गए थे. धीरे धीरे वह लोगों से कट गए, जिसके चलते अब उन्हें कोई नहीं पहचानता. जब उन्हें अपनी कैंसर की बीमारी के बारे में पता चलता है, और डाक्टर कह देते हैं कि अब उनकी उम्र केवल एक वर्ष के लिए ही रह गयी है, तब वह ईलाज करवाने की बजाय अपने पास मौजूद संसाधनों की मदद से अपने करियर की अंतिम फिल्म बनाकर अपनी खोई हुई शोहरत को पुनः वापस हासिल हासिल करने के लिए प्रयास शुरू करते हैं. उनके पास एक बेहतरीन कहानी है, जिसे एक बहुत बड़े फिल्म निर्माता अरविंदम चक्रवर्ती (सव्यासाची चक्रवर्ती) पैसे के बल पर खरीदना चाहते हैं. मगर अभिजीत गांगुली सीधे मना कर देते हैं. फिर वह राज (इंद्रजीत मजुमदार) और श्रेया (रिनी घोष) जैसे कइ दूसरे प्रतिभाशाली कलाकारों और तकनीशियन के एक समूह के साथ फिल्म का निर्माण शुरू करते हैं. फिल्म का प्रोमो बन जाता है. आधे से अधिक शूटिंग हो जाती है. अभिजीत गांगुली, श्रेया को अपनी बेटी पूजा की तरह मानते हैं. वह श्रेया व राज पर पूरा भरोसा करते हैं. मगर अभिजीत गांगुली को पता ही नही चलता है कि अरविंदम चक्रवर्ती ने राज को खरीद लिया है.राज व श्रेया निजी जीवन में एक दूसरे से प्रेम करते हैं. इसलिए राज के इशारे पर श्रेया, अभिजीत गांगुली से गलत कागज पर हस्ताक्षर करवाकर उनके साथ धोखाधड़ी करती है. जिससे वे बर्बाद हो जाते हैं. पता चलता है कि अरविंदम चक्रवर्ती ने राज और श्रेया के साथ ही नए नाम से उनकी ही कहानी पर फिल्म बनाकर रिलीज कर दी. फिल्म सफल होती है. राज और श्रेया स्टार बन जाते हैं.

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पर अभिजीत गांगुली मरने से पहले हार नहीं मानना चाहते. वह टीवी का एक रियालिटी शो ‘‘देअर लाइफ‘‘ नाम से एक अनोखा शो बनाते हैं. यह टीवी शो नामचीन फिल्म कलाकारों व सेलिब्रिटी की लाइफ स्टाइल से संबंधित है. अर्जुन चटर्जी (सप्तरिशि रौय) को सामने रखकर राज व श्रेया की जिंदगी को अपने टीवी रियालिटी शो में पेश करने के लिए अग्रीमेट करते हैं. फिर इस टीवी शो के माध्यम से वह राज, श्रेया व अरविंदम चक्रवर्ती सहित उन सभी व्यक्तियों से पहर एपीसोड में एक एक करके बदला लेना शुरू करते है, जिन्होंने उन्हें धोखा दिया था.

निर्देशनः

गजब की पटकथा व गजब का निर्देशन. दर्शक पूरे वक्त तक अपनी सीट पर बैठा रहता है. लेखक इस बात के लिए बधाई के पात्र है कि फिल्म देखते समय दर्शक इस बात का अनुमान ही नहीं लगा पाता कि अगले दृश्य में क्या होगा?

‘आई विटनेस’,‘प्रतिंबिंब’, ‘जिआलो’  जैसी कई लघु फिल्में  निर्देशित कर चुके 27 वर्षीय सप्तास्व बसु की बतौर निर्देशक यह पहली फीचर फिल्म है, मगर फिल्म देखकर यह कहना मुश्किल है कि यह किसी कम उम्र के निर्देशक की पहली फिल्म है. वह मूलतः इलेक्ट्रनिक्स और कम्युनीकेशन इंजीनियर हैं, तो उन्होंने अपनी इस योग्यता का भरपूर उपयोग किया है. बौलीवुड के फिल्मकारों को भी यह फिल्म देखकर कुछ तो सीख लेनी चाहिए.

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अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है तो अभिजीत गांगुली के किरदार में शाश्वत चटर्जी, अरविंदम चक्रवर्ती के किरदार में सव्यसाची चक्रवर्ती, श्रेया के किरदार में रिनी घोष, राज के किरदार में इंद्रजीत मजुमदार और सुभो के किरदार में कार्तिकेय त्रिपाठी ने शानदार अभिनय किया है. फिल्म के कैमरामैन प्रसेनजीत चौधरी और अंकित सेन गुप्ता बधाई के पात्र है.

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