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मां : भाग 1

रात के 10 बजे थे. सुमनलता पत्रकारों के साथ मीटिंग में व्यस्त थीं. तभी फोन की घंटी बज उठी…

‘‘मम्मीजी, पिंकू केक काटने के लिए कब से आप का इंतजार कर रहा है.’’

बहू दीप्ति का फोन था.

‘‘दीप्ति, ऐसा करो…तुम पिंकू से मेरी बात करा दो.’’

‘‘जी अच्छा,’’ उधर से आवाज सुनाई दी.

‘‘हैलो,’’ स्वर को थोड़ा धीमा रखते हुए सुमनलता बोलीं, ‘‘पिंकू बेटे, मैं अभी यहां व्यस्त हूं. तुम्हारे सारे दोस्त तो आ गए होंगे. तुम केक काट लो. कल का पूरा दिन तुम्हारे नाम है…अच्छे बच्चे जिद नहीं करते. अच्छा, हैप्पी बर्थ डे, खूब खुश रहो,’’ अपने पोते को बहलाते हुए सुमनलता ने फोन रख दिया.

दोनों पत्रकार ध्यान से उन की बातें सुन रहे थे.

‘‘बड़ा कठिन दायित्व है आप का. यहां ‘मानसायन’ की सारी जिम्मेदारी संभालें तो घर छूटता है…’’

‘‘और घर संभालें तो आफिस,’’ अखिलेश की बात दूसरे पत्रकार रमेश ने पूरी की.

‘‘हां, पर आप लोग कहां मेरी परेशानियां समझ पा रहे हैं. चलिए, पहले चाय पीजिए…’’ सुमनलता ने हंस कर कहा था.

नौकरानी जमुना तब तक चाय की ट्रे रख गई थी.

‘‘अब तो आप लोग समझ गए होंगे कि कल रात को उन दोनों बुजुर्गों को क्यों मैं ने यहां वृद्धाश्रम में रहने से मना किया था. मैं ने उन से सिर्फ यही कहा था कि बाबा, यहां हौल में बीड़ी पीने की मनाही है, क्योंकि दूसरे कई वृद्ध अस्थमा के रोगी हैं, उन्हें परेशानी होती है. अगर आप को  इतनी ही तलब है तो बाहर जा कर पिएं. बस, इसी बात पर वे दोनों यहां से चल दिए और आप लोगों से पता नहीं क्या कहा कि आप के अखबार ने छाप दिया कि आधी रात को कड़कती सर्दी में 2 वृद्धों को ‘मानसायन’ से बाहर निकाल दिया गया.’’

‘‘नहीं, नहीं…अब हम आप की परेशानी समझ गए हैं,’’ अखिलेशजी यह कहते हुए उठ खडे़ हुए.

‘‘मैडम, अब आप भी घर जाइए, घर पर आप का इंतजार हो रहा है,’’ राकेश ने कहा.

सुमनलता उठ खड़ी हुईं और जमुना से बोलीं, ‘‘ये फाइलें अब मैं कल देखूंगी, इन्हें अलमारी में रखवा देना और हां, ड्राइवर से गाड़ी निकालने को कहना…’’

तभी चौकीदार ने दरवाजा खटखटाया था.

‘‘मम्मीजी, बाहर गेट पर कोई औरत आप से मिलने को खड़ी है…’’

‘‘जमुना, देख तो कौन है,’’ यह कहते हुए सुमनलता बाहर जाने को निकलीं.

गेट पर कोई 24-25 साल की युवती खड़ी थी. मलिन कपडे़ और बिखरे बालों से उस की गरीबी झांक रही थी. उस के साथ एक ढाई साल की बच्ची थी, जिस का हाथ उस ने थाम रखा था और दूसरा छोटा बच्चा गोदी में था.

सुमनलता को देखते ही वह औरत रोती हुई बोली, ‘‘मम्मीजी, मैं गुड्डी हूं, गरीब और बेसहारा, मेरी खुद की रोटी का जुगाड़ नहीं तो बच्चों को क्या खिलाऊं. दया कर के आप इन दोनों बच्चों को अपने आश्रम में रख लो मम्मीजी, इतना रहम कर दो मुझ पर.’’

बच्चों को थामे ही गुड्डी, सुमनलता के पैर पकड़ने के लिए आगे बढ़ी थी तो यह कहते हुए सुमनलता ने उसे रोका, ‘‘अरे, क्या कर रही है, बच्चों को संभाल, गिर जाएंगे…’’

‘‘मम्मीजी, इन बच्चों का बाप तो चोरी के आरोप में जेल में है, घर में अब दानापानी का जुगाड़ नहीं, मैं अबला औरत…’’

उस की बात बीच में काटते हुए सुमनलता बोलीं, ‘‘कोई अबला नहीं हो तुम, काम कर सकती हो, मेहनत करो, बच्चोें को पालो…समझीं…’’ और सुमनलता बाहर जाने के लिए आगे बढ़ी थीं.

‘‘नहीं…नहीं, मम्मीजी, आप रहम कर देंगी तो कई जिंदगियां संवर जाएंगी, आप इन बच्चों को रख लो, एक ट्रक ड्राइवर मुझ से शादी करने को तैयार है, पर बच्चों को नहीं रखना चाहता.’’

‘‘कैसी मां है तू…अपने सुख की खातिर बच्चों को छोड़ रही है,’’ सुमनलता हैरान हो कर बोलीं.

‘‘नहीं, मम्मीजी, अपने सुख की खातिर नहीं, इन बच्चों के भविष्य की खातिर मैं इन्हें यहां छोड़ रही हूं. आप के पास पढ़लिख जाएंगे, नहीं तो अपने बाप की तरह चोरीचकारी करेंगे. मुझ अबला की अगर उस ड्राइवर से शादी हो गई तो मैं इज्जत के साथ किसी के घर में महफूज रहूंगी…मम्मीजी, आप तो खुद औरत हैं, औरत का दर्द जानती हैं…’’ इतना कह गुड्डी जोरजोर से रोने लगी थी.

‘‘क्यों नाटक किए जा रही है, जाने दे मम्मीजी को, देर हो रही है…’’ जमुना ने आगे बढ़ कर उसे फटकार लगाई.

‘‘ऐसा कर, बच्चों के साथ तू भी यहां रह ले. तुझे भी काम मिल जाएगा और बच्चे भी पल जाएंगे,’’ सुमनलता ने कहा.

‘‘मैं कहां आप लोगों पर बोझ बन कर रहूं, मम्मीजी. काम भी जानती नहीं और मुझ अकेली का क्या, कहीं भी दो रोटी का जुगाड़ हो जाएगा. अब आप तो इन बच्चों का भविष्य बना दो.’’

‘‘अच्छा, तो तू उस ट्रक ड्राइवर से शादी करने के लिए अपने बच्चों से पीछा छुड़ाना चाह रही है,’’ सुमनलता की आवाज तेज हो गई, ‘‘देख, या तो तू इन बच्चोें के साथ यहां पर रह, तुझे मैं नौकरी दे दूंगी या बच्चों को छोड़ जा पर शर्त यह है कि तू फिर कभी इन बच्चों से मिलने नहीं आएगी.’’

सुमनलता ने सोचा कि यह शर्त एक मां कभी नहीं मानेगी पर आशा के विपरीत गुड्डी बोली, ‘‘ठीक है, मम्मीजी, आप की शरण में हैं तो मुझे क्या फिक्र, आप ने तो मुझ पर एहसान कर दिया…’’

आंसू पोंछती हुई वह जमुना को दोनों बच्चे थमा कर तेजी से अंधेरे में विलीन हो गई थी.

‘‘अब मैं कैसे संभालूं इतने छोटे बच्चों को,’’ हैरान जमुना बोली.

गोदी का बच्चा तो अब जोरजोर से रोने लगा था और बच्ची कोने में सहमी खड़ी थी.

कुछ देर सोच में पड़ी रहीं सुमनलता फिर बोलीं, ‘‘देखो, ऐसा है, अंदर थोड़ा दूध होगा. छोटे बच्चे को दूध पिला कर पालने में सुला देना. बच्ची को भी कुछ खिलापिला देना. बाकी सुबह आ कर देखूंगी.’’

‘‘ठीक है, मम्मीजी,’’ कह कर जमुना बच्चों को ले कर अंदर चली गई. सुमनलता बाहर खड़ी गाड़ी में बैठ गईं. उन के मन में एक अजीब अंतर्द्वंद्व शुरू हो गया कि क्या ऐसी भी मां होती है जो जानबूझ कर दूध पीते बच्चों को छोड़ गई.

‘‘अरे, इतनी देर कैसे लग गई, पता है तुम्हारा इंतजार करतेकरते पिंकू सो भी गया,’’ कहते हुए पति सुबोध ने दरवाजा खोला था.

‘‘हां, पता है पर क्या करूं, कभीकभी काम ही ऐसा आ जाता है कि मजबूर हो जाती हूं.’’

तब तक बहू दीप्ति भी अंदर से उठ कर आ गई.

‘‘मां, खाना लगा दूं.’’

‘‘नहीं, तुम भी आराम करो, मैं कुछ थोड़ाबहुत खुद ही निकाल कर खा लूंगी.’’

ड्राइंगरूम में गुब्बारे, खिलौने सब बिखरे पडे़ थे. उन्हें देख कर सुमनलता का मन भर आया कि पोते ने उन का कितना इंतजार किया होगा.

सुमनलता ने थोड़ाबहुत खाया पर मन का अंतर्द्वंद्व अभी भी खत्म नहीं हुआ था, इसलिए उन्हें देर रात तक नींद नहीं आई थी.

सुमनलता बारबार गुड्डी के ही व्यवहार के बारे में सोच रही थीं जिस ने मन को झकझोर दिया था.

मां की ममता…मां का त्याग आदि कितने ही नाम से जानी जाती है मां…पर क्या यह सब झूठ है? क्या एक स्वार्थ की खातिर मां कहलाना भी छोड़ देती है मां…शायद….

सुबोध को तो सुबह ही कहीं जाना था सो उठते ही जाने की तैयारी में लग गए.

पिंकू अभी भी अपनी दादी से नाराज था. सुमनलता ने अपने हाथ से उसे मिठाई खिला कर प्रसन्न किया, फिर मनपसंद खिलौना दिलाने का वादा भी किया. पिंकू अपने जन्मदिन की पार्टी की बातें करता रहा था.

दोपहर 12 बजे वह आश्रम गईं, तो आते ही सारे कमरों का मुआयना शुरू कर दिया.

शिशु गृह में छोटे बच्चे थे, उन के लिए 2 आया नियुक्त थीं. एक दिन में रहती थी तो दूसरी रात में. पर कल रात तो जमुना भी रुकी थी. उस ने दोनों बच्चों को नहलाधुला कर साफ कपडे़ पहना दिए थे. छोटा पालने में सो रहा था और जमुना बच्ची के बालों में कंघी कर रही थी.

‘‘मम्मीजी, मैं ने इन दोनों बच्चों के नाम भी रख दिए हैं. इस छोटे बच्चे का नाम रघु और बच्ची का नाम राधा…हैं न दोनों प्यारे नाम,’’ जमुना ने अब तक अपना अपनत्व भी उन बच्चों पर उडे़ल दिया था.

सुमनलता ने अब बच्चों को ध्यान से देखा. सचमुच दोनों बच्चे गोरे और सुंदर थे. बच्ची की आंखें नीली और बाल भूरे थे.

अब तक दूसरे छोटे बच्चे भी मम्मीजीमम्मीजी कहते हुए सुमनलता के इर्दगिर्द जमा हो गए थे.

सब बच्चों के लिए आज वह पिंकू के जन्मदिन की टाफियां लाई थीं, वही थमा दीं. फिर आगे जहां कुछ बडे़ बच्चे थे उन के कमरे में जा कर उन की पढ़ाईलिखाई व पुस्तकों की बाबत बात की.

इस तरह आश्रम में आते ही बस, कामों का अंबार लगना शुरू हो जाता था. कार्यों के प्रति सुमनलता के उत्साह और लगन के कारण ही आश्रम के काम सुचारु रूप से चल रहे थे.

3 माह बाद एक दिन चौकीदार ने आ कर खबर दी, ‘‘मम्मीजी, वह औरत जो उस रात बच्चों को छोड़ गई थी, आई है और आप से मिलना चाहती है.’’

‘‘कौन, वह गुड्डी? अब क्या करने आई है? ठीक है, भेज दो.’’

मेज की फाइलें एक ओर सरका कर सुमनलता ने अखबार उठाया.

मौजमौज के खेल में हत्या

  लेखक:  रविंद्र शिवाजी दुपारगुडे    

मुंबई से सटे कल्याण तहसील के गांव राया के पुलिस चौकीदार किरण जाधव को किसी ने बताया कि गांव के बाहर नाले के किनारे बोरी में किसी की लाश पड़ी है. चूंकि किरण जाधव गांव में पुलिस की तरफ से चौकीदार था, इसलिए वह इस खबर को सुनते ही मौके पर पहुंच गया.

उसे जो सूचना दी गई थी, वह बिलकुल सही थी. इसलिए चौकीदार ने फोन कर के यह खबर टिटवाला थाने में दे दी. यह बात 23 जून, 2019 की है. थानाप्रभारी इंसपेक्टर बालाजी पांढरे को पता चला तो वह एसआई कमलाकर मुंडे और अन्य स्टाफ के साथ मौके पर पहुंच गए.

थानाप्रभारी जब मौके पर पहुंचे तो उन्हें वहां एक युवती की अधजली लाश मिली, जो एक बोरी में थी. बोरी और लाश दोनों ही अधजली हालत में थीं. मृतका की उम्र यही कोई 25-30 साल थी. लाश झुलसी हुई थी. उस की कमर पर काले धागे में पीले रंग का ताबीज बंधा था. जिस बोरी में वह लाश थी, उस में मुर्गियों के कुछ पंख चिपके मिले.

थानाप्रभारी ने यह खबर अपने अधिकारियों को दे दी. कुछ ही देर में फोरैंसिक टीम के साथ एसडीपीओ आर.आर. गायकवाड़ और क्राइम ब्रांच के सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट आंधले भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

तब तक वहां तमाम लोग जमा हो चुके थे. पुलिस अधिकारियों ने उन सभी से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका. फोरैंसिक टीम का जांच का काम निपट जाने के बाद थानाप्रभारी ने लाश मोर्चरी में सुरक्षित रखवा दी और अज्ञात के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर लिया.

इस ब्लाइंड मर्डर केस को सुलझाने के लिए ठाणे (देहात) के एसपी डा. शिवाजी राठौड़ ने 2 पुलिस टीमें बनाईं. पहली टीम का गठन एसडीपीओ आर.आर. गायकवाड़ के नेतृत्व में किया. इस टीम में थानाप्रभारी बालाजी पांढरे, एसआई कमलाकर मुंडे, जितेंद्र अहिरराव, हवलदार अनिल सातपुते, दर्शन साल्वे, सचिन गायकवाड़ और तुषार पाटील आदि को शामिल किया गया.

दूसरी टीम क्राइम ब्रांच के सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट आंधले के नेतृत्व में बनाई गई. इस टीम में एपीआई प्रमोद गढ़ाख, एसआई अभिजीत टेलर, बजरंग राजपूत, हेडकांस्टेबल अविनाश गर्जे, सचिन सावंत आदि थे. दोनों टीमों का निर्देशन एडिशनल एसपी संजय कुमार पाटील कर रहे थे.

मृतका के गले में जो ताबीज था, पुलिस ने उस की जांच की तो उस पर बांग्ला भाषा में कुछ लिखा नजर आया. उस से यह अंदाजा लगाया गया कि युवती शायद पश्चिम बंगाल की रही होगी. जिस बोरी में शव मिला था, उस बोरी में मुर्गियों के पंख थे, जिस का मतलब यह था कि बोरी किसी चिकन की दुकान से लाई गई होगी.

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पुलिस टीमों ने इन्हीं दोनों बिंदुओं पर जांच शुरू की. पुलिस ने टिटवाला में चिकन की दुकान चलाने वालों को अज्ञात युवती की लाश के फोटो दिखाए तो पुलिस को सफलता मिल गई. एक दुकानदार ने फोटो पहचानते हुए बताया कि वह टिटवाला के खड़वली इलाके में रहने वाली मोनी है, जो अकसर बनेली के चिकन विक्रेता आलम शेख उर्फ जाने आलम के यहां आतीजाती थी.

पुलिस टीम आलम शेख की चिकन की दुकान पर पहुंच गई. लेकिन आलम दुकान पर नहीं था. पुलिस ने उस के नौकर से पूछा तो उस ने बताया कि आलम शेख पश्चिम बंगाल स्थित अपने घर गया है. पुलिस ने आलम की दुकान की जांच की. इस के बाद पुलिस खड़वली इलाके में उस जगह पहुंची, जहां मोनी रहती थी. वहां के लोगों से बात कर के पुलिस को जानकारी मिली कि मोनी और आलम शेख के बीच नाजायज संबंध थे.

अवैध संबंधों और आलम शेख के दुकान से फरार होने से पुलिस समझ गई कि मोनी की हत्या में आलम शेख का ही हाथ होगा. पुलिस ने किसी तरह से आलम शेख का पश्चिम बंगाल का पता हासिल कर लिया. वह पश्चिम बंगाल के जिला वीरभूम के गांव सदईपुर का रहने वाला था.

एडिशनल एसपी संजय कुमार पाटील ने एक पुलिस टीम बंगाल के सदईपुर भेज दी. वहां जा कर टिटवाला पुलिस ने स्थानीय पुलिस की मदद से आलम शेख को हिरासत में ले लिया.

आलम शेख को स्थानीय न्यायालय में पेश कर पुलिस ने उस का ट्रांजिट रिमांड ले लिया और थाना टिटवाला लौट आई. पुलिस ने आलम शेख से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने मोनी के कत्ल की बात स्वीकार कर ली. उस से पूछताछ के बाद मोनी की हत्या की  कहानी इस प्रकार निकली—

मूलरूप से पश्चिम बंगाल के जिला वीरभूम के गांव सदईपुर का रहने वाला 33 वर्षीय आलम शेख उर्फ जाने आलम टिटवाला क्षेत्र में चिकन की दुकान चलाता था. करीब 4-5 महीने पहले उस की मुलाकात खड़वली क्षेत्र की रहने वाली मोनी से हुई.

मोनी आलम की दुकान पर चिकन लेने गई थी. पहली मुलाकात में ही आलम उस का दीवाना हो गया. उसी दिन बातचीत के दौरान आलम ने मोनी से उस का मोबाइल नंबर भी ले लिया.

इस के बाद मोनी अकसर उस की दुकान से चिकन लेने जाने लगी. नजदीकियां बढ़ाने के लिए आलम ने उस से चिकन के पैसे लेने भी बंद कर दिए. धीरेधीरे दोनों के संबंध गहराते गए और फिर जल्दी ही उन के बीच शारीरिक संबंध बन गए.

कुछ दिनों बाद आलम शेख ने मोनी को खड़वली क्षेत्र में ही किराए का एक मकान भी ले कर दे दिया, जिस में मोनी अकेली रहने लगी. उस के अकेली रहने की वजह से आलम की तो जैसे मौज ही आ गई. जब उस का मन होता, मोनी के पास चला जाता और मौजमस्ती कर दुकान पर लौट आता.

उन के संबंधों की खबर मोहल्ले के तमाम लोगों को हो चुकी थी. आलम मोनी को आर्थिक रूप से भी सहयोग करता था. धीरेधीरे मोनी की आलम से पैसे मांगने की आदत बढ़ती गई. वह उस से ढाई लाख रुपए ऐंठ चुकी थी.

इतने पैसे ऐंठने के बाद भी वह उसे ब्लैकमेल करने लगी. वह आलम को धमकी देने लगी कि अगर उस ने बात नहीं मानी तो वह उस के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करा देगी. मोनी की धमकी से आलम परेशान रहने लगा.

अंत में आलम शेख ने मोनी को रास्ते से हटाने की ठान ली. एक दिन आलम ने अपनी इस पीड़ा के बारे में अपने दोस्त मनोरुद्दीन शेख को बताया और साथ ही मोनी की हत्या करने में उस से मदद मांगी. मनोरुद्दीन ने आलम को हर तरह का सहयोग देने की हामी भर दी. इस के बाद दोनों ने मोनी का काम तमाम करने की योजना बनाई.

योजना के अनुसार 22 जून, 2019 की रात को आलम शेख गले में अंगौछा बांध कर दुकान पर पहुंचा और वहां से एक खाली बोरी ले कर मोनी के घर पहुंच गया. उस वक्त मोनी सोई हुई थी. आलम ने आवाज दे कर दरवाजा खुलवाया. इस के बाद दोनों बैठ कर इधरउधर की बातें करने लगे. उसे अपनी बातों में उलझा कर आलम मौका देख रहा था. फिर मौका मिलते ही उस ने अंगौछा मोनी के गले में डाल कर पूरी ताकत से खींचना शुरू कर दिया.

मोनी ज्यादा विरोध नहीं कर सकी. कुछ देर बाद जब उस की सांसें बंद हो गईं तब आलम ने मोनी के गले का अंगौछा ढीला किया. इस के बाद आलम ने अपने दोस्त मनोरुद्दीन शेख को भी वहां बुला लिया.

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दोनों ने साथ में लाई बोरी में शव डाला. फिर आलम शेख और मनोरुद्दीन उस बोरी को मोटरसाइकिल से ले कर निकल पड़े. रास्ते में उन्होंने एक पैट्रोलपंप से एक डिब्बे में पैट्रोल भी लिया. फिर उन्होंने शव को राया गांव के पास एक नाले के किनारे डाल दिया और पैट्रोल डाल कर जलाने की कोशिश की. पर शव झुलस कर रह गया. लाश ठिकाने लगाने के बाद दोनों वहां से चंपत हो गए.

आलम शेख उर्फ जानेआलम से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के दोस्त मनोरुद्दीन शेख को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों को भादंवि की धारा 302, 201 के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया.

कथा लिखने तक दोनों आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. मामले की जांच इंसपेक्टर बालाजी पांढरे कर रहे थे.

कहीं आपको कैल्शियम की कमी तो नहीं

आमतौर पर तीस की उम्र के बाद महिलाओं के शरीर में कैल्शियम कम होने लगता है. जिसके चलते उन्हें अनेक बीमारियों का सामना करना पड़ता है. इसमें हड्डियों की कमजोरी, थकान और हड्डियों का भुरभुराना मुख्य है. हड्डियों के टूटने-भुरभुराने को औस्टियोपोरोसिस कहते हैं. औस्टिओपोरोसिस ऐसी बीमारी है, जिसमें हड्डियों का घनत्व (डेंसिटी) कम हो जाता है. हड्डियां इतनी कमजोर और भंगुर हो जाती हैं कि गिरने, झुकने या छींकने-खांसने पर भी हड्डियों में फ्रैक्चर होने का खतरा रहता है. कैल्शियम को आमतौर पर हड्डियों की हेल्थ से ही जोड़ा जाता है. लेकिन क्या कैल्शियम की जरूरत सिर्फ आपकी हड्डियों के लिए ही होती है?

हमारे शरीर में करीब 90% कैल्शियम हड्डियों और दांतों में पाया जाता है. पर कैल्शियम हमारी एक-एक कोशिका के लिए जरूरी है, खासकर हमारे तंत्रिका तंत्र, खून, मसल्स और हार्ट के लिए ये बेहद जरूरी है. इसकी अहमियत का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि कैल्शियम हमारी हार्ट बीट को भी रेग्युलेट करता है.

हमारे शरीर में कैल्शियम का होना बहुत जरूरी है. अगर हमारे शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाती है, तो इसका हमारे शरीर पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ता है. कैल्शियम की कमी किसी भी उम्र में व किसी भी इंसान को हो सकती है. अगर किसी व्यक्ति को कैल्शियम की कमी हो जाती है तो उसके शरीर में अनेकों बीमारियां जन्म ले लेती हैं. शरीर में कैल्शियम की कमी के कारण कुछ लक्षण दिखायी देने लगते हैं, जिनके चलते आसानी से पता चल सकता है कि आप कैल्शियम की कमी के शिकार हो रहे हैं.

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आइए जानते हैं उन लक्षणों के बारे में जिनसे आप आसानी से पता लगा सकते हैं कि आपके शरीर में कैल्शियम की कमी है और आपको तुरंत डॉक्टर की सलाह की जरूरत है.

– कई बार हमारे हाथ पैर कई बार सुन्न होने लगते हैं. जब भी हम थोड़ी देर के लिए एक जगह पर बैठ जाते हैं, तो हमारे पैरों और हाथों में सुन्नपन महसूस होता है. यह कैल्शियम की कमी के कारण होता है.
– कैल्शियम की कमी से हमारे दांत भी कमजोर होकर टूटने और हिलने लग जाते हैं. पहले जहां हम गन्ना चूसने या चने चबाने में कठिनाई अनुभव नहीं करते थे, वहीं कैल्शियम की कमी के कारण हमें परेशानी अनुभव होने लगती है.
– कैल्शियम की कमी से हमारे मसूड़ों में कमजोरी आ जाती है और वे सूज जाते हैं.
– कैल्शियम की कमी से हमारी हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और चलने या बैठने के वक्त उन में आवाज आने लग जाती हैं.
– कैल्शियम की कमी से नाखून भी टूटने लग जाते हैं. अगर हमारे शरीर में कैल्शियम की कमी है तो हमारे नाखूनों पर सफेद-सफेद निशान भी दिखाई देने लगते हैं.
– कैल्शियम की कमी से हमारी त्वचा रूखी-सूखी दिखाई देने लगती है. इसकी कमी से हमारी त्वचा पर खुजली भी होती है.
– कैल्शियम की कमी से व्यक्ति का स्वभाव भी चिड़चिड़ा हो जाता है.
– कैल्शियम की कमी का हमारे बालों पर भी अत्यधिक प्रभाव पड़ता है. इसकी कमी से हमारे बाल रूखे हो जाते हैं और टूटने लगते हैं.
– कैल्शियम की कमी से हमें थकान महसूस होती है और हमारा पूरा शरीर दर्द करता रहता है.
– कैल्शियम की कमी से व्यक्ति हमेशा तनाव में रहता है.
– कैल्शियम की कमी से हम अच्छी नींद भी नहीं ले पाते हैं.
– अगर बच्चों में कैल्शियम की कमी होती है तो बच्चों को बार-बार खांसी, जुकाम, बुखार आदि की शिकायत रहती है.
– शरीर में अगर लंबे समय तक कैल्शियम की बनी रहे, तो मोतियाबिंद और औस्टिओपोरोसिस का खतरा बढ़ सकता है.
कैल्शियम की कमी से जुड़ी थकान ब्रेन फौग का कारण बन सकती है, जिसमें फोकस करने में परेशानी, भूलना और कन्फ्यूजन शामिल है.

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फेस्टिवल स्पेशल : ऐसे बनाएं दही सैंडविच

नारियल को मिर्च, अदरक, नमक व दही के साथ महीन पीस लें. इस चटनी को ब्रैड स्लाइस के बीच लगाएं व दूसरा ब्रैड स्लाइस ऊपर रख कर बंद करें.

सामग्री

– 1 कप हंग कर्ड

– 1/2 कप कच्चा नारियल कसा

– 1-2 हरीमिर्चें

– 1 टुकड़ा अदरक

– 4 ब्रैड स्लाइस

– 2 बड़े चम्मच मक्खन

– नमक स्वादानुसार.

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बनाने की विधि

नारियल को मिर्च, अदरक, नमक व दही के साथ महीन पीस लें.

इस चटनी को ब्रैड स्लाइस के बीच लगाएं व दूसरा ब्रैड स्लाइस ऊपर रख कर बंद करें.

गरम तवे पर मक्खन लगा कर दोनों तरफ से सेंक लें.

तिकोना काट कर गरमगरम सर्व करें.

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9 टिप्स : ऐसे बनाएं बच्चों को हेल्दी और एक्टिव

बच्चों को भी साफसफाई और स्वस्थ आदतों के बारे में समझाना चाहिए. साफसुथरा रहने से वे न केवल स्वस्थ रहेंगे, बल्कि उन का आकर्षण और आत्मविश्वास भी बढ़ेगा. बचपन की आदतें हमेशा बनी रहती हैं इसलिए जरूरी है कि वे बचपन से ही हाइजीन के गुर सीखें.

ओरल हाइजीन

ओरल हाइजीन प्रत्येक बच्चे की दिनचर्या का एक प्रमुख अंग होना चाहिए. ऐसा करने से बच्चा कई बीमारियों जैसे कैविटी, सांस की बदबू और दिल की बीमारियों से बचा रहेगा.

क्या करें

– बच्चे ध्यान रखें कि रोजाना दिन में 2 बार कम से कम 2 मिनट के लिए अपने दांतों को ब्रश से साफ करें. खासतौर पर खाना खाने के बाद सफाई बहुत ही जरूरी है.

– बच्चे कम उम्र से ही रोजाना ब्रश और कुल्ला करने की आदत डालें.

– टंग क्लीनर से जीभ साफ करना सीखें.

– बच्चे के दांतों की नियमित रूप से जांच करवाएं.

बौडी हाइजीन

– बच्चे रोज नहाने की आदत डालें. रोज नहाने से शरीर तो साफ रहता ही है, मृत त्वचा भी निकल जाती है.

– बच्चे नहाते समय शरीर के विभिन्न भागों जैसे हाथों, पैरों, पंजों, जोड़ों, बगलों, कमर, नाभि, घुटनों आदि को अच्छी तरह साफ करें.

– अपना अंडरवियर रोज बदलें और नहा कर साफ कपड़े पहनें.

– बच्चे सप्ताह में 2 बार बालों को शैंपू से धोने की आदत डालें ताकि बालों से तेल और गंदगी अच्छी तरह निकल जाए.

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हैंड हाइजीन

– बच्चे में हाथ धोने की आदत डालें. उन्हें पता होना चाहिए कि हाथ धोने में थोड़ा समय लगता है. हाथ धोना रोगाणुओं को फैलने से रोकने और बीमार पड़ने से बचाने का सब से महत्त्वपूर्ण तरीका है.

– बच्चे नियमित रूप से हाथ धोना सीखें. खासतौर पर खाना खाने के बाद और पहले, छींकने या खांसने के बाद, खेलने के बाद, वाशरूम इस्तेमाल करने के बाद.

– वे हाथ धोते समय साबुन, हैंडवाश और पानी का सही इस्तेमाल करना सीखें.

फुट हाइजीन

बच्चों को पता होना चाहिए कि पैरों को साफसुथरा रखना भी बेहद जरूरी है. गंदे पैरों से न केवल तेज दुर्गंध आती है, बल्कि दाद और दूसरे संक्रमणों का भी खतरा बढ़ जाता है.

– बच्चों को दिन में 2 बार पैर साफ करने की आदत डालनी चाहिए. उंगलियों के बीच के हिस्सों को अच्छी तरह पोंछ कर सुखाएं, क्योंकि उंगलियों के बीच की जगह के गीला रहने पर फंगस हो सकता है.

टौयलेट हाइजीन

– बच्चों को शौच करने का सही तरीका पता होना चाहिए. हमेशा आगे से पीछे की ओर धोएं. पीछे से आगे की ओर धोने से संक्रमण का खतरा हो सकता है, यह उन्हें पता होना चाहिए.

– बच्चों को टौयलेट के बाद फ्लश करने की आदत डालनी चाहिए.

– बच्चे यह ध्यान रखें कि संक्रमण से बचने के लिए हर बार टौयलेट से आने के बाद हाथ धोना बहुत ही जरूरी है.

नेल हाइजीन

– बच्चे अपने नाखूनों को साफसुथरा रखना सीखें, क्योंकि गंदे नाखूनों में रोगाणु पनपते हैं, जिन से वे बीमार हो सकते हैं.

– बच्चे दांतों से नाखून काटने की आदत न डालें. उन्हें पता होना चाहिए कि दांतों से नाखून काटने से मैल और रोगाणु पेट में जा कर उन्हें बीमार बना सकते हैं.

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स्लीप हाइजीन

– बच्चे 8-10 घंटे की गहरी नींद सोने की आदत डालें. उन्हें पता होना चाहिए कि यदि वे पूरी

नींद सोएंगे तो उन का शारीरिक और मानसिक विकास अच्छी तरह होगा.

– हमेशा नाइट सूट पहन कर सोने की आदत डालें ताकि आरामदायक कपड़ों में गहरी नींद सो पाएं.

– बच्चे अपने बिस्तर को साफसुथरा रखना सीखें. कम से कमसप्ताह में 2 बार चादर जरूर बदलें.

– उन्हें रात को ब्रश कर के हाथपैरों को अच्छी तरह धोने के बाद ही बिस्तर पर जाना सिखाएं.

– बच्चे रात में सोेने से पहले पेशाब जाने की आदत डालें ताकि रात में उठने पर नींद डिस्टर्ब न हो.

फूड हाइजीन

– हाथों और मुंह को पोंछने के लिए साफ कपड़े का इस्तेमाल करना सीखें.

– बच्चे फल आदि खाने से पहले उन्हें साफ पानी से अच्छी तरह धोना सीखें.

सराउंडिंग हाइजीन

– बच्चे जूतेचप्पलों को यहांवहां न रख हमेशा शू रैक में रखना सीखें.

– बच्चे कूडे़ या और किसी बेकार सामान को डस्टबिन में डालना सीखें.

– अपने कपड़ों को तह कर के अलमारी में रखने की आदत डालें.

– डा. के.के. गुप्ता (सरोज सुपर स्पैश्यलिटी हौस्पिटल) और डा. आशु साहनी (जेपी हौस्पिटल) से गरिमा पंकज द्वारा की गई बातचीत पर आधारित

जानिए, आखिर है क्या हाईड्रोलिक रिवर्सिबल प्लाऊ 

यह जुताई का एक ऐसा खास उपकरण है जिस में ऊपर और नीचे की तरफ 2 या 3 हल जैसे नुकीले आकार की रौड लगी होती है जो जमीन में 1 से 1.5 फुट की गहराई तक जुताई कर मिट्टी को पलट देता है. यह हाइड्रोलक सिस्टम से नियंत्रित होता है.

रोटावेटर के लाभ

* इस में लगे हुए नुकीले हल मिट्टी की जुताई करते हैं और ब्लेडनुमा रौड मिट्टी को पलटने का काम करती है, जिस से कठोर परत टूट जाती?है.

* मिट्टी नरम होने की वजह से फसलों और पौधों की जड़ों को बिना किसी रुकावट के प्रसार करने में मदद मिलती है और वे बेहतर विकास और उपज देती है.

* ऐसा करने से मिट्टी की जड़ों तक औक्सीजन आसानी से पहुंचती है, जो फसलों और पौधों के लिए बहुत जरूरी है. इस वजह से फसल की बढ़वार और पैदावार अच्छी होती है.

* जमीन में उगे खरपतवार और दूसरे वनस्पति को उखाड़ कर जमीन में मिला देता है जिस से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है और उपज अच्छी होती है.

* खेत में एक बार ही रिवर्सिबल प्लाऊ से जुताई करने से जमीन की पानी ग्रहण करने की कूवत बढ़ जाती है.

* मिट्टी पलटने से खरपतवारों के बीज जमीन की गहराई में दब जाते हैं, जिस से उन का अंकुरण कम होता है और खरपतवार नियंत्रण में कारगर है.

* यह मशीन पिछली फसल कटने के बाद जो अवशेष खेत में रह जाते हैं, उन्हें जड़ से खोद कर अच्छी तरह से मिट्टी में मिला देती है.

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* ये खेत में नाली नहीं बनाता क्योंकि खुद ही ट्रैक्टर के साथ बदल जाता है और दूसरी तरफ से बनी हुई नाली में मिट्टी डाल देता है जिस से मिट्टी का कटाव नहीं होता.

इस का रखरखाव कैसे करें

* इस्तेमाल करने से पहले तय यह कर लें कि उपकरण पूरी तरह से सही?है.

* इस्तेमाल के बाद उपकरण छायादार जगह पर रखें.

* बेरिंगों में ग्रीस या मौबिल औयल का इस्तेमाल करते रहें.

हाइड्रोलिक रिवर्सिबल प्लाऊ पर सरकार कितना अनुदान देगी : इस की अनुमानित कीमत 50,000 से 1,40,000 रुपए तक है. इस में सरकार आप को एनएफएसएम योजना के तहत अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति लघु सीमांत और महिला किसानों के लिए इकाई लागत का 50 फीसदी और सामान्य किसानों के लिए 40 (20 हौर्सपावर से कम ट्रैक्टर पर 20,000 और 16,000 रुपए) 20 से 35 हौर्सपावर तक के ट्रैक्टर पर 70,000 रुपए और 56,000 रुपए अधिकतम अनुदान देती है.

अनुदान के लिए कागजात

* आवेदन पात्र मय लाभार्थी के पासपोर्ट साइज का प्रमाणित फोटो.

* जमीन की जमाबंदी या पासबुक.

* मशीन का क्रय बिल या प्रोफार्मा इनवोइस और अधिकृत विक्रेता का प्रमाणपत्र.

* यंत्र का प्रमाणित फोटो लाभार्थी के साथ.

* शपथपत्र या अंडरटेकिंग.

* ट्रैक्टर के कागजातों की प्रतिलिपि.

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अलगअलग राज्यों में अनुदान अलग हो सकता?है. यह योजना ‘पहले आओ पहले पाओ’ के आधार पर है. योजना का फायदा लेने के लिए क्षेत्र के कृषि पर्यवेक्षक/सहायक कृषि अधिकारी/सहायक निदेशक, कृषि अधिकारी से संपर्क करें.

क्या घर की इन चीजों को आप भी करते हैं नजरअंदाज ?

आजकल आप अपने दैनिक जीवन में इतने व्‍यस्‍त होती हैं कि आपके पास रोजाना घर की सफाई के लिए समय नहीं होता है. ऐसे में आपके लिए घर की सफाई करना चुनौती बन जाता है. कई लोग तो ऐसे होते हैं जो हफ्ते में एक बार ही घर की सफाई कर पाते हैं.

घर की जल्दी-जल्दी सफाई करने के चक्कर में हम घर के कुछ सामान को साफ करना भूल जाते हैं या उन्‍हें नज़रअंदाज कर देते हैं.  लेकिन इन चीजों को साफ करना बेहद जरुरी है. आइए बताते हैं, घर के किन सामानों को साफ करना है बेहद जरुरी.

किताबें

अगर आपको किताबें पढ़ने का शौक है तो ज़ाहिर सी बात है कि आपके घर में कुछ किताबें तो होंगी ही. ये कोई गंदी आदत नहीं है लेकिन आप अपने बुक शेल्‍फ पर जमी धूल को हर हफ्ते साफ करने की कोशिश करनी चाहिए. इसमें एक छोटा सा माइक्रोफाइबर कपड़ा भी कमाल दिखा सकता है. इससे ना सिर्फ किताबें ठीक तरह से रहेंगी बल्कि आपके घर में भी कीटाणु नहीं पनपेंगें.

कारपेट

कारपेट में बहुत धूल-मिट्टी होती है और अगर आपके घर में पालतू जानवर या बच्‍चे हैं तो ये जगहें और भी ज़्यादा गंदी रहती है. इन्‍हें हफ्ते में एक बार जरूर साफ करना चाहिए.वैक्‍यूम से आप अपने कारपेट की सारी धूल-मिट्टी और गंदगी को साफ कर सकते हैं. नियमित सफाई करने से कारपेट से सारे कीटाणु निकल जाएंगे.

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वाशिंग मशीन के अंदर की सफाई

वाशिंग मशीन के अंदर मोल्‍ड, फफूंदी और लिंट जम जाता है.इससे बचने के लिए आपको मशीन में थोड़ा सा पानी भरकर उसमें ब्‍लीच डालकर खाली घुमाएं. आप चाहें तो वाशिंग मशीन को पूरा पानी से भरकर उसमें तीन चम्‍मच ब्‍लीच डालकर भी घुमा सकते हैं. इससे वाशिंग मशीन अंदर से साफ हो जाती है.

ओवन रैक

ओवन में खाने की कई सारी चीजें गर्म होती हैं और ओवन रैक पर ग्रीस, ग्रिम की परत जम जाती है. ऐसे में इसकी सफाई करना मुश्किल होता है. इसे साफ करने के लिए एक चौथाई कप सफेद सिरका लें और उसमें इतनी ही मात्रा में डिशवाशिंग लिक्‍विड डालें और एक कप पानी डालकर एक स्‍प्रे बोतल में भर लें.

इसे ओवन रैक पर स्‍प्रे करें और आधे घंटे के लिए छोड़ दें. इसके बाद ग्रीस को स्‍क्रब करें और गंदगी को साफ करें.

जूतों का रैक

घर के इस हिस्‍से की सफाई को भी नजरअंदाज किया जाता है. हफ्ते में एक बार शू रैक पर सूखा कपड़ा मारकर इसकी सफाई जरूर करें. अगर आप नियमित ऐसा करते हैं तो शूरैक पर धूल-मिट्टी नहीं जमेगी और आपके जूते-चप्‍पल भी साफ रहेंगे.

रेफ्रिजरेटर कौइल

आमतौर पर रेफ्रिजरेटर के पीछे रेफ्रिजरेटर कौइल होता है और इसे साफ करना आसान होता है. इसके लिए आपको ब्रश के ब्रिसल का इस्तेमाल करना है और फिर वैक्‍यूम का इस्‍तेमाल करना है. हालांकि, फ्रिज को बंद करके उसकी सफाई करना बहुत जरूरी है. इस बात का ध्‍यान रखें कि नियमित रेफ्रिजरेटर की सफाई करने से उसकी उम्र बढ़ती है.

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आह रे अयोध्या

अयोध्या पूरी दुनिया में सबसे चर्चित है. राममंदिर पर आने वाले फैसले के मद्देनजर यहां पर हाई एलर्ट है. अयोध्या के हाई एलर्ट का यह हाल है कि एक घर में 2 शवों के साथ एक लड़की 2 माह तक रहती रही किसी को पता नहीं चला. जब शव सड़ने लगे उनकी बदबू से कालोनी के लोगों को चैन की नींद लेना मुश्किल हो गई तब पुलिस को शिकायत की गई.

पुलिस ने दरवाजा तोड़ कर देखा तो अंदर वीभत्स नजारा दिखा. कालोनी के रहने वाले ही नहीं यहां का प्रशासन भी संवेदनशील होता तो यह नहीं हो पाता. क्या किसी सभ्य समाज में ऐसी घटना की कल्पना हो सकती है. एक गजटेड अधिकारी का परिवार इस दशा में पंहुच गया पर किसी ने उसकी सुध नही ली. किसी परिवार की ऐसी हालत एक दिन में नहीं हुई होगी. जिससे पता चलता है कि सरकार के पास ऐसा कोई तंत्र नहीं है तो ऐस लोगों की हालत पर निगरानी कर सके.

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उत्तर प्रदेश की सरकार अयोध्या में रामराज्य की स्थापना के लिये कृत संकल्प है. अभी पिछले ही सप्ताह अयोध्या में करोड़ो रूपये खर्च करके घरघर को रोशन किया गया. अयोध्या को रोशन करने के लिये 6 लाख से अधिक दीयें जलाने का विश्व रिकार्ड  भी बनाया गया. दीवाली के अवसर पर पूरी अयोध्या दीपोत्सव से जगमग हो रही थी पर इसी अयोध्या में एक घर ऐसा भी था जिसमें एक लड़की अपनी मां और बहन के शव के साथ सोन को मजबूर थी. पड़ोसी और शासन प्रशासन के किसी अमले को इसकी जानकारी नहीं थी. अयोध्या की सुरक्षा व्यवस्था में लगी पुलिस और दूसरी जांच और गुप्तचार एजेंसी तक को इसकी जानकारी नहीं हो पाई थी.

जिस परिवार की घटना है वह परिवार कोई ऐसा वैसा गरीब परिवार नहीं था. एसडीएम जैसे प्रशासनिक पद पर रहे बृजेंद श्रीवास्तव का परिवार था.

अयोध्या की देवकाली कोतवाली नगर क्षेत्र में पूर्व एसडीएम बृजेंद् श्रीवास्तव का मकान आदर्श नगर कालोनी में था. 1990 में बृजेंद श्रीवास्तव ने आत्महत्या कर ली थी. बृजेंद श्रीवास्तव के परिवार में उनकी पत्नी पुष्पा, और तीन बेटियां रूपाली, विभा और दीपा रहती थी. कुछ साल पहले रूपाली की भी मौत हो चुकी थी. अब मां पुष्पा दोनो बेटियो विभा और दीपा के साथ रहती थी.

परिवार में एक बाद एक होने वाले हादस में पूरे परिवार की मानसिक हालत ठीक नहीं थी. इस बात की जानकारी पड़ेसियों को थी. कालोनी के लोगों से इस परिवार की बहुत बातचीत नहीं थी.

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करीब दो महीन से इस घर से कोई बाहर नहीं निकला. इस बात की जानकारी कालोनी के लोगों को थी. इसके बाद भी ना तो कालोनी के लोगों और ना ही जिला प्रशासन को इस बारें में कोई जानकारी हुई.

दशहरा और दीपावली जैसे त्यौहार बीत गये. हर घर रोशन हुआ. केवल इस घर को छोड़कर. किसी पडोसी ने इनके विषय में नहीं सोंचा. अयोध्या के दीपो की रोशनी पूरी दुनिया में चर्चा का विषय रही. उस की रोशनी पूर्व एसडीएम बृजेंद श्रीवास्तव के परिजनो तक नहीं पहुंची. 2 माह तक दीपा अपनी मां पुष्पा और बहन विभा के शव के साथ घर में रहती रही. उनके बगल ही सो जाती थी. जब शव 2 माह तक सडडने लगे उनकी बदबू कालोनी वालों को परेशान करने लगी तो उन लोगों ने पुलिस को शिकायत की.

सूचना पर आई पुलिस को दीपा अपनी मां और बहन के शव के साथ सोती मिली. दोनो शव आधे से अधिक सड़ चुके थे. जिनकी हड्डियां तक बाहर आ चुकी थी. सीओ सिटी अरविंद चैरसिया ने बताया कि शव करीब 2 माह के लग रहे है. पोस्टमार्टम के बाद ही मौत का कारण पता चल सकेगा. पुलिस ने दीपा को सरकारी संरक्षण गृह में भेज दिया है. अयोध्या की इस घटना से दिलो को झंझोड कर रख दिया है. अभी तक यह सोचा जाता था कि मुम्बई जैसे बड़े शहरों में अपार्ट मेंट में ही ऐसी घटनायें घट सकती है. छोटे शहरों में रहने वाले नागरिक ज्यादा संवेदनशील है. अयोध्या की घटना ने बता दिया कि शहर छोटा हो या बड़ा इससे फर्क  नहीं पड़ता. फर्क पड़ता है तो इस बात से कि वहा के रहने वाले नागरिकों की सोच कैसी है ?  हो सकता है कि मंदिर के फैसले की गूंज में यह घटना दब जाये पर यह सभ्य समाज के लिये ठीक नहीं है.

‘‘बाला”: पैसा वसूल फिल्म

रेटिंगः साढ़े तीन स्टार

निर्माताः दिनेश वीजन

निर्देशकः अमर कौशिक

कलाकारः आयुष्मान खुराना, भूमि पेडणेकर, यामी गौतम, दीपिका चिखालिया, धीरेंद्र कुमार, सीमा पाहवा, जावेद जाफरी, सौरभ शुक्ला, अभिषेक बनर्जी व अन्य.

अवधिः दो घंटे सत्रह मिनट

हमारे यहां शारीरिक रंगत,  मोटापा,  दुबलापन, छोटे कद आदि के चलते लड़कियों को जिंदगी भर अपमान सहना पड़ता है. वह हीनग्रंथि कर शिकार होकर खुद को बदलने यानी कि चेहरे को खूबसूरत बनाने के लिए कई तरह की फेअरनेस क्रीम लगाती हैं, कद बढ़ाने के उपाय, मोटापा कम करने के उपाय करती रहती है. तो वही लड़के अपने सिर के गंजेपन से मुक्ति पाने के उपाय करते नजर आते हैं. फिल्मकार अमर कौशिक ने इन्ही मुद्दों को फिल्म ‘बाला’ में गंजेपन को लेकर कहानी गढ़ते हुए जिस अंदाज में उठाया है, उसके लिए वह बधाई के पात्र हैं. अंततः वह सदियों से चली आ रही इन समस्यओं से मुक्ति का उपाय देते हुए कहते हैं कि ‘खुद को बदलने की जरुरत क्यों? अपनी कहानी में वह काली लड़की के प्रति समाज के संकीर्ण रवैए को बताने में वह पीछे नही रहते.

कहानीः

यह कहानी कानपुर निवासी बालमुकुंद शुक्ला उर्फ बाला (आयुष्मान खुराना) के बचपन व स्कूल दिनों से शुरू होती है. जब उसके सिर के बाल घने और सिल्की होते थे और वह अपने बालों पर इस कदर घमंड करता था कि स्कूल में हर खूबसूरत लड़की उसकी दीवानी थी. वह भी श्रुति का दीवाना था. मगर गाहे बगाहे बाला अपनी सबसे अच्छी दोस्त लतिका के काले चेहरे को लेकर उसका तिरस्कार भी करता रहता था. स्कूल में कक्षा के बोर्ड पर वह अपने गंजे शिक्षक की तस्वीर बनाकर उसे तकला लिखा करता था. मगर पच्चीस साल की उम्र तक पहुंचते ही बाला के सिर से बाल इस कदर झड़े कि वह भी गंजे हो गए. उनकी बचपन की प्रेमिका श्रुति ने अन्य युवक से शादी कर ली. समाज में उसका लोग मजाक उड़ाने लगे हैं. बाला अब एक सुंदर बनाने वाली क्रीम बनाने वाली कंपनी में नौकरी कर रहे हैं. इसके प्रचार के लिए वह औरतों के बीच अपने अंदाज में बातें कर प्रोडक्ट बेचते हैं. एक बार लतिका (भूमि पेडणेकर) भी अपनी मौसी के साथ पहुंच जाती है. और बाला के सिर से टोपी हटाकर कर लोगों के सामने उसका गंजापन ले आती है. बाला का मजाक उड़ता है. प्रोडक्ट नही बिकता. परिणामतः नौकरी मे उसे मार्केटिंग से हटाकर आफिस में बैठा दिया जाता है.

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लतिका ने ऐसा पहली बार नही किया. लतिका स्कूल दिनों से ही बाला को बार-बार आईना दिखाने की कोशिश करती रही है, वह कहती रही है कि खुद को बदलने की जरुरत क्यों हैं. मगर बाला लतिका से चिढ़ता है. पेशे से जानी- मानी दबंग वकील लतिका काले रंग के कारण नकारी जाती रही है.मगर उसने कभी खुद को हीन महसूस नहीं किया.

बाला के माता (सीमा पाहवा) व पिता (सौरभ शुक्ला) भी परेशान हैं. क्योंकि बाला की शादी नहीं हो रही है. बालों को सिर का ताज समझने वाला बाला, बालों को उगाने के लिए सैकड़ों नुस्खे अपनाता है, वह हास्यास्पद व घिनौने हैं. मगर बाला को यकीन है कि उसके बालों की बगिया एक दिन जरूर खिलेगी. पर ऐसा नहीं होता. अंततः वह बाल ट्रांसप्लांट कराने के लिए तैयार होता है, पर उसे डायबिटीज है और डायबिटीज के कारण पैदा हो सकने वाली समस्या से डरकर वह ऐसा नही कराता. अपने बेटे को निराश देखकर उनके पिता (सौरभ शुक्ला) बाला के लिए दिल्ली से विग मंगवा देते हैं. विग पहनने से बाला का आत्म विश्वास लौटता है. इसी आत्मविश्वास के बल पर लखनउ की टिक टौक स्टार व कंपनी की ब्रांड अम्बेसेडर परी (यामी गौतम) को अपने प्रेम जाल में  फंसाकर उससे शादी कर लेता है. मगर सुहागरात  से पहले ही परी को पता चल जाता है कि उसका पति बाला गंजा है. परी तुरंत ससुराल छोड़कर मायके पहुंच जाती है. अपनी मां (दीपिका चिखालिया) की सलासह पर वह अदालत में बाला पर धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए शादी को निरस्त करने की गुहार लगाती है.बाला अपना मुकदमा लड़ने के लिए वकील के रूप में लतिका को ही खड़ा करता है. पर अदालती काररवाही के दौरान बाला को सबसे बड़ा ज्ञान मिलता है.

लेखन व निर्देशनः

अमर कौशिक ने लगभग हर लड़की के निजी जीवन से जुड़ी हीनग्रथि और समाज के संकीर्ण रवैए को हास्य के साथ बिना उपदेशात्मक भाषण के जिस शैली में फिल्म में पेश किया है, उसके लिए वह बधाई के पात्र हैं. मगर इंटरवल के बाद भाषणबाजी पर जोर देकर फिल्म को थोड़ा कमजोर कर डाला. फिल्म के संवाद कहीं भी अपनी मर्यादा नहीं खोते और न ही अश्लील बनते हैं. कुछ संवाद बहुत संदर बने हैं. अमर कौशिक ने महज फिल्म बनाने के लिए गंजेपन का मुद्दा नहीं उठाया, बल्कि वह इस मुद्दे को गहराई से उठाते हुए इसकी तह तक गए हैं. अमूमन फिल्म की कहानी व किरदार जिस शहर में स्थापित होते हैं, वहां की बोलचाल की भाषा को फिल्मकार मिमिक्री की तरह पेश करते रहे हैं, मगर इस फिल्म में कानपुर व लखनउ की बोलचाल की भाषा को यथार्थ के धरातल पर पेश किया गया है. फिल्मकार ने अपरोक्ष रूप से ‘टिकटौक स्टारपना’ पर भी कटाक्ष किया है. फिल्मकार ने इमानदारी के साथ इस सच को उजागर किया है कि जो लड़की महज दिखावे की जिंदगी जीती है, वह जिंदादिल नही हो सकती.

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अभिनयः

बाला के किरदार में आयुष्मान खुराना ने शानदार अभिनय किया है. दर्शक गंजेपन को भूलकर सिर्फ बाला के गम का हिस्सा बनकर रह जाता है. बाला की गंजेपन के चलते जो हताशा है, उसे दर्शकों के दिलों तक पहंचाने  में आयुष्मान खुराना पूरी तरह से सफल रहे हैं. पर बौलीवुड के महान कलाकारों की मिमिक्री करते हुए कुछ जगह वह थकाउ हो गए हैं. भूमि ने साबित कर दिखाया कि सांवले /काले रंग के चहरे वाली लड़की लतिका के किरदार को उनसे बेहतर कोई नहीं निभा सकता था. कई दृश्यों में वह चिंगारी पैदा करती हैं. टिकटौक स्टार परी के किरदार में यामी गौतम सुंदर जरुर लगी हैं, मगर कई दृश्यों में उन्होंने ओवर एक्टिंग की है. छोटे से किरदार में दीपिका चिखालिया अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाती हैं. सौरभ शुक्ला, सीमा पाहवा, जावेद जाफरी, धीरेंद्र कुमार ने ठीक ठाक अभिनय किया है.

फिल्म रिव्यू: ‘सैटेलाइट शंकर’

रेटिंगः दो स्टार

निर्माताः मुराद खेतानी और अश्विन वर्दे

निर्देशकः इरफान कमल

कलाकारः सूरज पंचोली,मेघा आकाशउपेंद्र लिमये,अनिल के रेजी,पालोमी घोष,राज अर्जुन व अन्य.

अवधिः दो घंटे बीस मिनट

फिल्मकार इरफान कमल फिल्म‘‘सेटेलाइट’’शंकर में भारतीय सेना के एक जवान की जिंदगी की व उसकी प्रेम कथा लेकर आए हैं, जो कि एक बेहतरीन रोमांचक और रोमांटिक फिल्म बन सकती थी, मगर  फिल्मकार ने उसे देशभक्त और हर मुसीबत के समय लोगों की मदद के लिए कूद पड़ने वाले हीरो के रूप में पेश करने के चक्कर में फिल्म को चैपट कर डाला.

कहानीः

कहानी के केंद्र में केरला निवासी भारतीय सेना का जवान शंकर (सूरज पंचोली) है, जो कि कश्मीर सीमा पर कार्यरत है. उसकी बटालियन से जुड़े लोग उसे सैटेलाइट के नाम से जानते हैं, क्योकि उसके पास बचपन में उसके पिता द्वारा दिया गया एक उपकरण है, जिसकी मदद से वह किसी की भी मिमिक्री करके लोगों का मनोरंजन भी करता रहता है. वह केरला का रहने वाला है,मगर उसे हिंदी सहित कई दूसरे राज्यों की भाषाओं में भी महारत हासिल है. सैटेलाइट शंकर दूसरों की आवाजें निकालकर कई बार विषम परिस्थिति को भी अनुकूल बनाकर लोगों के बीच खुशियों की बहार ले आता है. सीमा पर गोलीबारी में घायल होने के बाद जब आर्मी अस्पताल के डाक्टर शंकर को आठ दिन अस्पताल में आराम करने की हिदायत देते हैं, तो वह अपने वरिष्ठ से बात कर आठ दिन अस्पताल में बिताने की बजाय अपने घर जाकर अपनी मां की आंख का आपरेशन कराकर वापस आने की आठ दिन की छुट्टी ले लेता है. उसके वरिष्ठ उसे सैनिक की शपथ दिलवाते हैं कि आठवें दिन वह अपने बेसकैंप सुबह मौजूद रहेगा.

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जब शंकर अपने शहर पोलाची के लिए रवाना होता है, तो उसकी बटालियन के साथी उसे अपने घरों के लिए संदेश और तोहफे उसके हाथ से भिजवाते हैं. घर जाते हुए ट्रेन में वह अपनी मां के कहने पर नर्स प्रमिला (मेघा आकाश) से बात कर उसे अपने दोस्त श्रीधर से बात करने के लिए कहता है. क्योंकि उसे प्रमिला की तस्वीर पसंद नहीं आयी थी. पर श्रीधर की बातें सुनकर शंकर को अपनी गलती का अहसास होता है. आगे चलकर रास्ते में वह पुनः प्रमिला से बात करते हैं.

कश्मीर से पोलाची जाते समय उसका एक सैनिक की तरह मददगार और निस्वार्थ स्वभाव उसके लिए मुसीबतें खड़ी कर देता है. एक बंगाली बुजुर्ग दंपति को उनकी सही ट्रेन में बैठाने के चक्कर में उसकी अपनी ट्रेन छूट जाती है. अब उसे पठानकोट टैक्सी  से जाकर उसी ट्रेन को पकड़ना है. टैक्सी वाला दो हजार रूपए मांगता है. पर उसकी मुलाकात एक विडियो ब्लौगर मीरा ( पालोमी घोष) से होती है, जिसके साथ मिलकर वह टैक्सी माफिया का पर्दाफाश करता है. वहां भी उसकी ट्रेन छूट जाती है. वह सड़क के रास्ते चलकर पंजाब में अपने साथी के घर उसका समान पहुंचाता है. वह अपने दोस्त की आवाज में बातें करके उसकी कोमा में जा चुकी मां को होश में लाता है,फिर वह आगरा फोर्ट पहुंचाता है, पर उसे एक बार फिर ट्रेन छोड़नी पड़ती है,क्योंकि वह दुर्घटनाग्रस्त बस में फंसे लोगों को मौत के मुंह से बचाने लग जाता है. फिर ग्वालियर के नजदीक के एक शहर में अपनी बटालियन के साथी अनवर के घर जाकर भाइयों के आपसी मनमुटाव को दूर करता है. फिर महाराष्ट् में वह टेंपो ड्राइवर को गुंडों से बचाता है. इस समाज सेवा के चक्कर में अब सैटेलाइट शंकर के पास अपने बेस कैंप में पहुंचने में सिर्फ दो दिन बचे हैं. इसलिए अब वह अपनी मां के पास जाने की बजाय वापस लौटना चाहता है. पर एक शहीद महाड़िक की पत्नी के कहने पर मां के पास जाने का मन बना लेता है. उसी वक्त प्रमिला से उसकी बात होती है. वह अपनी समस्या बताता है. तब मेघा, शंकर को न केवल उसकी मां से मिलने की तरकीब बताती है, बल्कि उसके वापस कश्मीर लौटने का रास्ता भी सुझाती है. मेघा व शंकर की मुलाकात हो जाती है. शंकर, मेघा को दिल दे बैठता है. शंकर अपनी मां से मिलकर, उनकी आंखों का आपरेशन करवाकर किस तरह आर्मी बेस में हाजिर होता है, वह अपने आप में रोचक है.

निर्देशनः

फिल्मकार इरफान कमल ने यदि थोड़ी सावधानी के साथ इस फिल्म का निर्माण किया होता,तो यह एक बेहतरीन फिल्म बन सकती थी. क्योंकि वर्तमान समय में हमारे देश को जिस तरह के नायक की जरुरत है, फिल्म में उसी तरह देश को अखंड करने वाले नायक की कहानी बयां की गयी है. मगर फिल्म की शुरूआत से ही फिल्मकार इशारा कर देते है कि वह विषयवस्तु के साथ गंभीर नहीं है. पहले दृश्य में गोलीबार के दृश्य को जिस तरह से मजाकिया अंदाज में पेश किया गया,उसे सही नही ठहराया जा सकता. फिल्मकार ने अतिशयोक्ति अलंकार का उपयोग करते हुए एक सैनिक को निजी जीवन में भी नायक बताने के चक्कर में फिल्म का गुड़गोबर कर डाला. फिल्म की पटकथा कई जगह मैलोड्रामैटिक हो गयी है. इंटरवल से पहले फिल्म बेवजह लंबी कर दी गयी है, इसे एडीटिंग टेबल पर कसने की जरुरत थी. एक ही फिल्म में आपसी भाईचारा, भ्रष्टाचार को दूर करने सहित तमाम सामाजिक मुद्दे रखकर फिल्म को चूंचूं का मुरब्बा बना दिया गया. इंटरवल के बाद फिल्म कुछ ठीक हो जाती है,जब सैटेलाइट शंकर के रोमांस व सोशल मीडिया द्वारा शंकर की मदद के दृश्य रोचक बने हैं. फिल्मकार ने यदि एक सैनिक की प्रेम कहानी को कुछ ज्यादा तवज्जो दी होती,तो भी फिल्म रोचक बन सकती थी. वीडियो ब्लागर के किरदार को भी अतशयोक्तिपूर्ण और कई जगह अति बचकाना बना दिया गया है. फिल्म में जितने भी मुद्दे उठाए गए हैं,वह अपना प्रभाव डालने में असफल रहे हैं.  फिल्म की लंबाई हर हाल में कम की जानी चाहिए थी.

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अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है,तो चार साल बाद सूरज पंचोली ने इस फिल्म से वापसी की है. 2015 में वह असफल फिल्म ‘हीरो’ में नजर आए थे. सूरज पंचोली ने एक्शन व नृत्य के दृश्यों में अच्छा काम किया है, मगर संवाद अदायगी सहित इमोशनल दृश्यों के लिए उन्हे अभी और मशक्कत करने की जरुरत है.  प्रमिला के किरदार में दक्षिण भारत की अदाकारा मेघा आकाश सुंदर व प्यारी लगी हैं.  उनकी संवाद अदायगी आपको अपना बना लेती है. सूरज पंचोली और मेघ आका की औन स्क्रीन केमिस्ट्री बहुत क्यूट है. वीडियो ब्लागर के किरदार में पालोमी घोष ने ठीक ठाक अभिनय किया है,मगर कई जगह उन्होने ओवर एक्टिंग की है.

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