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छिपकली : भाग 1

कविता की यह पहली हवाई यात्रा थी. मुंबई से ले कर चेन्नई तक की दूरी कब खत्म हो गई उन्हें पता ही नहीं चला. हवाई जहाज की खिड़की से बाहर देखते हुए वह बादलों को आतेजाते ही देखती रहीं. ऊपर से धरती के दृश्य तो और भी रोमांचकारी लग रहे थे. जहाज के अंदर की गई घोषणा ‘अब विमान चेन्नई हवाई अड्डे पर उतरने वाला है और आप सब अपनीअपनी सीट बेल्ट बांध लें,’ ने कविता को वास्तविकता के धरातल पर ला कर खड़ा कर दिया.

हवाई अड्डे पर बेटा और बहू दोनों ही मातापिता का स्वागत करने के लिए खड़े थे. बेटा संजू बोला, ‘‘मां, कैसी रही आप की पहली हवाई यात्रा?’’

‘‘अरे, तेरी मां तो बादलों को देखने में इतनी मस्त थीं कि इन्हें यह भी याद नहीं रहा कि मैं भी इन के साथ हूं,’’ दीप बोले.

‘‘मांजी की एक इच्छा तो पूरी हो गई. अब दूसरी इच्छा पूरी होने वाली है,’’ बहू जूही बोली.

‘‘कौन सी इच्छा?’’ कविता बोलीं.

‘‘मां, आप अंदाजा लगाओ तो,’’ संजू बोला, ‘‘अच्छा पापा, आप बताओ, मां की वह कौन सी इच्छा थी जिस की वह हमेशा बात करती रही थीं.’’

‘‘नहीं, मैं अंदाजा नहीं लगा पा रहा हूं क्योंकि तेरी मां की तो अनेक इच्छाएं हैं.’’

इसी बातचीत के दौरान घर आ गया था. संजू ने एक बड़ी सी बिल्ंिडग के सामने कार रोक दी.

‘‘उतरो मां, घर आ गया. एक नया सरप्राइज मां को घर के अंदर जाने पर मिलने वाला है,’’ संजू ने हंसते हुए कहा.

लिफ्ट 10वीं मंजिल पर जा कर रुकी. दरवाजा खोल कर सब अंदर आ गए. घर देख कर कविता की खुशी का ठिकाना न रहा. एकदम नया फ्लैट था. फ्लैट के सभी खिड़कीदरवाजे चमकते हुए थे. बाथरूम की हलकी नीली टाइलें कविता की पसंद की थी. रसोई बिलकुल आधुनिक.

संजू बोला, ‘‘मां, तुम्हारी इच्छा थी कि अपना घर बनाऊं और उस घर में जा कर उसे सजाऊं. देखो, घर तो एकदम नया है, चाहे किराए का है. अब तुम इसे सजाओ अपनी मरजी से.’’

कविता पूरे घर को प्रशंसा की नजर से देखती रही फिर धीरे से बालकनी का दरवाजा खोला तो ठंडी हवा के झोंके ने उन का स्वागत किया. बालकनी से पेड़ ही पेड़ नजर आ रहे थे. सामने पीपल का विशालकाय वृक्ष था जिस के पत्ते हवा में झूमते हुए शोर मचा रहे थे. आसपास बिखरी हरियाली को देख कर कविता का मन खुशी से झूम उठा.

संजू और जूही दोनों कंप्यूटर इंजीनियर हैं और सुबह काम पर निकल जाते तो रात को ही वापस लौटते. सारा दिन कविता और दीप ही घर को चलाते. कविता को नया घर सजाने में बहुत मजा आ रहा था. इमारत भी बिलकुल नई थी इसलिए घर में एक भी कीड़ामकोड़ा और काकरोच नजर नहीं आता था, जबकि मुंबई वाले घर में काकरोचों की भरमार थी. पर यहां नए घर की सफाई से वह बहुत प्रभावित थी. गिलहरियां जरूर उन की रसोई तक आतीं और उन के द्वारा छिड़के चावल के दाने ले कर गायब हो जाती थीं. उन गिलहरियों के छोटेछोटे पंजों से चावल का एकएक दाना पकड़ना और उन्हें कुतरते देखना कविता को बहुत अच्छा लगता था.

उस नई इमारत में कुछ फ्लैट अभी भी खाली थे. एक दिन कविता को अपने ठीक सामने वाला फ्लैट खुला नजर आया. सुबह से ही शोरगुल मचा हुआ था और नए पड़ोसी का सामान आना शुरू हो चुका था. देखने में सारा सामान ही पुराना सा लग रहा था. कविता को लगा, आने वाले लोग भी जरूर बूढे़ होंगे. खैर, कविता ने यह सोच कर दरवाजा बंद कर लिया कि हमें क्या लेनादेना उन के सामान से. हां, पड़ोसी जरूर अच्छे होने चाहिए क्योंकि सुबहशाम दरवाजा खोलते ही पहला सामना पड़ोसी से ही होता है.

शाम होतेहोते सबकुछ शांत हो गया. उस फ्लैट का दरवाजा भी बंद हो गया. अब कविता को यह जानने की उत्सुकता थी कि वहां कौन आया है. रात को जब बेटाबहू आफिस से वापस लौटे तब भी सामने के फ्लैट का दरवाजा बंद था. बहू बोली, ‘‘मां, कैसे हैं अपने पड़ोसी?’’

‘‘पता नहीं, बेटा, मैं ने तो केवल सामान ही देखा है. रहने वाला अभी तक कोई नजर नहीं आया है. पर लगता है कोई गांव वाले हैं. पुरानापुराना सामान ही अंदर आता दिखाई दिया है.’’

‘‘चलो मां,   2-4 दिन में पता लग जाएगा कि कौन लोग हैं और कैसे हैं.’’

एक सप्ताह बीत गया. पड़ोसियों के दर्शन नहीं हुए पर एक दिन उन के घर से आता हुआ एक काकरोच कविता को नजर आ गया. वह जोर से चिल्लाईं, ‘‘दीप, दौड़ कर इधर आओ. मारो इसे, नहीं तो घर में घुस जाएगा. जल्दी आओ.’’

‘‘क्या हुआ? कौन घुस आया? किसे मारूं? घबराई हुई क्यों हो?’’ एकसाथ दीप ने अनेक प्रश्न दाग दिए.

‘‘अरे, आओगे भी या वहीं से प्रश्न करते रहोगे. वह देखो, एक बड़ा सा काकरोच अलमारी के पीछे चला गया.’’

‘‘बस, काकरोच ही है न. तुम तो यों घबराई हुई हो जैसे घर में कोई अजगर घुस आया हो.’’

‘‘दीप, तुम जानते हो न कि काकरोच देख कर मुझे घृणा और डर दोनों लगते हैं. अब मुझे सोतेजागते, उठतेबैठते यह काकरोच ही नजर आएगा. प्लीज, तुम इसे निकाल कर मारो.’’

‘‘अरे, भई नजर तो आए तब तो उसे मारूं. अब इतनी भारी अलमारी इस उम्र में सरकाना मेरे बस का नहीं है.’’

‘‘किसी को मदद करने के लिए बुला लो, पर इसे मार दो. मुझे हर हालत में इस काकरोच को मरा हुआ देखना है.’’

‘‘तुम टेंशन मत लो. रात को काकरोचमारक दवा छिड़क देंगे…सुबह तक उस का काम तमाम हो जाएगा.’’

दीप ने बड़ी मुश्किल से कविता को शांत किया.

शाम को काकरोचमारक दवा आ गई और छिड़क दी गई. सुबह उठते ही कविता ने एक सधे हुए जासूस की भांति काकरोच की तलाश शुरू की पर मरा या जिंदा वह कहीं भी नजर नहीं आया. कविता की अनुभवी आंखें सारा दिन उसी को खोजती रहीं पर वह न मिला.

अब तो अपने फ्लैट का दरवाजा भी कविता चौकन्नी हो कर खोलती पर फिर कभी काकरोच नजर नहीं आया.

एक दिन खाना बनाते हुए रसोई की साफसुथरी दीवार पर एक नन्ही सी छिपकली सरकती हुई कविता को नजर आई. अब कविता फिर चिल्लाईं, ‘‘जूही, संजू…अरे, दौड़ कर आओ. देखो तो छिपकली का बच्चा कहां से आ गया.’’

मां की घबराई हुई आवाज सुन कर दौड़ते हुए बेटा और बहू दोनों रसोई में आए और बोले, ‘‘मां, क्या हुआ?’’

‘‘अरे, देखो न, वह छिपकली का बच्चा. कितना घिनौना लग रहा है. इसे भगाओ.’’

‘‘मां, भगाना क्या है…इसे मैं मार ही देता हूं,’’ संजू बोला.

‘‘मारो मत, छिपकली को लक्ष्मी का अवतार मानते हैं,’’ जूही बोली.

‘‘और सुन लो नई बात. अब छिपकली की भी पूजा करनी शुरू कर दो.’’

‘‘तुम इसे भगा दो. मारने की क्या जरूरत है,’’ कविता भी बोलीं.

झाड़ू उठा कर संजू ने उस नन्ही छिपकली को रसोई की खिड़की से बाहर निकाल दिया.

सर्दियों में इन 4 नेचुरल तरीकों से रखें घर को गर्म

विंटर सीजन में सर्द हवाओं से बचने और घर को नेचुरल तरीके से गर्म रखने के लिए ब्राइट कलर के पर्दे इस्तेमाल करें. इस सीजन में ऐसे पर्दे खूबसूरत लगते हैं. आज हम ऐसे फैब्रिक और कलर के बारे में बात करेंगे जो आपके घर को इस सीजन में भी खूबसूरत दिखाएगा. आइए बताते हैं.

  1. मेहरून रंग – मेहरून रंग के पर्दे वुडन फर्नीचर वाले कमरे में भी लगा सकते हैं. यह पर्दे सर्द हवा को रोक कर कमरे को गर्मी प्रदान करते है.

2. डीप ब्‍लू –  इस कलर के पर्दे को बच्चों के कमरे, लिविंग रूम, डाईनिंग या ड्राइंग रूम में लगा सकती हैं. इस रंग के पर्दे घर को स्टाइलिश लुक देते हैं.

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3. पीला रंग – पीले रंग के परदे लगाने से कमरा सुंदर लगता है. पीले रंग के पर्दे लगाने से कमरे में रौशनी भी आती है और कमरे को एक न्य लुक भी मिलता है.

4. लाल रंग – ब्राइट कलर इस मौसम के लिए बेस्ट है. इस रंग के पर्दे लगाने से घर सुंदर और परफेक्ट लगता है. आप वेलवेट फैब्रिक में भी इस रंग के पर्दे का चुनाव कर सकती हैं,  इससे बाहर की सर्द हवा अंदर नही आएगी.

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मेरे बेटे अलग अलग गानों पर नाचते हैं और वीडियो बनाते हैं उनकी इस आदत से परेशान हूं, मैं क्या करूं ?

सवाल

मैं राजस्थान के एक छोटे से गांव का निवासी हूं. मेरी उम्र 36 वर्ष है और मेरी पत्नी 32 वर्ष की है. हमारे 2 बेटे हैं. परेशानी यह है कि 13 साल के मेरे बेटों को सोशल मीडिया पर वीडियो बनाने का शौक चढ़ा है. जब देखो तब अलगअलग गानों पर नाचते हैं और वीडियो बनाते हैं. मैं उन की इस आदत से परेशान हूं. मैं क्या करूं कि वे दोनों थोड़ा सुधर जाएं.

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जवाब

आप के बच्चे अभी छोटे हैं और इस उम्र में बच्चों का नाचगाने में मन लगना आम बात है. हालांकि सोशल मीडिया का सही प्रकार से इस्तेमाल किया जाए तो उस में कोई बुराई नहीं है परंतु आप के बच्चे अभी छोटे हैं, और इस उम्र में सोशल मीडिया का चसका लगना ठीक नहीं है. आप उन्हें मनोरंजन के लिए किसी मंडली या ग्रु्रप का हिस्सा बना सकते हैं जहां नाचगाना सिखाया भी जाता है और बच्चों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भी ले जाया जाता है. जब बच्चों का मन असली क्रिएटिव ऐक्टिविटी में लगेगा तो उन के पास सोशल मीडिया या मोबाइल के लिए समय नहीं बचेगा और उन्हें खुद सोशल मीडिया तुच्छ लगने लगेगा.

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फेस्टिवल स्पेशल 2019: ऐसे बनाएं आलू का रायता

फेस्टिवल सीजन के दौरान आप इस डिश को जरूर ट्राई करें. आलू का रायता बनाने में आसान है और टाईम भी कम लगता है. तो चलिए जानते हैं इसे बनाने की रेसिपी.

सामग्री

– आलू (04 नग)

– दही (02 कप फेंटा हुआ)

– हरी मिर्च  (01 नग कटी हुई)

– भुना जीरा पाउडर (01 चम्मच)

– चाट मसाला (01 चम्मच)

– काली मिर्च पाउडर (चुटकी भर)

– काला नमक (1/2 चम्मच)

– लाल मिर्च पाउडर (स्वादानुसार)

– धनिया पत्ती (आवश्यकतानुसार)

– नमक (स्वादानुसार)

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बनाने की विधि :

– सबसे पहले आलू धो कर उबाल लें.

– उबले आलुओं को ठंडा करके इन्हें छील लें और चाकू की मदद से छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें.

– अब एक कटोरे में सभी सामग्री को अच्छे से मिला लें और ऊपर से भुने हुए जीरे का पाउडर, काली मिर्च   का पाउडर, काला नमक और नमक छिड़कें.

– अगर आप रायता को स्पाइसी बनाना चाहती हैं तो थोड़ा सा पिसा हुआ लाल मिर्च भी मिला सकती हैं.

– स्‍वादिष्‍ट आलू का रायता तैयार है, इसे हरी धनिया से गार्निश करें और खाने के साथ परोसें.

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भूलकर भी एक साथ न खाएं ये चीजें

बचपन में दादी के मुख से सुनते थे कि मछली खा कर कभी दूध नहीं पीना चाहिए. कभी फल खाने के बाद पानी पी लो तो दादी की डांट पड़ती थी. कई भारतीय व्यंजन हैं जिनके साथ खाने पर पाबंदी है. कहते हैं इससे विभिन्न रोग शरीर को लग जाते हैं. हम स्वादिष्ट खाना खाते हैं और कोशिश करते हैं कि उसमें सभी पोषक तत्व भी मौजूद हों, लेकिन कई बार हम जाने-अनजाने में ऐसी चीजें एकसाथ खा लेते हैं जो कि हमारी सेहत के लिए अच्छा नहीं होता और जिसके कारण हम अनेकों बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. जिन खाद्य पदार्थों के साथ खाने पर पाबंदी है वे ‘विरुद्ध आहार’ कहलाते हैं. यानी दो ऐसी खाने की चीजें जिनकी प्रकृति अलग-अलग होती है, उन्हें विरुद्ध आहार की श्रेणी में रखा गया है. होटलों में ऐसी बहुत सी चीजें खाने को मिलती हैं जो विरुद्ध आहार के अंतर्गत आती हैं, मगर जानकारी के अभाव में हम उन्हें खाते हैं और रोगों का शिकार होते हैं.

आइए जानते हैं कि कौन-कौन सी वे चीजें हैं जो विरुद्ध आहार के अंतर्गत आती हैं

  • दूध और दूध से बने पदार्थ जैसे कि दही, छाछ इत्यादि को अगर हम नींबू, कटहल या खट्टे पदार्थों के साथ खाते हैं तो यह विरुद्ध आहार होता है. आमधारणा यह है कि दुबलेपन से छुटकारा पाने के लिए केला-दूध खाओ, लेकिन यह जानकारी कम ही लोगों को है कि केला और दूध विरुद्ध आहार हैं. इन्हें कभी भी साथ नहीं खाना चाहिए. प्याज, कटहल, खट्टे पदार्थ, मीट-मछली और जूस जैसी चीजें दूध के साथ लेना विरुद्ध आहार के अंतर्गत आता हैं.

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  • हमें दही के साथ भी केला और अन्य फल नहीं खाने चाहिए. इनका आपस में मेल नहीं होता और हम पेट की कई बीमारियों के शिकार बन जाते हैं. इससे एसिडिटी, कब्ज, जलन, गैस, चक्कर आना जैसे रोग शरीर को घेर लेते हैं. दही और फल विरुद्ध आहार हैं. दही और फलों में अलग-अलग एंजाइम होते हैं. इस कारण वे पच नहीं पाते, इसलिए दोनों को साथ लेने की सलाह नहीं दी जाती है. दही के साथ खजूर खाना भी हानिकारक होता है. दही की तासीर ठंडी है. उसे किसी भी गर्म चीज के साथ नहीं लेना चाहिए. मछली की तासीर काफी गर्म होती है, इसलिए उसे दही के साथ नहीं खाना चाहिए. परांठे या पूरी जैसी तली-भुनी चीजों के साथ भी दही नहीं खाना चाहिए क्योंकि दही फैट के डाइजेशन में रुकावट पैदा करता है.
  • अधिकतर लोग शराब, बीयर और कोल्ड ड्रिंक के साथ नमकीन पदार्थों का सेवन करते हैं. लेकिन यह भी सेहत के लिए ठीक नहीं होता और इससे लूज मोशन, पेट खराब होना, चक्कर आना जैसी बीमारियां होती हैं.
  • खीरा और टमाटर भी हम सलाद में एक साथ खा लेते हैं. लेकिन आपने महसूस किया होगा कि इससे हमारा पेट भारी-भारी सा हो जाता है. इसलिए इन दोनों को हमें अलग-अलग ही खाना चाहिए. इसी तरह से गाजर के साथ नींबू का प्रयोग वर्जित है. इससे पेशाब सम्बन्धी बीमारियां हो जाती हैं.
  • शहद को कभी गर्म करके नहीं खाना चाहिए. चढ़ते हुए बुखार में भी शहद का सेवन नहीं करना चाहिए. इससे शरीर में पित्त बढ़ता है. शहद और मक्खन एक साथ नहीं खाना चाहिए. घी और शहद कभी साथ में नहीं खाना चाहिए. यहां तक कि पानी में मिलाकर भी शहद और घी का सेवन नुकसानदेह हो सकता है.शहद के साथ कभी भी मूली या घी, मक्खन, तेल जैसी चीजें जिन्हें हम गर्म करते हैं, नहीं खानी चाहिए.

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  • तरबूज, खरबूजे को खाने के बाद भूल कर भी पानी नहीं पीना चाहिए. इससे हैजा, अपच, लूज मोशन हो सकते हैं. फलों के सेवन के तुरंत बाद पानी पीना वर्जित है. अमरूद, खीरा, जामुन और मूंगफली के बाद तो भूल कर पानी न पियें.
  • कुछ ऐसे फल हैं जो साथ खाए जाएं तो नुकसान पहुंचाते हैं. जैसे संतरा और केला एक साथ नहीं खाना चाहिए क्योंकि खट्टे फल मीठे फलों से निकलने वाली शुगर के पाचन में रुकावट पैदा करते हैं, जिससे अपच की शिकायत पैदा हो जाती है. इन फलों को साथ खाने से फलों की पौष्टिकता भी कम हो जाती है.
  • मछली और अंडे के साथ दूध, दही कभी नहीं खानी चाहिए. मांस को तिल के तेल में कभी नहीं पकाना चाहिए. इसके अलावा मांसाहारी चीजों के साथ हमें मैदे वाली चीजें भी नहीं खानी चाहिए. इससे मोटापा, डायबिटीज, गैस इत्यादि बीमारियां हमारे शरीर में उत्पन्न हो जाती हैं. मछली के साथ काली मिर्च नहीं खानी चाहिए. मछली खाने के बाद काली मिर्च खाने से नुकसान हो सकता है.
  • हमें गर्म और ठंडी चीजें भी एक साथ नहीं खानी चाहिए. जिस तरह से चाय के तुरंत बाद आइसक्रीम का खाना, कोल्ड ड्रिंक का पीना विरुद्ध आहार कहलाता है.
  • तिल के साथ पालक का सेवन नहीं करना चाहिए. यही नहीं तिल के तेल में कभी भूलकर भी पालक न बनाएं. ऐसा करने से डायरिया हो सकता है.
  • 10 दिन तक कांसे के बर्तन में रखे घी को नहीं खाना चाहिए.
  • पीली छतरी वाले मशरूम सरसों के तेल में नहीं पकाने चाहिए.
  • दूध की बनी खीर के साथ सत्तू, शराब, खटाई और कठहल नहीं खाना चाहिए.
  • चावल के साथ सिरका नहीं खाना चाहिए.

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विरुद्ध आहार को हमेशा ध्यान में रखें. हम जो भी खाएं संतुलित और स्वादिष्ट खाएं और अपने शरीर की प्रकृति के अनुसार ही खाएं तभी हम अपने आप को दीघार्यु तक निरोगी और स्वस्थ बनाए रख सकते हैं.

मसालों की कटाई व प्रोसैसिंग

पुराने समय से मसालों का हमारे जीवन में खास स्थान रहा है. मसालों का अपने रूप, रस, सुगंध, स्वाद, रंग, आकार वगैरह के कारण अलग ही महत्त्व है. भारत के मसालों की मांग विदेशों में तेजी से बढ़ रही है. मसाले हमारे खाने को जायकेदार बनाने के साथ दवा का भी काम करते हैं.

कटाई के बाद मसालों की सफाई, ग्रेडिंग, पैकिंग वगैरह काम किए जाते हैं. कटाई के समय मसालों में नमी 55-85 फीसदी होती है. इन को महफूज रखने के लिए इन की नमी को घटा कर 8-10 फीसदी तक करना पड़ता है.

मसालों के कारोबार के लिए उन की सही तरीके से कटाई के बाद मड़ाई, सफाई, ग्रेडिंग और पैकिंग पर खास ध्यान दें. यहां हम मसालों की कटाई के बाद के कामों की चर्चा कर रहे हैं.

धुलाई : जिन मसालों को जमीन के पास से या जमीन में से खोद कर निकाला जाता है, उन की धुलाई करना जरूरी होता है, ताकि उन में लगी धूल और संक्रमण पैदा करने वाले पदार्थ साफ हो जाएं. धुलाई बहते पानी से करनी चाहिए. इलायची, हलदी, अदरक वगैरह मसालों की धुलाई की जाती है.

छाल निकालना : कुछ मसाले जैसे अदरक, लहसुन के सूखने में इन की छाल ही रुकावट होती है. इन को सुखाने के लिए इन की छाल निकालना जरूरी होता है. छाल निकालने के लिए खास तरह के चाकुओं का इस्तेमाल किया जाता है. सफेद अदरक लेने के लिए अदरक की छाल निकाल कर उसे नीबू पानी से धो लिया जाता है. इस के लिए 600 मिलीलिटर नीबू के रस को 30 लिटर पानी में मिलाया जाता है.

गोदना : सभी तरह की मिर्च को सुखाने के लिए गोदने की विधि इस्तेमाल की जाती है. मिर्च को लंबाई में दबा कर चपटा कर के सुखाने में कम समय लगता है. इस से क्वालिटी व रंग भी बना रहता है.

रासायनिक उपचार : इस से मसालों को उन के असली रंगरूप में रख कर सुंदर बनाया जाता है, जिस से उन की अच्छी कीमत मिलती है.

छोटी इलायची के बाहर का हरा चमकदार रंग उस की छाल में मौजूद क्लोरोफिल के कारण होता है. इस की चमक को बनाए रखने के लिए इलायची को 2 फीसदी सोडियम कार्बोनेट के घोल में 10 मिनट तक रखा जाता है. मिर्च को सोडियम बाई कार्बोनेट व जैतून के तेल के मिश्रण से उपचारित करने के बाद सुखाने से उस का रंग बना रहता है.

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अदरक को धोने के बाद साफ पानी में एक दिन के लिए रखा जाता है. इस के बाद 2 फीसदी बुझे चूने के घोल में 6 घंटे के लिए रखा जाता है.

बुझे चूने के पानी के घोल से उपचारित अदरक को सल्फर डाई औक्साइड के धुएं से (लगभग 3.5 किलोग्राम गंधक धुआं प्रति टन अदरक की दर से) 12 घंटों के लिए उपचारित किया जाता है.

इलायची की फली का रंग हरा चमक लिए हुए होना चाहिए. सभी फलियों का एक जैसा रंग नहीं होने के कारण इलायची की कीमत कम या ज्यादा होती है. एकसमान रंग लाने के लिए इलायची की फलियों को घुलनशील गंधक से उपचारित किया जाता है.

मसालों में हलदी के पीले रंग व इस की खास महक को बनाए रखने के लिए विशेष सावधानी रखनी पड़ती है. खुदाई के 3-4 दिन बाद मुख्य कंद से छोटेछोटे कंदों को अलग कर लिया जाता?है. कंदों को धो कर बुझे चूने के पानी, सोडियम कार्बोनेट या सोडियम बाई कार्बोनेट के घोल में उबाला जाता है.

मसालों को सुखाना

मसालों को सुखाने के दौरान इन में नमी की मात्रा को कम कर के 5 से 8 फीसदी तक बनाए रखें. सही ढंग से सूखने पर मसालों का मूल रंग व स्वाद बना रहता है. मसालों को सुखाने के लिए इन तकनीकों को अपनाएं:

धूप में सुखाना : मसालों को धूप में सुखाने के लिए खास सावधानी रखनी पड़ती है, ताकि धूल व बारिश से उन्हें नुकसान न हो. इलायची को 2 फीसदी सोडियम कार्बोनेट से उपचारित कर के और अदरक, हलदी को बुझे चूने के पानी से उपचारित कर के धूप में 8-10 दिन तक सुखाया जाता?है.

मसालों में 5 से 8 फीसदी नमी रह जाने तक ही उन्हें धूप में सुखाया जाता है. आईसीएआर ने मिर्च के लिए मिर्च छेदन मशीन तैयार की है. इस मशीन द्वारा 10 किलोग्राम प्रति घंटे की दर से मिर्च छेदन किया जाता है.

मशीन द्वारा सुखाना : मसालों को धूप में सुखाने पर मौसमी बाधाओं के अलावा उन में सूक्ष्म जीवों, धूल, चिडि़यों की गंदगी वगैरह मिलने का डर रहता है, जिस से मसाले की क्वालिटी पर बुरा असर पड़ता?है. इस से बचने के लिए मशीन से मसालों को 60 से 70 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर 6 से 8 घंटों के लिए सुखाया जाता है.

बिजली की मशीन से सुखाना : गरम हवा के लिए बिजली से चलने वाली शोषक मशीन का इस्तेमाल किया जाता है. इस में तापमान, समय वगैरह का नियंत्रण रहता है, जिस से आसानी से हर तरह के मसालों को सुखाया जा सकता है.

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भारतीय मसालों की राष्ट्रीय कानून के तहत हर अवस्था में ग्रेडिंग की जाती है. मसालों के लिए ग्रेडिंग करना कृषि उपज अधिनियम (1987) श्रेणीकरण विपणन के अधीन होता है. इन श्रेणियों को एगमार्क कहा जाता है. इस में भौतिक गुण जैसे रंग, आकार, घनत्व वगैरह का खासतौर पर ध्यान रखा जाता है.

किसानों को अपने उत्पादों की अच्छी कीमत पाने के लिए ग्रेडिंग की जानकारी होना जरूरी है.

कारोबार की कुशलता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक ग्रेडिंग एक अहम अंग?है.

मसालों की गुणवत्ता मान

साबुत बड़ी इलायची : साबुत बड़ी इलायची के सूखे व लगभग पके हुए फल संपुटों के रूप में होते हैं. दलपुंजों के टुकड़ों, डंठलों व अन्य चीजों का भार अनुपात में 5 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए. कीटों द्वारा नुकसान किए पदार्थ की मात्रा भार में 5 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.

बड़ी इलायची का चूर्ण : बीजों के चूर्ण में बीज अच्छी तरह पिसे होने चाहिए. नमी भार में 14 फीसदी से कम व कुल खनिज भार में 8 फीसदी से कम और वाष्पीय तेल एक फीसदी से कम होना चाहिए.

साबुत लाल मिर्च: कैप्सिकम फ्रुटेसैंस के सूखे पके फल या फलियां शामिल होती हैं. इस में अन्य पदार्थ बाहरी दलपुंज के टुकड़े, धूल, मिट्टी के ढेले, पत्थर वगैरह  शामिल हैं.

ये चीजें भार में 5 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. कीटों द्वारा खराब पदार्थों की मात्रा भार में 5 फीसदी से कम हो.

लाल मिर्च चूर्ण : सूखी साफ फलियों का चूर्ण होना चाहिए. मिर्च के चूर्ण में धूल, कवक, कीट द्वारा नुकसान व सुगंधित पदार्थ नहीं होने चाहिए. मिर्च के चूर्ण की नमी 12 फीसदी से कम, कुल खनिज भार 8 फीसदी से कम होना चाहिए.

साबुत धनिया : कोरिएंडम सेटाइवम के सूखे बीज, जिस में धूल, कचरा, कंकड़, मिट्टी के ढेले, भूसी, डंठल के अलावा अन्य

खाद्य पदार्थ के बीज व कीटों द्वारा खाए बीज शामिल न हों, का अनुपात 0.8 फीसदी से ज्यादा न हो.

धनिया चूर्ण : इस में नमी भार में 12 फीसदी से ज्यादा नहीं व कुल खनिज भार 7 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए.

मेथी: सूखे पके बीज में फालतू पदार्थ, धूल, कचरा, कंकड़, मिट्टी के ढेले वगैरह का अनुपात भार में 5 फीसदी से कम होना चाहिए. कीटों द्वारा खाए पदार्थ की मात्रा भार में  5 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.

मेथी चूर्ण : इस में मेथी के सूखे पके फलों का पिसा चूर्ण, जिस में नमी भार में 10 फीसदी से कम व कुल खनिज भार में 7 फीसदी से कम होनी चाहिए.

साबुत हलदी : पौधे से सूखे कंद या कंदीय जड़ में लैड क्रोमेट व अन्य रंजक पदार्थों की मिलावट नहीं होनी चाहिए. कीटों द्वारा नुकसान किए पदार्थों की मात्रा भार में 5 फीसदी से कम होनी चाहिए.

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हलदी चूर्ण : चूर्ण में बाहरी रंग की मिलावट नहीं होनी चाहिए. चूर्ण में नमी भार में 13 फीसदी से कम व कुल खनिज भार में

9 फीसदी से कम होनी चाहिए. लैड क्रोमेट जांच नेगेटिव होनी चाहिए.

स्टोरेज : मसाले व इन के उत्पाद नमी के मामले में ज्यादा संवेदनशील होते हैं, क्योंकि इन में नमी लेने की कूवत ज्यादा होती है. इस वजह से नमी से बचाने के लिए इन का भंडारण व पैकिंग अच्छी होनी चाहिए. नमी के आने पर इन में दरार पड़ने, रंग फीका पड़ने के अलावा कीट व बीमारियों का हमला हो जाता है.

दूरी : भाग 3

बस चल पड़ी थी, वह दूर तक हाथ हिलाती रही. मन में एक कसक लिए, क्या वह फिर कभी इन परोपकारियों से मिल पाएगी? नाम, पता, कुछ भी तो न मालूम था. और न ही उन दोनों ने उस का नामपता जोर दे कर पूछा था. शायद जोर देने पर वह बता भी देती. बस, राह के दोकदम के साथी उस की यात्रा को सुरक्षित कर ओझल हो रहे थे.

बस खड़खड़ाती मंथर गति से चलती रही. वह 2 सीट वाली तरफ बैठी थी और उस के साथ एक वृद्धा बैठी थी. वह वृद्धा बस में बैठते ही ऊंघने लगी थी, बीचबीच में उस की गरदन एक ओर लुढ़क जाती. वह अधखुली आंखों से बस का जायजा ले, फिर ऊंघने लगती. और वह यह राहत पा कर सुकून से बैठी थी कि सहयात्री उस से कोई प्रश्न नहीं कर रहा. स्कूल के कपड़ों में उस का वहां होना ही किसी की उत्सुकता का कारण हो सकता था.

वह खिड़की से बाहर देखने लगी थी. किनारे के पेड़ों की कतारें, उन के परे फैले खेत और खेतों के परे के पेड़ों को लगातार देखने पर आभास होता था जैसे कि उस पार और इस पार के पेड़ों का एक बड़ा घेरा हो जो बारबार घूम कर आगे आ रहा हो. उसे सदा से यह घेरा बहुत आकर्षक लगता था. मानो वही पेड़ फिर घूम कर सड़क किनारे आ जाते हैं.

खेतों के इस पार और उस पार पेड़ों की कतारें चलती बस से यों लगतीं मानो धरती पर वृक्षों का एक घेरा हो जो गोल घूमता जा रहा हो. उसे यह घेरा देखते रहना बहुत अच्छा लगता था. वह जब भी बस में बैठती, बस, शहर निकल जाने का बेसब्री से इंतजार करती ताकि उन गोल घूमते पेड़ों में खो सके. पेड़ों और खयालों में उलझे, अपने ही झंझावातों से थके मस्तिष्क को बस की मंथर गति ने जाने कब नींद की गोद में सरका दिया.

आंख खुली तो बस मथुरा पहुंच चुकी थी. बिना किसी घबराहट के उस ने अपनेआप को समेट कर बस से नीचे उतारा. एक पुलकभर आई थी मन में कि नानीमामी उसे अचानक आया देख क्या कहेंगी, नाराज होंगी या गले से लगा लेंगी, वह सोच ही न पा रही थी. रिकशेवाले को देने के पैसे नहीं थे उस के पास, पर नाना का नाम ही काफी था.

इस शहर में कदम रखने भर से एक यकीन था शंकर विहार, पानी की टंकी के नजदीक, नानी के पास पहुंचते ही सब ठीक हो जाएगा. नानीनाना ने बहुत लाड़ से पाला थाउसे. बचपन में इस शहर की गलियों में खूब रोब से घूमा करती थी वह. नानाजी कद्दावर, जानापहचाना व बहुत इज्जतदार नाम थे. शहरभर में नाम था उन का. तभी आज बरसों बाद भी उन का नाम लेते ही रिकशेवाले ने बड़े अदब से उसे उस के गंतव्य पर पहुंचा दिया था.

रिकशेवाले से बाद में पैसे ले जाने को कह कर वह गली के मोड़ पर ही उतर गई थी और चुपचाप चलती हमेशा की भांति खुले दरवाजे से अंदर आंगन में दाखिल हो गई थी. शाम के 4 बज रहे थे शायद, मामी आंगन में बंधी रस्सी पर से सूखे कपड़े उतार रही थीं. उसे देखते ही कपड़े वहीं पर छोड़ कर उस की ओर बढ़ीं और उसे अपनी बांहों में कस कर भींच लिया और रोतेरोते हिचकियों के बीच बोलीं, ‘‘शुक्र है, तू सहीसलामत है.’’ वे क्यों रो रही हैं, उस की समझ में न आया था.

वह बरामदे की ओर बढ़ी तो मामी उस का हाथ पकड़ कर दूसरे कमरे में ले जाते हुए बोलीं, ‘‘जरा ठहर, वहां कुछ लोग बैठे हैं.’’ नानी को इशारे से बुलाया. उन्होंने भी उसे देखते ही गले लगा लिया, ‘‘तू ठीक तो है? रात कहां रही? स्कूल के कपड़ों में यों क्यों चली आई?’’ न जाने वो कितने सवाल पूछ रही थीं.

उसे बस सुनाई दे रहा था, समझ नहीं आ रहा था. शायद एकएक कर के पूछतीं तो वह कुछ कह भी पाती. आखिरकार मामा ने सब को शांत किया और उस से कपड़े बदलने को कहा. वह नहाधो कर ताजा महसूस कर रही थी. लेकिन एक अजीब सी घबराहट ने उसे घेर लिया था. घर में कुछ बदलाबदला था. कुछ था जो उसे संशय के घेरे में रखे था.

आज वह यहां एक अजनबी सा महसूस कर रही थी, मानो यह उस का घर नहीं था. ऐसा माहौल होगा, उस ने सोचा नहीं था. सब के सब कुछ घबरा भी रहे थे. वह नानी के कमरे में चली गई. पीछेपीछे मामी चाय और नाश्ता ले कर आ गईं. तीनों ने वहीं चाय पी. मामी और नानी शायद उस के कुछ कहने का इंतजार कर रहे थे और वह उन के कुछ पूछने का. कहा किसी ने कुछ भी नहीं.

मामी बरतन वापस रखने गईं तो वह नानी की गोद में सिर टिका कर लेट गई. सुकून और सुरक्षा के अनुभव से न जाने कब वह सो गई. आंख खुली तो बहुत सी आवाजें आ रही थीं. और उन के बीच से मां की आवाज, रुलाईभरी आवाज सुनाई दे रही थी. वह हड़बड़ा कर उठ बैठी, लगता था उस की सारी शक्ति किसी ने खींच ली हो. काश, वह यहां न आ कर किसी कब्रिस्तान में चली गई होती.

मां और मामा उस के व्यवहार और चले आने के कारणों का विश्लेषण कर रहे थे. उसे उठा देख मां जोरजोर से रोने लगी थी और उसे उठा कर भींच लिया था. तेल के लैंप की रोशनी के रहस्यमय वातावरण में सब उसे समझाने लगे थे, वापस जाने की मनुहार करने लगे थे. वह चीख कर कहना चाहती थी कि वापस नहीं जाएगी लेकिन उस के गले से आवाज नहीं निकल रही थी.

कस कर आंखें मींचे वह मन ही मन से मना रही थी कि काश, यह सपना हो. काश, तेल का लैंप बुझ जाए और वे सब घुप अंधेरे में विलीन हो जाएं. उस की आंख खुले तो कोई न हो. लेकिन वह जड़ हो गई थी और सब उसे समझा रहे थे. हां, सब उसे ही समझा रहे थे. वह तो वैसे भी अपनी बात समझा ही नहीं पाती थी किसी को. सब ने उस से कहा, उसे समझाया कि मां उस से बहुत प्यार करती है.

सब कहते रहे तो उस ने मान ही लिया. उस के पास विकल्प भी तो न था. वह मातापिता के साथ लौट आई. अब मां शब्दों में ज्यादा कुछ न कहती. बस, एक बार ही कहा था, हम तो डर गए हैं तुम से, तुम ने हमारा नाम खराब किया, सब कोई जान गए हैं. वह घर में कैद हो गई. कम से कम स्कूल में कोई नहीं जानता. प्रिंसिपल जानती थी, उसे एक दिन अपने कमरे में बुलाया था.

अपने को दोस्त समझने को कहा था. वह न समझ सकी. दिन गुजरते रहे. बरस बीतते रहे. जिंदगी चलती रही. पढ़ाई पूरी हुई. नौकरी लगी. विवाह हुआ. पदोन्नति हुई. और आज जब उस के दफ्तर में काम करने वाली एक महिला कर्मचारी ने छुट्टी मांगते हुए बताया कि वह अपनी एक वर्ष की बिटिया को नानी के घर में छोड़ना चाहती है तो ये बरसों पुरानी बातें उस के मस्तिष्क को यों झिंझोड़ गईं जैसे कल की ही बातें हों.

आज एक बड़े ओहदे पर हो कर, बेहद संजीदा और संतुलित व्यवहार की छवि रखने वाली, वह अपना नियंत्रण खोती हुई उस पर बरस पड़ी थी, ‘‘तुम ऐसा नहीं कर सकती, सुवर्णा. यदि तुम्हारे पास बच्चे की देखभाल का समय नहीं था तो तुम्हें एक नन्हीं सी जान को इस दुनिया में लाने का अधिकार भी नहीं था. और जब तुम ने उसे जन्म दिया है तो तुम अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती.

‘‘नानी, मामी, दादी, बूआ सब प्यार कर सकती हैं, बेइंतहा प्यार कर सकती हैं पर वे मां नहीं हो सकतीं. आज तुम उसे छोड़ कर आओगी, वह शायद न समझ पाए. वह धीरेधीरे अपनी परिस्थितियों से सामंजस्य बिठा लेगी. खुश भी रहेगी और सुखी भी. तुम भी आराम से रह सकोगी. लेकिन तुम दोनों के बीच जो दूरी होगी उस का न आज तुम अंदाजा लगा सकती हो और न कभी उसे कम कर सकोगी. ‘‘जिंदगी बहुत जटिल है, सुवर्णा, वह तुम्हें और तुम्हारी बच्ची को अपने पेंचों में बेइंतहा उलझा देगी. उसे अपने से अलग न करो.’’ वह बिना रुके बोलती जा रही थी और सुवर्णा हतप्रभ उसे देखती रह गई.

‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ : क्या नायरा लाएगी औनलाइन पापा?

दर्शकों का पसंदीदा शो ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में लगातार धमाकेदार ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. दर्शक इस शो को काफी पसंद कर रहे हैं. इस शो के ट्विस्ट एंड टर्न से दर्शक खुब एंटरटेन कर रहे हैं.

हाल ही में आपने देखा कि बास्केट बौल गेम में नायरा और कैरव जीत जाते हैं. पहले तो कायरव बहुत खुश होता है लेकिन बाद में वो नायरा और कार्तिक की बातें सुनकर गलतफहमी का शिकार हो जाता है एक बार फिर से वो पापा से और ज्यादा नाराज हो जाता है.

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इधर वंश कहता है कि वो पिज्जा खाना चाहता है,  नायरा उसके लिए और्डर कर रही होती है. और फिर वो कहती है, किसी को और कुछ चाहिए तो बता दें. तभी कायरव वहां आ जाता है और कहता है कि उसे औनलाइन न्यू पापा चाहिए और अच्छे वाले करना ये वाले मुझे अच्छे नहीं लगते हैं. ये सुनकर सभी घरवाले चौंक जाते हैं. नायरा उसपर गुस्सा करती है लेकिन वो वहां से चला जाता है.

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हाल ही में आपने देखा कि कायरव अपने पापा से नफरत करने लगा है. कायरव को लगता है कि कार्तिक उसकी मम्मी से नफरत करता है.

इसी कारण वह कार्तिक से दूर जाने लगता है. तो उधर कार्तिक अपने बेटे के जन्मदिन के लिए एक शानदार पार्टी का आयोजन करता है. बर्थपार्टी के दौरान ही कैरव घर से भाग जाता है और सड़क पर चला जाता है. इसके बाद पूरे सिंघानिया परिवार में हाहाकार मच जाता है. इस शो के अपकमिंग एपिसोड में देखना दिलचस्प होगा कि कायरव की गलतफहमी को कैसे दूर करेगी नायरा.

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फिल्म रिव्यू: “बायपास रोड”

 रेटिंग: दो स्टार

निर्देशकः नमन नितिन मुकेश

कलाकारः नील नितिन मुकेश, अदा शर्मा, शमा सिकंदर, गुल पनाग, सुधांशु पांडे, रजित कपूर, मनीश चैधरी, ताहिर शब्बीर

अवधिः दो घंटे 17 मिनट

धन दौलत के लोभ में इंसान किस कदर गिर गया है, उसी के इर्द गिर्द घूमती कहानी पर नमन नितिन मुकेश के रहस्यप्रधान रोमांचक फिल्म ‘‘बाय पास रोड’’ लेकर आए हैं, जो कि प्रभावित नही करती.

कहानीः

अलीबाग में रह रहे मशहूर फैशन डिजाइनर विक्रम कपूर (नील नितिन मुकेश) जिस दिन घातक दुर्घटना का शिकार होते है, उसी दिन उनकी कंपनी की सेक्सी और नंबर वन मौडल सारा ब्रिगेंजा (शमा सिकंदर) की अपने घर में रहस्यमयी मौत होती है. मीडिया को लगता है कि इन दोनों हादसों का आपस में कोई न कोई गहरा रिश्ता जरूर है. सारा की मौत पहली नजर में आत्महत्या लगती है. जबकि इस हादसे में विक्रम को कुचल कर मारने की कोशिश की जाती है.

फिर कहानी अतीत में जाती है, जहां विक्रम और सारा के अतिनजदीकी रिश्तों का सच सामने आता है. हालांकि विक्रम अपनी ही कंपनी में इंटर्नशिप करने वाली डिजाइनर राधिका (अदा शर्मा) से प्यार करते है और सारा ब्रिगेंजा भी जिम्मी (ताहिर शब्बीर) की मंगेतर हैं.

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अस्पताल में पता चलता है कि विक्रम के दोनों पैर बेकार हो चुके हैं और अब उन्हें सिर्फ व्हील चेअर का ही सहारा हैं. जब विक्रम अस्पताल से अपने पिता प्रताप कपूर (रजित कपूर) के साथ अपने घर पहुंचता है, तो घर पर उनकी सौतेली मां रोमिला (गुल पनाग), सात आठ वर्षीय सौतेली बहन नंदिनी (पहल मांगे) और नौकर की मौजूदगी के बावजूद हादसे का शिकार होते-होते बचते हैं.

उधर पुलिस अफसर हिमांशु रौय (मनीष चैधरी) सारा की मौत का सच जानने उजागर करने पर आमादा है. हिमांशु रौय को सारा के मंगेतर जिम्मी के अलावा विक्रम के व्यावसायिक प्रतिद्वंदी नारंग (सुधांशु पांडे) पर शक है. पुलिस की जांच अलग चल रही है, तो वहीं व्हील चेअर पर रहेन वाले विक्रम को मारने की कई बार कोशिश होती है. इसी बीच कुछ अन्य हत्याएं भी हो जाती हैं. अंततः सच सामने आता ही है.

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लेखनः

अभिनय करने के साथ फिल्म की पटकथा व संवाद नील नितिन मुकेश ने ही लिखी है. उन्होंने पूरी कहानी को अपनी तरफ से जलेबी की तरह घुमाते हुए रहस्य का जामा पहनाने का भरसक प्रयास किया है. पर वह पूरी तरह से इसमें सफल नहीं हुए.

कहानी पुरानी ही है. इस तरह की कहानी तमाम सीरियल व अतीत में कुछ फिल्मों में आ चुकी है. फिल्म का क्लायमेक्स तो लगभग हर रहस्यप्रधान सीरियल से मिलता जुलता है. वर्तमान से बार बार अतीत में जाने वाली कहानी काफी कन्फ्यूजन पैदा करती है. कहानी में कई कमियां हैं. एक दृष्य में सारा का प्रेमी जिम्मी पुलिस से भगते हुए कदई मंजिल उपर से नीचे गिरता है. पुलिस उसके पास पहुंच जाती है. और उसे देखकर वह मृत समझती है, पर इंटरवल के बाद जिम्मी पुनः कहानी में नजर आने लगते हैं. कुछ चरित्र ठीक से विकसित नही किए गए. फिल्म के कुछ संवाद बहुत सतही है. कुल मिलाकर फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी नील नितिन मुकेश का लेखन है.

निर्देशनः

अपने समय के मशहूर गायक स्व.मुकेश के पोते, गायक नितिन के बेटे व नील नितिन मुकेश के छोटे भाई नमन नितिन मुकेश ने ‘‘बायपास रोड’’ से पहली बार निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा है. तकनीकी दृष्टिकोण से देखें, तो वह पूरी तरह से सफल रहे हैं. मगर कथा व पटकथा की मदद न मिलने के कारण उनका सारा प्रयास विफल हो गया.

अभिनयः

विक्रम के किरदार को नील नितिन मुकेश ने इमानदारी व शानदार अभिनय के साथ निभाया है. अदा शर्मा ने भी ठीक ठाक अभिनय किया है. रजित कपूर, शमा सिकंदर और मनीश चैधरी अपनी छाप छोड़ जाते हैं. इसके अलावा अन्य कलाकारों के चरित्र लेखक की कमजोरी की भेंट चढ़ गए.

‘छोटी सरदारनी’ : क्या सरबजीत परम की कस्टडी केस देने के लिए तैयार होगा ?

कलर्स टीवी का शो ‘छोटी सरदारनी’ टीआरपी चार्ट में  टौप पर है. यह शो नंबर वन हो गया है. वैसे पिछले हफ्ते यह शो छठे नंबर पर था. यह शो दर्शकों का फेवरेट शो बना हुआ है.

इस शो में दर्शकों को लगातार महाट्विस्ट देखने को मिल रहे है. जी हां इस शो के ट्विस्ट एंड टर्न को दर्शक काफी पसंद कर रहे हैं. तो आइए इस शो के ट्विस्ट एंड टर्न के बारे में जानते हैं.

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इस शो के पिछले एपिसोड में आपने देखा कि नीरजा यानी परम की नानी कहती है, परम पुत्र आज नानी मम्मा के पास सोएगा. परम उसे मना कर देता है और कहता है कि मैं मेहर मम्मा के पास सोऊंगा. परम के इस जवाब से नीरजा दुखी हो जाती है और वहां से जाने लगती है. तभी मेहर उसे रोक कर कहती है कि आपसे रिक्वेस्ट थी आज आप यही परम के पास सो जाओ. नीरजा वहां सोने के लिए तैयार हो जाती है और परम को कविता सुनाने के लिए कहती है.

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इस शो के अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि नीरजा परम की  कस्टडी के लिए कोर्ट में केस करना चाहती है. इसी सीलसीले में नीरजा सरब के पास जाती है और कहती है कि हमें परम की कस्टडी के बारे में बात करनी है, जिसे सुनकर सभी चौंक जाते हैं.  अब देखना ये काफी दिलचस्प होगा कि क्या सरबजीत नीरजा को परम की कस्टडी केस देने के लिए तैयार होगा ?

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