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फेस्टिवल स्पेशल: घर पर बनाएं क्रिस्पी भुट्टे के पकौड़े

भुट्टे के पकौड़े काफी करारे और स्वादिष्ट होते हैं. भुट्टे को कद्दूकस कर के पकौड़े बनाएं जाते है. जब भी आपको कुछ अलग खाने का मन हो तो आप शाम के नाश्ते में भुट्टे के पकौड़े बना सकती हैं. तो आपको झटपट बताते हैं भुट्टे के पकौड़े की बनाने की विधि.

सामग्री

कौर्न फ्लोर (2-3 टेबल स्पून)

हरा धनिया (2-3 टेबल स्पून बारीक कटा हुआ)

अदरक  (1 चम्मच पेस्ट)

हरी मिर्च (2 बारीक कटी हुई)

कश्‍मीरी दम आलू की रेसिपी

धनिया पाउडर ( 1छोटी चम्मच)

नरम भुट्टे (4)

लाल मिर्च पाउडर (1 छोटी चम्मच)

नमक (स्वादानुसार)

तेल (तलने के लिए)

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बनाने की विधि

सबसे पहले भुट्टों को कद्दूकस कर लें और कद्दूकस करके पल्प निकाल लीजिए.

पल्प को प्याले में निकाल लें, इसमें कौर्न फ्लोर डालकर मिक्स कर दीजिए.

फिर, इसमें धनिया पाउडर, अदरक का पेस्ट, बारीक कटी हुई हरी मिर्च, लाल मिर्च, नमक और थोड़ा सा बारीक कटा हुआ हरा धनिया डाल दें.

सभी सामग्रियों को अच्छे से मिला लें.

कढा़ई में तेल डालकर गरम कीजिए और जब तेल गरम हो जाय तो उसमें से थोडा़-थोडा़ मिश्रण चम्मच से लेकर डाल दें.

जितने पकौड़े एक बार में कढा़ई में आ जाएं उतने पकौड़े डाल कर तल लीजिए.

पकौड़ों को पलट-पलट कर गोल्डन ब्राउन होने तक तल लें.

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गोल्डन ब्राउन होने के बाद पकौड़ों को किसी प्लेट में बिछे नेपकिन पेपर पर निकाल लें, इसी तरह से बाकी पकौड़े भी तल लें.

इन पकौड़ों को आप हरे धनिये की चटनी के साथ परोसें.

posted by- Saloni

मेकअप व हेयरस्टाइल से पा सकती हैं सैक्सी लुक

कई बार ऐसा होता है कि आप पार्टी में लेटैस्ट फैशन की ड्रैस पहन कर जाती हैं. मैचिंग ज्वैलरी व ऐक्सैसरीज भी कैरी करती हैं, लेकिन फिर भी लोग आप की तारीफ करने के बजाय आप की फ्रैंड की तारीफ करते हैं जिस की वजह से आप का मूड खराब हो जाता है और आप ऐंजौय नहीं कर पातीं.

लेकिन क्या आप ने सोचा है कि ऐसा क्यों होता है. लोग क्यों आप की फ्रैंड की तारीफ करते हैं? दरअसल, अलग व खास दिखने के लिए सिर्फ ड्रैस ही काफी नहीं होती बल्कि आप का मेकअप व हेयरस्टाइल भी जरूरी है. इन का परफैक्ट कौंबिनेशन ही लोगों का ध्यान आकर्षित करता है और सब तारीफ करते नहीं थकते.

अगर आप पार्टी में सैल्फी क्वीन के साथसाथ ब्यूटी क्वीन भी बनना चाहती हैं तो मेकअप ऐक्सपर्ट कपिल बंसल द्वारा बताए गए निम्न मेकअप टिप्स फौलो करें :

फेस मेकअप

मेकअप लगाने से पहले चेहरा वैट टिशू से क्लीन करें. इस के बाद चेहरे पर कंसीलर लगाएं, कंसीलर आप ब्रश और हाथ से भी लगा सकती हैं. यदि चेहरे पर डार्क सर्कल व दागधब्बे हैं तो कंसीलर हाथ से ही लगाएं. इस से ये सही से कवर हो जाते हैं.

कंसीलर के बाद चेहरे पर बेस लगाएं. बेस लगाते समय कभी भी चेहरे की मसाज न करें. इस से चेहरे पर पैचेज आते हैं, इसलिए मसाज के बजाय टैब कर के मिक्स करें. अब चेहरे पर मेकअप स्टूडियो का लूज पाउडर लगाएं. इस से 15-20 मिनट में चेहरे पर ग्लो आ जाता है. पर एक बात का ध्यान रखें, लूज पाउडर सिर्फ गरमियों में लगाएं, सर्दियों में लगाने पर पैचेज आते हैं.

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स्मोकी आई मेकअप

पार्टी लुक हो या कैजुअल लुक, स्मोकी आई मेकअप कभी भी किया जा सकता है. स्मोकी आई के लिए सब से पहले आंखों पर गोल्डन आई बेस लगाएं. फिर ब्राउन व रैड शैडो लगाएं. इस के बाद ब्लैक लाइनर लगाएं, लाइनर पतला नहीं बल्कि मोटा लगाएं तभी आंखों पर स्मोकी इफैक्ट आएगा. ब्लैक लाइनर के बाद ब्लैक शैडो लगा कर स्मज करें. वैसे तो स्मोकी आई मेकअप ज्यादातर ब्लैक और ग्रे टोन में ही किया जाता है, लेकिन फिर भी अगर किसी और कलर से स्मोकी लुक देना चाहती हैं तो दे सकती हैं.

आप ब्लैक के साथ अन्य डार्क कलर्स का इस्तेमाल कर सकती हैं, लेकिन एक बात का ध्यान रहे, डार्क कलर में उसी कलर का चुनाव करें जो कलर आप की ड्रैस में हो वरना मेकअप काफी अटपटा लगेगा. इस के बाद आईब्रो डिफाइन करें. आईब्रो डिफाइन करने के लिए कभी भी ब्लैक शैडो का इस्तेमाल न करें. इस से आईब्रो ज्यादा हाइलाइट हो जाती हैं और नैचुरल नहीं दिखतीं. इसलिए ब्लैक की जगह डार्कब्राउन शेड का इस्तेमाल करें. आईब्रो डिफाइन करने के बाद आंखों पर काजल लगाएं.

काजल लगाते समय अगर आंखों में पानी आ जाए तो कपड़े से पोंछने के बजाय किनारों पर इयर बड लगाएं, यह पानी सोख लेता है और काजल फैलने नहीं देता. काजल थोड़ा सा बाहर निकाल कर लगाएं. काजल लगाने के बाद आंखों के नीचे ब्राउन आईशैडो लगाएं.

अब स्मोकी लुक को फाइनल टच देने के लिए पलकों पर मसकारा लगाना न भूलें.

फेस कंटूरिंग

कंटूरिंग का साधारण मतलब है मेकअप से चेहरे के फीचर्स को उभारना, जिस से फीचर्स शार्प नजर आएं. कंटूरिंग के लिए हमेशा अपनी स्किन टोन से 2 शेड डार्क इस्तेमाल करें. नाक की कंटूरिंग के लिए पहले दोनों तरफ डार्क शेड लगाएं और बीच में लाइट शेड लगा कर मर्ज करें. नाक के अलावा जौ लाइन व चिन की भी कंटूरिंग करें. इस से आप के फेस की शेप परफैक्ट लगेगी.

चिक्स मेकअप

चिक्स ब्लशर से उभारें. इस के लिए पीच, पिंक व बेज शेड का ब्लशर लगाएं. ध्यान रहे इसे नीचे तक न फैलाएं. ऐसा करने से चेहरा अजीब लगता है और पैचेज नजर आते हैं. ब्लशर आप जितना सौफ्ट तरीके से लगाएंगी वह उतना ही नैचुरल दिखेगा.

लिप मेकअप

अंत में लिपस्टिक लगाएं. लिपस्टिक लगाते समय अकसर हम सब एक गलती करते हैं आप भी वही गलती न करें. हम सोचते हैं कि डार्क लिपस्टिक में हम ज्यादा खूबसूरत लगेंगे पर अगर आप ने आंखों पर डार्क कलर का शैडो लगाया है तो लिपस्टिक न्यूड शेड की लगाएं.

पार्टी के लिए डिफरैंट हेयरस्टाइल

–       सब से पहले इयर टू इयर पार्टिशन करें. फिर हर सैक्शन में अच्छी तरह से कंघी करें. इस के बाद पीछे के सैक्शन को भी 2 भागों में बांटें. अब छोटेछोटे सैक्शन ले कर टौंग मशीन से कर्ल कर के क्लिप लगाएं. जब बालों में कर्ल बन जाए तब क्लिप निकाल कर सारे कर्ल को फैला लें. अब आगे से हाफ बालों को ले कर क्लिप लगा लें और नीचे के बालों में रबड़ बैंड लगा कर पोनी टेल बनाएं. इस के बाद पोनी के अंदर बन लगा कर पिन से अच्छी तरह से सैट करें. फिर फ्रंट के बालों में इयर टू इयर पार्टिशन करें और सैंटर के बालों को फोल्ड कर के पिन लगाएं.

इस के बाद पोनी के ऊपर के बालों को ट्विस्ट कर के पोनी के पास पिनअप करें. आगे के बालों के साथ भी ऐसा ही करें. अब आगे के बालों को थोड़ा मैसी लुक देने के लिए हेयर स्प्रे करें और हेयर ऐक्सैसरीज से सजाएं.

–       हेयरस्टाइल बनाने से पहले बालों में अच्छी तरह कंघी कर लें ताकि बाल उलझें नहीं. अब इयर टू इयर पार्टिशन करें. फिर पीछे के सैक्शन से थोड़े से बाल निकाल लें और क्राउन एरिया पर ट्विस्ट कर के पिन लगा लें. अब नीचे के बालों को बैक कौमिंग कर के पफ बनाएं और पिन से सैट करें, अब आगे के बालों में छोटेछोटे सैक्शन ले कर ट्विस्ट ऐंड टर्न करें. फिर हलकाहलका खींचें और पीछे की तरफ पिन लगाएं. ऐसा करने के बाद पीछे के बालों से छोटेछोटे सैक्शन ले कर टौंग मशीन से कर्ल करें. फिर राउंड डोनट इन कर्ल के अंदर डाल कर अच्छी तरह से पिन से सैट करें ताकि डोनट फिक्स हो जाए. अब इस में से छोटेछोटे सैक्शन ले कर हलकाहलका घुमाएं और पफ के पास ला कर पिन लगाएं.

–       सब से पहले इयर टू इयर पार्टिशन करें फिर छोटेछोटे सैक्शन ले कर बैक कौमिंग करें. जब सारे बालों में बैक कौमिंग हो जाए तब हेयर स्प्रे करें और हलके हाथों से कंघी कर लें.

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अब 2 पिन ले कर रबड़ के बीच में लगाएं. इस के बाद सारे बालों को ले कर पोनीटेल बनाएं और पिन लगे हुए रबड़ से टक करें. अब 4 जूड़ा नैट लें. फिर एक पिन में इन चारों नैट को लगा लें और पोनी के बीच में फिक्स करें. ध्यान रहे पिन को इस तरह से लगाएं कि पिन पोनी के बीच में लगे. इस के बाद चोटी को 4 पार्ट में डिवाइड करें. अब हर पार्ट से छोटेछोटे सैक्शन ले कर बैक कौमिंग करें. फिर ऊपर से हलकाहलका स्मूद कर लें और पिन में लगे एक नैट से बालों को कवर करें. अब बाकी के सैक्शन में भी ऐसा ही करें. जूड़ा नैट को नीचे से पिन से टक कर लें ताकि वह हिले नहीं. अंत में ऐक्सैसरीज से सजाएं.

–       छोटे बालों में हेयरस्टाइल बनाने के लिए इयर टू इयर पार्टिशन करें. फिर पीछे के बालों को ले कर पोनी बना लें. अब फ्रंट से बालों को ले कर बैक कौमिंग करें और ऊपर से फ्लैट कर के पोनी के पास पिन लगाएं. अब क्राउन एरिया से बालों को ले कर बैक कौमिंग करें, स्टफिंग लगा कर रोल कर के पिन से सैट करें. इस के बाद पोनी में डोनट लगा कर बालों से डोनट को कवर करें.

नेपाल की बारिश से भारत बेहाल पर क्यों?

कुदरत के साथ खेलना हंसीखेल नहीं है, यह बात किसी नेता को समझ में आई हो या न, बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के जेहन में जरूर घर कर गई होगी. जाते मानसून ने इस बार देश के कई राज्यों का खेल बिगाड़ दिया था. बिहार उन में से एक था. लगातार बरसते पानी ने राजधानी पटना को भी लील लिया था.

दरअसल, ऊंचे पहाड़ों पर बसे खूबसूरत नेपाल में बारिश के मौसम में वहां की नदियां जब उफनती हुई तराई में भारत की तरफ बढ़ती हैं तो अपने साथ विनाश भी लाती हैं. लेकिन यह इस मुसीबत का एक ही पहलू है. जानमाल को उजाड़ती, घरों को लीलती, संचार के साधनों को ठप करती ये नदियां उतनी भयावह नहीं होतीं जितनी इंसान की लापरवाही उन्हें बना देती है.

नेपाल के सरकारी महकमे की मानें तो भारत की तरफ से बनाए गए तटबंधों के चलते बारिश से नेपाल में ज्यादा नुकसान होता है. नेपाल की नदियां पूरे वेग से भारत की तरफ बहती हैं और तटबंधों से पानी रुकने से नेपाल के गांवों में पानी भर जाता है.

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इतना ही नहीं, नेपाल के एक सरकारी महकमे के मुताबिक, इस साल जुलाई महीने की बाढ़ में नेपाल की गुजारिश के बावजूद भारत ने अपने तटबंधों को काफी समय तक बंद रखा था. इस से नेपाल के गौर इलाके के साथसाथ दूसरी सरहदी बस्तियों में तालाब जैसे हालात हो गए थे. इस से वहां भारी तबाही हुई थी. तब तकरीबन 20 लोग मारे गए थे.

इस मुद्दे पर नेपाल के विदेश मंत्री ने अपने लोगों के इस तरह मारे जाने पर दुख और चिंता जाहिर की थी. इस के उलट भारत के सरकारी अफसरों ने कहा कि दोनों देशों की आपसी रजामंदी के बाद ही तटबंधों को कवर कर के रखा गया था. इस का नेपाल को भी फायदा होता है. बारिश से दोनों देशों के किसानों को कुदरती तौर पर उपजाऊ मिट्टी मिलती है. यहां तक कि दोनों देशों ने गौर इलाके के पास बने तटबंध के बारे में लिखित तौर पर अपनी मंजूरी दी हुई है.

कुदरत के कहर के ये दिन नेपाल और भारत के बीच तनातनी का माहौल पैदा कर देते हैं.

भारत और नेपाल के बीच तकरीबन 1,800 किलोमीटर लंबी सरहद है. तकरीबन 600 नदियां और छोटी धाराएं नेपाल से बहते हुए भारत में दाखिल होती हैं. जब ये नदियां उफान पर होती हैं, तब नेपाल और भारत के मैदानी इलाके बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं.

मानसून में जब गंगा की सहायक नदियां कोसी और गंडक पानी से लबालब भर जाती हैं तो बिहार में इस का बुरा असर पड़ता है.

भारत के सरकारी अफसर इस का कुसूरवार नेपाल को यह कहते हुए ठहरा देते हैं कि उस ने फ्लडगेट खोल कर नदी के निचले हिस्से में रहने वाली आबादी को खतरे में डाल दिया, मगर सचाई यह है कि इन दोनों नदियों पर बने बैराज नेपाल में होने के बावजूद इन का प्रबंधन भारत सरकार ही करती है. दोनों देशों के बीच साल 1954 में हुई कोसी संधि और साल 1959 में हुई गंडक संधि के तहत ऐसा किया जाता है.

भूकंप वाले पर्वतीय देश नेपाल में पिछले कुछ तकरीबन 20 सालों में पत्थर की खुदाई और जंगलों की बेतहाशा कटाई के चलते हालात बिगड़े हैं. साल 2002 से साल 2018 तक नेपाल 42,513 हेक्टेयर जंगल की जमीन गंवा चुका है. रेत माफिया ने नदियों को खोदखोद कर गड्ढों में बदल दिया है.

बिहार में 7 जिले पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया और किशनगंज नेपाल से जुड़े हैं. नेपाल के पहाड़ों पर जब बारिश होती है, तो उस का पानी नदियों के जरीए नीचे आ कर पहले नेपाल के मैदानी इलाकों में और उस के बाद भारत के सरहदी इलाकों में भर जाता है.

20 जुलाई को राज्यसभा के शून्यकाल में जनता दल (यूनाइटेड) के राज्यसभा सांसद रामनाथ ठाकुर ने बिहार में आई बाढ़ के मुद्दे को उठाते हुए सरकार से अनुरोध किया था कि इसे आपदा घोषित किया जाए. साथ ही, नेपाल और भारत के बीच बांध को जल्द बनवाया जाए.

इसी तरह उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह ने नेपाल से बाढ़ के रूप में आने वाली तबाही के सिलसिले में एक चिट्ठी के जरिए सरकार को अवगत कराया था कि नेपाल ने भालू बांध जलकुंडी परियोजना को ले कर ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई थी.

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साल 1997 में भालू बांध जलकुंडी परियोजना को मूर्त रूप देने के लिए तब के विधायक धनराज यादव ने एक चिट्ठी प्रधानमंत्री को लिखी थी और बाद में जय प्रताप सिंह ने भी 17 मार्च, 1999 को राप्ती और उस की सहायक नदियों की भयंकर विनाशलीला की तरफ ध्यान खींचने और समस्या के समाधान में राप्ती के उद्गम स्थान के पास पक्के बांध बनाने के लिए प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी थी. पर भालू बांध जलकुंडी परियोजना पर अब तक भारत और नेपाल की तरफ से कोई सार्थक पहल नहीं हो पाई है.

कुछ इन दोनों देशों की लापरवाही और कुछ यहां के भौगोलिक हालात के चलते हर साल मानसून के सीजन में भारी बारिश कहर बन कर टूटती है. इस बार तो बिहार के उपमुख्यमंत्री और भाजपाई नेता सुशील कुमार मोदी ने भी इस सैलाब का स्वाद चख लिया है. उम्मीद है वे केंद्र में बैठे अपने आकाओं को इस मुसीबत से छुटकारा दिलाने की गुहार लगाएंगे जिस से आम लोगों का भी कुछ भला हो जाएगा.

क्या हों उपाय

तटबंधों का उचित रखरखाव होना चाहिए और उन की लगातार निगरानी की जानी चाहिए.

अगर ऐसे उपाय नहीं किए जाते हैं, तो जवाबदेह के खिलाफ कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए. तटबंध तोड़ने वालों या अपनेआप टूटने के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देने के लिए कानून बनाया जाए.

प्रभावित राज्य को अपनी राहत नियमावली को दुरुस्त कर लेना चाहिए.

तटबंधों की मरम्मत का काम हर साल बारिश के मौसम से पहले पूरा कर लिया जाए. काम कागजों पर न हो.

बाढ़ से प्रभावित जिलों में जानमाल, घरेलू सामान, पशुपालन, रोजगार, उद्योगधंधों, बागबगीचों, पोखरतालाब वगैरह का जो भी नुकसान हो, सरकार उस का पूरा मुआवजा दे.

बाढ़ के पानी को रोकने के लिए तालाब वगैरह बनाए जाएं, टीलों पर राहत केंद्र बनाने की तैयारी रहे, नावों का खास इंतजाम हो, जिस से फंसे लोगों को राहत शिविर तक पहुंचाया जा सके.

बाढ़ के चलते अपना घरबार छोड़ कर आए लोगों को दोबारा बसाने की योजना पहले से तैयार रहे. जहां लोगों को ठहराया जाए वहां पानी और शौचालय का समुचित इंतजाम रहना चाहिए.

नदी बेसिन इलाके में छोटे जलाशय और चेक डैम बनाने को बाढ़ रोकने का असरदार उपाय माना जा रहा है. इन से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता, साथ ही इन पर लागत भी कम आती है.

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मुझे कई सालों से पीरियड्स टाइम पर नहीं आते हैं. मैं क्या करूं ?

सवाल
मेरी उम्र 24 वर्ष है और मैं एमबीए कर रही हूं. मुझे कई सालों से पीरियड्स टाइम पर नहीं आते हैं जिस से मैं बहुत परेशान हूं. मुझे लग रहा है कि कहीं मुझे कोई बड़ी बीमारी तो नहीं है. इस डर से मैं डाक्टर के पास भी नहीं गई हूं?

जवाब
जब आप को कई वर्षों से पीरियड्स की समस्या है तो आप ने डाक्टर से सलाह क्यों नहीं ली. आप जैसी पढ़ीलिखी युवती से ऐसी गलती की उम्मीद नहीं की जा सकती. वैसे लड़कियों में तो यह आम समस्या है, तो फिर कैसा डर.

लेकिन अब आप बिना देर किए गाइनोकोलौजिस्ट को दिखाएं जिस से सारी स्थिति क्लीयर हो सके.

कई बार सिस्ट का प्रौब्लम या फिर हार्मोंस डिसबैलेंस होने से पीरियड्स टाइम पर नहीं आते हैं जिस से दर्द होने के साथसाथ चिड़चिड़ापन आने लगता है. इस के लिए जरूरी है कि चैकअप करा कर प्रौपर ट्रीटमैंट लें ताकि बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सकें.

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अनियमित माहवारी

औरतों को हर माह पीरियड से दोचार होना पड़ता है, इस दौरान कुछ परेशानियां भी आती हैं. मसलन, फ्लो इतना ज्यादा क्यों है? महीने में 2 बार पीरियड क्यों हो रहे हैं? हालांकि अनियमित पीरियड कोई असामान्य घटना नहीं है, किंतु यह समझना आवश्यक है कि ऐसा क्यों होता है.

हर स्त्री की मासिकधर्म की अवधि और रक्तस्राव का स्तर अलगअलग है. किंतु ज्यादातर महिलाओं का मैंस्ट्रुअल साइकिल 24 से 34 दिनों का होता है. रक्तस्राव औसतन 4-5 दिनों तक होता है, जिस में 40 सीसी (3 चम्मच) रक्त की हानि होती है.

कुछ महिलाओं को भारी रक्तस्राव होता है (हर महीने 12 चम्मच तक खून बह सकता है) तो कुछ को न के बराबर रक्तस्राव होता है.

अनियमित पीरियड वह माना जाता है जिस में किसी को पिछले कुछ मासिक चक्रों की तुलना में रक्तस्राव असामान्य हो. इस में कुछ भी शामिल हो सकता है जैसे पीरियड देर से होना, समय से पहले रक्तस्राव होना, कम से कम रक्तस्राव से ले कर भारी मात्रा में खून बहने तक. यदि आप को प्रीमैंस्ट्रुल सिंड्रोम की समस्या नहीं है तो आप उस पीरियड को अनियमित मान सकती हैं, जिस में अचानक मरोड़ उठने लगे या फिर सिरदर्द होने लगे.

असामान्य पीरियड के कई कारण होते हैं जैसे तनाव, चिकित्सीय स्थिति, अतीत में सेहत का खराब रहना आदि. इन के अलावा आप की जीवनशैली भी मासिकधर्म पर खासा असर कर सकती है.

कई मामलों में अनियमित पीरियड ऐसी स्थिति से जुड़े होते हैं जिसे ऐनोवुलेशन कहते हैं. इस का मतलब यह है कि माहवारी के दौरान डिंबोत्सर्ग नहीं हुआ है. ऐसा आमतौर पर हारमोन के असंतुलन की वजह से होता है. यदि ऐनोवुलेशन का कारण पता चल जाए, तो ज्यादातर मामलों में दवा के जरीए इस का इलाज किया जा सकता है.

इलाज संभव

जिन वजहों से माहवारी अनियमित हो सकती है या पीरियड मिस हो सकते हैं वे हैं: अत्यधिक व्यायाम या डाइटिंग, तनाव, गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन, पोलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, युटरिन पोलिप्स या फाइब्रौयड्स, पैल्विक इनफ्लैमेटरी डिजीज, ऐंडोमिट्रिओसिस और प्रीमैच्योर ओवरी फेल्योर.

कुछ थायराइड विकार भी अनियमित पीरियड का कारण बन सकते हैं. थायराइड एक ग्रंथि होती है, जो वृद्धि, मैटाबोलिज्म और ऊर्जा को नियंत्रित करती है. किसी स्त्री में आवश्यकता से अधिक सक्रिय थायराइड है, इस का रक्तपरीक्षण से आसानी से पता किया जा सकता है. फिर रोजाना दवा खा कर इस का इलाज किया जा सकता है. हारमोन प्रोलैक्टिन का उच्च स्तर भी इस समस्या का कारण हो सकता है.

यदि किसी महिला को पीरियड के दौरान बहुत दर्द हो, भारी रक्तस्राव हो, दुर्गंधयुक्त तरल निकले, 7 दिनों से ज्यादा पीरियड चले, योनि में रक्तस्राव हो या पीरियड के बीच स्पौटिंग, नियमित मैंस्ट्रुअल साइकिल के बाद पीरियड अनियमित हो जाए, पीरियड के दौरान उलटियां हों, गर्भाधान के बगैर लगातार 3 पीरियड न हों तो अच्छा यही होगा कि तुरंत चिकित्सीय परामर्श लिया जाए. अगर किसी लड़की को 16 वर्ष की आयु तक भी पीरियड शुरू न हो तो तुरंत डाक्टर से मिलना चाहिए.

– डा. मालविका सभरवाल, स्त्रीरोग विशेषज्ञा, नोवा स्पैशलिटी हौस्पिटल्स

ताहिरा कश्यप ने शाहरुख खान के साथ “टेड टौक्स इंडिया नई बात” में किया प्रेरित

स्तन कैंसर महिलाओं में सबसे अधिक पाए जाने वाले कैंसर में से एक है, हालांकि, इस पर चर्चा करना भारत में एक टैबू  है. भारत के प्रमुख लेखकों में से एक ताहिरा कश्यप को भी उनके परिवार द्वारा उनके पौजिटिव डायग्नोसिस के बारे में बात करने से मना कर दिया गया था.

लेकिन ताहिरा कश्यप ने समाज के इन टैबू से हटकर इंस्टाग्राम पर कैंसर से अपनी लड़ाई के बारे में अपनी बात खुलकर रखती आयी हैं.

हाल ही में ताहिरा कश्यप को शाहरुख खान द्वारा होस्ट किये जाने वाले शो ‘टेड टाक्स इंडिया नई बात’ में आमंत्रित किया गया था, जहां उन्होंने बताया कि सबसे कठिन समय कब होता है. ताहिरा उन 26 वक्ताओं में से एक थीं जो बेहतर भारत के भविष्य को आकार दे रही हैं.

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ताहिरा कहती हैं, “इस महत्वपूर्ण मंच को इस तरह के अद्भुत लोगों के साथ साझा करना और मेरी कहानी साझा करने में सक्षम होना एक सौभाग्य की बात है. खुलेआम इसके बारे में बात करने के पीछे एकमात्र कारण यह है कि प्रारंभिक स्तन कैंसर के लक्षण सभी के दिमाग में बैठ जाए और किसी को भी इन लक्षणों को जानने के बाद उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यह विचार डर पैदा करने के लिए नहीं है, बल्कि सतर्क करने के लिए है. यह न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया में मृत्यु दर को बदल सकता है. मैं टेड टौक्स की आभारी हूं कि उन्होंने मुझे ये अवसर दिया. ”

शो में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के वक्ताओं को दिखाया गया है, जिन्होंने भारत में स्वास्थ्य, पर्यावरण जागरूकता और यौन शोषण जैसे प्रमुख मुद्दों से निपटने के लिए अपने विचारों पर प्रकाश डाला.

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500 साल पुराने विवाद का फैसला: मंदिर भी बनेगा, मस्जिद भी बनेगी

अयोध्या के राम मंदिर पर फैसला भले ही दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट से सुनाया जाना था पर इसमें गांवगांव तक रहने वालो के कान लगे थे. एक रात पहले से ही लोगों के दिलों में तमाम आशंकायें घर कर गई थी. चिन्ता की लकीरों का आलम यह था कि दूर दराज के बाजार और सड़को पर सन्नाटा सुबह से ही परस गया था. हर कोई यह सुनने को बेचैन था कि फैसला क्या असर डालेगा ? जैसे जैसे सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने लगा जनता को राहत महसूस होने लगी.

देश का सबसे बड़ा और सबसे पुराना जमीन का विवाद पर सबसे बड़ी अदालत का फैसला समाज में गंगा जमुनी तहजीब को बढ़ावा देने वाला रहा है. अयोध्या राममंदिर विवाद का फैसला देते समय सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जगह भारत सरकार को देते हुए कहा है कि वह 3 माह में ट्रस्ट बनाकर मंदिर निर्माण को दिशा दे. मंदिर निर्माण के साथ कोर्ट ने मस्जिद बनाने के लिये भी 5 एकड़ जमीन देने का निर्णय दिया है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का देश की बहुसंख्यक जनता ने स्वागत किया है. सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद पक्ष के वादी इकबाल अंसारी ने कहा ‘यह फैसला अहम मुददा था. कोर्ट ने जो फैसला दिया है उसका स्वागत है. वह हम स्वीकार करते है. अब सरकार पर निर्भर है कि वह हमें कहा जमीन देती है.’

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सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी कहते हैं कि सुन्नी बोर्ड इस फैसले से संतुष्ट नहीं है. यह फैसला विरोधाभासी है. इस पर पुर्नविचार करना चाहिए. हम कोर्ट के फैसले का पूरा अध्ययन करके अगला कदम उठायेगे.’ दूसरी तरफ हिन्दू महासभा ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने विविधता में एकता का संदेश दिया है. देश की जनता ने 5 जजों की संविधान पीठ प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, एसए बोबडे, डीवाई चन्द्रचूड, अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर के फैसले का स्वागत किया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते समय इस बात का खास ख्याल रखा कि इसका सार्थक संदेश जनता में जाये. जिससे देश में सौहार्द का वातावरण बना रहे.

देश में सौहार्द को वातावरण बना रहे इसके लिये प्रशासनिक स्तर पर हर जगह कड़े प्रबंध पहले से ही कर लिए गये थे. स्कूल, कालेज, शराब और असलहों तक की दुकानों को बंद कर दिया गया था. धारा 144 लागू करके जनता में यह संदेश दिया गया कि वह भीड़ का हिस्सा ना बने. मुकदमे के फैसले के पक्ष और विपक्ष दोनो के लोग सड़कों पर उतर कर माहौल ना खराब करें. उत्तर प्रदेश में अयोध्या सहित पूरे प्रदेश के जिलों में सुरक्षा के लिये मजबूत प्रबंध किये गए. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिये यह चुनौती भरा समय था. विपक्षी दलों ने भी पूरे मामले में संयम का परिचय दिया. जिससे राजनीतिक बयानबाजी को रोका गया.

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प्रदेश में हर तरफ चैकसी रखने के साथ ही साथ सोशल मीडिया को नियत्रित करना भी कठिन चुनौती थी. इसके लिये कल रात से पूरा प्रचार प्रसार शुरू हो गया था. सोशल मीडिया पर नजर रखने के लिये पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की टीम का गठन कर लिया गया था. शनिवार को तमाम सरकारी विभागों में पहले से छुट्टी होती है. स्कूल कालेज बंद होने से सड़को पर सन्नाटा सुबह से ही परसा था. कल रात जैसे ही यह पता चला कि कल सुबह अयोध्या का फैसला आयेगा तमाम लोग कर्फ्यू जैसी आशंकाओं से घिर कर जरूरी सामान की खरीददारी करने लगे. ऐसे लोगों को सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुनकर राहत महसूस हो रही है.

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देश की अधिकतर जनता का मंदिर के मुकदमे से होई सरोकार नहीं था. उसकी रूचि इस बात में थी कि समाज में अमन और चैन बना रहे. देश के लोगों के सामने 1992 में ढांचा ढ़हाये जाने की घटना के बाद हुए खूनखराबे का खौफ था. अयोध्या के मुकदमें में सैकड़ों सालों में सैकड़ों लोगों की जान गई इसके बाद ऐसे सौहार्द पूर्ण फैसले ने देश में अमनचैन की राह दिख रही है. मंदिर के फैसले साथ मंदिर के नाम पर होने वाली राजनीति पर भी विराम लग सकता है. जिससे जनता भी अब अपने रोजीरोजगार के मुददों पर सोच सकेगी.

‘छोटी सरदरानी’: क्या परम सरबजीत से दूर हो जाएगा ?

कलर्स चैनल पर प्रसारित होने वाला सीरीयल “छोटी सरदारनी” में धमाकेदार ट्विस्ट एंड टर्न दर्शकों को देखने को मिल रहे हैं. जी हां, कहानी का एंगल परम की कस्टडी को लेकर चल रहा है. अगर परम की कस्टडी नीरजा को मिल जाती है तो  परम सरबजीत से दूर हो जाएगा. ये ट्रैक तो आने वाले एपिसोड में ही पता चलेगा. फिलहाल आपको इस शो के ट्विस्ट एंड टर्न के बारे में बताते हैं.

हाल ही में आपने देखा कि कुलवंत मेहर से मिलने आती है. वो मेहर से कहती है कि मैं अपने आप को यहां आने से रोक ही नहीं पाई. कुलवंत मेहर से बताती है कि बिट्टु की शादी तय हो गई है और वो मेहर से कहती है, आपको खुश होना चाहिए. मेहर को कुलवंत ये भी बताती है कि आज मैं एक सरदार से मिली थी, वह बिल्कुल तुम्हारी तरह दिख रहा था.

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कुलवंत नीरजा के पास जाती है और उसे मिठाई देती है. और वो परम को अपने पास बुलाती है. परम के पैर में चोट लगी होती है, कुलवंत उसे ठीक करती है. परम सरबजीत से कहता है, पापा अब मैं बिल्कुल ठीक हो गया हूं. मेहर ये सब देखकर खुश होती है. सरबजीत परम को गले लगाता है.

इस शो के अपकमिंग एपिसोड में ये देखना दिलचस्प होगा कि नीरजा को परम की कस्टडी मिलेगी या नहीं.

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‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’:  फिर टूटेगा कायरव का दिल, क्या करेगी नायरा ?

स्टार प्लस का लोकप्रिय शो ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में लगातार हाईवोल्टेज ड्रामा चल रहा है. आए दिन इस शो की कहानी में नए नए मोड़ आ रहे है. दर्शक इस शो को खूब पसंद कर रहे हैं. शो के ट्रैक में कार्तिक और कायरव के रिश्ते की कहानी दिखाया जा रहा है. पूरा गोयंका और सिंघानिया परिवार दोनो के रिश्ते सुधारने की पूरी तरह कोशिश कर रहे हैं.

हाल ही में आपने देखा कि नायरा ने बौस्केटबौल खेल का आयोजन किया था, जिससे कायरव खुश हो जाए. लेकिन कायरव तो अपने पापा कार्तिक से नाराज है क्योंकि कायरव को लगता है कि कार्तिक नायरा से हमेशा लड़ता है. कायरव ने तो औनलाइन पापा के लिए भी डिमांड कर दी है.

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इस शो के  एपिसोड में आपको धमाकेदार ट्विस्ट देखने को मिलेगा. जी हां कार्तिक अपने बेटे को खुश करने के लिए सरदार जौली सिंह के गेटअप में दिखेगा. दरअसल पुरुष और महिलाओं के बीच डांस प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा, इसमें सारे सदस्य पंजाबी गेटअप में नजर आएंगे. तो वही कार्तिक सरदार जौली सिंह के गेटअप में दिखेगा. प्रतियोगिता में डांस के दौरान सरदार जौली सिंह यानी कार्तिक गिर जाएगा.

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तो उधर नायरा कार्तिक का नाम लेकर उसे तेजी से आवाज देगी. तभी कायरव सुन लेगा. और कायरव को पता चल जाएगा कि सरदार जौली सिंह कोई और नहीं बल्कि उसके पापा कार्तिक है. अब देखना ये दिलचस्प होगा कि सरदार जौली सिंह की सच्चाई जानने के बाद कायरव का क्या रिएक्शन होगा. फिर से कार्तिक नायरा कैसे मनाएंगे कायरव को.

सर्जिकल कैस्ट्रेशन : समाधान या नई समस्या

‘‘मेरे हाथ बंधे हुए हैं. मैं वही सजा सुना सकती हूं जिस का प्रावधान है. लेकिन मेरी चेतना मु झे यह कहने के लिए अनुमति देती है कि वक्त आ गया है कि देश के कानून बनाने वाले विद्वान बलात्कार की वैकल्पिक सजा के तौर पर रासायनिक या सर्जिकल बधियाकरण के बारे में सोचें जैसे कि  दुनिया के तमाम देशों में यह मौजूद है.’’

इतिहास अपनेआप को दोहराता है कम से कम सर्जिकल कैस्ट्रेशन जैसी सजा को ले कर तो यह बात 100 फीसदी सच है. राजधानी दिल्ली स्थित रोहिणी जिला अदालत की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लौ ने 17 फरवरी, 2012 को यौन अपराध के एक मामले में 30 वर्षीय बलात्कारी नंदन को हालांकि उम्रकैद की सजा सुनाई और निर्देश दिया कि दोषी को सजा में कोई रियायत न दी जाए यानी उसे मरते दम तक जेल में रखा जाए, लेकिन कसक के साथ न्यायाधीश ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में सर्जिकल कैस्ट्रेशन की सजा होनी चाहिए. उन्होंने अपनी इच्छा जताते हुए यह भी जोड़ा कि हमारे यहां ऐसी सजा का प्रावधान नहीं है.

आश्चर्यजनक किंतु सत्य यह है कि जज महोदया ने इस के पहले भी ठीक इन्हीं शब्दों में सर्जिकल कैस्ट्रेशन की वकालत की थी. तब उन्होंने शब्दश: उस जुमले का इस्तेमाल किया था जिस जुमले का इस्तेमाल हम ने लेख के शुरू में किया है. सचमुच इस तरह की एकरूपता बहुत कम देखने को मिलती है खासतौर पर जब मामला इतना संवेदनशील हो. बहरहाल, एक 30 वर्षीय रिश्ते के मौसा द्वारा 6 साल की बच्ची के साथ बलात्कार किए जाने पर जज महोदया ने यह फैसला सुनाया. इस फैसले की पृष्ठभूमि में टाटा इंस्टिट्यूट औफ सोशल साइंसेज द्वारा कराए गए सर्वे के वे आंकड़े भी थे जो बताते हैं कि हिंदुस्तान की हर 3 में से 1 लड़की और हर 2 में से 1 लड़का परिजनों से ही यौनशोषण का शिकार है.

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सजाओं पर बहस

हमारे यहां कई ऐसे अपराध हैं जिन की सजाओं को ले कर रहरह कर समाज में बहस उठती रहती है कि सजा के पुराने प्रावधान को बदल दिया जाना चाहिए. इस में लंबे समय से बहस में रहने वाला एक मामला सजाएमौत को ले कर भी है. देश में एक बड़ा तबका अकसर यह बहस करता है कि देश में सजाएमौत का प्रावधान खत्म होना चाहिए जैसे कि दुनिया के कई उन्नत लोकतांत्रिक देशों में है. ऐसे देशों में फ्रांस और ब्रिटेन का उदाहरण दिया जाता है.

दूसरी तरफ लंबे अरसे से यह बहस भी देश में काफी शिद्दत से होती रही है कि बलात्कारियों को सजाएमौत देने की सिफारिश पूर्व गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी भी करते रहे हैं.

मगर अभी तक इस मामले में रासायनिक या सर्जिकल बधियाकरण की मांग न तो महिला आयोग की तरफ से आई थी और न ही किसी राजनीतिक या सामाजिक संस्था या संगठन की तरफ से आई थी. इस मामले में खुद एक न्यायाधीश ने अपनी निजी राय प्रकट कर के देश को एक ज्वलंत मुद्दा दिया है कि इस पर सोचा जाना चाहिए कि बलात्कारी भविष्य में ऐसा न कर सकें, इस के लिए उन से उन का पौरुष छीन लिया जाना चाहिए. सुनने में यह एक भावनात्मक, आक्रोशपूर्ण और महिलाओं के प्रति सकारात्मक सोच लगती है, लेकिन क्या वास्तव में यह महिलाओं के हित में होगा? क्या कैमिकल या सर्जिकल कैस्ट्रेशन जैसे सख्त कानून बनने व उस के लागू होने के बाद बलात्कार की घटनाओं में कमी आएगी? क्या ऐसे कानून के खतरनाक दुरुपयोग किए जाने की आशंका नहीं है?

आमतौर पर कानून सिर्फ आक्रामक भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि किसी स्थितिपरिस्थिति की बहुत गहराई से पड़ताल करते हैं. उस के व्यावहारिक नतीजों के अनुमानों पर माथापच्ची करते हैं. इस के बाद तय होता है कि यह समाज या उस व्यापक वर्ग, जिस की बेहतरी की जिम्मेदारी उस कानून में होती है, के लिए कितना फायदेमंद होगा?

सुनने में लगता है कि यह बहुत अच्छा कानून होगा. इस के भय से बलात्कारी महिलाओं को  मां, बहन, बेटी के रूप में देखने लगेंगे. लेकिन इस पूरी संभावना के विपरीत एक डरावनी आशंका का भी पहलू है.

कानूनों पर प्रतिक्रिया     

आमतौर पर कठोर कानूनों की प्रतिक्रिया डर के बजाय कई बार विद्रोह के रूप में होती है. कैमिकल या सर्जिकल कैस्ट्रेशन की कानूनन स्थिति में आशंका है कि कहीं ऐसी स्थितियां न पैदा हो जाएं कि बलात्कारी बजाय डरने के, बलात्कार करने के साथसाथ पीडि़ता की हत्या करने पर ही उतर आए.

जब बलात्कारी को सजाएमौत देने की बात होती है तो अकसर प्रबुद्ध वकीलों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि इस से हो सकता है कि कुछ, बहुत मामूली फर्क बलात्कार की घटनाओं पर तो पड़े लेकिन बलात्कारियों द्वारा बलात्कार पीडि़त महिला की हत्या किए जाने के मामले बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगे. कारण यह है कि जब कानून इस की इजाजत देगा तो भला कौन बलात्कारी है जो अपने हाथ कानून के हाथों तक पहुंचने देगा. हर बलात्कारी यही सोचेगा, बलात्कार करने के बाद बेहतर है पीडि़त की हत्या कर दी जाए जिस से सजा के डर की आशंका ही खत्म हो जाए.

कुछ इसी तरह की आशंका देखी जाए तो इस प्रस्तावित कानून के साथ भी जुड़ती है. जब बलात्कारी को यह लगेगा कि उस के पकड़े जाने पर उसे हमेशाहमेशा के लिए पुरुषत्वविहीन किया जा सकता है तो वह घृणा, भय और वितृष्णा में पीडि़ता की जिंदगी लेना ज्यादा सीधा और सुविधाजनक सम झेगा.

नतीजतन, सिर्फ पीडि़तों की संख्या में ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा बल्कि उन की हत्याओं का एक भयंकर सिलसिला शुरू हो सकता है. इसलिए इस कानून के बारे में भावुकता से सोचने के पहले गहराई से उन्हीं के प्रति ईमानदारी व सहानुभूति से सोचना चाहिए जो आज भी पीडि़त हैं यानी महिलाएं.

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कुल मिला कर  कैस्ट्रेशन की सजा से लगता नहीं कि महिलाओं को कोई फायदा होगा, उलटे उन के लिए स्थितियां और भी डरावनी, भयानक व जटिल हो जाएंगी.

इस प्रस्तावित कानून के साथ एक जबरदस्त आशंका इस के दुरुपयोग की भी है. क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो औफ इंडिया के एकत्रित आपराधिक आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि 95 फीसदी से ज्यादा बलात्कार जानपहचान के मित्र, पड़ोसी, रिश्तेदार और नजदीकी करते हैं. लेकिन उस से भी ज्यादा जटिल तथ्य यह है कि बलात्कार के जितने मामले दर्ज होते हैं उन में से 50 फीसदी तक मामले ऐसे होते हैं जिन के पीछे कहीं न कहीं सहमति का आधार होता है और किसी वजह से परिस्थितियां बदल जाने से सहमति के रिश्ते बलात्कार की श्रेणी में आ जाते हैं.

इन आंकड़ों के भीतर का आंकड़ा यह भी बताता है कि बड़े पैमाने पर ऐसे आंकड़े एक स्थिति के बाद जा कर बलात्कार का मामला बन गए जबकि पहले उन में एक सहमति का आधार था.

कहने का मतलब यह है कि ऐसी परिस्थितियों में इस प्रस्तावित कानून के दुरुपयोग की आशंका और ज्यादा बढ़ जाती है. सहमति के रिश्ते कब बलात्कार के टैग के नीचे आ जाएं, कहना कठिन होगा. फिर बात देखने वाली यह भी है कि भले ऐसे मामले बहुत कम होते हों जिन में बलात्कारी की भूमिका में महिलाएं होती हैं, फिर भी ऐसे कुछ मामले तो होते ही हैं जब पुरुष किसी मजबूरी या ब्लैकमेलिंग के तहत बलात्कार जैसी स्थिति का शिकार होता है.

सवाल है क्या ऐसे पुरुषों के लिए न्याय की कोई व्यवस्था वैसे ही बनाई जा सकेगी जैसी महिलाओं के लिए बनाए जाने का प्रस्ताव है?

पीडि़त महिलाएं ही

दोराय नहीं कि बलात्कार जैसे मामलों में महिलाओं के प्रति सकारात्मक और सहानुभूतिपूर्वक सोचे जाने की जरूरत है, क्योंकि आमतौर पर वे ही पीडि़त होती हैं. लेकिन, कोई ऐसा कानून बनाना खतरे से खाली नहीं होगा जिस के दुरुपयोग की जबरदस्त आशंकाएं मौजूद हों.

हालांकि दुनिया के कई देश इस तरह का कानून रखते हैं मगर देखने में यह कतई नहीं आया कि ऐसे कानून बना देने भर से बलात्कार जैसी यौनहिंसा के अपराध में किसी तरह की कोई कमी दिखी हो. इस समय दुनिया में जिन देशों में सर्जिकल और कैमिकल कैस्ट्रेशन की सजा का प्रावधान है उन में अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, पोलैंड और जरमनी जैसे विकसित देश भी शामिल हैं. अमेरिका में कुछ राज्यों में स्वेच्छा से कैमिकल कैस्ट्रेशन के लिए राजी होने वाले यौन अपराधियों को कम सजा दी जाती है. इसराईल ने भी बाल यौन उत्पीड़कों को ऐसी ही सजा देने का प्रावधान किया है.

कैलिफोर्निया, अमेरिका का वह अकेला राज्य है जिस ने अपने यहां कैस्ट्रेशन का प्रावधान लागू करने के लिए अपनी पारंपरिक दंड संहिता बदल डाली.

इस में भी दोराय नहीं कि महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते यौन हिंसा अपराधों को रोकने के लिए कोई प्रशासनिक मनोवैज्ञानिक कड़ा कानून लाना ही होगा. लेकिन इस के पहले इस मामले में देशव्यापी बहस की जरूरत है ताकि यह सुनिश्चित हो कि ऐसे कानून से पीडि़तों की पीड़ा और नहीं बढ़ेगी तथा समाज में बर्बरता का युग नहीं लौटेगा.

लेकिन अगर कोई बिना इन तमाम मुद्दों पर विचारविमर्श किए, बिना एक राष्ट्रव्यापी जनचेतना विकसित किए हुए यह कानून परवान चढ़ाता है तो जाहिर है इस के कई खतरनाक नतीजे भी देखने को मिल सकते हैं. इन से बचने के लिए इस पर एक राष्ट्रव्यापी बहस की जरूरत है.

क्या है सर्जिकल कैस्ट्रेशन या बधियाकरण?

कैस्ट्रेशन या बधियाकरण की मानव इतिहास में मौजूदगी तब से है जब अभी व्यवस्थित ढंग से इतिहास को दर्ज करना भी शुरू नहीं किया गया था. कहने का मतलब यह कि इंसान को जब से याद है उस से पहले ही इस तरह की व्यवस्था विभिन्न कबीलाई समाजों में मौजूद थी. दुनिया के हर भौगोलिक और ऐतिहासिक क्षेत्र में, चाहे वह मध्यपूर्व रहा हो, यूरोप रहा हो, या अफ्रीका हर कोने में यह सजा के एक रूप में मौजूद रही है.

प्राचीनकाल में जब कोई सेना दूसरी सेना पर विजय हासिल कर लेती थी तो अपनी विजय को खौफनाक याद का रूप देने के लिए या कहें कि पराजितों में दहशत भरने के लिए सेना के तमाम सैनिकों का पौरुष छीन लिया जाता था. इतिहास में ऐसे तथ्य भी मौजूद हैं कि इन पुरुषों का पुरुषत्व छीन कर इन्हें महिलाओं की तरह हरम (रनिवास) में रखा जाता था. इन्हें हिजड़ा भी कहा जाता था और इस के बाद इन की दुनिया बदल जाती थी.

दरअसल, कैस्टे्रशन वह कार्यवाही है जिस के तहत किसी भी पुरुष का पुरुषत्व के कारक उस के टैस्टीकल्स या अंडकोश को नष्ट कर दिया जाता है. जब टैस्टीकल्स ही नहीं होंगे तो सैक्सुअल रसायनों का उत्पादन नहीं होगा और न तो दिलोदिमाग में और न ही शारीरिक गतिविधि के रूप में पुरुष सैक्स के लिए सक्षम रह पाएगा. इस तरह वह बलात्कार कर पाने में अक्षम हो जाएगा.

जहां तक सर्जिकल कैस्ट्रेशन की बात है तो इस में पुरुष के अंडकोश हमेशाहमेशा के लिए सर्जिकल ढंग से काट दिए जाते हैं यानी शरीर से इस हिस्से को ही खत्म कर दिया जाता है, लेकिन जब बात कैमिकल कैस्ट्रेशन की होती है तो इस के तहत इस तरह का शरीर में रासायनिक प्रभाव पैदा किया जाता है कि ऐसा व्यक्ति सैक्सुअल उत्थान और सैक्सुअल कल्पनाशीलता से हमेशाहमेशा के लिए वंचित हो जाता है. इस में रसायनों के जरिए टैस्टीकल्स को पूरी तरह नष्ट कर दिया जाता है.

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जहां तक कैस्ट्रेशन को एक सजा के रूप में इस्तेमाल किए जाने की बात है, तो इस के मूल में यह मकसद है कि इस प्रक्रिया के जरिए किसी व्यक्ति में सैक्स की क्षमता और उस में सैक्स की मानसिक चाहत को भी हर हालत में खत्म किया जाए. लेकिन इस तरह की कार्यवाहियां मानवाधिकारों के हनन की वजह भी बनती हैं.

अगर समाजशास्त्री नजरिए से देखें तो इस तरह की खौफनाक कार्यवाही के कुछ साइड इफैक्ट्स भी देखने में आते हैं. ऐसे समाज में जहां कड़ाई से कैस्ट्रेशन का कानून मौजूद है वहां देखा गया कि बलात्कार के पीडि़तों को अकसर अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है. सब से बड़ी बात यह है कि अगर वाकई यह कानून इतना ही प्रभावशाली होता तो उन तमाम देशों में बलात्कार जैसे अपराध हमेशाहमेशा के लिए खत्म हो गए होते जहां कैस्ट्रेशन की सजा का प्रावधान है.

इस सजा के कुछ अनदेखे मैडिकल पहलू भी हैं. मसलन, देखने में आया है कि जब किसी अपराधी को कैमिकल कैस्ट्रेशन की प्रक्रिया से गुजारा जाता है तो उस में खून के थक्के बनने की और गंभीर एलर्जिक रिऐक्शन की स्थितियां पैदा हो जाती हैं. कुछ लोग इस से बहुत ज्यादा मोटे हो जाते हैं और कुछ की इस कार्यवाही के बाद हड्डियां छोटी पड़ जाती हैं, उन में घनत्व कम हो जाता है और उन्हें कई तरह की कार्डियोवैस्कुलर व्याधियों व ओस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याएं हो जाती हैं.

कैस्टे्रशन के बाद देखा गया कि तमाम पुरुष महिलाओं जैसा व्यवहार करने लगते हैं. उन के हावभाव बदल जाते हैं. उन की सिर्फ पुरुषत्व की क्षमता ही नहीं छीनी जाती, बल्कि उन के कुदरती पुरुषपन का स्वभाव भी खत्म हो जाता है. इस तरह यह सजा जिंदगीभर मानसिक और भावनात्मक रूप से भी घुटघुट कर मरने के लिए होती है. इसलिए बधियाकरण के बारे में सोचते हुए इस के सभी पहलुओं पर ध्यान रखना होगा.

एकमत नहीं वकील

सर्जिकल कैस्ट्रेशन क्या वास्तव में महिलाओं के विरुद्ध बढ़ते यौन अपराधों को रोकने का कोई कारगर विकल्प हो सकता है? इस सवाल पर समाज की व्यापक राय मिले, इस से पहले यह जान लेना जरूरी है कि वकीलों की भी इस संबंध में एक राय नहीं है.

नामी वकील मीनाक्षी लेखी सर्जिकल कैस्ट्रेशन जैसी सजा के बारे में एडिशनल सैशन जज कामिनी लौ से सहमत हैं. मीनाक्षी के मुताबिक, ‘सर्जिकल कैस्ट्रेशन के बारे में कोर्ट ने जो राय रखी है, उस के बारे में विचारविमर्श तो किया ही जाना चाहिए.’

साथ ही वे उन का यह मानना है कि हमें अपनी पारंपरिक सोच को बदलने की जरूरत है. आखिर उदारवादी देशों में भी इस तरह की सजा का प्रावधान है. तब फिर भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस तरह की सजा के बारे में क्यों नहीं सोचा जाना चाहिए?

मीनाक्षी लेखी का मानना है कि हमारे यहां सिर्फ आरोपी के मानवाधिकार के बारे में ही बातें होती हैं, पीडि़त के बारे में कोई कुछ नहीं सोचता. मगर मीनाक्षी लेखी के इन तर्कों से मशहूर क्रिमिनल लायर आर के आनंद कतई सहमत नहीं हैं. उन का मानना है, ‘‘भारत में इस तरह की बातें नहीं हो सकतीं. हमारे सिस्टम में मुजरिम को सुधारने की चिंता व कोशिश होती है. ऐसे में कैस्ट्रेशन जैसी सजा के बारे में नहीं सोचा जा सकता. क्योंकि इस से पीडि़ताओं के विरु द्ध अपराध के और अधिक उग्र होने की आशंका है.’’ आर के आनंद का इस संदर्भ में सु झाव है, ‘‘बच्चियों, बूढ़ी औरतों के साथ घिनौने तरीके से किए गए रेप के मामलों में सजा को और सख्त तो बनाया जा सकता है लेकिन कैस्ट्रेशन जैसी सजा बेमानी है. सजा गंभीर ही करनी है तो फांसी की सजा के बारे में सोचा जा सकता है. आखिर फिरौती व अपहरण के मामलों में यदि फांसी की सजा हो सकती है तो फिर रेप में क्यों नहीं हो सकती?’’

कुल मिला कर समाज के दूसरे तबकों की तरह ही कानून की जानकारी रखने वाले वकीलों का तबका भी कैस्ट्रेशन की सजा को ले कर एकमत नहीं है.

कायाकल्प : भाग 1

बेटे की शादी के कुछ महीने बाद ही सुमित्रा ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए. रोजरोज की कलह से परेशान बेटेबहू ने अलग घर ले लिया लेकिन 15 दिन के अंदर ही सुमित्रा को ऐसी खबर मिली जिस से उस के स्वभाव में अचानक परिवर्तन आ गया.

खिड़की से बाहर झांक रही सुमित्रा ने एक अनजान युवक को गेट के सामने मोटरसाइकिल रोकते देखा.

‘‘रवि, तू यहां क्या कर रहा है?’’ सामने के फ्लैट की बालकनी में खड़े अजय ने ऊंची आवाज में मोटर- साइकिल सवार से प्रश्न किया.

‘‘यार, एक बुरी खबर देने आया हूं.’’

‘‘क्या हुआ है?’’

‘‘शर्मा सर का ट्रक से एक्सीडेंट हुआ जिस में वह मर गए.’’

खिड़की में खड़ी सुमित्रा अपने पति राजेंद्र के बाजार से घर लौटने का ही इंतजार कर रही थीं. रवि के मुंह से यह सब सुन कर उन के दिमाग को जबरदस्त झटका लगा. विधवा हो जाने के एहसास से उन की चेतना को लकवा मार गया और वह धड़ाम से फर्श पर गिरीं और बेहोश हो गईं.

छोटे बेटे समीर और बेटी रितु के प्रयासों से कुछ देर बाद जब सुमित्रा को होश आया तो उन दोनों की आंखों से बहते आंसुओं को देख कर उन के मन की पीड़ा लौट आई और वह अपनी बेटी से लिपट कर जोर से रोने लगीं.

उसी समय राजेंद्रजी ने कमरे में प्रवेश किया. पति को सहीसलामत देख कर सुमित्रा ने मन ही मन तीव्र खुशी व हैरानी के मिलेजुले भाव महसूस किए. फिर पति को सवालिया नजरों से देखने लगीं.

‘‘सुमित्रा, हम लुट गए. कंगाल हो गए. आज संजीव…’’ और इतना कह पत्नी के कंधे पर हाथ रख वह किसी छोटे बच्चे की तरह बिलखने लगे थे.

सुमित्रा की समझ में आ गया कि रवि उन के बड़े बेटे संजीव की दुर्घटना में असामयिक मौत की खबर लाया था. इस नए सदमे ने उन्हें गूंगा बना दिया. वह न रोईं और न ही कुछ बोल पाईं. इस मानसिक आघात ने उन के सोचनेसमझने की शक्ति पूरी तरह से छीन ली थी.

करीब 15 दिन पहले ही संजीव अपनी पत्नी रीना और 3 साल की बेटी पल्लवी के साथ अलग किराए के मकान में रहने चला गया था.

पड़ोसी कपूर साहब, रीना व पल्लवी को अपनी कार से ले आए. कुछ दूसरे पड़ोसी, राजेंद्रजी और समीर के साथ उस अस्पताल में गए जहां संजीव की मौत हुई थी.

अपनी बहू रीना से गले लग कर रोते हुए सुमित्रा बारबार एक ही बात कह रही थीं, ‘‘मैं तुम दोनों को घर से जाने को मजबूर न करती तो आज मेरे संजीव के साथ यह हादसा न होता.’’

इस अपराधबोध ने सुमित्रा को तेरहवीं तक गहरी उदासी का शिकार बनाए रखा. इस कारण वह सांत्वना देने आ रहे लोगों से न ठीक से बोल पातीं, न ही अपनी गृहस्थी की जिम्मेदारियों का उन्हें कोई ध्यान आता.

ज्यादातर वह अपनी विधवा बहू का मुर्झाया चेहरा निहारते हुए मौन आंसू बहाने लगतीं. कभीकभी पल्लवी को छाती से लगा कर खूब प्यार करतीं, पर आंसू तब भी उन की पलकों को भिगोए रखते.

तेरहवीं के अगले दिन वर्षों की बीमार नजर आ रही सुमित्रा क्रियाशील हो उठीं. सब से पहले समीर और उस के दोस्तों की मदद से टैंपू में भर कर संजीव का सारा सामान किराए के मकान से वापस मंगवा लिया.

उसी दिन शाम को सुमित्रा के निमंत्रण पर रीना के मातापिता और भैयाभाभी उन के घर आए.

सुमित्रा ने सब को संबोधित कर गंभीर लहजे में कहा, ‘‘पहले मेरी और रीना की बनती नहीं थी पर अब आप सब लोग निश्ंिचत रहें. हमारे बीच किसी भी तरह का टकराव अब आप लोगों को देखनेसुनने में नहीं आएगा.’’

‘‘आंटी, मेरी छोटी बहन पर दुख का भारी पहाड़ टूटा है. अपनी बहन और भांजी की कैसी भी सहायता करने से मैं कभी पीछे नहीं हटूंगा,’’ रीना के भाई रोहित ने भावुक हो कर अपने दिल की इच्छा जाहिर की.

‘‘आप सब को बुरा न लगे तो रीना और पल्लवी हमारे साथ भी आ कर रह सकती हैं,’’ रीना के पिता कौशिक साहब ने हिचकते हुए अपना प्रस्ताव रखा.

सुमित्रा उन की बातें खामोश हो कर सुनती रहीं. वह रीना के मायके वालों की आंखों में छाए चिंता के भावों को आसानी से पढ़ सकती थीं.

रीना के साथ पिछले 6 महीनों में सुमित्रा के संबंध बहुत ज्यादा बिगड़ गए थे. समीर की शादी करीब 3 महीने बाद होने वाली थी. नई बहू के आने की बात को देखते हुए सुमित्रा ने रीना को और ज्यादा दबा कर रखने के प्रयास तेज कर दिए थे.

‘इस घर में रहना है तो जो मैं चाहती हूं वही करना होगा, नहीं तो अलग हो जाओ,’ रोजरोज की उन की ऐसी धमकियों से तंग आ कर संजीव और रीना ने अलग मकान लिया था.

उन की बेटी सास के हाथों अब तो और भी दुख पाएगी, रीना के मातापिता के मन के इस डर को सुमित्रा भली प्रकार समझ रही थीं.

उन के इस डर को दूर करने के लिए ही सुमित्रा ने अपनी खामोशी को तोड़ते हुए भावुक लहजे में कहा, ‘‘मेरा बेटा हमें छोड़ कर चला गया है, तो अब अपनी बहू को मैं बेटी बना कर रखूंगी. मैं ने मन ही मन कुछ फैसला लिया है जिन्हें पहली बार मैं आप सभी के सामने उजागर करूंगी.’’

आंखों से बह आए आंसुओं को पोंछती हुई सुमित्रा सब की आंखों का केंद्र बन गईं. राजेंद्रजी, समीर और रितु के हावभाव से यह साफ पता लग रहा था कि जो सुमित्रा कहने जा रही थीं, उस का अंदाजा उन्हें भी न था.

‘‘समीर की शादी होने से पहले ही रीना के लिए हम छत पर 2 कमरों का सेट तैयार करवाएंगे ताकि वह देवरानी के आने से पहले या बाद में जब चाहे अपनी रसोई अलग कर ले. इस के लिए रीना आजाद रहेगी.

‘‘अतीत में मैं ने रीना के नौकरी करने का सदा विरोध किया, पर अब मैं चाहती हूं कि वह आत्मनिर्भर बने. मेरी दिली इच्छा है कि वह बी.एड. का फार्म भरे और अपनी काबिलीयत बढ़ाए.

‘‘आप सब के सामने मैं रीना से कहती हूं कि अब से वह मुझे अपनी मां समझे. जीवन की कठिन राहों पर मजबूत कदमों से आगे बढ़ने के लिए उसे मेरा सहयोग, सहारा और आशीर्वाद सदा उपलब्ध रहेगा.’’

सुमित्रा के स्वभाव में आया बदलाव सब को हैरान कर गया. उन के मुंह से निकले शब्दों में छिपी भावुकता व ईमानदारी सभी के दिलों को छू कर उन की पलकें नम कर गईं. एक तेजतर्रार, झगड़ालू व घमंडी स्त्री का इस कदर कायाकल्प हो जाना सभी को अविश्वसनीय लग रहा था.

रीना अचानक अपनी जगह से उठी और सुमित्रा के पास आ बैठी. सास ने बांहें फैलाईं और बहू उन की छाती से लग कर सुबकने लगी.

कमरे का माहौल बड़ा भावुक और संजीदा हो गया. रीना के मातापिता व भैयाभाभी के पास अब रीना व पल्लवी के हितों पर चर्चा करने के लिए कोई कारण नहीं बचा.

क्या सुमित्रा का सचमुच कायाकल्प हुआ है? इस सवाल को अपने दिलों में समेटे सभी लोग कुछ देर बाद विदा ले कर अपनेअपने घर चले गए.

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