Download App

coronavirus: बच्चों की पढाई का रूटीन रखें बरकरार

लॉक डाउन के कारण सब घर में कैद हो कर बैठे हैं. ऑफिस बंद, स्कूल कॉलेज, जरुरत की चीजों की दुकानों के आलावा केवल जीवन सुचारु रूप से चलता रहे, वे सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं. देश के नागरिक होने के नाते हमारा भी कर्तव्य बनता है कि सरकार के इस कदम में उस का साथ दें लेकिन घर में बैठे छोटे बच्चों का क्या करें.

एक तरफ उन की उन की पढाई का हरजा हो रहा है दूसरी तरफ खाली बैठेबैठे उन के दिमाग में नईनई शरारतें सूझती हैं. मातापिता परेशान हैं. बच्चे हैं, अब उन से बड़ों की तरह उपेक्षा भी नहीं की जा सकती है कि समझदारी के साथ घर में बैठ कर बड़ों का सा आचार व्यवहार  करें.

येभी पढ़ें-#coronavirus: कोरोना वायरस के दौरान मानसिक संबलता है जरूरी

लेकिन इस का हल मातापिता ही निकलना होगा. बच्चों की दिनचर्या को ट्रैक पर लाना मातापिता का काम है. पढ़ाई का जो वक्त बरबाद हो गया है आगे नहीं होने देना है.

क्या करें

इस में दो राय नहीं कि मातापिता को अब आजकल इस बात की टेंशन नहीं कि बच्चें को स्कूल भेजने के लिए सुबह जल्दीजल्दी उन्हें नींद से जगाना है, रेडी करना है, टाइम से स्कूल भेजना ह, वो अफरातफरी नहीं, लेकिन फिर भी बच्चों की स्कूली दिनचर्या को बरकरार रखनी है

बनाएं टाइमटेबल: बच्चों का जैसे स्कूल में टाइमटेबल था. घर में उन का वैसा ही एक टाइम टेबल बनाएं. स्कूल में जैसे 30-40 मिनट का एक पीरियड होता है, वैसे ही टाइम डूरेशन के हिसाब से उन्हें पढ़ने के लिए बिठाएं.

* दिनचर्या में आए फर्क : बच्चे स्कूल के लिए सुबह 6 बजे उठते थे, तो अब बेशक उन्हें 6 बजे नहीं, पर 7 बजे तक नींद से जगा दें. जैसे पहले फ्रैश होते थे, ब्रश करते थे. नहाधो कर स्कूल के लिए तैयार होते थेर. ठीक वैसे ही घर पर रहे कर करें. अब फर्क होगा कि वे स्कूल ड्रेस में नहीं होंगे. रेडी हो कर वे सीधे अपने स्टडी रूम में जाएंगे.

ये भी पढ़ें-#coronavirus: सोशल डिस्टेंसिंग ने बूस्टर शॉट दिया

* स्कूल सा वातावरण : स्कूल में जैसे सबजक्ट वाइज पीरियड होते हैं वैसे ही बच्चे पढ़ाई करें. जो टाइमटेबल आप ने बच्चों के लिए बनाया है उसी के अनुसार पढ़ाना शुरू करें. यहांमातापिता की भूमिका टीचर की रहेगी. जैसे फस्ट पीरियड हिंदी का है तो बुक के चैप्टर के कठिन शब्दों की डिक्टेशन दें. जो वर्ड गलत हो उसे 10-10 टाइम्स लिखने के लिए बोलिये. ऐसा ही इंगलिश सब्जेक्ट के साथ कर सकते हैं. बाकी सब्जेक्ट भी टेक्सटबुक के अनुसार पढ़ा सकते हैं.

टाइम सलौट बिलकुल स्कूल के जैसा टाइट रखें. मातापिता बच्चों को समझाएं कि उन्हें अपना टाइम बिलकुल वेस्ट नहीं करना है. बताएं कि लौकडाउन के बाद स्कूल में पढ़ाई बहुत स्पीडली कराई जाएगी इसलिए उन्हें पहले से तैयार रहना है.

*पढ़ा हुआ रीशूट करें : बच्चे का रिजल्ट आ गया है, वह पास भी हो गया है लेकिन अभी भी हो सकता है बच्चा अपनी मैथ्स की बुक के कई सवाल अभी भी हल नहीं कर सकता हो. बच्चे को उन्हें रीशूट करने को कहें. इस के अलावा बच्चानेक्स्ट क्लास की अपनी मैथ्स बुक के चैप्टर इंटरनेट में देख सकता है. कुछ चैप्टर इंटरनेट की मदद से सौल्व कर सकता है ताकि स्कूल जाने से पहले वह प्रैक्टिस कर ले.

*समय न हो बरबाद रू बच्चे की पढ़ाई का समय बिलकुल खराब न होने दें- इंग्लिश हिंदी सब्जेक्ट की ग्रामर उन्हें पढ़ा सकते हैं. मैथ्स के सवाल उन्हें हल करने के लिए दें, चाहे तो इंटरनेट की मदद लें या किसी और की. बाहर की टेंशन बच्चों पर न हों. आसपास के माहौल से उन्हें दूर रखें.

ये भी पढ़ें-#coronavirus: औनलाइन एजुकेशन में इंटरनेट ही आड़े, बच्चे हैं परेशान तो करें ये काम

* छुट्टियां न मान कर चलें : स्कूल बंद हैं, स्कूल नहीं जाना तो इस का मतलब यह नहीं कि बच्चे छुट्टियों के मूड में आ जाएं कि अभी तो पढ़ाई नहीं होनी.

टाइम बिलकुल वेस्ट नहीं करना है. बच्चों का धयान पूरी तरह से पढ़ाई की तरफ लगाए रखना है. उन्हें मोटिवेट करना है कि स्कूल बंद है तो घर पर ही पढ़ाई करनी है.

* प्ले टाइम : शाम के वक्त बच्चे अपने दोस्तों के साथ खेलने जाते हैं लेकिन अब क्या करें. बाहर जाना मना है और दोस्त भी साथ नहीं. ऐसे में मातापिता ही बच्चों के दोस्त बन जाएं. उन के साथ घर में इनडोर गेम्स जैसे सांप सीढ़ी, लूडो, कैरम बोर्ड, शतरंज खेलें. दिमागी कसरत के लिएफनी ट्रिकी गेम्स खेलें जैसे तुम मेरे भाई हो, लेकिन मैं तुम्हारा भाई नहीं. हू एम आई?

उत्तर योर सिस्टर

कहां ऐसी रोड मिलेगी जिस पर व्हीकल्स न हो, ऐसा जंगल जहां पेड़ न हो और ऐसा शहर जहां घर न हो

उत्तर – ऑन  ए मैप खेलखेल में जनरल नौलिज के प्रश्न पूछ सकते हैं.

ये भी पढ़ें-#coronavirus: मिला अपनों का साथ

यानी कि बच्चों के साथ आप को बच्चा भी बनना है, उन का टीचर भी, उन का दोस्त भी बनना है और मातापिता तो आप हैं ही.

इस तरह बच्चों को नईनई एक्टीविटी कराते रहें ताकि उन का मन पढ़ाई की तरफ से डाइवर्ट न हो.

आंखों में इंद्रधनुष: भाग 1

उस की आंखों में इंद्रधनुष था. उस के जीवन में पहली बार वसंत के फूल खिले थे, पहली बार चारों तरफ बिखरे हुए रंग उस की आंखों को चटकीले, चमकदार और सुंदर लगे थे, पहली बार उसे पक्षियों की चहचहाहट मधुर लगी थी, पहली बार उस ने आमों में बौर खिलते देखे थे और रातों को उन की खुशबू अपने नथुनों में भरी थी, पहली बार उस ने कोयल को कूकते हुए सुना था और पहली बार उसे आसमान बहुत प्यारा व शीतल लगा था. अपने चारों तरफ बिखरे हुए प्रकृति के इतने सारे रूप और रंग उस ने पहली बार देखे थे और उन्हें बाहरी आंखों से ही नहीं, मन की आंखों से भी अपने अंदर भर कर उन की सुंदरता और शीतलता को महसूस किया था, क्योंकि वह जवान हो चुकी थी.

उस का मन अब पुस्तकों में नहीं लगता था. सफेद कागज पर छपे काले अक्षरों पर अब उस की निगाह नहीं टिकती थी. अब उस का मन पता नहीं कहांकहां, किन जंगलों, पर्वतपहाड़ों, रेगिस्तान, मैदानों और बीहड़ों में भटकता रहता था. उस के मन को निगाहों के रास्ते पता नहीं किस चीज की तलाश थी कि वह रातदिन बेचैन रहती थी, खोईखोई रहती थी. लोगों के टोकने पर उसे होश आता कि वह स्वयं में ही कहीं खो गई थी. उस की अवस्था पर लोग हंसते, परंतु वह तनिक भी विचलित न होती. वह खोई रहती एक ऐसी दुनिया में, जहां केवल वह थी, फूल थे, नाना प्रकार के रंग थे और आंखों को शीतलता प्रदान करने वाला खुला आसमान था.

आसमान पर उस की निगाहें टिकी रहतीं. वहां धुनी हुई रुई से सफेद बादलों के टुकड़े हलकेहलके तैरा करते. उन बादल के टुकड़ों की मंद गति उस के मन को बहुत भाती. देखतेदेखते आषाढ़ आ गया और आसमान में बादलों की घटाएं घिरने लगीं. घटाओं ने नीले आसमान को अपनी काली, घनी जुल्फों से ढक लिया. परंतु उसे बुरा न लगा क्योंकि काली घटाएं भी उस के मन को बहुत भाने लगी थीं. फिर घटाओं ने अपनी जुल्फों को लहराते हुए छोटीछोटी बूंदें प्यासी धरती के आंचल पर बिखरा दीं. बूंदों के धरती पर गिरते ही सोंधी सी खुशबू उस के नथुनों में समा गई और वह बावली सी हो गई. वह और ज्यादा भटक गई और इसी भटकन के दौरान उस ने आसमान में एक शाम को इंद्रधनुष देखा, जो इतना मोहक और सुंदर था कि वह उस इंद्रधनुष के गहरे रंगों में बहुत देर तक खोई रही और फिर उसे पता ही न चला कि धीरेधीरे वह इंद्रधनुष कब उस की आंखों में आ कर बैठ गया. आंखों में इंद्रधनुष के आते ही वह अपने में खो सी गई. उस का मन कुछ पाने की तलाश में भटकता रहा, और फिर एक दिन उस की आंखों के सात रंगों में एक और रंग आ कर बैठ गया, यह उसे बहुत भला लगा, परंतु अपनी आंखों में बसे इंद्रधनुष के कारण वह यह नहीं देख सकी कि जो नया रंग उस की आंखों में आ कर बस गया है, उस का रंग बहुत ही भद्दा और काला सा है. इस अवस्था में एक मासूम और जवान हो रही लड़की के लिए केवल रंग महत्त्वपूर्ण होते हैं. वह उन के प्रभाव से अपरिचित होती है. उसे पता नहीं चलता कि उन रंगों के साथ वह एक खतरनाक खेल खेलने जा रही है.

खैर, उस वक्त उसे वह काला रंग भी इंद्रधनुष के सात रंगों में से एक लगा… इतना मोहक, सुंदर, सुखद और प्यारा कि वह उस के रंग में रंग गई. वह काला रंग उस की आंखों के इंद्रधनुष के रंगों में इस कदर घुलमिल गया था कि वह उसे गुलाबी रंग जैसा लगता. अपनी सपनीली आंखों से जब वह उस काले रंग को देखती तो वह गुलाबी रंग बन कर उस की आंखों के रास्ते दिल में उतर जाता, क्योंकि वह स्वयं सुनहरे रंग की होती हुई भी दूसरों की निगाहों को गुलाबी रंग जैसी लगती थी. उस ने उस रंग को अपने जीवन के हर पल में सम्मिलित कर लिया था. काले रंग ने एक दिन उस से कहा, ‘‘क्या हम यों ही इंद्रधनुष देख कर अपने मन को बहलाते रहेंगे, बादलों के उमड़नेघुमड़ने से क्या हमारे मन को सुख प्राप्त हो सकेगा? बारिश की फुहारों से भीग कर क्या हम अपने मन को तृप्त करते रहेंगे? क्या यही हमारा जीवन है?’’

‘‘तो हम और क्या करें?’’ गुलाबी रंगवाली लड़की ने, जिस की आंखों में इंद्रधनुष था, उदास स्वर में कहा.

आजकल घर में उसे डांट पड़ने लगी थी. उस की उदासीभरी चुप्पी से घर वालों को उस के चरित्र के ऊपर संदेह होने लगा था और कई चौकन्नी आंखें उस के इर्दगिर्द मंडराने लगी थीं. उन सतर्क और जासूस निगाहों से उसे कोई कष्ट नहीं होता था क्योंकि उस की स्वयं की निगाहें ही इस कदर भटकी हुई थीं कि दूसरों की निगाहों को वह देख नहीं पाती थी, परंतु जब उस के आचारव्यवहार को देख कर घर वाले, विशेषकर उस की मां उसे बारबार टोकतीं, बातोंबातों में कुछ ऐसा कह देतीं कि उस के कोमल हृदय को गहरी ठेस लगती और वह कराह कर रह जाती.

उस की कराह को मम्मी नहीं सुन पातीं या सुन कर भी अनसुना कर देतीं और उसे डांटती ही चली जातीं, उस के दिल में होने वाले घावों की परवा किए बिना. तब उस को बेहद कष्ट होता, परंतु अपने दिल का हाल न वह मां को बता सकती थी न किसी और को. अपने मन की तकलीफ को वह काले रंग से भी कैसे कहती, क्योंकि वह जब भी उस से अकेले में मिलता, उस के अपने रंग होते और वह उन रंगों को चटकदार बनाने के प्रयास में लगा रहता. वह कुछ ऐसे रंगों की बात करता जो गुलाबी रंगवाली लड़की के रंगों से मेल नहीं खाते थे.

‘‘प्यार के कुछ रंग हम अपने जीवन में भी भर लें, तो…’’ काले रंग ने उसे अपनी जद में लेते हुए कहा.

‘‘वे तो हमारे जीवन में हैं, इतने सारे रंग, जो चारों तरफ बिखरे पड़े हैं, मेरी आंखों में बस गए हैं, वे सब प्यार के ही तो रंग हैं जिन के सहारे हम जी रहे हैं,’’ उस ने भोलेपन से कहा. वह सचमुच भोली थी, क्योंकि उस का रंग गुलाबी था और गुलाबी रंग प्यार का प्रतीक होता है. इस रंग में छलकपट नहीं होता. परंतु काला रंग बहुत शातिर, चतुर और चालाक था. उसे पता था कि गुलाबी रंग को किस प्रकार मटियामेट कर के काला बनाया जा सकता है. ‘‘तुम बहुत भोली हो,’’ काले रंग ने उस के ऊपर घटाओं की तरह छाते हुए कहा. उस ने उस का हाथ पकड़ लिया और अपने सीने पर रखते हुए आगे कहा, ‘‘इतने सारे रंग जो प्रकृति में चारों तरफ बिखरे पड़े हैं, इन्हें देख कर हम अपने मन को संतोषभरा सुख प्रदान कर सकते हैं, परंतु हमारे तन को सुख देने वाले रंग कुछ और ही होते हैं.’’

क्या करूं कि बीवी का व्यवहार बदले और हम दोनों सहवास का पूरा आनंद उठा सकें?

सवाल

मैं विवाहित युवक हूं. अपनी बीवी की एक असंगत समस्या से परेशान हूं. जब भी रात को हम सहवास करने के लिए बिस्तर पर जाते हैं, तो पत्नी पूछती है कि करोगे क्या? उठो करो. इस से मैं खीज जाता हूं कि न कोई फोरप्ले, न कोई उत्साह. कृपया बताएं कि क्या करूं कि बीवी अपना व्यवहार बदले और हम दोनों सहवास का पूरापूरा आनंद उठा सकें?

जवाब

आप अपनी पत्नी को समझाएं कि सहवास अन्य दैनिक कार्यों से अलग क्रिया है. यह वह कार्य नहीं है जिसे झटपट निबटा लिया जाए. इस में तन के साथ साथ मन से भी सक्रिय होना होता है, इसलिए हड़बड़ी न मचाए. सहवास में प्रवृत्त होने से पहले स्पर्श, आलिंगन, चुंबन आदि रतिक्रीड़ाएं करनी चाहिए. इस से मजा दोगुना हो जाता है. यदि आप पत्नी को प्यार से समझाएंगे तो वह आप की बात पर जरूर गौर करेगी. उस के बाद सहवास दोनों के लिए रुचिकर हो जाएगा.

सवाल

मैं 1 साल से एक लड़के से प्यार करती हूं. वह भी मुझे बेहद चाहता है. हमेशा मेरी इच्छाओं का सम्मान करता है. ऐसा कोई काम नहीं करता जो मुझे नागवार गुजरता हो. मगर अब कुछ दिनों से वह शारीरिक संबंध बनाने को कह रहा है पर साथ ही यह भी कहता है कि यदि तुम्हारी मरजी हो तो. मैं ने उस से कहा कि ऐसा करने से यदि मुझे गर्भ ठहर गया तो क्या होगा? इस पर उस का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं होगा. कृपया राय दें कि मुझे क्या करना चाहिए? जवाब

जवाब

दोस्ती में एकदूसरे की इच्छाओं को तवज्जो देना जरूरी होता है. तभी दोस्ती कायम रहती है. इस के अलावा आप का बौयफ्रैंड अभी आप का विश्वास जीतने के लिए भी ऐसा कर रहा है. जहां तक शारीरिक संबंधों को ले कर आप की आशंका है तो वह पूरी तरह सही है. यदि आप संबंध बनाती हैं तो गर्भ ठहर सकता है, इसलिए शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने से हर हाल में बचना चाहिए.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

#coronavirus: आंखों में इंद्रधनुष: भाग 3

संसार में बहुत सारे रंग होते हैं और ये सारे रंग सभी को खुशियां प्रदान करते हैं. परंतु कभीकभी कुछ रंग किसी के जीवन में कष्ट और आंखों में आंसू भर जाते हैं. वह काला रंग, जिस ने उस की आंखों से इंद्रधनुष के सारे रंग चुरा लिए थे और उस के बदन के खिले हुए फूलों को तोड़ कर मसल दिया था, आजकल कहीं नजर नहीं आता था. वह उस से मिलने के लिए बेताब थी. बेकरारी से उस से मिलने के लिए निर्धारित स्थल पर इंतजार करती, परंतु वह न आता. वह निराश हो जाती और हताश हो कर घर वापस लौट आती. वह उस की गली में भी कई बार गई परंतु वह एक बार भी अपने कमरे पर नहीं मिला. पड़ोस में किसी से पूछने का साहस वह न कर पाई. फोन पर भी वह नहीं मिलता था. अकसर उस का फोन बंद मिलता, कभी अगर मिल जाता तो बहाना बना देता कि काम के सिलसिले में कुछ अधिक व्यस्त है, खाली होते ही मिलेगा और वह उसे स्वयं ही फोन कर लेगा, वह परेशान न हो.

परंतु वह परेशान क्यों न होती. काले रंग ने उस के लिए परेशान होने के बहुत सारे रास्ते खोल दिए थे. वह उन रास्तों से गुजरने के लिए बाध्य थी. उस के शरीर में व्याप्त काला रंग अपना आकार बढ़ाता जा रहा था. वह इतना ज्यादा चिंतित रहने लगी थी कि उस की सुंदर काली आंखों के नीचे काले घेरे पड़ने लगे थे, चेहरा मुरझाने लगा था, होंठ सूख कर पपडि़यां बन गए थे, जैसे पूरे चेहरे पर किसी ने बहुत सारी बर्फ डाल दी हो. उस की यह स्थिति देख कर उस के घर के लोगों के चेहरों के रंग भी बदल गए थे. उस की निगाह उन लोगों की तरफ नहीं उठ पाती थी, परंतु जब भी उठती तो उसे अपने ही परिजनों के चेहरों पर इतने सारे रंग नजर आते कि वह डर जाती… उन सभी की आंखों में घृणा, क्रोध, आक्रोश, वितृष्णा, तिरस्कार और अविश्वास के गहरे रंग भरे हुए थे और ये सभी रंग उस से एक ही प्रश्न बारबार पूछ रहे थे, ‘क्या हुआ है तुम्हारे साथ? क्या कर डाला है तुम ने? इतना सारा काला रंग कहां से ले आई हो कि हम सब का दम घुटने लगा है. कुछ बताओ तो सही.’ परंतु वह कुछ न बता पाती. किसी भी प्रश्न का उत्तर देने का साहस उस के पास नहीं था. उस ने जो किया था, वह किसी भी तरह क्षम्य नहीं था.

वह एक संपन्न, सुशिक्षित, सुसंस्कृत और सभ्य परिवार था. उस परिवार के लोग भयभीत थे, इस बात से नहीं कि उस के घर के गुलाबी रंग ने अपने ऊपर बहुत सारा काला रंग डाल लिया था और उस ने इस कदर इस रंग को ओढ़ रखा था कि उस का प्राकृतिक गुलाबी रंग कहीं खो गया था. काले रंग के अलावा कोई और रंग उस में नजर भी नहीं आता था. वे इस बात से डर रहे थे कि अगर यह काला रंग घर के बाहर फैल गया तो समाज में किस प्रकार अपना मुंह दिखाएंगे और किस प्रकार अपने सिर को ऊंचा कर के चल सकेंगे. किसी भी परिवार के लिए ऐसे क्षण आत्मघाती होते हैं.

स्थिति दयनीय ही नहीं, भयावह भी थी. सब को किसी न किसी दिन एक विस्फोट की प्रतीक्षा थी. कब होगा यह विस्फोट, कोई नहीं जानता था. विस्फोट हो जाता तो उस के प्रभाव से होने वाले नुकसान का अंदाजा लगाया जा सकता था, परंतु यहां तो सभीकुछ अनिश्चित सा था और अनिश्चय की घडि़यां बहुत कष्टदायी होती हैं. कुछ न कुछ तो करना ही होगा. यों डरेसहमे से, आंखों में संदेह के बादलों का गांव बसा कर किस तरह जिया जा सकता था. उस घर के 3 रंगों-लाल, पीले और हरे ने आपस में सलाह की. नीला रंग अभी छोटा था और वह बहुत सारी चिंताओं से मुक्त था, सो उसे चर्चा में सम्मिलित नहीं किया गया. लाल रंग गुस्सैल स्वभाव का था. उस ने कड़क कर कहा, ‘‘मैं अभी उस की हड्डीपसली तोड़ कर एक कर देता हूं. पूछता हूं कि कौन है वह, जिस के साथ उस ने अपना मुंह काला किया है.’’

‘‘यह कोई समस्या का समाधान नहीं है. इस से बात बिगड़ सकती है और बाहर तक जा सकती है. मैं उस से बात करती हूं,’’ पीले रंग वाली स्त्री ने शांत भाव से कहा. ‘‘मुझे बस एक बार पता चल जाए कि वह कौन कमीना रंग है जिस ने हमारे घर के रंग के साथ काले रंग से होली खेली है, उस को चलनेफिरने लायक नहीं छोड़ूंगा,’’ हरे रंग ने अपनी युवावस्था के जोश में कहा. ‘‘तुम अपने हथियारों को संभाल कर रखो. उन से बाद में काम लेना. अभी तो हमें अहिंसा के साथ मामले को सुलझाने का प्रयास करना है, जब बात नहीं बनेगी तो आप दोनों को कमान सौंप दूंगी.’’ और अंत में, पीले रंगवाली स्त्री ने कमान अपने हाथ में संभाल ली. वह परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए कमर कस कर गुलाबी रंग वाली लड़की, जो उस की बेटी थी, के कमरे में जा पहुंची.

गुलाबी रंग वाली लड़की काले रंग के प्रभाव और चिंता में स्वयं बहुत पीली हो गई थी, जैसे पीलिया की रोगी हो. उस की अधिकतर दिनचर्या उस के कमरे और बिस्तर तक ही सीमित हो कर रह गई थी. उस ने पीले रंग को कमरे में आते देखा तो उस का रंग और अधिक पीला हो गया. वह हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई और अनायास उस के मुख से निकला, ‘‘आप?’’ उस की आंखें हैरत से फट सी गई थीं. ‘‘हां, मैं? क्या मैं तुम्हारे कमरे में नहीं आ सकती?’’ पीले रंग ने कठोर स्वर में कहा. वह सच का सामना करने आई थी और आज उसे किसी भी तरह गुलाबी रंग से सच उगलवाना था. सच प्रकट नहीं होगा तो अनिश्चय की स्थिति में सभी लोग घुलते हुए भयंकर रोगी बन जाएंगे.

गुलाबी रंग की आंखों में भय की परत और अधिक गहरी हो गई. पीला रंग पलंग पर बैठ गया, ‘‘बैठो न, तुम से कुछ बातें करनी हैं.’’ वह बैठ गई, नीची निगाहें, हृदय में असामान्य धड़कन, शरीर में अजीब सी सनसनी भरा कंपन…पता नहीं आज क्या होने वाला है? उस ने इस दिन की कल्पना कभी नहीं की थी, तब भी नहीं जब उस ने अपनी आंखों में इंद्रधनुष के रंग भरने शुरू किए थे और तब भी नही, जब काला रंग उस के जीवन के रंगों के साथ घुलने लगा था और तब भी नहीं जब काले रंग ने मीठीमीठी बातों के रंग उस के ऊपर बिखरा कर उसे मदहोश कर दिया था और उस के कोमल बदन के सारे फूल चुरा लिए थे. वह एक वीरान बगीचे के समान हो गई थी, जहां से अभीअभी पतझड़ गुजर कर गया था.

पीले रंग के चेहरे के भाव और उस के स्वर की कठोरता ने गुलाबी रंग पर यह स्पष्ट कर दिया था कि आज हर प्रकार की ऊहापोह और अविश्वास की डोर कटने वाली थी, अनिश्चय का अंत होने वाला था. आज हर वह बात खुल जाएगी, जिसे उस ने अभी तक अपने हृदय की तमाम परतों के भीतर छिपा रखा था. उस ने भले ही बहुत सारे रहस्य अपने बदन की परतों के अंदर छिपा रखे हों, परंतु उस के बदन में होने वाले बाहरी परिवर्तनों ने बहुत सारे रहस्यों को सुबह की रोशनी की तरह स्पष्ट कर दिया था. सब की धुंधलाई आंखों में चमक आ गई थी. वह डरतेसहमते पीले रंग के पास बैठ गई. आज उसे उस के पास बैठते हुए डर लग रहा था. वह इसी रंग की कोख से पैदा हुई थी, उस के आंचल का दूध पिया था और उस की बांहों में झूलते हुए लोरियों को सुना था. बचपन से ले कर जवान होने तक बहुत सारी बातों को दोनों ने साथ जिया था, परंतु आज इस अनहोनी बात से मांबेटी के बीच की दूरियां बढ़ गई थीं. वे एकदूसरे से अपरिचित हो गई थीं.

मां फिर भी मां होती है. पीले रंग ने उस का सिर सांत्वना देने वाले भाव से सहलाया. गुलाबी रंग कांप गया. पीले रंग का स्थिर स्वर उभरा, ‘‘घबराओ मत, सबकुछ साफसाफ बता दो. अब छिपाने से कोई फायदा नहीं है. घर के सभी लोगों को तुम्हारी स्थिति का आभास है, परंतु हम तुम्हारे मुंह से सुनना चाहते हैं कि यह सब कैसे हुआ? क्या किसी ने जोरजबरदस्ती की है तुम्हारे साथ या तुम ने पूरी समझदारी को ताक पर रख कर यह कालिख अपने मुंह पर पोत ली है और अब यह कालिख तुम्हारे पेट में फैल कर बड़ी हो रही है.’’

गुलाबी रंग का बदन कांपने लगा. उस के मन में बहुत सारे चित्र उभरने लगे, जैसे मन के परदे पर बाइस्कोप चल रहा हो. इन विभिन्न चित्रों के रंग उसे और ज्यादा डराने लगे और उस ने एक निरीह चिडि़या, जो बाज के पंजों में फंसी हो, की तरह पीले रंग की आंखों में देखा. पीले रंग वाली स्त्री उस की भयभीत आंखों की बेबसी और लाचारी देख कर पिघल गई और उस ने सिसकते हुए गुलाबी रंग को अपने अंक में समेट लिया. इस के बाद कमरे में केवल करुण कं्रदन का दिल दहला देने वाला स्वर भर गया और पता नहीं चल रहा था कि दोनों महिलाएं एकसाथ इतने सुर, लय और ताल में किस प्रकार रो सकती थीं कि दोनों का स्वर एकजैसा लगे. यह संभव भी था क्येंकि वे दोनों नारियां थीं और सब से बड़ी बात यह थी कि वे दोनों आपस में मांबेटी थीं. वे एकदूसरे के दर्द को बिना किसी शब्द और स्वर के भी तीव्रता के साथ महसूस कर सकती थीं.

‘‘मम्मी, मुझे माफ कर दो. रंगों की चकाचौंध में मैं भटक गई थी. मुझे पता नहीं था कि जीवन के कुछ रंग चमकीले और लुभावने होने के साथसाथ जहरीले भी होते हैं. यौवन के उसी एक रंग ने मुझ में जहर घोल दिया और मैं उसे जीवन का अद्भुत सुख समझ कर जीती रही. जीवन में ऐसी खुशियां भरती रही, जो बाद में मुझे दुख देने वाली थीं.’’ ‘‘जवानी के रंगों के बीच भटक कर लड़कियां जो जहर पीती हैं, वह उन के मुंह पर ही कालिख नहीं पोतता, बल्कि उस के घरपरिवार के ऊपर भी एक बदनुमा दाग छोड़ जाता है. खैर, इन सब बातों पर चर्चा करने का यह उचित समय नहीं है. यह बताओ, वह कौन है, कहां रहता है और क्या करता है?’’ ‘‘पहले मैं ने उस के बारे में अधिक कुछ जानने का प्रयास नहीं किया था. मेरी आंखों में इतने सारे रंग भरे हुए थे कि वह मुझे हर कोण से सुंदर, शिक्षित, सभ्य और सुसंस्कृत लगा, परंतु जब रंग फीके पड़ने लगे और मेरी आंखों के ऊपर से परदे उठे तो पता चला कि वह एक ऐसा युवक था, जिस का कोई सामाजिक या आर्थिक आधार नहीं था. वह एक कंपनी का साधारण सा सेल्समैन है और शहर की एक गंदी बस्ती के एक छोटे से कमरे में किराए पर रहता है.’’

पीले रंग वाली स्त्री यह सुन कर और ज्यादा पीली पड़ गई, परंतु मुसीबत की इस घड़ी में उसे अपने धैर्य को बचाए रखना था. वह मां थी और बेटी के जीवन की सुरक्षा के लिए उसे हर संभव उपाय करने थे, वरना कलंक का अमिट धब्बा उस की बेटी के माथे पर सदा के लिए चिपक कर रह जाता. तब उसे धोना असंभव हो जाता. उस ने पूछा, ‘‘क्या वह तुम से ब्याह करने के लिए राजी है?’’ गुलाबी रंग की आंखों में अविश्वास के रंग तैर गए, ‘‘पता नहीं, कई दिनों से वह मुझ से कतराने लगा है. फोन पर बात नहीं करता. कभी बात हो भी जाए तो मिलने नहीं आता. काम का बहाना बना देता है.’’

‘‘तब तो मुश्किल है,’’ वह चिंतित हो उठी.

‘‘क्या मुश्किल है?’’ बेटी का शरीर फिर कांपने लगा.

‘‘तुम दोनों का मिलन…तुम्हारा कलंक मिटाने के लिए मैं उस साधारण युवक से भी तुम्हारी शादी कर देती, परंतु लगता है कि उस के मन में पहले से ही छल था. वह तुम्हारे यौवन और सौंदर्य का रसपान करना चाहता था. वह उसे प्राप्त हो गया, तो अब तुम से दूर हो गया. जो लड़कियां जवानी में अपनी आंखों में प्रेम का इंद्रधनुष बसा लेती हैं उन की आंखों और बदन के रंगों को चुराने के लिए मानवरूपी दैत्य राजकुमार का भेष बना कर यौवन से भरपूर राजकुमारियों को प्रेम के जादू से अपने वश में कर के उन के सतीत्व का धन छीन कर उन के दीप्त यौवन का रसपान करते हैं. तुम जानेअनजाने, एक दैत्य की कुटिल चालों के जाल में फंस गईं और अपना सबकुछ लुटा बैठीं. इस गलती की सजा केवल तुम्हें ही नहीं, हमें भी जीवनभर भुगतनी पड़ेगी.’’ ‘‘काश, मैं उसे पहचान पाती,’’ गुलाबी रंग ने अफसोस जताते हुए कहा. परंतु अब अफसोस करने से भी क्या फायदा था? जवानी में कोई भी विवेक से काम नहीं लेता.

‘‘गलती हमारी भी है. हर जवान हो रही बेटी की मां को इतना ध्यान रखना ही चाहिए कि जवानी में उस की बेटी के कदम बहक सकते हैं. सचेत रह कर मुझे तुम्हारी हर गतिविधि का ध्यान रखना चाहिए था. तुम्हारी आंखों में गलत रंग भरते, इस के पहले ही अगर हमें पता चल जाता…’’ मां भी अफसोस करने लगीं.

गुलाबी रंग चुप.

‘‘तुम ने उस का कमरा देखा है?’’

‘‘हां.’’

‘‘तो चलो.’’

उन्हें विश्वास नहीं था, फिर भी अविश्वास की घड़ी में मनुष्य विश्वास का दामन नहीं छोड़ता. वे उस काले रंग के कमरे पर गईं. वहां जा कर पता चला कि वह उस कमरे में अकेला रहता था. कहीं बाहर का रहने वाला था और अब उसे छोड़ कर पता नहीं कहां चला गया था. किसी को भी उस के गांव का पता नहीं मालूम था और न यही मालूम था कि वह कहां गया था. मकानमालिक को भी उस ने कुछ नहीं बताया था. अब तो उस का फोन नियमित रूप से बंद था. काले रंग की मंशा का पता चल गया था. लड़कियां जब अपनी आंखों में इंद्रधनुष के रंग भरती हैं तो रंगों की चकाचौंध में वे उन के पीछे छिपे काले रंग को नहीं देख पाती हैं. काश, वह देख पाती तो उस की आंखों में इंद्रधनुष के रंगों की जगह केवल आंसू न होते.

 

 

#coronavirus: करो ना क्रांति 

आज़ादी का दिन जब पहली बार आयोजित किया गया होगा, कितना उल्लास रहा होगा हर भारतीय के मन में. परन्तु आज आज़ादी के ७० वर्ष बाद यह कोरोना का लौकडाउन महज़ छुट्टी का एक दिन भर रह गया हैं. पुरुष पूरा दिन आदेश देने में व्यतीत करते हैं और स्त्रियाँ उसे पूरा करने में. प्रकृति ने भी स्त्री और पुरुष की रचना करते समय अंतर किया था. सारी पीड़ा तो स्त्री के हिस्सें मे डाल दी और पुरुष को दे दिया कठोर संवेदनहीन दिल. स्त्रियाँ तो १५ अगस्त १९४७ के पूर्व भी पराधीन थीं, और आज भी हैं. स्त्रियाँ भी अपनी इस दशा के लिए कम उत्तरदायी नहीं हैं क्योंकि पराधीनता को अपनी नियति मान स्वीकार भी तो उन्होंने ही किया है, शायद धर्म के धुरंधर प्रचार के कारण.

“भाभी हल्वे में चीनी कितनी डालूँ ?” विराज के तेज़ी से दोड़ते सोच के घोड़ों को अदिति की आवाज़ के चाबुक ने लगाम लगा कर रोक दिया था.जमीनी हकीकत जानते हुए भी, पता नहीं क्यों उसके मन के भीतर सोयी हुई एक्टिविस्ट गाहे-बगाहे जाग उठती थी.अमर की आदेशों की लिस्ट लंबी होती जा रही थी. घर के काम में उसकी सहायता के लिये आने वाली बाई विमला को भी संक्रमण के खतरे की वजह से उसने छुट्टी दे दी थी. पता नहीं वह कैसे गुजारा कर रही होगी. कहा भी था कि उसे घर पर ही रहने दें, कुछ आराम हो जाएगा और उसको वेतन भी दिया जा सकेगा.
ये भी पढ़ें-लमहों ने खता की थी: भाग 1
इन्हें ही लगा थाकि न जाने कहां से कोरोना लें आई हो. मेरी एक नहीं चली. सब ने कहा कि वे खुद काम कर लेंगे. पर अब घर के सभी कामों की जिम्मेदारी विराज और उसकी ननद अदिति के ऊपर आ गयी थी. अदिति दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रैजुवेशन कर रही थी. विराज का प्रयास था कि अदिति पर भी कम से कम काम का दबाव पड़े. इसलिये वो अधिकतर काम स्वयं ही निबटा ले रही थी. उसके दोनों बच्चें १० साल की आन्या और १२ साल का मानव अपने कमरे में वीडियो गेम खेलने में व्यस्त थे. पति अमर अपने कमरे में अधलेटे हुए चाय की चुस्कियां ले रहे थें.
अचानक वहीं से चीख कर बोलें,“सुनो आज नेटफलिक्स पर एक नयी फिल्म आयी है. सब साथ ही देखेंगे.” फिर थोड़ा रुककर बोलें, “ये तुम्हारे बच्चें इतना शोर क्यों कर रहे हैं? देखो जरा !”अन्य दिन तो वर्क फ्रौम होम होता था तो फिर भी अमर समय पर नहा लिया करते थें. लेकिन शनिवार होने के कारण महाशय छुट्टी मोड में चले गये थें. बच्चों की तो खैर, छुट्टियाँ ही थी. “बाबू साहेब सुबह से लेटे-लेटे हुक्म दे रहे हैं. मैं घर के रोजमर्या के कार्यों के साथ बढ़े हुये कामों को भी निबटाने में लगी हूँ, यह नहीं दिख रहा हैं जनाब को. जब कुछ गलत करे तो बच्चें मेरे, परन्तु जब यही बच्चें कुछ अच्छा करते हैं, तो इनके हो जाते हैं.”
सोच तो इतना कुछ लिया विराज ने परन्तु प्रत्यक्ष में इतना भर कह पाई, “जी, बस अभी देखती हूँ.”
सभी काम निबटाने में बारह बज गये थें. पूरा परिवार फिल्म देखने बैठ गया. विराज ने सोचा थोड़ा सुस्ता ले, तभी अमर की आवाज कानों में पड़ी. “अरे विराज कहाँ हो भई?”“थोड़ा थक गयी थी. सोचा लेट लेती हूँ !” विराज अनमनी सी हो गयी थी. “अरे इतनी मुश्किल से तो फैमिली टाइम मिला है. उसमें भी इन्हें सोना है !”
अमर की बात सुनकर विराज को ऐसा मालूम हुआ जैसे गुस्से की एक लहर तनबदन में रेंग गयी हो. मन में आया कि कह दे, “फॅमिली टाइम या पैर फैलाकर ऑर्डर देने का टाइम.” वैसे आम दिनों में भी अमर घर का कोई काम नहीं करते थें. लेकिन विमला और अदिति की सहायता से काम हो जाता था. फिर विराज को थोड़ा मी टाइम भी तो मिल जाया करता था. लेकिन अब तो विराज के पास दो घड़ी बैठकर चाय पीने का भी समय नहीं था.
“अरे कहाँ रह गयी !?” अमर ने जब दुबारा बुलाया विराज को मन मारकर जाना ही पड़ा. फिल्म वाकई में अच्छी थी. विराज को भी अच्छा लग रहा था कि पूरा परिवार एक साथ बैठा था. तभी अचानक अमर ने फरमान सुनाया, “विराज पकोड़े बना लो. फिल्म के साथ सभी को मजा आ जायेगा.”“सभी को या तुम्हें !” विराज के इस अचानक पूछे गये प्रश्न पर अमर चौंक गया था. फिर थोड़ा गुस्से में बोला, “मैं तो सभी के लिये कह रहा था. तुम्हारा मन नहीं तो मत बनाओ.”
“मम्मी प्लीज” अब तो बच्चें भी चिल्लाने लगे थें. विराज उठ कर रसोई में चली गयी थी.
थोड़ी देर बाद अदिति को वहाँ बैठी देखकर, अमर बोल पड़े थे,” अरे तुम कहाँ  बैठ रही हो, अंदर रसोई में जाओ भाभी के साथ.”अदिति के चेहरे पर एक पल की झेंप को पहचान लिया था विराज ने. दोनों की नज़रें मिली और हालें दिल बयां हो गया था. विराज ने इशारे से अदिति को अंदर बुला लिया था.
अंदर रसोई में भी कुर्सियां लगी हुई थी, उनमें से एक पर अदिति को बैठने का इशारा करके विराज ने अपना सारा ध्यान गैस पर रखी हुई कढ़ाई पर लगा दिया था.
“कितनी गर्मी हैं आज!” अदिति ने बात शुरू करने के लिए यह जुमला कहा था शायद.
“हमम! चाहो तो वापस कमरे में जाकर बैठ जाओ, वहां तो ए सी लगा है.”
“नही-नहीं, मैं ठीक हूँ.”“भाभी आपको क्या लगता है, यह लॉकडाउन कब तक रहेगा?” अदिति फिर बोली थी.“देखो कब तक चलता है ! बस देश में सब ठीक रहें !” विराज ने दार्शनिक के अंदाज़ में कहा.
“भाभी मुझे आपके साथ बातें करना बहुत पसंद है.” अदिति ने बात बदल दी थी.
“आजकल हमें समय भी बहुत मिल रहा है. तुम्हारे साथ कितनी विषयों पर बातें हो जाती हैं” विराज ने उसकी बात का अनुमोदन किया था.“आप तो मेरी प्यारी भाभी है !” अदिति ने पीछे से विराज को अपने अंक में भर कर कहा था. “इसी बात पर मेरी तरफ से तुम्हें ट्रीट.” विराज ने मुस्कुराते हुए कहा.
“क्या मिलेगा ट्रीट में ?” अदिति ने पूछा था.“तुम पहले ये पकौड़े दे आओ. खाना तो तैयार ही है. तुम्हें अच्छी सी चाय पिलाती हूँ?”“भाभी आप चाय लेकर बालकोनी में चलो, मैं पकोड़े देकर आती हूँ.” अदिति ने बड़े प्यार से विराज को कहा था.
“लॉकडाउन में भी इन्हें पाँच दिन का काम और दो दिन की छुट्टी मिल रही है, परन्तु हमें कब मिलती हैं छुट्टी? यदि कुछ कहूँगी तो एक ही उत्तर मिलेगा, तुम तो सारा दिन घर में आराम ही करती हो. हमें तो बड़ी मुश्किल से छुट्टियाँ मिलती हैं. उस समय दिल करता हैं की कह दूँ, यह आराम एक दिन के लिए तुम भी लेकर देखो .” “तो कहती क्यों नहीं ?” विराज को पता ही नहीं चला था कि कब उसके मन की आवाज जबान से निकलने लगी थी. अदिति ने सब सुन लिया था. उसके प्रश्न का उत्तर सोचने में विराज को समय लगा. अदिति भी पास आकर बैठ गयी और अपना प्रश्न दोहरा दिया था. इस बार विराज बोली थी.
“अब बात तो उनकी भी पूरी तरह से गलत नहीं हैं. ऑफिस में परेशानी तो कई तरह की होती ही हैं.” अब विराज का स्वर बदल गया था.
“पुरुषों से अपने कार्य के लिए सम्मान की अपेक्षा हम तभी कर सकते हैं जब स्वयं हम अपने कार्य को सम्मानित महसूस करे.” अदिति की आँखों में चमक थी. “हमारे कार्य का कोई आर्थिक महत्व नहीं हैं, सम्मान इस दुनिया में द्रव्य सम्बन्धी हैं.” विराज ने एक आह भरकर अपनी बात रखी थी.
“मैं ऐसा नहीं मानती. कामकाजी स्त्रियों को कौन सा सम्मान ज्यादा मिल जाता हैं? घर आकर उन्हें भी चूल्हा-चौकी की इस आग में जलना ही पड़ता हैं. बाहर से थक कर दोनों ही आते हैं, परन्तु पुरुष के हिस्से आती हैं टीवी का रिमोट और सोफे का आराम. स्त्री के हिस्से आती हैं रसोई और बच्चों की पढाई.” अदिति ने उसकी इस बात का खंडन किया था.
विराज उनकी बातों को अनमने भाव से सुन रही थी कि अनायास ही नीचे की फ्लैट से आ रही एक स्त्री की आवाज ने उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया था. विराज उसे नहीं जानती थी. कभी मिलने का समय ही नहीं मिल पाया था. वो और उसके पति दोनों ही इंजीनियर थें. कभी-कभी बालकोनी से उनके मध्य एक मुस्कान का आदान-प्रदान हो जाया करता था.
वो किसी से फोन पर बात कर रही थी-“मेरी राय में इसमें मर्दों से ज्यादा औरतों की गलती हैं. दोष पुरुष पर डाल कर औरत अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती. बचपन से मर्द को यह बताया जाता हैं की तेरे सारे काम करने के लिए घर में एक स्त्री हैं. उसकी परवरिश ही ऐसी होती हैं की वो स्वभाववश ही आराम पसंद हो जाता हैं. कभी माँ, कभी बहन, कभी बीवी बन कर हम औरतें ही उन्हें आलसी बना देती हैं. अब जब मर्द को यह पता हो की, घर में औरत हैं उसका काम करने को तो फिर वो क्यों अपने शरीर को कष्ट देगा. आराम किसे बुरा लगता हैं? इसलिए वो तो काम नहीं करेगा, तुझे काम करवाना पड़ेगा. उसे समझाने से पहले तुझे खुद समझना होगा की तू भी इन्सान हैं और तुझे भी आराम की उतनी ही जरुरत हैं. तुझे क्या लगता हैं रवि  हमेशा से घर के काम में मेरी मदद करता था ! नहीं, उसे खाना बनाना मैंने सिखाया हैं. अब देख मुझे से भी अच्छी खीर बनाता है. चल अब फ़ोन रखती हूँ, रवि बुला रहा है.”
फ़ोन रख कर न मालूम किस भावना के वशीभूत होकर उसने ऊपर देखा. वहाँ दो जोड़ी आँखों को अपनी ओर घूरता पाया. उन आँखों में इर्ष्या और सम्मान का भाव एक साथ मौजूद था. इर्ष्या इसलिए कि जो बात वे अभी तक सोच भी नहीं पाई थी, उसे वो इतने अच्छे से समझ गयी थी. सम्मान इसलिए कि न केवल समझी थी अपितु अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन भी ले आई थी.उन दोनो की खामोशी ने एक दूसरे से संवाद कर लिया, और एक छोटी सी चिंगारी उसकी आँखों से विराज की आँखों में प्रवेश कर गयी थी. बिना किसी शोर के एक मूक क्रांति का जन्म हुआ था.वो अंदर चली गयी थी. अदिति और विराज दोनों चुप थें.
“मध्यम वर्ग की सोच में बदलाव एक क्रांति ही ला सकती हैं.” अदिति ने चुप्पी तोड़ी थी.“तब तक …” विराज ने प्रश्न ऐसे पूछा था जैसे उत्तर उसे पहले से पता हो.“जो जैसे चल रहा है, वैसे ही चलता रहेगा.” अदिति जैसे स्वयं को समझा रही थी.उसकी बात सुनकर विराज एक मुस्कान के साथ बोली, “ बात किसी वर्ग की नहीं हैं. बात सिर्फ इतनी है कि, जो तू कहता है, बात सही लगती हैं; पर वो मेरे नहीं तेरे होठों पर सजती है.”“आप कहना क्या चाहती हैं !?” अदिति के स्वर में उत्सुकता थी.
“समाज में सकारात्मक परिवर्तन के हम सभी पक्षधर हैं. परन्तु पहला कदम उठाने से डरते हैं.  बदलाव केवल क्रांति ही ला सकती हैं, यह एक भ्रान्ति हैं. आत्मविश्वास के साथ बढे हुए छोटे-छोटे कदम भी परिवर्तन ला सकते हैं.” “जैसे की …” अदिति को विराज की बातों ने जैसे सम्मोहित कर लिया था.
“बच्चों को खाने के लिए बुला लेते हैं.” विराज ने अनायास ही बातों का रुख बदल दिया.
दोनों ही वर्तमान में लौट आये थें.“हाँ, मैं आन्या को बुला लाती हूँ. खाना लगाने में मदद कर देगी.”
“क्यों?” विराज ने अदिति की तरफ बिना देखे पूछ लिया था.??? अदिति के चेहरे पर प्रश्न था.
“मानव क्या करेगा ? पुरुष होने की उत्कृष्टता का लाभ लेगा ! बदलाव अपनी परवरिश में लाना होगा. अपने बेटों को हुक्म देने वाला नहीं, साथ देने वाला पुरुष बनाना होगा, और अपनी बेटियों को गलत का विरोध करना सिखाना होगा. तुम समझ रही हो ना !?”
विराज के इन शब्दों ने जैसे अदिति पर जादू कर दिया था. पहला कदम लेना उतना मुश्किल भी नहीं था.
“भाभी, मैं अभी मानव और आन्या को बुला कर लाती हूँ. आज उन्हें मेज़ पर खाना लगाना सिखाते हैं” लगभग उछलती हुई अदिति अंदर की तरफ चली गयी थी. कुछ सोचकर विराज भी उस तरफ चल दी थी, आखिर बड़े बच्चे को भी तो उसका नया पाठ समझाना था.
जब विराज बैठक में पहुंची तो अमर किसी से फोन पर बात कर रहे थें. टी वी बंद था. बच्चें भी अपने कमरे में जा चुके थें. अमर की स्त्री स्वतंत्रता और सशक्तिकरण पर चर्चा अभी-अभी समाप्त हुई थी. पुरुष बॉस और स्त्री बॉस में कौन ज्यादा प्रभावी होता हैं; इस प्रिय विषय पर वाद-विवाद कई घंटों तक चला था. स्त्रियों की मानसिक क्षमता का भी आंकलन हो चुका था. अभी शेरों-शायरी का दौर जारी था और श्रीमान अमर जी एक शेर सुना रहे थें.
“एक उम्र गुजार दी तेरे शहर में, अजनबी हम आज भी हैं.तेरी ख्वाहिशों के नीचे, मेरे दम तोड़तें ख्वाब आज भी हैं….”अमर ने अपनी पंक्तियाँ अभी समाप्त ही की थी की विराज ने उन्ही पंक्तियों के साथ अपने शब्द जोड़ दिए थें …. “तेरे दर्वाज़ाऐ क़ल्ब पर दस्तक देते मेरे हाँथों को देखा हैं कभी
तेरी गर्म रोटी की चाह में झुलसे मेरे हाथ तब भी थे और आज भी हैं …”
अमर चौंक कर पलट गये थें. अपने स्वप्न में भी विराज से इस तरह के व्यवहार की उम्मीद उन्होंने नहीं की थी. उन्होंने कंधे उचका कर विराज से कारण पूछा. बेपरवाह विराज ने उनके कान पर से फोन हटाया और कॉल काट दी. कमरे में तूफान के बाद वाली शांति पसर गयी थी.अपनी दम्भी आवाज़ में अमर ने पूछा था, “यह क्या हो रहा है विराज !?
 “कुछ नहीं! इस कोरोना फीवर ने मुझे दो बातें समझा दी हैं.”“अच्छा ! जरा मैं भी तो सुनूँ कौन-कौन सी !” अमर के स्वर में तल्खी थी. विराज सामने पड़े सोफ़े पर आराम से बैठकर बोली, “पहली तो ये कि सही शिक्षा किसी भी उम्र में दी जा सकती है; मात्र एक मंत्र पढ़ना है, तुम भी करो ना. दूसरी, फॅमिली टाइम घर की स्त्रियों के लिये भी होता है. घर सभी का तो घर के काम मात्र स्त्री के क्यों ! मुसीबत तो सब पर आयी है, तो उसका सामना भी तो सबको मिलकर ही करना होगा.”
इतना कहकर विराज ने पलट कर पीछे देखा. आन्या और अदिति मेज पर खाना लगा रहे थें और मानव ग्लासों में पानी भर रहा था. अमर की नजर भी विराज की नजर का पीछा करते हुये उधर ही चली गयी थी.
“सुनो !” विराज की आवाज पर अमर ने उसकी तरफ देखा.“खाना तैयार हैं, मेज़ पर लगा दिया हैं. अदिति अपना और मेरा खाना यहीं ले आयेगी.”
अमर चुपचाप अंदर की तरफ जाने लगा था कि विराज ने फिर पुकारा-“सुनो ! बड़े बर्तन तो मैंने धो दिये थें. अपने और बच्चों के बर्तन धोकर अलमारी में रख देना.” इतना कहकर बिना अमर की तरफ देखे, विराज टी वी खोलकर अपना धारावाहिक देखने में तल्लीन हो गयी थी. घर में करो ना क्रांति का बिगुल बज चुका था. टीवी से आवाज़ आ रही थी.
 राजकुमार कुछ देर तक राजकुमारी के विचार परिवर्तन की राह देखता रहा. वह उनके कोमल ह्रदय को लेकर विश्वस्त था. परन्तु राजकुमारी की अनभिज्ञता उसे व्यग्र कर रही थी. उसकी निर्निमेष दृष्टि से अविचलित राजकुमारी अपनी सखियों के साथ आखेट में व्यस्त थी. राजकुमारी की ना को हाँ में बदलने का दम्भ जो उसने अपने मित्रों के सामने भरा था, वह दम तोड़ रहा था. थके क़दमों से वह आगे बढ़ गया था. इस परिवर्तन को उसने अनमने भाव से स्वीकार कर लिया था. अपनी गले में लटकती माला से खेलती हुयी राजकुमारी भी जानती थी कि यह पहला सबक था, पूरी शिक्षा अभी शेष थी.

आंखों में इंद्रधनुष:भाग 2

‘‘वे रंग कहां मिलेंगे?’’ गुलाबी रंग वाली लड़की ने उत्साह से उस के हाथ को दोनों हाथों से पकड़ कर जोर से दबा दिया, ‘‘चलो, मुझे वहां ले चलो. मैं उन रंगों को भी अपने तनमन में बसा लेना चाहती हूं.’’ लड़की सचमुच बहुत भोली थी और काले रंग की चाल को नहीं समझ पा रही थी. लड़कियां जब अपनी आंखों में इंद्रधनुष बसा लेती हैं तो उन की आंखों में जीवन के वास्तविक रंग खो जाते हैं और वे ऐसे काल्पनिक रंगों की विविधता में खो जाती हैं कि उन को पाने के चक्कर में अपना बहुतकुछ गंवा देती हैं.

काले रंग ने उसे अपने रंग में रंगते हुए कहा, ‘‘इन रंगों को पाने के लिए हमें एकांत की अंधेरी गलियों में जाना होगा. वहां हमें कुछ दिखाई नहीं देगा, परंतु हम अपने हाथों से उन रंगों को प्राप्त कर सकते हैं. अगर तुम सहमत हो तो हम चलें और उन रंगों को खोज कर अपने हाथों से अपने तनबदन में भर लें. देखना, बहुत अच्छे लगेंगे तुम को वे रंग, जब वे तुम्हारी पकड़ में आ जाएंगे.’’ गुलाबी रंग वाली लड़की को काले रंग की मंशा का अंदाजा नहीं था. वह बस जीवन को सुख प्रदान करने वाले कुछ और रंगों को अपने तनबदन में समेट लेना चाहती थी. इंद्रधनुष के रंग उस की आंखों में कम पड़ने लगे थे. अब उसे उन रंगों की तलाश थी जो उस के तनबदन से लिपट कर उसे जीवन के अभी तक अपरिचित सुख से सराबोर कर दें. वह भोली थी, परंतु उत्सुक थी. और जहां ये दोनों चीजें हों वहां बुद्धिमत्ता नहीं हो सकती, सतर्कता नाम की किसी चीज से इन का कोई वास्ता नहीं होता.

और फिर अपनी आंखों में इंद्रधनुष लिए वह यहांवहां भटकती रही. जंगल के वीरान सन्नाटे में, होटल के बदबूदार नीमअंधेरे कमरे में, बगीचों के पौधों के पीछे की नरम मिट्टी पर उगी गुदगुदी घास पर और न जाने कहांकहां. उसे जीवन के सुखद रंगों की तलाश थी और इस तलाश में वह बहुतकुछ भूल गई थी, अपने घरपरिवार को, नातेरिश्तेदारों को, सगेसंबंधियों को और कालेज के दोस्तों को… उसे कुछ रंग पाने थे. वे रंग जिन को उस ने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था. वह उस काले रंग के माध्यम से उन रंगों को खोजने निकली थी, परंतु वह स्वयं भटक गई थी, ऐसी अंधेरी गलियों में जहां काले रंग ने अपने खुरदरे हाथों से उस के बदन में कुछ ऐसे बीज बो दिए थे, जो धीरेधीरे उग रहे थे और उस के बदन में कुछ ऐसी मिठास भर रहे थे कि वह दिनोदिन मदहोश होती जा रही थी.

उस के होशहवास गुम थे और उसे पता नहीं था कि वह किस दुनिया में विचरण कर रही थी. परंतु जो भी हो रहा था, उसे अच्छा लग रहा था. फिर एक दिन काले रंग ने उस के बदन के सारे रंग चुरा लिए और उस के अंदर एक काला रंग भर दिया. गुलाबी रंग को पता नहीं चला कि उसे सुख प्रदान करने वाले कौन से रंग प्राप्त हुए थे, परंतु ये जो भी रंग थे, उसे सुखद ही लग रहे थे. उन रंगों को वह पहचान नहीं पा रही थी और शायद जीवन के अंत तक न पहचान पाए, परंतु इन बदरंग रंगों में खोने का उसे कोई अफसोस नहीं था. उस की आंखों के इंद्रधनुष में काला रंग पूरी तरह से घटाओं की तरह छा गया और वह भी उन घटाओं की फुहारों में भीग कर प्रफुल्लित अनुभव कर रही थी.

एक दिन गुलाबी रंग के अंदर एक दूसरा काला रंग उभरने लगा. वह चिंतित हुई और उस ने काले रंग को इस संबंध में बताया कि वह अपने अंदर कुछ परिवर्तन अनुभव कर रही थी और उसे लग रहा था कि उस के अंदर एक काला रंग धीरेधीरे कागज पर फैली स्याही की तरह फैलने लगा था. काला रंग थोड़ी देर के लिए सन्न सा रह गया. उस ने अविश्वसनीय भाव से गुलाबी रंग को देखा, उस की आंखों में इंद्रधनुष ढूंढ़ने का प्रयास किया, परंतु उस की आंखों का इंद्रधनुष फीका सा लगा. वह भयभीत हो गया, परंतु चतुराई से उस ने अपने चेहरे के भावों को गुलाबी रंग वाली लड़की से छिपा लिया. फिर धीरे से जमीन की तरफ देखता हुआ बोला, ‘‘नहीं, कुछ नहीं हुआ. तुम ठीक हो.’’

‘‘नहीं, कुछ तो हुआ है. मेरे मन में एक अजीब सी बेचैनी घर कर गई है. मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता. मेरे शरीर में कुछ परिवर्तन हो रहा है, जिसे मैं ठीक से समझ नहीं पा रही हूं.’’

‘‘यह तुम्हारा भ्रम है. तुम ने ढेर सारे रंग एकसाथ अपने हाथों से समेट कर अपने बदन में भर लिए हैं, इसीलिए तुम्हें ऐसा लग रहा है. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’’ ‘‘काश, सबकुछ ठीक हो जाए, परंतु मैं अपने मन को कैसे समझाऊं? मेरे घर वाले भी अब तो और ज्यादा सतर्क व चौकन्ने हो कर मेरी हरकतों पर नजर रख रहे हैं. उन की आंखों में ऐसे रंग उभर आते हैं कि कभीकभी मैं डर जाती हूं,’’ उस ने काले रंग को जोर से पकड़ते हुए कहा. काला रंग यह बात सुन कर और अधिक भयभीत हो गया. अगर गुलाबी रंग के घर वालों को सबकुछ पता चल गया तो उस का क्या होगा? वह तो बेमौत मारा जाएगा. वे लोग पता नहीं क्या करेंगे उस के साथ? कहीं यह मासूम लड़की घर वालों के दबाव में आ कर सबकुछ बता न दे. उस ने लड़की की पकड़ से धीरे से अपने को छुड़ाया और चौकन्नी निगाहों से चारों तरफ इस तरह देखने लगा जैसे उसी वक्त वहां से भाग जाना चाहता हो.

उस दिन लड़की को ढेर सारी सांत्वना और झूठे आश्वासन दे कर उस ने अपने को उस के चंगुल से छुड़ाया और फिर वह काला रंग पता नहीं कहां गुम हो गया. प्रत्यक्ष रूप से तो वह अवश्य लुप्त हो गया था परंतु पूरी तरह से कैसे गुम हो सकता था? उस का प्रतिरूप लड़की के अंदर धीमी गति से अपने पैर पसारने लगा था और गुलाबी रंग वाली लड़की यह बात अच्छी तरह समझ गई थी कि उस के जीवन में अब कुछ ठीक नहीं होने वाला था. अपनी निगाहों और हाथों से सुख प्रदान करने वाले जितने रंग उस ने पकड़ कर अपने बदन में भरे थे, वे सारे पिघल कर बह गए थे और अब केवल एक ही रंग बचा था, जो उस के अंदर धीरेधीरे गाढ़ा होता जा रहा था, वह था काला रंग.

#coronavirus: कोरोना ने दिलाई कार्ल मार्क्स की याद

21 दिन के लाकडाउन की घोषणा के बाद पूरा देश थम गया. देश बोले तो घिसती रगड़ खाती इकोनोमी. इस इकोनोमी में खुद को सुरक्षित पाते वह मालदार लोग आते हैं जिन की तिजोरियां भरी हुई हैं, बैंक खातों के अंक हर सेकंड बढ़ते जाते हैं. उन्हें चिंता है तो अपने नफेनुकसान की. गिरते शेयरों की. बंद पड़े अपने कारखानों की. फिर आता है वह पढ़ालिखा तबका जिन के लिए कोरोना से लड़ाई मतलब बालकोनी से हाथ हिलाना, सोशल मीडिया पर ‘घरों पर ही रहने’ का सन्देश देना, कहीकहीं भूखे को खाना खिला इन्स्टा, ट्विटर पर फोटो चिपका देना और पलायन करने वाले गरीब मजदूरों को दिन भर गाली देना है.

यह अभिजात तबका पहले कांग्रेस कार्यकाल में खराब सरकारी व्यवस्ता की किरकिरी करता था और समस्याएं गिनाता था. बहरहाल अब शासन बदला है, तो इन के ऊपर अंधराष्ट्रवाद का खुमार और भक्ति सर चढ़ कर बोल रहा है चाहे देश और ज्यादा गर्त में चला गया हो. इन के लिए चिंता बस यही है कि ‘हद है यार, एक तो कोरोना का वैक्सिनैसन नहीं बना है ऊपर से ये गरीब लोग भीड़ के साथ झोला उठा अपने घर चल दिए हैं..’

अब आते हैं देश के सब से निचले पायदान में खड़े इन्ही गरीबों के पास, जिन के लिए देश न रुका है न ही रुक सकता है. उन का नाम “चलती को जिन्दगी” है क्योंकि वे मानते हैं “रुकता वही है जिन का बसेरा होता है.” नहीं समझे?

मतलब यह कि न तो उन के पास हाथ हिलाने के लिए बालकोनी और घर है, न ही अपने शेयर गिरने की चिंता. सच है, ये घुमंतू हैं जहाँ दानाखाना की आश है वहां चल देंगे, अगर देश में सीमाएं न हो तो उन्हें भी लांघ जाएंगे. फिलहाल ये शहरों में उड़ कर आएं हैं. शहर में काम करने आए ये नवयुवक मजदूर महज 6-8 हजार रूपए में छोटी फक्ट्रियों में महीने के हिसाब से नौचे जा रहे हैं.

ये भी पढ़ें- कहां खो गये जनसेवक

आज देश को जब बंद किया तो इन्ही मजदूरों को इतनी दिक्कत हुई कि इन्होने सरकार के लाकडाउन का फरमान मानने से इनकार कर दिया. आखिर क्यों जिस बिमारी को पूरी दुनिया में इस समय सब से बड़ा खतरा बताया जा रहा है उसे यह ठोकर मार आगे बढ़ गए?

“रहने को घर नहीं है हिन्दोस्तां हमारा”

“साहब, कोरोना बाद में मारेगी पहले भूख मार देगी” यह कहते हुए 20 वर्षीय युवा ललित फैक्ट्री के मालिक से अपने इस महीने की तनख्वाह ले कर दिल्ली से बरेली चल दिया. ललित के पास न मकान था न किराया का कमरा. वह वहीँ बलजीत नगर की एक छोटी सी फैक्ट्री में ही रहता था. उस का काम चार्जर बनाने का था. अब फैक्ट्री बंद है तो उसे बिना पैसों के वहां रुकना ठीक नहीं लगा. यही हाल अलगअलग राज्यों में असंख्य मजदूरों का भी है. जब ललित से पूछा कि सरकार तो राशन और खातों में पैसे मुहैय्या करवा रही है. तुम जा क्यों रहे हो? तो तपाक से कहता है “न मेरे पास राशन कार्ड है न बैंक खाता.”

फिर मुस्कुराते हुए कहता है “वैसे भी मोदी जी ने कहा है अपने घर में ही रहे, तो में अपने घर जा रहा हूं. लम्बा सफ़र है फिर कभी मिलेंगे”

ललित की तरह कई मजदूर ऐसे ही लाकडाउन की परवाह किये बिना निकल चुके है उन्हें सरकार की राहत घोषणाओं पर ख़ासा विश्वास नहीं है. जाहिर है उन्होंने कई सरकारों को बदलते देखा है लेकिन अपने हालातों को नहीं. वे यह घोषणाएं हमेशा सुनते आएं हैं. नेताओं की बड़ीबड़ी हांके अब उन के लिए आम बात है. यह अविश्वास इतना हो गया है कि उन्हें लगता है ये तो मौत पर भी सियासत करने से बाज नहीं आएंगे, यह मजदूर भूखे प्यासे सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर रहे हैं. कई अपने छोटे बच्चों को गोद में लिए चल दिए हैं. तो वहीँ अपनी बीवी को कंधे पर बैठाए 257 किलोमीटर की दूरी तय करते मजदूर की सनसनाती तस्वीर देश को आइना दिखा रही है.

ये भी पढ़ें- #Lockdown: कांवड़ यात्रा पर मेहरबान सरकार लेकिन मजदूरों पर लाचार

असहाय वे बच्चे हैं जिन के लिए कोरोना नहीं बल्कि गरीबी आफत बन कर आई है. अपनी इस छोटी उम्र में उन्होंने बचपन की शेतानियों को वेसे भी खो दिया था बस अब बाकी था तो बचपन का पूरी तरह ख़त्म होना सो वो भी हुआ. यह सिर्फ 4 या 5 दिन की लम्बी पैदल यात्रा नहीं बल्कि आजीवन चिपकने वाली वह काली याद है जिसे सोच मजदूरों को हमेशा अपनी लाचारी महसूस होती रहेगी. ऐसे हालत में कुछ लोगों की रास्ते में भूख व दुर्घटना से मौत हो चुकी है. यह मोतें कोरोना के कारण आई समस्या से हुई है लेकिन कोरोना की फ़ाइल में इन मौतों को चिपकाया नहीं जाएगा. बमुश्किल है कि इन मौतों का कोई खाका भी बन पाए. अलबत्ता ये वों मजदूर होंगे जिन की हाजरी कभी किसी सरकारी कागजों में नहीं होगी.

यही कारण होगा कि जर्मनी के महान समाजवादी विचारक कार्ल मार्क्स ने मजदूरों को ले कर कहा था कि “मजदूरों का कोई देश नहीं होता.” इसी तर्ज पर उन्होंने “दुनिया के मजदूरों एक हो” का नारा दिया. इस नारे के कई गहन मतलब निकल सकते हैं लेकिन जो फ़िलहाल समझ आ रहा है यह कि मजदूर किसी जगह(देश) पर जन्म ले तो सकता है लेकिन उन की सरकारों ने कभी उन्हें अपना नहीं समझा. आज अभिजातों के लिए विदेश में हवाई जहाज भेज कर रेस्क्यू ओप्रेशन चलाया जा रहा है. वहीँ लाचार गरीबों को बसों में ठूसठूस कर जानवरों सा व्यवहार किया जा रहा है. यहाँ तक कि उन पर कीड़ेमकोड़ों की तरह केमिकल का छिडकाव किया जा रहा है. उन के लिए मजदूर सिर्फ मशीन के कलपुर्जे है.

देश को देश बनाने में इन मजदूरों ने अपना खूनपसीना लगा दिया. फिर भी ये मजदूर अपने यहाँ ही परदेशी है. देश की इकोनोमी में अपनी मेहनत लगाने वाले ये बेघर है, अनाथ हैं जिन के पास रहने की जगह भी है तो वह गन्दी बस्तियां हैं जहाँ बच्चों के लिए धुलमिटटी ही उन का खिलौना है और मांबाप के लिए रोजीरोटी. इन्हें कोरोना से लड़ने के लिए पहले गरीबी को मात देनी पड़ेगी. कोरोना की मौत से न डरने वाले ये मजदूर जानीपहचानी मौतों से डर रहे हैं, वह है भूख जिस का वैक्सीनेशन खाना है जो हमेशा से सरकारों के पास था. लेकिन इतने सालों बाद भी इन तक नहीं पहुंचा है. यह सारे अंतर्विरोध आज उठउठ कर सामने आ रहे हैं. भले ही आज पुरे विश्व में पूंजी की बात कहने वालों का डंका बज रहा है लेकिन जमीन पर मची यह खलबली कहीं मार्क्स की प्रासंगिकता की जीवन्तता की तरफ इशारा तो नहीं?

ये भी पढ़ें- #coronavirus: भाजपा नेताओं के बिगड़ते बोल

#coronavirus: घुटन

“आशा है कि आप और आप का परिवार स्वस्थ होगा, और आप के सभी प्रियजन सुरक्षित और स्वस्थ होंगे, उम्मीद करते हैं कि हम सभी मौजूदा स्थिति से मजबूती से और अच्छे स्वास्थ्य के साथ उभरें, कृपया अपना और अपने परिवार का ख्याल रखें.”

घर पर रहें और सुरक्षित रहें

मीतू ने व्हाट्सऐप पर नीलिमा का भेजा यह मैसेज पढ़ा और एक ठंडी सांस भरी क्या सुरक्षित रहे. पता नहीं कैसी मुसीबत आ गई है. कितनी अच्छीखासी लाइफ चल रही थी. कहां से यह कोरोना आ गया. दुनिया भर में त्राहित्राहि मच गई है. खुद मेरी जिंदगी क्या कम उलझ कर रह गई है. सोचते हुए दोनों हाथों से सिर को पकड़ते हुए वह धप से सोफे पर बैठ गई.

मीतू का ध्यान दीवार पर लगी घड़ी पर गया. 2 बज रहे थे दोपहर के खाने का वक्त हो गया था. रिषभ को अभी भी हलका बुखार था. खांसी तो रहरह कर आ ही रही है.

ये भी पढ़ें-लमहों ने खता की थी: भाग 3

रिषभ उस का पति. बहुत प्यार करती है वह उस से लव मैरिज हुई थी दोनों की. कालेज टाइम में ही दोनों का अफेयर हो गया था. रिषभ तो जैसे मर मिटा था उस पर. एकदूसरे के प्यार में डूबे कालेज के तीन साल कैसे गुजर गए थे, पता ही नहीं चला दोनों को. बीबीए करने के बाद एमबीए कर के रिषभ एक अच्छी जौब चाहता था ताकि लाइफ ऐशोआराम से गुजरे. मीतू से शादी कर के वह एक रोमांटिक मैरिड लाइफ गुजारना चाहता था.

रिषभ ने जैसा सोचा था बिलकुल वैसा ही हुआ. वह उन में से था जो, जो सोचते हैं वहीं पाते हैं. अभी उस की एमबीए कंपलीट भी नहीं हुई थी उस का सलेक्शन टौप मोस्ट कंपनी में हो गया. सीधे ही उसे अपनी काबिलियत के बूते पर बिजनेस डेवलपमेंट मैनेजर की पोस्ट मिल गई.

दिल्ली एनसीआर नोएड़ा में कंपनी थी उस की. मीतू को अच्छी तरह याद है वह दिन जब पहले दिन रिषभ ने कंपनी ज्वाइन की थी. जमीन पर पैर नहीं पड़ रहे थे उस के. लंच ब्रेक में जब उसे मोबाइल मिलाया था तब उस की आवाज में खुशी, जोश को अच्छी तरह महसूस किया था उस ने.

‘मीतू तुम सीधा मैट्रो पकड़ कर नोएडा सेक्टर 132 पहुंच जाना शाम को. मैं वहीं तुम्हारा इंतजार करूंगा. आज तुम्हें मेरी तरफ से बढ़िया सा डिनर, तुम्हारी पसंद का.’

ये भी पढ़ें-लम्हों ने खता की थी

कितना इंजौय किया था दोनों ने वह दिन. सब कितना अच्छा. भविष्य के कितने सुनहरे सपने दोनों ने एकदूसरे का हाथ थाम कर बुने थे.

रिषभ की खुशी, उस का उज्जवल भविष्य देख बहुत खुश थी वह. मन ही मन उस ने अपनेआप से वादा किया था कि रिषभ को वह हर खुशी देने की कोशिश करेंगी. बचपन में ही अपने मातापिता को एक हादसे में खो दिया था उस ने. लेकिन बूआ ने खूब प्यार लेकिन अनुशासन से पाला था रिषभ को, क्योंकि उन की खुद की कोई औलाद न थी. मीतू रिषभ की जिंदगी में प्यार की जो कमी रह गई थी, वह पूरी करना चाहती थी.

क्या हुआ उस वादे का, कहां गया वह प्यार. ‘ओफ रिषभ मैं यह सब नहीं करना चाहती तुम्हारे साथ.’ सोचते हुए मीतू को वह दिन फिर से आंखों के आगे तैर गया, जिस दिन रिषभ देर रात गए औफिस से घर वापस आया था. 4 दिन बाद होली आने वाली थी.

साहिर मीतू और रिषभ की आंखों का तारा. 5 साल का हो गया था. शाम से होली खेलने के लिए पिचकाारी और गुब्बारे लेने की जिद कर रहा था.

‘नहीं बेटा कोई पिचकारी और गुब्बारे नहीं लेने. कोई बच्चा नहीं ले रहा. देखो टीवी में यह अंकल क्या बोल रहे हैं. इस बार होली नहीं खेलनी है.’

मीतू ने साहिर को मना तो लिया लेकिन उस का दिल भीतर से कहीं डर गया. टीवी के हर चैनल पर कोरोना वायरस की खबरेें आ रही थी. मानव से मानव में फैलने वाला यह वायरस चीन से फैलता हुआ पूरे विश्व में तेजी से फैल रहा है. लोगों की हालत खराब है.

रिषभ रोज मैट्रो से आताजाता है.  कितनी भीड़ होती है. राजीव चैक मेट्रो स्टेशन पर तो कई बार इतना बुरा हाल होता है कि लोग एकदूसरे पर चढ़ रहे होते हैं. टेलीविजन पर लोगों को एतियात बरतने के लिए बोला जा रहा है.

मीतू उठी और रिमोट से टेलीविजन की वैल्यूम कम की और झट रिषभ का मोबाइल मिलाया. ‘कितने बजे घर आओगे, रिषभ.’

‘यार मीतू, बौस एक जरूरी असाइनमैंट आ गया है. रात 10 बजे से पहले तो क्या ही घर पहुंचुगा.’

‘सुनो भीड़भाड़ से जरा दूर ही रहना. इंटरनेट पर देख रहे हो न. क्या मुसीबत सब के सिर पर मंडरा रही है,‘ मीतू के जेहन में चिंता की लकीरें बढ़ती जा रही थीं.

‘डोंट वरी डियर, मुझे कुछ नहीं होने वाला. बहुत मोटी चमड़ी का हूं. तुम्हे तो पता ही है क्यों…’ रिषभ ने बात को दूसरी तरफ मोड़ना चाहा.

‘बसबस, ज्यादा मत बोलो, जल्दी घर आने की कोशिश करो, कह कर मीतू ने मोबाइल काट दिया लेकिन पता नहीं क्यों मन बैचेन सा था.

उस रात रिषभ देर से घर आया. काफी थका सा था. खाना खा कर सीधा बैडरूम में सोने चला गया.

अगले दिन मीतू ने सुबह दो कप चाय बनाई और रिषभ को नींद से जगाया.

‘मीतू इतनी देर से चाय क्यों लाई. औफिस को लेट हो जाऊंगा,‘ रिषभ जल्दीजल्दी चाय पीने लगा.

‘अरेअरे… आराम से ऐसा भी क्या है. मैं ने सोचा रात देर से आए हो तो जरा सोने दूं. कोई बात नहीं थोड़ा लेट चले जाना औफिस,‘ मीतू ने बोलते हुए रिषभ के गाल को हाथ लगाया, ‘रिषभ तुम गरम लग रहे हो. तबीयत तो ठीक है,‘ मीतू ने रिषभ का माथा छूते हुए कहा.

ये भी पढ़ें-बीवी और कुत्ता

‘यार, बिलकुल ठीक हूं. बस थोड़ा गले में खराश सी महसूस हो रही है. चाय पी है थोड़ा बैटर लगा है,‘ और बोलता हुआ वाशरूम चला गया.

लेकिन मीतू गहरी चिंता में डूब गई. कल ही तो व्हाट्सऐप पर उस ने कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों के लक्षण के बारे में पढ़ा है. खांसी, बुखार, गले में खराश, सांस लेने में दिक्कत…

‘ओह…नो… रिषभ को कहीं… नहींनहीं, यह मैं क्या सोच रही हूं. लेकिन अगर सच में कहीं…’

मीतू के सोचते हुए ही पसीने छूट गए.

तब तक रिषभ वौशरूम से बाहर आ गया. मीतू को बैठा देख बोला, ‘किस सोच में डूबी हो,’ फिर उस का हाथ अपने हाथ से लेता हुआ अपना चेहरा उस के चेहरे के करीब ले आया और एक प्यार भरी किस उस के होंठो पर करना ही चाहता था कि मीतू एकदम पीछे हट गई.

‘अब औफिस के लिए देर नहीं हो रही,’ और झट से चाय के कप उठा कर कमरे से चली गई.

रिषभ मीतू के इस व्यवहार से हैरान हो गया. ऐसा तो मीतू कभी नहीं करती. उलटा उसे तो इंतजार रहता है कि रिषभ पहले प्यार की शुरूआत करे फिर मीतू अपनी तरफ से कमी नहीं छोड़ती थी लेकिन आज मीतू का पीछे हटना, कुछ अजीब लगा रिषभ को.

खैर ज्यादा सोचने का टाइम नहीं था रिषभ के पास. औफिस जाना था. झटपट से तैयार हो गया. नाश्ता करने के लिए डाइनिंग टेबल पर बैठ गया.

मीतू ने नाश्ता रिषभ के आगे रखा और जाने लगी तो वह बोला, ‘अरे, तुम्हारा नाश्ता कहां है. रोज तो साथ ही कर लेती हो मेरे साथ. आज क्या हुआ?’

‘कुछ नहीं तुम कर लो. मैं बाद में करूंगी. कुछ मन नहीं कर रहा.’ मीतू दूर से ही खड़े हो कर बोली.

‘क्या बात है तुम्हारी तबीयत तो ठीक है.’

‘हां सब ठीक है.‘ मीतू साहिर के खिलौने समेटते हुए बोली.

‘साहिर के स्कूल बंद हो गए हैं कोराना वायरस के चलते. चलो अब तुम्हें उसे सुबहसुबह स्कूल के लिए तैयार नहीं करना पड़ेगा. चलो कुछ दिन का आराम हो गया,‘ रिषभ ने मीतू को हंसाने की कोशिश की.

‘खाक आराम हो गया. यह आराम भी क्या आराम है. चारों तरफ खतरा मंडरा रहा है और तुम्हे मजाक सूझ रहा है,‘ मीतू नाराज होते हुए बोली.

‘अरे…अरे, मुझ पर क्यों गुस्सा निकाल रही हो. मेरा क्या कसूर है. मैं फैला रहा हूं क्या वायरस,‘ रिषभ ने बात खत्म करने की कोशिश की, ‘देखो ज्यादा पेनिक होने की जरूरत नहीं.’

‘मैं पेनिक नहीं हो रही बल्कि तुम ज्यादा लाइटली ले रहे हो सब.’

‘ओह, तो यह बात है. कहीं तुम्हें यह तो नहीं लग रहा कि मुझे कोरोना हो गया है. तुम ही दूरदूर रह रही हो. बेबी, आए एम फिट एंड फाइन. ओके शाम को मिलते हैं. औफिस चलता हूं. बाय डियर, ‘बोलता हुआ रिषभ घर से निकल गया.

मीतू के दिमाग में अब रातदिन कोरोना का भय व्याप्त हो गया था. होली आई और चली गई, उन की सोसाइटी में पहले ही नोटिस लग गया था कि कोई इस बार होली नहीं खेलेगा.

ये भी पढ़ें-लमहों ने खता की थी: भाग 1

मीतू अब जैसे ही रिषभ औफिस से आता उसे सीधे बाथरूम जाने के लिए कहती और कपड़े वही रखी बाल्टी में रख्ने को कहती. फिर शौवर ले कर, कपड़े चेज करने के बाद ही कमरे में जाने देती.

हालात दिन पर दिन बिगड़ ही रहे थे. टेलीविजन पर लगातार आ रही खबरें, व्हाट्सऐप पर एकएक बाद एक मैसेज, कोरोना पर हो रही चर्चाएं मीतू के दिमाग को गड़बड़ा रही थीं.

दूसरी तरफ रिषभ मीतू के बदलते व्यवहार से परेशान हो रहा था. न जाने कहां चला गया था उस का प्यार. बहाने बनाबना कर उस से दूर रहती. साहिर का बहाना बना कर उस के कमरे में सोने लगी थी. साहिर को भी उस से दूर रखती थी. अपने ही घर में वह अछूत बन गया था.

रिषभ का पता है और मीतू भी इस बात से अनजान नहीं थी कि बदलते मौसम में अकसर उसे सर्दीजुकाम, खांसी, बुखार हो जाता है.

लेकिन कोरोना के लक्षण भी तो कुछ इसी तरह के हैं. मीतू पता नहीं क्यों टेलीविजन, व्हाट्सऐप के मैसेज पढ़पढ़ कर उन में इतनी उलझ गई है कि रिषभ को शक की निगाहों से देखने लगी है.

आज तो हद ही हो गई. सरकार ने जनता कफ्यू का ऐलान कर दिया था. रिषभ को रह रह कर  खांसी उठ रही थी. हलका बुखार भी था. रिषभ का मन कर रहा था कि मीतू पहले ही तरह उस के सिरहाने बैठे. उस के बालों में अपनी उंगलियां फेरे. दिल से, प्यार से उस की देखभाल करे. आधी तबीयत तो उस की मीतू की प्यारी मुसकान देख कर ही दूर हो जाती थी. लेकिन अचानक जैसे सब बदल गया था.­

मीतू न तो उस का टैस्ट करवाना चाहती है. रिषभ अच्छी तरह समझ रहा था कि मीतू नहीं चाहती कि आसपड़ोस में किसी को पता चले कि वह रिषभ को कोरोना टैस्ट के लिए ले गई है और लोगों को यह बात पता चले और उन से दूर रहे. खुद को सोशली बायकोट होते वह नहीं देख सकती थी.

मीतू का अपेक्षित व्यवहार रिषभ को और बीमार बना रहा था. उधर मीतू ने आज जब रिषभ सो गया तो उस के कमरे का दरवाजा बंद कर बाहर ताला लगा दिया.

रिषभ दवाई खा कर सो गया था. दोपहर हो गई थी और खाने का वक्त हो रहा था. मीतू अपनी सोच से बाहर निकल चुकी थी.

रिषभ की नींद खुली. थोड़ी गरमी महसूस हुई. दवा खाई थी इसलिए शायद पसीना आ गया था. सोचा, थोड़ी देर बाहर लिविंग रूप में बैठा जाए. पैरों में चप्पल पहनी और चल कर दरवाजे तक पहुंच कर हैंडल घुमाया. लेकिन यह क्या दरवाजा खुला ही नहीं. दरवाजा लौक्ड था.

“मीतूमीतू, दरवाजा लौक्ड है. देखो तो जरा कैसे हो गया यह.” रिषभ दरवाजा पीटते हुए बोला.

“मैं ने लौक लगाया है,” मीतू ने सपाट सा जवाब दिया.

“दिमाग तो सही है तुम्हारा. चुपचाप दरवाजा खोला.”

‘नहीं तुम 14 दिन तक इस कमरे में ही रहोगे. खानेपीने की चिंता मत करो, वो तुम्हें टाइम से मिल जाएगा,‘ मीतू ने जवाब दिया.

‘मीतू तुम यह सब बहुत गलत कर रही हो.‘

‘कुछ गलत नहीं कर रही. मुझे अपने बच्चे की फिक्र है.‘

‘तो क्या मुझे साहिर की फिक्र नहीं है,‘ रिषभ लगभग रो पड़ा था बोलते हुए.

लेकिन मीतू तो जैसे पत्थर की बन गई थी. आज रिषभ का रोना सुन कर भी उस का दिल पिघला नहीं. कहां रिषभ की हलकी सी एक खरोंच भी उस का दिल दुखा देती थी.

रिषभ दरवाजा पीटतेपीटते थक गया तो वापस पलंग पर आ कर बैठ गया. यह क्या डाला था मीतू ने. बीमारी का भय, मौत के डर ने पतिपत्नी के रिश्ते खत्म कर दिया था.

14 दिन कैसे बीते यह रिषभ ही जानता है. मीतू की उपेक्षा को झेलना किसी दंश से कम न था उस के लिए. मीतू उस के साथ ऐसा व्यवहार करेगी, वह सोच भी नहीं सकता था. मौत का डर इंसान को क्या ऐसा बना देता है. जबकि अभी तो यह भी नहीं पूरी तौर से पता नहीं कि वह कोरोना वायरस से संक्रमित है भी या नहीं.

मीतू चाहे बेशक सब एहतियात के तौर पर कर रही हो लेकिन पतिपत्नी के बीच विश्वास, प्यार को एक तरफ रख कर उपेक्षा का जो रवैया अपनाया था, उस ने पतिपत्नी के प्यार को खत्म कर दिया था.

रिषभ कोरोना नेगेटिव निकला पर उन के रिश्ते पर जो नेगेटिविटी आ गई थी उस का क्या.

मीतू दोबारा से रिषभ के करीब आने की कोशिश करती लेकिन रिषभ उस से दूर ही रहता. कोरोना ने उन की जिंदगी को अचानक क्या से क्या बना दिया था. मीतू ने उस दिन दरवाजा लौक नहीं किया था, जिंदगीभर की दोनों की खुशियों को लौक कर दिया था.

Lockdown: घर पर ऐसे टाइम बिता रही हैं ‘तारक मेहता’ की दयाबेन, फैंस को दिया ये मैसेज

छोटे परदे के पॉपुलर शो Taarak Mehta Ka Ooltah Chashmah में दयाबेन का रोल करने वाली एक्ट्रेस Disha Vakani (दिशा वकानी) करीब दो साल से मैटरनिटी ब्रेक पर है और अभी तक वह इस शो पर लौटकर नहीं आई है. ऐसे में फैंस उन्हें काफी मिस कर रहे है. हाल ही में दिशा ने एक वेबसाइट को दिए गए इंटरव्यू में देश का मौजूदा हालात को लेकर काफी बातें शेयर की है. इसी के साथ ही साथ उन्होंने अपने फैंस के लिए एक खास मैसेज भी दिया है.

घरवालों के साथ मिलकर करती हूं काम…

दिशा वकानी ने कहा है कि, ‘मैं इस वक्त सभी निर्देशों का पालन कर रही हूं और इस समय मैं घर से बाहर भी नहीं निकल रही हूं. हम गरम पानी पी रहे है और खाने को अच्छे से पकाकर ही खा रहे है साथ ही साथ सोशल डिस्टेंस भी मैंटेन कर रहे है. मेरे हाउस हेल्पर यहां पर नहीं है तो मैं घर का सारा काम घरवालों के साथ मिलकर खुद ही कर रही हूं. मुझे पता है कि लोग घरों में कैद रहने से परेशान है और बोर हो रहे है लेकिन मुझे नहीं लगता है कि ये कोई दिक्कत की बात है.

 

View this post on Instagram

 

Negotiations are being made with the producers. Let’s hope for the best?

A post shared by Disha Vakani (@disha.vakani) on

 

View this post on Instagram

 

World?

A post shared by Disha Vakani (@disha.vakani) on

ये भी पढ़ें- Lockdown: रश्मि देसाई ने लगाई झाड़ू तो इस वजह से ट्रोल करने लगे यूजर, देखें VIDEO

बाहर खेलना चाहती है बेटी…

इसी के साथ ही दिशा ने ये भी बताया है कि वह किस तरह से अपनी बेटी का ख्याल रख रही हैं. दिशा ने आगे कहा है कि, ‘मेरी बेटी जोकि अभी काफी छोटी है..वो बाहर खेलने जाना चाहती है और हर दिन कहती है कि उसे बाहर खेलना है..लेकिन एक जिम्मेदार माता-पिता होने के नाते हम उसका ध्यान बाकी चीजों में बंटा रहे हैं. वह भी इस दौरान अच्छी चीजें सीख रही है. मुझे विश्वास है ये समय भी कट जाएगा. अच्छा सोचें तो आगे अच्छा ही होगा.’

 

View this post on Instagram

 

A post shared by DISHA VAKANI (@dishavakanioffcal) on

ये भी पढ़ें- #coronavirus: कोरोना पीड़ितो के लिए कार्तिक आर्यन ने डोनेट किए इतने करोड़,

बता दें कि टीवी शो तारक मेहता का उल्टा को शुरु हुए 10 साल से ज्यादा हो गए हैं और खास बात यह है कि आज भी लोग इस शो के रिपीट टेलीकास्ट को भी बड़े ही चाव से देखते है. इस बात में कोई भी शक नहीं है कि इस कॉमेडी शो के हर एक किरदार को लोगों ने भरपूर प्यार दिया है और दयाबेन के किरदार का तो आज तक कोई तोड़ नहीं है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें