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आशा की नई किरण: भाग2

‘‘बस यही कि आप एक अच्छे डाक्टर से सलाह ले कर इलाज करवा लें और जब तक आप का इलाज चलता रहेगा, मैं अपने जौब पर वापस जा कर खुश रहने का प्रयास करूंगी.’’

पीयूष सोच में पड़ गया. स्वाति का काम पर जाना उसे पसंद नहीं था. दरअसल, वह अपनी यौन अक्षमता से परिचित था और वह नहीं चाहता था कि शादी के बाद स्वाति अन्य पुरुषों के संपर्क में आए. स्त्री की अधूरी इच्छाएं और कामनाएं उसे भटका सकती थीं. इन पर किसी स्त्री का जोर नहीं चलता.

‘‘बाहर जा कर काम करने की इच्छा तुम मन से निकाल दो,’’ पीयूष ने कुछ कड़े स्वर में कहा, ‘‘मां, कभी नहीं मानेंगी और अगर मैं ने इजाजत दी तो घर में बेवजह कलह पैदा होगा. परंतु मैं एक काम कर सकता हूं. तुम में रचनात्मक प्रतिभा है. मैं घर पर कंप्यूटर ला देता हूं. तुम लेखकहानी लिख कर पत्रपत्रिकाओं में भेजो. इस से तुम्हारे अंदर का रचनाकार जीवित रहेगा और तुम समय का सही उपयोग भी कर सकोगी.’’ स्वाति जो चाहती थी, यह उस का सही समाधान नहीं था. चौबीसों घंटे घर पर रहने से एकाकीपन और ज्यादा डरावना लगने लगता है. यों तो स्वाति के ऊपर बाहर जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं था परंतु पुरानी सहेलियों और मित्रों से संपर्क टूट चुका था. एकाध से कभीकभार फोन पर बात हो जाती थी. अब उसे अपने पुराने रिश्तों को जीवित करना होगा. जिस घुटनभरी मानसिक अवस्था में वह जी रही थी, उस में उस का बाहर निकल कर लोगों के साथ घुलनामिलना आवश्यक था, वरना वह मानसिक अवसाद के गहरे कुएं में गिर सकती थी. स्वाति ने बुझे मन से पति के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया परंतु मन में विद्रोह के भाव जाग्रत हो उठे. वह बहुत सीधी, सरल और सच्चे मन की लड़की थी. उस के स्वभाव में विद्रोही भाव नहीं थे. परंतु परिस्थितियां मनुष्य को विद्रोही बना देती हैं. स्वाति के पास विद्रोह करने के एक से अधिक कारण थे परंतु अपनी मनोभावना को उस ने पति पर प्रकट नहीं किया. स्वाति ने संशय से पूछा, ‘‘और आप ने अपने बारे में क्या सोचा है?’’

‘‘अपने बारे में क्या सोचना?’’ उस ने टालने के भाव से कहा.

‘‘आप जानबूझ कर अनजान क्यों बन रहे हैं? क्या आप समझते हैं कि मैं इतनी भोली हूं और पुरुष के बारे में कुछ नहीं जानती. आप अपनेआप को किसी भ्रम में रखने की कोशिश न करें वरना मांजी पोतापोती का मुंह देखे बिना ही इस दुनिया से कूच कर जाएंगी.’’

पीयूष कुछ पल चुप रहा, फिर गंभीरता से कहा, ‘‘मैं अपना इलाज करवा लूंगा.’’

‘‘तो फिर कब चलेंगे डाक्टर के पास?’’ स्वाति ने उत्साह से कहा.

‘‘तुम क्यों मेरे साथ चलोगी? मैं स्वयं जा कर डाक्टर से सलाह ले लूंगा,’’ पीयूष की आवाज में बेरुखी साफ दिखाई पड़ रही थी.

स्वाति के मन में कुछ चटक गया. पतिपत्नी के प्रेम की डोर में एक गांठ पड़ गई. पीयूष ने दूसरे ही दिन एक डैस्कटौप कंप्यूटर, प्रिंटर के साथ ला कर घर पर लगवा दिया. स्टेशनरी भी रख दी. स्वाति ने अपने भावों को शब्दरूप में ढालना आरंभ किया. उस के लेखन को प्रकाशन के माध्यम से गति मिली. इस से काफी हद तक उसे मानसिक सुख और शांति का अनुभव हुआ. स्वाति अपनी दुश्चिंता और मानसिक परेशानी से बचने के उपाय ढूंढ़ रही थी, तो दूरी तरफ सासूमां उस की परेशानी बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थीं. जैसेजैसे महीने साल में बदल रहे थे, सासूमां की वाणी की मधुरता गायब होती जा रही थी. उन के मुंह से अब केवल व्यंग्यबाण ही निकलते थे. स्वाति को बातबात पर कोसना उन की दिनचर्या में शामिल हो गया था. सासूमां की कटुता स्वाति अपनी कहानियों और कविताओं में भरती रहती थी.

सासूमां अकसर टोकतीं, ‘‘स्वाति, कुछ घर की तरफ भी ध्यान दो.’’

‘‘मेरे बिना घर का कौन सा काम रुका पड़ा है?’’ स्वाति ने अब अपनी स्वाभाविक सरलता त्याग दी थी. वह भी पलट कर जवाब देने लगी थी.

‘‘शादी के कई साल हो गए. अभी तक एक बच्चा पैदा न कर सकी. घरगृहस्थी की तरफ कब ध्यान दोगी, बच्चे कब संभालोगी?’’

‘‘जब समय आएगा, बच्चे भी पैदा हो जाएंगे?’’

‘‘वह समय पता नहीं कब आएगा?’’ सासूमां बोलीं.

स्वाति कुछ नहीं बोली, तो सासूमां ने आगे कहा, ‘‘तुम्हारे पैर घर में टिकते ही नहीं, बच्चों की तरफ ध्यान क्यों जाएगा? बाहर तुम्हारे सारे शौक पूरे हो रहे हैं, तो पति से क्या लगाव होगा? उसे प्यार दोगी तभी तो बच्चे पैदा होंगे.’’ स्वाति ने जलती आंखों से सासूमां को देखा. मन में एक ज्वाला सी भड़की. इच्छा हुई कि सासूमां को सबकुछ बता दे, कमसेकम उन का कोसना तो बंद हो जाएगा, परंतु क्या वे उस की बात पर विश्वास करेंगी? शायद न करें, अपने बेटे की कमजोरी को वे क्यों स्वीकार करेंगी?

‘‘पता नहीं कैसी बंजर कोख ले कर आई है. ऊसर में भी बरसात की दो बूंदें पड़ने से घास उग आती है, परंतु इस की कोख में तो जैसे पत्थर पडे़ हैं,’’ सासूमां के प्रवचन चलते ही रहते थे. सासूमां की जलीकटी सुनतेसुनते स्वाति तंग आ चुकी थी. लेख, कविता और कहानी के माध्यम से मन की भड़ास निकालने के बाद भी उस के मन की जलन कम नहीं होती थी. दिन पर दिन स्वाति का मानसिक तनाव बढ़ता जा रहा था. पीयूष की तरफ से उसे कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिल रहे थे. उस ने कहा था कि वह एक आयुर्वेदाचार्य से सलाह ले कर जननेंद्रियों को पुष्ट करने वाली कुछ यौगिक क्रियाएं कर रहा था और दूध के साथ कोई चूर्ण ले रहा था. स्वाति समझ गई, वह किसी ढोंगी वैद्य के चक्कर में फंस गया था. एक नियमित अवधि के बाद जब दोनों ने संबंध बनाए तो स्वाति को पीयूष की पौरुषता में कोई अंतर नजर नहीं आया.

‘‘आप किसी अच्छे डाक्टर को क्यों नहीं दिखाते?’’ स्वाति ने कहा.

‘‘क्या फायदा, जब आयुर्वेद में इस का इलाज नहीं है तो अंगरेजी चिकित्सा में कहां होगा?’’

‘‘आप कैसी दकियानूसी बातें कर रहे हैं. आप पढ़ेलिखे हैं. एक अनपढ़गंवार व्यक्ति के मुंह से भी यह बात अच्छी नहीं लगती. आज विज्ञान कहां से कहां पहुंच गया. चिकित्सा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हो रही है. कम से कम आप तो ऐसी बात न करें.’’

‘‘ठीक है, अगर तुम कहती हो तो मैं डाक्टर को दिखा दूंगा,’’ पीयूष ने बात को टालते हुए कहा और बाहर की तरफ चल दिया.

स्वाति पति के टालू स्वभाव से हैरान रह गई. पता नहीं किस मिट्टी का बना है यह इंसान. सासूमां का अत्याचार उस के ऊपर बदस्तूर जारी था, बल्कि दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा था. उन के तानों और जलीकटी बातों से स्वाति का हृदय फट कर रह जाता था. दूसरी तरफ पति की उपेक्षा से उस की मानसिक परेशानी दोगुनी हो जाती. उसे लगता, इस भरीपूरी दुनिया में वह बिलकुल अकेली पड़ गई है. उस का पति और सास ही उस के दुश्मन बन गए हैं. अपने मम्मीपापा से वह अपनी परेशानी बता नहीं सकती थी. अपना दर्द वह उन के हिस्से में क्यों डाले. उन्होंने तो अपनी जिम्मेदारी निभा दी थी. उस की शादी कर दी. अब अपने दांपत्यजीवन की परेशानियों से अवगत करा कर उन्हें क्यों परेशान करे? उस ने ठान लिया कि वह स्वयं ही अपनी परेशानियों से लड़ेगी और जीत हासिल करेगी. इन्हीं दुश्चिंताओं से गुजरते हुए उस ने इंटरनैट पर एक प्रसिद्ध सैक्सोलौजिस्ट का नाम व पता ढूंढ़ निकाला, फिर पीयूष से कहा, ‘‘आप स्वयं तो कुछ करने वाले नहीं हैं. मैं ने एक डाक्टर के बारे में इंटरनैट से जानकारी प्राप्त की है. उन से अपौइंटमैंट भी ले लिया है. कल हम दोनों उन के पास चलेंगे.’’ पीयूष ने अपने स्वर में और ज्यादा तल्खी घोलते हुए कहा, ‘‘एक बात समझ लो, मैं किसी डाक्टर के पास नहीं जाने वाला, तुम अपने काम से काम रखो. घर संभालो, मां की सेवा करो, अपना लेखन कार्य करो. तुम्हें जो चाहिए, मैं ला कर दूंगा. मेरे बारे में कुछ करने की तुम्हें जरूरत नहीं है.’’

 

#lockdown: संतरे की उपज पर पहले मौसम और अब लॉकडाउन की मार

झालावाड़ जिले के संतरा उत्पादकों पर पिछले दिनों मौसम की मार और अब लॉकडाउन के कारण उन को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. अब भी 50 प्रतिशत संतरे बगीचे में पौधों पर लदे हुए हैं.

किसानों की बढ़ती चिंता
झालावाड़ को संतरा उत्पादन के क्षेत्र में छोटा नागपुर कहा जाता है. झालावाड़ के सुनेल क्षेत्र में पिछले दिनों हुई बारिश और आंधी के कारण संतरे के बगीचों की हालत बहुत खराब हो गई है. संतरे के पौधों के टूटने और संतरे जमीन में गिरने से किसानों की चिंता बढ़ गई है. किसानों का कहना है कि उन्हें काफी मात्रा में नुकसान हुआ है.भारतीय किसान संघ के पदाधिकारियों ने शीघ्र यहां का सर्वे कराकर क्षेत्र के किसानों को उचित मुआवजा दिलवाने की मांग की है. किसानों को अभी तक अतिवृष्टि से खरीफ फसलों को हुए नुकसान का मुआवजा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत नहीं मिल पाया है इसलिए क्षेत्र के किसानों को आर्थिक रूप से काफी हद तक परेशानी हो रही है.

पहले मौसम अब कोरोना बना परेशानी
भारतीय किसान संघ के एक पदाधिकारी ने बताया कि क्षेत्र के किसान कोरोना वायरस के कारण लॉक डाउन की वजह से प्रशासन को सूचित नहीं कर पा रहे हैं. इसलिए वे मीडिया के माध्यम से प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि जिले की सभी पंचायतों के पटवारियों के माध्यम से सर्वे करवा कर किसानों को उचित मुआवजा दिलवाया जाए.

राज्य के डिप्टी सीएम से की गुजारिश
वहीं एक अन्य किसान ने राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट से अपील की है कि वो संतरा किसानों को इस आपदा से निकालें. झालावाड़ जिले में किसानों की संतरे की फसल खराब हो रही है. अब संतरे का टूटने का समय आ गया है लेकिन कोरोना वायरस के कारण वाहनों ओर मंडियों पर रोक लगाने से संतरे को मंडी तक नहीं पहुंचा पा रहे है.सरकार से विनती है कि मंडी खुलवाएं और किसानों की उपज का सही मूल्य दिलवाएं.

21 दिन में हो जाएगी फसल की बरबादी
राजस्थान के झालावाड़ में ही नहीं महाराष्ट्र में नागपुर से लेकर मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई अन्य जिलों में भी संतरे की खेती होती है. कई जगह किसान किन्नु भी उगाते हैं. ये संतरे की फसल पकने का समय है लेकिन कोरोना संकट के चलते किसान के बाग तक व्यापारी नहीं आ रहे हैं, जिस के कारण परेशान किसान राजस्थान और मध्य प्रदेश सरकार से गुहार लगा रहे हैं. किसानों पंकज ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ट्वीट किया कि किसानों के संतरे के बगीचे पूर्ण रूप से पक चुके हैं अगर 21 दिन तक ये फल किसान बेच नहीं पाया तो सारा फल गिर कर खराब हो जाएगा. पौधों की संख्या ज्यादा होने पर किसान स्वयं मंडी में नहीं बेच सकता इसलिए जो लोग बगीचे का फल लेते है उन्हें गांव में आने दिया जाए.

#coronavirus: कोरोना और सिमरन

लेखक-रंगनाथ द्विवेदी 

सिमरन अपनी शादी की कुछ सालों तक कितनी खुश थी. सिद्धार्थ को अपने पति के तौर पर पाकर मानो उसने दुनिया पाली हो, लेकिन हमेशा जिंदगी का रंग एक सा नहीं रहता, उसके रंग भी बदलते रहते हैं. क्योंकि सिमरन की जिंदगी इस कायनात की आखिरी तस्वीर नहीं, इसकी और भी तस्वीरें हैं, इसके और भी रंग हैं, जो बदलते रहते हैं. कुछ ऐसा ही बदलाव उसकी जिंदगी में  कोरोना जैसी महामारी से आएगा, उसको इसकी कतई उम्मीद न थी. लेकिन किसी को दुनिया पूरी और मुकम्मल नहीं मिलती. ऐसा सिमरन के साथ भी हुआ. उसको भी उसकी दुनिया मुकम्मल नहीं मिली. कोरोना ने उसके तमाम वे  रंग छीन लिए, जो ना जाने कितनी सिमरन के रहे होंगे.

सिमरन की सारी खुशी, सारे सपने,  सारे अरमान कोरोना की भेंट चढ़ गए. उसके सारे अरमानों को कोरोना वायरस ने ना चाह कर भी हमेशा के लिए लॉकडाउन कर दिया. यह दुनिया कोरोना को परास्त कर लेगी,  लेकिन हां ना जाने मुझे जैसी कितनी सिमरन इस टीस पीड़ा और दर्द के वह जख्म हमेशा हरे रहेंगे जो कोरोना ने दिये है .अब तो  हमेशा के लिए उसके मन में अपने पति को खोने की ये  नागफनी दिल में चूभेगी और यह चुभन हमेशा सिमरन को कोरोना की याद दिलाते रहेगे और हमेशा सिमरन सिसकती रहेगी.

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सिमरन उस पल को याद कर भावुक हो उठती है , जब वे मुंबई घर से कमाने के लिए जा रहे थे तो कुछ समय निकालकर वे कमरे में जब आये तो उन्होंने अपनी सिमरन को बाहों में भरकर उसके माथे का चुंबन लिया और बड़े ही प्यार से मेरी जान कहा था तो उसे क्या पता था कि यह सिमरन की माथे भाग लिया उसके सुहाग का आखिरी चुंबन होगा. अगर वे जानती तो कभी भी उन्हें कमाने के लिए मुंबई ना जाने देती किसी न किसी तरीके से उन्हें रोक लेती लेकिन अचानक चीन से फैले कोरोना ने बहुतों को अपनी चपेट में ले लिया. उसी चपेट में सिमरन की खुशियों की दुनिया भी आ गई.

कोरोना ने बस सिमरन का सुहाग ही नही बल्कि दो मासूम बच्चो के सर से उनके पिता  का असमय साया भी छीन लिया. उनके बुढ़े माँ-बाप के सहारे की एकलौती लाठी को हमेशा के लिये तोड़ दिया. इसके साथ ही जवान बहन की शादी के लाल जोड़े भी रो उठे. कोरोना वायरस का जब तक पता चलता तब तक सिमरन की दुनिया हमेशा के लिए तबाह व बर्बाद हो गई. सिमरन को ये तकलीफ रही की वे उस समय उनके पास न थी.

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अब सिमरन को अपने सुन्दर व खूबसूरत चेहरे को मेकप नही, बल्कि सिमरन को अपने पति के यादों के आंसू उसके पूरे चेहरे को सैनिटाइज कर रहे हैं. उसका अब अपने पति की यादों के कोरोना वायरस से बाहर निकल पाना या बच  पाना मुमकिन नहीं.

आने वाला कल सिमरन के हौसले वह उसके जिम्मेदारियों का है. उसे केवल कोरोना वायरस के यादों के अलावा एक हकीकत जीना है, अपने बच्चों के लिए, बुढ़े सास-ससुर के लिए,

अपनी ननद के लिये, फिर एक लंबे अंतराल के बाद समस्त जिम्मेदारियों के इतर फिर वही याद, वही कोरोना वायरस और उसके पति का उसके माथे पर लिया हुआ आखरी चुंबन. उसके पास यही यादों की वे पूंजी होगी, जिसके सहारे वे–“अपने जिंदगी की आखिरी सांस लेगी”.

#coronavirus: तीमारदारी

सरकारी अस्पताल का बरामदा मरीजों से खचाखच भरा हुआ था. छींक आने के साथ गले में दर्द, सर्दी, खांसी, बुखार से सम्बंधित मरीजों की तादाद यहां अचानक ही बढ़ गई थी.

मरीजों को सुबह से ही तमाम सरकारी अस्पताल में लंबीलंबी लाइनों में खड़े देखा जा सकता था क्योंकि इन अस्पतालों में मरीजों को पहले ओपीडी में पर्ची बनवाने के बाद ही डाक्टर के पास जाना होता था. देखने के बाद डाक्टर दवा दे कर घर भेज देते थे.

तब तक कोरोना अपने देश में आया नहीं था. एक सरकारी अस्पताल में ऐसे मरीजों की तादाद ज्यादा ही बढ़ गई.

सरकार ने इन मरीजों को गंभीर बता कर भर्ती करने के लिए कहा तो ऐसे में वहां डाक्टरों की जिम्मेदारी बढ़ गई. स्टाफ की भी जरूरत आ पड़ी.

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इन मरीजों को अलग ही वार्ड में रखा गया था. छूत की बीमारी बता कर इन मरीजों को दूर से ही दवा, खाना दिया जाता था. मरीजों के साथ एक तरह से अलग तरह का ही बरताव किया जाता था.

इन मरीजों की देखरेख के लिए सीनियर डाक्टर कमल ने अपने से जूनियर डाक्टर सुनील से कुछ को मैडिकल अटेंडेंट के तौर पर रखने के लिए कहा.डाक्टर सुनील ने किसी नर्स के माध्यम से राज को मैडिकल अटेंडेंट के तौर पर रख लिया.

‘‘बधाई हो राज, तुम नौकरी पर रख लिए गए हो. अपने काम में मन लगाना ताकि किसी को कहने का मौका न मिले. तुम यहां इनसानियत के लिए भी काम कर सकोगे. किसी लाचार के काम आ सकोगे.’’ डाक्टर सुनील ने राज का हौसला बढ़ाते हुए कहा.

“जी डाक्टर साहब,” इतना ही कह सका राज.

जो भी हो, राज  की समझ में तो यही आया कि उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई है.अस्पताल में राज को 6 महीने की पहले ट्रेनिंग दी गई. पर उसे इस छूत की बीमारी के बारे में ज्यादा नहीं बताया गया था.

जब डाक्टरों को खुद ही नहीं पता था, तो वे उसे क्या बताते. राज को अस्पताल में सबकुछ करना पड़ता था. मरीजों के टैंपरेचर, ब्लडप्रैशर वगैरह के रिकौर्ड रखने से ले कर उन्हें बिस्तर पर सुलाने तक की जिम्मेदारी उस पर थी. हर बिस्तर तक जा कर उसे मरीजों को दवा देनी पड़ती थी.

वैसे, राज अस्पताल के आसपास ही रहता था और पैदल ही चला आता था. वह एक पिछड़े इलाके से ताल्लुक रखता था और गरीब भी.

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यहां  अस्पताल की नर्स से ले कर कंपाउंडर, डाक्टर तक मरीजों को डांटते रहते थे. किसी से मिलने की मनाही थी. एकएक इंजैक्शन लगाने के लिए नर्स फीस लेती थी. डाक्टरों से बात करने में डर लगता था कि कहीं डांटने न लगें.

यहां नर्सों का दबदबा था. राज को पहले ही ताकीद कर दी गई थी कि किसी मरीज से कभी भी चाय मत पीना, वरना निकाला जा सकता है.राज को पलपल यही खयाल रहता था कि कैसे नौकरी महफूज रखी जाए.

एक दिन जब राज अपनी शिफ्ट ड्यूटी पर गया, तो उस से पहले काम कर रहे साथी उमेश ने बताया, ‘‘एक नया मरीज भरती हुआ है. उसे दवा दे देना.’’यह कह कर वह उमेश अपनी ड्यूटी खत्म कर घर चला गया.

 राज ने उस मरीज को गौर से देखा. उस के गले में बेहद दर्द था. उसे छींकें भी बहुत आ रही थीं. बुखार से उस का बदन तप रहा था. पर राज ने डाक्टर को न बुला कर डाक्टर द्वारा दी गई पर्ची के मुताबिक उसे दवा दे दी. पर उस मरीज की तबियत बिगड़ने लगी.

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अगले दिन उस मरीज की जांच की गई. डाक्टर कमल राज पर चिल्लाया, ‘‘यह क्या है…? तुम ने तो मरीज का कोई केयर ही नहीं किया है?’’यह सुन कर राज के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह बोला, ‘‘सर, मैं ने उसे दवा दी थी.’’

“पर, दवा से कुछ असर नहीं हुआ.” राज ने अपनी बात कही. उस की बात सुन कर डाक्टर कमल उस पर बिगड़ा, ‘‘तुम्हारी समझाने की ड्यूटी नहीं है. तुम्हारी लापरवाही के चलते इस मरीज की हालत बिगड़ी है. कहीं दवा से कोई इंफैक्शन न हो जाए.’’

यह सुन कर राज की बोलती बंद हो गई. डाक्टर द्वारा डांट खा कर राज अपने को अपमानित सा महसूस करने लगा.राज को बड़ी कुंठा होने लगी.अब वह अपनेआप को बड़ा बेबस महसूस कर रहा था.

यही सोच कर राज कुछ दिन की छुट्टी ले कर अपने गांव जाने की योजना बनाने लगा.अगले दिन यही सोच कर राज  सीनियर डाक्टर कमल के पास चला गया, ‘‘सर, मुझे तो अपनेआप पर शर्म आ रही है, इसलिए मैं कुछ दिन की छुट्टी ले कर गांव जाना चाहता हूं.’’

वह सीनियर डाक्टर तुरंत मुड़ा और दूसरे मरीज को आवाज दी. वह मरीज उस के चैंबर में आया. राज वहीं खड़ा उस डाक्टर और मरीज को देखने लगा.

उस मरीज को देखने के बाद सीनियर डाक्टर कमल ने राज से समझाते हुए कहा, ‘‘उस दिन उस मरीज की जान चली जाती, अगर थोड़ी देर और होती.”

“क्या तुम ने खबर देखी है कि सरकार ने इस तरह के मरीजों को कोरोना होने की बात कही है, इसलिए इन्हें भर्ती किया जा रहा है. मरीज भी पहले से ज्यादा हो गए हैं. इन मरीजों को ले कर सरकार बहुत गंभीर है. और तुम ऐसे समय में छुट्टियां मांग रहे हो. ऐसे समय में तो तुम्हें इन मरीजों की तीमारदारी करनी चाहिए. यह भी एक तरह की देशभक्ति है.”

इतना कह कर सीनियर डाक्टर कमल अपने चैंबर से चला गया.यह सुन कर राज को दुख होने लगा. डाक्टर द्वारा समझाए जाने पर उस ने छुट्टी पर न जाने का मन बनाया. उसे अब इस नौकरी का असली माने पता चला था. यही तो उस का असली काम था, जिसे करने से वह चूक रहा था.

#coronavirus: “मीडिया के बोल में निजामुद्दीन का शोर”

टीवी खौलते ही एंकरों की दनदनाती आवाज. मानों बहुत समय बाद उन्हें कुछ उन के मतलब का टोनिक मिल गया हो. इतने दिन मजदूरमजदूर की पीपरी बजा कर यह एंकर अपने असली मुददों से भटक गए थे. पिछले 4-5 दिनों से मजदूरों की पलायन की ख़बरों को चलाचला कर इन का हाल ठीक वैसे ही हो गया था जैसे इंडियन क्रिकेटरों का विदेशी पिचों पर होता है. 6-8 साल से चेनलों पर चमकते या चमकाए गए इन नए एंकरों की जमात मजदूरों के मुददों से ऐसे अज्ञान थी जैसे देश की जनता कालेधन से.

ज्यादातर एंकरों के लिए मजदूर वह शब्द था जिसे बस अपने करियर में फिलर के तौर पर ही इस्तेमाल करना था. पर उन्हें क्या पता था कि एकाएक इन के सामने मजदूरों के प्रश्न उठ खड़े हो जाएंगे. जाहिर है इन्हें सब से पहले दिक्कत इस बात की हुई की अब उन्हें जमीनी मुददों पर दिमागी कसरत करनी पड़ेगी. अलगअलग मजदूरों के आकड़ें बनाने पड़ेंगे. कौन निचला है, कौन मंझला है, कौन ऊपर है इन प्रश्नों से रूबरू होना पड़ेगा.

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उस बारे में बात करनी पड़ेगी जिसे छिपाने के लिए 6-8 साल कमरतोड़ मेहनत की. काले कोट और सफ़ेद कालर पहने इन एंकरों को अब बदबूदार गंदे गरीबों को अपने चैनल में जगह देनी पड़ेगी. जाहिर है इन एंकरों ने कभी भी जमीन के मुददों पर न कोई स्क्रिप्ट तैयार की और न ही इन से किसी ने करवाई. इसलिए ये बिन पानी मछली की तरह तड़प रहे थे. अपनी घिसीपिटी भारतपकिस्तान, हिन्दूमुसलमान, देशभक्तिदेशद्रोही की कोपीपेस्ट स्क्रिप्ट की इन्हें याद सता रही थी.

मीडिया फिर से आवारा हो गई है

देरसवेर ही सही इन के अरमान पुरे हुए. अब निजामुद्दीन का मसला टीवी चैनल पर मानो थमने का नाम न ले रहा है. यह खबर एंकरों के लिए मानो वह आक्सीजन की सप्लाई थी जिस के न होने के कारण गोरखपुर में बच्चों की मौत हुई. इन्होने नफरत फैलाने वाली फाइलों का थौथा फिर से निकाल लिया है. निकाल लिया का मतलब यह नहीं की आलमारी से निकाला, बल्कि वहीँ उन के सामने टेबल पर ही यह फाइलें पड़ी हुईं थी. कमबख्त धूल भी नहीं जम पाई थी इन फाइलों में. जुम्माजुम्मा 7 ही दिन तो हुए थे फाइलों को पड़े.

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“कोरोना जिहाद से देश बचाओ”, “धर्म के नाम पर जान लेवा अधर्म”, “निजामुद्दीन का विलेन कौन”, “देवबंद में बंद 500 कोरोना बम”, “तबलीगी वायरस”, “थूक जिहाद”, “निजामुद्दीन में छुपे संदिग्ध” जैसे कई टाइटल डाल न्यूज चैनलों को मानो रेगिस्तान में पानी मिल गया हो. फिर शुरू हो गया है वही खेल जिस के फैर में फंस कर हर समय जनता गुमराह ही हुई है. ये हर मुद्दे को हिन्दू बनाम इस्लाम से जोड़ देना चाहते हैं. कारण, इसे जोड़ कर सरकार के काले करतूत को छुपाने में आसानी होगी. इन एंकरों की भाषा कम्युनल जान पड़ रही है. इस में इस्लाम और मुसलमानों के प्रति खीज, आक्रोश, नफरत है जो इन के चैनलों के प्राइमटाइम को देख समझ आ रहा है. इन्हें देख लग रहा है कि मस्जिदें, दरगाह ही हर चीज की समस्या है और इन का खात्मा हर समस्या का निदान.

क्या है तबलीगी जमात

खैर, मामला गंभीर है, मोटामोटी यह कि तबलीगी जमात पर आए देशविदेश के लोग निजामुद्दीन में इकठ्ठा हुए. हालाँकि यह हर साल होने वाला कार्यक्रम है. हजारों की संख्या में पुरे देश और विदेशों से इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग इकठ्ठा होते हैं. इस में संख्या को ले कर कोई लिखित या स्पष्ट नियम नहीं है. इस जत्थे का एक नेता होता है जिसे अमीर कहा जाता है. यह मुख्य मरकज़ निजामुद्दीन से अनुमति ले 3 दिन/ 40 दिन/ 4 माह/ या 1 साल के लिए भ्रमण करते है अपनी सारी रिपोर्ट या अनुभव निजामुद्दीन मरकज में साझा करते है, जिसे कालगुजारी कहा जाता है. जाहिर है यह हर साल होने वाला कर्यक्रम होता है तो इस के बारे में सरकार को उचित जानकारी रहती है. यहाँ तक की जो लोग विदेश से इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुँचते है उन्हें सरकार ही स्टाम्प लगा कर अनुमति देती है. यानी यह धार्मिक त्यौहार सरकार की नजरों के सामने पहले से ही था. उन्हें मोटामोटी जानकारी थी की कार्यक्रम में कितने लोग शिरकत लेने वाले हैं.

सरकार और पुलिस की लापरवाही

22 मार्च की तारीख से दिल्ली में लाकडाउन की प्रक्रिया की शुरूआत हुई. पहले दिन ‘जनता कर्फ्यू’ लगाया गया उस के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री के द्वारा 23 से 31 मार्च की तारीख तक ‘बंद’ का ऐलान, फिर अंत में केंद्र सरकार द्वारा 24 मार्च से 14 अप्रैल की तारीख तक पुरे देश को ‘लाकडाउन’ किया गया. जाहिर है यह एकाएक किया गया लाकडाउन था. और इसका हश्र यह हुआ कि 22 के बाद दिल्ली में फंसे लाखों लोगों को संभलने का मौका नहीं मिला. यही कारण था कि हजारों की संख्या में मजदूरों ने यहाँ से पैदल ही अपने घरगांव की तरफ पलायन यात्रा की जो अभी भी जारी है. साथ ही हजारों दिल्ली में पढ़ रहे छात्रों को अपने होस्टल, पीजी, कमरों, मदरसों में बिना संभले कैद होना पड़ा. इसी कड़ी में निजामुद्दीन में फंसे जमात के वे लोग भी आए जिसे इस समय मीडिया और सोशल मीडिया में बुरी तरह ट्रोल किया जा रहा है. पूरा दोष जमातियों के ऊपर डाला जा रहा है. अन्दर के पैच भी सामने दिख रहे है जिसमें प्रशासनिक लापरवाहियां सामने आ रही हैं. यह मसला सुलझाया कम विवादित ज्यादा किया जा रहा है.

इन जमातियों में से कुछ लोगों को कोरोना संक्रमण होने की खबर मिली है. जिसमें पता चला है कि इसमें शामिल 6 जमाती कर्नाटक में और 1 जम्मू कश्मीर में कोरोना से मर चुके हैं. यकीनन यह सरकार की नाकामी ही है कि खबर होते हुए भी कोई जरुरी कदम नहीं उठाए गए. पुलिस की नजर में इतनी बड़ी भीड़ लाकडाउन से ही वहां कैद थी तो एहतियातन उन्हें वहां से हटाया क्यों नहीं गया? आखिर क्या इस दिन का इन्तेजार किया जा रहा था कि इसे मीडिया कब हिन्दू बनाम मुसलमान का मसाला बना उछाले? जाहिर है यह प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है कि न तो संभलने का मोका दिया गया और न ही विदेश से आए जमातियों की स्क्रीनिंग की गई. भारत में पहला कोरोना का मामला 30 जनवरी को सामने आ गया था. उस के बाद सरकार ने बाहर से आ रहे विदेशियों में कोरोना के पहचान के लिए क्या जरुरी कदम उठाए और जो यहाँ उस से पहले से ही मौजूद विदेशी सैलानी थे उन्हें किस तरह से ट्रैक कर उन की स्क्रीनिंग की गई यह सवाल जानने के लिए गूगल मत कीजियेगा क्योंकि मीडिया के जरिये आम लोगों के लिए यह राज ही बने रहेंगे.

मीडिया को नफरत फैलाने से रोका नहीं गया तो स्थिति और खराब हो सकते हैं

यह सच है मुस्लिमों को ट्रोल करना इस समय सब से आसान है इसलिए किया भी जा रहा है. वरना हिन्दू धर्म को मानने वाले 400 लोग इस समय वैष्णो देवी में फंसे है. मीडिया और ट्रोलर के लिए अंतर यह है की वैष्णो देवी में श्रद्धालु ‘फंसे’ है और निजामुद्दीन में जमाती संदिग्ध ‘छुपे’ हैं. दोगलेपन की सीमा इन एंकरों की तब और ज्यादा दिख जाती है जब सीएम योगी आदित्यनाथ राममंदिर के दर्शन के लिए सेकड़ों के साथ लाकडाउन को तोड़ कर निकल पड़ते हैं. लेकिन मजाल इन की जो उस पर सवाल उठा सके.

आज मीडिया का उद्देश्य जागरूक करना नहीं भय और नफरत फैलाना हो गया है. जो सवाल लापरवाह सरकार, चाहे वों दिल्ली की हो या केंद्र की, उन से पूछने की जरुरत है उसे भटका कर हिन्दू बनाम मुस्लिम किया जा रहा है. इस से पहले कोरोना को ले कर नस्लीय हमले हम देख चुके हैं. जब उत्तरपूर्वी राज्यों के लोगों को ‘कोरोना’ और ‘चायनीज’ कह कर उन के मुह पर थूका जा रहा था. अब बन्दूक की नली मुसलमानों की तरफ घुमा दी गई है. लोग अब समस्याओं को भूल निजामुद्दीन का मुद्दा ले कर बैठा है. इस नफरत के साथ इस बिमारी को खत्म नहीं किया जा सकता. प्रधानमंत्री ने लाकडाउन के दिन जनता से अपील की थी साथ देने की.

जाहिर है उस अपील में देश के 21 करोड़ मुस्लिम भी थे. यह समुदाय पहले से ही सरकार पर विश्वास खो चुका है. ऐसी परिस्तिथि में अगर और उन्हें कुरेदा गया तो स्थितियां और बिगडती चली जाएंगी. इस बिमारी के खात्मे के लिए सरकार की पहलकदमी और जनता की एकता जरुरी है. अगर मीडिया ऐसे ही धार्मिक नफरत फैलाती रहेगी तो संभावित सरफिरे पैदा होंगे जो इस संक्रमण को फैलाने का ही काम करेंगे. अभी सोशल मीडिया में रिएक्सन आने शुरू हो गए हैं जिस मे मुसलामानों से दूरी बनाने की हिदायत दी जा रही है. कोई सीधा गोली मारने, भगा देने की बात कर रहा है. मीडिया के फैलाए इस धार्मिक जहर में इस की मार सब से नीचे के गरीब मुसलमानों को पड़ने वाली है जो हिन्दू मकानमालिकों के घर पर किरायदार के तौर पर रह रहे हैं. वह इस लाकडाउन में बेघरों में शामिल होने वाले हैं जिन्हें पुलिस सड़कों में पीटेगी. यह पूरा साइकिल सिर्फ मुस्लिम विरोधी ही नहीं गरीब मजदूर विरोधी है. इसे प्रशासन को जल्द से जल्द रुकवाने की जरुरत है.

#coronavirus: लॉक डाउन में मिडिल क्लास का दर्द

देश की वर्तमान स्थिति कुछ इस तरह की है कि 21 दिनों के लिए लोगों को घर में शांत बैठने की जितनी हिदायतें दी जा रही हैं उतनी ही अशांति उन के मन में कौंध रही है. इस बात को समझने के लिए किसी का अर्थशास्त्री होना जरूरी नहीं कि देश की अर्थव्यस्था 2016 की नोटबंदी के बाद से ही चरमराई हुई है और अब लौकडाउन के बाद इस के पूरी तरह से ध्वस्त होने की गुंजाइश और अधिक बढ़ गई है.

दिहाड़ी मजदूरों की बाद करना व्यर्थ है क्योंकि उन के लिए यह स्थिति किसी त्रासदी से कम नहीं. वहीं, उच्च वर्ग से भी इस त्रासदी का सरोकार उतना अधिक नहीं क्योंकि उस का अकाउंट उस की जरूरतों के हिसाब से भरा हुआ है और आने वाले 2-3 महीने तो क्या उस से ज्यादा समय के लिए भी वह अपना भरणपोषण पहले की तरह ही कर सकता है.

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तेलंगाना और महाराष्ट्र सरकार ने यह घोषणा भी कर दी है कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन में कटौती की जाएगी. हो सकता है अन्य राज्य सरकारें भी जल्द ही वेतन कटौती की घोषणा कर दें. सवाल उठता है मध्य वर्ग का कि वह किस तरह से अपने बजट को बनाए रख पाता है. यह वह वर्ग है जिस के अकाउंट में पैसा तो है पर इतना नहीं कि यह 2 महीने से ज्यादा घर बैठ कर खा सकता है. यह वह वर्ग है जो यदि हाथ पर हाथ रखे बैठा रहे तो इसे भी दिहाड़ी मजदूरों की तरह होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा.

आर्थिक मंदी का दौर

2016 की नोटबंदी और 2017 के जीएसटी लागू होने के बाद भारतीय अर्थव्यसथा लगातार गिरी है. कहने को तो भारतीय अब भी इस मार को झेल रहे थे कि उन को एक और मार कोरोना वायरस के रूप में पड़ गई. घर पर 21 दिनों के लिए रहने का मतलब है नौकरी पर न जा पाना. नौकरी पर न जाने का मतलब यह नहीं कि पैसा आना पूर्ण रूप से बंद हो गया है परंतु यह बात भी ध्यान में रखने वाली है कि हर व्यक्ति वर्क फ्रौम होम भी नहीं कर रहा है. इस का अर्थ है कि हर व्यक्ति के अकाउंट में महीने की निश्चित राशि शायद न आ पाए क्योंकि अर्थव्यवस्था की मार तो व्यक्ति की कथित कंपनी को भी पड़ रही है और ऐसे में कटौती होना निश्चित है. सरकार के इस अनायास लौकडाउन ने सप्लाई चैन को त्रस्त कर दिया है जिस का परिणाम आर्थिक क्षति के रूम में हम सभी को भुगताना पड़ रहा है. वैसे भी औनलाइन शौपिंग वैबसाइट्स बंद पड़ी हैं, फूड सप्लाई कम हुई है, आयातनिर्यात लगभग बंद है और साथ ही अनेक छोटे बड़े व्यापार घाटे में हैं.

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ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इस लौकडाउन के बढ़ने की पूरी संभावना है. स्पष्ट तौर पर यह कोरोना वायरस तभी खत्म होगा जब इस की वैक्सीन आएगी. जब तक वैक्सीन नहीं बन जाती इस के पूरी तरह खत्म होने की संभावना नहीं है क्योंकि भारत ट्रांसमिशन के तीसरे स्टेज पर है जिस के बाद सब कुछ सामान्य होना मुश्किल है. वैक्सीन आने पर भी भारत के हर एक व्यक्ति को वैक्सीनेट करना चंद दिनों का काम नहीं है. यानी कम से कम एक साल तक हम सभी को कोरोना वायरस से जूझना पड़ सकता है.

ऐसे में यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी हो जाता है कि मध्यवर्ग समझदारी और सूझबूझ के साथ अपनी आर्थिक स्थिति पर ध्यान दे जिस से वह आने वाले वक्त के लिए पहले से ही तैयार हो व लौकडाउन खत्म होने के पश्चात उस पर अर्थव्यवस्था की मार कम पड़े.

खर्चों पर लगाम कसने की जरूरत

आप इस समय घर पर हैं जिस से आप का बाहर आनेजाने का खर्च, होटल में खाने का खर्च, मार्केट जा कर हजारों की शौपिंग का खर्च आदि बच रहा है. इस सेविंग को आने वाले समय के लिए बचाए रखिए. यह न हो कि लौकडाउन ओवर होते ही आप अपनी सेविंग्स एक बार में उड़ा दें. यह समय है अपने खर्चों को कंट्रोल करने का क्योंकि लौकडाउन खत्म होने के बाद भी आप के औफिस से शायद आप को आप की पूरी तनख्वाह न मिले और आप के बचे हुए पैसे भी हवा हो जाएं.

अपने खर्चों का एक खाका तैयार कर लें. आप को जिन चीजों की अत्यधिक जरूरत हो केवल उन पर ही खर्च करें. घर का बजट बनाएं और उस के हिसाब से चलें. मेडिकल इमरजेंसी के लिए हमेशा तैयार रहें. घर के बजट का एक हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं के लिए हमेशा बचाए रखें.

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घर में सामन को ओवरस्टौक न करें. बड़ी मात्रा में चीजें खरीदने से पहले भी यह ध्यान में रखें कि यह चीजें कितने समय तक सही रह सकती हैं और क्या सचमुच आप को इतनी अधिक मात्रा में इन की जरूरत है या नहीं. जैसे खाद्य पदार्थों को सोचसमझ कर स्टौक करें. महंगाई के डर से ऐसा न हो कि आप घर में 20 किलो आलू जमा कर लें और उन में से 5 किलो पड़ेपड़े ही सड़ जाएं.

कई लोग एंजाइटी या तनाव के चलते औनलाइन शौपिंग करने लगते हैं और खुद को रोक नहीं पाते. यह आदत खासकर महिलाओं और लड़कियों में होती है. हालांकि, इस समय और्डर की शिप्पिंग नहीं हो रही लेकिन पेमेंट के साथ और्डर किया जा सकता है. यह वह समय नहीं हैं जब आप अपने पैसे बिना सोचे समझे शौपिंग में उड़ा सकें. सोचसमझ कर पैसे बचाएं न कि उड़ाएं.

एंटर्टेंमेंट रिसौर्सेस जैसे नेटफ्लिक्स या प्राइम की मैम्बरशिप लेने से बचें या लेनी हो तो किसी एक की ही लें. अगर आप हर पोर्टल की मैम्बरशिप लेंगे तो इस में भी आप की अच्छी खासी राशि व्यर्थ होगी. इसी तरह आप जिनजिन औनलाइन ऐप्स या पोर्टल पर पैसे भरते हैं, जिन की आप को कुछ खास जरूरत न हो, उन से सब्स्क्रिप्शन हटा सकते हैं.

अगर आप के बैंक से आप के बिलों की औटोमैटिक पेमेंट होती है तो यह बिलकुल सही समय है कि आप इस पर ध्यान दें. कुछ बिलों के भुगतान औनलाइन सही हैं परंतु अगर कोई ऐसे बिल हैं जिन की पेमेंट आप घर में रहते हुए नहीं करना चाहते तो उन्हें आप औटोमैटिक पेमेंट औपशन से हटा दीजिए.

इस समय किसी को उधार देने से पहले एक बार अच्छे से विचार करें. यदि कोई ऐसा व्यक्ति है जो लंबे समय तक पैसे ले कर वापस चुकाता नहीं है तो उसे बड़ी राशि उधार में न दें. मदद का हाथ बढ़ाना सही है परंतु सोचसमझ कर.

Lockdowm: लॉकडाउन के कारण भतीजे के फ्यूनरल में शामिल नहीं हो पाए सलमान खान

सलमान खान के परिवार के लिए यह समय बेहद ही दुख का है. उनके भतीजे अबदुल्ला खान का निधन हो गया हैं. जिस वजह से पूरा परिवार शोक में डूबा हुआ है. कोरोना की वजह से सलमान और उनका पूरा परिवार अबदुल्ला के अंतिम संस्कार में भी नहीं जा पाया.

बता दें कि अबदुल्ला सलमान खान के बहुत करीब थे. वह अंतिम संस्कार में न पहुंच पाने की वजह से बहुत दुखी है. अबदुल्ला का पूरा परिवार इंदौर में रहता है. इस वक्त वहां पहुंचना बहुत मुश्किल था. लेकिन सलमान बाद में अबदुल्ला के परिवार वालों से मिलने जरूर जाएंगे.

 

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अबदुल्ला कि मौत दिल का दौरा पड़ने से हुआ है. उन्हें लंग इंफेक्शन भी था. यह खबर सलमान के मैनेजर जोर्डी पटेल ने दिया है.

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इन दिनों सलमान खान अपने परिवार के साथ पनवेल फार्महाउस में हैं. वहां अपने परिवार वालों के साथ समय बीता रहे हैं. सलमान को अपने भतीजे से अंतिम समय में नहीं मिलने का बेहद मलाल है.

 

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सलमान अपने सोशल मीडिया पर इन दिनों काफी एक्टिव रहते हैं. अपने परिवार और भांजे के साथ मस्ती करते हुए तस्वीर शेयर करते रहते हैं. उन्हें अपने परिवार वालों के साथ समय बिताना सबसे अच्छा लगता है. शायद यहीं वजह से जो सलमान खान अभी तक अपना पुराना घर गैलेक्सी अपार्टमेंट छोड़ नहीं पाएं है.

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सलमान अपनी बहन अर्पिता से बहुत क्लोज हैं. हाल ही में सलमान की बहन ने सलमान के बर्थ डे के दिन बेटी को जन्म दिया है. जो सलमान खान के लिए सबसे बड़ा गिफ्ट है.

वर्क फ्रंट की बात करें तो सलमान कई नए प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं, लेकिन कोरोना के चलते सभी काम को बंद करके अपने फैमली के साथ हैं.

#coronavirus: एक फोन से एम्स से जुड़ जायेंगे डॉक्टर्स

 केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने बीते सप्ताह  ‘राष्‍ट्रीय दूरभाष-परामर्श केंद्र (कॉनटेक) (CoNTeC)’ का शुभारंभ किया. ‘कॉनटेक’ परियोजना दरअसल ‘कोविड-19 नेशनल टेलीकंसल्टेशन सेंटर’ का संक्षिप्त नाम है. इसकी परिकल्‍पना स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने की है और इसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा कार्यान्वित किया गया है.

* क्या हैकॉनटेक’ ?

‘कॉनटेक’ एक टेलीमेडिसिन केन्द्र है जिसकी स्थापना अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान., नई दिल्ली के द्वारा की गई है, जिसमें देश भर से विशेषज्ञों के बहु-आयामी सवालों का उत्तर देने के लिए विभिन्न नैदानिक क्षेत्रों के विशेषज्ञ डॉक्टर 24 घंटे उपलब्ध होंगे. यह एक बहु-मॉडल दूरसंचार केन्द्र है जिसके माध्यम से देश के अलावा विश्व के किसी भी हिस्से से दोनों ओर से ऑडियो-वीडियो वार्तालाप के साथ-साथ लिखित संपर्क भी किया जा सकता है. संचार साधनों के रूप में, सरल मोबाइल टेलीफोन के साथ-साथ दोनों और से वीडियो वार्तालापों के लिए व्हाट्सएप, स्काइप और गूगल डुओ का उपयोग किया जाएगा.

कॉनटेकसे संपर्क कैसे करें ?

‘कॉनटेक’ से संपर्क करने के लिए कोविड-19 का उपचार करने वाले चिकित्सकों के द्वारा देश/दुनिया में कहीं से भी एकल मोबाइल नंबर (+91 9115444155) डायल किया जा सकता है जिसमें छह लाइनें हैं जिनका वर्तमान में एक साथ उपयोग किया जा सकता है. भविष्य में जरूरत पड़ने पर लाइनों की संख्या बढ़ाई जा सकती है. इनकमिंग कॉल्स को कॉनटेक प्रबंधकों द्वारा उठाया जाएगा, इसके पश्चात कोविड-19 का उपचार कर रहे विशेषज्ञ चिकित्सकों की इच्छानुसार नैदानिक क्षेत्रों के विशेषज्ञ चिकित्सक से उनकी बात कराई जाएगी.

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आगे प्रबंधक, कॉल करने वालों विशेषज्ञों की इच्छानुसार व्हाट्सएप, स्काइप या गूगल डुओ के माध्यम से दोनों ओर से वीडियो कॉल संपर्क स्थापित करने में मार्गदर्शन करेंगे. एनएमसीएन नेटवर्क से कॉल करने वाले व्यक्त अपनी ओर से किसी भी समय टेलीमेडिसिन बुनियादी सुविधा का उपयोग करके संपर्क कर सकते हैं.

* वास्तविक समय में एम् से जुड़ाव होगा

डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि ‘कोविड-19’ के मरीजों के इलाज के लिए देश भर के डॉक्टरों को वास्तविक समय में एम्‍स से जोड़ने के लिए ही एम्‍स में ‘कॉनटेक’ को चालू किया गया है. डॉक्टर चौबीसों घंटे इस केंद्र में उपलब्ध रहेंगे और इसे चौबीसों घंटे चालू भी रखेंगे.  यहां तैनात किए जाने वाले डॉक्टरों के लिए भोजन एवं ठहरने की सुविधा भी उपलब्ध है. इसे एम्स में इसलिए स्थापित किया गया है, ताकि छोटे राज्य भी एम्स के डॉक्टरों के व्‍यापक अनुभवों से लाभ उठा सकें.

देश भर के डॉक्टर आपस में जुड़ेंगे

कोविड-19 के रोगियों के इलाज के लिए दुनिया भर में डॉक्टर अलग-अलग प्रोटोकॉल का उपयोग कर रहे हैं और इस केंद्र का लक्ष्‍य देश भर के डॉक्टरों को आपस में जोड़ना है, ताकि वे एक साथ प्रोटोकॉल पर चर्चा कर सकें और तदनुसार सर्वोत्तम उपचार प्रदान कर सकें.

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टेलीमेडिसिन संबंधी दिशा-निर्देश भी भारत सरकार द्वारा अधिसूचित कर दिए गए हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म एवं प्रौद्योगिकी की मदद से बड़े पैमाने पर जनता को न केवल कोविड-19, बल्कि अन्य बीमारियों के उपचार में भी सहूलियत होगी.

* गरीब से गरीब व्यक्ति को सर्वोत्तम उपचार सुलभ होगा

भारत एक विशाल देश है और गरीबों तक पहुंचने के लिए प्रौद्योगिकी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. देश के गरीब मरीजों को किसी भी परिस्थिति में गुणवत्तापूर्ण इलाज से वंचित नहीं किया जाना चाहिए. वर्तमान परिस्थिति में गरीबों को भी देश के सर्वोच्च डॉक्टरों की सुविधा मिल सकेगा.

डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि प्रतिष्ठित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में इस केंद्र को चालू करने का मुख्‍य उद्देश्य देश के गरीब से गरीब व्यक्ति को सर्वोत्तम उपचार सुलभ कराना है. एम्स को एक साथ जोड़ने की आवश्यकता है ताकि वे स्वास्थ्य क्षेत्र में देश के लिए नीति कार्यान्वयन में और अधिक मदद कर सकें. एम्स को अपने बीच परामर्श, टेलीमेडिसिन, शिक्षा, प्रशिक्षण, सहभागिता और प्रोटोकॉल के आदान-प्रदान के लिए जिला अस्पतालों के साथ समन्वय स्थापित कर मानक बनना चाहिए.

‘कॉनटेक’, लखनऊ के एसजीपीजीआई स्थित राष्ट्रीय संसाधन केंद्र के साथ एनएमसीएन के माध्यम से जुड़े 50 मेडिकल कॉलेजों के बीच वीडियो सम्मेलन (वीसी) का संचालन करने के लिए पूरी तरह से राष्ट्रीय मेडिकल कॉलेज नेटवर्क (एनएमसीएन) के साथ एकीकृत है. रोगी प्रबंधन सलाह को एम्स के निदेशक  द्वारा नामित एम्स की टीम द्वारा तैयार किए गए राष्ट्रीय दिशा-निर्देश परिपूरक प्रोटोकॉल के अनुसार मानकीकृत किया जाएगा.

सूखे फूलों को भी बना सकते हैं आमदनी का जरिया

आज जिस तरीके से हम फल सब्जी की प्रोसेसिंग करते हैं ,उन्हें सुखाकर रखते हैं चाहे वह घरेलू तौर-तरीके हो या आधुनिक. ऐसे ही कुछ तरीकों से हम फूलों को भी सुखाकर फायदे का सौदा बना सकते हैं .
जानकारों का कहना है कि सूखे फूलों की विदेशों में खासी मांग है और भारत से अनेक देशों में इन्हें निर्यात भी किया जाता है .
शुष्क तकनीक द्वारा खिले हुए फूलों को मुरझाने से पहले ही संरक्षित किया जाता है . फूलों को सुखाने के लिए पौधे से केवल फूल ही नहीं काटा जाता ,बल्कि उसका पूरा तना काटा जाता है , जिसमें, फूल,उसकी पत्तियां ,बीज, कलियां भी शामिल होती हैं.
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क्या है फूल सुखाने  की तकनीक : फूलों को सुखाने ये लिए उन्हें सुबह के समय काट लिया जाता है, उसके बाद उनके छोटेछोटे गुच्छे बना लिए जाते हैं, जिन्हें रस्सी के सहारे किसी अंधेरे कमरे में लटका दिया जाता है. लटकाने के लिए छत पर रस्सी का बांस आदि लगाया जा सकता है, जिस पर उन गुच्छों को लटकाया जाता है. अंधेरे कमरे में गर्मी और हवा का आवागमन भी होना चाहिए , लेकिन एक बात याद रखें कि फूलों को सुखाने के बाद उनका प्राकृतिक रंग कुछ हल्का हो जाता है जिन्हें बाद में खास तरीकों से रंगा भी जा सकता है.
इसके अलावा फुल सुखाने की अनेक तकनीकियां है ,जैसे दाब शुष्कन विधि , बंद चूल्हा शुष्कन विधि , सूर्य की रोशनी में सुखाना, कम तापमान पर सुखाना, ग्लिसरीन शुष्कन विधि.
लेकिन इन सबके लिए आप को ट्रेनिंग लेनी होगी तभी इस काम को कर सकते हैं इस की बारीकियों को समझना होगा.
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किसी काम को शुरू करने के लिए कहीं ना कहीं से शुरुआत करनी होगी प्रकृति के भरोसे, रहकर, या सरकार के भरोसे रहकर यह काम नहीं हो सकते .हमें खुद को मजबूत बनाना होगा, समय के साथ खुद को बदलना होगा ,नई तकनीकियों को सीखना होगा तभी हम अपना आने वाला कल बेहतर बना सकते हैं.
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