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#coronavirus: कोरोना पीड़ितो के लिए कार्तिक आर्यन ने डोनेट किए इतने करोड़, लिखा-इमोशनल मैसेज

कोरोना वायरस से इस वक्त भारत सरकार और भारत वासी एकजुट होकर लड़ रहे है . भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस आपदा की घड़ी में लोगों से अपील की है कि वह अपने सामर्थ्य के अनुसार आर्थिक तौर से सरकार का सहयोग करें. युवा सुपरस्टार कार्तिक आर्यन ने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए प्रधानमंत्री केयर्स फंड में 1 करोड़ रुपये का योगदान करने का निर्णय लिया है.

 

कार्तिक का इस बारे में कहना है कि यह उनकी अपनी जिम्मेदारी है कि वह जरूरतमंदों के काम आ सकें. चूँकि कार्तिक साफ़ तौर पर मानते हैं कि आज वह जो कुछ भी हैं, वह आम लोगों की वजह से ही हैं. कार्तिक ने ट्विटर पर अपनी बात रखते हुए कहा, ” यह समय की मांग है कि हम सब एक देश के तौर पर साथ खड़े हो. जो भी आज मैं हूं, जो भी पैसे मैंने कमाए हैं, वो सब देश की जनता की वजह से कमाए हैं. और हमारे लिए मैं पीएम-केयर्स फंड में 1 करोड़ रुपये डोनेट कर रहा हूं.

 

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We need each other now more than ever. Let’s show our support ??

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मैं अपने सभी देशवासियों से निवेदन करता हूं वह इस विपदा के समय में ज्‍यादा से ज्‍यादा दान दें.” कार्तिक ने सभी लोगों से अपील की है कि वह भी इस नेक काम में आगे आयें और अपने सामर्थ्य के अनुसार जितना संभव हो सके, अपना योगदान दें. कार्तिक का यह ट्वीट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है.

 

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Apni picture Sunday ko Family ke saath baithke TV pe dekhne wali feeling… Still unbeaten ❤️ And Mummy Never waits for credits?

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बता दें कि कार्तिक ने कोरोना वायरस को लेकर कुछ दिनों पहले अपने मोनोलॉग का एक बेहतरीन वीडियो जारी किया था, जिसमें उन्होंने अपने चितपरिचित अंदाज में लोगों से अपने घरों में रहने की अपील की थी. वह वीडियो खूब वायरल भी हुआ. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्तिक के इस कदम की सराहना करते हुए अपने पेज पर शेयर किया था . अब कार्तिक ने देश की मदद के लिए इतनी बड़ी धनराशि डोनेट करते हुए युवा पीढ़ी को प्रेरित करने का प्रशंशनीय काम किया है .

 

Lockdown: रश्मि देसाई ने लगाई झाड़ू तो इस वजह से ट्रोल करने लगे यूजर, देखें VIDEO

कोरोना वायरस की वजह से सभी स्टार्स इन दिनों अपने घर पर हैं. ऐसे में टीवी जगत की मशहूर कलाकार रश्मि देसाई अपने घर की सफाई करती नजर आई.

दरअसल, रश्मि देसाई अपने घर में मेकअप करके झाडू लगा रही हैं. यह वीडीयो रश्मि ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर किया है. जिसके बाद ट्रोलर्स रश्मि के इस नए लुक को देखने के बाद कई तरह के सवाल खड़े करने लगे.

कुछ ने कहा रश्मि लोगों को दिखाने के लिए झाडू लगा रही है तो वहीं कुछ यूजर्स ने सवाल किया कि मेकअप करके कौन झाडू लगाता है. इसके बाद लगातार लोग रश्मि को ट्रोल करने लगे.

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हालांकि रश्मि को भी क्या पता था कि उसे वीडियो डालने के बाद ट्रोलर्स का शिकार होना पड़ेगा. वैसे इस पर रश्मि अभी तक अपने सफाई में कुछ भी नहीं कही है. रश्मि इन दिनों अपने फैमली के साथ क्वालिटी टाइम बिता रही है.

 

 

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Clean home ? @imrashamidesai #rashmidesai busy during #Lockdown21 . . .#bb13 #biggboss13 #viralbhayani?

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रश्मि देसाई सबको सीरियल उतरन से सभी को पसंद आने लगी थी. इस शो में उन्हें सभी घरों में पसंदीदा बहू के रूप में देखने लगे थे लोग.

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हाल ही में रश्मि सलमान खान के सबसे विवादित शो बिगबॉस 13 का हिस्सा बनी थी. इस शो में भी लोगों को रश्मि का किरदार खूब पसंद आया था. रश्मि देसाई इस शो के आखिरी तक घर में बनी हुई थीं. हालांकि टॉप थ्री का हिस्सा नहीं बन पाई थीं.

खबर है रश्मि जल्द ही सीरियल नागिन में नजर आएंगी. फैंस रश्मि के कमबैक का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. इसके अलावा भी रश्मि के पास कई प्रोजेक्ट्स है जिसका खुलासा रश्मि जल्द ही करेंगी.

#coronavirus: ओसीडी से पीड़ित व्यक्ति कोरोना एंजाइटी से कैसे बचें

कोरोना वाइरस लोगों में एंजाइटी और डिप्रेशन जैसी समस्याओं का मुख्य कारण बन रहा है लेकिन इस का अत्यधिक प्रभाव उन पर है जो ओसीडी यानी ओब्सेसिव कंपलसिव डिसोर्डर से पीड़ित हैं. हाथों को बारबार साफ करना, अपने आसपास सफाई रखना, उपकरण व डिजिटल सरफेस को साफ रखना आदि जहां साधारण व्यक्तियों के लिए सामान्य काम हैं वही ओसीडी से पीड़ित व्यक्ति के लिए यह काम एंजाइटी का कारण बनते हैं

.इसे स्पष्टरूप से इस तरह समझा जा सकता है कि सामान्य व्यक्ति जहां 20 सेकंड तक हाथ धोता रहेगा वहीं ओसीडी से पीड़ित व्यक्ति इस बात से ही घबराने लगेगा कि आखिर उसे 20 सेकंड बाद रुक जाना है या नहीं, या उसे अपने हाथों को और ज्यादा साफ करने के लिए 20 मिनट के अंतराल की जगह हर 5 मिनट में ही हाथ धो लेने चाहिए या नहीं.इस पर मेंटल एंड बिहेवीओरल साइन्सेस की हैड औफ डिपार्टमेंट कामना छिब्बर का कहना है, “यह समझना बेहद जरूरी है कि इस तरह की स्थिति से कई और ट्रिगर्स दब सकते हैं जिन से व्यक्ति को पहले से भी ज्यादा एंजाइटी हो सकती है. सो, जिस व्यक्ति को साधारणतया एंजाइटी नहीं होती है उसे भी इस स्थिती में एंजाइटी होने लगती है और यदि पहले से ही उस व्यक्ति की स्थिति नाजुक है तो हाइपरविजीलेंस में वृद्धि होती है. इस से व्यक्ति में तनाव और एंजाइटी और अधिक बढ़ जाती है.”

ओसीडी को केवल ओब्सेसिव क्लीनलिनेस के रूप में ही नहीं आंका जा सकता. कई लोगों में ओसीडी से एक्सट्रीम हाइपोकांड्रिया या उन के मस्तिष्क में अपने आसपास के व्यक्तियों को कहीं उन के कारण किसी तरह का नुकसान न पहुंचे, जैसे अत्यधिक तीव्र विचार भी कौंधने लगते हैं. नोवल कोरोना वाइरस से उन में डर, बाध्यकारी व्यवहार, एक ही काम को करते रहना और असाधारण रूप से तनाव लेना व खुद को बुरी तरह से तटस्थ कर लेने जैसी स्थिती पैदा होने लगती है.

यह स्थिति सभी में अलग हो सकती है और इस का प्रभाव भी किसी पर ज्यादा तो किसी पर कम पड़ सकता है. अतः ओसीडी से पीड़ित व्यक्ति कुछ बातों को ध्यान में रख कोरोना के समय होने वाली एंजाइटी से नजात पाया जा सकता है:

– अगर आप का किसी तरह का ट्रीटमेंट चल रहा है तो उसे बीच में न रोकें. अपने डाक्टर से कोंटेक्ट में रहें और अपनी दवाएं न रोकें.
– आप एक ही काम को बारबार दोहरा नहीं रहे हैं इस बात को सुनिश्चित करने के लिए अपने परिवार के लोगों की मदद लें. उन्हें कहें कि यदि वे आप को रिपीटेटिव ओब्सेसिव मैनर में देखें तो टोकें.
– बैलेंस बनाने की कोशिश करें. अजीब ख्याल आने लगें तो डाक्टर द्वारा बताए गए स्टेप्स फौलो करें.
– झूठी खबरों से दूर रहें और केवल विश्वस्नीय जानकारी को ही अपने दिमाग में घर करने दें. सोश्ल मीडिया एंजाइटी बढ़ाने का काम कर सकता है इसलिए उस पर भी सीमित समय के लिए ही एक्टिव रहें.
– कोई सवाल मन में हो तो उस एक सवाल को ओवरथिंक करने के बजाए उस के जवाब ढूंढने की कोशिश करें.
– डाक्टर द्वारा दी गई एक्सरसाइज करते रहें और अपने डेली रूटीन को सामनी बनाए रखने की कोशिश करें.
कोरोना वाइरस कुछ समय में खत्म हो जाएगा और हम सभी अपनेअपने घरों से निकलने में एकबार फिर सक्षम होंगे. तबतक कोशिश करें कि अपना संयम न खोएं और इस समय  नकारात्मक नहीं सकारात्मक सोचें.

#coronavirus: भुखमरी के कगार पर फूलों की खेती करने वाले किसान

जी हां , लोगों के जीवन में खुशी का रंग भरते फूलों ने इन दिनों किसानों के जीवन को रंगहीन कर दिया है .फल , सब्जी या फूलों की खेती की खेती. ये सभी नगदी फसलें हैं .फसल तैयार होने के बाद अगर इन्हें तुरंत बाजार में ना भेजा जाए तो यह खराब हो जाती हैं , इन का मोल दो कौड़ी का भी नहीं रह जाता.
आज फूल पैदा करने वाले किसानों के सामने ऐसा ही दौर आया है .खेतों में लदे इन फूलों की खुशबू किसानों का दम घोंट रही है . अपने हाथों से किसान  खुशबू बिखेरती अपनी फसल को काट कर फेंकने को मजबूर हैं,  क्योंकि कोरोना के कहर ने किसी को नहीं छोड़ा .

देश की मंडियां बंद हैं, कारोबार बंद हैं, कारखाने बंद हैं,  देश का किसान भुखमरी के कगार पर है. किसानों को फसल से मिलने वाली आमदनी तो दूर, उनकी लागत लागत भी डूब चुकी है .फूलों की खेती करने वाले मेरठ ततारपुर के किसान ओमबीर ने बताया कि हम तो इस समय बरबाद हो चुके हैं. हम ने 4 एकड़ में फूलों की फसल लगाई थी , 2 एकड़ में गुलाब लगाया था ,  2 एकड़ में गुलदावरी और ग्लेडियोलस की फसल लगाई थी. गुलदावरी तैयार है, गुलाब तैयार है ,ग्लेडियोलस भी तैयार है. लेकिन सभी फसलों को हमें अपने हाथों से काट कर फेंकना पड़ रहा है .गुलाब तो काटने के बाद फिर गुलजार हो जाएगा, लेकिन बाकी फसलों को हमें खेत में ही जोतना होगा.

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उन्होंने आगे बताया कि हम हर साल अपनी फसल को दिल्ली की गाजीपुर मंडी में ले जाकर बेचते थे , लेकिन इस समय सब कुछ बंद होने के कारण सब बर्बाद हो गया .फूलों के अलावा हम ने चुकंदर और बंद गोभी भी लगा रखी है , उन फसलों का भी यही हाल है . क्या करें, कुछ समझ नहीं आ रहा. कुल मिलाकर हम आज के समय 17 – 18 लाख रुपए के नीचे आ गए हैं .खीरी लखीमपुर उत्तर प्रदेश के किसान हैं यदुनंदन सिंह ,वह भी फूलों की खेती करते हैं. उन्होंने 5 एकड़ में गैंदा लगाया हुआ है. बातचीत में उन्होंने बताया कि पूरा बाजार बंद है .रोजाना नुकसान हो रहा है ,रोजाना फूलों को तोड़कर फेंकना पड़ रहा है, फूलों को तोड़ना भी जरूरी है ,नहीं तो पौधे खराब हो जाएंगे . लगातार ऐसे ही हालात रहे तो आने वाले समय में हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाएगी .

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गाजियाबाद के बागवानी विशेषज्ञ डा.अनंत कुमार ने बताया कि हमारे इलाके में अनेक किसान जरबेरा और मैरीगोल्ड  फूलों की खेती कर रहे हैं. देश भर में इन फूलों के अच्छे दाम मिलते हैं, लेकिन इस बार फसल को खेतों में ही काटकर फेंकना पड़ रहा है.करोल बाग, दिल्ली के एक फूल विक्रेता ने बताया कि इस समय हमारे पास जो थोड़ेबहुत फूल आ रहे हैं ,वो यमुना के किनारे कुछ  किसान फूलों की खेती करते हैं वहां से आ रहे हैं. जो माल आ रहा है वह भी नहीं बिक रहा , कोरोना के डर से ग्राहक ही नहीं हैं , लोग डरे हुए हैं. जबकि अभी नवरात्रि का त्यौहार चल रहा है और फूलों की अच्छी मांग होती रही है .ऐसे समय में हमारी अच्छी कमाई होती थी लेकिन अब दाल रोटी के भी लाले पड़े हैं .

यही समय था किसानों की कमाई का : सही मायने में देखा जाए तो फूल पैदा करने वाले किसानों पर दोहरी मार पड़ी है. सितंबर से मार्च तक का समय फूलों की खेती के लिए ही खास होता है. जिस समय का इंतजार किसान महीनों से करते हैं.इस के अलावा फूलों की खेती करने के लिए खेत तैयार करने के लिए 4 से 5 बार तक जुताई करनी होती है. खादबीज ,खरपतवार नाशक, निराईगुड़ाई ,पानी आदि का खर्चा अलग .कुल मिलाकर फूलों की खेती करने में 10 से 15 हजार रु. प्रति एकड़ तक का खर्चा आता है .ऐसे में किसान को मुनाफा तो दूर, उस की लागत भी डूब गई.

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ऐसे किसानों के लिए सरकार द्वारा भी अभी तक ऐसी कोई राहत वाली खबर नहीं आई है, जबकि मजदूरों को , बेरोजगारों को , पेंशनरों को , सरकार द्वारा अनेक राहत दी गई है. सभी को मिलने वाली राशि भी बढ़ाई गई है, लेकिन किसान उस लाइन में कहीं खड़ा नजर नहीं आता , जबकि ऐसे समय में उस किसान को नहीं भूलना चाहिए जो देश का अन्नदाता है. – भानु प्रकाश राणा

#coronavirus: भगवान नहीं विज्ञान दिलाएगा कोरोना से मुक्ति

दुनिया में जब-जब भी मनुष्य पर संकट आया इतिहास गवाह है कि धर्म के ठेकेदार, ईश्वर के स्वयंभू एजेंट्स और अमीर पूंजीपति मैदान छोड़ कर अपनी-अपनी बिलों में घुस जाते हैं. आपदाओं से अगर कोई लड़ता है तो वह है विज्ञान. आज कोरोना वायरस के संकट में पूरा विश्व थरथर काँप रहा है. मानव जीवन मुश्किल में है. हर दिन सैकड़ों ज़िंदगियाँ काल के गाल में समा रही हैं. ऐसे वक़्त में पोंगा पंडित, मौलवी-मौलाना, पादरी जो विज्ञान की धज्जियां उड़ाते हुए धार्मिक अंधविश्वासों, पाखंड और मान्यताओं को स्थापित करने में दिन रात एक किये रहते थे, सारे के सारे सिरे से नदारद हो गए हैं. गोमूत्र को हर मर्ज़ की दवा बताने वाले कोरोना से खुद को बचाने के लिए सात किवाड़ों के पीछे जा छिपे हैं. अब कोई गोमूत्र नहीं पी रहा और ना ही गोबर का लेप अपने शरीर पर कर रहा है. अब कोई व्रत नहीं कर रहा, कथाएं नहीं बांच रहा, गण्डा-ताबीज़ नहीं बाँट रहा है क्योंकि धर्म के ठेकेदारों को ये अच्छी तरह मालूम है कि इन चीज़ों से ना कभी कुछ हुआ है और ना कभी कुछ होगा.

ये अच्छी तरह जानते हैं की रोग का इलाज साइंस के पास ही है फिर भी ये धर्म के नाम पर विज्ञान का अपमान करने से बाज़ नहीं आते. आपसी नफरत, झूठ, अंधविश्वास व अवैज्ञानिक तथ्यों की घुट्टी पिलाकर इंसानियत का भारी नुकसान करते हैं. और जब मानव जाति पर आपदा आती है तो ये दुम दबा कर भाग खड़े होते हैं. आज अगर कोरोना जैसी त्रासदी से कोई लड़ रहा है तो वह हैं विज्ञान की आराधना करने वाले डॉक्टर्स, नर्स और मेडिकल स्टाफ, जो अपनी जान जोखिम में डाल कर आम आदमी से ले कर धर्म के उन ठेकेदारों की भी जान बचाने में लगे हैं जिन्होंने अपने पाखंड को स्थापित करने के लिए तमाम डॉक्टर्स की बलि ले ली. डॉक्टर कफील को बिहार की जनता कैसे भुला सकती है जो बिहार में दिमागी बुखार से तड़प रहे सैकड़ों बच्चों की जाने बचाने के लिए भयानक बारिश में भी अपनी कार से ऑक्सीजन सिलिंडर की खोज में मारे मारे फिरे थे, सैकड़ों बच्चों की जाने बचाने के लिए जिहोने रात और दिन में फर्क नहीं किया, रात दिन उनके इलाज में जुटे रहे मगर वही डॉक्टर कफील आज धर्म के इन्ही ठेकेदारों और इनके इशारे पर नाच रहे राजनेताओं की साजिश और बदनीयती का शिकार होकर जेल की सलाखों में कैद हैं. अगर इस वक़्त वो बाहर होते तो शायद कोरोना से लड़ने में अपना योगदान ही दे रहे होते.
धर्म के इन ठेकेदारों और इनके इशारे पर नाचने वाले सत्ता के लालची नेताओं को बहुत अच्छी तरह मालूम है कि कोरोना जैसे रोग के भयावह प्रकोप में उन्हें उनका काल्पनिक ईश्वर बचाने नहीं आएगा. वैज्ञानिक ही उनको जीवन दान देंगे.

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अमेरिका की एक टेक कंपनी में ऑपरेशन मैनेजर 43 वर्षीया जेनिफर हैलर नाम की महिला के प्रति सर सम्मान से झुक जाता है. ये वही महिला हैं जिन्होंने सियाटल के रिसर्च इंस्टीट्यूट में कोविड-19 को ख़त्म करने के लिए ईजाद की गई वैक्सीन का परीक्षण सबसे पहले अपने ऊपर करवाया. मालूम हो कि जेनिफर दो मासूम बच्चों की माँ हैं, मगर मानव जाति को खतरे में देख कर उन्होंने अपनी जान पर ख़तरा मोल लिया क्योंकि उनको विज्ञान पर भरोसा है. उनको भरोसा है डॉक्टर्स पर. गौरतलब है कि वैक्सीन के परीक्षण से पहले जेनिफर को इस खतरनाक कोरोना वायरस से संक्रमित होना पड़ा. क्या जान का इतना बड़ा जोखिम कोई धर्म का ठेकेदार, कोई पंडित, कोई मौलाना या कोई पादरी उठा सकता है?
उन महान वैज्ञानिकों के नाम से पूरे मानव समाज का सिर झुक जाता है जिन्होंने अपने जीवन का बलिदान देकर पल भर में लाखों लोगों को मार देने वाली बीमारियों के टीके इजाद किए, वरना यह धरती कबकी मरघट बन गई होती.

भारत में हर साल धार्मिक स्थलों व संस्थाओं को सरकार व कॉर्पोरेट घराने अरबों-खरबों रुपये का अनुदान देते है. श्रद्धालुओं से हर वर्ष धार्मिक स्थलों को अरबों रुपयों का दान मिलता है. सोना चांदी हीरे जवाहरात मिलते हैं. मगर जब इन्ही श्रद्धालुओं पर प्राकृतिक विपदा आती है तो धर्म के ये ठेकेदार मैदान छोड़कर भाग जाते हैं. इनके ईश्वर भी इन श्रद्धालुओं की पीड़ा देख कर मुँह फेर लेते हैं और मास्क लगा कर आइसोलेशन में चले जाते हैं. तब आपदा से सिर्फ आम आदमी, डॉक्टर, रिसर्च स्कॉलर्स और वैज्ञानिक ही जूझते नजर आते हैं. अरबों रुपयों पर सांप की तरह कुंडली मार कर बैठे धन व धर्म के ठेकेदार ऐसी विपदा में भगवान् के ख़ज़ाने से एक रुपया नहीं निकालते हैं. उल्लेखनीय है कि देश भर में गरीब-गुरबा, मजदूर, किसान कोरोना की दहशत और पेट की आग की दोहरी मार से जूझ रहे हैं. शहरों से भूखे प्यासे पलायन कर रहे हैं. छह माह के दुधमुहे बच्चों को आँचल में समेटे और साठ साल की बूढी माँ का हाथ थामे औरतें हज़ार हज़ार किलोमीटर का फासला पैदल तय कर रही हैं. कहाँ हैं बमबम भोले यात्रा के दौरान कांवरियों के लिए जगह जगह खाने पीने का इंतज़ाम करने वाले धर्मात्मा लोग? सलीबें लगाने वाले, आलू पूरी बांटने वाले? सब नदारद.

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ढाई हजार साल पहले गौतम बुद्ध से लेकर आधुनिक दुनिया के कई महान विचारकों व वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है. संसार का सृजन किसी काल्पनिक ईश्वर ने नहीं किया बल्कि करोड़ों वर्षों में इसका धीरे धीरे सतत विकास हुआ है. प्रकृति के नियमों से संसार चलता है और इनका पालन करना ही सबसे बड़ा धर्म है. लेकिन इन सारे तथ्यों को पैरों तले रौंदते हुए धर्म के ठेकेदार ईश्वर के नाम पर लूट और वैज्ञानिक सोच का गला घोंटते रहते हैं.
कोरोना से लड़ने के लिए आज पूरी मानव जाति भगवान् की नहीं बल्कि विज्ञान की शरण में है.मानवता के रक्षक वैज्ञानिक कोरोना का टीका बनाने और उसके परीक्षण में रात दिन लगे हुए हैं. इसलिए विज्ञान की गाइडलाइंस का पालन करें जो सरकार के ज़रिये आप तक पहुंच रही है.घबराएं नहीं, हर बार की तरह जीत तर्क, विवेक और विज्ञान की ही होगी.

#coronavirus: कोरोना वायरस के दौरान मानसिक संबलता है जरूरी

 

नोवल कोरोना वाइरस का कहर विभिन्न देशों पर बीती जनवरी से मंडरा रहा है. यह वाइरस न केवल व्यक्ति को शारीरिक रूप से प्रभावित कर रहा है बल्कि मानसिक रूप से भी हानि पहुंचा रहा है. वर्ल्ड हैल्थ और्गनाइजेशन के मानसिक स्वास्थ्य विभाग द्वारा मानसिक रूप से हो रही क्षति को रोकने अथवा कम करने के लिए कुछ उपायों की सूची तैयार की गई है जिन्हें अपनाना हर व्यक्ति के लिए लाभकारी हो सकता है.
कोविड-19 जैसी महामारी के विस्तार में जितनी सजगता व सावधानी की आवश्यकता है उस से कही ज्यादा आवश्यकता मानसिक संबल की है. व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ होगा तो अपने साथसाथ अपने आसपास मौजूद व्यक्तियों के मानसिक स्वास्थ्य में भी मददगार सिद्ध होगा.

कोविड-19 के दौरान मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए निम्न बातें समझना अतिआवश्यक है:

• कोरोना वाइरस वैश्विक महामारी है और वे व्यक्ति जो इस दौरान विदेशी यात्रा पर थे इस बात से पूरी तरह अंजान थे कि वे इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं. किसी भी व्यक्ति को इस बात के लिए मानसिक प्रताड़ना देना कि वह किसी और देश से अपने देश बीमारी लाने का वाहक बना है, गलत है.

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• कोविड-19 से पीड़ित व्यक्ति “कोविड केस” या “कोरोना वाला” नहीं है बल्कि केवल एक व्यक्ति है जिसे कोविड-19 हो गया है. वह व्यक्ति स्वस्थ होने के बाद एक बार फिर समाज का हिस्सा होगा. व्यक्ति की पहचान उस की बीमारी के तौर पर करना, या बनाना सही नहीं है. यह उस व्यक्ति के लिए मानसिक आघात हो सकता है.

• आम व्यक्ति जितना कम हो सके उतना न्यूज देखे, और कोरोना वाइरस की जानकारी रखे. जानकारी का ओवरडोज न करें. सुबह से शाम यदि आप घर बैठे इस वाइरस के एकएक खबर पर नजर रखते रहेंगे तो यह डर को केवल बढ़ाने का ही काम करेगा. एक निश्चित समय के लिए ही न्यूज़ आदि देखें.

• फैक्ट्स और मिथ को अलगअलग रखने के लिए विश्वसनीय वैबसाइट्स को देखें जिन से आप को सही जानकारी मिले.

• हो सकता है आप से ज्यादा आप के किसी दोस्त या जानने वाले के लिए यह स्थिति घातक हो. हो सकता है आप के परिवार में ही कोई व्यक्ति हो जो किसी से बात न कर रहा हो, अकेला रह रहा हो, अंदर ही अंदर नकारात्मकता से भर रहा हो. उस से बात कीजिए. यह कहने की बजाए कि “हम भी तो घर में हैं, हमें तो कुछ नहीं हो रहा” उस की स्थिति को समझिए और जानिए. सभी की मानसिक स्थिति एक सी नहीं होती.

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• आप की सोसाइटी या आसपड़ोस में यदि ऐसे व्यक्ति हैं जो हेल्थकेयर से जुड़े हैं या जिन का बाहर आनाजाना जरूरी है, उन्हें समाज से अलग करने की कोशिश मत कीजिए. वे बीमारी ले कर आएंगे इस भय को निकाल दीजिए. इन लोगों को इस समय अत्यधिक मानसिक संबल की आवश्यकता है, उन का साथ दीजिए न कि ताने या दुत्कार.

• ग्रुप लीडर्स या कंपनियों के मालिक जिन की टीम घर बैठे काम कर रही है, वे उन में काम बांटे. इस बात पर ध्यान दें कि ऐसे समय में कोई भी व्यक्ति मानसिक तनाव से न गुजरे. यह सुनिश्चित करें कि अत्यधिक तनाव और निम्नतम तनाव वाले व्यक्ति के बीच ज्यादा भेद न हो.

• मांबाप इस समय अपने बच्चों पर अधिक ध्यान दें. बच्चों के लिए यह स्थिति काफी अलग है, घर में बंद रहना, अपने दोस्तों से न मिल पाना आदि उन के लिए नया है. बच्चों से बात कर उन से उन के डर और भय को, उन की फीलिंग्स को एक्सप्रेस करने के लिए कहें.

• बच्चों के साथ खेलें, उन के समय को प्रौडक्टिव व क्रिएटिव कामों में बांटे. बच्चों को अच्छा वातावरण दें जिस से वे खुद को मुक्त महसूस करें और बोर न हों. बच्चों की मानसिक स्थिति पर कोई फर्क न पड़े इस के लिए मातापिता का सजग होना जरूरी है.

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• कोरोना वाइरस के समय में बच्चों के मन में अनेक सवाल उमड़घुमड़ रहे होंगे. ऐसे में उन्हें एंजाइटी भी हो सकती है. बच्चे अपने मातापिता को देख कर भी स्थिति भांपने की कोशिश करते हैं. बच्चों को कोरोना वाइरस के बारे में बताइए, अपने मजे के लिए या उन पर हंसने के लिए उन्हें डराने की कोशिश न करें.

• यदि आप मानसिक रूप से स्वस्थ महसूस नहीं कर रहे हैं तो इस बारे में किसी से चर्चा कीजिए, हो सके तो किसी मनोवैज्ञानिक से बात कीजिए. जिन चीजों से आप को परेशानी हो रही है उन से दूर रहिए और वे काम कीजिए जो आप को खुशी देते हों.

#coronavirus lockdown: लॉकडाउन में किन्नरों का लंगर

लेखक-राजेश चौरसिया

●किन्नरों ने नेताओं जनप्रतिनिधियों को पीछे छोड़ा..
●रोजाना बांट रहे जरूरतमंद लोगों को लाखों का राशन..
●कहा अब तक जनता ने हमें पाला अबकी हमारी बारी है..
●हमारा सब कुछ न्यौछावर इन पर, ये सब इनका ही तो है..
●जनता बोली किन्नरराज़ में रामराज़, नेता वेता सब नाम के..
●सेक्स परिवर्तन कर जीतू से बनी थी नीतू..

देशभर में लॉग डाउन का असर सभी जगह देखने को मिल रहा है जिसके चलते आम से लेकर खासतक तक हर कोई परेशान है जो भी जिस स्तर का है वह उस स्तर पर मजबूर और परेशान है. किसी की परेशानी किसी से कमतर यानि किसी से कम नहीं है. बावजूद इसके लोगों में जितना दम है वह एक-दूसरे की मदद करने में लगे हुए हैं. और ऐसे लोगों के जज्बे को हम सलाम करते हैं.

ताजा मामला मध्य प्रदेश बुंदेलखंड अंचल के छतरपुर जिले का है जहां जनता के राजा अर्थात सेवक कहने वाले नेताओं जनप्रतिनिधियों को पीछे छोड़ते लोगों के हुए मुश्किल वक्क्त में थर्ड जेंडर (किन्नरों) ने वो कर दिखाया है कि जिसे देख कर आप आह और वह किए बगैर ना रहेंगे.

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तो आइए चलते हैं उस जगह पर जहां पर आप की आह और वाह दोनों एक साथ निकलने वाली है.

यह हैं छतरपुर की आईकॉन नीतू किन्नर जिन्होंने यहां छतरपुर की धरा पर ही जन्म लिया और देशभर में अपनी खूबसूरती और नाजुक अदाओं प्रणाम कमाया. नीतू ने अपने दौर का सबसे युवा और खूबसूरत किन्नर माना जाता था जो उम्र के इस पड़ाव में भी कायम है, उन्होंने अपने शुरुआती दौर में मुंबई में रहते हुए बहुत नाम कमाया और अब कई वर्षों से अपनी जन्मभूमि पहुंचकर लोगों की सेवा में लगी हुईं हैं.

बता दें कि जब से कोरोना का कहर देश-दुनिया पर छाया हुआ है और अब इसके डर/बचाव से देशभर में लॉक डाउन किया हुआ है तब से लोगों पर इसका खाशा असर हुआ है. और तभी से नीतू किन्नर और उनके साथी किन्नर इस मुहिम्मन लगे हुए हैं और रोजाना गरीब, असहाय, जरूरतमंद, मज़बूर, मजदूर लोगों को खाने के लाले पड़े हुए हैं उन्हें काम भी नहीं मिला रहा जिससे वहः और उनके बच्चे भूखों मरने के कगार पर आ गये हैं. ऐसे में नीतू किन्नर सभी जरूरतमंदों को राशन, पानी और उनकी हर जरूरत को पूरा कर रहे हैं उन्हें राशन, पानी से लेकर कपड़े और नगद रूपाये तक बांट रहे हैं.

नीतू की मानें तो यह सब लॉग डाउन के पहले दिन से ही अनवरत जारी है और उनके यहां रोजाना सैकड़ों जरूरतमंदों की यूं ही भीड़ लगती है और वह दिल दोनों हाथ खोलकर लोगों की मदद करतीं हैं.

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नीतू की मानें तो यह सब इनका (जनता का) ही तो है. अब तक जनता ने हमें पाला है अब हमारी बारी है कि हम इनकी सेवा कर सकें यह जो भी है सब इनका ही तो दिया हुआ है जो हम इन्हें सूत समेत वापिस कर रहे हैं इसमें हमारा कुछ भी नहीं है सब ऊपरवाला कर रहा है हम सो सिर्फ निमित्त मात्र हैं. इस जग में हमारा किन्नर समाज का कुछ भी नहीं होता सब इन लोगों का ही होता है.

जानकारी के अनुसार नीतू किन्नर आज से नहीं विगत कई वर्षों से ऐसा करतीं आ रहीं हैं कि वह हर जरूरतमंद की हरसंभव मदद करती हैं. जो भी इनके दर पर पहुंचता है वह उसे खाली हाथ नहीं जाने देतीं.

दुनिया और लोगों की नजरों में भले ही यह शहर, नगर, जिले में बधाई और नेंग के तौर पर लोगों से मांगते नजर आते हैं पर असल में इसका दूसरा पहलू कुछ और ही है यह एक हाथ लेते हैं और दोनों हाथों से फील खोलकर सबको बांट देते हैं.

यहां जो जरूरतमंद इन तक पहुंच नहीं पाता और इन्हें पता चल जाता है तो यह और इनकीं टीम जरूरतमंद के घर जाकर उन्हें उनकी जरूरत का सामान मुहैया कराते हैं.

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जरूरतमंद लेने आई महिलाओं मीरा यादव, ममता प्रजापति, पुष्पा देवी की मानें तो नेता, जनप्रतिनिधि तो सिर्फ नाम के होते हैं जो सिर्फ हमसे लेने आते हैं देने कुछ भी नहीं, वह चुनाव के वक्त तो हमारे घरों तक चले आते हैं और उसके बाद 5 साल तक कहीं नजर ही नहीं आते. इससे बेहतर तो हमारे किन्नर लोग हैं जो हर वक्त हम मजमून, गरीबों, जरूरतमंदों की मदद के लिये तत्पर और हर संभव खड़े रहते हैं.

मामला चाहे जो भी हो पर इतना तो तय है कि हम महिला/पुरुषों को इन (थर्ड जेंडर) किन्नरों ने पीछे छोड़ दिया है और ऐसे वक्त दिल और दोनों हाथ खोलकर लोगों की मदद कर रहे हैं. जिसे देख हर किसी के मुंह से आह और वाह दोनों निकल पड़ती है.

स्वत्रंत पत्रकारिता के लिए जरूरी है कि पाठक सब्सक्राइब करके पढ़े डिजिटल संस्करण

लॉक डाउन का असर तेजी से प्रिंट मीडिया पर पड़ा है. बहुत सारे शहरों में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं का वितरण नही हो पा रहा. हॉकर और ग्राहक दोनो में करोना का डर छाया हुआ है. पाठकों की गिरती संख्या को देखते हुए समाचार पत्रों ने जनता को यह समझने की बहुतेरी कोशिश की कि इससे करोना वायरस नही फैलता है. इसके बाद भी बात बनी नही.

लॉक डाउन के समय मददगार है डिजिटल संस्करण :

बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों और कस्बों तक एक जैसे ही हालत बने हुए है. ऐसे में प्रिंट मीडिया ने भी अपने “ई पेपर” भेजने शुरू किए. आज वाट्सएप पर बहुत सारे समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं के पीडीएफ फाइल आने लगी है. इससे सूचनाएं मिलती है.

ई पेपर के साथ ही साथ सभी मीडिया अपने डिजिटल एडिशन भी वेबसाइट पर पाठकों के लिए लाई है. जिंसमे एक लिंक के साझा करने पर खबरें, कहानियां, लेख पढ़ें जा रहे है.

लॉक डाउन के समय जब लोग घरों से बाहर नही निकल पा रहे और पत्र पत्रिकायें घरो तक नही पहुँच पा रही ऐसे में ई पेपर औऱ डिजिटल संस्करण ही लोगो के लिए सबसे उपयोगी है.

प्रमाणिक खबरों के लिए स्वत्रंत पत्रकारिता जरूरी

सोशल मीडिया पर आने वाली खबरों की प्रामाणिकता नही होती. ऐसे में जब तक मीडिया की किसी वेबसाइट या ई पेपर में उसको पढ़ा ना जा सके तो लोगो का भरोसा नही होता है.

पाठकों तक निष्पक्ष खबरे पहुचे इसके लिए जरूरी है कि पत्र और पत्रिकाए स्वत्रंत रूप से काम कर सके. अगर पत्र पत्रिकाएं विज्ञापन के दवाब में होगी तो वो समझौते करेगी. जिस संस्था या सरकार से पत्र पत्रिकाओं को विज्ञापन मिलेगा वो कभी उनकी सच्चाई से पाठकों को रूबरू नही कराएगी. पाठकों को अगर निष्पक्ष पत्रकारिता चाहिए तो इनको मजबूत करना पाठकों की जिम्मेदारी बनती है.

पम्पलेट नहीं खबरे पढ़े:

पाठकों तक सही सूचनाएं पहुँचने वाली संस्थाएं आज भी सरकारी विज्ञपनों पर निर्भर नही रहती है. पाठक की ताकत ही पत्र पत्रिकाओं की असल ताकत होती है. दुनिया मे कोई भी चीज मुफ्त नही होती. मुफ्त की जो भी चीज होती है उसके खर्च किसी और तरह से पूरे होते है. इसी तरह अगर पाठक फ्री में पत्र पत्रिकाए पढ़ाने की आदत डाल लगे तो उनको पत्र पत्रिकाएं नही पंपलेट पढ़ने को मिलेंगे. जिनको पाठक पढ़ना भी नही चाहते और एक हाथ से लेकर दूसरे हाथ से फेंक देते है.

दुनिया भर में स्वत्रंत पत्रकारिता को बचाये रखने के लिए पाठक पत्र पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ते है. जंहा पाठक खरीद कर नही पढ़ते वँहा की पत्रकारिता विज्ञपनों के भरोसे हो जाती है फिर पाठक वही पढ़ते है जो विज्ञापन देने वाला पढ़ना चाहता है. यही वजह है कि भारत मे विज्ञापन और मैटर के बीच किसी तरह का कोई सिद्धांत नही रह गया है. कवर पेज तक पर विज्ञापन छपने लगे है. समाचार से अधिक विज्ञापन होने लगे है. समाचार भी पेड़ न्यूज बन गए है. ऐसे में पाठकों को सही जानकारी नही मिलती.

 खबरे ही नही पत्रकारिता के लिए सामाजिक जिम्मेदारी जरूरी:

पत्र पत्रिकाओं के डिजिटल संस्करण वेबसाइट पर लाने के लिए और पाठकों तक सच्ची खबरे पहुचने तक एक टीम मेहनत करती है. उसकी अपनी कुछ जरूरतें होती है. कंपनी का एक इन्फ्रास्ट्रक्चर होता है. जिसको चलाने के दो ही रास्ते है या तो पाठक सब्सक्राइब करके संस्थान को मजबूत करे या मुफ्त पढ़ने के चक्कर मे वो पढ़े जिसकी कीमत कोई और दे रहा हो. पाठकों को अपनी मर्जी अपनी जानकारी प्राप्त करने के लिये मीडिया चाहियें तो उसे मुफ्त के पढ़ने की आदत छोड़नी चाहिए.

#coronavirus: मुआवजे की आस में किसान

पिछले दिनों देश में अनेक हिस्सों में बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि ने अनेक किसानों की फसल खराब कर दी है. अब किसान की नजरें कभी बरबाद हुई फसल की ओर उठती हैं तो कभी सरकार की ओर. अब सब से बड़ी समस्या उन खेतों के सर्वे की आ रही है. क्योंकि लॉक डाउन लागू है.

राजस्थान के एक कृषि विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि फसल ख़राब होने पर शायद की ये पैसा सभी किसानों को मिल पता हो, क्योंकि बीमा कंपनियों के नियम ही कुछ ऐसे हैं जिन में किसान उलझ कर रह जाता है. जैसे फसल खराब होने की जानकारी बीमा कंपनियों को 72 घंटे में देनी होती है आदि. उन्होंने ये भी बताया कि अभी तक पिछले 2 सालों में ख़राब हुई फसल का पैसा भी अनेक किसानों को नहीं मिला है. जबकि सरकार की तरफ से समय पर फंड जारी हो गया था. किसानों के बैंक खाते से बिना जानकारी दिए बीमा की किश्त भी काट ली जाती है.

हालांकि इस समय हालातों को देखते हुए राजस्थान सरकार की तरफ से गिरदावरी के आदेश जारी हो चुके हैं और अनेक रकबों की जांच होने के बाद रिपोर्ट भी संबंधित विभागों को भेजी जा चुकी है. देखना यह है की महामारी के इस दौर में किसानों का पैसा उन तक पहुँचता भी है या नहीं. हालांकि फसल सर्वे को जरुरी मानते हुए हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश व अन्य प्रदेश सरकारों ने टाइम बाउंड सर्कुलर जारी कर दिया है. सभी जिलों के कृषि अधिकारियों को कहा है की इस से जुड़े कर्मचारी इस काम में लग जाएं और तय समय में इस काम को पूरा करें और रिपोर्ट मुख्यालय में भेजें.

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लेकिन यह काम इतना आसान नहीं दिख रहा क्योंकि बीमा कंपनियों के कर्मचारी भी फील्ड में जाने से कतरा रहे हैं और कई गांव में तो बाहर से आए लोगों को भी रोका जा रहा है.ड्रोन से फसल सर्वे : वैसे आज तकनीकी के दौर में कोई भी काम ऐसा नहीं है जो न हो सके. आज सरकार और कंपनियों के पास आर्टिफिशल इंटेलिजेंस जैसी अनेक आधुनिक तकनीक मौजूद हैं. जिस का इस्तेमाल ऐसे सर्वे में होता रहा है. इसलिए सरकार और बीमा कंपनीयां फसल सर्वे के काम को ड्रोन के जरिए करा कर किसान को समय से रहत दे सकती है.

कैसे होता है फसल सर्वे: फसल सर्वे के पहले चरण में कृषि विभाग के लोग संबंधित किसान के खेतों में जाते हैं और पिछले 5 सालों की फसल पैदावार लगभग कितनी होती है यह देखते हैं. इस सर्वे के लिए कृषि विभाग के स्टाफ को फसल काटने से पहले 2 से 3 बार जाना होता है. फसल बीमा के लिए यह सर्वे खास होता है. क्योकि सर्वे में यह देखा जाता है कि पिछले 5 सालों में उस खेत से किसान की कितनी औसतन कटाई हुई. इसी के आधार पर मुआवजा दिया जाता है.सर्वे के दूसरे दौर में कृषि विभाग के कर्मचारी द्वारा यह देखा जाता है. किसान ने कौन कौन सी फसल बोई हैं और कितने रकबे में बोई है. जिसका मिलान पटवारियों द्वारा की गई गिरदावरी से किया जाता है. गिरदावरी का मतलब खेत के रिकॉर्ड से है कि किसान ने कितने रकबे में कौन की फसल बोई है. जिस का लेखाजोखा पटवारी के पास होता है.

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तीसरा और आखिरी सर्वे स्थानीय सर्वे होता है इस चरण में एडीओ (एग्रीकल्चर डवलपमेंट ऑफिसर) या उसी ओहदे के बराबर अधिकारी द्वारा एक कमेटी का गठन होता है जिस में बीमा कंपनी का प्रतिनिधि और किसान भी शामिल होता है. इस कमेटी के लोग मौके पर जाकर आपदा वाले खेत में फसल का सर्वे करते हैं. यह काम फसल कटाई से पहले करना होता है. उसी के आधार पर किसान के नुकसान की भरपाई की जाती है.अब किसान के सामने सबसे बड़ी समस्या यही है. क्योकि ज्यादातर इलाकों में फसल पक चुकी है या पकने वाली है. फसल पकने के बाद उसे समय से काटना भी जरुरी है. जब तक ख़राब फसल का सर्वे नहीं होता तो किसान उसे काट भी नहीं सकता.

इसलिए सबसे पहले सरकार को यह कदम उठाना ही होगा होगा कि प्राकृतिक आपदा से ख़राब हुई फसल का जल्दी से जल्दी सर्वे कराया जाए. जिस से उस की भरपाई हो सके. साथ ही बची हुई फसल को किसान समय से काट कर रख सके.

कहां खो गये जनसेवक

पूरा देश जहां कोरोना वायरस के संक्रमण से जूझ रहा है, वहीं हमारे देश के चौकीदार आलीशान सरकारी बंगलों में दुबक कर जनता को भाषण देकर अपना ज्ञान बघार रहे हैं. कोरोना से बचाव के लिए लाक डाउन की घोषणा तो हो गई, लेकिन इसके लिए कोई पूर्व तैयारी न होने से लोगों के समक्ष रोजमर्रा की जरूरतों की बस्तुओं की आपूर्ति नहीं हो पा रही है. देश का कोई भी बड़ा नेता या जनप्रतिनिधि जनता के बीच नहीं पहुंचा है.

कोरोनावायरस से बचाव के लिए जनससेवक की भूमिका हमारे देश के डाक्टर, नर्सेस, पैरा मेडिकल स्टाफ, सरकारी अफसर, पुलिस जवान  , मीडिया कर्मी और बड़ी संख्या में कर्मचारी अधिकारी निभा रहे हैं. मध्यप्रदेश के गांव कस्बों में सुदूर जिलों से आये कृषि मजदूरों को खाने पीने की जिम्मेदारी छोटी छोटी स्वयंसेवी संस्थाओं ने पूरी की तो प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हे बसों से उनके गंतव्य तक पहुचाने का काम किया.

मध्यप्रदेश का नरसिंहपुर जिला देश का पहला जिला है जहां नरेंद्र मोदी से भी पहले 23 मार्च को लौक डाउन षुरू हो गया था .मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले में 21 मार्च को 4 कोरोना पाज़ीटिव केस मिलने की खबर ने पूरे प्रदेश में हड़कंप मचा दिया.कमलनाथ सरकार की बिदाई हो चुकी थी. यैसे में प्रदेश के अफसरों ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए सख्त कदम उठाने का फैसला किया. 22 को देश में प्रधानमंत्री के  आह्वान पर जनता कर्फ्यू चल रहा था. जबलपुर से सटे नरसिंहपुर जिले के डीएम दीपक सक्सेना और एसपी डा.गुरूकरण सिंह ने आपात बैठक बुलाई और 23 से पूरे जिले में लाक डाउन की घोषणा कर दी.

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कोरोनावायरस का खतरा इन दूरदर्शी अधिकारिओं ने पहले ही भांप लिया था. लाक डाउन के दिन डीएम और एसपी की जोड़ी जब सड़कों पर उतरी तो जिले की जनता ऐसे जनसेवकों पर‌ नाज कर उठी. लाक डाउन के दौरान जिले के कोने कोने में घूमकर इन अफसरों ने न केवल कोरोना वायरस के संक्रमण के प्रति जनता को जागरूक किया,बल्कि जनता की तकलीफों को दूर भी किया. गाडरवारा तहसील के एसडीएम राजेश शाह ने जिले में फंसे शहडोल जिले के मजदूरों को खाना पीना की व्यवस्था के साथ उन्हें उनके घर भी पहुंचाया. 28 मार्च से पूरे जिले में होम डिलीवरी की सुविधा देकर लोगो को जयरी दवाइयों के साथ फल ,सब्जी ,दूध और किराना सामग्री घर घर पहुंचाने की व्यवस्था कर सख्ती से लौक डाउन का पालन जनता से करवाया .

 

जांबाज अफसरों ने जनता के मन में छुपे उस भ्रम को दूर  कर दिया कि असली जनसेवक सफेद पोश नेता नहीं है. 26 मार्च को जनता को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लाक डाउन में सुबह 7 बजे से 12 बजे तक ढील देकर फल सब्जी, दूध, किराना ,आटा चक्की की दुकानें खोलने का निर्णय लेकर सोशल डिस्टेसिंग का पूरा ख्याल रखा गया. दुकानों के सामने मार्किंग करके भीड़ को कुशलता के साथ काबू में किया गया.किसानों को कृषि कार्य में राहत देते हुए थ्रेसर, हार्वेस्टर चलाने और डीजल की व्यवस्था सुनिश्चित करने में ये अफसर सफल रहे.

जब शहरों में फंसे मजदूर रोजी-रोटी के लिए जद्दोजहद कर रहे थे तो पुलिस के जवानों ने घरों से खाना लाकर उनकी पेट पूजा कराई. नर्मदा सुगर मिल सालीचौका के विनीत माहेश्वरी ने आस पास के गांव कस्बों में सेनाटाइजर को बांट कर लोगों को कोरोना वायरस से बचने के लिए जागरूक करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.मगर कोई भी जनप्रतिनिधि या राजनेता अपनो बंगलों से बाहर नहीं निकला.

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गांव कस्बों में काम करने वाले डाक्टरों ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई . गाडरवारा के डा संजय मोदी ने लोगों को फ्री मेडिकल चैक अप की सुविधा मुहैया कराई तो तेंदूखेड़ा के डा शचीन्द्र मोदी ने 50 हजार रूपये की रकम जिला आपदा प्रबंधन के लिये अवश्यक दवांये ,मास्क और सेनेटाइजर खरीदने के लिये  प्रदान की .

 

अपने आपको देश का चौकीदार बताने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता को संबोधित करते हुए कोरोना वायरस का डर तो दिखा दिया, लेकिन इससे बचाव के लिए  डाक्टरों और अस्पतालों के लिए कोई सरक्षा के इंतजामात नहीं किये. उल्टे जनता को ताली और थाली बजाने की नसीहत दे डाली. प्रधानमंत्री के इस कदम की दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज के डाक्टर देवब्रत महापात्र ने खुला पत्र लिखकर आलोचना की. उन्होंने लिखा कि देश के सरकारी अस्पतालों में डाक्टर किन परिस्थितियों में काम कर रहे हैं.मुश्किल हालातों में काम कर रहे डॉक्टरों के पास गुणवत्तापूर्ण गाऊन, उपकरण और मास्क तक नहीं हैं.सोशल मीडिया पर लिखे इस पत्र के जरिए उन्होंने देश के मुखिया को नसीहत दी कि यदि वे डाक्टरों की सुरक्षा के लिए जरूरी उपकरण नहीं दे सकते तो थाली बजाकर उनका मजाक न उड़ाएं.

जहां एक ओर‌ हमारे देश के डाक्टर अपनी जान जोखिम  में डालकर कोरोनावायरस से संक्रमित लोगों का इलाज कर रहे हैं और हमारा समाज इन्हे प्रताड़ित कर रहा है. दिल्ली के साथ देश के इलाकों में मक़ान मालिक उन डाक्टर और‌ नर्सो से मकान खाली करवाने की धमकी  दे रहे हैं जो‌ कोरोना का इलाज कर‌ रहे हैं.

आज  देश में फैली इस महामारी के दौर में जनता के सच्चे जनसेवक इन डाक्टरों, नर्सों और सरकारी अफसरों पर हमें गर्व है . यह भारतीय लोकतंत्र की विडंबना ही है कि अपने स्वार्थो की खातिर नोट और शराब की बोतलों में वोट खरीदने वाले राजनेता देश के हुक्मरान बने बैठे हैं. कोरोना की इस जंग ने लोगों को सचेत जरूर किया है कि वे अपने कीमती वोट से यैसे जनसेवकों का चुनाव करें ,जो उनके बुरे वक्त में उनके साथ खड़ा रह सके .

नेताओं का डरा रहा कोरोना

अपने आपको जनता का सेवक कहने वाले नेता कोरोना के कहर से इस कदर भयभीत हैं कि वे जनता के दुख दर्दो से कन्नी काट रहे हैं . न्यूज चैनलों पर लंबी चैड़े भाषण देने वाले भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और क्वालिफाईड डाॅ संबित पात्रा ने जनता को कोइ्र मदद करने की बजाय अपने आपको घर में कैद कर लिया है . कमलनाथ सरकार के गिरते ही मध्यप्रदेश के छतरपुर जिला भाजपा जिलाध्यक्ष माखनसिंह की अगुआई में भाजपाई जुलूस निकालकर जस्न मनाते नजर आये , लेकिन जब कोरोना का खतरा बढ़ तो जनता के बीच जाने से कतरा रहे हैं . मध्यप्रदेश के एक पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा मुख्यमंत्री बनने के लिये खूब भागदौडत्र करते रहे ,परन्तु जब शिवराज के रहते उनकी दाल नहीं गली तो आने आपको कोरोना से बचाने अपने घर पर नाती पोतों के साथ खेलने पढ़ाई करने के वीडियो सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं .

मध्यप्रदेश के कांग्रेसी नेता भी कोरोना की परवाह किये बिना सरकार बचाने दिल्ली ,बेंगलरू तक दौड़ धूप करते रहे और जब सरकार गिरी तो जनता से मुंह मोड़ अपने आपको घरों में आइसोलेट कर लिया. छत्तीसगढ़ के एक विधायक ने तो हद ही कर दी .प्रधानमंत्री के जनता कर्फयू के दौरान वेमेतरा के विधायक आशीष छावड़ा ने अपने घर पर नेताओं का हुजूम इकट्ठा कर बकायदा कोरोना से बचाव के लिये हवन और पूजा पाठ तक करवा दिया .

देश के गरीब ,पिछड़े और दलितों को किसी पाप योनि का मानने वाले नेताओं की कमी नहीं है .सरकार के नूमाइंदे इन गरीबों को चंद दिनों के लिये दो वक्त की रोटी का इंतजाम न कर सके . इसी बजह से एक राज्य से दूसरे राज्य अपने घर जाने सडको पर पलायन कर रही मजदूरों की भीड़ ने बिना प्लानिंग किये गये लौक डाउन पर सबाल खड़े कर दिये हैं .

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