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Family Story : सालते क्षण – सड़ेगले रिश्तों के पसोपेश की उधेड़बुन भरी कहानी

Family Story : पुराने सालते क्षण जीवनभर के लिए रह जाते हैं, खासकर तब, जब ऐसे पारिवारिक रिश्ते हों जो उन क्षणों को घटाने की जगह एक ऐसा क्षण और जोड़ दें जो ताउम्र कचोटता रहे. ऐसे ही सड़ेगले रिश्तों के पसोपेश की उधेड़बुन है यह कहानी 5 वर्षों के निर्वासन के बाद मैं फिर यहां आया हूं. सोचा था, यहां कभी नहीं आऊंगा लेकिन प्राचीन सालते क्षणों को नए परिवेश में देखने के मोह का मैं संवरण न कर पाया था. जीवन के हर निर्वासित क्षण में भी इस मोह की स्मृति मेरे मन के भीतर बनी रही थी और मैं इसी के उतारचढ़ाव संग घटताबढ़ता रहा था. फिर भी आज तक मैं यह न जान पाया कि यह मोह क्यों और किस के प्रति है? हां, एक नन्ही सी अनुभूति मेरे मन के भीतर अवश्य है जो मु झे बारबार यहां आने के लिए बाध्य करती रही है. यह अनुभूति मां के प्रति भी हो सकती है और अमृतसर की इस धरती के प्रति भी जिस की मिट्टी में लोटपोट कर मैं बढ़ा हुआ.

इसे ले कर मैं कभी एक मन नहीं हो पाया था. यदि हो भी पाता तो भी मु झे बारबार यहां आना पड़ता. बस से मैं बड़ी बदहवासी में उतरा. बदहवासी यहां आने की कि वे क्षण जिन के लिए मैं यहां आया हूं, अपने परिवेश में यदि ज्यों के त्यों हुए तो जो निरर्थकता मन के भीतर आएगी, उस का सामना कैसे कर पाऊंगा? बाद में हाथ में पकड़े ब्रीफकेस में सहेज कर रखी नोटों की गड्डी से मु झे बल मिलता है. थोड़ी देर के लिए मैं इस एहसास से मुक्त हो जाता हूं कि अब मैं मां का निखट्टू पुत्र नहीं हूं. निखट्टू मेरा उपनाम है. इस के साथ ही मु झे याद हो आते हैं मेरे दूसरे उपनाम भी. सीधा और भोला होने के वश रखा गया ‘भलोल’ उपनाम. सदा नाक बहती रहने के वश रखा ‘दोमुंही’ उपनाम. इन उपनामों से बारबार चिढ़ाने से मेरा जो रुदन निकलता तो मां से ले कर छोटे भाई तक को गली में लड़ती कौशल्या की आवाज का आभास होता था. 9वीं में मेरे कौशल्या उपनाम की बड़ी चर्चा थी.

मेरे मन में यह प्रश्न उस समय भी था और आज भी है कि अगर मैं भलोल हूं या मेरी नाक बहती है तो इस में मैं कहां दोषी हूं? और यह भी कि, मेरी दुर्दशा करने वाले मेरे अपने कहां हुए? अब सोचता हूं मेरा इन के साथ केवल रोटीकपड़े तक का संबंध रहा है. वह भी इस घर में पैदा हुआ हूं शायद इसलिए. मु झे पता ही नहीं चला कि कब संगम सिनेमा से गुजर कर पिंगलबाड़े तक पहुंच गया था. पिंगलबाड़े से मुड़ने पर पहले तहसील आती है. छुट्टी के रोज भी यहां भीड़ रहती है. जमघट लगा रहता है. मुकदमे ही मुकदमे. मुकदमे अपनों पर जमीनों के लिए. कत्लों के मुकदमे. तारतार होते रिश्ते. बेहिसाब दुश्मनी, कोई अंत नहीं. मैं जल्दी से आगे बढ़ जाता हूं. आगे वह क्रिकेट ग्राउंड आता है जिस पर मैं बचपन में अपने साथियों संग क्रिकेट खेला करता था. मां कहती, क्रिकेट ने मेरी पढ़ाई ले ली.

मैं कैसे कहता कि बड़े भाई की नईनई शादी, एक ही कमरे में परदे लगा कर उन के सोने का बंदोबस्त, रातभर चारपाई की चरमराहट, परदे के पीछे के दृश्यों की परिकल्पनाओं ने मु झे पढ़ने नहीं दिया था. पढ़ने के लिए मैं मौडल टाउन चाचाजी के पास और चालीस कुओं पर भी जाता पर परदे के पीछे की परिकल्पनाएं मेरा पीछा नहीं छोड़ती थीं. धीरेधीरे मैं पढ़ने में खंडित होता गया था. परीक्षा परिणाम आया तो मैं फेल था. पढ़ने के लिए जब फिर दाखिला भरा तो बड़े भाई का मत बड़ा साफ था, ‘तुम्हें अब की बार याद रखना होगा. व्यक्ति कारखाने में पैसा तब लगाता है जब उसे लाभ दिखाई दे.’ विडंबना देखें, जब यही बात राजू भाई ने इन्हें कही थी तो सब के सम झाने और मनाने पर भी पढ़ाई छोड़ दी थी. राजू भाई केवल यही चाहते थे कि कुक्कु का चक्कर छोड़ कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. आज वही शब्द कहने से वे बिलकुल नहीं हिचकचाए थे. राजू भाई ठीक कहते थे, जिस बात का विरोध आज हम अपनी जान दे कर करते हैं, कोई समय आता है हम परिस्थितियों द्वारा इतने असहाय होते हैं कि उसी बात को बिना शर्त स्वीकार कर लेते हैं. उस समय उन की यह बात सम झ में नहीं आई थी.

आज समझ में आती है. मैं ने भी पढ़ाई छोड़ दी थी. इसलिए नहीं कि मु झे उन की बात सम झ में आ गई थी, बल्कि इसलिए कि बड़े भाई के शब्द मु झ से सहन नहीं हुए थे. बड़े भाई को भी शायद राजू भाई के यही शब्द सहन नहीं हुए होंगे. हम दोनों एकदूसरे की बात सहन कर लेते तो शायद हालात दूसरे होते. देखता हूं क्रिकेट ग्राउंड भी अब वहां नहीं है. सोचा था, जब मैं वहां पहुंचूंगा तो बच्चे पहले की तरह खेलते मिलेंगे. उन को खेलते देख मैं अपने बचपन के दिनों को याद कर लूंगा. वहां एक सुंदर बंगला हुआ करता था. और भी कई सुंदर बंगले बन गए थे. मैं किसी को कुछ कह नहीं सकता था. बच्चों के उल्लास तो आएदिन खत्म किए जाते हैं. बड़े भारी मन से मैं अपनी गली की ओर बढ़ता हूं. गली के मोड़ तक आतेआते मेरे पांव ढीले पड़ जाते हैं. आगे बढ़ने की इच्छा नहीं होती. गली के लोग मु झे निखट्टू नाम से जानते हैं. मु झे देखते ही आग की तरह यह खबर फैल जाएगी. न जाने समय के कौन से क्षणों में मेरा नाम निखट्टू पड़ा.

इस नाम से पीछा छुड़ाने के लिए मैंने मोटर मैकेनिकी, कुलीगीरी, रिक्शा चलाने से ले कर होटल में बरतन मांजने तक के काम किए. पर इस निखट्टू नाम से पीछा नहीं छूटा, चाहे तन के सुंदर कपड़े और नोटों से भरा ब्रीफकेस मु झे एहसास दिलाता है कि अब मैं मां का निखट्टू पुत्र नहीं रहा हूं. जानता हूं मैं मन की हीनभावना से छला गया हूं. यही भावना मु झे बल देती है. गली में झांक कर देखता हूं कि जिस बात की अपेक्षा थी वैसा कुछ नहीं था. गली में मु झे कोई दिखाई नहीं दिया था. सबकुछ बदल गया था. महाजनों का घर और बड़ा हो गया था. पहले हौजरी की एक मशीन हुआ करती थी, अब बहुत सी मशीनें लग गई हैं. गली भी पक्की हो गई है. मंसो की भैंसों के कारण जहां गंदगी फैली रहती थी, मु झे गली में कहीं भैंस दिखाई नहीं दी थी. घर के समीप पहुंचा तो मैं चकरा गया. हमारा घर कहां गया? उस की जगह खूबसूरत दोमंजिला मकान खड़ा था. मैं ने इधरउधर देखा कि कोई पहचान वाला मिले तो पूछूं कि दिनेश साहनी का घर यही है? एकाएक ऊपर लिखे ‘साहनी विला’ पर मेरी नजर पड़ी. दरवाजे पर एक ओर बड़े भाई के नाम की तख्ती भी दिखाई दे गई. भाई के नाम के नीचे लगी घंटी दबाने पर किसी अंजान महिला ने दरवाजा खोला. वह कपड़ों से नौकरानी लग रही थी. मु झे देख कर शायद वह यह पूछती कि आप को किस से मिलना है कि इतने में ‘‘कौन है?’’ कहती हुई मां दरवाजे तक चली आईं. मु झे देख कर आश्चर्य के भाव उन के चेहरे पर आए, फिर सामान्य हो गईं. मुख से निखट्टू निकलतेनिकलते रह गया पर निकला नहीं.

मां को देख कर नौकरानी सी लगने वाली भीतर चली गई. मां ने दरवाजा पूरा खोल दिया. मैं उस को प्रणाम करने के बाद बड़े अनमने भाव से भीतर चला आया. कदम रखते ही आंखें चुंधिया गईं. पूरे कमरे में ईरानी कालीन, एक ओर बड़ी सी डाइनिंग टेबल, दरवाजे के पास चमकदार फ्रिज, एक तरफ सोफा व बैड, गद्देदार कुरसियां और टीवी. टीवी के पीछे वाली दीवार पर मोतियों से बनाई गई एक औरत की आकृति फ्रेम की गई थी. मैं आगे नहीं बढ़ पाया. न ही मां ने मु झे बढ़ने के लिए कहा. बैठने के लिए भी नहीं कहा. मैं ने महसूस किया कि मु झे बैठाने से ज्यादा उस को यह बताने की चिंता है कि सारा सामान जिसे देख कर हैरान हूं, कहां से और कैसे आया है? मां बोली, ‘‘ये सारा सामान दिनेश ने फौरेन से मंगवाया है. यह ईरानी कालीन अभी पिछले महीने ही आया है. टीवी और फ्रिज बहुत पहले आ गया था.

पूरे 10 लाख रुपए लगे हैं.’’ मैं ने महसूस किया, मेरे ब्रीफकेस में पड़ी रकम एकदम छोटी है. जो रकम मां ने बताई थी, उस से दोगुनी छोटी. इन 5 वर्षों में जो क्षण मु झे सालते रहे हैं वे और बड़े हो गए हैं. जाने कहां से पीड़ा की एक तीखी अनुभूति भीतर से उठी और भीतर तक चीरती चली गई. पीड़ा इसलिए कि निखट्टू उपनाम से मुक्ति पाने की जो इच्छा ले कर यहां आया था, वह जाती रही. बैठक और ड्योढ़ी मिला कर ड्राइंगरूम में इतनी कीमत की चीजें हैं तो भीतर के कमरों में जाने क्याक्या देखने को मिले. मां ने बताया, ‘‘अपनी पत्नी के सारे गहने बेच कर जिस होटल में तुम बरतन मांजते थे उसी होटल को खरीद लिया था. यह उसी की करामात है कि हमें कोई कमी नहीं है.’’ ऐसे कहा जैसे अब भी उसी होटल में बरतन मांजता होऊं. ‘‘गांव की जमीन उस ने छेड़ी तक नहीं. कहता था जिस में सब हिस्सेदार हों उस में वह कुछ नहीं करेगा.’’ मां को भय हुआ कि कहीं मैं होटल में अपने हिस्से का दावा न करने लगूं. इसलिए साफ बात करना ठीक सम झी. मैं कहने को हुआ कि इस मकान में भी तो मेरा हिस्सा है, पर चुप रहा. बाद में मां ने महसूस किया कि उन्होंने मु झे बैठने को नहीं कहा. ‘‘बूट उतार कर सोफे पर बैठ जाओ.’’ यह सुन कर मैं संकुचित हो उठा कि उस का अपना बेटा, अपने भाई की ईरानी कालीन पर बूट पहन कर बैठ नहीं सकता.

कालीन पर तो बूट पहन कर ही बैठा जाता है. मैं ने यह भी महसूस किया कि घर छोड़ते समय जिस तरह मु झे ले कर मां भावशून्य थी उस में और वृद्धि हो गई है. न मैं बैठा और न ही मैं ने बूट उतारे. कहा, ‘‘चलूंगा मां. देखने आया था कि शायद तुम्हें मेरा अभाव खटकता हो. पर नहीं, यहां सबकुछ उलट है. तुम्हें मेरा अभाव नहीं था बल्कि मु झे तुम्हारा अभाव था. कितना विलक्षण है कि बेटे को मां का अभाव है पर मां को नहीं.’’ वहां से निकलने के बाद भी पीछे से मां की आवाज आती रही, ‘‘कुछ खातेपीते जाओ. भाई से नहीं मिलोगे? होटल नहीं देखोगे?’’ मु झे मां की आवाज किसी कुएं से आती सुनाई दी. मां, दिनेश भाई के साथ इसलिए है कि दोनों एक ही वृत्ति के हैं. बेईमान और धोखेबाज. मैं ने तो यह महसूस किया कि अब तक के सालते क्षणों में कुछ और क्षण समावेश कर गए हैं. और यह भी कि क्षण यदि खुद में बदल भी जाएं तो निरथर्कता और बढ़ जाती है जो आदमी को जीवनभर सालती है. Family Story

Social Story In Hindi : सीता की लट

Social Story In Hindi : सीता की लट…यही नाम था उस सांप का. कहने को यह जगह राजधानी की सीमा में था लेकिन वह इलाका बाहरी शहर का अविकसित गांव था, जहां के खेतताल से ले कर श्मशान भूमि तक छोटेछोटे प्लौटों में तबदील होती चली जा रही थी.

8 सौ स्क्वायर फीट प्लौट में 1 हौल, 2 कमरे और नाममात्र के गार्डन, बाऊंड्री शहरी मकान अभी बन कर पूरा ही हुआ था. किसी प्राइवेट कंपनी का एरिया सेल्स मैनेजर पंकज, उस की पत्नी काया और 2 नन्हें बच्चे सफल और प्रबल अभी हाल ही में वहां रहने आए थे.

पति सुबह लंच बौक्स ले कर काम पर रवाना हो चुका था. 5 साल के सफल को वह 8 मिनट स्कूटी चला कर स्कूल बस में चढ़ा आई है. अब दोपहर 1 बजे उसे लेने जाना होगा. यहां से सब जगहें दूरदूर हैं पर काया को विश्वास है कि जब खाली कालोनियां बस जाएंगी, यह मिटता हुआ गांव पूरी तरह मिट जाएगा, घर के आगे की पतली सड़क प्रस्तावित बाईपास 40 फुट रोड में बदल जाएगी. हां, तब सफल की स्कूल बस का रूट जरूर बदलेगा और वह बिलकुल घर के बाहर आ कर हौर्न बजा दिया करेगी. बस, 2-4 साल में ही इस गांव की जगह पूरी एक पौश कालोनी होगी, यह तय है.

‘तब हम कह सकेंगे कि इस कालोनी को बसाने वाले हम हैं. हम यहां तब से हैं जब कालोनी का कोई नामोनिशान न था और घर के पते में गांव मेंहदी खेड़ा लिखना पड़ता था,’ काया मन ही मन हंस कर कहती और मामूली प्राइवेट नौकरीदार मैनेजर पति होमलोन, पेंशन प्लान से ले कर कंपनी का इस मंथ का दिया बिक्री टारगेट पूरा कर पाने, न कर पाने की चिंताओं से दबा, भ्रम की तरह मुसकरा कर फिर उदास हो जाता.

पति का लंच बौक्स और बेटे की स्कूल बस सुबह के दोनों महान लक्ष्य पूरे हुए. बड़ा संयोग यह कि कुछ देर तंग करने के बाद अब छोटू प्रबल गहरी नींद सो गया है. काया जल्दीजल्दी घर के काम निबटाने में लगी है. बरतन मांज लिए हैं. पोंछा लगा रही है.

इस गंवई इलाके की गरीबनें अब तक महरी नहीं बनी हैं. यहां आते ही काया ने हफ्ते 2 हफ्ते बड़ी कोशिश की थी. सड़क से गुजरतीं 2-4 फटेहाल, निहायत गरीब दिखने वाली मजदूर औरतों से पूछा भी था और उन के जवाब थे कि गांव में किसी के जूठे बरतन मांजने जाना बड़ा बुरा माना जाता है. हां, गेहूं बीनने जैसा काम हो तो वे खुशीखुशी कर देंगी.

‘‘पर हम तो ब्रैंडेड आटा इस्तेमाल करती हैं,” काया के इस जवाब पर बकरियां चराने वाली एक औरत संतोष बहुत चौंकी थी. अब आटा बेचने की भी कंपनियां खुल गई हैं. क्या भाव पसेरी का? आटा बेचते हैं कि चांदी?

लब्बोलुआब यह कि यहां आ कर नन्हें बच्चों की मां काया को अपने घर में झाडूपोंछा, बरतन, कपड़े वगैरह सब कामों में खुद के ही हाथ घिसने पड़ते हैं तिस पर यह छोटू. इतना ज्यादा सक्रिय शैतान जैसे कोई जिन्न…उस दिन छत की रेलिंग पकड़ कर हवा में लटक गया था… उस दिन सड़क पर उतनी दूर अकेला घुटनों पर चलता मिला था. एक दिन अचानक गायब हो गया. मां ढूंढ़ती, घबराती, हलकान और वह मजे से सोफे के नीचे सरक कर सो गया था.

पोंछा लगा कर पानी बाहर फेंकने आई वह एक पल को ठिठक गई. बगल के श्मशान में, जो घर से बस इतने प्लौट्स के बाद है कि धुआं यहां नहीं लगता, धूप में दाह की ऊंची आग तेज गरम चमक के साथ झिलमिला रही है. इंसान जीवन में कितनेकितने दंभ और मिथ्या पालता है कि यह मेरा, यह मैं…

काया को सहसा याद आया कि उस की नानी और उस की मां भी हमेशा यही करती थीं कि घर के सामने से कभी अर्थी निकले तो मुट्ठी भर बारीक राई फेंक देती थीं ताकि मृतक की आत्मा इधर नहीं आने पाएं. इन सब ढकोसलों में पड़ने का वक्त किस के पास है. काया ने पोंछे का धूल फिनायल भरे पानी से दूसरी तरफ बहा दिया. मांनानी की किसी भी मान्यता को मानना उस डर को एक पहचान दे देना होगा जिसे वह भरसक झुठलाया करती है. पति अकसर टूर पर रहते हैं. श्मशान की तरफ कड़कती बिजली की खौफनाक रोशनी और हाहाकार सा पानी बरसाती अंधेरी रातों में, अपने दोनों बच्चों को चिपकाए काया दिल में लगातार दोहराती है,’मुझे डर नहीं लगता, मुझे डर नहीं लगता, मुझे डर नहीं लगता…’

निडर होना भी एक भयानक विवशता है और पीछे एक नया डर उस के इंतजार में है. पोंछे का पानी बाऊंड्री के बाहर फेंक लोहे का गेट बंद कर वह पलटी ही थी कि अचानक उस के मुंह से चीख निकल गई, “सांप…”

सामने एक सांप था. बाऊंड्री के बीचोंबीच पूरे रोबदार से रेंग कर आता हुआ.

‘अंदर मेरा बच्चा है,’ उस का पांव उठता है फिर ठिठक जाता है. सामने सांप है और अंदर मेरा बच्चा है. फिर किसी ने दोहराया उस के भीतर और वह सांप को लगभग फांदती हुई दौड़ गई. सोए बच्चे को समेटे वह वापस दौड़ आई. सांप ऐन बीच में कुंडली जमा चुका था.

चिल्लाना यहां कौन सुनता…खेत व प्लौटों का सूनापन उस ने पहली बार सच की रोशनी में देखा. सड़क पार 2 सौ कदम की दूरी पर गांव की किराने की दुकान है. बच्चे को चिपकाए वह भाग कर वहां पहुंची,”भैया, हमारे घर सांप निकला है. आप जल्दी चलिए प्लीज…’’

दुकान खुली ही छोड़ दुकानदार दौड़ आया, साथ में उस के दोनों ग्राहक भी. सहायता की यही सच्ची तत्परता उन्हें ग्रामीण साबित करती है. बाऊंड्री में बैठे सांप को देखते ही डंडों पर कसी उन की मुट्ठियां ढीली पड़ गईं,”अरे, जे तो सीता की लट है,’’ वे हलके हो कर बोले जैसे किसी गुंडे हत्यारे को ढूंढ़ते आए हों और मिला कोई नन्हा सा शरारती बच्चा.

‘‘सांप है…’’ काया उसी घबराहट के वशीभूत थी अब भी.

‘‘जे सांप कछू न करे…’’

‘‘यह जो भी है, है तो सांप ही न. आप इसे मार क्यों नहीं देते?’’

‘‘है तो जे सीता की लट ही. न होय तो भी आप जाने दो. कौन बड़ा सांप है… काहे हत्या का पाप सिर लेना.’’ वे जाने लगे. उस की घबराहट कुछ और गाढ़ी हो गई,”यह सिर्फ एक सांप है.’’

‘‘इसे न मारना, बहनजी. यदि सीता की एक लट को आप ने मार दओ तो ऐसी 7 निकलेंगी जहीं, आप के घर भीतर से.’’

वह रोकती रह गई. मददगार वापस लौट गए. अब बाऊंड्री में बची काया और वह सांप जो सरक कर गुलाब के गमले के पीछे जा छिपा था. काया को समझ नहीं आ रहा, करे तो करे क्या? पति को फोन करने का कोई अर्थ नहीं निकलेगा. अब क्या? धड़कते दिल से काया सांप से हरसंभव दूरी बनाए, चौकन्ने पंजों पर चलती निकली और इस पार आ कर दरवाजा झट बंद कर लिया. हरएक खिड़की की सिटकनी चढ़ा ली. दरवाजे के नीचे अखबार लगा दिया. अब हवा तक अंदर नहीं आ सकती. इस अकेलेपन में उस सांप का भय जैसे कालिया दह का राजा, जैसे शेषनाग, जैसे साक्षात मौत…

अभी तक तो छोटा बच्चा सो रहा है, अभी तक तो बड़ा बच्चा स्कूल में है लेकिन कितनी देर…कितना समय है उस के पास इन हालातों से अपने बच्चों को और अपनेआप को बचाने के लिए… दिमाग फिरकी की तरह घूम रहा है कि क्या करें…काया का सिर दुखने लगा. उस ने खिड़की से झांक कर देखा. वहीं है वह सांप…

बाहर से बकरियों का इक्कादुक्का स्वर आना शुरू हो गया है. संतोष बकरियां चरा कर आ गई है. काया उम्मीद और हिम्मत से दरवाजा खोली और बोली,”संतोष, ओ संतोष…’’ अपनी एकमात्र जानपहचानदारिन को वह भरसक ऊंची आवाज में पुकारती है.

संतोष लोहे के फाटक तक आ कर रुक जाती है, हमेशा की तरह. इधर घर के मुख्यद्वार पर काया है. उन दोनों के बीच रास्ते पर सांप है.

‘‘संतोष, इसे मार दो प्लीज,’’ डर भरी उंगली से आधुनिका ने जिस की ओर इंगित किया है, ग्रामीण युवती उसे देख सहजता से कहती है,”जे, सीता की लट. जाको भगा दीजिए. जे काटती नहीं है. जब रावण सीता मैया का हरण कर लिए जा रहो, तो मैया के कछू केस वन में गिर गए, वे ही लटें जे नागिनें होती हैं, बड़ी पवित्तर और निर्दोष. मारना नहीं, बाईजी. डंडा भी नहीं दिखाना. नहीं तो इत्ती निकलेंगी कि आप गिन नहीं पाओगी.”

“अनगिनत निकलेंगी या सिर्फ 7 और निकलेंगी? क्या बकवास है,” पूछतेपूछते ही साइंस पढ़ा हुआ काया का जेहन झुंझला उठा.

संतोष भी चली गई तो मदद की कहीं से कोई उम्मीद नहीं रही. दरवाजा बंद कर उस ने नीचे अखबार से रास्ता बंद किया और भीतरी कमरे में सोए बच्चे को एक नजर देखा. जब तक यह सोया है, तभी तक दरवाजा बंद रखा जा सकता है. न जाने वह कब जाग जाए. कुछ करना होगा उसे अभी.

वह परेशान हो कर शून्य दिमाग से सोफे पर बैठी है. अपनी हर परेशानी में हमेशा वह अकेली ही क्यों है? कभी जब बेटे की स्कूल बस समय पर नहीं आती है, तो वह बस स्टौप पर नन्हें प्रबल को चिपकाए धूपबारिश से बचतीजूझती बस, ड्राइवर से ले कर स्कूल के तय जिम्मेदारों तक को फोन करती परेशान होती है, अकेली ही. कभी जब उसे हरारत, बुखार जैसा कुछ हो जाता है तो उस पस्त हाल में भी तयशुदा रूटीन से घर के सब काम पूरे कर रही होती है अकेली. जानलेवा धूप में भी अपने दोनों बच्चों को स्कूटी पर संग लिए, एक को आगे खड़ा किए, दूसरे को कंगारू बैग में सीने से बांधे, वह भरे ट्रैफिक में चली जा रही होती है, कभी घर का राशन लाने, कभी पेरैंट्स मीट, कभी कोई बिल भरने अकेली ही.

पति नाम का जीव जैसे सिर्फ रुपए कमाने वाला और मूड के मुताबिक कुछेक और काम करने वाला रोबोट है कोई. और मन न होने पर भी करने वाले सारे काम तो पत्नी को ही करने पड़ते हैं. काया सोफे से उठ खड़ी हुई. कितनी ही बार उस ने साबित किया है कि अपने बच्चों की परवरिश व हिफाजत के लिए वह किसी मर्द के आसरे की मुहताज नहीं.

तब जब वे किराए के एक कमरे में रहते थे जो दूसरी मंजिल का कोना था, कोने पर घनी, ऊपर को जाती, फूलों लदी एक बेल थी जिस में एक विराट छत्ता छिपा था मधुमक्खियों का और यह बात उस ने तब जानी थी जब सामान वहां जल्दीजल्दी शिफ्ट करने के बाद पति को टूर पर जाना पड़ा था. इस से पहले कि कोई मधुमक्खी उस के बेटे को नुकसान पहुंचा पाती, उस ने कौकरोच मारने वाले स्प्रे से पूरा का पूरा छत्ता इस फुरती से नहला दिया था कि एक डंक भी हिल न सका था छत्तेभर मधुमक्खियों का.

तब जब वे उस घुप्प अंधेरे एलआईजी फ्लैट में रहते थे, जो नाले के पास था, नन्हा सफल मच्छरनाशक कौइल खा लिया था. बिना घबराए उस ने बच्चे को नमक का पानी इतना पिलाया था कि उस ने उलटी कर के पूरे जहर को बाहर निकाल दिया था.

तब जब वह दूसरी बार प्रैगनैंट थी और स्कूल बस मिस हो जाने पर बेटे के टेस्ट के दिन स्कूटी से उस को ले कर स्कूल जा रही थी, तो अचानक स्कूटी गिर गई थी. सारी खरोचें उसी को आई थीं, सफल साफ बच गया था. अपनी छिली कनपटी और रिसती कुहनी की परवाह किए बिना किस हौंसले से वह पलभर में फिर स्कूटी स्टार्ट कर रही थी. फुरती से, बिना घबराए.

गृहिणी ने सांप का सामना करने के लिए दिलदिमाग स्थिर किया, अपना कुल साहस बटोरा और दरवाजा खोल दिया.

सांप वहीं छिपा बैठा है, ऐन वहां जहां से वह उस के किसी भी बच्चे पर सरलता से हमला कर सकता है. लेकिन गांव के लोग अगर कह रहे हैं कि यह काटता नहीं तो क्या इसे सिर्फ भगाया नहीं जा सकता? निहत्थी काया बेआवाज पांवों से 2-4 कदम उस तरफ को बढ़ती है. सांप चौंक कर फन उठा लेता है. निर्णय हो चुका है. इस का नाम सीता की लट हो या गंगा की तट, यह सिर्फ एक सांप है और काया एक जिम्मेदार मां है… गांव माफ कर देता है, उसे जो नुकसान नहीं पहुंचाता, शहर नहीं कर पाता, उसे भी जो सीधा फायदा नहीं देता.

धड़कते दिल और पुख्ता हौंसले से उस ने 1 बालटीभर पानी जोर से फेंका. सांप सरसराता निकल आया. बला की फुरती है उस में. उस ने फन फैला लिया और फुफकारने लगा.
सांप में मौत सरीखी फुरती है और बच्चों की मां में सब हदों के पार आ चुका साहस. न जाने कितने ही वार किए उस ने हाथ के रैकेट से सांप पर, अंधाधुंध…

सांप सामने है पर अब भी उस के अंगों में हरकत बाकी है. एक पौलिथिन में सांप को डाल कर संतोष मन ही मन बोल पङी कि मरे सांप को अग्नि देनी चाहिए. अग्नि का पवित्र द्वार मिलता है तो अगली योनि मानव की पाता है सर्प. काया को यह मिथक नुकसानदेह नहीं लगता लेकिन सच में उस के पास बिलकुल समय नहीं है. यह जगह फिनायल से धोनी है, अपने हाथ और रैकेट ऐंटीसैप्टिक से साफ भी.बेटे को स्टौप पर लेने जाने का समय होने ही वाला है. सोए छोटू को जगा कर साथ लेना है. स्कूटी बाहर निकालनी है.

काया ने बंद पौलिथीन ताकत भर के उधर फेंकी जिधर प्रज्वलित श्मशान है. खाली पड़े खेतप्लौटों को देख विजयी मगर विवश हत्यारिन काया अपनेआप को तसल्ली दे रही है कि बस, कुछ ही सालों में यह गांव मिट जाएगा और यहां उस के मकान की तरह के सैंकड़ों शहरी मकान बन जाएंगे. Social Story In Hindi

Family Story In Hindi : मोको कहां ढूंढे रे बंदे

Family Story In Hindi : आज फिर कांता ने छुट्टी कर ली थी और वो भी बिना बताए. रसोई से ज़ोर – ज़ोर से बर्तनों का शोर आ रहा था. बेचारे गुस्से के कारण बहुत पिटाई खा रहे थे. पर इस गुस्से के कारण कुछ बर्तनों पर इतनी जम के हाथ पड़ रहा था कि मानो उनका भी  रंग रूप निखर आया हो. वही जैसे फेशियल के बाद चेहरे पर आता है. अरे, “आज मुझे पार्लर भी तो जाना है.” अचानक याद आया. सारा काम जल्दी – जल्दी निपटा  दिया. थकान भी लग रही थी. पर सोचा चलो, वही रिलैक्स हो जाऊंगी. घर का सारा काम निपटा कर मैं पार्लर पहुंच गई.

जब फेशियल हो गया तो पार्लर वाली बोली…….
“दीदी कल देखना, क्या ग्लो आता है.” उफ़….एक तो उसका “दीदी” बोलना और दूसरा अंग्रेजी का “ग्लो” ग्लो~~ वाह!! सच, मन कितना आनंद से भर जाता है. खुश होकर मैंने कुछ टिप उसके हाथ में रख दी, “थैंक यू दीदी” उसने कहा.सच में अपने आप पर बड़ा गर्व महसूस होने लगा, जैसे न जाने कितना महान काम कर दिया हो.घर वापसी के लिए पार्लर का दरवाज़ा खोलते समय सचमुच में एक सेलेब्रिटी वाली फीलिंग आने लगती है. लगता है जैसे बाहर कई सारे फोटोग्राफर और ऑटोग्राफ लेने वाले इंतजार में खड़े होंगे… मैडम, मैडम!हेल्लो.. हेल्लो.. प्लीज़ प्लीज़ एक फोटो. इधर,  इधर, मैडम. ऐसा सोचते ही एक गर्वीली मुस्कुराहट अनायास ही चेहरे पर आ गई.

पर ये क्या? पार्लर से निकलते ही सब्ज़ी वाला भईया दिख गया। उफ़…मेरे ख्यालों की
दुनिया जैसे पल भर में गायब हो गई. मुझे देखते ही वो अपने चिरपरिचित अंदाज़ में बोला “हां,…. चाहिए कुछ?” मैं जैसे सपने से जागी.अरे हां,आलू तो खत्म हो ही गए है. परांठे कैसे बनेंगे कल.सन्डे को कुछ स्पेशल तो सबको चाहिए ही. फिर चाहे लंच में छोले चावल बन जाएंगे. टमाटर भी लेे ही लेती हूं. रखे रहेंगे, बिगड़ते थोड़े ही है. कुछ और सब्जियां भी ‘सेफर साइड योजना’ के तहत लेे ली जाती है.अब आती है असली जिम्मेदारी निभाने की बारी..यानी हिसाब लगवाने की बारी “क्या भईया, क्यूं इतनी मंहगी  लगा रहे हो?”
“हमेशा तो आपसे ही लेती हूं.”

“आज क्या कोई पहली बार सब्ज़ी थोड़े खरीद रही हूं आपसे?”
“उधर, बाहर मार्केट में बैठते हो तो कम भाव लगाते हो”
“हमारी कॉलोनी में आते ही सबके भाव बढ़ जाते है”
अन्तिम डायलॉग बोलते समय थोड़ा फक्र महसूस होता है. देखा हम कितनी पॉश कॉलोनी के वासी है. परन्तु फ्री का धनिया और हरी मिर्च मांगते वक्त मैं अपने वास्तविक रूप में लौट आती.बनावट तो अस्थाई होती है, वास्तविकता ही हमारे साथ स्थाई रूप से रहती है.पर ये हमें शायद बहुत कम या कहिए देर से समझ आता है.

खैर….सब्जी वाले के साथ मोल भाव करने और कुछ एक्स्ट्रा लेने में अपनी कला पर खुद को ही शाबाशी दे डाली, हमेशा की तरह। वरना, घर पर ये सब बताओ तो इन समझदारी की बातों को भला कौन समझता है? उल्टा प्रवचन अलग मिल जाता है पतिदेव से …”क्या तुम भी, यूं दो – चार रुपयों के लिए इन मेहनतकश लोगो से इतना तोल मोल करती हो” इतनी सुबह- सुबह दूर मंडी से तुम्हें ये सब घर बैठे ही मिल जाता है. ये भी तो फ्री होम डिलीवर ही है. हमें तो इनका शुक्रगुज़ार होना चाहिए.

उहं मैंने मन ही मन  मुंह बनाया. अरे, घर चलाना कोई खेल नहीं है. बहुत सारी बातें सोचनी पड़ती है. ये मर्दों के बस की बात नहीं है. अपने और उनके दोनों के ही हिस्से की बातें मैं मन ही मन सोच रही थी.
जब सब्ज़ियां खरीद ली तो याद आया. ओह, हां.. .’ब्रेड और मख्खन भी तो नहीं है और छोटे बेटे ने अपना शैंपू लाने के लिए भी तो कहा था।’ कुछ चिप्स और चॉकलेट भी लेे लूंगी उसके लिए. घर पहुंचते ही  बोलता है “मेरे लिए क्या लाई हो मम्मी?” दुकान पर पहुंची तो कुछ अन्य वस्तुओं पर भी नज़र गई । उन्हें देख कर सोचा..”अच्छा हुआ जो नजर पड़ गई, ये सामान भी तो लगभग खत्म ही होने लगा है.” ये तो बहुत अच्छा हुआ, जो देखकर याद आ गया। वरना फिर से आना पड़ता.
सारा सामान लेे कर  थकी – हारी घर पहुंची। रिक्शे वाले से भी थोड़ी बहस हो गई किराए को लेकर. आज तो सारा मूड ही खराब हो गया.

डोरबेल बजाई तो चीकू ने दरवाज़ा खोला और चिल्ला कर बोला… पापा,  “मम्मी आ गई हैं.” “पता नहीं क्यूं ये हमेशा अपने पापा को सावधान होने का संकेत देता है.” जैसे, “मैं नहीं, कोई खतरे की घड़ी आ गई हो.”
हमेशा की तरह मैंने इस बात को नजर अंदाज़ किया.
चीकू बोला ,”मेरे लिए क्या लाई हो मम्मी?” हर बार उसकी यही जिज्ञासा होती.
अरे। “हर बार क्यूं पूछते हो?” “मैं कोई विदेश यात्रा से आती हूं.” थकान अब तल्खी में बदल रही थी.
पतिदेव ने शायद इसे महसूस कर लिया था. वे कमरे से बाहर आये और माहौल की नज़ाकत को समझते हुए चिंटू को अंदर जाने का इशारा किया और सामान भीतर लेे जाने के लिए उठाने लगे. फिर अचानक जैसे उन्हें कुछ याद आया. वे  सहानुभूति जताते हुए बोले…अरे,,”तुम तो पार्लर गई थी ना?”
“क्या पार्लर बंद था?” ओह! “लगता है सारा समय घर की खरीदी में ही निकल गया.”

क्या इन्हें मेरा “ग्लो” नजर नहीं आ रहा? बाल भी तो ठीक कराए थे, क्या वो भी दिखाई नहीं पड़  रहे?
एक वो पार्लर वाली है जो बोल रही थी….”दीदी”, “आप अपने पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही हो” “देखो तो कितनी ड्रायनेस आ गई है हाथों पर और बाल भी कितने हल्के होते जा रहे है”
“आप थोड़ा जल्दी जल्दी विजिट किया करे” सच में मेरा कितना ख्याल करती है, और इन्हें देखो, इतना कुछ करवा कर आने के बाद भी पूछ रहे है…”क्या पार्लर नहीं गई?”
हद है. दिनभर की थकान,  सबसे हुई बहस और पति की नज़र का दोष.एक धमाके का रूप ले चुका था. मैंने जोर से पांव पटके और धड़ाम से दरवाज़ा बंद किया और कहा..

“कभी तो मुझ पर ध्यान दीजिए, कभी तो फुरसत निकालिए” “क्या आपको कहीं भी?… कुछ?.. सुंदरता नजर आती है?” मैंने एक – एक शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा “हर समय बस, ये अख़बार और टीवी”
“क्या बार बार वही न्यूज सुनते रहते हो””घर -बाहर का सारा काम कर करके मेरे चेहरे का ग्लो ही खत्म हो गया” ये देखो, बर्तन मांज – मांज कर मेरे हाथ कितने ड्राई हो गए है”

“ये नाखून तो जैसे सारे ही टूट गए है.” मैं  गुस्से में बोल रही थी.
आवाज़ से लग रहा था, बस रो ही पडूंगी, पर उनके सामने रोना अपनी बात को कमज़ोर बनाना था। मैं सीधे अपने कमरे में चली गई. अचानक एक छोटे से प्रश्न पर इतना भड़क जाना? उनकी कुछ समझ नहीं आ रहा था. पतिदेव ज्यादा बहस के मूड में नहीं  थे. चुपचाप सारा सामान रसोई में रख अख़बार उठा कर पढ़ने लगे.

कुछ देर बाद मैंने अपने कमरे का दरवाज़ा खोला। देखा रसोई में कुछ खुसुर – पुसुर हो रही थी.
चीकू की आवाज़ आ रही थी….”पापा आज बाहर से कुछ मंगवा  ले?”और पतिदेव बोल रहे थे..”यार चीकू मैगी ही बना लेते है।” “अब, मम्मी से कौन पता करे कि उन्हें क्या खाना है?”

अब मुझे अपने आप पर भी गुस्सा आने। आखिर इतना बवाल करने की क्या जरूरत थी.
मैंने रसोई में जाकर बिना प्यास के पानी पिया। बस टोह लेने के लिए कि क्या चल रहा है. फिर सपाट और संयमित स्वर में पूछा..”क्या खाओगे?” दोनों एक साथ बोल उठे…”खिचड़ी”
“ये तो कमाल हो गया, यार चीकू ” पापा ने बड़ी प्रशंसा भरी नज़रों से चीकू को शाबाशी दी और चीकू ने भी अपनी आंखे झपकाकर पापा को “टू गुड” कहा।  “वाह!”
“इतनी अंडरस्टैंडिंग” सच में कमाल ही है. जो खिचड़ी के नाम से ही बिदकते हो आज खुद खिचड़ी खाने के लिए कह रहे हैं. जो मैं अपनी थकान की स्थिति के विकल्प रूप में बनाती हूं. मैं मन ही मन मुस्कुराई पर स्वयं की प्रतिष्ठा के मद्देनजर चेहरा संजीदा ही बनाए रखा.

अब वे दोनों चुपचाप रसोई से बाहर निकल कर टेबल लगाने लगे. खाने के बाद के सारे काम निपटा कर जब मैं चीकू के कमरे में गई तो वो सो चुका था. आज इसे अकारण ही डांट दिया. बहुत बुरा लग रहा था. कॉमिक्स उसके हाथ से निकाल कर हौले से उसके बालों को सहलाया. बत्ती बंद कर  मैंने अपने कमरे की ओर रुख किया.

आश्चर्य है आज उनके हाथ में न अख़बार था न मोबाइल मुझे देख कर वे थोड़ा मुस्कराए मुझे थोड़ा अटपटा लगा. पता नहीं क्या बात है? मैं उनकी ओर पीठ घुमाकर  अपने ड्राई हाथों पर क्रीम मलने लगी. आज थोड़ी ज्यादा देर तक हाथों को क्रीम मलती रही. शायद उनके बुलाने का इंतजार कर रही थी. सोचे जा रही थी…”इतना धैर्य भी भला किस काम का? जो बोलने में भी इतना समय लगे।” मन में बोले गए वाक्य के पूरा होने की देर थी कि आवाज़ आई…”आओ!” “तुम्हें कुछ दिखाना है” ये हो क्या रहा है? शाम के खाने से लेकर अभी तक आश्चर्य ही आश्चर्य इतने आश्चर्य वाली धाराएं तो पहले कभी नहीं देखी.

मैं बिना कुछ कहे बैठ गई..वे अलमारी से एक बड़ा सा लिफाफा निकाल रहे थे. मैं सोच रहीं थीं, अभी न तो मेरा जन्मदिन है, न शादी की सालगिरह. फिर तोहफे लेने देने वाली परंपरा भी तो ज़रा कम ही है हमारे बीच.उन्होंने वो बड़ा सा लिफाफा मेरे सामने रख दिया. “ये क्या?”  “लिफाफा तो पुराना सा दिख रहा है” मुझे कुछ अजीब लगा.
मैंने धीरे से पूछा… ..
…..”क्या है इसमें ?”
“आज तुम पार्लर से आकर पूछ रही थी ना…. कि क्या मुझे  कहीं भी, किसी भी रूप में कुछ सुंदरता दिखाई देती है?”
“ये वही सुंदरता वाला लिफाफा है.”
वे एकदम शांत और संयत आवाज़ में बोले।

अब तो सच में, मैं आश्चर्य के समुद्र में गोते लगाने लगी।
देखो, अनु, “सुंदरता की सबकी अपनी परिभाषा होती है।” “सुंदरता देखने का सबका अपना अलग – अलग नज़रिया होता है।”
“किसी को तन की सुंदरता मोहित करती है, तो किसी को मन की, कोई स्वभाव की सुंदरता देखता है तो कोई भाषा की।”
“कोई  प्रकृति की सुंदरता में खो जाता है, तो किसी को खेत – खलिहान में काम करने वाले उन मेहनतकश मजदूर और उन पर लगी उस माटी की सुंदरता मोहित करती है।” “कोई रसोई में खाना बनाती उस गृहिणी और उसके माथे पर आने वालेे पसीने की बूंदों में सुंदरता देखता है, जिसमें परिवार के लिए स्नेह झलकता है, जो मैं तुममें भी अक्सर देखता हूं।” “मुझे तुम्हारा वो ग्लो ज्यादा अच्छा लगता है, तो इसमें मेरा क्या कसूर है?” वे बोलते जा रहे थे। मैं अपना सिर नीचे किए बस उन्हें सुन रही थी। आंखों में आंसू डबडबाने लगे थे।
तभी लिफाफे के खुलने की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
“ये देखो।” मैंने पनीली आंखों से देखा….”ये मां की बरसों पुरानी तस्वीर है।” मैंने देखा सासू मां की उस ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर को … एक सादी सी सुती साड़ी पहने, माथे पर बड़ी सी बिंदी, बालों की एक लंबी ढीली सी चोटी।इतनी सादगी और कितनी सुंदर। मैं मोहित हो कर देखने लगी। सचमुच सुंदर।
फिर निकली एक बड़ी सी राखी जो बचपन में बहन ने बांधी थी। उस समय वो कलाई से भी काफी बड़ी रही होगी। मुझे अपने भाई की याद गई वो भी तो ऐसी ही बड़ी सी राखी बंधवाता था और फिर सारे मोहल्ले को दिखता था। उसे याद कर मैं धीरे से हंस पड़ी।
फिर निकली एक पुरानी सी कैसेट जिसमें मेरी नानी के गाए भजन और उनके साथ की गई बातचीत की पर्ची लगी हुई थी।
पिताजी जी के साथ देखी गई फिल्म का पोस्टर। सचमुच कमाल।
हमारी पहली यात्रा के टिकिट, चीकू की पहली पेंटिंग वाला कागज़। सारी चीजे इतने जतन से संभाली हुई।
अब तो मेरी बहुत कोशिश से रोकी हुई रुलाई फूट पड़ी।
“देखो अनु,” “मैं तुम्हारा दिल दुखना हरगिज़ नहीं चाहता।” “पार्लर जाना कोई बुरी बात नहीं है।” “न ही मैंने तुम्हें कभी रोका है।”
“अपने आप को अच्छा रखना और लगना कोई गुनाह नहीं है।”
“दरसअल, हमें जो अच्छा लगता है, हम चाहते है सामने वाले को भी वो, उसी रूप में अच्छा लगे और वो उसकी तारीफ करे,पर ऐसा हर बार जरूरी तो नहीं।”
“उसकी अपनी सोच हमसे अलग भी तो हो सकती है।”
“मुझे लगता है, जब हम सुंदरता का कोई रूप देख कर खुश होते है,तो आपकी आंतरिक खुशी  चेहरे पर अपने आप आ जाती है।”
उस खुशी से चेहरा दमकने लगता है। शायद तभी चेहरे को दर्पण कहा   जाता है। बिना बोले ही कितनी बातें कह जाता है।
“मेरा अपना सुंदरता का क्या नज़रिया है, वो मैंने तुम्हें बता दिया।”
“मेरा तुम्हारा मन दुखाने का कभी भी कोई मकसद नहीं होता।”  एक गहरे निःश्वास के साथ वे चुप हो गए।

उस दिन मैं एक नए संवेदनशील इंसान से मिली।अब मेरी आंखों में खुशी के आंसू झिलमिला रहे थे। सुंदरता की ऐसी परिभाषा तो शायद मैंने पहले कभी सोची ही नहीं।आज कुछ अलग सा महसूस किया था। सच,एक नया अर्थ समझ आया था.
मुझे लगा जैसे आज संवेदनाओं की कितनी उलझने सुलझ गई थी।
दूर बादलों की ओट से चांद बाहर निकल रहा था। ठीक मेरे मन की तरह। शिकवे- शिकायतों के सारे काले बादल शांत, श्वेत चांदनी में बदल गए थे। खिड़की से झांकती चांदनी मुस्कुरा रही थी।
हम दोनों खामोश थे।बस आंखें बोल रही थी।
मैंने उनकी ओर देखा और  झूठ – मूठ का गुस्सा दिखाते हुए कहा… चलिए, “अब सो जाइए। कल सुबह मुझे आलू के परांठे भी बनाने है।”
“वाकई। तुम्हारे आलू परांठे होते बहुत सुंदर है।” पतिदेव एक शरारती मुस्कान लिए बोले।
देखा नहीं? “उन्हें देखते ही मेरे और चीकू के चेहरे पर कितना “ग्लो”~~ आ जाता है।”
हम दोनों खिलखिला कर हंस पड़े। Family Story In Hindi 

Government of India : सरकार, स्लम और बुल्डोजर

Government of India : कुछ सालों से कोर्ट्स लगातार कह रही हैं कि सरकारी जमीन पर घर बनाने वालों को सिर्फ इसलिए परमानैंट रहने का अधिकार नहीं मिल जाता कि वे वहां वर्षों से रह रहे हैं, उन के पास बिजली के कनैक्शन हैं, बस्ती में पानी का नल है, आधारकार्ड या पैनकार्ड हैं, बच्चों के स्कूल पास में हैं आदि. दिल्ली की सत्ता में नई आई भारतीय जनता पार्टी, चूंकि अगले चुनाव होने में काफी समय है इसलिए, भयंकर तोड़फोड़ कर रही है. वह मुख्यतया मुसलिम बस्तियों को नष्ट कर रही है हालांकि साथसाथ हिंदुओं की भी कुछ बस्तियों का सफाया हो रहा है. इसी कारण मामले कोर्ट में दायर किए जा रहे हैं.

हर शहर में बनी स्लम बस्ती असल में शहर का लेती कम है, शहरियों को देती ज्यादा है. सरकारी मुफ्त की जमीन पर बनी झुग्गियों को शुरू में सिर्फ तिरपाल बांध कर बसाया जाता है. धीरेधीरे हर घर 50 फुट से बढ़ कर 500 फुट तक का ही नहीं हो जाता बल्कि कुछ 2-3 मंजिलों तक हो जाते हैं. पास का कोई नाला इन लोगों का सीवर बन जाता है. चूंकि इन्हें मकान का किराया कम देना होता है, ये लोग शहरियों को सस्ते में सेवाएं देते रहते हैं. शहरी इन स्लमों को देख कर नाकभौं चढ़ाते हैं पर अगर यहां के कामगार उन शहरियों जैसे पक्के मकानों का किराया देने लगें तो उन के वेतन तीनगुना बढ़ जाएंगे.

शहरों के विकास में स्लमों का बड़ा योगदान है और ऐसा दुनिया के हर बड़े शहर में हुआ है. हर शहर में स्लम हैं जो सरकारी जमीन पर ही बनाए गए हैं.

कुछ शहरों में किसानों ने बिना शहरी अधिकारियों की अनुमति के अपनी जमीन पर मकान बना लिए हैं, इन्हें भी अधिकारी तोड़ते रहते हैं. लेकिन चूंकि यह जमीन सरकारी नहीं होती, इसलिए अफसरों के हाथ बंधे होते हैं.

भारत में 1950 के आसपास लैंड एक्विजिशन एक्ट के अंतर्गत शहरों के चारों ओर किसानों की जमीनें कौडि़यों के भावों में खरीद कर वहां ऊंचे लोगों के लिए बस्तियां बसाई गईं और तब सरकारों ने आज के दामों में खरबों बनाए थे. इस पर शायद ही किसी कोर्ट ने आपत्ति की थी क्योंकि तब किसानों की जमीन का बाजार भाव भी कोई ज्यादा नहीं था. अब स्थिति बदल चुकी है. जिन जमीनों को सरकारों ने 1950 के दशक में जबरन लिया था उन में से कुछ जमीनों पर बने घर तो रैगुलर बस्तियां बन गईं पर कुछ पर स्लम उग आए हैं जिन्हें अब देशभर में उखाड़ा जा रहा है.

सोनिया गांधी ने 2005 में और 2013 में लैंड एक्विजिशन कानूनों में बदलाव कर के मुआवजे में मोटी रकम देनी शुरू की तो यह सरकारी धांधली रुकी. पर जहां कब्जा हो चुका है, वहां से लोगों को निकालना टेढ़ी खीर है और कोई राजनीतिक दल इस जलती खीर को निगलना नहीं चाहता. भाजपा यह कदम उठा रही है तो सिर्फ इसलिए कि वह ज्यादातर यह काम मुसलिमबहुल बस्तियों में कर रही है.

सरकारी या निजी जमीन पर बिना सरकारी अनुमति के मकान बनाने की छूट का समर्थन नहीं किया जा सकता पर यह नहीं भूलना चाहिए कि घरों और फैक्ट्रियों के मजदूर, डिलीवरी बौय, सफाई करने वाली मेड्स, बढ़ई, मिस्त्री, माली, चौकीदार इन्हीं बस्तियों में रहते हैं. उन्हें गांवों में इतनी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं, इसलिए वे स्लमों में रहते हैं. ऐसे में उन्हें उखाड़ना शहर का उस डाल पर कुल्हाड़ी मारना है जिस पर शहर खुद बैठा है.

अंगरेजों के जमाने में मुंबई और अहमदाबाद जैसे शहरों में मिलों में ही रिहायशी मकान भी बनाए जाते थे. यही परंपरा फिर शुरू करनी होगी. यह कैसे होगी, कैसे किस के हक होंगे, यह तय करना होगा. सरकारी जमीन पर जबरन कब्जा मंजूर नहीं है पर इन लोगों को उखाड़ते ही शहर ठप हो जाएंगे.

S Jaishankar : विदेश मंत्री या विदेश सचिव

S Jaishankar : विश्वगुरु का दम भरने वाले भारत की विदेश नीति आजकल उसी तरह गड्ढे में है जैसी देशी आर्थिक प्रगति और रोजगारों की नीतियां हैं. भारत सरकार का असल ध्यान धर्मकर्म में है, विदेश नीति, आर्थिक मामलों, शिक्षा, अनुशासन में नहीं.

जो चमक नरेंद्र मोदी के प्रथम शासनाकाल में आई थी वह भारतीय मूल के विदेशों में बसे ऊंची जातियों के नागरिकों के अपने देशों की सरकारों पर बनाए दबाव के कारण आई थी. लेकिन अब इस ‘महान’ भारत की पोल खुल गई है कि 5वीं से चौथी बनी अर्थव्यवस्था प्रतिव्यक्ति आय में नीचे से 20 के अंदर है. अर्थव्यवस्था की थोड़ीबहुत जो धौंस है वह सैन्य या उपभोक्ता सामान की खरीद के कारण है.

अब विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों का भारत सरकार से मोह भंग हो गया है क्योंकि हर गोरों के देश में भूरों, कालों, बाहरियों को शक से देखा जाने लगा है. भारतीय मूल के लोग अब अपने नए देशों में ज्यादा लाइमलाइट में नहीं आना चाहते और वहां अब भारत सरकार की वकालत वे कम कर रहे हैं.

नरेंद्र मोदी जी-7 की मीटिंग के लिए न सिर्फ बहुत देर से बुलाए गए बल्कि वहां अमेरिकी राष्ट्रपति उन से मिले बिना वाशिंगटन चले गए और भारत के विरोध के बावजूद कहते रहे कि उन्होंने ही भारत-पाक युद्ध रुकवाया. भारत में लोग इस मूड में थे कि सिंदूर औपरेशन के बहाने पाकिस्तान की कमर तोड़ दी जाए पर युद्ध बिना लाहौर, कराची पर कब्जा किए खत्म हो गया तो देश के भारतीय भी और विदेशों में बसे भारतीय भी मुंह लटका कर बैठ गए हैं. उन की पैरवी अब कम हो गई है क्योंकि वे जानते हैं कि अब चलनी तो अमेरिका और चीन की ही है चाहे हमारी अर्थव्यवस्था आबादी के कारण कितनी ही बड़ी क्यों न हो या हो जाए.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के फील्डमार्शल आसिम मुनीर के साथ प्रैस की गैरमौजूदगी में जो लंच कैबिनटरूम में किया, उस से साफ है कि ट्रंप, जिन के लिए मोदी ने 2019 में अहमदाबाद में ‘एक बार फिर ट्रंप सरकार’ के नारे लगवाए थे, मोदी या भारत को खास भाव नहीं दे रहे. ट्रंप के लिए भारत दूसरे देशों की तरह का ही है.

भारत ने औपरेशन सिंदूर के लिए छोटेछोटे देशों में सांसदों के जो प्रतिनिधिमंडल भेजे थे वे हैलोहाय कर और केकपेस्ट्री खा कर लौट आए हैं. उन्होंने कुछ खास पाया हो, ऐसा उन के बयानों से स्पष्ट नहीं हुआ. ये सांसद सरकारी खर्च पर देशों की सैर कर आए.

भारत का प्रतिद्वंद्वी असल में चीन है पर भारत अपने से कहीं छोटे पाकिस्तान का राग आलापता रहता है और हमारी विदेश नीति, जनता में चल रहे नैरेटिव के अनुसार, पाकिस्तान को केंद्र में रख रही. हमें तो चीन से सबक लेना है, चीन के बराबर रहना है, चीन जैसा बनना है. हमारी आंतरिक और विदेशी बातें हिंदूमुसलिम करने के कारण पाकिस्तान तक ही सीमित हैं और 11 साल बाद अब यह नीति बेकार हो गई है. पाकिस्तान के प्रति दुनिया के किसी देश में रुचि नहीं रह गई है क्योंकि सब ने अब अफगानिस्तान को अपने हाल पर छोड़ दिया है.

1990 तक भारत के बराबर रहा चीन आज दुनियाभर में धौंस जमा सकता है क्योंकि उस ने शिक्षा पर ध्यान दिया, देश की सड़कों पर ध्यान दिया, बराबरी पर ध्यान दिया जबकि धार्मिक बरबादी नहीं होने दी. आज दुनिया चीनी इशारों पर चल रही है. भारत की कोई जगह नहीं है. हमारे बौने विदेश मंत्री ने रहीसही कसर पूरी कर दी है क्योंकि वे, दरअसल, जननेता नहीं, सिर्फ अफसर हैं. वहीं, सभी देशों में विदेश मंत्री आमतौर पर राजनीति से जुड़ा व्यक्ति होता है जिस से उस का वजन भी होता है. हमारे विदेश मंत्री का दुनिया के दूसरे देशों में विदेश सचिव जैसा रुतबा मात्र है जो हर बात को बौस से एप्रूव कराएगा. यह एक बड़ी खराबी है.

Donald Trump : अमेरिकी-अमेरिकी में खाई 

Donald Trump : अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खब्ती नीतियां पूरे देश में ऐसा वायरस उगा रही हैं जिस से अमेरिका 10-15 सालों में थर्ड वर्ल्ड कंट्री बन जाए तो बड़ी बात नहीं. जैसे भारत में हिंदू मुसलमान कर के समाज को 2 हिस्सों में बांट दिया गया है कुछ वैसे ही ट्रंप ने अमेरिका में लोगों को बांट डाला है. दूसरी बार सत्ता में आने के बाद ट्रंप ने अवैध घुसपैठियों को पकड़ने के लिए भारी हथियार लिए, बुलेटप्रूफ वरदी पहने, मास्क लगाए अर्धसैनिकों को कैलिफोर्निया के लौस एंजेल्स में भेज दिया जिस से वहां के स्थानीय लोग उबल पड़े.

यह न सिर्फ जनता की इच्छा जाने बिना किया गया बल्कि वहां के चुने हुए गवर्नर को भी बताए बिना किया गया. वाशिंगटन की पुलिस को राज्य की पुलिस का कोई सहयोग नहीं मिला और अब इस खूबसूरत शहर में दंगों, आगजनी, गिरफ्तारियों, जुलूसों, धरनों, हाथापाई का दौर चल रहा है जहां का हौलीवुड सारी दुनिया में जाना जाता है.

घुसपैठिए अमेरिका का भला ही कर रहे हैं, बुरा नहीं. ये गरीब, अनपढ़अधपढ़, छोटे काम करने वाले सौदोसौ डौलर महीना कमाने के लिए हजारों डौलर खर्च कर के खुशहाल देश अमेरिका में आए थे पर अब ट्रंप प्रशासन द्वारा उन्हें खलनायक बना डाला गया है व जंजीरों में बांध कर मवेशियों की तरह गाडि़यों में ठूंसा जा रहा है. उन्हें कईकई दिनों तक भूखा रखा जा रहा है. उन के साथ वही बरताव हो रहा है जो 400 साल पहले अफ्रीका से काले गुलामों को यूरोपीय बंदूकों के बल पर जहाजों में भर अमेरिका लाने के लिए किया गया था.

आधे से ज्यादा अमेरिकी इस से सहमत नहीं पर ये वे अमेरिकी हैं जो पढ़ेलिखे हैं और सड़कों पर एक बेवकूफ नेता के नाम पर नारे नहीं लगा सकते. रेड हैट पहने मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) एक तरह का संप्रदाय बन गया है जो जरमनी के नाजियों की तरह अमेरिका को शुद्ध गोरे ईसाइयों का देश बनाना चाहता है. शिक्षित अमेरिकी समझते हैं कि अमेरिका ने हर तरह के लोगों का खुल कर स्वागत किया था. बहुतों को तो अपने यूरोपीय जन्म का इतिहास भी नहीं मालूम.

यही कट्टर लोग अब, सिर्फ चर्च के कहने पर, अमेरिकी-अमेरिकी में खाई पैदा कर रहे हैं. वे बहाना यह कर रहे हैं कि पुलिस उन्हें ही पकड़ रही है जो बिना कागजों के अमेरिका में रह रहे हैं. असल में निशाना हर गैरगोरा है, वे काले भी हैं जो 400 साल पहले आए थे. उन्हें यह कह कर डराया जा रहा है कि अगर उन्होंने बाद में अपनी मरजी से आए लोगों का साथ दिया, तो उन की खैर नहीं.

लौस एंजेल्स के निवासी इस बात को समझ रहे हैं और हर कदम पर ट्रंप की बिगड़ैल फोर्स का विरोध कर रहे हैं. वे उन गोरों का विरोध कर रहे हैं जो अनर्गल झुठ फैला रहे हैं कि ये लोग अपराधी हैं, जुर्म करते हैं, पालतू कुत्तेबिल्लियां खा जाते हैं, सड़कों पर लूट के लिए जिम्मेदार हैं वगैरह.

आंकड़े बताते हैं कि गोरों और गैरगोरों के अपराधी होने में फर्क नहीं. फर्क इतना है कि अदालतें गोरों को बरी कर देती हैं, गैरगोरों को लंबी सजा दे देती हैं. अदालतों में जज, वकील, जूरी चाहे गैरगोरे हों लेकिन वे अपने को गोरों के एहसान तले होना दर्शाते हुए पकड़े गए अपराधी को उस की स्किन के रंग से ही उसे वास्तविक अपराधी करार दे देते हैं.

लौस एंजेल्स के बाद ऐसे प्रदर्शन अमेरिकाभर में हो रहे हैं. वे जुलाई, जो अमेरिका का स्वंत्रता दिवस है, को भी हुए. अगर ये ट्रंप के अमेरिका के नष्ट होने से बचा सकें तो बड़ी बात होगी वरना अमेरिका भी ईरान, उत्तरी कोरिया और अफगानिस्तान की तरह ‘महान’ बनेगा, इस में शक नहीं.

Social Story : ऐसे हुई पूजा

Social Story : अंशु के अच्छे अंकों से पास होने की खुशी में मां ने घर में पूजा रखवाई थी. प्रसाद के रूप में तरहतरह के फल, दूध, दही, घी, मधु, गंगाजल वगैरा काफी सारा सामान एकत्रित किया गया था. सारी तैयारियां हो चुकी थीं लेकिन अभी तक पंडितजी नहीं आए थे. मां ने अंशु को बुला कर कहा, ‘‘अंशु, एक बार फिर लखन पंडितजी के घर चले जाओ. शायद वे लौट आए हों… उन्हें जल्दी से बुला लाओ.’’

‘‘लेकिन मां, अब और कितनी बार जाऊं? 3 बार तो उन के घर के चक्कर काट आया हूं. हर बार यही जवाब मिलता है कि पंडितजी अभी तक घर नहीं आए हैं?’’

अंशु ने टका जा जवाब दिया, तो मां सहजता से बोलीं, ‘‘तो क्या हुआ… एक बार और सही. जाओ, उन्हें बुला लाओ.’’

‘‘उन्हें ही बुलाना जरूरी है क्या? किसी दूसरे पंडित को नहीं बुला सकते क्या?’’ अंशु ने खीजते हुए कहा.

‘‘ये कैसी बातें करता है तू? जानता नहीं, वे हमारे पुराने पुरोहित हैं. उन के बिना हमारे घर में कोई भी कार्य संपन्न नहीं होता?’’

‘‘क्यों, उन में क्या हीरेमोती जड़े हैं? दक्षिणा लेना तो वे कभी भूलते नहीं. 501 रुपए, धोती, कुरता और बनियान लिए बगैर तो वे टलते नहीं हैं. जब इतना कुछ दे कर ही पूजा करवानी है तो फिर किसी भी पंडित को बुला कर पूजा क्यों नहीं करवा लेते? बेवजह उन के चक्कर में इतनी देर हो रही है. इतने सारे लोग घर में आ चुके हैं और अभी तक पंडितजी का कोई अतापता ही नहीं है,’’ अंशु ने खरी बात कही.

‘‘बेटे, आजकल शादीब्याह का मौसम चल रहा है. हो सकता है वे कहीं फंस गए हों, इसी वजह से उन्हें यहां आने में देर हो रही हो.’’

‘‘वह तो ठीक है पर उन्होंने कहा था कि बेफिक्र रहो, मैं अवश्य ही समय पर चला आऊंगा, लेकिन फिर भी उन की यह धोखेबाजी. मैं तो इसे कतई बरदाश्त नहीं करूंगा. मेरी तो भूख के मारे हालत खराब हो रही है. आखिर मुझे तब तक तो भूखा ही रहना पड़ेगा न, जब तक पूजा समाप्त नहीं हो जाती. जब अभी तक पंडितजी आए ही नहीं हैं तो फिर पूजा शुरू कब होगी और फिर खत्म कब होगी पता नहीं… तब तक तो भूख के मारे मैं मर ही जाऊंगा.’’

‘‘बेटे, जब इतनी देर तक सब्र किया है तो थोड़ी देर और सही. अब पंडितजी आने ही वाले होंगे.’’

तभी पंडितजी का आगमन हुआ. मां तो उन के चरणों में ही लोट गईं.

पंडितजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘क्या करूं, थोड़ी देर हो गई आने में. यजमानों को कितना भी समझाओ मानते ही नहीं. बिना खाए उठने ही नहीं देते. खैर, कोई बात नहीं. पूजा की सामग्री तैयार है न?’’

‘‘हां महाराज, बस आप का ही इंतजार था. सबकुछ तैयार है,’’ मां ने उल्लास भरे स्वर में कहा.

तभी अंशु का छोटा भाई सोनू भी वहां आ कर बैठ गया. पूजा की सामग्री के बीच रखे पेड़ों को देख कर उस का मन ललचा गया. वह अपनेआप को रोक नहीं पाया और 2 पेड़े उठा कर वहीं पर खाने लगा. पंडितजी की नजर पेड़े खाते हुए सोनू पर पड़ी तो वे बिजली की तरह कड़क उठे, ‘‘अरे… सत्यानाश हो गया. भगवान का भोग जूठा कर दिया इस दुष्ट बालक ने. हटाओ सारी सामग्री यहां से. क्या जूठी सामग्री से पूजा की जाएगी?’’

मां तो एकदम से परेशान हो गईं. गलती तो हो ही चुकी थी. पंडितजी अनापशनाप बोलते ही चले जा रहे थे. जैसेतैसे जल्दीजल्दी सारी सामग्री फिर से जुटाई गई और पंडितजी मिट्टी की एक हंडि़या में शीतल प्रसाद बनाने लगे.

अंशु हड़बड़ा कर बोल उठा, ‘‘अरे…अरे पंडितजी, आप यह क्या कर रहे हैं?’’

‘‘भई, शीतल प्रसाद और चरणामृत बनाने के लिए हंडि़या में दूध डाल रहा हूं.’’

‘‘मगर यह दूध तो जूठा है?’’

‘‘जूठा है. वह कैसे? यह तो मैं ने अलग से मंगवाया है.’’

‘‘लेकिन जूठा तो है ही… आप मानें चाहे न मानें, यह जिस गाय का दूध है, उसे दुहने से पहले उस के बछड़े ने तो दूध अवश्य ही पिया होगा, तो क्या आप बछड़े के जूठे दूध से प्रसाद बनाएंगे? यह तो बड़ी गलत बात है.’’

पंडितजी के चेहरे की रंगत उतर गई. वे कुछ भी बोल नहीं पाए. चुपचाप हंडि़या में दही डालने लगे.

अंशु ने फिर टोका, ‘‘पंडितजी, यह दही तो दूध से भी गयागुजरा है. मालूम है, दूध फट कर दही बनता है. दूध तो जूठा होता ही है और इस दही में तो सूक्ष्म जीव होते हैं. भगवान को भोग क्या इस जीवाणुओं वाले प्रसाद से लगाएंगे?’’ पंडितजी का चेहरा तमतमा गया. भन्नाते हुए शीतल प्रसाद में मधु डालने लगे.

‘‘पंडितजी, आप यह क्या कर रहे हैं? यह मधु तो उन मधुमक्खियों की ग्रंथियों से निकला हुआ है जो फूलों से पराग चूस कर अपने छत्तों में जमा करती हैं. भूख लगने पर सभी मधुमक्खियां मधु खाती हैं. यह तो एकदम जूठा है,’’ अंशु ने फिर बाल की खाल निकाली. पंडितजी ने हंडि़या में गंगाजल डाला ही था कि अंशु फिर बोल पड़ा, ‘‘अरे पंडितजी, गंगाजल तो और भी दूषित है. गंगा नदी में न जाने कितनी मछलियां रहती हैं, जीवजंतु रहते हैं. आखिर यह जल भी तो जूठा ही है और ये सारे फल भी तोतों, गिलहरियों, चींटियों आदि के जूठे हैं. आप व्यर्थ ही भगवान को नाराज करने पर तुले हैं. जूठे प्रसाद का भोग लगा कर आप भगवान के कोप का भाजन बन जाएंगे और हम सब को भी पाप लगेगा.‘‘

‘‘तो फिर मैं चलता हूं… मत कराओ पूजा,’’ पंडितजी नाराज हो कर अपने आसन से उठने लगे.

‘‘पंडितजी, पूजा तो आप को करवानी ही है लेकिन जूठे प्रसाद से नहीं. किसी ऐसी पवित्र चीज से पूजा करवाइए जो बिलकुल शुद्ध हो, जूठी न हो और वह है मन, जो बिलकुल पवित्र है?’’

‘‘हां बेटे, ठीक कहा तुम ने मन ही सब से पवित्र होता है. पवित्र मन से ही सच्ची पूजा हो सकती है. सचमुच, तुम ने आज मेरी आंखें खोल दीं. मेरी आंखों के सामने ढोंग और पाखंड का परदा पड़ा हुआ था. मुझ से बड़ी भूल हुई. मुझे माफ कर दो,’’ उस के बाद पंडितजी ने उसी सामग्री से पूजा करवा दी लेकिन पंडितजी के चेहरे पर पश्चात्ताप के भाव थे. Social Story 

Social Story In Hindi : अड़ियल टट्टू

Social Story In Hindi : हमेशा की तरह सुकेश मुंबई के नरीमन पौइंट स्थित अपने औफिस 11:15 बजे पहुंचा जबकि औफिस पहुंचने का समय 10:45 बजे था।
रोज देरी से औफिस पहुंचने के कारण बौस सुकेश से नाराज रहते थे, लेकिन सुकेश, बौस के निर्देशों को एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देता था।
महानगर होने की वजह से यहां औफिस पहुंचने का समय दूसरे शहरों से अलग था, क्योंकि मुंबई में 10 बजे सभी के लिए औफिस पहुंचना संभव नहीं था। नरीमन पौइंट के आसपास निम्न व मध्यवर्ग के लोगों के लिए किराए से या खुद के मकान में रहना असंभव था। इसलिए, अपनी सैलरी के हिसाब से कोई कर्मचारी विरार रहता था तो कोई खारगर।
अमूमन, सुकेश औफिस पहुंचते ही चाय पीता था, उस के डेस्क के सामने ही चायकौफी की मशीन लगी हुई थी। वह चाय की चुसकी ले ही रहा था कि तभी एचआर का मसेंजर डाक रिसीव करने वाले कलर्क से बोला, “विभाग में सुकेश सर कहां बैठते हैं, उन्हें चिट्ठी देनी है।” सुकेश अपना नाम सुन कर बोला, “मैं ही सुकेश हूं, दे दो चिट्ठी।”
चिट्ठी पढ़ते ही सुकेश के होश उड़ गए, क्योंकि उसे बैंक की सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था और उस की बर्खास्तगी आज से ही प्रभावी थी। कारण था 5 सालों से वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में लगातार ‘सी’ ग्रेड दिया जाना।
बौस इस हद तक चला जाएगा, सुकेश को उम्मीद नहीं थी। बौस के खिलाफ सुकेश कुछ भी नहीं कर सकता था, फिर भी उस के मन में बौस के प्रति नफरत और क्रोध की चिनगारी भड़कने लगी। सुकेश बौस पर अपशब्दों की लगातार फाइरिंग कर रहा था। जब इस से भी मन नहीं भरा तो उस ने बौस को 2 थप्पड़ जड़ दिए। जब शोरगुल बढ़ गया तो विमल भी चेंबर के अंदर आ गया। विभाग में एचआर विमल ही देखता था।
विमल ने बौस और सुकेश को शांत करवाने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन वह कामयाब नहीं हो सका। सुकेश का चेहरा गुस्से से लाल हो गया था। चिल्लाने के कारण वह खांसने भी लगा था, फिर भी वह लगातार बोले जा रहा था। उस के गले के नस तने हुए थे और मुंह से थूक लगातार निकल रहा था। चूंकि, उस के पास अब खोने के लिए कुछ भी नहीं था, इसलिए वह बहुत ज्यादा आक्रामक हो गया था।
अंत में बौस को सिक्योरिटी औफिसर को बुलाना पड़ा। उस के हस्तक्षेप के बाद भी सुकेश बड़ी मुश्किल से चेंबर से बाहर आया, लेकिन, “बौस को मार दूंगा, किसी को नहीं छोङूंगा, कोर्ट जाऊंगा…” आदि उस के द्वारा बड़बड़ाना जारी रहा।
जब ऊर्जा खत्म हो गई और हलक प्यास से सूखने लगा तो हताशा और निराशा की स्थिति में वह अपनी सीट पर बैठ कर पानी पीने लगा। हालांकि, मन के अस्थिर होने की वजह से वह अपने सिर के बालों पर बारबार उंगलियां फिरा रहा था साथ ही साथ चेहरे को दोनों हथेलियों से हलकाहलका दबा भी रहा था।
कुछ देर सुकेश शांत रहा, फिर अचानक से वह विमल से उलझ गया। विमल शांत रहा, चुपचाप सुकेश का अनर्गल प्रलाप सुनता रहा। जब सुकेश की चिल्लाने की तीव्रता कम हुई तो विमल बोला, “भाई, तुम अर्थशास्त्री हो, खुद को विद्वान मानते हो और आज कह रहे हो कि तुम्हें यह नियम पता नहीं था। तुम्हारे इस तर्क को कौन मानेगा, किसी को लगातार 5 बार वार्षिक रिपोर्ट में सी ग्रेड मिलने पर उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाता है, यह तुम्हें अच्छी तरह से पता है। मैं विगत 3 सालों से इस खतरे के बारे में तुम्हें बता रहा हूं, पिछले साल बौस से माफी मांगने के लिए भी मैं ने तुम से कहा था। मैं ने यह भी कहा था कि बड़ी मछली हमेशा छोटी मछली को खा जाती है, फिर भी तुम अड़ियल टट्टू बने रहे।”
जब विमल का स्वर तल्ख और तेज हुआ तो सुकेश के जबान पर ताला लग गया। विमल की बातों को सुनने के बाद भी सुकेश का मन और भी अशांत हो गया। कुछ देर तक सामने की वीआईपी लिफ्ट की तरफ निर्लिप्त भाव से एकटक ताकता रहा, फिर अचानक से उठ कर डीजीएम लौ से इस उम्मीद में मिलने चला गया ताकि उसे उस की समस्या का कोई समाधान मिल सके।
डीजीएम लौ ने कहा, “बैंक में वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट की ग्रेडिंग के आधार पर बर्खास्त करने के प्रावधान को 2015 में लागू किया गया था, लेकिन यह अपवाद जैसा है, क्योंकि इस के पहले कभी इस वजह से बैंक की सेवा से किसी को बर्खास्त नहीं किया गया है। चूंकि, इस प्रावधान को अधिकारी संवर्ग की सेवा शर्तों में शामिल किया जा चुका है, इसलिए अदालत में तुम इस केस को शायद ही जीत पाओगे।”
डीजीएम लौ के यहां से लौटते समय सुकेश के कदमों में भारीपन को देखते ही विमल समझ गया कि बात नहीं बनी। विमल मन ही मन सोच रहा था कि कितना वेबकूफ और घमंडी है सुकेश? अर्थशास्त्री है, खुद को विद्वान समझता है, पढ़ाईलिखाई विदेश से की है, फिर भी उस की अक्ल हमेशा घास खाने गई हुई होती है। इतना अकड़ू है कि कभी भी सीधे मुंह बात नहीं करता है। बौस और सुकेश के बीच मनमुटाव का कारण सिर्फ अहम है। मैं…मैं…और सिर्फ मैं… सुकेश की बर्खास्तगी का मूल कारण है।
सुकेश का पिछले 5 सालों से बौस के साथ खटपट चल रहा था। पहले बौस का रोज सुकेश से बकझक होता था, लेकिन जैसे ही बौस को पता चला कि अगर किसी भी कर्मचारी को वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में लगातार 5 सालों तक सी ग्रेड दी जाए तो बैंक उसे सेवा से बर्खास्त कर देता है, बौस ने सुकेश के साथ बहस करना बंद कर दिया और उसे हर साल सी ग्रेडिंग देनी शुरू की।
चूंकि, समीक्षा पदाधिकारी के साथ बौस हमेशा तालमेल बना कर रखते थे, इसलिए बौस की दी हुई ग्रेडिंग को समीक्षा पदाधिकारी भी हमेशा यथावत रखते थे।
बर्खास्तगी के बाद सुकेश को गृह एवं कार ऋण तत्काल प्रभाव से बंद करना होगा या फिर दूसरी नौकरी करनी होगी, ताकि वह हर महीने घर और कार की किस्त और ब्याज जमा कर सके। अभी वह बैंक द्वारा आवंटित मकान में रहता है, उसे भी उसे तुरंत खाली करना पड़ेगा। फर्नीचर, फिक्सचर की कीमत भी उसे बैंक को तुरंत चुकानी होगी।
पत्नी, हाउसवाइफ है, बेटा भी 3 महीने का है, तुरंत नौकरी मिल जाएगी, यह आसान नहीं होगा, क्योंकि निजी और सरकारी नौकरियों की कार्य संस्कृति में जमीनआसमान का अंतर होता है। साथ में, अब उस पर बर्खास्तगी का कलंक भी लग चुका है।
इंसान जानता है कि इस दुनिया में किसी की कोई औकात नहीं। सभी रंगमंच के पात्र हैं और एक दिन सभी को अपनी भूमिका अदा कर के इस दुनिया से रुखसत होना है। कोई यहां अमर बन कर नहीं आया है। बावजूद इस के, सुकेश ने सिर्फ अपने झूठे दंभ को पोषित करने के चक्कर में अपने परिवार को सड़क पर ले कर आ गया। यह सब सोचतेसोचते विमल का मन बोझिल सा हो गया। Social Story In Hindi 

Romantic Story In Hindi : विश्वासघात – जूही ने कैसे छीना नीता का पति

Romantic Story In Hindi : नीला आसमान अचानक ही स्याह हो चला था. बारिश की छोटीछोटी बूंदें अंबर से टपकने लगी थीं. तूफान जोरों पर था. दरवाजों के टकराने की आवाज सुन कर जूही बाहर आई. अंधेरा देख कर अतीत की स्मृतियां ताजा हो गईं…

कुछ ऐसा ही तूफानी मंजर था आज से 1 साल पहले का. उस दिन उस ने जीन्स पर टौप पहना था. अपने रेशमी केशों की पोनीटेल बनाई थी. वह बहुत खूबसूरत लग रही थी. उस ने आंखों पर सनग्लासेज चढ़ाए और ड्राइविंग सीट पर बैठ गई.

कुछ ही देर में वह बैंक में थी. मैनेजर के कमरे की तरफ बढ़ते हुए उसे कुछ संशय सा था कि उस का लोन स्वीकृत होगा भी या नहीं, पर मैनेजर की मधुर मुसकान ने उस के संदेह को विराम दे दिया. उस का लोन स्वीकृत हो गया था और अब वह अपना बुटीक खोल सकती थी. आननफानन उस ने मिठाई मंगवा कर बैंक स्टाफ को खिलाई और प्रसन्नतापूर्वक घर लौट आई.

शुरू से ही वह काफी महत्त्वाकांक्षी रही थी. फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करते ही उस ने लोन के लिए आवेदन कर दिया था. पड़ोस के कसबे में रहने वाली जूही इस शहर में किराए पर अकेली रहती थी और अपना कैरियर गारमैंट्स के व्यापार से शुरू करना चाहती थी.

अगले दिन उस ने सोचा कि मैनेजर को धन्यवाद दे आए. आखिर उसी की सक्रियता से लोन इतनी जल्दी मिलना संभव हुआ था. मैनेजर बेहद स्मार्ट, हंसमुख और प्रतिभावान था. जूही उस से बेहद प्रभावित हुई और उस की मंगाई कौफी के लिए मना नहीं कर पाई. बातोंबातों में उसे पता चला कि वह शहर में नया आया है. उस का नाम नीरज है और शहर से दूर बने अपार्टमैंट्स में उस का निवास है.

धीरेधीरे मुलाकातें बढ़ीं तो जूही ने पाया कि दोनों की रुचियां काफी मिलती है. दोनों को एकदूसरे का साथ काफी अच्छा लगने लगा. लगातार मुलाकातों में जूही कब नीरज से प्यार कर बैठी, पता ही न चला. नीरज भी जूही की सुंदरता का कायल था.

बिजली तो उस दिन गिरी जब बुटीक की ओपनिंग सेरेमनी पर नीरज ने अपनी पत्नी नीता से जूही को मिलवाया. नीरज के विवाहित होने का जूही को इतना दुख नहीं हुआ, जितना नीता को उस की पत्नी के रूप में पा कर. नीता जूही की सहपाठी रही थी और हर बात में जूही से उन्नीस थी. उस के अनुसार नीता जैसी साधारण स्त्री नीरज जैसे पति को डिजर्व ही नहीं करती थी.

सहेली पर विजय की भावना जूही को नीरज की तरफ खींचती गई और नीता से अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के चक्कर में जूही का नीरज से मिलनाजुलना बढ़ता गया. नीता खुश थी. अकेले शहर में जूही का साथ उसे बहुत अच्छा लगता था. वह हमेशा उस से कुछ सीखने की कोशिश करती, पर इन लगातार मुलाकातों से जूही और नीरज को कई बार एकांत मिलने लगा.

दोनों बहक गए और अब एकदूसरे के साथ रहने के बहाने खोजने लगे. नीता को अपनी सहेली पर रंच मात्र भी शक न था और नीरज पर तो वह आंख मूंद कर विश्वास करती थी. विश्वास का प्याला तो उस दिन छलका, जब पिताजी की बीमारी के चलते नीता को महीने भर के लिए पीहर जाना पड़ा.

सरप्राइज देने की सोच में जब वह अचानक घर आई, तो उस ने नीरज और जूही को आपत्तिजनक हालत में पाया. इस सदमे से आहत नीता बिना कुछ बोले नीरज को छोड़ कर चली गई.

जूही अब नीरज के साथ आ कर रहने लगी. कहते हैं न कि प्यार अंधा होता है, पर जब ‘एवरीथिंग इज फेयर इन लव ऐंड वार’ का इरादा हो तो शायद वह विवेकरहित भी हो जाता है.

समय अपनी गति से चलता रहा. जूही और नीरज मानो एकदूसरे के लिए ही बने थे. जीवन मस्ती में कट रहा था. कुछ समय बाद जूही को सब कुछ होते हुए भी एक कमी सी खलने लगी.

आंगन में नन्ही किलकारी खेले, वह चाहती थी, पर नीरज इस के लिए तैयार नहीं था. उस का कहना था कि ‘लिव इन रिलेशन’ की कानूनी मान्यता विवादास्पद है, इसलिए वह बच्चे का भविष्य दांव पर नहीं लगाना चाहता. जूही इस तर्क के आगे निरुत्तर थी.

जूही का बुटीक अच्छा चल रहा था. नाम व  कमाई दोनों ही थे. एक दिन अचानक ही एक आमंत्रणपत्र देख कर वह सकते में आ गई. पत्र नीरज की पर्सनल फाइल में था. आमंत्रणपत्र महक रहा था. वह था तो किसी पार्लर के उद्घाटन का, पर शब्दावली शायराना व व्यक्तिगत सी थी. मुख्य अतिथि नीरज ही थे.

जूही ने नीरज को मोबाइल लगाना चाहा पर वह लगातार ‘आउट औफ रीच’ आता रहा. दिन भर जूही का मन काम में नहीं लगा. बुटीक छोड़ कर वह जा नहीं सकती थी. रात को नीरज के आते ही उस ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी.

कुछ देर तो नीरज बात संभालने की कोशिश करता रहा पर तर्कविहीन उत्तरों से जब जूही संतुष्ट नहीं हुई, तो दोनों का झगड़ा हो गया. नीरज पुन: किसी अन्य स्त्री की ओर आकृष्ट था. संभवत: पत्नी के रहते जूही के साथ संबंध बनाने ने उसे इतनी हिम्मत दे दी थी.

मौजूदा दौर में स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता ने उस के वजूद को बल दिया है. इतना कि कई बार वह समाज के विरुद्ध जा कर अपनी पसंद के कार्य करने लगती है. नीरज जैसे पुरुष इसी बात का फायदा उठाते हैं.

उन्होंने पढ़ीलिखी, बराबर कमाने वाली स्त्री को अपने समान नहीं माना, बल्कि उपभोग की वस्तु समझ कर उस का उपयोग किया. अपने स्वार्थ के लिए जब चाहा उन्हें समान दरजा दे दिया और जब चाहा तब सामाजिक रूढि़यों के बंधन तोड़ दिए. विवाह उन के लिए सुविधा का खेल हो गया.

इस आकस्मिक घटनाक्रम के लिए जूही तैयार नहीं थी. उस ने तो नीरज को संपूर्ण रूप से चाहा व अपनाया था. नीरज को अपनी नई महिला मित्र ताजा हवा के झोंके जैसी दिख रही थी. उस के तन व मन दोनों ही बदलाव के लिए आतुर थे.

जूही को अपनी भलाई व स्वाभिमान नीरज का घर छोड़ने में ही लगे. कुछ महीनों का मधुमास इतनी जल्दी व इतनी बेकद्री से खत्म हो जाएगा, उस ने सोचा न था. नीरज ने उस को रोकने का थोड़ा सा भी प्रयास नहीं किया.

शायद जूही ने इस कटु सत्य को जान लिया था कि पुरुष के लिए स्त्री कभी हमकदम नहीं बनती. वह या तो उसे देवी बना कर उसे नैसर्गिक अधिकारों से दूर कर देता है या दासी बना कर उस के अधिकारों को छीन लेता है. उसे पुरुषों से चिढ़ सी हो गई थी.

नीरज के बारे में फिर कभी जानने की उस ने कोशिश नहीं की, न ही नीरज ने उस से संपर्क साधा.

आज बादलों के इस झुरमुट में पिछली यादों के जख्मों को सहलाते हुए वह यही सोच रही थी कि विश्वासघात किस ने किस के साथ किया था? Romantic Story In Hindi

Family Story : तुमने क्यों कहा मैं सुंदर हूं – क्या दो कदम ही रहा दोनों का साथ

Family Story : सरकारी नौकरियों में लंबे समय तक एकसाथ काम करते और सरकारी घरों में साथ रहते कुछ सहकर्मियों से पारिवारिक रिश्तों से भी ज्यादा गहरे रिश्ते बन जाते हैं, मगर रिटायरमैंट के बाद अपने शहरोंगांवों में वापसी व दूसरे कारणों के चलते मिलनाजुलना कम हो जाता है. फिर भी मिलने की इच्छा तो बनी ही रहती है. उस दिन जैसे ही मेरे एक ऐसे ही सहकर्मी मित्र का उन के पास जल्द पहुंचने का फोन आया तो मैं अपने को रोक नहीं सका.

मित्र स्टेशन पर ही मिल गए. मगर जब उन्होंने औटो वाले को अपना पता बताने की जगह एक गेस्टहाउस का पता बताया तो मैं ने आश्चर्य से उन की ओर देखा. वे मुझे इस विषय पर बात न करने का इशारा कर के दूसरी बातें करने लगे.

गेस्टहाउस पहुंच कर खाने वगैरह से फारिग होने के बाद वे बोले, ‘‘मेरे घर की जगह यहां गेस्टहाउस में रहने की कहानी जानने की तुम्हें उत्सुकता होगी. इस कहानी को सुनाने के लिए और इस का हल करने में तुम्हारी मदद व सुझाव के लिए ही तुम्हें बुलाया है, इसलिए तुम्हें तो यह बतानी ही है.’’ कुछ रुक कर उन्होंने फिर बोलना शुरू किया, ‘‘मित्र, महिलाओं की तरह उन की बीमारियां भी रहस्यपूर्ण होती हैं. हर महिला के जीवन में उम्र के पड़ाव में मीनोपौज यानी प्राकृतिक अंदरूनी शारीरिक बदलाव होता है, जो डाक्टरों के अनुसार भी कोई बीमारी तो नहीं होती, मगर इस का मनोवैज्ञानिक प्रभाव हर महिला पर अलगअलग तरह से होता है. कुछ महिलाएं इस में मनोरोगों से ग्रस्त हो जाती हैं.

‘‘इसी कारण मेरी पत्नी भी मानसिक अवसाद की शिकार हो गई, तो मेरा जीवन कई कठिनाइयों से भर गया. घरपरिवार की देखभाल में तो उन की दिलचस्पी पहले ही कम थी, अब इस स्थिति में तो उन की देखभाल में मुझे और मेरी दोनों नवयुवा बेटियों को लगे रहना पड़ने लगा जिस का असर बेटियों की पढ़ाई और मेरे सर्विस कैरियर पर पड़ रहा था.

‘‘पत्नी की देखभाल के लिए विभाग में अपने अहम पद की जिम्मेदारी के तनाव से फ्री होने के लिए जब मैं ने विभागाध्यक्ष से मेरी पोस्ंिटग किसी बेहद सामान्य कार्यवाही वाली शाखा में करने की गुजारिश की, तो उन्होंने नियुक्ति ऐसे पद पर कर दी जो सरकारी सुविधाओं को भोगते हुए नाममात्र का काम करने के लिए सृजित की गई लगती थी.’’

‘‘काम के नाम पर यहां 4-6 माह में किसी खास मुकदमे के बारे में सरकार द्वारा कार्यवाही की प्रगति की जानकारी चाहने पर केस के संबंधित पैनल वकीलों से सूचना हासिल कर भिजवा देना होता था.

‘‘मगर मुसीबत कभी अकेले नहीं आती. मेरे इस पद पर जौइन करने के 3 हफ्ते बाद ही उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार से विभिन्न न्यायालयों में सेवा से जुड़े 10 वर्ष से ज्यादा की अवधि से लंबित मामलों में कार्यवाही की जानकारी मांग ली. मैं ने सही स्थिति जानने के लिए वकीलों से मिलना शुरू किया. विभाग में ऐसे मामले बड़ी तादाद में थे, इसलिए वकील भी कई थे.

‘‘इसी सिलसिले में 3-4 दिनों में कई वकीलों से मिलने के बाद में एक महिला पैनल वकील के दफ्तर में पहुंचा. उन पर नजर डालते ही लगा कि उन्होंने अपने को एक वरिष्ठ और व्यस्त वकील दिखाने के लिए नीली किनारी की मामूली सफेद साड़ी पहन रखी है और बिना किसी साजसज्जा के गंभीरता का मुखौटा लगा रखा है. और 2-3 फाइलों के साथ कानून की कुछ मोटी किताबें सामने रख कर बैठी हुई हैं. मेरे आने का मकसद जानते ही उन्होंने एक वरिष्ठ वकील की तरह बड़े रोब से कहा, ‘देखिए, आप के विभाग के कितने केस किसकिस न्यायाधीश की बैंच में पैडिंग हैं और इस लंबे अरसे में उन में क्या कार्यवाही हुई है, इस की जानकारी आप के विभाग को होनी चाहिए. मैं वकील हूं, आप के विभाग की बाबू नहीं, जो सूचना तैयार कर के दूं.’

‘‘इस प्रसंग में वकील साहिबा के साथ अपने पूर्व अधिकारियों के व्यवहार को जानते व समझते हुए भी मैं ने उन से पूरे सम्मान के साथ कहा, ‘वकील साहिबा, माफ करें, इन मुकदमों में सरकार आप को एक तय मानदेय दे कर आप की सेवाएं प्राप्त करती है, तो आप से उन में हुई कार्यवाही कर सूचना प्राप्त करने का हक भी रखती है. वैसे, हैडऔफिस का पत्र आप को मिल गया होगा. मामला माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा मांगी गई सूचना का है. यह जिम्मेदारीभरा काम समय पर और व्यवस्था से हो जाए, इसलिए मैं आप लोगों से संपर्क कर रहा हूं, आगे आप की मरजी.’

‘‘मेरी बात सुन कर वकील साहिबा थोड़ी देर चुप रहीं, मानो कोई कानूनी नुस्खा सोच रही हों. फिर बड़े सधे लहजे में बोलीं, ‘देखिए, ज्यादातर केसेज को मेरे सीनियर सर ही देखते थे. उन का हाल  में बार कोटे से न्यायिक सेवा में चयन हो जाने से वे यहां है नहीं, इसलिए मैं फिलहाल आप की कोई मदद नहीं कर सकती.’

‘ठीक है मैडम, मैं चलता हूं और आप का यही जवाब राज्य सरकार को भिजवा दिया जाएगा.’ कह कर मैं चलने के लिए उठ खड़ा हुआ तो वकील साहिबा को कुछ डर सा लगा. सो, वे समझौते जैसे स्वर में बोलीं, ‘आप बैठिए तो, चलिए मैं आप से ही पूछती हूं कि यह काम 3 दिनों में कैसे किया जा सकता है?’

‘‘अब मेरी बारी थी, इसलिए मैं ने उन्हीं के लहजे में जवाब दिया, ‘देखिए, यह न तो मेरा औफिस है, न यहां मेरा स्टाफ काम करता है. ऐसे में मैं क्या कह सकता हूं.’ यह कह कर मैं वैसे ही खड़ा रहा तो अब तक वकील साहिबा शायद कुछ समझौता कर के हल निकालने जैसे मूड में आ गई थीं. वे बोलीं, ‘देखिए, सूचना सुप्रीम कोर्ट को भेजी जानी है, इसलिए सूचना ठोस व सही तो होनी ही चाहिए, और अपनी स्थिति मैं बता चुकी हूं, इसलिए आप कड़वाहट भूल कर कोई रास्ता बताइए.’

‘‘वकील साहिबा के यह कहने पर भी मैं पहले की तरह खड़ा ही रहा. तो वकील साहिबा कुछ ज्यादा सौफ्ट होते हुए बोलीं, ‘देखिए, कभीकभी बातचीत में अचानक कुछ कड़वाहट आ जाती है. आप उम्र में मेरे से बड़े हैं. मेरे फादर जैसे हैं, इसलिए आप ही कुछ रास्ता बताइए ना.’

‘‘देखिए, यह कोई इतना बड़ा काम नहीं है. आप अपने मुंशी से कहिए. वह हमारे विभाग के मामलों की सूची बना कर रिपोर्ट बना देगा.’

‘‘देखिए, आप मेरे फादर जैसे हैं, आप को अनुभव होगा कि मुंशी इस बेगार जैसे काम में कितनी दिलचस्पी लेगा, वैसे भी आजकल उस के भाव बढ़े हुए हैं. सीनियर सर के जाने के बाद कईर् वकील लोग उस को बुलावा भेज चुके हैं,’ कह कर उन्होंने मेरी ओर थोड़ी बेबसी से देखा. मुझे उन का दूसरी बार फादर जैसा कहना अखर चुका था. सो, मैं ने उन्हें टोकते हुए कहा, ‘मैडम वकील साहिबा, बेशक आप अभी युवा ही है और सुंदर भी हैं ही, मगर मेरी व आप की उम्र में 4-5 साल से ज्यादा फर्क नहीं होगा. आप व्यावसायिक व्यस्तता के कारण अपने ऊपर ठीक से ध्यान नहीं दे पाती हैं, नहीं तो आप…

‘‘महिला का सब से कमजोर पक्ष उस को सुंदर कहा जाना होता है. इसलिए वे मेरी बात काट कर बोलीं, ‘आप कैसे कह रहे हैं कि मेरी व आप की उम्र में सिर्फ 4-5 साल का फर्क है और आप मुझे सुंदर कह कर यों ही क्यों चिढ़ा रहे हैं.’ उन्होंने एक मुसकान के साथ कहा तो मैं ने सहजता से जवाब दिया, ‘वकील साहिबा, मैं आप की तारीफ में ही सही, मगर झूठ क्यों बोलूंगा? और रही बात आप की उम्र की, तो धौलपुर कालेज में आप मेरी पत्नी से एक साल ही जूनियर थीं बीएससी में. उन्होंने आप को बाजार वगैरह में कई बार आमनासामना होने पर पहचान कर मुझे बतलाया था. मगर आप की तरफ से कोई उत्सुकता नहीं होने पर उन्होंने भी परिचय को पुनर्जीवित करने की कोशिश नहीं की.’

‘‘अब तक वकील साहिबा अपने युवा और सुंदर होने का एहसास कराए जाने से काफी खुश हो चुकी थीं. इसलिए बोलीं, ‘अच्छा ठीक है, मगर अब आप बैठ तो जाइए, मैं चाय बना कर लाती हूं, फिर आप ही कुछ बताएं,’ कह कर वे कुरसी के पीछे का दरवाजा खोल कर अंदर चली गईं.

‘‘थोड़ी देर में वे एक ट्रे में 2 कप चाय और नाश्ता ले कर लौटीं और बोलीं, ‘आप अकेले बोर हो रहे होंगे. मगर क्या करूं, मैं तो अकेली रहती हूं, अकेली जान के लिए कौन नौकरचाकर रखे.’ उन की बात सुन कर एकदफा तो लगा कि कह दूं कि सरकारी विभागों के सेवा संबंधी मुदकमों के सहारे वकालत में इतनी आमदनी भी नहीं होती? मगर जनवरी की रात को 9 बजे के समय और गरम चाय ने रोक दिया.

‘‘चाय पीने के बाद तय हुआ कि मैं अपने कार्यालय में संबंधित शाखा के बाबूजी को उन के मुंशी की मदद करने को कह दूंगा और दोनों मिल कर सूची बना लेंगे. फिर उन की फाइलों में अंतिम तारीख को हुई कार्यवाही की फोटोकौपी करवा कर वे सूचना भिजवा देंगी.

‘‘सूचना भिजवा दी गई और कुछ दिन गुजर गए मगर कोई काम नहीं होने की वजह से मैं उन से मिला नहीं. तब उस दिन दोपहर में औफिस में उन का फोन आया. फोन पर उन्होंने मुझे शाम को उन के औफिस में आ कर मिलने की अपील की.

‘‘शाम को मैं उन के औफिस में पहुंचा तो एकाएक तो मैं उन्हें पहचान ही नहीं पाया. आज तो वे 3-4 दिनों पहले की प्रौढ़ावस्था की दहलीज पर खड़ी वरिष्ठ गंभीर वकील लग ही नहीं रही थीं. उन्होंने शायद शाम को ही शैंपू किया होगा जिस से उन के बाल चमक रहे थे, हलका मेकअप किया हुआ था और एक बेहद सुंदर रंगीन साड़ी बड़ी नफासत से पहन रखी थी जिस का आंचल वे बारबार संवार लेती थीं.

‘‘मुझे देखते ही उन के मुंह पर मुसकान फैल गई तो पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गया, ‘क्या बात है मैडम, आज तो आप,’ मगर कहतेकहते मैं रुक गया तो वे बोलीं, ‘आप रुक क्यों गए, बोलिए, पूरी बात तो बोलिए.’ अब मैं ने पूरी बात बोलना जरूरी समझते हुए बोल दिया, ‘ऐसा लगता है कि आप या तो किसी समारोह में जाने के लिए तैयार हुई हैं, या कोई विशेष व्यक्ति आने वाला है.’ मेरी बात सुन कर उन के चेहरे पर एक मुसकान उभरी, फिर थोड़ा अटकती हुई सी बोलीं, ‘आप के दोनों अंदाजे गलत हैं, इसलिए आप अपनी बात पूरी करिए.’ तो मैं ने कहा, ‘आज आप और दिनों से अलग ही दिख रही हैं.’

‘‘और दिनों से अलग से क्या मतलब है आप का,’ उन्होंने कुछ शरारत जैसे अंदाज में कहा तो मैं ने भी कह दिया, ‘आज आप पहले दिन से ज्यादा सुंदर लग रही हैं.’

‘‘मेरी बात सुन कर वे नवयुवती की तरह मुसकान के साथ बोलीं, ‘आप यों ही झूठी तारीफ कर के मुझे चने के झाड़ पर चढ़ा रहे हैं.’ तो मैं ने हिम्मत कर के बोल दिया, ‘मैं झूठ क्यों बोलूंगा? वैसे, यह काम तो वकीलों का होता है. पर हकीकत में आज आप एक गंभीर वकील नहीं, किसी कालेज की सुंदर युवा लैक्चरर लग रही हैं?’ यह सुन कर वे बेहद शरमा कर बोली थीं, ‘अच्छा, बहुत हो गई मेरी खूबसूरती की तारीफ, आप थोड़ी देर अकेले बैठिए, मैं चाय बना कर लाती हूं. चाय पी कर कुछ केसेज के बारे में बात करेंगे.’

इस घटना के कुछ दिनों बाद शाम को मैं औफिस से घर लौटा तो वकील साहिबा मेरे घर पर मौजूद थीं और बेटियों से खूब घुममिल कर बातचीत कर रही थीं. मेरे पहुंचने पर बेटी ने चाय बनाई तो पहले तो उन्होंने थोड़ी देर पहले ही चाय पी है का हवाला दिया, मगर मेरे साथ चाय पीने की अपील को सम्मान देते हुए चाय पीतेपीते उन्होंने बेटियों से बड़ी मोहब्बत से बात करते हुए कहा, ‘देखो बेटी, मैं और तुम्हारी मम्मी एक ही शहर से हैं और एक ही कालेज में सहपाठी रही हैं, इसलिए तुम मुझे आंटी नहीं, मौसी कह कर बुलाओगी तो मुझे अच्छा लगेगा.

‘‘अब जब भी मुझे टाइम मिलेगा, मैं तुम लोगों से मिलने आया करूंगी. तुम लोगों को कोई परेशानी तो नहीं होगी?’ कह कर उन्होंने प्यार से बेटियों की ओर देखा, तो दोनों एकसाथ बोल पड़ीं, ‘अरे मौसी, आप के आने से हमें परेशानी क्यों होगी, हमें तो अच्छा लगेगा, आप आया करिए. आप ने तो देख ही लिया, मम्मी तो अभी बातचीत करना तो दूर, ठीक से बोलने की हालत में भी नहीं हैं. वैसे भी वे दवाइयों के असर में आधी बेहोश सी सोई ही रहती हैं. हम तो घर में रहते हुए किसी अपने से बात करने को तरसते ही रहते हैं और हो सकता है कि आप के आतेजाते रहने से फिल्मों की तरह आप को देख कर मम्मी को अपना कालेज जीवन ही याद आ जाए और वे डिप्रैशन से उबर सकें.’

‘‘मनोचिकित्सक भी ऐसी किसी संभावना से इनकार तो नहीं करते हैं. अपनी बेटियों के साथ उन का संवाद सुन कर मुझे उन के एकदम घर आ जाने से उपजी आशंकापूर्ण उत्सुकता एक सुखद उम्मीद में परिणित हो गई और मुझे काफी अच्छा लगा.

‘‘इस के बाद 3-4 दिनों तक मेरा उन से मिलना नहीं हो पाया. उस दिन शाम को औफिस से घर के लिए निकल ही रहा था कि उन का फोन आया. फोन पर उन्होंने मुझे शाम को अपने औफिस में आने को कहा तो थोड़ा अजीब तो लगा मगर उन के बुलावे की अनदेखी भी नहीं कर सका.

‘‘उन के औफिस में वे आज भी बेहद सलीके से सजी हुई और किसी का इंतजार करती हुई जैसी ही मिलीं. तो मैं ने पूछ ही लिया कि वे कहीं जा रही हैं या कोई खास मेहमान आने वाला है?

‘‘मेरा सवाल सुन कर वे बोलीं, ‘आप बारबार यही अंदाजा क्यों लगाते हैं.’ यह कह कर थोड़ी देर मुझे एकटक देखती रहीं, फिर एकदम बुझे स्वर में बोलीं, ‘मेरे पास अब कोई नहीं आने वाला है. वैसे आएगा भी कौन? जो आया था, जिस ने इस मन के द्वार पर दस्तक दी थी, मैं ने तो उस की दस्तक को अनसुना ही नहीं किया था, पता नहीं किस जनून में उस के लिए मन का दरवाजा ही बंद कर दिया था. उस के बाद किसी ने मन के द्वार पर दस्तक दी ही नहीं.

‘‘आज याद करती हूं तो लगता है कि वह पल तो जीवन में वसंत जैसा मादक और उसी की खुशबू से महकता जैसा था. मगर मैं न तो उस वसंत को महसूस कर पाई थी, न उस महकते पल की खुशबू का आनंद ही महसूस कर सकी थी,’ यह कह कर वे खामोश हो गईं.

‘‘थोड़ी देर यों ही मौन पसरा रहा हमारे बीच. फिर मैं ने ही मौन भंग किया, ‘मगर आप के परिवारजन, मेरा मतलब भाई वगैरह, तो आतेजाते होंगे.’ मेरी बात सुन कर थोड़ी देर वे खामोश रहीं, फिर बोलीं, ‘मातापिता तो रहे नहीं. भाइयों के अपनेअपने घरपरिवार हैं. उन में उन की खुद की व्यस्तताएं हैं. उन के पास समय कहां है?’ कहते हुए वे काफी निराश और भावुक होने लगीं तो मैं ने उन की टेबल पर रखे पानी के गिलास को उन की ओर बढ़ाया और बोला, ‘आप थोड़ा पानी पी लीजिए.’

‘‘मेरी बात सुन कर भी वे खामोश सी ही बैठी रहीं तो मैं गिलास ले कर उन की ओर बढ़ा और उन की कुरसी की बगल में खड़ा हो कर उन्हें पानी पिलाने के लिए गिलास उन की ओर बढ़ाया. तो उन्होंने मुझे बेहद असहाय नजर से देखा तो सहानुभूति के साथ मैं ने अपना एक हाथ उन के कंधे पर रख कर गिलास उन के मुंह से लगाना चाहा. उन्होंने मेरे गिलास वाले हाथ को कस कर पकड़ लिया. तब मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ, और मैं ने सौरी बोलते हुए अपना हाथ खींचने की कोशिश की.

‘‘मगर उन्होंने तो मेरे गिलास वाले हाथ पर ही अपना सिर टिका दिया और सुबकने लगीं. मैं ने गिलास को टेबल पर रख दिया, उन के कंधे को थपथपाया. पत्नी की लंबी बीमारी के चलते काफी दिनों के बाद किसी महिला के जिस्म को छूने व सहलाने का मौका मिला था, मगर उन से परिचय होने के कम ही वक्त और अपने सरकारी पद का ध्यान रखते हुए मैं शालीनता की सीमा में ही बंधा रहा.

‘‘थोड़ी देर में उन्हें सुकून महसूस हुआ तो मैं ने कहा, ‘आई एम सौरी वकील साहिबा, मगर आप को छूने की मजबूरी हो गई थी.’ सुन कर वे बोलीं, ‘आप क्यों अफसोस जता रहे हैं, गलती मेरी थी जो मैं एकदम इस कदर भावुक हो गई.’ कह कर थोड़ी देर को चुप हो गईं, फिर बोलीं, ‘आप से एक बात कहना चाहती हूं. आप ‘मैं जवान हूं, मैं सुंदर हूं’ कह कर मेरी झूठी तारीफ कर के मुझे यों ही बांस पर मत चढ़ाया करिए.’ यह कहते हुए वे एकदम सामान्य लगने लगीं, तो मैं ने चैन की सांस ली.

‘‘उस दिन के बाद मेरा आकर्षण उन की तरफ खुद ही बढ़ने लगा. कोर्ट से लौटते समय वे अकसर मेरी बेटियों से मिलने घर आ जाती थीं. फिर घर पर साथ चाय पीते हुए किसी केस के बारे में बात करते हुए बाकी बातें फाइल देख कर सोचने के बहाने मैं लगभग रोज शाम को ही उन के घर जाने लगा.

पत्नी की मानसिक अस्वस्थता के चलते उन से शारीरिक रूप से लंबे समय से दूर रहने से उपजी खीझ से तल्ख जिंदगी में एक समवयस्क महिला के साथ कुछ पल गुजारने का अवसर मुझे खुशी का एहसास देने लगा.

‘‘दिन बीतते रहे. बातचीत में, हंसीमजाक से नजदीकी बढ़ते हुए उस दिन एक बात पर वे हंसी के साथ मेरी और झुक गईं तो मैं ने उन्हें बांहों में बांध लिया. उन्होंने एकदम तो कोई विरोध नहीं किया मगर जैसे ही उन्हें आलिंगन में कसे हुए मेरे होंठ उन्हें चूमने के लिए बढ़े, अपनी हथेली को बीच में ला कर उन्हें रोकते हुए वे बोलीं, ‘देखिए, लंबे समय से अपने घरपरिवार और अपनों से अलग रहते अकेलेपन को झेलती तल्ख जिंदगी में आप से पहली ही मुलाकात में आप के अंदर एक अभिभावक का स्वरूप देख कर आप मुझे अच्छे लगने लगे थे.

‘‘आप से बात करते हुए मुझे एक अभिभावक मित्र का एहसास होता है. आप के परिवार में आप की बेटियों से मिल कर उन के साथ बातें कर के समय बिताते मुझे एक पारिवारिक सुख की अनुभूति होती है. मेरे अंदर का मातृत्वभाव तृप्त हो जाता है. इसलिए आप से, आप के परिवार से मिले बिना रह नहीं पाती.

‘‘हमारा परिचय मजबूत होते हुए यह स्थिति भी आ जाएगी, मैं ने सोचा नहीं था. फिर भी आप अगर आज यह सब करना चाहेंगे तो शायद आप की खुशी की खातिर आप को रोकूंगी नहीं, मगर इस के बाद मैं एकदम, पूरी तरह से टूट जाऊंगी. मेरे मन में आप की बनाई हुई एक अभिभावक मित्र की छवि टूट जाएगी. आप की बेटियों से मिल कर बातें कर के मेरे मन में उमंगती मातृत्व की सुखद अनुभूति की तृप्ति की आशा टूट जाएगी. मैं पूरी तरह टूट कर बिखर जाऊंगी. क्या आप मुझे इस तरह टूट कर बिखर जाने देंगे या एक परिपक्व मित्र का अभिभावक बन सहारा दे कर एक आनंद और उल्लास से पूर्ण जीवन प्रदान करेंगे, बोलिए?’

‘‘यह कहते भावावेश में उन की आवाज कांपने लगी और आंखों से आंसू बहने लगे. मेरी चेतना ने मुझे एकदम झकझोर दिया. जिस्म की चाहत का जनून एक पल में ठंडा हो गया. अपनी बांहों से उन्हें मुक्त करते हुए मैं बोला, ‘मुझे माफ कर देना. पलभर को मैं बहक गया था. मगर अब अपने मन का द्वार बंद मत करना.’

‘यह द्वार दशकों बाद किसी के सामने अपनेआप खुला है, इसे खुला रखने का दायित्व अब हम दोनों का है. आप और मैं मिल कर निभाएंगे इस दायित्व को,’ कह कर उन्होंने मेरा हाथ कस कर थाम लिया, फिर चूम कर माथे से लगा लिया.

‘‘उस दिन के बाद उन का मेरे घरपरिवार में आना ज्यादा नियमित हो गया. एक घरेलू महिला की तरह उन की नियमित देखभाल से बच्चे भी काफी खुश रहने लगे थे. एक दिन घर पहुंचने पर मैं बेहद पसोपेश में पड़ गया. मेरी बड़ी बेटी पत्नी के कमरे के बाहर बैठी हुई थी. और कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था. मेरे पूछने पर बेटी ने बताया कि आज भी सेविका नहीं आई है और उसे पत्नी के गंदे डायपर बदलने में काफी दिक्कत हो रही थी. तभी अचानक मौसी आ गईं. उन्होंने मुझे परेशान देख कर मुझे कमरे के बाहर कर दिया और खुद मम्मी का डायपर बदल कर अब शायद बौडी स्पंज कर रही हैं. तभी, ‘मन्नो, दीदी के कपड़े देदे,’ की आवाज आई.

‘‘बेटी ने उन्हें कपड़े पकड़ा दिए. थोड़ी देर में वकील साहिबा बाहर निकलीं तो उन के हाथ में पत्नी के गंदे डायपर की थैली देख कर मैं शर्मिंदा हो गया और ‘अरे वकील साहिबा, आप यह क्या कर रही हैं,’ मुश्किल से कह पाया, मगर वे तो बड़े सामान्य से स्वर में, ‘पहले इन को डस्टबिन में डाल दूं, तब बातें करेंगे,’ कहती हुई डस्टबिन की तरफ बढ़ गईं.

‘‘डस्टबिन में गंदे डायपर डाल कर वाशबेसिन पर हाथ धो कर वे लौटीं और बोलीं, ‘मैं ने बच्चों को मुझे मौसी कहने के लिए यों ही नहीं कह दिया. बच्चों की मौसी ने अपनी बीमार बहन के कपड़े बदल दिए तो कुछ अनोखा थोड़े ही कर दिया,’ कहते हुए वे फिर बेटी से बोलीं, ‘अरे मन्नो, पापा को औफिस से आए इतनी देर हो गई और तू ने चाय भी नहीं बनाई. अब जल्दी से चाय तो बना ले, सब की.’

‘‘चाय पी कर वकील साहिबा चलने लगीं तो बेटी की पीठ पर हाथ रख कर बड़े स्नेह से बोलीं, ‘देखो मन्नो, आइंदा कभी भी ऐसे हालात हों तो मौसी को मदद के लिए बुलाने में देर मत करना.’

‘‘ऐसे ही दिन, महीने बीतते हुए 5 साल बीत गए. पत्नी इलाज के साथसाथ वकील साहिबा की सेवा से धीरेधीरे काफी स्वस्थ हो गईं. मगर उन के स्वास्थ्य में सुधार होते ही उन्होंने सब से पहले कभी उन की कालेजमेट रही और अब बच्चों की मौसी वकील साहिबा के बारे में ही एक सख्त एन्क्वायरी औफिसर की तरह उन से मेरा परिचय कैसे बढ़ा, वह घर कैसे और क्यों आने लगी, बेटियों से वह इतना क्यों घुलमिल गई, मैं उन के घर क्यों जाता हूं आदि सवाल उठाने शुरू कर दिए तो मैं काफी खिन्न हो गया. मगर मैं ने अपनी खिन्नता छिपाए रखी, इस से पत्नी के शक्की स्वभाव को इतना प्रोत्साहन मिल गया कि एक दिन घर में मुझे सुनाने के लिए ही बेटी को संबोधित कर के जोर से बोली थी, ‘वकील साहिबा तेरे बाप की बीवी बनने के लिए ही तेरी मौसी बन कर घर में घुस आई. खूब फायदा उठाया है दोनों ने मेरी बीमारी का. मगर मैं अब ठीक हो गई हूं और दोनों को ठीक कर दूंगी.’

‘‘पत्नी का प्रलाप सुन कर बेटी कुढ़ कर बोली, ‘मम्मी, मौसी ने आप के गंदे डायपर तक कई बार बदले हैं, कुछ तो खयाल करो.’ यह कह कर अपनी मां की बेकार की बातें सुनने से बचने के लिए वह अपने कमरे में चली गई. वह अपनी मौसी की मदद से किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही थी.

‘‘इस के कुछ समय बाद बड़ी बेटी, जो ग्रेजुएशन पूरा होते ही वकील साहिबा के तन, मन से सहयोग के कारण बैंक सेवा में चयनित हो गई थी, ने अपने सहपाठी से विवाह करने की बात घर में कही तो पत्नी ने शालीनता की सीमाएं तोड़ते हुए अपनी सहपाठिनी वकील साहिबा को फोन कर के घर पर बुलाया और बेटी के दुस्साहस के लिए उन की अस्वस्थता के दौरान मेरे साथ उन के अनैतिक संबंधों को कारण बताए हुए उन्हें काफी बुराभला कह दिया.

‘‘इस के बावजूद भी बेटी के जिद पर अड़े रहने पर जब उन्होंने बेटी का विवाह में सहयोग करते हुए उस की शादी रजिस्ट्रार औफिस में करवा दी तब तो पत्नी ने उन के घर जा कर उन्हें बेहद जलील किया. इस घटना के बाद मैं ने ही उन्हें घर आने से रोक दिया. अब जब भी कोर्ट में उन से मिलता, उन का बुझाबुझा चेहरा और सीमित बातचीत के बाद एकदम खामोश हो कर ‘तो ठीक है,’ कह कर उन्हें छोड़ कर चले जाने का संकेत पा कर मैं बेहद खिन्न और लज्जित हो जाता था.

‘‘इस तरह एक साल गुजर गया. उस दिन भी हाईकोर्ट में विभाग के विरुद्ध एक मुकदमे में मैं भी मौजूद था. विभाग के विरुद्ध वादी के वकील के कुछ हास्यास्पद से तर्क सुन कर जज साहब व्यंग्य से मुसकराए थे और उसी तरह मुसकराते हुए प्रतिवादी के वकील हमारी वकील साहिबा की ओर देख कर बोले, ‘हां वकील साहिबा, अब आप क्या कहेंगी.’

‘‘जज साहब के मुसकराने से अचानक पता नहीं वकील साहिबा पर क्या प्रतिक्रिया हुई. वे फाइल को जज साहब की तरफ फेंक कर बोलीं, ‘हां, अब तुम भी कहो, मैं, जवान हूं, सुंदर हूं, चढ़ाओ मुझे चने की झाड़ पर,’ कहते हुए वे बड़े आक्रोश में जज साहब के डायस की तरफ बढ़ीं तो इस बेतुकी और अप्रासंगिक बात पर जज साहब एकदम भड़क गए और इस गुस्ताखी के लिए वकील साहिबा को बरखास्त कर उन्हें सजा भी दे सकते थे पर गुस्से को शांत करते हुए जज साहब संयत स्वर में बोले, ‘वकील साहिबा, आप की तबीयत ठीक नहीं लगती, आप घर जा कर आराम करिए. मैं मुकदमा 2 सप्ताह बाद की तारीख के लिए मुल्तवी करता हूं.’

‘‘उस दिन जज साहब की अदालत में मुकदमा मुल्तवी हो गया. मगर इस के बाद लगातार कुछ ऐसी ही घटनाएं और हुईं. एक दिन वह आया जब एक दूसरे जज महोदय की नाराजगी से उन्हें मानसिक चिकित्सालय भिजवा दिया गया. अजीब संयोग था कि ये सभी घटनाएं मेरी मौजूदगी में ही हुईं.

‘‘वकील साहिबा की इस हालत की वजह खुद को मानने के चलते अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए औफिस से ही समय निकाल कर उन का कुशलक्षेम लेने अस्पताल हो आता था. एक दिन वहां की डाक्टर ने मुझ से उन के रिश्ते के बारे पूछ लिया तो मैं ने डाक्टर को पूरी बात विस्तार से बतला दी. डाक्टर ने मेरी परिस्थिति जान कर मुलाकात का समय नहीं होने पर भी मुझे उन की कुशलक्षेम जानने की सुविधा दी. फिर डाक्टर ने सीधे उन के सामने पड़ने से परहेज रखने की मुझे सलाह देते हुए बताया कि वे मुझे देख कर चिंतित सी हो कर बोलती हैं, ‘तुम ने क्यों कहा, मैं सुंदर हूं.’ और मेरे चले आने पर लंबे समय तक उदास रहती हैं.

‘‘बेटा उच्चशिक्षा के बाद और बड़ी बेटी व दामाद किसी विदेशी बैंकिंग संस्थान में अच्छे वेतन व भविष्य की खातिर विदेश चले गए थे. छोटी बेटी केंद्र की प्रशासनिक सेवा में चयनित हो गई थी. मगर वह औफिसर्स होस्टल में रह रही थी. अब परिवार में मेरे और पत्नी के अलावा कोई नहीं था. उधर पत्नी के मन में मेरे और वकील साहिबा के काल्पनिक अवैध संबंधों को ले कर गहराते शक के कारण उन का ब्लडप्रैशर एकदम बढ़ जाता था, और फिर दवाइयों के असर से कईकई दिनों तक मैमोरीलेप्स जैसी हालत हो जाती थी.

‘‘इसी हालात में उन्हें दूसरा झटका तब लगा जब बेटे ने अपनी एक विदेशी सहकर्मी युवती से शादी करने का समाचार हमें दिया.

‘‘उस दिन मेरे मुंह से अचानक निकल गया, ‘अब मन्नू को तो वकील साहिबा ने नहीं भड़काया.’ मेरी बात सुन कर पत्नी ने कोई विवाद खड़ा नहीं किया तो मुझे थोड़ा संतोष हुआ. मगर उस के बाद पत्नी को हाई ब्लडप्रैशर और बाद में मैमोरीलेप्स के दौरों में निरंतरता बढ़ने लगी तो मुझे चिंता होने लगी.

‘‘कुछ दिनों बाद उन्हें फिर से डिप्रैशन ने घेर लिया. अब पूरी तरह अकेला होने कारण पत्नी की देखभाल के साथ दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करना बेहद कठिन महसूस होता था. रिटायरमैंट नजदीक था, और प्रमोशन का अवसर भी, इसलिए लंबी छुट्टियां ले कर घर पर बैठ भी नहीं सकता था. क्योंकि प्रमोशन के मौके पर अपने खास ही पीठ में छुरा भोंकने का मौका तलाशते हैं और डाक्टर द्वारा बताई गई दवाइयों के असर से वे ज्यादातर सोई ही रहती थीं. फिर भी अपनी गैरहाजिरी में उन की देखभाल के लिए एक आया रख ली थी.

‘‘उस दिन आया ने कुछ देर से आने की सूचना फोन पर दी, तो मैं उन्हें दवाइयां, जिन के असर से वे कमसेकम 4 घंटे पूरी तरह सोईर् रहती थीं, दे कर औफिस चला गया था. पता नहीं कैसे उन की नींद बीच में ही टूट गई और मेरी गैरहाजिरी में नींद की गोलियों के साथ हाई ब्लडप्रैशर की दशा में ली जाने वाली गोलियां इतनी अधिक निगल लीं कि आया के फोन पर सूचना पा कर जब मैं घर पहुंचा तो उन की हालत देख कर फौरन उन्हें ले कर अस्पताल को दौड़ा. मगर डाक्टरों की कोशिश के बाद भी उन की जीवन रक्षा नहीं हो सकी.

‘‘पत्नी की मृत्यु पर बेटे ने तो उस की पत्नी के आसन्न प्रसव होने के चलते थोड़ी देर इंटरनैट चैटिंग से शोक प्रकट करते हुए मुझ से संवेदना जाहिर की थी, मगर दोनों बेटियां आईं थी. छोटी बेटी तो एक चुभती हुई खमोशी ओढ़े रही, मगर बड़ी बेटी का बदला हुआ रुख देख कर मैं हैरान रह गया. वकील साहिबा को मौसी कह कर उन के स्नेह से खुश रहने वाली और बैंकसेवा के चयन से ले कर उस के जीवनसाथी के साथ उस का प्रणयबंधन संपन्न कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहने के कारण उन की आजीवन ऋ णी रहने की बात करने वाली मेरी बेटी ने जब कहा, ‘आखिर आप के और उन के अफेयर्स के फ्रस्टेशन ने मम्मी की जान ले ही ली.’ और मां को अपनी मौसी की सेवा की याद दिलाने वाली छोटी बेटी ने भी जब अपनी बहन के ताने पर भी चुप्पी ही ओढ़े रही तो मैं इस में उस का भी मौन समर्थन मान कर बेहद दुखी हुआ था.

‘‘कुछ समय बाद मैं और तुम सेवानिवृत्त हो गए. मैं अब वकील साहिबा को देखने के लिए नियमितरूप से मानसिक अस्पताल जाने लगा और उन के साथ काफी समय गुजारने लगा. एक दिन अस्पताल की डाक्टर ने मुझ से कहा, ‘देखिए, अब वह बिलकुल स्वस्थ हो गई है. वह वकालत फिर से कर पाएगी, यह तो नहीं कहा जा सकता मगर एक औरत की सामान्य जिंदगी जी पाएगी, बशर्ते उसे एक मित्रवत व्यक्ति का सहारा मिल सके जो उसे यह यकीन दिला सके कि वह उसे तन और मन से संरक्षण दे सकता है.

‘‘पत्नी की मृत्यु के बाद मैं ने अपनी संतानों द्वारा मुझे लगभग पूरी तरह इग्नोर कर दिए जाने के चलते गहराए अकेलेपन से छुटकारा पाने के लिए उन का दिल से मित्र बनने का संकल्प लिया. इस बारे में बच्चों से बात की, तो पुत्र ने तो केवल इतना कहा, ‘आप तो हमें भारतीय सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक नैतिकता की बातें सिखाया करते थे, अब हम क्या कहें.’ मगर बड़ी पुत्री ने कहा, ‘आया का देर से आने की सूचना देने के बावजूद आप का औफिस चले जाना और इस बीच उसी दिन मम्मी की दवाइयों का असर समय से पहले ही खत्म होने के कारण उन का बीच में जाग जाना व अपनी दवाइयां घातक होने की हद तक अपनेआप खा लेना पता नहीं कोई कोइंसीडैंट था या साजिश. ऐसी क्या मजबूरी थी कि आप पूरे दिन की नहीं, तो आधे दिन की छुट्टी नहीं ले सके उस दिन. लगता है मम्मी ने डिप्रैशन में नींद की गोलियों के साथ ब्लडप्रैशर कम करने की गोलियां इतनी ज्यादा तादाद में खुद नहीं ली थीं. किसी ने उन्हें जान कर और इस तरह दी थीं कि लगे कि ऐसा उन्होंने डिप्रैशन की हालत में खुद यह सब कर लिया.’

‘‘यह सुन कर तो मैं स्तब्ध ही रह गया. छोटी पुत्री ने, ‘अब मैं क्या कहूं, आप हर तरह आजाद हैं. खुद फैसला कर लें,’ जैसी प्रतिक्रिया दी. तो एक बार तो लगा कि पत्नी की बची पड़ी दवाइयों की गोलियां मैं भी एकसाथ निगल कर सो जाऊं, मगर यह सोच कर कि इस से किसी को क्या फर्क पड़ेगा, इरादा बदल लिया और पिछले कुछ दिनों से सब से अलग इस गैस्टहाउस में रहने लगा हूं. परिचितों को इसी उपनगर में चल रहे किसी धार्मिक आयोजन में व्यस्त होने की बात कह रखी है.’’ यह सब कह कर मेरे मित्र शायद थक कर खामोश हो गए.

काफी देर मौन पसरा रहा हमारे बीच, फिर मित्र ने ही मौन भंग किया, और बड़े निर्बल स्वर में बोले, ‘‘मैं ने तुम्हें इसलिए बुलाया है कि तुम बताओ, मैं क्या करूं?’’

मित्र के सवाल करने पर मुझे अपना फैसला सुनाने का मौका मिल गया. सो, मैं बोला, ‘‘अभिनव तुम्हें क्या करना है, तुम दोनों अकेले हो. वकील साहिबा के अंदर की औरत को तुम ने ही जगाया था और उन के अंदर की जागी हुई औरत ने तुम्हारे हताशनिराश जीवन में नई उमंग पैदा की और तुम्हारे परिवार को तनमन से अपने प्यार व सेवा का नैतिक संबल दे कर टूटने से बचाया. ऐसे में उसे जीवन की निराशा से टूटने से उबार कर नया जीवन देने की तुम्हारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है. उस के द्वारा तुम्हारे परिवार पर किए गए एहसानों को चुकाने का समय आ गया है. तुम वकील साहिबा से रजिस्ट्रार औफिस में बाकायदा विवाह करो, जिस से वे तुम्हारी विधिसम्मत पत्नी का दर्जा पा सकें और भविष्य में कभी भी तुम्हारी संतानें उन्हें सता न सकें. तुम्हारे संतानों की अब अपनी दुनिया है, उन्हें उन की दुनिया में रहने दो.’’

मेरी बात सुन कर मित्र थोड़ी देर कुछ फैसला लेने जैसी मुद्रा में गंभीर रहे, फिर बोले, ‘‘चलो, उन के पास अस्पताल चलते हैं.’’

मित्र के साथ अस्पताल पहुंच कर डाक्टर से मिले, तो उन्होंने सलाह दी कि आप उन के साथ एक नई जिंदगी शुरू करेंगे, इसलिए उन्हें जो भी दें, वह एकदम नया दें और अपनी दिवंगत पत्नी के कपड़े या ज्वैलरी या दूसरा कोई चीज उन्हें न दें. साथ ही, कुछ दिन उस पुराने मकान से भी कहीं दूर रहें, तो ठीक होगा.

डाक्टर से सलाह कर के और उन्हें कुछ दिन अभी अस्पताल में ही रखने की अपील कर के हम घर लौटे तो पड़ोसी ने घर की चाबी दे कर बताया कि उन की छोटी बेटी सरकारी गाड़ी में थोड़ी देर पहले आई थी. आप द्वारा हमारे पास रखाई गई घर की चाबी हम से ले कर बोली कि उन्होंने मां की मृत्यु के बाद आप को अकेले नहीं रहने देने का फैसला लिया है, और काफी बड़े सरकारी क्वार्टर में वह अकेली ही रहती है, इसलिए अभी आप का कुछ जरूरी सामान ले कर जा रही है. आप ने तो कभी जिक्र किया नहीं, मगर बिटिया चलते समय बातोंबातों में इस मकान के लिए कोई ग्राहक तलाशने की अपील कर गई है.

ताला खोल कर हम अंदर घुसे तो पाया कि प्रशासनिक अधिकारी पुत्री उन के जरूरी सामान के नाम पर सिर्फ उन की पत्नी का सामान सारे वस्त्र, आभूषण यहां तक कि उन की सारी फोटोज भी उतार कर ले गई थी. एक पत्र टेबल पर छोड़ गई थी. जिस में लिखा था, ‘हम अपनी दिवंगता मां की कोई भी चीज अपने बाप की दूसरी बीवी के हाथ से छुए जाना भी पसंद नहीं करेंगे. इसलिए सिर्फ अपनी मां के सारे सामान ले जा रही हूं. आप का कोईर् सामान रुपयापैसा मैं ने छुआ तक नहीं है. मगर आप को यह भी बताना चाहती हूं कि अब हम आप को इस घर में नहीं रहने देंगे. भले ही यह घर आप के नाम से है और बनवाया भी आप ने ही है, मगर इस में हमारी मां की यादें बसी हैं. हम यह बरदाश्त नहीं करेंगे कि हमारे बाप की दूसरी बीवी इस घर में हमारी मां का स्थान ले. आप समझ जाएं तो ठीक है. वरना जरूरत पड़ी तो हम कानून का भी सहारा लेंगे.’

पत्र पढ़ कर मित्र कुछ देर खिन्न से दिखे. तो मैं ने उन्हें थोड़ा तसल्ली देने के लिए फ्रिज से पानी की बोतल निकाल कर उन्हें थोड़ा पानी पीने को कहा तो वे बोले, ‘‘आश्चर्य है, तुम मुझे इतना कमजोर समझ रहे हो कि मैं इस को पढ़ कर परेशान हो जाऊंगा. नहीं, पहले मैं थोड़ा पसोपेश में था, मगर अब तो मैं ने फैसला कर लिया है कि मैं इस मकान को जल्दी ही बेच दूंगा. पुत्री की धमकी से डर कर नहीं, बल्कि अपने फैसले को पूरा करने के लिए. इस की बिक्री से प्राप्त रकम के 4 हिस्से कर के 3 हिस्से पुत्र और पुत्रियों को दे दूंगा, और अपने हिस्से की रकम से एक छोटा सा मकान व सामान्य जीवन के लिए सामान खरीदूंगा. उस घर से मैं उन के साथ नए जीवन की शुरुआत करूंगा. मगर तब तक तुम्हें यहीं रुकना होगा. तुम रुक सकोगे न.’’ कह कर उन्होंने मेरा साथ पाने के लिए मेरी ओर उम्मीदभरी नजर से देखा. मेरी सांकेतिक स्वीकृति पा कर वे बड़े उत्साह से, ‘‘किसी ने सही कहा है, अ फ्रैंड इन नीड इज अ फ्रैंड इनडीड,’’ कहते हुए कमरे के बाहर निकले, दरवाजे पर ताला लगा कर चाबी पड़ोसी को दी और सड़क पर आ गए. नई जिंदगी की नई राह पर चलने के उत्साह में उन के कदम बहुत तेजी से बढ़ रहे थे. Family Story

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