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Donald Trump : अमेरिकी-अमेरिकी में खाई 

Donald Trump : अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खब्ती नीतियां पूरे देश में ऐसा वायरस उगा रही हैं जिस से अमेरिका 10-15 सालों में थर्ड वर्ल्ड कंट्री बन जाए तो बड़ी बात नहीं. जैसे भारत में हिंदू मुसलमान कर के समाज को 2 हिस्सों में बांट दिया गया है कुछ वैसे ही ट्रंप ने अमेरिका में लोगों को बांट डाला है. दूसरी बार सत्ता में आने के बाद ट्रंप ने अवैध घुसपैठियों को पकड़ने के लिए भारी हथियार लिए, बुलेटप्रूफ वरदी पहने, मास्क लगाए अर्धसैनिकों को कैलिफोर्निया के लौस एंजेल्स में भेज दिया जिस से वहां के स्थानीय लोग उबल पड़े.

यह न सिर्फ जनता की इच्छा जाने बिना किया गया बल्कि वहां के चुने हुए गवर्नर को भी बताए बिना किया गया. वाशिंगटन की पुलिस को राज्य की पुलिस का कोई सहयोग नहीं मिला और अब इस खूबसूरत शहर में दंगों, आगजनी, गिरफ्तारियों, जुलूसों, धरनों, हाथापाई का दौर चल रहा है जहां का हौलीवुड सारी दुनिया में जाना जाता है.

घुसपैठिए अमेरिका का भला ही कर रहे हैं, बुरा नहीं. ये गरीब, अनपढ़अधपढ़, छोटे काम करने वाले सौदोसौ डौलर महीना कमाने के लिए हजारों डौलर खर्च कर के खुशहाल देश अमेरिका में आए थे पर अब ट्रंप प्रशासन द्वारा उन्हें खलनायक बना डाला गया है व जंजीरों में बांध कर मवेशियों की तरह गाडि़यों में ठूंसा जा रहा है. उन्हें कईकई दिनों तक भूखा रखा जा रहा है. उन के साथ वही बरताव हो रहा है जो 400 साल पहले अफ्रीका से काले गुलामों को यूरोपीय बंदूकों के बल पर जहाजों में भर अमेरिका लाने के लिए किया गया था.

आधे से ज्यादा अमेरिकी इस से सहमत नहीं पर ये वे अमेरिकी हैं जो पढ़ेलिखे हैं और सड़कों पर एक बेवकूफ नेता के नाम पर नारे नहीं लगा सकते. रेड हैट पहने मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) एक तरह का संप्रदाय बन गया है जो जरमनी के नाजियों की तरह अमेरिका को शुद्ध गोरे ईसाइयों का देश बनाना चाहता है. शिक्षित अमेरिकी समझते हैं कि अमेरिका ने हर तरह के लोगों का खुल कर स्वागत किया था. बहुतों को तो अपने यूरोपीय जन्म का इतिहास भी नहीं मालूम.

यही कट्टर लोग अब, सिर्फ चर्च के कहने पर, अमेरिकी-अमेरिकी में खाई पैदा कर रहे हैं. वे बहाना यह कर रहे हैं कि पुलिस उन्हें ही पकड़ रही है जो बिना कागजों के अमेरिका में रह रहे हैं. असल में निशाना हर गैरगोरा है, वे काले भी हैं जो 400 साल पहले आए थे. उन्हें यह कह कर डराया जा रहा है कि अगर उन्होंने बाद में अपनी मरजी से आए लोगों का साथ दिया, तो उन की खैर नहीं.

लौस एंजेल्स के निवासी इस बात को समझ रहे हैं और हर कदम पर ट्रंप की बिगड़ैल फोर्स का विरोध कर रहे हैं. वे उन गोरों का विरोध कर रहे हैं जो अनर्गल झुठ फैला रहे हैं कि ये लोग अपराधी हैं, जुर्म करते हैं, पालतू कुत्तेबिल्लियां खा जाते हैं, सड़कों पर लूट के लिए जिम्मेदार हैं वगैरह.

आंकड़े बताते हैं कि गोरों और गैरगोरों के अपराधी होने में फर्क नहीं. फर्क इतना है कि अदालतें गोरों को बरी कर देती हैं, गैरगोरों को लंबी सजा दे देती हैं. अदालतों में जज, वकील, जूरी चाहे गैरगोरे हों लेकिन वे अपने को गोरों के एहसान तले होना दर्शाते हुए पकड़े गए अपराधी को उस की स्किन के रंग से ही उसे वास्तविक अपराधी करार दे देते हैं.

लौस एंजेल्स के बाद ऐसे प्रदर्शन अमेरिकाभर में हो रहे हैं. वे जुलाई, जो अमेरिका का स्वंत्रता दिवस है, को भी हुए. अगर ये ट्रंप के अमेरिका के नष्ट होने से बचा सकें तो बड़ी बात होगी वरना अमेरिका भी ईरान, उत्तरी कोरिया और अफगानिस्तान की तरह ‘महान’ बनेगा, इस में शक नहीं.

Social Story : ऐसे हुई पूजा

Social Story : अंशु के अच्छे अंकों से पास होने की खुशी में मां ने घर में पूजा रखवाई थी. प्रसाद के रूप में तरहतरह के फल, दूध, दही, घी, मधु, गंगाजल वगैरा काफी सारा सामान एकत्रित किया गया था. सारी तैयारियां हो चुकी थीं लेकिन अभी तक पंडितजी नहीं आए थे. मां ने अंशु को बुला कर कहा, ‘‘अंशु, एक बार फिर लखन पंडितजी के घर चले जाओ. शायद वे लौट आए हों… उन्हें जल्दी से बुला लाओ.’’

‘‘लेकिन मां, अब और कितनी बार जाऊं? 3 बार तो उन के घर के चक्कर काट आया हूं. हर बार यही जवाब मिलता है कि पंडितजी अभी तक घर नहीं आए हैं?’’

अंशु ने टका जा जवाब दिया, तो मां सहजता से बोलीं, ‘‘तो क्या हुआ… एक बार और सही. जाओ, उन्हें बुला लाओ.’’

‘‘उन्हें ही बुलाना जरूरी है क्या? किसी दूसरे पंडित को नहीं बुला सकते क्या?’’ अंशु ने खीजते हुए कहा.

‘‘ये कैसी बातें करता है तू? जानता नहीं, वे हमारे पुराने पुरोहित हैं. उन के बिना हमारे घर में कोई भी कार्य संपन्न नहीं होता?’’

‘‘क्यों, उन में क्या हीरेमोती जड़े हैं? दक्षिणा लेना तो वे कभी भूलते नहीं. 501 रुपए, धोती, कुरता और बनियान लिए बगैर तो वे टलते नहीं हैं. जब इतना कुछ दे कर ही पूजा करवानी है तो फिर किसी भी पंडित को बुला कर पूजा क्यों नहीं करवा लेते? बेवजह उन के चक्कर में इतनी देर हो रही है. इतने सारे लोग घर में आ चुके हैं और अभी तक पंडितजी का कोई अतापता ही नहीं है,’’ अंशु ने खरी बात कही.

‘‘बेटे, आजकल शादीब्याह का मौसम चल रहा है. हो सकता है वे कहीं फंस गए हों, इसी वजह से उन्हें यहां आने में देर हो रही हो.’’

‘‘वह तो ठीक है पर उन्होंने कहा था कि बेफिक्र रहो, मैं अवश्य ही समय पर चला आऊंगा, लेकिन फिर भी उन की यह धोखेबाजी. मैं तो इसे कतई बरदाश्त नहीं करूंगा. मेरी तो भूख के मारे हालत खराब हो रही है. आखिर मुझे तब तक तो भूखा ही रहना पड़ेगा न, जब तक पूजा समाप्त नहीं हो जाती. जब अभी तक पंडितजी आए ही नहीं हैं तो फिर पूजा शुरू कब होगी और फिर खत्म कब होगी पता नहीं… तब तक तो भूख के मारे मैं मर ही जाऊंगा.’’

‘‘बेटे, जब इतनी देर तक सब्र किया है तो थोड़ी देर और सही. अब पंडितजी आने ही वाले होंगे.’’

तभी पंडितजी का आगमन हुआ. मां तो उन के चरणों में ही लोट गईं.

पंडितजी मुसकराते हुए बोले, ‘‘क्या करूं, थोड़ी देर हो गई आने में. यजमानों को कितना भी समझाओ मानते ही नहीं. बिना खाए उठने ही नहीं देते. खैर, कोई बात नहीं. पूजा की सामग्री तैयार है न?’’

‘‘हां महाराज, बस आप का ही इंतजार था. सबकुछ तैयार है,’’ मां ने उल्लास भरे स्वर में कहा.

तभी अंशु का छोटा भाई सोनू भी वहां आ कर बैठ गया. पूजा की सामग्री के बीच रखे पेड़ों को देख कर उस का मन ललचा गया. वह अपनेआप को रोक नहीं पाया और 2 पेड़े उठा कर वहीं पर खाने लगा. पंडितजी की नजर पेड़े खाते हुए सोनू पर पड़ी तो वे बिजली की तरह कड़क उठे, ‘‘अरे… सत्यानाश हो गया. भगवान का भोग जूठा कर दिया इस दुष्ट बालक ने. हटाओ सारी सामग्री यहां से. क्या जूठी सामग्री से पूजा की जाएगी?’’

मां तो एकदम से परेशान हो गईं. गलती तो हो ही चुकी थी. पंडितजी अनापशनाप बोलते ही चले जा रहे थे. जैसेतैसे जल्दीजल्दी सारी सामग्री फिर से जुटाई गई और पंडितजी मिट्टी की एक हंडि़या में शीतल प्रसाद बनाने लगे.

अंशु हड़बड़ा कर बोल उठा, ‘‘अरे…अरे पंडितजी, आप यह क्या कर रहे हैं?’’

‘‘भई, शीतल प्रसाद और चरणामृत बनाने के लिए हंडि़या में दूध डाल रहा हूं.’’

‘‘मगर यह दूध तो जूठा है?’’

‘‘जूठा है. वह कैसे? यह तो मैं ने अलग से मंगवाया है.’’

‘‘लेकिन जूठा तो है ही… आप मानें चाहे न मानें, यह जिस गाय का दूध है, उसे दुहने से पहले उस के बछड़े ने तो दूध अवश्य ही पिया होगा, तो क्या आप बछड़े के जूठे दूध से प्रसाद बनाएंगे? यह तो बड़ी गलत बात है.’’

पंडितजी के चेहरे की रंगत उतर गई. वे कुछ भी बोल नहीं पाए. चुपचाप हंडि़या में दही डालने लगे.

अंशु ने फिर टोका, ‘‘पंडितजी, यह दही तो दूध से भी गयागुजरा है. मालूम है, दूध फट कर दही बनता है. दूध तो जूठा होता ही है और इस दही में तो सूक्ष्म जीव होते हैं. भगवान को भोग क्या इस जीवाणुओं वाले प्रसाद से लगाएंगे?’’ पंडितजी का चेहरा तमतमा गया. भन्नाते हुए शीतल प्रसाद में मधु डालने लगे.

‘‘पंडितजी, आप यह क्या कर रहे हैं? यह मधु तो उन मधुमक्खियों की ग्रंथियों से निकला हुआ है जो फूलों से पराग चूस कर अपने छत्तों में जमा करती हैं. भूख लगने पर सभी मधुमक्खियां मधु खाती हैं. यह तो एकदम जूठा है,’’ अंशु ने फिर बाल की खाल निकाली. पंडितजी ने हंडि़या में गंगाजल डाला ही था कि अंशु फिर बोल पड़ा, ‘‘अरे पंडितजी, गंगाजल तो और भी दूषित है. गंगा नदी में न जाने कितनी मछलियां रहती हैं, जीवजंतु रहते हैं. आखिर यह जल भी तो जूठा ही है और ये सारे फल भी तोतों, गिलहरियों, चींटियों आदि के जूठे हैं. आप व्यर्थ ही भगवान को नाराज करने पर तुले हैं. जूठे प्रसाद का भोग लगा कर आप भगवान के कोप का भाजन बन जाएंगे और हम सब को भी पाप लगेगा.‘‘

‘‘तो फिर मैं चलता हूं… मत कराओ पूजा,’’ पंडितजी नाराज हो कर अपने आसन से उठने लगे.

‘‘पंडितजी, पूजा तो आप को करवानी ही है लेकिन जूठे प्रसाद से नहीं. किसी ऐसी पवित्र चीज से पूजा करवाइए जो बिलकुल शुद्ध हो, जूठी न हो और वह है मन, जो बिलकुल पवित्र है?’’

‘‘हां बेटे, ठीक कहा तुम ने मन ही सब से पवित्र होता है. पवित्र मन से ही सच्ची पूजा हो सकती है. सचमुच, तुम ने आज मेरी आंखें खोल दीं. मेरी आंखों के सामने ढोंग और पाखंड का परदा पड़ा हुआ था. मुझ से बड़ी भूल हुई. मुझे माफ कर दो,’’ उस के बाद पंडितजी ने उसी सामग्री से पूजा करवा दी लेकिन पंडितजी के चेहरे पर पश्चात्ताप के भाव थे. Social Story 

Social Story In Hindi : अड़ियल टट्टू

Social Story In Hindi : हमेशा की तरह सुकेश मुंबई के नरीमन पौइंट स्थित अपने औफिस 11:15 बजे पहुंचा जबकि औफिस पहुंचने का समय 10:45 बजे था।
रोज देरी से औफिस पहुंचने के कारण बौस सुकेश से नाराज रहते थे, लेकिन सुकेश, बौस के निर्देशों को एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देता था।
महानगर होने की वजह से यहां औफिस पहुंचने का समय दूसरे शहरों से अलग था, क्योंकि मुंबई में 10 बजे सभी के लिए औफिस पहुंचना संभव नहीं था। नरीमन पौइंट के आसपास निम्न व मध्यवर्ग के लोगों के लिए किराए से या खुद के मकान में रहना असंभव था। इसलिए, अपनी सैलरी के हिसाब से कोई कर्मचारी विरार रहता था तो कोई खारगर।
अमूमन, सुकेश औफिस पहुंचते ही चाय पीता था, उस के डेस्क के सामने ही चायकौफी की मशीन लगी हुई थी। वह चाय की चुसकी ले ही रहा था कि तभी एचआर का मसेंजर डाक रिसीव करने वाले कलर्क से बोला, “विभाग में सुकेश सर कहां बैठते हैं, उन्हें चिट्ठी देनी है।” सुकेश अपना नाम सुन कर बोला, “मैं ही सुकेश हूं, दे दो चिट्ठी।”
चिट्ठी पढ़ते ही सुकेश के होश उड़ गए, क्योंकि उसे बैंक की सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था और उस की बर्खास्तगी आज से ही प्रभावी थी। कारण था 5 सालों से वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में लगातार ‘सी’ ग्रेड दिया जाना।
बौस इस हद तक चला जाएगा, सुकेश को उम्मीद नहीं थी। बौस के खिलाफ सुकेश कुछ भी नहीं कर सकता था, फिर भी उस के मन में बौस के प्रति नफरत और क्रोध की चिनगारी भड़कने लगी। सुकेश बौस पर अपशब्दों की लगातार फाइरिंग कर रहा था। जब इस से भी मन नहीं भरा तो उस ने बौस को 2 थप्पड़ जड़ दिए। जब शोरगुल बढ़ गया तो विमल भी चेंबर के अंदर आ गया। विभाग में एचआर विमल ही देखता था।
विमल ने बौस और सुकेश को शांत करवाने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन वह कामयाब नहीं हो सका। सुकेश का चेहरा गुस्से से लाल हो गया था। चिल्लाने के कारण वह खांसने भी लगा था, फिर भी वह लगातार बोले जा रहा था। उस के गले के नस तने हुए थे और मुंह से थूक लगातार निकल रहा था। चूंकि, उस के पास अब खोने के लिए कुछ भी नहीं था, इसलिए वह बहुत ज्यादा आक्रामक हो गया था।
अंत में बौस को सिक्योरिटी औफिसर को बुलाना पड़ा। उस के हस्तक्षेप के बाद भी सुकेश बड़ी मुश्किल से चेंबर से बाहर आया, लेकिन, “बौस को मार दूंगा, किसी को नहीं छोङूंगा, कोर्ट जाऊंगा…” आदि उस के द्वारा बड़बड़ाना जारी रहा।
जब ऊर्जा खत्म हो गई और हलक प्यास से सूखने लगा तो हताशा और निराशा की स्थिति में वह अपनी सीट पर बैठ कर पानी पीने लगा। हालांकि, मन के अस्थिर होने की वजह से वह अपने सिर के बालों पर बारबार उंगलियां फिरा रहा था साथ ही साथ चेहरे को दोनों हथेलियों से हलकाहलका दबा भी रहा था।
कुछ देर सुकेश शांत रहा, फिर अचानक से वह विमल से उलझ गया। विमल शांत रहा, चुपचाप सुकेश का अनर्गल प्रलाप सुनता रहा। जब सुकेश की चिल्लाने की तीव्रता कम हुई तो विमल बोला, “भाई, तुम अर्थशास्त्री हो, खुद को विद्वान मानते हो और आज कह रहे हो कि तुम्हें यह नियम पता नहीं था। तुम्हारे इस तर्क को कौन मानेगा, किसी को लगातार 5 बार वार्षिक रिपोर्ट में सी ग्रेड मिलने पर उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाता है, यह तुम्हें अच्छी तरह से पता है। मैं विगत 3 सालों से इस खतरे के बारे में तुम्हें बता रहा हूं, पिछले साल बौस से माफी मांगने के लिए भी मैं ने तुम से कहा था। मैं ने यह भी कहा था कि बड़ी मछली हमेशा छोटी मछली को खा जाती है, फिर भी तुम अड़ियल टट्टू बने रहे।”
जब विमल का स्वर तल्ख और तेज हुआ तो सुकेश के जबान पर ताला लग गया। विमल की बातों को सुनने के बाद भी सुकेश का मन और भी अशांत हो गया। कुछ देर तक सामने की वीआईपी लिफ्ट की तरफ निर्लिप्त भाव से एकटक ताकता रहा, फिर अचानक से उठ कर डीजीएम लौ से इस उम्मीद में मिलने चला गया ताकि उसे उस की समस्या का कोई समाधान मिल सके।
डीजीएम लौ ने कहा, “बैंक में वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट की ग्रेडिंग के आधार पर बर्खास्त करने के प्रावधान को 2015 में लागू किया गया था, लेकिन यह अपवाद जैसा है, क्योंकि इस के पहले कभी इस वजह से बैंक की सेवा से किसी को बर्खास्त नहीं किया गया है। चूंकि, इस प्रावधान को अधिकारी संवर्ग की सेवा शर्तों में शामिल किया जा चुका है, इसलिए अदालत में तुम इस केस को शायद ही जीत पाओगे।”
डीजीएम लौ के यहां से लौटते समय सुकेश के कदमों में भारीपन को देखते ही विमल समझ गया कि बात नहीं बनी। विमल मन ही मन सोच रहा था कि कितना वेबकूफ और घमंडी है सुकेश? अर्थशास्त्री है, खुद को विद्वान समझता है, पढ़ाईलिखाई विदेश से की है, फिर भी उस की अक्ल हमेशा घास खाने गई हुई होती है। इतना अकड़ू है कि कभी भी सीधे मुंह बात नहीं करता है। बौस और सुकेश के बीच मनमुटाव का कारण सिर्फ अहम है। मैं…मैं…और सिर्फ मैं… सुकेश की बर्खास्तगी का मूल कारण है।
सुकेश का पिछले 5 सालों से बौस के साथ खटपट चल रहा था। पहले बौस का रोज सुकेश से बकझक होता था, लेकिन जैसे ही बौस को पता चला कि अगर किसी भी कर्मचारी को वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में लगातार 5 सालों तक सी ग्रेड दी जाए तो बैंक उसे सेवा से बर्खास्त कर देता है, बौस ने सुकेश के साथ बहस करना बंद कर दिया और उसे हर साल सी ग्रेडिंग देनी शुरू की।
चूंकि, समीक्षा पदाधिकारी के साथ बौस हमेशा तालमेल बना कर रखते थे, इसलिए बौस की दी हुई ग्रेडिंग को समीक्षा पदाधिकारी भी हमेशा यथावत रखते थे।
बर्खास्तगी के बाद सुकेश को गृह एवं कार ऋण तत्काल प्रभाव से बंद करना होगा या फिर दूसरी नौकरी करनी होगी, ताकि वह हर महीने घर और कार की किस्त और ब्याज जमा कर सके। अभी वह बैंक द्वारा आवंटित मकान में रहता है, उसे भी उसे तुरंत खाली करना पड़ेगा। फर्नीचर, फिक्सचर की कीमत भी उसे बैंक को तुरंत चुकानी होगी।
पत्नी, हाउसवाइफ है, बेटा भी 3 महीने का है, तुरंत नौकरी मिल जाएगी, यह आसान नहीं होगा, क्योंकि निजी और सरकारी नौकरियों की कार्य संस्कृति में जमीनआसमान का अंतर होता है। साथ में, अब उस पर बर्खास्तगी का कलंक भी लग चुका है।
इंसान जानता है कि इस दुनिया में किसी की कोई औकात नहीं। सभी रंगमंच के पात्र हैं और एक दिन सभी को अपनी भूमिका अदा कर के इस दुनिया से रुखसत होना है। कोई यहां अमर बन कर नहीं आया है। बावजूद इस के, सुकेश ने सिर्फ अपने झूठे दंभ को पोषित करने के चक्कर में अपने परिवार को सड़क पर ले कर आ गया। यह सब सोचतेसोचते विमल का मन बोझिल सा हो गया। Social Story In Hindi 

Romantic Story In Hindi : विश्वासघात – जूही ने कैसे छीना नीता का पति

Romantic Story In Hindi : नीला आसमान अचानक ही स्याह हो चला था. बारिश की छोटीछोटी बूंदें अंबर से टपकने लगी थीं. तूफान जोरों पर था. दरवाजों के टकराने की आवाज सुन कर जूही बाहर आई. अंधेरा देख कर अतीत की स्मृतियां ताजा हो गईं…

कुछ ऐसा ही तूफानी मंजर था आज से 1 साल पहले का. उस दिन उस ने जीन्स पर टौप पहना था. अपने रेशमी केशों की पोनीटेल बनाई थी. वह बहुत खूबसूरत लग रही थी. उस ने आंखों पर सनग्लासेज चढ़ाए और ड्राइविंग सीट पर बैठ गई.

कुछ ही देर में वह बैंक में थी. मैनेजर के कमरे की तरफ बढ़ते हुए उसे कुछ संशय सा था कि उस का लोन स्वीकृत होगा भी या नहीं, पर मैनेजर की मधुर मुसकान ने उस के संदेह को विराम दे दिया. उस का लोन स्वीकृत हो गया था और अब वह अपना बुटीक खोल सकती थी. आननफानन उस ने मिठाई मंगवा कर बैंक स्टाफ को खिलाई और प्रसन्नतापूर्वक घर लौट आई.

शुरू से ही वह काफी महत्त्वाकांक्षी रही थी. फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करते ही उस ने लोन के लिए आवेदन कर दिया था. पड़ोस के कसबे में रहने वाली जूही इस शहर में किराए पर अकेली रहती थी और अपना कैरियर गारमैंट्स के व्यापार से शुरू करना चाहती थी.

अगले दिन उस ने सोचा कि मैनेजर को धन्यवाद दे आए. आखिर उसी की सक्रियता से लोन इतनी जल्दी मिलना संभव हुआ था. मैनेजर बेहद स्मार्ट, हंसमुख और प्रतिभावान था. जूही उस से बेहद प्रभावित हुई और उस की मंगाई कौफी के लिए मना नहीं कर पाई. बातोंबातों में उसे पता चला कि वह शहर में नया आया है. उस का नाम नीरज है और शहर से दूर बने अपार्टमैंट्स में उस का निवास है.

धीरेधीरे मुलाकातें बढ़ीं तो जूही ने पाया कि दोनों की रुचियां काफी मिलती है. दोनों को एकदूसरे का साथ काफी अच्छा लगने लगा. लगातार मुलाकातों में जूही कब नीरज से प्यार कर बैठी, पता ही न चला. नीरज भी जूही की सुंदरता का कायल था.

बिजली तो उस दिन गिरी जब बुटीक की ओपनिंग सेरेमनी पर नीरज ने अपनी पत्नी नीता से जूही को मिलवाया. नीरज के विवाहित होने का जूही को इतना दुख नहीं हुआ, जितना नीता को उस की पत्नी के रूप में पा कर. नीता जूही की सहपाठी रही थी और हर बात में जूही से उन्नीस थी. उस के अनुसार नीता जैसी साधारण स्त्री नीरज जैसे पति को डिजर्व ही नहीं करती थी.

सहेली पर विजय की भावना जूही को नीरज की तरफ खींचती गई और नीता से अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के चक्कर में जूही का नीरज से मिलनाजुलना बढ़ता गया. नीता खुश थी. अकेले शहर में जूही का साथ उसे बहुत अच्छा लगता था. वह हमेशा उस से कुछ सीखने की कोशिश करती, पर इन लगातार मुलाकातों से जूही और नीरज को कई बार एकांत मिलने लगा.

दोनों बहक गए और अब एकदूसरे के साथ रहने के बहाने खोजने लगे. नीता को अपनी सहेली पर रंच मात्र भी शक न था और नीरज पर तो वह आंख मूंद कर विश्वास करती थी. विश्वास का प्याला तो उस दिन छलका, जब पिताजी की बीमारी के चलते नीता को महीने भर के लिए पीहर जाना पड़ा.

सरप्राइज देने की सोच में जब वह अचानक घर आई, तो उस ने नीरज और जूही को आपत्तिजनक हालत में पाया. इस सदमे से आहत नीता बिना कुछ बोले नीरज को छोड़ कर चली गई.

जूही अब नीरज के साथ आ कर रहने लगी. कहते हैं न कि प्यार अंधा होता है, पर जब ‘एवरीथिंग इज फेयर इन लव ऐंड वार’ का इरादा हो तो शायद वह विवेकरहित भी हो जाता है.

समय अपनी गति से चलता रहा. जूही और नीरज मानो एकदूसरे के लिए ही बने थे. जीवन मस्ती में कट रहा था. कुछ समय बाद जूही को सब कुछ होते हुए भी एक कमी सी खलने लगी.

आंगन में नन्ही किलकारी खेले, वह चाहती थी, पर नीरज इस के लिए तैयार नहीं था. उस का कहना था कि ‘लिव इन रिलेशन’ की कानूनी मान्यता विवादास्पद है, इसलिए वह बच्चे का भविष्य दांव पर नहीं लगाना चाहता. जूही इस तर्क के आगे निरुत्तर थी.

जूही का बुटीक अच्छा चल रहा था. नाम व  कमाई दोनों ही थे. एक दिन अचानक ही एक आमंत्रणपत्र देख कर वह सकते में आ गई. पत्र नीरज की पर्सनल फाइल में था. आमंत्रणपत्र महक रहा था. वह था तो किसी पार्लर के उद्घाटन का, पर शब्दावली शायराना व व्यक्तिगत सी थी. मुख्य अतिथि नीरज ही थे.

जूही ने नीरज को मोबाइल लगाना चाहा पर वह लगातार ‘आउट औफ रीच’ आता रहा. दिन भर जूही का मन काम में नहीं लगा. बुटीक छोड़ कर वह जा नहीं सकती थी. रात को नीरज के आते ही उस ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी.

कुछ देर तो नीरज बात संभालने की कोशिश करता रहा पर तर्कविहीन उत्तरों से जब जूही संतुष्ट नहीं हुई, तो दोनों का झगड़ा हो गया. नीरज पुन: किसी अन्य स्त्री की ओर आकृष्ट था. संभवत: पत्नी के रहते जूही के साथ संबंध बनाने ने उसे इतनी हिम्मत दे दी थी.

मौजूदा दौर में स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता ने उस के वजूद को बल दिया है. इतना कि कई बार वह समाज के विरुद्ध जा कर अपनी पसंद के कार्य करने लगती है. नीरज जैसे पुरुष इसी बात का फायदा उठाते हैं.

उन्होंने पढ़ीलिखी, बराबर कमाने वाली स्त्री को अपने समान नहीं माना, बल्कि उपभोग की वस्तु समझ कर उस का उपयोग किया. अपने स्वार्थ के लिए जब चाहा उन्हें समान दरजा दे दिया और जब चाहा तब सामाजिक रूढि़यों के बंधन तोड़ दिए. विवाह उन के लिए सुविधा का खेल हो गया.

इस आकस्मिक घटनाक्रम के लिए जूही तैयार नहीं थी. उस ने तो नीरज को संपूर्ण रूप से चाहा व अपनाया था. नीरज को अपनी नई महिला मित्र ताजा हवा के झोंके जैसी दिख रही थी. उस के तन व मन दोनों ही बदलाव के लिए आतुर थे.

जूही को अपनी भलाई व स्वाभिमान नीरज का घर छोड़ने में ही लगे. कुछ महीनों का मधुमास इतनी जल्दी व इतनी बेकद्री से खत्म हो जाएगा, उस ने सोचा न था. नीरज ने उस को रोकने का थोड़ा सा भी प्रयास नहीं किया.

शायद जूही ने इस कटु सत्य को जान लिया था कि पुरुष के लिए स्त्री कभी हमकदम नहीं बनती. वह या तो उसे देवी बना कर उसे नैसर्गिक अधिकारों से दूर कर देता है या दासी बना कर उस के अधिकारों को छीन लेता है. उसे पुरुषों से चिढ़ सी हो गई थी.

नीरज के बारे में फिर कभी जानने की उस ने कोशिश नहीं की, न ही नीरज ने उस से संपर्क साधा.

आज बादलों के इस झुरमुट में पिछली यादों के जख्मों को सहलाते हुए वह यही सोच रही थी कि विश्वासघात किस ने किस के साथ किया था? Romantic Story In Hindi

Family Story : तुमने क्यों कहा मैं सुंदर हूं – क्या दो कदम ही रहा दोनों का साथ

Family Story : सरकारी नौकरियों में लंबे समय तक एकसाथ काम करते और सरकारी घरों में साथ रहते कुछ सहकर्मियों से पारिवारिक रिश्तों से भी ज्यादा गहरे रिश्ते बन जाते हैं, मगर रिटायरमैंट के बाद अपने शहरोंगांवों में वापसी व दूसरे कारणों के चलते मिलनाजुलना कम हो जाता है. फिर भी मिलने की इच्छा तो बनी ही रहती है. उस दिन जैसे ही मेरे एक ऐसे ही सहकर्मी मित्र का उन के पास जल्द पहुंचने का फोन आया तो मैं अपने को रोक नहीं सका.

मित्र स्टेशन पर ही मिल गए. मगर जब उन्होंने औटो वाले को अपना पता बताने की जगह एक गेस्टहाउस का पता बताया तो मैं ने आश्चर्य से उन की ओर देखा. वे मुझे इस विषय पर बात न करने का इशारा कर के दूसरी बातें करने लगे.

गेस्टहाउस पहुंच कर खाने वगैरह से फारिग होने के बाद वे बोले, ‘‘मेरे घर की जगह यहां गेस्टहाउस में रहने की कहानी जानने की तुम्हें उत्सुकता होगी. इस कहानी को सुनाने के लिए और इस का हल करने में तुम्हारी मदद व सुझाव के लिए ही तुम्हें बुलाया है, इसलिए तुम्हें तो यह बतानी ही है.’’ कुछ रुक कर उन्होंने फिर बोलना शुरू किया, ‘‘मित्र, महिलाओं की तरह उन की बीमारियां भी रहस्यपूर्ण होती हैं. हर महिला के जीवन में उम्र के पड़ाव में मीनोपौज यानी प्राकृतिक अंदरूनी शारीरिक बदलाव होता है, जो डाक्टरों के अनुसार भी कोई बीमारी तो नहीं होती, मगर इस का मनोवैज्ञानिक प्रभाव हर महिला पर अलगअलग तरह से होता है. कुछ महिलाएं इस में मनोरोगों से ग्रस्त हो जाती हैं.

‘‘इसी कारण मेरी पत्नी भी मानसिक अवसाद की शिकार हो गई, तो मेरा जीवन कई कठिनाइयों से भर गया. घरपरिवार की देखभाल में तो उन की दिलचस्पी पहले ही कम थी, अब इस स्थिति में तो उन की देखभाल में मुझे और मेरी दोनों नवयुवा बेटियों को लगे रहना पड़ने लगा जिस का असर बेटियों की पढ़ाई और मेरे सर्विस कैरियर पर पड़ रहा था.

‘‘पत्नी की देखभाल के लिए विभाग में अपने अहम पद की जिम्मेदारी के तनाव से फ्री होने के लिए जब मैं ने विभागाध्यक्ष से मेरी पोस्ंिटग किसी बेहद सामान्य कार्यवाही वाली शाखा में करने की गुजारिश की, तो उन्होंने नियुक्ति ऐसे पद पर कर दी जो सरकारी सुविधाओं को भोगते हुए नाममात्र का काम करने के लिए सृजित की गई लगती थी.’’

‘‘काम के नाम पर यहां 4-6 माह में किसी खास मुकदमे के बारे में सरकार द्वारा कार्यवाही की प्रगति की जानकारी चाहने पर केस के संबंधित पैनल वकीलों से सूचना हासिल कर भिजवा देना होता था.

‘‘मगर मुसीबत कभी अकेले नहीं आती. मेरे इस पद पर जौइन करने के 3 हफ्ते बाद ही उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार से विभिन्न न्यायालयों में सेवा से जुड़े 10 वर्ष से ज्यादा की अवधि से लंबित मामलों में कार्यवाही की जानकारी मांग ली. मैं ने सही स्थिति जानने के लिए वकीलों से मिलना शुरू किया. विभाग में ऐसे मामले बड़ी तादाद में थे, इसलिए वकील भी कई थे.

‘‘इसी सिलसिले में 3-4 दिनों में कई वकीलों से मिलने के बाद में एक महिला पैनल वकील के दफ्तर में पहुंचा. उन पर नजर डालते ही लगा कि उन्होंने अपने को एक वरिष्ठ और व्यस्त वकील दिखाने के लिए नीली किनारी की मामूली सफेद साड़ी पहन रखी है और बिना किसी साजसज्जा के गंभीरता का मुखौटा लगा रखा है. और 2-3 फाइलों के साथ कानून की कुछ मोटी किताबें सामने रख कर बैठी हुई हैं. मेरे आने का मकसद जानते ही उन्होंने एक वरिष्ठ वकील की तरह बड़े रोब से कहा, ‘देखिए, आप के विभाग के कितने केस किसकिस न्यायाधीश की बैंच में पैडिंग हैं और इस लंबे अरसे में उन में क्या कार्यवाही हुई है, इस की जानकारी आप के विभाग को होनी चाहिए. मैं वकील हूं, आप के विभाग की बाबू नहीं, जो सूचना तैयार कर के दूं.’

‘‘इस प्रसंग में वकील साहिबा के साथ अपने पूर्व अधिकारियों के व्यवहार को जानते व समझते हुए भी मैं ने उन से पूरे सम्मान के साथ कहा, ‘वकील साहिबा, माफ करें, इन मुकदमों में सरकार आप को एक तय मानदेय दे कर आप की सेवाएं प्राप्त करती है, तो आप से उन में हुई कार्यवाही कर सूचना प्राप्त करने का हक भी रखती है. वैसे, हैडऔफिस का पत्र आप को मिल गया होगा. मामला माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा मांगी गई सूचना का है. यह जिम्मेदारीभरा काम समय पर और व्यवस्था से हो जाए, इसलिए मैं आप लोगों से संपर्क कर रहा हूं, आगे आप की मरजी.’

‘‘मेरी बात सुन कर वकील साहिबा थोड़ी देर चुप रहीं, मानो कोई कानूनी नुस्खा सोच रही हों. फिर बड़े सधे लहजे में बोलीं, ‘देखिए, ज्यादातर केसेज को मेरे सीनियर सर ही देखते थे. उन का हाल  में बार कोटे से न्यायिक सेवा में चयन हो जाने से वे यहां है नहीं, इसलिए मैं फिलहाल आप की कोई मदद नहीं कर सकती.’

‘ठीक है मैडम, मैं चलता हूं और आप का यही जवाब राज्य सरकार को भिजवा दिया जाएगा.’ कह कर मैं चलने के लिए उठ खड़ा हुआ तो वकील साहिबा को कुछ डर सा लगा. सो, वे समझौते जैसे स्वर में बोलीं, ‘आप बैठिए तो, चलिए मैं आप से ही पूछती हूं कि यह काम 3 दिनों में कैसे किया जा सकता है?’

‘‘अब मेरी बारी थी, इसलिए मैं ने उन्हीं के लहजे में जवाब दिया, ‘देखिए, यह न तो मेरा औफिस है, न यहां मेरा स्टाफ काम करता है. ऐसे में मैं क्या कह सकता हूं.’ यह कह कर मैं वैसे ही खड़ा रहा तो अब तक वकील साहिबा शायद कुछ समझौता कर के हल निकालने जैसे मूड में आ गई थीं. वे बोलीं, ‘देखिए, सूचना सुप्रीम कोर्ट को भेजी जानी है, इसलिए सूचना ठोस व सही तो होनी ही चाहिए, और अपनी स्थिति मैं बता चुकी हूं, इसलिए आप कड़वाहट भूल कर कोई रास्ता बताइए.’

‘‘वकील साहिबा के यह कहने पर भी मैं पहले की तरह खड़ा ही रहा. तो वकील साहिबा कुछ ज्यादा सौफ्ट होते हुए बोलीं, ‘देखिए, कभीकभी बातचीत में अचानक कुछ कड़वाहट आ जाती है. आप उम्र में मेरे से बड़े हैं. मेरे फादर जैसे हैं, इसलिए आप ही कुछ रास्ता बताइए ना.’

‘‘देखिए, यह कोई इतना बड़ा काम नहीं है. आप अपने मुंशी से कहिए. वह हमारे विभाग के मामलों की सूची बना कर रिपोर्ट बना देगा.’

‘‘देखिए, आप मेरे फादर जैसे हैं, आप को अनुभव होगा कि मुंशी इस बेगार जैसे काम में कितनी दिलचस्पी लेगा, वैसे भी आजकल उस के भाव बढ़े हुए हैं. सीनियर सर के जाने के बाद कईर् वकील लोग उस को बुलावा भेज चुके हैं,’ कह कर उन्होंने मेरी ओर थोड़ी बेबसी से देखा. मुझे उन का दूसरी बार फादर जैसा कहना अखर चुका था. सो, मैं ने उन्हें टोकते हुए कहा, ‘मैडम वकील साहिबा, बेशक आप अभी युवा ही है और सुंदर भी हैं ही, मगर मेरी व आप की उम्र में 4-5 साल से ज्यादा फर्क नहीं होगा. आप व्यावसायिक व्यस्तता के कारण अपने ऊपर ठीक से ध्यान नहीं दे पाती हैं, नहीं तो आप…

‘‘महिला का सब से कमजोर पक्ष उस को सुंदर कहा जाना होता है. इसलिए वे मेरी बात काट कर बोलीं, ‘आप कैसे कह रहे हैं कि मेरी व आप की उम्र में सिर्फ 4-5 साल का फर्क है और आप मुझे सुंदर कह कर यों ही क्यों चिढ़ा रहे हैं.’ उन्होंने एक मुसकान के साथ कहा तो मैं ने सहजता से जवाब दिया, ‘वकील साहिबा, मैं आप की तारीफ में ही सही, मगर झूठ क्यों बोलूंगा? और रही बात आप की उम्र की, तो धौलपुर कालेज में आप मेरी पत्नी से एक साल ही जूनियर थीं बीएससी में. उन्होंने आप को बाजार वगैरह में कई बार आमनासामना होने पर पहचान कर मुझे बतलाया था. मगर आप की तरफ से कोई उत्सुकता नहीं होने पर उन्होंने भी परिचय को पुनर्जीवित करने की कोशिश नहीं की.’

‘‘अब तक वकील साहिबा अपने युवा और सुंदर होने का एहसास कराए जाने से काफी खुश हो चुकी थीं. इसलिए बोलीं, ‘अच्छा ठीक है, मगर अब आप बैठ तो जाइए, मैं चाय बना कर लाती हूं, फिर आप ही कुछ बताएं,’ कह कर वे कुरसी के पीछे का दरवाजा खोल कर अंदर चली गईं.

‘‘थोड़ी देर में वे एक ट्रे में 2 कप चाय और नाश्ता ले कर लौटीं और बोलीं, ‘आप अकेले बोर हो रहे होंगे. मगर क्या करूं, मैं तो अकेली रहती हूं, अकेली जान के लिए कौन नौकरचाकर रखे.’ उन की बात सुन कर एकदफा तो लगा कि कह दूं कि सरकारी विभागों के सेवा संबंधी मुदकमों के सहारे वकालत में इतनी आमदनी भी नहीं होती? मगर जनवरी की रात को 9 बजे के समय और गरम चाय ने रोक दिया.

‘‘चाय पीने के बाद तय हुआ कि मैं अपने कार्यालय में संबंधित शाखा के बाबूजी को उन के मुंशी की मदद करने को कह दूंगा और दोनों मिल कर सूची बना लेंगे. फिर उन की फाइलों में अंतिम तारीख को हुई कार्यवाही की फोटोकौपी करवा कर वे सूचना भिजवा देंगी.

‘‘सूचना भिजवा दी गई और कुछ दिन गुजर गए मगर कोई काम नहीं होने की वजह से मैं उन से मिला नहीं. तब उस दिन दोपहर में औफिस में उन का फोन आया. फोन पर उन्होंने मुझे शाम को उन के औफिस में आ कर मिलने की अपील की.

‘‘शाम को मैं उन के औफिस में पहुंचा तो एकाएक तो मैं उन्हें पहचान ही नहीं पाया. आज तो वे 3-4 दिनों पहले की प्रौढ़ावस्था की दहलीज पर खड़ी वरिष्ठ गंभीर वकील लग ही नहीं रही थीं. उन्होंने शायद शाम को ही शैंपू किया होगा जिस से उन के बाल चमक रहे थे, हलका मेकअप किया हुआ था और एक बेहद सुंदर रंगीन साड़ी बड़ी नफासत से पहन रखी थी जिस का आंचल वे बारबार संवार लेती थीं.

‘‘मुझे देखते ही उन के मुंह पर मुसकान फैल गई तो पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गया, ‘क्या बात है मैडम, आज तो आप,’ मगर कहतेकहते मैं रुक गया तो वे बोलीं, ‘आप रुक क्यों गए, बोलिए, पूरी बात तो बोलिए.’ अब मैं ने पूरी बात बोलना जरूरी समझते हुए बोल दिया, ‘ऐसा लगता है कि आप या तो किसी समारोह में जाने के लिए तैयार हुई हैं, या कोई विशेष व्यक्ति आने वाला है.’ मेरी बात सुन कर उन के चेहरे पर एक मुसकान उभरी, फिर थोड़ा अटकती हुई सी बोलीं, ‘आप के दोनों अंदाजे गलत हैं, इसलिए आप अपनी बात पूरी करिए.’ तो मैं ने कहा, ‘आज आप और दिनों से अलग ही दिख रही हैं.’

‘‘और दिनों से अलग से क्या मतलब है आप का,’ उन्होंने कुछ शरारत जैसे अंदाज में कहा तो मैं ने भी कह दिया, ‘आज आप पहले दिन से ज्यादा सुंदर लग रही हैं.’

‘‘मेरी बात सुन कर वे नवयुवती की तरह मुसकान के साथ बोलीं, ‘आप यों ही झूठी तारीफ कर के मुझे चने के झाड़ पर चढ़ा रहे हैं.’ तो मैं ने हिम्मत कर के बोल दिया, ‘मैं झूठ क्यों बोलूंगा? वैसे, यह काम तो वकीलों का होता है. पर हकीकत में आज आप एक गंभीर वकील नहीं, किसी कालेज की सुंदर युवा लैक्चरर लग रही हैं?’ यह सुन कर वे बेहद शरमा कर बोली थीं, ‘अच्छा, बहुत हो गई मेरी खूबसूरती की तारीफ, आप थोड़ी देर अकेले बैठिए, मैं चाय बना कर लाती हूं. चाय पी कर कुछ केसेज के बारे में बात करेंगे.’

इस घटना के कुछ दिनों बाद शाम को मैं औफिस से घर लौटा तो वकील साहिबा मेरे घर पर मौजूद थीं और बेटियों से खूब घुममिल कर बातचीत कर रही थीं. मेरे पहुंचने पर बेटी ने चाय बनाई तो पहले तो उन्होंने थोड़ी देर पहले ही चाय पी है का हवाला दिया, मगर मेरे साथ चाय पीने की अपील को सम्मान देते हुए चाय पीतेपीते उन्होंने बेटियों से बड़ी मोहब्बत से बात करते हुए कहा, ‘देखो बेटी, मैं और तुम्हारी मम्मी एक ही शहर से हैं और एक ही कालेज में सहपाठी रही हैं, इसलिए तुम मुझे आंटी नहीं, मौसी कह कर बुलाओगी तो मुझे अच्छा लगेगा.

‘‘अब जब भी मुझे टाइम मिलेगा, मैं तुम लोगों से मिलने आया करूंगी. तुम लोगों को कोई परेशानी तो नहीं होगी?’ कह कर उन्होंने प्यार से बेटियों की ओर देखा, तो दोनों एकसाथ बोल पड़ीं, ‘अरे मौसी, आप के आने से हमें परेशानी क्यों होगी, हमें तो अच्छा लगेगा, आप आया करिए. आप ने तो देख ही लिया, मम्मी तो अभी बातचीत करना तो दूर, ठीक से बोलने की हालत में भी नहीं हैं. वैसे भी वे दवाइयों के असर में आधी बेहोश सी सोई ही रहती हैं. हम तो घर में रहते हुए किसी अपने से बात करने को तरसते ही रहते हैं और हो सकता है कि आप के आतेजाते रहने से फिल्मों की तरह आप को देख कर मम्मी को अपना कालेज जीवन ही याद आ जाए और वे डिप्रैशन से उबर सकें.’

‘‘मनोचिकित्सक भी ऐसी किसी संभावना से इनकार तो नहीं करते हैं. अपनी बेटियों के साथ उन का संवाद सुन कर मुझे उन के एकदम घर आ जाने से उपजी आशंकापूर्ण उत्सुकता एक सुखद उम्मीद में परिणित हो गई और मुझे काफी अच्छा लगा.

‘‘इस के बाद 3-4 दिनों तक मेरा उन से मिलना नहीं हो पाया. उस दिन शाम को औफिस से घर के लिए निकल ही रहा था कि उन का फोन आया. फोन पर उन्होंने मुझे शाम को अपने औफिस में आने को कहा तो थोड़ा अजीब तो लगा मगर उन के बुलावे की अनदेखी भी नहीं कर सका.

‘‘उन के औफिस में वे आज भी बेहद सलीके से सजी हुई और किसी का इंतजार करती हुई जैसी ही मिलीं. तो मैं ने पूछ ही लिया कि वे कहीं जा रही हैं या कोई खास मेहमान आने वाला है?

‘‘मेरा सवाल सुन कर वे बोलीं, ‘आप बारबार यही अंदाजा क्यों लगाते हैं.’ यह कह कर थोड़ी देर मुझे एकटक देखती रहीं, फिर एकदम बुझे स्वर में बोलीं, ‘मेरे पास अब कोई नहीं आने वाला है. वैसे आएगा भी कौन? जो आया था, जिस ने इस मन के द्वार पर दस्तक दी थी, मैं ने तो उस की दस्तक को अनसुना ही नहीं किया था, पता नहीं किस जनून में उस के लिए मन का दरवाजा ही बंद कर दिया था. उस के बाद किसी ने मन के द्वार पर दस्तक दी ही नहीं.

‘‘आज याद करती हूं तो लगता है कि वह पल तो जीवन में वसंत जैसा मादक और उसी की खुशबू से महकता जैसा था. मगर मैं न तो उस वसंत को महसूस कर पाई थी, न उस महकते पल की खुशबू का आनंद ही महसूस कर सकी थी,’ यह कह कर वे खामोश हो गईं.

‘‘थोड़ी देर यों ही मौन पसरा रहा हमारे बीच. फिर मैं ने ही मौन भंग किया, ‘मगर आप के परिवारजन, मेरा मतलब भाई वगैरह, तो आतेजाते होंगे.’ मेरी बात सुन कर थोड़ी देर वे खामोश रहीं, फिर बोलीं, ‘मातापिता तो रहे नहीं. भाइयों के अपनेअपने घरपरिवार हैं. उन में उन की खुद की व्यस्तताएं हैं. उन के पास समय कहां है?’ कहते हुए वे काफी निराश और भावुक होने लगीं तो मैं ने उन की टेबल पर रखे पानी के गिलास को उन की ओर बढ़ाया और बोला, ‘आप थोड़ा पानी पी लीजिए.’

‘‘मेरी बात सुन कर भी वे खामोश सी ही बैठी रहीं तो मैं गिलास ले कर उन की ओर बढ़ा और उन की कुरसी की बगल में खड़ा हो कर उन्हें पानी पिलाने के लिए गिलास उन की ओर बढ़ाया. तो उन्होंने मुझे बेहद असहाय नजर से देखा तो सहानुभूति के साथ मैं ने अपना एक हाथ उन के कंधे पर रख कर गिलास उन के मुंह से लगाना चाहा. उन्होंने मेरे गिलास वाले हाथ को कस कर पकड़ लिया. तब मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ, और मैं ने सौरी बोलते हुए अपना हाथ खींचने की कोशिश की.

‘‘मगर उन्होंने तो मेरे गिलास वाले हाथ पर ही अपना सिर टिका दिया और सुबकने लगीं. मैं ने गिलास को टेबल पर रख दिया, उन के कंधे को थपथपाया. पत्नी की लंबी बीमारी के चलते काफी दिनों के बाद किसी महिला के जिस्म को छूने व सहलाने का मौका मिला था, मगर उन से परिचय होने के कम ही वक्त और अपने सरकारी पद का ध्यान रखते हुए मैं शालीनता की सीमा में ही बंधा रहा.

‘‘थोड़ी देर में उन्हें सुकून महसूस हुआ तो मैं ने कहा, ‘आई एम सौरी वकील साहिबा, मगर आप को छूने की मजबूरी हो गई थी.’ सुन कर वे बोलीं, ‘आप क्यों अफसोस जता रहे हैं, गलती मेरी थी जो मैं एकदम इस कदर भावुक हो गई.’ कह कर थोड़ी देर को चुप हो गईं, फिर बोलीं, ‘आप से एक बात कहना चाहती हूं. आप ‘मैं जवान हूं, मैं सुंदर हूं’ कह कर मेरी झूठी तारीफ कर के मुझे यों ही बांस पर मत चढ़ाया करिए.’ यह कहते हुए वे एकदम सामान्य लगने लगीं, तो मैं ने चैन की सांस ली.

‘‘उस दिन के बाद मेरा आकर्षण उन की तरफ खुद ही बढ़ने लगा. कोर्ट से लौटते समय वे अकसर मेरी बेटियों से मिलने घर आ जाती थीं. फिर घर पर साथ चाय पीते हुए किसी केस के बारे में बात करते हुए बाकी बातें फाइल देख कर सोचने के बहाने मैं लगभग रोज शाम को ही उन के घर जाने लगा.

पत्नी की मानसिक अस्वस्थता के चलते उन से शारीरिक रूप से लंबे समय से दूर रहने से उपजी खीझ से तल्ख जिंदगी में एक समवयस्क महिला के साथ कुछ पल गुजारने का अवसर मुझे खुशी का एहसास देने लगा.

‘‘दिन बीतते रहे. बातचीत में, हंसीमजाक से नजदीकी बढ़ते हुए उस दिन एक बात पर वे हंसी के साथ मेरी और झुक गईं तो मैं ने उन्हें बांहों में बांध लिया. उन्होंने एकदम तो कोई विरोध नहीं किया मगर जैसे ही उन्हें आलिंगन में कसे हुए मेरे होंठ उन्हें चूमने के लिए बढ़े, अपनी हथेली को बीच में ला कर उन्हें रोकते हुए वे बोलीं, ‘देखिए, लंबे समय से अपने घरपरिवार और अपनों से अलग रहते अकेलेपन को झेलती तल्ख जिंदगी में आप से पहली ही मुलाकात में आप के अंदर एक अभिभावक का स्वरूप देख कर आप मुझे अच्छे लगने लगे थे.

‘‘आप से बात करते हुए मुझे एक अभिभावक मित्र का एहसास होता है. आप के परिवार में आप की बेटियों से मिल कर उन के साथ बातें कर के समय बिताते मुझे एक पारिवारिक सुख की अनुभूति होती है. मेरे अंदर का मातृत्वभाव तृप्त हो जाता है. इसलिए आप से, आप के परिवार से मिले बिना रह नहीं पाती.

‘‘हमारा परिचय मजबूत होते हुए यह स्थिति भी आ जाएगी, मैं ने सोचा नहीं था. फिर भी आप अगर आज यह सब करना चाहेंगे तो शायद आप की खुशी की खातिर आप को रोकूंगी नहीं, मगर इस के बाद मैं एकदम, पूरी तरह से टूट जाऊंगी. मेरे मन में आप की बनाई हुई एक अभिभावक मित्र की छवि टूट जाएगी. आप की बेटियों से मिल कर बातें कर के मेरे मन में उमंगती मातृत्व की सुखद अनुभूति की तृप्ति की आशा टूट जाएगी. मैं पूरी तरह टूट कर बिखर जाऊंगी. क्या आप मुझे इस तरह टूट कर बिखर जाने देंगे या एक परिपक्व मित्र का अभिभावक बन सहारा दे कर एक आनंद और उल्लास से पूर्ण जीवन प्रदान करेंगे, बोलिए?’

‘‘यह कहते भावावेश में उन की आवाज कांपने लगी और आंखों से आंसू बहने लगे. मेरी चेतना ने मुझे एकदम झकझोर दिया. जिस्म की चाहत का जनून एक पल में ठंडा हो गया. अपनी बांहों से उन्हें मुक्त करते हुए मैं बोला, ‘मुझे माफ कर देना. पलभर को मैं बहक गया था. मगर अब अपने मन का द्वार बंद मत करना.’

‘यह द्वार दशकों बाद किसी के सामने अपनेआप खुला है, इसे खुला रखने का दायित्व अब हम दोनों का है. आप और मैं मिल कर निभाएंगे इस दायित्व को,’ कह कर उन्होंने मेरा हाथ कस कर थाम लिया, फिर चूम कर माथे से लगा लिया.

‘‘उस दिन के बाद उन का मेरे घरपरिवार में आना ज्यादा नियमित हो गया. एक घरेलू महिला की तरह उन की नियमित देखभाल से बच्चे भी काफी खुश रहने लगे थे. एक दिन घर पहुंचने पर मैं बेहद पसोपेश में पड़ गया. मेरी बड़ी बेटी पत्नी के कमरे के बाहर बैठी हुई थी. और कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था. मेरे पूछने पर बेटी ने बताया कि आज भी सेविका नहीं आई है और उसे पत्नी के गंदे डायपर बदलने में काफी दिक्कत हो रही थी. तभी अचानक मौसी आ गईं. उन्होंने मुझे परेशान देख कर मुझे कमरे के बाहर कर दिया और खुद मम्मी का डायपर बदल कर अब शायद बौडी स्पंज कर रही हैं. तभी, ‘मन्नो, दीदी के कपड़े देदे,’ की आवाज आई.

‘‘बेटी ने उन्हें कपड़े पकड़ा दिए. थोड़ी देर में वकील साहिबा बाहर निकलीं तो उन के हाथ में पत्नी के गंदे डायपर की थैली देख कर मैं शर्मिंदा हो गया और ‘अरे वकील साहिबा, आप यह क्या कर रही हैं,’ मुश्किल से कह पाया, मगर वे तो बड़े सामान्य से स्वर में, ‘पहले इन को डस्टबिन में डाल दूं, तब बातें करेंगे,’ कहती हुई डस्टबिन की तरफ बढ़ गईं.

‘‘डस्टबिन में गंदे डायपर डाल कर वाशबेसिन पर हाथ धो कर वे लौटीं और बोलीं, ‘मैं ने बच्चों को मुझे मौसी कहने के लिए यों ही नहीं कह दिया. बच्चों की मौसी ने अपनी बीमार बहन के कपड़े बदल दिए तो कुछ अनोखा थोड़े ही कर दिया,’ कहते हुए वे फिर बेटी से बोलीं, ‘अरे मन्नो, पापा को औफिस से आए इतनी देर हो गई और तू ने चाय भी नहीं बनाई. अब जल्दी से चाय तो बना ले, सब की.’

‘‘चाय पी कर वकील साहिबा चलने लगीं तो बेटी की पीठ पर हाथ रख कर बड़े स्नेह से बोलीं, ‘देखो मन्नो, आइंदा कभी भी ऐसे हालात हों तो मौसी को मदद के लिए बुलाने में देर मत करना.’

‘‘ऐसे ही दिन, महीने बीतते हुए 5 साल बीत गए. पत्नी इलाज के साथसाथ वकील साहिबा की सेवा से धीरेधीरे काफी स्वस्थ हो गईं. मगर उन के स्वास्थ्य में सुधार होते ही उन्होंने सब से पहले कभी उन की कालेजमेट रही और अब बच्चों की मौसी वकील साहिबा के बारे में ही एक सख्त एन्क्वायरी औफिसर की तरह उन से मेरा परिचय कैसे बढ़ा, वह घर कैसे और क्यों आने लगी, बेटियों से वह इतना क्यों घुलमिल गई, मैं उन के घर क्यों जाता हूं आदि सवाल उठाने शुरू कर दिए तो मैं काफी खिन्न हो गया. मगर मैं ने अपनी खिन्नता छिपाए रखी, इस से पत्नी के शक्की स्वभाव को इतना प्रोत्साहन मिल गया कि एक दिन घर में मुझे सुनाने के लिए ही बेटी को संबोधित कर के जोर से बोली थी, ‘वकील साहिबा तेरे बाप की बीवी बनने के लिए ही तेरी मौसी बन कर घर में घुस आई. खूब फायदा उठाया है दोनों ने मेरी बीमारी का. मगर मैं अब ठीक हो गई हूं और दोनों को ठीक कर दूंगी.’

‘‘पत्नी का प्रलाप सुन कर बेटी कुढ़ कर बोली, ‘मम्मी, मौसी ने आप के गंदे डायपर तक कई बार बदले हैं, कुछ तो खयाल करो.’ यह कह कर अपनी मां की बेकार की बातें सुनने से बचने के लिए वह अपने कमरे में चली गई. वह अपनी मौसी की मदद से किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही थी.

‘‘इस के कुछ समय बाद बड़ी बेटी, जो ग्रेजुएशन पूरा होते ही वकील साहिबा के तन, मन से सहयोग के कारण बैंक सेवा में चयनित हो गई थी, ने अपने सहपाठी से विवाह करने की बात घर में कही तो पत्नी ने शालीनता की सीमाएं तोड़ते हुए अपनी सहपाठिनी वकील साहिबा को फोन कर के घर पर बुलाया और बेटी के दुस्साहस के लिए उन की अस्वस्थता के दौरान मेरे साथ उन के अनैतिक संबंधों को कारण बताए हुए उन्हें काफी बुराभला कह दिया.

‘‘इस के बावजूद भी बेटी के जिद पर अड़े रहने पर जब उन्होंने बेटी का विवाह में सहयोग करते हुए उस की शादी रजिस्ट्रार औफिस में करवा दी तब तो पत्नी ने उन के घर जा कर उन्हें बेहद जलील किया. इस घटना के बाद मैं ने ही उन्हें घर आने से रोक दिया. अब जब भी कोर्ट में उन से मिलता, उन का बुझाबुझा चेहरा और सीमित बातचीत के बाद एकदम खामोश हो कर ‘तो ठीक है,’ कह कर उन्हें छोड़ कर चले जाने का संकेत पा कर मैं बेहद खिन्न और लज्जित हो जाता था.

‘‘इस तरह एक साल गुजर गया. उस दिन भी हाईकोर्ट में विभाग के विरुद्ध एक मुकदमे में मैं भी मौजूद था. विभाग के विरुद्ध वादी के वकील के कुछ हास्यास्पद से तर्क सुन कर जज साहब व्यंग्य से मुसकराए थे और उसी तरह मुसकराते हुए प्रतिवादी के वकील हमारी वकील साहिबा की ओर देख कर बोले, ‘हां वकील साहिबा, अब आप क्या कहेंगी.’

‘‘जज साहब के मुसकराने से अचानक पता नहीं वकील साहिबा पर क्या प्रतिक्रिया हुई. वे फाइल को जज साहब की तरफ फेंक कर बोलीं, ‘हां, अब तुम भी कहो, मैं, जवान हूं, सुंदर हूं, चढ़ाओ मुझे चने की झाड़ पर,’ कहते हुए वे बड़े आक्रोश में जज साहब के डायस की तरफ बढ़ीं तो इस बेतुकी और अप्रासंगिक बात पर जज साहब एकदम भड़क गए और इस गुस्ताखी के लिए वकील साहिबा को बरखास्त कर उन्हें सजा भी दे सकते थे पर गुस्से को शांत करते हुए जज साहब संयत स्वर में बोले, ‘वकील साहिबा, आप की तबीयत ठीक नहीं लगती, आप घर जा कर आराम करिए. मैं मुकदमा 2 सप्ताह बाद की तारीख के लिए मुल्तवी करता हूं.’

‘‘उस दिन जज साहब की अदालत में मुकदमा मुल्तवी हो गया. मगर इस के बाद लगातार कुछ ऐसी ही घटनाएं और हुईं. एक दिन वह आया जब एक दूसरे जज महोदय की नाराजगी से उन्हें मानसिक चिकित्सालय भिजवा दिया गया. अजीब संयोग था कि ये सभी घटनाएं मेरी मौजूदगी में ही हुईं.

‘‘वकील साहिबा की इस हालत की वजह खुद को मानने के चलते अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए औफिस से ही समय निकाल कर उन का कुशलक्षेम लेने अस्पताल हो आता था. एक दिन वहां की डाक्टर ने मुझ से उन के रिश्ते के बारे पूछ लिया तो मैं ने डाक्टर को पूरी बात विस्तार से बतला दी. डाक्टर ने मेरी परिस्थिति जान कर मुलाकात का समय नहीं होने पर भी मुझे उन की कुशलक्षेम जानने की सुविधा दी. फिर डाक्टर ने सीधे उन के सामने पड़ने से परहेज रखने की मुझे सलाह देते हुए बताया कि वे मुझे देख कर चिंतित सी हो कर बोलती हैं, ‘तुम ने क्यों कहा, मैं सुंदर हूं.’ और मेरे चले आने पर लंबे समय तक उदास रहती हैं.

‘‘बेटा उच्चशिक्षा के बाद और बड़ी बेटी व दामाद किसी विदेशी बैंकिंग संस्थान में अच्छे वेतन व भविष्य की खातिर विदेश चले गए थे. छोटी बेटी केंद्र की प्रशासनिक सेवा में चयनित हो गई थी. मगर वह औफिसर्स होस्टल में रह रही थी. अब परिवार में मेरे और पत्नी के अलावा कोई नहीं था. उधर पत्नी के मन में मेरे और वकील साहिबा के काल्पनिक अवैध संबंधों को ले कर गहराते शक के कारण उन का ब्लडप्रैशर एकदम बढ़ जाता था, और फिर दवाइयों के असर से कईकई दिनों तक मैमोरीलेप्स जैसी हालत हो जाती थी.

‘‘इसी हालात में उन्हें दूसरा झटका तब लगा जब बेटे ने अपनी एक विदेशी सहकर्मी युवती से शादी करने का समाचार हमें दिया.

‘‘उस दिन मेरे मुंह से अचानक निकल गया, ‘अब मन्नू को तो वकील साहिबा ने नहीं भड़काया.’ मेरी बात सुन कर पत्नी ने कोई विवाद खड़ा नहीं किया तो मुझे थोड़ा संतोष हुआ. मगर उस के बाद पत्नी को हाई ब्लडप्रैशर और बाद में मैमोरीलेप्स के दौरों में निरंतरता बढ़ने लगी तो मुझे चिंता होने लगी.

‘‘कुछ दिनों बाद उन्हें फिर से डिप्रैशन ने घेर लिया. अब पूरी तरह अकेला होने कारण पत्नी की देखभाल के साथ दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करना बेहद कठिन महसूस होता था. रिटायरमैंट नजदीक था, और प्रमोशन का अवसर भी, इसलिए लंबी छुट्टियां ले कर घर पर बैठ भी नहीं सकता था. क्योंकि प्रमोशन के मौके पर अपने खास ही पीठ में छुरा भोंकने का मौका तलाशते हैं और डाक्टर द्वारा बताई गई दवाइयों के असर से वे ज्यादातर सोई ही रहती थीं. फिर भी अपनी गैरहाजिरी में उन की देखभाल के लिए एक आया रख ली थी.

‘‘उस दिन आया ने कुछ देर से आने की सूचना फोन पर दी, तो मैं उन्हें दवाइयां, जिन के असर से वे कमसेकम 4 घंटे पूरी तरह सोईर् रहती थीं, दे कर औफिस चला गया था. पता नहीं कैसे उन की नींद बीच में ही टूट गई और मेरी गैरहाजिरी में नींद की गोलियों के साथ हाई ब्लडप्रैशर की दशा में ली जाने वाली गोलियां इतनी अधिक निगल लीं कि आया के फोन पर सूचना पा कर जब मैं घर पहुंचा तो उन की हालत देख कर फौरन उन्हें ले कर अस्पताल को दौड़ा. मगर डाक्टरों की कोशिश के बाद भी उन की जीवन रक्षा नहीं हो सकी.

‘‘पत्नी की मृत्यु पर बेटे ने तो उस की पत्नी के आसन्न प्रसव होने के चलते थोड़ी देर इंटरनैट चैटिंग से शोक प्रकट करते हुए मुझ से संवेदना जाहिर की थी, मगर दोनों बेटियां आईं थी. छोटी बेटी तो एक चुभती हुई खमोशी ओढ़े रही, मगर बड़ी बेटी का बदला हुआ रुख देख कर मैं हैरान रह गया. वकील साहिबा को मौसी कह कर उन के स्नेह से खुश रहने वाली और बैंकसेवा के चयन से ले कर उस के जीवनसाथी के साथ उस का प्रणयबंधन संपन्न कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहने के कारण उन की आजीवन ऋ णी रहने की बात करने वाली मेरी बेटी ने जब कहा, ‘आखिर आप के और उन के अफेयर्स के फ्रस्टेशन ने मम्मी की जान ले ही ली.’ और मां को अपनी मौसी की सेवा की याद दिलाने वाली छोटी बेटी ने भी जब अपनी बहन के ताने पर भी चुप्पी ही ओढ़े रही तो मैं इस में उस का भी मौन समर्थन मान कर बेहद दुखी हुआ था.

‘‘कुछ समय बाद मैं और तुम सेवानिवृत्त हो गए. मैं अब वकील साहिबा को देखने के लिए नियमितरूप से मानसिक अस्पताल जाने लगा और उन के साथ काफी समय गुजारने लगा. एक दिन अस्पताल की डाक्टर ने मुझ से कहा, ‘देखिए, अब वह बिलकुल स्वस्थ हो गई है. वह वकालत फिर से कर पाएगी, यह तो नहीं कहा जा सकता मगर एक औरत की सामान्य जिंदगी जी पाएगी, बशर्ते उसे एक मित्रवत व्यक्ति का सहारा मिल सके जो उसे यह यकीन दिला सके कि वह उसे तन और मन से संरक्षण दे सकता है.

‘‘पत्नी की मृत्यु के बाद मैं ने अपनी संतानों द्वारा मुझे लगभग पूरी तरह इग्नोर कर दिए जाने के चलते गहराए अकेलेपन से छुटकारा पाने के लिए उन का दिल से मित्र बनने का संकल्प लिया. इस बारे में बच्चों से बात की, तो पुत्र ने तो केवल इतना कहा, ‘आप तो हमें भारतीय सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक नैतिकता की बातें सिखाया करते थे, अब हम क्या कहें.’ मगर बड़ी पुत्री ने कहा, ‘आया का देर से आने की सूचना देने के बावजूद आप का औफिस चले जाना और इस बीच उसी दिन मम्मी की दवाइयों का असर समय से पहले ही खत्म होने के कारण उन का बीच में जाग जाना व अपनी दवाइयां घातक होने की हद तक अपनेआप खा लेना पता नहीं कोई कोइंसीडैंट था या साजिश. ऐसी क्या मजबूरी थी कि आप पूरे दिन की नहीं, तो आधे दिन की छुट्टी नहीं ले सके उस दिन. लगता है मम्मी ने डिप्रैशन में नींद की गोलियों के साथ ब्लडप्रैशर कम करने की गोलियां इतनी ज्यादा तादाद में खुद नहीं ली थीं. किसी ने उन्हें जान कर और इस तरह दी थीं कि लगे कि ऐसा उन्होंने डिप्रैशन की हालत में खुद यह सब कर लिया.’

‘‘यह सुन कर तो मैं स्तब्ध ही रह गया. छोटी पुत्री ने, ‘अब मैं क्या कहूं, आप हर तरह आजाद हैं. खुद फैसला कर लें,’ जैसी प्रतिक्रिया दी. तो एक बार तो लगा कि पत्नी की बची पड़ी दवाइयों की गोलियां मैं भी एकसाथ निगल कर सो जाऊं, मगर यह सोच कर कि इस से किसी को क्या फर्क पड़ेगा, इरादा बदल लिया और पिछले कुछ दिनों से सब से अलग इस गैस्टहाउस में रहने लगा हूं. परिचितों को इसी उपनगर में चल रहे किसी धार्मिक आयोजन में व्यस्त होने की बात कह रखी है.’’ यह सब कह कर मेरे मित्र शायद थक कर खामोश हो गए.

काफी देर मौन पसरा रहा हमारे बीच, फिर मित्र ने ही मौन भंग किया, और बड़े निर्बल स्वर में बोले, ‘‘मैं ने तुम्हें इसलिए बुलाया है कि तुम बताओ, मैं क्या करूं?’’

मित्र के सवाल करने पर मुझे अपना फैसला सुनाने का मौका मिल गया. सो, मैं बोला, ‘‘अभिनव तुम्हें क्या करना है, तुम दोनों अकेले हो. वकील साहिबा के अंदर की औरत को तुम ने ही जगाया था और उन के अंदर की जागी हुई औरत ने तुम्हारे हताशनिराश जीवन में नई उमंग पैदा की और तुम्हारे परिवार को तनमन से अपने प्यार व सेवा का नैतिक संबल दे कर टूटने से बचाया. ऐसे में उसे जीवन की निराशा से टूटने से उबार कर नया जीवन देने की तुम्हारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है. उस के द्वारा तुम्हारे परिवार पर किए गए एहसानों को चुकाने का समय आ गया है. तुम वकील साहिबा से रजिस्ट्रार औफिस में बाकायदा विवाह करो, जिस से वे तुम्हारी विधिसम्मत पत्नी का दर्जा पा सकें और भविष्य में कभी भी तुम्हारी संतानें उन्हें सता न सकें. तुम्हारे संतानों की अब अपनी दुनिया है, उन्हें उन की दुनिया में रहने दो.’’

मेरी बात सुन कर मित्र थोड़ी देर कुछ फैसला लेने जैसी मुद्रा में गंभीर रहे, फिर बोले, ‘‘चलो, उन के पास अस्पताल चलते हैं.’’

मित्र के साथ अस्पताल पहुंच कर डाक्टर से मिले, तो उन्होंने सलाह दी कि आप उन के साथ एक नई जिंदगी शुरू करेंगे, इसलिए उन्हें जो भी दें, वह एकदम नया दें और अपनी दिवंगत पत्नी के कपड़े या ज्वैलरी या दूसरा कोई चीज उन्हें न दें. साथ ही, कुछ दिन उस पुराने मकान से भी कहीं दूर रहें, तो ठीक होगा.

डाक्टर से सलाह कर के और उन्हें कुछ दिन अभी अस्पताल में ही रखने की अपील कर के हम घर लौटे तो पड़ोसी ने घर की चाबी दे कर बताया कि उन की छोटी बेटी सरकारी गाड़ी में थोड़ी देर पहले आई थी. आप द्वारा हमारे पास रखाई गई घर की चाबी हम से ले कर बोली कि उन्होंने मां की मृत्यु के बाद आप को अकेले नहीं रहने देने का फैसला लिया है, और काफी बड़े सरकारी क्वार्टर में वह अकेली ही रहती है, इसलिए अभी आप का कुछ जरूरी सामान ले कर जा रही है. आप ने तो कभी जिक्र किया नहीं, मगर बिटिया चलते समय बातोंबातों में इस मकान के लिए कोई ग्राहक तलाशने की अपील कर गई है.

ताला खोल कर हम अंदर घुसे तो पाया कि प्रशासनिक अधिकारी पुत्री उन के जरूरी सामान के नाम पर सिर्फ उन की पत्नी का सामान सारे वस्त्र, आभूषण यहां तक कि उन की सारी फोटोज भी उतार कर ले गई थी. एक पत्र टेबल पर छोड़ गई थी. जिस में लिखा था, ‘हम अपनी दिवंगता मां की कोई भी चीज अपने बाप की दूसरी बीवी के हाथ से छुए जाना भी पसंद नहीं करेंगे. इसलिए सिर्फ अपनी मां के सारे सामान ले जा रही हूं. आप का कोईर् सामान रुपयापैसा मैं ने छुआ तक नहीं है. मगर आप को यह भी बताना चाहती हूं कि अब हम आप को इस घर में नहीं रहने देंगे. भले ही यह घर आप के नाम से है और बनवाया भी आप ने ही है, मगर इस में हमारी मां की यादें बसी हैं. हम यह बरदाश्त नहीं करेंगे कि हमारे बाप की दूसरी बीवी इस घर में हमारी मां का स्थान ले. आप समझ जाएं तो ठीक है. वरना जरूरत पड़ी तो हम कानून का भी सहारा लेंगे.’

पत्र पढ़ कर मित्र कुछ देर खिन्न से दिखे. तो मैं ने उन्हें थोड़ा तसल्ली देने के लिए फ्रिज से पानी की बोतल निकाल कर उन्हें थोड़ा पानी पीने को कहा तो वे बोले, ‘‘आश्चर्य है, तुम मुझे इतना कमजोर समझ रहे हो कि मैं इस को पढ़ कर परेशान हो जाऊंगा. नहीं, पहले मैं थोड़ा पसोपेश में था, मगर अब तो मैं ने फैसला कर लिया है कि मैं इस मकान को जल्दी ही बेच दूंगा. पुत्री की धमकी से डर कर नहीं, बल्कि अपने फैसले को पूरा करने के लिए. इस की बिक्री से प्राप्त रकम के 4 हिस्से कर के 3 हिस्से पुत्र और पुत्रियों को दे दूंगा, और अपने हिस्से की रकम से एक छोटा सा मकान व सामान्य जीवन के लिए सामान खरीदूंगा. उस घर से मैं उन के साथ नए जीवन की शुरुआत करूंगा. मगर तब तक तुम्हें यहीं रुकना होगा. तुम रुक सकोगे न.’’ कह कर उन्होंने मेरा साथ पाने के लिए मेरी ओर उम्मीदभरी नजर से देखा. मेरी सांकेतिक स्वीकृति पा कर वे बड़े उत्साह से, ‘‘किसी ने सही कहा है, अ फ्रैंड इन नीड इज अ फ्रैंड इनडीड,’’ कहते हुए कमरे के बाहर निकले, दरवाजे पर ताला लगा कर चाबी पड़ोसी को दी और सड़क पर आ गए. नई जिंदगी की नई राह पर चलने के उत्साह में उन के कदम बहुत तेजी से बढ़ रहे थे. Family Story

Hindi Love Stories : घनचक्कर – मायरा और ईशानी को अपने बॉयफ्रैंड्स से क्या प्रौब्लम थी?

Hindi Love Stories : “यार, बहुत गुस्सा आ रहा है, ये लड़के भी न, अपनेआप को पता नहीं क्या समझते हैं. मेरा मन करता है, आदिव को पीट डालूं. दोस्तों से पी एस फोर खिला लो, हर चीज का टाइम है इस के पास. कोई मैसेज भेजती हूं, एक स्टिकर भेज देता है, चार वर्ड्स टाइप करने में जैसे थक जाएगा. बात करने का अपना मूड होगा तो बस फिर तो कितनी देर बात करवा लो. यह न सुधरा तो मेरा ब्रेकअप हुआ ही समझो. देखो मायरा, तुम उस की बहन हो तो भी मैं तुम्हारे सामने उस की गलतियां बता रही हूं, तुम्हें बुरा तो नहीं लग रहा? तुम मेरी दोस्त भी तो हो. मैं तुम से यह सब शेयर कर सकती हूं न?”

“क्यों नहीं, डियर, अब तो हम अच्छे दोस्त बन चुके हैं. इन लड़कों का क्या है, फ़ालतू होते हैं बिलकुल. कोई अक्ल नहीं होती. पता नहीं, अपनेआप को इतना स्मार्ट क्यों समझते हैं. इन्हें प्रौब्लम क्या है. यतिन भी ऐसा ही है. मेरा भी किसी दिन ब्रेकअप होने वाला है. सारा दिन मैंमैं करता है. मैं ये, मैं वो, अरे भाई, तुम्हें इतना ही मैंमैं करना था तो धरती पर बकरी के रूप में क्यों नहीं आ गए. कल मैं उस के साथ गई थी तो आगे वाली कार लड़की ड्राइव कर रही थी. बस, हंसने लगा, बोला, ‘तुम भी ऐसे ही चलाती हो न?’

“मैं ने उसे घूरा तो और हंसा, ‘यार, जोक भी नहीं समझतीं?’

“मैं ने कहा, ‘यह घटिया जोक कई दिनों से सुन रही हूं. तुम्हें यही लगता है न, कि लड़कियां अच्छी ड्राइविंग नहीं करतीं?’

“‘मैं ने ऐसा कभी नहीं कहा,’ कह कर वह और ज़ोर से हंसा था. इशानी, मेरा तो मन खराब कर देता है यह यतिन. अपनी सारी शौपिंग मेरे साथ करता है, मुझ पर इतना डिपैंड करता है और फिर लड़कियों का ही मजाक उड़ाता है, कितनी डांट खाता है मुझ से.”

“कल पता है क्या हुआ, आदिव अपने लिए खाना बना रहा था, वीडियोकौल पर मुझ से बातें करता रहा. मैं बहुत खुश थी. फिर अपने कपड़े प्रैस करता हुआ भी बातें करता रहा. मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था. जैसे ही उस के काम ख़त्म हुए, बोला, ‘चलो, अब मैं थोड़ा अपने दोस्तों के साथ खेल लेता हूं, थक गया.’ मायरा, मुझे इतना तेज़ गुस्सा आया कि क्या बताऊं, मैं ने कहा, ‘आदि, तुम मुझे यूज़ कर रहे थे, अपना टाइम पास कर रहे थे. मुझे अब तभी कौल करना जब मुझ से ही बातें करनी हों. ये सब फालतू काम नहीं.’ और मैं ने गुस्से में फोन रख दिया था.”

“अरे, तुम अपना खून मत जलाओ, इशानी. लड़के बहुत बेकार होते हैं.”

मैं अपनी चाबी से फ्लैट का दरवाजा खोलकर अंदर आ चुकी थी और सब्जी का बैग किचन में रख कर लिविंगरूम में आ कर सुस्ता रही थी. मेरा आना अपने बैडरूम में बैठी मेरी बेटी मायरा को पता नहीं चला था. इशानी और मायरा को अभी फुरसत कहां थी कि उन्हें खबर हो, दोनों बेचारे 2 सीधेसादे लड़कों की बिचिंग करने में बिजी जो थीं. उफ़, ये लड़कियां, मैं आराम से अभी इन की बात सुन रही थी.

यह मायरा है, मेरी बेटी और यह इशानी है, विदेश में रहने वाले मेरे बेटे आदिव की गर्लफ्रैंड. दोनों अचानक अच्छी सहेलियां बन गई हैं, मिल कर अपनेअपने बॉयफ्रैंड्स को कोसती हैं. और मैं, मैं आजकल एकदम घनचक्कर बनी रहती हूं. बच्चों की दोस्त जैसे रहती हूं तो वे भी जीभर कर मेरे सामने अपना दिल उड़ेल कर रखते रहते हैं. मायरा का दोस्त है, यतिन. जब भी मिली हूं, अच्छा लगा है, पर मायरा को उस में इतनी कमियां दिखती हैं कि मैं ने एक दिन पूछ ही लिया, ‘फिर उस से मतलब क्यों रखती हो?’

मैडम बोलीं, ‘उसे चांस दे रही हूं, सुधर गया तो ठीक है वरना देखते हैं.’

मुझे इशानी और यतिन अपने बच्चों के लिए पसंद हैं पर इन सब की बातें जब सुनती हूं, सच, सिर घूमघूम जाता है. हर पक्ष मुझ से उम्मीद करता है कि मैं उसी के पक्ष में बोलूं और फिर जिस की साइड ले ली, वह तो खुश, जिस की नहीं ली, वह नाराज़. क्या किया जाए. मेरे पति सुमित अकसर मुझ से हंसते हुए कहते हैं, ‘बरखा, जब भी तुम्हें इन में से कोई अपनी बात बता रहा होता है और तुम समझाने की कोशिश करती हो, तुम्हारी शक्ल देखने वाली होती है. तुम्हें तो इन सब ने एकदम नचा डाला है. अच्छा है, मांओं से ही ये सब शेयर करते हैं, अपने बस का तो है नहीं कि सब की कहानी सुनी जाए.’

मैं कहती हूं, ‘वे सब तुम्हें नहीं बताते पर तुम मुझ से तो सब सुनते ही हो. रहने दो, तुम्हें मजा आता है सब सुन कर, जानती हूं.”

अचानक मायरा रूम से बाहर आई तो मुझे देख कर चौंक पड़ी, “मौम, आप कब आईं?”

“जब तुम लोग बेचारे लड़कों को आशीर्वाद दे रही थीं,” कहतीकहती मैं हंस पड़ी.

इशानी तो अभी थोड़ा संकोच करती है, मायरा ने कहा, “ये लड़के बहुत बेकार हैं, मौम. आप का लाड़ला जब अपना खाना, कपड़ा संभाल रहा होता है तब इशानी को यूज़ करता है, काम ख़त्म होते ही दोस्तों के साथ गेम खेलता है.”

ऐसे टाइम मुझे सचमुच फूंकफूंक कर कदम रखना होता है. मैं ने कहा, “वहां वह औफिस जाता है, आ कर अपने सारे काम खुद करता है, उसे कहां कोई हैल्प है. तुम लोगों को यहां सब कियाकराया मिलता है. वह अपने काम करता हुआ बात कर लेता है, अच्छा ही है न.”

इशानी और मायरा ने एकदूसरे को देखा. मायरा ने अच्छी दोस्त की भूमिका निभाते हुए कहा, “इशानी, तेरा गुस्सा जायज है, अब की बार तू इस आदिव को कह देना कि बातें करता हुआ न खाना बनाए, न कपड़े प्रैस करे. तुझे फुल अटेंशन दे कर बातें करे. ये लड़के कितना तेज़ होते हैं.”

मुझे इस फ़ालतू गुस्से पर हंसी आ गई, “कभी तो तुम कहती हो इन लड़कों के पास अक्ल नहीं है, कभी कहती हो, तेज़ होते हैं, पहले एक राय बना लो.”

“मौम, आप रहने दो. मुझे पता है, आदिव दूर रहता है, इसीलिए आप को उस पर लाड़ आता रहता है.”

मैं ने बात बदली, “अच्छा, यतिन के क्या हाल हैं?”

इस बार इशानी की मीठी सी आवाज़ आई, “आंटी, यतिन लड़कियों की ड्राइविंग का बहुत मजाक उड़ाता है, यह बात हमें पसंद नहीं. एक बार मायरा ने कार चलाते हुए गलती से सिग्नल तोड़ दिया था, इस बात पर अभी तक हंसता है. गलती किस से नहीं होती.”

“वहीं, एक बार जब वह कार ड्राइव कर रहा था, आगे वाली कार एक लड़की चला रही थी, “आदिव ने मायरा को चिढ़ाने के लिए, बस, इतना कहा था, ‘आज हम सब ठीक से घर पहुंच जाएं तो बड़ी बात है’ तो पूरे रास्ते मायरा इस बात पर मुझ से नाराज़ रही थी कि आदिव के इस मजाक पर मैं हंसी कैसे.”

और एक दिन फिर आदिव वीडियोकौल पर था, उस का उतरा चेहरा देख मैं ने पूछा, “क्या हुआ?”

“अरे, मौम, ये लड़कियां कैसी होती हैं, ये कौन से प्लैनेट से आती हैं?”

मैं ने घूरा, “अच्छा?”

“अरे, आप को नहीं कह रहा हूं कुछ, आप तो मां हैं.”

“फिर भी, हूं तो एक औरत ही न?”

“अरे नहीं, मां अलग कैटेगरी में आती हैं, मौम. यह इशानी की बच्ची, कितनी लड़ाकी है. पता है आप को, हर समय शिकायतें. मौम, इन लड़कियों को कोई काम नहीं है क्या. बस, वह यही चाहती है कि सारा दिन उसे मैसेज करता रहूं, फोन करता रहूं, जहां मैसेज का रिप्लाई लेट हुआ, मैसेज आता है, ‘औनलाइन तो दिख रहे हो, फिर क्या परेशानी है रिप्लाई करने में.’ इतने टौन्ट!”

“आजकल इशानी और मायरा की बहुत जमती है, पता है?” मैं ने उसे घर का भेद दिया.

“बस, फिर तो दोनों लड़कों की कमियां बताती रहती होंगी, मौम. आप उन दोनों की बात ज़्यादा मत सुना करो. ये मायरा भी, है तो एक लड़की ही न, बहन है तो क्या हुआ, इतनी फेमिनिस्ट बनती है. हुंह, कोई कामधाम नहीं.”

“नहीं, दोनों औफिस तो जाती ही हैं, कभी वर्क फ्रौम होम चलता है.”

“पर इन दोनों को घर के काम तो नहीं करने पड़ते न. मैं तो यहां सब अपनेआप करता हूं. अब आ रही है न बाहर आगे पढ़ने, देखूंगा, कितना टाइम रहेगा इशानी मैडम के पास. कितने मैसेज करेगी दिनभर, कामचोर को जब अपने काम करने पड़ेंगे तो समझेगी मेरा रूटीन. मौम, पता है, क्या कह रही थी, ‘लड़कियों से इतनी परेशानी है तो गे क्यों नहीं हो जाते?’”

मैं ज़ोर से हंसी तो उसे भी हंसी आ गई. हम दोनों अब इशानी और मायरा के कमैंट्स पर हंसते रहे. आदिव के बचपन का दोस्त है, जीत. वह कभीकभी मिलने आ जाता है. एक दिन आया, तो कहने लगा, “रिद्धि को जानती हैं न आप?’’ मुझे पता है रिद्धि उस की सालों से गर्लफ्रैंड है.

“हां, क्या हुआ?”

“अरे, होना क्या है, आंटी, दिमाग खराब करती है.”

मैं ने सोचा, इशानी, मायरा और आदिव ही नहीं, यह भी भरा बैठा है किसी बात पर. “क्या हुआ?”

“उस के घर गया था, उस के मम्मीपापा से मिला, बाद में कह रही है, ‘तुम मेरी मम्मी से उतना खुल कर नहीं मिले जैसे तुम्हें मिलना चाहिए था. उन्हें तुम से बेटे जैसी फीलिंग नहीं आई.’ मैं ने कह दिया, ‘जब मैं उन का बेटा हूं ही नहीं, तो यह फीलिंग न भी आए तो भी चलेगा. दामाद ही समझ लें मुझे, बहुत है.’ बस आंटी, इतनी सी बात पर वह बोली, ‘तुम कितना रूड बिहेव कर रहे हो?’ आंटी, ये लड़कियां ऐसी बातें क्यों करती हैं?”

मैं ने प्यार से समझाया, “ये सब बातें तो चलती रहती हैं. इन्हें हलके में ही लो.”

उसे हंसी आ गई, “आंटी, उस की बातों को हलके में ही तो लेता हूं, तभी सालों से झेल पा रहा हूं.”

अपने मन की भड़ास निकाल कर थोड़ी देर बाद वह चला गया था. मैं ने मायरा को बताया कि जीत आया था, सुनते ही बोली, “हां, रिद्धि से बात हुई, उस ने बताया कि वह उस की मम्मी से काफी रूडली बात कर के आया है. सारे के सारे लड़के, बस, दूसरों का दिमाग खराब करते हैं.”

मेरे मुंह से निकल गया, “तुम लोग इन लड़कों को छोड़ क्यों नहीं देतीं?”

“इन्हें हम ही झेल सकती हैं, इन्हें कोई नहीं पूछेगा,” शान से कहती मायरा रूम से निकल गई.

वह तो चली गई, मैं बैठी रह गई, सोच रही हूं कि इन का क्या होगा. मुझ से हर युवामन अपने मन की भड़ास निकाल कर चला जाता है और यह उम्मीद करता है कि मेरी गरदन उस की बात पर सिर्फ हां में ही हिले, दिमाग चकराने लगता है. और ये सब आपस में प्यार करते हैं, एकदूसरे से खूब जुड़े हैं, शिकायतें हैं, पर साथ भी चाहिए. दिल से एक आवाज़ आती है- यही तो लाइफ है. और मुझे अभी क्या, शायद हमेशा ही इन सब के बीच में घनचक्कर ही बन कर रहना है. बस, सुनती हूं, मुसकराती हूं और हां में सिर हिलाती हूं. Hindi Love Stories

Family Story : जिंदगी एक पहेली – क्या वाकई में उमा आतंकवादी थी

Family Story : कालिज का वार्षिकोत्सव था. छात्रों की गहमागहमी के बीच प्राचार्य शीला वर्मा व्यस्त थीं. तभी एक महिला अपने 8 साल के बच्चे के साथ वहां पहुंची और प्राचार्य का अभिवादन कर बोली, ‘‘मैम, मैं उमा हूं.’’ प्राचार्य शीला ने उसे गौर से देखा तो देखती रह गईं. उन्हें अपनी आंखों पर सहज भरोसा नहीं हो रहा था. उन की आंखों के सामने जो उमा खड़ी थी वह संपन्नता की प्रतिमूर्ति थी जबकि उन्होेंने जिस उमा को देखा था वह दीनहीन दुर्बल काया थी.

प्राचार्य को समझते देर न लगी कि संभ्रांत महिला के रूप में जो उमा खड़ी है वह कामयाबी के शिखर पर है. इसीलिए अपनी पूर्व छात्रा को मेहमानों की पंक्ति में बैठाते हुए वह बोलीं कि उमा, तुम कहीं जाना नहीं. इस कार्यक्रम के बाद मैं फुरसत में तुम से बात करूंगी. वार्षिकोत्सव के अवसर पर कालिज की छात्राओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो गया था. प्राचार्य शीला वर्मा अपनी कुरसी पर बैठी उमा के बारे में सोचने लगीं. 8 साल पहले की सारी घटनाएं उन की आंखों में चलचित्र की तरह घूमने लगीं.

प्राचार्य शीला सामने खड़ी युवती को चिंता भरी निगाहों से देख रही थीं. तकनीकी कालिज में दाखिला लेने आई उमा बदहवास सी खड़ी थी. बिखरे बाल, सूनी आंखें जैसे दया की याचना कर रही थीं. उमा शीला के निर्णय की प्रतीक्षा में खड़ी थी. ‘कालिज में सुबह 9 से शाम 4 बजे तक रहना होगा. छात्रों की उपस्थिति पर यहां काफी ध्यान रखा जाता है. महीने भर के बच्चे की देखभाल करते हुए पढ़ाई करना क्या संभव होगा?’ प्राचार्य ने शंका जाहिर की.

‘मैं किसी भी तरह समय के साथ तालमेल कर लूंगी. कृपया मुझे प्रवेश दें,’ उमा की आवाज कांप रही थी. ‘तुम अगले साल दाखिला ले सकती हो. तब तक बच्चा भी कुछ बड़ा हो जाएगा और तुम्हारी सेहत भी सुधर जाएगी.’

‘मैडम, मुझे यह प्रशिक्षण पूरा कर के नौकरी में लगना है. यदि मुझे दाखिला नहीं मिला तो मैं कहीं की नहीं रहूंगी.’ प्राचार्य शीला ने उमा की ओर गंभीरता से देखते हुए उसे जाने का संकेत किया. उमा के जाने के बाद कमरे में सन्नाटा छा गया. प्रवेश समिति के अन्य सदस्यों के साथ विचारविमर्श करने के बाद उमा को कालिज में प्रवेश देने का निर्णय लिया गया था.

उमा कालिज में सब से पहले पहुंच जाती थी. कक्षा में प्रश्नों का जवाब बड़ी फुर्ती से देती थी. साथ में पढ़ने वाली लड़कियों के साथ बहुत कम बोलती, क्योंकि वह हमेशा अपने में ही खोई रहती थी. कई बार तो छोटीछोटी बातों पर साथियों से उलझ जाती थी. प्राचार्य शीला वर्मा को उमा के कटु व्यवहार की खबर जबतब मिलती रहती थी. एक दिन दोपहर को शीला के कमरे में खुफिया पुलिस अफसर करियप्पन आ धमके. शहर के मशहूर महिला तकनीकी कालिज में पुलिस अफसर का आना लड़कियों व कालिज स्टाफ के बीच घबराहट पैदा करने वाला था. करियप्पन उमा से पूछताछ करना चाहते थे.

प्राचार्य ने उमा के सारे रेकार्ड पेश करवाए तो करियप्पन ने दबे स्वर में अपने आने का कारण जाहिर किया कि उमा का श्रीलंका के आतंकवादी संगठन से संपर्क होने की खबर कई बार थाने में आई है. खबर देने वाला हमेशा अपना नाम और पता फर्जी देता है. कई बार शिकायती पत्र आने के कारण खुफिया विभाग को खोजखबर लेने का आदेश दिया गया है.

शीला असमंजस में पड़ गईं. पुलिस केवल शक के आधार पर जांच के लिए आई है. उमा को अचानक पुलिस अफसर के सामने खड़ा करने पर न जाने वह कैसा व्यवहार करेगी. वैसे भी उस की दिमागी हालत ठीक नहीं है. यदि वह आवेग में चीखनेचिल्लाने लगी तो मामला चारों ओर फैल जाएगा और कालिज की बदनामी होगी. काफी सोचविचार के बाद वह बोली थीं, ‘आफिसर, मैं उमा से बातचीत कर के कुछ जानकारी लेती हूं. उस के बाद उमा से आप बातचीत करें. अचानक पुलिस जांच की बात सुन कर हो सकता है वह कुछ खतरनाक निर्णय ले बैठे. उमा काफी कमजोर है और तनावग्रस्त रहती है. आप 3-4 दिन का समय दीजिए.’

‘ठीक है, पर अब आप को उस की निगरानी भी करनी है, क्योंकि कालिज की सुरक्षा की जिम्मेदारी हम पुलिस वालों पर ही है,’ पुलिस अफसर करियप्पन ने उठते हुए कहा. अगले दिन प्राचार्य ने उमा को अपने कमरे में बुलवाया. कालिज की छुट्टी के बाद उमा उन के कमरे में आई. उमा को देखते ही उन्हें इंटरव्यू के दिन का दृश्य याद आया. उमा उस वक्त भी सामान्य नहीं लग रही थी. उस के चेहरे पर गहरी वेदना साफ झलक रही थी, पर उस के आतंकवादी होने की बात सचमुच दिल को दहलाने वाली थी. क्या सचमुच उमा किसी षड्यंत्र में उलझी हुई है? क्या वह किसी आतंकवादी घटना को अंजाम देने के लिए ही यहां छात्रा बन कर आई है? इस नाजुक मामले को सावधानी से सुलझाना होगा.

‘मैडम, आप ने मुझे मिलने को कहा था?’ उमा परेशान सी खड़ी थी. ‘आप कहां रहती हैं? आप के परिवार में कौनकौन हैं?’ प्राचार्य ने पूछा.

‘जी, मैं इस समय एक महिला होस्टल में रहती हूं,’ उमा के होंठ कांप रहे थे. ‘उमा, तुम ने कालिज में प्रवेश के समय अपने फार्म पर रेडहिल्स एरिया में रहने की बात दर्ज की है. अब तुम तामवरम स्थित होस्टल में रहने की बात कह रही हो. पता बदलने की सूचना कालिज को क्यों नहीं दी?’ प्राचार्य का चेहरा तमतमाने लगा.

‘जी मैम, सबकुछ काफी जल्दी में करना पड़ा. इस कारण होस्टल का पता स्कूल कार्यालय को बता नहीं पाई. मैं कल नया पता आफिस में दे दूंगी,’ उमा ने कहा. ‘आप अपना घर छोड़ कर होस्टल में क्यों रहने लगी हैं? आप के छोटे बच्चे की देखभाल कौन करता है?’ प्राचार्य ने पूछा.

‘जी मैम…यह सब मेरा निजी मामला है. मैं इस बारे में बात नहीं करना चाहती,’ उमा ने दृढ़ स्वर में कहा. ‘देखो उमा, तुम को ढूंढ़ते हुए खुफिया पुलिस के अफसर कालिज आए थे. पुलिस थाने में कई दिनों से कोई फोन कर कह रहा था कि तुम श्रीलंका के आतंकवादी संगठन से जुड़ी हुई हो. मैं ने पुलिस अफसर से कुछ समय मांग लिया है ताकि तुम से खुद पहले बात कर सकूं. तुम इस मामले में मेरा सहयोग करोगी तो तुम्हारे लिए अच्छा होगा,’ प्राचार्य कड़ी आवाज में बोलीं.

‘क्या मैं आतंकवादी हूं?’ उमा तमतमा कर बोली, ‘सारा आतंक मुझ पर करने के बाद अब वे लोग यह नया नाटक खेल रहे हैं…नीच कहीं के…आने दो पुलिस को…उन की सारी करतूत खोल कर रख दूंगी.’ ‘उमा…चिल्लाना बंद करो,’ प्राचार्य संयत स्वर में बोलीं, ‘पुलिस से निबटना इतना आसान नहीं है. आतंकवादियों से संबंध होने के शक में तुम्हें कैद करना बहुत आसान है. फिर बरसों कोर्टकचहरी में फंसना होगा. तुम्हारे जीवन के मूल्यवान दिन यों ही बरबाद हो जाएंगे. अपनी समस्या को बिना दुरावछिपाव के बताने पर मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं,’ कहते हुए उन्होंने उमा को कुरसी पर बैठने का इशारा किया.

उमा सिर झुकाए कुरसी पर कुछ क्षण मौन बैठी रही. फिर अपनी कहानी बताते हुए बोली कि मेरे पिता सदाशिवन का कोयंबटूर में कपड़े का काम था. मेरी 2 छोटी बहनें भी थीं. मां सरकारी स्कूल में अध्यापिका थीं. बचपन में मुझे कभी किसी चीज की कमी नहीं महसूस हुई.

मेरे पिताजी खानेपीने के बडे़ शौकीन थे. बच्चों को भी बढि़या पकवान खिलाते थे और सैरसपाटे के लिए अपने साथ ले जाते थे. मैं 8वीं कक्षा में पढ़ रही थी, तब मुझे मातापिता के बीच के तनाव का कुछ एहसास हुआ. पता चला कि मेरे पिता शराब पीते हैं. वह रात को देर से घर आते और फिर कमरे में मां से लड़ते रहते थे. मां का कड़ा अनुशासन मुझे अच्छा नहीं लगता था. मैं अपने पिता की ही बात मानती थी और उन के प्रति ही श्रद्धा रखती थी. मैं पढ़ने में काफी तेज थी और उस साल बी.एससी. की परीक्षा दी थी.

मैं ने जिस साल बी.एससी. की परीक्षा दी थी उसी साल अगस्त में एक दिन पिताजी अपने मित्र गोपीनाथ को घर ले कर आए और मुझे बुला कर गोपीनाथ को प्रणाम करने को कहा. पिताजी ने मेरे सामने ही मेरी पढ़ाई, संगीत और खाना बनाने की गोपीनाथ से काफी तारीफ की और बोले कि जितनी जल्दी हो शादी की तैयारी कर देंगे. गोपीनाथ के जाने के बाद मेरे मातापिता में मेरे विवाह को ले कर झड़प शुरू हो गई. मां कह रही थीं कि गोपीनाथ का बेटा रमेश उमा के लायक नहीं है. उस ने पढ़ाई भी ठीक तरह से नहीं की है और कोई ढंग का कामधंधा भी नहीं करता है.

पिताजी चिल्लाने लगे कि आज के समय में इस से ज्यादा अच्छा रिश्ता भला हमें और कहां मिलेगा? सबकुछ जानने के बाद भी तुम तकरार क्यों कर रही हो? पिता के प्रति पूरी श्रद्धा होने के कारण रमेश को देखे बिना ही मैं ने शादी के लिए अपनी सहमति दे दी थी. मां का विरोध टिक नहीं सका. रमेश के साथ मेरी शादी हो गई और हम हनीमून के लिए ऊटी गए थे. ऊटी का मौसम सुहावना था. वहां रंगबिरंगे फूलों से भरा अति विशाल बगीचा, गहरे ठंडे पानी से भरी झील में नौका विहार की सुविधा, चटपटी खाने की चीजों आदि के बीच हम कहीं खो से गए थे.

रात को कमरे में शराब की बोतल खोल कर रमेश जो बैठा तो सारी रात पीता ही रहा. दिन भर जिस रमेश के साथ जिंदगी को बेहद हसीन मान बैठी थी, वह रात में वहशी दरिंदा बन गया था. सुबह होने तक शरीर और मन दोनों बुरी तरह आहत हो चुके थे. होटल का बिल भरने के लिए भी रमेश के पास पैसा नहीं था तो मैं ने विदाई के समय मां के दिए हुए रुपयों से होटल का बिल भरा था.

ससुराल आते ही अपनी सास से पति की शिकायत करने लगी तो उन का तेवर बदल गया और झिड़की लगाते हुए बोलीं कि क्या तुम्हारे पिता शराब नहीं पीते हैं? तुम्हारी मां कैसे चुपचाप गृहस्थी चला रही हैं? जाओ, अपना काम करो. मेरे हाथ की मेहंदी भी नहीं छूटी थी कि घर की नौकरानी की छुट्टी कर दी गई. रसोई का पूरा काम और इसी के साथ सफाई, बर्तन मलना, कपड़ा धोना, बगीचे की देखरेख करना सबकुछ मेरे पल्ले आ पड़ा. बाद में मुझे पता चला कि मेरा पति रमेश न पिता के व्यापार में हाथ बंटाता है और न ही कहीं नौकरी करता है. दिन भर बिगड़े दोस्तों के साथ ताश खेलना, शराब पीना, फालतू आवारागर्दी करना ही उस का काम था.

इस नारकीय जीवन में मैं शादी के दूसरे ही महीने गर्भवती हो गई. शरीर की कमजोरी बढ़ गई तो मायके जाने की इच्छा जाहिर की. बहुत मुश्किल से 4 दिन मायके में रहने की अनुमति मिली. मायके पहुंचते ही मैं मां पर बिफर पड़ी. मां चुपचाप सबकुछ सुनती रहीं. अंत में उन्होंने वह सच बताया जिस से मैं पूरी तरह अनजान थी. मां ने बताया कि तुम्हारे पिता ने व्यापार में घाटा होने पर रमेश के पिता से 20 लाख का कर्ज लिया था जिसे वह दे नहीं पा रहे थे. जब स्थिति बिगड़ आई तब रमेश के पिता ने अपने आवारा लड़के की शादी तुम्हारे साथ करने की शर्त रखी. यदि शादी नहीं करते तो तुम्हारे पिता को जेल जाना पड़ता. वास्तव में एक तरह से तुम्हारे पिता ने उस राक्षस के हाथ तुम्हें बेच दिया.

कर्ज लेने के कागजात शादी के बाद वापस करने का वादा रमेश के पिता ने किया था, पर आज तक उन्हें वापस नहीं किया है. बताओ, मैं क्या कर सकती हूं? 2 लड़कियां और घर में बैठी हैं. उन का भविष्य भी तो मुझे देखना है. बेटी, तुम घर की इज्जत बचाए रखना.

‘मां, मैं अब न तो ससुराल जाऊंगी और न ही वह सब जुल्म सहूंगी,’ मेरे विश्वास को देख कर मां बोलीं कि बेटी तुम गर्भवती हो. अपने बच्चे के बारे में भी तो तुम्हें सोचना होगा. तुम्हारे पिताजी रमेश से किसी बुरी लत में कम नहीं हैं पर मैं केवल तुम बच्चों के कारण ही तो उन के साथ गृहस्थी चला रही हूं.’ मैं हारे हुए सिपाही की तरह ससुराल लौट गई थी. यातना भरे दिन, खूंखार रातें किसी तरह बीत रही थीं. नीरज का जन्म हुआ. उस के बाद पति से लड़झगड़ कर ही मैं टे्रनिंग कालिज में दाखिला ले पाई थी. मुझे घर के कामों से आजाद हो कर कालिज जाते देख मेरी सास चिढ़ गईं. छोटे बच्चे की देखभाल करना, अपने आवारा लड़के को असमय खिलाना- पिलाना सास को भारी पड़ रहा था.

मुझे कालिज से छुड़वा कर घर में बैठाने के लिए सास ने जादूटोने का सहारा लिया. घर में तांत्रिक आनेजाने लगे. एक दिन मेरे खाने में कुछ जड़ीबूटी मिला कर दिया गया तो मैं आधी बेहोशी की हालत में पहुंच गई, फिर मुझे घसीट कर उस तांत्रिक के सामने बैठाया गया और भूत उतारने के लिए मुझे मारापीटा गया. तब मैं रोती हुई, दर्द से चीखती हुई निढाल हो गई थी. होश आने पर मुझे अपनी असहाय स्थिति का ज्ञान हुआ. मायके मैं जा नहीं सकती थी. अपनी टे्रनिंग मुझे हर कीमत पर पूरी करनी है. काफी सोचविचार कर मैं गिल्ड आफ सर्विस के कार्यालय में गई तो सोशल वेलफेयर बोर्ड के होस्टल में बहुत मुश्किल से जगह मिली. अपने शरीर पर पड़े गहनों को बेच कर ही होस्टल में बच्चे के साथ रह कर अपनी पढ़ाई कर रही हूं. होस्टल की वार्डन रमेश को मुझ से मिलने नहीं देती हैं.

मैडम, मेरे पति ने मुझे फोन पर कई बार धमकी दी है कि मैं वापस घर चली आऊं. यदि मैं वापस नहीं आई तो वह मुझे बरबाद कर के ही छोड़ेंगे. यह उन्हीं की चाल होगी. आतंकवादी बता कर वह मुझे जेल भेजना चाहते हैं. मेरे बच्चे को मुझ से अलग करना चाहते हैं. प्लीज मैम, मेरी मदद कीजिए. प्राचार्य ने उमा को शांत करा कर भेज दिया. खुफिया पुलिस अधिकारी से बातचीत की. हफ्ते भर की जांच के बाद पुलिस ने उमा को निर्दोष पाया. उमा ने अपनी टे्रनिंग पूरी कर ली.

पुरस्कार वितरण की घोषणा के साथ प्राचार्य शीला वर्मा ने आंखें खोलीं तो सामने की कतार में उमा अपने बच्चे के साथ बैठी थी. उन्होंने उमा को मंच पर बुला कर उसे सम्मानित करने के बाद धीरे से कहा, ‘तुम जाना नहीं. तुम से बातें करनी हैं.’ प्राचार्य के ड्राइंगरूम में बैठी उमा अपने बारे में बता रही थी.

‘‘मैडम, यहां से टे्रनिंग करने के बाद मुझे दुबई के एक स्कूल में पढ़ाने का आफर मिला तो मैं अपने बच्चे को ले कर वहां चली गई. उस के बाद पढ़ाने की नौकरी छोड़ कर मैं एक कंपनी में लग गई और अब एक ऊंचे ओहदे पर हूं. कुछ समय के बाद पति को भी दुबई बुला लिया और उन का उपचार करा कर नशे की लत छुड़वा दी. वह भी अब काम कर रहे हैं. ‘‘मैं आप से मिल कर आशीर्वाद लेने आई हूं. यदि आप मेरी मदद नहीं करतीं तो शायद मैं पुलिस के चंगुल में फंस कर जेल चली गई होती. मैं आप का एहसान कभी नहीं भूल सकती,’’ उमा गद्गद हो कर कह रही थी फिर उस ने बैग से एक उपहार निकाल कर प्राचार्य को दिया.

‘‘उमा, जीवन की जंग को जीतना आसान नहीं है. जीवन एक अनबूझ पहेली है. हम आत्मविश्वास के बल पर ही सफलता पा सकते हैं और यह हौसला अपने में बनाए रखना.’’ Family Story

Modern Mother : मां, डाक्टर, न्यायालय और विकृत गर्भ “ममता और ममता”

Modern Mother : अस्पताल में, चाय पर डाक्टरों में ममता पर चर्चा चल रही थी. मुंबई की आधुनिक मां की ममता को एक विकृत बच्चे को जन्म देना गवारा न था. जांच करवाई थी, बच्चे में कुछ विकृति थी. डाक्टर ने गर्भपात से मना कर दिया. कारण, गर्भ 20 सप्ताह पार कर चुका था, मान्य कानूनी सीमा पार.

महिला ने उच्च न्यायालय में गुहार लगाई कि उसे एक विकृत बच्चे को जन्म देने और उस की परवरिश करने को बाध्य नहीं किया जा सकता, सो, गर्भ नष्ट करवाने की अनुमति दी जाए. मीडिया और महिला संगठनों की सहानभूति जागरूक मां के लिए थी.

न्यायालय के समक्ष सीमा से इतर प्रश्न था कि क्या विकृति ऐसी है कि जन्मा बच्चा सामान्य जीवन नहीं जी पाएगा और जीवित रहने के लिए भी उसे सदा किसी पर निर्भर रहना पड़ेगा? सो, वरिष्ठ चिकित्सकों से परीक्षण करवाया गया. बच्चे को हार्ट ब्लौक नामक हृदय की ऐसी विकृति थी जिस से हृदय गति सामान्य नहीं थी और जन्मोपरांत उसे पेसमेकर लगा कर ठीक करना होगा. उस के बाद बच्चा सामान्य जीवन जी सकेगा, पेसमेकर के साथ.

न्यायालय ने अर्जी नामंजूर कर दी. प्रश्न उठाया गया कि उस चिकित्सा का भार कौन वहन करेगा? मांबाप पर यह अनुचित भार था. न्यायालय से रिलीफ नहीं मिला. प्रकृति ने खुद मदद की, बच्चे की अस्पताल में ही गर्भ में मृत्यु हो गई.

दूसरी ओर उस गरीब मां की ममता जिस की प्यारी बच्ची के जन्म के समय से ही पेशाब की थैली बाहर खुली थी, पेशाब सतत बाहर बहता रहता. सरकारी अस्पताल के डाक्टर ने कहा, ‘बच्ची थोड़ी बड़ी हो जाए तभी कुछ करना संभव होगा.’

मां क्या करे, कैसे पाले इस बच्ची को? बहता पेशाब, गंध, पट्टी, रूई बांध कर रखा. बड़ी हुई. प्यारी, सुंदर, चंचल. बड़ा औपरेशन बताया गया, पर खर्चे की सामर्थ्य नहीं. स्कूल जाने लगी. पढऩे में अच्छी. शरीर से उठती हलकी सी गंध पर गांव के स्कूल में किसी ने ध्यान नहीं दिया. जब मासिकधर्म शुरू हुआ तो मांबाप को चिंता हुई. रुपयों का प्रबंध किया. औपरेशन के लिए सरकारी अस्पताल में ही आए. औपरेशन हुआ, गुरदे से पेशाब लाने वाली दोनों नलियों को थैली से काट कर बड़ी आंत में खोल दिया गया. पेशाब की थैली को हटा कर छेद बमुश्किल बंद कर दिया.

सरकारी अस्पताल के डाक्टरों के लिए इस तरह के मामले चैलेंज होते हैं. अब किशोरी नौर्मल थी. बस, हर कुछ घंटे बाद उसे टट्टी के रास्ते पेशाब करना होता था.

मां की ममता पूछने आई, ‘क्या विवाह कर दें?’ ‘हां, लेकिन लडक़े को सबकुछ बताने के बाद,’ डाक्टरों ने कहा. एक पांव से पोलियोग्रस्त शिक्षित युवक को ले कर उसी डाक्टर के पास आए. सब बताया, समझाया. विवाह हुआ. आशंकाभरे गर्भ, प्रसव. दो सुंदर स्वस्थ बच्चियों की मां बनी.

गर्व के साथ 6 और 4 साल की बच्चियों को ले कर दोनों उसी चिकित्सक के पास आए थे मां के बारबार होते संक्रमण से दोनों गुरदे क्षतिग्रस्त हो चुके थे उन्हीं के लिए परामर्श करने. न उस लडक़ी को अफसोस था, न पति को. बूढ़ी मां भी साथ थी, खुश थी कि बेटी नहीं रही तो क्या, नातिनें तो होंगी.

Social Media : रैंडियर न बन जाएं सोशल मीडिया के इंफ्लुएंसर “ज्ञान नहीं, अज्ञान फैलाया जा रहा”

Social Media : आज सोशल मीडिया बहुत बड़ी जनसंख्या के लिए अकेला मीडिया बन गया है पर यह अब ओवर किल यानी जरूरत से ज्यादा पोस्ट करने वालों का शिकार होने वाला है. सोशल मीडिया पर हजारों इंफ्लुएंसर्स आज ज्ञान बांट रहे हैं जो सही हो या गलत, बहरहाल वह करोड़ों नहीं बल्कि अरबों लिए अकेला स्रोत है.

सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वालों और उस से ‘ज्ञान’ पाने वालों का हाल सैंट मैथ्यू आइलैंड का हो सकता है. आर्कटिक समुद्र में यह छोटा सा द्वीप 1,000 फुट की ऊंची पहाड़ी पर है. द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका ने वहां एक मिलिट्री पोस्ट बनाई तो सैनिक 29 रैंडियर, हिरण की तरह का जानवर, लेते आए कि कहीं राशन कम हो तो वे उन्हें पका कर खा सकें. युद्ध के बाद उन रैंडियरों को वहीं छोड़ दिया गया.

वर्ष 1963 में रिसर्चर्स की एक टीम गई तो उन्हें 6,000 रैंडियर मिले क्योंकि उन्हें मारने वाला वहां कोई नही था. कुछ साल बाद वे फिर गए तो एक भी रैंडियर नहीं बचा था क्योंकि उन्होंने सारे पेड़पौधे खा डाले थे और भूख से भर गए थे.

सोशल मीडिया इसी मौत मर सकता है कि जरूरत से ज्यादा लोग ‘अज्ञान’ बांट रहे हैं जिस का न विज्ञान से मतलब है, न संज्ञान से. आप भी अगर सोशल मीडिया की लत के शिकार हैं तो संभल जाइए वरना आप की दशा सैंट मैथ्यू आइलैंड के रैंडियर्स सरीखी हो सकती है जब आप की सारी सोच, विवेक, व्यवहार, जानकारी सिर्फ सोशल मीडिया पर होगी और पोस्ट करने वाली सिर्फ सरकार होगी.

Problem Solving : ‘5 क्यों’ और समस्या छूमंतर, कामयाब जिंदगी का फलसफा

Problem Solving : जापान की टोयोटा मोटर कंपनी से एक इंजीनियर ताईची ओहनो ने ‘5 क्यों’ का सिस्टम ईजाद किया था. यह किसी भी समस्या पर लागू किया जा सकता था पर जो उदाहरण ने उस ने अपनी कार कंपनी के लिए दिया था वह इंजन ब्लौक में बोल्ट के सही तरह से न कसे जाने के बारे में था.

1. पूछा गया क्यों : क्योंकि बोल्ट की थ्रैड लाइनें सही नहीं थीं.

2. क्यों : जहां बोल्ट थ्रैड कटते हैं उस का कटिंग टूल सही नहीं था.

3. क्यों : कटिंग टूल्स का बौक्स खाली था.

4. क्यों : बौक्स जिस रैक पर रखा था वह गिर गई थी और बौक्स का सामान बिखर गया था, कुछ सामान मशीनों के नीचे तक चला गया था.

5. क्यों : रैक का एक पैर जंग खा गया था जिस से रैक टेढ़ी हो गई थी और सामान गिर गया.

इस तरह हर समस्या के पीछे जाया जा सकता है और उसे हल किया किया जाता है. ब्रेकअप हो रहा है, तलाक हो रहा है, पेरैंट्स नाराज हैं, टीचर ने मार्क्स नहीं दिए, तो 5-6 बात पूछिए, शायद सही उत्तर मिल जाए. जरूरी हो तो और पूछिए पर पहले ‘क्यों’ के जवाब पर चुप न रहें. यह जीवन का फलसफा है. सफलता के गुणों में से एक है.

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