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Family Story In Hindi : जो बोया सो काटा – अनुज को क्यों अकेलापन महसूस हो रहा था ?

Family Story In Hindi : बच्चों के साथ रहने के मामले में मनीषा व निरंजन के सुनेसुनाए अनुभव अच्छे नहीं थे. अपने दोस्तों व सगेसंबंधियों के कई अनुभवों से वे अवगत थे कि बच्चों के पास जा कर जिंदगी कितनी बेगानी हो जाती है, लेकिन अब मजबूरी थी कि उन्हें बच्चों के पास जाना ही था क्योंकि वे शारीरिक व मानसिक रूप से लाचार हो गए थे.

उम्र अधिक हो जाने से शरीर कमजोर हो गया था. निरंजन के लिए अब बाहर के छोटेछोटे काम निबटाना भी भारी पड़ रहा था. कार चलाने में दिक्कत होती थी. मनीषा वैसे तो घर का काम कर लेती थीं लेकिन अकेले ही पूरी जिम्मेदारी संभालना मुश्किल हो जाता था. नौकरचाकरों का कोई भरोसा नहीं, काम वाली थी, कभी आई कभी नहीं.

छुट्टियां न मिलने की वजह से बेटा अनुज भी कम ही आ पाता था. इसलिए उन्हें अब मानसिक अकेलापन भी खलने लगा था. अकेले रहने में अपनी बीमारियों से भी निरंजनजी डरते थे.

यही सब सोचतेविचारते अपने अनुभवों से डरतेडराते आखिर उन्होंने भी लड़के के साथ रहने का फैसला ले ही लिया.

इस बारे में उन्होंने पहले बेटे को चिट्ठी लिखना ठीक समझा ताकि बेटे और बहू के मूड का थोड़ाबहुत पहले से ही पता चल जाए.

हफ्ते भर के अंदर ही बेटे का फोन आ गया कि पापा, आज ही आप की चिट्ठी मिली है. आप मेरे पास आना चाह रहे हैं, यह हम सब के लिए बहुत खुशी की बात है. बच्चे और नीता तो इतने खुश हैं कि अभी से आप के आने का इंतजार करने लगे हैं. आप बताइए, कब आ रहे हैं? मैं लेने आ जाऊं या फिर आप खुद ही आ जाएंगे?

फोन पर बेटे की बातें सुन कर निरंजन की आंखें भर आईं. प्रत्युत्तर में बोले, ‘‘हम खुद ही आ जाएंगे, बेटे… परसों सुबह यहां से टैक्सी से चलेंगे और शाम 7 बजे के आसपास वहां पहुंच जाएंगे.’’

‘‘ठीक है, पापा,’’ कह कर बेटे ने फोन रख दिया.

‘‘अनुज हमारे आने की बात सुन कर बहुत खुश है,’’ निरंजन बोले.

‘‘अभी तो खुश है पर पता नहीं हमेशा साथ रहने में कैसा रुख हो,’’ मनीषा अपनी शंका जाहिर करती हुई बोलीं.

‘‘सब अच्छा होगा, मनीषा,’’ निरंजन दिलासा देते हुए बोले.

शाम के 7 बजे जब निरंजन और मनीषा बेटे के घर पर पहुंचे तो बेटेबहू और बच्चे उन के इंतजार में बैठे थे. दरवाजे पर टैक्सी रुकने की आवाज सुन कर चारों घर से बाहर निकल पड़े.

दादाजी…दादाजी कहते हुए दोनों बच्चे पैर छूते हुए उन से चिपक गए. बेटेबहू ने भी पैर छुए. सब ने एकएक सामान उठा लिया. यहां तक कि बच्चों ने भी छोटा सामान उठाया और सब एकसाथ अंदर आ गए.

मन में शंका थी कि थोड़े दिन रहने की बात अलग थी पर हमेशा के लिए रहना…न जाने कैसा हो.

नीता चायनाश्ता बना कर ले आई. सभी बैठ कर गपशप करने लगे.

‘‘मम्मीपापा, आप फ्रेश हो लीजिए,’’ बहू नीता बोली, ‘‘इस कमरे में आप का सामान रख दिया है. आज से यह कमरा आप का है.’’

‘‘यह हमारा कमरा…पर यह तो बच्चों का कमरा है…’’

‘‘बच्चे  छोटे वाले कमरे में शिफ्ट हो गए हैं.’’

‘‘लेकिन तुम ने बच्चों का कमरा क्यों बदला, बहू…उन की पढ़ाईलिखाई डिस्टर्ब होगी. फिर उस छोटे से कमरे में दोनों कैसे रहेंगे?’’

‘‘कैसी बात कर रही हैं, मम्मीजी आप, घर के सब से बड़े क्या सब से छोटे कमरे में रहेंगे. बच्चों की पढ़ाई और सामान वगैरह के लिए अलग कमरा चाहिए…रात में तो दोनों आप के साथ ही घुस कर सोने वाले हैं,’’ नीता हंसते हुए बोली.

मनीषा को सुखद एहसास हुआ. बेटा तो अपना ही है लेकिन बहू के मुंह से ऐसे शब्द सुन कर जैसे दिल की शंकाओं का कठोर दरवाजा थोड़ा सा खुल गया.

सुबह बहुत देर से नींद खुली. निरंजन उठ कर बाथरूम हो आए. अंदर खटरपटर की आवाज सुन कर नीता ने चाय बना दी. उस दिन रविवार था.  बच्चे व अनुज भी घर पर थे.

चाय की टे्र ले कर नीता दरवाजे पर खटखट कर बोली, ‘‘मम्मीजी, चाय.’’

‘‘आजा…आजा बेटी…अंदर आजा,’’ निरंजन बोले.

‘‘नींद ठीक से आई, पापा,’’ नीता चाय की ट्रे मेज पर रखती हुई बोली.

‘‘हां, बेटी, बहुत अच्छी नींद आई. बच्चे और अनुज कहां हैं?’’ मनीषा ने पूछा.

‘‘सब उठ गए हैं. बच्चों ने तो अभी तक दूध भी नहीं पिया है. कह रहे थे कि जब दादाजी उठ जाएंगे तो वे चाय पीएंगे और हम दूध.’’

‘‘तुम ने भी अभी तक चाय नहीं पी,’’ मनीषा ट्रे में चाय के 4 कप देख कर बोलीं.

‘‘मम्मीजी, हम एक बार की चाय तो पी चुके हैं, दूसरी बार की चाय आप के साथ बैठ कर पीएंगे.’’

तभी बच्चे व अनुज कमरे में घुस गए और दादादादी के बीच में बैठ गए.

‘‘दादाजी, पापा कहते हैं कि वह आप से बहुत डरते थे. आप जब आफिस से आते थे तो वह एकदम पढ़ने बैठ जाते थे, सच्ची…’’ पोता बोला.

‘‘पापा यह भी कहते हैं कि वह बचपन में बहुत शैतान थे और दादी को बहुत तंग करते थे. है न दादी?’’ पोती बोली थी.

दोनों बच्चों की बातें सुन कर निरंजन व  मनीषा हंसने लगे.

‘‘सभी बच्चे बचपन में अपनी मम्मी को तंग करते हैं और अपने पापा से डरते हैं,’’ निरंजन बच्चों को प्यार करते हुए बोले.

‘‘हां, और मम्मी कहती हैं कि सभी मम्मीपापा अपने बच्चों को बहुत प्यार करते हैं…जैसे दादादादी मम्मीपापा को प्यार करते हैं और मम्मीपापा हमें.’’

पोती की बात सुन कर मनीषा व निरंजन की नजरें नीता के चेहरे पर उठ गईं. नीता का खुशनुमा चेहरा दिल में उतर गया. दोनों ने मन में सोचा, एक अच्छी मां ही बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकती है.

दोपहर के खाने में नीता ने कमलककड़ी के कोफ्ते और कढ़ी बना रखी थी.

‘‘पापा, आप यह कोफ्ते खाइए. ये बताते हैं कि आप को कमलककड़ी के कोफ्ते बहुत पसंद हैं,’’ नीता कोफ्ते प्लेट में रखती हुई बोली.

‘‘और मम्मी को कढ़ी बहुत पसंद है. है न मम्मी?’’ अनुज बोला, ‘‘याद है मैं कढ़ी और कमलककड़ी के कोफ्ते बिलकुल भी पसंद नहीं करता था. और मेरे कारण आप अपनी पसंद का खाना कभी भी नहीं बनाती थीं. अब आप की पसंद का खाना ही बनेगा और हम भी खाएंगे.’’

बेटा बोला तो मनीषा को अपने भावों पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो गया. आंखों के कोर भीग गए.

‘‘नहीं बेटा, खाना तो बच्चों की पसंद का ही बनता है, जो बच्चों को पसंद हो वही बनाया करो.’’

रात को पोते व पोती में ‘बीच में कौन सोएगा’ इस को ले कर होड़ हो गई. आखिर दोनों बीच में सो गए.

थोड़ी देर बाद नीता आ गई.

‘‘चलो, बच्चो, अपने कमरे में चलो.’’

‘‘नहीं, हम यहीं सोएंगे,’’ दोनों चिल्लाए.

‘‘नहीं, दादादादी को आराम चाहिए, तुम अपने कमरे में सोओ.’’

‘‘रहने दे, बेटी,’’ निरंजन बोले, ‘‘2-4 दिन यहीं सोने दे. जब मन भर जाएगा तो खुद ही अपने कमरे में सोने लगेंगे.’’

दोनों बच्चे उस रात दादादादी से चिपक कर सो गए.

दिन बीतने लगे. नीता हर समय उन की छोटीछोटी बातों का खयाल रखती. बेटा भी आफिस से आ कर उन के पास जरूर बैठता.

एक दिन मनीषा शाम को कमरे से बाहर निकली तो नीता फोन पर कह रही थी, ‘‘मैं नहीं आ सकती… मम्मीपापा आए हुए हैं. यदि मैं आ गई तो वे दोनों अकेले रह जाएंगे. उन को खराब लगेगा,’’ कह कर उस ने बात खत्म कर दी.

‘‘कहां जाने की बात हो रही थी, बेटी?’’

‘‘कुछ नहीं, मम्मीजी, ऐसे ही, मेरी सहेली बुला रही थी कि बहुत दिनों से नहीं आई.’’

‘‘तो क्यों नहीं जा रही हो. हम अकेले कहां हैं, और फिर थोड़ी देर अकेले भी रहना पड़े तो क्या हो गया. देखो बेटी, तुम अगर नहीं जाओगी तो मैं बुरा मान जाऊंगी.’’

नीता कुछ न बोली और दुविधा में खड़ी रही.

मनीषा नीता के कंधे पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘बेटी, मम्मीपापा आ गए हैं इसलिए अगर तुम ने अपनी दिनचर्या में बंधन लगाए तो हम यहां कैसे रह पाएंगे. यह अब कोई 2-4 दिन की बात थोड़े न है, अब तो हम यहीं हैं.’’

‘‘कैसी बात कर रही हैं, मम्मीजी. आप का रहना हमारे सिरआंखों पर. मैं बंधन थोड़े न लगा रही हूं… और थोड़ाबहुत बंधन रहे भी तो क्या, बच्चों के कारण मांबाप बंधन में नहीं रहते हैं. फिर बच्चों को भी मांबाप के कारण बंधना पड़े तो कौन सी बड़ी बात है.’’

नीता की बात सुन कर मनीषा ने चाहा कि उस को गले लगा कर खूब प्यार करें.

मनीषा ने नीता को जबरन भेज दिया. धीरेधीरे मनीषा की कोशिश से नीता भी अपनी स्वाभाविक दिनचर्या में रहने लगी. उस ने 1-2 किटी भी डाली हुई थीं तो मनीषा ने उसे वहां भी जबरदस्ती भेजा.

उस की सहेलियां जब घर आतीं तो मनीषा चाय बना देतीं. नाश्ते की प्लेट सजा देतीं. नीता के मना करने पर प्यार से कहतीं, ‘‘तुम जो हमारे लिए इतना करती हो, थोड़ा सा मैं ने भी कर दिया तो कौन सी बड़ी बात कर दी.’’

अनुज व नीता को अब कई बातों की सुविधा हो गई थी. कहीं जाना होता तो दादादादी के होने से बच्चों की तरफ से दोनों ही निश्ंिचत रहते.

महीना खत्म हुआ. निरंजन को पेंशन मिली. उन्होंने अपना पैसा बहू को देने की पेशकश की तो अनुज व नीता दोनों नाराज हो गए.

‘‘पापा, आप कैसी बातें कर रहे हैं. पैसे दे कर ही रहना है तो आप कहीं भी रह सकते हैं. आप ने हमारे लिए जीवन भर इतना किया, पढ़ायालिखाया और मुझे इस लायक बनाया कि मैं आप की देखभाल कर सकूं,’’ अनुज बोला.

‘‘लेकिन बेटा, मेरे पास हैं इसलिए दे रहा हूं.’’

‘‘नहीं, पापा, पैसा दे कर तो आप मेरा दिल दुखा रहे हैं… जब दादीजी और दादाजी आप के पास रहने आए थे तो उन के पास देने के लिए कुछ भी नहीं था तो क्या आप ने उन की देखभाल नहीं की थी. जितना आप से  बन सकता था आप ने उन के लिए किया और आप के पास पैसा है तो आप हम से हमारा सेवा करने का अधिकार क्यों छीनना चाहते हैं.’’

निरंजन निरुत्तर हो गए. मनीषा आश्चर्य से अपने उस लापरवाह बेटे को देख रही थीं जो आज इतना समझदार हो गया है.

अनुज ने जब पैसे लेने से साफ मना कर दिया तो निरंजन ने पोते और पोती के नाम से बैंक में खाता खोल दिया और जो भी पेंशन का पैसा मिलता उस में डालते रहते. बेटे ने उन का मान रखा था और वे बेटे का मान रख रहे थे.

एक दिन निरंजन सुबह उठे तो बदन टूट रहा था और कुछ हरारत सी महसूस कर रहे थे. मनीषा ने उन का उतरा चेहरा देखा तो पूछ बैठीं, ‘‘क्या हुआ…तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

‘‘हां, कुछ बुखार सा लग रहा है.’’

‘‘बुखार है,’’ मनीषा घबरा कर माथा छूती हुई बोली,  ‘‘अनुज कोे बुलाती हूं.’’

‘‘नहीं, मनीषा, उसे परेशान मत करो…शाम तक देख लेते हैं…शायद ठीक हो जाए.’’

मनीषा चुप हो गई.

लेकिन शाम होतेहोते बुखार बहुत तेज हो गया. दोपहर के बाद निरंजन लेटे तो उठे ही नहीं. शाम को आफिस से आ कर अनुज पापा के साथ ही चाय पीता था.

निरंजन जब बाहर नहीं आए तो नीता कमरे में चली गई. मनीषा निरंजन का सिर दबा रही थीं.

‘‘पापा को क्या हुआ, मम्मीजी?’’

‘‘तेरे पापा को बुखार है.’’

‘‘बुखार है…’’ कहती हुई नीता ने बहू की सारी औपचारिकताएं त्याग कर निरंजन के माथे पर हाथ रख दिया.

‘‘पापा को तो बहुत तेज बुखार है, तभी पापा आज सुबह से ही सुस्त लग रहे थे. आप ने बताया भी नहीं. मैं अनुज को बुलाती हूं,’’ इतना कह कर नीता अनुज को बुला लाई.

अनुज जल्दी ही आ गया और मम्मीपापा को तकलीफ न बताने के लिए एक प्यार भरी डांट लगाई, फिर डाक्टर को बुलाने चला गया. डाक्टर ने जांच कर के दवाइयां लिख दीं.

‘‘मौसमी बुखार है, 3-4 दिन में ठीक हो जाएंगे,’’ डाक्टर बोला.

बेटाबहू, पोता और पोती सब निरंजन को घेर कर बैठ गए. नीता ने जब पढ़ाई के लिए डांट लगाई तब बच्चे पढ़ने गए.

‘‘खाने में क्या बना दूं?’’ नीता ने पूछा.

निरंजन बोले,’’ तुम जो बना देती हो वही स्वादिष्ठ लगता है.’’

‘‘नहीं, पापा, बुखार में आप का जो खाने का मन है वही बनाऊंगी.’’

‘‘तो फिर थोड़ी सी खिचड़ी बना दो.’’

‘‘थोड़ा सा सूप भी बना देना नीता, पापा को सूप बहुत पसंद है,’’ अनुज बोला.

निरंजन को अटपटा लग रहा था कि अनुज उन के लिए इतना कुछ कर रहा है. उन की हिचकिचाहट देख कर अनुज बोला, ‘‘मैं कुछ नया नहीं कर रहा. आप दोनों ने दादा व दादी की जितनी सेवा की उतनी तो हम आप की कभी कर भी नहीं पाएंगे. पापा, मैं तब छोटा था. आज जो कुछ भी हम करेंगे हमारे बच्चे वही सीखेंगे. बड़ों का तिरस्कार कर हम अपने बच्चों से प्यार और आदर की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. यह कोई एहसान नहीं है. अब आप आराम कीजिए.’’

‘‘हमारा बेटा औरों जैसा नहीं है न…’’ मनीषा भर्राई आवाज में बोलीं.

‘‘हां, मनीषा, वह बुरा कैसे हो सकता है. तुम ने सुना नहीं, उस ने क्या कहा.’’

‘‘हां, बच्चों में संस्कार उपदेश देने से नहीं आते, घर के वातावरण से आते हैं. जिस घर में बड़ों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है उस घर में बच्चे बड़ों को आदर देना सीखते हैं और जिस घर में बड़ों का तिरस्कार होता है उस घर के बच्चे भी तो वही सीखेंगे.’’

एक पल रुक कर मनीषा फिर बोली, ‘‘हम दोनों ने अपने मातापिता की सेवा व उचित देखभाल की. हमारी गृहस्थी में उन का स्थान हमेशा ही महत्त्वपूर्ण रहा, वही हमारे बच्चों ने सीखा. लेकिन अधिकतर लोग अपने बच्चों से तो सेवा व आदर की उम्मीद करते हैं, लेकिन वे अपने जीवन में अपने बड़ों की मौजूदगी को भुला चुके होते हैं.’’

मनीषा के मन से आज सारे संशय खत्म हो चुके थे.

उन के सगेसंबंधियों, दोस्तों ने उन्हें अपने अनुभव बता कर उन के मन में बेटेबहू के प्रति डर व नकारात्मक विचार पैदा किए, अब वे अपने अनुभव बता कर दूसरों के मन में बेटेबहू के प्रति प्यार व सकारात्मक विचार भरेंगे.

निरंजन ने संतोष से आंखें मूंद लीं और मनीषा कमरे की लाइट बंद कर बहू की सहायता करने के लिए रसोई में चली गईं. आखिर इनसान जो अपनी जिंदगी में बोएगा वही तो काटेगा. कांटे बो कर फूलों की उम्मीद करना तो मूर्खता है. Family Story In Hindi

Social Media : डिजिटल टाइम और तीर्थयात्राएं ‘गैरजरूरी’

Social Media : भारतीयों का सोशल मीडिया पर स्पैम टाइम काफी बढ़ गया है. इस का इलाज तो है कि डिजिटल डिटौक्स कर लिया जाए मगर इस से भी खतरनाक है इन्हीं युवाओं में धार्मिक यात्राओं का बढ़ता चलन. यह न सिर्फ समय व पैसा बरबाद कर रहा है बल्कि दिमाग को कुंद भी कर रहा है.

भारत में 491 मिलियन यानी 49 करोड़ से अधिक लोग सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं. शहर ही नहीं, गांव के लोग भी इस में सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं. सोशल मीडिया में सब से ज्यादा प्रयोग फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब का किया जाता है. राजनीतिक लोग ट्विटर, जो अब एक्स के नाम से जाना जाता है, का उपयोग करते हैं. 68 फीसदी पुरुष और 32 फीसदी महिलाएं इस का प्रयोग करती हैं.

हर भारतीय के हिसाब से देखा जाए तो वह प्रतिदिन 2 घंटा 26 मिनट सोशल मीडिया पर गुजारता है. युवा लड़केलड़कियां सब से ज्यादा इस का प्रयोग कर रहे हैं. सोशल मीडिया के बढ़ते प्रयोग को कम करने के लिए अलगअलग तरह के प्रयास भी तेज हो गए हैं.

आजकल एक नया ट्रैंड चला है कि सोशल मीडिया से दूरी कैसे बनाई जाए. इस के लिए डिजिटल डिटौक्स अपनाने पर जोर दिया जा रहा है. चर्चा इस बात की हो रही है कि सोशल मीडिया लोगों का समय खराब कर रहा है. इस वजह से देश का युवावर्ग और बाकी लोग देश की प्रगति में हिस्सेदारी नहीं निभा पा रहे. सोशल मीडिया पर कौन कितना समय बिता रहा है, इस बात की गणना करने के लिए मोबाइल ऐप्स आ गए हैं. ये मोबाइल में डाउनलोड किए जा सकते हैं. इस के बाद मोबाइल यह बता देगा कि हम स्क्रीन पर कितना समय बिता रहे हैं.

ऐप यह भी बताता है कि हमें मोबाइल पर कितना समय बिताना चाहिए. इस में सिक्योरिटी का भी फीचर होता है. अगर उस को मोबाइल पर ऐक्टिव कर दिया जाए तो दी गई समयसीमा के बाद ऐप मोबाइल पर सोशल मीडिया अकाउंट को बंद कर देता है. अब इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि सप्ताह में कम से कम 48 घंटे सोशल मीडिया से दूर रहा जाए. इस को ही डिजिटल डिटौक्स कहा जाता है. मनोविज्ञानी सेहत के लिए इस को बेहद जरूरी बता रहे हैं.

डिजिटल डिटौक्स के लिए कई मोबाइलों में ऐप को डाउनलोड करने की भी जरूरत नहीं होती. उन में ये फीचर्स इनबिल्ट होते हैं. अगर मोबाइल यह बताता है कि स्क्रीन पर समय अधिक बिता रहे हैं तो वह यह सु?ाव देता है कि अधिक से अधिक कितना समय सोशल मीडिया पर या मोबाइल पर दे सकते हैं. मनोविज्ञानी भी कहते हैं कि सोशल मीडिया पर ज्यादा समय देने से कितना नुकसान होने लगा है.

क्या होता है डिजिटल डिटौक्स

डिजिटल डिटौक्स का मतलब कुछ समय के लिए स्मार्टफोन, कंप्यूटर और सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखना होता है जिस से कि आप अपनी स्क्रीन की लत से छुटकारा पा सकें और वास्तविक दुनिया से जुड़ सकें. इस के कई लाभ बताए जाते हैं. डिजिटल डिटौक्स से तनाव और चिंता कम हो सकती है. स्क्रीन से दूर रहने से अच्छी नींद आने लगती है. ब्लू स्क्रीन अच्छी नींद में बाधा डालती है.

डिजिटल डिटौक्स का एक लाभ यह भी बताया जाता है कि इस से ऐक्सरसाइज के लिए अधिक समय निकाल सकते हैं, जिस से शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है. डिजिटल डिटौक्स से रिलेशन को मजबूत करने के लिए आपस में बातचीत करने का समय निकाला जा सकता है. इस से आपस में बातचीत कर सकते हैं. किताबें पढ़ सकते हैं, जो समाज से जोड़ने का काम करती हैं व विचारों को मजबूत करती हैं, साथ ही, तर्कशक्ति का विस्तार करती हैं. बचे हुए समय में अपने अंदर स्किल का विकास कर सकते हैं.

जानकार लोग राय देते हैं कि सप्ताह में एक से दो दिन डिजिटल डिटौक्स करें. इस से लाभ होगा. यह बात सच है कि सोशल मीडिया में लोग अपना बहुत सारा समय गुजार रहे हैं. ऐसे में उस से दूरी बेहद जरूरी हो गई है.

सोशल मीडिया से भी अधिक घातक तीर्थयात्राएं हो गई हैं जिन में लाखों युवा अपना समय नष्ट कर रहे हैं. जैसे सोशल मीडिया से दूरी के लिए डिजिटल डिटौक्स जरूरी है वैसे ही तीर्थयात्राओं से युवाओं को दूर रखने की जरूरत है. तीर्थयात्राओं के चलते युवाओं में स्किल डैवलपमैंट नहीं हो पा रहा. वे केवल कांवड़ यात्राओं तक सीमित हुए जा रहे हैं. सरकार भी जनता के टैक्स का पैसा तीर्थयात्राओं की व्यवस्था पर खर्च कर रही है जोकि गलत है.

तीर्थयात्राओं से कैसे बचेंगे

डिजिटल डिटौक्स के जरिए सोशल मीडिया से तो बच जाएंगे लेकिन तीर्थयात्राओं में समय बरबाद करने से कैसे बचेंगे? लोग मानते हैं कि तीर्थयात्राएं करने से पुण्य मिलता है, जिस से भविष्य निखरता है. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि पौराणिक कथाओं में यह सम?ाया जाता रहा है कि ‘अजगर करें न चाकरी, पंच्छी करे न काम, दास मलूका कह गए सब के दाता राम’. इस के कारण जब सोशल मीडिया का दौर नहीं था तब भी लोग खाली समय पास करने के लिए चौपालों पर हुक्का गुड़गुड़ाते समय पास करते रहते थे. इस के अलावा तीर्थयात्राएं करने चले जाते थे.

कईकई माह की तीर्थयात्राएं लोग करते थे. यह दौर आज भी चल रहा है. सोशल मीडिया पर अपना समय बरबाद न करने के लिए डिजिटल डिटौक्स तो हम करने की वकालत करने लगे हैं लेकिन जो समय तीर्थयात्राओं पर खर्च हो रहा है उस का क्या होगा? तीर्थयात्राओं पर केवल अपनी ही जेब का पैसा खर्च नहीं होता बल्कि देश और समाज का वह पैसा भी खर्च होता है जो टैक्स के रूप में सरकार को दिया जाता है. टैक्स लेते समय सरकार यह दावा करती है कि इस पैसे से वह देशप्रदेश और शहर का विकास करेगी. असल में सरकार इस पैसे से जनता को तीर्थयात्राएं भी कराती है. उस के लिए सड़कें और मंदिर बनवाती है. अगर कोई दुर्घटना हो जाए तो उस का मुआवजा भी देती है. इस के बदले वह जनता से वोट लेती है.

कितनी खर्चीली हैं यात्राएं

दिल्ली में बुजुर्गों को तीर्थयात्रा करवाने के लिए दिल्ली सरकार की मुख्यमंत्री तीर्थयात्रा योजना लागू है जिस का लाभ हर साल हजारों लोग ले रहे हैं. चारधाम, वैष्णो देवी, अयोध्या, प्रयागराज, अजमेर शरीफ जैसे कई तीर्थस्थलों की यात्रा कराई जाती हैं. मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना का लाभ अब तक 87,000 से ज्यादा लोग उठा चुके हैं. 2019 से शुरू हुई इस योजना में अब तक 90 से ज्यादा यात्राएं कराई जा चुकी हैं. हर विधानसभा से साल में 1,100 लोग इस योजना का लाभ उठा सकते हैं. पूरी दिल्ली से हर साल 77,000 लोग सरकार के खर्च पर प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों पर जा सकते हैं.

उत्तराखंड में गढ़वाल मंडल विकास निगम (जीएमवीएन) की ओर से जारी टूर पैकेज के अनुसार चारधाम की यात्रा के लिए प्रति यात्री 22 से 55 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं. इस टूर पैकेज में हरिद्वार, ऋषिकेश और देहरादून से चारधाम की यात्रा के लिए टिकट औनलाइन बुक कराए जाते हैं. जीएमवीएन की ओर से चारधाम यात्रा में यात्रियों के खानेपीने व रहने के भी इंतजाम किए जाते हैं. जीएमवीएन ने नौन एसी बस, टैंपो ट्रैवलर, एसी इनोवा और नौन एसी कैब से चारधाम के लिए 14 टूर पैकेज जारी किए हैं. इन पैकेज में चारधामों के अलावा केदारनाथ और बद्रीनाथ की अलग से भी यात्रा कर सकते हैं. 6 से 11 दिनों के भीतर यह यात्रा पूरी होती है.

नौन एसी बस से चारधाम यात्रा करने पर 22 से 38 हजार रुपए तक खर्च करने होंगे जबकि एसी इनोवा से यात्रा करने में 35 से 55 हजार रुपए तक यात्राखर्च बैठेगा. चारधाम के लिए यात्रा मई, जून, सितंबर और अक्तूबर तक होती है.

10 दिनों की यात्रा में प्रति वयस्क 35,040 रुपए, प्रति बच्चा 33,540 रुपए और प्रति वृद्ध 32,790 रुपए खर्च करने पड़ते हैं. एसी इनोवा से चारधाम यात्रा करने में 54 हजार रुपए से अधिक खर्च होगा. दूसरी यात्राओं पर भी इसी तरह से खर्च करना होता है.

इसी तरह से कैलाश मानसरोवर यात्रा में औसतन खर्च 1 लाख 75 हजार से ले कर 2 लाख 83 हजार रुपए तक होता है. कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए सरकार की ओर से सब्सिडी भी मिलती है.

50-50 के 5 जत्थे उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे की तरफ से और 50-50 के 10 जत्थे सिक्किम के नाथुला दर्रे से रवाना होते हैं. उत्तराखंड के रूट से जाने के लिए पहले 5,000 रुपए जमा कराने होते हैं. लिस्ट में नाम आते ही 51,000 रुपए जमा कराने होते हैं. मैडिकल खर्च के लिए 8,000 रुपए देने पड़ते हैं.

चाइनीज वीजा के लिए 2,400 रुपए अलग से चुकाने होते हैं. साथ ही, 4,000 रुपए अलग खर्चों के लिए होते हैं. तिब्बत प्रशासन को 1,200 डौलर देने होंगे. सिक्किम वाला रूट उत्तराखंड की तुलना में ज्यादा महंगा होता है. 5,000 रुपए एडवांस के अलावा आप को 35,000 रुपए और देने होते हैं. इस के बाद 20,000 रुपए की दिल्ली-बागडोगरा के बीच रिटर्न फ्लाइट के देने पड़ते हैं. यहां भी 8,000 रुपए मैडिकल, 2,400 रुपए चाइनीज वीजा के लिए खर्च होते हैं. 4,000 रुपए अन्य खर्चों के लिए लिए जाते हैं. तिब्बत प्रशासन को इस रूट के लिए 2,400 डौलर यानी 2 लाख रुपए से ज्यादा देने होते हैं.

मिलता है सरकारी प्रोत्साहन

कुछ राज्य सरकारें कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए सब्सिडी देती हैं. उत्तर प्रदेश सरकार एक लाख की सब्सिडी देती है. हरियाणा सरकार 50,000 रुपए की सब्सिडी देती है. इसी तरह से उत्तराखंड सरकार 30,000 रुपए की सब्सिडी देती है. यानी सरकारें जो पैसा विकास के लिए टैक्स के रूप जनता से लेती हैं उसे इस तरह से धार्मिक यात्राओं पर खर्च करती हैं जिस के लिए वे जनता से कोई अनुमति नहीं लेती हैं. इस तरह की धार्मिक यात्राओं में युवा अपना समय और पैसा दोनों बरबाद करते हैं.

इसी तरह की कावंड़ यात्रा भी है. इस के लिए उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की कुछ सड़कों को बंद कर दिया जाता है. इस से जनता को बेहद नुकसान होता है. दिल्ली सरकार ने कांवडि़यों के लिए 10 लाख रुपए देने का ऐलान किया है. दिल्ली की 200 से ज्यादा कांवड़ सेवा समितियों को 50 हजार से 10 लाख रुपए अनुदान दिया जाएगा. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि वे चाहती हैं कि कांवडि़यों को दिल्ली में एक पत्थर तक न चुभे. दिल्ली में कांवड़ियों की 180 समितियां रजिस्टर्ड हैं. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि 50 फीसदी पैसा पहले और बाकी पैसा खर्चे का ब्योरा आ जाने के बाद दिया जाएगा.

उत्तर प्रदेश सरकार भी कांवड़ यात्रा के लिए अलग इंतजाम करती है. कांवडि़यों के ऊपर हैलिकौप्टर से फूल बरसाए जाते हैं. इस का खर्च करोड़ों में आता है. उत्तराखंड की सरकार कांवड़ यात्रा पर

10 करोड़ रुपए खर्च कर रही है. कांवड़ यात्रा में हजारों युवा हिस्सा ले कर अपना समय बरबाद करते हैं. सोशल मीडिया पर केवल लोग अपना पैसा बरबाद करते हैं लेकिन तीर्थयात्राओं पर अपना समय और पैसे के साथ ही साथ वे जनता का पैसा भी बरबाद करते हैं जो टैक्स के रूप में सरकार वसूल करती है.

सोशल मीडिया की लत को डिजिटल डिटौक्स के जरिए सुधारा जा सकता है लेकिन पौराणिक कथाओं में तीर्थयात्रा के महत्त्व को जिस तरह से बता कर जनता को गुमराह किया जाता है उस की लत को कैसे छुड़ाएंगे, यह सोचने वाली बात है.

जब तक इस में सुधार नहीं होगा, युवाओं की ताकत केवल जयकारा लगाने तक सीमित रह जाएगी. वे कोई रचनात्मक काम नहीं कर पाएंगे. युवा आज इजराइल जैसे देशों में नौकरी करने इसलिए जाते हैं क्योंकि अपने देश में उन को नौकरी नहीं मिलती है. पिछले दिनों अमेरिका ने जिस तरह से भारत के लोगों के हाथपैर बांध कर भेजा वह राष्ट्रीय शर्म जैसा था. इस की वजह यह है कि युवाओं में स्किल डैवलपमैंट नहीं हो रहा है.

Family : पहली शादी से हुए बच्चों के रहते दूसरी शादी से बच्चे पैदा करना कितना सही

Family : पहली शादी के फ्लौप होने पर या जीवनसाथी की मृत्यु के बाद व्यक्ति अकेला हो जाता है. इस अकेलेपन को दूर करने के लिए दूसरी शादी करना बेहतर विकल्प हो सकता है पर सवाल यह है कि पहली शादी से हुए बच्चों के रहते दूसरी शादी से बच्चे पैदा करना कितना सही है?

निशांत की बीवी कोरोना के दौरान मर गई. पहली बीवी से निशांत की 6 और 7 साल की 2 बेटियां थीं. पत्नी की मौत के वक्त तो निशांत ने तय किया था कि वह कभी दूसरी शादी नहीं करेगा लेकिन पत्नी की मौत के 5 साल गुजर जाने के बाद निशांत को जीवनसाथी की कमी खलने लगी. निशांत की साली कुसुम के भी 2 बच्चे थे और वह पिछले 3 साल से तलाकशुदा थी. निशांत और कुसुम एकदूसरे के करीब आए और 2024 में दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली.

निशांत और कुसुम के पहली शादी से दो-दो बच्चे थे. शादी के बाद दोनों के कुल मिला कर चार बच्चों की बड़ी फैमिली हो गई लेकिन चार बच्चों के इस परिवार में निशांत और कुसुम के अपने बच्चे की कमी खलने लगी. कुसुम के 2 बच्चों का बाप निशांत नहीं था तो निशांत के 2 बच्चों की मां कुसुम नहीं थी. दोनों का मन था कि दोनों का अपना भी एक बच्चा हो. लेकिन दोनों असमंजस की स्थिति में थे कि महंगाई के इस दौर में 5वें बच्चे को पैदा करना क्या सही फैसला होगा? क्या पहले के चारों बच्चों पर इस का बुरा असर नहीं पड़ेगा? क्या दोनों अपने सभी बच्चों के साथ न्याय कर पाएंगे?

निशांत और कुसुम के सवाल वाजिब हैं. पुराने दौर की बात अलग थी. परिवार बड़े हुआ करते थे जिस में पतिपत्नी के 8-9 बच्चे भी हों तो भी पल जाते थे. महंगाई के इस दौर में एक या दो बच्चे पालना भी मुश्किल है. आज के दौर में सभी लोग अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं. पेरैंट्स के लिए अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना पहली प्राथमिकता हो गई है. खासकर मिडिल क्लास में तो बच्चों की परवरिश पर काफी खर्च किया जा रहा है. प्राइवेट स्कूल और कोचिंग के साथ बच्चों को कई तरह के एकैडमिक कोर्सेज भी करवाए जा रहे हैं.

भविष्य की चुनौतियां बेहद कठिन हैं, इसलिए लोग अपने बच्चों को ले कर काफी सजग हैं. यही कारण है कि लोग कम बच्चे पैदा कर रहे हैं ताकि कम संसाधनों में भी बच्चों को अच्छी एजुकेशन हासिल हो सके. निशांत और कुसुम के पास कुल मिला कर चार बच्चे पहले से हैं, ऐसे में दोनों के लिए पांचवां बच्चा पैदा करना समझदारी का काम तो कतई नहीं है.

2 साल पहले रुखसाना के शौहर ने उसे तलाक दे कर दूसरी शादी कर ली. तलाक के वक्त रुखसाना का बच्चा 3 साल का ही था, इसलिए उस वक्त रुखसाना के मन में दूसरी शादी का खयाल बिलकुल नहीं आया लेकिन तलाक के 2 साल बाद रुखसाना की जिंदगी में समीर ने दस्तक दी. समीर रुखसाना से शादी करना चाहता था और उस के 5 साल के बेटे को भी अपनाने की बात करता था. लेकिन रुखसाना को मर्दों पर भरोसा नहीं रह गया था, इसलिए रुखसाना काफी समय तक समीर को टालती रही. लेकिन जब उसे लगा कि समीर हाथ से निकल जाएगा तो उस ने समीर से कोर्ट मैरिज कर ली.

शादी के बाद रुखसाना ने समीर को दूसरा बच्चा नहीं करने के लिए मना लिया था और समीर भी रुखसाना के बच्चे को अपने सगे बेटे की तरह प्यार करने लगा था लेकिन फिर समीर बच्चे के लिए जिद करने लगा तो रुखसाना भी समीर को मना नहीं कर पाई और शादी के 3 साल बाद रुखसाना समीर से प्रैग्नेंट हो गई. उस ने फिर से बेटे को जन्म दिया. इस वक्त तक समीर का पहला बेटा 8 साल का हो चुका था. अब समीर के अंदर का असली पिता नजर आने लगा था जो सिर्फ अपने बेटे को ही अपनी औलाद मानता था और रुखसाना के बेटे को देखना भी पसंद नहीं करता था.

समीर के इस बदले मिजाज को देखते हुए रुखसाना ने अपने छोटे से बेटे को अपनी मां के पास भेज दिया लेकिन जल्द ही रुखसाना की मां की डैथ हो गई और मामा के बच्चों के बीच रुखसाना के बेटे की परवरिश मुश्किल हो गई. समीर उस बच्चे को घर में लाने को बिलकुल तैयार नहीं था. आखिरकार, रुखसाना को अपने बेटे को बोर्डिंग स्कूल भेजना पड़ा लेकिन तब तक वह बच्चा इतना बिगड़ चुका था कि कुछ ही दिनों में बोर्डिंग स्कूल वालों ने बच्चे को स्कूल से बाहर कर दिया.

होते हैं मनमुटाव

ज्यादातर मामलों में यही होता है. पहली शादी से पैदा हुए बच्चों के साथ सौतेला व्यवहार होना लाजिमी है. इस मामले में औरत और मर्द दोनों एकजैसे होते हैं. पार्टनर की पहली शादी से पैदा हुए बच्चों को कोई एक्सैप्ट नहीं करता. दूसरी शादी में यह एक बहुत बड़ा मसला है.

अगर औरत और मर्द दोनों के बच्चे हैं और फिर भी दोनों एकदूसरे से शादी करना चाहते हैं तो ऐसे मामलों में पेरैंटिंग इक्वल और बैलेंस रहती है क्योंकि दोनों की स्थिति एकजैसी होती है लेकिन अगर दोनों में से किसी एक के बच्चा है और दूसरे के कोई बच्चा नहीं है तो ऐसे मामले में बैलेंस होना मुश्किल होता है और ऐसी शादी में पहले वाले बच्चे के साथ भेदभाव होने की संभावना बढ़ जाती है.

दूसरी शादी के लिए मनचाहा पार्टनर इंतजार में हो और पहले पार्टनर के बच्चों को अपनाने के लिए भी तैयार हो तो ऐसे में दूसरी शादी करने में कोई हर्ज नहीं. दूसरी शादी के बाद यदि दोनों ओर कोई बच्चा नहीं है तो दोनों को बच्चा जरूर पैदा करना चाहिए लेकिन अगर दोनों में किसी एक के पहले से बच्चा है तो यह देखना जरूरी है कि बच्चा ज्यादा छोटा तो नहीं.

अगर पहली शादी से पैदा हुआ बच्चा 10 साल से ज्यादा बड़ा नहीं है तब थोड़ा समझदारी दिखाना और उफनते हुए जज्बातों पर लगाम लगाना जरूरी हो जाता है. इस से बच्चे के विकास पर गहरा असर पड़ता है. अगर पहली शादी वाला बच्चा 5 साल के आसपास का हो तब मैनेज करने में ज्यादा दिक्कत नहीं आती.

15 साल के बच्चे समझदार हो जाते हैं. किशोर बच्चों पर पेरैंट्स की दूसरी शादी या दूसरी शादी से पैदा हुए बच्चों से कोई फर्क नहीं पड़ता. अगर यह बच्चा लड़का हो तो वह इस उम्र तक इतना परिपक्व हो जाता है कि उस के साथ सौतेले व्यवहार की गुंजाइश कम हो जाती है लेकिन किशोरावस्था की लड़कियों के साथ सौतेले मां या बाप के बुरे बरताव की संभावना बनी रहती है. कई मामलों में देखा गया है कि सौतेले पिता ही घर की नाबालिग बच्चियों का यौनशोषण करते हैं.

घटती हैं आपराधिक घटनाएं

आरवी की 12 साल की बेटी थी. आरवी के पति की मौत हुए अरसा बीत चुका था. वह शादी के कुछ साल बाद ही विधवा हो गई थी. आरवी सुनील नाम के एक तलाकशुदा शख्स के साथ रिलेशन में थी और उस से शादी करना चाहती थी लेकिन 12 साल की बेटी सौम्या के कारण वह सुनील से शादी नहीं कर पा रही थी. आरवी की मां भी उसे दूसरी शादी करने से रोकती थी लेकिन बिना शादी के सुनील के साथ रिश्ता निभाना भी मुश्किल था. सुनील टैक्सी ड्राइवर था. आरवी ने सुनील से दूसरी शादी कर ली. आरवी जौब पर चली जाती और सुनील भी टैक्सी ले कर काम पर निकल जाता. शादी के 3 साल खुशी से गुजरे. इस बीच आरवी की बेटी सौम्या 15 साल की हो गई.

एक दिन आरवी अपने औफिस में थी कि उस के फोन पर सौम्या के स्कूल से फोन आया. उन्होंने बताया कि सौम्या की तबीयत अचानक खराब होने के कारण उसे मदन मोहन हौस्पिटल में भेजा गया है. आरवी दौड़ी हुई अस्पताल पहुंची तो सौम्या की हालत के बारे में जान कर उस के होश उड़ गए. सौम्या 5 महीने की प्रैग्नैंट थी और उस ने इस प्रैग्नैंसी से बचने के लिए किसी नीमहकीम की दवा खा ली थी जिस से उस की हालत बिगड़ गई और वह आईसीयू में पहुंच गई.

होश आने पर सौम्या ने पुलिस को जो बयान दिया उसे जान कर आरवी के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. आरवी की पीठ पीछे उस का दूसरा पति सुनील आरवी की नाबालिग बेटी सौम्या से पिछले 2 साल से बलात्कार कर रहा था और आरवी को इस बात की भनक तक नहीं लगी.

इस तरह के मामलों को देखते हुए दूसरी शादी में सावधानी जरूर बरतनी चाहिए. अगर पहले से बच्चे हों और दूसरी शादी करनी ही पड़ जाए तो कोशिश कीजिए कि नए पार्टनर के साथ बच्चे न हों. अगर बच्चा पैदा करने में दोनों की सहमति हो तो तब भी एक से ज्यादा बच्चा पैदा न करें.

जीवन एक बार ही मिलता है. जीवन में शादी का न चल पाना या पार्टनर की मौत हो जाना दुखद जरूर होता है लेकिन ऐसा होने पर जीवन खत्म नहीं होता. जीवन के ऐसे दुखद मोड़ पर यदि विवेक और समझदारी से काम लेंगे तो यह नई शुरुआत करने का अवसर भी हो सकता है. जीवन में प्रयोग चलते रहने चाहिए. पहली शादी से पैदा हुए बच्चों के होते हुए दूसरी शादी करने में हर्ज क्या है. पहली शादी से बच्चे हों तो भी दूसरी शादी करने में कोई बुराई नहीं है. अगर दूसरा पार्टनर भी बच्चे चाहता हो तो यह उस का हक है.

Child Theft Gang : गोद के नाम पर मासूमों की मंडी

Child Theft Gang : दिल्ली समेत देशभर में ऐसे मामले दर्ज हो रहे हैं जिन में बच्चा चोर गिरोह नवजात बच्चों की चोरी कर उन्हें बेच डालता है. जानें कि कैसे सुनियोजित तरीके से यह घिनौना धंधा चल रहा है.

जुलाई की उमसभरी दोपहर. एनसीआर में कांवड़ यात्रा की गहमागहमी. इस बीच, फरीदाबाद टोल प्लाजा के पास अचानक एक लावारिस बच्चा दिखाई देता है. पुलिस पहुंचती है, बच्चा सकुशल होता है और कुछ ही दिनों बाद उस के मांबाप तक उसे पहुंचा दिया जाता है. सबकुछ सामान्य लगता है. लेकिन नहीं, यह कोई गुमशुदगी नहीं थी. 2 साल बाद दिल्ली पुलिस ने जो रहस्य खोला वह बेहद खौफनाक था.

दरअसल, यह एक सुनियोजित बाल तस्करी का मामला था, जिस में मासूम बच्चों को किडनैप कर उन्हें अवैध रूप से बेचने का नैटवर्क अपना घिनौना कृत्य कर रहा था. हैरानी और आश्चर्य यह कि इस नैटवर्क की कमान किसी डौन या गैंगस्टर के पास नहीं थी बल्कि 3 आम महिलाएं इसे चला रही थीं.

कौन थीं गिरोह की सरगनाएं

आरती उर्फ रजीना कोती : पश्चिम बंगाल से भाग कर फरीदाबाद में बसने वाली महिला, जिस ने अपनी पहचान और जिंदगी दोनों बदली.

कांता भुजेल : फरीदाबाद की नर्स, जो खुद को ‘डाक्टर प्रिया’ बताती थी और बच्चा न पाल सकने वाले जोड़ों की तलाश करती थी.

निर्मला नेम्मी : दिल्ली में वकीलों के लिए काम करने वाली अकाउंटैंट, जिस की जिम्मेदारी थी फर्जी दस्तावेज तैयार करना.

ये तीनों महिलाएं सुनियोजित तरीके से स्टेशन से बच्चों का अपहरण करतीं, उन्हें खरीदारों तक पहुंचातीं और नकली कानूनी दस्तावेजों के जरिए सबकुछ वैध दिखाने का प्रयास करतीं.

आरती की कहानी यहीं नहीं रुकी. साल 2023 में जब वह एक बार फिर गर्भवती हुई तो गरीबी ने उसे मजबूर कर दिया कि वह अपने होने वाले बच्चे को गोद दे दे. इसी दौरान उस की मुलाकात कांता भुजेल से हुई, जिस ने उसे एक ‘औफर’ दिया कि बच्चे को किसी बेऔलाद दंपती को बेच दो.

तभी तीसरी किरदार निर्मला नेम्मी सामने आई. उस ने कहा कि वह फर्जी दस्तावेजों की व्यवस्था कर सकती है. यहीं से शुरू हुआ वह अपराध का रास्ता जहां गर्भपात को छोड़ कर अब दूसरों के बच्चों को चुरा कर बेचना इन महिलाओं का ‘धंधा’ बन गया.

पहला केस : बच्चा चुराया और बेचने से पहले छोड़ दिया

31 जुलाई, 2023 : नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से आरती ने 3 साल के एक बच्चे को अगवा किया. 2 दिनों तक फरीदाबाद में उसे रखने के बाद जब कोई खरीदार न मिला तो घबरा कर बच्चे को टोल प्लाजा के पास छोड़ दिया. यही वह बच्चा था जिसे फरीदाबाद पुलिस ने गुमशुदा मान कर मातापिता को सौंप दिया था.

दूसरा केस : बच्चा बिका, बाइक खरीदी गई

17 अक्तूबर, 2024 : एक ढाई साल का बच्चा अपनी मां के पास सो रहा था, जिसे आरती ने उठाया और गाजियाबाद ले गई. यहां एक दंपती को यह बच्चा गोद में दे दिया गया और बदले में 1.2 लाख रुपए लिए गए. इन पैसों से बाइक खरीदी गई और कुछ जरूरी खर्चे निबटाए गए.

तीसरा केस : बच्ची को 30 हजार रुपए में बेचा

21 जनवरी, 2025 : 4 महीने की एक बच्ची अगवा की गई. कांता भुजेल ने पहाड़गंज में एक जोड़ा तलाशा, जिन्हें यह बच्ची यह कह कर बेची गई कि वह एक कुंआरी मां की संतान है. बदले में 30,000 रुपए मिले. रैकेट के पकड़े जाने के बाद बच्ची को भी रैस्क्यू कर लिया गया.

भारत में गोद लेने की पूरी प्रक्रिया सीएआरए (सैंट्रल एडौप्शन रिसोर्स अथौरिटी) के तहत संचालित होती है.

आंकड़े बताते हैं-
– 2022-23 में भारत में केवल 3,175 कानूनी घरेलू गोदनामे हुए.
– जबकि सालाना 80,000 से अधिक दंपती गोद लेने की प्रतीक्षा सूची में होते हैं.
यही असंतुलन एक गैरकानूनी बाजार को जन्म देता है जहां गरीब, बेसहारा या अपहरण किए गए बच्चों को खरीदनेबेचने की जमीन तैयार हो जाती है.

जब मासूम बने शिकार

हैदराबाद 2022 : मुसाफिरखाने के पास से 6 साल की बच्ची को एक महिला उठा ले गई. 2 दिनों बाद बच्ची एक अनजान घर में पाई गई. पूछताछ में पता चला कि महिला ने बच्ची को 50,000 रुपए में एक बेऔलाद परिवार को सौंपने का सौदा किया था.

भोपाल 2021 : भोपाल रेलवे स्टेशन से एक बच्चा अगवा कर लिया गया. बच्चा 2 दिनों तक एक झुग्गी बस्ती में छिपा कर रखा गया और बाद में बेचने की तैयारी थी. पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर समय रहते उसे बचा लिया.

नेपाल सीमा मामला

भारत व नेपाल सीमा से हर साल औसतन 400 से अधिक बच्चों की तस्करी की रिपोर्ट मिलती है. इन में से कई बच्चों को अनाथ दिखा कर अवैध रूप से गोद दिया जाता है.

सबकुछ जानती थीं ये अपराधिन

दिलचस्प यह है कि तीनों अपराधिन महिलाओं को कानून की पूरी जानकारी थी. उन्हें यह भी पता था कि किस उम्र के बच्चे ज्यादा डिमांड में होते हैं और किन्हें छोड़ देना चाहिए. उन्होंने सस्ते मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया, फर्जी नाम रखे और कोई सुबूत न छूटे, इस की पूरी तैयारी की.

अन्य आरोपी व पुलिस की जांच

पुलिस का कहना है कि इस मामले में 2 और बिचौलियों की पहचान हो चुकी है, जिन की तलाश जारी है. वहीं, जिन दंपतियों ने बच्चों को गोद लिया, वे खुद को इस पूरी साजिश से अनजान बता रहे हैं, लेकिन पुलिस उन के बयानों की भी गहराई से जांच कर रही है.

कानूनी कार्रवाई और आगे की राह

आरती, कांता और निर्मला के अलावा आरती का पति सूरज भी इस गिरोह में शामिल पाया गया. इन सभी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 137(2), 143 और 61(2) के तहत केस दर्ज किया गया है. दोषी पाए जाने पर इन्हें 7 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है.

कानून की पकड़ से दूर नहीं कोई

यह मामला न सिर्फ पुलिस की सजगता का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे समाज में कुछ महिलाएं भी मासूम बच्चों की खरीदफरोख्त जैसे संगीन अपराधों में लिप्त हो सकती हैं. बच्चों को अगवा करना, फर्जी दस्तावेज तैयार कर उन्हें बेचना- यह अपराध जितना क्रूर है उतना ही संगठित भी. अब जबकि यह गिरोह टूट चुका है, आगे की कार्रवाई यह सुनिश्चित करेगी कि ऐसे नैटवर्क भविष्य में फिर पनप न सकें. दिल्ली में सामने आए बच्चों की तस्करी और फर्जी गोदनामों के गिरोह का परदाफाश इस सवाल को फिर से हमारे सामने खड़ा करता है. यह केवल अपराध नहीं, बल्कि पूरे समाज को लहूलुहान कर देने वाली घटना है.

समस्या की जड़ : गरीबी नहीं, व्यवस्था में छेद

दिल्ली में पकड़ा गया यह गिरोह न सिर्फ बच्चों का सौदा कर रहा था, बल्कि समाज की कई स्तरों पर विफलता को उजागर भी कर रहा था.

महिलाएं, जो खुद पीड़ित थीं, अपराधी बन गईं. फर्जी दस्तावेजों की व्यवस्था एक अकाउंटैंट कर रही थी, जिस से साबित होता है कि कानूनी प्रक्रिया की नकल भी हो रही है. और ऐसे खरीदार भी मौजूद हैं जो वैध प्रक्रिया को छोड़ कर आसान रास्ते से बच्चा गोद लेना चाहते हैं.

मन को झकझोरने वाले आंकड़े

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, 2021 में भारत में 7,102 बच्चों के अपहरण की रिपोर्टें दर्ज हुईं. यूनिसेफ के अनुसार, हर साल 12 लाख बच्चे वैश्विक तस्करी का शिकार होते हैं. हर घंटे भारत में 4 बच्चे लापता होते हैं.

अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भारत

भारत उन देशों में शामिल है जहां बाल तस्करी के केस तेजी से बढ़ रहे हैं. इंटरपोल की 2023 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया में बाल तस्करी का सब से बड़ा हौटस्पौट भारत, नेपाल और बंगलादेश की त्रिकोणीय सीमा है.

ममता बिकने लगे, तो हम सब दोषी हैं

यह केवल आरती, कांता और निर्मला की साजिश नहीं थी, यह समाज की उस चुप्पी का परिणाम है जो वर्षों से ऐसे अपराधों को अनदेखा करती रही. यह समय है जागने का, सोचने का और जिम्मेदारी उठाने का.

जब ममता बिकती है तो इंसानियत की कीमत सब से ज्यादा चुकानी पड़ती है. यह कोई एक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक नैतिकता की विफलता है. कानून से पहले समाज को बदलना होगा. वरना अगला बच्चा किसी और की गोद से किसी और की तिजोरी में चला जाएगा और हम बस, रिपोर्ट पढ़ते रह जाएंगे.

Religion : राजनीति में धर्मकर्म, मोहरा बनती आम जनता

Religion : आज भारतीय राजनीति में धर्म सियासत का सब से ताकतवर हथियार बन गया है. मंदिरमसजिद विवादों से ले कर धार्मिक जुलूसों तक हर मुद्दे को वोटों में बदलने की होड़ लगी है. जब धर्म राजनीति का मोहरा बन जाए तो क्या राष्ट्र एकता खो कर विभाजन की ओर नहीं बढ़ता?

दूसरे विश्व युद्ध के बाद से राष्ट्र निर्माण का प्रमुख आधार रहा था ‘धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद’, जिस में धर्म को कुछ समय के लिए हाशिए पर डाल दिया गया था. लेकिन वर्तमान समय की रूपरेखा बड़ी तेजी से पीछे की ओर अर्थात प्रजातीय राष्ट्रवाद की तरफ जा रही है. ‘राष्ट्रवाद’ का यह रूप कभीकभी ‘धार्मिक अतिवाद’ में नजर आ रहा है जो समतावाद के विचारों को तोड़मरोड़ कर प्रजातांत्रिक सिद्धांतों के साथ बड़ी साजिश रचता महसूस किया जा रहा है, जिन की बुनियाद पर मजबूत व धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के सपने संजोए गए थे.

धर्म और राजनीति का जहरीला घालमेल जनता के सामने परोसा जा रहा है जो राजनीतिक व्यवस्था के साथ सामाजिक तानेबाने को भी अस्थिर कर सकता है. जनता विकासवाद बनाम धार्मिक विरासतवाद के बीच फंस गई है. मतलब, जनता की हालत, कविवर दुष्यंत कुमार के शब्दों में, ‘जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में, हम नहीं हैं आदमी, हम हैं झुनझुने’ जैसी हो गई है.

नागरिकों को शिक्षित करने और अनुशासित करने की जिम्मेदारी सरकार की होती है मगर वर्तमान सरकार तो पूरी जनता को धर्म व आस्था में डुबकी लगवाने को आतुर है.

धार्मिक आयोजनों में कई बार कई जानें जा चुकीं पर फिर भी बौराए लोग इसे मोक्षमार्ग मान दिनप्रतिदिन अपनी जानें जोखिम में डाले जा रहे हैं. सावन का महीना शुरू हो चुका है और लोग पाप धोने के लिए कांवड़ ले कर निकल पड़े हैं. धार्मिक आयोजनों या तीर्थस्थलों पर भगदड़ की कई बार घटनाएं घटित हुई हैं. उन में से कुछ इस प्रकार हैं:

3 मई, 2025: गोवा के लैराई देवी मंदिर में भगदड़ मचने से 6 लोगों की मौत और सैकड़ों घायल हो गए.

9 जनवरी, 2025:आंध्र प्रदेश के तिरुपति बालाजी मंदिर में बैकुंठ द्वार दर्शन टिकट काउंटर के पास भगदड़ से 6 लोगों की मौत और 40 लोग घायल हो गए.

29 जनवरी, 2025: महाकुंभ में मची भगदड़ में 30 तीर्थयात्री मारे गए और 60 से ज्यादा घायल हो गए.

2022:माउंट आबू, राजस्थान: गुरुपूर्णिमा के अवसर पर हुई भगदड़ में कई श्रद्धालु घायल हुए.

इलाहाबाद (प्रयागराज): 2013 में आयोजित कुंभ में भगदड़ के कारण 40 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी.

2013:रतनगढ़ मंदिर, मध्य प्रदेश: नवरात्र के दौरान मंदिर में भगदड़ मचने से 115 से अधिक लोगों की मौतें हुईं.

2011:सबरीमाला मंदिर, केरल: मकर संक्रांति पर तीर्थयात्रियों की भीड़ में भगदड़ मचने से 100 से अधिक लोग मारे गए.

हथेलियों पर जान ले कर भीड़ का हिस्सा होने को आतुर बौराय लोग अंधविश्वास और कुरीतियों को बढ़ावा दे रहे हैं, जो समाज के लिए हानिकारक है. किसी भी समाज की उन्नति इस बात पर निर्भर करती है कि वह किन मूल्यों, व्यक्तित्वों और सामाजिक परिवेश को आदर्श मानता है. यदि समाज तर्क, समावेशिता और नैतिकता को अपनाता है तो समृद्धि की ओर बढ़ता है और जब वह कट्टरता, मिथ्या महिमामंडन की ओर बढ़ता है तो उस का पतन निश्चित होता है.

वर्तमान समय में शिक्षा की चिंता, रोजगार की उपलब्धता फिलहाल सरकार के आराम मोड में है. विकास के नाम पर वह देशवासियों के पापपुण्य को धोने की कवायद कर रही है और उन्हें रूढ़ीवाद की जंजीर पहना रही है.

सरकार इस सवाल पर मौन है कि देश की तीनचौथाई आबादी केवल, किसी तरह जिंदा रह सके तक ही सीमित क्यों है?

बौद्धिक और सांस्कृतिक मोरचे, समाचारपत्र, इलैक्ट्रौनिक मीडिया, टैलीफोन और इंटरनैट भी अंधविश्वास फैलाने में लगे हैं. मानो, ‘अंधविश्वास का आधुनिकीकरण’ हो गया हो.

विवाद और विभाजन के कारक

भारतीय लोकतंत्र ‘खुल्ला खेल फर्रुखाबादी’ की तरह हो गया है. राजनीति और धर्म दोनों समाज के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं लेकिन इन के घनिष्ठ संबंध अकसर विवाद और विभाजन के कारण बने हैं.

राजनीतिक घोषणाएं तो अधिकतर विचारों, कार्यों की प्रासंगिकता अपने अनुसार ही ढालती हैं अपने तंत्र को स्थापित करने के लिए. सो, कई बार तर्कशीलता की जगह भावनात्मक पूर्वाग्रह हावी हो जाता है.

मानो, राजनीति पर धर्म के अंकुश से चराचर जगत में शांति स्थापित हो जाएगी. जान लें कि राजनीतिक संरक्षण से कट्टरपंथी सोच और असहिष्णुता को बढ़ावा मिलता है.

अति धार्मिकता ने धर्म को तमाम फर्जी बाबाओं, रूढि़वाद और कर्मकांडों के हवाले किया तो वहीं सोशल मीडिया ने बाजारों में ला कर ‘धर्म को उपभोक्ता वाद’ के रूप में प्रचारित किया.

यह है एक होड़

‘सारा कुछ हमें ही मिल जाए’ इस सोच में सब गिरफ्त हैं. धर्म केवल विश्वास प्रणाली नहीं है, यह व्यक्ति की मानसिकता, भावनाओं और सामाजिक व्यवहार को गहराई से प्रभावित भी करता है.

विश्व में मानो धार्मिक पहचान और सभ्यता का मुद्दा मतदाताओं को लुभाने और उन्हें प्रभावित करने के लिए उछाला जा रहा है. यह धार्मिक पहचान धर्मग्रंथों पर आधारित धार्मिक आस्था और उस के अभ्यास से अलग है. यह केवल अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को प्रमाणित करने के लिए उपकरण बन कर रह गई है. यूरोप में भी लगभग सभी लोकलुभावन नेता अपनी राजनीतिक रणनीति को राजनीति में धर्म के समावेश के संभावित नतीजों पर ही ध्यान दे कर तैयार कर रहे हैं.

उधर, रूस में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन रूढि़वादी चर्च के संरक्षक के रूप में उभरे हैं. यूनाइटेड किंगडम में यूरोसैप्टिक पार्टियां- ब्रिटिश नैशनल पार्टी और यूकेआईपी, जरमनी में आल्टरनैटिव फौर डच लैंड, इटली में लेगा नौर्ड, औस्ट्रिया में फ्रीडम पार्टी, स्विट्जरलैंड में स्विस पीपल्स पार्टी, नीदरलैंड में पार्टी फौर फ्रीडम, फ्रांस में नैशनल रैली जैसी तमाम पार्टियों का एजेंडा वैश्वीकरण के प्रभाव को रोकने और धर्मनिरपेक्ष उदारवादी सामाजिक व्यवस्था का विरोध करना है. भारत में भी इस का असर इन वाकयों से समझा जा सकता है.

‘‘वर्ष 2002 में एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे थे. प्रमोद महाजन उन के पोलिंग एजेंट बने थे.

प्रमोद महाजन ने एपीजे अब्दुल कलाम से पूछा, ‘सर, किस शुभ दिन पर नौमिनेशन फाइल किया जाए?’

एपीजे अब्दुल कलाम ने जवाब दिया, ‘जब तक पृथ्वी घूम रही है तब तक हर दिन शुभ है. जिस दिन पृथ्वी ने घूमना बंद कर दिया उस दिन से मानव प्रजाति का अशुभ दिन शुरू.’

यह सच है कि विश्व राजनीति में भगवान, धर्मकर्म की गहरी पैठ बनी हुई है. भविष्य और समय की रफ्तार ही बताएगी कि हम किस राह को चल निकले थे. इतिहास गवाह है कि हर दौर पेचीदा और शासकीय विरोधाभास लिए होता है. कहीं हमारे देश की ऊर्जा किसी खाने में गिरवी तो नहीं रखी जा रही है?

लेखिका : पम्मी सिंह ‘तृप्ति’

Women’s Property Rights : अकेली औरत शिकंजे में संपत्ति के

Women’s Property Rights : भारतीय कानून में महिलाओं को पैतृक संपत्ति पर पूरा अधिकार दिया गया है लेकिन जानकारी के अभाव, सामाजिक दबाव और पारिवारिक भय के चलते ज्यादातर महिलाएं अपने इस हक का इस्तेमाल नहीं कर पातीं. कई बार परिवार या समाज उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ाने लग जाता है.

भारतभूमि पर औरतों को यों तो कई रूपों में पूजने की परंपरा रही, कभी उसे धन की देवी बताया गया, कभी ज्ञान की देवी, तो कभी शक्ति की मगर वास्तविकता में भारत की महिलाओं को हमेशा धन, ज्ञान और शक्ति से दूर रखने की साजिश हुई. न तो उस को पिता या पति की चलअचल संपत्ति का मालिक बनने दिया जाता, न उस के अकेले के नाम पर कोई बैंक बैलेंस होता, न उस की शिक्षा के प्रति कोई गंभीरता होती और न ही उसे शस्त्रबल का कौशल हासिल होता.

उसे तो सदियों से बस दासी बना कर रखने की कोशिश रही. ऐसी दासी जो हर प्रकार से पुरुष पर आश्रित रहे. अपनी हर जरूरत के लिए किसी भिखारी की तरह पुरुष के आगे हाथ फैलाती रहे. मगर समय में कुछ बदलाव आया. धीरेधीरे औरत ने भी शिक्षा पाई, नौकरी पाई और अपने पैरों पर खड़ी हुई.

आज भारत की स्त्री ने हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति तो दर्ज करा दी है मगर यह प्रतिशत देश की कुल औरतों के मुकाबले में अभी बहुत ही कम है. पढ़लिख कर अच्छी नौकरियों में आने वाली महिलाएं मात्र 5 फीसदी ही होंगी, बाकी जो पढ़लिख रही हैं वे बस इसलिए कि उन्हें अच्छा घरवर मिल जाए. पढ़ाईलिखाई शादी के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से मजबूत होने के लिए की जाती है. जैसे, एक पुरुष की शिक्षा इसलिए नहीं होती है कि उसे अच्छा ससुराल और अच्छी पत्नी मिल जाए बल्कि इसलिए होती है ताकि वह अच्छी नौकरी में आ कर अच्छा धन कमा सके और आर्थिक रूप से सशक्त हो सके. इसी तरह स्त्रियों को भी यह बात समझनी बहुत जरूरी है कि उन की आर्थिक संपन्नता ही उन्हें दास संस्कृति से मुक्ति देगी.

जिस तरह एक या ज्यादा लड़कों को उन के पिता से पैतृक जमीन और धन हासिल होता है और संपत्ति उन में शक्ति और स्वाभिमान का भाव जागृत करती है, उस धन के आधार पर वे तरक्की करते जाते हैं, वैसे ही लड़की को भी पैतृक संपत्ति और ससुराल की संपत्ति पर अपने हक का एहसास रहना चाहिए. अपने हिस्से की धनसंपत्ति अपने पिता और पति से अवश्य ही प्राप्त करनी चाहिए.

आजादी के बाद बने भारत के कानूनों ने हिंदू महिलाओं को पैतृक संपत्ति पर अधिकार दिया है, मगर अफसोस कि औरतें भावुकतावश या इस डर से कि कहीं रिश्ते न बिगड़ जाएं, अपने हिस्से की संपत्ति पर हक नहीं जताती हैं. अधिकांश महिलाएं अपने भाइयों से अपना हिस्सा नहीं मांगतीं, ताकि उन के रिश्ते मधुर बने रहें. यह केवल उन परिस्थितियों में किया जाना चाहिए जब बहन की स्थिति विवाह के कारण बहुत अच्छी हो और भाई की बहुत खराब.

ससुराल में भी पति की चलअचल संपत्ति पर पत्नी का हक होता है मगर देखा गया है कि ज्यादातर औरतें पति की मृत्यु के बाद निरीह सा जीवन जीने लगती हैं और संपत्ति पर बेटे या पति के मांबाप, भाई काबिज हो जाते हैं. पत्नी उस संपत्ति को बेचने या रखने का फैसला नहीं कर पाती, जबकि उस को ऐसा करने का कानूनी हक है.

संपत्ति कैसीकैसी

बहुतेरी औरतों को इस बात का पता ही नहीं है कि कौनकौन सी संपत्ति उन की है? वे उन संपत्ति की देखभाल कैसे करें? किन दस्तावजों पर उन का नाम चढ़ना चाहिए? नाम कहां जा कर चढ़वाना है?

संपत्ति के मालिकाना हक और उस की सुरक्षा के बारे में देश की 80 फीसदी महिलाएं लापरवाह हैं. कुछ को इस विषय में जानकारी ही नहीं होती है. उन के पास संपत्ति होते हुए भी वे पिता, पति, बेटे, भाई के रहमोकरम पर पति के गुजर जाने के बाद पूरी उम्र काट देती हैं.

48 वर्षीया नजमा खातून बाराबंकी के एक गांव की रहने वाली है. वह लखनऊ में किराए के एक छोटे से कमरे में रह कर कई घरों में नौकरानी का काम करती है. नजमा के 4 बेटे हैं. उस के 3 बेटों की शादियां हो चुकी हैं. बड़े बेटे के 2 बच्चे और बाकी दोनों के पास एकएक बच्चा है.

नजमा का सब से छोटा बेटा 15 साल का है जो कई सालों से नजमा के साथ लखनऊ में ही रहता है. नजमा के पति का देहांत 8 साल पहले हुआ था. बाराबंकी में नजमा के पति के पास 15 बीघा खेती की जमीन थी. गांव में 5 कमरों का घर भी था. कानूनन नजमा खेत और घर की मालकिन है मगर उस के लड़कों ने खेती की जमीन का आपस में बंटवारा कर खसराखतौनी पर अपने नाम चढ़वा लिए हैं.

घर पर उन की पत्नियों और बच्चों का कब्जा है. पति के मरने के बाद नजमा कुछ साल वहां रही. उस के लड़कों ने कुछ कागजों पर उस का अंगूठा लगवाया. बहुओं ने कुछ समय तक तो उस के साथ ठीक बरताव किया, फिर नजमा को खाने के लिए भी बारबार मिन्नतें करनी पड़ती थीं.

56 वर्षीया किरण दीक्षित तो पढ़ीलिखी महिला हैं. कई साल नौकरी भी की. नोएडा में रहती हैं. उन के एक बेटी है जिस की शादी बेंगलुरु में हुई है. उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में किरण दीक्षित के नाम पर खेती की 20 बीघा जमीन है जो उन के पिता ने उन के नाम वसीयत की थी. मगर उस जमीन पर किरण के चचेरे भाई खेती करते हैं. कई सालों से वही उस जमीन की देखरेख कर रहे हैं.

किरण के मातापिता की मृत्यु हुए 12 साल हो चुके हैं मगर अभी तक खसराखतौनी पर किरण दीक्षित का नाम नहीं चढ़ा है. वे अपने पति के परिवार में इतनी व्यस्त हैं कि कभी बस्ती जाने का उन्हें मौका ही नहीं मिला. उन की जमीन पर कब व कौन सी फसल उगाई जाती है, कितनी फसल बिक रही है, कितना पैसा आ रहा है, उन को जानकारी नहीं है.

वे कभीकभी फोन पर अपने चचेरे भाई से जमीन का हाल जान लेती हैं. जो वह बताता है उस पर यकीन कर लेती हैं. भाई ने कभी फसल बिकने पर उन को पैसा नहीं भेजा. वे इस में ही खुश हैं कि चचेरा भाई उन की जमीन की देखरेख कर रहा है. आखिर ऐसी संपत्ति होने का क्या फायदा?

अनीता की शादी हुए अभी सिर्फ 4 साल ही हुए थे कि 2021 में उस के पति अक्षय की कोरोना महामारी की चपेट में आने से मौत हो गई. उस की ससुराल में देवर, ननद और सासससुर हैं. अक्षय की मृत्यु के बाद सास ने अनीता को समझना शुरू किया कि यहां उस का कोई भविष्य नहीं है. उस के पास कोई संतान भी नहीं है. पूरी जिंदगी अकेले कैसे काटेगी. इस से अच्छा वह अपने मायके लौट जाए और फिर से विवाह कर ले.

अनीता का मायका चमोली में है. वह पढ़ीलिखी है. वह दिल्ली में अपनी ससुराल में ही रह कर नौकरी करना चाहती थी. उस ने अपने पति के औफिस में बात कर ली थी. औफिस वाले उस को अक्षय की जगह रखने को तैयार थे मगर उस की सास इस के लिए राजी नहीं थी. वह बोली, ‘हमारे यहां बहुओं से नौकरी नहीं करवाई जाती. अपने मायके जा कर नौकरी करो.’

धीरेधीरे अनीता की ससुराल के लोग उस से बुरा बरताव करने लगे. वह दिनभर घर का काम करती और ससुरालियों के ताने सहती थी. आखिरकार वह परेशान हो कर मायके चमोली चली आई. मगर मायके में भी वैसी ही प्रताड़ना सहनी पड़ रही है. उस की भाभी से उस की पटरी नहीं खाती. भाभी के लिए तो वह बोझ बन कर आई हुई मेहमान है.

जबकि अनिता अपने पिता की संपत्ति में आधे की हकदार है और बहू होने के नाते अपनी ससुराल में रहने का भी उस को पूरा हक था. मगर हक होते हुए भी उस को खदेड़ कर बाहर कर दिया गया. उस को पुलिस के पास जा कर ससुरालियों के खिलाफ एफआईआर करवानी चाहिए थी. मगर उस ने नहीं करवाई. भाई से पिता की संपत्ति से आधा हिस्सा मांगना चाहिए. मगर वह खामोश है. वजह यह कि उस को संपत्ति के संबंध में जानकारी कम है.

अचल संपत्ति महिलाओं के लिए आर्थिक रूप से सुरक्षित और सशक्त होने का एक महत्त्वपूर्ण जरिया है. सो, उन्हें इस की जानकारी होनी चाहिए ताकि वे अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें और अपनी संपत्ति की रक्षा कर सकें.

भारत में हिंदू महिलाओं को अचल संपत्ति में समान अधिकार प्राप्त हैं. यह अधिकार देश के कानूनों ने उन्हें दिया है. अचल संपत्ति महिलाओं को आर्थिक रूप से सुरक्षित करने में मदद करती है. यह उन्हें आय का स्रोत प्रदान कर सकती है. वे इसे बेच कर या किराए पर दे कर अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकती हैं.

महिलाओं को मिले कानूनी हक

1956 में महिलाओं को पति व पिता की मृत्यु के बाद कुछ कानूनी हक मिले थे. महिलाओं के लिए संपत्ति कानूनों में अब बहुत सारे बदलाव हो चुके हैं. 2005 के संशोधनों ने महिलाओं के अधिकारों को भाइयों के बराबर ला दिया है. हिंदू महिलाओं को पैतृक संपत्ति में भाई के बराबर हिस्सा मिलने का प्रावधान हो चुका है. वह अपने भाइयों की तरह पैतृक संपत्ति में सहउत्तराधिकारी है.

बिना संपत्ति मिले भी एक विवाहित बेटी, विधवा, तलाकशुदा या परित्यक्ता होने पर वह अपने मातापिता के घर में भरणपोषण या आश्रय की मांग कर सकती है. पिता द्वारा बेटी को उपहार में दी गई या वसीयत की गई किसी भी संपत्ति या परिसंपत्ति पर वयस्क होने के बाद उस का पूरा अधिकार होता है.

हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 के अनुसार, एक विवाहित महिला को अपनी निजी संपत्ति पर पूरा अधिकार होता है, जिसे वह अपनी इच्छानुसार बेच सकती है या किसी को उपहार के रूप में दे सकती है.

संयुक्त परिवार के मामले में हिंदू महिला अपने पति और उस के परिवार से आश्रय, सहायता और भरणपोषण पाने की अधिकारी है. अपने पति और अपने बच्चों के बीच संपत्ति के बंटवारे के मामले में उसे भी दूसरों के बराबर हिस्सा और अपने पति की मृत्यु के मामले में वह अपनेअपने बच्चों और अपनी सास के बीच विभाजित पति की संपत्ति के बराबर हिस्से की हकदार है.

एक हिंदू मां को अपने मृतक बेटे की संपत्ति में उस की पत्नी और बच्चों के बराबर हिस्सा मिलता है. यदि पिता की मृत्यु के बाद बच्चे पारिवारिक संपत्ति का बंटवारा करते हैं तो मां को अपने प्रत्येक बच्चे के बराबर संपत्ति का हिस्सा पाने का अधिकार है.

वह अपने पात्र बच्चों से आश्रय और भरणपोषण पाने की भी हकदार है. उसे अपनी संपत्तियों और परिसंपत्तियों पर पूरा अधिकार है और वह उन्हें अपनी इच्छानुसार निबटा सकती है. हालांकि, उस की मृत्यु के बाद उस की संपत्ति उस के सभी बच्चों को समान रूप से विरासत में मिलती है.

हिंदू बहू के अधिकार बहुत सीमित हैं. सासससुर की संपत्ति पर बहू का कोई अधिकार नहीं है चाहे वह पैतृक संपत्ति हो या उन के द्वारा स्वयं अर्जित की गई संपत्ति. वह ऐसी संपत्तियों पर केवल अपने पति की विरासत और हिस्से के माध्यम से अधिकार प्राप्त कर सकती है.

हिंदू तलाकशुदा महिला पति से भरणपोषण और गुजारा भत्ता मांग सकती है, लेकिन अपने पूर्व पति की संपत्ति पर कोई हिस्सेदारी नहीं रख सकती. अगर संपत्ति पति के नाम पर पंजीकृत है तो कानून उसे ही मालिक मानता है. अगर संपत्ति संयुक्त रूप से स्वामित्व वाली है तो पत्नी को खरीद में अपना योगदान साबित करना होगा. तब वह केवल उक्त संपत्ति में अपने योगदान तक ही हिस्से की हकदार होगी. औपचारिक तलाक के बिना अलग होने की स्थिति में पत्नी और बच्चे पुरुष की संपत्ति पर अपनी विरासत के हकदार हैं, चाहे उस ने दोबारा शादी की हो या नहीं.

यदि किसी महिला के पति की मृत्यु हो जाती है तो उस विधवा महिला को पति की संपत्ति से अपनी सास और अपने बच्चों के बराबर हिस्सा मिलता है.

यदि विधवा स्त्री ने दोबारा विवाह किया है तो हिंदू विवाह पुनर्विवाह अधिनियम 1856 के अनुसार, पूर्व पति की संपत्ति पर उसे अपना दावा छोड़ना होगा. लेकिन हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 24 के अनुसार, यदि संपत्ति के बंटवारे पर चर्चा के समय या बंटवारे के समय विधवा अविवाहित रहती है और बहुत बाद में विवाह करती है तो वह संपत्ति में अपने हिस्से की मालिक होती है.

अन्य धर्मों के अलग कानून

एक ईसाई महिला को भी अपने भाईबहनों के साथ अपने मातापिता दोनों की संपत्ति समान रूप से विरासत में मिलती है. शादी होने तक उसे अपने मातापिता से आश्रय और भरणपोषण मिलता है. उस के बाद वह अपने पति से भरणपोषण प्राप्त करने की अधिकारी है. वयस्क होने के बाद उसे अपनी निजी संपत्ति पर पूरा अधिकार होता है.

विवाहित ईसाई महिला का पति यदि उस का भरणपोषण न करे तो इस आधार पर वह तलाक की अर्जी दे सकती है. ईसाई धर्म की महिला उत्तराधिकार कानूनों के अनुसार अपने पति की संपत्ति के एकतिहाई हिस्से की हकदार है. जबकि, बाकी हिस्सा मृतक के बच्चों के बीच समान रूप से विभाजित किया जाता है. अगर कोई बच्चा नहीं है तो महिला को संपत्ति का आधा हिस्सा मिलता है.

ईसाई धर्म की महिलाओं के लिए संपत्ति कानून में मां को बच्चों का आश्रित नहीं माना जाता है. मां होने के नाते, महिला भरणपोषण पाने की पात्र नहीं है. लेकिन अगर उस के पुत्र की मृत्यु हो जाती है, वह अविवाहित था और उस के कोई बच्चे भी नहीं हैं तो मां को उस की संपत्ति से एकचौथाई हिस्सा पाने का हक है. तलाकशुदा, पुनर्विवाहित विधवा या दूसरी पत्नी होने पर ईसाई महिलाओं के लिए उत्तराधिकार कानून हिंदू कानूनों के समान ही हैं.

इसलामिक कानून के तहत मुसलिम महिला के लिए संपत्ति और उत्तराधिकार कानून थोड़े अलग हैं. एक मुसलिम महिला का हिस्सा एक पुरुष के हिस्से का आधा होता है. यहां महिलाओं के लिए उत्तराधिकार कानून के अनुसार बेटियों को बेटों के हिस्से का आधा हिस्सा मिलता है. लेकिन एक मुसलिम महिला को अपनी संपत्ति पर पूरा नियंत्रण होता है.

वह अपनी इच्छानुसार उस का निबटान या प्रबंधन, बिक्री, उपहार कर सकती है. बेटियों को विवाह तक और विधवा होने या तलाक होने के बाद भी पैतृक संपत्ति में रहने का अधिकार है. अगर उस के बच्चे हैं तो जब बच्चे उस की देखभाल करने लायक बड़े हो जाते हैं तब वह बच्चों की जिम्मेदारी बन जाती है.

मुसलिम महिला यदि ससुराल में रहती है और उस के पति की मृत्यु हो जाती है और उस के पास कोई संतान नहीं है तब उस महिला को पति की संपत्ति का एकचौथाई हिस्सा मिलेगा. यदि बच्चे हैं तो जायदाद का 8वां हिस्सा मिलेगा.

महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियां

सख्त कानूनों के बावजूद महिलाएं पैतृक संपत्ति पर दावा कर सकती हैं और अपना हक प्राप्त कर सकती हैं लेकिन जानकारी के अभाव में अधिकांश महिलाएं ऐसा नहीं कर पातीं और उपेक्षित जीवन जीने के लिए मजबूर होती हैं.

संपत्ति पर अपना हक प्राप्त करने की राह में महिलाओं के सामने सब से बड़ी चुनौती है जागरूकता की कमी. पूरे भारत में ज्यादातर महिलाओं को अपने कानूनी अधिकारों के बारे में जानकारी नहीं है. उन्हें नहीं पता कि वे संयुक्त संपत्ति या पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांग सकती हैं.

एक कारक जो इसे कुछ जटिल बनाता है वह है कानूनी प्रावधानों की जटिलता. यदि कोई महिला पर्याप्त रूप से शिक्षित नहीं है तो कानूनी भाषा को समझना उस के लिए मुश्किल होता है. ऐसे में किसी अच्छे वकील की मदद ली जा सकती है.

विरासत का दावा करने में महिलाओं के सामने आने वाली दूसरी चुनौती है, परिवार का दबाव. महिलाओं पर अकसर उन के परिवार द्वारा अपनी विरासत को छोड़ने या उसे परिवार के किसी पुरुष सदस्य, जैसे भाई या पति को हस्तांतरित करने का दबाव डाला जाता है.

इस के अलावा जो तीसरी चुनौती है वह है समाज का दबाव. भारत एक पितृसत्तात्मक देश है. जिस के कारण यहां पुरुषों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है. लोग अपनी संपत्ति बेटियों के बजाय बेटों को देना पसंद करते हैं. यह इतना अधिक है कि महिलाओं को विरासत में मिली संपत्ति का मालिक होने से हतोत्साहित किया जाता है.

यह इस हद तक है कि अगर बेटी को संपत्ति विरासत में मिलती है तो समाज द्वारा उस की आलोचना की जाती है. लोग उस के घर आनाजाना और बातचीत करना छोड़ देते हैं. कभीकभी तो यह उपेक्षा इतनी बढ़ जाती है कि वह अपनी संपत्ति छोड़ने के लिए मजबूर हो जाती है.

मगर औरतों को यह समझना चाहिए कि अपना हक छोड़ना कोई समझदारी नहीं है. कोई कितनी भी आलोचना करे या दबाव बनाए, औरत को अपना हक पाने के लिए पुलिस और कानून का सहारा लेने से हिचकना नहीं चाहिए. कभीकभी तो उस के साहस दिखाने और पहला कदम उठाने मात्र से ही परिवार उस का वाजिब हक उसे दे देने में अपनी भलाई समझता है.

महिलाओं को यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए कि उन के हाथ में आई संपत्ति ही उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में मदद करती है. इस से वे किसी की मुहताज नहीं रहतीं बल्कि अपने जीवन में निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होती हैं.

अचल संपत्ति महिलाओं को समाज में सम्मानजनक स्थान देती है. इस से उन की सामाजिक स्थिति में सुधार होता है और उन्हें अधिक अधिकार मिलते हैं. वे अपने परिवार की आर्थिक रूप से सुरक्षा कर सकती हैं और बच्चों की अच्छी शिक्षा व स्वास्थ्य के लिए पैसा खर्च कर सकती हैं. सो, उन्हें जमीनजायदाद से संबंधित सभी प्रकार की जानकारी होनी चाहिए ताकि वे अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें और अपनी संपत्ति की रक्षा कर सकें.

आगे का अंश बौक्स के बाद 

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हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 (हिंदू सक्सेशन एक्ट 1956) भारत में हिंदू परिवारों के बीच संपत्ति के उत्तराधिकार (इनहेरिटेंस), विरासत (सक्सेशन) और विभाजन (पार्टीशन) को नियंत्रित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण कानून है. यह अधिनियम 17 जून, 1956 को लागू हुआ और इस में समयसमय पर संशोधन होते रहे हैं, विशेषकर 2005 में एक ऐतिहासिक संशोधन हुआ था.

इस का उद्देश्य हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म के अनुयायियों के लिए एकसमान उत्तराधिकार व्यवस्था प्रदान करना था. यह उन पर भी लागू होता है जो इन धर्मों से संबंधित हैं, लेकिन उन्हें विधिवत रूप से किसी और धर्म में परिवर्तित नहीं किया गया. यह अधिनियम मुसलिम, ईसाई, यहूदी या पारसी लोगों पर लागू नहीं होता. उन के लिए अलग पर्सनल लौ है.

प्रमुख उद्देश्य
– हिंदू परिवारों में पैतृक और स्वअर्जित संपत्ति के बंटवारे को कानूनी रूप देना.
– महिलाओं (बेटियों, विधवाओं) को संपत्ति में बराबरी का अधिकार देना.
– संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति (कोपार्सनरी प्रौपर्टी) के नियमों को स्पष्ट करना.

संपत्ति के प्रकार
– स्वअर्जित संपत्ति यानी व्यक्ति द्वारा खुद अर्जित की गई संपत्ति.
– पैतृक संपत्ति यानी चार पीढि़यों से चली आ रही संपत्ति, जिस में सभी सहधर्मी कोपार्सनर का अधिकार होता है.

दरअसल, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम किसी हिंदू व्यक्ति की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाने पर संपत्ति के वितरण हेतु विधिक ढांचा है. इस अधिनियम के तहत मृतक के साथ व्यक्ति के संबंधों के आधार पर उत्तराधिकारियों, उन के अधिकारों एवं संपत्ति के विभाजन के निर्धारण के लिए नियम निर्धारित किए गए हैं.

हिंदू धर्म के अनुसार वीरशैव, लिंगायत, ब्रह्मोस, प्रार्थना समाज और आर्य समाज के अनुयायी शामिल हैं. यह अधिनियम बौद्ध, सिख और जैन धर्म पर भी लागू होता है. वे व्यक्ति जो मुसलिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि हिंदू कानून या रीतिरिवाज उन पर लागू नहीं होते हैं, तब तक यह अधिनियम लागू होगा.

यह अधिनियम संपूर्ण भारत में लागू होगा लेकिन संविधान के अनुच्छेद 366 के अनुसार यह अनुसूचित जनजातियों पर स्वत: लागू नहीं होता है, जब तक कि केंद्र सरकार द्वारा इसे अधिसूचित न कर दिया जाए.

हिंदू विधि की शाखाएं : इस से संपत्ति के उत्तराधिकार एवं अंतरण की एकसमान प्रणाली का निर्धारण होता है जो मिताक्षरा और दायभाग शाखाओं पर समान रूप से लागू होती है. मिताक्षरा विधि पश्चिम बंगाल और असम को छोड़ कर पूरे भारत में लागू होती है जबकि दायभाग विधि पश्चिम बंगाल और असम पर लागू होती है.

दायभाग विधि के तहत उत्तराधिकार का अधिकार पूर्वजों की मृत्यु के बाद ही प्राप्त होता है जबकि मिताक्षरा विधि में जन्म से ही संपत्ति का अधिकार प्रदान किया गया है.

दायभाग प्रणाली में पुरुष और महिला, परिवार के दोनों ही सदस्य सहदायिक हो सकते हैं जबकि मिताक्षरा प्रणाली में सहदायिक अधिकार केवल पुरुष सदस्यों तक ही सीमित है. सहदायिक वह व्यक्ति होता है जो जन्म से ही पैतृक संपत्ति पर अधिकार का दावा कर सकता है.

संपत्ति का वितरण

श्रेणी I के उत्तराधिकारी : विधवा को संपत्ति का एक हिस्सा मिलता है. पुत्र, पुत्री और मां सभी को बराबर हिस्सा मिलता है.

श्रेणी II के उत्तराधिकारी : यदि कोई श्रेणी ढ्ढ का उत्तराधिकारी मौजूद नहीं है तो संपत्ति को समान रूप से विभाजित किया जाता है.

सगोत्रीय और सजातीय : यदि कोई श्रेणी I या II का उत्तराधिकारी नहीं है तो संपत्ति पैतृक रिश्तेदारों (सगोत्रीय) और अन्य रिश्तेदारों (सगोत्रीय) को हस्तांतरित हो जाती है.

हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 : अधिनियम की धारा 6 में वर्ष 2005 में संशोधित किया गया था और महिलाओं को वर्ष 2005 से संपत्ति के विभाजन के लिए सहदायिक के रूप में मान्यता दी गई थी.

अन्य समुदायों में उत्तराधिकार कानून

मुसलिम : यह मुसलिम पर्सनल लौ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1973 द्वारा शासित है.

ईसाई, पारसी और यहूदी : ईसाई, पारसी और यहूदियों के मामले में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 लागू होता है.

उत्तराधिकार के प्रकार

पुत्रों के अधिकार : जन्म से ही पैतृक संपत्ति में हिस्सा होता है. पुत्र की मृत्यु होने पर उस के उत्तराधिकारी को उस का हिस्सा मिलता है.

बेटियों के अधिकार : पहले बेटियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं था, लेकिन हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 के बाद बेटियों को भी जन्म से ही पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार मिला. विवाहित और अविवाहित दोनों बेटियां अब पिता की संपत्ति में पुत्र के बराबर की हिस्सेदार होती हैं. अब बेटी भी संयुक्त परिवार की कोपार्सनर बन गई है.

संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति

पुराने नियम के अनुसार केवल पुरुष सदस्य ही कोपार्सनर होते थे. संशोधन 2005 के बाद बेटियां भी कोपार्सनर मानी गईं. वे भी अपने हिस्से की मांग कर सकती हैं. पिता की मृत्यु के बाद बेटी संपत्ति की उत्तराधिकारी बनती है.

वसीयत और उत्तराधिकार

व्यक्ति अपनी स्वअर्जित संपत्ति की वसीयत किसी को भी दे सकता है. यदि वसीयत नहीं है तो उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार संपत्ति का बंटवारा होता है.

कुछ विशेष बातें :
– महिला की संपत्ति पर उस का पूर्ण अधिकार होता है.
– सौतेली संतानों के अधिकार भी मान्य होते हैं यदि वे गोद लिए गए हों.
– बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित, संपत्ति पर उस का अधिकार बना
रहता है.
– विवाह के बाद भी उस का अधिकार बना रहता है.
– वह संपत्ति में हिस्सेदारी कर सकती है, बेच सकती है, वसीयत बना सकती है.

क्यों ऐतिहासिक था 2005 का संशोधन

यह लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम था. पहले हिंदू पुत्रियां संयुक्त परिवार की सदस्य होते हुए भी संपत्ति की उत्तराधिकारी नहीं मानी जाती थीं, अब वे भी परिवार की संपत्ति में जन्म से अधिकार रखती हैं.

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 और उस के 2005 के संशोधन ने महिलाओं को संपत्ति में समान अधिकार दे कर एक बड़ी सामाजिक क्रांति की शुरुआत की. यह अधिनियम अब लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करता और संयुक्त परिवार की संपत्ति में सभी को समान हक देता है. इस वजह से यह अधिनियम आज के सामाजिक न्याय के मूल्यों के अधिक करीब हो गया है.

हक छोड़ना त्याग नहीं, अन्याय को स्वीकार करना है

किसी भी लड़की या महिला को पैतृक संपत्ति (मायके की संपत्ति) और ससुराल की संपत्ति दोनों पर अपने कानूनी और नैतिक अधिकार से पीछे नहीं हटना चाहिए. यह न केवल उस के आत्मसम्मान और सशक्तीकरण से जुड़ा है, बल्कि अगली पीढि़यों के लिए भी एक सशक्त मिसाल कायम करता है. एक जागरूक और सशक्त महिला को अपने सभी कानूनी अधिकारों का उपयोग करना चाहिए, चाहे वह मायके की संपत्ति हो या ससुराल की.

पैतृक संपत्ति पर हक : हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में 2005 के संशोधन के बाद बेटियों को भी बेटों के समान अधिकार दिए गए हैं.

पिता की संपत्ति में बेटी को भी बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए, चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित.

ससुराल की संपत्ति पर हक : शादी के बाद महिला को पति की संपत्ति, खासकर अगर वह संयुक्त संपत्ति है, पति की मृत्यु के बाद उस में हिस्सा पाने के लिए कानूनी अधिकार प्राप्त होते हैं.

मांबाप की तरह ससुराल के लोग भी महिला को उस की सम्मानजनक स्थिति में रखें, न कि सिर्फ ‘बाहरी’ समझें.

क्यों गलत है हक छोड़ना

कई बार समाज या परिवार का दबाव बहनों को ‘भाई की मदद’ के नाम पर संपत्ति से वंचित कर देता है, जोकि अन्याय है.

महिला हक छोड़ती है, तो वह आर्थिक रूप से कमजोर बनती है और निर्भरता की स्थिति में चली जाती है. हक न लेने से कानूनी मिसालें कमजोर होती हैं और फिर अन्य महिलाएं भी पीछे हटती हैं.

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संपत्ति पर महिला का अधिकार

भारत में महिलाओं का संपत्ति पर अधिकार संविधान और कानून दोनों द्वारा सुनिश्चित किया गया है. लेकिन सामाजिक स्तर पर अब भी जागरूकता और स्वीकार्यता की बहुत ज्यादा कमी है. महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को न तो उन के मातापिता द्वारा खुल कर बताया जाता है और न ही ससुरालियों या उन के पतियों द्वारा संपत्ति पर उन के अधिकारों के बारे में कोई चर्चा की जाती है. कभीकभी तो महिला को पता ही नहीं होता कि उस के पति के पास कोई पैतृक संपत्ति है भी या नहीं. जमीनजायदाद के मामलों से स्त्री को ज्यादातर भारतीय परिवार दूर ही रखते हैं. लेकिन अब जबकि लड़कियां भी लड़कों के समान शिक्षा प्राप्त कर रही हैं तो उन को खुद इस मामले में जागरूक होना चाहिए.

‘सरिता’ हमेशा ही महिलाओं को उन के अधिकारों के प्रति जागरूक करती रही है.

पैतृक संपत्ति पर स्त्री का अधिकार हिंदू सक्सेशन एक्ट, 1956 संशोधित 2005) : वर्ष 2005 में हुए संशोधन के बाद पैतृक संपत्ति पर बेटियों को पुत्रों के समान अधिकार मिल गया है. अब बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित, उसे अपने पिता की संपत्ति में बराबर का हिस्सा मिलता है. बेटी को कुलवारिस माना गया है, जिस के चलते वह पुश्तैनी संपत्ति में भी हिस्सा मांग सकती है.

विवाह के बाद महिला के अधिकार: विवाह के बाद महिला को अपने पति की संपत्ति में हिस्सा तभी मिलता है जब वह विधवा हो और पति की कोई वसीयत न हो. पति की मृत्यु के बाद पत्नी को पति की चलअचल संपत्ति में हिस्सा मिलता है. साथ ही, उसे पति की पैंशन/ग्रेच्युटी का अधिकार प्राप्त है. उसे बच्चों के साथ समान उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता मिल चुकी है.

सासससुर की संपत्ति पर अधिकार: यदि सासससुर ने वसीयत की है तो बहू को संपत्ति मिल सकती है. यदि वसीयत नहीं है और पति की मृत्यु हो चुकी है तो बहू को पति के हिस्से का अधिकार मिल सकता है.

मुसलिम महिलाओं के अधिकार : मुसलिम कानून में महिला को पिता की संपत्ति में हिस्सा मिलता है (हालांकि बेटियों का हिस्सा बेटों से कम होता है). पति की संपत्ति में भी उसे हिस्सा मिलता है जो आमतौर पर 1/8 या 1/4 होता है. मुसलिम महिला को मेहर का कानूनी हक है जो विवाह के समय तय होता है.

विधवा, तलाकशुदा और अविवाहित महिलाओं के अधिकार : विधवा महिला को पति की संपत्ति में बराबर हिस्सा मिलता है. तलाकशुदा महिला को तलाक के बाद पति की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होता, लेकिन गुजारा भत्ता मिल सकता है. अविवाहित महिला को अपने मातापिता की संपत्ति में पूरा कानूनी अधिकार है.

महिलाओं को चाहिए कि-

– अपनी संपत्ति खुद के नाम करवाएं. इस को करने में वक्त न लगाएं.

– वसीयत बनाएं या अपने हिस्से का कानूनी दावा करें.

– जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाह लेने में न हिचकें. परिवार या समाज के भय से झिझकें नहीं. समाज और परिवार आप को न तो भोजन देंगे और न सम्मान.

– अपने अधिकारों को ले कर सशक्त और जागरूक बनें और उन किताबों को बारबार पढ़ें जो आप को आप के अधिकारों के बारे में जागरूक करती हैं.

स्त्री को अपना सशक्तीकरण खुद करना होगा

भारत की मोदी सरकार नारी सशक्तीकरण का कितना ही ढोल पीटे मगर सत्यता यह है कि वह औरत को धर्म की बेडि़यों में जकड़ कर सदैव पुरुष का गुलाम बनाए रखने की मानसिकता रखती है. औरतें व्रत, पूजा, धार्मिक स्थलों की यात्राओं, बाबाओं के प्रवचनों में फंसी रहें, भाजपा की यही मंशा है. महिलाओं को सशक्त करने से जुड़े जितने भी कानून देश में बने, वे सब कांग्रेस के काल में बने. मगर उन कानूनों को जनमानस तक पहुंचाने और समाज में जागरूकता फैलाने का काम ठीक से नहीं हुआ.

नारी सशक्तीकरण का साफ मतलब है कि महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त बनाया जाए ताकि वे अपने जीवन के फैसले खुद ले सकें और समाज में बराबरी से जी सकें. मगर लिंगभेद, दहेज प्रथा, बाल विवाह, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर असमानता जैसी समस्याओं से महिलाएं आज भी जूझ रही हैं. स्त्री को खुद यह तय करना होगा कि उसे क्या चाहिए, किस दिशा में बढ़ना है और क्या सही है.

जब तक वह अपने फैसले खुद नहीं लेगी, तब तक उस का सशक्तीकरण नहीं होगा. उसे क्या खाना है, क्या पहनना है, क्या पढ़ना है आदि सारे फैसले उस के खुद के होंगे तभी वह सही अर्थों में आजाद होगी. अगर स्त्री हमेशा किसी और (पुरुष, समाज या सरकार) से मदद या सहारे की अपेक्षा करेगी तो वह आत्मनिर्भर नहीं बन पाएगी. सशक्तीकरण की शुरुआत आत्मनिर्भर बनने से होती है.

ज्ञान, शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मविश्वास स्त्री को अपने अधिकारों के लिए खड़ा होने की ताकत देते हैं. ये सभी स्त्री खुद हासिल कर सकती है. परंपराएं, रूढि़यां, धर्म और समाज स्त्री को आगे बढ़ने से रोकते हैं. इन्हें चुनौती देना भी एक प्रकार का सशक्तीकरण है और यह संघर्ष स्त्री को खुद ही करना होगा. स्त्री सशक्तीकरण कोई उपहार नहीं है जो कोई और देगा, यह एक संघर्ष है जिसे स्त्री को खुद करना होगा ताकि उस का पूरी तरह से सशक्तीकरण हो सके.

Romantic Story in Hindi : इंतजार

Romantic Story in Hindi : एक पार्टी में देखा था उसे। सफेद चिकन का कुर्ता, बड़े इयररिंग्स, लाल बिंदी,नीली समुद्र सी गहराई लिए बड़ी– बड़ी आंखे,घुंघरू वाला ब्रेसलेट पहने, अपने लंबे खुले बालों की लट को संभालती हुई ,भीड़ में वह अलग सी रोशनी बिखेर रही थी।

उसकी उन्मुक्त हंसी ने ही रवि का ध्यान खींचा ।दोनों गालों पर पड़ते डिंपल उसकी मुस्कुराहट को दुगना खूबसूरत कर रहे थे।

उसकी छवि ने मानो रवि की आंखों को बांध रखा था। उसके सिवा उसे कोई नजर ही नहीं आ रहा था।

“अरे रवि !कोल्ड ड्रिंक लिया कि नहीं?” रवि ने यंत्र चलित सा नहीं में सर हिलाया।

“अरे तो चल ना यार! एक-एक लेते हैं” और सूरज उसे खींचता सा ड्रिंक काउंटर की तरफ ले गया।

रवि ने ड्रिंक लेकर पलट कर देखा तो वह नहीं थी। रवि बेचैनी से चारों तरफ ढूंढ रहा था,अभी तो उसे जी भरकर देखा भी नहीं पता नहीं कहां ओझल हो गई।

“जब बेटी उठ खड़ी होती है, तभी विजय बड़ी होती है” रवि ने अगले दिन, कॉलेज के थिएटर के अंदर जैसे ही प्रवेश किया, उसके कानों में एक बुलंद आवाज गूंजी।

रवि की नजर सीधा स्टेज पर खड़ी उस लड़की पर पड़ी,स्पॉटलाइट की रोशनी में जगमगाती,अपने संवादों का शायद अभ्यास कर रही थी। लंबे खुले बाल, सलवार कुर्ते में पसीने से तरबतर अपने पात्र में खोई हुई।

रवि उसे अवाक सा देखता रह गया।
“क्या ये वही है?नहीं–नहीं रवि! तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है.तुम्हे हर तरफ वही दिखाई दे रही है।”रवि खुद से ही बाते कर रहा था

तभी पीछे से उसकी सारी नाटक मंडली शोर मचाते हुए पहुंच गई। वह लड़की इन सबको देख सकुचाकर भाग गई।

रवि और उसके साथी कॉलेज में हो रही थिएटर प्रतियोगिता में शामिल होने आए थे।

प्रेक्टिस खत्म कर जब सब थिएटर से बाहर निकले,रवि को एक झुंड में से फिर वही आवाज सुनाई दी। रवि उस चेहरे को देखना चाह रहा था पर उसके साथी उसे खींचते हुए कैंटीन ले गए।

अगले दिन प्रतियोगिता थी।रवि उस लड़की को अपने विचारों से हटा नहीं पा रहा था। एक-एक कर सारे कॉलेज अपनी-अपनी प्रस्तुति दे रहे थे। तभी मंच पर रानी लक्ष्मीबाई नाटक का मंचन हुआ और वही लड़की रानी लक्ष्मी बाई के अवतार में थी।

उस लड़की ने अपने किरदार में जान डाल दी थी मानो साक्षात् रानी लक्ष्मीबाई सामने हो। नाटक के बाद अन्ततः पात्र परिचय में रवि को उस लड़की का नाम और शहर का पता लग ही गया।

“अपराजिता” यथा नाम तथा गुण.

आत्मनिर्भर और आत्म सम्मान से भरी हुई। अपराजिता इसी शहर के नर्सिंग कॉलेज की है जानकर रवि अनायास ही खुशी से भर उठा।
प्रतियोगिता समाप्त हुई. सब अपने घर वापस चले गए पर रवि अपराजिता की स्मृतियां भी वहां से साथ ले आया।

अगले दिन रवि कॉलेज के लिए निकला तो रास्ते में एक्सीडेंट के कारण ट्रैफिक जाम लगा था। उसने आगे बढ़कर मदद करनी चाही तो वहां अपराजिता पहले ही घायल को फर्स्ट एड दे रही थी।
रवि को देखकर अपराजिता ने घायल को अस्पताल ले चलने का निवेदन किया। दोनों ने घायल को अस्पताल पहुंचाया और वेटिंग लाउंज में इंतजार करने लगे।

“ हैलो…मैं अपराजिता. मैं इसी मेडिकल कॉलेज में नर्सिंग की स्टूडेंट हूं। आपका मदद के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ”।

रवि बस उसे देखे ही जा रहा था । “आपका शुभ नाम?” अपराजित ने बड़ी –बड़ी पलके झपकाते हुए पूछा. तब उसने हड़बड़ा कर उत्तर दिया “रवि,मैं इंजीनियरिंग कॉलेज का स्टूडेंट हूं।” तभी नर्स भागती हुई आई ।“
पेशेंट का काफी ब्लड लॉस हो गया है .क्या आप ब्लड डोनेट करना चाहेंगे?”

दोनों ने एक सुर में “हां” कहा और नर्स के साथ चल दिए ।फिर तो बस जैसे बातों का सिलसिला चल निकला, बातों – बातों में रवि ने अपराजिता से नाटक प्रतियोगिता का जिक्र किया.“ क्या सच में! आप उस प्रतियोगिता में शामिल थे? अपराजिता ने आश्चर्य से कहा।
“यह कैसा संयोग है?”
“आपने तो रानी लक्ष्मी बाई को मंच पर जीवंत कर दिया था!” रवि ने अपराजिता से कहा
“धन्यवाद” अपराजिता ने आंखे झुकाते हुए कहा अस्पताल से निकलते वक्त दोनों ने फिर मिलने का वादा कर फोन नंबर एक्सचेंज किए और अपनी अपनी राह पर चल दिए।

आज तो रवि जैसे सातवें आसमान पर था। उसे बिल्कुल भी अपेक्षा नहीं थी कि अपराजिता से यूं मुलाकात हो जाएगी। घर आकर भी उसे नींद नहीं आ रही थी। वह अपराजिता के ख्यालों में ही खोया हुआ था।

फिर कुछ समय अपराजिता से कोई संपर्क ही नहीं हुआ। दोनों अपने एग्जाम्स की तैयारी में जुट गए।
अपराजिता का ख्याल रवि के मन में हमेशा ही रहता। एक दिन रवि एक स्टूडियो में, नाटक के लिए ऑडिशन देने पहुंचा। सारे हॉल में कोई इधर-उधर चहल कदमी कर रहा है,तो कोई अपनी स्क्रिप्ट याद कर रहा है, कोई अपने बाल बना रहा है, तो कोई डायलॉग्स की प्रैक्टिस कर रहा है।
तभी ऑडिशन रूम से तड़ाक की आवाज आई। थप्पड़ की गूंज दूसरे कमरे तक आ गई थी। दरवाजा जोर से खुला और रवि ने देखा ,अपराजिता वहां से बेहद गुस्से में बड़बड़ाती हुई हॉल से बाहर निकली। उसका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था। रवि उसे देखकर उसके पीछे भागता है।“अपराजिता.. अपराजिता रुको! क्या हुआ?”

अपराजिता गुस्से में तमतमाई हुई अपनी ही रौ में बोले चली जा रही थी “वह डायरेक्टर खुद को समझता क्या है? एक्टिंग करने आए हैं, तो क्या वह हमसे बदतमीजी कर सकता है ?उसने एक कोशिश की और मैंने उसे वही सबक सिखा दिया. अब वह ऐसी हरकत किसी और के साथ कभी नहीं करेगा.”

रवि ने उसे शांत किया और कहा “तुमने जो किया बिल्कुल ठीक किया. अब तुम घर जाकर आराम करो”.

“सॉरी रवि, मैंने अपनी परेशानी में तुम्हें भी इंवॉल्व कर लिया.वैसे क्या तुम भी यहां ऑडिशन देने आए थे?”
“हां, पर अब ऐसा कोई इरादा नहीं है.”रवि ने कहा।
“ओके, बाय…टेक केयर.” कहकर दोनों ने विदा ली .

रातभर रवि अपराजिता के बारे में ही सोचता रहा।वह ठीक तो होगी ना। सुबह सबसे पहले उससे मिलकर अपने दिल की बात रख दूंगा।

सुबह रवि ने अपराजिता को फोन कर हाल-चाल पूछा और शाम को पास के कैफे में मिलने की रिक्वेस्ट की। अपराजिता ने भी हामी भर दी। पूरे रास्ते रवि यही सोचता जा रहा था कि अपराजिता से कैसे कहे कि उसके व्यवहार और समझदारी से प्रभावित हो वह उसे पसंद करने लगा है और जीवन साथ गुजारना चाहता है।

रवि कैफे में पहुंचकर अपराजिता की राह देखता है। तभी उसे सामने से बलखाती , इठलाती नदी सा आता देखकर वह मंत्रमुग्ध हो जाता है। उसके परफ्यूम की मंद– मंद सुगंध कैफे में एक ताजा बयार का झोंका ले आई.
“हेलो रवि”
“हैलो ,तुम कैसी हो?”
“हां, अब मैं ठीक हूं. बताओ तुमने मुझे यहां क्यों बुलाया?”

“अपराजिता,मुझे पता नहीं तुम कैसे रिएक्ट करोगी पर मैं तुमसे अपने दिल की बात करना चाहता हूं. मैं तुम्हें पहले दिन से पसंद करता हूं और साथ जीवन गुजारना चाहता हूं.” यह कह कर रवि याचक की तरह अपराजिता की तरफ देखता है ।

अपराजिता को इस प्रपोजल की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। कुछ क्षण एक मौन सा पसार गया दोनों के बीच।रवि को खुद पर ही ग्लानि हो रही थी कि उसने इतनी जल्दी अपनी भावनाएं क्यों व्यक्त कर दी।एक –एक गुजरता सेकंड पहाड़ सा लग रहा था।

“रवि, मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करती हूं ।हम अभी –अभी तो मिले हैं।मै तुम्हे अभी ठीक से जान भी नहीं पाई।मैंने अपना जीवन पहले ही अपने नर्सिंग प्रोफेशन को दे दिया है ।

मेरी मां को कैंसर था और मैं बचपन से उनके साथ हॉस्पिटल जाती थी। वहां पर नर्स जैसे मेरी मां की सेवा करती थी वह मुझे बहुत प्रेरणादायक लगा। तभी मैंने यह डिसाइड कर लिया था कि मैं अपना जीवन बीमारों की सेवा में लगाऊंगी।

थिएटर मेरा शौक है, पर नर्सिंग ही मेरा जीवन है। मेरे हिसाब से तुम्हें मेरा ख्याल छोड़कर जीवन का एक उद्देश्य बनाना चाहिए।”अपराजिता ने बहुत ही शांत स्वर में कहा

“तुम्हारे हिसाब से यह ठीक है, पर मैं तुम्हारे पथ की बाधा नहीं,तुम्हारा साथी बनना चाहता हूं। तुम्हे मजबूर नहीं करना चाहता, मजबूती से तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं। तुम्हे जितना चाहिए उतना वक्त लो। अच्छा चलता हूं।” रुंधे गले से यह कहकर रवि बाहर निकल आया।

मौसम बदले,साल बदले रवि का कभी न खत्म होने वाला इंतजार वही उसी कैफे में ठहरा हुआ था। रवि ने खुद को थिएटर में डुबा लिया था।हर किरदार को निभाते हुए उसे अपराजिता का इंतजार रहता।कभी अपने सहकलाकारो में,कभी दर्शकों में,जमीन–आसमान,भीड़ –एकांत उसे बस एक झलक की आस थी।किसी प्यासे चकोर सा चांद की याद में तड़प रहा था। फैंस की भीड़ में,पार्टीज, प्रमोशन में भी उसके मन में एक खालीपन था।

आज रवि अपने ६०वें जन्मदिन पर एक नाटक में एकाकी बुजुर्ग का किरदार निभा रहा था।दर्शक उसके साथ हँस,रो रहे थे।

तभी अचानक रवि स्टेज पर ही धड़ाम से गिर जाता है।कुछ सेकंड्स में नहीं उठने पर दर्शक उसकी एक्टिंग को प्रोत्साहित करने जोर से तालियां बजाते हैं।फिर भी कोई हरकत न होने पर स्टेज में भगदड़ मच जाती है।कोई रवि को उठाने की कोशिश करता है,कोई डॉक्टर और एम्बुलेंस बुलाता है।

रवि की आंख हॉस्पिटल में खुलती है।इतनी कमजोरी महसूस होती है मानो शरीर में जान ही नहीं।

“कैसे हो रवि?”

उफ्फ वही मधुर आवाज।इतने सालों में उसके कान तरस गए इस आवाज के लिए।

धीरे से आंखे खोलते हुए उसे वही सफेद धुंधली झलक दिखाई पड़ती है जो सालों से उसके हृदय कर छपी है।

“अपराजिता क्या ये तुम हो?”कमजोर सी आवाज में रवि ने कहा
“मै कोई सपना तो नहीं देख रहा!”
“मै कहां हूं ?मुझे क्या हुआ?”
“रवि अभी तुम आराम करो ।कल बात करते हैं ”अपराजिता ने उसके हाथों पर हौले से अपना हाथ रखते हुए कहा
“नहीं अपराजिता!मत जाओ”कहते हुए रवि फिर नींद के आगोश में चल गया।

अगली सुबह से ही रवि अपराजिता का इंतजार कर रहा था।उसे देखते ही रवि में जान आ गई।
“अब कैसी तबियत है रवि?कितने कमजोर हो गए हो।अपना बिल्कुल ध्यान नहीं रखते न!”
“किसके लिए रखता!”रवि की आवाज में नाराजगी का पुट था।
“तुम कहां चली गई थी,न फोन, न पता।कहां–कहां नहीं ढूंढा तुम्हे मैने”
“तुम्हारी निश्छल स्वीकारोक्ति ने मेरे मन में भी तुम्हारे लिए आकर्षण जगा दिया था।तुम्हारा कैफे से उठ के जाना ऐसा लग रहा था जैसे मेरा कोई हिस्सा मुझसे जुदा हो रहा हो”
“मै किसी भी रिश्ते में बंध कर अपने उद्देश्य की प्राप्ति नहीं कर सकती थी।यह दोनों के साथ अन्याय होता।”अपराजिता ने नीची नजरें किए एक उसांस छोड़ा
“तुम मुझ पर भरोसा तो करती!”रवि ने उदास होते हुए कहा
“पर ऐसा नहीं है कि मैं तुम्हें एक क्षण के लिए भुला पाई।तुम्हारे सारे नाटक,पुरस्कार समारोहों की एक–एक पेपर कटिंग मैने संजो कर रखी है।”अपराजिता ने कहा
रवि ने उसकी तरफ प्रशंसा की दृष्टि से देखा।
“रवि,क्या मै अब तुम्हारी सेवा का अधिकार मांग सकती हूं?”अपराजिता के शब्दों में याचना थी।
रवि ने धीमे से उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए हां में सर हिलाया। दोनों की आंखों से निर्मल अश्रुधारा के साथ सालों का इंतजार भी बह निकला। Romantic Story in Hindi 

लेखक : अश्विनी देशपांडे

Romantic Story In Hindi : दिल्ली त्रिवेंद्रम दिल्ली – एक जैसी थी समीर और राधिका की कहानी

Romantic Story In Hindi : समीर टैक्सी से उतर कर तेज कदमों से इंदिरा गांधी हवाईअड्डे की ओर बढ़ा, क्योंकि रास्ते में काफी देर हो चुकी थी.

काउंटर पर बैठी युवती ने उस से टिकट ले कर कहा, ‘‘आप की सीट है 12वी, आपातकालीन द्वार के पास.’’

बोर्डिंग कार्ड ले कर वह सुरक्षा कक्ष में चला गया. फ्लाइट जाने वाली थी, इसलिए

वह तुरंत विमान तक ले जाने वाली बस में बैठ गया.

‘‘नमस्ते,’’ विमान परिचारिका ने उस का हाथ जोड़ कर स्वागत किया.

समीर उसे देखता रह गया.

‘‘सर, आप का बोर्डिंग कार्ड?’’ परिचारिका मुसकरा कर बोली.

समीर ने उसे अपना बोर्डिंग कार्ड पकड़ा दिया.

वह उसे उस की सीट 12बी पर ले गई. समीर ने अपने बैग से काले रंग की डायरी निकाली और बैग ऊपर रख कर सीट पर बैठ गया.

उस की बगल वाली सीट, जो बीच के रास्ते के पास थी, खाली थी. समीर अपनी डायरी देखने लगा. पहले ही पन्ने पर विधि की तसवीर चिपकी थी. उस के जेहन में विधि का स्वर गूंज गया…

‘समीर मैं तुम से प्यार नहीं करती. यदि तुम ने कभी सोचा तो यह सिर्फ तुम्हारी गलती है. मैं तुम से शादी नहीं कर सकती…’

‘‘नमस्कार,’’ आवाज सुन समीर ने चौंक कर आंखें खोलीं. विमान परिचारिका उद्घोषणा कर रही थी, ‘‘आप का विमान संख्या आईसी 167 में, जो मुंबई होता हुआ त्रिवेंद्रम जा रहा है, स्वागत है. आप सभी अपनीअपनी कुरसी की पेटी बांध लीजिए…’’

समीर ने एक गहरी सांस ली. अपनी कुरसी की पेटी बांधी और आंखें मूंद लीं. आंखों के सामने विधि का मुसकराता हुआ चेहरा घूमने लगा…

‘‘माफ कीजिए…’’

समीर ने चौंक कर आंखें खोलीं. सामने वही परिचारिका खड़ी थी.

‘‘आप मेरी सीट बैल्ट के ऊपर बैठे हैं.’’

समीर थोड़ा झेंप गया. उस ने चुपचाप अपने नीचे से सीट बैल्ट निकाल कर उसे पकड़ा दी. वह मुसकरा कर बैठ गई. उस के हाथ में भी समीर की डायरी के समान एक काले रंग की डायरी थी. वह अपनी डायरी पढ़ने लगी.

समीर ने फिर आंखें मूंद लीं और सोचने लगा, ‘विधि, क्या यह सब झूठ था? हमारा रोज मिलना, तुम्हारा पत्र लिखना क्या यह सब एक खेल था? क्या तुम्हें कभी मेरी याद नहीं आएगी?’

उसी समय सीट बैल्ट खोलने की उद्घोषणा हुई तो परिचारिका खड़ी हुई.

‘‘सुनिए,’’ वह समीर को देख कर धीरे से बोली.

समीर ने उस की ओर देखा.

‘‘आप की आंखों में आंसू हैं. इन्हें पोंछ लीजिए,’’ उस के स्वर में गंभीरता थी.

आंसुओं की धार ने उस के दोनों गालों पर रास्ते के निशान बना दिए थे. उस ने झट

से रूमाल से अपनी आंखों और चेहरे को पोंछ लिया.

‘‘सुबह नाश्ते में मिर्च ज्यादा थी.’’

वह बिना कुछ बोले चली गई.

थोड़ी देर बाद वह नाश्ते की ट्राली घसीटते हुए लाई और यात्रियों को नाश्ता देने लगी.

‘‘सर, आप क्या लेंगे, वैज या नौनवैज?’’ उस ने समीर से पूछा.

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘चाय या कौफी?’’

‘‘नहीं, कुछ नहीं.’’

वह बिना कुछ बोले आगे बढ़ गई. उस के भावों से लगा कि उसे थोड़ी सी खीज हुई है.

थोड़ी देर बाद वह फिर आई और बिना कुछ बोले एक प्लेट में चाय और कुछ बिस्कुट रख कर चली गई.

समीर को उस का आग्रह भरा मौन आदेश लगा, क्योंकि इस में अपनत्व था. उस ने चुपचाप चाय पी और बिस्कुट खा लिए. कुछ देर बाद वह दोबारा आई और प्लेट ले कर जाने लगी. प्लेट लेते समय दोनों की नजरें मिलीं.

समीर ने देखा कि उस की साड़ी पर राधिका नाम का टैग लगा था. वह थोड़ा मुसकरा दी. समीर को एक क्षण के लिए लगा कि उस की मुसकराहट में उदासी की छाया है.

उसे फिर विधि की याद सताने लगी. उस ने डायरी खोल ली और लिखने लगा, ‘क्या लड़की का प्यार सिर्फ शादी के बाद दौलत और सुविधाओं के लिए होता है? विधि मुझे छोड़ कर अरुण से शादी इसलिए कर रही है, क्योंकि उस के पास बंगला और कार है, जबकि मैं अभी किराए के मकान में हूं. आज ही उस की शादी है. अच्छा है कि मैं दिल्ली में नहीं रहूंगा. उसे अपने सामने विदा होते देखता तो न जाने क्या कर बैठता.’

समीर की आंखों में एक बार फिर आंसू आ गए. उस ने आंसू पोंछ लिए, डायरी बंद

कर के बगल वाली सीट पर रख दी और आंखें बंद कर लीं.

‘‘कृपया ध्यान दीजिए. अब हमारा विमान मुंबई के छत्रपति शिवाजी हवाईअड्डे पर उतरेगा. आप अपनीअपनी कुरसी की पेटी बांध लें. त्रिवेंद्रम जाने वाले यात्रियों से निवेदन है कि वे विमान में ही रहें,’’ उद्घोषणा हो रही थी.

राधिका उस की बगल में आ कर बैठ गई. समीर की डायरी उस ने सामने सीट की जेब में रख दी. समीर ने आंखें खोल कर राधिका को देखा, तो वह मुसकरा कर धीरे से बोली, ‘‘जिंदगी के सारे गमों को पी कर मुसकराना होता है.’’

समीर की इच्छा हुई कि बोले उपदेश देना सरल है, लेकिन जब खुद पर गुजरती है तब सारे उपदेश धरे रह जाते हैं, मगर वह चुप रहा.

‘‘मैं ने शायद कुछ गलत कह दिया. आई एम सौरी, सर,’’ वह थोड़ी देर बाद फिर बोली.

‘‘ऐसी बात नहीं है. आप ने बोला तो सही है. मुझे इस का बिलकुल बुरा नहीं लगा,’’ समीर के मुंह से निकला, ‘‘आप त्रिवेंद्रम तक मेरे साथ चलेंगी न?’’ समीर ने पूछा और फिर सकुचा गया.

‘‘आप खाना खाएंगे, तब जरूर चलूंगी,’’ वह मुसकरा कर बोली.

उसी समय विमान मुंबई उतर गया. राधिका अपनी डायरी ले कर चली गई.

समीर ने अपनी डायरी बैग में रख दी और औफिस की फाइल निकाल कर मीटिंग की तैयारी करने लगा.

बीच में उसे पानी की जरूरत महसूस हुई. वह पीछे की ओर गया परंतु राधिका की जगह कोई और परिचारिका थी. वह बिना पानी मांगे ही अपनी सीट पर आ गया.

थोड़ी देर बाद राधिका उस की बगल से गुजरी, तो वह बोला, ‘‘राधिका, एक गिलास पानी चाहिए.’’

‘‘जरूर,’’ राधिका ने मुसकरा कर कहा. लगता था कि उसे अपने नाम के संबोधन से आश्चर्य भी हुआ और खुशी भी.

पीछे से खिलखिलाने की आवाज आई. शायद दूसरी परिचारिका ने भांप लिया था कि समीर ने पानी के लिए राधिका का इंतजार किया. वह राधिका को छेड़ रही थी.

राधिका ने उसे पानी की बोतल दे दी. बोतल लेते समय दोनों के हाथ स्पर्श हुए तो दोनों के शरीर में सिहरन दौड़ गई. उस ने राधिका को देखा. वह कुछ उदास हो गई थी.

उसी समय मुंबई में यात्री चढ़ने लगे. विमान जब मुंबई से चला तो राधिका उस की बगल वाली सीट पर ही थी, पर न जाने किन खयालों में खोई थी.

‘‘यह बहुत थकाने वाली फ्लाइट है,’’ समीर ने बात शुरू करने के इरादे से कहा.

‘‘हां,’’ कह कर वह फिर अपने खयालों में खो गई.

समीर ने अपनी आंखें बंद कर लीं.

‘‘सर, आप वैज लेंगे या नौनवैज?’’

समीर चौंक कर उठा. राधिका उस के कंधे को हलके से थपथपा कर पूछ रही

थी. वह बीच में कब सो गया, उसे पता ही नहीं चला.

‘‘वैज,’’ समीर के मुंह से निकला.

राधिका ने चुपचाप उसे वैज खाने की ट्रे दे दी. उस समय दोनों की नजरें टकराईं. नजरों में ही बातें हो गईं कि समीर उस के कहने पर ही खाना खा रहा है.

‘बनावटी मुसकानों और खोखले वाक्यों के पीछे विमान परिचारिकाओं के पास दिल भी होता है, जो दूसरों का दर्द महसूस कर सकता है,’ समीर ने सोचा.

‘इसे कम से कम मेरा कहना याद तो है. भूखा रहने से कोई दुख कम नहीं होता, इतना तो इसे पता होना चाहिए,’ राधिका सोच रही थी.

खाना खाने के बाद समीर की आंख फिर लग गई.

‘‘अब हम त्रिवेंद्रम हवाईअड्डे पर आ पहुंचे हैं. आशा है कि आप की यात्रा सुखद रही. आप हमारे साथ फिर यात्रा करें तो हमें खुशी होगी,’’ उद्घोषणा हो रही थी.

विमान से उतरते समय समीर की नजरें राधिका से मिलीं तो वह मुसकरा दी. ऐसा लगा कि शायद कुछ कहना चाहती है.

पूरा दिन समीर मीटिंग में व्यस्त रहा. शाम को समय काटने के लिए वह कोवलम बीच चला गया और वहां समुद्र के किनारे टहलने लगा. बरबस ही उसे विधि की याद आने लगी. उस ने और विधि ने शादी के बाद ऐसी ही किसी जगह जाने का प्रोग्राम बनाया था, वह सोचने लगा.

उसे लगा कि कोई पहचाना हुआ चेहरा उस के सामने से गुजरा. अरे यह तो वही है, सुबह वाली विमान परिचारिका. क्या नाम था इस का? हां, राधिका, उसे याद आया.

राधिका आगे जा कर रेत पर बैठ गई. समुद्र की लहरें उस के पैरों को छू रही थीं. जब भी वह त्रिवेंद्रम आती थी, कोवलम बीच जरूर आती थी. समुद्र में सूर्य का विलीन होते देखना उसे बहुत अच्छा लगता था.

राधिका को यह दृश्य आदित्य से बिछड़ने के बाद अपनी जिंदगी के बहुत करीब लगता था. वह सोचने लगी, ‘कब उस ने आदित्य को आखिरी बार देखा था? शायद

2 साल से ज्यादा हो गए. वह अपनी नईनवेली दुलहन के साथ गोवा घूमने जा रहा था.

विमान में उसे देख कर व्यंग्यपूर्वक मुसकरा दिया था.’ ‘‘आप के सुंदर चेहरे पर आंसू शोभा नहीं देते,’’ सुन कर राधिका चौंक पड़ी. सामने एक पहचाना सा चेहरा था. यह तो सुबह की फ्लाइट में था. आंसुओं की धार उस के चेहरे को भिगो रही थी. उस ने आंसू पोंछ लिए.

‘‘लगता है, आंख में रेत का कण चला गया था,’’ वह बोली.

‘‘आप क्या पहली बार त्रिवेंद्रम आए हैं?’’ राधिका ने बात बदलने के लिहाज से पूछा.

‘‘राधिका, मेरा नाम समीर है. मैं साल में 2-3 बार यहां आता हूं.’’

उसी समय पास से मूंगफली वाला गुजरा. समीर ने एक पैकेट मूंगफली खरीद कर राधिका को आधी मूंगफली दीं. राधिका ने बताया कि इतनी लंबी फ्लाइट के बाद उसे एक दिन का विश्राम मिलता है. कल फिर वह उसी फ्लाइट से दिल्ली जाएगी.

मूंगफली खातेखाते वे इधरउधर की बातें करते रहे. अंधेरा होने पर दोनों ने मुसकरा कर एकदूसरे से विदा ली. राधिका को यह बहुत अच्छा लगा कि समीर ने उस के आंसुओं का कारण जानने की कोशिश नहीं की.

समीर ने अपने गैस्टहाउस में लौट कर हमेशा की तरह अपनी डायरी निकाली. उस ने सोचा कि वह आज राधिका से मुलाकात का पूरा विवरण लिखेगा. डायरी खोलते ही उस के अंदर से फोटो गिर पड़ा. फोटो में राधिका किसी लड़के के साथ थी.

‘तो मेरी डायरी राधिका की डायरी से बदल गई है,’ उस ने सोचा. पहले तो उसे

लगा कि उसे डायरी नहीं पढ़नी चाहिए, परंतु उस के मन में राधिका की उदासी का राज जानने की इच्छा थी, इसलिए उस ने पढ़ना शुरू किया.

दिनांक ………..मैं आज बहुत खुश हूं. मुझे इंडियन एअरलाइंस में विमान परिचारिका के लिए चुन लिया गया है. मम्मीपापा ने कहा कि उन्हें मुझ पर गर्व है.

दिनांक ………..

आज मुझे आदित्य ने लोदी गार्डन में मिलने के लिए बुलाया. मेरा हाथ पकड़ कर बोला कि वह मुझ से प्यार करता है और शादी करना चाहता है. पता नहीं कितने वर्षों से मैं आदित्य के मुंह से यह वाक्य सुनने का इंतजार कर रही थी. लगता है कि आज रात नींद नहीं आएगी.

दिनांक ………..

मेरी जिंदगी बंध गई है आदित्य और इंडियन एयरलाइंस के बीच में, परंतु मन हमेशा आदित्य में ही लगा रहता है.

दिनांक ………..

आज मैं ने अपनी सहेली शीला को आदित्य से अपने प्यार और शादी के बारे में बताया तो वह चुप रही. लगता है कि उसे मुझ से जलन हुई है.

दिनांक ………..

कई दिनों से आदित्य के स्वभाव में परिवर्तन देख रही हूं. कई बार मिलने का वादा कर के भी वह नहीं आता. लेकिन वादा तोड़ने का उसे कोई पछतावा नहीं होता. लगता है कि उसे कोई परेशानी है, जिसे मैं समझ नहीं पा रही.

दिनांक ………..

शीला ने मुझे कल शाम 6.00 बजे नेहरू पार्क में मिलने के लिए बुलाया है. मैं ने मना करने की कोशिश की, परंतु उस ने दोस्ती का वास्ता दिया है.

दिनांक ………..

आज मेरे सारे सपने चकनाचूर हो गए. शीला मुझे नेहरू पार्क में एक कोने में ले गई और मुझे मेरे प्यार की असलियत बता दी. आदित्य किसी युवती को अपने आलिंगन में ले कर प्यार भरी बातें कर रहा था. हमें देख कर बेशर्मों की तरह मुसकरा दिया.

शीला ने बाद में बताया कि आदित्य ने शीला के साथ भी खेल खेला था. मैं शीला की एहसानमंद हूं कि उस ने मुझे बरबाद होने से बचा लिया.

दिनांक ………..

जिंदगी में एक सूनापन सा भर गया है. दिन तो किसी तरह कट जाता है, लेकिन रात नहीं कटती. लगता है कि नींद आंखों से रूठ चुकी है.

दिनांक ………..

आज मेरी दिल्लीगोवा फ्लाइट पर ड्यूटी थी. अचानक देखा कि आदित्य अपनी नईनवेली दुलहन के साथ बैठा है. मुझे देख कर व्यंग्य से मुसकरा दिया. मन में तो तूफान उठ रहे थे परंतु मैं ने अपने चेहरे पर भाव नहीं आने दिए.

समीर ने पाया कि वह राधिका के दर्द को महसूस कर सकता है, क्योंकि वह भी इसी तरह के दर्द से गुजर रहा है.

राधिका ने अपने होटल में समीर की डायरी बंद कर दी और बालकनी में आ कर बैठ गई. वह सोचने लगी, ‘अब तक मैं पुरुषों को ही बेवफा और धोखेबाज समझती थी. क्या विधि के लिए सुखसुविधाओं की कीमत समीर के सच्चे प्यार से ज्यादा थी?’

दूसरे दिन सुबह समीर औफिस पहुंचा तो उस के निदेशक ने कहा कि उस के साथ

2 और साथी त्रिवेंद्रम से दिल्ली जाएंगे. उसे उन्हीं लोगों के साथ बैठना पड़ा. राधिका से नजरें चार हुईं तो दोनों समझ गए कि वे एकदूसरे की डायरी पढ़ चुके हैं.

वह 1-2 बार बाथरूम के बहाने पीछे गया परंतु राधिका के साथ दूसरी परिचारिकाएं थीं, इसलिए कुछ नहीं कह पाया.

मुंबई में हवाईजहाज रुका तब उस ने राधिका की डायरी निकाली और पीछे की ओर गया. राधिका ने उसे देख लिया. चुपचाप उन्होंने एकदूसरे की डायरी वापस कर दी.

राधिका ने अपनी डायरी खोली. उसमें समीर का संदेश था, ‘मैं आप का दर्द अनुभव कर सकता हूं. मुझे विश्वास है कि आप को जिंदगी में सच्चा प्यार अवश्य मिलेगा. यदि मैं आप के लिए कुछ कर सका तो मुझे खुशी होगी.’

– समीर

समीर अपनी सीट पर आ गया और डायरी पलटने लगा. अंदर राधिका ने लिखा था, ‘जिंदगी में सुख एवं दुख दोनों होते हैं. आशा करती हूं कि आप जिंदगी भर विधि का रोना नहीं रोएंगे.’

– राधिका

जब समीर दिल्ली आने पर विमान से उतरने लगा तो राधिका जैसे दरवाजे पर उस का इंतजार कर रही थी. दोनों की आंखों में चमक थी. इस बात को 2 साल गुजर गए. राधिका और समीर पहले अच्छे दोस्त और फिर पतिपत्नी बन गए. उन के स्मृतिपटल पर दिल्ली त्रिवेंद्रम दिल्ली फ्लाइट हमेशा रहेगी, क्योंकि यहीं से उन्हें अपनी जिंदगी की दिशा मिली. Romantic Story In Hindi 

Hindi Love Stories : दुनिया – जब पड़ोसिन ने असमा की दुखती रग पर रखा हाथ

Hindi Love Stories : यह फ्लैट सिस्टम भी खूब होता है. कंपाउंड में सब्जी वाला आवाजें लगाता तो मैं पैसे डाल कर तीसरी मंजिल से टोकरी नीचे उतार देती, लेकिन मेरे लाख चीखनेचिल्लाने पर भी सब्जी वाला 2-4 टेढ़ीमेढ़ी दाग लगी सब्जियां व टमाटर चढ़ा ही देता. एक दिन मामूली सी गलती पर पोस्टमैन 1,800 रुपए का मनीऔर्डर ले कर मेरे सिर पर सवार हो गया और आज हौकर हमारा अखबार फ्लैट नंबर 111 में डाल गया.

मिसेज अनवर वही अखबार लौटाने आई थीं. मैं ने शुक्रिया कह कर उन से अखबार लिया और फौर्मैलिटी के तौर पर उन्हें अंदर आने के लिए कहा तो वे झट से अंदर आ गईं और फैल कर बैठ गईं. कुछ देर इधरउधर की बातें कर के मैं उन के लिए कौफी लेने किचन की तरफ बढ़ी तो वे भी मेरे पीछे ही चली आईं और लाउंज में मौजूद चेयर संभाल ली. मैं ने वहीं उन्हें कौफी का कप थमाया और लंच की तैयारी में जुट गई.

वे बोलीं, ‘‘कुछ देर पहले मैं ने तुम्हारे फ्लैट से एक साहब को निकलते देखा था. उन्हें लाख आवाजें दी मगर उन्होंने सुनी नहीं, इसलिए मुझे खुद ही आना पड़ा.’’

‘‘चलिए अच्छी बात है, इसी बहाने आप से मुलाकात तो हो गई,’’ कह कर मैं मुसकरा दी. फिर गोश्त कुकर में चढ़ाया, फ्रिज से

सब्जी निकाली और उन के सामने बैठ कर छीलने लगी.

‘‘सच कहती हूं, जब से तुम आई हो तब से ही तुम से मिलने को दिल करता था, मगर इस जोड़ों के दर्द ने कहीं आनेजाने के काबिल कहां छोड़ा है.’’

मैं खामोशी से लौकी के बीज निकालती रही. तब उन्होंने पूछा, ‘‘तुम्हारे शौहर तो मुल्क से बाहर हैं न?’’

‘‘जी…?’’ मैं ने चौंक कर उन्हें देखा, ‘‘जिन साहब को आप ने सुबह देखा, वही तो…’’

‘‘हैं… वे तुम्हारे शौहर हैं?’’

मिसेज अनवर जैसे करंट खा कर उछलीं और मैं ने ऐसे सिर झुका लिया जैसे आफताब सय्यद मेरे शौहर नहीं, मेरा जुर्म हों. वैसे इस किस्म के जुमले मेरे लिए नए नहीं थे मगर हर बार जैसे मुझे जमीन में धंसा देते थे. मैं ने लाख बार उन्हें टोका है कि कम से कम बाल ही डाई कर लिया करें, मगर बनावट उन्हें पसंद ही नहीं है.

मिसेज अनवर ने यों तकलीफ भरी सांस ली जैसे मेरी सगी हों. फिर बोलीं, ‘‘कितनी प्यारी दिखती हो तुम, क्या तुम्हारे घर वालों को तुम्हें जहन्नुम में धकेलते वक्त जरा भी खयाल नहीं आया?’’

फिर वे लगातार व्यंग्य भरे वाक्य मुझ पर बरसाती रहीं और कौफी पीती रहीं. मेरी अम्मी को सारी जिंदगी ऐसे ही लोगों की जलीकटी बातें सताती रहीं. अब्बा बैंकर थे और बहुत जल्दी दुनिया छोड़ गए थे. अम्मी पढ़ीलिखी थीं, इसलिए अब्बा की बैंकरी उन के हिस्से में आ गई. अम्मी की आधी जिंदगी 2-2 पैसे जमा करते गुजरी. उन्होंने अपने लहू से अपने पौधों की परवरिश की, मगर जब फल खाने का वक्त आया तो…

बड़ी आपा शक्ल की प्यारी मगर, मिजाज की ऊंची निकलीं. उन के लिए रिश्ते तो आते रहे मगर उन की उड़ान बहुत ऊंची थी. मास्टर डिगरी लेने के बाद उन्हें लैक्चररशिप मिल गई तो उन की गरदन में कुछ ज्यादा ही अकड़ आ गई और अम्मी के खाते में बेटी की कमाई खाने का इलजाम आ पड़ा.

‘‘बेटी की शादी कब कर रही हैं आप? अब कर ही डालिए. इतनी देर भी सही नहीं.’’ लोग ऐसे कहते जैसे अम्मी के कान और आंखें तो बंद हैं. वे मशवरे के इंतजार में बैठी हैं. अम्मी बेटी की बात मुंह पर कैसे लातीं. किसकिस को बड़ी आपा के मिजाज के बारे में बतातीं.

अम्मी पाईपाई पर जान देती थीं और सारा जमाजोड़ बेटियों के लिए बैंक में रखवा देती थीं. आपा हर रिश्ते पर नाक चढ़ा कर कह देतीं, ‘‘असमा या हुमा की कर दीजिए न, आखिर उन्हें भी तो आप को ब्याहना ही है.’’

और इस से पहले कि असमा या हुमा के लिए कुछ होता बड़े भैया उछलने लगे. मेरी शादी होगी तो जारा सरदरी से ही. अम्मी भौचक्की रह गईं. अभी तो पेड़ का पहला फल भी न खाया था. अभी दिन ही कितने हुए थे बड़े भाई को नौकरी करते हुए. जारा सरदारी भैया की कुलीग थी. अम्मी ने ताड़ लिया कि बेटा बगावत के लिए आमादा है. ऐसे में हथियार डाल देने के अलावा कोई चारा न था. फिर वही हुआ जो भाई ने चाहा था.

जारा सरदरी को अपनी कमाई पर बड़ा घमंड और शौहर पर पूरा कंट्रोल था. ससुराल वालों से उस का कोई मतलब न था. बहुत जल्दी उस ने अपने लिए अलग घर बनवा लिया.

अम्मी को बड़ी आपा की तरफ से बड़ी मायूसी हो रही थी लेकिन हुमा के लिए एक ऐसा रिश्ता आ गया, जो अम्मी को भला लगा. आखिरकार बड़ी आपा के नाम की सारी जमापूंजी खर्च कर उसे ब्याह दिया. हुमा का भरापूरा ससुराल था. ससुराल के लोगों के मिजाज अनूठे थे. इस पर शौहर निखट्टू.

उस की सारी उम्मीदें ससुराल वालों से थीं कि वे उसे घरजमाई रख लें, कारोबार करवा दें या घर दिलवा दें. यह कलई बाद में खुली. झूठ पर झूठ बोल कर अम्मी को दोनों हाथों से लूटा गया. मगर ससुराल वालों की हवस पूरी न हुई.

हुमा बहुत जल्दी घर लौट आई. उस का सारा दहेज ननदों के काम आया. फिर बहुत मुश्किल से तलाक मिलने पर उसे छुटकारा मिला. लेकिन इस पर खानदान के कई लोगों ने अम्मी को यों लताड़ा जैसे अम्मी को पहले से सब कुछ पता था.

हुमा का उजड़ना उन्हें मरीज बना गया. वे आहिस्ताआहिस्ता घुल रही थीं. एक रोज वे बिस्तर से जा लगीं, मगर सांसें जैसे हम दोनों बहनों में अटकी थीं.

कभी-कभी बड़े भैया बीवीबच्चे समेत घर आते तो अम्मी की परेशानियां जबान पर आ जातीं. लेकिन वे हर बात उड़ा जाते. ‘‘अम्मी, हो जाएगा सब कुछ. आप फिक्र न किया करें.’’

परेशानियों के इसी दौर में छोटे भैया से मायूस हो कर अम्मी ने उन्हें ब्याहा. छोटे भैया अपने पैरों पर खड़े थे. लेकिन घर की जिम्मेदारियों से दूर भागते थे. घर की गाड़ी अम्मी के बचाए पैसों पर ही चल रही थी. लेकिन घर चलाने के लिए एक जिम्मेदार औरत का होना जरूरी होता है, यह सोच कर ही अम्मी ने छोटे भैया को ब्याह दिया था.

लेकिन अम्मी एक बार फिर मात खा गईं. छोटी भाभी बहुत होशियार और समझदार साबित हुईं, मगर मायके के लिए. उन के दिलोदिमाग पर मायके का कब्जा था. कोई न कोई बहाना बना कर मायके की तरफ दौड़ लगाना और कई दिन डेरा डाल कर वहां पड़ी रहना उन की फितरत थी. ससुराल में वे कभीकभी ही नजर आतीं. अचानक छोटे भैया को दुबई में नौकरी का चांस मिल गया और भाभी का पड़ाव हमेशा के लिए मायके में बन गया.

इस दौरान एक खुशी की बात यह हुई कि बड़ी आपा के लिए एक भला रिश्ता मिल गया. संजीदा, सोबर और जिम्मेदार एहसान अलवी. पढ़ेलिखे होने के साथसाथ अरसे से अमेरिका में रहते थे. आपा जितनी उस उम्र की थीं, उस से कम की ही नजर आती थीं और एहसान अलवी अपनी उम्र से 2-4 साल ज्यादा के दिखते थे.

अम्मी को फिर इनकार का अंदेशा था. उन्होंने आपा को समझाया, ‘‘ऐसा रिश्ता फिर मिलने वाला नहीं. समझो कि गोल्डन चांस है. पानी पल्लू के नीचे से गुजर जाए तो लौट कर नहीं आता.’’

पता नहीं क्या हुआ कि यह बात आपा की अक्ल में समा गई. फिर चट मंगनी, पट ब्याह. आपा अमेरिका चली गईं.

शादी के नाम पर हुमा रोने बैठ जातीऔर एक ही रट लगाती, ‘‘मुझे नहीं करनी शादीवादी.’’

मैं आईने के समाने खड़ी होती तो आठआठ आंसू रोती. हमारे खानदान के हर घर में रिश्ता मौजूद था, मगर लड़के 4 अक्षर पढ़ कर किसी काबिल हो जाते हैं, तो खानदान की फीकी सीधी लड़कियों पर हाथ नहीं रखते हैं. ऐसे में सारी रिश्तेदारी धरी की धरी रह जाती है. फिर अब उन्हें बदला भी लेना था. अम्मी ने भी तो खानदान की किसी लड़की पर हाथ नहीं रखा था. उन के दोनों बेटों की बीवियां तो पराए खानदान की थीं. इस धक्कमपेल में मेरी उम्र 30 पार कर गई.

फिर अचानक बड़ी आपा की ससुराल के किसी फंक्शन में आफताब सय्यद के रिश्तेदारों ने मुझे पसंद किया. आफताब की सारी फैमिली कनाडा में रहती थी और उन के सभी भाईबहन शादीशुदा थे. आफताब की पहली शादी नाकाम हो चुकी थी. बीवी ने नया घर बसा लिया था. उन के 2 बच्चे थे, जो आफताब के पास ही थे. अम्मी को मेरी नेक सीरत पर भरोसा था. और मुझे भी कहीं न कहीं तो समझौता करना ही था. पानी पल्लू के नीचे से गुजर जाए तो लौट कर नहीं आता, यह बात मैं ने गिरह में बांध ली थी.

आफताब बहुत खयाल रखने वाले शौहर साबित हुए. हमारी उम्र में फर्क बहुत ज्यादा न था. मगर दुनिया तो यही समझती थी कि वे मुझ से बहुत बड़े हैं और बच्चों समेत सारी गृहस्थी मेरी मुट्ठी में है. इस एहसास की झील में कोई न कोई कंकड़ डाल कर हलचल मचा ही देता था. तब मुझे लगता था कि इंसान अपनी जिंदगी से समझौता कर भी ले तो दुनिया उसे कहां छोड़ती है? Hindi Love Stories 

लेखिका : गुलनाज

Social Story : राशनकार्ड की महिमा

Social Story : ‘‘साहब, सिलेंडर खाली हो गया है,’’ रसोईघर से रामकिशन के शब्द किसी फोन की घंटी की तरह मुझे चौंका गए.

हम ने एजेंसी को फोन खड़खड़ाया, ‘‘गैस सिलेंडर बुक करवाना है.’’

‘‘नंबर?’’ किसी मैडम की आवाज थी.

‘‘9242,’’ मैं ने भी ऐसे बोला जैसे फोन में नंबर पहले से ही फीड हो.

‘‘राजगोपालजी?’’

‘‘जी हां, देवीजी.’’

‘‘आप को अपना राशनकार्ड दिखाना होगा,’’ मधुर आवाज में मैडम बोलीं.

‘‘क…क्या?’’ हम हकलाए, ‘‘राशनकार्ड?’’

‘‘जी हां.’’

‘‘किस खुशी में?’’

‘‘बस, हमारी खुशी है. इसी खुशी में.’’

हम घबरा गए. यह तो नहले पे दहला मार रही है, ‘‘लेकिन वह तो मैं ने कभी बनवाया ही नहीं?’’

अब की बारी उन की थी, ‘‘क्या कहा?’’

‘‘हां. कभी बनवाया ही नहीं तो लाने का सवाल ही नहीं उठता.’’

‘‘कमाल है,’’ मैडमजी बोलीं, ‘‘अच्छा, ऐसा कीजिए, अपनी सिलेंडर बुक ले कर हमारी एजेंसी के दफ्तर में आ जाइए. पता जानते हैं न कि एजेंसी कहां है? बहुचरजी के पास.’’

‘‘जी हां, उस जगह को आबाद कर चुका हूं.’’

हम जब सिलेंडर बुक ले कर वहां पहुंचे तो मैडमजी ने हमेें घूरा और बोलीं, ‘‘आप ही राजगोपालजी हैं.’’

हम ने हां में गरदन हिलाई तो एक मोटा रजिस्टर हमारे सामने कर दिया गया.

‘‘इस में आप अपनी सिलेंडर बुक का नंबर लिखिए फिर यह भी लिखिए कि अगली बार राशनकार्ड दिखाऊंगा और यहां हस्ताक्षर कर दीजिए. इस बार हम आप का सिलेंडर बुक कर देते हैं लेकिन अगली बार राशनकार्ड दिखाना पड़ेगा.’’

‘‘लेकिन क्यों? यह सिलेंडर बुक देखिए. 1988 से मैं आप से सिलेंडर लेता आ रहा हूं तो अब की यह राशनकार्ड की आफत कैसे आ गई?’’

‘‘सर, ऊपर से आदेश आया है कि बिना राशनकार्ड देखे किसी को सिलेंडर न दिया जाए.’’

‘‘लेकिन मेरी समझ से तो राशन- कार्ड केवल गरीबों की मदद के लिए होता है ताकि उन्हें सरकारी रियायत से सस्ते खाद्य पदार्थ जैसे चावल, गेहूं, तेल, चीनी आदि मिल जाएं. मैं इस श्रेणी में नहीं आता. यहां बड़ौदा में कभी राशनकार्ड का उल्लेख नहीं हुआ. पासपोर्ट है, बिजली, टेलीफोन, हाउस टैक्स के बिल हैं, पैनकार्ड व ड्राइविंग लाइसेंस हैं. इन सब से ही हमारा काम चल जाता है.’’

‘‘अरे साहब, कई लोगों ने कईकई जाली कनेक्शन ले रखे हैं इसलिए सरकार को यह कदम उठाना पड़ा. कोई गैरकानूनी ढंग से तिपहिए में गैस लगा रहा है तो कोई मोटर में. कोई कईकई सिलेंडरों की ब्लैक कर रहा है.’’

‘‘अच्छा? तो हम बेचारे सीधेसादे पुरुष लोग पकड़ गए? कमाल है.’’

वे हंस पड़ीं.

‘‘यह तो बताइए कि यह कम्बख्त कार्ड बनता कहां है?’’

‘‘कुबेर भवन में.’’

‘‘ठीक,’’ कह कर हम ने स्कूटर दौड़ाया. बहू कुबेर भवन में ही 8वीं मंजिल पर काम करती है, यह सोच कर मन में तसल्ली मिली.

वैसे हमें अजनबियों से पूछताछ करने में कोई झिझक नहीं होती. अधिक से अधिक ‘न’ या ‘नहीं मालूम’ यही तो कोई कहेगा. ?ांपड़ तो नहीं मारेगा. और इसी बहाने कई बार नए मित्र भी बन जाते हैं.

जानकारी के बाद हम राशन कार्ड आफिस पहुंच गए. क्लर्क से आवेदनपत्र (फार्म) मांगा, मिल गया. फिर पूछा, ‘‘भैया, क्याक्या भरना है और क्याक्या प्रमाणपत्र इस के साथ देने हैं?’’

‘‘बिजली का बिल, पुराना राशन- कार्ड और उस में क्याक्या बदलना है, पता या प्राणियों की संख्या,’’ भैया एक सांस में बोल गया.

हम घबरा गए, ‘‘लेकिन मैं ने तो कभी राशनकार्ड बनवाया ही नहीं.’’

‘‘क्यों, कहां से आए हो?’’

‘‘बरेली, यू.पी. से.’’

‘‘तो वहां का राशनकार्ड लाओ,’’ भैया ने फरमाया.

‘‘अरे, वहां भी कभी बनवाया नहीं और वह तो बहुत पुरानी बात हो गई. बड़ौदा में 22 साल से रह रहा हूं. तो अब मैं बड़ौदा का ही रहने वाला हो गया.’’

उस ने हमें ऐसे घूरा जैसे हम कोई अजायबघर के जीव हों. फिर बोला, ‘‘तो फिर साहब से मिलो,’’ और दाईं तरफ इशारा किया.

हमारी भृकुटि तन गईं, ‘‘वहां तो कोई है ही नहीं?’’

‘‘साहब हर सोमवार को आते हैं और 11 से 2 बजे तक, तभी मिलो. आज गुरुवार है,’’ और हमें दरवाजा नापने का इशारा किया.

सोमवार को सवा 11 बजे पहुंचे तो देखा छोटे से दरवाजे के सामने करीब 60 लोग लाइन लगाए खड़े हैं. हम भी उन के पीछे खड़े हो गए. कुछ देर गिनती करते रहे और पाया कि एक प्राणी हर 4 मिनट में अंदर जाता है यानी हमारा नंबर 4 घंटे बाद आएगा. दिल टूट गया, कुछ तिकड़म लगाना पड़ेगा.

वहां से बाहर आए और मित्र सागरभाई को अपनी दुखभरी कहानी सुनाई. वे फोन पर बोले, ‘‘काटजू साहब, चिंता की कोई बात नहीं, सब पैसे बनाने के धंधे हैं. आप अपने कागज मुझे दे दीजिए. मैं अपने एक एजेंट मित्र से काम करवा दूंगा. 3 साल पहले मैं ने अपना भी राशनकार्ड ऐसे ही बनवाया था.’’

हम बड़े खुश हुए कि चलो, बला टली. मन ही मन कहा कि सागरभाई, दोस्त हो तो आप जैसा. जा कर उन्हें सब कागजों की एकएक प्रतिलिपि दे दी.

एक बात और, ‘एक हथियार काम न करे तो दूसरा तो काम करे,’ यह सोच कर अपने एक और मित्र गोबिंदभाई से भी संपर्क किया. उन्होंने तो अपने एक पुराने मामलतदार मित्र से मुलाकात भी करवा दी.

पटेल साहब बोले, ‘‘आप को कब तक राशनकार्र्ड चाहिए?’’

‘‘यही 8-10 दिन में.’’

वे बेफिक्री से बोले, ‘‘ठीक है, अपने सब कागजात दे दीजिएगा.’’

वापस लौटते समय गोबिंदभाई ने समझाया कि पटेल साहब को कुछ दक्षिणा भी देनी पड़ेगी और दक्षिणा समय पर निर्भर रहेगी, कम समय माने अधिक दक्षिणा. हम समझ गए, सिर हिला दिया.

2 दिन बाद हम ने फोन किया, ‘‘सागरभाई, मामला तय हो गया?’’

फोन पर रोनी आवाज सुनाई दी, ‘‘नहीं साहब, उस ने कहा है कि अब यह काम बहुत मुश्किल हो गया है. वह नहीं बनवा सकता. राशन विभाग के भाईलोग बहुत सख्त हो गए हैं, उस को घास भी नहीं डालते.’’

 

मन ही मन हम ने सागरभाई और उन के एजेंट को गाली देते हुए फोन रख दिया. यह दांव तो खाली गया.

अब हम पहुंचे पटेल साहब के यहां. उन की बहू घंटी सुनने पर बाहर निकली.

‘‘साहब हैं?’’ हम ने पूछा.

‘‘नहीं.’’

‘‘अरे, कहां गए?’’

‘‘भारगाम.’’

‘‘कब आएंगे?’’

‘‘5 दिन बाद.’’

हम ने फिर माथा पकड़ लिया. लगता है यह सोमवार भी गया. दर्देदिल लिए हुए गोबिंदभाई को मामला-ए-राशन कार्ड की रिपोर्ट दी. उन्होंने दिलासा दिया, ‘‘कोई बात नहीं काटजू साहब, 5 दिन बाद पटेल साहब आप का काम जरूर करवा देंगे.’’

हम ने घर की राह ली.

मंगलवार को फिर पटेल साहब के दर्शन हेतु निकल पड़े. अब की किस्मत से साहब घर पर ही थे.

‘‘साहब, मेरे राशनकार्ड का काम?’’

पटेल साहब ने दुखभरी मुद्रा बनाई, ‘‘काटजू साहब, 2-3 महीने लग जाएंगे. डिपार्टमेंट में कुछ अंदरूनी जांच चल रही है. मेरी समझ से आप खुद ही कार्ड के लिए जाएं तो ठीक होगा.’’

हम ने मन ही मन अपनेआप को कोसा और पटेल साहब को भी. बड़ा तीसमार खां बना फिरता था. कहता था, ‘कितने दिनों में कार्ड चाहिए?’ मेरे 2 सोमवारों का खून कर दिया. सोचा भीम और अर्जुन तो फेल हो गए, अब शेर की मांद में खुद ही जाना पड़ेगा और कोई चारा बचा ही नहीं था. चलो, इस को भी आजमा लिया जाए.

खैर, सोमवार को पौने 11 बजे राशनकार्ड के दफ्तर पहुंचे तो देखा लंबी लाइन लगी हुई है, जबकि दरवाजा बंद है, हम भी लाइन में लग गए. बुढ़ापे में समय की कोई तकलीफ नहीं और करना भी क्या है? हां, स्टैमिना अवश्य चाहिए, कहीं खड़ेखड़े दिल धड़कना न बंद कर दे.

गिनती की तो सामने 55 जवान व बूढ़े खड़े थे. अगर हरेक पर 3-3 मिनट लगता है तो ढाई या 3 घंटे लगेंगे. खैर, देखते हैं क्या होता है?

?ोले से यह सोच कर किताब निकाली कि चलो, 2-3 अध्याय ही पढ़ लिए जाएं. वैसे भी हमारी आदत है कि जहां किसी काम के लिए बैठना या खड़े रहना पड़ेगा वहां हम कोई किताब जरूर ले जाते हैं, टाइम पास के लिए. अभी 3 पन्ने पढ़े ही थे कि दफ्तर खुला. आधे घंटे में 5 प्राणी अंदर घुसे. हम गम में डूब गए, अब क्या होगा? सामने वाले पुरुष ज्ञानी व दयालु निकले. पूछा तो उन्होंने सवाल किया, ‘‘आप को क्या करवाना है?’’

‘‘नया राशनकार्ड बनवाना है.’’

‘‘सौगंधपत्र बनवा लिया है?’’

‘‘यह क्या बला है.’’

वे हंसे (हमारे दुख पर), ‘‘अरे, ऐफिडेविट. इस के बिना कुछ नहीं होगा. आप इसे बनवा लीजिए.’’

‘‘बगल वाली इमारत में इस का दफ्तर है. वहां आवेदनपत्र भी मिल जाएगा और स्टैंपपेपर भी.’’

हम उस ओर भागे.

रास्ते में एक और सज्जन से पूछा, ‘‘सौगंधपत्र यहां कहां पर बनता है?’’

वे भी ज्ञानी व मार्गदर्शक निकले. बोले, ‘‘यहीं बनता था, किंतु गांधी- जयंती के बाद से अब नर्मदा भवन में बनता है.’’

वडोदरा शहर की खासीयत है कि सभी सरकारी आफिस, दोचार किलोमीटर के भीतर ही मिल जाते हैं. उन्हें धन्यवाद दे कर हम नर्मदा भवन भागे.

नर्मदा भवन में 3 देवियों ने हमारी बहुत सहायता की. एक सज्जन ने फार्म तो दे दिया किंतु कुबेर भवन जाने की सलाह दी. हम अब तक काफी अनुभव प्राप्त कर चुके थे. कुछ शंका हुई और पास खड़े चौकीदार की तरफ देखा. वह भी अनुभवप्राप्त प्राणी था उस ने अपने पास बुलाया फिर अंदर इशारा किया, ‘‘उस महिला से मिलो.’’

उस युवती ने फार्म भरवाया फिर बिजली बिल, पासपोर्ट की कापी इत्यादि नत्थी की और अंदर दाईं तरफ की मेज पर जाने को कहा.

वहां एक मुहर लगाई गई, रजिस्टर में कुछ लिखा गया और 11 नंबर का सिक्का दिया और कहा, ‘‘उस 11 नंबर के काउंटर पर जाइए, वहां आप का सब काम हो जाएगा.’’

11 नंबर काउंटर की कुमारी मुसकराई तो बड़ी भोली लगी. वह थी तो दुबलीपतली पर बहुत खूबसूरत थी. बोली, ‘‘कहिए?’’

‘‘पहले अपना नाम बताइए.’’

वह खिले चेहरे से बोली, ‘‘निकी.’’

‘‘आगे?’’

‘‘पाटिल.’’

‘‘कुछ खातीपीती नहीं हो क्या? देखो, हाथ की हड्डी भी उभरी हुई दिख रही है और उम्र तो 17 की होगी.’’

मुसकरा कर बोली, ‘‘अंकल, खाती बहुत हूं किंतु वजन नहीं बढ़ता, और 22 वर्ष की हूं.’’

‘‘पढ़ाई कितनी की, बी.कौम या 12वीं?’’

‘‘नहीं, कंप्यूटर साइंस में डिप्लोमा किया है.’’

‘‘और शादी?’’

उस ने सिर हिला दिया.

हम ने सोचा कि इसे अपने बेटे के लिए गांठ लें तो बहुत भाग्यवान सम?ोंगे.

अपने काम के बीच में बोल पड़ी, ‘‘क्या सोच रहे हैं, अंकल?’’

लगता है, हमारे मन के विचारों को उस ने पढ़ लिया था. सो बोला, ‘‘सोच रहा था कि तुम्हारी व मेरे बेटे की जोड़ी कैसी रहेगी? वह भी अविवाहित है. वैसे तुम मेरा काम पूरा करो नहीं तो बातों ही बातों में पूरा दिन बीत जाएगा.’’

उस ने कनखियों से हमें घूरा, आंखों से आश्चर्य जाहिर किया. सोचा होगा कि कैसे अंकल से पाला पड़ा है, काम के साथ रिश्ता भी ले आए. फिर कहा, ‘‘20 रुपए दीजिए, अंकल. यहां हस्ताक्षर कीजिए और सीधे खड़े रहिए. मुझे आप की फोटो खींचनी है, सौगंधपत्र पर जाएगी.’’

फोटो खींचने के बाद निकी ने भरा फार्म हमें थमाते हुए उप मामलतदार की तख्ती की तरफ इशारा किया कि वहां यह दे दीजिए. वे रजिस्टर में इसे दर्ज व हस्ताक्षर कर आप को दे देंगी.

उस को धन्यवाद दे हम आगे बढ़े.

कुछ ही देर में नर्मदा भवन का सारा काम समाप्त हुआ. सौगंधपत्र हमारे हाथ में था.

घड़ी में देखा तो साढ़े 12 बज चुके थे. सोचा, शायद आज ही काम बन जाए और हम कुबेर भवन जा पहुंचे.

देखा, भीड़ तो कम थी. करीब 20 प्राणी. हम भी उन्हीं में लग गए, 21वें. सामने एक जवान था. परिचय किया, ‘‘आप का नाम?’’

‘‘हितेनभाई.’’

हम ने कहा, ‘‘यार, जरा आगे जा कर पता लगा लो कि भीड़ कितनी रफ्तार से चल रही है और नए राशनकार्ड के लिए कुछ और ?ामेला यानी कुछ और कागजात तो नहीं चाहिए. मैं कतार में तुम्हारी जगह सुरक्षित रखता हूं.’’

हितेन मान गया और आगे दरियाफ्त कर के बदहवास हालत में वापस लौटा. बोला, ‘‘नया राशनकार्ड यहां नहीं भुतड़ी कचहरी में बनता है. यहां केवल पुराने कार्डों के नाम या बदले पते ठीक किए जाते हैं.’’

‘‘अच्छा, यह भूत की कचहरी है कहां?’’

‘‘मुझे नहीं मालूम.’’

हमारा यह वार्त्तालाप एक और सज्जन सुन रहे थे. बीच में आ गए, ‘‘मैं जानता हूं और मुझे भी वहीं जाना है. जुबली बाग यहां से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर है.’’

हितेनभाई के पास मोटरसाइकिल थी, हमारे पास स्कूटर तो हम ने उस सज्जन से कहा, ‘‘चलिए, आप को ले चलते हैं. रास्ता बता दीजिएगा.’’

भुतड़ी कचहरी में केवल 4 लोग कतार में थे. हमारा नंबर आने पर अधिकारी बदतमीजी से बोला, ‘‘यह क्या है? आवेदनपत्र कहां है, ऐफिडेविट व मतदाता पहचानपत्र कहां है?’’

‘‘यह रहा आवेदनपत्र और यह ऐफिडेविट है. मतदाता पहचानपत्र खो गया.’’

‘‘उस के बिना कुछ नहीं होगा. वह लाओ. कहां से आए हो?’’

‘‘वैसे तो बरेली, यू.पी. का रहने वाला हूं लेकिन वडोदरा में 22 साल से रह रहा हूं. अभी तक राशनकार्ड की कभी कोई जरूरत नहीं पड़ी. इसलिए बनवाया नहीं था.’’

‘‘तो अब कौन सी जरूरत आन पड़ी है?’’

‘‘गैस सिलेंडर वाला राशनकार्ड दिखाने को कह रहा है.’’

उस ने हमारे सारे कागज वापस करते हुए कहा, ‘‘जाओ, मेरा समय बरबाद न करो. बाहर दाईं तरफ दरवाजे पर एक आदमी बैठा है. वह आप को सब सम?ा देगा कि क्याक्या लाना है.’’

हम निराश हो बाहर निकले. देखा हितेन भी मुंह लटकाए खड़ा था. उस को भी अधिकारी ने ?िड़क दिया था. बाहर के आदमी से पूछा तो वह ज्ञानी निकला. हमारे कागजात देखे और सुझाव दिया.

‘‘यहां कुछ नहीं होगा. आप कुबेर भवन के नीचे कमरा नं. 23 में जाइए. वहीं सब काम होगा.’’

‘‘लेकिन वहां से तो हम आए हैं. और यहां उस अंदर के बाबू ने यह सब और मांग लिया. कहां से लाएंगे?’’

‘‘आप उन की परवा न कीजिए. जैसा मैं कहता हूं वैसा कीजिए.’’

वहां से हट कर हम उबल पड़े. ‘‘सच, हम भारतवासियों को एकदूसरे को तड़पाने व तड़पते देख खूब आनंद आता है. कभी कहते हैं यह लाओ, कभी कहते हैं वह लाओ.’’

हमारे समाज में पुरुषों को रोना वर्जित है, स्त्री होते तो दहाड़ मारमार कर रो लेते. गम में डूबे हुए जब कुबेर भवन पहुंचे तो देखा कमरा नंबर 23 बंद हो चुका था.

8वीं मंजिल पर बहू से जा कर मिले तो उस ने कहा, ‘‘पापा, अपने कागज मुझे दीजिए. मैं अपनी एक मित्र से पूछताछ करवाऊंगी. वह नीचे की पहली मंजिल पर काम करती है और ऐसे मामलों को निबटाती भी है.’’

हम बोले, ‘‘ठीक है, बेटी. कोशिश करो. 400-500 तक खर्च करने को मैं तैयार हूं.’’

2 दिन बाद बहू का फोन आया, ‘‘मैं अपनी दोस्त के साथ राशन अधिकारी से मिली थी. बड़ा बदतमीज आदमी है. पहले तो एकदम मना कर दिया. फिर जब मैं ने कहा कि मैं भी राज्य सरकार में काम करती हूं तब माना. उस का रेट 500 रुपए है. आप अगले सोमवार को आइएगा.’’

हम ने बहू को धन्यवाद दिया. विक्रम और बेताल की कहानी में विक्रम की तरह सोमवार को हम फिर दफ्तर पहुंचे. बहू को फोन मिलाया तो वह नीचे उतर कर आई और लाइन में हमें खड़े देख संतुष्ट हुई. बोली, ‘‘मेरी दोस्त की किसी करीबी रिश्तेदार की 2 दिन पहले मौत हो गई है. वह कई दिन नहीं आ पाएगी. अच्छा किया आप लाइन में लग गए.’’

कतार में करीब 25 लोग लगे थे. 40 मिनट में अपना नंबर आ गया. साहब के पास कागज का पुलिंदा रख चुपचाप खड़े हो गए. सब पन्नों पर उन्होंने एक निगाह डाली फिर कुछ कहे बिना हस्ताक्षर कर हमें बाहर की तरफ इशारा कर दिया.

बाहर गए. पावती पाने वालों की कतार लगी थी, यानी कागज व रुपए जमा कर रसीद लेना. इस कतार मेें हम घंटे भर तक धीरेधीरे सरकते रहे फिर आफिस के अंदर दाखिल हुए. 20 रुपए दिए, रसीद मिली और आदेश मिला कि 5 नवंबर को शाम 4 से 6 बजे के बीच कार्ड लेने आ जाना.

रसीद को पर्स में संभाल कर रखा (खरा सोना जो हो गया था) ऊपर भागे बहू को धन्यवाद देने. देखें, अब 5 नवंबर को क्याक्या गुल खिलते हैं.

5 नवंबर को राशनकार्ड मिल गया, आप को आश्चर्य हुआ न? हमें भी हो रहा है, आज तक. Social Story

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