Hindi Social Story: मायके के सुख-दुख में सहभागी बनी सुवीरा ने अपना पूरा जीवन उन को समर्पित कर दिया. लेकिन उन्होंने कदमकदम पर सुवीरा और उस के पति को न केवल अपमानित किया बल्कि उस से नाता भी तोड़ दिया. अपने अंतिम समय में अम्मां और भाई को एक नजर देखने की उसकी अभिलाषा क्या पूरी हो पाई?

पदचाप और दरवाजे के हर खटके पर सुवीरा की तेजहीन आंखों में चमक लौट आती थी. दूर तक भटकती निगाहें किसी को देखतीं और फिर पलकें बंद हो जातीं. सिरहाने बैठे गिरीशजी से उन की बहू सीमा ने एक बार फिर जिद करते हुए कहा था,  ‘‘पापा, आप समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे? जब तक नानीजी और सोहन मामा यहां नहीं आएंगे, मां के प्राण यों ही अधर में लटके रहेंगे. इन की यह पीड़ा अब मुझ से देखी नहीं जाती,’’ कहते-कहते सीमा सिसक उठी थी.

बरसों पहले का वह दृश्य गिरीशजी की आंखों के सामने सजीव हो उठा जब मां और भाई के प्रति आत्मीयता दर्शाती पत्नी को हर बार बदले में अपमान और तिरस्कार के दंश सहते उन्होंने ऐसी कसम दिलवा दी थी जिस की सुवीरा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

‘‘आज के बाद अगर इन लोगों से कोई रिश्ता रखोगी तो तुम मेरा मरा मुंह देखोगी.’’

बरसों पुराना बीता हुआ वह लम्हा धुल-पुंछ कर उन के सामने आ गया था. अतीत के गर्भ में बसी उन यादों को भुला पाना इतना सहज नहीं था. वैसे भी उन रिश्तों को कैसे झुठलाया जा सकता था जो उन के जीवन से गहरे जुड़े थे.

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