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Best Hindi Story : निडरता – देश के लिए मरमिटते एक सैनिक कहानी

Best Hindi Story : देश के लिए मरमिटना है बस यही एक जज्बा दिल में लिए हम मौत के सामने सीना ताने खड़े थे. फौजी थे, देश की लाखों जानों की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी थी.

1965 की लड़ाई चल रही थी. यूनिट को मोरचाबंदी करने के लिए बहुत कम समय दिया गया था. पूरा डिव 5 सितंबर को सांबा से आगे बैजपुरा इलाके में फैल गया था.
मुझे याद है 7 सितंबर को रात में 11 बजे हमारे तोपखाने ने अपनी तोपों के मुंह खोल दिए थे. पूरा पश्चिम लाल हो गया था. सभी जवान और अधिकारी बाहर आ गए थे. उसी समय आदेश आया कि एडवांस वर्कशौप डिटैचमैंट जाएगी. उस के लिए पहले से 2 गाडि़यां तैयार की गई थीं. एक में जनरल स्टोर, वैपन स्टोर और इलैक्ट्रौनिक स्टोर था जिस का इंचार्ज मैं था. दूसरी गाड़ी में गाडि़यों और टैंकों के स्पेयर पार्ट्स थे जिस का इंचार्ज एक बंगाली स्टोरकीपर अमल कुमार दत्ता था.

मैं पंजाब का और दत्ता बंगाल का, दोनों ही निडर थे. मेरी गाड़ी का ड्राइवर एक मद्रासी लड़का सिपाही राजू था. दूसरी गाड़ी का ड्राइवर सिपाही सुरिंदर पंजाब से था. बंगाल और पंजाब का संगम था. सब निडर थे.

जब हम ने और गाड़ियों के साथ मूव किया तो रात को एक बज चुका था. बिना लाइट के चलना था. लड़ाई में लाइट जला कर नहीं चला जाता. लाइट जले तो गोला वहीं आता है. यह अच्छा हुआ था कि चांदनी रात थी. हालांकि पाकिस्तान चौकी ज्यादा दूर नहीं थी लेकिन पाकिस्तान में घुसने में सुबह के 5 बज गए. डोगरा रैजिमैंट के जवान हमें गाइड कर रहे थे. उन्होंने कहा, ‘गाडि़यों को तुरंत डिस्पर्स करें. एयरअटैक होने वाला है. ऐसे समय वृक्षों के नीचे जहां भी जगह मिलती है, गाडि़यां पार्क की जाती हैं. वहीं लेट जाना होता है.

अभी गाड़ियां पार्क हो ही रही थीं कि जबरदस्त एयरअटैक हुआ. ऐसे अटैक फर्स्ट लाइट में किए जाते हैं जब सभी रिलैक्स होते हैं. एयरअटैक खत्म हुआ तो सभी पाकिस्तान में आसपास के खेतों में चले गए. हमारे पास घिसी करने के अलावा कोई चारा नहीं था. मेरे स्टोर में लिक्विड सोप था. उसे हाथ पर मला और वाटर टैंक से बूंदबूंद आते पानी से हाथ साफ कर लिए. कई तो यह भी नहीं कर सके. हैंडटूहैंड लड़ने वाले जवान ऐसी स्थिति से कैसे निबटते होंगे, केवल अनुमान ही लगा सकते हैं. ये नैचुरल कौज किसी के रोके नहीं रुकती है पर सब मैनेज करना पड़ता है.

पौ फट रही थी. उसी समय हुक्म हुआ कि अपनाअपना नाश्ता और लंच ले लो. हमें तुरंत आगे मूव करना है. नाश्ता क्या था, नमकीन शकरपारे थे. उन्हें ही हमें नाश्ते और लंच के लिए इस्तेमाल करना था. आदेश ऐसा था जो भी खाकी यूनिफौर्म में दिखाई दे उसे तुरंत गोली मार दें. फ्रंट सीट पर मैं बैठा था. गाड़ी के ऊपर का ढक्कन खोल कर सीट पर खड़ा हो गया. कारबाइन मशीन को फायरिंग पोजिशन पर ले आया. मैगजीन चार्ज कर लिया यानी एक गोली चैंबर में चली गई. सेफ्टी कैच को रैपिडफायर पर कर लिया ताकि फायर करने की जरूरत पड़े तो बैरल से एकएक या दोदो गोलियां निकलें.

हमारे अगले डैस्टिनेशन के बीच पाकिस्तान का केवल चारवां गांव था. हमें महाराज के गांव में मोरचाबंदी करनी थी. दोनों गांवों में काफी दूरी थी. हमें चारवां में कोई दुश्मन नहीं मिला. हां, रास्ते के दृश्य देख कर मन विचलित हुआ. सैकड़ों लाशें जगहजगह पड़ी थीं. लाशें फूल कर डरावनी हो गई थीं. आसमान में हजारों चीलकौए मंडरा रहे थे मानव मांस खाने का लुत्फ उठाने के लिए. उन के लिए हिंदुस्तान व पाकिस्तान के शवों में कोई अंतर न था. वे नरभक्षी थे.

मुझे आश्चर्य हुआ कि यह जानते हुए भी कि हिंदुस्तान कई फ्रंट खोल सकता है, पाकिस्तान ने अपने गांव खाली क्यों नहीं करवाए. मरने वाले सभी सिविलयन थे. शवों को बुल्डोजर से इकट्ठा कर के दफनाया जा रहा था. सेना के इंजीनियर विभाग के जवान इस कार्य को अंजाम दे रहे थे. सेना में आए मुल्ले उन के लिए कलमा पढ़ रहे थे, सजदा कर रहे थे. यह भारतीय सेना का मानवीय पक्ष था कि वे दुश्मन के शवों को भी सम्मान देते हैं. हमारे शहीद जवानों को पीछे अस्पतालों में भिजवाया जा रहा था जिस से उन के घरवालों के आने तक सुरक्षित रखा जा सके.

महाराज के गांव तक पहुंचने के रास्ते में 2 बार एयरअटैक हुए. गाडि़यां जल्दी से दूरदूर डिस्पर्स कर के, जिस को जहां जगह मिली, लेट गए. सुरक्षा के लिए ऐसा करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं होता. गाडि़यों का नुकसान भरा जा सकता है लेकिन जवान शहीद हो जाएं तो उस नुकसान को भरना मुश्किल होता है. यह अच्छा हुआ कि दोनों एयरअटैक में हमारा कोई नुकसान नहीं हुआ.

महाराज के सामने बड़े मैदान में यूनिट ने राउंड शेप में मोरचाबंदी कर ली. यानी, चारों तरफ मोरचे, बीच में दूरदूर गाडि़यों का डिस्पले. गाडि़यां भी इस तरह पार्क की जातीं कि एक का मुंह अगर पूर्व की तरफ है तो दूसरी का मुंह पश्चिम की तरफ होता. उस के बाद कैमाफ्लाइज नैट लगा कर इस तरह छिपाया जाता कि किसी को पता नहीं चलता कि यहां कोई गाड़ी पार्क है.

लड़ाई में हमारी वर्कशौप पर जबरदस्त लोड था. हालांकि हमारी रिपेयर टीमें फास्टमूविंग लाइटें ले कर रैजिमैंटों के साथसाथ चलती थीं. टैंक या गाडि़यां रिपेयर कर के तुरंत लड़ाई में शामिल कर देते थे. टैंक या गाडि़यां पीछे वर्कशौप में वही आती थीं जो रिपेयर टीमें ठीक नहीं कर पातीं.

उस समय हमारे पास सेंचुरियन और शरमन टैंक थे. दोनों टैंक ब्रिटिश मेड थे. सारे पश्चिमी देश पाकिस्तान के साथ थे. शरमन टैंक ठीक चल रहे थे लेकिन सेंचुरियन टैंक में गन को घुमाने वाला पुर्जा ‘फंक्शन एंड कंट्रोल यूनिट’ खराब हो जाता था. गन फायर तो करती लेकिन चारों तरफ घूम नहीं पाती थी. ब्रिटेन ने इस पुर्जे के लिए हाथ खड़े कर दिए थे.

शरमन टैंक पाकिस्तान के पैटर्न टैंक का मुकाबला नहीं कर पाते थे. स्टोर में जितना फंक्शन एंड कंट्रोल था, वह खत्म सा हो गया था. हमारा चैक यह होता था कि पुराना ले कर नया देते.

टैलिकौम आइटम था. सभी अफसर और टैलिकौम मेकैनिक इसे ठीक करने में लगे हुए थे. इस छोटे से पुर्जे के कारण जिस तरफ गन का मुंह होता उसी तरफ वह फायर कर पाती थी. पाकिस्तान के पैटर्न टैंक उन्हें आसानी से शिकार बना लेते. काफी नुकसान हो रहा था.

फिर एक टैलिकौम मेकैनिक हवलदार लाल सिंह के मन में आइडिया आया कि यह एक फ्यूज है जिस के कारण यह पुर्जा काम नहीं कर पाता. अगर इसे किसी गुडकंडक्टर से जोड़ दिया जाए तो वह फ्यूज का काम करने लगेगा. वे मेरे पास स्टोर में आए और 2 तरह की पैकिंगवायर ले कर गए. मैं पैकिंगवायर की डिस्क्रिप्शन नहीं दे सकता. उन्होंने प्रयोग किया और वे सफल रहे. टैंक पर लगा कर उसे टैस्ट किया गया. गन चारों तरफ घूमने लगी. समस्या का समाधान हो गया था. रिपेयर टीम को बता दिया गया कि यह पैकिंगवायर का टुकड़ा फ्यूज का काम करेगा. फिर टैंक नहीं रुके.

रन-औफ-कच्छ की छोटी सी लड़ाई में कुछ पैटर्न टैंक पकड़े गए थे. उन पर प्रयोग किए गए कि कौन से गोले से इसे बरबाद किया जा सकता है. तीन तरह के गोले तैयार किए गए. एक गोला ऐसा था जो टैंक में सुराख कर के अंदर के क्रीयू को खत्म करता. टैंक को वैसे ही कैप्चर कर लिया जाता. एक गोला हवा में फट कर आसपास लेटे दुश्मनों को समाप्त करता. एक गोला ऐसा था जो टैंक में आग लगा देता. आदेश यह था कि ज्यादा से ज्यादा टैंक कैप्चर किए जाएं. आज देश में जगहजगह वही टैंक खड़े हैं.

हमारा रियर कपूरथला में था. वहां से जल्दी मूवमैंट के कारण बहुत सा स्टोर रह गया था. लड़ाई में उन की सख्त जरूरत थी.
एक पार्टी बनाई गई जिसे कपूरथला से सारा स्टोर लाने के लिए कहा गया. उस पार्टी में मैं भी था. एक और हवलदार सरदूल सिंह थे जिन का घर जालंधर के पास किसी गांव में था. मेरा घर अमृतसर में था. हम दोनों से कहा गया 2 दिन अपने घर में रह कर कपूरथला रिपोर्ट करना. मकसद यह था कि जिन के घर पंजाब में हैं और रास्ते में आते हैं, वे अपने घरवालों से मिल लें. उन्हें कुछ तसल्ली हो जाएगी कि वे ठीक हैं.

कपूरथला के लिए गाड़ी लंच के बाद चली. चाहते थे, दिन में जितना सफर हो जाए, अच्छा है. लेकिन पठानकोट पहुंचते ही रात के 8 बज गए थे. वहां साथ लाया डिनर किया और आगे का सफर शुरू किया. गाड़ी से बटाला-बाबा-बकाला होते हुए जालंधर से कपूरथला चले जाना था. अंधेरे में ही सफर करना था. लड़ाई में गाड़ी की लाइटें नहीं जला सकते थे.

गाड़ी अमृतसर के रास्ते जाती तो मैं अमृतसर उतरता. मैं ने गुरदासपुर में उतरने का निर्णय किया. गुरदासपुर में मेरी मौसी रहती थी. रात वहां गुजारने की सोची. ड्राइवर ने जब मुझे गुरदासपुर उतारा तो रात के 10 बज चुके थे. चारों तरफ अंधेरा था. ब्लैकआउट था. कोई बंदा दिखाई नहीं दे रहा था. मैं यूनिफौर्म में था और कारबाइन मशीन मेरे कंधे पर थी.

मैं पैदल ही मौसी के घर की ओर चल पड़ा. उसी समय पंजाब पुलिस का एक सिपाही मेरे पास आया. वह बरसते गोलों में भी अपनी ड्यूटी कर रहा था. साइकिल उस के पास थी. पंजाबी में पूछा, ‘‘बाऊजी, तुसीं कित्थे जाना ऐ?’’
मैं ने कहा, ‘‘कृष्णा महल्ले में मेरी मौसी रहती है. मैं ओथे जा रहया हां.’’
‘‘बाऊजी, मेरी साइकिल ते बैठो. मैं तुहानू छड देदां हां. चाहे तुसीं फौजी हो, लड़ाई दा टाइम ऐ. मैं कोई रिस्क नई लैना चाहदां.’’
मुझे बहुत अच्छा लगा. मैं ने कहा, ‘‘कोई गल नई, तुसीं छड दो.’’

पुलिस के सिपाही ने मुझे मौसी के घर छोड़ा. मैं ने उस का धन्यवाद किया. मैं ने मौसी का दरवाजा खटखटाया और कहा कि, ‘मैं बिंदी हूं.’ दरवाजा तुरंत खुल गया. सिपाही तब तक नहीं गया जब तक मैं घर के अंदर नहीं चला गया. सभी बैठक में रेडियो के पास बैठे खबरें सुन रहे थे. मैं ने मौसाजी को प्रणाम किया. कलानौर से मेरे मझले मामाजीमामीजी भी आए हुए थे. कलानौर डेरा बाबानानक के पास था और तोप के गोलों की रेंज में था. मैं ने उन्हें भी प्रणाम किया.

मेरा नाना परिवार और दादा परिवार जानते थे कि मैं लड़ाई में गया हूं. वे सब मेरे लिए चिंतित थे. मुझे यूनिफौर्म और हथियार के साथ देख कर थोड़ी देर के लिए चिंता मिट गई. मैं ने बताया कि हमारी यूनिट पाकिस्तान में चविंडा के पास महाराज के गांव में है. हम तोप के गोलों से तो दूर हैं लेकिन एयरअटैक से बच नहीं पाते हैं. फिर भी रातदिन काम करते हैं. घुप्प अंधेरे में भी. 2 दिन अमृतसर रह कर कपूरथला से स्टोर ले कर लड़ाई में शमिल होना है. कपूरथला में हमारा रियर है.
‘‘चविंडा में तो बहुत जबरदस्त लड़ाई चल रही है. रेडियो पर यही बताया जा रहा है,’’ मौसाजी ने कहा.
‘‘जी, मौसाजी. चविंडा हम से 3 किलोमीटर आगे है. हमारे वापस जाने तक उन्हें सियालकोट से पीछे धकेल दिया जाएगा. वैसे, अल्लड़ रेलवे स्टेशन पर हमारा कब्जा हो गया है. इस से सियालकोट से डेरा बाबा नानक की रेल सप्लाई बंद हो गई है. सड़कों के रास्ते पहले ही बंद कर दिए गए थे.’’

मामीजी ने मेरे लिए आलू के परांठे बनाए और खा कर मैं सो गया. सुबह नाश्ता कर के मैं अमृतसर के लिए निकला. लड़ाई में भी बसें चल रही थीं. मझले मामाजी भी मेरे साथ हो लिए. मैं यूनिफौर्म में और हथियार के साथ था. प्राइवेट बस थी, फिर भी बस वाले ने मुझ से किराया नहीं लिया. बस में बैठी सवारियों के चेहरों पर कोई डर नहीं था. सभी मुझ से लड़ाई के बारे जानना चाहते थे. मैं ने कहा, ‘‘मैं ज्यादा नहीं बता सकता लेकिन उन की बैंड बज रही है.’’
वे जानना चाहते थे कि मैं इस समय कहां हूं. मैं ने कहा, ‘‘मैं सुरक्षा कारणों से अपनी लोकेशन नहीं बता सकता. हां, सियालकोट सैक्टर में हूं.’’

फिर किसी ने कोई सवाल नहीं किया. एक जगह बस रुकी. 2 युवा लड़कियां बस में चढ़ीं. उन के हाथ में लिफाफे और चाय का थरमस व कप थे. वे फौजियों को ढूंढ़ रही थीं. मुझे देखा तो तुरंत मुझे एक लिफाफा और गरमगरम चाय दी. मैं ने मामू के लिए भी मांगा. उन्होंने खुशी से दी. पंजाब में फौजियों के लिए जगहजगह खानेपीने की व्यवस्था थी. कोई जवान भूखा न जाए, ऐसी व्यवस्था जम्मूपठानकोट रोड पर भी थी. लगा पूरा देश लड़ाई लड़ रहा है. लिफाफे में गरमगरम पकौड़े थे.

उन दिनों फौजी गाडि़यों की बहुत मूवमैंट थी. कोई भी फौजी बिना खाएपिए नहीं जा पाता था. यह देशवासियों की बहुत बड़ी सेवा थी. उन्हें किसी ने ऐसा करने के लिए नहीं कहा था. अपने मन से वे सब सेवा कर रहे थे. देश के प्रति उन का यह जज्बा आश्चर्यजनक था. एक मोरचा युद्ध के मैदान में था जिसे हम सैनिक संभाले हुए थे, एक मोरचा हमारे देशवासी यहां संभाले हुए हैं. मैं उन की इस सेवा के समक्ष नतमस्तक हो गया.

अमृतसर बसस्टैंड पर उतरा तो मामू मेरे साथ नहीं आए. मैं ने उन से कहा भी लेकिन उन्होंने कहा, ‘‘मैं पहले मौडल टाउन बड़ी बहन के पास जाऊंगा.’’

फिर मैं कुछ नहीं बोल पाया. स्टैंड से बाहर निकला तो कई रिक्शेवाले पूछने लगे कि बाऊजी कहां जाना है. हम छोड़ देते हैं. फिर एक रिक्शेवाले ने कहा, ‘‘मैनू तुहाडे घर दा पता ऐ. तहसीलपुरा में है.’’
मैं ने उसे ध्यान से देखा. यह ज्ञान सिंह था. मेरे साथ चौथी तक पढ़ा था. मैं उस के रिक्शे पर बैठ गया, कहा, ‘‘यार, मेरे कोल टुटे पैसे नहीं ए.’’
‘‘कोई गल नई, बाऊजी. तुसीं देश दी सेवा कर रहे हो. असीं फौज च जाके सेवा नई कर सकदे. एह छोटी जेई सेवा कर के सानू लग्गेगा कि असीं वी लड़ाई लड़ रहे हां.’’
मैं कुछ नहीं बोल पाया. भावुक हो उठा. मैं ने बात बदल दी, ‘‘ज्ञान, तुसीं अग्गे नई पढ़े?’’
‘‘कित्थे बाऊजी, गरीबी ऐनी सी दालरोटी नई चल पांदी सी. मैं छोटा सी, मैंनू मजदूरी वी नई मिलदी सी. मां कई जगह झाड़ूपोंछा करती थी. मैं बड़ा हुआ तां मेरे पास रिक्शा चलान दे अलावा कोई चारा नई सी.’’
घर आया तो मैं ने घर से पैसे ले कर देने की कोशिश की लेकिन उस ने नहीं लिए. घर वाले मुझे देख कर खुश हुए.
2 दिन रह कर मैं जीटी रोड पर आ गया. बहुत सी फौजी गाडि़यां जालंधर जा रही थीं. एक गाड़ी में जगह मिल गई. उस ने जब मुझे कपूरथला रोड पर छोड़ा तो अंधेरा घिर आया था. उस समय बस मिलने का कोई चांस नहीं था. मैं पैदल ही कपूरथला की ओर चल पड़ा.
मेरे पीछे आ रहे एक साइकिल वाले ने पूछा, ‘‘साहबजी, तुसीं कित्थे जाना ऐ ते पैदल ही क्यों जा रहे हो?’’
उन दिनों फौजियों की पंजाब में बहुत इज्जत थी. मैं ने कहा, ‘‘मैंनू कपूरथला जाना ऐ. पैदल चलूंगा तो सुबह तक पहुंच जाऊंगा.’’
‘‘साहबजी, कपूरथला ऐथों 20 किलोमीटर दूर ऐ. ऐस वेले कोई सवारी वी नई मिलनी ऐ. सवेरे 8 बजे बस आएगी, ओदे च चले जाना. रात मेरे घर रुकोजी.’’

मैं जल्दी से निर्णय नहीं कर पाया. लड़ाई चल रही है, किसी अनजाने घर में रुकना ठीक रहेगा या नहीं?
‘‘तुसीं कुज न साचोजी. रात दा वेला ऐ. ऐस सड़क ते सारे पिंड पैरा दे रहे ने. कई तुहानू परेशान कर सकदे ने. चाहे तुसीं वर्दी च हो. कई घटनावां होइयां ने फौजियों से हथियार लूट कर ले गए हैं.’’
मैं ने कुछ देर सोचा, फिर उस के साथ हो लिया. उस के घर में मेरी जबरदस्त सेवा की गई. बढि़या खाना मिला और शानदार बिस्तर दिया गया. रात मैं ने आराम से काटी. सुबह उस का धन्यवाद कर के बस के लिए मैं सड़क पर आ गया. उन अनजान लोगों की सेवा को मैं जीवनभर भूल नहीं पाया.

थोड़ी देर बाद हवलदार सरदूल सिंह भी बस के लिए मेरे पास आ कर खडे़ हो गए. मैं ने उन्हें जयहिंद कहा. उन्होंने मुझ से हाथ मिलाया. कपूरथला रियर में पहुंचे तो नाश्ता तैयार था. नाश्ता किया और वापस चल पडे़. स्टोर पहले ही गाड़ी में लोड कर दिया गया था. लंच नहीं बनाया गया था. जगहजगह लगाए गए लंगर से खाने का इरादा था.

शाम को हम पठानकोट पहुंचे. लंगर से लिया डिनर किया और आगे का सफर शुरू किया. यूनिट में हम रात को एक बजे पहुंचे. सभी मोरचों पर थे. गाड़ी पार्क कर के हम भी मोरचे पर खड़े हो गए. सोने का प्रश्न ही नहीं था. रात को एयरअटैक नहीं होते थे लेकिन घात लगा कर बैठे दुश्मन के अटैक करने का हमेशा खतरा था. उस के लिए पूरी यूनिट मोरचे पर रहती थी.

22 दिन की इस लड़ाई में न सो सके, न नहा सके और न ही ठीक से खाना मिला. पाकिस्तान के कई कुओं में जहर मिलाया गया था. वे नहाने के काबिल भी नहीं थे. स्किन डिजीज होने का खतरा था. वाटर टैंकों से हिंदुस्तान से पानी आता था. केवल 2 बोतल पानी मिलता. उस से आप कुछ भी कर लें. काम करते हुए खुद को बचाने की प्राथमिकता थी.

वर्कशौप में हमारे सैक्शन की जिम्मेदारी होती थी कि हम कलपुर्जों की कमी न होने दें. पहले कहा गया कि सिर्फ ब्रिगेड की गाडि़यों को रिपेयर करेंगे. फिर कहा गया, पूरे डिव की गाडि़यों को एंटेरटेन करेंगे. हमारी पूरी सप्लाई सिविल ट्रकों पर थी. उन पर एयरअटैक कम होते थे. उन्हें भी रिपेयर करने के आदेश आए. मैं और मेरे साथ एक अफसर रातदिन कलपुरजों को जम्मू, पठानकोट और जालंधर से कलपुरजे ला कर देते रहे. सभी सप्लायर दिल खोल कर सामान देते थे. वे कहते थे, ‘‘तुसीं सामान लै जाओ जी. लैटरहैड ते लिख के दे दो. बिलिंग कर के पैसे आदें रहनगे. पर पाकिस्तान नू ओना दी नानी याद दिला दो.’’

सीजफायर के बाद वे खुद महाराज के आ कर सप्लाई करते रहे. उन के बिलों के 6 महीने बाद पेमेंट किया जाना शुरू किया गया. ट्रकों के पेमेंट एक साल बाद तक किए जाते रहे. लड़ाकू फौज के जवान बताते हैं कि जहां ट्रक में 10 टन माल आता था, वे 12 टन माल लाते थे. इतने बहादुर थे कि कहते थे, ‘‘साहबजी, तुसीं सिर्फ लड़ो. सानू दसो कि माल कित्थे अनलोड करना ऐ.’’ उन्होंने मोरचे तक सामान पहुंचाया बिना किसी डर के.

महाराज के गांव के तीन तरफ बड़ेबड़े गन्ने के खेत थे. बिलकुल पोने गन्ने. भूख लगती तो सभी गन्ने चूपते. नित्यकर्म के लिए हमारे स्टोर में कौटनवेस्ट आती थी. सभी उस का प्रयोग करते थे. कई बार ऐसा होता कि हम नाश्ता ले कर स्टोर में आ जाते. उसी समय एयरअटैक होता. एक बार मुझे नाश्ता गाड़ी की टेलबोल्ट पर रखने का समय नहीं मिला. मैं ने उसे जमीन पर रखा और मोरचे पर आ गया. मेरी आंखों के सामने कुत्ता नाश्ता खा गया, मैं कुछ नहीं कर सका. यह नहीं पता चला कि वह कुत्ता पाकिस्तान का था या हिंदुस्तान का. उन के लिए कोई बौर्डर का बंधन नहीं था.

मुझे बाऊजी कहा करते थे कि जो दाना समय में न हो, उसे मुंह से भी गिर जाना है. उन की यह बात कितनी सच थी.

सीजफायर के बाद एमईएस से कहा गया कि वे हर यूनिट में ट्यूबवैल लगाएं. कई कौमन ट्यूबवैल भी लगाए गए जहां से वाटरटैंक से मैस के लिए पानी आता था. पूरा खाना औयलकुकरों पर बनता था जो बहुत शोर करते थे. उन के लिए गहरे मोरचे खोदने पर भी शोर कम न होता था. हमें चाय के साथ कभी नमकीनपूरी मिलती और कभी शक्करपारे मिलते. 22 दिन तक यही सिलसिला रहा.

सीजफायर के बाद सारी व्यवस्थाएं हो गईं. तब सभी के चेहरों पर सुकून दिखाई देने लगा. लड़ाई फिर कभी भी शुरू हो सकती है, इसलिए रिपेयर का जबरदस्त लोड हो गया. हम रातदिन कलपुर्जों के लिए भागते रहे. हां, नहाने और खाने की व्यवस्था ठीक हो गई.

इस बीच, ताशकंद समझते के बाद प्रधानमंत्री लालबहादुर शस्त्रीजी के मरने की खबर आई. पूरा देश शोक में डूब गया. भारतीय सेना को उम्मीद थी कि पाकिस्तान के जीते हुए इलाके के बदले पीओके ले लिया जाएगा. लेकिन ऐसा न हो सका. सेना इस सम?ाते से निराश थी. 6 महीने वहां रहने के बाद आदेश आया, 31 मार्च, 1966 तक हमें सारा इलाका खाली करना है. भारतीय सेना अनुशासनप्रिय है. वह आदेशों का पालन करती है.

छोड़ते समय कैंप फेयर होता है. बड़ा खाना किया जाता है. शहीदों को नमन किया जाता है. उन के परिवारों के लिए शोकसभा आयोजित की जाती है. जो घायल हैं उन के जल्दी ठीक होने की उम्मीद व्यक्त की जाती है. ठीक होने पर भी वे दोबारा सर्विस में आने के काबिल नहीं रहते. किसी का बाजू नहीं होता, किसी की टांग नहीं होती है. हां, उन का अच्छी तरह इलाज कर के मैडिकल पैंशन के साथ अन्य सुविधाएं दे कर घर भेज दिया जाता है. जिला सैनिक बोर्डों के जरिए उन्हें सरकारी नौकरियों में एडजस्ट किया जाता है. शहीद परिवारों के साथ भी ऐसा ही किया जाता है. कोशिश होती है कि उन्हें यों ही सड़क पर न छोड़ा जाए.

पाकिस्तान छोड़ने के बाद हमें जम्मू के पास छनियां गांव में जगह मिली. वहां काफी देर रहे यह सोच कर कि पाकिस्तान फिर कोई गड़बड़ न करे. इतने बड़े डिव की यूनिटों को पंजाब में एडजस्ट करना मुश्किल था. हमारी यूनिट को पटियाला में राजिंदरा अस्पताल के पास अंगरेजों के समय की बनी बैरकों में जगह मिली. उस से थोड़ा आगे यूनिट को वर्किंग प्लेस मिला.

पूरा स्टोर सैट करने में एक महीना लग गया. तब कहीं जा कर पहली लीवपार्टी गई. उस में मेरा नाम नहीं था. मैं ने घर में लिख दिया था कि मैं ठीक हूं, छुट्टी मिलने पर आऊंगा. मैं आता हूं या नहीं, घरवालों को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था. उन्हें पैसा चाहिए होता था, वह मिल रहा था. बाऊजी को छोड़ कर पूरा परिवार मेरे प्रति अभावुक था. परिवार में यह स्थिति हमेशा रही. लड़ाई में देश की निडरता और देशवासियों के सहयोग को मैं कभी भूल नहीं पाया.

Hindi Satire : अजीब शह हैं ये मूंछें भी

Hindi Satire : मूंछें अब मर्द की नहीं, घर की प्रौपर्टी बन चुकी हैं. इन पर ताव देने से पहले, बीवी के भाव जान लेना जरूरी है वरना कहीं ऐसा न हो कि मूंछों के चक्कर में आप का खाना, बरतन और बिस्तर-तीनों ड्राइंगरूम के सोफे पर चले जाएं.

कुछ सालों पहले एक वाक्य बहुत ही चर्चित हुआ था कि मूंछें हों तो नत्थूलाल जैसी. भई, कसम से हम ने तो आज तक न नत्थूलालजी को देखा न उन की मूंछों को. लेकिन आज हम जिन मूंछों की कथा आप को सुनाने जा रहे हैं, कसम से आप को बहुत ही आनंद आने वाला है.

आज हम किस्सा सुना रहे हैं अपने पड़ोसी शर्माजी की मूंछों का जो हम ने कड़कड़ाती ठंड में अपनी बालकनी में चाय पीते हुए सुना. अब क्या करें हमारी बालकनी व उन के बैडरूम की दीवारें लगी हुई हैं. सो, जब भी जोर से बातचीत होती है, हमारे कानों में, चाहे न चाहे, पड़ ही जाती है.

औफिस से आ कर जैसे ही हमें अपने पड़ोसी शर्माजी के घर से ऊंची आवाजें सुनाई दीं, हमारे दोनों कान एकदम से खड़े हो गए. अरे, ऐसा भला क्या हो गया जो शर्माइन इतने ऊंचे स्वर में शर्माजी को डांट रही हैं. फ्लैट में रहने का और कोई सुख हो न हो, एक बहुत बड़ा सुख यह है कि पड़ोस के घर की आवाजें चाहेअनचाहे सुनाई पड़ ही जाती हैं. वह क्या है कि दो ही स्थितियों में इंसान का स्वर ऊंचा हो जाता है- मौका गुस्से का हो या खुशी का. आवाजों की उठापटक से तो लग रहा है कि मौका गुस्से का ही है. हमारे खुराफाती दिमाग में विचारों की उछलकूद चलने लगी कि आखिर माजरा क्या है जो मिसेज शर्मा इतने गुस्से में जोरजोर से बोल रही हैं.

हम अपना चाय का कप ले कर जैसे ही बालकनी की तरफ जाने लगे, हमारी मिसेज ने टोका, ‘‘पगला गए हैं क्या जो इतनी ठंड में बालकनी में चाय पीने जा रहे हैं.’’ अब हम उन को कैसे समझाएं कि चाय की चुस्की के साथ यदि पड़ोसी की चटपटी खबर कानों में पड़ जाए तो चाय बिना चीनी के ही मीठी लगने लगती है, ऐसे में क्या सर्दी क्या गरमी.

लेकिन श्रीमतीजी से यह खुलासा भी नहीं कर सकते थे कि हम तो पड़ोस के शर्माजी के घर से आती ऊंची आवाजों का जायजा लेने को बालकनी में जा रहे हैं क्योंकि यदि उन्हें सच्चाई बताएं तो तुरंत कहेंगी कि छिछि, ऐसी ओछी हरकत करते शर्म नहीं आती आप को परंतु इस समय इन बातों में समय बरबाद न कर हम शर्माजी के बैडरूम की तरफ कान लगा कर चाय पीने लगे.

अधिक कुछ तो पल्ले नहीं पड़ा, परंतु मिसेज शर्मा बारबार मूंछ शब्द का प्रयोग कर रही थीं- ‘अरे, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मूंछ मुंड़वाने की. यू नो ये मूंछें तो मर्दों की आनबानशान होती हैं. यही मूंछें तो मर्दानगी की निशानी हैं. बिना मूंछ का आदमी भी कोई आदमी होता है.’ अनायास ही हमारा हाथ अपने चेहरे की तरफ चला गया, अरे, हमारी तो मूंछें हैं ही नहीं तो क्या हम आदमी नहीं हैं. फिर सोचा, मिसेज शर्मा कोई लाटगर्वनर थोड़े ही हैं जो यह तय करेंगी कि कौन आदमी कहलाने लायक है और कौन नहीं.

परंतु बात तो शर्माजी की मूंछों की हो रही थी, काफी देर कान लगा कर बस इतना सुनने में आया कि शर्माजी आज औफिस से आते समय अपनी मूंछें मुंड़वा आए थे. अब इस को शर्माजी के मन का वहम कहें या प्रमोशन न होने का दुख, क्योंकि आज औफिस में प्रमोशन की जो लिस्ट डिक्लेयर हुई थी, वे सब के सब बिना मूंछों वाले थे. सो, शर्माजी के दिमाग में आया कि कहीं ये मुई मूंछें ही तो उन के प्रमोशन में बाधा नहीं डाल रहीं.

उधर मिसेज शर्मा के आंसुओं की गंगाजमुना बहती जा रही थी. ‘अब तुम मेरे पापा के सामने क्या मुंह ले कर जाओगे. तुम्हारी इन्हीं मूंछों पर फिदा हो कर तो पापा ने मेरा हाथ तुम्हारे हाथ में दिया था. मुंछमुंडा लोगों से तो पापा को बहुत चिढ़ है. पता नहीं तुम्हें देख कर कैसे रिऐक्ट करेंगे. पापा का गुस्सा तो तुम जानते ही हो, बातबात पर बंदूक तान लेते हैं, फौजी जो रह चुके हैं. कहीं तुम्हारे साथ भी यही सुलूक…’

अब शर्माजी बेचारे पसोपेश में हैं कि अपने प्रमोशन को अधिक तवज्जुह दें या ससुरजी के गुस्से को.

मुई मूंछें हुईं न जी का जंजाल. वैसे, देखा जाए तो मूंछों का इतिहास उतना ही पुराना है जितना इंसान के जन्म का. जितनी तरह के इंसान उतनी तरह की मूंछें हैं. किसी की नुकीली हैं तो किसी की कंटीली. किसी की तलवारकट हैं तो किसी की राजसी. किसी की तितली छाप हैं तो किसी की झबरीले कुत्ते की पूंछ जैसी. किसी की छोटी हैं तो किसी की लंबी.

आजकल तो देशविदेश में मूंछों की अजीबोगरीब प्रतियोगिताएं भी होने लगी हैं. वर्ष 2021 में जरमनी में मूंछ प्रतियोगिता का आयोजन हुआ. उस में भाग लेने नीदरलैंड, इटली, स्विट्जरलैंड, आस्ट्रिया तक के लोग पहुंचे थे. उस प्रतियोगिता में जिन लोगों ने भाग लिया था उन का अपनी मूंछों के साथ प्रयोग काबिलेतारीफ था. बाकायदा सात जजों के पैनल ने इस का फैसला कर के दो लोगों को विजयी घोषित किया था. लोगों ने अपनी मूंछों के साथ अजीबोगरीब डिजाइन बनाए थे.

मूंछों के संदर्भ में याद आया कि हमारी दादी के चचिया ससुर की मूंछें तो पूरे 10 फुट लंबी थीं. सो, वे दोनों तरफ इन की चोटी बना कर, फिर इस का जूड़ा बना कर रखते थे. जब भी किसी शादीब्याह में जाना होता तो सब के आकर्षण का केंद्र तो बनते ही, साथ ही, अपनी मूंछों की खूब आवभगत करवाते.

मूंछें तो हमारे ससुरजी की भी खूब लंबी थीं. वे भी अपनी मूंछों का बहुत खयाल रखते, उन पर तेल चुपड़ कर हर रोज उन की कंघी करते. जब दूध पीते तो पूरी की पूरी दूध की मलाई उन की मूंछों में लग जाती. इतना ही नहीं, जब कुल्ला करते तो उन की मूंछें कथकली की तरह डांस करती प्रतीत होतीं.

विसर, इतिहास गवाह है कि बिना मूंछों का आज तक कोई राजा नहीं हुआ. अकबर अपनी मूंछों के कारण ही महान कहलाया. महाराणा प्रताप भी घास की रोटी खाते थे लेकिन अपनी मूंछों पर कभी आंच नहीं आने दी.

मूंछों पर मुहावरे भी क्या खूब बने हैं- मूंछों पर ताव देना, मूंछ का बाल बांका न होने देना, मूंछ मुंड़वाना व मूंछ नीची न होने देना आदिआदि.

आजकल कुछ सर्वे भी हुए हैं कि मूंछ वाले मर्दों को औरतें पसंद नहीं करतीं. सर्वे के पीछे किस का हाथ है, कौन जाने. लेकिन इतना तो तय है कि मूंछें होती हैं बहुत महत्त्वपूर्ण. कौन जाने भविष्य में कोई ऐसा कानून बन जाए कि मूंछें रखना जरूरी हो.

वैसे, इन्हीं मूंछों से कई लोगों को बड़ेबडे कारनामे करते भी देखा है. एक सज्जन तो अपनी लंबी मूंछों से ट्रक खींच कर लोगों का मनोरंजन करते हैं और एक दूसरे सज्जन अपनी मूंछों से तरहतरह के डांस कर के दिखाते हैं. तो हुईं न मूंछें महत्त्वपूर्ण.

मुद्दा यह है कि मूंछें तो आप की अपनी अमानत हैं, आप जैसे चाहें उन का उपयोग करें. फिर है भी तो ये घर की खेती. जब मन करे मूंछें बढ़ा लो, जब मन करे कटवा लो. लेकिन ऐसा करने से पहले अपनी श्रीमतीजी की परमिशन जरूर ले लीजिए. यदि वे आप के मूंछ मुंड़वाने से रूठ कर मायके चली गईं तो कहीं लेने के देने न पड़ जाएं.

लेखिका : माधुरी

Indian Music Director : “पंचम दा” सात सुरों का म्यूजिकल एंटरटेनर

Indian Music Director : पंचम दा उर्फ आर डी बर्मन म्यूजिक इंडस्ट्री का ऐसा नाम है जो मिटाए नहीं मिट सकता. उन्होंने अपने दौर में म्यूजिक फ्यूजन में जो कमाल कर दिखाया वह मिसाल बन गया. आज भी नए संगीतकार उस रचनात्मकता को छू लेना अपनी सफलता मान लेते हैं.

27 जून, 1939 को कोलकाता में जन्मे मशहूर संगीतकार व गायक राहुल देव बर्मन की यह 86वीं जयंती है. 4 जनवरी, 1994 की सुबह उन का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था पर आर डी बर्मन उर्फ पंचम दा आज भी हर पीढ़ी के संगीतप्रेमी के दिलों में जिंदा हैं. पंचम दा एक नाम है, मगर उन की कई पहचान हैं. कोई उन्हें फिल्म संगीत में क्रांति लाने वाला बताता है तो कुछ लोग उन्हें फ्यूजन संगीत की शुरुआत करने का श्रेय देते हैं.

एक तबका राहुल देव बर्मन को भारतीय संगीत को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाने वाला मानता है. 60 और 70 के दशक में जन्मे लोग संगीतकार के रूप में उन की एक अलग पहचान थी. कुछ लोग उन्हें एक ऐसे साहित्यिक चोरी करने वाले के रूप में भी देखते हैं जिस ने उन के ज्यादातर हिट नंबरों की नकल की है. फिर चाहे वह फिल्म ‘शोले’ का गीत ‘महबूबा महबूबा’ हो, जिस में पंचम दा ने रमेश सिप्पी के कहने पर पारंपरिक साइप्रस गीत ‘से यू लव मी…’ (डेमिस रूसो द्वारा रचित और उन्हीं द्वारा गाया गया) की धुन का उपयोग किया था.

विदेशी गानों से प्रेरित बर्मन के गानों के अन्य उदाहरण हैं- ‘भूत बंगला’ का ‘आओ ट्विस्ट करें…’ (चबी चेकर का ‘लेट्स ट्विस्ट अगेन’), ‘तुम से मिल के…’ (लियो सेयर का ‘व्हेन आई नीड यू’), ‘जिंदगी मिल के बिताएंगे…’ (पोल अंका का ‘द लौन्गेस्ट डे’), ‘जहां तेरी ये नजर है…’ (फारसी कलाकार जिया अताबी का ‘हेले माली’) और ‘दिलबर मेरे…’ (एलेक्जेंड्रा का ‘जिगुनरजंगे’) आदि.

संगीत की समझ रखने वाले इसे उन की किसी भी धुन की चोरी नहीं मानते, बल्कि प्रेरणा मानते हैं. पंचम दा के साथ 14 साल तक बांसुरी बजा चुके बांसुरीवादक पंडित रोनू मजूमदार कहते हैं, ‘‘पंचम दा ने कभी चोरी नहीं की. वे प्रेरणा लेते थे और बेहतर धुन या गाना बना कर दिखाया. मैं ने कई मौलिक गीतों को सुना है और पाया कि उन से बेहतर रचना तो पंचम दा ने की.’’

कुछ लोग कहते हैं कि राहुल देव बर्मन उर्फ पंचम दा हिंदी सिनेमा के ऐसे फनकार थे जिन्होंने संगीत की परिभाषा को बदल कर रख दिया था. उच्च कोटि के संगीतकार के तौर पर उन्होंने इंडस्ट्री में अहम योगदान दिया था. कुछ लोग उन्हें ‘संगीत का बाइबिल’ कहा करते थे.

कुछ लोग तो पंचम दा को वैज्ञानिक मानते थे. कोई कुछ भी कहे पर सब से बड़ा सच तो यह भी है कि पंचम दा ने अकेले ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय और पश्चिमी धुनों के बीच की खाई को पाटने में कामयाबी हासिल की. उन्होंने दोनों की बेहतरीन धुनों को मिला कर अनूठी कृतियां बनाईं. यही वजह है कि पंचम दा के देहांत के 31 वर्षों बाद भी हर उम्र के लोग उन के गीत गुनगुनाते हुए मिल जाते हैं.

कैसे पड़ा ‘पंचम दा’ नाम

राहुल देव बर्मन के पिता सचिन देव बर्मन हिंदी फिल्मों के मशहूर गायक व संगीतकार और मां मीरा देवी मशहूर गीतकार थीं. शुरू में, उन की नानी ने उन्हें टुब्लू नाम दिया था, हालांकि बाद में उन्हें पंचम नाम से जाना जाने लगा. कुछ कहानियों के अनुसार, उन्हें पंचम नाम इसलिए दिया गया क्योंकि बचपन में जब भी वे रोते थे तो यह संगीत संकेतन के सी मेजर स्केल पर 5वें स्वर (पा), जी नोट में सुनाई देता था.

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पंचम 5वें स्केल डिग्री का नाम है. (षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यमा, पंचम, धैवत, निशाद). एक अन्य सिद्धांत कहता है कि बच्चे का नाम पंचम इसलिए रखा गया क्योंकि वह पांच अलगअलग स्वरों में रो सकता था. एक और संस्करण यह है कि जब अनुभवी भारतीय अभिनेता अशोक कुमार ने नवजात राहुल को बारबार पा शब्दांश का उच्चारण करते देखा तो उन्होंने लड़के का नाम पंचम रख दिया.

बर्मन ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पश्चिम बंगाल में कोलकाता के बल्लीगंज सरकारी हाईस्कूल से प्राप्त की पर हाईस्कूल में फेल हो गए तो पिता ने उन्हें मुंबई बुला लिया. महज 9 वर्ष की उम्र में आर डी बर्मन ने अपना पहला गीत ‘ऐ मेरी टोपी पलट के आ…’ की धुन बनाई, जिसे उन के पिता ने 1956 में रिलीज फिल्म ‘फंटूश’ में इस्तेमाल किया था. ‘सिर जो तेरा चकराए…’ गीत की धुन भी उन्होंने एक बच्चे के रूप में तैयार की थी. उन के पिता ने इसे 1957 में रिलीज हुई गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ के साउंडट्रैक में शामिल किया. यही नहीं, उन्होंने 1958 में फिल्म ‘सोलहवां साल’ में देव आनंद के गीत ‘है अपना दिल तो आवारा,..’ के लिए हारमोनिका बजाया था.

पंचम दा ने अपने पिता सचिन देव बर्मन के साथ कई फिल्में कीं. कई फिल्मों की धुनें, मुखड़ा व अंतरा बनाने के बावजूद पंचम दा को सहायक संगीतकार का ही क्रैडिट मिला. इन फिल्मों में ‘चलती का नाम गाड़ी’ (1958), ‘कागज के फूल’ (1959), ‘तेरे घर के सामने’ (1963), ‘बंदिनी’ (1963), ‘जिद्दी’ (1964), ‘गाइड’ (1965) और ‘तीन देवियां’ (1965) शामिल हैं. बर्मन ने अपने पिता की हिट रचना ‘है अपना दिल तो आवारा…’ के लिए माउथ और्गन भी बजाया, जिसे फिल्म ‘सोलहवां साल’ में दिखाया गया था और हेमंत मुखोपाध्याय ने इस गाने को गाया था.

1959 में पंचम दा को बतौर संगीतकार पहली फिल्म गुरुदत्त के सहायक निरंजन द्वारा निर्देशित फिल्म ‘राज’ मिली थी, जोकि कभी पूरी नहीं हुई. गुरुदत्त और वहीदा रहमान अभिनीत इस फिल्म के गीत शैलेंद्र ने लिखे थे. आर डी बर्मन ने फिल्म के लिए 2 गाने रिकौर्ड किए, इस से पहले कि यह बंद हो जाए. पहला गाना गीता दत्त और आशा भोंसले ने गाया था और दूसरे गाने को शमशाद बेगम ने.

स्वतंत्र संगीत निर्देशक के रूप में बर्मन की पहली फिल्म ‘छोटे नवाब’ 1961 में रिलीज हुई थी. इस फिल्म से जुड़ने का भी अजीब किस्सा है. हिंदी फिल्मों के तत्कालीन लोकप्रिय हास्य अभिनेता महमूद ने फिल्म ‘छोटे नवाब’ का निर्माण करने का जब फैसला किया तो वे संगीतकार के रूप में सचिन देव बर्मन को लेना चाहते थे. महमूद अपना यह प्रस्ताव ले कर जब सचिन देव बर्मन के स्टूडियो पहुंचे तो वहीं राहुल देव बर्मन तबला बजा रहे थे. महमूद ने फिल्म ‘छोटे नवाब’ में संगीत देने के लिए सचिन देव बर्मन से बात की तो सचिन देव बर्मन ने इनकार कर दिया.

महमूद ने उसी वक्त वहां पर तबला बजा रहे राहुल देव बर्मन को ‘छोटे नवाब’ के लिए संगीत निर्देशक के रूप में साइन कर लिया. बाद में बर्मन ने महमूद के साथ घनिष्ठ संबंध विकसित किए और महमूद की फिल्म ‘भूत बंगला’ में पंचम दा ने कैमियो भी किया यानी कि बतौर अभिनेता छोटी भूमिका भी निभाई. इस के बाद महमूद की फिल्म ‘प्यार का मौसम’ में भी छोटा किरदार निभाया.

पंचम दा ने उस दौर में यादगार व कर्णप्रिय गीत बनाए जब गानों की प्रोग्रामिंग में कंप्यूटर की मदद नहीं ली जाती थी, यानी, उस वक्त ‘की बोर्ड’ नहीं हुआ करता था.

राहुल देव बर्मन को बतौर संगीतकार पहचान दिलाने का श्रेय 1966 में बनी फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ को जाता है. मजेदार बात यह है कि इस फिल्म से पंचम दा का जुड़ना समय का खेल था. फिल्म के नायक शम्मी कपूर थे और शम्मी कपूर की हर फिल्म में संगीतकार शंकर जयकिशन ही हुआ करते थे. ‘तीसरी कसम’ के समय शंकर जयकिशन व्यस्त थे, तब युवा संगीतकार के रूप में राहुल देव बर्मन को इस फिल्म से जुड़ने का अवसर मिला था. ‘ओ हसीना जुल्फों वाली’, ‘आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा,’ और ‘ओ मेरे सोना रे…’ जैसे गानों के साथ यह शम्मी और आर डी दोनों के कैरियर की सब से बड़ी म्यूजिकल हिट फिल्मों में से एक साबित हुई.

1971 में रिलीज फिल्म ‘अमर प्रेम’ ने राहुल देव बर्मन को संगीत का बादशाह बना दिया था. नासिर हुसैन की ज्यादातर फिल्मों को पंचम दा ने संगीत से संवारा. लेकिन पंचम दा ने सब से अधिक फिल्में निर्देशक रमेश बहल के साथ कीं, जिन की कंपनी ‘रोज मूवीज’ काफी चर्चित कंपनी रही है. पंचम दा का रमेश बहल के साथ 1970 में रिलीज हुई फिल्म ‘द ट्रेन’ से रिश्ता जुड़ा था. फिर दर्जनों फिल्मों तक जारी रहा.

फिल्म ‘चलती का नाम गाड़ी’ के बाद पंचम दा का किशोर कुमार के साथ अटूट रिश्ता बन गया और जिस फिल्म के संगीतकार पंचम दा हों, उस में गायक किशोर कुमार का होना एक अनिवार्य शर्त सी हो गई थी. उन दिनों कहा जाता था कि किशोर कुमार का पुनरुद्धार पंचम दा के संगीत निर्देशन में ही हुआ.

पंचम दा के संगीत की खासियत

आर डी बर्मन के संगीत की अपनी खासियत रही है. पहली खासियत यह रही कि उन्होंने अपने संगीत में पश्चिमी वाद्ययंत्रों का जम कर प्रयोग किया. उन्होंने सैक्सोफोन, तुरही, इलैक्ट्रिक गिटार और ड्रम जैसे पाश्चात्य वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया, जिस से उन की रचनाओं में एक नई, ताजा और समकालीन ध्वनि आई तो वहीं उन के संगीत की कोई एक शैली नहीं है. उन्होंने रौक, फंक और डिस्को जैसी शैलियों को भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ मिला कर एक नया और आकर्षक मिश्रित संगीत बनाया.

उन की गिनती प्रयोगशील संगीतकार के रूप में होती है क्योंकि उन्होंने कई प्रयोग किए. उन का मानना था कि एक शास्त्रीय गायक के ही समकक्ष कमर्शियल गायक होता है. इसी को साबित करने के लिए 1981 में उन्होंने फिल्म ‘कुदरत’ के गीत ‘हमें तुम से प्यार कितना…’ का आधा हिस्सा किशोर कुमार से और आधा हिस्सा शास्त्रीय गायिका परवीन सुल्ताना से गंवा कर हंगामा बरपा दिया था.

पंचम दा ऐसे संगीतकार थे जिन्होंने वाद्ययंत्रों और अभिनव व्यवस्थाओं को शामिल कर के संगीत में निडरता से क्षितिज की खोज की. उन्होंने संगीत रचने के लिए विभिन्न प्रकार की ध्वनियों का उपयोग किया, जैसे कि गिलास, सैंडपेपर आदि. जी हां, जब कानों में गिलास के टकराने की आवाज सुनाई देती है तो ‘यादों की बारात’ फिल्म का गाना ‘चुरा लिया है तुम ने…’ याद आता है. इस गाने की संगीत धुन तैयार करने के लिए पंचम दा ने गिलास का इस्तेमाल किया था. इसी तरह फिल्म ‘जमाने को दिखाना है’ के गीत ‘होगा तुम से प्यारा कौन…’ में ट्रेन की आवाज लाने के लिए आर डी बर्मन ने सैंडपेपर का इस्तेमाल किया था. सैंडपेपर को आपस में रगड़ने से रेलगाड़ी की आवाज निकलती है.

फिल्म ‘खुशबू’ के गीत ‘ओ मांझी रे…’ में तो उन्हें गांव वाला फील लाने के लिए आटाचक्की से आने वाली आवाज चाहिए थी. इस के लिए पंचम दा ने सोडावाटर की 2 बोतलें मंगवाईं. इन में से वे एकएक कर के हर बोतल से थोड़ा सा सोडा खाली करते और उस में हवा फूंकते. जिस से ‘थुप ठुक, थुप ठुक’ की आवाज निकलती थी. पंचम दा ने इसी तरह का प्रयोग ‘शोले’ फिल्म में भी किया. इस फिल्म के ‘महबूबा महबूबा…’ गाने में भी आधी भरी बोतल में फूंक मार कर गाने का बैकग्राउंड म्यूजिक तैयार किया गया. इस के अलावा ‘किताब’ फिल्म के एक गाने में पंचम दा ने अनोखा जुगाड़ बिठाया.

गुलजार साहब का लिखा गाना ‘मास्टरजी की चिट्ठी आई…’ बच्चों पर फिल्माया जाना था. अब बच्चे गाना गाते हुए स्कूल बैंच को ही पीटेंगे. इस को ध्यान में रखते हुए पंचम दा ने अपने और्केस्ट्रा मंग स्कूल बैंच को बजवाया. म्यूजिक में इस तरह के अनोखे प्रयोगों की वजह से पंचम दा को संगीत का वैज्ञानिक कहा जाने लगा.

बेहद कम लोग जानते होंगे कि पंचम दा ‘माउथ और्गन’ बहुत अच्छा बजाते थे. उन्होंने अपनी इस कला का प्रदर्शन 1958 में रिलीज हुई फिल्म ‘सोलहवां साल’ के गाने ‘है अपना दिल तो आवारा…’ में किया था. देव आनंद के साथ सफर कर रहा शख्स जो माउथ और्गन बजा रहा है, दरअसल, वह धुन पंचम दा ने दी थी.

प्रयोगशील संगीतकार पंचम दा

आर डी बर्मन एक क्रिएटिव जीनियस थे. नित नए प्रयोग करते रहते थे. एक दिन उन्होंने बियर बोटल में ब्लो करते हुए ‘फू’ की आवाज कर एक साउंड रिकौर्ड किया, जिसे फिल्म ‘शोले’ के गीत ‘महबूबा…’ में उपयोग किया गया. इस गाने की शुरुआत इसी बियर साउंड से होती है.

फिल्म ‘ कारवां’ के गीत ‘मोनिका ओ डार्लिंग पिया अब तो तू आ जा…’ के अलावा ‘गोरिया कहां तेरा देश…’, ‘दिलबर दिल से प्यारे…’ सहित कई लोकप्रिय गीत हैं. ताहिर हुसैन के लिए नासिर हुसैन ने इस फिल्म का निर्देशन किया था. संगीतकार आर डी बर्मन ने आशा भोंसले के साथ ‘मोनिका ओ डार्लिंग…’ गाया भी था.

फिल्म ‘द ग्रेट गैम्बलर’ का गीत ‘दो लफ्जों की कहानी…’ को आशा भोंसले ने गाया है. कुछ लाइनें अमिताभ बच्चन की हैं. इस गाने में एक नहीं, तीन अंतरे हैं. पहला अंतरा शुरू होने से पहले गिटार का एक स्ट्रोक सुनाई देता है. दूसरा अंतरा शुरू होने से पहले गिटार के दो स्ट्रोक और तीसरा अंतरा शुरू होने से पहले गिटार के तीन स्ट्रोक सुनाई देते हैं.

तीन गानों को मिला कर तैयार किया गया गाना ‘एक चतुर नार…’ था. इस गाने में तीन पुराने गानों का मिश्रण है. पहला गाना एक चतुर नार कर के शृंगार है, जिसे अशोक कुमार ने फिल्म ‘झुला’ में गाया था. फिर गाने में एक लाइन है, ‘देखी तेरी चतुराई’, इस लाइन की धुन विष्णु पंत द्वारा स्वरबद्ध भजन ‘वन चले रघुराई’ से प्रेरित है. एक और लाइन है, ‘ काला रे जा रे जा रे’ यह लता मंगेशकर द्वारा स्वरबद्ध गाना ‘चंदा रे जा रे जा रे…’ से प्रेरित है. इसी गाने में किशोर कुमार चिल्लाते हैं, ‘ओ टेढ़े सीधे हो जा रे…’ तो सच यह है कि पहले यह लाइन गाने का हिस्सा नहीं थी पर किशोर कुमार ने गाना गाते समय अपने मन से जोड़ दिया और पंचम दा ने इसे रख लिया.

कैरियर में उतारचढ़ाव

यों तो अपने प्रयोगशील संगीत के दम पर पंचम दा ने 3 दशकों तक बौलीवुड में धाक जमाए रखी लेकिन 90 का दशक आतेआते पंचम का संगीत थोड़ा कमजोर पड़ने लगा. उस की कई वजहें थीं. सब से बड़ी वजह अमिताभ बच्चन का उदय होना रहा. अमिताभ बच्चन अपनी फिल्मों में बहुत ही हलकाफुलका संगीत चाहते थे. पंचम दा का संगीत अमिताभ बच्चन के किरदारों के साथ मेल नहीं खा रहा था तो वहीं जतिन ललित, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल सहित कई संगीतकार उभर रहे थे. परिणामतया पंचम दा की लगातार 27 फिल्मों का गीत-संगीत असफल हो गया.

पर पंचम दा के कैरियर की शानदार पारी अभी बाकी थी पर तभी 1986 में उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा. इस मुसीबत के समय उन के सब से पुराने साथी नासिर हुसैन ने भी उन का साथ छोड़ दिया. नासिर हुसैन के बेटे मंसूर खान ने जब 1987 में फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ की शुरुआत की तो पंचम दा को पूरा यकीन था कि इस फिल्म का संगीत तो वही देंगे. मगर मंसूर खान ने संगीतकार के तौर पर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को चुना. इस से उन्हें बड़ा धक्का लगा.

सुभाष घई ने अपनी फिल्म ‘राम लखन’ के एनाउंसमैंट के साथ ही संगीतकार के रूप में पंचम दा का नाम घोषित किया. मगर बिना पंचम दा को कोई सूचना दिए उन की जगह लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को ‘रामलखन’ का संगीतकार बना दिया.

इस से वे अंदर तक टूट गए. फिर वे लगातार शराब व सिगरेट में डूबे रहने लगे. कहा जाता है कि वे हर दिन शाम को अपने साथ बैठ कर दारू पीने के लिए लोगों को घूस दिया करते थे. हालात इतने बदतर हो गए थे कि हर संगीत कंपनी ने पंचम दा से दूरी बना ली थी.

पर एक बार फिर समय ने अपना रंग दिखाया और विधु विनोद चोपड़ा ने उन्हें अपनी फिल्‘1942 अ लव स्टोरी’ के संगीत निर्देशन का औफर दिया. उन्होंने इस फिल्म को बेहतरीन म्यूजिक दे कर साबित कर दिया कि उन से बेहतर संगीतकार न हुआ है, न होगा. समय की बेरहमी देखिए कि पंचम दा अपनी आखिरी कामयाबी को देखने से पहले ही दुनिया से रुखसत हो गए.

4 जनवरी, 1994 को दिल की बीमारी के चलते पंचम दा का निधन हो गया. जबकि ‘1942 अ लव स्टोरी’ 15 जुलाई, 1994 को रिलीज हुई और इस फिल्म के ‘कुछ न कहो…’, ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा…’ सहित सभी गीत सुपरडुपर हिट हुए.

कुमार सानू कहते हैं, ‘‘पंचम दा से मेरी पहली मुलाकात 1981 में हुई थी. उन के साथ कई फिल्मों में कभी एक लाइन तो कभी आधी लाइन गाने का मौका मिलता. लेकिन जब ‘1942 अ लव स्टोरी’ फिल्म का ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा…’ गाना रिकौर्ड हो रहा था. तब पंचम दा मेरे पास आ कर बोले, ‘इस गाने में बहुत सारे एकजैसे शब्द हैं. उन सभी को तुम अलगअलग तरह से गा दोगे तो यह गाना हिट हो जाएगा.’’

फिल्म ‘1942 अ लव स्टोरी’ के संगीत निर्देशन के लिए पंचम दा को 1995 का फिल्मफेयर दिया गया. इस के अलावा पंचम दा को 2 और फिल्मों ‘सनम तेरी कसम’ (1983) और ‘मासूम’ (1984) के संगीत निर्देशन के लिए फिल्मफेयर से नवाजा गया. बतौर संगीत निर्देशक पंचम दा ने 331 फिल्मों को संगीत दिया. इन में से 292 हिंदी फिल्में थीं. साल 2013 में संगीत के क्षेत्र में पंचम दा की उपलब्धि को देखते हुए भारत सरकार ने उन पर डाक टिकट जारी किया था.

Health Update : टांग व पैर में ऐंठन

Health Update : पैरों में ऐंठन होने के कई कारण हो सकते हैं. अच्छी बात यह है कि इस में सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती. सही दिनचर्या और रखरखाव से ही ठीक हो जाता है यह, मगर जरूरी है कि समझें वे क्या तरीके हैं.

कुछ लोग रात के वक्त टांगों में ऐंठन या क्रैम्प्स की शिकायत करते हैं. पैरों में ऐंठन की शिकायत अकसर बुजुर्ग करते रहते हैं. ऐसी महिलाएं जिन का वजन ज्यादा है वे पैरों की ऐंठन से पीड़ित रहती हैं. कभीकभी खेलकूद में रुचि रखने वाले छात्र भी टांगों में क्रैम्प्स की शिकायत करते हैं. शराब के आदी लोग टांगों में ऐंठन की समस्या से ग्रसित रहते हैं. इस समस्या को दुनियाभर में नएनए नाम दिए गए हैं, जैसे ‘नाक्टरनल लेग सिंड्रोम’, ‘रैस्टलैस लेग सिंड्रोम.’ कभी आप ने सोचा है कि ऐसा क्यों होता है.

ऐंठन के ज्यादा शिकार कौन

जो लोग धूम्रपान या तंबाकू यानी जर्दा या खैनी के आदी हैं, वे अकसर टांगों में अकड़न की शिकायत करते हैं. डायबीटिज के मरीज भी अकसर ऐंठन की समस्या से ग्रस्त रहते हैं. कौफी का बहुत ज्यादा सेवन करने वाले लोग भी पैरों की अकड़न की समस्या से पीडि़त रहते हैं. मोटापे से पीडि़त महिलाएं व बुजुर्ग इस का शिकार ज्यादा होते हैं. कभी अत्यधिक थकान व बहुत ज्यादा चलने के बाद भी लोग टांगों की ऐंठन की समस्या से ग्रसित रहते हैं. टीवी या कंप्यूटर के सामने घंटों लगातार बैठने वाले लोग भी पैरों में ऐंठन की समस्या से पीडि़त रहते हैं.

डायलिसिस पर निर्भर गुरदे के मरीज भी टांगों में अकड़न व छटपटाहट की शिकायत करते हैं. जो मरीज डाइयूरेटिक्स यानी पेशाब ज्यादा निकालने वाली दवा लेते हैं वे भी टांगों में क्रैम्प्स की शिकायत करते हैं.

शराब के व्यसनी या लिवर सिरोसिस जैसी समस्याओं से पीडि़त व्यक्ति भी टांगों में ऐंठन की समस्या से ग्रसित रहते हैं. कुछ गर्भवती महिलाएं भी टांग व पैरों में ऐंठन की तकलीफ से पीड़ित रहती हैं. घुटनों के आर्थ्राइटिस से पीडि़त मरीज भी टांगों में क्रैम्प्स की जबतब शिकायत करते हैं.

कहां जाएं

ऐंठन की समस्या है तो तुरंत किसी अनुभवी वैस्कुलर सर्जन से सलाह लें. अपने खून में विटामिन डी, कैल्शियम व मैग्नीशियम की मात्रा की जांच करवाएं. टांगों की नसों की वेन्स डौप्लर नामक जांच करवाएं. अगर आप धूम्रपान या तंबाकू के आदी हैं या फिर मधुमेह रोग से ग्रस्त हैं तो टांगों की आट्रिरियल डौप्लर नामक जांच भी करवाएं. कमर व घुटने का एक्सरे भी करवाएं. पैरों की नसों की एक विशेष जांच एनसीवी जरूर करवाएं. कुछ विशेष खून की जांचें, जैसे एलएफटी व पैराथाइरायड हारमोन भी करवा लें. कभीकभी कमर की हड्डी की एमआरआई की जरूरत पड़ती है. इन सब जांचों की रिपोर्ट के आधार पर ही सही इलाज की दिशा का निर्धारण होता है.

बचने के उपाय

कभी भी औफिस, घर व दुकान में एक घंटे से ज्यादा लगातार न बैठें और न ही एक घंटे से ज्यादा खड़े रहें. बैठेबैठे अगर एक घंटा हो जाए तो तुरंत 5 से 10 मिनट के लिए चलना शुरू कर दें. फिर चलने के बाद दोबारा बैठ सकते हैं. यह क्रिया हर घंटे दोहराएं. अगर लगातार खड़े रहते एक या डेढ़ घंटे से ज्यादा हो जाए तो तुरंत बैठ जाएं और कुरसी पर 5 मिनट के लिए पैरों को थोड़ा ऊपर रख कर टखनों (एन्किल जौइंट) को ऊपरनीचें करें.

प्रतिदिन 5 से 6 किलोमीटर सैर करें. अगर संभव हो सके तो शाम को भी 2 से 3 किलोमीटर टहलें. अपने शरीर के वजन को नियंत्रण में रखें. आधा लिटर टोंड मिल्क का प्रतिदिन सेवन जरूर करें. हरे पत्तेदार सब्जियों का भरपूर आनंद लें. रोज 250 ग्राम सलाद व 250 ग्राम फलों का नियमित सेवन करें. यह न्यूनतम मात्रा है और अगर इस से थोड़ा ज्यादा मात्रा में लेंगे तो और फायदा होगा.

खून में जिंक, कैल्शियम व विटामिन डी व बी ग्रुप के विटामिन की कमी न होने दें. कच्चे व हरे नारियल के पानी का प्रतिदिन सेवन करें.

कुछ विशेष दवाएं भी मददगार होती हैं क्रैम्प्स की समस्या से निबटने के लिए. गाबापेन्टीन, मैग्नीशियम व बी कौम्पलेक्स का सेवन कुछ हद तक मददगार साबित होता है. प्रीगाबालीन दवा से बचें. कभीकभी कैल्शियम चैनल ब्लौकसर्स व डोपामीनर्जिक दवाएं, जैसे ब्रोमोक्रिप्टीन इत्यादि की भी जरूरत पड़ती है लेकिन इन दवाओं को वैस्कुलर सर्जन की सलाह के बिना कतई न लें पेय पदार्थों में कौफी का अत्यधिक सेवन न करें. किन्हीं भी तरह के मादक पदार्थों से बचें. शरीर पर कम से कम 2 से 3 घंटे धूप को पड़ने दें. गरमी में सुबह 6 बजे से 8 बजे तक और शाम को 5 बजे से 6 बजे तक की धूप का सेवन कर सकते हैं.

इलाज की विधाएं

क्रैम्प्स के इलाज के लिए ज्यादातर मामलों में सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती है. अपनी दिनचर्या में आमूलचूल परिवर्तन करना पड़ता है. अगर आप का ऐसा व्यवसाय है जिस में घंटों लगातार खड़े रहना पड़ता हो तो अपना व्यवसाय या नौकरी बदलने की संभावना तलाशें. धूम्रपान व तंबाकू को हमेशा के लिए त्याग दें. शराब के सेवन से बचें वरना टांगों की हड्डियां कमजोर हो जाएंगी और क्रैम्पस की समस्या और जटिल हो जाएगी.
अगर वेन्स में शिकायत है और समस्या ज्यादा बढ़ गई है तो लेसर या आरएफए (रेडियो फ्रीक्वैंसी एबलेशन) द्वारा इलाज की जरूर पड़ती है. अगर शुद्ध रक्त वाली नलियों यानी धमनियों में रुकावट है तो बाईपास सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है. इन सब के लिए हमेशा किसी अनुभवी वैस्क्युलर सर्जन से संपर्क में रहें.

पैरों की स्ट्रेचिंग (खिंचवाने) वाले व्यायाम करें. रोजाना नहाने से पहले या दिन में कभी लेट कर टांगों को एक फुट ऊपर रख कर, पैरों से जांघ की तरफ जैतून या सरसों के तेल से मांसपेशियों पर हलका दबाव डालते हुए मालिश करें. सोने से पहले आधे घंट के लिए टहलें या स्थिर साइकिल पर बैठ कर पहियों को घुमाएं. गर्भवती महिलाएं गर्भावस्था के दौरान क्रमित दबाव वाली जुराबें जरूर पहना करें.

लेखक दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में वरिष्ठ वैस्कुलर व कार्डियो थोरेसिक सर्जन हैं.

Social Story : मकड़जाल – रवि की बात सुन क्यों मानवी के होश उड़ गए ?

Social Story : आज मानवी की आंख जरा देर से खुली, लेकिन जब वह सो कर उठी तब उस ने एक अजीब सी बेचैनी महसूस की. अपनी बिगड़ी हालत देख कर वह समझ गई कि जरूर उस का गर्भपात हुआ है. तब उस ने अधीरता से रवि को आवाज लगाई, पर उस की आवाज उसे नहीं सुनाई दी.

‘जरूर रवि मेरे लिए चाय बना रहा होगा,’ यही सोच कर वह देर तक आंखें मूंदे बिस्तर पर पड़ी रही, लेकिन जब काफी देर के बाद भी रवि नहीं आया तब मानवी का माथा ठनका.

फिर वह किसी तरह अपनी बची शक्ति समेट कर बड़ी मुश्किल से उठी और धीरेधीरे चलती हुई किचन की तरफ बढ़ गई.

पर यह क्या? रवि तो किचन में भी नहीं था. तभी उस की नजर घर में फैले सामान पर पड़ी. सामने वाली अलमारी का ताला टूटा पड़ा था और उस में रखा सारा कीमती सामान गायब था.

ये सब देख कर मानवी की चीख निकल गई. तब वह धम से सामने पड़े सोफे पर बैठ गई और अनायास ही उस का दिल भर आया.

एक तरफ वह बहुत कमजोरी महसूस कर रही थी तो दूसरी तरफ मानसिक व आर्थिक रूप से भी अक्षम हो चुकी थी.

उसे आज समझ आ रहा था कि उस ने रवि के साथ लिव इन में रह कर कितनी बड़ी भूल की है.

‘कुछ भी ऐसा मत करना मेरी बेटी, जिस से बाद में हमें पछताना पड़े,’ दिल्ली आते समय उस के बाबूजी उस से बोले थे.

‘ओह, बाबूजी… मैं वहां कुछ बनने जा रही हूं, इसलिए कुछ भी ऐसेवैसे की तो गुंजाइश ही नहीं है…’ इतना कह कर उस ने आगे बढ़ कर अपने बाबूजी के चरणस्पर्श कर लिए थे.

फिर वह अपनी आंखों में ढेर सारे सपने लिए दिल्ली आ पहुंची थी. छोटे शहर की मानवी को दिल्ली स्वप्न नगरी से कम नहीं लगी थी. अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते हुए कब रवि उस का हमसफर बन बैठा, इस का एहसास तो उसे बहुत देर में हुआ.

तभी अचानक मानवी को याद आने लगा कि रात को रवि ने जो ड्रिंक उसे औफर किया था, जरूर उस में उस ने कुछ मिलाया होगा. तभी तो उस ड्रिंक को पीते ही उसे बेहोशी छाने लगी थी और शायद इसी वजह से उस का यह गर्भपात हुआ.

अब तो जैसे उस की सोचनेसमझने की शक्ति चुक गई थी. अभी कल ही तो रवि ने उस से मंदिर में शादी की थी. वैसे यह बात नहीं थी कि मानवी ने यह निर्णय जल्दबाजी में लिया था बल्कि लगातार 2 साल लिव इन में रहने के बाद ही उस ने यह निर्णय लिया था.

फिर अचानक मानवी को सारी बीती बातें रवि की सोचीसमझी चाल का हिस्सा लगने लगी थीं.

‘2 महीने का गर्भ है मुझे, अब तो शादी कर लो मुझ से,’ मानवी जब रवि से बोली तो वह खुश होने के बजाय उलटा उस पर ही बरस पड़ा था.

‘पता नहीं, तुम आजकल की लड़कियों को क्या होता जा रहा है. सरकार गर्भनिरोध के नितनए तरीकों पर लाखों रुपए बरबाद कर रही है, पर तुम लोगों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती. मैं तो मस्तमौला हूं पर तुम तो ध्यान रख सकती थी,’ रवि अचानक आक्रामक हो उठा था.

ये सब सुन कर मानवी का मुंह उतर गया था. फिर वह रोंआसी सी अपने कमरे की तरफ बढ़ गई थी.

थोड़ी देर रो लेने के बाद जब उस का जी हलका हुआ, तब उस ने रवि को अपने सामने खड़ा पाया. उस के हाथ में एक ट्रे थी, जिस में कौफी के 2 मग और मानवी के मनपसंद वैज सैंडविच थे.

‘‘लो जानेमन, गुस्सा थूको और नाश्ता कर लो, ऐसी स्थिति में तो तुम्हें बिलकुल भूखा नहीं रहना चाहिए और फिर हमारा नन्हा शैतान भी तो भूखा होगा…’’ इतना कह कर रवि ने अपने हाथों में पकड़ी ट्रे मानवी के सामने रख दी थी.

‘‘वैसे तुम जानते सबकुछ हो पर अनजान बनने का नाटक करते हो, शायद इसी वजह से मैं तुम्हें अपना दिल दे बैठी,’’ इतना कह कर मानवी ने रवि को खींच कर अपने पास बैठा लिया और फिर वे दोनों नाश्ता करने लगे.

‘‘मानवी, ऐसा करते हैं कि आज दोपहर में मूवी देखते हैं और फिर लंच भी बाहर ही कर लेंगे,’’ रवि खाली ट्रे उठाते हुए बोला, ‘‘पर हां, आज का सारा खर्च तुम्हें ही करना होगा, क्योंकि मेरी हालत जरा टाइट है.’’

‘‘वह तो ठीक है जनाब, पर आज तुम्हारा आशिकी भरा व्यवहार देख कर मुझे तुम पर बहुत प्यार आ रहा है,’’ यह कहतेकहते वह रवि से लिपट गई थी.

‘‘मैं एक बात सोच रहा था कि अगर अब जिम्मेदारी आ रही है तो उस से निबटने के लिए प्लानिंग भी करनी पड़ेगी.’’

रवि मानवी को चूमते हुए बोला, ‘‘अगर कुछ इंतजाम हो जाए तो मैं अपना कोई काम ही शुरू कर लूं. मुझे तो इस बंधीबंधाई कमाई वाली प्राइवेट नौकरी में आगे बढ़ने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं और फिर क्या शादी के बाद भी हर छोटेछोटे खर्च के लिए मैं तुम पर ही निर्भर रहूंगा?’’

‘‘अच्छा जानू, एक बात तो बताओ जरा कि अगर किसी और की मदद लेने की जगह मैं ही तुम्हें फाइनैंस कर दूं तो?’’

‘‘वाह, इस से बढि़या बात तो कोई हो ही नहीं सकती. यह तो वही कहावत हुई, ‘बगल में छोरा और शहर में ढिंढोरा.’ मुझ से ज्यादा तो तुम आर्थिक रूप से सबल हो. इस का तो मुझे तनिक भी एहसास नहीं था,’’ यह कहतेकहते रवि की आंखों में अचानक ही चमक नजर आने लगी थी.

फिर उस ने अचानक ही मानवी को अपनी ओर खींच लिया था और प्यार भरे स्वर में उस से बोला था, ‘‘मैं तो सोच रहा था कि तुम शायद अपने किसी परिचित या सहकर्मी से मदद लोगी पर तुम्हारे पास तो गढ़ा हुआ धन है, मेरी छिपीरुस्तम…’’

‘‘जनाब, जरा अपनी सोच को ब्रेक लगाइए और ध्यान से मेरी बात सुनिए,’’ मानवी हंसते हुए बोली, ‘‘मेरे पास कोई गढ़ा हुआ धन नहीं बल्कि खूनपसीने से कमाए हुए पैसों की बचत है जिस की मैं ने एफडी करवाई हुई है.’’

अब तक मैं ने इस बारे में तुम्हें नहीं बताया था पर अब जब हम दोनों एक होने जा रहे हैं तो भला यह दुरावछिपाव क्यों?’’

‘‘ओह, मेरी प्यारी मानवी,’’ इतना कह कर रवि ने एक प्यारा सा चुंबन मानवी के गाल पर अंकित कर दिया था.

फिर वे दोनों अपने प्यार की खुमारी में डूबे पिक्चर हौल की तरफ बढ़ गए थे.

पहले उन्होंने मस्त मूवी का मजा लिया और फिर एक बढि़या रेस्तरां में लजीज खाना खाया.

जब रात को दोनों सोने के लिए बिस्तर पर लेटे तब फिर से रवि ने सुबह वाली बात का जिक्र छेड़ दिया.

‘‘मैं क्या कह रहा था मानवी,’’ रवि जरूरत से ज्यादा अपने स्वभाव को नम्र करते हुए बोला, ‘‘कल सोमवार है तो तुम औफिस जाने से पहले बैंक से पैसे निकाल कर मुझे दे देना. पैसे हाथ में होंगे तो आगे की प्लानिंग आसान हो जाएगी,’’ फिर रवि मानवी के बालों में अपना हाथ फेरने लगा था.

‘‘वह तो ठीक है जानू,’’ मानवी रवि को गलबहियां डालती हुई बोली, ‘‘पर पहले हमारी शादी होगी, तभी तुम्हें पैसे मिलेंगे, क्योंकि मैं ने यह पैसे अपने फ्यूचर पार्टनर के लिए ही तो बचा कर रखे थे.’’

‘‘ओह, तो तुम्हें मुझ पर भी विश्वास नहीं है,’’ रवि खुद को मानवी की पकड़ से छुड़ाते हुए बोला, ‘‘क्या, मैं तुम्हें ऐसा लगता हूं जो तुम्हें धोखा दे कर भाग जाऊंगा?’’

‘‘सच, बहुत प्यारे लगते हो तुम, जबजब गुस्से में होते हो,’’ मानवी फिर से रवि से लिपटते हुए बोली, ‘‘मेरे जानेजिगर, अब जब तुम्हें अपना तनमन ही सौंप दिया तो भला शक की कैसी गुंजाइश?

‘‘मैं तो यह सोच रही थी कि अब जब शादी करनी ही है तो फिर देरी कैसी? इधर हमारी शादी हुई तो उधर मैं अपनी सारी जमापूंजी तुम्हें सौंप दूंगी,’’ मानवी रवि के आगोश में समाते हुए बोली.

इतना कह कर मानवी तो सो गई पर रवि बेचैनी से लगातार करवटें बदलता रहा था.

‘‘जल्दी से तैयार हो जाओ. हम लोग अभी मंदिर जा कर शादी करेंगे,’’ इतना कह कर रवि ने एक पैकेट उसे थमा दिया, जिस में एक प्यारी सी लाल साड़ी, लाल चूडि़यां और एक प्यारा सा महकता गजरा था.

‘‘पर रवि, इतनी भी क्या जल्दी है? थोड़ा समय दो मुझे,’’ मानवी चाय बनाते हुए बोली.

‘‘तुम लड़कियां न वाकई में कमाल हो. पहले तो जल्दीजल्दी की रट लगाती हो और फिर अगर तुम्हारी बात मान लो तो उस में भी तुम्हें प्रौब्लम होती है,’’ इतना कह कर रवि गुस्से में पैर पटकता हुआ बाहर चला गया.

वैसे मानवी को ये सब इतनी जल्दी होते देख अटपटा तो अवश्य लग रहा था पर अब शक की कोई गुंजाइश नहीं थी.

इसलिए वह सबकुछ भुला कर खुशीखुशी तैयार होने लगी थी. बीचबीच में उसे अपने घर वालों की याद भी आ रही थी पर फिर उस ने सोच लिया था कि वह शादी होते ही रवि को ले कर अपने घर जाएगी.

मानवी को दुलहन के रूप में देख कर पहले तो वे लोग अवश्य उस से गुस्सा होंगे पर फिर जल्दी ही मान भी जाएंगे, क्योंकि वह सभी की लाड़ली जो है.

‘‘वाह, क्या गजब ढा रही हो तुम दुलहन के रूप में, आज तो सब तुम पर फिदा हो जाएंगे,’’ रवि की इस चुटकी पर मानवी शरमा कर उस के गले जा लगी थी.

‘‘अरे सुनो, तुम्हारा बैंक भी तो मंदिर के रास्ते में ही पड़ता है न. ऐसा करना तुम अपनी चैकबुक भी रख लेना,’’ रवि कुछ सोचते हुए बोला.

‘‘तुम भी न, हर काम जल्दी में ही करते हो,’’ मानवी अपना मांगटीका ठीक करते हुए बोली, ‘‘वैसे मुझे कम से कम इतना तो बता दो कि तुम कौन सा काम शुरू करने वाले हो?’’

‘‘मैडम, यह सरप्राइज है तुम्हारे लिए. बस, यह समझ लो कि यह शादी का तोहफा होगा तुम्हारे लिए,’’ इतना कह कर उस ने मानवी का हाथ पकड़ा और फिर वे दोनों शादी करवाने वाली दुकान की तरफ बढ़ गए. वहां एक पंडित बैठा था. उस ने जल्दबाजी में रीतिरिवाज निबटा कर उन की शादी करवा दी और एक प्रमाणपत्र पकड़ा दिया. फिर लौटते समय मानवी ने बैंक से पैसे निकाल कर रवि को दे दिए.

पैसे मिलते ही रवि के रंगढंग बदल गए, इस का एहसास मानवी को हुआ तो जरूर पर फिर उस ने इसे वहम मान कर आगे बढ़ने में ही भलाई समझी.

मानवी कपड़े चेंज कर के अभी लेटी ही थी कि तभी रवि आ गया, ‘‘यह क्या जानेमन, आज तो सैलिब्रेशन की रात है और तुम इतनी सुस्त सी लेटी हो. दैट्स नौट फेयर माई लव,’’ इतना कह कर उस ने विदेशी शराब 2 गिलासों में उड़ेल दी.

वैसे तो मानवी थकी होने के कारण सोना चाहती थी पर वह रवि को परेशान भी तो नहीं कर सकती थी.

फिर वह तुरंत उठी और रवि के पास जा कर बैठ गई.

‘‘चीयर्स,’’ कह कर इधर दोनों के गिलास आपस में टकराए तो उधर एक अजीब सा उन्माद छा गया मानवी पर. फिर थोड़ी देर बाद उस की आंखें भारी होने लगीं और वह सो गई. अब जब आंखें खुलीं तो रवि का सारा सच उस के सामने आ गया था.

अभी वह इसी उहापोह में थी कि क्या करे? तभी उस के मोबाइल पर उस की सहेली रम्या का फोन आ गया.

‘‘क्या यार, 2 दिन से औफिस क्यों नहीं आई?’’ रम्या हंसते हुए बोली.

‘‘कुछ नहीं यार.’’

‘‘तू अभी बिजी है तो मैं बाद में कौल करती हूं,’’ रम्या ने चुटकी ली.

‘‘ऐसा कुछ नहीं है यार,’’ इतना कह कर मानवी रोने लगी.

‘‘तू रो मत, मैं अभी आती हूं,’’ फिर चिंतातुर रम्या सारा काम बीच में ही छोड़ कर मानवी के पास पहुंच गई.

मानवी की इतनी बुरी हालत देख कर रम्या भी सकते में आ गई. फिर मानवी ने भारी मन से रम्या को सबकुछ बता दिया.

‘‘मैं तो तुझे पहले ही समझाती थी कि मत पड़ इस लिव इन के चक्कर में, पर तब तो मैडम पर इश्क का भूत जो सवार था. लिव इन एक कच्चा रिश्ता होता है जो किसी को भी सुख नहीं देता,’’ रम्या गुस्से में बोले जा रही थी.

‘‘मैं तो आत्महत्या कर के अपना जीवन ही समाप्त कर दूंगी. आखिर किस मुंह से मैं सामना करूंगी अपने घर वालों का?’’ इतना कह कर मानवी फिर से रोने लगी.

‘‘आत्महत्या के बारे में सोचना भी मत,’’ यह कह कर रम्या मानवी को समझाने लगी, ‘‘देख मानवी, अब तक तो तू ने जो कुछ गलत किया सो किया पर अब संभल जा. रही बात तेरे परिवार वालों की, तो यह बात समझ ले कि हमारी लाख गलतियों के बावजूद जो हमें स्वीकार करता है, वह हमारा परिवार ही होता है.

‘‘तू शायद यह नहीं जानती थी कि अपने दोस्त तो हम चुनते हैं पर हमें हमारी फैमिली चुनती है.

‘‘शुरू में तो तेरे परिवार वाले तेरे शुभचिंतक होने के नाते तुझे अवश्य डांटेंगे, लेकिन फिर तुझे खुले मन से स्वीकार भी कर लेंगे.

‘‘आत्महत्या तो रवि को करनी चाहिए तूने तो उसे सच्चे दिल से चाहा था, पर दगाबाज तो वही निकला, जो तुझे आर्थिक, मानसिक व शारीरिक स्तर पर धोखा दे कर चंपत हो गया. वह शातिर तो तेरे पैसों पर ऐश कर रहा होगा और तू यहां रोरो कर बेहाल हो रही है.’’

फिर रम्या ने उस के आंसू पोंछे और उसे अपनी कार में बैठा कर डाक्टर के पास ले गई.

डाक्टर ने पहले मानवी का चैकअप किया और फिर थोड़े उपचार के बाद उसे कुछ दवाएं लिख दीं, जिन से मानवी को बहुत आराम मिला.

इसी बीच रम्या ने मानवी द्वारा बताए गए नंबर पर उस के घर वालों से संपर्क किया और उन्हें सारी बात बता दी.

फिर क्या था? शाम होते ही मानवी के घर वाले उसे लेने आ पहुंचे.

मानवी की मनोदशा उस की मां ने तुरंत भांप ली और उसे अपने प्यार भरे आंचल में समेट लिया. पर मानवी की गलतियों पर उस के बाबूजी ने उसे बहुत डांटा. फिर इस बात का एहसास होते ही कि मानवी को अपनी गलतियों का एहसास है, उन्होंने उसे माफ भी कर दिया.

मानवी अपने घर वालों के साथ अपने घर चली गई. रम्या उस की कार को जाते हुए तब तक देखती रही, जब तक  कार उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई.

एक तरफ जहां उसे अपनी सहेली से बिछुड़ना बहुत खल रहा था वहीं दूसरी तरफ उसे इस बात की बेहद खुशी थी कि चाहे देर से ही सही, उस की सहेली उसे उस मकड़जाल से बाहर निकालने में सफल हो गई थी, जिसे उस ने अपनी नासमझी से अपने इर्दगिर्द बुना था. Social Story

Hindi Love Stories : कायापलट – हर्षा को नकारने वाले रोहित को क्यों हुआ पछतावा?

Hindi Love Stories : ‘बैस्टकपल’ की घोषणा होते ही अजय ने हर्षा को अपनी बांहों में उठा लिया. हर्षा भी छुईमुई सी उस की बांहों में समा गई. स्टेज का पूरा चक्कर लगा कर अजय ने धीरे से उसे नीचे उतारा और फिर बेहद नजाकत से झुकते हुए उस ने सभी का शुक्रिया अदा किया. पिछले साल की तरह इस बार भी इंदौर के लायंस क्लब में थीम पार्टी ‘मेड फौर ईचअदर’ में वे दोनों बैस्ट कपल चुने गए थे. लोगों की तारीफ भरी नजरें बहुत देर तक दोनों का पीछा करती रहीं.

क्लब से बाहर आ कर अजय गाड़ी निकालने पार्किंग में चला गया. बाहर खड़ी हर्षा उस का इंतजार करने लगी. तभी अचानक किसी ने धीरे से उसे पुकारा. हर्षा मुड़ी पर सामने खड़े इंसान को यकायक पहचान नहीं पाई. लेकिन जब पहचाना तो चीख पड़ी, ‘‘रोहित… तुम यहां कैसे और यह क्या हालत बना ली है तुम ने?’’

‘‘तुम भी तो बिलकुल बदल गई हो… पहचान में ही नहीं आ रही,’’ रोहित की हंसी में कुछ खिन्नता थी, ‘‘यह है मेरी पत्नी प्रीति,’’ कुछ झिझक और सकुचाहट से उस ने पीछे खड़ी पत्नी का परिचय कराया.

सामने खड़ी थुलथुल काया में हर्षा को कुछ अपना सा नजर आया. उस ने आगे बढ़ कर प्रीति को गले लगा लिया, ‘‘नाइस टू मीट यू डियर.’’

तभी अजय गाड़ी ले कर आ गया. हर्षा ने अजय को रोहित और प्रीति से मिलवाया. कुछ देर औपचारिक बातों के बाद अजय ने उन्हें अगले दिन अपने यहां रात के खाने पर आमंत्रित किया.

अजय और हर्षा के घर में घुसते ही डेढ़ वर्षीय आदी दौड़ कर मां की गोदी में आ चढ़ा. हर्षा भी उसे प्यार से दुलारने लगी. 2 घंटे से आदी अपनी दादी के पास था. हर्षा अजय के साथ क्लब गई हुई थी.

हर्षा और अजय की शादी 4 साल पहले हुई थी. खूबसूरत शख्सीयत की मालकिन हर्षा बहुत ही हंसमुख और मिलनसार थी. इस समय वह पति अजय और अपने डेढ़ साल के बच्चे आदी के साथ खुशहाल और सफल दांपत्य जीवन जी रही थी. लेकिन कुछ साल पहले उस की स्थिति ऐसी न थी. हालांकि तब भी उस की जिंदादिली लोगों के लिए एक मिसाल थी.

90 किलोग्राम वजनी हर्षा अपनी भारीभरकम काया के कारण अकसर लोगों की निगाहों का निशाना बनती थी. लेकिन अपने जानने वालों के लिए वह एक सफल किरदार थी, जो अपनी मेहनत और हौसले के बल पर बड़ी से बड़ी चुनौतियों का मुकाबला करने की हिम्मत रखती थी. अपने कालेज में वह हर दिल अजीज और हर फंक्शन की जान थी. उस के बगैर कोई भी प्रोग्राम पूरा नहीं होता था.

हर्षा दिखने में भले मोटी थी, पर इस से उस की फुरती व आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं आई थी. वह और उस का बौयफ्रैंड रोहित एकदूसरे की कंपनी बहुत पसंद करते थे. बिजनैसमैन पिता ने अपनी इकलौती बेटी हर्षा को बड़े नाजों से पाला था. वह अपने मातापिता की जान थी.

बिस्तर पर लेटी हर्षा रोहित से हुई आज अचानक मुलाकात के बारे में सोच रही थी. थका अजय बिस्तर पर लेटते ही नींद के आगोश में जा चुका था. हर्षा विचारों के भंवर में गोते खातेखाते 4 साल पहले अपने अतीत से जा टकराई…

‘‘रोहित क्या यह तुम्हारा आखिरी फैसला है? क्या तुम मुझ से शादी नहीं करना चाहते?’’ फाइनल ईयर में वेलैंटाइन डे की कालेज पार्टी

में उस ने रोहित को झंझोड़ते हुए पूछा था. दरअसल, उस ने उसी शाम रोहित से बाकायदा अपने प्यार का इजहार कर शादी के बारे में पूछा था. मगर रोहित की नानुकुर से उसे बड़ी हताशा हाथ लगी थी.

‘‘देखो हर्षा, यारीदोस्ती की बात अलग है, क्योंकि दोस्ती कइयों से की जा सकती है, पर शादी तो एक से ही करनी है. मैं शादी एक लड़की से करना चाहता हूं, किसी हथिनी से नहीं. हां, अगर तुम 2-4 महीनों में अपना वजन कम कर सको तो मैं तुम्हारे बारे में सोच सकता हूं,’’ रोहित बेपरवाही से बोला.

हर्षा को रोहित से ऐसे जवाब की बिलकुल उम्मीद नहीं थी. बोली, ‘‘तो ठीक है रोहित, मैं अपना वजन कम करने को कतई तैयार नहीं… कम से कम तुम्हारी इस शर्त पर तो हरगिज नहीं, क्योंकि मैं तुम्हारी दया की मुहताज नहीं हूं, तुम शायद भूल गए कि मेरा अपना भी कोई वजूद है. तुम किसी भी स्लिमट्रिम लड़की से शादी के

लिए आजाद हो,’’ कह बड़ी सहजता से बात को वहीं समाप्त कर उस ने गाड़ी घर की दिशा में मोड़ ली थी.

मगर रोहित को भुलाना हर्षा के लिए आसान न था. आकर्षक कदकाठी और मीठीमीठी बातों के जादूगर रोहित को वह बहुत प्यार करती थी. लोगों की नजरों में भले ही यह एक आदर्श पेयर नहीं था, लेकिन ऐसा नहीं था कि यह चाहत एकतरफा थी. कई मौकों पर रोहित ने भी उस से अपने प्यार का इजहार किया था.

वह जब भी किसी मुश्किल में होता तो हर्षा उस के साथ खड़ी रहती. कई बार उस ने रुपएपैसे से भी रोहित की मदद की थी. यहां तक कि अपने पापा की पहुंच और रुतबे से उस ने कई बार उस के बेहद जरूरी काम भी करवाए थे. तो क्या रोहित के प्यार में स्वार्थ की मिलावट थी? हर्षा बेहद उदास थी, पर उस ने अपनेआप को टूटने नहीं दिया.

अगर रोहित को उस की परवाह नहीं तो वह क्यों उस के प्यार में टूट कर बिखर जाए? क्या हुआ जो वह मोटी है… क्या मोटे लोग इंसान नहीं होते? और फिर वह तो बिलकुल फिट है. इस तरह की सोच से अपनेआप को सांत्वना दे रही हर्षा ने आखिरकार पापा की पसंद के लड़के अजय से शादी कर ली, जो उसी की तरह काफी हैल्दी था.

स्टेज पर उन दोनों की जोड़ी देख किसी ने पीठपीछे उन का मजाक उड़ाया तो किसी ने उन्हें यह कह कर दिली मुबारकबाद दी कि उन की जोड़ी बहुत जम रही है. बहरहाल, अजय से शादी कर हर्षा अपनी ससुराल इंदौर आ गई.

शादी के बाद अजय के साथ हर्षा बहुत खुश थी. अजय उसे बहुत प्यार करता था और साथ ही उस का सम्मान भी. रोहित को वह एक तरह से भूल चुकी थी.

एक दिन अजय को खुशखबरी देते हुए हर्षा ने बताया कि उन के यहां एक नन्हा मेहमान आने वाला है. अजय इस बात से बहुत खुश हुआ. अब वह हर्षा का और भी ध्यान रखने लगा. 10-15 दिन ही बीते थे कि अचानक एक शाम हर्षा को पेट में भयंकर दर्द उठा. अजय उस वक्त औफिस में था. फोन पर हर्षा से बात होते ही वह घर रवाना हो गया.

लेकिन अजय के पहुंचने तक हर्षा का बच्चा अबौर्ट हो चुका था. असीम दर्द से हर्षा वाशरूम में ही बेहोश हो चुकी थी और वहीं पास मुट्ठी भर भू्रण निष्प्राण पड़ा था. अजय के दुख का कोई ठिकाना न था. बड़ी मुश्किल से बेहोश हर्षा हौस्पिटल पहुंचाई गई.

हर्षा के होश में आने के बाद डा. संध्या ने उन्हें अपने कैबिन में बुलाया, ‘‘अजय और हर्षा मुझे बेहद दुख है कि आप का पहला बच्चा इस तरह से अबौर्ट हो गया. दरअसल, हर्षा यह वह वक्त है जब आप दोनों को अपनी फिटनैस पर ध्यान देना होगा, क्योंकि अभी आप की उम्र कम है. यह उम्र आप के वजन को आप की शारीरिक फिटनैस पर हावी नहीं होने देगी, पर आगे चल कर आप को इस वजह से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए सही यह होगा कि नए मेहमान को अपने घर लाने से पहले आप अपने वजन को न सिर्फ नियंत्रित करें, बल्कि कम भी करें.’’

डा. संध्या ने उन्हें एक फिटनैस ट्रेनर का नंबर दिया. शुरुआत में हर्षा को यह बेहद मुश्किल लगा. वह अपनी पसंद की चीजें खाने का मोह नहीं छोड़ पा रही थी और न ही ज्यादा ऐक्सरसाइज कर पाती थी. थोड़ा सा वर्कआउट करते ही थक जाती. पर अजय के साथ और प्यार ने उसे बढ़ने का हौसला दिया.

कहना न होगा कि संयमित खानपान और नियमित ऐक्सरसाइज ने चंद महीनों में ही अपना कमाल दिखाना शुरू कर दिया. करीब 6 महीनों में दोनों पतिपत्नी का कायापलट हो गया. अजय जहां 75 किलोग्राम का रह गया वहीं हर्षा का वजन 60 किलोग्राम पर आ गया.

हर्षा की खुशी का ठिकाना न था. प्यारी तो वह पहले भी बहुत लगती थी, पर अब उस का आत्मविश्वास और सुंदरता दोगुनी हो उठी. अपनी ड्रैसिंगसैंस और हेयरस्टाइल में चेंज कर वह और भी दमक उठी. डेढ़ साल पहले नन्हे आदी ने उस की कोख में आ कर उस के मातृत्व को भी महका दिया. संपूर्ण स्त्री की गरिमा ने उस के व्यक्तित्व में चार चांद लगा दिए. पर यह रोहित को क्या हुआ, उस की पत्नी प्रीति भी इतनी हैल्दी कैसे हो गई… हर्षा सोचती जा रही थी. नींद अभी भी उस की आंखों से कोसों दूर थी.

सुबह 9 बजे आंख खुलने पर हर्षा हड़बड़ा कर उठी. उफ कितनी देर हो गई, अजय औफिस चले गए होंगे. रोहित और उस की वाइफ शाम को खाने पर आएंगे. अभी वह इसी सोचविचार में थी कि चाय की ट्रे ले कर अजय ने रूम में प्रवेश किया.

‘‘गुड मौर्निंग बेगम, पेश है बंदे के हाथों की गरमगरम चाय.’’

‘‘अरे, तुम आज औफिस नहीं गए और आदी कहां है? तुम ने मुझे जगाया क्यों नहीं?’’ हर्षा ने सवालों की झड़ी लगा दी.

‘‘अरे आराम से भई… एकसाथ इतने सवाल… मैं ने आज अपनी प्यारी सी बीवी की मदद करने के लिए औफिस से छुट्टी ले ली है. आदी दूध पी कर दादी के साथ बाहर खेलने में मस्त है… मैं ने आप को इसलिए नहीं उठाया, क्योंकि मुझे लगा आप देर रात सोई होंगी.’’

सच में कितनी अच्छी हैं अजय की मां, जब भी वह व्यस्त होती है या उसे अधिक काम होता है वे आदी को संभाल लेती हैं. उसे अजय पर भी बहुत प्यार आया कि उस ने उस की मदद के लिए औफिस से छुट्टी ले ली. लेकिन भावनाओं को काबू करती वह उठ खड़ी हुई, शाम के मेहमानों की खातिरदारी की तैयारी के लिए.

सुबह के सभी काम फुरती से निबटा कर मां के साथ उस ने रात के खाने की सूची बनाई. मेड के काम कर के जाने के बाद हौल के परदे, सोफे के कवर वगैरह सब अजय ने बदल दिए. गार्डन से ताजे फूल ला कर सैंटर टेबल पर सजा दिए.

शाम को करीब 7 बजे रोहित और प्रीति आ गए. हर्षा और अजय ने बहुत आत्मीयता से उन का स्वागत किया. दोनों मां और आदी से मिल कर बहुत खुश हुए. खासकर प्रीति तो आदी को छोड़ ही नहीं रही थी. आदी भी बहुत जल्दी उस से घुलमिल गया. हर्षा ने उन दोनों को अपना घर दिखाया. प्रीति ने खुल कर हर्षा और उस के घर की तारीफ की. खाना वगैरह हो जाने के बाद वे सभी बाहर दालान में आ कर बैठ गए. देर तक मस्ती, मजाक चलता रहा. पर बीचबीच में हर्षा को लग रहा था कि रोहित उस से कुछ कहना चाह रहा है.

अजय की मां अपने वक्त पर ही सोती थीं. अत: वे उन सभी से विदा ले कर सोने चली गईं. इधर आदी भी खेलतेखेलते थक गया था. प्रीति की गोद में सोने लगा.

‘‘क्या मैं इसे तुम्हारे कमरे में सुला दूं? प्रीति ने पूछा.

हर्षा ने अपना सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘श्योर.’’

तभी अजय अपनी किसी जरूरी फोनकौल पर ऐक्सक्यूज मी कहते हुए बाहर निकल गया.

रोहित ने हर्षा की ओर बेचारगी भरी नजर डाली, ‘‘हर्षा मैं तुम्हारा गुनहगार हूं, तुम्हारा मजाक उड़ाया, दिल दुखाया. शायद उसी का सिला है कि आज तुम दोनों हमारी तरह हो और हम तुम्हारी तरह. बहुत गुरूर था मुझे अपनी डैशिंग पर्सनैलिटी पर. लेकिन अब देखो मुझे, कहीं का नहीं रह गया. शादी के वक्त प्रीति भी स्लिमट्रिम थी, पर वह भी बाद में ऐसी बेडौल हुई कि अब हम सोशली अपने यारदोस्तों और रिश्तेदारों से कम ही मिलते हैं.’’

कुछ देर रुक कर रोहित ने गहरी सांस ली, ‘‘सब से बड़ा दुख मुझे प्रीति की तकलीफ देख कर होता है. 2 मिस कैरेज हो चुके हैं उस के. डाक्टर ने वजन कम करने की सलाह दी है, मगर हम दोनों की हिम्मत नहीं होती कि कहां से शुरुआत करें. बहुत इतराते थे अपनी शादी के बाद हम, पर वह इतराना ऐसा निकला कि अच्छीखासी हैल्थ को मस्तीमजाक में ही खराब कर लिया और अब… जानती हो घर से दूर जैसे ही इंदौर आने का चांस मिला तो मैं ने झट से हां कह दी ताकि लोगों के प्रश्नों और तानों से कुछ तो राहत मिले.

पर जानते नहीं थे कि यहां इतनी जल्दी तुम से टकरा जाएंगे. कल पार्टी में तुम्हें देख काफी देर तक तो पहचान ही नहीं पाया. लेकिन जब नाम सुना तब श्योर हो गया और फिर बड़ी हिम्मत जुटा कर तुम से बात करने की कोशिश की,’’ रोहित के चेहरे पर दुख की कोई थाह नहीं थी.

रोहित और प्रीति की परेशानी जान हर्षा की उस के प्रति सारी नाराजगी दूर हो गई. बोली, ‘‘रोहित, यह सच है कि तुम्हारे इनकार ने मुझे बेहताशा दुख पहुंचाया था, पर अजय के प्यार ने तुम्हें भूलने पर मुझे मजबूर कर दिया. आज मेरे मन में तुम्हारे लिए तनिक भी गुस्सा बाकी नहीं है.’’

तभी सामने से आ रहे अजय ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘भई कौन किस से गुस्सा है?’’

‘‘कुछ नहीं अजय,’’ कह कर हर्षा ने अजय को रोहित और प्रीति की परेशानी के बारे में बताया.

‘‘अरे तुम दोनों हर्षा के साथ जा कर डा. संध्या से मिल लो. जरूर तुम्हें सही सलाह देंगी,’’ अजय ने कहा. तब तक प्रीति भी आदी को सुला कर आ गई थी.

‘‘हां रोहित, तुम बिलकुल चिंता न करो, मैं कल ही प्रीति और तुम्हें अपनी डाक्टर के पास ले चलूंगी… बहुत जल्दी प्रीति की गोद में भी एक नन्हा आदी खेलेगा,’’ कहते हुए हर्षा ने प्रीति को गले लगा लिया.

उन दोनों के जाने के बाद हर्षा देर तक रोहित और प्रीति के बारे में सोचती रही. वह प्रीति की तकलीफ समझ सकती थी, क्योंकि वह खुद भी कभी इस तकलीफ से गुजर चुकी थी. उस ने तय किया कि वह उन दोनों की मदद जरूर करेगी.

हर्षा इसी सोच में गुम थी कि पीछे से आ कर अजय ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और उस ने भी हंसते हुए रात भर के लिए अपनेआप को उन बांहों की गिरफ्त के हवाले कर दिया. Hindi Love Stories

Social Story In Hindi : सुहानी गुड़िया – वो वहां किसके इंतजार में खड़ी थी ?

Social Story In Hindi : आज मेरा जी चाह रहा है कि उस का माथा चूम कर मैं उसे गले से लगा लूं और उस पर सारा प्यार लुटा दूं, जो मैं ने अपने आंचल में समेट कर जमा कर रखा था. चकनाचूर कर दूं उस शीशे की दीवार को जो मेरे और उस के बीच थी. आज मैं उसे जी भर कर प्यार करना चाहती हूं.

मुझे बहुत जोर की भूख लगी थी. भूख से मेरी आंतें कुलबुला रही थीं. मैं लेटेलेटे भुनभुना रही थी, ‘‘यह मरी रेनू भी ना जाने कब आएगी. सुबह के 10 बजने को हैं, पर महारानी का अतापता ही नहीं. यह लौकडाउन ना होता तो ना जाने कब का इसे भगा देती और दूसरी रख लेती. जब इसे काम की जरूरत थी तो कैसे गिड़गिड़ा मेरे पास आई थी और अब नखरे देखो मैडम के.’’

अरविंद सुबहसुबह मुझे चाय के साथ ब्रेड या बिसकुट दे कर दवा खिलाते और खुद दूध कौर्नफ्लैक्स खा कर अस्पताल चले जाते हैं. डाक्टरों की छुट्टियां कैंसिल हैं, इसलिए ज्यादा मरीज ना होने पर भी उन्हें अस्पताल जाना ही पड़ता है.

मैं डेढ़ महीने से टाइफाइड के कारण बिस्तर पर पड़ी हूं. घर का सारा काम रेनू ही देखती है. मैं इतनी कमजोर हो गई हूं कि उठ कर अपने काम करने की भी हिम्मत नहीं होती. पड़ेपड़े न जाने कैसेकैसे खयाल मन में आ रहे थे, तभी सुहानी की मधुर आवाज मेरे कानों में पड़ी, ‘‘मां आप जाग रही हैं क्या? मैं आप के लिए चाय बना लाऊं.’’

मैं ने कहा, ‘‘नहीं, चाय और दवा तो तेरे बड़े पापा दे गए हैं, पर बहुत जोर की भूख लगी है. रेनू भी ना जाने कब आएगी. कितना भी डांट लो, इस पर कोई असर नहीं होता.’’

सुहानी बोली, ‘‘मां, आप उस पर चिल्लाना मत, आप की तबीयत और ज्यादा खराब हो जाएगी.’’

उस ने टीवी औन कर के लाइट म्यूजिक चला दिया. मैं गाने सुन कर अपना ध्यान बंटाने की कोशिश करने लगी.

थोड़ी ही देर में सुहानी एक प्लेट में पोहा और चाय ले कर मेरे पास खड़ी थी. मैं हैरानी से उसे देख कर बोली, ‘‘अरे, यह क्या किया तुम ने, अभी रेनू आ कर बनाती ना.’’

सुहानी ने बड़े धीमे से कहा, ‘‘मां, आप को भूख लगी थी, इसीलिए सोचा कि मैं ही कुछ बना देती हूं.’’

मेरा पेट सच में ही भूख के कारण पीठ से चिपका जा रहा था, इसलिए मैं प्लेट उस के हाथ से ले कर चुपचाप पोहा खाने लगी. उस ने मुझ से पूछा, ‘‘मां, पोहा ठीक से बना है ना?’’

नमक थोड़ा कम था, पर मैं मुसकरा कर बोली, ‘‘हां, बहुत अच्छा बना है, तुम ने यह कब बनाना सीखा.’’

यह सुन कर उस की आंखों में जो संतोष और खुशी की चमक मुझे दिखी, वह मेरे मन को छू गई.

जब से मैं बीमार पड़ी हूं, मेरे पति और बच्चों से भी ज्यादा मेरा ध्यान सुहानी रखती है. मेरे कुछ बोलने से पहले ही वह समझ जाती है कि मुझे क्या चाहिए.

मुझे याद आने लगा वह दिन, जब मेरे देवरदेवरानी अपनी नन्ही सी बिटिया के साथ शौपिंग कर के लौट रहे थे. सामने से आती एक तेज रफ्तार कार ने उन की कार में टक्कर मार दी. वे दोनों बुरी तरह घायल हो गए.

देवर ने तो अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही दम तोड़ दिया था और देवरानी एक हफ्ते तक अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझने के बाद भगवान को प्यारी हो गई.

अस्पताल में जब अर्धचैतन्य अवस्था में देवरानी ने नन्ही सलोनी का हाथ अरविंद के हाथों में थमाते हुए कातर निगाहों से देखा तो वह फफकफफक कर रो पड़े. उन की मृत्यु के बाद लखनऊ में उन के घर, औफिस, फंड, ग्रेच्युटी वगैरह के तमाम झमेलों का निबटारा करने के लिए लगभग 2 महीने तक अरविंद को लखनऊ में काफी भागदौड़ करनी पड़ी. सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद सलोनी की कस्टडी का प्रश्न उठा.

देवरानी का मायका रायबरेली में 3 भाइयों और मातापिता का सम्मिलित परिवार और व्यवसाय था. वे चाहते थे कि सलोनी की कस्टडी उन्हें दे दी जाए. उन के बड़े भैया बोले, ‘‘सलोनी हमारी बहन की एकमात्र निशानी है, हम उसे अपने साथ ले जाना चाहते हैं.’’

इस पर अरविंद ने कहा कि सलोनी मेरे भाई की भी एकमात्र निशानी है. वहीं अरविंद के पिताजी बोले, ‘‘सलोनी कहीं नहीं जाएगी. मेरे बेटे अनिल की बिटिया हमारे घर में ही रहेगी.”

इस पर देवरानी का छोटा भाई बिगड़ कर बोला, ‘‘मैं अपनी भांजी का हक किसी को नहीं मारने दूंगा. आप लोग मेरे बहनबहनोई की सारी संपत्ति पर कब्जा करना चाहते हैं, इसीलिए सलोनी को अपने पास रखना चाहते हैं.’’

इस विषय पर अरविंद और मांबाबूजी की उन से बहुत बहस हुई. अरविंद और बाबूजी जानते थे कि उन लोगों की नजर मेरे देवर के लखनऊ वाले मकान और रुपयोंपैसों पर थी. सलोनी के नानानानी बहुत बुजुर्ग थे, वे उस की देखभाल करने में सक्षम नहीं थे. अंत में अरविंद ने सब को बैठा कर निर्णय लिया कि अम्मांबाबूजी बहुत बुजुर्ग हैं और गांव में सलोनी की पढ़ाईलिखाई का उचित इंतजाम नहीं हो सकता, इसलिए सलोनी मेरे साथ रहेगी. अनिल का लखनऊ वाला मकान सलोनी के नाम पर कर दिया जाएगा और उसे किराए पर उठा दिया जाएगा. उस का जो भी किराया आएगा, उसे सलोनी के अकाउंट में जमा कर दिया जाएगा.

अनिल के औफिस से मिला फंड वगैरह का रुपया भी सलोनी के नाम से फिक्स कर दिया जाएगा, जो उस की पढ़ाईलिखाई और शादीब्याह में खर्च होगा.

अरविंद के इस फैसले से मैं सहम गई. उस समय तो कुछ न कह पाई, पर अपने 2 छोटे बच्चों के साथ एक और बच्चे की जिम्मेदारी उठाने के लिए मैं बिलकुल तैयार नहीं थी. अभी तक जिस सहानुभूति के साथ मैं उस की देखभाल कर रही थी, वह विलुप्त होने लगी.

मैं ने डरतेडरते अरविंद से कहा, ‘‘सुनिए, मुझे लगता है कि आप को सलोनी को उस के नानानानी को दे देना चाहिए. नानानानी और मामा के बच्चों के साथ वह ज्यादा खुश रहेगी.’’

अरविंद शायद मेरी मंशा भांप गए और मेरे कंधे पर सिर रख कर रो पड़े. कातर नजरों से मेरी ओर देखते हुए बोले, ‘‘रंजू, अनिल मेरा एकलौता भाई था. वह मुझे इस तरह छोड़ जाएगा, यह सपने में भी नहीं सोचा था. सलोनी मेरे पास रहेगी तो मुझे लगेगा मानो मेरा भाई मेरे पास है.’’

मैं ने उन्हें जीवन में पहली बार इतना मायूस और लाचार देखा था. वह बच्चों की तरह बिलखते हुए बोले, ‘‘रंजू, मेरे मातापिता और सलोनी को अब तुम्हें ही संभालना है.’’

उन को इतना व्यथित देख मैं ने चुपचाप नियति को स्वीकार कर लिया. बाबूजी इस गम को सह न पाए. हार्ट पेशेंट तो थे ही, महीनेभर बाद दिल का दौरा पड़ने से परलोक सिधार गए.

बाबूजी के जाने के बाद तो अम्मां मानो अपनी सुधबुध ही खो बैठीं, न खाने का होश रहता, न नहानेधोने का. हर समय पूजापाठ में व्यस्त रहने वाली अम्मां अब आरती का दीया भी ना जलाती थीं. वे कहतीं, ‘‘बहू, अब कौनो भगवान पर भरोसा नाही रही गओ है, का फायदा ई पूजापाठ का जब इहै दिन दिखबे का रहै.’’

उन्हें कुछ भी समझाने का कोई फायदा नहीं था. वे अंदर ही अंदर घुलती जा रही थीं. एक बरस बाद वे भी इस दुनिया को छोड़ कर चली गईं.

अरविंद अपने काम में बहुत व्यस्त रहने लगे. सामान्य होने में उन्हें दोतीन वर्ष का समय लग गया.

नन्ही सलोनी मुझे मेरे घर में सदैव अवांछित सदस्य की तरह लगती थी. उस के सामने न जाने क्यों मैं अपने बच्चों को खुल कर न तो दुलरा ही पाती और न ही खुल कर गले लगा पाती थी. मैं अपने बच्चों के साथसाथ उसे भी तैयार कर के स्कूल भेजती और उस की सारी जरूरतों का ध्यान रखती, पर कभी गले से लगा कर दुलार ना कर पाती.

समय कब हथेलियों से सरक कर चुपकेचुपके पंख लगा कर उड़ जाता है, इस का हमें एहसास ही नहीं होता. कब तीनों बच्चे बड़े हो गए और कब मैं सलोनी की बड़ी मां से सिर्फ मां हो गई, मुझे पता ही ना चला. मैं उसे कुछ भी नहीं कहती थी, पर सुमित और स्मिता को जो भी इंस्ट्रक्शंस देती, वह उन्हें चुपचाप फौलो करती. उन दोनों को तो मुझे होमवर्क करने, दूध पीने और खाने के लिए टोकना पड़ता था, पर सलोनी अपना सारा काम समय से करती थी.

मुझे पेंटिंग्स बनाने का बड़ा शौक था. घर की जिम्मेदारियों की वजह से मैं अपने इस शौक को आगे तो नहीं बढ़ा पाई, पर बच्चों के प्रोजैक्ट में और जबतब साड़ियों, कुरतों और कपड़ों के बैग वगैरह पर अपना हुनर आजमाया करती थी.

जब भी मैं कुछ इस तरह का काम करती, तो सुहानी भी अपनी ड्राइंग बुक और कलर्स के साथ मेरे पास आ कर बैठ जाती और अपनी कल्पनाओं को रंग देने का प्रयास करती. यदि कहीं कुछ समझ में ना आता, तो बड़ी मासूमियत से पूछती, ‘‘बड़ी मां, इस में यह वाला रंग करूं अथवा ये वाला ज्यादा अच्छा लगेगा.’’ उस की कला में दिनोंदिन निखार आता गया. विद्यालय की ओर से उसे सभी प्रतियोगिताओं के लिए भेजा जाने लगा और हर प्रतियोगिता में उसे कोई ना कोई पुरस्कार अवश्य मिलता. पढ़ाई में भी अव्वल सलोनी अपने सभी शिक्षकशिक्षिकाओं की लाड़ली थी.

जब कभी सुमित, स्मिता और सुहानी तीनों आपस में झगड़ा करते, तो सुहानी समझदारी दिखाते हुए उन से समझौता कर लेती. मैं बच्चों के खेल और लड़ाई के बीच में कोई दखलअंदाजी नहीं करती थी.

डेढ़ महीने पहले जब डाक्टर ने मेरी रिपोर्ट देख कर बताया कि मुझे टाइफाइड है तो सभी चिंतित हो गए. सुमित, स्मिता और अरविंद हर समय मेरे पास ही रहते और मेरा बहुत ध्यान रखते थे, पर धीरेधीरे सब अपनी दिनचर्या में बिजी हो गए.

अभी परसों की ही बात है, मैं स्मिता को आवाज लगा रही थी, ‘‘स्मिता, मेरी बोतल में पानी खत्म हो गया है, थोड़ा पानी कुनकुना कर के बोतल में भर कर रख दो.”

इस पर वह खीझ कर बोली, ‘‘ओफ्फो मम्मा, आप थोड़ा वेट नहीं कर सकतीं. कितनी अच्छी मूवी आ रही है, आप तो बस रट लगा कर रह जाती हैं.’’

इस पर सुहानी ने उठ कर चुपचाप मेरे लिए पानी गरम कर दिया. मेरी खिसियाई सी शक्ल देख कर वह बोली, ‘‘मां क्या आप का सिरदर्द हो रहा है, लाइए मैं दबा देती हूं.”

मैं ने मना कर दिया. सुमित बीचबीच में आ कर मुझ से पूछ जाता है, ‘‘मां, आप ने दवा ली, कुछ खाया कि नहीं वगैरह.”

स्मिता भी अपने तरीके से मेरा ध्यान रखती है और अरविंद भी, किंतु सलोनी उस के तो जैसे ध्यान में ही मैं रहती हूं.

आज मुझे आत्मग्लानि महसूस हो रही है. 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली सलोनी कितनी समझदार है. मैं सदैव अपने घर में उसे अवांछित सदस्य ही मानती थी, कभी मन से उसे बेटी न मान पाई. लेकिन वह मासूम मेरी थोड़ी सी देखभाल के बदले में मुझे अपना सबकुछ मान बैठी. कितने गहरे मन के तार उस ने मुझ से जोड़ लिए थे.

मुझे याद आ रहा है उस का वह अबोध चेहरा, जब सुमित और स्मिता स्कूल से आ कर मेरे गले से झूल जाते और वह दूर खड़ी मुझे टुकुरटुकुर निहारती तो मैं बस उस के सिर पर हाथ फेर कर सब को बैग रख कर हाथमुंह धोने की हिदायत दे देती थी.

उस ने मेरी थोड़ी सी सहानुभूति को ही शायद मेरा प्यार मान लिया था. अपनी मां की तो उसे ज्यादा याद नहीं, पर मुझे ही मानो मां मान कर चुपचाप अपना सारा प्यार उड़ेल देना चाह रही है.

आज मेरा जी चाह रहा है कि मैं उसे अपने गले से लगा कर फूटफूट कर रोऊं और अपने मन का सारा मैल और परायापन अपने आंसुओं से धो डालूं. मैं उसे अपने सीने से लगा कर ढेर सारा प्यार करना चाह रही हूं. मैं उस से कहना चाहती हूं, ‘‘मैं तेरी बड़ी मां नहीं सिर्फ मां हूं. मेरी एक नहीं दोदो बेटियां हैं. अपने और सलोनी के बीच जो कांच की दीवार मैं ने खड़ी कर रखी थी, वह आज भरभरा कर टूट गई है. सलोनी मेरी गुड़िया मुझे माफ कर दो.‘‘  Social Story In Hindi

Family Story In Hindi : बुलावा आएगा जरूर

Family Story In Hindi : भाग्यश्री अपने नाम के विपरीत थी. कुछ भी नहीं था उस के पास अपने नाम जैसा. बचपन से ले कर अब तक मातापिता की उपेक्षा ही सही, लेकिन फिर भी मायके में प्यार पाने की उम्मीद उस ने कभी नहीं छोड़ी.

ब तबीयत कैसी है मां?’’ दयनीय दृष्टि से देखती भाग्यश्री ने पूछा.

मां ने सिर हिला कर इशारा किया, ‘‘ठीक है.’’ कुछ पल मां जमीन की ओर देखती रही. अनायास आंखों से आंसू की  झड़ी  झड़ने लगी. सुस्त हाथों को धीरेधीरे ऊपर उठा कर अपने सिकुड़े कपोलों तक ले गई. आंसू पोंछ कर बोली, ‘‘प्रकृति की मरजी है बेटा.’’

परिवार के प्रति आक्रोश दबाती हुई भाग्यश्री ने कहा, ‘‘प्रकृति की मरजी कोई नहीं जानता, किंतु तुम्हारे लापरवाह बेटे को सभी जानते हैं और… और पिताजी की तानाशाही. दोनों के प्रति तुम्हारे समर्पित भाव का प्रतिदान तुम्हें यह मिला कि तुम दोनों की मानसिक चोट से आहत हो कर यहां तक  पहुंच गईं? जिंदगी जकड़ कर रखना चाहती है, लेकिन मौत तुम्हें अपनी ओर खींच रही है.’’

मां ने आहत स्वर में कहा, ‘‘क्या किया जाए, सब समय की बात है.’’

भाग्यश्री ने अपनी आर्द्र आंखों को पोंछ कर कहा, ‘‘दवा तो ठीक से ले रही हो न, कोई कमी तो नहीं है न?’’

पलभर मां चुप रही, फिर बोली, ‘‘नहीं, दवा तो लाता ही है.’’

‘‘कौन? बाबू?’’ भाग्यश्री ने पूछा.

‘‘और नहीं तो कौन, तुम्हारे पिताजी लाएंगे क्या, गोबर भी काम में आ जाता है, गोथठे के रूप में. लेकिन वे? इस से भी गएगुजरे हैं. वही ठीक रहते तो किस बात का रोना था?’’ कुछ आक्रोश में मां ने कहा.

भाग्यश्री सिर  झुका कर बातें सुनती रही.

‘‘और एक बेटा है, वह अपनेआप में लीन रहता है, कमरे में  झांक कर भी नहीं देखता. आने में देरी हो जाए, तो मन घबराता है. देरी का कारण पूछती हूं, तो बरस पड़ता है. घर में नहीं रहने पर इधर बाप की चिल्लाहट सुनो और आने पर कुछ पूछो, तो बेटे की  िझड़की सुनो. बस, ऐसे ही दिन काट रही हूं,’’ आंसू पोंछती हुई मां ने कहा, ‘‘हां, लेकिन सेवा तुम्हारे पिताजी करते हैं मूड ठीक रहा तो, ठीक नहीं तो चार बातें सुना कर ही सही, मगर करते हैं.’’

भाग्यश्री ने कई बार सोचा कि मां की सेवा के लिए एक आया रख दे, मगर इस में भी समस्याएं थीं. एक तो यह कि इस माहौल में आया रहेगी नहीं, हरवक्त तनाव की स्थिति, बापबेटे के बीच वाकयुद्ध, अशांति ही अशांति. स्वयं कुछ भी खा लें, मगर आया को तो ढंग से खिलाना पड़ेगा न. दूसरा यह कि भाग्यश्री की सहायता घरवाले स्वीकार करेंगे? इन सब कारणों से वह लाचार थी. वह मां के पास बैठी थी, तभी उस के पिताजी आए. औपचारिकतावश भाग्यश्री ने प्रणाम किया. फिर चुपचाप बैठी रही.

भाग्यश्री ने अपने पिताजी की ओर देखा. उन के चेहरे पर क्रोध का भाव था. निसंदेह वह भाग्यश्री के प्रति था.

पिछले 10 वर्षों में वह बहुत कम यहां आईर् थी. जब उस ने अपनी मरजी से शादी की, पिताजी ने उसे त्याग दिया. मां भी पिताजी का समर्थन करती, किंतु मां तो मां होती है. मां अपना मोह त्याग नहीं पाई थी. शादी भी एक संयोग था. स्नेहदीप के बिना जीवन अंधकारमय रहता है. प्रकाश की खोज करना हर व्यक्ति की प्रवृत्ति है.

व्यक्ति को यदि अपने परिवेश में स्नेह न मिले तो बूंदभर स्नेह की लालसा लिए उस की दृष्टि आकाश को निहारती है, शायद स्वाति बूंद उस पर गिर पड़े. जहां आशा बंधती है, वहां वह स्वयं भी बंध जाता है. भाग्यश्री के साथ भी ऐसी ही बात थी. नाम के विपरीत विधाता का लिखा. दोष किस का है- इस सर्वेक्षण का अब समय नहीं रहा, लेकिन एक ओर जहां भाग्यश्री का खूबसूरत न होना उस के बुरे समय का कारण बना, वहीं, दूसरी ओर पिता का गुस्सैल स्वभाव भी. कभी भी उन्होंने घर की परिस्थिति को देखा ही नहीं, बस, जो चाहिए, मिलना चाहिए अन्यथा घर सिर पर उठा लेते.

घर की विषम परिस्थितियों ने ही भाग्यश्री को सम झदार बना दिया. न कोई इच्छा, न शौक. बस, उदासीनता की चादर ओढ़ कर वह वर्तमान में जीती गई. परिश्रमी तो वह बचपन से ही थी. छोटे बच्चों को पढ़ा कर उस ने अपनी पढ़ाई पूरी की. उस का एक छोटा भाई था. बहुत मन्नत के बाद उस का जन्म हुआ था. इसलिए उसे पा कर मातापिता का दर्प आसमान छूने लगा था. पुत्र के प्रति आसक्ति और भाग्यश्री के प्रति विरक्ति यह इस घर की पहचान थी.

लेकिन, उसे अपने एकांत जीवन से कभी ऊब नहीं हुई, बल्कि अपने एकाकीपन को उस ने जीवन का पर्याय बना लिया था. कालांतर में हरदेव के आत्मीय संसर्ग के कारण उस के जीवन की दिशा ही नहीं बल्कि परिभाषा भी बदल गई. बहुत ही साधारण युवक था वह, लेकिन विचारउदात्त था. सादगी में विचित्र आकर्षण था.

भाग्यश्री न तो खूबसूरत थी, न पिता के पास रुपए थे और न ही वह सभ्य माहौल में पलीबढ़ी थी. किंतु पता नहीं, हरदेव ने उस के हृदय में कौन सा अमृतरस का स्रोत देखा, जिस के आजीवन पान के लिए वह परिणयसूत्र में बंध गया. हरदेव के मातापिता ने इस रिश्ते को सहर्ष स्वीकार किया. भाग्यश्री के मातापिता ने उस के सामने कोई आपत्ति जाहिर नहीं की, मगर पीठपीछे बहुत कोसा. यहां तक कि वे लोग न इस से मिलने आए, न ही उन्होंने इसे घर बुलाया. खुश रह कर भी भाग्यश्री मायके के संभावित दुखद माहौल से दुखी हो जाती. उपेक्षा के बाद भी वह अपने मायके के प्रति लगाव को जब्त नहीं कर पाती और यदाकदा मांपिताजी, भाई से मिलने आती, किंतु लौटती तो अपमान के आंसू ले कर.

कुछ माह बाद ही भाग्यश्री को मालूम हुआ कि उस की मां लकवे का शिकार हो गई है. घबरा कर वह मायके आई. अपाहिज मां उसे देख कर रोने लगी, मानो बेटी के प्रति जितना भी दुर्भाव था, वह बह रहा हो. किंतु, पिताजी की मुद्रा कठोर थी. मां अपनी व्यथा सुनाती रही, लेकिन पिताजी मौन थे. आर्थिक तंगी तो घर में पहले से ही थी, अब तो कंगाली में आटा भी गीला हो गया था. मां के पास वह कुछ देर बैठी रही, फिर बहुत साहस जोड़ कर, मां को रुपए दे कर कहने लगी, ‘इलाज में कमी न करना मां. मैं तुम्हारा इलाज कराऊंगी, तुम चिंता न करना.’

उस की बातों को सुनते ही पिताजी का मौन भंग हुआ. बहुत ही उपेक्षित ढंग से उन्होंने कहा, ‘हम लोग यहां जैसे भी हैं, ठीक हैं. तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है. मिट्टी में इज्जत मिला कर आई है जान बचाने.’ विकृत भाव चेहरे पर आच्छादित था. कुछ पल चुप रहे, फिर उन्होंने कहा, ‘तुम्हारे आने पर यह रोएगी ही, इसलिए न आओ तो अच्छा रहेगा.’

घर में उस की उपेक्षा नई बात नहीं थी. आंसूभरी आंखों से मां को देखती हुई उदासी के साथ वह लौट गई. मातापिता ने उसे त्याग दिया. मगर वह त्याग नहीं पाई थी. इस बार 5वीं बार वह सहमीसहमी मां के घर आई थी. इस बार न उसे उपेक्षा की चिंता थी, न पिताजी के क्रोध का भय था. और न आने पर संकोच. मां के दुख के आगे सभी मौन थे.

उसे याद आई. छोटे भाई के प्रति मातापिता का लगाव देख कर वह यही सम झ बैठी थी कि यह घर उस का नहीं. खिलौने आए तो उस भाई के लिए ही. उसे याद नहीं कि उस ने कभी खिलौने से खेला भी था. खीर बनी, तो पहले भाई ने ही खाई. उस के खाने के बाद ही उसे मिली. मां से पूछती, ‘हर बार उसी की सुनी जाती, मेरी बात क्यों नहीं? गलती अगर बाबू करे तो दोषी मैं ही हूं, क्यों?’

लापरवाही के साथ बड़े गर्व से मां कहती, ‘उस की बराबरी करोगी? वह बेटा है. मरने पर पिंडदान करेगा.’ मां के इस दुर्भाव को वह नहीं भूली. पति के घर में हर सुख होने के बाद भी वह अतीत से निकल नहीं पाई. बारबार उसे चुभन का एहसास होता रहा. लेकिन अब? मां की विवशता, लाचारी और कष्ट के सामने उस का अपना दुख तुच्छ था.

कुछ पल वह मां के पास बैठी रही. फिर बोली, ‘‘बाबू कहां है?’’ बचपन से ही, वह भाई को बाबू बोलती आई थी. यही उसे सिखाया गया था.

‘‘होगा अपने कमरे में,’’ विरक्तभाव से मां ने कहा.

भाग्यश्री कमरे में जा कर बाबू के पास बैठ गई. पत्थर पर फूल की क्यारी लगाने की लालसा में उसे कुछ पल अपलक देखती रही. फिर साहस समेट कर बोली, ‘‘आज तक इस घर ने मु झे कुछ नहीं दिया है. बहनबेटी को देना बड़ा पुण्य का काम होता है.’’

बाबू आश्चर्य से उसे देखने लगा, क्योंकि किसी से कुछ मांगना उस का स्वभाव नहीं था.

‘‘क्या कहती हो दीदी? क्या दूं,’’ बाबू ने पूछा.

‘‘मन का चैन,’’ याचक बन कर उस ने कहा.

बाबू चुप रहा. बाबू के चेहरे का भाव पढ़ कर उस ने आगे कहा, ‘‘देखो बाबू, हम दोनों यहीं पलेबढ़े. लेकिन, तुम्हें याद है? मांपिताजी का सारा ध्यान तुम्हीं पर रहता था. तुम्हीं उन के लिए सबकुछ हो. उन के विश्वास का मान रख लो. मु झे मेरे मन का चैन मिल जाएगा.’’ बोलतेबोलते उस का गला भर आया. कुछ रुक कर फिर बोली, ‘‘याद है न? मां तुम्हें छिप कर पैसा देती थीं जलेबियां खाने के लिए. मैं मांगती, तो कहतीं ‘इस की बराबरी करोगी? यह बेटा है, आजीवन मु झे देखेगा.’  और मैं चुप हो जाती. मां के इस प्रेम का मान रख लो बाबू. पहले उस के दुर्भाव पर दुख होता था और अब उस की विवशता पर. दुख मेरे समय में ही रहा.’’

‘‘तुम क्या कह रही हो, मैं सम झ नहीं पा रहा हूं,’’ कुछ खी झ कर बाबू ने कहा, ‘‘क्या कमी करता हूं? दवा, उचित खानापीना, सभी तो हो रहा है. क्या कमी है?’’

‘‘आत्मीयता की कमी है,’’ भाग्यश्री का संक्षिप्त उत्तर था. ‘चोर बोले जोर से’ यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है. खी झ कर बाबू बोला, ‘‘हांहां, मैं गलत हूं. मगर तुम ने कौन सी आत्मीयता दिखाई? आज भी कोई पूछता है कि भाग्यश्री कैसी है, तो लगता है कि व्यंग्य से पूछ रहा है.’’

बाबू की यह बात उसे चुभ गई. आंखें नम हो गईं. मगर धीरे से कहने लगी, ‘‘हां, मैं ने गलत काम किया है. तुम लोगों के सताने पर भी मैं ने आत्माहत्या नहीं की, बल्कि जिंदगी को तलाशा है, यही गलती हुई है न?’’

बाबू चुप रहा.

‘‘देखो बाबू,’’ भरे हुए कंठ से उस ने कहा, ‘‘बहस नहीं करो. मैं इतना ही जानती हूं कि मांपिताजी, मांपिताजी होते हैं. मैं ने इतना अन्याय सह कर भी मन मैला न किया. फिर तुम्हें क्या शिकायत है कि इन के दुखसुख में हाल भी न पूछो? दवा से ज्यादा सद्भाव का असर होता है.’’

‘‘कौन कहता है?’’ बात का रुख बदलते हुए बाबू ने कहा, ‘‘कौन शिकायत करता है? क्या नहीं करता? तुम्हें पता है सारी बातें? कौन सा ऐसा दिन है, जब पिताजी मु झे नहीं कोसते? एक सरकारी नौकरी न मिली कि नालायक, निकम्मा विशेषणों से अलंकृत करते रहते हैं. बीती बातों को उखाड़उखाड़ कर घर में कुहराम मचाए रहते हैं. घर की शांति भंग हो गई है.’’ वह अपने आंसू पोंछने लगा.

बात जब पिताजी पर आई, तो कमरे में आ कर चीखते हुए भाग्यश्री को बोलने लगे, ‘‘हमारे घर के मामले में तुम कौन हो बोलने वाली? कौन तुम्हें यहां की बातें बताता है? यह मेरा बेटा है, मैं इसे कुछ बोलूं तो तुम्हें क्या? यह हमें लात मारे, तुम्हें क्या मतलब?’’

बात कहां से कहां पहुंच गई. भाग्यश्री को भी क्रोध आ गया. वह कुछ बोली नहीं, बस, आक्रोश से अपने पिताजी को देखती रही. पिताजी का चीखना जारी था, ‘‘तुम अपने घर में खुश रहो. हमारे घर के मामले में तुम्हें बोलने का अधिकार नहीं है.’’

‘हमारा घर?

‘पिताजी का घर?

‘बाबू का घर? मेरा नहीं? हां, पहले भी तो नहीं था. और अब? शादी के बाद?’ भाग्यश्री मन में सोच रही थी.

पिताजी को बोलते देख, मां ने आवाज लगाई. भाग्यश्री मां के पास चली गई. मां ने रोते हुए कहा, ‘‘समय तो किसी का कोई बदल नहीं सकता न बेटा? मेरे समय में ही दुख लिखा है, इसलिए तो बापबेटे की मत मारी गई. आपस में भिड़ कर एकदूसरे का सिर फोड़ते रहते हैं. तुम बेकार मेरी चिंता करती हो. तुम्हें यहां कोई नहीं सराहता, फिर क्यों आती हो.’’ यह कहती हुई वह फूटफूट कर रो पड़ी.

पिताजी के प्रति उत्पन्न आक्रोश ममता में घुल गया. कुछ देर तक भाग्यश्री सिर नीचे किए बैठी रही. आंखों से आंसू बहते रहे. अचानक उठी और बाबू से बोली, ‘‘मां, मेरी भी है. इस की हालत में सुधार यदि नहीं हुआ, तो बलपूर्वक मैं अपने साथ ले जाऊंगी,’’ कहती हुई वह चली गई.

महल्ले में ही उस का मुंहबोला एक भाई था, कुंदन. वह बाबू का दोस्त भी था. उदास हो कर लौटती भाग्यश्री को देख कर वह उस के पीछे दौड़ा, ‘‘दीदी, ओ दीदी.’’

भाग्यश्री ने पीछे मुड़ कर देखा. बनावटी मुसकान अधरों पर बिखेर कर हालचाल पूछने लगी. उसे मालूम हुआ कि फिजियोथेरैपी द्वारा वह इलाज करने लगा है. उस की उदास आंखें चमक उठीं. याचनाभरी आवाज में कहा, ‘‘भाई, मेरी मां को भी देख लो.’’

‘‘चाचीजी को? हां, स्थिति ठीक नहीं है, यह सुना, लेकिन किसी ने मु झ से कहा ही नहीं,’’ कुंदन ने कहा.

‘‘मैं कह रही हूं न,’’ व्यग्र होते हुए भाग्यश्री ने कहा.

दो पल दोनों चुप रहे. कुछ सोच कर भाग्यश्री ने फिर कहा, ‘‘लेकिन भाई, यह बताना नहीं कि मैं ने तुम्हें भेजा है. नहीं तो मां का इलाज करवाने नहीं देंगे सब.’’

‘‘लेकिन, लेकिन क्या कहूंगा?’’

‘‘यही कि, बाबू के मित्र हो, इसलिए इंसानियतवश. और हां,’’ भाग्यश्री ने अपने बटुए में से एक हजार रुपया निकाल कर देते हुए कहा, ‘‘तुम मेरा पता लिख लो, मेरे घर आ कर ही अपना मेहनताना ले लेना.’’

कुंदन उसे देखता रहा. भाग्यश्री की आंखों में कृतज्ञता छाई थी, बोली, ‘‘भाई, तुम्हारा एहसान मैं याद रखूंगी. बस, मेरी मां को ठीक कर दो.’’

कुंदन सिर हिला कर कह रहा था, ‘‘ठीक है.’’

दो माह बाद वह फिर से मायके आई. हालांकि कुंदन से उसे मालूम हो गया था कि मां की स्थिति में बहुत सुधार है, फिर भी वह देखना चाहती थी. भाग्यश्री के मन में एक अज्ञात भय था. जैसे कोई किसी दूसरे के घर में प्रवेश कर रहा हो वह भी चोरीचोरी. जैसेजैसे घर निकट आ रहा था, उस के कदम की गति धीमी होती जा रही थी और हृदय की धड़कन बढ़ती जा रही थी.

वहां पहुंच कर उस ने बरामदे में  झांका. मां, पिताजी और बाबू तीनों बैठ कर चाय पी रहे थे. सभी प्रसन्न थे. आपस में बातें करते हुए हंस रहे थे. भाग्यश्री ने शायद ही कभी ऐसा दृश्य देखा होगा. भाग्यश्री वहीं ठहर गई. उस ने अपने भाई से ‘मन का चैन’ मांगा था, भाई ने उसे दे दिया. मायके से प्राप्त उपेक्षा, तो उस का दुख था ही, लेकिन यह ‘मन का चैन’ उस का सुख था.

‘ठीक ही है,’ उस ने सोचा, मैं तो इस घर के लिए कभी थी ही नहीं. फिर अपना स्थान क्यों ढूढ़ूं? आज मन का चैन मिला, इस से बड़ा मायके का उपहार क्या होगा. मन का चैन ले कर वह वहीं से लौट आई, बिन बुलाए कभी न जाने के लिए.

बाहर निकल कर नम आंखों से अपने मायके का घर देख रही थी. अनायास उस के अधरों पर वेदना के साथ एक मुसकान दौड़ आई. उंगली से इशारा करती हुई, भरे हुए कंठ से वह बुदबुदाई, ‘मुझे पता है पिताजी, एक दिन आप मु झे बुलाएंगे जरूर. मन का चैन पा कर वह प्रसन्न थी, किंतु मायके के विद्रोह से उस का अंतर्मन बिलख रहा था. उस ने मन से पूछा, ‘लेकिन कहां बुलाएंगे?’ मन ने उत्तर भी दे दिया, ‘जल्द ही बुलाएंगे.’

अपनी आंखों को पोंछती हुई वह एकाएक मुड़ी और अपने घर की ओर चल दी. मन में विश्वास था कि एक दिन बुलावा आएगा, हां, बुलावा आएगा जरूर. Family Story In Hindi

Romantic Story : रिश्तों की मरम्मत – पतिपत्नी के बीच अनकहा प्यार

Romantic Story : पतिपत्नी का साथ जीवनभर का एक वादा है, जिस में हर भाव छिपा होता है. भारती और प्रेम के बीच चाहे कितनी ही लड़ाइयां होती थीं लेकिन जब जरूरत पड़ी तो दोनों हर दर्द और परेशानी को मिल कर झेलने को तैयार थे.

भारती और प्रेम के बीच महसंग्राम फिर से जारी था. आएदिन दोनों का झगड़ा महिलाओं के उन मुश्किल दिनों के जैसा हो गया जो हर महीने आ ही धमकते. रजोनिवृत्ति की संभावना दूरदूर तक दिखाई नहीं देती थी. झगड़ा ऐसा कि लगता मानो अब दोनों एकदूसरे को शारीरिक हानि पहुंचा कर ही दम लेंगे. शब्दों के बाण इतने तीखे कि उस से होने वाले घाव कभी न भर सकें.

तभी भारती के मोबाइल फोन की घंटी बजी. भारती ने देखा और नजरअंदाज कर दिया. घंटी फिर बजी. इस बार भारती ने फोन रिसीव कर लिया. भारती मोबाइल फोन पर ऐसे बात करने लगी मानो घर में अभी कुछ हुआ ही नहीं. चंद मिनट पहले की तीखी वाणी मोबाइल फोन पर किसी दूसरे से बात करने में मधुर हो गई. अगर अभी कोई घर में दाखिल होता तो उसे कुछ देर पहले की स्थिति झुठी लगती.

भारती पूरी दुनिया वालों से अच्छे से बात करती सिवा प्रेम के, प्रतिक्रिया में प्रेम का भी वही रवैया. एकदूसरे से बात करने की जब बारी आती तो ऐसा लगता मानो दोनों के मन में ढेरों गुस्सा भरा पड़ा है. न तो सीधे सवाल निकल कर आते और न ही सीधे जवाब.

बड़े होते 2 बच्चों की जिम्मेदारियों ने दोनों के रिश्तों में इतनी नीरसता ला दी कि लगता ही नहीं कि दोनों ने कभी साथ जीनेमरने की कसमें खाई थीं. भारती बच्चों की ख्वाहिशों को पूरी करने में ऐसी उल?ा कि उसे प्रेम के पसंदनापसंद का खयाल ही नहीं रहा. दोनों एक अच्छे मांबाप तो बन गए मगर इस चक्कर में एक अच्छे पतिपत्नी कहीं दफन हो कर रह गए.

बच्चे अगर कुछ खाने की फरमाइश कर दें तो सुबह 7 बजे बच्चों के स्कूल जाने से पहले ही भारती बना कर तैयार कर देती जबकि प्रेम की छोटी सी फरमाइश को पूरी होने में महीनों लग जाते. इस वजह से प्रेम खुद को कुछ ज्यादा ही उपेक्षित महसूस करने लगा. उसे लगता कि घर में और साथसाथ भारती के दिल में अब उस के लिए कोई जगह नहीं. उसे ऐसा लगने लगा कि घर में हो रही हर चीज उस के लिए नहीं है या हर वह चीज जो वह चाहता है खासकर वही पूरी नहीं की जाती.

दोनों अपनेअपने हिसाब से ताना देने का जोड़घटाव करते रहते, कोई पीछे नहीं रहना चाहता. गुजरे वक्त की न जाने कौनकौन सी बुरी यादें दोनों ने बीमा की तरह अपने मन में जमा कर रखी थीं जो किस्तदरकिस्त दोनों के कड़वाहट वाले रिश्तों में जमा होती रहतीं. अच्छी चीजों का निकल कर आने वाला रास्ता बंद हो चुका था.

बारिश की वजह से डेंगू के बढ़ते कहर ने भारती को भी नहीं छोड़ा. प्लेटलेट्स इतनी कम हो गए कि उसे आईसीयू में भरती करने की नौबत आ गई. पूरा घर प्रेम को अकेले ही संभालना पड़ रहा था. सुबह 7 बजे बच्चे घर का खाना खा कर और लंच में भी घर का ही खाना ले कर स्कूल जाएं, इस के लिए भारती तड़के 4 बजे ही जग जाती थी. प्रेम ने भी पूरी कोशिश की और उस की कोशिश सफल भी रही पर सुबह 4 बजे जब वह जगता तो उस समय का सन्नाटा उसे काटने को दौड़ता.

इस सन्नाटे में उस का मन करता कि घर के किसी कोने में सिर्फ वह और भारती चंद मिनट साथ बैठें. उस की गोद में भारती का सिर हो और दोनों ढेर सारी सिर्फ प्यारभरी बातें करें पर वह जानता था कि आईसीयू से भारती के लौट आने के बाद भी वह पल अब कभी नहीं आने वाला. डाक्टर की देखरेख से भारती की हालत सुधरने लगी. जब भारती घर लौट कर आई तो मन में लाख द्वेष रहने के बावजूद प्रेम ने उस का पूरा खयाल रखा.

घर, अस्पताल और औफिस संभालतेसंभालते प्रेम के अंदर भी नीरसता पैदा हो गई. उसे बस इस बात की जल्दी रहती कि कैसे 7 बजे तक बच्चों को तैयार कर स्कूल भेज सके, फिर भारती की सभी जरूरतों को पूरा कर खुद भी औफिस के लिए निकल सके. उसे कुछ और सोचने का वक्त ही नहीं मिलता और कितना भी जल्दी कर ले, 5-10 मिनट की देर हो ही जाती.

वह खुद को भारती की जगह महसूस करने लगा. धीरेधीरे उसे भारती की मनोस्थिति समझ आने लगी. उस ने कभी कोशिश ही नहीं की कि भारती के साथ चंद मिनट बैठ कर कुछ बातें करे और वहीं भारती की जलीकटी बातें उसे ऐसा सोचने की भी फुरसत न देती थीं. धीरेधीरे भारती की सेहत में सबलता आने लगी. थोड़ाबहुत घर के काम में वह भी हाथ बंटाने लगी लेकिन पारिवारिक स्थिति पहले जैसी ही थी.

इधर भारती को भी अपने रवैए के प्रति मन में ग्लानि महसूस होने लगी. उस ने देखा कि प्रेम उस का खयाल रखते हुए घर का सब काम संभाल ले रहा है तो फिर वह क्यों नहीं. उसे तो औफिस जाने की भी चिंता नहीं. प्रेम को उस से बस इतनी ही शिकायत रहती थी न, कि उस के जीवन में अब उस के लिए कोई जगह नहीं रही क्योंकि वह उस को अपना समय नहीं दे पाती. अब भारती को प्रेम की शिकायत सही लगने लगी थी.

दोनों के मन के अंदर भावुकता अंकुरण का असफल प्रयास जारी था परंतु पुरानी बुरी यादों की परत इतनी मोटी थी कि वह भाव अंकुरित नहीं हो पा रहा था. दोनों में बगैर जरूरत कोई बातचीत न होती. हां, लेकिन, तीखी वाणी और टेढ़ी बातें अपना अस्तित्व खो चुकी थीं.

एक दिन भारती का रैगुलर चैकअप करा जब दोनों अस्पताल से लौट रहे थे तो ग्राइंडर मशीन की जार, जो उन्होंने ठीक होने को दिया था, उस दुकान पर रुके. दुकानदार ने जार ठीक करने का जो खर्च बताया उस पर प्रेम ने कहा, ‘‘भाईसाहब, ठीकठीक खर्च बताओ, आप जो खर्च बता रहे हो उस में थोड़े पैसे और मिला दें तो नया जार मिल जाएगा.’’
‘‘साहब, ऐसा है कि आप के घर का ज्यादातर सामान धीरेधीरे पुराना हो रहा होगा. उन सब की अब मरम्मत की जरूरत पड़ती होगी. ऐसे में आप कितना नया सामान खरीदेंगे. चीजों का बदलाव सब से आसान है पर उस की मरम्मत करवा लेने से उस से जुड़ी यादें घर में ही रह जाती हैं.’’

इतनी बड़ी बात दुकानदार कितनी सहजता से बोल गया. ऐसे कितने ही पल दोनों को याद आ गए जब दोनों अलग होना चाहते थे, रिश्ता खत्म कर जीवन में बदलाव चाहते थे लेकिन दरअसल उसे मरम्मत की जरूरत थी. दोनों आपसी सहमति से दुकानदार को जार की मरम्मत करने की इजाजत दे अपनी स्कूटी की तरफ बढ़ गए.

प्रेम ने स्कूटी के दोनों हैंडल पकड़ खुद को संतुलित किया और पीछे भारती लेडीस्टेप पर कम भार देते हुए बैठ गई. दोनों एकदूसरे की सहजता का खयाल रखने की पूरी कोशिश कर रहे थे पर दोनों के दिमाग में दुकानदार की बातें घूम रही थीं और उन्हें समझ आ चुका था कि सिर्फ चीजों को ही नहीं, रिश्तों को भी मरम्मत की जरूरत होती है.

स्कूटी स्टार्ट कर प्रेम हैंडल संभालते हुए दुपहिया चला रहा था और पीछे भारती ऊंचेनीचे रास्तों पर खुद को बैलेंस करने की कोशिश कर रही थी.

Family Story : वादा – बेटे का तिरस्कार सहता पिता

Family Story : एक डाक्टर होते हुए भी पत्नी को मौत के मुंह में जाते हुए देखते रह गए थे डाक्टर सुमित. कितने व्यथित थे वे लेकिन उन का बेटा मुदित शायद पापा का दुख समझ नहीं पा रहा था.

कौफी का मग सामने था. मग में पहले की तरह ही झाग के बुलबुले दिख रहे थे. एक घूंट भरा और मुंह कड़वा हो गया. डाक्टर सुमित ने मग नीचे रख दिया, ‘कैंटीन वाले रवि की कौफी पर भी असर हो रहा है,’ सोचते हुए डाक्टर सुमित के चेहरे पर एक खिन्न सी मुसकान आई और चली गई. असर सब ओर था. हर तरफ उदासी पंजे गाढ़ कर जमी थी. अभी 2 ही बजे थे, अगली शिफ्ट शुरू होने में एक घंटा था. इन दिनों सभी 2 शिफ्टों में काम कर रहे हैं, इन दिनों मरीज बढ़ने लगे हैं. डाक्टर सुमित ने आसपास नजर दौड़ाई, कैंटीन लगभग खाली थी. अधिकतर डाक्टर्स लंच के लिए चले गए होंगे.

कैंटीन में इस वक्त डाक्टर सुमित के अलावा चारपांच लोग ही थे. खांसी की आवाज सुन कर उन का ध्यान कोने की मेज पर चला गया, दसबारह साल का बच्चा मातापिता के साथ बैठा था. मां के हाथ में बिसकुट का पैकेट था, वह हाथ में बिसकुट ले कर बच्चे को खिला रही थी. मां के बारबार कहने पर बच्चे ने जरा सा बिसकुट कुतरा और फिर खांसने लगा. मां ने बच्चे की पीठ सहलानी शुरू कर दी. पिता ने फौरन बैग से फ्लास्क निकाला और मां को थमा दिया. मां ने फ्लास्क खोल कर पानी निकाला और बच्चे को अपने हाथ से पिलाने लगी.

डाक्टर सुमित ने वहां से दृष्टि हटा ली. कितने बेचैन लग रहे हैं दोनों, मातापिता हैं न, बच्चे की तकलीफ देख कर उस से ज्यादा परेशान हो जाते हैं और यही बच्चे बड़े हो कर कितने दूर हो जाते हैं, यह सोचते हुए डाक्टर सुमित ने कौफी का एक और घूंट भरा और मुंह फिर कड़वा हो गया.

कौफी छोड़ कर वे उठ खड़े हुए. बाहर निकलते हुए उन की नजर एक बार फिर कोने वाली मेज की तरफ गई, मां ने आंचल से बच्चे का मुंह पोंछ कर उसे अपनी गोद में लिटा लिया था और पिता उस के पैर अपनी गोद में रख कर सहला रहा था.

गरिमा भी ऐसे ही करती थी. जब भी मुदित तकलीफ में होता था, अपनी गोद में उस का सिर रख कर वह सहलाती रहती. हां, उस वक्त डाक्टर सुमित इस बच्चे के पिता की तरह उस का पैर अपनी गोद में नहीं रख पाते थे, लेकिन अस्पताल से दस बार फोन करते और मुदित का हाल पूछते, दवाएं भिजवाते.

गरिमा उन्हें आश्वस्त करती, ‘परेशान मत हो, सुमित, मैं हूं न.’ आश्वासन देने वाली गरिमा अब नहीं थी, मुदित था लेकिन उन से बहुत दूर, एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद मुदित को यह तक पता नहीं चला कि वे बिना नाश्ता किए अस्पताल आ रहे हैं. गरिमा होती तो ऐसा होता?

वह तो उन्हें बिना नाश्ता किए जाने ही नहीं देती थी, सुबह 7 बजे की शिफ्ट होती तो सैंडविच बना कर साथ रख देती और मुदित कहता, ‘सब खाना है, प्रौमिस?’ डाक्टर सुमित हंसते हुए कहते, ‘प्रौमिस’. वादा निभाने की पुष्टि करने के लिए कई बार उन्होंने सैंडविच खाते हुए अपना वीडियो भी बना कर भेजा.

लेकिन अब पूछना तो दूर, मुदित नाश्ते की टेबल पर ही नहीं आता, पता नहीं खुद नाश्ता करता है या नहीं, गरिमा होती तो उन्हें झट आश्वस्त कर देती, ‘मैं हूं न, तुम परेशान मत हो.’

गरिमा होती तो ऐसी नौबत ही नहीं आती, अपने केबिन में बैठते हुए डाक्टर सुमित ने सोचा, वह होती तो न गरिमा की सहेली रीमा का फोन आता जिसे सुन कर मुदित भड़क उठा था और न ही आंखों में आंसू भर कर उन से कहता, ‘आप किसी को प्यार नहीं करते पापा, न मम्मी को, न मुझे. आप को किसी के लिए कुछ नहीं करना है क्योंकि आप को लगता है, सब ठीक है,’ कहते हुए मुदित ने अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लिया था. डाक्टर सुमित हतप्रभ से बंद दरवाजा देखते रहे.

अपनी समझ से तो उन्होंने ठीक ही किया था. रीमा ने संवेदना प्रकट करने के लिए फोन किया था, ‘हाय, यह भी कोई जाने की उम्र थी’ गरिमा की असमय मृत्यु पर शोक प्रकट करने के बाद वह उन्हीं घिसेपिटे सवालों को दोहरा रही थी जिन का जवाब ढूंढ़तेढूंढ़ते डाक्टर सुमित हार चुके थे, इसीलिए रीमा की संवेदना भी उन्हें सिर्फ औपचारिकता लग रही थी. वह लगातार बोल रही थी, ‘सोचती हूं तो आंसू नहीं थमते, घर तो वही संभालती थी, अब कौन खयाल रखेगा, मुदित को कौन देखेगा, आप कैसे मैनेज कर पाते होंगे, कितनी परेशानी होती होगी!’

पिछले 5 महीनों में गरिमा की कमी को हर कदम पर महसूस करते हुए बहुत मुश्किल से खुद को संभाला था. सहानुभूति की लहर कहीं उन्हें फिर असहाय न कर दे, इसलिए वे झट से बोल उठे, ‘परेशानी का क्या है, घर के काम के लिए मेड है, खाना तो मिल ही जाता है, मैं बिलकुल ठीक हूं और मुदित तो बहुत समझदार है, रीमाजी, वह भी सीख रहा है सब.’

उधर से गरिमा को याद करते हुए अपना खयाल रखने की हिदायत के साथ रीमा ने फोन बंद किया तब उन्होंने देखा सोफे पर मुदित बैठा था. वह झटके से बोला, ‘मुझे मम्मी के बिना कुछ अच्छा नहीं लगता, न खाना, न यह घर,’ डाक्टर सुमित ने ठंडी सांस भरी और उस की बगल में बैठ गए. लेकिन कंधे पर रखा उन का हाथ झटकते हुए मुदित उठ खड़ा हुआ, ‘और आप कहते हैं कि सब पहले जैसा हो रहा है? कुछ पहले जैसा नहीं है.’

डाक्टर सुमित ने उस का हाथ पकड़ कर बैठाने की कोशिश की, लेकिन मुदित ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, ‘बोलिए अपना फेवरेट डायलौग, हम कर ही क्या सकते हैं. मुझे पता है, आप कुछ नहीं कर सकते. मम्मी बीमार हुई, तब आप ने यही कहा. मम्मी जा रही थी, मैं रो रहा था और आप ने कह दिया, हम कर ही क्या सकते हैं, आज वो नहीं है तब भी आप यही बोलिए पापा, क्योंकि आप को किसी के लिए कुछ नहीं करना है.’

डाक्टर सुमित को झटका सा लगा. गरिमा का कैंसर अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया, तब रोग का पता लगा था. उन्होंने अपनी तरफ से हर कोशिश की थी लेकिन वे हाथ मलते रह गए. गरिमा चली गई. डाक्टर हो कर भी उसे न बचा पाने का मलाल उन के मन में था. मुदित इसी बात पर उन से नाराज था.

उस रात वे सो नहीं पाए. इसी उधेड़बुन में रहे कि मुदित को कैसे समझाएं कि गरिमा के बिना वे कितने अकेले हो गए हैं. ऐसे में सहानुभूति जताने वाली बातें उन की हिम्मत कमजोर करने लगती हैं. ऐसे पलों में वे बड़ी कठिनाई से खुद को संभाल कर कहते हैं, ‘सब ठीक है.’

यह बात मुदित धीरेधीरे ही समझ पाएगा, यह सोच कर वे अगली सुबह नाश्ते की मेज पर उस का इंतजार करते रहे. वह जब नहीं आया तो एक कागज पर उन्होंने लिखा, ‘अस्पताल जा रहा हूं, तुम नाश्ता कर लेना और फोन जरूर करना.’ कागज उस के कमरे के दरवाजे के नीचे से खिसका कर वे अस्पताल आ गए थे.

पूरा दिन बीत गया, कोई फोन नहीं आया. रात को घर लौट कर उन्होंने देखा, झुमकी खाना बना कर चली गई थी लेकिन मुदित ने खाना नहीं खाया था. नहा कर वे सीधे मुदित के कमरे की ओर गए. दरवाजा बंद था. कई आवाजें देने पर भी जब मुदित ने कोई जवाब नहीं दिया तो उन्होंने फिर कागज पर लिखा, ‘आजकल लौटने में देर हो रही है. दो शिफ्ट्स चल रही हैं. कल भी सुबह ही निकल जाऊंगा. हो सकता है अब रात में भी अस्पताल में रुकना पड़े. तुम अपना ध्यान रखना. खाना खा लो. याद है न, मम्मी कहती थी, गुस्सा कभी खाने पर नहीं निकालना चाहिए,’ यह लिखते हुए उन्हें लगा कि आंखें नम हो गई हैं. कागज दरवाजे के नीचे खिसका कर वे अपने कमरे में लौट आए.

आज भी मुदित को बिना देखे ही वे अस्पताल आ गए थे. दूसरी शिफ्ट में भी एक मिनट की फुरसत नहीं मिली. अभी जिस मरीज को देखा है उस की हालत बहुत गंभीर है. उसे देखते हुए कई बार मोबाइल की आवाज आई है. शायद कोई कौल कर रहा है. नर्स को दवाओं और इंजैक्शन देने का निर्देश दे कर उन्होंने अभीअभी जेब से मोबाइल निकाला है, मुदित का मैसेज है, ‘खाना आप के साथ ही खाऊंगा. प्रौमिस कीजिए कि आप रात में घर लौट आएंगे.’ डाक्टर सुमित के थके चेहरे पर मुसकान उभर आई. उन्होंने प्रौमिस टाइप किया और अगले मरीज को देखने लगे.

लेखक : राजुल अशोक

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