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अपना घर- भाग 3: आखिर विजय के घर में अंधेरा क्यों था?

‘‘चाचा के पास थोड़ी सी जमीन है जिस में सालभर के गुजारे लायक ही अनाज होता है. कभीकभार चाचा मुझे यहां ले कर आ जाता है.’

‘‘मैं ने उस से पूछा, ‘जब चाचा ने इस काम में तुम्हें धकेला तो तुम ने विरोध नहीं किया?’

‘‘वह बोली थी, ‘किया था विरोध. बहुत किया था. एक दिन तो मैं ने यमुना में डूब जाना चाहा था. तब किसी ने मुझे बचा लिया था. मैं क्या करती? अकेली कहां जाती? कटी पतंग को लूटने को हजारों हाथ होते हैं. बस, मजबूर हो गई थी चाचा के सामने.’

‘‘फिर मैं ने उस से पूछा था, ‘इस दलदल में धकेलने के बजाय चाचा ने तुम्हारी शादी क्यों नहीं की?’

‘‘वह बोली, ‘मुझे नहीं मालूम…’

‘‘यह सुन कर मैं कुछ सोचने लगा था. तब उस ने पूछा था, ‘क्या सोचने लगे? आप मेरी चिंता मत करो और…’

‘‘कुछ सोच कर मैं ने कहा था, ‘सीमा, मैं तुम्हें इस दलदल से निकाल लूंगा.’

‘‘तो वह बोली थी, ‘रहने दो आप बाबूजी, क्यों मजाक करते हो?’

‘‘लेकिन मैं ने ठान लिया था. मैं ने उस से कहा था, ‘यह मजाक नहीं है. मैं तुम्हें यह सब नहीं करने दूंगा. मैं तुम से शादी करूंगा.’

‘‘सीमा के चेहरे पर अविश्वास भरी मुसकान थी. एक दिन मैं ने सीमा के चाचा से बात की. एक मंदिर में हम दोनों की शादी हो गई.

‘‘मैं ने कभी सीमा को उस की पिछली जिंदगी की याद नहीं दिलाई. वह मेरा कितना उपकार मानती है कि मैं ने उसे ऐसे दलदल से बाहर निकाला जिस की उसे सपने में भी उम्मीद नहीं थी.’’

यह सुन कर विजय हैरान रह गया. वह अनिल की ओर एकटक देख रहा था. न जाने कितने लोग सीमा के जिस्म से खेले होंगे? आखिर यह सब कैसे सहन कर गया अनिल? क्या अनिल के सीने में दिल नहीं है? अनिल के सामने कोई मजबूरी नहीं थी, फिर भी उस ने सीमा को अपनाया.

अनिल ने कहा, ‘‘यार, भूल तो सभी से होती है. कभी किसी को माफ भी कर के देखो. भूल की सजा तो कोई भी दे सकता है, पर माफ करने वाला कोईकोई होता है. किसी गिरे हुए को ठोकर तो सभी मार सकते हैं, पर उसे उठाने वाले दो हाथ किसीकिसी के होते हैं.’’

तभी सीमा एक ट्रे में चाय के कप व कुछ खाने का सामान ले कर आई और बोली, ‘‘चाय लीजिए.’’

विजय सकपका गया. वह सीमा से आंखें नहीं मिला पा रहा था. वह खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था. उसे लग रहा था कि सचमुच उस ने सुरेखा को घर से निकाल कर बहुत बड़ी भूल की है. शक के जाल में वह बुरी तरह उलझ गया था. आज उस जाल से बाहर निकलने के लिए छटपटाहट होने लगी. उसे खुद से ही नफरत हो रही थी.

विजय चुपचाप चाय पी रहा था. अनिल ने कहा, ‘‘अब ज्यादा न सोचो. कल ही जा कर तुम भाभीजी को ले आओ. सब से पहले यह शराब उठा कर बाहर फेंक देना. भाभीजी के आने के बाद तुम्हें इस की जरूरत नहीं पड़ेगी.

‘‘शराब तुम्हें खोखला और बरबाद कर देगी. भाभीजी की याद में जलने से जिंदगी दूभर हो जाएगी. जिस का हाथ थामा है, उसे शक के अंधेरे में इस तरह भटकने के लिए न छोड़ो.

‘‘कुछ त्याग भी कर के देखो यार. वैसे भी इस में भाभीजी की जरा भी गलती नहीं है.’’

विजय को लग रहा था कि अनिल ठीक ही कह रहा है. वह एक भूल तो कर चुका है सुरेखा को घर से निकाल कर, अब तलाक लेने की दूसरी भूल नहीं करेगा. कुछ दिनों में ही उस की और घर की क्या हालत हो गई है. अभी तो जिंदगी का सफर बहुत लंबा है.

‘‘हम 4 दिन बाद लौटेंगे तो भाभीजी से मिल कर जाएंगे,’’ अनिल ने कहा.

विजय ने मोबाइल फोन का स्विच औन किया और दूसरे कमरे में जाता हुआ बोला, ‘‘मैं सुरेखा को फोन कर के आता हूं.’’

अनिल और सीमा ने मुसकुरा कर एकदूसरे की ओर देखा.

विजय ने सुरेखा को फोन मिलाया. उधर से सुरेखा बोली, ‘हैलो.’

‘‘कैसी हो सुरेखा?’’ विजय ने पूछा.

‘मैं ठीक हूं. कब भेज रहे हो तलाक के कागज?’

‘‘सुरेखा, तलाक की बात न करो. मुझे दुख है कि उस दिन मैं ने तुम्हें घर से निकाल दिया था. फिर फोन पर न जाने क्याक्या कहा था. मुझे उस भूल का बहुत पछतावा है.’’

‘पी कर नशे में बोल रहे हो क्या? मुझे पता है कि अब तुम रोज शराब पीने लगे हो.’

‘‘नहीं सुरेखा, अब मैं नशे में नहीं हूं. मैं ने आज नहीं पी है. तुम्हारे बिना यह घर अधूरा है. अब अपना घर संभाल लो. मैं तुम्हें लेने कल आ रहा हूं.’’

उधर से सुरेखा का कोई जवाब

नहीं मिला.

‘‘सुरेखा, तुम चुप क्यों हो?’’

सुरेखा के रोने की आवाज सुनाई दी.

‘‘नहीं, सुरेखा नहीं, अब मैं तुम्हें रोने नहीं दूंगा. मैं कल ही आ कर मम्मीपापा से भी माफी मांग लूंगा. बस, एक रात की बात है. मैं कल शाम तक तुम्हारे पास पहुंच जाऊंगा.’’

‘मैं इंतजार करूंगी,’ उधर से सुरेखा की आवाज सुनाई दी.

विजय ने फोन बंद किया और अनिल व सीमा को यह सूचना देने के लिए मुसकराता हुआ उन के पास आ गया.

एक टूटाफूटा समाज कभी उन्नति नहीं कर सकता?

‘‘हमारे मंदिरों को तोड़ कर मसजिदें बना कर आज भी हम पर गुर्राते हैं’’ जैसे शब्दों से आज का भारत का सोशल मीडिया लदा पड़ा है. वोटों की खातिर गढ़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं, तरहतरह की कहानियों को फैलाया जा रहहा है, हर फूलपत्ती, तराशे हुए पत्थर को किसी भगवान का नाम दे कर नया इतिहास लिखा जा रहा है. जैसा हर समाज में होता है, धर्म के दुकानदार किसी भी आंधी, बिजली की चमक, बाढ़, बारिश, बर्फ गिरने को चमत्कार कह कर साबित कर डालते हैं कि देखो भगवान है, यह भगवान का किया है. आज का हिंदू समाज इस बात को ले कर खुश हो रहा है कि वह 500 या 700 साल पहले हुए वाकेया को ले कर अपनी जीत मना सकता है.

ङ्क्षहदू समाज की ताॢकक शक्ति इतनी कुंद हो गई कि वह अपनी कमजोरी को अपना बदला लेने का हक मानता है. सदियों पहले क्या हुआ था, इस का आज कोई सुबूत भी नहीं है और जरूरत भी नहीं है. सदियों तक ङ्क्षहदू समाज विदेशी राजाओं के राज का हिस्सा रहा है पर दुनिया के राजाओं का इतिहास परखें तो पता चलेगा लगभग सभी समाज कभी न कभी लंबे समय तक किसी तरह के विदेशी आक्रांताओं के अधीन रहे और जब विदेशी आक्रांता उन में घुलमिल गया वे और कोई दूसरा नया विदेशी आक्रांता सिर पर आ चढ़ा तो ही आधी पैनी मुक्ति पिछले आक्रांता से मिली.

मुसलिम राज से पहले कब कौन से विशुद्ध भारतीयों ने अपनी इच्छा से चुने हुए राजा के आधीन रह कर जीवन जिया है, इतिहास इस बारे में कम ही बताता है. इतिहास तो जीतने वाले आक्रांता ही लिखवाते हैं और वे तरहतरह के निशान छोड़ जाते हैं. वे कैसे राजा बने यह इस इतिहास में स्पष्ट नहीं होता. उस समय की जनता बाहरी व्यक्ति के खिलाफ  उठ खड़ी क्यों नहीं हुई. यह तो पता ही नहीं चलता.

इतिहास के सहारे वर्तमान में वोट पाने की कला अब भारतीयों ने सीख ली है क्योंकि जब आॢथक या सामाजिक मोर्चों पर कुछ उपलब्धि न हो तो इतिहास का ढोल बजाना बहुत आसान है. जो ज्यादा शोर मचा सकता है, वह सारी बातचीत का मुंह मोढ़ सकता है. आज देश में बात ही एक हो रही हो, कौन सा मंदिर कब तोड़ा गया. अभी 2-3 जगहों की बात हो रही हैं, कल को और दृढ़ निकाले जा सकते हैं.

इस नई कहानी से होगा क्या? क्या किसान का अन्न ज्यादा पैदा हो जाएगा? क्या अस्पतालों के बैड बढ़ जाएंगे? क्या फ्लाईओवरों के नीचे रह रहे भूखों के लिए मकान उग जाएंगे? क्या क्लासों में ज्यादा अच्छी पढ़ाई जाएगी? उलटे इन सब जगह जो भी हो रहा है, वह और धीमे हो जाएगा. देश में खुदती खाइयां चौड़ी हो जाएंगी. एकदूसरे के प्रति भेदभाव बढ़ जाएगा और भेदभाव का यह वायरस धर्म से जाति और जाति में आया, आपस के क्षेत्र और फिर घरघर में घुस जाएगा.

एक टूटाफूटा समाज कभी उन्नति नहीं कर सकता. एक विशाल पत्थर को उठाने के लिए हजारों हाथों का जोर एक साथ चाहिए, अलगअलग नहीं. देश की जनता को इतिहास, परंपरा, पूजापाठ की विधि के नाम पर बांट कर जो विनाश किया जा रहा है. वह देश को दशकों पीछे ले जाएगा. इस का अर्थ है हर घर का अपना अच्छे कल का सपना धूमिल हो जाएगा. जीते तो हम रहेंगे क्योंकि उत्तर कोरिया वाले भी जी रहे हैं, सोमानिया वाले भी और हेती वाले भी.

जब नई बहू घर आए तो क्या करे ससुर

घर में नई बहू आती है तो शुरूशुरू में परिवार में एक असहजता दिखने लगती है. खासकर ससुर, जो पहले ठसक के रहता था, को संयमित रहना पड़ता है. इस नए बदलाव से उखड़ें नहीं, ऐसा होता ही है, बल्कि सामंजस्य बैठाने की कोशिश करें.

सामान्य हिंदी मीडियम स्कूलों में पढ़लिख कर बड़े हुए परिवार आज भी तमाम तरह के घरेलू हालात से रूबरू होते हैं. गांव छोड़ कर शहरों में रह रहे ऐसे परिवार अपने सीमित सदस्यों के साथ रहते हैं. गांव से शहर आने के बाद जो छोटा सा घर बनाते हैं उसी को बनाने व तैयार करने में उन की आर्थिक स्थिति बिखर जाती है. इस के बाद बच्चों की पढ़ाई और कैरियर को बनाने की जद्दोजहेद में बड़े घर का सपना पूरा नहीं हो पाता.

गांव में बड़ेबड़े संयुक्त परिवारों को छोड़ कर शहर आए ये परिवार अपने छोटे से परिवार में ही खुश रहते हैं. उन को कभी इस बात की परवा भी नहीं होती कि घर के हर सदस्य को रहने के लिए अलग कमरा क्यों नहीं है? जाड़ा, गरमी, बरसात कई बार सब एक ही कमरे में रह लेते हैं. वे इसे ही अपना प्यारा सा, छोटा सा संसार सम?ा लेते हैं.

इस में परेशानी तब आती है जब घर में नई बहू का आगमन होता है. आमतौर पर आज के समय में शहरों में होने वाली शादियां मैरिज हौल में होती हैं. लगभग सभी मेहमान वहीं आते हैं और वहीं से वापस अपने घर चले जाते हैं. घर केवल नई बहू ही आती है. नई बहू के लिए घर का सब से अच्छा कमरा तैयार कर दिया जाता है. उस का अपना सामान उस में रख दिया जाता है. शहरों के ज्यादातर घर छोटे होते हैं.

माहौल में अनुशासन आ जाता है

4-5 कमरे होने के बाद भी वे पासपास ही होते हैं. अधिकतर में कमरे से जुड़ा बाथरूम नहीं होता. जिस घर में परिवार 3-4 सदस्यों के साथ बेधड़क रहता था. उसे अब इस बात का खयाल रखना पड़ता है कि घर में नई बहू है. कई बार बातचीत करतेकरते इस बात का खयाल नहीं रहता है. फोन पर तेजतेज आवाज में बात करतेकरते याद आता है तो टोका जाता है कि धीरे बोलो, बहू सुन लेगी. घरों में रहने वाले आदमी, खासकर ससुर को यह सावधानी अधिक बरतनी पड़ जाती है. पहले बाथरूम से नहा कर निकलने का काई नियम नहीं होता था. बाद में यह देखना पड़ता है कि क्या और कैसे करें.

घर में नाराज होने पर भी किसी पर गुस्सा नहीं निकाल सकते. डर लगता है बहू क्या सोचेगी. खाने में नमक कम हो या तेज, उस के बारे में कहने से पहले सोचना पड़ता है. घर में आने के बाद सही तरह से कपड़े पहन कर बैठना पड़ता है. एक तरह से देखें तो आजादी एक बंधन में बंध जाती है. यह सही है कि धीरेधीरे बहू खुद सामंजस्य बैठा लेती है. बहू के घर में आने के बाद स्वभाव में एक बदलाव लाना ही पड़ता है. यह बात केवल बहू की ही नहीं होती. किसी औफिस में 4 लड़के एकसाथ काम कर रहे हों तो अलग माहौल होता है. वहीं अगर एक लड़की और 3 लड़के काम कर रहे हों तो माहौल में अनुशासन बन ही जाता है.

एहतियात बढ़ जाता है

हिंदी स्कूलों में पढ़े, गांव छोड़ कर शहरों में आए लोग भले ही बहू को पहले जैसा परदा करने को न कहते हों लेकिन अभी भी वे अंगरेजियत वाला व्यवहार अपना नहीं पाते हैं. गांव में पहले आदमियों को घर के अंदर जाने की जरूरत तभी पड़ती थी जब उन को खाना खाने जाना हो या रात को सोने जाना हो. ज्यादातर लोग रात को घर के बाहर ही सोते थे. जब आदमी घर के अंदर जाते थे तब नई बहुएं या छोटबड़े भाई की पत्नियां अंदर अपने कमरों में चली जाती थीं. आदमी को घर के अंदर अगर अचानक प्रवेश करना हो तो घर में घुसने से पहले उसे ऐसी आवाज करनी पड़ती थी जिस से घर के अंदर की महिलाओं को लगे कि आदमी घर में आ रहा है.

भले ही गांव से शहर आ कर बहुतकुछ बदल गया हो पर वह सोचने वाली मानसिकता कायम है. शहरों में छोटे घरों में आदमी को रहना पड़ता है. ऐसे में बहू और उसे खुद को सतर्क रहना पड़ता है, जिस की वजह से एहतियात बरतनी पड़ती है. ससुर को अपनी कई आदतें बदलनी पड़ती हैं. उस के जीवन में अनुशासन आ जाता है. गीला तौलिया बैड पर नहीं रख सकते. खाने के बरतन इधरउधर नहीं रख सकते. घर वालों से नाराज होने पर भी तेज आवाज में बात नहीं कर सकते. फोन पर बात करते समय बोलने में शब्दों का चयन सावधानी से करना पड़ता है. कई बार अपनी घरेलू परेशानियों के बारे में बोलने से पहले सोचना पड़ता है.

सामंजस्य बैठाएं

असल में नई बहू के आने के बाद घर के माहौल में बदलाव होता है. बहू भी परिवार का एक सदस्य होती है. ऐसे में उस के साथ सामंजस्य भी बैठाना चाहिए. ज्यादातर समस्याएं मानसिक होती हैं. समय के साथसाथ तालमेल बन जाता है. बेटी बचपन से साथ रहती है तो उस के साथ तालमेल पहले से बना होता है. बहू शादी के बाद घर का सदस्य बनती है, ऐसे में उस के साथ तालमेल बैठाने में समय लगता है. बात केवल ससुर की ही नहीं होती, बहू को भी परिवार के दूसरे कई सदस्यों के साथ तालमेल बैठाना पड़ता है.

महिलाओं में यह स्वाभाविक गुण होता है कि वह अपने व्यवहार से जल्द ही तालमेल करने में सफल हो जाती है. पहले के समय में केवल बहू से अपेक्षा की जाती थी कि वह अपने व्यवहार को बदल ले. लेकिन आज के बदलते दौर में बहू के साथ ही साथ पूरे परिवार को ही अपने व्यवहार में बदलाव लाना पड़ता है. एकदूसरे के साथ तालमेल बैठा कर ही परिवार खुशहाली से चल सकता है. रातोंरात आदतें नहीं बदलतीं, ऐसे में कई बातें नजरअंदाज करनी चाहिए.

ससुर और बहू दोनों को ही एकदूसरे की आजादी और स्वभाव को सम?ाते हुए बदलाव की उम्मीद करनी चाहिए. तभी परिवार में खुशी का माहौल बनता है. बहू को बहू ही सम?ाना चाहिए, कई बार लोग पहले अतिउत्साह में बहू को बेटी की तरह देखने व व्यवहार करने लगते हैं जो बाद में अखरने लगता है. ससुर और बहू का एक स्वाभाविक रिश्ता होता है, उस पर ही दोनों को चलते हुए एकदूसरे का सम्मान करना चाहिए.

सख्त निर्णय: सुधा ने अपने बेटों के साथ क्या किया?

दादा बनवारी लाल बरनवाल भी जब कोरोनाग्रस्त हुए, तो घर में जैसे सब की नींद खुली. सुधा अपने दोनों बेटों को बहुत पहले से चेतावनी दे रही थी कि घर की हालत ठीक नहीं चल रही, व्यवसाय चौपट हो गया है और उन्हें काहिली से फुरसत नहीं. यही हाल रहा, तो और बुरे दिन देखने को मिलेंगे. साराकुछ कर्ज में डूबा हुआ है, यह बैंकवालों और महाजनों के तगादों से समझ आ रहा था. मगर उन के कानों पर जू तक न रेंग रही थी.

विगत दिनों ही घर के मुखिया रामनाथ बरनवाल कोरोना से लड़तेलड़ते चल बसे थे. उन पर लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी वे बच न पाए. शहर के प्रसिद्ध पारस अस्पताल में उन का इलाज चला था. यह वह समय था  जब औक्सीजन से ले कर दुर्लभ दवाओं तक की मारामारी थी. वह सब किसी प्रकार सिर्फ पैसों के बल पर ही तो उपलब्ध हुआ था. जब वहां भी स्थिति नहीं संभली,  तो उन्हें एयर एम्बुलैंस द्वारा बेंगलुरु के प्रतिष्ठित अस्पताल में भी भिजवाया गया था.

पैसे की किल्लत को सुधा तभी समझ पाई जब एकाउंटैंट सुधीर ने बताया कि बैंकों के खाते खाली हैं. तब उस ने तुरंत अपने आभूषण निकाल उन्हें बैंक में जमा करा कर 10 लाख रुपए लोन ले उन के इलाज में खर्च किया था. उस के लिए पति का जीवन महत्त्वपूर्ण था. वहां से वे ठीक हो कर आए ही तो थे कि ब्लैक फंगस नामक रोग ने जकड़ लिया. इस के इलाज के लिए भी  पानी की तरह पैसा बहाया गया. मगर वे बच नहीं पाए.

एक साल से कामधाम, बिजनैस-व्यापार सबकुछ बंद ही तो था. शहर के एक मशहूँर मार्केट में उन की दुकान ‘ द साड़ी शौप’ में कभी 28 स्टाफ काम करते थे और एक समय ऐसा था कि वहां कभी किसी को फुरसत न मिलती थी. मगर लौकडाउन के चक्कर में साराकुछ चौपट होता चला गया. तिस पर रामनाथ बरनवाल की जिद कि दुकान बंद हो या चले, स्टाफ को पूरा वेतन दिया ही जाना चाहिए. सभी को समय से नियमित वेतन दिया जाता रहा था. दादाजी ने दबे स्वरों में इस का विरोध किया था, मगर वे कहां मानने वाले थे. और यही कारण था कि घर तो घर, बैंक से भी सारी नकदी निकल चुकी थी. एक उम्मीद थी कि त्योहारों और लगन के बाद स्थिति संभल जाएगी. मगर दूसरी बार का लौकडाउन रहीसही कसर पूरी कर कंगाल कर गया था.

और ऐसी विषम परिस्थिति में वे कोरोना से ऐसे ग्रस्त हुए कि बाकी बचीखुची संपत्ति भी उन के इलाज में खर्च हो गई.

सुधा की मुसीबतों का अंत नहीं था. दादाजी ने इलाज के लिए अलग से बैंक से और महाजनों से भी पैसों का इंतजाम किया था. मगर पिताजी बच नहीं पाए थे. उलटे, भारीभरकम देनदारी छोड़ गए थे.

घर के दोनों बेटों को जैसे इस से कोई मतलब न था कि घर का खर्च चल कैसे रहा है. उन्होंने कभी पैतृक व्यवसाय में रुचि नहीं ली. बड़े बेटे राजेश का अपना एक साहित्यिक संसार था जिस में वह अपनी कविताओं के माध्यम से रचताबसता था. साहित्य सेतु नामक एक संस्था का वह संस्थापक सदस्य था और उसी बहाने वह अपनी रूमानी कविताओं में उलझा, डूबा रहता था. उस की अपनी एक मित्रमंडली थी जो उस के लिए अपने परिवार से बढ़ कर थी. इतना कि अपनी पत्नी और 2 छोटे बच्चों का भी ख़याल नहीं रखता था.

छोटे बेटे राकेश का अपना नाटकों का संसार था. अभिनय और नाटकों के प्रति गहरी रुचि ने उसे भी अपने पैतृक व्यावसायिक कार्यों से दूर कर दिया था. उस की संस्था ‘रसरंग’   पटना के अलावा अन्य शहरों में भी नाटकों के प्रदर्शन के लिए जानी जाती थी. और उस के लिए भी अपने परिवार की अपेक्षा अपना एनजीओ और कलाकार-परिवार ही सबकुछ था. उस की पत्नी  ने तो अब उसे कुछ कहनासुनना ही छोड़ दिया था और अपने नन्हें बेटे के साथ मगन रहती थी.

पिता और दादा जी ने अपने स्तर पर भरपूर प्रयास तो किया ही कि वे दोनों अपनी विशाल पैतृक व्यवसाय में थोड़ी रुचि लें, मगर उन दोनों में जैसे कारोबारी रक्त थे ही नहीं. और इसलिए वे दोनों इस दायित्व से भागे रहते थे. उन लोगों की बदौलत उन की शहर में मशहूर कपड़े की दुकान चल तो रही थी मगर वे चिंतित रहते थे कि उन के बाद क्या होगा. और इस समय यही विकट परिस्थिति आ गई थी. पिता के गुजरने के बाद जब पानी सिर से गुजरने लगा, तो सुधा ने अपने उन दोनों बेटों को चेतावनी भी दी कि सारा बिजनैस ठप पड़ा है. और आगे भी लौकडाउन खुलने के आसार नहीं  हैं. ऐसे में वे कुछ तो देखें. मगर जब शुरू से ही वे कुछ नहीं देखे, तो अब क्या देखते. अभी हाल ही में पिता का श्राद्धकर्म भी नहींनहीं करते धूमधाम से किया गया, तो उस के भोजभात और दानदक्षिणा में लाखों खर्च हो गए थे. और यह सब दादाजी के क्रैडिट पर संपन्न हुआ था.

मगर इस के बाद ही दादाजी भी कोरोनाग्रस्त हो गए थे. दुकान और गोदाम को गिरवी रख कर उन्होंने बैंक और महाजनों से कर्ज लिया था. व्यवसाय तो वैसे भी लेनदेन और क्रैडिट पर ही चलता है. चिंतित सुधा को वे बुला कर सारी वस्तुस्थिति से अवगत करा बोले- ‘अब मैं यह भार और नहीं उठा सकता, सुधा. वैसे भी, 82 साल का वृद्ध हूं. रामनाथ के जाने के बाद मैं टूट चुका हूं. तुम्हारे बेटों को शुरू से समझाते आया. मगर उन्होंने कभी रुचि नहीं ली कि साड़ी शौप के इस विशाल व्यापार को देखेंसमझें. अब आगे का तुम ही देख सको, तो देखना.’

‘ऐसा न कहिए,’ वह फूट पड़ी, ‘मैं क्या देख सकती हूं, मेरा तो सारा समय इस विशाल आलीशान घर को ही देखनेसंभालने में चला  गया. बाहर का काम मैं क्या जानूं. आप को कुछ नहीं होगा. मैं आप का अच्छे डाक्टर से इलाज कराऊंगी.’

‘इस का कोई फायदा नहीं होगा. एक तो इस समय सारे डाक्टर्स खुद परेशान हैं, व्यस्त हैं. अपने स्तर पर तो वे बेहतर ही काम करते हैं. मगर मुझे इस का एहसास हो रहा है कि अब मैं ज्यादा दिन चल नहीं सकता. वैसे भी, रामनाथ के जाने के बाद मेरे जीने की इच्छा भी नहीं है. तुम वकील अजयेंद्र को बुला कर सबकुछ समझ लेना.’

‘नहीं, ऐसा मत कहिए. मैं अकेले झेल नहीं पाऊंगी,’ वह एकदम से घबरा कर बोली, ‘मैं अभी बेटों को बुलाती हूं, शायद अब वे कुछ समझें.’

उस ने तुरंत अपने बेटों को आवाज दी. सभी उन के कमरे में भागेभागे आए. मगर तब तक देर हो चुकी थी. पक्षी पिंजरा छोड़ अनंत आकाश में उड़ चला था.

सुधा को होश नहीं था. वह समझ नहीं पाती थी कि वह करे तो क्या करे.

उस के सामने उस का अतीत साकार होने लगा था. श्वसुर बनवारी लाल कोई 40 साल पहले एक छोटे से गांव से इस शहर में आऐ थे. वे कपड़ों की गठरी बांधे गलीमहल्लों में फेरी लगा कर कपड़े बेचा करते थे. बाद में स्थिति सुधरी तो एक दुकान को किराए पर ले लिया. रामनाथ बरनवाल से तकरीबन 30 साल पूर्व जब उस की शादी हुई थी, तो वे एक गंदी गली के एक छोटे से 2 कमरों के किराए के घर में रहते थे.

विवाह के बाद ही अचानक व्यवसाय में तेजी आई, तो एक भव्य मार्केट में भाड़े पर दुकान ले ली. कमाई बढ़ी, तो रहनसहन का स्तर भी बढ़ा. फिर इस पौश कालोनी में 800 गज  जमीन ले यह आलीशान मकान बना, तो उसे परम संतोष का एहसास हुआ था.  कितने उतारचढ़ावों को वह देख चुकी है. काश, उस के बेटे इस व्यवसाय को समय रहते संभाल पाते.

दादाजी की अंत्येष्टि के बाद वह थोड़ी स्थिर हुई. आगे का काम कैसे चले, यही सोच रही थी. मगर उस का दिमाग काम नहीं कर रहा था. अचानक उसे वकील अजयेंद्र की याद आई. उस ने उन्हें तुरंत बुलवा भेजा. साथ ही, अकाउंटैंट सुधीर और उस के सहयोगी को भी बुला लिया. इसी बीच दोनों बेटों को भी उस ने अपने पास आने को कह खुद को मानसिक स्तर पर तैयार करने में लग गई कि उसे करना क्या  है.

दोनों बेटों के चेहरे से साफ झलक रहा था कि वे परिस्थितियों की गंभीरता का आकलन कर रहे हैं. अकाउंटैंट सुधीर अपने सहयोगी कंप्यूटर औपरेटर अजीत के साथ फाइलों का गट्ठर थामे हाजिर हो चुका था. अजयेंद्रजी फाइलों पर सरसरी निगाह से अवलोकन कर सुधीर से पूछ बैठे- “लेनदारी तो कहीं है नहीं. तो देनदारी की ही बात की जाए.”

“विगत वर्ष से ही इस घर की स्थिति डांवांडोल चल रही थी,” सुधीर बोला, “कोई 10 करोड़ रुपए के कर्ज पहले से ही बैंक के थे. बाद में  रमानाथजी ने अपनी दुकान के लिए एक करोड़ रुपए के कपड़े क्रैडिट पर और मंगवा लिए थे कि त्योहारों के मौसम में अनुकूल स्थिति हो जाएगी. मगर उस समय भी लौकडाउन खुला नहीं और सारा माल गोदाम में पड़ा रह गया. खर्च तो कम हुए नहीं. उलटे, स्टाफ को भी वेतन का नियमित भुगतान चलता  रहा. और इस प्रकार डेढ़ करोड़ रुपए का कर्ज और बढ़ा है.”

“बेटे, तुम बताओ, तुम इस परिस्थिति में क्या कर सकते हो?” सुधा ने अपने बेटों की ओर देखते हुए उन की तरफ सवाल उछाल दिया, “मैं सारा कर्ज खत्म करना चाहूंगी. मुझे अपने घर की कुर्की, जब्ती, नीलामी कर बदनामी नहीं करवानी.”

“कुल कितने का कर्ज बकाया है?” राजेश ने सहज भाव से कहा. तो, सुधीर ने तुरंत जवाब दिया- “यही कोई 20 करोड़ रुपया का बकाया है.”

“अरे बाप रे, इतनी बड़ी रकम!” राकेश चिहुंक कर बोला- “कहां से आएगी इतनी बड़ी रकम?”

“देखो मां, हमारी दुकान चलाने में न पहले रुचि थी और न अब है,” राजेश तटस्थ भाव से बोल रहा था- “उस दुकान और गोदाम को बेच कर यह कर्ज चुकाया जा सकता है.”

“और कोई रास्ता भी नहीं बचा है,” अजयेंद्रजी बोले, “सुधीरजी शायद इस का भी लेखाजोखा कर रखे होंगे. वही बेहतर बता सकते हैं.”

“काफी खराब लग रहा है यह स्थिति देख कर,” सुधीर सकुचाते हुए बोले, “एक वे दिन देखे थे हम ने कि इस घर में रुपयों की बरसात होती थी. और मुझे उस का हिसाबकिताब रखते रात के ग्यारह-बारह बज जाते थे. और एक आज का दिन है कि मुझ से इस प्रौपर्टी के बेचने के लिए हिसाब लगाने को कहा जा रहा है.”

“तो हमें ही अच्छा लग रहा है क्या,” राकेश आगे बढ़ कर बोला, “हम इसे संभाल नहीं सकते. तिस पर इतनी बड़ी देनदारी है, तो कोई क्या करे.”

“अब आप लोग दबाव दे रहे हैं, तो बताना ही पड़ेगा मुझे. तो सुन लीजिए, वह सब बेचने के बाद लगभग 15 करोड़ रुपए ही आएंगे. बाकी के 5 करोड़ रुपए कहां से आएंगे, यह विचार कर लीजिए.”

“फिलहाल इतना तो व्यवस्था कर लीजिए,” राजेश उठता हुआ बोला, “आगे की आगे देखी जाएगी.”

राकेश भी अपने बड़े भाई का अनुसरण करते वहां से चला गया था.

सुधा  वकील अजयेंद्र और अकाउंटैंट सुधीर का मुंह देखते हुए स्तब्ध बैठी रह गई. उस का माथा तनाव और दर्द से फटा जा रहा था. तो, ये बेटे हैं, जिन्हें अपनी पैतृक संपत्ति से जरा भी मोह नहीं. अपने भविष्य का भी ख़याल नहीं आया इन्हें कि कल क्या होगा!

“800 गज में बने इस मकान की कीमत क्या होगी,” वह सुधीर जी से मुखातिब थी, “इस पौश एरिया के इस आलीशान मकान के  अच्छे दाम तो मिलने ही चाहिए.”

“यह आप क्या कह रही हैं,” अजयेंद्र जी अवाक् हो बोल पड़े, “फिर आप कहां रहेंगी? आप के बेटे कहां जाएंगे?”

“बीसेक साल पहले गंगा किनारे एक अपार्टमैंट बन रहा था, तो मैं ने वहां वन बीएचके का एक फ्लैट खरीद लिया था कि कभीकभी वहां जा कर गंगादर्शन का आनंद लूंगी. अभी वह भाड़े पर है. उसे खली करा कर मैं उसी में जा कर रहने लगूंगी. और बेटों का क्या है, वे अभी युवा हैं, कुछ न कुछ इंतजाम कर ही लेंगे. यह भी हो सकता है कि वे अपनी ससुराल में ही रह-बस जाएं. मगर मुझे क्या, मैं ने तो गरीबी देखी है, अभाव झेला है. मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला.”

“फिर भी भाभीजी, इस मकान को कितने शौक से बनवाया आप लोगों ने, इस का गवाह मैं खुद हूं,” अजयेंद्र जी बोले, “आप को इस घर को छोड़ते कैसा लगेगा?”

“मुझे मालूम है, बहुत खराब लगेगा. इस घर में तीसेक साल पहले मैं बहू बन कर आई और यहीं की हो कर रह गई. इस घर से मेरी अनेक यादें जुड़ी हैं. मेरे दोनों बेटों का जन्म भी यहीं हुआ,” सुधा उदास  होती हुई बोली, “मगर जब हमारे पितासमान श्वसुर और पति ही नहीं रहे, तो मतलब रह क्या जाता है. मेरी पहली प्राथमिकता तो यही है कि उन के नाम कोई देनदारी न रहे, उन पर कोई कलंक न लगे.”

“मगर इस पैतृक संपत्ति पर उन का भी हक  है.”

“मैं कहां कह रही हूं कि नहीं है भाईसाहब,” वह तैश में आ कर बोली, “मैं पहले उन्हीं से कहूंगी कि वे चाहें तो इसे मिल कर या अलगअलग हिस्सों के रूप में  ही खरीद लें, ताकि सभी कर्जों और देनदारियों को खत्म किया जा सके. उन के इनकार करने के बाद ही इस का कोई अन्य ग्राहक तलाशेंगे.”

“वे कहां से व्यवस्था कर पाएंगे, मैडम?”

“क्यों, उन के खाते में थोड़ेबहुत पैसे अवश्य होंगे. अपनी गाड़ी बेचेंगे, और क्या… उन की बीवियों के पास लाखों के आभूषण हैं. वे अपने एनजीओ अथवा ससुराल वालों से भी सहयोग ले सकते हैं. अपने क्रैडिट पर बैंक से लोन ले सकते हैं. करना चाहें, तो बहुतकुछ कर सकते हैं.”

“जब पहले कुछ नहीं किया तो अब क्या कर लेंगे,” अजयेंद्र जी बोले, “मगर सवाल यह भी तो है कि आप अकेले वहां कैसे रहेंगी?”

“और कोई रास्ता भी तो नहीं है,” वह उदास स्वर में बोलते और उठते हुए बोली, “और क्या… इन बेटों से पहले ही कोई उम्मीद नहीं थी और अब तो इन से कुछ कहना ही बेकार है. अब वे जानें और उन का काम जाने. मुझे जो निर्णय लेना था, ले लिया. इस से ज्यादा मैं कुछ कर नहीं सकती.”

क्या देश में “जनता जनार्दन” का राष्ट्रपति बनेगा!

अब यह स्पष्ट हो गया है कि आगामी 18 जुलाई 2022 को भारत के आगामी राष्ट्रपति पद का निर्वाचन होना है. राष्ट्रपति चुनाव की समय सीमा स्पष्ट होने के साथ ही देशभर में इस पद के लिए कुछ महत्वपूर्ण नामों की चर्चा जनता जनार्दन के दरबार यानी सोशल मीडिया पर अपने सबाब पर है.

सोशल मीडिया पर उम्मीदवार के रूप में जिन नेताओं और हस्तियों के नाम की चर्चा सबसे अधिक है, उनमें देशभर में किसान आंदोलन के समय, सरकार के खिलाफ खुलकर बोलने वाले केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान से लेकर देश के कुछ राज्यों के अनुसूचित जनजाति की महिला राज्यपालों के नाम सुर्खियों में है.

आरिफ मोहम्मद खान का नाम इसलिए सबसे ज्यादा चर्चा में है क्योंकि आज भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी पहली दफा एक तरह से दुनिया भर के मुस्लिम देशों के निशाने पर आ गए हैं. नूपुर शर्मा के  मोहम्मद पैगंबर पर दिए गए गैरजिम्मेदाराना बयान के बाद और लंबी चुप्पी के कारण भाजपा पर राजनीतिक संकट के बादल मंडला रहे हैं और भाजपा के नेताओं की बोलती बंद है. ऐसे में आरिफ मोहम्मद खान अगर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बन जाते हैं तो देखते ही देखते माहौल बदलने लगेगा भाजपा की छवि धूमिल हुई है वह कुछ साफ बनेगी.

सोशल मीडिया के

ट्विटर प्लेट फार्म पर  राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में मूल रूप से ओड़ीशा की रहवासी और दो दफा की विधायक व एक दफा राज्यमंत्री के रूप में कार्य कर चुकीं और झारखंड की पहली महिला राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू, का नाम सबसे ऊपर है उसके पश्चात छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसूईया उइके का नाम आगामी राष्ट्रपति पद के लिए सामने है . कुछ लोगों ने देश के महत्वपूर्ण उद्योगपति रतन टाटा और कुछ ने उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू के नाम भी सुझाए हैं सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन का नाम भी राष्ट्रपति पद के लिए सोशल मीडिया में चर्चा में है. यह माना जा रहा है कि अमिताभ के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सकारात्मक संबंध है और अमिताभ की छवि यसमैन की है ऐसे में देश की आवाम को अपनी और आकर्षित करने के लिए भाजपा यह मास्टर स्ट्रोक चल सकती है.

सबसे ऊपर मोहम्मद आरिफ खान

आम आदमी पार्टी (आप) के नेता और दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री भाजपा के समर्थक सोमनाथ भारती ने  दावा किया है कि आगामी राष्ट्रपति चुनाव में आरिफ मोहम्मद खान का राष्ट्रपति बनना लगभग तय है. सोमनाथ भारती के संबंध भाजपा से कैसे हैं यह देश जानता है ऐसे में अगर आरिफ मोहम्मद खान का नाम उभरकर सामने आ जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. निर्वाचन आयोग ने गुरुवार, 9 जून को घोषणा की – अगला राष्ट्रपति निर्वाचित करने के लिए चुनाव 18 जुलाई को होगा तथा मतगणना 21 जुलाई को होगी. इसके साथ ही देश भर में यह चर्चा चल पड़ी है कि देश का आगामी राष्ट्रपति कौन बनेगा…?

आपका यह जानना जरूरी है कि  राष्ट्रपति चुनाव में सांसदों और विधायकों वाले निर्वाचक मंडल के 4,809 सदस्य मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के उत्तराधिकारी का चुनाव करेंगे.वहीं भाजपा में अभी तक राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को लेकर कोई नाम अधिकृत रूप से सामने नहीं आया है .

2017 में राष्ट्रपति चुनाव के दरमियान पूर्व लोकसभा

अध्यक्ष और विपक्षी दलों की उम्मीदवार मीरा कुमार को भाजपा उम्मीदवार रामनाथ कोविंद ने लगभग 3,34,730 मूल्य के मतों से पराजित किया था. मजे की बात यह है कि राष्ट्रपति चुनाव की घोषणा के कुछ घंटे की अवधि में ही, अपने ठेठ  अंदाज के लिए अपने खुले विचारों के कारण और मोदी से आमने सामने की टक्कर लेने के लिए चर्चित आरिफ मोहम्मद खान का नाम देश में ट्विटर पर 10 शीर्ष में ट्रेंड करने लगा .

एक ट्विटर उपयोगकर्ता ने  लिखा – मिस्टर खान को राष्ट्रपति बनाया जाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक और ‘मास्टर स्ट्रोक’ होगा.

ऐसे ही एक व्यक्ति ने लिखा – इससे भाजपा पर मुसलिम विरोधी होने की छवि में सुधार आएगा और पैगंबर को लेकर हाल ही में भाजपा के कुछ नेताओं द्वारा की गई टिप्पणी से दुनिया भर में उपजी नाराजगी को दूर करने का बेहतर मौका मिला है .

कुल मिलाकर  सोशल मीडिया में जो नाम चल रहे हैं एक तरह से यह आम जनता के नाम है मगर हमारे देश में राजनीतिक पार्टियां अपने नफे और नुकसान के साथ चलती हैं. ऐसे में देखना यह दिलचस्प होगा कि राष्ट्रपति पद उम्मीदवार कौन होगा.

अनुज के पीछे-पीछे सात समंदर पार पहुंची अनुपमा, देखें Video

अनुपमा (Anupamaa) फेम रूपाली गांगुली और गौरव खन्ना की जोड़ी को फैंस काफी पसंद करते हैं. फैंस को इस जोड़ी से रिलेटेड फोटोज और वीडियोज का बेसब्री से इंतजार रहता है. शो में शादी के बाद अनुज-अनुपमा जमकर रोमांस करते नजर आ रहे हैं.  बीते दिन ही अनुज और अनुपमा ने मानडे सेलीब्रेट किया है. अब एक और वीडियो सामने आया है, जिसमें अनुपमा अनुज के साथ सात समंदर पार जाने की बात कर रही है. आइए बताते है, इस वीडियो के बारे में…

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना ने मानडे के मौके पर एक शानदार वीडियो शेयर की है. इस वीडियो में वीडियो में अनुज और अनुपमा समंदर किनारे धमाल मचा रहे हैं. फैंस को अनुज और अनुपमा का ये अंदाज बेहद पसंद आ रहा है.

 

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सीरियल अनुपमा  में इन दिनों नया ट्रैक दिखाया जा रहा है. शो में नये किरदारों के आने से कहानी में बड़ा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो में आपने देखा कि आदिक और सारा की दोस्ती अनु के बच्चों से होती है.

 

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शो के आने वाले एपिसोड में दिखाया जाएगा कि काव्या, बा और वनराज से कहती है कि अनुपमा के अच्छे विश्वास की वजह से एक अनपढ़ होने के बावजूद उसे इतना अच्छा परिवार और एक प्यार करने वाला पति मिला है.

 

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तो दूसरी तरफ लीला, समर, पाखी, तोशु और किंजल को आदिक और सारा के साथ घुलते- मिलते देखकर कहती है कि उन्हें वहां आना कम करना होगा. लीला ये भी कहती है कि बेटी के घर ज्यादा आना-जाना ठीक नहीं होता है.

 

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शो में आप ये भी देखेंगे कि अनुज शाह परिवार और जीके को पूजा के लिए उनके साथ बैठाता है. पंडित जी घर के मालिक से कलश रखने के लिए बुलाते है. अनुज इसके लिए अनुपमा को कहता है. अनुज कहता है कि वो इस घर की मालकिन है.शो में अब ये देखना दिलचस्प होगा कि अनुज की ये बात सुनकर बरखा कैसे रिएक्ट करती है?

Yeh Rishta Kya Kehlata Hai के पार्थ ने की शादी, जमकर नाचे अक्षरा और अभिमन्यु

टीवी सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ के पार्थ बिरला यानी नीरज गोस्वामी (Neeraj Goswami)  ने शादी रचाई. जी हां, पार्थ की शादी की फोटोज और वीडियोज सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है.

नीरज गोस्वामी की शादी में अक्षरा और अभिमन्यु यानी हर्षद चोपड़ा (Harshad Chopda) और प्रणाली राठौड़ (Pranali Rathod) और सहित कई सितारे शामिल हुए. इन सितारों ने पार्थ की शादी में जमकर डांस किया.

 

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नीरज गोस्वामी की बारात से जुड़ा एक वीडियो सुर्खियों में छाये हुए है.  इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि प्रणाली राठौड़, हर्षद चोपड़ा और प्रेयल शाह जमकर डांस करते दिखाई दे रहे हैं.

 

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प्रणाली राठौड़ ने नीरज गोस्वामी की शादी से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया, जिसमें वह निहारिका चौकसे और बाकी कास्ट के साथ मस्ती करती नजर आई.

 

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करिश्मा सावंत ने भी  पार्थ की शादी शामिल हुईं, उन्होंने इससे जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयरकिया है, जिसमें उनका लुक देखने लायक है. उनके इस वीडियो को लेकर फैंस भी उनकी तारीफें करते नहीं थक रहे हैं.

 

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‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में इन दिनों बड़ा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. अभिमन्यु अपनी मां मंजरी और हर्ष का तलाक करवाने का फैसला लेता है. तो दूसरी तरफ अक्षरा उसका साथ नहीं देती है.

 

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ज्ञानवापी विवाद: एक नए फसाद की शुरुआत

ज्ञानवापी विवाद के भड़कने से न सिर्फ इस कानून के सामने चुनौती खड़ी हुई है बल्कि बचेकुचे सांप्रदायिक सौहार्द के गहरे पतन में चले जाने की आशंका बढ़ गई है. जब अयोध्या मंदिर प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और उस को शांति के साथ देश के लोगों ने स्वीकार कर लिया तब यह उम्मीद जग गई कि अब मंदिरमसजिद को ले कर कोई पुराना विवाद नहीं उभरेगा. देश की धर्मनिरपेक्षता बची रहेगी. यहां का भाईचारा और गंगाजमुनी तहजीब बची रहेगी. इस बात का डर था कि समान नागरिक संहिता कानून की बात से विवाद बढ़ता दिख रहा था लेकिन उस मुददे में मंदिरमसजिद विवाद जैसी तासीर नहीं थी. मंदिरमसजिद विवादों को रोकने के लिए ही 1991 में धर्मस्थल विधेयक बनाया गया था जिस में कहा गया था कि 1947 में जिस धर्मस्थल की जैसी स्थिति थी वैसी ही आगे बनी रहेगी. ऐसे में देश अयोध्या के बाद किसी और मंदिरमसजिद विवाद में नहीं पड़ेगा.

राजनीति सत्ता की कुरसी हासिल करने का एक तरह का युद्ध है. जैसे कौरवों को सत्ता से हटाने के लिए पांडवों ने महाभारत की उसी तरह से एक पार्टी को सत्ता से हटाने के लिए दूसरी पार्टी साम, दाम, दंड और भेद का प्रयोग करती है. देश का संविधान कहता है कि राजनीति में धर्म का प्रयोग नहीं होना चाहिए लेकिन पूरे देश में धड़ल्ले से चुनाव जीतने के लिए धर्म का प्रयोग किया जाता है. अयोध्या का मंदिर विवाद एक ऐसा मुद्दा था जिस ने भारतीय जनता पार्टी के लिए सत्ता की सीढ़ी बनने का काम किया. यह बात और है कि अयोध्या ही नहीं, पूरे देश ने इस मुददे के कारण बहुत नुकसान झेला.

अयोध्या मुददे से अशांत हुआ देश का माहौल

1990 के पहले अयोध्या बहुत शांत शहर था. देशविदेश के लोग आते थे. अयोध्या के तमाम मंदिरों के साथ ही साथ राममंदिर के दर्शन करते थे. अयोध्या के प्रमुख मंदिरों में भंडारे चलते रहते थे, जहां बाहर से आने वालों को मुफ्त में खाना दिया जाता था. रैस्तरां और खाने के होटल व दुकानें बहुत कम थीं.

राममंदिर बनाने के लिए 1990 में कारसेवा आंदोलन विश्व हिंदू परिषद द्वारा शुरू किया गया. हजारों की संख्या में पहुंचे कारसेवकों को मंदिर पहुंचने से रोकने के लिए उस समय की मुलायम सरकार ने गोली चलवा दी, जिस के कारण दर्जनों कारसेवक मारे गए. अयोध्या की इस घटना ने पूरे देश के शांत माहौल मे ककंड़ मारने का काम किया. पूरे देश में उथलपुथल मच गई.

कश्मीर से ले कर देश के दूसरे हिस्सों में आतंकवाद का माहौल बन गया. हिंदू और मुसलमानों के बीच आपसी भरोसा तो टूटा ही, अयोध्या में दर्शन के लिए आने वाले लोगों की संख्या में भी कमी आ गई. 1990 के बाद हर साल कारसेवा आंदोलन होने लगा. धर्म की नगरी अयोध्या पुलिस की छावनी में बदल गई. यहां आने वालों की चैकिंग होने लगी. भीड़ को रोकने के लिए अयोध्या से 10 किलोमीटर पहले ही गाड़ियों को रोका जाने लगा. पैदल लोगों को जाने दिया जाता था. अयोध्या और मंदिर परिसर के पास रहने वाले किसी के घर में कोई मेहमान आता था तो उसे पुलिस में सूचना देनी होती थी. कब से कब तक मेहमान रहा, बताना पड़ता था. घर आतेजाते सुरक्षा जांच और तलाशी देनी पड़ती थी.

बहुत सारी सुरक्षा के बाद भी 1992 में अयोध्या में बाबरी मसजिद का विवादित ढांचा ढहा दिया गया. इस के बाद पूरे देश में तनाव फैल गया. मुंबई जैसे कई शहरों में बम विस्फोट हो गए. इस के कारण ही गुजरात में दंगे हुए. पूरा देश अशांत हो गया. अयोध्या के गुलजार रहने वाले मंदिरों में सन्नाटा छा गया. दर्शन करने आने वालों की संख्या में कमी आने लगी. जो मंदिर पहले भंडारे चलाते थे वहां भुखमरी की हालत आ गई. मंदिरमंदिर में मालिकाना हक को ले कर झगड़े होने लगे. अयोध्या में रहने वालों के कारोबार बंद होने लगे. लोगों का पलायन होने लगा. मंदिर परिसर से लगे घरों की मरम्मत तक कराने के लिए सरकार की इजाजत लेनी पड़ती थी. हर तरफ पुलिस ही पुलिस दिखने लगी थी.

अयोध्या में प्रवेश करते ही जांच कराते समय लगता था जैसे हम किसी और देश की सीमा को पार कर रहे हों. इन हालात हो बदलने में 24 साल का समय लग गया. बाबरी मसजिद को ले कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सभी ने सम्मान किया. अशांति भले खत्म हो गई पर हिंदूमुसलमानों के बीच जो दूरियां बढीं वे कम नहीं हुईं.

ऐसे में अयोध्या के बाद वाराणसी की ज्ञानवापी मसजिद का झगड़ा सामने आ गया है. वाराणसी के साथ ही साथ पूरे देश में चर्चा का सब से बड़ा बिंदु ‘ज्ञानवापी विवाद’ हो गया है. पूरा विवाद जिला अदालत से ले कर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक में एकसाथ चलने लगा है. रोज नए फैसले आने लगे हैं.

‘ज्ञानवापी विवाद’ से 1990 जैसी हालत

‘ज्ञानवापी विवाद’ की शुरुआत श्रंगार गौरी में पूजा अर्चना के अधिकार को ले कर हुई. इस के बाद कोर्ट ने वहां कमीशन नियुक्त कर दिया. जिसे यह बताना था कि ज्ञानवापी मसजिद में क्या हिंदू देवीदेवताओं और मंदिरों के निशान हैं? कोर्ट के इस आदेश के बाद ज्ञानवापी मसजिद पूरे देश में चर्चा का विषय हो गया.

ज्ञानवापी मसजिद वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर से हुआ सटी हुई है. इस मसजिद को ले कर विवाद है. एक पक्ष का दावा है कि मंदिर तोड़ कर यह मसजिद बनाई गई थी. इस का एक मुकदमा 1991 में जिला अदालत में लंबित है.

अगस्त 2021 में दिल्ली की रहने वाली 5 महिलाओं की तरफ से जिला अदालत में दाखिल याचिका पर सुनवाई हुई है. इस मुकदमे को राखी सिंह समेत 5 अन्य बनाम स्टेट औफ यूपी के नाम से जाना जाता है. याचिका में कहा गया कि परिसर में श्रृंगार गौरी की प्रतिमा साल में एक दिन दर्शनपूजन के लिए खुलती है लेकिन हम चाहते हैं कि श्रृंगार गौरी और अन्य की नियमित पूजापाठ की अनुमति दी जाए. यह मांग भी की गई कि अदालत कोर्ट कमिश्नर की नियुक्ति करे, जो इन सभी देवीदेवताओं की मूर्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करे. तर्क दिया गया था कि जिस स्थल को एक पक्ष मसजिद बता रहा है दरअसल वह मसजिद है ही नहीं, औरंगजेब ने मंदिर को तोड़ कर मसजिद का निर्माण कराया.

इस याचिका में अंजुमन इंतजामिया मसजिद को प्रतिवादी बनाया गया, जो मसजिद की देखभाल करती है. मसजिद पक्ष का दावा है कि मंदिर तोड़ कर मसजिद नहीं बनवाई गई बल्कि अकबर ने अपने दीन ए इलाही धर्म के तहत मंदिर और मसजिद का निर्माण कराया था. ऐसे में यह कहना गलत होगा कि मंदिर को तोड़ कर मसजिद बनाई गई.

इधर, लोअर कोर्ट का इस याचिका पर मिलाजुला ऐसा फैसला आया जो दोनों पक्षों को स्वीकार नहीं हुआ. दोनों पक्ष हाईकोर्ट चले गए और फिर हाईकोर्ट ने लोअर कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी. इस के बाद यह मुकदमा बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहा था. इस मुकदमे में भी उसी तरह से बहुत सारे पेंच हैं, जैसे अयोध्या मामले में थे.

8 अप्रैल को निचली अदालत ने स्थानीय वकील अजय कुमार को कोर्ट कमिश्नर नियुक्त करते हुए परिसर का निरीक्षण करने और निरीक्षण की वीडियोग्राफी करने का आदेश दिया. अंजुमन इंतजामिया मसजिद के प्रबंधन ने कमिश्नर की नियुक्ति और निरीक्षण को हाईकोर्ट में चुनौती दी. कहा गया कि किसी पक्षकार को सुबूत इकट्ठा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती. इस बात को ले कर आपत्ति दर्ज कराई गई कि जो अजय कुमार कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किए गए हैं वे याचिकाकर्ताओं की पसंद पर किए गए हैं. हाईकोर्ट ने मसजिद प्रबंधन की दलीलों को खारिज करते हुए एडवोकेट कमिश्नर को मौजूदा सुबूत को सुरक्षित करने की पूरी छूट दी और कहा कि अगर मसजिद प्रबंधन को कमिश्नर की रिपोर्ट पर कोई आपत्ति होती है तो वे उसे कानूनी चुनौती दे सकते हैं.

इस के बाद निचली अदालत ने ईद के बाद सर्वे पूरा करने को कहा था. सर्वे के दौरान ही यह खबर फैल गई कि ज्ञानवापी मसजिद परिसर में शिवलिंग मिला है. दूसरे पक्ष ने इसे मसजिद के वजूखाने में प्रयोग होने वाला फव्वारा बताया. पूरे देश में ‘शिवलिंग बनाम फव्वारा’ को ले कर बहस तेज हो गई. सोशल मीडिया के जमाने में सच और झूठ को पहचान पाना बेहद मुशकिल हो गया है. ऐसे में देश को अशांत करने का एक नया हथियार मिल गया है.

धर्म और राजनीति

अयोध्या की तरह अब वाराणसी धर्म और राजनीति रण बन रहा है. ‘अयोध्या केवल झांकी है काशी, मथुरा बाकी हैं’ का नारा पहले से ही भाजपाई हिंदुवादियों के जबान पर था. इस नारे के पीछे ही पूरे विवाद की कहानी छिपी है.

धर्म की राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी को लगता है कि अयोध्या के बाद काशी का ज्ञानवापी विवाद और मथुरा का कृष्ण जन्मभूमि विवाद उस के लिए लाभकारी होगा. इस के सहारे हिंदुत्व को एक तरफ रखा जा सकेगा और इस से मुसलमानों की बात करने वाले राजनीतिक दल कमजोर पड़ कर मुकाबले से बाहर हो जाएंगे. वर्ष 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में यह बात सफल होती दिखी. भाजपा द्वारा योगी आदित्यनाथ के रूप में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री संत समाज से दे कर हिंदुत्व की छवि को और मजबूत किया गया.

इस के बाद चुनाव दर चुनाव जीतने के लिए धर्म की राजनीति को महत्त्व दिया जा रहा है. अयोध्या में मंदिर बनाने को ले कर कोर्ट के फैसले के बाद भाजपा अब काशी और मथुरा मुददों को गरम देखना चाहती है. भले ही उस की सामने से कोई भूमिका न दिख रही हो लेकिन अयोध्या के बाद काशी और मथुरा उस की योजना का हिस्सा हैं.

यह बात अयोध्या आंदोलन के समय ही तय हो चुकी थी. इस से देश को कितना नुकसान होगा, यह बात भाजपा को पता है, लेकिन उसे इस की परवा नहीं. वह चुनावी राजनीति में मुसलमानों की संख्या और हैसियत को नगण्य करने की योजना में है. यही कारण है जिस की वजह से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ‘80 बनाम 20’ की बात की गई थी.

धर्मस्थल कानून

अयोध्या आंदोलन को हवा देने वाले लोग जिस समय ‘अयोध्या केवल झांकी है, काशी मथुरा बाकी हैं’ का नारा दे रहे थे उस समय की केंद्र सरकार को इस बात का आभास था कि देश में एक के बाद एक मसजिदमंदिर विवाद खड़े हो सकते हैं. ऐसे में 1991 में नरसिम्हा राव सरकार ने ‘प्लेस औफ वर्शिप एक्ट’ यानी ‘पूजा स्थल कानून 1991’ बनाया.

इसे 1991 में लागू किया गया. यह कानून कहता है कि 15 अगस्त, 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजास्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजास्थल में नहीं बदला जा सकता. यदि कोई इस एक्ट का उल्लंघन करने का प्रयास करता है तो उसे जुर्माना और 3 साल तक की जेल भी हो सकती है.

प्लेस औफ वर्शिप एक्ट की धारा-2 कहती है कि 15 अगस्त, 1947 में मौजूद किसी धार्मिक स्थल में बदलाव के विषय में यदि कोई याचिका कोर्ट में पैंडिंग है तो उसे बंद कर दिया जाएगा. प्लेस औफ वर्शिप एक्ट की धारा-3 के अनुसार किसी भी धार्मिक स्थल को पूरी तरह या आंशिक रूप से किसी दूसरे धर्म में बदलने की अनुमति नहीं है. इस के साथ ही यह धारा यह सुनिश्चित करती है कि एक धर्म के पूजा स्थल को दूसरे धर्म के रूप में न बदला जाए या फिर एक ही धर्म के अलग खंड में भी न बदला जाए.

प्लेस औफ वर्शिप एक्ट की धारा-4 (1) कहती है कि 15 अगस्त, 1947 को एक पूजा स्थल का चरित्र जैसा था उसे वैसा ही बरकरार रखा जाएगा. प्लेस औफ वर्शिप एक्ट की धारा-4 (2) के अनुसार, यह कानून उन मुकदमों और कानूनी कार्यवाहियों को रोकने की बात करता है जो प्लेस औफ वर्शिप एक्ट के लागू होने की तारीख पर पेंडिंग थे. प्लेस औफ वर्शिप एक्ट की धारा-5 में प्रावधान है कि यह एक्ट रामजन्मभूमि-बाबरी मसजिद मामले और इस से संबंधित किसी भी मुकदमे, अपील या कार्यवाही पर लागू नहीं करेगा. ज्ञानवापी विवाद में इस कानून की परीक्षा होनी है. अभी तक जिस तरह से कोर्ट ने ज्ञानवापी विवाद में पूजा स्थल कानून का मान रखा है उस से ज्ञानवापी का पक्ष संतुष्ट नहीं है.

मनुवादी की बढती धमक

दूसरी तरफ हिंदू पक्ष इस पूजा स्थल कानून से खुश नहीं है. वह इसे खत्म करने की मांग कर रहा है. ज्ञानवापी विवाद को अगर पूजा स्थल कानून के कारण खत्म मान लिया जाएगा तो मथुरा का मंदिरमसजिद विवाद भी खत्म समझा जा सकता है, लेकिन अगर पूजा स्थल कानून की किसी खामी को आधार बना कर ज्ञानवापी विवाद में कोई फैसला आया तो यह पक्का है कि मथुरा विवाद भी तेजी पकड़ेगा. उस को भी हवा मिल जाएगी. यही नहीं, पूरे देश में तमाम जगहों से मसजिद और पूजा स्थल विवाद शुरू हो जाएंगे, जिन का कोई अंत नहीं दिखेगा. इस बहस से देश को क्या हासिल होगा?

असल में हिंदुत्व की राजनीति करने वाले लोग एक नए किस्म का देश बनाना चाहते हैं, जिस में मनुवादी वर्णव्यवस्था को कायम करने का काम किया जाएगा. जिस में ऊंचीनीची जातियों की औरतों, ओबीसी और एससी वर्ग के लोगों को धर्म और मंदिर का नशा दे कर चुप रखा जा सके.

इस का नुकसान मुसलमानों को तो होगा ही, उस से ज्यादा नुकसान हिंदू जाति के दलित और पिछड़ों को होगा. राजनीतिक रूप से देखा जाए तो यह बात साफ दिखती है. वर्ष 1989 में जब मंडल कमीशन लागू हुआ तो अयोध्या आंदोलन के रूप में कमंडल को आगे किया गया. ऐसे में दलितपिछड़ों की राजनीति को दरकिनार कर दिया गया. धीरेधीरे उत्तर प्रदेश में दलितपिछड़ों की अगुआई करने वाली बसपा और सपा हाशिए पर चली गईं. अयोध्या के बाद काशी और मथुरा इस के नए साधन बनेंगे.

वो क्या जाने पीर पराई- भाग 3: हेमंत की मृत्यु के बाद विभा के साथ क्या हुआ?

वह एकटक मु?ो देखती रही. पता नहीं मैं ने किस भाव में आ कर यह सब कह दिया. उस के चेहरे पर कई भाव आतेजाते रहे. फिर मैं दृढ़ता से उस की ओर देख कर बोली, ‘‘ले, अब चाबियां संभाल और कार निकाल. स्कूल के लिए देर हो रही है. मैं तेरे साथ चलती हूं.’’

‘‘आंटी, मम्मी को कार चलानी नहीं आती,’’ उस का बेटा रोंआसा सा बोला.

‘‘क्यों?’’ मैं ने ममता की ओर देखते हुए कहा, ‘‘पिछली बार तो तू कार चलाना सीख रही थी?’’

‘‘हां,’’ वह बोली, ‘‘मैं चला भी लेती परंतु एक दिन साइकिल वाला सामने आ गया. फिर दोबारा हिम्मत नहीं हुई. मैं ने हेमंत से कहा भी था कि मु?ो क्या जरूरत है, तुम साथ में हो तो तुम्हीं तो चलाओगे न, मु?ो क्या पता कि…’’ कहतेकहते ममता का कंठ अवरुद्ध हो गया.

मु?ा से कुछ और कहते न बना.

अपने चेहरे के हर भाव मैं ने

दूसरी तरफ मुंह फेर कर छिपा लिए और ?ाट से चाबियां ले कर कार में बैठ गई.

विमल के लगातार फोन आते रहे. बच्चे भी मु?ो मिस करने लगे. यहां ममता को इस तरह अचानक छोड़ कर जाने का मन ही नहीं हुआ. मेरा तो भरापूरा परिवार था, पर अब यहां इस का कौन था? जिस घोंसले की सब से बड़ी चिडि़या ही फुर्र से उड़ जाए उस नीड़ का नष्ट हो जाना तो लगभग तय है.

डाक से एक दिन अपोलो टायर्स में जमा की गई 20 हजार रुपए की एफडी की रसीद आई. मैं ने ममता से इस बारे में पूछा तो वह अनजान सी बनी रही. बस, मेरे हाथ में मोटी सी एक फाइल पकड़ा कर किचन में चली गई.

मैं ने सारे पेपर एकएक कर के छान डाले परंतु उस एफडी का पता न चल सका. मैं ने थोड़ी नाराजगीभरे स्वर में कहा कि यह सब तो उसे पता होना ही चाहिए था. बैंकों के अकाउंट्स, उन में नौमिनेशन फैसिलिटी, सारे शेयर और एफडी की पूरी जानकारी और सब से जरूरी यह कि किस से कितना पैसा लिया और दिया है.

फिर सारा दिन उस के साथ बैठ कर मैं ने सभी कागज क्रम में लगाए और जितनी जानकारी मु?ो थी, मैं सब सम?ाती रही. अब प्रतीत हो रहा था कि विमल मु?ो सारी बातें समयसमय पर क्यों सम?ाते रहते थे.

‘‘हेमंत तो कंप्यूटर का कीड़ा था,’’ मैं ने कहा था, ‘‘फिर तुम ने उस से यह सब क्यों नहीं सीखा?’’

‘‘सीखती क्या?’’ वह बहुत ही मासूमियत से बोली, ‘‘आते ही कंप्यूटर पर जुट जाते. सबकुछ तो उन्हें टेबल पर ही चाहिए था. वे बारबार मु?ो भी कंप्यूटर सीखने पर जोर देते रहते कि घर बैठीबैठी बोर होती रहती हो, सीख जाओगी तो तुम्हारे ही काम आएगा, पर मैं ही हमेशा टालती रही. मु?ो भला कंप्यूटर सीख कर क्या करना था. कंप्यूटर वाला ही एक दिन छिन जाएगा, ऐसा क्या कोई पहले से पता था.’’

मेरा दिल भर आया. न गुस्सा करते ही बना, न सम?ाते ही. मु?ो लगा किसी बड़ी, मोटी मछली का कांटा गले में अटक कर रह गया हो.

विमल को एक दिन मैं ने बुला लिया. इंश्योरैंस और बैंकों का काम करना, सारे खाते बंद करवाना. अब भागदौड़ का काम था, जो मेरे बूते से बाहर था. इस भागदौड़ में विमल ही ठीक से काम करवा सकते थे. उन सब की औपचारिकताएं इतनी लंबी थीं कि सारा दिन घर छोड़ कर चक्कर लगाना हमारे लिए संभव नहीं था.

घर के बाहर वाला कमरा हमेशा हेमंत के छात्रों से भरा रहता था. अब उस वीरान कमरे में जाने से भी डर लगने लगा. कमरे में एक कोने में लगे उस के फोटो पर हार देख कर तो दिल और भी छोटा हो जाता. हेमंत की छवि चलचित्र की तरह कई बार मेरी आंखों के सामने तैरती रहती.

एक दोपहर बच्चों को पढ़ाते हुए मैं ने ममता से कहा, ‘‘क्यों नहीं यही काम तू कर लेती?’’ मैं ने उस का हाथ पकड़ते हुए सम?ाया, ‘‘8वीं, 10वीं को तो तू पढ़ा ही सकती है. तेरी पोस्ट ग्रेजुएशन भला कब काम आएगी. तेरे बच्चे भी तेरे पास रहेंगे और घर भी संभला रहेगा.’’

यह सुन कर ममता के चेहरे पर थोड़ी चमक उभरी, उस के चेहरे पर चमक देख कर मु?ो थोड़ी राहत सी मिली. उस की आंखों में पहली बार मैं ने चमक देखी.

‘‘यही शायद ठीक रहेगा,’’ वह मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कातर स्वर में बोली, ‘‘जाने से पहले मेरा यह काम भी करती जा न, कैसेकैसे सब करना होगा.’’

‘‘अच्छा, विमल तु?ो आते ही सब सम?ा देंगे. थोड़ाबहुत पढ़ाने का अनुभव तो उन को भी है. मैं ने कभी बच्चों को पढ़ाया नहीं,’’ मैं ने सांत्वना देते हुए कहा.

रविवार को उस के आंसू रोके नहीं रुक रहे थे. सवेरे से ही दोनों बच्चों की आंखों में सैलाब सा उमड़ आया था. बारबार मु?ा से आ कर लिपट जाते. मेरे और विमल की अटैची के इर्दगिर्द रहते. उन का दिल छोटा होता गया.

मैं क्या कहती? इतनी घुटन जीवन में कभी देखी, सही न थी. जाना भी मेरी मजबूरी थी. मु?ा से लिपट कर बोली, ‘‘दीदी, सहानुभूति और सांत्वना के दो शब्द सुनने में तो बहुत अच्छे लगते हैं, पर उन पर अमल करना बहुत कठिन है. सब एकएक कर के आते रहे. किसी ने मन से, किसी ने अनमने भाव से इन शब्दों का प्रयोग किया. मैं भला स्वयं असहाय किसी से क्या कहती, जो कहा लोगों ने ही कहा.’’

‘‘मृत्यु से कहीं ज्यादा त्रासदी पीछे रह कर ?ोलना होता है. तुम ने एकएक कर के मु?ो इन सब से उबारा. मेरा जीवन फिर एक लय में लगाया. तुम्हारे आने से मेरी दुखी भावनाओं को सचमुच बहुत राहत मिली. मैं सचमुच तुम्हें मिस करूंगी,’’ जाते वक्त वह मेरे पांवों की तरफ ?ाकने लगी तो मैं ?ाट से अपने रुके हुए आंसुओं को संभालते हुए बोली, ‘‘तुम मु?ो छोड़ने न आना, नहीं तो मैं रो पड़ूंगी और मैं औटोरिकशा में बैठ गई.’’

आम से अच्छी फलत के लिए कीटों और रोगों का नियंत्रण जरूरी

शैलेंद्र सिंह, एसके तोमर, एसके सिंह, एसपी सिंह, प्रेमशंकर, कंचन

कृषि विज्ञान केंद्र, बेलीपार, गोरखपुर

इस समय आम की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कीट जैसे भुनगा, गुजिया व पुष्पगुच्छ (गाल मिज) कीट हैं. आम के भुनगा कीट व गुजिया कीट के शिशु और प्रौढ़ दोनों पत्तियों व फूलों का रस चूसते हैं, जिस के प्रभाव से फूल सूख कर गिर जाते हैं. ये कीट एक प्रकार का मीठा रस (लसलसा द्रव) छोड़ते हैं, जो पेड़ों, पत्तियों, प्ररोहों, फूलों आदि पर लग जाता है. इस मीठे द्रव्य के ऊपर काली फफूंद (सूटीमोल्ड) उगती है, जो पत्तियों पर काली परत जमा कर प्रकाश संश्लेषण पर बुरा असर डालती है. गालमिज कीट से प्रभावित बौर टेढ़े हो जाते हैं व काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं. इस का प्रकोप छोटेछोटे फलों पर भी होता है.

इस की रोकथाम के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 10 मिलीलिटर मात्रा प्रति 15 लिटर पानी की दर से 2 छिड़काव, एक फूल आने से पहले और दूसरा फल के मटर के दाने के बराबर होने पर करना चाहिए. तीसरा छिड़काव जरूरत के मुताबिक करें. कार्बोसल्फान 25 फीसदी ईसी की 1 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी अथवा लैम्ब्डासाईंहैलोथ्रिन 5 फीसदी ईसी 1 मिलीलिटर प्रति डेढ़ लिटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए.

इस समय गुजिया कीट का प्रकोप दिखाई दे रहा है. यह सफेद रंग का कीट है, जिस की मादा कीट भूमि में अंडे देती है. इस के बच्चे पेड़ पर चढ़ कर हानि पहुंचाते हैं. इस कीट के शिशु और प्रौढ़ कोमल शाखाओं, टहनियों और फूलों के डंठलों से रस चूसते हैं. इस के अधिक प्रकोप से फल गिर जाते हैं.

इस की रोकथाम के लिए 20-25 सैंटीमीटर चौड़ा व 400 गेज मोटी पौलीथिन शीट पौधों के तने पर जमीन की सतह से 30 सैंटीमीटर ऊपर लपेट कर उस के दोनों सिरों को रस्सी से बांध देना चाहिए.

पौलीथिन पट्टी लपेटने के पहले तने पर मिट्टी का लेप लगाना चाहिए. रस्सी से बांधने के बाद निचले सिरे को अच्छी तरह ग्रीस लगा कर बंद कर देना चाहिए. इस से प्रकोप कम हो जाता है.

अगर कीट का प्रकोप हो चुका है, तो कार्बोसल्फान 25 फीसदी ईसी की दर से 1 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी अथवा लैम्ब्डासाईंहैलोथ्रिन 5 फीसदी ईसी 1 मिलीलिटर प्रति डेढ़ लिटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए.

गाल मिज कीट के नियंत्रण के लिए स्पाईनोसेड 45 फीसदी एसपी 1 मिलीलिटर प्रति 2-3 लिटर पानी अथवा थायोमेंथोक्साम

25 फीसदी डब्लूजी 1 ग्राम  प्रति 3-4 लिटर पानी की दर से 2 छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए.

इस समय आम की फसल में लगने वाले रोगों में खर्रा या दहिया, ऐंथ्रेक्नोज, गुम्मा व कोयलिया प्रमुख हैं. दहिया रोग का प्रकोप पत्तियों, पुष्पक्रम (बौर) व फलों पर होता है. इन भागों पर सफेद चूर्ण दिखाई देता है. इस से प्रभावित भाग सूख जाता है.

दहिया रोग के नियंत्रण के लिए विलयनशील गंधक (2 ग्राम प्रति लिटर पानी में) से प्रथम छिड़काव बौर निकलने के तुरंत बाद करना चाहिए. दूसरा छिड़काव 10-15 दिनों बाद ट्राईडेमेफौन (1 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में) का करना चाहिए.

तीसरा छिड़काव जरूरत के मुताबिक दूसरे छिड़काव के 10-15 दिनों बाद पेंकानजोल 10 फीसदी ईसी 1 मिलीलिटर प्रति 2 लिटर पानी अथवा ट्राईडेमेफौन (1 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में) का करना चाहिए.

एंथ्रेक्नोज रोग के लक्षण पत्तियों व बौर पर गोल, भूरे धब्बे, फूलों का मुरझाना, टहनियों का सूखना आदि के रूप में प्रकट होते हैं. इस के नियंत्रण के लिए बौर पर कार्बेंडाजिम (1 ग्राम प्रति लिटर पानी में) का छिड़काव करना चाहिए.

गुम्मा रोग के विकार से ग्रस्त आम के बौर में फल नहीं बनते हैं. बौर फूलों के हरे घने गुच्छे के रूप में दिखाई देते हैं, जो पेड़ों पर काफी लंबे समय तक लगा रहता है.

इस के नियंत्रण के लिए प्रभावित बौर को तोड़ कर नष्ट कर दें और प्लैनोफिक्स की

1 मिलीलिटर की मात्रा 2-3 लिटर पानी की दर से ?ि??छड़काव करें.

कोयलिया रोग से बचाव के लिए बौर में

फल लगने के बाद बोरैक्स या कास्टिक सोडा (10 ग्राम प्रति लिटर पानी में) का प्रथम छिड़काव और 15 दिनों बाद दूसरा छिड़काव करना चाहिए.

बौर में फल बैठने के बाद मटर/कंचे आकार के फल भारी मात्रा में गिरते हैं. इस

की रोकथाम के लिए प्लैनोफिक्स का

1 मिलीलिटर प्रति 2-3 लिटर पानी की दर से छिड़काव फलों के मटर के बराबर होने की अवस्था में करना चाहिए.

आम के पौधों को सूखने से बचाव के लिए पौधे की जड़ के पास चारों तरफ 2 मीटर तक अच्छी तरह गुड़ाई करें व हलकी सिंचाई कर दें, उस के बाद उस में कार्बेंडाजिम की 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर भूमि को शोधित कर दें. उस के बाद उस में ट्राइकोडर्मायुक्त सड़ी गोबर की खाद मिलाएं.

आम की जो टहनियां ऊपर से सूखती हुई नीचे की तरफ आ रही हों, ऐसे लक्षण दिखने पर रोगग्रस्त भाग से 7-10 सैंटीमीटर नीचे से कटाई के बाद कौपरऔक्सीक्लोराइड 50 फीसदी डब्लूपी 3 ग्राम प्रति लिटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए.

आम के पौधों में गोंद नियंत्रण के लिए

10 साल के पेड़ के थाले में 250 ग्राम कौपर सल्फेट, 250 ग्राम जिंक सल्फेट, 125 ग्राम बोरैक्स, 100 ग्राम बुझा हुआ चूना मिट्टी में अच्छी तरह मिला कर सिंचाई कर दें.

जहां तक संभव हो, तने के गोंद को जूट के बोरे से रगड़ कर साफ करने के बाद कौपरऔक्सीक्लोराइड 50 फीसदी डब्लूपी 3 ग्राम प्रति लिटर पानी की दर से छिड़काव करें. ध्यान रहे कि आम के बौर में जब फूल खिल रहे हों, तो उस समय किसान कीटनाशकों का छिड़काव न करें.

इन बताए गए तरीकों से अगर किसान आम के बगीचे में कीट व रोग नियंत्रण का काम करते हैं, तो आम की फसल से अधिक उत्पादन प्राप्त कर ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं.

अधिक जानकारी के लिए कृषि विज्ञान केंद्र, बेलीपार, गोरखपुर के वैज्ञानिकों से मोबाइल नंबर 9795160389 पर संपर्क करें. ठ्ठ

कोविड 19 से लड़ने के लिए शहतूत का सेवन करें

शहतूत में प्रोटीन और विटामिन ए, विटामिन ई, विटामिन सी भरपूर होता है. यह कैल्शियम, आयरन, फोलेट, थायमिन, नियासिन का स्रोत है. इस का उपयोग कई बीमारियों और त्वचा की देखभाल सामग्री के उपचार में किया जाता है. शहतूत जो कैंसर को रोकने और सामान्य स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए अधिक जाना जाता है, इसलिए इस के लाभ दिनप्रतिदिन बढ़ रहे हैं. शहतूत में मौजूद विटामिन तत्त्व और खनिज लवण व्यापक स्तर पर अंगों द्वारा आवश्यक सभी पोषक तत्त्वों को कवर करते हैं

शहतूत 2 प्रकार के पाए जाते हैं, एक काला और दूसरा हरा. हरे शहतूत के फायदों में हड्डियों को मजबूत करना, दिल की सुरक्षा करना और मूत्रवर्धक प्रभाव शामिल है. यह बहुत पौष्टिक भी होता है. यह एंटीऔक्सीडैंट का एक अच्छा स्रोत है. शहतूत का शरबत बना कर भी इस्तेमाल किया जाता है.

प्रतिरक्षा प्रणाली का समर्थन करता है शहतूत

शहतूत में एल्कलाइड होते हैं, जो मैक्रोफेज को सक्रिय करते हैं. मैक्रोफेज श्वेत रक्त कोशिकाएं होती हैं, जो प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय कर उन्हें स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करती हैं.

दिल के लिए शहतूत के सेवन से एचडीएल (अच्छा कोलैस्ट्रोल) बढ़ता है और कुल कोलैस्ट्रोल कम होता है. इस प्रकार यह एथोस्क्लेरोसिस यानी दिल का दौरा, स्ट्रोक और कोरोनरी हार्ट रोग के जोखिम को कम करता है.

कैंसर के खतरे को कम करता है

यह एंटीऔक्सीडेंट से भरपूर होता है और इस में वे पोषक तत्त्व होते हैं, जो ट्यूमर के विकास को रोकने और फैलने व कैंसर से बचाने में मदद करते हैं. शहतूत में एंथोसाइएनिन से भरा होता?है, जो कैंसर कोशिकाओं को दूर रखने में मदद करता है. इस में एंटी कैंसर गुण होते हैं, इसलिए स्वस्थ रहने के लिए शहतूत का सेवन अवश्य करना चाहिए.

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