सारी उम्मीदें टूटने लगी थीं. सैलाब की त्रासदी को हुए 1 महीने से भी ज्यादा का समय बीत चुका था. परिवार के लोगों ने सब जगह भटक कर देख लिया था, मगर चारधाम की यात्रा पर गए जानकीदास का कुछ भी अतापता नहीं था.

जानकीदास का नाम न तो जिंदा बचने वालों की सूची में था, न ही मरने वालों की सूची में.

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