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दलितों की बदहाली

सुप्रीम कोर्ट भी किस तरह दलितों को जलील करता है इस के उदाहरण उस के फैसलों में मिल जाएंगे. देशभर में दलितों को बारबार एहसास दिलाया जाता है कि संविधान में उन्हें बहुत सी छूट दी हैं पर यह कृपा है और उस के लिए उन्हें हर समय नाक रगड़ते रहनी पड़ेगी. महाराष्ट्र म्यूनिसिपल टाउनशिप ऐक्ट में यह हुक्म दिया गया है कि अगर दलित या पिछड़ा चुनाव लड़ेगा तो उस को अपनी जाति का सर्टिफिकेट नौमिनेशन के समय या चुने जाने के 6 महीने में देना होगा.

यह अपनेआप में उसी तरह का कानून है जैसा एक जमाने में दलितों को घंटी बांध कर घूमने के लिए बना था ताकि वे ऊंची जातियों को दूर से बता सकें कि वे आ रहे हैं. यह वैसा ही है जैसा केरल की नीची जाति की नाडार औरतों के लिए था कि वे अपने स्तन ढक नहीं सकतीं ताकि पता चल सके कि वे दलित अछूत हैं. दोनों मामलों में इन लोगों से जी भर के काम लिया जा सकता था पर दूरदूर रख कर.

गरीब की ताकत है पढ़ाई

कानून यह भी कहता है कि हर समय अपना जाति प्रमाणपत्र रखो. क्यों? ब्राह्मणों को तो हर समय या कभी भी अपना जाति सर्टिफिकेट नहीं चाहिए होता तो पिछड़े दलित ही क्यों लगाएं? क्यों वे कलेक्टर, तहसीलदार से अपना सर्टिफिकेट बनवाएं? उन्होंने किसी आरक्षित सीट के लिए कह दिया कि वे पिछड़े या दलित हैं तो मान लिया जाए. आज 150 साल की अंगरेजी पढ़ाई, बराबरी के नारों के बावजूद भी क्यों जाति का सवाल उठ रहा है? क्या पढ़ेलिखे विद्वानों के लिए 150 साल का समय कम था कि वे जाति का सवाल ही नहीं मिटा सकते थे? जब हम मुगलों और ब्रिटिशों के राज से छुटकारा पा सकते थे तो क्या दलित पिछड़े के तमगों से नहीं निकल सकते थे?

अस्वच्छ भारत

यहां तो उलट हो रहा है. शंकर देवरे पाटिल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उस कानून को सही ठहराया है जिस ने यह जबरन कानून थोप रखा है कि आरक्षित सीट पर खड़े होना है तो सर्टिफिकेट लाओ. यह अपमानजनक है. यह दलितों, पिछड़ों को एहसास दिलाने के लिए है कि वे निचले, गंदे, पैरों की धूल हैं. यह बराबरी के सिद्धांत के खिलाफ है.

दलितों और पिछड़ों को जो भी छूट मिले उन्हें बिना किसी प्रमाणपत्र लटकाए मिलनी चाहिए. अगर ऊंची जाति का कोई उस का गलत फायदा उठाए तो उस के लिए सजा हो, दलित पिछड़े के लिए नहीं. वैसे भी ऊंची जाति का कोई दलित पिछड़े को दोस्त तक नहीं बनाता, वह उन की जगह कैसे लेगा? ऊंची जातियों का आतंक इतना है कि नीची जाति वाले तो हर समय चेहरे पर ही वैसे ही अपने सर्टिफिकेट गले में लटकाए फिरते हैं. नरेंद्र मोदी कहते रहें कि हिंदू आतंकवादी नहीं हैं पर लठैतों के सहारे दलितों और पिछड़ों पर जो हिंदू आतंक 150 साल में नई हवा के बावजूद भी बंद नहीं हुआ, वह सुप्रीम कोर्ट की भी मोहर इसी आतंकवाद की वजह से पा जाता है.

गरीबी बनी एजेंडा

कभी भी इन 5 चीजों को ना खाएं खाली पेट, होती हैं गंभीर बीमारियां

स्वस्थ रहने के लिए केवल खाना जरूरी नहीं है. आप क्या और कब खा रहे हैं, इसका सेहत पर काफी असर होता है. सही समय पर सही चीज खाना ही आप अच्छी सेहत का राज है.

कोई भी खाना आपकी टाइमिंग पर काफी निर्भर करता है. सुबह में जो चीज आपके लिए फायदेमंद है, हो सकता है रात में उसे खाने से आपकी सेहत पर नकारात्मक असर पड़े. इस खबर में हम आपको ऐसी ही कुछ चीजों के बारे में बताएंगे, जिनको खाली पेट खाना आपकी सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है.

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टमाटर:

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टमाटर हमारी सेहत के लिए कई मायनों में फायदेमंद होता है. विटामिन और एंटीऔक्सिडेंट से भरपूर टमाटर को अगर सही समय पर ना खाया जाए तो ये हमारे लिए हानिकारक हो सकता है. चूंकि ये एसिडिक होता है, इसे खाली पेट खाना काफी नुकसानदायक हो सकता है. अल्सर से पीड़ित लोगों के लिए ये खतरनाक स्थिति हो सकती है.

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कौफी या चाय:

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अक्सर लोगों को बेड टी या कौफी की आदत होती है. जागते ही लोगों को चाय या कौफी चाहिए होती है. पर इसका सेहतच पर काफी बुरा असर पड़ता है. हमारे शरीर को ये काफी नुकसान पहुंचाते हैं. आपको बता दें कि खाली पेट कौफी पीने से शरीर में हाइड्रोक्लोरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाती है और इससे कब्ज व वोमिटिंग की समस्या बढ़ जाती है. इससे पाचनतंत्र पर भी काफी बुरा असर पड़ता है.

पेस्ट्रीज:

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नाश्ते में लोग अक्सर पेस्ट्रीज लेते हैं. ब्रेकफास्ट के लिए ये अच्छा औप्शन है, चूंकि इनमें यीस्ट होता है, खाली पेट लेने से कई तरह की पेट की समस्याएं आ सकती है.

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कार्बोनेटेड ड्रिंक्स:

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आमतौर परकोल्ड ड्रिंक्स या सौफ्ट ड्रिंक्स हमारी सेहत के लिए काफी हानिकारक होते हैं. इन्हें खाली पेट लेना सेहत के लिए और भी खतरनाक हो सकता है. सुबह उठते ही खाली पेट कार्बोनेटेड ड्रिक्स पीने से कैंसर व अन्य हार्ट बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

खट्टे फलों से रहें दूर:

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सुबह में खट्टे फलों से दूर रहें. फल जैसे संतरा, अंगूर, नींबू में विटामिन सी, फाइबर और एंटीऔक्सिडेंट के तत्वों से भरपूर होते हैं, पर अगर आप इनका सुबह में खाली पेट सेवन करते हैं तो ये आपके पेट के लिए काफी हानिकारक होते हैं.

क्या इस टीवी एक्ट्रेस ने तलाक के बदले मांगे 2 करोड़ रूपए, जानें पूरा सच

छोटे परदे की जानी-मानी एक्ट्रेस वाहबिज दोराबजी अपने पति से तलाक लेने वाली हैं. हाल ही में ऐसी खबर आईं है. और इसके लिए उन्होंने विवियन से 2 करोड़ रुपये की भी मांग की हैं. वाहबिज ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक ओपन लेटर लिखा हैं, जिसमें उन्होंने ऐसी सभी अफवाहें बंद करने की मांग करते हुए बहुत सारी बातें कही हैं.

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वाहबिज ने लिखा है, ‘जो लोग मेरे तलाक में इतना इंट्रेस्ट ले रहे हैं क्या वो बताएंगे कि उन्होंने कभी अपने आपको ऐसी स्थिति में पाया है ? क्या आप अपनी जिंदगी के सबसे खराब दिनों से गुजरे हैं और अपने आपसे पूछा है कि यह मेरे साथ ही क्यों हो रहा है यह किसी भी लड़की के लिए शर्मिंदगी की बात है कि उसको लेकर ऐसी खबरें सामने आ रही हैं. वाहबिज ने ऐसे समय में चुप रहने की जगह अपनी बात खुलकर कहना सही समझा.

 

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सोचकर देखिए ऐसी स्थिति में आप पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया जाए… सबसे खराब बात तब होती है जब ऐसे सवाल आपके करीबियों से नहीं बल्कि उन लोगों से आते हैं जो आपको जानते ही नहीं हैं. जब आप इन चीजों को लेकर परेशान होते हैं तो आपसे कहा जाता है कि यह एक सेलेब्रिटी होने की कीमत है.

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बालों में खुजली की समस्या से राहत पाने के ये हैं 4 उपाय

अगर आपके भी बालों में खुजली होती है तो इसके कई कारण हो सकते हैं. बालों की जड़ों में रूखेपन के कारण भी खुजली होती है या तो डैंड्रफ की समस्या हो सकती है. अगर डैंड्रफ का भी इलाज नहीं किया गया तो आपके सिर में इंफेक्शन भी हो सकता है. तो आइए बालों की खुजली की समस्या से निजात पाने के लिए आपको कुछ घरेलू उपाय बताते हैं जिससे आप अपना सकती हैं.

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  1. ऐलोवेरा

ऐलोवेरा का इस्तेमाल आपके बालों को सुंदर, मजबूत और डैंड्रफ फ्री कर सकता है. जी हां, अगर ऐलोवेरा जेल को बालों की जड़ों में थोड़ी देर मसाज करके 15 मिनट बाल शैम्पू से लें तो सिर में खुजली की समस्या दूर हो जाती है.

2. सेब का सिरका

ये सिर की गंदगी को साफ करने के लिए बहुत समय से उपयोग किया जा रहा है. तीन चौथाई पानी के साथ एक चौथाई सेब का सिरका मिलाकर बालों में रोज मालिश करने से सिर में खुजली की समस्या दूर हो जाती है.

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3. नींबू और शहद

नींबू भी एंटी-बैक्टीरियल, एंटीफंगल गुणों से लैस होता है. बस शहद में नींबू का रस मिलाइए और बालों की जड़ों में मसाज कीजिए, 15 मिनट बाद सिर धो लीजिए. खुजली और डैंड्रफ की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा.

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4. टी ट्री औयल

टी ट्री औयल का प्रयोग लोग सुंदरता बढ़ाने के लिए करते रहे हैं. इसमें टरपीन्स नाम को यौगिक मौजूद होता है जो एंटी-बैक्टीरियल, एंटीफंगल गुणों से लैस होता है. इसके उपयोग से बालों की जड़ों में नमी बनी रहती है और खुजली से निजात मिल जाती है.

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posted by- Saloni

ज्यादा पानी पीना हो सकता है खतरनाक, जानें क्यों

आपके शरीर में 60 प्रतिशत पानी होता है. पाचन, अवशोषण, पोषक तत्व पहुंचाने और शरीर के तापमान को ठीक बनाए रखने में मदद करता है. आप जानते हैं कि कम पानी से शरीर थका हुआ और डी-हाइड्रेटड हो जाता है, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है जरूरत से ज़्यादा पानी पीने से क्या होता है?

एक अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ पैनल के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, हाइपोनैट्रिमया (ईएएच) (ब्लड में सोडियम की कमी) से बचने के लिए पानी का सेवन सिर्फ तभी करें, जब आपको प्यास लगी हो. यह दिशा-निर्देश ‘क्लिनीकल जरनल औफ स्पोर्ट मेडिसिन’ में छपे थे.

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ज्यादा पानी पीने के नुकसान

– ज्यादा पानी पीने की सीमा होनी चाहिए और ज़्यादा डी-हाइड्रेशन से बचने के लिए, जब पर्याप्त तरल       पदार्थ दिए जाते हैं तो उससे हाइपोनैट्रिमया का विकास होता है.

–   किडनी की अतिरिक्त पानी पचाने की क्षमता कमजोर होने लगती है और शरीर में मौजूद सोडियम     पतला होने लगता है.

– ज्यादा पानी पीने से कोशिकाओं में सूजन आने लगती है, जो कि जीवन के लिए खतरनाक साबित हो     सकती है.

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ज्यादा पानी पीने से होने वाले नुकसानों की पहचान के लक्षण

– इसके शुरूआती लक्ष्ण हैं चक्कर आना, उबकाई, सूजन और एथलेटिक इवेंट के दौरान वजन बढ़ना.

– समस्या बढ़ जाने पर ईएएच के दौरान उल्टी, सिर दर्द, मानसिक स्थिती का बदलना ( भ्रम, उत्तेजक और बेहोशी) और कोमा जैसे लक्ष्ण देखने को मिलते हैं.

– कठिन प्रतियोगिता जैसे मैरेथान, ट्रायथलान, स्विंमींग, रेस और सैन्य अभ्यास के दौरान ईएएच हो सकता है.

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गरीब की ताकत है पढ़ाई

हमारे देश में ही नहीं, लगभग सभी देशों में गरीब, मोहताज, कमजोर पीढ़ी दर पीढ़ी जुल्मों के शिकार रहे हैं. इसकी असली वजह दमदारों के हथियार नहीं, गरीबों की शिक्षा और मुंह खोलने की कमजोरी रही है. धर्म के नाम पर शिक्षा को कुछ की बपौती माना गया है और उसी धर्म देश के सहारे राजाओं ने अपनी जनता को पढ़ने-लिखने नहीं दिया. समाज का वही अंग पीढ़ी दर पीढ़ी राज करता रहा जो पढ़-लिख और बोल सका.

बिकाऊ मीडिया

2019 के चुनाव में भी यही दिख रहा है. पहले बोलने या कहने के साधन बस समाचारपत्र या टीवी थे. समाचारपत्र धन्ना सेठों के हैं और टीवी कुछ साल पहले तक सरकारी था. इन दोनों को गरीबों से कोई मतलब नहीं था. अब डिजिटल मीडिया आ गया है, पर स्मार्टफोन, डेटा, वीडियो बनाना, अपलोड करना खासा तकनीकी काम है जिस में पैसा और समय दोनों लगते हैं जो गरीबों के पास नहीं हैं.

गरीबों की आवाज 2019 के चुनावों में भी दब कर रह गई है. विपक्ष ने तो कोशिश की है पर सरकार ने लगातार राष्ट्रवाद, देश की सुरक्षा, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर जनता को बहकाने की कोशिश की है ताकि गरीबों की आवाज को जगह ही न मिले. सरकार से डरे हुए या सरकारी पक्ष के जातिवादी रुख से सहमत मीडिया के सभी अंग कमोबेश एक ही बात कह रहे हैं, गरीब को गरीब, अनजान, बीमार चुप रहने दो.

मोदी की नैया

चूंकि सोशल, इलैक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया पढ़ेलिखों के हाथों में है, उन्हीं का शोर सुनाई दे रहा है. आरक्षण पाने के बाद भी सदियों तक जुल्म सहने वाले भी शिक्षित बनने के बाद भी आज भी मुंह खोलने से डरते हैं कि कहीं वह शिक्षित ऊंचा समाज जिस का वे हिस्सा बनने की कोशिश कर रहे हैं उन का तिरस्कार न कर दे. कन्हैया कुमार जैसे अपवाद हैं. उन को भीड़ मिल रही है पर उन जैसे और जमा नहीं हो रहे. 15-20 साल बाद कन्हैया कुमार क्या होंगे कोई नहीं कह सकता क्योंकि रामविलास पासवान जैसों को देख कर आज कोई नहीं कह सकता कि उन के पुरखों के साथ क्या हुआ. रामविलास पासवान, प्रकाश अंबेडकर, मायावती, मीरा कुमार जैसे पढ़लिख कर व पैसा पा कर अपने समाज से कट गए हैं.

बदलना होगा शहरों के पुराने इलाकों को

2019 के चुनावों के दौरान राहुल गांधी गरीबों की बात करते नजर आए पर वोट की खातिर या दिल से, कहा नहीं जा सकता. पिछड़ों, दलितों ने उन की बातों पर अपनी हामी की मोहर लगाई, दिख नहीं रहा. दलितों से जो व्यवहार पिछले 5 सालों में हुआ उस पर दलितों की चुप्पी साफ करती है कि यह समाज अभी गरीबी के दलदल से नहीं निकल पाएगा. हां, सरकार बदलवा दे यह ताकत आज उस में है पर सिर्फ उस से उस का कल नहीं सुधरेगा. उसे तो पढ़ना और कहना दोनों सीखना होगा. आज ही सीखना होगा. पैन ही डंडे का जवाब है.

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5 टिप्स: दांतों का पीलापन हटाएं और पाएं परफेक्ट स्माइल

एक अच्छी स्माइल के लिए दांतों का सफेद होना भी जरूरी होता है. दांतों का पीलापन हमारी पर्सेनेलिटी के लिए कभी-कभी दाग की तरह हो जाता है. हर कोई ब्यूटीफुल दिखने के लिए कई तरह के प्रोडक्ट्स ट्राई करता है लेकिन जब बात दांतों की आती है तो हम कोशिश करते हैं कि घरेलु नुस्खों से ही उनका इलाज हो तो वह बढ़िया रहता है. इसीलिए आज हम आपको कुछ होममेड टिप्स बताएंगे. जिससे आप लंबे समय तक के लिए दांतों के पीलेपन से छुटकारा पा सकते हैं…

1. दांतों के पीलेपन को हटाने के लिए नमक है असरदार

दांतों के पीलेपन हटाने और मोतियों जैसा सफेद बनाने के लिए नमक का इस्तेमाल बहुत होता है. नमक में भारी मात्रा में सोडियम और क्लोराइड होता है, जो दांतों का पीलापन कम करने में मदद करता है. दांत साफ करते वक्त हमेशा ब्रश में पेस्ट के साथ थोड़ा सा नमक जरूर रखें. आप खुद देखेंगे कि कुछ ही दिनों में आपके दांत साफ हैं, लेकिन ध्यान रहे नमक के ज्यादा इस्तेमाल से दांतों के इनेमल को नुकसान पहुंच सकता है.

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2. पीलेपन को हटाने के लिए अपनाएं दूध के प्रोडक्ट्स

वैसे तो आपको बाजार में कई तरह के प्रोडक्ट्स दांत चमकाने के लिए मिल जाते हैं, लेकिन इनसे दांतों को फायदा मिलने के बजाय नुकसान पहुंचने के चांस ज्यादा होते हैं. जिस तरह से नेचुरल प्रोडक्ट आपके दांतों को साफ और मजबूत कर सकते हैं उस तरह कोई और नहीं कर सकते हैं. दूध और दूध से बने प्रोडक्ट्स हमारे दांतों से बहुत जल्द पीलापन दूर करते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि दूध में ज्यादा कैल्शियम होता है, जो दांतों के लिए बहुत जरूरी होता है.

3. ब्रश करते टाइम नींबू का करें इस्तेमाल

दांत के बैक्टीरिया को मारने और दांतों को सफेद करने के लिए नींबू वाकई बहुत असरदार है. खाना खाने के बाद नींबू से ब्रश करने पर बहुत फायदा होता है. रोजाना रात के खाने के बाद एक नींबू का रस निकालकर उसमें बराबर मात्रा में पानी मिला लें. खाने के बाद इस पानी का कुल्ला करें. रोजाना ऐसा करने से दांतों का पीलापन और सांसों की बदबू दूर हो जाती है. अगर आप ऐसा रोज नहीं कर सकते हैं तो हफ्ते में एक बार जरूर करें.

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4. बेकिंग सोडा से करें दांतों को साफ

दांतों का पीलापन दूर करने के लिए बेकिंग सोडा बहुत कारगार है. जिस तरह हम दांत साफ करते वक्त नमक का इस्तेमाल करते हैं उसी तरह बेकिंग सोडा का इस्तेमाल भी करना है. यानी ब्रश करते वक्त अपने पेस्ट में थोड़ा सा बेकिंग सोडा मिला लें और अब धीरे-धीरे अपने दांत साफ करें. कुछ ही दिनों में आप देखेंगे कि आपके दांतों पर जमी पीली परत धीरे-धीरे साफ हो रही है.

edited by- rosy

इक जरा हाथ छूटा तेरा, रास्ते ही जुदा हो गये

जबसे तुम बेवफ़ा हो गये
आदमी से ख़ुदा हो गये
तुम मिले दोस्त बन के मगर
दोस्ती की सज़ा हो गये
अब कभी आके मिलते नहीं
मुफ़लिसों की दुआ हो गये
इक ज़रा हाथ छूटा तेरा
रास्ते ही जुदा हो गये
नींद आंखों में आती नहीं
सारे सपने खफा हो गये
अब ये आंसू ये तन्हाइयां
मेरे ग़म की दवा हो गये

बिग बी ने फैन्स के साथ शेयर किया ये मजेदार जोक

अमिताभ बच्चन ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक जोक शेयर किया हैं, जिसमें उन्होंने नेताओं से लेकर भारतीय पत्नियों को निशाना साधा हैं. बिग बी ने इस जोक में लिखा हैं कि पत्नी- शादी से पहले तुम मुझे होटल, सिनेमा, और न जाने कहां- कहां घुमाते थे… शादी हुई तो घर के बाहर भी नहीं ले जाते.. पति- क्या तुमने कभी किसी को… चुनाव के बाद प्रचार करते देखा है.

मैं अपने कैरियर में हमेशा चूजी रहा हूं : राम कपूर

संघर्ष से सब को गुजरना पड़ता है : अक्षय कुमार

अमिताभ बच्चन के इस जोक को कई सारे लोगों ने लाइक किया हैं और इस पर कई कमेंट भी आ रहे हैं. बिग बी के आने वाले फिल्म की चर्चा की जाए तो वो जल्द ही रणबीर कपूर और आलिया भट्ट की बिग बजट सुपरहीरो फिल्म ‘ब्रह्मास्त्र’ में नजर आएंगे. इसके साथ-साथ अमिताभ बच्चन अपनी सुपरहिट फिल्म ‘आंखे’ के सीक्वल में भी काम करते दिखेंगे.

भोपाल में होगा हिंदुत्व का लिटमस टेस्ट

21 अप्रैल, रविवार  की शाम एक न्यूज चैनल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू प्रसारित हो रहा था. इस इंटरव्यू के दौरान एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि आप मौजूदा राजनेताओं में से किसे चुनौती मानते हैं. इस बाबत उन्हें कुछ विपक्षी नेताओं के नाम भी दिये गए. इस पर नरेंद्र मोदी का जवाब बड़ा दिलचस्प था कि नरेंद्र मोदी के लिए चुनौती सिर्फ नरेंद्र मोदी ही हैं. फिर बात को विस्तार देते वे खुद को देश की चिंता में डूबा हुआ बताते रहें कि मोदी ही कैसे मोदी के लिए चुनौती हैं. गोया की विपक्षी नेता भिनभिनाती हुईं मक्खियां हो जिनसे उनकी तुलना होना या करना जिल्लत या जलालत की बात है.

इस दृश्य ने बरबस ही शोले फिल्म के उस सीन की याद दिला दी, जिसमें गब्बर सिंह रामगढ़ बालों को धौंस नुमा समझाइश दे रहा है कि गब्बर के ताप से तुम्हें एक ही आदमी बचा सकता है खुद गब्बर.

बंगाल में क्यों गरमा रही है राजनीति

क्या है मौजूदा चुनाव प्रचार में इस जवाब के मायने, और क्यों और कैसे. यह नरेंद्र मोदी की हीन भावना और अहंकार है, जो तरह-तरह से बौखलाहट की शक्ल में प्रदर्शित भी हो रही है. इसे समझने के लिए भोपाल सीट का उदाहरण काफी है, जहां से भाजपा (दरअसल में आरएसएस) ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को मैदान में उतारकर यह गलतफहमी दूर कर दी है कि 17वीं लोकसभा के लिए चुनाव कट्टर हिन्दुत्व के नाम पर नहीं लड़ा जा रहा. इस सीट से कांग्रेस कोई एक महीना पहले ही पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को उम्मीदवार घोषित कर चुकी थी. प्रज्ञा भारती मालेगांव बम ब्लास्ट की आरोपी हैं और हाल फिलहाल जमानत पर हैं. उनकी उम्मीदवारी की घोषणा के बाद देश भर में जो बवंडर मचा, उसमें लोग भूल गए कि उन्हें अपना और देश का भविष्य तय करना है. न कि यह, हिन्दू और भगवा आतंकवाद जैसे शब्द देने वाले कांग्रेसी दिग्विजय सिंह के सही गलत होने का फैसला 12 मई को मतदान के जरिए करना है.

बात को उलट कर देखें तो भोपाल के वोटर्स को यह भी तय करना भड़काया जा रहा है कि वे प्रज्ञा भारती के साथ इंसाफ करें जिन्हें कथित तौर पर पुलिस हिरासत में अमानवीय तरह से प्रताड़ित किया गया है. 24 घंटों में भोपालवासी दहशत में आ गए कि आखिरकार यह हो क्या रहा है और प्रज्ञा भारती के आने का आगाज ऐसा है तो अंजाम कैसा होगा. प्रज्ञा भारती ने शहीद कहे जाने वाले आईपीएस अधिकारी हेमंत करकरे की आतंकियों द्वारा हत्या की वजह अपना श्राप बताया तो ऐसा लगा कि बात बात पर श्राप देने के लिए कुख्यात ऋषि दुर्वासा इस बार स्त्री रूप में अवतरित हो गए हैं और हम लोग यानि कि जनता लोकतंत्र से निकलकर सीधे त्रेता और द्वापर युग में पहुंच गए हैं जिनमें सत्ता और समाज के फैसले वोट और संविधान से नहीं बल्कि ऋषि मुनियों के आशीर्वादों और श्रापों से तय होते हैं. प्रज्ञा भारती ने दिग्विजय सिंह को महिषासुर नाम का राक्षस बताते उनके वध का उद्घोष सा भी कर दिया तो लोगों को समझ आ गया कि अब चुनाव नहीं बल्कि मजाक होने लगा है .

नेताओं के बिगड़े बोल कह दी गंदी बात

दो दौर की वोटिंग के बाद ही भाजपा को समझ आ गया था कि मोदी का जादू उतर चला है और हिन्दुत्व का करंट कहीं नहीं है, खासतौर से हिन्दी भाषी राज्यों में जो उसका गढ़ रहे हैं . ऐसे में हिन्दुत्व को मुद्दा बनाने उसे भोपाल सीट मुफीद लगी क्योंकि दिग्विजय सिंह हमेशा आरएसएस और कट्टर हिन्दुत्व को अपने निशाने पर रखते रहे हैं. दिग्विजय सिंह खुद भी कट्टर हिन्दू हैं लेकिन उनका हिन्दुत्व भाजपा और आरएसएस के हिन्दुत्व से अलग है, जो यह कहता है कि ये दोनों हिंसा और बम धमाकों में भरोसा करते हैं जबकि वे सिर्फ कर्मकांड करते अहिंसक हिन्दुत्व में भरोसा करते हैं.

एक महीने में भोपाल के तमाम छोटे बड़े मंदिरों में जाकर देवी देवताओं के सामने माथा टेकने वाले दिग्विजय सिंह के बारे में आम राय यह है कि वे हिंदुओं से ज्यादा मुसलमानों के करीबी और हितैषी हैं. यह बात एक हद तक सच भी है, जिसका फायदा उठाते ही भगवा खेमे ने प्रज्ञा भारती पर दांव खेलते देश भर में मैसेज दे दिया कि अब उसके पास कुछ नहीं बचा है लिहाजा बाकी चरणों के मतदान में लोग उसके इस नए पुराने एजेंडे को जेहन में रखते वोट करें. भाजपा के पास उपलब्धियों के नाम पर कुछ नहीं है बेरोजगार, किसान, महिला सुरक्षा, विकास, शिक्षा और स्वास्थ बगैरह के नाम पर वह जो गिना रही है. उसका खोखलापन आंकड़ों की चादर से ढक नहीं पा रहा .

कहने का मतलब यह नहीं की आतंकवाद को सहज स्वीकार लिया जाए बल्कि यह है कि इसके नाम पर डर और दहशत फैलाने की अव्यवहारिक राजनीति न की जाये. नरेंद्र मोदी की खोखली होती दहाड़ उसी सूरत में प्रभावी होती जब वे वादे के मुताबिक गरीबी, बेरोजगारी, किसान आत्महत्याएं, कालाधन, भ्रष्टाचार वगैरह वगैरह खत्म नहीं तो थोड़ा बहुत कम ही कर चुके होते.

चुनावी जंग में क्यों भाजपा से पिछड़ रही कांग्रेस?

भाजपा का प्रचार नरेंद्र मोदी के इर्द गिर्द सिमट कर रह जाना कतई हैरत या हर्ज की बात नही है. एतराज की बात है कि उनका धर्म को देश और देश को धर्म बताना जिसके झांसे में 8–10 फीसदी लोग हैं भी. ये लोग ऊंची जातियों के हैं जिन्होंने कभी भूख, अभाव, गरीबी, भेदभाव और छुआछूत का न दंश सहा है और न ही इसका दर्द भोगा है. उल्टे ये लोग चाहते हैं कि वह सुनहरा दौर फिर से आए जिसमें शूद्र उनकी सेवा करता रहता था जिसकी औरते इनकी हवस मिटाने सहज उपलब्ध रहतीं थीं. छोटी जाति वाले ये लोग  गुलामों की तरह इनके खेतों में काम करते रहते थे और ये लोग अय्याशी में डूबे या तो हवेली में मुजरा देखते हुक्का गुडगुड़ाते रहते थे या फिर मंदिरों में पसरे दक्षिणा के पैसे गिनते रहते थे .

क्या करेंगे भोपाली –

प्रज्ञा भारती की भोपाल से उम्मीदवारी इसी काल को आधुनिक तरीके से लाने का आश्वासन है कि यूं ही भगवाधारियों को चुनते रहो धीरे धीरे जातिगत आरक्षण और एट्रोसिटी एक्ट वगैरह बंद कर दिये जाएंगे. भोपाल में न तो प्रज्ञा भारती की जीत गारंटेड है और न ही दिग्विजय सिंह की क्योंकि दोनों ही हिन्दुत्व की राजनीति कर रहे हैं. साढ़े चार लाख मुसलमान वोटरों का तो कांग्रेस में जाना तय है लेकिन 15 लाख के लगभग हिन्दू  वोटर असमंजस हैं कि क्या करें .

भोपाल के मतदाताओं के सामने एक तरफ कुआ है तो दूसरी तरफ खाई है.  एक नपीतुली साजिश के तहत भाजपा की तरफ से अंदरूनी तौर पर प्रचार यह किया जा रहा है कि अगर दिग्विजय सिंह जीते तो मुसलमान हावी हो जाएंगे और राज्य सरकार में उनका दखल और रुतबा बढ़ जाएगा जिससे प्रदेश फिर उनके कार्यकाल की तरह पिछड़ जाएगा. कांग्रेस जिस हिन्दुत्व पर लड़ रही है वह शायद ही लोगों को रास आए. दिग्विजय सिंह की इमेज भाजपा ने एक पाखंडी और छद्म हिन्दू की बना दी हैं, जिससे उबर पाने का कोई टोटका दिग्विजय सिंह जैसे तजुर्बेकार नेता के पास नहीं है. जिसके विकास के दावे और विजन पर लोग यकीन नहीं कर पा रहें .

लोग वोट तो प्रज्ञा भारती को भी नहीं करना चाह रहे. पुराने भोपाल के चौक स्थित भाजपा समर्थित एक सर्राफा व्यापारी की मानें तो साध्वी को नहीं मालूम कि भोपाल लोकसभा कहाँ से शुरू होकर कहाँ खत्म होती है. उन्हें राजनीति की भी समझ और तमीज नहीं है इसके अलावा उनका अतीत भी अच्छा नहीं है उन्हें अगर आतंकवादी कहा जाता है तो इसमें गलत क्या है . ऐसे में लोग उन्हें भी चुनने से कतरा रहे हैं.

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अब 23 मई की गिनती में क्या होगा यह देखना कम सस्पेंस और कम दिलचस्पी की बात नहीं होगी क्योंकि दांव पर भोपालियों की बुद्धि और समझ भी लगी है. दिग्विजय सिंह हारे तो उनका सियासी कैरियर बिलकुल खत्म हो जाएगा और साध्वी प्रज्ञा हारीं तो वे अपना डेरा डंगर समेटकर सूरत स्थित अपने आश्रम चली जाएंगी.  उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है. जिस मंशा से उन्हें मैदान में उतारा गया है वह बेहद साफ है कि जनता मोदी और उनकी सरकार का आकलन किस आधार पर करती है, पांच साल के लचर काम काज पर या फिर थोपे जा रहे कट्टर हिन्दुत्व पर जिससे पंडों के अलावा कभी किसी को कुछ नहीं मिला और न आगे कभी मिलेगा. बात सिर्फ इतनी सी है कि नरेंद्र मोदी नकारे जाने लगे हैं लेकिन वही जैसे तैसे भाजपा को सत्ता की दौड़ में रखे हुये भी हैं. लेकिन धर्म और कट्टर हिन्दुत्व उनकी नैया पार लगा पाएगा यह जरूर मुमकिन नहीं.

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