बौलीवुड में सफलता मिलनी आसान नही होती. यहां पर कलाकार की प्रतिभा से ज्यादा मायने उसकी तकदीर रखती है. पिछले 12 वर्ष से बौलीवुड में सक्रिय श्रवण रेड्डी ने 2007 में टीवी सीरियल ‘‘जर्सी नंबर 10’’अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा था. उसके बाद उन्होंने कुछ सीरियल किए. टीवी जगत मे उन्हे पहचान भी मिली,मगर फिल्मों में अभिनय करने का अवसर नही मिल पाया. जबकि उन्होंने बतौर सहायक निर्देशक कुछ फिल्में की इन दिनों ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘एमएक्स प्लेअर’’ पर प्रसारित हो रही हास्यप्रद वेब सीरीज ‘‘थिंकिस्तान’’में अंग्रेजी दा हेमा का के किरदार में जबरदस्त शोहरत बटोर रहे हैं.

प्रस्तुत  है श्रवण रेड्डी के साथ हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश

अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताएं?

मैं मूलतः हैदराबाद का रहने वाला हूं. मेरे पापा बिजनेस मैन हैं और मम्मी हाउस वाइफ हैं. मेरी पूरी पढ़ाई हैदराबाद में हुई. मुझे पहले कभी समझ में नही आया कि मुझे क्या करना चाहिए. स्कूल व कौलेज के दिनों में मैं क्रिकेट खेलता था. अभिनय को लेकर मैंने कुछ सोचा नहीं था. कुछ वजहों के चलते मुझे क्रिकेट से दूरी बनानी पड़ी. तब अचानक अभिनय की तरफ मेरी रूचि बढ़ गयी. कौलेज के दिनों में ही मैंने सोच लिया था कि अब मुझे अभिनय ही करना है. कौलेज की पढ़ाई पूरी होते ही मैं  मुंबई पहुंच गया.

मुबई में किस तरह से करियर की शुरूआत हुई?

मैंने किसी एक्टिंग स्कूल से ट्रेनिंग हासिल नहीं की. लेकिन मैंने एक्टिंग के कई वर्कशौप किए. मैंने बहुत कुछ टीवी सीरियल में अभिनय करते हुए सीखा.एक्टिंग वर्कशौप मैं अभी भी करता रहता हूं. क्योंकि मेरा मानना है कि एक कलाकार को अपने अंदर की प्रतिभा को हमेशा निखारते रहना चाहिए.

पहला सीरियल कैसे मिला था?

मैं अपने आपको लक्की मानता हूं कि मुंबई पहुंचने के बाद मुझे लंबा संघर्ष नहीं करना पड़ा.जब मैं मुंबई पहुंचा,उस वक्त मुझे इस बात का अहसास नहीं था कि टीवी कितना बड़ा माध्यम है. लेकिन यहां पहुंचने के बाद मैंने देखा कि लोग एक टीवी सीरियल में काम पाने के लिए किस तरह से भाग रहे हैं. मैं 2007 की बात बता रहा हूं. उन दिनों कौस्टिंग डायरेक्टर नहीं थे. उस वक्त तो एक फिल्म के लिए औडीशन दे पाना ही बड़ा मुश्किल था. तो मैंने टीवी सीरियलों के लिए औडीशन देना शुरू किया. यह सोचकर की इससे मेरी एक्टिंग की प्रैक्टिस होती रहेंगी. क्योंकि उस वक्त तक मुझे यह भी नहीं पता था कि काम पाने के लिए किस तरह से संघर्ष किया जाए. घर पर बैठने की बजाय मैंने औडीशन देना शुरू कर दिया था. मेरा मानना है कि आप अच्छे कलाकार हों या बुरे कलाकार हों, पर अपने अंदर के कलाकार को हमेशा बचाकर रखना जरूरी है. मैंने अपने अभिनय को तराशने के लिए औडीशन देना शुरू किया था.मुझे पहले औडीशन से ही अच्छे रिस्पांस मिलने लगे थे. मैंने सबसे पहले टीवी सीरियल क्रिकेट पर आधारित ‘‘जर्सी नंबर 10’’के लिए औडीशन दिया था. उस वक्त मैं काफी छोटा भी था, मैच्योर नहीं था.पर मुझे इस सीरियल में अभिनय करने का मौका मिल गया.मैंने दो वर्ष पहले ही क्रिकेट खेलना बंद किया था,इसलिए मेरे लिए इसमें अभिनय करना ज्यादा आसान हो गया.

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वैसे पहले मेरे मन में हिचक हुई कि मैं यह सीरियल करूं या ना करूं. पर कुछ लोगों ने सलाह दी कि,‘अभी तू बच्चा लग रहा है और तेरे जैसे को फिल्म में काम मिलना आसान नही है. तू पहले सीरियल कर ले,मैच्योरिटी आ जाएगी,फिर फिल्म करना.’उसके बाद मैंने सीरियल में अभिनय किया.लोगों ने बहुत सराहा और मुझे दूसरा सीरियल भी मिल गया.लेकिन 2-3 सीरियल करने के बाद मुझे चार साल का ब्रेक लेना पड़ा.

यानी कि आप मानते हैं कि कलाकार को हमेशा कुछ न कुछ नया सीखते रहना चाहिए. प्रैक्टिस करते रहना चाहिए?

जी हां! किसी भी कलाकार को कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि उन्हें सब कुछ आता है.जितने भी बड़े व सफल कलाकार हैं,उनकी सोच यही है कि अभी बहुत कुछ सीखना है. मेरी राय में जितने भी अच्छे कलाकार हैं,वह कभी नहीं सोचते कि उन्हें सब कुछ आता है.हर अच्छा कलाकार सदैव ओवर कौन्फीडेंस से खुद को बचाकर रखता हैं.

चार साल के बाद वापसी करने पर संघर्ष करना पड़ा?

-चार साल बाद जब मैंने फिर से अभिनय में वापसी की,तो मैं सब कुछ भूल चुका था कि मैंने पहले क्या किया है.क्योंकि मुझे इस बात का अहसास है कि बौलीवुड में नजरों से ओझल होते ही आपको गायब मान लिया जाता है.इसलिए मैंने एकदम नई शुरूआत मानकर संघर्ष षुरू किया. यहां हर 6 माह में लोग बदल जाते हैं. लोगों की पोजिशन बदल जाती है. तो मैंने पुनः औडीशन देना शुरू किया. दूसरी बात चार साल पहले जो मैंने काम किया था,उसमें मैं स्टार बना नही था.इसलिए भी लोगों को याद नही था.खैर,धीरे धीरे काम मिलता रहा.मेरे अभिनय की गाड़ी दौड़ रही है.

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वेब सीरीज‘‘थिंकिस्तान’’कैसे मिली?

-मैंने एक फिल्म के लिए औडीशन दिया था. कास्टिंग डायरेक्टर ने मुझसे कहा कि मैं फिलहाल कोई सीरियल या फिल्म ना करूं. क्योंकि इस फिल्म के लिए मेरा चयन लगभग तय है. फिलहाल मैं तीसरे नंबर पर था. निर्देशक को तीनों में से किसी एक को लेना था. फिल्म बड़ी थी. निर्देशक बड़ा था तो मैंने चार माहे तक इंतजार किया. अचानक एक दिन उसी कास्टिंग डायरेक्टर ने मुझे फोन कर वेब सीरीज करने के लिए कहा. इसके निर्देशक से मेरी मुलाकात हुई. मुझे काफी सुलझे हुए निर्देशक लगे. निर्देशक को मेरा औडीशन पसंद आ गया. उनके अनुसार मैं इस वेबसीरीजके किरदार के लिए फिट था. पर मैं दुविधा में था कि वेबसीरीज करूं या फिल्म के लिए इंतजार करूं. कास्टिंग डायरेक्टर की सलाह पर मैंने कर ली.उसने कहा कि ‘‘थिंकिस्तान’’ मिलेगी या नहीं, यह दावा फिलहाल नही किया जा सकता.

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वेब सीरीज ‘‘थिंकिस्तान’’है क्या?

-जैसा कि आपने नाम देखा, इसका आधा नाम अंग्रेजी भाषा और आधा हिंदी में है. यदि मैं इसकी रूह की बात करूं, तो यह दो दोस्तों की कहानी है. एक मुंबई के चेम्बूर इलाके में पला बढ़ा है और दूसरा भोपाल में पला बढ़ा है. दोनों विज्ञापन जगत से जुड़ते हैं. दोनों के बीच गहरी दोस्ती और उनके एक साथ ग्रो करने कहानी है. दो दोस्तों के प्यार की कहानी है. इसी के साथ दोनों की अपनी अपनी निजी समस्याएं हैं. पर दोनों अलग अलग भाषाओं में माहिर हैं, जिसके चलते किसके करियर की गति क्या होती है, वह सब इसका हिस्सा है. इन दोनों की ताकत दोनों का इंटेलीजेंस पावर एक जैसा है. दोनों की काबीलियत भी एक समान है. पर हमारे देश में हिंदी व अंग्रेजी भाषा को लेकर जो भेदभाव है, उसके चलते जो कुछ होता है, वह इसका मुख्य मुद्दा है. यह दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश में आम धरणा यह है कि यह हिंदी भाषी है,तो इसमें काबीलियत नहीं है. अंग्रेजी बोलने वालों को यहां टैलेंटेड मान लिया जाता है.

इस वेब सीरीज में भोपाल से आया हुआ अमित श्रीवास्तव नामक लड़का हिंदी भाषी और मुंबई वाला लड़का हेमा अंग्रेजी भाषी है, पर यह दोनों कैसे दोस्त बनते हैं, इनके बीच कैसे एक समझ विकसित होती है, उसकी कहानी है. फिर अपनी अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए यह दोनों अपनी दोस्ती को संभालते हैं या नहीं, यह सब इस वेब सीरीज का मुद्दा है. इसमें अंग्रेजी भाषी लड़के की जद्दोजेहाद अलग है, जबकि हिंदी भाषी लड़के का संघर्ष अलग है. अंग्रेजी भाषी लड़के को ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ता. लड़कियां भी उसकी तरफ आकर्षित होती हैं. इसलिए उसकी प्रगति ज्यादा तेज होती है. यह पहला सीजन है, जिसमें 11 एपीसोड प्रसारित होंगे. उसके बाद इसका दूसरा सीजन आएगा.

एड वल्र्ड में भाषा को लेकर जो भेदभाव है,उसकी बात इसमें है?

सिर्फ विज्ञापन जगत ही नहीं आम जीवन में भी आप भाषा का विभाजन महसूस करते होंगे. हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में अंगे्रजी और हिंदी के प्रति जो भेदभाव है, वह झेलते रहते हैं. हिंदी की बजाय अंग्रेजी भाषी को जल्दी स्वीकार कर लिया जाता है.

भाषा का मुद्दा कही न कही पोलीटिकल इश्यू भी हो गया है. क्या इसमें उस पोलीटिक्स की भी बात की गयी है?

जी नहीं..यह वेब सीरीज इस बारे में बात करती है कि भाषा के चलते किस तरह एक इंसान के हूनर की पहचान नहीं होती है.उसकी वजह से दोस्ती पर जो असर पड़ता है, उसकी बात की गयी है.

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इस किरदार को निभाते हुए आपको अपनी जिंदगी का कोई घटनाक्रम याद आया?

कई घटनाक्रम याद आए.मेरी भी अंग्रेजी बहुत अच्छी नही है. दक्षिण मुंबई में अंग्रेजी का एक अलग माहौल है,तो मुझे भी खुद को उस कल्चर में ढालने में वक्त लगा.कई उतार चढ़ाव देखने पडे़. मैं खुद इस वेब सीरीज की कहानी के साथ रिलेट करता हूं. मेरा मानना है कि मुंबई पूरा हिंदुस्तान नही है.

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इसके बाद क्या कर रहें हैं?

दो फिल्मों की बात चल रही है. एक हिंदी है,दूसरी दक्षिण भारत की. पर अभी से इनको लेकर कोई बात नही कर सकता.

भविष्य की क्या योजना है?

मैंने योजनाएं बनाना बंद कर दिया है.मेरे पास जो अच्छे औफर आएंगे, वह करूंगा.जब मेरे पास कोई औफर आएगा,उस वक्त मुझे जो अच्छा लगेगा,कर लूंगा.जब पेट भरा होता है,तो हम रूह के लिए काम करते हैं.जब पेट खाली हो तो पहले पेट को भरने के बारे में सोचते हैं.

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