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राहुल गांधी का राजनीतिक दांव, इस्तीफा !

सत्रहवीं लोकसभा समर में,  सत्ता की चाहत के साथ 19 माह से राहुल गांधी बड़ी बेताबी से प्रयासशील थे. यह सच है कि राहुल गांधी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं जिस कांग्रेस का प्राचीन और 134 साल का समृद्ध इतिहास है. और जिस पर महात्मा गांधी का सर्वाधिक प्रभाव और छाया है. महात्मा जी साध्य और साधन के शुचिता की बात करते थे और जीवन में उसे उतारा भी,  इस एक मात्र सूत्र का मर्म अगर राहुल गांधी समझते तो कांग्रेस का उद्धार हो जाता. आज यह हालात नही होते.

मगर ऐसा प्रतीत होता है राहुल गांधी स्वयं और हर एक कांग्रेस मैन यह मानता है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जैसे, इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा मानी जाती थी “राहुल ही कांग्रेस हैं, कांग्रेस का मतलब ही सिर्फ राहुल है ! ”

मगर ऐसा है नहीं, यह 17 वीं लोकसभा चुनाव परिणाम से आईने की भांति स्पष्ट हो गया है. अब हताश निराश राहुल गांधी ने इस्तीफा देने की पेशकश की है यह मामला देश दुनिया में चर्चा का बयास बना हुआ है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की इस “नौटंकी” को कांग्रेस और देश हित में आपको समझना होगा. दरअसल कांग्रेस आजकल यह मानकर चलती है कि वह गांधी परिवार के बगैर शून्य है और सत्ता का स्वर्ग प्राप्त नहीं कर सकती. और चाहती है उसके नेता गांधी परिवार की कोई विभूती हो, मगर अब वह जादुई नेतृत्व, व्यक्तित्व कांग्रेस के पास नहीं है. परिणाम स्वरूप कांग्रेस ‘रूग्ढ’ हो चली है, यह बूढी कांग्रेस अब धीरे-धीरे चल रही है, ठिठक रही है, गिर रही है. और इसे भरपूर  औक्सीजन चाहिए .

दूसरी तरफ “कांग्रेस” को राहुल गांधी और उनका परिवार अपने  पंजे से मुक्त  नहीं करना चाहता. राहुल गांधी का इस्तीफा, एक माह का समय और एक माह से कांग्रेस की निरंतर समीक्षा, प्रदेश अध्यक्षों पर बिजली का गिरना. यह संकेत देता है कि राहुल गांधी व श्रीमती सोनिया गांधी भरे मन से राजनीतिक परिदृश्य से बाहर  जा रहे हैं. यह नियति हो गई है. हालांकि चाहत नहीं है. आइए, कांग्रेस की इस नियति और आगामी राष्ट्रीय अध्यक्ष की खोज के मायने का विश्लेक्षण करें .

 क्या कांग्रेस एक पिट्ठू चाहती है !

आप वैष्णो देवी दर्शनार्थ कभी जाते हो तो  देखेंगे, आपको  पिट्ठू मिलते हैं वहां. यह शब्द सुनकर प्रतीत होता है जैसे घोड़े होते है, वैसे पिट्ठू होते होंगे. मगर ऐसा नहीं है. एक व्यक्ति होता है जो आपको अपनी पीठ पर बिठाकर के मां वैष्णो देवी का दर्शन कराने पैदल चल पड़ता है यह दृश्य देख हृदय काप जाता है. आदमी पर सवार आदमी.

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अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सर्वमान्य नेता कांग्रेस के असीम औक्सीजन के स्रोत माने जाने वाले राहुल गांधी, श्रीमती सोनिया गांधी को भी आज कांग्रेस के लिए स्वयं के लिए एक पिट्ठू की आवश्यकता जान  पड़ती है. जो उन्हें अपने कंधे पर पीठ पर बिठा कर के सत्ता- सुंदरी के दर्शन करा दे.

राहुल गांधी ने 23 मई 2019 के परिणामों के पश्चात बैठक की और पार्टी नेताओं के समक्ष त्यागपत्र की घोषणा कर दी. जैसा कि होता है कांग्रेस की चिरपरिचित ‘कोटरी’ जिसका धंधा कांग्रेस की छत्रछाया में चल रहा है, वह नहीं चाहती. भले दिखावे के लिए ही सही वह गिड़गिड़ा कर कहती है, नहीं नहीं नहीं! आप इस्तीफा मत दीजिए.

कांग्रेस तो रसातल में चली जाएगी. देश का क्या होगा ? नरेंद्र मोदी एंड कंपनी तो यही चाहती है… ऐसे लाखों तर्क देकर, राहुल गांधी के मुंह से 1 माह का समय ले लिया जाता है.

अब राहुल गांधी, एक माह चिंतन करते हैं, उनका स्यापा कमजोर पड़ने लगता है. गम गलत होता है, तो आदमी दु:ख भूल जाता है और फिर घर परिवार की सार संभाल लेने लगता है. अब जो कांग्रेस में नाटक चल रहा है, वह यही सब नौटंकी है… देखिए कैसे राहुल और उनके अंध समर्थक कांग्रेस को राहुल मुक्त करने का छलावा दिखा कांग्रेस को उनकी कांख में दाब रखने की रणनीति बना रहे हैं.

 राहुल की कलम से

अब कांग्रेस के सुप्रीम लीडर राहुल गांधी वही सब करेंगे जो श्रीमती सोनिया गांधी ने किया था. सोनिया गांधी जब लंबे समय तक कांग्रेस का नेतृत्व कर अस्वास्थ हो चली, तो उन्होंने अपने युवा पुत्र राहुल को पहले उपाध्यक्ष बनाया फिर अध्यक्ष बना दिया. कांग्रेस पार्टी में खूब तालियां बजी और मान लिया गया कि अब नये खून के उबाल से सत्ता पर हम काबिज हो जाएंगे. सत्ता सिहांसन अब दूर नहीं है.

दरअसल यहां भी कोई लोकतांत्रिक पद्धति का पालन नहीं हुआ. चुनाव तो दूर की बात है . वंशवाद का यह ऐसा नायाब नमूना है जिसे मैडम तुसाद  के अजायबघर में जगह मिलनी चाहिए. राहुल गांधी अब यह समझ गए हैं कि कांग्रेस को सिरे से छोड़ देना उनके लिए घातक होगा. इसलिए अब अपना उत्तराधिकारी खोज रहे हैं और नि:संदेह इसमें उनकी माता जी श्रीमती सोनिया गांधी की बेहतरीन सलाह उन्हें मिल रही है. आखिर राहुल गांधी अध्यक्ष पद छोड़ना चाहने के बाद भी अध्यक्ष पद का मोह क्यों नहीं छोड़ पा रहे हैं. क्यों चाहते हैं कि कोई रबड़ स्टांप, जो देश की एक गौरवशाली राष्ट्रीय पार्टी को चलाएं.

 चुनाव करा दो सारा टंटा खत्म !

राहुल गांधी के इस्तीफे और कांग्रेस की दारुण स्थिति पर छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार जसराज जैन तल्ख टिप्पणी करते हुए कहते हैं- “अगरचे कांग्रेस को प्राणवायु से स्तंभित रखना है तो नीचे से ऊपर तक अर्थात ब्लौक, जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक चुनाव कराने होंगे.”

हम देखें तो श्रीमती सोनिया गांधी ने कांग्रेस को मरणासन्न करने की भूल की हैं. उन्होंने कांग्रेस का संविधान बदलकर दो वर्षों में होने वाले चुनाव को  पांच वर्षों में कराने का नियम बनाया, ताकि वे निष्कंटक अध्यक्ष बनी रहे. हर दो वर्षों का लफड़ा-टंटा खत्म हुआ.

मगर जब किसी तालाब का पानी रुक जाता है तो वहां संडाघ पैदा हो जाती है. कांग्रेस में भी यही हुआ है. नीचे से ऊपर तक अपने चहेतों को लेकर पार्टी संगठन चल रहा है परिणाम स्वरूप यह एक धंधा बन गया है. राजे रजवाड़े और जमीदारी जैसा. यह चेहरे धीरे-धीरे पार्टी के लिए जहर बनते जा रहे हैं. अगर चुनाव हो तो सच्चे मन से कर्मठ और समर्पित कांग्रेसमैन सामने आ सकते हैं और इससे कांग्रेस को ऊर्जा मिलेगी.

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फिर रिमोट कंट्रोल

दरअसल जैसा माहौल बन रहा है. उससे स्पष्ट है कि राहुल गांधी और उनका परिवार यह कतई नहीं चाहते कि कोई उनके संरक्षण, सरपरस्ती के बगैर कांग्रेस की कमान बागडोर संभाले. राहुल गांधी इस्तीफा तो देना चाहते हैं मगर चाहते हैं अध्यक्ष उनकी रिमोट से चले और इसी कारण एक- डेढ़ माह से इंटरव्यू का खेल चल रहा है.

यूपीए वन और टू की डा. मनमोहन सिंह सरकार को सोनिया गांधी की रिमोट की सरकार कहा जाता है, यह इतिहास में दर्ज हो गया है. और सेल्यूलाइड पर  “एक्सीडेंटल प्रधानमंत्री” अदद मूवी मनमोहन सिंह पर संजय बारू की किताब पर आधारित देश देख चुका है.

रिमोट कंट्रोल बुरा नहीं, मगर यह किसी परिवार का नहीं राष्ट्रहित का होना चाहिए. विकास और प्रगति का होना चाहिए. कांग्रेस अध्यक्ष की निष्ठा कांग्रेस के प्रति होनी चाहिए न कि राहुल और सोनिया गांधी के प्रति. अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस का क्षरण तय है और राहुल और सोनिया गांधी जैसा चाहते हैं वह भी शायद उन्हें नहीं मिलेगा. क्योंकि देश की जनता आपको देख रही है, समझ रही है अब देश की आवाम अपढ और गद्दापच्चीसी में नहीं जी रही है भाई.

राहुल सोनिया की चाहत

संभवत राहुल, सोनिया गांधी चाहते हैं ऐसा शख्स कांग्रेस अध्यक्ष बने जो उनके प्रति पूर्ण समर्पित हो, उनके चरण पादुका लेकर  कांग्रेस का राज काज संभाले, क्योंकि कल जब राहुल, सोनिया, प्रियंका चाहे तो भरत की तरह सम्मान उन्हें कांग्रेस का राजपाट सौप दे.

अब कांग्रेस को नया जीवन देने का कार्य अंजाम दिया जा रहा है, और इसके लिए गांधी परिवार के प्रति अंधनिष्ठा को सर्वोपरि गुण मानकर चयन प्रक्रिया जारी है. इसमें अशोक गहलोत के बाद अब पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे का नाम सबसे ऊपर है. यह माना जा रहा है की शिंदे पूर्णरूप से श्रीमती सोनिया गांधी के निष्ठावान कार्यकर्ता हैं .

अभी परिक्षण जारी है. कांग्रेस का भविष्य तय होने जा रहा है. मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास स्वयं को कभी-कभी दोहराता है अगर शिंदे,  सीताराम केसरी सिद्ध नहीं हुए तो कांग्रेस को प्राणवायु देने के लिए समर्थ हाथों की जरूरत है. जो कांग्रेस का वजन थाम सके और उसे मंजिल तक पहुंचाए.

बुरी संगत

आज निवेदिता को यह बात समझ में आ गई कि दोस्ती हमेशा अच्छे लोगों से ही करनी चाहिए. आज अपने एक दोस्त के चलते वह मारीमारी फिर रही है. पुलिस उस के पीछे पड़ी है और कभी भी पकड़े जाने का डर है. एक बार पुलिस के हत्थे चढ़ जाने के बाद फिर कितनी परेशानी होगी, यह सोच कर उस का दिल बैठा जा रहा है.

जाधव ने डाक्टर बत्रा से एक करोड़ रुपए की रकम मांगी थी. रकम न देने पर उस ने डाक्टर के उस वीडियो को वायरल करने की धमकी दी थी, जिस में उस की प्रेमिका के साथ उस के रोमांटिक पल गुप्त तरीके से फिल्माए गए थे. सब से बड़ी बात यह थी कि यह फिल्म खुद निवेदिता ने बनाई थी.

एक दिन डाक्टर बत्रा ने किसी बात पर निवेदिता को बुरी तरह डांटा था और उस की नजर में उसे बगैर किसी गलती के डांटा गया था.

निवेदिता ने उस समय डाक्टर को कुछ नहीं कहा था, पर उसी समय उस ने फैसला कर लिया था कि वह डाक्टर को आगे से कभी ऐसा करने का मौका नहीं देगी.

निवेदिता को पता था कि डाक्टर बत्रा से मिलने एक औरत आती है. डाक्टर उस के साथ घंटों एकांत में बिताता है. उस के आने पर कई बार वह मरीजों को काफी देर तक इंतजार करवाता है.

नर्स होने के नाते निवेदिता का डाक्टर के केबिन तक प्रवेश था और कई बार उस ने डाक्टर को उस औरत के साथ ऐसी हालत में देखा था, जिस से जाहिर था कि उन दोनों के बीच कुछ है.

डाक्टर बत्रा की डांट से आहत निवेदिता ने उसे सबक सिखाने के लिए अपने मोबाइल फोन से डाक्टर बत्रा की उस औरत के साथ का वीडियो बना लिया था. चूंकि वह काफी दिनों से डाक्टर के क्लिनिक में काम करती थी, इसलिए उस के लिए यह काम मुश्किल न था. उस ने एक खिड़की से दोनों के प्यार के पलों का वीडियो बना लिया था.

डाक्टर बत्रा मस्ती के सागर में गोते लगा रहा था और उसे इस बात की भनक भी न लगी. निवेदिता ने सोच रखा था कि अगली बार अगर डाक्टर उसे कुछ कहेगा तो वह वीडियो क्लिप दिखला कर उसे धमकाएगी.

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पर बाद में न कभी डाक्टर बत्रा ने ऐसा कुछ उस के साथ किया और न ही उसे डाक्टर को धमकी देने की जरूरत पड़ी. बात आईगई हो गई, बल्कि वह तो इस बात को भूल सी गई थी. लेकिन जिस क्लिप को उस ने डाक्टर को फंसाने के लिए बनाया था, उस में डाक्टर तो फंसा ही, वह खुद भी फंस गई.

हुआ यों कि निवेदिता का एक जानने वाला जाधव उस के पास अकसर आताजाता रहता था. वह घर पर ही आसपास के लोगों का हलकाफुलका इलाज किया करती थी. छोटोमोटी बीमारियों में जाधव उसी से दवा लिया करता था. धीरेधीरे दोनों की जानपहचान बढ़ गई थी.

जाधव के बारे में निवेदिता जानती थी कि वह गुंडा किस्म का आदमी है, चोरीचकारी भी करता है, पर उस से उस का रिश्ता ठीक ही था. उस के साथ उस का बरताव कभी ऐसा नहीं था, जिस से उसे एतराज होता. वह आता, इलाज करवाता और चला जाता. लेकिन थोड़ी नजदीकियां तो बढ़ ही गई थीं.

एक दिन निवेदिता किसी मरीज को देख रही थी, तभी जाधव आया था. उसे किसी के लिए दवा चाहिए थी.

निवेदिता दूसरे मरीज से बात कर रही थी, तभी जाधव उस के मोबाइल फोन से खेलने लगा. इसी बीच डाक्टर बत्रा की क्लिप पर उस की नजर पड़ गई और उस ने उस क्लिप को अपने मोबाइल फोन में ट्रांसफर कर लिया.

आज अखबार से निवेदिता को मालूम हुआ कि उस क्लिप को दिखला कर जाधव डाक्टर बत्रा से पहले भी

एक बार 30 लाख रुपए और एक बार 70 लाख रुपए ले चुका था.

डाक्टर ने अपनी इज्जत बचाने की खातिर भारीभरकम रकम उसे दे दी

थी. इतनी बड़ी रकम पा कर जाधव का लालच बढ़ता चला गया और इस बार उस ने एक करोड़ रुपए की मांग की और डाक्टर ने इस बार पुलिस की शरण ली.

पुलिस ने टैलीफोन की बातचीत के आधार पर जाधव को पकड़ लिया था और जाधव ने अपने मोबाइल फोन में क्लिप पाने की बात बताई थी.

पुलिस निवेदिता की तलाश में थी. आज नौकरी देने वाले अपने ही डाक्टर को नुकसान पहुंचाने के इरादे और बुरी संगत के फेर में उसे मारामारा फिरना पड़ रहा है.

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समर रेसिपी: मैंगो लस्सी

मैंगो लस्सी दही औप आम को मिलाकर बनाई जाती  है और आप भी गरमी के मौसम में  मैंगो लस्सी का मजा ले सकते हैं.

सामग्री

दही (125 ग्राम)

बर्फ का पानी (200 मिली.)

क्यूबस (8 बर्फ)

आम (1)

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चीनी (1 टेबल स्पून)

सूखा पुदीना (एक चुटकी)

 बनाने की वि​धि

  • एक ब्लेंडर में सारी सामग्री को डालकर अच्छे से फेंट लें.
  • इसे ठंडा सर्व करें.

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जानें, क्यों परेशान है सैंडविच जेनरेशन?

प्रभा हर शाम छह बजे जब औफिस से घर के लिए निकलती है, तो उसकी घबराहट और बेचैनी बढ़ जाती है. दिन भर औफिस के काम में थकने के बाद उसे अब दूसरी ड्यूटी जो निभानी है. वक्त जैसे पंख पसार कर उड़ने लगता है. रास्ते का ट्रेफिक, वाहनों का शोर-धुंआ, औटोवाले से किराये की झिक-झिक और घर पहुंचने की जल्दी में उसके हाथ-पैर फूले रहते हैं. घर पहुंचने से पहले उसे पास के मार्केट से सब्जी-भाजी और जरूरत की दूसरी चीजें भी खरीदनी होती हैं. घर में घुसते ही सास-ससुर की फरमाइशें, बच्चों की जिद सब उसे ही पूरी करनी है. खाना बनाने किचेन में घुसती है तो दस तरह के ख्याल रखने पड़ते हैं. सास के मुंह में दांत नहीं हैं तो उनको पतली रोटी के साथ दाल चाहिए तो ससुर को कब्ज की शिकायत रहती है, इसलिए उनके लिए अलग से खिचड़ी या पुडिंग बनानी है. बच्चे हमेशा कुछ चटपटा खाने को मचलते हैं तो पति को नौनवेज का शौक है. हर दूसरे दिन खाने में कुछ न कुछ नौनवेज तो होना ही चाहिए. साथ में चटनी और सलाद भी. सबकी फरमाइशें पूरी करते-करते प्रभा खीजने लगती है. उसे लगता है कि उसकी अपनी कोई ख्वाहिश, कोई चाह ही नहीं बची है, वह तो बस दो जेनरेशन के बीच सैंडविच बन कर रह गयी है. कभी-कभी यह दोहरी जिम्मेदारी प्रभा को बोझ लगने लगती है. उसका दिल चाहता है कि सबकुछ छोड़कर चुपचाप कहीं चली जाए. कहीं एकान्त में कुछ दिन शान्ति से बिता आये. मगर ऐसा करना भी सम्भव नहीं. जिम्मेदारियों से दामन छुड़ा कर कहां भाग जाए?

दरअसल पैंतीस-चालीस साल की प्रभा की पीढ़ी सैंडविच जेनरेशन कहलाती है, जो साठ साल से ऊपर के अपने बुजुर्गों और सोलह साल से कम के अपने बच्चों के बीच पिस रही है. जो कई-कई जिम्मेदारियों को एकसाथ निभा रही है. आमतौर पर अगर आप किसी से पूछें कि उसे अपने माता-पिता का ख्याल रखना कैसा लगता है, तो उसका जवाब होगा – बहुत अच्छा लगता है, मुझे मां-बाप की सेवा करके खुशी मिलती है, उनकी देखभाल करना तो मेरा फर्ज है, उन्होंने भी बचपन में मेरा ख्याल रखा, वगैरह, वगैरह. लेकिन बुजुर्गों के लिए काम करने वाली एक स्वयं सेवी संस्था के हालिया सर्वे के मुताबिक 29  प्रतिशत लोगों को अपने घर के बुजुर्ग बोझ की तरह लगते हैं. 15 प्रतिशत लोगों को तो बुजुर्ग इतना बड़ा बोझ लगते हैं कि वे उन्हें स्वयं घर से बाहर निकाल देते हैं. यही वजह है कि वृद्धाश्रमों में बूढ़ों की संख्या लगातार बढ़ रही है. ‘टियर वन’ और ‘टियर टू’ वाले 20 शहरों में एनजीओ ने यह सर्वे किया और तीस से पचास आयुवर्ग के लोगों से विस्तृत बातचीत के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि करीब पच्चीस फीसदी बुजुर्ग दुर्व्यवहार और अपमान के शिकार हैं. बेटे-बेटियां और नाती-पोते होने के बावजूद वे खुद को बहुत तनावग्रस्त, दुखी और एकाकी पाते हैं.

दरअसल वह जेनेरेशन जो तीस से पचास की उम्र के बीच है, जो अपने बच्चों और माता-पिता दोनों का ख्याल एकसाथ रख रही है, वह अपनी नौकरी-करियर, बच्चों और माता-पिता की जिम्मेदारियों के बीच हर वक्त संतुलन बनाने की कोशिश करती रहती है. कभी-कभी वह इसमें सफल नहीं हो पाती है. ऐसे में खुद को फंसा हुआ पाने पर वह चिड़चिड़ाहट और खीज से भर उठती है. यह खीज घर के सदस्यों पर गुस्से के रूप में प्रकट होता है. आमतौर पर गुस्सा माता-पिता पर ही निकलता है. पहले के वक्त में पुरुष कमाने के लिए बाहर जाता था, तो उसकी पत्नी घर संभालती थी. तब स्त्री के पास काफी वक्त होता था. वह घर के हर सदस्य के इच्छानुसार खाना भी तैयार कर लेती थी, और सबकी देखभाल भी ठीक से कर लेती थी. उसका पति शाम को घर लौटता तो खुद को खुश और हल्का महसूस करता था क्योंकि उसकी पत्नी घर के सभी सदस्यों का ख्याल ठीक से रखती थी. मगर आज जब पति-पत्नी दोनों नौकरीपेशा हो गये हैं तो अब दोनों के पास वक्त की कमी है. वहीं, घर की जिम्मेदारियां दोनों के बीच बराबर बंटने की जगह सिर्फ स्त्री के हिस्से में ही आ गयी हैं. खाना उसको ही बनाना है, घर की साफ-सफाई उसे ही करनी है, बाजार-हाट भी उसे ही करना है, बच्चों और बुजुर्गो की देखभाल भी उसके जिम्मे है, नाते-रिश्तेदारी भी उसे ही निभानी है, बच्चों के स्कूल में पेरेंट-टीचर मीटिंग हो तो उसे ही औफिस से छुट्टी लेकर अटेंड करना है, घर में कोई बीमार है तो डॉक्टर को दिखाने के लिए उसे ही जाना है, ऐसे में स्त्री का नाराज रहना, थकान से चूर रहना लाजिमी है और इसका असर नकारात्मक रूप से घर के दूसरे सदस्यों पर पड़ना है. उसके गुस्से का शिकार कभी बच्चे बनते हैं, तो कभी बुजुर्ग माता-पिता.

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दरअसल, सैंडविच जेनरेशन के समक्ष आज चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है. ज्वाइंट फैमिली में खाना बनाते वक्त ध्यान रखो कि जो खाना बड़ों के लिए बना है, उसे बच्चे नहीं खाएंगे, उनके लिए कुछ अलग से बनाओ. ऐसा अक्सर देखने को मिलता है कि बच्चे नित नयी फरमाइशें करते हैं, वहीं बुजुर्गों को उनकी सेहत के हिसाब से खाना देना होता है. एक बुजुर्ग व्यक्ति बच्चे के समान ही जिद्दी भी हो जाता है और इसलिए उसे अतिरिक्त देखभाल और प्यार की जरूरत होती है और सैंडविच जेनरेशन के लोगों के समक्ष ये सबसे बड़ा चैलेंज है. आप न तो नौकरी छोड़कर घर बैठ सकते हैं और न ही बच्चों और बुजुर्ग मां-बाप की अनदेखी कर सकते हैं. दोनों को आपके प्यार और साथ की जरूरत है. बुजुर्ग सोचते हैं कि जैसे हमने अपने बच्चों का ख्याल रखा वैसे ही बच्चे भी उनके बुढ़ापे की लाठी बनें. उनकी यह अपेक्षा इस जेनरेशन के लिए सिरदर्द बनी हुई है.

सैंडविच जेनरेशन के सामने अपनी प्राइवेसी को लेकर भी बड़ा चैलेंज होता है. ज्वाइंट फैमिली में आपको अपने लिए टाइम निकालना मुश्किल हो जाता है और न ही प्राइवेसी मिलती है. पति-पत्नी को साथ में वक्त बिताए महीनों हो जाते हैं. कहते हैं बात कर लेने से मन का बोझ हल्का हो जाता है, मगर जब वक्त ही न बचे तो बात भी कैसे करें? नतीजा, तनाव, चिड़चिड़ापन, खीज और गुस्सा, औफिस, बच्चे, बुजुर्ग और घर के काम उनके समय को बांट लेते हैं. ये सभी कारण मिलकर तनाव पैदा करते हैं और घर में मनमुटाव होता है.

सैंडविच जेनरेशन बच्चों और माता-पिता दोनों के साथ जेनरेशन गैप का सामना करती है. वे बच्चों और बुजुर्गों दोनों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाती है. इस वजह से उनके व्यवहार में रूखापन आ जाता है. सर्वे की मानें तो 42.5% लोग अपने बुजुर्ग को घर पर अकेला छोड़ देते हैं और 65% मेड के सहारे उन्हें छोड़कर जाते हैं. कई बार दोनों के बीच अच्छी तरह बैठकर बात भी नहीं हो पाती है. आंकड़े कहते हैं कि 25.7% लोग अपने घर के बुजुर्ग को लेकर गुस्सा और चिड़चिड़ापन महसूस करते हैं. सर्वे बताता है कि 62% बेटे, 26% बहुएं, 23% बेटियां अपने बुजर्गों को वित्तीय बोझ की तरह देखती हैं. औसतन एक परिवार अपने घर के बुजुर्ग पर 4,125 रुपये प्रतिमाह खर्च करता है. घर में रहने वाले सिर्फ 11 प्रतिशत बुजुर्ग ही कमाते हैं और अपने बेटे-बहू की मदद कर पाते हैं. बुढ़ापे की बीमारियां काफी खर्चीली होती हैं. अगर मेडिक्लेम या अन्य सेविंग्स नहीं हैं, तो यह वित्तीय बोझ सैंडविच जेनरेशन को बहुत भारी महसूस होता है. कुछ यही वजहें हैं कि आजकल वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. जिन्दगी के आखिरी दिन गिन रहे ये बुजुर्ग वहां हर पल अपने बच्चों और नाती-पोतों की याद में तड़पते रहते हैं. जिस घर की ईंट-ईंट उन्होंने अपने खून-पसीने की कमाई से जोड़ी, उस घर से निकाल दिया जाना उन्हें जीते-जी मार देता है. जिन बच्चों की परवरिश में उन्होंने अपनी जिन्दगी लगा दी, उनकी उपेक्षा सहन नहीं होती है.

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यह ठीक है कि आप खुद को दो पीढ़ियों के बीच फंसा महसूस करते हैं, आपके पास वक्त की कमी है, पैसे की कमी है और इन तमाम कमियों के बीच आप खुद को सैंडविच बना महसूस करते हैं, मगर जहां आप अपने बच्चों से प्यार करते हैं और उनकी हर ख्वाहिश को पूरा करने की कोशिश करते हैं, वहीं अपने बुजुर्गों की भावनाओं और जरूरतों को समझना भी जरूरी है. आखिर आप उन्हीं का अंश हैं. उन्हें खुद से दूर कैसे कर सकते हैं?

सैंडविच जेनरेशन अगर कुछ सावधानियां बरते और कुछ जरूरी बदलाव अपने जीवन में ले आये तो यह मुसीबत काफी हद तक कम हो सकती है. पहले के वक्त में समाज का ढांचा कुछ इस तरह बना था, जिसमें घर के लिए पैसा कमाने की जिम्मेदारी पुरुष पर थी और घर चलाने की जिम्मेदारी स्त्री पर. परन्तु आज जब स्त्री भी घर से बाहर निकल कर पुरुष के समान पैसा कमा रही है तो घर की जिम्मेदारियां भी दोनों के बीच बंटना जरूरी है, जो अभी तक नहीं बंटी हैं. लिहाजा घर की बहू पर दोहरी जिम्मेदारी आन पड़ी है और वह घर-बाहर दो-दो ड्यूटियां कर रही है. दोहरा बोझ उसे खीज और गुस्से से भर देता है, यही वजह है कि बेटे के साथ तो नहीं, लेकिन बहुओं के साथ सास-ससुर का झगड़ा ज्यादा होता है. बुजुर्गों को वृद्धाश्रम भेजने के पीछे बहुओं का हाथ ज्यादा होता है. ऐसे में समस्या की जड़ में झांकने की जरूरत है. बहू में ऐसे गुस्से और चिड़चिड़ेपन की वजह तलाशने और उसका समाधान करने की जरूरत है. आइये देखें वह कौन सी जिम्मेदारियां हैं, जिन्हें आपस में बांट कर सैंडविच जेनरेशन अपनी, अपने बच्चों की और अपने बुजुर्गों की जिन्दगी को खुशहाल बना सकती है –

  • किचेन का काम पति-पत्नी दोनों मिल कर करें. सब्जी काटना, बर्तन धोना, चाय बनाना, टेबल पर नाश्ता लगाना, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना यह सारे काम कोई भी पुरुष आसानी से कर सकता है. इन कामों में पत्नी की मदद करें तो उसका काफी वक्त बचेगा. घर के छोटे-छोटे कामों में पति की मदद मिल जाए तो पत्नी को खुशी भी होगाी और बच्चों और बूढ़ों के लिए अलग-अलग तरह का नाश्ता-खाना तैयार करने में उसको दिक्कत या खीज नहीं होगी.
  • जब पति-पत्नी दोनों नौकरी कर रहे हों तो घर में बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल के लिए एक सर्वेंट या मेड का रखना बहुत जरूरी है, जो घर की साफ-सफाई कर दे, बर्तन धो दे, बुजुर्गों के नहाने-धोने में मदद करे, कपड़े धोए और प्रेस कर दे, बाजार से सब्जी ले आये, शाम के लिए सब्जी काट कर रख दे, आटा गूंथ दे, घर के पौधों को पानी दे दे, बच्चों को ट्यूशन क्लास ले जाये, बुजुर्गों को आसपास घुमा लाए, आदि. पुरुषों को सोचना चाहिए कि जब घर की स्त्री भी घर की आमदनी में बढ़ोत्तरी के लिए पैसा कमा रही है तो फिर कंजूसी करके उसकी शारीरिक और मानसिक सेहत को दांव पर क्यों लगाया जाए? अगर घर के ये तमाम काम मेड या सर्वेंट कर देंगे तो शाम को ऑफिस से घर लौटने के बाद स्त्री के पास अपने सास-ससुर और बच्चों दोनों के लिए वक्त भी होगा और प्यार भी.
  • वीकेंड में पूरे परिवार के साथ कहीं घूमने जाएं. खाना बाहर ही खाएं. इससे आप आने वाले सप्ताह के लिए पूरी तरह फ्रेश हो जाएंगे. कभी-कभी माता-पिता को पास की रिश्तेदारी में भी छोड़ा जा सकता है, जहां एक-दो दिन बिताने के बाद वे भी खुद को फ्रेश महसूस करेंगे और आप दोनों को भी घर में थोड़ी प्राइवेसी मिल जाएगी.
  • अगर घर के बुजुर्गों की सेहत ठीक है और वे बाहर टहलने के लिए जाते हैं तो कुछ जिम्मेदारियां जैसे सब्जी-दूध वगैरह लाने की जिम्मेदारी उन पर भी डाली जा सकती है. वे बच्चों को ट्यूशन क्लास भी छोड़ने जा सकते हैं. इससे वे घर के काम में भी सहयोग करेंगे और बाहर अपने मित्रों से मिल कर खुशी भी महसूस करेंगे.
  • बच्चों को भी अपने दादा-दादी के साथ समय बिताने की आदत डलवाएं. इससे वे आप पर बोझ नहीं बनेंगे. बच्चे दादा-दादी के साथ ईवनिंग वॉक पर जा सकते हैं. उनके साथ बैठ कर अपना होमवर्क पूरा कर सकते हैं. उनके साथ कैरम, लूडो इत्यादि खेल कर अच्छा टाइम पास कर सकते हैं. बच्चों और बूढ़ों की आदतें लगभग एक जैसी होती हैं, ऐसे में दोनों एक साथ बैठ कर टीवी पर मनपसंद कार्यक्रम का लुत्फ उठा सकते हैं. किचेन गार्डन की साफ-सफाई कर सकते हैं, पौधों को पानी दे सकते हैं. इससे आपका काम कुछ हल्का हो जाएगा.
  • मुख्य बात यह है कि हर व्यक्ति को जवानी में ही अपने बुढ़ापे के लिए सेविंग्स कर लेनी चाहिए. बुढ़ापे में तमाम तरह के रोग शरीर को लग जाते हैं. मधुमेह, हार्ट डिजीज, कैंसर तो आज बहुत आम हैं. ये तमाम रोग बहुत खर्च करवाते हैं. ऐसे में यदि आपने मेडिक्लेम या अन्य सेविंग्स नहीं की हैं, तो आपकी बीमारी आपके बच्चों के ऊपर बहुत भारी पड़ेगी. इसलिए अपने बुढ़ापे के बारे में जवानी में ही सोच लीजिए, ताकि बुढ़ापे में ऐसी स्थिति न बने कि आपको अपने घर और बच्चों से दूर किसी वृद्धाश्रम में अपने जीवन की आखिरी सांसें लेनी पड़ें.

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मौर्निंग सिकनेस: इन 9 टिप्सों को आपनाकर ऐसे पाएं राहत

27वर्षीय अंजलि को प्रैगनैंट होते ही मौर्निंग सिकनैस की समस्या शुरू हो गई, लेकिन उस ने इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया, क्योंकि परिवार वालों ने कहा था कि यह आम बात है और 2-3 महीनों में यह समस्या ठीक हो जाती है. मगर अंजलि के साथ ऐसा नहीं हुआ. धीरेधीरे वह कमजोर होती गई. और फिर एक वक्त ऐसा आया कि चलनेफिरने में भी असमर्थ महसूस करने लगी.

परेशान हो कर जब डाक्टर के पास आई तो उन्होंने बताया कि वह डिहाइड्रेशन की शिकार हो चुकी है, जो इस अवस्था में बिलकुल ठीक नहीं है और किसी भी वक्त मिस कैरेज हो सकता है. अंजलि को हौस्पिटल में दाखिल कर आईवी के द्वारा पानी और दवा दी गई. 2-3 दिनों में वह स्वस्थ हो गई. बाद में एक हैल्दी बच्चे को जन्म दिया.

बीमारी नहीं है यह

असल में प्रैगनैंसी में मौर्निंग सिकनैस आम बात है. यह कोई बीमारी नहीं, क्योंकि इस दौरान महिलाएं कई हारमोनल बदलावों से गुजरती हैं. पहली तिमाही में मौर्निंग सिकनैस ज्यादा होती है. इस बारे में मुंबई की ‘वर्ल्ड औफ वूमन क्लीनिक’ की डाइरैक्टर और स्त्रीरोग विशेषज्ञा बंदिता सिन्हा बताती हैं कि गर्भावस्था में मौर्निंग सिकनैस को अच्छा माना जाता है, करीब 60 से 80% महिलाओं को यह होती है, लेकिन बारबार होने पर शरीर से अधिक मात्रा में पानी बाहर निकल जाता है, जिस से निर्जलीकरण हो जाता है और इस का प्रभाव बच्चे और मां दोनों पर पड़ने लगता है.

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कुछ महिलाओं को सवेरे ही नहीं, पूरा दिन यह समस्या होती रहती है. लेकिन यह अधिक और 3 महीने के बाद भी होती है, तो डाक्टर की सलाह लेना जरूरी होता है, क्योंकि हारमोनल बदलाव 4-5 महीने तक ही रहता है. इस के बाद शरीर इसे एडजस्ट कर लेता है.

बारबार उलटियां होने पर महिला थकान और कमजोरी महसूस करती है. इस से गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास पर असर पड़ता है. वह कुपोषण का शिकार हो सकता है, जिस से मिस कैरेज या समय से पहले डिलिवरी होने का डर रहता है.

गंभीर मौर्निंग सिकनैस को हाइपरमेसिस ग्रैविडेरम कहते हैं. इस का इलाज समय रहते करा लेना चाहिए ताकि बच्चा और मां दोनों स्वस्थ रहें. यह समस्या उन महिलाओं को अधिक होती है, जिन के जुड़वां या ट्रिप्लेट बच्चे होते हैं.

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ऐसे पाएं राहत

इन बातों का ध्यान रखने से मौर्निंग सिकनैस को काबू में किया जा सकता है:

  1. सुबह बिस्तर से उठते ही तुरंत ड्राई प्लेन बिस्कुट, ड्राई फ्रूट्स, सेब, इडली आदि का सेवन करें. बाद में कोई तरल पदार्थ या पानी पीएं.
  2. थोड़ी-थोड़ी देर बाद कुछ न कुछ खाती रहें.
  3. जिस फूड की गंध से उलटी आती हो उसे न खाएं.
  4. बाहर का खाना न खाएं, क्योंकि इस से अपच होने पर ऐसिडिटी की मात्रा बढ़ जाती है, जिस से उलटियां होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है.
  5. खाना अधिक गरम न खाएं. हमेशा हलका ठंडा भोजन करें.
  6. पानी, सूप, नारियल पानी, इलैक्ट्रोल पाउडर आदि का अधिक सेवन करें. फ्रूट जूस न लें, क्योंकि इस में कैमिकल होता है, जो कई बार नुकसानदायक साबित होता है.
  7. वजन अधिक होने पर उलटियां होने के चांस अधिक रहते हैं, इसलिए वजन को काबू में रखें.
  8.  जिन्हें माइग्रेन या ऐसिडिटी अधिक होती हो, उन्हें भी उलटियां अधिक हो सकती हैं.
  9. तनाव को दूर रखें और  पूरी नींद लें.

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घरेलू नुसखे भी अपना सकती हैं:

  • अदरक को नमक के साथ लेने पर काफी हद तक इस परेशानी को दूर किया जा सकता है.
  • पानी, नीबू और पुदीने के रस को मिला कर लेने से भी मौर्निंग सिकनैस दूर होती है.
  • इस के बाद भी अगर मौर्निंग सिकनैस की समस्या रहती है, तो तुरंत डाक्टर से मिलें.

मौनसून में घुंघराले बालों की ऐसे करें देखभाल

मौनसून में भीगना हर किसी को अच्छा लगता है. लेकिन इस मौसम में भीगने के साथ-साथ ख्याल रखना भी जरूरी होता है. क्योंकि इस मौसम में काफी सारी बीमारियां होने की भी संभावना रहती है. इसके साथ ही बालों को भी नुकसान पहुंचाती है. इसलिए मौनसून में सेहत के साथ-साथ बालों का भी ख्याल रखना जरूरी है. खासकर अगर आपके बाल घुंघराले हो तो, और ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. ते चलिए जानते हैं, आप घुंघराले बाल की कैसे देखभाल कर सकती हैं.

केला और औलिव औइल

कर्ली बालों के लिए औलिव औइल और केले का मास्क भी कारगर माना जाता है. केला बालों को स्मूद बनाता है और उन्हें मौइश्चराइज करता है वहीं औलिव औइल बालों को रूखा होने से बचाता है. एक केला छीलकर उसे मैश कर लें और फिर 2 ढक्कन औलिव औइल मिक्स करें. अब इसे बालों में अच्छी तरह से लगाएं. और 2-3 घंटे बाद शैंपू कर लें.

शहद और नींबू का मास्क

कर्ली बालों की सुरक्षा के लिए शहद और नींबू का मास्क भी परफेक्ट है. इसके लिए आधा कप शहद में 2 नींबू निचोड़कर मिला लें और फिर इस मिश्रण को बालों में जड़ों तक लगाएं. एक घंटे के लिए बालों को ऐसे ही छोड़ दें और फिर शैंपू कर लें.

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मौनसून में कर्ली बालों का ऐसे रखें ख्याल

1.बारिश में बाल भीगने से फंगल इन्फेक्शन होने का खतरा होता है. इससे बचने के लिए इस मौसम में एक अच्छा सा ऐंटी-माइक्रोबियल और हर्बल शैंपू का इस्तेमाल करें.

2.मौनसून के दौरान बालों में कम ही तेल लगाएं क्योंकि मौसम में पहले से ही नमी होती है और ऐसे में और तेल आपके बालों को और भी खराब बना सकता है.

3. इस मौसम में बाल हमेशा सूखे ही रहें. अगर बारिश में बाल गीले हो गए हैं तो सबसे पहले उन्हें अच्छी तरह सुखा लें और फिर साफ कंघी से बालों को सुलझाएं.

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अजब गजब: इग्लू जैसा होटल

इग्लू के बारे में आप ने जरूर पढ़ा होगा. इग्लू यानी बर्फ के घर. फिनलैंड के सारिसेलका में बने काकस्लौटेनन आर्टिक रिजौर्ट के कमरों को बिलकुल पारंपरिक इग्लू यानी बर्फ के घर की तरह बनाया गया है.

इस के कमरे और छत थर्मल ग्लास से बने हुए हैं. प्राकृतिक नजारों से घिरा यह अनोखा होटल पर्यटकों को ग्लास और लकड़ी के लग्जरी कमरे उपलब्ध कराता है, जो बर्फ के घर यानी इग्लू जैसे होते हैं.

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इस इलाके में कई ऐसे रिजौर्ट हैं जो दुनिया भर के पर्यटकों के बीच काफी मशहूर है. इस के अलावा यह रेनडियर सफारी, स्नो बौलिंग और स्कीइंग के लिए काफी मशहूर है. यहां इग्लू जैसे जो कमरे बने हैं. उन में पलंग की जगह बर्फ की सिल्ली का इस्तेमाल होता है, जिस पर लकड़ी का पटिया लगा होता है. इस क्षेत्र में फ्री वाईफाई और पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है, जिस वजह से दर्शक इस ओर आकर्षित होते हैं.

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ग्रेट फैमिली डिवाइडर

‘‘पता नहीं मैं ने क्या खोया और क्या पाया. कभीकभी तो लगता है कि मैं एक नर्क से निकल कर दूसरे नर्क में आ गई हूं,’’ 32 वर्षीया प्रियंका भोपाल की एक पौश कालोनी के एक फ्लैट में अकेली रहती हैं. 8 महीने पहले उन्होंने अपने पति से तलाक का मुकदमा जीता है. प्रियंका एक सरकारी विभाग में द्वितीय श्रेणी की राजपत्रित अधिकारी हैं और उन के पति भी एक सरकारी विभाग में उच्चाधिकारी हैं.

दार्शनिकों के अंदाज में प्रियंका बताती हैं, ‘‘कभीकभी ऐसा लगता है कि मुकदमा तो जीत गई हूं लेकिन जिंदगी हार गई हूं. मेरी हालत तो ‘अर्थ’ फिल्म की शबाना आजमी जैसी हो गई है जिसे उस की घरेलू नौकरानी यह सलाह देती रहती है कि बीबीजी, मर्द की ज्यादतियां बरदाश्त कर लेना बेहतर है बजाय इसके कि उसे छोड़ कर पूरी दुनिया की असहनीय ज्यादतियों से लड़ा जाए.’’

प्रियंका का पति सौरभ से शादी के 4 वर्षों बाद विवाद हुआ था. वजह थी सौरभ का मां के इशारे पर नाचना और उन के कहे पर चलना. प्रियंका बहुत ज्यादा संकुचित या पिछड़े विचारों की नहीं हैं. उन्हें पति की मातृभक्ति पर कोई खास एतराज नहीं था लेकिन बात बतंगड़ में तब बदली जब मां के कहने पर सौरभ ने उन्हें उपेक्षित और प्रताडि़त करना शुरू कर दिया.

‘‘वहां (ससुराल में) मुझे घुटन महसूस होने लगी थी क्योंकि हर काम सास की मरजी से होता था. यहां तक कि अपने बैडरूम के परदों के रंगों व डिजाइनों का चुनाव भी मैं अपनी मरजी से नहीं कर सकती थी,’’ प्रियंका रुक कर बताती हैं, ‘‘यह मेरे अधिकारों और इच्छाओं पर नाजायज अतिक्रमण था. इस पर मैं ने एतराज जताते अपना विरोध दर्ज कराना शुरू किया तो एवज में मुझे पहले डांट और फिर कुछ दफा मार भी मिली.’’

प्रियंका की मानें तो यह बात कहने सुनने में बहुत छोटी लगती और दिखती है लेकिन सवाल उस के अस्तित्व और इच्छाओं का भी था. बकौल प्रियंका, शुरू में उन्होंने एक समझदार पत्नी की तरह इस स्थिति से तालमेल बैठाए रखा. लेकिन हद तब हो गई जब मां के उकसाने पर सौरभ ने उन्हें पहली बार थप्पड़ मारा. तभी उन्होंने फैसला ले लिया था कि ऐसे पुरुष के साथ रह कर जिंदगी नर्क बनाने से बेहतर है कि तलाक ले कर अलग रहा जाए.

यह फैसला प्रियंका के लिए आसान नहीं था. जब उन्होंने इस से अपने बड़े भाई को अवगत कराया तो वे ससुराल आए. सौरभ और उस की मां से बात कर सुलह की कोशिश की. लेकिन कोई हल न निकला. सौरभ इस बात पर अड़ा रहा कि जब तक मां हैं, घर में फैसले उन्हीं के चलेंगे और प्रियंका को उन की हर बात, जायज हो या नाजायज, सिर झुका कर माननी पड़ेगी. नहीं तो, तलाक देने में उसे कोई एतराज नहीं.

उसी दिन फैसला हो गया था कि अब दोनों (दरअसल तीनों) का साथ रहना मुमकिन नहीं है. ऐसे में भाई उन्हें अपने घर यानी मायके ले आए जहां भाभी सहित 2 प्यारे भतीजे भी थे. भाई को उम्मीद थी कि कुछ दिन ससुराल से दूर रह कर वह बेहतर तरीके से सोच पाएंगी और सौरभ को भी उन की अहमियत समझ आएगी.

लेकिन सौरभ ने प्रियंका से कोई संपर्क नहीं किया और न ही प्रियंका ने पहल की. इस दौरान भाभी उन्हें दुनिया की ऊंचनीच समझाती रहीं कि ऐसी दिक्कतें तो हर घर में रहती हैं. जराजरा सी बात पर पति का यानी अपना घर छोड़ देना समझदारी की बात नहीं.

प्रियंका को जाने क्यों ऐसा लगा कि एक महीने में ही वह भाईभाभी पर बोझ बन गई हैं और भाभी उन्हें अपनी सहूलियत के लिए उसी नर्क में जाने की सलाह दे रही हैं. सो, उन्होंने अलग फ्लैट लेने का फैसला ले लिया. भाई ने, हालांकि, उन से कहा कि फ्लैट ले लो, यह हर्ज की बात नहीं, लेकिन यह घर भी तुम्हारा है.

‘‘एक औरत के 2 घर नहीं हो सकते,’’ प्रियंका बताती हैं, ‘‘और फिर कब तक उस घर में पड़ी रहती जो कभी मेरा मायका था. तमाम रिश्तेदार और जानपहचान वाले लोग आते थे और

मुझे देख कर भांप जाते थे कि कुछ गड़बड़ है.’’

बिल्डर से बात की, बैंक से लोन फाइनैंस कराया और फिर प्रियंका अलग रहने लगीं. इस दौरान भाईभाभी ने उन से नियमित संपर्क बनाए रखा. पैसों की कोई खास किल्लत नहीं थी. प्रियंका को तब 75 हजार रुपए के लगभग तनख्वाह मिलती थी और उन के बचत खाते में भी खासा अमाउंट था.

इस दौरान वे लगातार चिंतनमनन करती रहीं और आखिरकार इस निष्कर्ष पर पहुंचीं कि सौरभ ने उन्हें मामूली बात पर थप्पड़ मार कर अच्छा पति होने का नहीं, बल्कि एक क्रूर आदमी होने का परिचय दिया था. और जब पतिपत्नी के बीच किसी भी वजह से असहजता आ जाए और वे अपरिचितों की तरह रहने लगें तो साथ रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता. फिर एक दिन उन्होंने शहर के नामी वकील के जरिए सौरभ को तलाक का नोटिस भिजवा दिया. अतीत से हकीकत तक वह प्रियंका की जिंदगी का बेहद कठिन दिन था जब वे वकील के पास पहुंची थीं. वकील ने सारी बात ध्यान से सुनी और पेशेवर अंदाज में समझाया कि वे एक बार और सोच लें.

प्रियंका जैसी पत्नियां शायद ही कभी इस बात की वास्तविकता समझ पाएं कि हर कोई उन्हें ‘और सोच लो’ का मशवरा दे कर उन की परेशानी में इजाफा क्यों करता है. फिर भी वे अडिग रहीं. तो, वकील ने नोटिस तैयार करने के पहले उन्हें समझाया कि पति के थप्पड़ यानी क्रूरता का कुछ बढ़ाचढ़ा कर जिक्र करना होगा. तभी यह तलाक का आधार बन पाएगा.

वकील की निगाह में दिक्कत यह थी कि प्रियंका के पास इस बात के कोई पुख्ता सुबूत नहीं थे कि सौरभ उन के साथ हिंसा करता है. इस के बाद भी उस ने आश्वासन दिया कि वह तलाक करवा देगा और ऐसे कई मामलों में वह तलाक करवा चुका है.

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फीस तय हुई, पहले 50 हजार रुपए और प्रति पेशी 5 हजार रुपए. वकील ने बताया कि ज्यादा से ज्यादा एकडेढ़ साल में मुकदमा निबट जाएगा और इस में 3-4 तारीखें लगेंगी. उस के लाख समझाने पर भी प्रियंका यह झूठ बोलने को तैयार नहीं हुईं कि उन की सास भी मारापीटी करती हैं या ताने कसती हैं.

फीस की पहली किस्त का चैक मिलते ही वकील का चेहरा फूल सा खिल उठा. उस ने संक्षिप्त में प्रियंका को मुकदमे की प्रक्रिया समझाई कि पहले सौरभ को नोटिस जाएगा, जिस का जवाब वह देता है तो ठीक, वरना अदालत से उसे पहले समन और फिर वारंट जारी होंगे. चूंकि वह भी सरकारी अधिकारी है, इसलिए अदालत आने

में हीलाहवाली नहीं करेगा. अगर वह पहली ही पेशी में अपनी गलती स्वीकारते हुए तलाक के लिए राजी हो जाता है तो अदालत दोनों को सोचने का एक मियादी मौका देगी और फिर तलाक हो जाएगा.

सौरभ ने नोटिस लिया और उस का जवाब भी वकील के जरिए दिया जिसमें वह प्रियंका के लगाए आरोपों से साफसाफ मुकर गया था, उलटे, उस ने प्रियंका को ही झगड़ालू प्रवृत्ति का बता डाला.

इस झूठे जवाब पर प्रियंका सन्नाटे में आ गई. इस रात भी वे खूब रोईं और सोसाइटी की महिलाओं के साथ रोजाना की तरह शाम को टहलने नहीं गईं. रात का खाना जैसेतैसे गले उतार कर वे सोने गईं तो उन्हें शादी के बाद सौरभ के साथ नैनीताल में गुजारे हनीमून के दिन याद आने लगे. दोनों वहां के माल रोड पर हाथ में हाथ डाले एकदूसरे में खोए घूमते रहते थे और फिर रात को होटल में आ कर अभिसार में डूब जाते थे.

इस दौरान खूब लंबीलंबी बातें होती थीं. दोनों रिश्तेदारी, कालेज और दफ्तरों के संस्मरण साझा करते थे और आने वाली जिंदगी के सपने बुनते थे लेकिन हर बार सौरभ यह जरूर कहता था कि वह अपनी मां को बहुत चाहता है और उम्मीद है प्रियंका भी उन का मां जैसा ही सम्मान करते ध्यान रखेंगी.

खूबसूरत अतीत के हसीन लमहे कभी अदालत की चौखट तक भी पहुंचेंगे, यह प्रियंका ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. उन्हें सौरभ से कोई भी शिकायत नहीं थी सिवा इस के कि उस ने मां के उकसाने पर उन पर हाथ उठाया था और तब प्यारमोहब्बत के सारे कसमेवादे भूल गया था. उस ने यह भी नहीं सोचा कि प्रियंका पर क्या गुजरेगी.

पहली पेशी वाले दिन अदालत के रजिस्टर में दस्तखत करते हुए प्रियंका के हाथपैर ही नहीं, बल्कि वे खुद पूरी कांप रही थीं. रोना आ रहा था लेकिन अदालत में रो भी नहीं सकती थीं जहां अपने काम में मशगूल जज साहब थे, 2 क्लर्क थे, इजलास में आतेजाते वकील और कुछ मुवक्किल भी थे. वे सब के सब मशीन की तरह अपनेअपने काम में लगे थे. जैसेतैसे खुद को संभालते हुए प्रियंका ने हस्ताक्षर किए. प्रियंका की मनोदशा भांपते हुए वकील साहब ने बड़ी आत्मीयता से उन से अपने चैंबर में जाने का इशारा करते हुए कहा कि तारीख मिलते ही बता दूंगा.

अदालत ऐसी होती है, बाररूम ऐसा होता है और मुकदमे की काररवाई ऐसी होती है, इस का इल्म भी प्रियंका को नहीं था. वे तो चाहती थीं कि उसी दिन सौरभ को उन के सामने ला कर सवालजवाब किए जाएं और उसी दिन अदालत अपना फैसला सुना दे जिस से उन्हें छुटकारा मिले.

शाम को घर जा कर वे अकेले में फूटफूट कर रोईं. एक मन कर रहा था कि दौड़ कर सौरभ के पास चली जाएं और उसे बताएं कि उस की वजह से उन्हें किस दूसरी मानसिक यंत्रणा से गुजरना पड़ा है. क्या इसी दिन के लिए उस ने शादी की थी और जब मां के इशारे पर नाचना ही था तो उन की जिंदगी खराब करने की जरूरत क्या थी.

भाई पेशी पर नहीं आए थे, यह भी उन्हें अखर रहा था. ऐसा लग रहा था मानो वे दुनिया में ठीक वैसे ही अकेली रह गई हैं, जैसे मेले की भीड़ में कोई अबोध बच्चा गुम हो गया हो. और अपने मम्मीपापा को तलाश रहा हो. इस दिन उन्हें पापा की भी याद आई कि आज वे होते तो जरूर कुछ करते. सौरभ को समझाते उस की मां को समझाते और बात नहीं बनती तो अदालत में उन के साथ मजबूती से खड़े होते.

पर अकेलापन प्रियंका जैसी पत्नियों की नियति होती है. तलाक के मुकदमे की मानसिक, सामाजिक, आर्थिक और कानूनी प्रताड़ना उन्हें अकेले ही भुगतनी पड़ती है. यही उन की त्रासदी है जिस का कोई विकल्प नहीं है.

इस बात पर जरूर बहस करने की तमाम गुंजाइशें हैं कि उन की इस हालत का जिम्मेदार कौन होता है. जो समाज लोगों को सहारा देने के लिए बना है, वही समाज तलाक का मुकदमा लड़ रही औरतों के साथ वैसे क्यों नहीं खड़ा होता जैसे शादी के वक्त खड़ा होता है? अहम बात यह है कि तलाक की प्रक्रिया इतनी जटिल और लंबी क्यों है? वह शादी की तरह झटपट क्यों पूरी नहीं हो सकती है?

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कुछ कड़वे सच

प्रियंका जैसी लाखों महिलाओं की हालत, जिसे शोषण कहना ही बेहतर होगा, की शुरुआत दरअसल  घर से ही होती है. पति या ससुराल वाले परेशान करें या उन से किसी तरह का तालमेल न बैठे तो उन्हें एकतरफा मुजरिम न केवल मान लिया जाता है बल्कि बिना अपराध सिद्ध हुए उन की सजा की शुरुआत भी हो जाती है.

यदि पत्नी विरोध करती है तो सजा की मात्रा प्रताड़ना तक पहुंच जाती है और आमतौर पर उस का बचाव करने वाला कोई नहीं होता. विवाद बढ़ता है तो उसे घर से निकलने के लिए मजबूर कर दिया जाता है या फिर प्रताड़ना या हालात से घबरा कर वह खुद ही घर छोड़ देती है.

अब उस के सामने सवाल यह उठ खड़ा होता है कि कहां जाए? ऐसे में मायका ही उस का इकलौता विकल्प व सहारा होता है. अधिकांश मामलों में मायके वाले उसे सहारा देते भी हैं, लेकिन उन का नजरिया और व्यवहार दोनों बदल जाते हैं.

अलगाव के दौरान वह मायके वालों को भार लगती है. हालांकि मांबाप अगर हों तो उन का रुख थोड़ा नरमीभरा होता है, लेकिन भाईभाभियों या बहनों सहित दूसरे रिश्तेदारों की नजर में वह खटकने लगती है क्योंकि वह हर स्तर पर जगह घेरती है.

आजकल अधिकांश पत्नियां कमाऊ या नौकरीशुदा होती हैं, इसलिए वे आर्थिकरूप से भार नहीं होतीं. लेकिन अस्थायी परित्यक्ता का गुजारा केवल पैसे से ही पूरा नहीं होता है और न ही दूसरी जरूरतें पूरी होती हैं.

1950 में जब हिंदू महिलाओं को पहली दफा विवाहविच्छेद या तलाक का हक मिला था तब वे कमाऊ नहीं होती थीं, इसलिए उन की घर या समाज में कोई हैसियत भी नहीं होती थी. वे घर की नौकरानी सा काम करते जिंदगी गुजार देती थीं. मांगलिक कार्यों में उन्हें बुलाने से बचा जाता था.

दरअसल, तलाकशुदा महिला की हैसियत एक ऐसी मनहूस मानी जाने वाली विधवा की तरह होती है जिस का पति जिंदा होता है. लेकिन, पति के प्रति ऐसा नजरिया देखने में नहीं आता है.

यह कहना ज्यादती और फुजूल की बात है कि अब ऐसा नहीं रहा, हुआ इतना भर है कि कमाऊ महिलाएं अपने दम पर जिंदगी जी सकती हैं, लेकिन वह जिंदगी वैसी नहीं होती जैसी कि होनी चाहिए यानी समाज या परिवार में उन का कोई मानसम्मान नहीं होता. एक तरह से वे बहिष्कृत होती हैं. आर्थिक स्थिति या हैसियत उन्होंने अपने दम पर सुधारी है, किसी कानून का इस में कोई योगदान नहीं है.

औरतों के हालात जस के तस

साफ है समाज पुरुषप्रधान था, है और रहेगा. औरत की स्थिति अभी भी दोयम दर्जे की और साफसुथरे शूद्रों जैसी है. इस मानसिकता की जड़ में जाएं तो इस का पहला जिम्मेदार धर्म ही नजर आता है, जो कदमकदम पर उसे दासी, पैर की जूती और नर्क का द्वार करार देता है.

षड्यंत्रपूर्वक बुना गया यह तानाबाना तलाकशुदा औरतों पर गाज की तरह गिरता है. औरत कभी धर्म के दुकानदारों को रास नहीं आई. उन की नजर में उस की उपयोगिता एक भोग्याभर की रही है, जो पुरुष को हर तरह के सुख और संतुष्टि देती है.

तलाक का हक मिलने से इतनाभर हुआ कि पत्नियां भी अदालत जाने लगीं, लेकिन इस हक से उन के मानसम्मान, हैसियत और स्वाभिमान पर कोई फर्क नहीं पड़ा, वह ज्यों का त्यों है. आजादी के 70 सालों में पत्नियों के भले के लिए दर्जनों कानून बने, उन मेें सैकड़ों संशोधन हुए लेकिन उन की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. इस की इकलौती वजह यह है कि धर्मप्रधान समाज और पुरुष ऐसा नहीं चाहते. कई मामलों में तो खुद कानून भी इन्हीं के साथ खड़ा नजर आता है.

मौजूदा कानूनी प्रक्रिया कतई महिलाओं के हक में नहीं है. पहले पत्नी वकील करे फिर पेशियों पर हैरानपरेशान 11 से ले कर 5 बजे तक अदालत में नुमाइश की चीज बन कर अपराधी की तरह बैठी रहे. ऐसे में तो उस पर तरस ही आता है कि ऐसा क्यों? कानूनी प्रक्रियाओं, नियमों और न्याय के नाम पर यह अन्याय क्यों?

जब प्रियंका जैसी पत्नियां अदालत जाती हैं तो पति को क्यों तुरंत तलब नहीं किया जाता. उन्हें ऐसी कानूनी रियायतें क्यों मिली हुई हैं जो वे नोटिस के जरिए जवाब देते हैं, बहाने बना कर पेशियों पर नियमित नहीं आते और आते भी हैं तो क्लर्क को घूस दे कर मनचाही तारीख लगवा लेते हैं. इस से पत्नी की परेशानी और यंत्रणा बढ़ती है और कई बार तो वह ही मुकदमे की पिक्चर से गायब हो जाती है कि जब तलाक मिलना इतना दुष्कर काम है तो जिंदगी, ऐसी ही जैसी है, क्या बुरी है. नतीजतन, मुकदमा एकतरफा हो कर तलाक की डिक्री पति के हक में हो जाती है.

अफसोस तो इस बात का है कि कानूनों में कुछ सुधारों के बाद भी कानूनी प्रक्रियाएं उम्मीद और जरूरत के मुताबिक नहीं सुधरी हैं. सीधेसीधे कहा जाए तो तलाक में अनावश्यक देरी पत्नी के साथ ही ज्यादती होती है. पति इस से आमतौर पर अप्रभावित रहता है. तलाक 4 साल में हो या 6 साल में, पति के लिए तो यह मियाद वरदान जैसी बात होती है क्योंकि तलाक के मुकदमे के दौरान पत्नी पेशियों में हाजिर होने के चलते पैसों की तंगी की, रिश्तेदारों के तानों की और समाज की बदलती नजरों की सजा भुगत रही होती है.

यही पुरुषोचित अहं और आनंद है जिस को आज का शिक्षित, सभ्य और आधुनिक समाज भी अपने तरीके से ऐंजौय करता है. उस का इकलौता मकसद, जैसे भी हो, औरत को परेशानी में देखना है.

इस में शक नहीं कि कुछ मामलों में परेशानी और तनाव पतियों के हिस्से में भी आते हैं. लेकिन वे 10 फीसदी भी नहीं हैं, क्योंकि समाज पुरुषों के साथ होता है. तलाक के मुकदमे के दौरान पतियों को पत्नियों के मुकाबले न के बराबर ताने सुनने पड़ते हैं, अनदेखी तो उन की कहीं नहीं होती और वे कतई अकेले नहीं होते.

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30-40 साल पहले पति अपनी पत्नी को छोड़ तुरंत शादी कर लेता था और पत्नी खामोशी से सौत या दूसरी को ताकती रहती थी. हालात इतनेभर बदले हैं कि अब वह तलाक होेने तक दूसरी शादी नहीं कर सकता.

भोपाल के एक व्यापारी की मानें तो पत्नी से अनबन के चलते उस ने तलाक का मुकदमा दायर किया था और इसी दौरान उस के पास दूसरी शादी के प्रस्ताव आने लगे थे कि तलाक होते ही हमारे प्रस्ताव को प्राथमिकता में रखा जाए.

यह कैसा समाज है जिस की नसनस में दोहरापन समाया हुआ है. प्रियंका जैसी आत्मनिर्भर महिलाओं से भी कोई शादी करने को तैयार नहीं होता, क्योंकि वे पहले पति को मन और शरीर सौंप चुकी हैं. अब जो भी उन से शादी करेगा वह समाज का अनुपयोगी हिस्सा होगा, बेकार, निठल्ला या आलसी ही होगा. उस की इकलौती काबिलीयत केवल मर्द होना होती है जो तलाकशुदा से शादी नहीं, बल्कि उस पर एहसान करता है.

तलाक के उन्हीं मुकदमों में जल्दी फैसला होता है जिन में पति को तलाक की जल्दी रहती है. ऊपर जिस व्यापारी का जिक्र किया गया वह हर पेशी पर नियमित गया था. जिस से तलाक जल्दी यानी डेढ़ साल में हो गया. उस ने कुछ दिनों बाद ही दूसरी शादी कर ली लेकिन तलाकशुदा पत्नी मायके में बैठी भाइयों के बच्चे खिला रही है और भाभियों की बातें सुन रही है. इस मामले में गुजाराभत्ता मांगा नहीं गया था.

समझाइश या धौंस

भोपाल की एक काउंसलर की मानें तो यह सच है कि हर कोई तलाक चाहने वाली पत्नी को समझाता नजर आता है कि एक बार और इत्मीनान से सोच लो और कोशिश करो कि शादी टूटे नहीं. गोया कि वैवाहिक जीवन के तलाक तक पहुंचाने का ठीकरा उसी के सिर अग्रिमरूप से फोड़ दिया जाता है जिस से वह तलाक के बाद भी अपराधबोध से ग्रस्त रहे.

दरअसल, यह समझाइश आने वाली जिंदगी का डर दिखा कर उसे नर्क में धकेले रखने की साजिश है क्योंकि नारकीय व्यवस्थाएं बदलने पर पति को भी, थोड़ी ही सही, परेशानी तो उठानी पड़ती है. यह भी तलाक प्रक्रिया से जुड़े लोग नहीं चाहते कि पुरुष को रत्तीभर की परेशानी हो, जबकि तनाव झेल रही महिला से किसी को कोई सहानुभूति नहीं होती.

अपवाद मामलों को छोड़ दें तो कोई भी पति या पत्नी तलाक के लिए अदालत में तभी जाता है जब खुद उसे यह लगने लगता है कि अब इस हालत में वैवाहिक जीवन जीना और संभव नहीं. इस के बाद भी नादान पत्नियों को ही समझा जाता है मानो वे तलाक ले कर भारी गुनाह करने जा रही हों. तलाक की आजादी पर समझाइश के पहरे दशकों पुरानी साजिश हैं जिन का मकसद पत्नी को खूंटे से ही बांधे रखना होता है.

इस की एक अहम वजह धर्म की दुकानदारी का खतरे में पड़ना है. एक अंदाजे के मुताबिक, अभी कोई 20 लाख मुकदमे देशभर में तलाक के चल रहे हैं. लेकिन इन से 4 गुना ज्यादा मामले वे हैं जिन में पत्नियां समाज, परिवार और कानून से घबरा कर तलाक ले कर आजादी की सांस लेने के बारे में सोच भी नहीं पा रहीं. वे पति और ससुराल वालों की ज्यादतियां झेलते जिंदगी ढोने को मजबूर हैं.

भारत में यूरोप के मुकाबले तलाक की दर इसीलिए कम है कि यहां तलाक आसानी से नहीं मिलता. इस के लिए हजार तरह के पापड़ बेलते हजारों तरह की ही भावनात्मक, सामाजिक व मानसिक यंत्रणाएं भुगतनी पड़ती हैं. इसलिए धर्म और संस्कृति पर यह गर्व

भी एक साजिश है कि हमारे यहां की विवाहव्यवस्था बेहद मजबूत और टिकाऊ है. जबकि, दरअसल, यह महिलाओं के शोषण की बुनियाद पर खड़ी है. इस बात को जानबूझ कर हर स्तर पर नजरअंदाज किया जाता रहा है. धर्म के ठेकेदार अकसर पाश्चात्य संस्कृति को कोसते नजर आते हैं. वे इस सच को ढकने की कोशिश करते रहे हैं कि पश्चिम में महिलाएं हद से ज्यादा स्वतंत्र हैं.

घुटन में जी रहीं पत्नियां जब तलाक की तरफ पहला कदम उठाती हैं तो समझाइश के नाम पर उन की हिम्मत ठीक वैसे ही तोड़ने की कोशिश की जाती है जैसे पंडाल में बैठा धर्मगुरु भक्तों की भीड़ को समझाता है कि यह पाप है, अगर ऐसा करोगे तो उस की सजा भी तुम्हीं को भुगतनी पड़ेगी. बाद में इन उपदेशों को सच साबित करने की जिम्मेदारी भक्त समाज ही पूरी करता है.

कानूनी श्राप

कहने को तो कानून सभी के लिए बराबर है औैर न्याय के लिए बना है लेकिन तलाक के मुकदमों में महिलाओं की हालत देख लगता है कि उन्हें दी जाने वाली समझाइश को सच साबित करने की जिम्मेदारी कानून से जुड़े लोगों ने उठा रखी है ताकि दूसरी महिलाएं तलाक लेने से डरें.

जब इस प्रतिनिधि ने कुछ वकीलों, रिटायर्ड जजों और तलाक का मुकदमा लड़ रहे पतिपत्नियों से बात की तो एक हैरान कर देने वाली बात यह सामने आई कि आजकल हालत सुधरी है और अदालतों में तलाक के लिए पहले जैसा वक्त नहीं लगता. इस हकीकत की छानबीन पर यह बात भी सामने आई कि औसतन तलाक का एक मुकदमा 4-5 साल चलता है.

इस स्थिति और अदालतों की तरफदारी के माने समझने से पहले यह बात समझ लेना जरूरी है कि तलाक के लिए अगर 4 साल भी लगते हैं तो वे भी बहुत ज्यादा हैं. तलाक के मुकदमे की मियाद अगर 8-10 साल से घट कर 4 साल पर आ गई है तो यह ढोल पीटने की बात कतई नहीं है. सवाल यह उठना चाहिए कि तलाक 4 महीने में क्यों नहीं हो सकता? जब शादी 4 दिन और आजकल तो 4 घंटे में संपन्न हो सकती है तो तलाक 4 साल में क्यों?

इस सवाल का जवाब कानून और समाज के ठेकेदार बड़ी गंभीरतापूर्वक और दार्शनिक अंदाज में यह कहते हुए देते हैं कि यह एक नाजुक मसला है. इस में जल्दबाजी और हड़बड़ाहट 2 लोगों की जिंदगी बरबाद कर सकती है और बच्चे अगर हों तो उन की जिंदगी तो बेपेंदी के लोटे जैसी हो जाती है.

इस तरह की दलीलें देने वाले लोग हकीकत में धर्मभीरु होते हैं जिन का असल मकसद धर्म के सिद्धांतों को बनाए रखना होता है जिस में स्त्री आजादी का नाम ही उस का शोषण है और अगर वह पति के शोषण से मुक्त होती है तो बाहर पूरा समाज उस का शोषण करने के लिए तैयार बैठा रहता है.

जवाब यह क्यों नहीं दिया जाता कि वाकई चूंकि मसला नाजुक और 2 लोगों की जिंदगी का होता है, इसलिए 4 साल भी क्यों. यह मियाद भी सजा नहीं तो क्या है? क्यों तलाक चाहने वालों खासतौर से महिलाओं को घेर कर प्रताड़नाएं भुगतने के लिए 4 साल मजबूर किया जाता है. चूंकि मामला संवेदनशील होता है, इसलिए ही इसे तुरंत निबटाना हर किसी की प्राथमिकता होनी चाहिए. उसे बेवजह लंबा खींचने से किसे क्या हासिल होता है?

4 साल की मियाद, दरअसल, सफेद झूठ है, हकीकत में होता कुछ और है.

स्थगन आदेश का दंश

जब इस बात की पड़ताल की गई तो पता चला कि निचली अदालतें तलाक के मुकदमों को जल्द निबटा रही हैं, लेकिन बात हाईकोर्ट तक भी जाती है, जहां न्याय यानी तलाक मिलने में सालोंसाल लग जाते हैं.

भोपाल की एक पीडि़ता रेखा (बदला नाम) ने अपने पति पर न केवल प्रताड़ना का आरोप लगाया था बल्कि उसे साबित भी कर दिया था. नतीजतन, तलाक 3 वर्षों में हो गया.

पति की मंशा चूंकि उसे और परेशान करने की थी, इसलिए वह हाईकोर्ट जा कर स्थगन आदेश यानी स्टे और्डर निचली अदालत के फैसले पर ले आया. यहां यह समझना जरूरी है और दिलचस्प भी कि हाईकोर्ट तलाक का फैसला नहीं देता, बल्कि यह देखता है कि कहीं निचली अदालत ने कोई जल्दबाजी दिखाते तो विवाहविच्छेद नहीं कर दिया है और कोई गड़बड़झाला तो नहीं किया है. यानी हाईकोर्ट का काम इतना भर है कि वह निचली अदालत के फैसले को पढ़ कर समीक्षा करे और हां या न में सिर हिला कर वादीप्रतिवादी को मुक्त करे.

रेखा बताती है, पूरे 10 साल हो गए लेकिन हाईकोर्ट अभी तक यह तय नहीं कर पाया कि उस का तलाक जायज है या नहीं. 10 साल तक क्या हुआ? इस पर झल्लाई रेखा बताती है कि पेशियां हुईं लेकिन उस का मुकदमा कभी नंबर पर नहीं आ पाया क्योंकि अदालत को 2 लोगों की जिंदगी से ताल्लुक रखता संवेदनशील और नाजुक मसला शायद होली की हंसीठिठोली सा लगा. नंबर आए तो उन मुकदमों के, जिन्हें कानूनी भाषा में अर्ली हियरिंग यानी जल्द सुनवाई वाला माना जाता है.

ये मुकदमे हाईकोर्ट के लिए अहम होते हैं जिन में किसी एक राजनेता ने दूसरे के खिलाफ ताना कसा होता है और उन में से किसी एक को जमानत चाहिए रहती है. वे मुकदमे अदालत की निगाह में ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं जिन में ज्यादा तगड़ी फीस हासिल कर किसी ने रिट दायर की होती है या किसी सैलिब्रिटी या फिर धर्म से जुड़ा मामला अदालत की चौखट तक आ जाता है.

रेखा बताती है कि 10 साल में महज एक बार सुनवाई हुई और उस में भी कोई नतीजा नहीं निकला, जज साहब ने फिर तारीख लगा दी. अब वह हर तारीख पर भोपाल से जबलपुर जाती है जिस में उस के 10 हजार रुपए खर्च होते हैं. उस की फाइल साल 2009 से नीचे दबी पड़ी है, साथ ही, दबे हैं उस के सपने और आजादी क्योंकि जब तक हाईकोर्ट स्थगन आदेश पर फैसला न दे यानी निचली अदालत के फैसले पर सहमति या असहमति न जताए, तब तक वे दबे ही रहेंगे.

रेखा के पति को अपनी बात कहने के लिए निचली अदालत ने तलाक  के बाद 45 दिनों की तयशुदा मियाद दी थी. जिस से वह हाईकोर्ट जा सके. इस से रेखा पर यह बंदिश अपनेआप लग गई थी कि वह हाईकोर्ट का फैसला आने तक शादी नहीं कर सकती.

अब रेखा तल्ख लहजे में पूछती है कि फिर यह तलाक कहां हुआ और मुकदमा 3 साल में निबट गया, यह किस आधार पर मान लिया जाए? मुझे तो रोतेभागते 13 साल हो गए और इस पर भी मजाक यह कि मैं किसी की पत्नी हूं या नहीं, यह कौन तय करेगा? मैं दूसरी शादी भी नहीं कर पाई, इस का जुर्माना कौन भरेगा या कौन इस नुकसान की भरपाई करेगा? 13 वर्षों में तलाक कानून की अच्छी जानकार बन गई रेखा यह भी कहती है कि विवाह और तलाक कानून बेहद अस्पष्ट हैं.

होना यह चाहिए

रेखा कहती है कि 13 वर्षों से तलाक का मुकदमा लड़तेलड़ते मैं थक गई हूं यह कैसा कानून और इंसाफ है जिस में तलाक के मुकदमे में भी तारीख पर तारीख लगती हैं, गवाहियां होती हैं, कानून की धाराओं का हवाला दे कर उन्हें बढ़वाया जाता है. अदालतों में तरहतरह के बहाने  बनाए जाते हैं. कभी पति का ऐक्सिडैंट रास्ते में हो जाता है तो कभी जज साहब छुट्टी पर होते हैं, कभी वकील साहब नदारद हो जाते हैं और कभी खुद अदालत अपनी तरफ से देर लगाती है कि वह अगली तारीख पर मामले को देखेगी.

आप क्या देखना चाहते हैं? रेखा लगभग रोते हुए कहती है कि कैसे एक औरत तलाक के लिए इतने साल कानून की चौखट पर अपनी एडि़यां रगड़ते हुए जिंदा है. वह जवानी से बुढ़ापे की तरफ जा रही है लेकिन किसी को उस की जिंदगी की परवा या सरोकार नहीं. तो इस से तो वह गंवार कहा जाने वाला समाज अच्छा है जिस में पंचायत पहली ही पेशी पर छोड़ छुट्टी (तलाक की मंजूरी) का फैसला सुना देती है और पूरा गांव समारोहपूर्वक भोज करता है.

रेखा जैसी पत्नियों के आक्रोश, क्रोध और भड़ास में ही छिपा है तलाक के मुकदमों का हल, जिन्हें ऐसे लोगों से बातचीत कर सूचीबद्ध किया गया है जो मुकदमा लड़ रहे हैं.तलाक के मुकदमे की मियाद तय होनी चाहिए और यह किसी भी सूरत में बढ़नी नहीं चाहिए.

तलाक का मुकदमा किसी एक अदालत में ही चलना चाहिए. फैसले पर दूसरे पक्ष को चुनौती का अधिकार भी इसी अदालत में होना चाहिए क्योंकि अधिकांश फैसले कानून से नहीं, बल्कि साक्ष्यों और गवाहों के अलावा न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर होते हैं.

वकील से ज्यादा अदालत को पक्षकारों की बात सुननी चाहिए.

तलाक के लिए तहसील स्तर तक विशेष न्यायालय होने चाहिए.

ऊंची अदालत में स्थगन आदेश की समयसीमा निर्धारित होनी चाहिए और यह न्यूनतम होनी चाहिए.

तलाक और महिलाओं के संरक्षण के लिए बने कानून की विभिन्न धाराओं जैसे 125, 24, 498, 376 वगैरह को संशोधित कर घरेलू हिंसा अधिनियम 2005-06 में मिला कर एक सशक्त कानून बनना चाहिए, जिस से महिलाओं को एक ही कानून के

तहत कम समय में कानूनी फायदा मिल सके.

बहुत से कानूनों का होना मुकदमों में देरी की वजह बनता है और खर्च भी ज्यादा होता है. इसलिए तलाक, भरणपोषण और घरेलू हिंसा के मुकदमे अलगअलग न चल कर एक ही मुकदमे में होने चाहिए.

मुकदमे की परेशानियां भुगत चुके या भुगत रहे पीडि़तों की इन बातों में दम है जिन पर कानूनविदों और सरकार को ध्यान देना चाहिए कि परेशानी की असल जड़ कानून ही है.

तलाक के बाद

तलाक के बाद आमतौर पर पत्नी की सामाजिक जिंदगी खत्म हो जाती है लेकिन पति की नहीं होती. इस स्थिति का जिम्मेदार कानून नहीं, बल्कि समाज और धर्म हैं. बकौल प्रियंका वे एक छोटे नर्क से निकल कर दूसरे बड़े नर्क में आ गई हैं.

हर कोई तलाकशुदा महिलाओं को अजीब नजर से देखता है. इस नजरिए को बदलने की सख्त जरूरत है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब तलाक कम से कम समय में हों. महिलाओं को यह न लगे कि वे कोई सजायाफ्ता मुजरिम थीं और जेल की सजा काट कर समाज में वापस आई हैं.

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सौरभ की जल्द धूमधड़ाके से दूसरी शादी होनी तय है, लेकिन प्रियंका फिल्म ‘निकाह’ की सलमा आगा की तरह घर में अकेले पड़े, ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए…’ जैसा उदासी भरा गाना क्यों गाती और सुनती रहें? इस बात पर सभी को अपने स्तर पर सोचना होगा कि यह भेदभाव क्यों.

समाज और कानून आम लोगों की जिंदगी आसान करने के लिए होने चाहिए, न कि धर्म जैसे होने चाहिए जो कदमकदम पर जिंदगी को जटिल बनाता है, वह भी सिर्फ इसलिए कि इस से कुछ विशेष लोगों की रोजीरोटी चलती है. तलाकशुदा महिलाएं जितनी ज्यादा बदहाली में रहेंगी उतनी ही यह दुकानदारी फलेगीफूलेगी, और कहा यह जाएगा कि वे अपने पूर्व और वर्तमान जन्म के पापों की सजा भुगत रही हैं, इसलिए उन से दूर रहो.

सिपहिया

‘‘अरी ओ लल्लन की बहू, देख तेरी चिट्ठी आई है…’’

यह सुन कर कुएं से पानी भर रही खूबसूरत सी लड़की ने अपनी कजरारी आंखों से पीछे मुड़ कर देखा कि किस में इतनी हिम्मत आ गई जो उस के ससुर का नाम इस तरह पुकार रहा है. यों तो उस की शादी के कुछ ही महीने बीते थे, पर यह वह अच्छी तरह जानती थी कि उस के ससुर की घर और गांव में बड़ी इज्जत थी.

उस के ससुर 2 जवान बेटों के बाप हैं और दोनों बेटे फौज में हवलदार हैं. वह यानी सरला बड़े बेटे की बहू है और छोटे बेटे की अभी शादी नहीं हुई है. बेटों की मां की मौत दोनों के बचपन में ही हो गई थी.

सरला बोली, ‘‘हां, बोलो डाकिया काका, क्यों पुकार रहे हो?’’

‘‘अरी बहू, बात ही ऐसी है कि हम तेरे घर जाने का इंतजार न कर सके. तू मुझे यहां पानी भरती दिखाई दी तो मैं यहीं आ गया. तेरे पति की चिट्ठी आई है और वह भी तेरे नाम से.’’

इतना सुनते ही सरला शरमा गई और चिट्ठी को उन के हाथ से ले कर बड़े प्यार से पलटपलट कर देखने लगी और चिट्ठी को छाती में ऐसे भींच लिया जैसे राघव ही आ गया हो.

सरला मुश्किल से राघव के साथ एक महीना रह पाई थी. इस के बाद राघव को सरहद से बुलावा आ गया. बस एक बार गांव के पंचायत औफिस से फोन से बात हुई थी. पर वहां साथ में बाबा थे तो सरला बस सुनती रही, कुछ कह न पाई.

आज अचानक आई चिट्ठी ने सरला की सूखी जिंदगी में बहार ला दी थी.

सरला चिट्ठी खोल कर पढ़ने लगी. अरे, यह क्या… चिट्ठी तो इंगलिश में है. राघव ने शायद चिट्ठी जानबूझ कर इंगलिश में लिखी, जिस से उसे लगे कि उस के पति को अच्छी इंगलिश आती है.

सरला के चेहरे पर आए भावों को डाकिया काका ने तुरंत पढ़ लिया और बोले ‘‘लाओ… मैं पढ़ देता हूं.’’

काका वहीं घास पर आराम से बैठ गए और चिट्ठी पढ़ने लगे. जैसेजैसे वे चिट्ठी को हिंदी में पढ़ते गए, सरला की आंखों से आंसू गिरते गए. पर आखिरी लाइन सुनते ही सरला का मन नाचने लगा.

डाकिया काका ने चिट्ठी पढ़ते हुए कहा, ‘‘सरला, मैं गांव जा रहा हूं. मेरी छुट्टियां मंजूर हो गई हैं.’’

‘‘काका, वे कब आ रहे हैं?’’

‘‘बेटी, यह चिट्ठी तुम्हें देर से मिली है. 22 तारीख को आने को लिखा है. इस का मतलब… कल ही तो 22 तारीख है.’’

‘‘अरे वाह, राघव कल आ रहे हैं. हाथों का सामान जमीन पर पटक कर मारे खुशी के सरला वहीं नाचने लगी और अपने साथ आई पड़ोसन से बोली, ‘‘मैं जा रही हूं. ये कल आने वाले हैं. मैं ने कोई तैयारी नहीं की है. बाबा भी शहर गए हैं. अब सारी तैयारियां मुझे ही करनी हैं.’’

सुबह जल्दी उठ कर सरला ने सब से पहले आंगन धोया, चावल के मंडन बनाए, घर की देहरी पर उसी चावल के आटे से लकीरें खींचीं, उन पर अक्षत रख दरवाजे को भी फूलों से सजा दिया. इस के बाद अपना कमरा साफ किया. नई चादर बिछाई, बगीचे से फूल तोड़ कर गुलदस्ते में लगाए.

कमरे में एक पुराना बक्सा रखा था. बस, वही कमरे की खूबसूरती खराब कर रहा था. सोचा कि इसे बाहर कर दे, मगर तभी सरला को याद आया कि शादी की रात राघव ने उसे बताया था कि इस में उस की मां का सामान रखा है और उसे वह साथ रखता है. इस से उसे लगता कि मां अब भी उस के साथ है. राघव मां के बेहद करीब था. सरला ने सोचा कि वह इस पर नई चादर डाल कर फूलों का गुलदस्ता रख देगी तो अच्छा लगेगा.

थोड़ी ही देर में सरला सारा कमरा सजा कर एक कोने में खड़ी हो कर कमरे को निहारने लगी कि कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई. जब पूरी तरह तसल्ली कर ली कि सबकुछ सज गया तो चौके में जा कर उस की पसंद के पकवान बनाने लगी.

यह सब करतेकरते रात हो गई, मगर राघव से मिलने की तड़प में उसे रात को नींद भी नहीं आ रही थी. कई तरह की बातें, कई तरह के खयाल, कई तरह की गुदगुदियां. वह अपनेआप ही शरमाती, अपनेआप ही हंसती.

सरला ने सोच लिया था कि उसे राघव से क्याक्या बातें करनी हैं, क्योंकि शादी के समय इतने मेहमान थे कि राघव को न तो ठीक से वक्त दे पाई थी और न ही उस की प्यारभरी शरारतों का साथ क्योंकि जब भी राघव उसे छेड़ता, परेशान करता, कमरे में आने को कहता तभी कोई न कोई चाची, नानी, काकी टपक आती और बेचारे 2 प्यार करने वाले मन मार कर रह जाते.

एक दिन तो हद ही हो गई थी.

2 दिन बाद राघव को जाना था और उस का मन था कि वह हर समय उस की बांहों में रहे. राघव उसे एक मिनट भी नहीं छोड़ना चाहता था. मगर तभी उस की चचिया सास ने महल्ले की औरतों को बुला लिया और ढोलक पर नाचगाना शुरू हो गया.

बेचारी सरला को न चाहते हुए भी वहीं बैठना पड़ा और जब शाम को कमरे में गई तो देखा, राघव बीयर की बोतल खोले पी रहा था.

‘यह क्या… आप शराब पी रहे हैं,’ सरला ने पूछा था.

राघव ने कहा था, ‘जब तुम प्यार का नशा नहीं करने दोगी तो इस नशे का सहारा लेना पड़ेगा. तुम्हें तो इन औरतों के लिए वक्त है, मेरे लिए नहीं. अगर कहीं मैं लौट कर नहीं आ…’

सरला ने उस के मुंह पर हाथ रख दिया था और बिलखते हुए राघव के सीने पर अपना सिर रख कर बोली थी, ‘आज के बाद इसे हाथ लगाया तो समझ लेना.’

तभी तेज हवा के झोंके से खिड़कियां खुल गईं और सरला अपने विचारों से बाहर आ गई. उस ने सोचा कि क्यों न बीयर भी राघव के लिए सजा दे. फिर याद आया कि बीयर लाएगा कौन? तभी उसे याद आया कि उस दिन राघव से बोतल ले कर छिपा कर रख दी थी, उस ने तुरंत भाग कर अलमारी खोली और बोतल ला कर कमरे में उसी बक्से के ऊपर रख दी. 2 गिलास भी रख दिए.

तभी घड़ी में देखा कि राघव के आने का समय हो रहा है. नहाधो कर सुंदर सी साड़ी, हाथों में चूडि़यां, बालों में गजरा और आंखों में मोटा सा काजल लगा कर वह तैयार हो गई.

ये पल कटने का नाम ही नहीं ले रहे थे. उस ने दरवाजा खोला और तभी याद आया कि घर में कुछ नमकीन न थी. वह नमकीन लेने चली गई.

इसी बीच अचानक उस का देवर भी कई महीनों बाद घर वापस आया. उस ने देखा कि कमरे में बड़े करीने से 2 गिलास और बीयर की एक बोतल रखी थी. सोचा कि भाभी ने बड़ा शानदार इंतजाम कर रखा है. फिर इधरउधर देखा और सोचा कि अच्छा मौका है. क्यों न मैं भी थोड़ी सी पी लूं.

उस ने गिलास में बीयर डाली ही थी कि तभी वह हुआ जो न होना चाहिए था. अचानक राघव आ गया. उसे इस तरह कमरे में पलंग पर बैठा देख वह भी उस की गैरमौजूदगी में… राघव गुस्से से तिलमिला गया.

तभी सामने से सरला नमकीन का पैकेट लाती दिखी तो राघव को लगा कि वह देवर के लिए नमकीन लेने गई थी.

राघव को सामने देख सरला के सारे अंग में बिजली की धाराएं दौड़ने लगीं. वह इस बात का इंतजार न कर सकी कि पति की खुली हुई बांहें उसे समेट कर सीने से लगा लें, पर जैसे ही वह राघव की तरफ बढ़ी तभी राघव की गुस्से भरी आवाज से सहम गई.

सरला ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि राघव तेजी से चिल्ला कर बोला, ‘‘बदचलन औरत… मैं ने तुझे क्या समझा था और तू क्या निकली.’’

इस अचानक आए शब्दों के तूफान से सरला चौंक गई. राघव के इस रूप को देख कर वह डर गई. तभी देवर के हाथ में गिलास देख कर वह सबकुछ समझ गई.

राघव बोला, ‘‘सरला, मैं तुझ से मिलने के लिए कितनी मिन्नतें कर के छुट्टी ले कर आया था.’’

सरला उस का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘ऐसा कुछ भी नहीं है. मुझे नहीं पता कि देवरजी कब आए.’’

राघव ने कस कर अपना हाथ झटका और जिन कदमों से आया था, उन्हीं कदमों से वापस जाने लगा.

सरला जब तक कुछ समझ पाती या समझा पाती तब तक राघव गुस्से में कहीं चला गया. उस के जाते कदमों के निशान को सरला अपने आंसुओं से भिगोने लगी.

तभी तेज तूफान आ गया. आंगन बड़ेबड़े ओलों से पट गया. मूसलाधार बारिश शुरू हो गई. ऐसा लग रहा था कि सरला के दुख से आसमान भी रो पड़ा हो. कभी नहीं भूलेगी वह शाम. शाम तो मौसम ने कर दी थी, वरना थी तो दोपहर. वह वहीं आंगन में बैठ कर बिलखबिलख कर रोने लगी.

बहुत तेज बारिश हो रही थी. सरला मन ही मन सोचने लगी कि इन तेज आती बारिश की बूंदों को रस्सी की तरह पकड़ कर राघव के पास पहुंच जाए. मगर बारिश और पड़ते ओलों की मार से पता नहीं कब वह बेहोश हो गई.

तभी बाबा शहर से लौट आए. बहू की ऐसी हालत देख कर वे परेशान हो गए. बाबा की आवाज सुन कर पड़ोस की चाची भी बाहर आ गई.

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देवर रोहित और चाची ने मिल कर सरला को कमरे तक पहुंचाया. चाची ने कहा, ‘‘तुम बाहर जाओ. मैं सरला के कपड़े बदल देती हूं.’’

रोहित जैसे ही बाहर आया तो बाबा बोले, ‘‘अब तू बता कि बहू इस तरह आंगन में क्यों पड़ी थी?’’

रोहित ने बाबा को सारा मामला बताया. रोहित ने कहा, ‘‘भैया को गलतफहमी हो गई. मैं ने और भाभी

ने बहुत समझाने की कोशिश की, पर उन्होंने कुछ नहीं सुना और उलटे कदमों से वापस चले गए.’’

बाबा चुपचाप बैठे सारी बातें सुनते रहे और फिर भारी कदमों से उठे और बोले, ‘‘तू चाची के साथ भाभी का ध्यान रख, मैं उस बेवकूफ को ढूंढ़ने जाता हूं. वह स्टेशन पर बैठा होगा क्योंकि ट्रेन तो अब कल सुबह ही है.’’

यह कहते हुए वे छाता ले कर बाहर निकल गए और मन ही मन सोचने लगे कि इतनी समझदार बहू के बारे में इतना गलत राघव ने कैसे सोच लिया.

सरला को होश आया तो उसे लगा कि उस के पैरों के पंजों में तेजी से कोई तेल मल रहा है. तभी उसे याद आया कि वह तो आंगन में बेहोश हो गई थी, आंखें खोल कर देखा कि सामने ससुर खड़े थे.

उस को होश में आते देख ससुर बोले, ‘‘कैसी हो बहू… और यह रहा तुम्हारा मुजरिम, जो सजा देना चाहो दो.’’

सरला ने आंख खोल कर धीरे से देखा कि राघव उस के पैरों की मालिश कर रहे थे.

‘‘अरे… मेरे पैर छोडि़ए.’’

राघव कान पकड़ कर बोला, ‘‘मुझे माफ कर दो सरला.’’

सभी लोग कमरे से बाहर आ गए.

‘‘आप ऐसे माफी मत मांगिए. रिश्तों की गीली जमीन पर अकसर लोग फिसल जाते हैं.’’

राघव बोला, ‘‘तुम संभाल भी तो सकती थी.’’

सरला बोली, ‘‘आप ने मौका ही कहां दिया.’’

राघव चुपचाप एकटक उसे देखने लगा. उस के चेहरे से पश्चात्ताप के शब्द बिना बोले साफ समझ में आ रहे थे. उस का हाथ अपने हाथ में पकड़ कर सरला बोली, ‘‘क्या सोच रहे हो जी?’’

राघव बोला, ‘‘बस यही सोच रहा हूं कि कुछ जख्मों के कर्ज लफ्जों से अदा नहीं होते.’’

सरला धीरे से बोली, ‘‘बस, सीने से लगा लो, सारे कर्ज अदा हो जाएंगे.’’

राघव ने सरला को अपनी बांहों में समेट लिया और अभीअभी बिखरने से बची अपनी प्यार की दुनिया में वे दोनों खो गए.

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जायरा वसीम के फैसले से चौंक गए ‘दंगल’ डायरेक्टर, जानें क्या कहा

सुपरहिट फिल्म ‘दंगल’  के डायरेक्टर नितीश तिवारी, जिनकी फिल्म से जायरा वसीम इंडस्ट्री में इंट्री की थीं. नितीश तिवारी ने कहा है कि उन्हें जायरा के इस ऐलान से झटका लगा है.

नितीश तिवारी के अनुसार, ‘मुझे जायरा से जुड़ी इस खबर की जानकारी दोपहर के करीब लगी और मैं दंग रह गया. मैंने कभी जायरा से इसकी उम्मीद नहीं की थी लेकिन आखिरकार यह उसका निजी फैसला है.  यह उसकी मर्जी है कि वो अपनी जिंदगी को किस तरफ लेकर जाना चाहती है.

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नितीश ने ये भी कहा कि उसने कुछ सोच-समझकर ही यह फैसला किया होगा. जायरा का इंडस्ट्री छोड़ना बौलीवुड के लिए एक नुकसानदायक है क्योंकि वो बहुत ही उम्दा कलाकार है.

नितीश तिवारी की ‘दंगल’ के साथ-साथ जायरा वसीम ने आमिर खान के साथ ‘सीक्रेट सुपरस्टार’ में भी काम किया था. इस फिल्म में जायरा ने इन्सिया का किरदार निभाया था, जो दर्शकों को काफी पसंद आया था. जायरा वसीम जल्द ही फिल्म ‘द स्काई इज पिंक’ में नजर आएंगी.

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