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जाति के खांचों में बंटता देश

हमारे देश में लोगों की नसों में खून के साथ जातियां बहती हैं. समाज टुकड़ेटुकड़े हो चुका है. दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की पिटाई, हत्या, बलात्कार व उत्पीड़न का सिलसिला थम नहीं रहा है. इन हालात में समाज में जातिवाद की खाई बढ़ती जा रही है और इस को पाटना मुश्किल होता जा रहा है.

22 मई को मुंबई में टीएन टोपीवाला नैशनल मैडिकल कालेज में 26 साल की गाइनोकोलौजी की छात्रा डा. पायल तड़वी ने आत्महत्या कर ली. कहा जा रहा है कि मैडिकल कालेज में डा. पायल तड़वी को उन की जाति को ले कर प्रताडि़त किया जा रहा था. पायल तड़वी भील समाज से थीं. इस समाज के अनुयायियों की आबादी इस देश में 80 लाख के करीब है.

अनुसूचित जनजाति में जन्मी

डा. पायल तड़वी उत्तरी महाराष्ट्र के जलगांव की रहने वाली थीं और उन्होंने पश्चिम महाराष्ट्र के मीराज-सांगली से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की थी. आरक्षण कोटे के तहत डौक्टरेट करने के लिए पायल ने पिछले साल ही इस अस्पताल में दाखिला लिया था. वे जलगांव में अपने समाज की सेवा के लिए एक अस्पताल खोलना चाहती थीं. 30 वर्षों बाद इस पिछड़े दलित समाज से कोई लड़की डाक्टर बनने वाली थी, मगर देश में फैले जाति के जहर ने उस की इहलीला समाप्त कर दी.

ऊंची जाति की 3 डाक्टर डा. हेमा आहूजा, डा. अंकिता खंडेलवाल और डा. भक्ति मेहर को इस मामले में गिरफ्तार किया गया है. महिला डाक्टरों पर आरोप है कि वे पायल की सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण उसे लगातार प्रताडि़त कर रही थीं. आत्महत्या वाले दिन भी औपरेशन थिएटर में उस के साथ बुरा बरताव हुआ था और वह रोती हुई वहां से बाहर निकली थी. पायल की मां आबेदा तड़वी कहती हैं कि उन की बेटी को कई महीने से जातिसूचक गालियां दी जा रही थीं. उसे लगातार कमतरी का एहसास कराया जा रहा था.

पायल की मां का कहना है कि इसी अस्पताल में उन्होंने अपना कैंसर का इलाज करवाया था, जहां उन्होंने खुद पायल को उत्पीड़न का सामना करते देखा था. वरिष्ठ महिला डाक्टर मरीजों के सामने भी पायल की बेइज्जती करती थीं, जिस से वह भारी मानसिक दबाव में थी. अपनी शिकायत में आबेदा तड़वी कहती हैं, ‘‘मैं उस समय भी शिकायत दर्ज कराना चाहती थी, लेकिन पायल ने मुझे रोक दिया था. पायल को डर था कि अगर शिकायत की गई तो वहां उस का और ज्यादा उत्पीड़न किया जाएगा और उस का भविष्य में डाक्टर बन कर अपने समुदाय की सेवा करने का सपना अधूरा ही रह जाएगा.’’

आत्महत्या से 9 दिनों पहले

डा. पायल तड़वी के पति सलमान ने भी टीएन टोपीवाला नैशनल मैडिकल कालेज से शिकायत की थी कि उस की पत्नी पायल को सीनियर डाक्टर मानसिक रूप से परेशान कर रहे हैं. मगर कालेज प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया.

पायल जिस समाज से आती हैं, उस समाज में हर तरह का पिछड़ापन है. ऐसे में इस समाज से कोई डाक्टर बन जाए, यह कोई साधारण बात तो नहीं थी. मुंबई में डा. पायल तड़वी की आत्महत्या को ले कर नागरिक समाज के एक हिस्से में बहुत बेचैनी है. कुछ लोग विरोध प्रदर्शन भी कर रहे हैं. मगर इन बातों की कोई बहुत ज्यादा चर्चा मीडिया में नहीं है, क्योंकि देश का मीडिया फिलहाल ‘मोदीमय’ है. वह नरेंद्र मोदी की सत्ता में वापसी की खबरें लिखनेदिखाने में व्यस्त है. पिछड़े समाज की हायहाय तो वैसे भी उस के लिए आएदिन की बात है.

कुछ लोगों के रूटीन प्रदर्शनों से देश की स्थिति बदलने वाली नहीं है. ऐसा विरोध प्रदर्शन मार्च 2014 में भी हुआ था, जब तमिलनाडु के मुथुकृष्णन ने आत्महत्या कर ली थी और जनवरी 2016 में भी, जब हैदराबाद सैंट्रल यूनिवर्सिटी के पीएचडी के छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी की खबर आई थी.

मुथुकृष्णन जेएनयू के पीएचडी स्कौलर थे. उन्होंने अपनी आखिरी पोस्ट में बड़ी बेबसी से लिखा था कि – ‘‘जब समानता नहीं, तो कुछ भी नहीं.’’ वहीं डौक्टरेट करने वाले रोहित वेमुला ने अपने गले में फांसी का फंदा डालने से पहले लिखा – ‘‘मैं तो हमेशा लेखक बनना चाहता था. विज्ञान का लेखक, कार्ल सेगन की तरह लेकिन मैं सिर्फ यह एक पत्र लिख पा रहा हूं. मैं ने विज्ञान, तारों और प्रकृति से प्रेम किया, फिर मैं ने लोगों को चाहा, यह जाने बगैर कि लोग जाने कब से प्रकृति से दूर हो चुके हैं. हमारी अनुभूतियां नकली हो गई हैं, हमारे प्रेम में बनावट है. हमारे विश्वासों में दुराग्रह है. एक इंसान की कीमत, उस की पहचान एक वोट, एक संख्या, एक वस्तु तक सिमट कर रह गई है.

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‘‘कोई भी क्षेत्र हो, अध्ययन में, राजनीति में, मरने में, जीने में, कभी भी एक व्यक्ति को उस की बुद्धिमत्ता से नहीं आंका गया. मेरा जन्म महज एक जानलेवा दुर्घटना थी. मैं बचपन के अपने अकेलेपन से कभी बाहर नहीं आ सकूंगा. अतीत का एक क्षुद्र बच्चा, जिस की किसी ने सराहना नहीं की. मैं न तो दुखी हूं और न उदास. मैं, बस, खाली हो चुका हूं. खुद से बेपरवाह हो चुका हूं.’’

मुथुकृष्णन और रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद देशभर में कई बहसें हुईं, वार्त्ताएं हुईं, टीवी शोज हुए, लोग तख्तियां ले कर सड़कों पर भी उतरे, मगर जाति की मार से छलनी हो रही जिंदगियों की कहानी रुकी नहीं. उस के बाद भी देशभर में दलितों, पिछड़ों, जनजातीय और अल्पसंख्यक लोगों की पिटाई, हत्याएं, बलात्कार, उत्पीड़न का सिलसिला ज्यों का त्यों चालू है.

डा. पायल तड़वी की आत्महत्या के बाद भी कुछ लोग तख्तियों के साथ सड़कों पर हैं, मगर यह खबर लावलश्कर के साथ सत्ता में दोबारा पदार्पण कर रहे नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण कार्यक्रम के भव्य आयोजन की खबरों के बीच दबा दी गई.

यही खबर नहीं, बल्कि उस 14 साल की मासूम बच्ची की खबर तो जिला स्तर तक भी नहीं पहुंच पाई, जिस को 24 मई की रात सामूहिक बलात्कार कर आग के हवाले कर दिया गया था. जिला मुजफ्फरनगर के ग्राम बधाई कलां में अनुसूचित जाति की एक उपजाति से संबंध रखने वाली मीनाक्षी के साथ दरिंदों ने हैवानियत दिखाई, भरे गांव के बीच दरिंदों ने उस से सामूहिक बलात्कार किया और फिर उसी खाट पर बांध कर उसे आग के हवाले कर दिया. मीनाक्षी की दर्दनाक कराहें सभ्य और संभ्रांत समाज के कानों तक नहीं पहुंचीं, क्योंकि आधा देश मोदी सरकार की वापसी के जश्न में मग्न था. यह घटना कुछ व्हाट्सऐप ग्रुपों में सर्कुलेट हो कर ही रह गई और उस के आरोपी अभी तक फरार हैं और मौज में घूम रहे हैं.

उच्च जातियों, पिछड़ी जातियों के कुछ चेलेचपाटों और दबंगों के कहर से पूरा राष्ट्र थर्रा रहा है. पिछड़ी जातियां, अनुसूचित जातियां, जनजातियां, आदिवासी समाज, मुसलमान सब डरे हुए हैं. अपनेअपने दायरों में सिमटे जा रहे हैं. दायरे तोड़ने की हिम्मत जवाब दे चुकी है, इसीलिए वे एकजुट नहीं हो पा रहे हैं, एक मजबूत ताकत नहीं बन पा रहे हैं. उन के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाली तमाम राजनीतिक पार्टियां उन्हें उन के दायरों में ही रखना चाहती हैं. उन्हीं में रहने को मजबूर करती हैं, ताकि उन का वोटबैंक बना रहे.

संघ की मंशा कामयाबी की ओर

नरेंद्र मोदी की सत्ता में वापसी के बाद जाति के दायरे और मजबूत होंगे, इस में दोराय नहीं है क्योंकि सवर्ण जातियां अब पूरी ताकत व संख्या के साथ मोदी के केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हैं. संघ की इच्छाओं को अपने कंधे पर उठा कर अपनी राजनीतिक इच्छा पूरी करने वाले मोदी गदगद हैं. राष्ट्रवाद की सुनामी चल रही है. राष्ट्रवाद हिंदूवाद का दूसरा नाम हो गया है. ‘गर्व से कहो कि हम हिंदू हैं’ या ‘भारत एक हिंदू राष्ट्र है’ या फिर ‘भारत शीघ्र एक हिंदू राष्ट्र बनने वाला है, अब ऐसा होने से कोई माई का लाल रोक नहीं सकता…’ जैसी बातें कहीसुनी जा रही हैं.

सनद रहे कि संघ की पौराणिक परिभाषा के मुताबिक, हिंदू मतलब सवर्ण, यानी केवल सवर्ण. संघ, जो देश की जनता को धर्म और जाति के खांचों में बांट कर देखता रहा है और हमेशा देखेगा. लोगों को जाति के शिकंजे में जकड़ कर रखने में ही उस की सफलता निहित है. पौराणिक सोच में अछूतों यानी दलितों-पिछड़ों, महिलाओं, मलेच्छों के लिए कोई जगह नहीं है. संघ जिस हिंदुत्व की बात करता है, उस का तैंतीस करोड़ देवीदेवताओं वाले, सैकड़ों जातियों में बंटे, बहुतेरी भाषाओं, रीतिरिवाज, परंपराओं, धार्मिक विश्वासों वाले उदार बहुसंख्यक समाज की जीवनशैली से कोई मेल नहीं है. आदिवासी और दलित उस के हिंदुत्व के खांचे में कभी फिट नहीं हो पाते हैं, जो पलट कर पूछते हैं कि अगर हम भी हिंदू हैं तो अछूत और हेय कैसे हुए?

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पिछली बार 2014 में तो भाजपा को नंगोंभूखों के वोट पाने के लिए विकास का चोला ओढ़ कर आना पड़ा था. अब की बार इस चोले की भी जरूरत नहीं पड़ी. वह अपने नग्नरूप में सामने है. हिंदुत्ववाद इस वक्त अपने चरम पर है. जीत का सेहरा बांधे मोदी के पीछे संघ की बरात हर्षोउल्लासित है. नरेंद्र मोदी की ‘अभूतपूर्व’ जीत से संघ की छाती फूली हुई है.

नरेंद्र मोदी की राजनीतिक सफलता के साथ अब हिंदू राष्ट्र की चाहत रखने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एजेंडा तेजी से आगे बढ़ेगा. मोदी के कंधे पर संघ ने बड़ी जिम्मेदारी डाली है. मोदी को सत्ता में बने रहना है तो संघ की आज्ञा को सिर झुका कर मानना है. इस जिम्मेदारी को पूरा करने की राह में अब जो भी आएगा, उस की खैर नहीं.

खून में मिला है जाति का जहर

30 बरस पहले की एक घटना आज भी मुझे ज्यों की त्यों याद है. मैं लखनऊ से गरमी की छुट्टियों में अपने ननिहाल गोरखपुर गई हुई थी. उस दिन अपने ममेरे भाई के साथ खेतों में घूम रही थी. मेरी उम्र उस वक्त कोई 13-14 बरस की थी और भाई 6-7 साल का था. जून का तपता हुआ महीना था. खेतों में घूमते हुए हम काफी दूर निकल गए थे. दूसरे गांव में पहुंच गए थे. भाई को बहुत जोर से प्यास लगी थी. एक घर के आगे हैंडपंप देख कर हम उधर पानी पीने के लिए लपके. तभी एक औरत चीखती हुई निकली, ‘रुको, रुको, कौन जात हो?’

मैं सकपका गई, बोली, ‘मुसलमान हैं.’ वह चीखी – ‘दूर हटो.’ मैं गिड़गिड़ा कर भाई की ओर इशारा कर के बोली, ‘इस को बड़ी प्यास लगी है.’ उस ने एक नजर बच्चे पर डाली और पास पड़े लोटे में हैंडपंप से खुद पानी निकाल कर उस ने इशारा किया तो छोटे भाई ने तुरंत चुल्लू बना कर अपना हाथ आगे बढ़ा दिया. उस औरत ने ऊपर से ही उस के हाथ में पानी गिराया, जिस से उस ने अपनी प्यास बुझाई.

गांव में रहने वाले उस मासूम के अंदर उस छोटी सी उम्र में ही यह ‘नफरत’ पैदा कर दी गई थी कि अलग धर्मजाति के कारण वह उन के लिए अछूत है और उन के लोटे या हैंडपंप को वह हाथ भी नहीं लगा सकता है. इस घटना ने मुझे हिला दिया. मुझे मेरे मांबाप ने बचपन से सिखाया था कि प्यासे को पानी पिलाना अच्छा काम है. मगर इस तरह कोई अमृत भी पिलाए तो मैं क्यों पियूं? उस दिन भयानक प्यास के बावजूद मैं वहां पानी नहीं पी सकी.

कानपुर की रहने वाली हर्षाली कहती है, ‘‘मैं स्तब्ध थी, एक बार तो मेरे लिए यकीन करना मुश्किल था जब मेरे 8 साल के बेटे ने मुझ से कहा कि उस की कक्षा में दोस्ती सरनेम देख कर होती है.’’ वह कहती है, ‘‘जब मैं ने उस से विस्तार से पूरी बात पूछी तो वह बोला कि उस के स्कूल में विद्यार्थी एक सरनेम होने पर अपना अलगअलग ग्रुप बना लेते हैं.’’ हर्षाली व्यथित थी कि जब शहर के नामी पब्लिक स्कूल में यह हो रहा है तो अन्य जगहों पर क्या हालत होगी.

वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘‘मैं गाजीपुर जिले के एक इंटर कालेज में बच्चों को समाज में उन की जगह बताने के लिए अपनाए जाने वाले कहीं अधिक रचनात्मक उपायों से परिचित था. एक ब्राह्मण टीचर अकसर किसी दलित छात्र को खड़ा कर जनवरीफरवरी के बाद वाले महीने का नाम पूछते थे. वह कहता था मार्च. वे पूछते, इस का उलटा क्या होगा और सारी क्लास हंसने लगती थी. सब को पता था जो उलटा है, वही उस की सामाजिक हैसियत है.’’

इस महादेश में लोगों की नसों में खून के साथ उन की जातियां बहती हैं. कचहरी में वकील अपनी जाति का तय किया जाता है, ताकि दगा न दे. झोला छाप डाक्टर भी अपना ही खोजा जाता है कि कमाई बिरादर की जेब में जाए. मुसलमान आदमी कहीं किराए का घर ढूंढ़ता है तो कोशिश करता है कि उसी महल्ले में मिले, जहां उस की बिरादरी की आबादी बसती हो. दूसरे से कितनी असुरक्षा महसूस करते हैं हम.

पोल खोलती रिपोर्ट

वर्ष 2008 में थोराट कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इस देश में 69 फीसदी अनुसूचित जाति, जनजाति के छात्रों को उन के शिक्षकों का सहयोग नहीं मिलता है. 72 फीसदी छात्र पढ़ाई के समय भेदभाव की बात मानते हैं. 84 फीसदी छात्रों ने प्रैक्टिकल परीक्षा में नाइंसाफी की बात कुबूल की है. हर तरफ असुरक्षा व्याप्त है और लगातार बढ़ रही है.

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जातिसूचक शब्दों ने समाज को टुकड़ोंटुकड़ों में बांट दिया है. हम ‘मूर्खो की संतान’ अपने नाम के आगे से जाति का नाम नहीं हटा पाते हैं. समझने को तैयार ही नहीं होते हैं. जो पिलाया गया, पीते गए और अब अपने ही हाथों से, हर रोज, घूंटघूंट अपने ही बच्चों को अलगाव का, भेद का, जाति का जहर पिला रहे हैं.

सवर्ण अपने नाम के आगे जातिसूचक शब्दों को बड़े घमंड के साथ चिपकाए रखते हैं. इस से उन के स्वभाव में एक रोब पैदा होता है. यही रोब निम्न जातियों को डराता है, असुरक्षित बनाता है और उन्हें अपने दायरे में ही सिमटे रहने के लिए मजबूर करता है. आने वाले वक्त में यह स्थिति और बदतर होगी, इस में दोराय नहीं है.

चाहत की शिकार

कुलमिला कर उस की जिंदगी की गाड़ी ठीकठाक चल रही थी. श्वेता से उस का परिचय होने के बाद तो जिंदगी में कोई कमी ही नहीं रह गई थी. बीचबीच में श्वेता उस के पास आती थी और उस की रातों को गुलजार कर जाया करती थी. वह अपनी जिंदगी से काफी संतुष्ट था खासकर श्वेता के आने के बाद से.

श्वेता समयसमय पर उस से थोड़ेबहुत पैसे लेती रहती थी, पर उसे इस का जरा भी अफसोस नहीं था, क्योंकि बदले में उसे श्वेता से काफीकुछ मिलता भी था.

परेशानी तब हुई, जब श्वेता की मांग दिनबदिन बढ़ने लगी. एक दिन तो उस ने उस से बड़ी मांग कर दी, ‘‘आनंद, मुझे 50,000 रुपए की सख्त जरूरत है,’’ यह उस ने आनंद के बालों में प्यार से हाथ फेरते हुए कहा.

‘‘क्या… 50,000 रुपए? तुम पागल तो नहीं हो गई हो क्या श्वेता?’’ आनंद ने चौंक कर उठते हुए कहा था.

‘‘क्या तुम मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकते? पहली बार तुम मुझे मना कर रहे हो. क्या इतना ही प्यार है तुम्हारे दिल में मेरे लिए या फिर मुझ से मन भर गया है?’’ श्वेता ने प्यार से कहा.

‘‘देखो, जो रकम मेरे बस में है, वह मैं तुम्हें दे सकता हूं, पर 50,000 रुपए… इतने रुपए तो मेरी सालभर की तनख्वाह के बराबर हैं,’’ आनंद ने उसे समझाने की कोशिश की.

‘‘7 साल की तनख्वाह के बराबर तो नहीं हैं न?’’ एकाएक श्वेता का रुख बदल गया.

‘‘अगर मैं पुलिस में शिकायत कर दूं तो 7 साल के लिए हवालात में चले जाओगे. सीसीटीवी कैमरे में सुबूत हैं कि तुम मुझे अपने साथ लाते रहे हो. यहां की हर गलीनुक्कड़ में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं. मेरे कपड़ों पर तुम्हारी करतूत के सुबूत भी हैं. वैसे भी आजकल ‘मी टू’ के चलते बड़ेबड़ों की हालत खराब है, फिर तुम्हारी क्या बिसात है?’’

‘‘देखो, 50,000 रुपए तो मुझे हर हाल में चाहिए ही चाहिए. तुम कैसे इंतजाम करोगे, यह तुम जानो. एक हफ्ते का समय है तुम्हारे पास,’’ कहते हुए श्वेता चली गई और आनंद हैरान सा उसे जाते हुए देखता रहा.

इस के बाद से आनंद काफी चिंतित रहने लगा था. उस की कुल तनख्वाह 6,000 रुपए महीने थी जिस में से 2-3 हजार रुपए तो वह श्वेता पर ही लुटा देता था. 1,000 रुपए घर भेज दिया करता था. बाकी उस के खानेपीने पर खर्च हो जाया करते थे. पैसों के लिए एकमात्र सहारा उस का मालिक था

जो 1-2 महीने से ज्यादा की एडवांस तनख्वाह नहीं दे सकता था.

तो फिर क्या किया जाए? अगर श्वेता ने पुलिस में शिकायत कर दी तो उसे लेने के देने पड़ जाएंगे. एक साल पहले ही वह मुंबई आया था. कोई ऐसा जानकार भी नहीं था जिस से उसे पैसों की मदद मिल सके.

आनंद मुंबई के दादर इलाके में एक प्लाट पर बने छोटे से झोंपड़ीनुमा मकान में रहता था. प्लाट के मालिक ने प्लाट की देखभाल के लिए उसे वहां टिका दिया था. प्लाट के मालिक की उस प्लाट पर एक बहुमंजिला अपार्टमैंट्स बनाने की योजना थी जिस के लिए बिल्डरों से बात चल रही थी.

आनंद को महज 6,000 रुपए तनख्वाह मिलती थी. घर पर बेकार बैठे रहने के बजाय यह भी बुरा न था. न जाने कितने लोग मुंबई जैसे बड़े शहरों में मामूली तनख्वाह पर काम करने आते हैं क्योंकि उन के पास और कोई काम नहीं होता. कइयों को तो काफी खराब हालात में रहना पड़ता है, पर वह संतुष्ट था. रहने को झोंपड़ी थी ही. वहीं कुछ कच्चापक्का बना कर खा लेता था. बिजलीपानी की सुविधा चौबीसों घंटे थी जिस का बिल मालिक अदा करता था.

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काफी सोचविचार के बाद आनंद के दिमाग में एक ही उपाय आया श्वेता को रास्ते से हटाने का. उस की हत्या कर देना, पर लाश को कहां और कैसे ठिकाने लगाएगा, यह बहुत बड़ी समस्या थी.

काफी सोचविचार के बाद आनंद ने लाश को प्लाट के एक कोने में फेंक कर खुद पुलिस को सूचित करने की योजना सोची. वह खुद शिकायत करेगा तो पुलिस को शक भी नहीं होगा.

अगली बार जब श्वेता आई तो आनंद ने उस का दिल खोल कर स्वागत किया.

‘‘जैसेतैसे मैं ने रुपयों का इंतजाम किया है. आगे से इतनी बड़ी रकम मत मांगना. मैं गरीब आदमी कहां से इतनी बड़ी रकम लाऊंगा?’’ आनंद ने श्वेता को बांहों में भरते हुए कहा.

श्वेता को इस बात से मतलब नहीं था कि आनंद ने रुपयों का इंतजाम कहां से किया है. मन ही मन उस ने सोचा, ‘रुपए तो मैं तुम से हमेशा मांगूंगी. आखिर मजबूरी में तुम्हें अपना जिस्म देती हूं तो उस का भुगतान तो देना ही होगा.’

श्वेता बोली, ‘‘अगर जरूरत नहीं होती तो तुम्हें क्यों तकलीफ देती…’’

फिर वे दोनों एकदूसरे के आगोश में समा गए. आनंद सोच रहा था कि वह आखिरी बार श्वेता के जिस्म को भोग रहा है, इस के बाद तो इसे खत्म कर देना है इसलिए वह जम कर उस के बदन का मजा ले रहा था.

श्वेता सोच रही थी कि आज 50,000 रुपए लेने के बाद फिर कब उस से रकम मांगनी है.

मौका पा कर आनंद ने श्वेता

का गला दबा दिया, फिर चाकू से

गले को रेत दिया और लाश को एक कोने में जा कर फेंक दिया.

आनंद को अपने प्लान पर पूरा भरोसा था, इसलिए वह आराम से सो गया. अगले दिन सुबह उस ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर जानकारी दी कि एक औरत की लाश प्लाट के एक कोने में पड़ी हुई है.

आनंद को यह गुमान था कि पुलिस को आसानी से चकमा दिया जा सकता है और इस के लिए उस ने खुद पुलिस से शिकायत करने की तरकीब अपनाई थी. शिकायत करने वाले पर पुलिस भला क्यों शक करेगी, उस ने यही सोचा था.

पुलिस ने आ कर सब से पहले श्वेता को अस्पताल पहुंचाया, जहां उसे ‘मृत लाया गया’ घोषित कर दिया. पुलिस ने अनजान शख्स के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया.

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आनंद बहुत खुश हुआ. उसे अपनी योजना कामयाब होती दिखाई दी, पर उसे पता नहीं था कि पुलिस शक के आधार पर उस से पूछताछ शुरू कर देगी. विरोधाभाषी बयानों के चलते वह पकड़ में आ गया और फिर मामला सुलझ गया.

आनंद ज्यादा देर तक पुलिस के सामने टिक नहीं पाया और उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. वही पुलिस को उस जगह पर भी ले गया जहां उस ने हत्या में इस्तेमाल किया गया चाकू छिपा कर रखा था.

इस तरह श्वेता के लालच ने उस की जिंदगी खत्म करवा दी और जिस्मानी आकर्षण ने आनंद की जिंदगी बरबाद कर दी.

मौनसून में कौन सी डाइट है राइट, जानें यहां

मौनसून में खानपान का खयाल रखना चाहिए. अगर मौनसून में खानपान सही तरीके का नहीं हुआ तो बीमारियां शरीर पर हमला कर देती हैं. खासतौर पर खाने में गड़बड़ी होने से लिवर इन्फैक्शन होने की संभावना ज्यादा रहती है जिस से पेट खराब हो जाता है.

खाने के साथसाथ साफ पानी भी पीना चाहिए. अगर स्वच्छ पानी की व्यवस्था नहीं है तो पानी को उबाल कर ठंडा कर लेना चाहिए. उस को साफ कपड़े से ढक कर रखना चाहिए.

मौसम के बदलने से शरीर पर प्रभाव पड़ता है. साफसुथरा खाने से मौसमी बीमारियों का खतरा नहीं रहता है. डाइटीशियन स्वाति आहलूवालिया कहती हैं, ‘‘बदलते मौसम में हैल्दी डाइट से बीमारियों को शरीर से दूर रखा जा सकता है.’’

खानपान के इस प्रभाव को समझने के लिए ही कहा जाता है कि ‘जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन.’ खानपान का संबंध केवल पेट की भूख मिटाने भर से नहीं है. खाने का संबंध हमारे शरीर के साथसाथ हमारे मन से भी होता है. बदलते मौसम में शरीर पर कई तरह की बीमारियों का खतरा मंडराता रहता है. इस से बचने के लिए संतुलित आहार की बहुत जरूरत है. खासतौर पर जब मौनसून की बात हो तो जरूर सतर्क हो जाएं. इस मौसम में बैलेंस्ड डाइट आवश्यक है.

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बैलेंस्ड डाइट लें

हमारे शरीर को हवा, सूर्य की रोशनी और पानी के अलावा कार्बोहाइड्रैट, फैट और प्रोटीन की भी जरूरत होती है. ये तत्त्व हमारे शरीर को बीमारियों से लड़ने की क्षमता और काम करने के लिए एनर्जी देते हैं. मौनसून के स्वास्थ्य आहार में फल, सब्जी, स्टार्च (इस में दालें, अनाज, दूध, दही सोयाबीन, अंडा और मछली आती है) लेना चाहिए. इस के साथ ही साथ प्रोटीन के लिए दूध, पनीर, दही, सोयाबीन, अंडा जरूर लेना चाहिए.

इस मौसम में हम जो खाना खाते हैं उस का एकतिहाई हिस्सा स्टार्च फूड से भरा होना चाहिए. स्टार्च फूड एनर्जी का सब से बढि़या माध्यम होता है. मौनसून में मौसमी फल भी खूब मिलते हैं. इन में आम, नीबू, लीची, तरबूज और खरबूजा जरूर खाना चाहिए, मौनसून में शरीर से पसीना बहुत निकल जाता है, ऐसे में शरीर के पानी को पूरा करने के लिए ये फल मददगार साबित होते हैं.

मौनसून में तलाभुना खाना खूब खाया जाता है. गरमागरम पकौड़ी, चाय, परांठों का मजा बरसात में आता है. इस से शरीर में फैट बढ़ता है. फैट को शरीर के दुश्मन के रूप में देखा जाता है. मौनसून के आहार में भी उचित मात्रा में फैट का होना जरूरी होता है. जरूरत इस बात की होती है कि सैचुरेटिड फैट की जगह पर अनसैचुरेटिड फैट को जगह देनी चाहिए. वेजिटेबल औयल जैसे सनफ्लौवर का तेल अनसैचुरेटिड फैट वाला होता है. मौनसून में इस का प्रयोग करना चाहिए. अगर आप ज्यादा मोटे हैं तो आप को लो फैट कैलोरीज का प्रयोग करना चाहिए.

कैलोरी के हिसाब से खाएं

कोई भी मौसम हो, आप को यह पता होना चाहिए कि आप को कितना खाने की जरूरत है. लड़कियों को सामान्य जीवन में 3,500 कैलोरी की प्रतिदिन जरूरत होती है. इस को पूरा करने के लिए नाश्ते की शुरुआत में चाय या जूस ले सकती हैं. इस के साथ कौर्नफ्लैक्स, अंकुरित अनाज या फिर बिस्कुट ले सकती हैं. अगर आप शाकाहारी हैं तो मछली और अंडे की जगह पर दूध या दूध से बनी खाने वाली वस्तुओं का प्रयोग कर सकती हैं. लंच में दाल और सीजनल सब्जियों को भरपूर जगह दें.

मौनसून में मिलने वाले फल आम, तरबूज, खरबूजे को भी लंच में शामिल करें. सलाद में टमाटर, खीरा, मूली और नीबू का प्रयोग जरूर करें. सलाद खाते समय यह जरूर ध्यान रखें कि यह अच्छी तरह से धुला हो. मौनसून में पत्तेदार सब्जियों और सलाद में कीड़े लग जाते हैं. ये सेहत के लिए बहुत नुकसानदायक होते हैं. रात का खाना हलका होना चाहिए. खाने के बाद बरसात में आमतौर पर लोग सो जाते हैं, इसलिए हैवी और मुश्किल से पचने वाले खाने का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. रात के खाने में सब्जीरोटी का ही प्रयोग करना चाहिए, सलाद और जूस भी लिया जा सकता है.

खूब खाएं सीजनल फल

बच्चों की उम्र बढ़ने वाली होती है तो उन को ऐसा खाना देना चाहिए जो उन के विकास में सहायक हो. उन के खाने में विटामिन, प्रोटीन, कैल्शियम और फाइबर की भरपूर मात्रा होनी चाहिए. बच्चों का नाश्ता दालों से बनी चीजों से होना चाहिए. दालों में सब से ज्यादा प्रोटीन होता है.

मौनसून में बच्चे स्कूल जाने की शुरुआत करते हैं जहां पर उन को खेल और पढ़ाई दोनों में भरपूर मेहनत करनी होती है. दूध, टोस्ट और शाकाहारी न हों तो अंडा और मछली खाने में दी जा सकती है. बच्चों का लंच भी खास किस्म का होना चाहिए. मक्खन, दाल, दही, सब्जी और जूस खाने में जरूर देना चाहिए.

सीजनल फू्रट या इस से बने पेय पदार्थ भी देने चाहिए. शाम के नाश्ते में मेवे से बने पदार्थ और दूध का प्रयोग करना चाहिए. रात के खाने में बच्चों को परहेज करने की जरूरत नहीं होती है. उन का लिवर अच्छी तरह से काम करता है, इसलिए उन को भरपूर मात्रा में खाना चाहिए.

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रात में करें मांसाहार से परहेज

लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को खाने में ज्यादा कैलोरी की जरूरत होती है. इस के साथ ही साथ उन को अपने शरीर का भी ज्यादा खयाल रखना होता है. ऐसे में नाश्ते से ले कर लंच तक बहुत सोचसमझ कर खाना चाहिए. सुबह के नाश्ते की शुरुआत अंकुरित दालों से कर दूधदही या फिर जूस ले सकते हैं. शाम को मौसमी फलों से बने शेक का मजा ले सकते हैं. ब्राउन ब्रैड से बनी चीजें भी खा सकते हैं.

लंच भरपूर होना चाहिए. डिनर हलका लें. जितना खाना आप लंच में लेते हों, डिनर में उस का 50 फीसदी या फिर 75 फीसदी ही लेना चाहिए. बरसात में मांसाहारी भोजन करने से बचें. रात के खाने में भी मांसाहार से बचें. डिनर में तरहतरह के पौष्टिक पदार्थों को ही प्राथमिकता दें.

मौनसून में ये  जरूर करें

  • मौनसून में साफ पानी पीना चाहिए. अगर स्वच्छ पानी की व्यवस्था नहीं है तो पानी को उबाल कर ठंडा कर लेना चाहिए. उस को साफ कपड़े से ढक कर रखना चाहिए.
  • फ्रिज में रखे खाने को गरम कर के खाने से बचें. अगर खाना जरूरी हो तो पहले यह देख लें कि खाना खराब न हुआ हो. अगर खाना सही हो तो उस को खूब गरम करें जिस से खाने में बैक्टीरिया को खत्म किया जा सके.
  • फ्राइड राइस और तली चीजों का प्रयोग ताजा ही करें. रखे खाने को फ्राई कर के न खाएं.
  • सलाद का प्रयोग सावधानी से करें. सलाद की पत्तियों में कीड़े हो सकते हैं जो बहुत नुकसानदायक होते हैं.
  • सड़े और पहले से कटे फलों का सेवन कतई न करें. इस से बीमारी फैलने का खतरा रहता है.
  • दूध और दही या दूध से बने दूसरे खाद्यपदार्थों का सेवन करते समय यह जरूर देख लें कि वे सही हैं या नहीं. मौनसून में दूध से बनी चीजें जल्दी खराब हो जाती हैं.
  • खाना हमेशा गरम खाएं. खाना खुला हुआ कभी न रखें. खाना बनाने और खाने वाली जगह पर कीड़ों को न आने दें. सफाई पर ध्यान दें. इन जगहों पर धूप लगे, इस का पूरा इंतजाम करें.
  • मौनसून के दौरान सरसों के तेल, मक्खन या मूंगफली के तेल में बना खाना खाने से बचना चाहिए.
  • स्ट्रीट फूड खाने से बचें.
  • आम अधिक न खाएं, इस से पिंपल्स होने की संभावना होती है.कच्चा दूध पीने से बचें.

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घर पर पाएं पार्लर जैसा क्लीनअप

आपको इस भागदौड़ भरी जिंदगी में रोज धूल, धूप और प्रदूषण से सामना करता पड़ता है. आपको अपने चेहरे को प्रदूषण से बचाने के लिए क्लीपअप करने की बहुत आवश्यकता होती है. अब ऐसे में आप घर पर फेस क्लिनअप कर सकती हैं. और वो भी पार्लर जैसा क्लिनअप. तो आइए जानते हैं, घर पर आप कैसे फेस क्लीनअप कर सकती हैं?

घर पर पाएं पार्लर जैसा फेस क्लीनअप

सबसे पहले एक चम्मच गेहूं के आटा में एक चम्मच दही डालें. फिर आधा चम्मच नींबू का रस इसमें डालकर, इसे मिलाएं. और आप चेहरे पर इसे लगा सकती हैं. इससे फेस की टैनिंग हटाता है. इसके अलावा फेस को गोरा करने में मदद करता है.

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चेहरे पर मुल्तानी मिट्टी, चंदन पाउडर और गुलाब जल मिलाकर लगाएं. कुछ देर के बाद फेस धो लें और ये पैक स्किन टाइटनिंग का भी काम करता है.

गरमी के मौसम में पोर्स ओपन हो जाते हैं इसलिए पोर्स बंद करने के लिए पूरे फेस पर गुलाब जल लगा लें. ये काफी असरकारक होता है.

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घर पर ऐसे बनाएं तंदूरी आलू

आलू की इस शानदार डिश को आप प्याज और सौंठ की चटनी के साथ सर्व कर सकते हैं. तो आइए जानते हैं इस रेसिपी को बनाने की विधि.

सामग्री

बेबी पोटैटो

तलने के लिए:

20 टेबल स्पून देसी घी

मसाला मिश्रण

1/2 टी स्पून आमचुर

1/2 टी स्पून काला नमक

1/2 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर

1 टी स्पून नमक

1/2 टी स्पून पीली मिर्च पाउडर

1 टी स्पून चाट मसाला

4 टेबल स्पून सौंठ चटनी

गार्निशिंग के लिए:

150 ग्राम टमाटर

150 ग्राम प्याज

30 ग्राम मिर्च

30 ग्राम धनिया

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बनाने की वि​धि

आलुओं को छिलके सहित आधा पकने तक उबाल लें.

आलुओं का छिलका उतार लें.

आलुओं को सीख में लगाकर तेल लगा लें.

इन्हें तंदूर में हल्के ब्राउन होने तक पकाएं.

आलुओं को ठंडा होने दें और इन्हें हथेलियों के बीच में रख कर दबाएं, इसे फ्लैटन कर लें, क्रश न करें.

एक पैन में घी गर्म करें और आलुओ को ​क्रिस्पी और गोल्डन ब्राउन होने तक फ्राई करें.

आमचुर, नमक, काला नमक, लाल मिर्च पाउडर और पीली मिर्च पाउडर मिलाकर एक मिक्सचर बना लें.

ड्राई मसाला डालकर आलुओं को भून लें और इसे प्लेट में लगा लें.

आलुओं को सौंठ की चटनी, कटा प्याज, टमाटर, हरी मिर्च और हरा धनिया डालें.

और गर्मागर्म सर्व करें.

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नासमझी की आंधी

सुबहसुबह रमेश की साली मीता का फोन आया. रमेश ने फोन पर जैसे ही  ‘हैलो’ कहा तो उस की आवाज सुनते ही मीता झट से बोली, ‘‘जीजाजी, आप फौरन घर आ जाइए. बहुत जरूरी बात करनी है.’’

रमेश ने कारण जानना चाहा पर तब तक फोन कट चुका था. मीता का घर उन के घर से 15-20 कदम की दूरी पर ही था. रमेश को आज अपनी साली की आवाज कुछ घबराई हुई सी लगी. अनहोनी की आशंका से वे किसी से बिना कुछ बोले फौरन उस के घर पहुंच गए. जब वे उस के घर पहुंचे, तो देखा उन दोनों पतिपत्नी के अलावा मीता का देवर भी बैठा हुआ था. रमेश के घर में दाखिल होते ही मीता ने घर का दरवाजा बंद कर दिया. यह स्थिति उन के लिए बड़ी अजीब सी थी. रमेश ने सवालिया नजरों से सब की तरफ देखा और बोले, ‘‘क्या बात है? ऐसी क्या बात हो गई जो इतनी सुबहसुबह बुलाया?’’

मीता कुछ कहती, उस से पहले ही उस के पति ने अपना मोबाइल रमेश के आगे रख दिया और बोला, ‘‘जरा यह तो देखिए.’’

इस पर चिढ़ते हुए रमेश ने कहा, ‘‘यह क्या बेहूदा मजाक है?  क्या वीडियो देखने के लिए बुलाया है?’’

मीता बोली, ‘‘नाराज न होएं. आप एक बार देखिए तो सही, आप को सब समझ आ जाएगा.’’

जैसे ही रमेश ने वह वीडियो देखा उस का पूरा जिस्म गुस्से से कांपने लगा और वह ज्यादा देर वहां रुक नहीं सका. बाहर आते ही रमेश ने दामिनी (सलेहज) को फोन लगाया.

दामिनी की आवाज सुनते ही रमेश की आवाज भर्रा गई, ‘‘तुम सही थी. मैं एक अच्छा पिता नहीं बन पाया. ननद तो तुम्हारी इस लायक थी ही नहीं. जिन बातों पर एक मां को गौर करना चाहिए था, पर तुम ने एक पल में ही गौर कर लिया. तुम ने तो मुझे होशियार भी किया और हम सबकुछ नहीं समझे. यहीं नहीं, दीपा पर अंधा विश्वास किया. मुझे अफसोस है कि मैं ने उस दिन तुम्हें इतने कड़वे शब्द कहे.’’

‘‘अरे जीजाजी, आप यह क्या बोले जा रहे हैं? मैं ने आप की किसी बात का बुरा नहीं माना था. अब आप बात बताएंगे या यों ही बेतुकी बातें करते रहेंगे. आखिर हुआ क्या है?’’

रमेश ने पूरी बात बताई और कहा, ‘‘अब आप ही बताओ मैं क्या करूं? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा.’’ और रमेश की आवाज भर्रा गई.

‘‘आप परेशान मत होइए. जो होना था हो गया. अब यह सोचने की जरूरत है कि आगे क्या करना है? ऐसा करिए आप सब से पहले घर पहुंचिए और दीपा को स्कूल जाने से रोकिए.’’

‘‘पर इस से क्या होगा?’’

‘‘क्यों नहीं होगा? आप ही बताओ, इस एकडेढ़ साल में आप ने क्या किसी भी दिन दीपा को कहते हुए सुना कि वह स्कूल नहीं जाना चाहती? चाहे घर में कितना ही जरूरी काम था या तबीयत खराब हुई, लेकिन वह स्कूल गई. मतलब कोई न कोई रहस्य तो है. स्कूल जाने का कुछ तो संबंध हैं इस बात से. वैसे भी यदि आप सीधासीदा सवाल करेंगे तो वह आप को कुछ नहीं बताएगी. देखना आप, स्कूल न जाने की बात से वह बिफर जाएगी और फिर आप से जाने की जिद करेगी. तब मौका होगा उस से सही सवाल करने का.’’

‘‘क्या आप मेरा साथ दोगी? आप आ सकती हो उस से बात करने के लिए?’’ रमेश ने पूछा.

‘‘नहीं, मेरे आने से कोई फायदा नहीं. दीदी को भी आप जानते हैं. उन्हें बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा. इस बात के लिए मेरा बीच में पड़ना सही नहीं होगा. आप मीता को ही बुला लीजिए.’’

घर जा कर रमेश ने मीता को फोन कर के घर बुला लिया और दीपा को स्कूल जाने से रोका,’’ आज तुम स्कूल नहीं जाओगी.’’

लेकिन उम्मीद के मुताबिक दीपा स्कूल जाने की जिद करने लगी,’’ आज मेरा प्रैक्टिकल है. आज तो जाना जरूरी है.’’

इस पर रमेश ने कहा,’’ वह मैं तुम्हारे स्कूल में जा कर बात कर लूंगा.’’

‘‘नहीं पापा, मैं रुक नहीं सकती आज, इट्स अर्जेंट.’’

‘‘एक बार में सुनाई नहीं देता क्या? कह दिया ना नहीं जाना.’’ पर दीपा बारबार जिद करती रही. इस बात पर रमेश को गुस्सा आ गया और उन्होंने दीपा के गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया. हालांकि? दीपा पर हाथ उठा कर वे मन ही मन दुखी हुए, क्योंकि उन्होंने आज तक दीपा पर हाथ नहीं उठाया था. वह उन की लाड़ली बेटी थी.

तब तक मीता अपने पति के साथ वहां पहुंच गई और स्थिति को संभालने के लिए दीपा को उस के कमरे में ले कर चली गई. वह दीपा से बोली, ‘‘यह सब क्या चल रहा है, दीपा? सचसच बता, क्या है यह सब फोटोज, यह एमएमएस?’’

दीपा उन फोटोज और एमएमएस को देख कर चौंक गई, ‘‘ये…य…यह सब क…क…ब  …कै…से?’’ शब्द उस के गले में ही अटकने लगे. उसे खुद नहीं पता था इस एमएमएस के बारे में, वह घबरा कर रोने लगी.

इस पर मीता उस की पीठ सहलाती हुई बोली, ‘‘देख, सब बात खुल कर बता. जो हो गया सो हो गया. अगर अब भी नहीं समझी तो बहुत देर हो जाएगी. हां, यह तू ने सही नहीं किया. एक बार भी नहीं खयाल आया तुझे अपने बूढ़े अम्माबाबा का? यह कदम उठाने से पहले एक बार तो सोचा होता कि तेरे पापा को तुझ से कितना प्यार है. उन के विश्वास का खून कर दिया तू ने. तेरी इस करतूत की सजा पता है तेरे भाईबहनों को भुगतनी पड़ेगी. तेरा क्या गया?’’

अब दीपा पूरी तरह से टूट चुकी थी. ‘‘मुझे माफ कर दो. मैं ने जो भी किया, अपने प्यार के लिए,  उस को पाने के लिए किया. मुझे नहीं मालूम यह एमएमएस कैसे बना? किस ने बनाया?’’

‘‘सारी बात शुरू से बता. कुछ छिपाने की जरूरत नहीं वरना हम कुछ नहीं कर पाएंगे. जिसे तू प्यार बोल रही है वह सिर्फ धोखा था तेरे साथ, तेरे शरीर के साथ, बेवकूफ लड़की.’’

दीपा सुबकते हुए बोली, ’’राहुल घर के सामने ही रहता है. मैं उस से प्यार करती हूं. हम लोग कई महीनों से मिल रहे थे पर राहुल मुझे भाव ही नहीं देता था. उस पर कई और लड़कियां मरती हैं और वे सब चटखारे लेले कर बताती थीं कि राहुल उन के लिए कैसे मरता है. बहुत जलन होती थी मुझे. मैं उस से अकेले में मिलने की जिद करती थी कि सिर्फ एक बार मिल लो.’’

‘‘लेकिन छोटा शहर होने की वजह से मैं उस से खुलेआम मिलने से बचती थी. वही, वह कहता था, ‘मिल तो लूं पर अकेले में. कैंटीन में मिलना कोई मिलना थोड़े ही होता है.’

‘‘एकदिन मम्मीपापा किसी काम से शहर से बाहर जा रहे थे तो मौके का फायदा उठा कर मैं ने राहुल को घर आ कर मिलने को कह दिया, क्योंकि मुझे मालूम था कि वे लोग रात तक ही वापस आ पाएंगे. घर में सिर्फ दादी थी और बाबा तो शाम तक अपने औफिस में रहेंगे. दादी घुटनों की वजह से सीढि़यां भी नहीं चढ़ सकतीं तो इस से अच्छा मौका नहीं मिलेगा.

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‘‘आप को भी मालूम होगा कि हमारे घर के 2 दरवाजे हैं, बस, क्या था, मैं ने पीछे वाला दरवाजा खोल दिया. उस दरवाजे के खुलते ही छत पर बने कमरे में सीधा पहुंचा जा सकता है और ऐसा ही हुआ. मौके का फायदा उठा कर राहुल कमरे में था. और मैं ने दादी से कहा, ‘अम्मा मैं ऊपर कमरे में काम कर रही हूं. अगर मुझ से कोई काम हो तो आवाज लगा देना.’

‘‘इस पर उन्होंने कहा, ‘कैसा काम कर रही है, आज?’ तो मैं ने कहा, ‘अलमारी काफी उलटपुलट हो रही है. आज उसी को ठीक करूंगी.’

‘‘सबकुछ मेरी सोच के अनुसार चल रहा था. मुझे अच्छी तरह मालूम था कि अभी 3 घंटे तक कोई नौकर भी नहीं आने वाला. जब मैं कमरे में गई तो अंदर से कमरा बंद कर लिया और राहुल की तरफ देख कर मुसकराई.

‘‘मुझे यकीन था कि राहुल खुश होगा. फिर भी पूछ बैठी, ‘अब तो खुश हो न? चलो, आज तुम्हारी सारी शिकायत दूर हो गई होगी. हमेशा मेरे प्यार पर उंगली उठाते थे.’ अब खुद ही सोचो, क्या ऐसी कोई जगह है. यहां हम दोनों आराम से बैठ कर एकदो घंटे बात कर सकते हैं. खैर, आज इतनी मुश्किल से मौका मिला है तो आराम से जीभर कर बातें करते हैं.’’

‘‘नहीं, मैं खुश नहीं हूं. मैं क्या सिर्फ बात करने के लिए इतना जोखिम उठा कर आया हूं. बातें तो हम फोन पर भी कर लेते हैं. तुम तो अब भी मुझ से दूर हो.’’ मुझे बहुत कुठा…औरतों के साथ तो वह जम कर…था.

‘‘मैं ने कहा, ‘फिर क्या चाहते हो?’

‘‘राहुल बोला, ‘देखो, मैं तुम्हारे लिए एक उपहार लाया हूं, इसे अभी पहन कर दिखाओ.’

‘‘मैं ने चौंक कर वह पैकेट लिया और खोल कर देखा. उस में एक गाउन था. उस ने कहा, ‘इसे पहनो.’

‘पर…र…?’ मैं ने अचकचाते हुए कहा.

‘‘‘परवर कुछ नहीं. मना मत करना,’ उस ने मुझ पर जोर डाला. ‘अगर कोई आ गया तो…’ मैं ने डरते हुए कहा तो उस ने कहा, ‘तुम को मालूम है, ऐसा कुछ नहीं होने वाला. अगर मेरा मन नहीं रख सकती हो, तो मैं चला जाता हूं. लेकिन फिर कभी मुझ से कोई बात या मिलने की कोशिश मत करना,’ वह गुस्से में बोला.

‘‘मैं किसी भी हालत में उसे नाराज नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैं ने उस की बात मान ली. और जैसे ही मैं ने नाइटी पहनी.’’ बोलतेबोलते दीपा चुप हो गई और पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदने लगी.

‘‘आगे बता क्या हुआ?  चुप क्यों हो गई?  बताते हुए शर्म आ रही है पर तब यह सब करते हुए शर्म नहीं आई?’’ मीता ने कहा.

पर दीपा नीची निगाह किए बैठी रही.

‘‘आगे बता रही है या तेरे पापा को बुलाऊं? अगर वे आए तो आज कुछ अनहोनी घट सकती है,’’ मीता ने डांटते हुए कहा.

पापा का नाम सुनते ही दीपा जोरजोर से रोने लगी. वह जानती थी कि आज उस के पापा के सिर पर खून सवार है. ‘‘बता रही हूं.’’ सुबकते हुए बोली, ‘‘जैसे ही मैं ने नाइटी पहनी, तो राहुल ने मुझे अपनी तरफ खींच लिया.

‘‘मैं ने घबरा कर  उस को धकेला और कहा, ‘यह क्या कर रहे हो? यह सही नहीं है.’ इस पर उस ने कहा, ‘सही नहीं है, तुम कह रही हो? क्या इस तरह से बुलाना सही है? देखो, आज मुझे मत रोको. अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो.’

‘‘‘तो क्या?’

‘‘‘देखो, मैं यह जहर खा लूंगा’, और यह कहते हुए उस ने जेब से एक पुडि़या निकाल कर इशारा किया. मैं डर गई कि कहीं यहीं इसे कुछ हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे. और फिर उस ने वह सब किया, जो कहा था. उस की बातों में आ कर मैं अपनी सारी सीमाएं लांघ चुकी थी. पर कहीं न कहीं मन में तसल्ली थी कि अब राहुल को मुझ से कोई शिकायत नहीं रही. पहले की तरह फिर पूछा, ‘राहुल अब तो खुश हो न?’

‘‘‘नहीं, अभी मन नहीं भरा. यह एक सपना सा लग रहा है. कुछ यादें भी तो होनी चाहिए’, उस ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘यादें, कैसी यादें’, मैं ने सवालिया नजर डाली. ‘अरे, वही कि जब चाहूं तुम्हें देख सकूं,’ उस से राहुल ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘पता नही क्यों अपना सबकुछ लुट जाने के बाद भी, मैं मूर्ख उस की चालाकी को प्यार समझ रही थी. मैं ने उस की यह ख्वाहिश भी पूरी कर देनी चाही और पूछा, ‘वह कैसे?’

‘‘‘ऐसे,’ कहते हुए उस ने अपनी अपनी जेब से मोबाइल निकाल कर झट से मेरी एक फोटो ले ली. फिर, ‘मजा नहीं आ रहा,’ कहते कहते, एकदम से मेरा गाउन उतार फेंका और कुछ तसवीरें जल्दजल्दी खींच लीं.

‘‘यह सब इतना अचानक से हुआ कि मैं उस की चाल नहीं समझ पाई. समय भी हो गया था और मम्मीपापा के आने से पहले सबकुछ पहले जैसा ठीक भी करना था. कुछ देर बाद राहुल वापस चला गया और मैं नीचे आ गई. किसी को कुछ नहीं पता लगा.

‘‘पर कुछ दिनों बाद एक दिन दामिनी मामी घर पर आई. उन की नजरें मेरे गाल पर पड़े निशान पर अटक गईं. वे पूछ बैठीं, ‘क्या हो गया तेरे गाल पर?’ मैं ने उन से कहा, ‘कुछ नहीं मामी, गिर गई थी.’

‘‘पर पता नहीं क्यों मामी की नजरें सच भांप चुकी थीं. उन्होंने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, ‘गिरने पर इस तरह का निशान कैसे हो गया? यह तो ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने जोर से चुंबन लिया हो. सब ठीक तो है न दीपा?’

‘‘मैं ने नजरें चुराते हुए थोड़े गुस्से के लहजे में कहा, ‘पागल हो गई हो क्या? कुछ सोच कर तो बोलो.’ और मैं गुस्से से वहां से उठ कर चली गई. ‘‘लंच के बाद सब लोग बैठे हुए हंसीमजाक कर रहे थे. मामी मुझे समझाने के मकसद से आईं तो उन्होंने मुझे खिड़की के पास खड़े हो कर, राहुल को इशारा करते हुए देख लिया. हालांकि मैं उन के कदमों की आहट से संभल चुकी थी पर अनुभवी नजरें सब भांप गई थीं. मामी ने मम्मी से कहा, ‘दीदी, अब आप की लड़की बड़ी हो गई है. कुछ तो ध्यान रखो. कैसी मां हो? आप को तो अपने घूमनेफिरने और किटीपार्टी से ही फुरसत नहीं है.’

‘‘पर मम्मी ने उलटा उन को ही डांट दिया. फिर मामी ने चुटकी लेते हुए मुझ से कहा, ‘क्या बात है दीपू? हम तो तुम से इतनी दूर मिलने आए हैं और तुम हो कि बात ही नहीं कर रहीं. अरे भई, कहीं इश्कविश्क का तो मामला नहीं है? बता दो, कुछ हैल्प कर दूंगी.’

‘‘‘आप भी न कुछ भी कहती रहती हो. ऐसा कुछ नहीं है,’ मैं ने अकड़ते हुए कहा. लेकिन मामी को दाल में कुछ काला महसूस हो रहा था. उन का दिल कह रहा था कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है और वे यह भी जानती थीं की ननद से कहने का कोई फायदा नहीं, वे बात की गहराई तो समझेंगी नहीं. इसलिए उन को पापा से ही कहना ठीक लगा, ‘बुरा मत मानिएगा जीजाजी, अब दीपा बच्ची नहीं रही. हो सकता है मैं गलत सोच रही हूं. पर मैं ने उसे इशारों से किसी से बात करते हुए देखा है.’

‘‘पापा ने इस बात को कोई खास तवज्जुह नहीं दी, सिर्फ ‘अच्छा’ कह कर  बात टाल दी. जब मामीजी ने दोबारा कहा तो पापा ने कहा, ‘मुझे विश्वास है उस पर. ऐसा कुछ नहीं. मैं अपनेआप देख लूंगा.’

‘‘मैं मन ही मन बहुत खुश थी, लेकिन यह खुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी. अब राहुल उन फोटोज को दिखा कर मुझे धमकाने लगा. रोज मिलने की जिद करता और मना करने पर मुझ से कहता, ‘अगर आज नहीं मिलीं तो ये फोटोज तेरे घर वालों को दिखा दूंगा.’

‘‘पहले तो समझ नहीं आया क्या करूं? कैसे मिलूं? पर बाद में रोज स्कूल से वापस आते हुए मैं राहुल से मिलने जाने लगी.’’

‘‘पर कहां पर? कहां मिलती थी तू उस से,’’ मीता ने जानना चाहा.

‘‘बसस्टैंड के पास उस का एक छोटा सा स्टूडियो है. वहीं मिलता था और मना करने के बाद भी मुझ से जबरदस्ती संबंध बनाता. एक बार तो गर्भ ठहर गया था.’’

‘‘क्या? तब भी घर में किसी को पता नहीं चला?’’ मीता चौंकी.

‘‘नहीं, राहुल ने एक दवा दे दी थी. जिस को खाते ही काफी तबीयत खराब हो गई थी और मैं बेहोश भी हो गई थी.’’

‘‘अच्छा, हां, याद आया. ऐसा कुछ हुआ तो था. और उस के बाद भी तू किसी को ले कर डाक्टर के पास नहीं गई. अकेले जा कर ही दिखा आई थी. दाद देनी पड़ेगी तेरी हिम्मत की. कहां से आ गई इतनी अक्ल सब को उल्लू बनाने की. वाकई तू ने सब को बहुत धोखा दिया. यह सही नहीं हुआ. वहां राहुल के अलावा और कौनकौन होता था?’’

‘‘मुझे नहीं मालूम.’’ लेकिन मुझे इतनी बात समझ में आ गई थी कि राहुल मुझे ब्लैकमेल कर मेरी मजबूरी का फायदा उठा रहा है. और मैं तब से जो भी कर रही थी, अपने घर वालों से इस बात को छिपाने के लिए मजबूरी में कर रही थी. मुझे माफ कर दो. मुझे नहीं पता था कि उस ने मेरा एमएमएस बना लिया है. मैं नहीं जानती कि उस ने यह वीडियो कब बनाया. उस ने मुझे कभी एहसास नहीं होने दिया कि हम दोनों के अलावा वहां पर कोई तीसरा भी है, जो यह वीडियो बना रहा है…’’ और वह बोलतेबोलते  रोने लगी.

मीता को सारा माजरा समझ आ चुका था. वह बस, इतना ही कह पाई,’’ बेवकूफ लड़की अब कौन करेगा यकीन तुझ पर? कच्ची उम्र का प्यार तुझे बरबाद कर के चला गया. इस नासमझी की आंधी ने सब तहसनहस कर दिया.’’

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उस ने रमेश को सब बताया. तो, एक बार को तो रमेश को लगा कि सबकुछ खत्म हो गया है. पर सब के समझाने पर उस ने सब से पहले थानेदार से मिल कर वायरल हुए वीडियो को डिलीट करवाया. अपने शहर के एक रसूखदार आदमी होने की वजह से, उन के एक इशारे पर पुलिस वालों ने राहुल को जेल में बंद कर दिया. उस के बाद पूरे परिवार को बदनामी से बचाने के लिए सभी लोकल अखबारों के रिपोर्टर्स को न छापने की शर्त पर रुपए खिलाए. दीपा को फौरन शहर से बहुत दूर पढ़ने भेज दिया, क्योंकि कहीं न कहीं रमेश के मन में उस लड़के से खतरा बना हुआ था. हालांकि, बाद में वह लड़का कहां गया, उस के साथ क्या हुआ?  यह किसी को पता नहीं चला.

विवाह

‘‘मैं लेट हो गई क्या?’’ विदिशा ने पूछा.

‘‘नहीं, मैं ही जल्दी आ गया था,’’ राज बोला.

‘‘तुम से एक बात पुछूं क्या?’’ विदिशा ने कहा.

‘‘जोकुछ पूछना है, अभी पूछ लो. शादी के बाद कोई उलझन नहीं होनी चाहिए,’’ राज ने कहा.

‘‘तुम ने कैमिस्ट्री से एमएससी की है, फिर भी गांव में क्यों रहते हो? पुणे में कोई नौकरी या कंपीटिशन का एग्जाम क्यों नहीं देते हो?’’

‘‘100 एकड़ खेती है हमारी. इस के अलावा मैं देशमुख खानदान का एकलौता वारिस हूं. मेरे अलावा कोई खेती संभालने वाला नहीं है. नौकरी से जो तनख्वाह मिलेगी, उस से ज्यादा तो मैं अपनी खेती से कमा सकता हूं. फिर क्या जरूरत है नौकरी करने की?’’

राज के जवाब से विदिशा समझ गई कि यह लड़का कभी अपना गांव छोड़ कर शहर नहीं आएगा.

शादी का दिन आने तक राज और विदिशा एकदूसरे की पसंदनापसंद, इच्छा, हनीमून की जगह वगैरह पर बातें करते रहे.

शादी के दिन दूल्हे की बरात घर के सामने मंडप के पास आ कर खड़ी हो गई, लेकिन दूल्हे की पूजाआरती के लिए दुलहन की तरफ से कोई नहीं आया, क्योंकि दुलहन एक चिट्ठी लिख कर घर से भाग गई थी.

‘पिताजी, मैं बहुत बड़ी गलती कर रही हूं, लेकिन शादी के बाद जिंदगीभर एडजस्ट करने के लिए मेरा मन तैयार नहीं है. मां के जैसे सिर्फ चूल्हाचौका संभालना मुझ से नहीं होगा. आप ने जो रिश्ता मेरे लिए ढूंढ़ा है, वहां किसी चीज की कमी नहीं है. ऐसे में मैं आप को कितना भी समझाती, मुझे इस विवाह से छुटकारा नहीं मिलता, इसलिए आप को बिना बताए मैं यह घर हमेशा के लिए छोड़ कर जा रही हूं…’

‘‘और पढ़ाओ लड़की को…’’ विदिशा के पिता अपनी पत्नी पर गुस्सा करते हुए रोने लगे. वर पक्ष का घर श्मशान की तरह शांत हो गया था. देशमुख परिवार गम में डूब गया था. गांव वालों के सामने उन की नाक कट चुकी थी, लेकिन राज ने परिवार की हालत देखते हुए खुद को संभाल लिया.

विदिशा पुणे का होस्टल छोड़ कर वेदिका नाम की सहेली के साथ एक किराए के फ्लैट में रहने लगी. उस की एक कंपनी में नौकरी भी लग गई.

वेदिका शराब पीती थी, पार्टी वगैरह में जाती थी, लेकिन उस के साथ रहने के अलावा विदिशा के पास कोई चारा नहीं था. 4 साल ऐसे ही बीत गए.

एक रात वेदिका 2 लाख रुपए से भरा एक बैग ले कर आई. विदिशा उस से कुछ पूछे, तभी उस के पीछे चेहरे पर रूमाल बांधे एक जवान लड़का भी फ्लैट में आ गया.

‘‘बैग यहां ला, नहीं तो बेवजह मरेगी,’’ वह लड़का बोला.

‘‘बैग नहीं मिलेगा… तू पहले बाहर निकल,’’ वेदिका ने कहा.

उस लड़के ने अगले ही पल में वेदिका के पेट में चाकू घोंप दिया और बैग ले कर फरार हो गया.

विदिशा को कुछ समझ नहीं आ रहा था. उस ने तुरंत वेदिका के पेट से चाकू निकाला और रिकशा लेने के लिए नीचे की तरफ भागी. एक रिकशे वाले को ले कर वह फ्लैट में आई, लेकिन रिकशे वाला चिल्लाते हुए भाग गया.

विदिशा जब तक वेदिका के पास गई, तब तक उस की सांसें थम चुकी थीं. तभी चौकीदार फ्लैट में आ गया. पुलिस स्टेशन में फोन किया था.

विदिशा बिलकुल निराश हो चुकी थी. वेदिका का यह मामला उसे बहुत महंगा पड़ने वाला था, इस बात को वह समझ चुकी थी. रोरो कर उस की आंखें लाल हो चुकी थीं.

पुलिस पूरे फ्लैट को छान रही थी. वेदिका की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. दूसरे दिन सुबह विदिशा को पुलिस स्टेशन में पूछताछ के लिए बुलाया गया. सवेरे 9 बजे से ही विदिशा पुलिस स्टेशन में जा कर बैठ गई. वह सोच रही थी कि यह सारा मामला कब खत्म होगा.

‘‘सर अभी तक नहीं आए हैं. वे

10 बजे तक आएंगे. तब तक तुम केबिन में जा कर बैठो,’’ हवलदार ने कहा.

केबिन में जाते ही विदिशा ने टेबल पर ‘राज देशमुख’ की नेमप्लेट देखी और उस की आंखों से टपटप आंसू गिरने लगे.

तभी राज ने केबिन में प्रवेश किया. उसे देखते ही विदिशा खड़ी हो गई.

‘‘वेदिका मर्डर केस. चाकू पर तुम्हारी ही उंगलियों के निशान हैं. हाल में भी सब जगह तुम्हारे हाथों के निशान हैं. खून तुम ने किया है. लेकिन खून के पीछे की वजह समझ नहीं आ रही है. वह तुम बताओ और इस मामले को यहीं खत्म करो,’’ राज ने कहा.

‘‘मैं ने खून नहीं किया है,’’ विदिशा बोली.

‘‘लेकिन, सुबूत तो यही कह रहे हैं,’’ राज बोला.

‘‘कल जोकुछ हुआ है, मैं ने सब बता दिया है,’’ विदिशा ने कहा.

‘‘लेकिन वह सब झूठ है. तुम जेल जरूर जाओगी. तुम ने आज तक जितने भी गुनाह किए हैं, उन सभी की सजा मैं तुम्हें दूंगा मिस विदिशा.’’

‘‘देखिए…’’

‘‘चुप… एकदम चुप. कदम, गाड़ी निकालो. विधायक ने बुलाया है हमें. मैडम, हर सुबह यहां पूछताछ के लिए तुम्हें आना होगा, समझ गई न.’’

विदिशा को कुछ समझ नहीं आ रहा था. शाम को वह वापस पुलिस स्टेशन के बाहर राज की राह देखने लगी.

रात के 9 बजे राज आया. वह मोटरसाइकिल को किक मार कर स्टार्ट कर रहा था, तभी विदिशा उस के सामने आ कर खड़ी हो गई.

‘‘मुझे तुम से बात करनी है.’’

‘‘बोलो…’’

‘‘मैं ने 4 साल पहले बहुत सी गलतियां की थीं. मुझे माफ कर दो. लेकिन मैं ने यह खून नहीं किया है. प्लीज, मुझे इस सब से बाहर निकालो.’’

‘‘लौज में चलोगी क्या? हनीमून के लिए महाबलेश्वर नहीं जा पाए तो लौज ही जा कर आते हैं. तुम्हारे सारे गुनाह माफ हो जाएंगे… तो फिर मोटरसाइकिल पर बैठ रही हो?’’

‘‘राज…’’ विदिशा आगे कुछ कह पाती, उस से पहले ही वहां से राज निकल गया.

दूसरे दिन विदिशा फिर से राज के केबिन में आ कर बैठ गई.

‘‘तुम क्या काम करती हो?’’

‘‘एक प्राइवेट कंपनी में हूं.’’

‘‘शादी हो गई तुम्हारी? ओह सौरी, असलम बौयफ्रैंड है तुम्हारा. बिना शादी किए ही आजकल लड़केलड़कियां सबकुछ कर रहे हैं… हैं न?’’

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‘‘असलम मेरा नहीं, वेदिका का दोस्त था.’’

‘‘2 लड़कियों का एक ही दोस्त हो सकता है न?’’

‘‘मैं ने अब तक असलम नाम के किसी शख्स को नहीं देखा है.’’

‘‘कमाल की बात है. तुम ने असलम को नहीं देखा है. वाचमैन ने रूमाल से मुंह बांधे हुए नौजवान को नहीं देखा. पैसों से भरे बैग को भी तुम्हारे सिवा किसी ने नहीं देखा है. बाकी की बातें कल होंगी. तुम निकलो…’’

रोज सुबह पुलिस स्टेशन आना, शाम 3 से 4 बजे तक केबिन में बैठना, आधे घंटे के लिए राज के सामने जाना. वह विदिशा की बेइज्जती करने का एक भी मौका नहीं छोड़ता था. तकरीबन

2 महीने तक यही चलता रहा.

विदिशा की नौकरी भी छूट गई. गांव में विदिशा की चिंता में उस की मां अस्पताल में भरती हो गई थीं. रोज की तरह आज भी पूछताछ चल रही थी.

‘‘रोजरोज चक्कर लगाने से बेहतर है कि अपना गुनाह कबूल कर लो न?’’

विदिशा ने कुछ जवाब नहीं दिया और सिर नीचे कर के बैठी रही.

‘‘जो लड़की अपने मांपिता की नहीं हुई, वह दोस्त की क्या होगी? असलम कौन है? बौयफ्रैंड है न? कल ही मैं ने उसे पकड़ा है. उस के पास से 2 लाख रुपए से भरा एक बैग भी मिला है,’’ राज विदिशा की कुरसी के पास टेबल पर बैठ कर बोलने लगा.

लेकिन फिर भी विदिशा ने कुछ नहीं कहा. उसे जेल जाना होगा. उस ने जो अपने मांबाप और देशमुख परिवार को तकलीफ पहुंचाई है, उस की सजा उसे भुगतनी होगी. यह बात उसे समझ आ चुकी थी.

तभी लड़की के पिता ने केबिन में प्रवेश किया और दोनों हाथ जोड़ कर राज के पैरों में गिर पड़े, ‘‘साहब, मेरी पत्नी बहुत बीमार है. हमारी बच्ची से गलती हुई. उस की तरफ से मैं माफी मांगता हूं. मेरी पत्नी की जान की खातिर खून के इस केस से इसे बाहर निकालें. मैं आप से विनती करता हूं.’’

‘‘सब ठीक हो जाएगा. आप घर जाइए,’’ राज ने कहा.

विदिशा पीठ पीछे सब सुन रही थी. अपने पिता से नजर मिलाने की हिम्मत नहीं थी उस में. लेकिन उन के बाहर निकलते ही विदिशा टेबल पर सिर रख कर जोरजोर से रोने लगी.

‘‘तुम अभी बाहर जाओ, शाम को बात करेंगे,’’ राज बोला.

‘‘शाम को क्यों? अभी बोलो. मैं ने खून किया है, ऐसा ही स्टेटमैंट चाहिए न तुम्हें? मैं गुनाह कबूल करने के लिए तैयार हूं. मुझ से अब और सहन नहीं हो रहा है. यह खेल अब बंद करो.

‘‘तुम से शादी करने का मतलब केवल देशमुख परिवार की शोभा बनना था. पति के इशारे में चलना मेरे वश की बात नहीं है. मेरी शिक्षा, मेरी मेहनत सब तुम्हारे घर बरबाद हो जाती और यह बात पिताजी को बता कर भी कोई फायदा नहीं था. तो मैं क्या करती?’’ विदिशा रो भी रही थी और गुस्से में बोल रही थी.

‘‘बोलना चाहिए था तुम्हें, मैं उन्हें समझाता.’’

‘‘तुम्हारी बात मान कर पिताजी मुझे पुणे आने देते क्या? पहले से ही वे लड़कियों की पढ़ाई के विरोध में थे. मां ने लड़ाईझगड़ा कर के मुझे पुणे भेजा था. मेरे पास कोई रास्ता नहीं था, इसलिए मुझे मंडप छोड़ कर भागना पड़ा.’’

‘‘और मेरा क्या? मेरे साथ 4 महीने घूमी, मेरी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया, उस का क्या? मेरे मातापिता का इस में क्या कुसूर था?’’

‘‘मुझे लगा कि तुम्हें फोन करूं, लेकिन हिम्मत नहीं हुई.’’

‘‘तुम्हें जो करना था, तुम ने किया. अब मुझे जो करना है, वह मैं करूंगा. तुम बाहर निकलो.’’

विदिशा वहां से सीधी अपने गांव चली गई. मां से मिली.

‘‘मेरी बेटी, यह कैसी सजा मिल रही है तुझे? तेरे हाथ से खून नहीं हो सकता है. अब कैसे बाहर निकलेगी?’’

‘‘मैं ने तुम्हारे साथ जो छल किया?है, उस की सजा मुझे भुगतनी होगी मां.’’

‘‘कुछ नहीं होगा आप की बेटी को, केस सुलझ गया है मौसी. असलम नाम के आदमी ने अपना गुनाह कबूल कर लिया है. वह वेदिका का प्रेमी था. दोनों के बीच पैसों को ले कर झगड़ा था, जिस के चलते उस का खून हुआ.

‘‘आप की बेटी बेकुसूर है. अब जल्दी से ठीक हो जाइए और अस्पताल से घर आइए,’’ राज यह बात बता कर वहां से निकल गया.

विदिशा को अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था.

‘‘सर, मैं आप का यह उपकार कैसे चुकाऊं?’’

‘‘शादी कर लो मुझ से.’’

‘‘क्या?’’

‘‘मजाक कर रहा था. मेरा एक साल का बेटा है मिस विदिशा.’’

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राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा, जानें क्या कहा

लोकसभा चुनाव 2019 में मिली हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी  ने आधिकारिक रूप से कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया.उन्होंने इस्तीफा देने से पहले ट्विटर पर से ‘अध्यक्ष, कांग्रेस’ हटाया फिर कहा,”अब मैं अध्यक्ष नहीं हूं.”

राहुल ने कहा,” 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को मिली हार की वह जिम्मेदारी लेते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा दे रहे हैं.”

अध्यक्ष बनने की चाहत नहीं

इस से पहले राहुल ने कहा कि पार्टी अध्यक्ष पद पर बने रहने की उन की कोई चाहत नहीं है और कांग्रेस कार्यकारी समिति को इस पद के लिए शीघ्र ही किसी और व्यक्ति को ढूंढ लेना चाहिए.

संभावना है कि जब तक नए अध्यक्ष का चुनाव नहीं होता तब तक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा अध्यक्ष पद का कार्यभार देख सकते हैं.

नए अध्यक्ष का फैसला जल्द करें

राहुल ने यह भी कहा है कि पार्टी को बिना देरी किए जल्द ही नए अध्यक्ष पर फैसला कर लेना चाहिए. वैसे पिछले दोनों कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने राहुल गांधी से मुलाकात की और उन्हें अध्यक्ष पद पर बने रहने का आग्रह किया. इस मुलाकात से पहले राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ट्वीट कर कहा,”राहुल गांधी ही पार्टी का नेतृत्व कर सकते हैं. देश हित और जनता के प्रति उन की प्रतिबद्धता बेमिसाल है.” लेकिन राहुल ने गहलोत के इस निवेदन को सिरे से खारिज कर दिया.

क्या कहा राहुल ने

  • बतौर अध्यक्ष 2019 में हार की जिम्मेदारी मेरी है.
  • हार की जिम्मेदारी सभी को लेनी होगी. दूसरों को जिम्मेदार ठहरा कर मैं अपनी जिम्मेदारी की अनदेखी करूं ये सही नहीं.
  • पार्टी को को खड़ा करने के लिए कड़े फैसले लेने होंगे.
  • 2019 में सिर्फ एक पार्टी से नहीं लड़ी कांग्रेस.
  • देश का पूरा सिस्टम, हर संस्था हमारे खिलाफ थी.

राहुल के इस्तीफे के बाद विपक्षियों ने भले राहत की सांस ली हो पर अपने सरल स्वभाव, विरासत में मिली राजनीतिक सूझबूझ से राहुल ने अपनी खास पहचान बनाई है. उन्होंने इस्तीफा भले दे दिया पर संसद में अपने सवालों से विपक्ष को निशाने में लेने पर ढील बरतेंगे, इस की संभावना कम ही है.

वैसे भी राहुल ने इस्तीफा दे कर एक तीर से दो निशाना साधने की कोशिश की है. पहली तो यह कि इस से उन की छवि और अधिक निखरेगी और विपक्ष को एक नसीहत भी होगा दूसरा वे पार्टी में उठ रही उन के खिलाफ गुपचुप विरोध पर विराम लगा कर पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर काम कर सकेंगे.

बहरहाल, जो भी हो इस्तीफे से राहुल को राजनीति नुकसान होगा, इस में संदेह ही है.

क्या शादी करने वाली हैं अंकिता लोखंडे ?

अभिनेत्री अंकिता लोखंडे जल्द ही बिजनेस मैन विक्की जैन संग अपने रिश्ते को एक नया नाम देती नजर आ सकती हैं. हाल ही में उन्होंने कुछ तस्वीरें शेयर की हैं जिनमें विक्की उन्हें प्रपोज करते नजर आ रहे हैं.

 

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अभिनेत्री अंकिता लोखंडे बिजनेस मैन विक्की जैन को डेट कर रही हैं. आजकल अंकिता और विक्की जैन दोनों अक्सर सोशल मीडिया पर एक दूसरे के साथ तस्वीरें भी शेयर करते हैं. लेकिन अब लगता है कि ये दोनों अपने इस रिश्ते को एक नया नाम देने का मन बना चुके हैं.

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अंकिता इन खूबसूरत लम्हों को अपने फैंस के साथ भी शेयर भी करती हैं. हाल ही में अंकिता ने अपने सोशल मीडिया पर कुछ तस्वीरें शेयर की हैं. जिसे देखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता है,  कि विक्की उन्हें शादी के लिए प्रपोज कर रहे हैं.

 

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हालांकि अंकिता ने इन पोस्ट्स में ये भी साफ कर दिया है कि उन्होंने विक्की के इस प्रपोजल का जवाब अभी नहीं दिया है. आपको बता दें, जैसे ही अंकिता ने इन तस्वीरों को शेयर किया, उन्हें बधाईयां मिलने लगी.

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ट्रैवल टिप्स: आपकी यात्रा हो सुरक्षित!

अगर आप यात्रा के लिए निकल रहे हैं तो यात्रा के दौरान जहां भी रात्रि विश्राम का प्लान बना रहे हों, सब से पहले औनलाइन आप वहां के सुरक्षा साधनों की जांच कर लें. होटल में सीसीटीवी कैमरे, आग, भूकंप आदि से बचने के उपाय किए गए हैं या नहीं, इस की जांच भी कर लें. अगर ये सब चीजें होटल में न हों तो ऐसे होटलों से दूरी बनाएं. साथ ही, यह भी ध्यान रखें कि बहुत सस्ते होटलों के चक्कर में न पड़ें. आप ने औनलाइन जो चीजें होटल के बारे में जांची हैं, उन्हें कमरा लेने के पहले सुनिश्चित कर लें कि वे चीजें होटल में हैं भी या नहीं.

अब शालिनी को लीजिए. उस ने गरमी की छुट्टियां बिताने के लिए पिथौरागढ़ को चुना. उस ने वहां जाने से पहले एक औनलाइन बुकिंग साइट से एक होटल बुक किया.

नियत समय पर उस ने होटल में पहुंच कर कमरा ले लिया. लेकिन यह क्या, उसे औनलाइन बुकिंग के दौरान जो सुविधाएं बुकिंग साइट पर दिखाई गई थीं उन की आधी भी उस होटल में नहीं थीं. शाम को भोजन भी उसे दिए गए मेन्यू के अनुसार नहीं दिया गया. चूंकि शालिनी ने पेमैंट उस बुकिंग साइट के जरिए औनलाइन की थी, इसलिए उस ने उस होटल की शिकायत उस औनलाइन बुकिंग साइट के कस्टमर केयर नंबर से कर दी.

जब वह दूसरे दिन सुबह टहलने के लिए निकल रही थी तो होटल प्रबंधन ने यह कह कर उसे रोक लिया कि उसे उस बुकिंग साइट के शिकायत नंबर पर फोन कर के होटल की कमियां दूर किए जाने की जानकारी देनी होगी, वरना उसे होटल से बाहर नहीं निकलने दिया जाएगा.

वह उस होटल प्रबंधन द्वारा बंधक सी बना ली गई थी. उस ने इस की शिकायत पुलिस में करने की धमकी भी दी, लेकिन होटल वालों का जवाब था कि यहां के नजदीकी थाने को बंधीबंधाई रकम भेजी जाती है, इसलिए पुलिस कोई सुनवाई नहीं करेगी. थकहार कर शालिनी ने फिर से उस कस्टमर केयर नंबर पर उस होटल की कमियों को दूर किए जाने की सूचना दी और उस होटल का 3 दिनों का पूरा पेमैंट किए जाने के बावजूद उस ने होटल छोड़ दिया.

इस के बाद जब वह घर लौटी तो उस ने उस बुकिंग साइट की जीरो रैंकिंग दी. जिस के बाद बुकिंग साइट द्वारा उस से जीरो रैंकिंग किए जाने का कारण फोन कर पूछा गया तो उस होटल की सारी घटना उस ने बता दी. नतीजतन, उस बुकिंग साइट ने अपना एग्रीमैंट उस होटल से खत्म कर लिया और इस की जानकारी उस साइट ने ईमेल व फोन से शालिनी को दी. लेकिन जिस परेशानी से शालिनी को दोचार होना पड़ा, उस के लिए यह कार्यवाही नाकाफी थी.

इन बातों का रखें विशेष ख्याल

एक ट्रैवल एजेंसी के मालिक आशुतोष मिश्रा का कहना है कि अगर आप किसी छोटे शहर में घूमनेफिरने का विचार बना रहे हैं तो आप को खासा सतर्क रहने की जरूरत होती है. ऐसी जगहों पर चोरी, छेड़खानी, रेप, मारपीट की घटना हो जाने की दशा में आप को ऐसी परिस्थितियों से निकालने में कुछ चीजें मददगार साबित हो सकती हैं. इस के लिए आप की पहली कोशिश रहनी चाहिए कि आप की मोबाइल की बैटरी फुलचार्ज हो.

दरअसल, हम ऐसी जगहों पर टै्रवलिंग के दौरान फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के चक्कर में मोबाइल की बैट्री गंवा बैठते हैं जिस से किसी मुसीबत की दशा में मोबाइल का उपयोग नहीं कर पाते हैं. अगर आप का मोबाइल चार्ज है तो किसी मुसीबत में फंसने पर आप मोबाइल का उपयोग पुलिस को कौल करने, अपने नजदीकी रिश्तेदारों और जानने वालों को हादसे की सूचना देने आदि में कर सकते हैं.

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पुलिस या मुसीबत वाली जगह से निकलने के लिए जीपीएस का उपयोग करने में भी मोबाइल का उपयोग कर सकते हैं. इसलिए मोबाइल डिस्चार्ज मोड में न जाने पाए. इस से बचने के लिए चार्ज किया हुआ अच्छी क्वालिटी का पावरबैंक साथ रखना न भूलें.

इमरजैंसी कौंटैक्ट नंबर रखें साथ :  किसी छोटे शहर में ट्रैवलिंग के लिए जा रहे हों तो आप स्थानीय थाने से ले कर पुलिस महकमे के बड़े अधिकारियों, एनजीओ, अपने वकील, नजदीकी रिश्तेदारों और दोस्तों के मोबाइल नंबर रखना न भूलें. हो सके तो इन सब नंबरों को किसी अलग डायरी में भी लिख कर रखें, क्योंकि मोबाइल गायब होने, छीने जाने या डिस्चार्ज होने की दशा में ये लिखे गए नंबर आप के बहुत काम के हो सकते हैं. इन नंबरों के अलावा पर्यटन विभाग की ट्रैवल गाइडबुक रखना भी न भूलें. ये सारी चीजें आप की मददगार साबित हो सकती हैं.

जब पुलिस न सुने :  ट्रैवलिंग के दौरान आप के साथ चोरी, ठगी, छेड़खानी, रेप, मारपीट की घटना हो जाए और पुलिस में शिकायत के बावजूद पुलिस आप की न सुने तो आप अपनेआप को लाचार महसूस करते हैं.

इन छोटे शहरों में दूसरे बड़े पर्यटन स्थलों की तरह सैलानियों की मदद के लिए पर्यटन थाने भी नहीं मिलने वाले हैं. ऐसी दशा में आप के साथ हुई घटना की रिपोर्ट अगर पुलिस नहीं लिखती है तो यह आम बात है. ऐसी जगहों की पुलिस अकसर अपराधियों से मिली होती है और उन से पुलिस को कमीशन की अच्छीखासी रकम मिलती है.

ऐसी दशा में अपनी स्थिति की सूचना पुलिस के उच्चाधिकारियों को दें और हो सके तो कोई सुरक्षित ठिकाना ढूंढ़ें जिस से आप संभावित खतरे से बच सकें. आप खुद की सुरक्षा को नजर में रख कर सोशल मीडिया के जरिए औनलाइन आ कर भी अपनी सुरक्षा की गुहार लगा सकते हैं. इस से अपराधियों के हौसले पस्त हो सकते हैं और आप का यह कदम पुलिसकर्मियों पर भी भारी पड़ सकता है.

इस के अलावा अगर पुलिस आप की सुनवाई न करे तो पुलिस और उस के आला अधिकारियों से साक्ष्यों सहित औनलाइन गुहार लगा सकते हैं. ऐसे में पुलिस का कार्यवाही करना उस की मजबूरी हो जाती है क्योंकि औनलाइन शिकायतों की निगरानी बड़ी सक्रियता से की जाती है.

रेप, छेड़खानी आम बात :  सैलानियों के साथ छोटे तो छोटे, बड़े शहरों में जहां पर्यटकों की भीड़ ज्यादा होती है वहां भी छेड़खानी और रेप की घटनाएं सामने आती रहती हैं. ये घटनाएं देशीविदेशी सभी पर्यटकों के साथ होती हैं.

इन घटनाओं का दोहराव इस बात की तरफ इशारा करता है कि ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले अपराधियों में पुलिस का कोई खौफ नहीं होता. इस का सिर्फ एक ही कारण है कि स्थानीय लैवल पर अपराधियों और पुलिस का गठजोड़ होता है जिस के चलते ऐसे अपराधियों पर पुलिस कार्यवाही करने से कतराती है.

कानूनी मामलों के जानकार मंगेश दूबे का कहना है, ‘‘आप के साथ रेप, छेड़खानी जैसी घटना हो जाए तो सब से पहले आप अपने साथ हुए इस तरह के जुर्म से जुड़े सभी सुबूत सुरक्षित रख लें. अपराधियों को सजा दिलाने के लिए सुबूत कारगर साबित होंगे. साथ ही, ऐसी घटना की सूचना जितनी जल्दी हो सके, पुलिस को दें. अगर पुलिस ऐसी घटनाओं में कोई उचित कार्यवाही न करे तो आप स्थानीय मीडिया को सारी बातें बताएं. मीडिया ऐसी बातों को उठा कर पुलिस पर कार्यवाही के लिए दबाव बना सकती है.’’

ऐसी ही एक घटना कुछ दिनों पहले मिर्जापुर जिले में स्थित अहरौरा बांध देखने आए देशी और विदेशी सैलानियों के साथ हुई. ये सैलानी यह सोच कर आए थे कि वे मिर्जापुर के इस शांत स्थल अहरौरा के लखनिया दरी जलप्रपात पर एंजौय करेंगे. इस में विदेशी सैलानियों व युवकयुवतियों के संग मनचलों ने छेड़खानी की. साथ ही, विरोध करने पर उन्होंने सैलानियों की पिटाई भी कर दी थी.

घटना की सूचना के बाद जब पुलिस पहुंची तब तक 5 आरोपी भाग चुके थे. उस में से एक पीडि़त भारतीय लड़की की तहरीर पर 4 आरोपियों को हिरासत में तो लिया गया था लेकिन भागे 5 आरोपियों पर अज्ञात में मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने अपनी कार्यवाही पूरी की, जबकि पुलिस चाहती तो पकड़े गए आरोपियों से बाकी लोगों के नाम उगलवा लेती.

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सैलानियों के साथ घटना में शामिल आरोपियों का पुलिस द्वारा बचाव किए जाने के सवाल पर मंगेश दूबे कहते हैं कि चूंकि सैलानियों के साथ घटना को अंजाम देने वाले स्थानीय होने के साथ पुलिस से अपनी गठजोड़ के चलते बच जाते हैं, इसलिए जब भी हम किसी ऐसे शहर में टहलने का मन बना रहे हैं तो हमें किसी अनजान व्यक्ति से दोस्ती करने से बचना चाहिए.

अनजान व्यक्ति मौके का फायदा उठा कर नशीली दवाएं खिला कर लूट सकते हैं या आप को ठगी का शिकार बना सकते हैं. अगर आप महिला हैं तो आप को ऐसी जगहों पर खासा सतर्क रहने की जरूरत है.

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