‘‘पता नहीं मैं ने क्या खोया और क्या पाया. कभीकभी तो लगता है कि मैं एक नर्क से निकल कर दूसरे नर्क में आ गई हूं,’’ 32 वर्षीया प्रियंका भोपाल की एक पौश कालोनी के एक फ्लैट में अकेली रहती हैं. 8 महीने पहले उन्होंने अपने पति से तलाक का मुकदमा जीता है. प्रियंका एक सरकारी विभाग में द्वितीय श्रेणी की राजपत्रित अधिकारी हैं और उन के पति भी एक सरकारी विभाग में उच्चाधिकारी हैं.

दार्शनिकों के अंदाज में प्रियंका बताती हैं, ‘‘कभीकभी ऐसा लगता है कि मुकदमा तो जीत गई हूं लेकिन जिंदगी हार गई हूं. मेरी हालत तो ‘अर्थ’ फिल्म की शबाना आजमी जैसी हो गई है जिसे उस की घरेलू नौकरानी यह सलाह देती रहती है कि बीबीजी, मर्द की ज्यादतियां बरदाश्त कर लेना बेहतर है बजाय इसके कि उसे छोड़ कर पूरी दुनिया की असहनीय ज्यादतियों से लड़ा जाए.’’

प्रियंका का पति सौरभ से शादी के 4 वर्षों बाद विवाद हुआ था. वजह थी सौरभ का मां के इशारे पर नाचना और उन के कहे पर चलना. प्रियंका बहुत ज्यादा संकुचित या पिछड़े विचारों की नहीं हैं. उन्हें पति की मातृभक्ति पर कोई खास एतराज नहीं था लेकिन बात बतंगड़ में तब बदली जब मां के कहने पर सौरभ ने उन्हें उपेक्षित और प्रताडि़त करना शुरू कर दिया.

‘‘वहां (ससुराल में) मुझे घुटन महसूस होने लगी थी क्योंकि हर काम सास की मरजी से होता था. यहां तक कि अपने बैडरूम के परदों के रंगों व डिजाइनों का चुनाव भी मैं अपनी मरजी से नहीं कर सकती थी,’’ प्रियंका रुक कर बताती हैं, ‘‘यह मेरे अधिकारों और इच्छाओं पर नाजायज अतिक्रमण था. इस पर मैं ने एतराज जताते अपना विरोध दर्ज कराना शुरू किया तो एवज में मुझे पहले डांट और फिर कुछ दफा मार भी मिली.’’

प्रियंका की मानें तो यह बात कहने सुनने में बहुत छोटी लगती और दिखती है लेकिन सवाल उस के अस्तित्व और इच्छाओं का भी था. बकौल प्रियंका, शुरू में उन्होंने एक समझदार पत्नी की तरह इस स्थिति से तालमेल बैठाए रखा. लेकिन हद तब हो गई जब मां के उकसाने पर सौरभ ने उन्हें पहली बार थप्पड़ मारा. तभी उन्होंने फैसला ले लिया था कि ऐसे पुरुष के साथ रह कर जिंदगी नर्क बनाने से बेहतर है कि तलाक ले कर अलग रहा जाए.

यह फैसला प्रियंका के लिए आसान नहीं था. जब उन्होंने इस से अपने बड़े भाई को अवगत कराया तो वे ससुराल आए. सौरभ और उस की मां से बात कर सुलह की कोशिश की. लेकिन कोई हल न निकला. सौरभ इस बात पर अड़ा रहा कि जब तक मां हैं, घर में फैसले उन्हीं के चलेंगे और प्रियंका को उन की हर बात, जायज हो या नाजायज, सिर झुका कर माननी पड़ेगी. नहीं तो, तलाक देने में उसे कोई एतराज नहीं.

उसी दिन फैसला हो गया था कि अब दोनों (दरअसल तीनों) का साथ रहना मुमकिन नहीं है. ऐसे में भाई उन्हें अपने घर यानी मायके ले आए जहां भाभी सहित 2 प्यारे भतीजे भी थे. भाई को उम्मीद थी कि कुछ दिन ससुराल से दूर रह कर वह बेहतर तरीके से सोच पाएंगी और सौरभ को भी उन की अहमियत समझ आएगी.

लेकिन सौरभ ने प्रियंका से कोई संपर्क नहीं किया और न ही प्रियंका ने पहल की. इस दौरान भाभी उन्हें दुनिया की ऊंचनीच समझाती रहीं कि ऐसी दिक्कतें तो हर घर में रहती हैं. जराजरा सी बात पर पति का यानी अपना घर छोड़ देना समझदारी की बात नहीं.

प्रियंका को जाने क्यों ऐसा लगा कि एक महीने में ही वह भाईभाभी पर बोझ बन गई हैं और भाभी उन्हें अपनी सहूलियत के लिए उसी नर्क में जाने की सलाह दे रही हैं. सो, उन्होंने अलग फ्लैट लेने का फैसला ले लिया. भाई ने, हालांकि, उन से कहा कि फ्लैट ले लो, यह हर्ज की बात नहीं, लेकिन यह घर भी तुम्हारा है.

‘‘एक औरत के 2 घर नहीं हो सकते,’’ प्रियंका बताती हैं, ‘‘और फिर कब तक उस घर में पड़ी रहती जो कभी मेरा मायका था. तमाम रिश्तेदार और जानपहचान वाले लोग आते थे और

मुझे देख कर भांप जाते थे कि कुछ गड़बड़ है.’’

बिल्डर से बात की, बैंक से लोन फाइनैंस कराया और फिर प्रियंका अलग रहने लगीं. इस दौरान भाईभाभी ने उन से नियमित संपर्क बनाए रखा. पैसों की कोई खास किल्लत नहीं थी. प्रियंका को तब 75 हजार रुपए के लगभग तनख्वाह मिलती थी और उन के बचत खाते में भी खासा अमाउंट था.

इस दौरान वे लगातार चिंतनमनन करती रहीं और आखिरकार इस निष्कर्ष पर पहुंचीं कि सौरभ ने उन्हें मामूली बात पर थप्पड़ मार कर अच्छा पति होने का नहीं, बल्कि एक क्रूर आदमी होने का परिचय दिया था. और जब पतिपत्नी के बीच किसी भी वजह से असहजता आ जाए और वे अपरिचितों की तरह रहने लगें तो साथ रहने का कोई मतलब नहीं रह जाता. फिर एक दिन उन्होंने शहर के नामी वकील के जरिए सौरभ को तलाक का नोटिस भिजवा दिया. अतीत से हकीकत तक वह प्रियंका की जिंदगी का बेहद कठिन दिन था जब वे वकील के पास पहुंची थीं. वकील ने सारी बात ध्यान से सुनी और पेशेवर अंदाज में समझाया कि वे एक बार और सोच लें.

प्रियंका जैसी पत्नियां शायद ही कभी इस बात की वास्तविकता समझ पाएं कि हर कोई उन्हें ‘और सोच लो’ का मशवरा दे कर उन की परेशानी में इजाफा क्यों करता है. फिर भी वे अडिग रहीं. तो, वकील ने नोटिस तैयार करने के पहले उन्हें समझाया कि पति के थप्पड़ यानी क्रूरता का कुछ बढ़ाचढ़ा कर जिक्र करना होगा. तभी यह तलाक का आधार बन पाएगा.

वकील की निगाह में दिक्कत यह थी कि प्रियंका के पास इस बात के कोई पुख्ता सुबूत नहीं थे कि सौरभ उन के साथ हिंसा करता है. इस के बाद भी उस ने आश्वासन दिया कि वह तलाक करवा देगा और ऐसे कई मामलों में वह तलाक करवा चुका है.

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फीस तय हुई, पहले 50 हजार रुपए और प्रति पेशी 5 हजार रुपए. वकील ने बताया कि ज्यादा से ज्यादा एकडेढ़ साल में मुकदमा निबट जाएगा और इस में 3-4 तारीखें लगेंगी. उस के लाख समझाने पर भी प्रियंका यह झूठ बोलने को तैयार नहीं हुईं कि उन की सास भी मारापीटी करती हैं या ताने कसती हैं.

फीस की पहली किस्त का चैक मिलते ही वकील का चेहरा फूल सा खिल उठा. उस ने संक्षिप्त में प्रियंका को मुकदमे की प्रक्रिया समझाई कि पहले सौरभ को नोटिस जाएगा, जिस का जवाब वह देता है तो ठीक, वरना अदालत से उसे पहले समन और फिर वारंट जारी होंगे. चूंकि वह भी सरकारी अधिकारी है, इसलिए अदालत आने

में हीलाहवाली नहीं करेगा. अगर वह पहली ही पेशी में अपनी गलती स्वीकारते हुए तलाक के लिए राजी हो जाता है तो अदालत दोनों को सोचने का एक मियादी मौका देगी और फिर तलाक हो जाएगा.

सौरभ ने नोटिस लिया और उस का जवाब भी वकील के जरिए दिया जिसमें वह प्रियंका के लगाए आरोपों से साफसाफ मुकर गया था, उलटे, उस ने प्रियंका को ही झगड़ालू प्रवृत्ति का बता डाला.

इस झूठे जवाब पर प्रियंका सन्नाटे में आ गई. इस रात भी वे खूब रोईं और सोसाइटी की महिलाओं के साथ रोजाना की तरह शाम को टहलने नहीं गईं. रात का खाना जैसेतैसे गले उतार कर वे सोने गईं तो उन्हें शादी के बाद सौरभ के साथ नैनीताल में गुजारे हनीमून के दिन याद आने लगे. दोनों वहां के माल रोड पर हाथ में हाथ डाले एकदूसरे में खोए घूमते रहते थे और फिर रात को होटल में आ कर अभिसार में डूब जाते थे.

इस दौरान खूब लंबीलंबी बातें होती थीं. दोनों रिश्तेदारी, कालेज और दफ्तरों के संस्मरण साझा करते थे और आने वाली जिंदगी के सपने बुनते थे लेकिन हर बार सौरभ यह जरूर कहता था कि वह अपनी मां को बहुत चाहता है और उम्मीद है प्रियंका भी उन का मां जैसा ही सम्मान करते ध्यान रखेंगी.

खूबसूरत अतीत के हसीन लमहे कभी अदालत की चौखट तक भी पहुंचेंगे, यह प्रियंका ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. उन्हें सौरभ से कोई भी शिकायत नहीं थी सिवा इस के कि उस ने मां के उकसाने पर उन पर हाथ उठाया था और तब प्यारमोहब्बत के सारे कसमेवादे भूल गया था. उस ने यह भी नहीं सोचा कि प्रियंका पर क्या गुजरेगी.

पहली पेशी वाले दिन अदालत के रजिस्टर में दस्तखत करते हुए प्रियंका के हाथपैर ही नहीं, बल्कि वे खुद पूरी कांप रही थीं. रोना आ रहा था लेकिन अदालत में रो भी नहीं सकती थीं जहां अपने काम में मशगूल जज साहब थे, 2 क्लर्क थे, इजलास में आतेजाते वकील और कुछ मुवक्किल भी थे. वे सब के सब मशीन की तरह अपनेअपने काम में लगे थे. जैसेतैसे खुद को संभालते हुए प्रियंका ने हस्ताक्षर किए. प्रियंका की मनोदशा भांपते हुए वकील साहब ने बड़ी आत्मीयता से उन से अपने चैंबर में जाने का इशारा करते हुए कहा कि तारीख मिलते ही बता दूंगा.

अदालत ऐसी होती है, बाररूम ऐसा होता है और मुकदमे की काररवाई ऐसी होती है, इस का इल्म भी प्रियंका को नहीं था. वे तो चाहती थीं कि उसी दिन सौरभ को उन के सामने ला कर सवालजवाब किए जाएं और उसी दिन अदालत अपना फैसला सुना दे जिस से उन्हें छुटकारा मिले.

शाम को घर जा कर वे अकेले में फूटफूट कर रोईं. एक मन कर रहा था कि दौड़ कर सौरभ के पास चली जाएं और उसे बताएं कि उस की वजह से उन्हें किस दूसरी मानसिक यंत्रणा से गुजरना पड़ा है. क्या इसी दिन के लिए उस ने शादी की थी और जब मां के इशारे पर नाचना ही था तो उन की जिंदगी खराब करने की जरूरत क्या थी.

भाई पेशी पर नहीं आए थे, यह भी उन्हें अखर रहा था. ऐसा लग रहा था मानो वे दुनिया में ठीक वैसे ही अकेली रह गई हैं, जैसे मेले की भीड़ में कोई अबोध बच्चा गुम हो गया हो. और अपने मम्मीपापा को तलाश रहा हो. इस दिन उन्हें पापा की भी याद आई कि आज वे होते तो जरूर कुछ करते. सौरभ को समझाते उस की मां को समझाते और बात नहीं बनती तो अदालत में उन के साथ मजबूती से खड़े होते.

पर अकेलापन प्रियंका जैसी पत्नियों की नियति होती है. तलाक के मुकदमे की मानसिक, सामाजिक, आर्थिक और कानूनी प्रताड़ना उन्हें अकेले ही भुगतनी पड़ती है. यही उन की त्रासदी है जिस का कोई विकल्प नहीं है.

इस बात पर जरूर बहस करने की तमाम गुंजाइशें हैं कि उन की इस हालत का जिम्मेदार कौन होता है. जो समाज लोगों को सहारा देने के लिए बना है, वही समाज तलाक का मुकदमा लड़ रही औरतों के साथ वैसे क्यों नहीं खड़ा होता जैसे शादी के वक्त खड़ा होता है? अहम बात यह है कि तलाक की प्रक्रिया इतनी जटिल और लंबी क्यों है? वह शादी की तरह झटपट क्यों पूरी नहीं हो सकती है?

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कुछ कड़वे सच

प्रियंका जैसी लाखों महिलाओं की हालत, जिसे शोषण कहना ही बेहतर होगा, की शुरुआत दरअसल  घर से ही होती है. पति या ससुराल वाले परेशान करें या उन से किसी तरह का तालमेल न बैठे तो उन्हें एकतरफा मुजरिम न केवल मान लिया जाता है बल्कि बिना अपराध सिद्ध हुए उन की सजा की शुरुआत भी हो जाती है.

यदि पत्नी विरोध करती है तो सजा की मात्रा प्रताड़ना तक पहुंच जाती है और आमतौर पर उस का बचाव करने वाला कोई नहीं होता. विवाद बढ़ता है तो उसे घर से निकलने के लिए मजबूर कर दिया जाता है या फिर प्रताड़ना या हालात से घबरा कर वह खुद ही घर छोड़ देती है.

अब उस के सामने सवाल यह उठ खड़ा होता है कि कहां जाए? ऐसे में मायका ही उस का इकलौता विकल्प व सहारा होता है. अधिकांश मामलों में मायके वाले उसे सहारा देते भी हैं, लेकिन उन का नजरिया और व्यवहार दोनों बदल जाते हैं.

अलगाव के दौरान वह मायके वालों को भार लगती है. हालांकि मांबाप अगर हों तो उन का रुख थोड़ा नरमीभरा होता है, लेकिन भाईभाभियों या बहनों सहित दूसरे रिश्तेदारों की नजर में वह खटकने लगती है क्योंकि वह हर स्तर पर जगह घेरती है.

आजकल अधिकांश पत्नियां कमाऊ या नौकरीशुदा होती हैं, इसलिए वे आर्थिकरूप से भार नहीं होतीं. लेकिन अस्थायी परित्यक्ता का गुजारा केवल पैसे से ही पूरा नहीं होता है और न ही दूसरी जरूरतें पूरी होती हैं.

1950 में जब हिंदू महिलाओं को पहली दफा विवाहविच्छेद या तलाक का हक मिला था तब वे कमाऊ नहीं होती थीं, इसलिए उन की घर या समाज में कोई हैसियत भी नहीं होती थी. वे घर की नौकरानी सा काम करते जिंदगी गुजार देती थीं. मांगलिक कार्यों में उन्हें बुलाने से बचा जाता था.

दरअसल, तलाकशुदा महिला की हैसियत एक ऐसी मनहूस मानी जाने वाली विधवा की तरह होती है जिस का पति जिंदा होता है. लेकिन, पति के प्रति ऐसा नजरिया देखने में नहीं आता है.

यह कहना ज्यादती और फुजूल की बात है कि अब ऐसा नहीं रहा, हुआ इतना भर है कि कमाऊ महिलाएं अपने दम पर जिंदगी जी सकती हैं, लेकिन वह जिंदगी वैसी नहीं होती जैसी कि होनी चाहिए यानी समाज या परिवार में उन का कोई मानसम्मान नहीं होता. एक तरह से वे बहिष्कृत होती हैं. आर्थिक स्थिति या हैसियत उन्होंने अपने दम पर सुधारी है, किसी कानून का इस में कोई योगदान नहीं है.

औरतों के हालात जस के तस

साफ है समाज पुरुषप्रधान था, है और रहेगा. औरत की स्थिति अभी भी दोयम दर्जे की और साफसुथरे शूद्रों जैसी है. इस मानसिकता की जड़ में जाएं तो इस का पहला जिम्मेदार धर्म ही नजर आता है, जो कदमकदम पर उसे दासी, पैर की जूती और नर्क का द्वार करार देता है.

षड्यंत्रपूर्वक बुना गया यह तानाबाना तलाकशुदा औरतों पर गाज की तरह गिरता है. औरत कभी धर्म के दुकानदारों को रास नहीं आई. उन की नजर में उस की उपयोगिता एक भोग्याभर की रही है, जो पुरुष को हर तरह के सुख और संतुष्टि देती है.

तलाक का हक मिलने से इतनाभर हुआ कि पत्नियां भी अदालत जाने लगीं, लेकिन इस हक से उन के मानसम्मान, हैसियत और स्वाभिमान पर कोई फर्क नहीं पड़ा, वह ज्यों का त्यों है. आजादी के 70 सालों में पत्नियों के भले के लिए दर्जनों कानून बने, उन मेें सैकड़ों संशोधन हुए लेकिन उन की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. इस की इकलौती वजह यह है कि धर्मप्रधान समाज और पुरुष ऐसा नहीं चाहते. कई मामलों में तो खुद कानून भी इन्हीं के साथ खड़ा नजर आता है.

मौजूदा कानूनी प्रक्रिया कतई महिलाओं के हक में नहीं है. पहले पत्नी वकील करे फिर पेशियों पर हैरानपरेशान 11 से ले कर 5 बजे तक अदालत में नुमाइश की चीज बन कर अपराधी की तरह बैठी रहे. ऐसे में तो उस पर तरस ही आता है कि ऐसा क्यों? कानूनी प्रक्रियाओं, नियमों और न्याय के नाम पर यह अन्याय क्यों?

जब प्रियंका जैसी पत्नियां अदालत जाती हैं तो पति को क्यों तुरंत तलब नहीं किया जाता. उन्हें ऐसी कानूनी रियायतें क्यों मिली हुई हैं जो वे नोटिस के जरिए जवाब देते हैं, बहाने बना कर पेशियों पर नियमित नहीं आते और आते भी हैं तो क्लर्क को घूस दे कर मनचाही तारीख लगवा लेते हैं. इस से पत्नी की परेशानी और यंत्रणा बढ़ती है और कई बार तो वह ही मुकदमे की पिक्चर से गायब हो जाती है कि जब तलाक मिलना इतना दुष्कर काम है तो जिंदगी, ऐसी ही जैसी है, क्या बुरी है. नतीजतन, मुकदमा एकतरफा हो कर तलाक की डिक्री पति के हक में हो जाती है.

अफसोस तो इस बात का है कि कानूनों में कुछ सुधारों के बाद भी कानूनी प्रक्रियाएं उम्मीद और जरूरत के मुताबिक नहीं सुधरी हैं. सीधेसीधे कहा जाए तो तलाक में अनावश्यक देरी पत्नी के साथ ही ज्यादती होती है. पति इस से आमतौर पर अप्रभावित रहता है. तलाक 4 साल में हो या 6 साल में, पति के लिए तो यह मियाद वरदान जैसी बात होती है क्योंकि तलाक के मुकदमे के दौरान पत्नी पेशियों में हाजिर होने के चलते पैसों की तंगी की, रिश्तेदारों के तानों की और समाज की बदलती नजरों की सजा भुगत रही होती है.

यही पुरुषोचित अहं और आनंद है जिस को आज का शिक्षित, सभ्य और आधुनिक समाज भी अपने तरीके से ऐंजौय करता है. उस का इकलौता मकसद, जैसे भी हो, औरत को परेशानी में देखना है.

इस में शक नहीं कि कुछ मामलों में परेशानी और तनाव पतियों के हिस्से में भी आते हैं. लेकिन वे 10 फीसदी भी नहीं हैं, क्योंकि समाज पुरुषों के साथ होता है. तलाक के मुकदमे के दौरान पतियों को पत्नियों के मुकाबले न के बराबर ताने सुनने पड़ते हैं, अनदेखी तो उन की कहीं नहीं होती और वे कतई अकेले नहीं होते.

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30-40 साल पहले पति अपनी पत्नी को छोड़ तुरंत शादी कर लेता था और पत्नी खामोशी से सौत या दूसरी को ताकती रहती थी. हालात इतनेभर बदले हैं कि अब वह तलाक होेने तक दूसरी शादी नहीं कर सकता.

भोपाल के एक व्यापारी की मानें तो पत्नी से अनबन के चलते उस ने तलाक का मुकदमा दायर किया था और इसी दौरान उस के पास दूसरी शादी के प्रस्ताव आने लगे थे कि तलाक होते ही हमारे प्रस्ताव को प्राथमिकता में रखा जाए.

यह कैसा समाज है जिस की नसनस में दोहरापन समाया हुआ है. प्रियंका जैसी आत्मनिर्भर महिलाओं से भी कोई शादी करने को तैयार नहीं होता, क्योंकि वे पहले पति को मन और शरीर सौंप चुकी हैं. अब जो भी उन से शादी करेगा वह समाज का अनुपयोगी हिस्सा होगा, बेकार, निठल्ला या आलसी ही होगा. उस की इकलौती काबिलीयत केवल मर्द होना होती है जो तलाकशुदा से शादी नहीं, बल्कि उस पर एहसान करता है.

तलाक के उन्हीं मुकदमों में जल्दी फैसला होता है जिन में पति को तलाक की जल्दी रहती है. ऊपर जिस व्यापारी का जिक्र किया गया वह हर पेशी पर नियमित गया था. जिस से तलाक जल्दी यानी डेढ़ साल में हो गया. उस ने कुछ दिनों बाद ही दूसरी शादी कर ली लेकिन तलाकशुदा पत्नी मायके में बैठी भाइयों के बच्चे खिला रही है और भाभियों की बातें सुन रही है. इस मामले में गुजाराभत्ता मांगा नहीं गया था.

समझाइश या धौंस

भोपाल की एक काउंसलर की मानें तो यह सच है कि हर कोई तलाक चाहने वाली पत्नी को समझाता नजर आता है कि एक बार और इत्मीनान से सोच लो और कोशिश करो कि शादी टूटे नहीं. गोया कि वैवाहिक जीवन के तलाक तक पहुंचाने का ठीकरा उसी के सिर अग्रिमरूप से फोड़ दिया जाता है जिस से वह तलाक के बाद भी अपराधबोध से ग्रस्त रहे.

दरअसल, यह समझाइश आने वाली जिंदगी का डर दिखा कर उसे नर्क में धकेले रखने की साजिश है क्योंकि नारकीय व्यवस्थाएं बदलने पर पति को भी, थोड़ी ही सही, परेशानी तो उठानी पड़ती है. यह भी तलाक प्रक्रिया से जुड़े लोग नहीं चाहते कि पुरुष को रत्तीभर की परेशानी हो, जबकि तनाव झेल रही महिला से किसी को कोई सहानुभूति नहीं होती.

अपवाद मामलों को छोड़ दें तो कोई भी पति या पत्नी तलाक के लिए अदालत में तभी जाता है जब खुद उसे यह लगने लगता है कि अब इस हालत में वैवाहिक जीवन जीना और संभव नहीं. इस के बाद भी नादान पत्नियों को ही समझा जाता है मानो वे तलाक ले कर भारी गुनाह करने जा रही हों. तलाक की आजादी पर समझाइश के पहरे दशकों पुरानी साजिश हैं जिन का मकसद पत्नी को खूंटे से ही बांधे रखना होता है.

इस की एक अहम वजह धर्म की दुकानदारी का खतरे में पड़ना है. एक अंदाजे के मुताबिक, अभी कोई 20 लाख मुकदमे देशभर में तलाक के चल रहे हैं. लेकिन इन से 4 गुना ज्यादा मामले वे हैं जिन में पत्नियां समाज, परिवार और कानून से घबरा कर तलाक ले कर आजादी की सांस लेने के बारे में सोच भी नहीं पा रहीं. वे पति और ससुराल वालों की ज्यादतियां झेलते जिंदगी ढोने को मजबूर हैं.

भारत में यूरोप के मुकाबले तलाक की दर इसीलिए कम है कि यहां तलाक आसानी से नहीं मिलता. इस के लिए हजार तरह के पापड़ बेलते हजारों तरह की ही भावनात्मक, सामाजिक व मानसिक यंत्रणाएं भुगतनी पड़ती हैं. इसलिए धर्म और संस्कृति पर यह गर्व

भी एक साजिश है कि हमारे यहां की विवाहव्यवस्था बेहद मजबूत और टिकाऊ है. जबकि, दरअसल, यह महिलाओं के शोषण की बुनियाद पर खड़ी है. इस बात को जानबूझ कर हर स्तर पर नजरअंदाज किया जाता रहा है. धर्म के ठेकेदार अकसर पाश्चात्य संस्कृति को कोसते नजर आते हैं. वे इस सच को ढकने की कोशिश करते रहे हैं कि पश्चिम में महिलाएं हद से ज्यादा स्वतंत्र हैं.

घुटन में जी रहीं पत्नियां जब तलाक की तरफ पहला कदम उठाती हैं तो समझाइश के नाम पर उन की हिम्मत ठीक वैसे ही तोड़ने की कोशिश की जाती है जैसे पंडाल में बैठा धर्मगुरु भक्तों की भीड़ को समझाता है कि यह पाप है, अगर ऐसा करोगे तो उस की सजा भी तुम्हीं को भुगतनी पड़ेगी. बाद में इन उपदेशों को सच साबित करने की जिम्मेदारी भक्त समाज ही पूरी करता है.

कानूनी श्राप

कहने को तो कानून सभी के लिए बराबर है औैर न्याय के लिए बना है लेकिन तलाक के मुकदमों में महिलाओं की हालत देख लगता है कि उन्हें दी जाने वाली समझाइश को सच साबित करने की जिम्मेदारी कानून से जुड़े लोगों ने उठा रखी है ताकि दूसरी महिलाएं तलाक लेने से डरें.

जब इस प्रतिनिधि ने कुछ वकीलों, रिटायर्ड जजों और तलाक का मुकदमा लड़ रहे पतिपत्नियों से बात की तो एक हैरान कर देने वाली बात यह सामने आई कि आजकल हालत सुधरी है और अदालतों में तलाक के लिए पहले जैसा वक्त नहीं लगता. इस हकीकत की छानबीन पर यह बात भी सामने आई कि औसतन तलाक का एक मुकदमा 4-5 साल चलता है.

इस स्थिति और अदालतों की तरफदारी के माने समझने से पहले यह बात समझ लेना जरूरी है कि तलाक के लिए अगर 4 साल भी लगते हैं तो वे भी बहुत ज्यादा हैं. तलाक के मुकदमे की मियाद अगर 8-10 साल से घट कर 4 साल पर आ गई है तो यह ढोल पीटने की बात कतई नहीं है. सवाल यह उठना चाहिए कि तलाक 4 महीने में क्यों नहीं हो सकता? जब शादी 4 दिन और आजकल तो 4 घंटे में संपन्न हो सकती है तो तलाक 4 साल में क्यों?

इस सवाल का जवाब कानून और समाज के ठेकेदार बड़ी गंभीरतापूर्वक और दार्शनिक अंदाज में यह कहते हुए देते हैं कि यह एक नाजुक मसला है. इस में जल्दबाजी और हड़बड़ाहट 2 लोगों की जिंदगी बरबाद कर सकती है और बच्चे अगर हों तो उन की जिंदगी तो बेपेंदी के लोटे जैसी हो जाती है.

इस तरह की दलीलें देने वाले लोग हकीकत में धर्मभीरु होते हैं जिन का असल मकसद धर्म के सिद्धांतों को बनाए रखना होता है जिस में स्त्री आजादी का नाम ही उस का शोषण है और अगर वह पति के शोषण से मुक्त होती है तो बाहर पूरा समाज उस का शोषण करने के लिए तैयार बैठा रहता है.

जवाब यह क्यों नहीं दिया जाता कि वाकई चूंकि मसला नाजुक और 2 लोगों की जिंदगी का होता है, इसलिए 4 साल भी क्यों. यह मियाद भी सजा नहीं तो क्या है? क्यों तलाक चाहने वालों खासतौर से महिलाओं को घेर कर प्रताड़नाएं भुगतने के लिए 4 साल मजबूर किया जाता है. चूंकि मामला संवेदनशील होता है, इसलिए ही इसे तुरंत निबटाना हर किसी की प्राथमिकता होनी चाहिए. उसे बेवजह लंबा खींचने से किसे क्या हासिल होता है?

4 साल की मियाद, दरअसल, सफेद झूठ है, हकीकत में होता कुछ और है.

स्थगन आदेश का दंश

जब इस बात की पड़ताल की गई तो पता चला कि निचली अदालतें तलाक के मुकदमों को जल्द निबटा रही हैं, लेकिन बात हाईकोर्ट तक भी जाती है, जहां न्याय यानी तलाक मिलने में सालोंसाल लग जाते हैं.

भोपाल की एक पीडि़ता रेखा (बदला नाम) ने अपने पति पर न केवल प्रताड़ना का आरोप लगाया था बल्कि उसे साबित भी कर दिया था. नतीजतन, तलाक 3 वर्षों में हो गया.

पति की मंशा चूंकि उसे और परेशान करने की थी, इसलिए वह हाईकोर्ट जा कर स्थगन आदेश यानी स्टे और्डर निचली अदालत के फैसले पर ले आया. यहां यह समझना जरूरी है और दिलचस्प भी कि हाईकोर्ट तलाक का फैसला नहीं देता, बल्कि यह देखता है कि कहीं निचली अदालत ने कोई जल्दबाजी दिखाते तो विवाहविच्छेद नहीं कर दिया है और कोई गड़बड़झाला तो नहीं किया है. यानी हाईकोर्ट का काम इतना भर है कि वह निचली अदालत के फैसले को पढ़ कर समीक्षा करे और हां या न में सिर हिला कर वादीप्रतिवादी को मुक्त करे.

रेखा बताती है, पूरे 10 साल हो गए लेकिन हाईकोर्ट अभी तक यह तय नहीं कर पाया कि उस का तलाक जायज है या नहीं. 10 साल तक क्या हुआ? इस पर झल्लाई रेखा बताती है कि पेशियां हुईं लेकिन उस का मुकदमा कभी नंबर पर नहीं आ पाया क्योंकि अदालत को 2 लोगों की जिंदगी से ताल्लुक रखता संवेदनशील और नाजुक मसला शायद होली की हंसीठिठोली सा लगा. नंबर आए तो उन मुकदमों के, जिन्हें कानूनी भाषा में अर्ली हियरिंग यानी जल्द सुनवाई वाला माना जाता है.

ये मुकदमे हाईकोर्ट के लिए अहम होते हैं जिन में किसी एक राजनेता ने दूसरे के खिलाफ ताना कसा होता है और उन में से किसी एक को जमानत चाहिए रहती है. वे मुकदमे अदालत की निगाह में ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं जिन में ज्यादा तगड़ी फीस हासिल कर किसी ने रिट दायर की होती है या किसी सैलिब्रिटी या फिर धर्म से जुड़ा मामला अदालत की चौखट तक आ जाता है.

रेखा बताती है कि 10 साल में महज एक बार सुनवाई हुई और उस में भी कोई नतीजा नहीं निकला, जज साहब ने फिर तारीख लगा दी. अब वह हर तारीख पर भोपाल से जबलपुर जाती है जिस में उस के 10 हजार रुपए खर्च होते हैं. उस की फाइल साल 2009 से नीचे दबी पड़ी है, साथ ही, दबे हैं उस के सपने और आजादी क्योंकि जब तक हाईकोर्ट स्थगन आदेश पर फैसला न दे यानी निचली अदालत के फैसले पर सहमति या असहमति न जताए, तब तक वे दबे ही रहेंगे.

रेखा के पति को अपनी बात कहने के लिए निचली अदालत ने तलाक  के बाद 45 दिनों की तयशुदा मियाद दी थी. जिस से वह हाईकोर्ट जा सके. इस से रेखा पर यह बंदिश अपनेआप लग गई थी कि वह हाईकोर्ट का फैसला आने तक शादी नहीं कर सकती.

अब रेखा तल्ख लहजे में पूछती है कि फिर यह तलाक कहां हुआ और मुकदमा 3 साल में निबट गया, यह किस आधार पर मान लिया जाए? मुझे तो रोतेभागते 13 साल हो गए और इस पर भी मजाक यह कि मैं किसी की पत्नी हूं या नहीं, यह कौन तय करेगा? मैं दूसरी शादी भी नहीं कर पाई, इस का जुर्माना कौन भरेगा या कौन इस नुकसान की भरपाई करेगा? 13 वर्षों में तलाक कानून की अच्छी जानकार बन गई रेखा यह भी कहती है कि विवाह और तलाक कानून बेहद अस्पष्ट हैं.

होना यह चाहिए

रेखा कहती है कि 13 वर्षों से तलाक का मुकदमा लड़तेलड़ते मैं थक गई हूं यह कैसा कानून और इंसाफ है जिस में तलाक के मुकदमे में भी तारीख पर तारीख लगती हैं, गवाहियां होती हैं, कानून की धाराओं का हवाला दे कर उन्हें बढ़वाया जाता है. अदालतों में तरहतरह के बहाने  बनाए जाते हैं. कभी पति का ऐक्सिडैंट रास्ते में हो जाता है तो कभी जज साहब छुट्टी पर होते हैं, कभी वकील साहब नदारद हो जाते हैं और कभी खुद अदालत अपनी तरफ से देर लगाती है कि वह अगली तारीख पर मामले को देखेगी.

आप क्या देखना चाहते हैं? रेखा लगभग रोते हुए कहती है कि कैसे एक औरत तलाक के लिए इतने साल कानून की चौखट पर अपनी एडि़यां रगड़ते हुए जिंदा है. वह जवानी से बुढ़ापे की तरफ जा रही है लेकिन किसी को उस की जिंदगी की परवा या सरोकार नहीं. तो इस से तो वह गंवार कहा जाने वाला समाज अच्छा है जिस में पंचायत पहली ही पेशी पर छोड़ छुट्टी (तलाक की मंजूरी) का फैसला सुना देती है और पूरा गांव समारोहपूर्वक भोज करता है.

रेखा जैसी पत्नियों के आक्रोश, क्रोध और भड़ास में ही छिपा है तलाक के मुकदमों का हल, जिन्हें ऐसे लोगों से बातचीत कर सूचीबद्ध किया गया है जो मुकदमा लड़ रहे हैं.तलाक के मुकदमे की मियाद तय होनी चाहिए और यह किसी भी सूरत में बढ़नी नहीं चाहिए.

तलाक का मुकदमा किसी एक अदालत में ही चलना चाहिए. फैसले पर दूसरे पक्ष को चुनौती का अधिकार भी इसी अदालत में होना चाहिए क्योंकि अधिकांश फैसले कानून से नहीं, बल्कि साक्ष्यों और गवाहों के अलावा न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर होते हैं.

वकील से ज्यादा अदालत को पक्षकारों की बात सुननी चाहिए.

तलाक के लिए तहसील स्तर तक विशेष न्यायालय होने चाहिए.

ऊंची अदालत में स्थगन आदेश की समयसीमा निर्धारित होनी चाहिए और यह न्यूनतम होनी चाहिए.

तलाक और महिलाओं के संरक्षण के लिए बने कानून की विभिन्न धाराओं जैसे 125, 24, 498, 376 वगैरह को संशोधित कर घरेलू हिंसा अधिनियम 2005-06 में मिला कर एक सशक्त कानून बनना चाहिए, जिस से महिलाओं को एक ही कानून के

तहत कम समय में कानूनी फायदा मिल सके.

बहुत से कानूनों का होना मुकदमों में देरी की वजह बनता है और खर्च भी ज्यादा होता है. इसलिए तलाक, भरणपोषण और घरेलू हिंसा के मुकदमे अलगअलग न चल कर एक ही मुकदमे में होने चाहिए.

मुकदमे की परेशानियां भुगत चुके या भुगत रहे पीडि़तों की इन बातों में दम है जिन पर कानूनविदों और सरकार को ध्यान देना चाहिए कि परेशानी की असल जड़ कानून ही है.

तलाक के बाद

तलाक के बाद आमतौर पर पत्नी की सामाजिक जिंदगी खत्म हो जाती है लेकिन पति की नहीं होती. इस स्थिति का जिम्मेदार कानून नहीं, बल्कि समाज और धर्म हैं. बकौल प्रियंका वे एक छोटे नर्क से निकल कर दूसरे बड़े नर्क में आ गई हैं.

हर कोई तलाकशुदा महिलाओं को अजीब नजर से देखता है. इस नजरिए को बदलने की सख्त जरूरत है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब तलाक कम से कम समय में हों. महिलाओं को यह न लगे कि वे कोई सजायाफ्ता मुजरिम थीं और जेल की सजा काट कर समाज में वापस आई हैं.

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सौरभ की जल्द धूमधड़ाके से दूसरी शादी होनी तय है, लेकिन प्रियंका फिल्म ‘निकाह’ की सलमा आगा की तरह घर में अकेले पड़े, ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए…’ जैसा उदासी भरा गाना क्यों गाती और सुनती रहें? इस बात पर सभी को अपने स्तर पर सोचना होगा कि यह भेदभाव क्यों.

समाज और कानून आम लोगों की जिंदगी आसान करने के लिए होने चाहिए, न कि धर्म जैसे होने चाहिए जो कदमकदम पर जिंदगी को जटिल बनाता है, वह भी सिर्फ इसलिए कि इस से कुछ विशेष लोगों की रोजीरोटी चलती है. तलाकशुदा महिलाएं जितनी ज्यादा बदहाली में रहेंगी उतनी ही यह दुकानदारी फलेगीफूलेगी, और कहा यह जाएगा कि वे अपने पूर्व और वर्तमान जन्म के पापों की सजा भुगत रही हैं, इसलिए उन से दूर रहो.

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