दो टूक कहा जाये तो देश को जायरा वसीम से कहीं ज्यादा नुसरत जहां जैसी युवतियों की ज्यादा जरूरत है. ऐसे वक्त में जब समाज और देश दोनों कट्टरपंथियों के चंगुल में फंसे छटपटा रहे हैं तब जोखिम युवाओं को ही उठाना पड़ेगा कि वे अपने  दिमाग की खिड़कियां खोलें और ताजी हवा में आजादी की सांस लेकर यह साबित करें कि वे धार्मिक कट्टरवाद और पंडे मुल्लाओं के गुलाम होकर उनके इशारे पर नाचने को तैयार नहीं हैं. उनकी ज़िंदगी उनकी है और वे इसे अपने तरीके से जिएंगे .

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