दो टूक कहा जाये तो देश को जायरा वसीम से कहीं ज्यादा नुसरत जहां जैसी युवतियों की ज्यादा जरूरत है. ऐसे वक्त में जब समाज और देश दोनों कट्टरपंथियों के चंगुल में फंसे छटपटा रहे हैं तब जोखिम युवाओं को ही उठाना पड़ेगा कि वे अपने  दिमाग की खिड़कियां खोलें और ताजी हवा में आजादी की सांस लेकर यह साबित करें कि वे धार्मिक कट्टरवाद और पंडे मुल्लाओं के गुलाम होकर उनके इशारे पर नाचने को तैयार नहीं हैं. उनकी ज़िंदगी उनकी है और वे इसे अपने तरीके से जिएंगे .

पहले बात जायरा की जो 2016 में आमिर खान की फिल्म दंगल से पहचानी गईं थीं. बिलाशक इस फिल्म से उन्होंने साबित किया था कि वे किसी और पेशेवर अभिनेत्री से उन्नीस नहीं हैं. इस फिल्म में काम करने से पहले वे माइक्रोसाफ्ट मोबाइल और टाटा स्काई के विज्ञापनों में भी  दिखीं थीं तभी समीक्षकों ने अंदाजा लगा लिया था कि सुर्ख गुलाबी रंगत वाली इस कश्मीरी कली की दौड़ मौडलिंग तक ही सिमटी नहीं रह जाने वाली जायरा ने अभी ज़िंदगी के 19 वसंत भी नहीं देखे हैं, लेकिन फिल्में छोड़ने का उसका ताजा बयान बताता है कि मुंबई की खुली हवा पर जन्नत कहे जाने बाले कश्मीर की धार्मिक घुटन भारी पड़ रही है. जायरा के पिता जाहिद वसीम बैंक मेनेजर हैं और मां जर्का टीचर हैं .

जायरा को दसवी बोर्ड के इम्तिहान में 92 फीसदी नंबर मिले थे और अभी वह जम्मू के हेरिटेज स्कूल से 11बी की पढ़ाई कर रही हैं. उम्मीद थी कि जायरा मुस्लिम युवतियों के लिए रोल मौडल साबित होगी. 2017 में आई ‘सीक्रेट सुपर स्टार’ जायरा की दूसरी फिल्म थी जो मुस्लिम पृष्ठभूमि पर आधारित थी. इस फिल्म के रिलीज होने के पहले एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि कश्मीर में कितनी सारी लड़कियां हैं जो अपनी मर्जी से नकाब पहनती हैं और उनकी शादियां नहीं हो रही हैं. उनके मां बाप उन पर नकाब उतारने का दबाब बना रहे हैं पर वो नहीं उतार रहीं हैं, बुर्का और दबाब एक स्टीरियोटाइप सोच है जरूरी नहीं कि हिजाब पहनने वाली लड़कियां घर वालों के दबाब में ही हिजाब पहनती हो.

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