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तो क्या अपनी आखिरी फिल्म के प्रमोशन से आउट होंगी जायरा वसीम!

बौलिवुड एक्ट्रेस जायरा वसीम का पोस्ट सोशल मीडिया पर हंगामा मचा दिया था. इस पोस्ट में ‘दंगल’ गर्ल जायरा वसीम ने बौलीवुड इंडस्ट्री को छोड़ने की बात कही थी और इसकी वजह खुद के अल्लाह से दूर होने को बताया था. जायरा वसीम के फैसले का कुछ लोग समर्थन कर रहे हैं तो वहीं कुछ इसकी कड़ी निंदा की है.

जायरा वसीम ने ये ऐलान ऐसे वक्त किया है जब वो प्रियंका चोपड़ा स्टारर फिल्म ‘स्काई इज पिंक’ में एक अहम भूमिका में नजर आने वाली हैं. आपको बता दें, इस फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी है जायरा वसीम इस फिल्म में नामी मोटिवेशनल स्पीकर आयशा चौधरी का किरदार निभाने वाली हैं.

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ये फिल्म 11 अक्टूबर को रिलीज होने वाली है. लेकिन इससे पहले ही जायरा वसीम के इस फिल्म को अलविदा कर देने के बाद अब संभव है कि वो इस फिल्म के प्रमोशनल एक्टिविटीज का भी वो हिस्सा न रहे. मिड डे की एक रिपोर्ट की मानें तो जायरा इस फिल्म के प्रमोशन में शामिल नहीं होगी.

रविवार को जायरा की फेसबुक पोस्ट से ये साफ हो गया है कि वो फिल्म इंडस्ट्री को छोड़ रही है। उनके फैसले के मुताबिक उन्होंने निर्माताओं से खुद को इस फिल्म के प्रमोशनल एक्टिविटिज से दूर रखने की गुजारिश की है.

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भाजपा का ममता उखाड़ो मिशन

भारतीय जनता पार्टी जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस को पश्चिम बंगाल से हटाने के लिए कमर कस कर अड़ी है उस से लगता है कि ममता बनर्जी उस की निगाह में कोई विदेशी मूल की हस्ती है जिसे हटाना उस का पुनीत कर्तव्य है. राहुल गांधी के खिलाफ उस ने यह कमर कसी थी सोशल मीडिया के माध्यम से पर पश्चिम बंगाल में वह जमीनी विवाद खड़े कर, दंगों की स्थिति पैदा कर, टीएमसी के नेताओं से दलबदल करा कर जंग लड़ रही है.

जिस तरह के कैडर आज भारतीय जनता पार्टी के पास हैं, उस से लगता नहीं कि ममता बनर्जी राज्य की सत्ता पर टिक पाएंगी. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल की तरह ममता का किला भी ढह जाएगा.

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भारतीय जनता पार्टी के पास मंदिरों और धर्म की दुकानदारी कर रहे हजारों कार्यकर्ताओं की फौज है. उधर ऊंची जातियों के सरकारी कर्मचारी, पुराने ठाकुर, व्यापारी, उद्योगपति तृणमूल कांग्रेस में अब अपना कल्याण नहीं देखते. उन्हें पौराणिक सामाजिक व्यवस्था का सपना दिखाने वाली भाजपा ज्यादा अच्छी लगती प्रतीत हो रही है.

पश्चिम बंगाल का इतिहास जहां एक तरफ हिंदू समाज की जड़ता के विरुद्ध मोरचे लेने वालों से भरा है वहीं पौराणिक संस्कृति के रखवालों से भी भरा है. अगर वहां राममोहन राय रहे हैं तो बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय भी जिन का आनंद मठ धर्मप्रचार का हिस्सा था. कट्टरवादी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद के राज्य में कम्युनिस्ट पार्टी ने पैर फैलाए लेकिन आज यह मृतप्राय है. ममता ने ही इसे कुचला था पर आज यही उस के पैरों का जख्म बन चुकी है. पुराने कम्युनिस्टों ने अब भारतीय जनता पार्टी की राह पकड़ ली है.

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ममता बनर्जी के पास कोई ऐसा एजेंडा नहीं है जिस के सहारे वे जनमानस को आकर्षित कर सकें. रामनवमी यात्राएं, दुर्गाकाली पूजाओं के सहारे भाजपा आसानी से सारे राज्य में पैठ बना चुकी है जबकि ममता के पास न वामपंथी विचारों का सहारा है, न समाजसुधार की डोर. ऐसे में साफ लग रहा है कि पश्चिम बंगाल भाजपा की झोली में गिरेगा ही. कुछ महीनों में या कुछ सालों में, बस, यह देखना बाकी है.

ट्रैवल: मुसीबत आए तो ऐसे संभले

आप अपनी छुट्टियों का प्लान किसी छोटे शहर में यात्रा के लिए कर रहे हैं तो यह आप के लिए खासा रोमांचक हो सकता है. क्योंकि छोटे शहरों में दूसरे पौपुलर शहरों की तरह न केवल सैलानियों की भीड़ से आप ऊबने से बच जाते हैं बल्कि वहां का खुला वातावरण, पहाडि़यां, खाइयां, खेत, मैदान और गांवों की खुली वादियां आप के रोमांच को कई गुना तक बढ़ा देती हैं.

यात्रा के दौरान जब आप के साथ चोरी, रेप, मारपीट या ठगी जैसी घटना हो जाए और वहां की पुलिस भी आप की कोई मदद न करे, तो ऐसी घटनाएं जीवनभर के लिए न केवल सबक दे जाती हैं बल्कि आप दोबारा ऐसे शहरों की यात्रा से तौबा कर लेते हैं, जैसा कि बस्ती जिले के रहने वाले विकास कसौधन के साथ हुआ.

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विकास अपने परिवार के साथ उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर मिर्जापुर की यात्रा पर यह सोच कर गए कि वहां विंध्याचल की पहाडि़यों के साथ ही महत्त्वपूर्ण रोमांचक पर्यटन स्थलों पर घूमने का मजा लेंगे. लेकिन यात्रा के दूसरे दिन वे जिस होटल में ठहरे उस होटल में शाम को लौटने के बाद जैसे ही कमरे में कदम रखा तो दंग रह गए. कमरे में रखा उन का सारा सामान बिखरा पड़ा था और उन की पत्नी की ज्वैलरी व नकद रुपए गायब थे.

विकास ने सब से पहले इस की शिकायत होटल प्रबंधन से की तो उन का जवाब सुन कर उन्हें बहुत गुस्सा आया. होटल प्रबंधन का कहना था कि वे पैसे और ज्वैलरी होटल में छोड़ कर गए ही क्यों. होटल वाले विकास के रूम से सामान गायब होने पर पूरी तरह से पल्ला झाड़ रहे थे. ऐसे में विकास की होटल वालों से कहासुनी बढ़ गई और नौबत हाथापाई तक आ गई.

घटना की सूचना विकास ने पुलिस के इमरजैंसी नंबर पर दी. कुछ देर बार पुलिस वाले घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने सारा मामला जानने के बाद उलटा विकास को फंसाने की कोशिश शुरू कर दी. पुलिस वालों का कहना था कि विकास ने होटल प्रबंधन के साथ मारपीट की है, इसलिए उसे थाने चलना होगा.

विकास ने होटल में हुए अपने सामान की चोरी की बात पुलिस के सामने रखी. लेकिन पुलिस इस में विकास की ही गलती देखती रही. पुलिस विकास को जबरदस्ती मारपीट के केस में फंसा रही थी जबकि विकास की कोई गलती नहीं थी. ऐसे में पुलिस से पीछा छुड़ाने के लिए उस ने पुलिस से कुछ लेदे कर मामला सुलटाने का अनुरोध किया. आखिर, मामला 10 हजार रुपए में तय हुआ. उस ने पास के एटीएम कार्ड से पैसे निकाल कर दिए और पुलिस वालों से पीछा छुड़ाया.

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यह केवल विकास के साथ हुई घटना नहीं है, बल्कि अकसर ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं. देशीविदेशी सैलानी अपनी यात्रा को रोमांचक बनाने के लिए छोटे शहरों की रोमांचक जगहों की यात्रा के दौरान घटनाओं का शिकार होते हैं और उन्हें स्थानीय लैवल पर पुलिस की कोई मदद नहीं मिलती है. ऐसे में अगर आप भी किसी छोटे शहर की रोमांचक यात्रा का प्लान बना रहे हैं तो कुछ बातों का विशेष खयाल रखें, वरना यात्रा आप के लिए रोमांचक  न हो कर परेशानियों का सबब बन सकती है.

मूवी ‘कबीर सिंह’ का नायक हमारे बीच हमारे शहर!

शाहिद कपूर की फिल्म ‘कबीर सिंह’ बाक्स औफिस पर अपना कमाल दिखा रही है 200 करोड़ रुपए कमाई के क्लब में शाहिद कपूर स्टार्टर फिल्म शामिल होने जा रही है. मगर क्या आपने यह फिल्म देखी हैं या इसकी स्टोरी सुनी है. दरअसल यह मूवी एक साइको बीमारी से पीड़ित शख्स की कहानी बताती है, जो गुस्सैल है,  और महिलाओं के साथ कभी भी कैसी भी हरकत कर सकता है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते. मूवी तो आप थिएटर में देखेंगे, मगर हम आज बात कर रहे हैं हमारे बीच, हमारे शहर में सायको पीड़ितों अर्थात मानसिक रोगियों के बारे में….

शाहिद कपूर की यह फिल्म आज के समय की सच्चाई को प्रस्तुत करती है. हमारे आस-पास भी ऐसे पात्र हैं जिन्हें हम देखते हैं और नजरअंदाज करते हैं. हम यह चिंतन करने को तैयार नहीं हैं की यह आदमी ऐसी असाधारण हरकतें क्यों कर रहा है थोड़ा सा प्यार थोड़ा सा सम्मान और देख रेख से यह साइको पीड़ित स्वस्थ हो सकता है.

संदीप रेड्डी वांगा निर्देशित इस फिल्म में सच्चाई का समावेश है, जीवन का सत्य है. इसलिए जहां शाहिद कपूर की आलोचना हो रही है वहीं बड़ी प्रशंसा भी हो रही है. मगर शाहिद कपूर इस फिल्म का रिएक्शन बड़े मजे से देख सुन नो कमेंट के मूड में है. भारतीय  फिल्म दुनिया अर्थात बौलीवुड और हौलीवुड दोनों जगह ऐसी फिल्में अक्सर बनी है महान एक्टर्स ने इनमें काम किया है और अमर हो गए हैं.

हमारे बीच भी है कबीर !

जी हां! हमारे बीच भी ‘कबीर सिंह’ मूवी सदृश्य किरदार है. विगत 28 मई 2019 को छत्तीसगढ़ के औद्योगिक नगर कोरबा के कोतवाली क्षेत्र में कुछ ऐसी ही विचित्र  घटना घटी. मामला पुलिस थाना पहुंचा और पुलिस ने रपट लिख कर छानबीन प्रारंभ कर दी,  मगर कोई सूत्र हाथ नहीं आया .
दरअसल हुआ यह कि छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल के संयंत्र में कार्यरत मधु (काल्पनिक नाम) नामक महिला के आवास पर रात्रि 1 बजे कोई दस्तक देता है. महिला अकेली होती है, वह दरवाजा खोलती है तो देख कर दंग रह जाती है और घबरा जाती है. एक शख्स पूर्ण ” नग्न “घर के बाहर खड़ा था हाथ में चाकू है वह इंजीनियर महिला को धक्का देता है और उसके आवास में बलात, प्रविष्ट होने लगता है. महिला घबरा जाती है मगर साहस देखिए वह उसका हाथ पकड़ लेती है जिसमें वह शख्स चाकू पकड़ा हुआ है. दोनों में छीना झपटी होती है, हल्ला होता है  वह व्यक्ति महिला को धक्का देकर भाग जाता है मगर इस धक्का-मुक्की में इंजीनियर महिला को चाकू से हल्का घाव हो जाता है महिला थाना पहुंच रपट लिखाती है. पुलिस अचंभित थी की यह कैसी घटना है, आदमी नग्न वह भी हाथ में चाकू लेकर आखिर क्या करने महिला के आवास पर आया था. क्या महिला को डराना था, अस्मत लूटनी थी या उस शख्स का इरादा लूट का था? पुलिस ने मौन, मामला दर्ज कर जांच प्रारंभ कर दी मगर कई दिनों तक इसका खुलासा नहीं हो पाया.

दरअसल वह शख्स एक साइको मरीज  था,  जैसा  “कबीर सिंह” फिल्म में शाहिद कपूर अभिनय करता हुआ उस साइको पीड़ित की दास्तां बयां कर रहा है. रंग,समय, परिस्थितियां अलग हो सकती हैं मगर समस्या एक है वह है मानसिक रुग्णता.

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शाहिद के पहले दिग्गजों ने निभाए रोल

शाहिद कपूर ने कबीर सिंह में साइको पेशेंट की भूमिका निभाई है. जिसमें साइको पीड़ितों के मामले में भी देश भर में चर्चा शुरू हो गई है. केंद्र सरकार ने 2016 में साइको अर्थात मानसिक रोगियों के अधिकारों को लेकर मेंटल हेल्थ केयर बिल 2016 कानून पारित किया है जिसमें मानसिक बीमारियों से पीड़ित लोगों को सुरक्षा और इलाज का अधिकार दिया गया है अब आगे मानसिक रोगियों के साथ संवेदना के साथ बर्ताव किया जाएगा शायद यह संभव होने लगे.

शाहिद के पूर्व अभिनेता ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार ने फिल्म ‘अमर’ में, राजेश खन्ना ने ‘रेड रोज’ में और संजीव कुमार ने फिल्म खिलौना में साइको पीड़ित के रोल निभाए हैं. ऐसा ही  रोल कुछ कुछ शाहरुख खान ने दीवाना और डर फिल्मों में निभाया है. यहीं नहीं हौलीवुड में मार्लीन बैडो  स्ट्रीटकार नेम्ड डिजायर, गौड फादर जैसी फिल्में कर इतिहास में अमर हो गए.

आखिर पकड़ा गया कबिर सिंह

21 जून को औद्योगिक नगरी कोरबा के बुधवारी बाजार बस्ती में एक घटना घटित हुई जिसकी रिपोर्ट कोतवाली पुलिस में दर्ज हुई. कोतवाल दुर्गेश शर्मा ने पाया की एक शख्स अपनी नाबालिग बहन को छेड़ता है. यह असामान्य बात है. जब विद्युत कौलोनी की इंजीनियर महिला की रिपोर्ट देखी जाती है तो शख्स का हुलिया व्यवहार वही पाया जाता है जो अपनी बहन के साथ छेड़छाड़ कर गायब है. ऐसे में पुलिस उसकी गिरफ्तारी करती है और पूछताछ में वह शख्स टूट जाता है. महिला इंजीनियर के आमना सामना  होने पर महिला उसे पहचान जाती है.

यह व्यक्ति था अविनाश कुमार संत. दरअसल लंबे समय से यह शख्स ऐसी हरकतें करता रहा. दुर्गेश शर्मा कोतवाल हमारे संवाददाता से बातचीत में खुलासा करते हैं कि सात वर्षों से यह शख्स इसी तरह अनेक हरकतों को अंजाम दे चुका है.

मगर ऐन केन, बचता रहा. हाल में एक दफे धारा 151 के तहत उस पर प्रतिबांधत्मक कार्यवाही भी पुलिस द्वारा की गई थी. यह नशा करता है मानसिक रूप से रूग्ढ़ है और ऐसी हरकतें नशे के हालात में करता है. पुलिस ने अपना कर्तव्य निभाया या कहें औपचारिकता और अविनाश कुमार को जेल भेज दिया गया.

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क्या मानसिक रोगियों के अधिकार हैं ?

आज जब सारी दुनिया में मानवता की बात होती है. गे से लेकर गाय तक की अधिकारों की बात हो रही है, ऐसे में मानसिक रोगियों को क्या जेल भेज कर कानून अपना काम खत्म कर लेगा. देखा जाए तो समलैंगिकों के अधिकारों से छोटा अधिकार साइको पीड़ितों का नहीं है. फिल्म ‘कबीर सिंह’ के बहाने आज मानसिक पीड़ितों के अधिकारों और समाज के उनके प्रति दायित्वों की भी चर्चा होगी. क्योंकि एक साइको पीड़ित क्या कर रहा है वह नहीं जानता है, नशे और बीमारी की हालत में  किया गया अपराध वैसे भी कठोर दंड को रोकता है. आने वाले समय में ऐसे पीड़ितों को जेल भेजने की जगह मानसिक चिकित्सालय में इलाज करवा सभ्य समाज में शामिल करना भी सरकार और समाज का दायित्व है.

समर रेसिपी: कच्चे आम का सलाद

आम का सलाद को बनाने के लिए प्याज, पुदीना, कच्चे आम लैट्यूस की जरूरत होती है. इस सलाद को आप मिनटों में तैयार कर सकती हैं.

सामग्री

कच्चा आम (1 1/2 कप)

प्याज (1/3 कप)

लाल मिर्च (1 टी स्पून)

पुदीने (1/8 कप)

लैट्यूस (1/3 कप)

पाम शुगर (1 टी स्पून)

सोया सौस (स्वादानुसार)

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बनाने की वि​धि

कच्चे आम को ​छीलकर कददूकस कर लें, इसके बाद प्याज के स्लाइस कर लें.

कच्चे आम और प्याज के साथ बाकी सामग्री को मिला लें.

मूंगफली को क्रश करके इसमें डालें और इसे लैट्यूस पर सर्व करें.

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फेशियल के बाद भूलकर भी न करें ये 6 काम

किसी भी पार्टी में जाना हो या कोई फंक्शन हो तो आप सबसे पहले पार्लर जाती हैं और फेशियल करवाती हैं. पार्लर में आपकी स्किन और रंग के हिसाब से कई तरह के फेशियल किए जाते हैं. माना जाता है 30 की उम्र के बाद आप को महीने में एक बार तो फेशियल करवाना ही चाहिए. लेकिन अब कम उम्र में  लड़कियां भी महीने में कम से कम एक बार तो फेशियल करवा ही लेती हैं. फेशियल करवाने से आपकी स्किन की टैनिंग तो हटती ही है इसके अलावा स्किन भी अच्छी रहती है.

लेकिन क्या आप जानती हैं फेशियल करने के बाद आपको कुछ काम बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, वरना फेशियल का रिएक्शन भी हो सकता है. जी हां, लोगों को इस बारे में कम जानकारी होती है कि फेशियल करवाने के कम से कम एक हफ्ते बाद तक कुछ ऐसी चीजें है जिनसे आपको बचना चाहिए लेकिन लोग अक्सर ये गलती कर बैठते हैं. जिसका नतीजा ये होता है कि कभी-कभी चेहरे पर उसका रिएक्शन भी हो जाता है. आइए बताते है, फेसियल करवाने के बाद आपको क्या नहीं करना चाहिए.

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  1. धूप में ना जाएं–  फेशियल करवाने के तुंरत  बाद भूलकर भी धूप में ना जाएं वरना चेहरे पर इसका रिएक्शन हो सकता है. अगर आपको बाहर जाना बहुत ही जरूरी है तो चेहरे पर कपड़ा बांधकर जाएं.
  2. थ्रेडिंग ना करवाएं– फेशियल करवाने के बाद थ्रेडिंग नहीं करवानी चाहिए. दरअसल फेशियल करवना के बाद स्किन बहुत सौफ्ट हो जाती है जिससे थ्रेडिंग करवाते समय कट लगने के चांसेज ज्यादा हो जाते हैं. इसलिए अगर आपको थ्रेडिंग और फेशियल दोनों चीजें करवानी हैं तो पहले थ्रेडिंग करवाएं उसके बाद फेशियल.
  3. फेशियल करवाने के 4 घंटे तक मुंह ना धोए– फेशियल करवाने के बाद कम से कम 4 घंटे तक तो  साबुन से भूलकर भी मुंह ना धोएं. अगर चेहरा साफ करना है तो पानी की हल्की छीटें मारकर पोछ लें लेकिन साबुन का इस्तेमाल ना करें.

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4. वैक्सिंग ना करवाएं– फेशियल करवाने के बाद चेहरे पर कभी वेक्सिंग नहीं करवानी चाहिए. क्योंकि फेशियल करवाने के बाद त्वचा मुलायम हो जाती है जिसके बाद वैक्सिंग करवाने से त्वचा छिल सकती है

5. फेस मास्क ना लगाएं– जब भी फेशियल करवाएं उसके एक  बाद एक हफ्ते तक किसी भी तरह मास्क चेहरे पर ना लगाएं इससे फेशियल ग्लो खत्म हो जाता है.

6. कम से कम तीन दिन तक स्क्रब ना करें– फेशियल कराने के बाद कम से कम तीन दिन तक चेहरे पर स्क्रब नहीं करना चाहिए. फेशियल कराने के बात वैसे ही आपकी स्किन साफ और सेंसिटिव हो जाती है जिसके बाद जल्दी स्क्रब करने से चेहरे पर दाने हो सकते हैं या चेहरा छिल सकता है.

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अजब गजब: पत्र लिख कर मिल सकता है साढ़े 3 करोड़ का घर

कनाडा की एक अमीर महिला आला वैगनर मिलरविले, अलबेर्टा के 5000 वर्गफुट के मकान में रहती है. उस के घर की कीमत साढ़े 3 करोड़ है. पिछले साल इस वृद्ध महिला की कमर में चोट लग गई. हालात ये बने कि वह अपने घर की सीढि़यां नहीं चढ़ सकती थी. आला वैगनर की नर्स ने सुझाव दिया कि वह अपने घर में अपनी जरूरत के हिसाब से बदलाव करा ले. लेकिन वह अपने प्रिय घर के स्ट्रक्चर में बदलाव को तैयार नहीं हुई.

वैगनर ने कहा मैं इस घर को एक आर्टवर्क की तरह देखती हूं और कोई भी बदलाव इस घर की कीमत और यहां मौजूद हस्तशिल्प को कमजोर ही करेगा. वैगनर ने कई महीनों तक घर को बेचने की कोशिश की लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ.

फिर एक दिन वैगनर के दिमाग में एक विचार आया. उस ने एक कौंटेस्ट ‘राइट ए लेटर, विन ए हाउस’ की शुरुआत करने की सोची. उस ने लोगों से कहा कि वह पत्र लिख कर बताएं कि वे अपने घर में क्यों रहना चाहते हैं.

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वैगनर ने अपने घर की कीमत निकालने के लिए हर आवेदन पर 25 डौलर की फीस भी रख दी. अब तक वैगनर के पास 68 हजार आवेदन आ चुके हैं. यानी भारतीय मुद्रा में 46 लाख 24 हजार रुपए वैगनर के खाते में आ चुके हैं.

अगर अगले कुछ महीनों में वैगनर को आवेदनों से अपने घर की कीमत न मिली तो वह सभी आवेदकों को उन के पैसे लौटा देंगी. अगर यह प्रतियोगिता सफल रहती है तो वह मिलने वाली राशि का 5 प्रतिशत महिला आश्रम के लिए देगी. हालांकि उस ने इन पत्रों की समीक्षा शुरू कर दी है. वह घर के बारे में लोगों के विचार जान कर द्रवित हैं. उस का कहना है कि वह चाहती हैं कि इस घर में कोई परिवार उसी तरह हंसीखुशी रहे, जैसे मैं रही हूं. मुझे विश्वास है कि इस कौंटेस्ट का परिणाम बहुत सुखद होगा.

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बुजुर्गों की दूसरी पारी

सभ्य और आधुनिक कहे जाने वाले समाज में आज बुजुर्गों की हालत बिरयानी में पड़े तेजपत्ते की तरह है. सब अपनेअपने में व्यस्त हैं. वृद्धों की व्यथा सुनने व समझने वाला कोई नहीं है, मगर ‘ठिकाना’ नामक स्वयंसेवी संस्था ने अकेलेपन के शिकार बुजुर्ग महिलाओं व पुरुषों को एक होने का मंच प्रदान कर सराहनीय कार्य किया है.

गणित के हिसाब से भले ही एक और एक 2 होता हो, लेकिन एकाकी जीवन जी रहे किसी भी बुजुर्ग महिला या पुरुष का एक से 2 होना सही माने में एक और एक ग्यारह वाली कहावत को चरितार्थ करता है.

मनोचिकित्सक अमिताभ डे सरकार ने बताया, ‘‘मैं वरिष्ठ नागरिकों की मानसिक स्थिति का लंबे समय से अध्ययन करता आ रहा हूं, इसलिए भलीभांति समझता हूं कि अकेलेपन के कारण जीने की इच्छा लगभग खत्म होने लगती है. और इसी वजह से कई तरह की शारीरिक व मानसिक बीमारियां घर करने लगती हैं.

ऐसे में यदि कोई बुजुर्गों के लिए हाथ बढ़ा कर मदद करे तो उस की जितनी भी प्रशंसा की जाए, वह कम है. ऐसा ही प्रशंसनीय व सराहनीय काम कर रही है ‘ठिकाना’ नामक संस्था.

संस्था द्वारा बीते दिनों सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले कोलकाता शहर के स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट क्लब में एकाकी रहने वाले बुजुर्गों के लिए ‘स्वयंवर’ आयोजित किया गया, जिस में 6 महिला और 5 पुरुष समेत कुल 11 प्रतिभागियों ने जीवनसाथी की तलाश में शिरकत की. महिला प्रतिभागियों का प्रवेश निशुल्क था और पुरुषों ने बतौर पंजीकरण शुल्क 600 रुपए अदा किए.

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आयोजकों ने बताया कि उन की संस्था के बैनर तले इसी तरह का पहला स्वयंवर दिसंबर 2017 में आयोजित किया गया था. आयोजकों के मुताबिक, संस्था का काम केवल मंच प्रदान करना है. इस के आगे का काम खुद प्रतिभागियों को करना है. मसलन, एकदूसरे को समझना, एकसाथ एक घर में रहना, शादी करना या दूर रह

कर भी एकदूसरे की जरूरत पूरी करना और सुखदुख में साथ देना, एकदूसरे के काम आना, एकदूसरे की मदद करना आदि.

स्वयंवर में शिरकत करने पहुंची एक बुजुर्ग महिला ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया, ‘‘आज भागदौड़ की जिंदगी में किसी के पास समय नहीं है. पिता के पास बेटे के लिए, तो बेटे के पास मांबाप के लिए समय नहीं है. वृद्ध मां या पिता को देखने वाला कोई नहीं है. ऐसे में हम जैसे बुजुर्गों के लिए यह स्वयंवर आशा की एक किरण है. इस मंच के जरिए अकेले जीने पर मजबूर लोगों को हमसफर चुनने का मौका दिया जा रहा है.’’

इस महिला ने आगे कहा, ‘‘उन्हें मंच की सब से अच्छी बात यह लगी कि अपने जीवनसाथी का चयन करने वाले बुजुर्ग पुरुष व महिला बतौर पतिपत्नी या लिवइन रिलेशन में भी रह सकते हैं.’’

इसी तरह, एक बुजुर्ग पुरुष ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, ‘‘तमाम बंधनों व आर्थिक स्थिति को देख कर वृद्ध उम्र के अंतिम पड़ाव में एकदूसरे का सहारा बनना चाहते हैं तो इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए.’’

एक सर्वेक्षण के मुताबिक, तकरीबन 10 फीसदी बुजुर्गों में एकाकी के कारण जीने की चाह खत्म हो जाती है. कुछ तो खुदकशी तक का रास्ता भी चुन लेते हैं. जानकारों का मत है कि ऐसे लोगों में फिर जीने का जज्बा पैदा करने वाले ऐसे कदम समाज में काफी कुछ बदलाव ला सकते हैं.

स्वयंवर का साक्षी बनने स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट क्लब पहुंचे ज्यादातर लोगों ने इस अनोखी पहल की तारीफ की, तो कुछ लोगों ने सवाल उछालते हुए कहा, ‘‘उम्र के इस पड़ाव में जब व्यक्ति खुद को संभाल नहीं पाते हैं तो वे अपने अंतिम वक्त में एकदूसरे का कैसे सहारा बनेंगे?’’ इन लोगों का तर्क था कि ऐसे बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम या फिर अपनों के बीच रहना ही सही है.

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संस्था के प्रमुख ने बताया कि इच्छुक बुजुर्ग स्वयंवर नामक मंच के माध्यम से अपनी दूसरी पारी शुरू कर सकते हैं. इस बाबत संस्था के फेसबुक पेज पर बुजुर्ग अपनी बात कह सकते हैं.

 सहारे की जरूरत

‘‘एकाकी जीवन जी रहे वृद्धवृद्धाओं को जीवन के आखिरी पड़ाव में उपयुक्त साथी चुनने का मौका उपलब्ध कराना बुजुर्गों की सेवा करना है. जीवनसाथी की मौत या जीवनसाथी से तलाक या फिर संतानों के विदेशों में रहने के कारण जिंदगी में एकाकीपन की मार झेल रहे बुजुर्गों को नया जीवन व ऊर्जा प्रदान करना ‘ठिकाना’ का मुख्य मकसद है. एकाकी होने के कारण बुजुर्गों में जीने की इच्छा धीरेधीरे खत्म होने लगती है.’’?

जायरा के ईमान से कहीं बेहतर है, नुसरत की बेईमानी  

दो टूक कहा जाये तो देश को जायरा वसीम से कहीं ज्यादा नुसरत जहां जैसी युवतियों की ज्यादा जरूरत है. ऐसे वक्त में जब समाज और देश दोनों कट्टरपंथियों के चंगुल में फंसे छटपटा रहे हैं तब जोखिम युवाओं को ही उठाना पड़ेगा कि वे अपने  दिमाग की खिड़कियां खोलें और ताजी हवा में आजादी की सांस लेकर यह साबित करें कि वे धार्मिक कट्टरवाद और पंडे मुल्लाओं के गुलाम होकर उनके इशारे पर नाचने को तैयार नहीं हैं. उनकी ज़िंदगी उनकी है और वे इसे अपने तरीके से जिएंगे .

पहले बात जायरा की जो 2016 में आमिर खान की फिल्म दंगल से पहचानी गईं थीं. बिलाशक इस फिल्म से उन्होंने साबित किया था कि वे किसी और पेशेवर अभिनेत्री से उन्नीस नहीं हैं. इस फिल्म में काम करने से पहले वे माइक्रोसाफ्ट मोबाइल और टाटा स्काई के विज्ञापनों में भी  दिखीं थीं तभी समीक्षकों ने अंदाजा लगा लिया था कि सुर्ख गुलाबी रंगत वाली इस कश्मीरी कली की दौड़ मौडलिंग तक ही सिमटी नहीं रह जाने वाली जायरा ने अभी ज़िंदगी के 19 वसंत भी नहीं देखे हैं, लेकिन फिल्में छोड़ने का उसका ताजा बयान बताता है कि मुंबई की खुली हवा पर जन्नत कहे जाने बाले कश्मीर की धार्मिक घुटन भारी पड़ रही है. जायरा के पिता जाहिद वसीम बैंक मेनेजर हैं और मां जर्का टीचर हैं .

जायरा को दसवी बोर्ड के इम्तिहान में 92 फीसदी नंबर मिले थे और अभी वह जम्मू के हेरिटेज स्कूल से 11बी की पढ़ाई कर रही हैं. उम्मीद थी कि जायरा मुस्लिम युवतियों के लिए रोल मौडल साबित होगी. 2017 में आई ‘सीक्रेट सुपर स्टार’ जायरा की दूसरी फिल्म थी जो मुस्लिम पृष्ठभूमि पर आधारित थी. इस फिल्म के रिलीज होने के पहले एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि कश्मीर में कितनी सारी लड़कियां हैं जो अपनी मर्जी से नकाब पहनती हैं और उनकी शादियां नहीं हो रही हैं. उनके मां बाप उन पर नकाब उतारने का दबाब बना रहे हैं पर वो नहीं उतार रहीं हैं, बुर्का और दबाब एक स्टीरियोटाइप सोच है जरूरी नहीं कि हिजाब पहनने वाली लड़कियां घर वालों के दबाब में ही हिजाब पहनती हो.

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गौरतलब है ‘सीक्रेट सुपर स्टार’ में जायरा एक ऐसी मुस्लिम लड़की की भूमिका में थी जिसका परिवार परंपरागत इस्लामिक परिवार है जिसमें दूसरी कई बन्दिशों की तरह बुर्का पहनना भी  एक अनिवार्यता होती है. तब जायरा के तेवर देख लगा था कि वह मुस्लिम समाज में पसरी बुर्का प्रथा समेत उन तमाम रूढ़ियों और कुरीतियों का विरोध करेगी और न भी कर पाये तो उन पर एतराज जरूर जताती रहेगी. वैचारिक और बौद्धिक तौर पर वह बहुत ज्यादा परिपक्व नहीं मानी जा सकती फिर भी ऐसा भी लगा था कि मुस्लिम समाज में औरतों की बदहाल और गुलामों जैसी जिंदगी उस वक्त जरूर उसे खटकती होगी जब उसने मुंबई में देखा होगा कि औरतें कई बेड़ियां तोड़कर कहां से कहां पहुंच गईं हैं और पूरी गैरत से जिंदगी गुजार रहीं हैं .

जाग उठा ईमान – किसी सी ग्रेड की फिल्म का नहीं बल्कि जायरा के ताजे ताजे बयान का एक छोटा सा टुकड़ा है जिसे लेकर वह सुर्खियों में है. सोशल मीडिया पर की गई एक पोस्ट में जायरा ने यूं तो 6 पन्नों का खत लिखा था पर उसका मजमून इन दो लाइनों में सिमट कर रह जाता है कि ईमान जाग जाने के चलते वह अब फिल्में और फिल्म इंडस्ट्री छोड़ रही है क्योंकि यह सब उसके और धर्म के बीच आड़े आ रहा है और यह रास्ता उसे उसके अल्लाह से दूर कर रहा है .

इस पोस्ट ने बौलीवुड सहित राजनीति में भी हाहाकार मचा रखा है. भाजपा और शिवसेना जायरा की इस पोस्ट की जांच की मांग करते यह कह रहे हैं कि उस पर कट्टरपंथी मुस्लिमों का दबाब है तो कांग्रेस इसे आस्था का विषय बताते हुये मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही है. जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कान्फ्रेंस के मुखिया उमर अब्दुल्लाह ने जायरा के फैसले का समर्थन किया है लेकिन उनसे भी ज्यादा कट्टरवादी पीडीपी की महबूबा मुफ्ती हाल फिलहाल खामोश हैं. बंगलादेशी साहित्यकार तसलीमा नसरीम ने इसे बेबकूफी भरा फैसला कहा है और इसकी संक्षिप्त व्याख्या भी यह कहते की है कि यह जानकार उनके रोंगटे खड़े हो गए कि जायरा अब एक्टिंग छोड़ना चाहती है क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके एक्टिंग के कारण अल्लाह में उनका विश्वास खत्म हो रहा है. मुस्लिम समुदाय की कई प्रतिभाओं को बुर्के के अंधकार में जाने के लिए मजबूर किया जाता है.

फिल्मी सितारों में सबसे तीखी और सटीक प्रतिक्रिया अपने दौर की मस्त मस्त अभिनेत्री रवीना टंडन ने यह कहते दी कि कोई फर्क नहीं पड़ता अगर वो लोग जिन्होंने महज 2 फिल्मों में काम किया हैं इस इंडस्ट्री के प्रति कृतज्ञता महसूस नहीं करते कि उन्हें यहां क्या क्या मिला है .  आशा करिए कि वो शांति से यहां से निकल जाएं और अपने उल्टे रास्तों पर चलने वाली सोच को खुद तक ही सीमित रखें .

जायरा के जागे ईमान पर हर कोई कुछ न कुछ कह रहा है लेकिन इनमें से अधिकतर इसे दुखद बताते उसका निजी और आस्था वाला फैसला भी बता रहे हैं. ये लोग दरअसल में कठमुल्लाओं की तरह दोगलेपन का शिकार हैं जिनमें इतनी हिम्मत और समझ नहीं कि वे एक कमसिन युवती की कुंठित मानसिकता को समझें फिर बोलें. क्योंकि सवाल एक जायरा के पलायन का नहीं बल्कि लाखों करोड़ों जायराओं और जानकियों के भविष्य और धार्मिक परेशानी का है.

जायरा असल में ईमान की आड़ में इस्लाम का ढोल पीट रही है जिससे यह संदेशा जाए कि सुबह का भूला अगर शाम को लौट आये तो ऊपर वाला और नीचे वाले भी माफ कर देते हैं.

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एक किशोरी की धार्मिक ग्लानि – अगर यह जायरा की जल्द प्रदर्शित होने जा रही फिल्म द स्काई इज पिंक के प्रचार का सस्ता हथकंडा नहीं है तो निश्चित रूप से यह एक मुस्लिम किशोरी की धार्मिक ग्लानि है जो यह खुल कर नहीं बता पा रही कि फिल्मों में काम करने से वह किस तरह अल्लाह ईमान और मजहब से दूर हो रही थी और ऐसा हो रहा था तो वह नर्गिस दत्त और मीना कुमारी से लेकर केटरीना कैफ तक के साथ क्यों नहीं हुआ .

दरअसल में जायरा धार्मिक पूर्वाग्रहों और कुंठाओ के साथ साथ परम्पराओं का शिकार लगती है उसे लगता है कि ऐसा या वैसा करने से अल्लाह उससे नाराज हो जाएगा और कयामत के दिन उसे अपने गुनाहों और उन पापों की सजा देगा जो दरअसल में उसने किए ही नहीं थे. जायरा शायद ही क्या तय है न तो बता पाएगी और न ही साबित कर पाएगी कि अल्लाह वाकई में कहीं है. जायरा जैसे धर्म से भयभीत युवा असल में धर्म की फेक्टरी की पैदाइश होते हैं जिन्हे बचपन से ही धर्म और उसके उसूलों से डरना सिखा दिया जाता है जिससे उसके ठेकेदारों की दुकान आबाद रहे .

जायरा के फैसले से ज्यादा यह बात अफसोसजनक है कि कई मुस्लिम कलाकार सीधे या घुमा फिराकर उसका समर्थन कर रहे हैं सीधे तौर पर उसका समर्थन करने वालों में चरित्र अभिनेता रजा मुराद का नाम उल्लेखनीय है.

नुसरत की बेईमानी को सलाम – जायरा के फैसले पर विवाद ऐसे वक्त में हो रहा है जब एक और मुस्लिम सांसद नुसरत जहां पर भी विवाद शबाब पर है. हालिया लोकसभा चुनाव में 30 वर्षीय नुसरत टीएमसी के टिकिट पर पश्चिम बंगाल की बशीरहाट सीट से साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा वोटों से जीतीं हैं. इत्तफाक से वह भी फिल्म अभिनेत्री हैं और खूबसूरती और एक्टिंग के मामले में जायरा पर बीस ही बैठती हैं .

नुसरत ने जैन समुदाय के एक व्यवसायी निखिल से शादी चुनाव जीतने के तुरंत बाद तुर्की में की थी. शपथ लेने के बाद उन्होंने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के पैर छुए थे तो कठमुल्लाओं की भौंहे तन गईं थीं क्योंकि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और के सामने झुकने की सख्त मुमानियत और पाबंदी है लिहाजा उनके खिलाफ फतवे जारी हुये थे और अभी तक हो रहे हैं. उनके ससद में वन्देमातरम बोलने पर भी एतराज जताया गया था.

हालांकि नुसरत इन ठेकेदारों के निशाने पर तो तभी आ गईं थीं जब उन्होंने अपनी मांग में सिंदूर भरा था और गले में मंगलसूत्र भी लटकाया था. इस पर देवबंद में बैठे मुल्लाओं ने इसे इस्लाम के खिलाफ बताया था और तो और एक साहब ने तो यह तक फरमा डाला था कि मुस्लिम युवतियों को हिन्दू लड़को से शादी नहीं करना चाहिए. जानें क्यों यह जनाब यह नहीं बोल पाये थे कि मुसलिम लड़कों भी हिन्दू या गैर मुस्लिम लड़कियों से शादी नहीं करनी चाहिए.

लेकिन दिलेर नुसरत पर इन बातों या फतवों का कोई असर नहीं हुआ उल्टे उन्होंने कहा कि वह संयुक्त भारत की प्रतिनिधि हैं जो धर्म जाति और पंथ से परे है, कट्टरपंथियों के बयानों पर ध्यान देने का मतलब घृणा और हिंसा को बढ़ावा देना है इतिहास इसका गवाह है. नुसरत परिधान को भी आस्था से परे मानती हैं.

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ऐसा कहना एक काल्पनिक बात होगी कि व्यक्तिगत कारणों के चलते जायरा पर इन फतवों का असर इतने गहरे तक पड़ा कि वह पलायन की हद तक डर गई. हकीकत तो यह है कि जायरा घाटी की धार्मिक घुटन से खुद को आजाद नहीं कर पाई और न ही ऐसा चाहती और जो खुद बेड़ियों में बंधे रहना चाहता है, धर्म के नाम पर गुलामों सी जिंदगी जीना पसंद करता है उसके लिए कोई कुछ नहीं कर सकता. लेकिन सीखा नुसरत जैसी युवतियों से जाना चाहिए कि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता से बढ़कर और सुखद कुछ नहीं होता. हरेक को अपने इस हक का इस्तेमाल करने से हिचकना या डरना नहीं चाहिए कि वह अपनी मर्जी से जियें, पसंद का खायें पियें और पसंद के ही कपड़े पहनें, मनचाही जगह शादी करें और फिजूल के धार्मिक पाखंडों और चोचलों से दूर रहें, जो महंगे भी पड़ते हैं और दिमागी तौर पर गुलाम भी बनाते हैं. देश और समाज को जायराओं की नहीं बल्कि नुसरतों की जरूरत है जो दीन ईमान वगैरह से दूर रहते, आजादी और सुकून से जीती हैं और यह अगर बेईमानी है तो इसे सर आंखो पर लिया जाना चाहिए.

औनलाइन बुलिंग के खिलाफ अनन्या पांडे ने शुरू की नई पहल

वर्ल्ड सोशल मीडिया डे पर 30 जून रविवार को बौलीवुड एक्ट्रेस अनन्या पांडे ने औनलाइन बुलिंग के खिलाफ अपनी नई पहल डीएसआर (डिजिटल सोशल रिस्पौन्सिबिलिटी) की घोषणा की. उन्होंने सोशल मीडिया बुलिंग के खिलाफ अधिक से अधिक जागरूकता फैलाने के लिए एक समुदाय का निर्माण करने के लिए एक पहल शुरू की है, जिसका नाम ‘सो पौजिटिव’ है.

दरअसल अनन्या ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो के जरिए अपने फौलोअर्स को इस बात की जानकारी दी. अनन्या ने लोगों से सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर निगेटिविटी फैलने से रोकने की अपील भी की हैं.

अनन्या ने सोशल मीडिया बुलिंग के अपने निजी संघर्षो के बारे में एक वीडियो में बताया. अनन्या ने लिखा, “अपनी जिम्मेदारियों को समझना बड़े होने का हिस्सा है और एक जागृत मिलेनियल के रूप में मैं, अनन्या पांडेय आपको अपनी ‘डिजिटल सोशल रिसपौन्सिब्लिटी पहल सो+’  से परिचित कराती हूं.

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अनन्या ने लिखा, “वे लिखते हैं तुम बहुत पतली हो, तुम्हारे अंदर कोई प्रतिभा नहीं है, वे लिखते हैं तुम अपने बाप के पैसे पर उड़ती हो..तुम भाई-भतीजावाद की उत्पाद हो. वो मुझे ओवरएक्टिंग की दुकान कहते हैं. वे मेरी मां, मेरे पापा यहां तक कि मेरी छोटी बहन और मेरे दोस्तों के बारे में भी लिखते हैं. उन्होंने मुझ पर झूठी होने का आरोप लगाया. ”

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अनन्या ने लिखा, “एक पल के लिए मैंने विचार किया कि आखिर वे हैं कौन..वे कुछ नहीं हैं, न उनका कोई चेहरा है, न पहचान, बिना प्रमाणित नए अकाउंट हैं. सोशल मीडिया बुलीज को लेकर मैंने सोचा मैं ही क्यों.. अंत में मुझे अहसास हुआ कि मैं नहीं हूं..सिर्फ मैं ही नहीं हूं.” इसके साथ ही अनन्या ने नेटिजेंस से सोशल मीडिया पर सकारात्मक माहौल बनाने की अपील की.

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