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जानें कैसे बनाएं दही पूरी

पूरी, आलू, दही और सेव डालकर तैयार होने वाली दही पूरी खाने में जितनी टेस्टी है, उसे बनाना उतना ही आसान है. हर उम्र के लोग इसे खाना पसंद करते हैं. तो चलिए जानते हैं, कैसे बनाएं दही पूरी

सामग्री

दही एक कप

धनिया पत्ता मुठ्ठीभर

नमक चुटकीभर

चीनी 1 चम्मच

जीरा पाउडर एक चौथाई चम्मच

पानी पूरी 15 (तोड़ी हुई)

उबला हुआ आलू 2 (चौकोड़ कटा हुआ)

सेव एक चौथाई कप

चाट मसाला तीन चौथाई चम्मच

लाल मिर्च पाउडर एक चौथाई चम्मच

हरी चटनी एक चौथाई चम्मच

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बनाने की वि​धि

सबसे पहले एक बर्तन में दही, नमक और चीनी को अच्छी तरह से मिक्स करें.

अब पानी पूरी वाली पूरी को एक प्लेट पर सजा लें.

पूरी के ऊपर से कटा हुआ आलू, चाट मसाला पाउडर, लाल मिर्च पाउडर और जीरा पाउडर डालें.

ऊपर से 2-3 चम्मच हरी चटनी और दही डाल दें.

धनिया का पत्ता और सेव से सजाकर तुरंत सर्व करें.

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जगमोहन रेड्डी की राह पर अमित जोगी

आखिरकार वही हुआ जो छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत प्रमोद कुमार जोगी के पुत्र और जनता कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमित ऐश्वर्या जोगी की चाहत थी. अमित जोगी हर दूसरे दिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल  को चैलेंज करते थे कि मुझे गिरफ्तार किया जाए. मुझे गिरफ्तार किया जाए. अंततः उनकी मंशा 3 सितंबर को भूपेश बघेल ने पूरी कर दी .

छत्तीसगढ़ की राजनीति के जानकार जानते हैं कि मुख्यमंत्री की शपथ के साथ प्रदेश में भाजपा के दिग्गज और पूर्व मुख्यमंत्री डा रमन सिंह भूपेश के कोप के भाजन बने हैं. डौक्टर रमन और उनके खासुलखास दांए बांए सहित पुत्र अभिषेक सिंह, दामाद पुनीत गुप्ता पर अनेक जांच गंभीर प्रकरण कांग्रेस सरकार ने लाद दिए हैं.

इधर अपने घुर विरोधी रहे अजीत जोगी पर भूपेश बघेल की ‘वक्र’ दृष्टि है इसे सभी जानते हैं मगर भूपेश बघेल उतने तल्ख नहीं हुए जितने भाजपा की मंडली पर रहे हैं. संभवत: इसका कारण अजीत जोगी का विशाल कद और पूर्ववर्ती खट्टे -मीठे संबंध रहे हैं. इधर अजीत जोगी ने भी आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार पर ‘नम्र’ दृष्टि रखी हुई थी.प्रत्यक्ष प्रमाण संसदीय चुनाव रहा जिसमें अजीत जोगी मैदान में उतरते तो कांग्रेस के एक या फिर दोनों बस्तर और कोरबा प्रत्याशी खेत रह जाते.

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अमित जोगी का चैलेंज, गेम- चेंजलर छत्तीसगढ़ में जनता कांग्रेस की बखत नहीं बन पाने के पश्चात अमित जोगी ने अपने पिताश्री की बनाई राजनीतिक धरोहर जनता कांग्रेस जोगी पार्टी की कमान संभालने के बाद धुआंधार ढंग से भूपेश बघेल पर आक्रमण प्रारंभ कर दिया. छत्तीसगढ़ के कोने कोने में घूम-घूम कर ज्वलंत मुद्दे उठाए और हर दिन हुंकार भरी की भूपेश बघेल दम है तो मुझे गिरफ्तार करो  !

30 अगस्त को थाने पहुंच ज्ञापन सौंपा की भूपेश बघेल अपने राजनीतिक शौचालय की गंदगी फैला रहे हैं, मेरे पिता को जाति मामले पर रंजिश वश फंसाया गया है एफ आई आर दर्ज किया गया है .भूपेश बघेल में दमखम है तो मुझे गिरफ्तार करें. यह एक इंतेहा थी, जिस पर प्रदेश के दूसरे नंबर के बड़े नेता टी. एस. सिंहदेव की प्रतिक्रिया आई-” अमित की इच्छा पूरी होगी प्रशासन अपना काम करेगा.” और सिंहदेव दिल्ली सोनिया गांधी के पास पहुंच गए. इघर भूपेश बघेल के इशारे पर अमित जोगी को गिरफ्त में ले लिया गया. सबसे महत्वपूर्ण यह की जिस तरह श्री कृष्ण ने शिशुपाल को सौ गालियां तक की छूट दे रखी थी और उसके पश्चात सुदर्शन चक्र चलाया था संभवत: यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ. जब अमित के चैलेंज की इंतहा हुई तो ‘गिरफ्तारी’ हो गई ।… मगर रूकिए… छत्तीसगढ़ की राजनीति का यह घटनाक्रम एक ‘चैलेंजर गेम’ मे भी बदल सकता है, कैसे … आगे देखते हैं…

भूपेश की घेराबंदी है यह ?

इसमें कोई दो राय नहीं की अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के राजनीतिक परिवारों में अपना अहम स्थान रखते हैं. और प्रारंभ से प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रहे हैं. यह वह शख्सियत है जो कभी मौन नहीं रहती सदैव संघर्षरत रहती है. ऐसे में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि अमित जोगी का यह कदम भूपेश बघेल को घेरना है और यह संदेश प्रसारित करना भी कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भूपेश बघेल “क्रूरता” के साथ अपने राजनीतिक विरोधियों को निपटा रहे हैं.अब यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि सरकार के इस कदम से अमित जोगी और उनकी पार्टी को जनता की कितनी सिम्पैथी मिलती है .मगर एक बड़ा सच यह है कि जिस प्रकरण में अमित जोगी को गिरफ्त में लिया गया है वह चुनाव में उनकी दोहरी नागरिकता को छिपाने का है और 2013 के विधानसभा चुनाव के दरम्यान दी गई शपथ का है. मजे की बात यह की तब अमित जोगी कांग्रेस के उम्मीदवार थे और भाजपा प्रत्याशी समीरा पैकरा ने शिकायत की थी. यही कारण है कि भाजपा के बड़े नेता डा. रमन सिंह, धर्मजीत कौशिक ,प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी इस मामले पर खामोश है.

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 राजनीति के “केंद्र” में आना चाहते हैं

प्रदेश की राजनीति में अमित ऐश्वर्या जोगी केंद्र में आना और रहना चाहते हैं. इसके लिए हर हथकंडा, राजनीतिक आंदोलन प्रोपेगेंडा होगा. और- राजनीति में सब जायज भी है.इस तरह अमित जोगी अपनी पार्टी को जनता के बीच ले जाकर राजनीतिक परिस्थितियां बदलना चाहते हैं .उन्होंने एक दफे कहा था जगन रेड्डी जब 15 साल संघर्ष कर के मुख्यमंत्री बन सकते हैं तो यह एक उदाहरण है. जगन रेड्डी को एक तरह से अपना आदर्श बना अमित जोगी छत्तीसगढ़ की राजनीति में पेंगे भर रहे हैं.अब यह भविष्य के गर्भ में है कि आने वाले समय में एक और दो नंबर की पार्टियों को नेस्तनाबूद कर क्या अमित जोगी अपना लक्ष्य प्राप्त कर पाएंगे.

अब ‘नेटफ्लिक्स’ के लिए ‘द व्हाइट टाइगर’ का सह निर्माण व उसमें अभिनय करेंगी प्रियंका

प्रियंका चोपड़ा ने अरविंद अदिगा की किताब ‘‘द व्हाइट टाइगर’’ को पढ़ा था, तभी से इसकी तारीफ करती रही हैं. अब वह उसी किताब पर‘‘नेटफ्लिक्स’’ के लिए बन रही फिल्म में राज कुमार राव के साथ प्रियंका चोपड़ा अभिनय करने वाली हैं. इस बात की नई घोषणा ‘नेटफ्लिक्स’’ ने आज एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर की है. मजेदार बात यह है कि प्रियंका चोपड़ा जोनस स्वयं इस फिल्म का मुकुल देवड़ा के साथ मिलकर सह निर्माण भी करेंगी. फिल्म का निर्देशन हौलीवुड फिल्म ‘‘फारेनहाइट 451’’के निर्देशक रामिन बाहरानी करेंगी. इस फिल्म में आदर्श गौरव भी अहम किरदार निभाएंगे.

मशहूर ईरानियन अमरीकन निर्देशक रामिन बहरानी 2005 से अब तक करीबन आठ फिल्मों का लेखन व निर्देशन कर चुके हैं. उनकी हर फिल्म ने तमाम अवार्ड हासिल किए. प्रियंका चोपड़ा जोनस ने एक बयान जारी कर कहा है- ‘‘जब मैंने अरविंद की इस किताब को पढ़ा, तो इसकी मार्मिक कहानी मेरे दिल को छू गयी थी. मैं तो बहुत रोमांचित हो गयी थी. यह कहानी कच्ची महत्वाकांक्षा और अपने लक्ष्य को पाने के लिए किसी भी हद तक जाने की है.इस कहानी की सिनेमाई प्रस्तुति के लिए मैं ‘नेटफ्लिक्स’ और रामिन बहारानी के साथ काम करने को लेकर अति उत्साहित हूं. मैं पहली बार राज कुमार राव के साथ काम करने को लेकर भी उत्साहित हूं. हम अगले माह यानी कि अक्टूबर माह से भारत में इस फिल्म की शूटिंग करेंगे.’’

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वैसे ‘‘नेटफ्लिक्स’’ ने अप्रैल 2018 में ही रामिन बाहरानी के निर्देशन में इस फिल्म के बनने की घोषणा की थी. उस वक्त रमानी बाहरानी ने कहा था- ‘‘मैं इसे सिर्फ भारतीय नहीं बल्कि सार्वभौमिक कहानी मानता हूं और मेरी राय में विश्व का हर इंसान इस कहानी व इसके किरदार के साथ खुद को जुड़ा पाएंगे. इस उपन्यास में भी ‘लौयन’ और ‘स्लमडौग मिलेनियर’ फिल्मों की ही तरह भारतीय पृष्ठभूमि में सामाजिक मुद्दों की खोज की गयी है. एक व्यक्ति की व्यक्तिगत कहानी में पूरे देश का दायरा समाहित होता है. अमीर व गरीब की अवधारणा वैश्विक है.’’

RAMIN-BAHRANI

जबकि राज कुमार राव कहते हैं- ‘‘मैं खुद को भाग्यशली समझता हूं कि मैंने बौलीवुड में उस वक्त कदम रखा है,जब कलाकार को रोमांचक काम करने का अवसर मिल रहा है. मैं एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म ‘द व्हाइट टाइगर’ का हिस्सा बनने को लेकर अति उत्साहित हूं. मैं तो निर्देशक रामिन के काम का भी प्रशंसक रहा हूं.’’

उधर लेखक व निर्देशक रामिन बाहरानी ने बयान जारी कर कहा है- ‘‘मैं पिछले एक दशक से अरविंद अदिगा की किताब ‘‘द व्हाइट टाइगर’’ पर फिल्म बनाना चाहता था. मेरी यह ख्वाहिश अब नेटफ्लिक्स, प्रियंका चोपड़ा और मुकुल देवड़ा के प्रयासों के चलते पूरी होने जा रही है.’’

ज्ञातब्य है कि उपन्यासकार अरविंद अदिगा और निर्देशक रामिन बाहरानी एक साथ कोलंबिया विश्वविद्यालय में सहपाठी थे. रमानी के अनुसार अरविंद ने इस उपन्यास के कुछ पन्ने उनके घर में ही लिखे थे. कौलेज के बाद भी यह दोनों अच्छे दोस्त बने हुए हैं.

‘‘द व्हाइट टाइगर’’ की कहानी एक चाय बेचने वाले इंसान की है,जो कि एक दिन न सिर्फ बहुत बड़ा उद्योगपति बनता है, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा स्रोत भी बनता है. पर इस बीच उसकी अपनी एक अति कठिन संघर्ष यात्रा भी है. मूलतः भारतीय लेखक अरविंद अदिगा का अंग्रेजी भाषा का ‘‘द व्हाइट टाइगर’’ पहला उपन्यास है, जो कि 2008 में प्रकाशित हुआ था. और इसी वर्ष इसे चालिसवें ‘‘मैन बूकर प्राइज’’ से नवाजा गया था. इसमें वैश्विक स्तर पर विश्व में भारत के वर्ग संघर्ष का हास्यप्रद चित्रण है. यह लकहानी है एक गांव के लड़के बलराम हलवाई की है. उसे अपनी चचेरी बहन के दहेज की रकम को चुकाने के लिए पढ़ाई छोड़कर अपने भाई के साथ धनबाद में एक चाय की दुकान में काम करना पड़ता है. चाय बनाते बनाते वह ग्रहकों की आपसी बातचीत से भारत सरकार की अर्थव्यवस्था को समझने का प्रयास करता है. समय निकालकर ड्रायविंग भी सीखता है.फिर वह दिल्ली आता है, जहां वह अपने ही गांव के जमींदार/अमीर इंसान की कार का ड्रायवर बन जाता है. दिल्ली में ही सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा गरीब व अमीर के बीच के भेद को समझता है. उसे एक अति कटु अनुभव से गुजरना पड़ता है, जिसके चलते वह एक दिन अपने मालिक की हत्या व उसके पैसे चुराकर बंगलौर पहुंचता है. बंगलौर में एक पुलिस अधिकारी को घूस देकर वह अपना टैक्सी का व्यापार शुरू करता है. अंततः एक दिन वह बहुत बड़ा उद्यमी बन जाता है. इस डार्क उपन्यास में जाति,धर्म और वफादारी ,भ्रष्टाचार व गरीबी जैसे कई मुद्दे उठाए गए हैं. इसमें बलराम के माध्यम से आजादी को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं.

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उपन्यासकार अरविद अदिगा दूसरे कम उम्र के चर्चित उपन्यासकार हैं. न्यूयार्क टाइम्स ने उनके उपन्यास को बेस्ट सेलर कहा. वैसे प्रियंका चोपड़ा जोनस, ‘‘नेटफिलक्स’’ के लिए फिल्म ‘‘वी कैन बी हीरोज’’ के अलावा एक अनाम भारतीय फिल्म कर रही हैं. जबकि दीवाली के अवसर पर प्रियंका चोपड़ा की हिंदी फिल्म ‘‘स्काय इज द पिंक’’ प्रदर्शित होने वाली है.

वायरल हो रही रणबीर और आलिया की वेडिंग फोटोज, जानें क्या है सच

बौलीवुड एक्ट्रेस आलिया भट्ट और रणबीर कपूर के अफेयर के चर्चे की खबर काफी समय से आ रही है. कई बार आलिया पब्लिकली भी अपने रिलेशनशिप पर हिंट भी दे चुकी हैं. दरअसल कौफी विद करन के एक एपिसोड में आलिया और रणबीर साथ गए थे. हालांकि ये दोनों सुपरस्टार्स कई इवेंट पर एक साथ स्पौट किए गए हैं.

आपको बता दें, जब रणबीर और आलिया की शादी की कुछ तस्वीरें वायरल होने लगीं. हर कोई इन तस्वीरों को देखकर हैरान रह गया. वायरल हो रही इन तस्वीरों में आलिया दुल्हन के लिबास में पूरी तरह सजी दिखाई दे रही हैं. वहीं उनके सामने रणबीर कपूर भी दूल्हे के गेटअप में खड़े हैं. रणबीर, आलिया को एक दूसरे को देख रहे हैं तो वहीं आलिया भी शर्माती दिखाई दे रही हैं.

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इन तस्वीरों को रणबीर आलिया के एक फैनपेज ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया है. ये तस्वीरें देखने के बाद तो जैसे फैंस के बीच हलचल मच गई. हर कोई ये पूछ रहा है क्या उन दोनों की शादी हो गई है? पर आप इन तस्वीरों की सच्चाई जानकर हैरान रह जाएंगे.

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दरअसल ये तस्वीरें पूरी तरह फेक हैं. इन तस्वीरों में आलिया तो असली हैं लेकिन रणबीर कपूर की फोटोशौप तस्वीर दिखाई गई है. जी हां तो ये फोटोशौप का कमाल है.किसी विज्ञापन शूट के लिए आलिया दुल्हन बनी है और दूल्हा रणबीर नहीं बल्कि कोई और मौडल है. इस विज्ञापन से आलिया की ये फोटो लेकर फोटोशौप से रणबीर-आलिया की शादी की तस्वीरें बना दी गई हैं.

वैसे काफी दिनों से ये बात चर्चे में है कि रणबीर और आलिया जल्द ही शादी कर सकते हैं. हालांकि अभी तक अपने रिश्ते पर इन दोनो ने कोई बयान दिया है.

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मध्यप्रदेश में कांग्रेस की कबड्डी

कबड्डी का खेल बड़ा दिलचस्प होता है. इसमें कौन किसकी टांग लाइन तक खींच रहा है, इसका सटीक अंदाजा तो कई बार तो रेफरी भी लगाने में गच्चा खा जाता है तो मैदान से दूर खड़े दर्शकों की विसात क्या जो धूल फांकते किसी के आउट होने या पकडे जाने पर तालियां पीटते रहते हैं. आधी दौड़ और आधी कुश्ती के मिश्रण वाले इस देहाती खेल को मध्यप्रदेश के कांग्रेसी इन दिनों पूरे दिलोदिमाग से खेल रहे हैं और जनता आखे मिचचिचाते फैसले का इंतजार कर रही है कि कोई फैसला हो तो घर को जाएं.

वैसे नियमों और कायदे कानूनों के हिसाब तो कबड्डी में दो ही टीमें होनी चाहिए लेकिन मध्यप्रदेश कांग्रेस का हाल जरा जुदा है, जहां कांग्रेस की तीन टीमें एक दूसरे से भिड़ रहीं हैं और उससे से भी ज्यादा दिलचस्प बात ये है कि कौन सा खिलाड़ी किस टीम से खेल रहा है इसका अता पता भी किसी को नहीं. फिर यह तय कर पाना तो और भी मुश्किल काम है कि दरअसल में कौन किसकी टांग खींच रहा है. लेकिन इन तमाम गफलतों के बाद भी खेल जारी है और राह चलते लोग तमाशा देखते ताजे ताजे निर्मित गड्डों में गिर रहे हैं. मनोरंजन का कोई दूसरा साधन उनके पास है भी नहीं क्योंकि अघोषित बिजली कटौती के चलते घरों में टीवी बंद पड़े हैं और बीबी अंबानी के जियो की कृपा से मायके वालो और सहेलियों से चैटिंग में व्यस्त है .

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इन तीनों टीमों में से पहली टीम के कैप्टन घोषित मुख्यमंत्री और विधायक दल द्वारा विधि विधि विधान से चुने गए कमलनाथ हैं. दूसरी टीम की कैप्टनशिप पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के पास है, जो घोषित तौर पर कांग्रेस विधायक दल द्वारा न चुने गए मुख्यमंत्री हैं और तीसरी टीम के उस्ताद चिकने चुपड़े चेहरे वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं. जो घोषित टीम के कैप्टन बनते बनते रह गए थे, लेकिन क्यों में अभी भी लगे हैं पर दिक्कत यह है कि न कोई छींक रहा और न कोई सींका टूट रहा .

उठा पटक के लिए अभिशप्त दिग्विजय सिंह ने चार दिन पहले मंत्रियों को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उनके द्वारा तबादलों के लिए की गई सिफ़ारिशों पर कार्रवाई का हिसाब मांगा गया था. इस धोबी पछाड़ दांव से कई मंत्री सही में घबरा उठे कि क्या जबाब दें और मूल सवाल कहीं हिस्सा बांटी का तो नहीं कि अच्छा.. सारा का सारा खुद हजम कर गए और जिन मुलाजिमों और अफसरों से हमने पेशगी ले रखी है उनकी फाइलें दबा गए. अब सच जो भी है चिट्ठी का वाजिब असर हुआ और उनकी टीम के मंत्री ब्योरा लेकर उनके बंगले पर पहुंच गए और एनओसी प्राप्त कर ली.

टीम क्रमांक एक और तीन के मंत्री यह कहते बिदक गए कि आप होते कौन हैं हिसाब मांगने वाले… एक युवा खिलाड़ी उमर सिंघार ने तो सीधे सोनिया गांधी को चिट्ठी लिख डाली कि टीम क्रमांक दो के कैप्टन खामख्वाह टीम क्रमांक एक यानी असली टीम के मुखिया बनने की कोशिश कर रहे जिन्हें जनता यानी दर्शकों ने कोई 15 साल पहले ही फाउल पर फाउल करने के कारण खेल से बाहर कर दिया था. चूंकि ये पकड़े जाने से बचने बदन पर सरसों का तेल लगाए रहते हैं  इसलिए उनके खिलाफ एक्शन लिया जाये जिससे असली टीम बेहिचक खेल कर जनता का मनोरंजन कर सके. आखिर 114 सीटें कबड्डी खेलने ही तो मिली हैं नहीं तो पब्लिक का टाइम पास कैसे होगा .

जैसा कि पुराना और पुश्तैनी कांग्रेसी रिवाज है, राष्ट्रीय टीम की अध्यक्ष जिन्हें पहले से ही स्कोर और नतीजा मालूम था चुप रहीं और चश्मा पोंछते कंप्यूटर स्क्रीन पर अपनी स्वाभिमान से संविधान वाले प्रोजेक्ट का गुना भाग लगाते उसका रूट देखते सोचती रहीं कि इन तीन राज्यों से कब क्यों और कैसे कांग्रेस की रूटें उखड़ीं थीं और क्या अब भी ऐसा कोई टोटका है जिसे आजमाकर नव हिन्दुत्व का चक्रव्यूह वेधा जा सके. अपने अभिमन्यु ने तो कुरुक्षेत्र छोड़ दिया है लेकिन वे नहीं छोड़ सकतीं क्योंकि तेजी से देश भर का दलित हिन्दू बनाया जाकर छला जा रहा है और यहां ये आपस में ही लड़े मरे जा रहे हैं जिन्हें अपने प्रदेश की परवाह नहीं वे देश की परवाह क्या खाक करेंगे.

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इस प्रतिक्रियाहीनता से तीनों टीमों के कप्तानों को ज्ञान प्राप्त हो गया कि आलाकमान तो  पहले से ही दुखी है, उसे और दुखी करना बेवकूफी की हद ही होगी. लिहाजा अब कबड्डी धीमे धीमे खेली जाये और लाइन टच कर वापस आ जाने की शैली अपनाई जाये क्योंकि बात अगर बढ़ी तो अब दूर तलक नहीं जा पाएगी और जनता बजाय तालियां पीटने के मुक्के मारने लगेगी. फिर सालों साल तक कबड्डी खेलने के लिए सत्ता का मैदान सपनों में भी नहीं मिलेगी. इसलिए बेहतरी इसी में है कि तीनों टीमों के कैप्टन पेवेलियन वापस लौट कर पंजा लड़ाकर मसला हल कर लें.

मैं और मेरी साली एक-दूसरे से प्यार करते हैं, अब हमें क्या करना चाहिए?

सवाल

मेरी मंगनी हो गई है, पर मैं अपनी मंगेतर की बहन से प्यार करता हूं. वह भी मुझ से प्यार करती है, पर उस की भी मंगनी हो गई है. अब हमें क्या करना चाहिए?

जवाब

आप दोनों को अपने प्यार का इजहार पहले ही कर देना चाहिए था, तब सीधे सीधे आप दोनों की ही मंगनी हो जाती. अभी चूंकि आप लोगों की शादी नहीं हुई है, लिहाजा घर वालों को सारी बातें बता दें, ताकि आप की शादी प्रेमिका से ही हो.

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जानिए मकड़ों ने किस शहर को घेर रखा है अपने जाल में

ग्रीस में एक ऐसा शहर है जिसे मकड़ी ने अपने जाल से कब्जा कर लिया है.  जी हांं आप इसे सुनकर जरूर चौंक गए होंगे. पर मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक ग्रीस के शहर एतोलिको में मकड़ों ने कब्जा जमा रखा है.

मकड़ों का जाल

इस शहर में मकड़ों ने हर तरफ जाले बुन दिए हैं. मकड़ों का कब्जा इतना ज्यादा है कि पेड़-पौधे, झाड़ियां तक इनके बुने जाले से ढंक गए हैं.

मौसम का असर

ऐसा कहते है कि ये मौसमी मकड़ियां  एक तरह के मच्छरों के कारण फैल रहे हैं जो उनका पसंदीदा भोजन हैं. ठंड का मौसम आते ही ये मच्छर कम हो जाते हैं, और उसके साथ ही इन मकड़ों की संख्या भी कम हो जाती है.

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खास किस्म के मकड़े

खबर के मुताबिक ये एक खास किस्म के सफेद मकड़ों का कारनामा है, जिनका नाम टैरानगाथा जीनस बताया जा रहा है. ये बेहद हलके और छोटे होते हैं, इसलिए जमीन से ज्यादा पानी में तेजी से चलते हैं.

इंसानों को नहीं है खतरा

वैसे ये भी बताया गया कि ये मकड़े इंसानों के लिए हानिकारक नहीं होते हैं. इनकी खासियत है कि ये अपने शरीर को खींच कर लंबा कर सकते हैं इसीलिए इन्हें स्ट्रेच स्पाइडर भी कहते हैं.

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अंधविश्वास: पुलिस को भूत का भय

राजधानी रायपुर के  पुलिस  के अंधविश्वास की इंतिहा यह है कि पुलिसकर्मियों में भूत-प्रेत का ऐसा भय व्याप्त हो चुका है कि वर्दीधारी पुलिसकर्मी अपने साथ नींबू और मिर्च तक लेकर चल रहे हैं.यही नहीं नहीं पूजा -पाठ की सामाग्री भी साथ में रखते हैं. पुलिसकर्मी इतने अंधविश्वास में डूबे हुए हैं कि  कोई भी जल्दी से वाहन 112 {टाइगर-2} के परिचालन के लिए तैयार नहीं होता है जब किसी की ड्यूटी लगाई जाती है तो उसकी धिग्गी बंध जाती है.अफसरों के भय से यदि कोई पुलिसकर्मी वाहन चलाता  है, तो उसकी सारी रात दहशत में व्यतीत होती है.

भूत भगाने टोटका जारी

अगर भूत का यह किस्सा किसी गांव देहात का होता किसी छोटे शहर का होता तो आप इसे पूर्ण भगत लोगों की भूत प्रेत की काल्पनिक सोच कहते. मगर छत्तीसगढ़ की राजधानी की पुलिस जब भूत प्रेत की बात करती है तो यह समझने की बात है कि हमारे बीच अंधविश्वास भूत प्रेत का रूढ़ बकवाद किस तरह घर कर गया है. संबंध में डॉक्टर जीआर पंजवानी बताते हैं दरअसल इस भूत के पीछे मनोविज्ञान काम करता है और जब कोई इसके संजाल में फंस जाता है तो देखा देखी और लोकगीत हंसते चले जाते हैं यही सब कुछ इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की पुलिस

महकमे की कहानी है. ऐसी पुलिस जो कठोर प्रशिक्षण प्राप्त करती है जिन्हें जीवन की सच्चाई से रूबरू होना पड़ता है आए दिन अपराध घटित होते हैं और उन्हें वह अपनी विवेचना में लेते हैं ऐसा महकामा अंधविश्वास के मायावी जाल में फंसा हुआ है यह एक शर्मनाक स्थिति के अलावा और क्या हो सकता है. स्थिति राजदीपम तब बन जाती है कि जब पुलिस विभाग के कर्मचारी भूत भगाने के लिए किसी तांत्रिक को बुलाते हैं और नींबू मिर्च का प्रयोग कर समाज को दिखाते हैं कि देखो भूत प्रेत होता है….!

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सो जाते हैं तो आता है भूत

जी हां जब पुलिस को आग लगती है तो भूत आता है और कहता है श्रीमान उठिए! यह कहना है आजाद नगर मैं मुक्त आयत वाहन 112 ड्यूटी लगने वाले पुलिसकर्मियों का.. राजधानी रायपुर में डायल-112 द्वारा पुलिस हर किसी को मदद पहुंचाने के लिए तत्पर रहती है, यहीं  आजाद चौक थाना क्षेत्र में चलने वाली डायल-112 {टाइगर 2} में कोई भी पुलिसवाला बैठनें से पहले बचना चाहता है और अंततः उच्च अधिकारियों के आदेश पर नींबू मिर्च लेकर बैठता है. मजे की बात यह है कि रात को नींद आने से कथित तौर पर उन्हें भूत उठा देता है. यह भूत पुलिस के अनुसार  इस वाहन में जो भी बैठता है, उसे रात में  किसी शख्स के होने का आभास होने लगता है. और भयभीत पुलिस कर्मियों का रात गहराने के साथ डर और भय बढ़ता जाता है. पुलिसवाले  बताते हैं कि इस गाड़ी में चलने वाले आरक्षक की रात में अगर आंख लगती है तो भूत  उन्‍हें उठाने आता है . अब सवाल यह है कि पुलिस ड्यूटी में सोती क्यों है पुलिस की ड्यूटी तो ड्यूटी होती है फिर पुलिस क्यों सो जाती है!

भूत भगाने पूजा पाठ करवाया

बड़े शहरों को राजधानी को प्रगतिशील समाज का हिस्सा कहा जाता है फिर पुलिस और चिकित्सा विभाग तो इस संदर्भ में कभी समाज के लिए मानक होते हैं मगर रायपुर की पुलिस वाहन में लगा नींबू मिर्च और लाल कपड़ा का वीडियो वायरल होकर यह कहानी बयां कर रहा है की पुलिस इस तरह अंधविश्वास में जी रही है. निसंदेह जब पुलिस मोकामा भूत प्रेत अंधविश्वास को तवज्जो देने लगेगा तो आम आदमी अशिक्षित तब का इसकी गिरफ्त में आ जाता है और फिर तांत्रिक मानसिक लोगों का धंधा चलने लगता है सूत्रों के अनुसार रायपुर के कथित वाहन में नींबू मिर्च रखा जाता है और लाल कपड़े में कुछ तांत्रिक साधना भी कराई गई है से मजे की बात यह है कि भूत प्रेत का यह अंधविश्वास किसी एक शख्स के कथन से प्रचारित नहीं हुआ है बल्कि लगभग 6 लोगों ने इसकी पुष्टि की है. इससे बड़ा मजाक और क्या होगा कि पुलिसकर्मी  वाहन में रखे नींबू-मिर्ची और लाल कपड़े में पूजा अर्चना कर बांधी गई सामग्री लेकर ड्यूटी आते  हैं.  वाहन में संकटमोचन बजरंगबली भी हैं यही नहीं इस वाहन में सामने बोनट की भी तांत्रिक क्रिया की जाती है.खबर है कि  कि बैगा से भी पुलिसकर्मियों द्वारा झाड़फूंक भी कराईगई है. इस 112 वाहन में चलने वाले पुलिस कर्मचारी कितनी दहशत में हैं, उसका अंदाजा एक वायरल आडियो से लगाया जा सकता है इसमें एक आरक्षक अपने अफसर से कह रहा है कि किस तरह पुलिसकर्मियों को डर लग रहा है और कोई उनका गला दबाता है…! अधिकारी भी मान रहे हैं कि डायल 112 के एक वाहन को लेकर इस तरह की शिकायत आई है और इसे पुलिकर्मियों का वहम करार दे रहे हैं.

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इन्तकाम : भाग 6

निकहत को निक्की के रूप में देखकर संजीव की दशा बड़ी अजीब सी हो रही थी. उसके लिए अब होटल ताज के इस हौल में एक पल भी रुकना भारी हो रहा था. उसका जी चाह रहा था कि यहां से भाग जाए. उसने निकहत की तेज नजरें अपने अन्दर तक उतरते महसूस की थीं. स्टेज पर दूसरा गाना शुरू हो चुका था. संजीव उठ खड़ा हुआ. मोनिका उसे रोक पाती, इससे पहले ही वह तेजी से दरवाजे की ओर बढ़ गया. पार्किंग से कार निकालकर वह सीधा घर आ गया. उसका मन अजीब सा हो रहा था, जैसे उसने कोई भयानक चीज देख ली हो. व्हिस्की का एक लार्ज पेग लेने के बाद ही उसे कुछ राहत मिली. वह चुपचाप सोफे पर पड़ गया. उसे बार-बार निकहत का ख्याल आ रहा था. वह शत-प्रतिशत निकहत थी. इतना ज्यादा परिवर्तन, सचमुच हैरत की बात थी. निकहत इतनी खूबसूरत भी हो सकती है, इसकी तो वह कभी कल्पना ही नहीं कर सकता था. न जाने कब तक वह अपने विचारों में गुम रहा.

रात काफी बीत चुकी थी कि अचानक दरवाजा खुलने की आवाज ने उसे चौंका दिया. मोनिका बड़बड़ाती हुई अन्दर दाखिल हुई.

‘वाट अ स्टूपिड फेलो यू आर…’ संजीव को सामने देखकर वह गुस्से से बोली, ‘मुझे वहां छोड़कर तुम कार लेकर चले आए, तुमको फोन कर कर के थक गई मगर फोन भी नहीं उठाया… अरे! कहीं तो मेरी इज़्जत रख लिया करो, जानते हो मुझे दूसरों से लिफ्ट मांगनी पड़ी….’ उसकी आवाज तेज हो गयी.

‘आई एम वेरी सौरी डार्लिंग…’ संजीव ने सोफे से उठते हुए कहा, ‘वो अचानक मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही थी, सिर घूम रहा था, सो मैं चला आया… प्रोग्राम कैसा रहा…?’ उसने बहाना बनाते हुए पूछा.

मोनिका उसकी तबियत का सुनकर कुछ शान्त हो गयी, ‘प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा… मगर तुम मुझे बता तो देते… ऐसे कैसे मुझे छोड़ के चले आये … ?’

‘मैं तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था, बेकार में तुम्हारा मूड खराब होता…’ वह बड़े प्यार से उसके गालों को छूता हुआ बोला.

‘ओके… ओके… मुझे बड़ी जोर की नींद आ रही है…’ कहते हुए वह उंगलियों में पर्स घुमाती बेडरूम की ओर बढ़ गयी. संजीव पुन: सोफे पर पसर गया. आज तो जैसे नींद उसकी आंखों से कोसों दूर भाग गयी थी.

दूसरे दिन …

संजीव पिछले डेढ़ घण्टे से होटल ताज के बाररूम में बैठा था. बियर की दो बोतलें वह खाली कर चुका था. न जाने उसके मन की कौन सी भावना उसे यहां तक खींच लायी थी. शायद एक नजर निकहत को फिर से देख लेने की चाहत थी. उसकी खूबसूरती उसकी आंखों में गड़ गयी थी. आज सुबह के अखबार में उसने बीती रात के प्रोग्राम की तारीफ पढ़ी थी. निकहत के कई फोटो पेज-3 पर थे. अखबार से ही संजीव को पता चला था कि निकहत का यहां दो दिन का प्रोग्राम है. लंच के तुरंत बाद ही वह होटल ताज पहुंच गया था. उसकी नजरें लगातार बाररूम के काले शीशों के पार हौल में टिकी हुई थीं. निकहत के कुछ साथी कलाकार वहां मौजूद थे. एक गिटारिस्ट अपने गिटार पर धुन बजाता हुआ कुछ गाने में मशगूल था, मगर निकहत उसे कहीं भी नजर नहीं आयी. समय काफी गुजर चुका था. वह उठकर काउंटर की ओर बढ़ गया. पेमेंट करके वह हौल के अन्दर जाने के लिए मुड़ा ही था कि एक मध्यम और मधुर आवाज ने उसे चौंका दिया.

‘हेलो संजीव…’

वह तेजी से पलटा तो निकहत उसके सामने मौजूद थी. लाल और गोल्डेन कलर की पाश्चात्य ड्रेस में वह बिल्कुल दहकता हुआ शोला नजर आ रही थी. उसके सुन्दर मुखड़े पर अनोखा तेज था. सुन्दर घुंघराले बाल उसके माथे पर बिखरे हुए थे. छरहरी उत्तेजक काया और ऊंची हील में वह संजीव से भी लम्बी प्रतीत हो रही थी. उसे इस तरह अपने करीब देखकर एक पल को तो संजीव हड़बड़ा गया, समझ में न आया कि क्या कहे…

‘कैसे हो संजीव…?’ आखिरकार निकहत ने ही पूछा.

‘निकहत… तुम…?’ संजीव की जुबान लड़खड़ा गयी.

‘अरे! तुम तो मुझे ऐसे देख रहे हो, जैसे पहचानते ही नहीं…? अरे बाबा, मैं निकहत ही हूं… वही निकहत जिसने कभी तुमसे बेपनाह मोहब्बत की थी…’ वह मीठी हंसी हंसते हुए धीरे से बोली.

‘कैसी हो निकहत…?’ संजीव बड़ी मुश्किल से पूछ सका.

‘मैं तो अच्छी हूं, तुम अपनी सुनाओ…?’

‘मैं भी ठीक हूं…’ उसने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

‘आओ, बाहर लौन में बैठते हैं…’ निकहत ने बड़े प्यार से उसका हाथ थाम लिया.

संजीव हैरान था निकहत के व्यवहार से. उसे देखकर तो लगता था जैसे उसे पुरानी कोई भी बात याद नहीं थी. वह दुत्कार… वह अपमान… वह बेवफाई… शायद वह सबकुछ भूल चुकी थी. संजीव उसके साथ खिंचता हुआ लौन में आ गया.

‘निकहत… कितना बदल गयी हो तुम…?’ संजीव ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा.

‘हां संजीव… जिन्दगी के उतार-चढ़ाव इन्सान को बदलने पर मजबूर कर देते हैं…’ वह उदास सी हो गयी, ‘तुम भी तो अचानक कितना बदल गये थे…’ वह उसकी आंखों में देखने लगी.

‘निकहत… मुझे माफ कर दो, मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा सलूक किया, निकहत… मैं बहुत शर्मिन्दा हूं…’ संजीव की आवाज भर्रा गयी.

‘नहीं संजीव, नहीं…प्लीज…’ उसने उसका हाथ थाम लिया, ‘ऐसा मत सोचो… एक तुम्हीं तो हो जिसकी वजह से आज मैं इस मुकाम पर पहुंची हूं… अगर उस रोज तुमने मुझे दुत्कारा न दिया होता तो क्या तुम्हारी निकहत आज दौलत और शोहरत की इन बुलन्दियों को छू सकती थी? कभी नहीं…’ उसने प्यार से उसका हाथ अपनी आंखों से लगा लिया, ‘मैं आज भी तुम्हें उतना ही प्यार करती हूं संजीव… बल्कि उससे भी कहीं ज्याद…’ उसने धीरे से कहकर चेहरा झुका लिया.

संजीव को यकीन नहीं हो रहा था कि जो कुछ उसने सुना है वह सच है.

‘निकहत…!’ वह उसके प्रेमाकर्षण में बंध गया, ‘क्या सचमुच तुम…?’

‘हां संजीव… तुम्हारे सिवा मेरी जिन्दगी में कभी कोई नहीं आ सकता… मेरे दिल में आज भी तुम्हारी ही धड़कने बसी हुई हैं संजीव…’ वह उसके और निकट आ गयी.

‘मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूं निकहत… तुम नहीं जानतीं, उस वक्त मैं कितना मजबूर था, तुम्हें खोकर मैं एक दिन भी सुकून से नहीं जी सका हूं निकहत… निकहत… क्या हमारी जिन्दगी के वह हंसीन लम्हे फिर से वापस नहीं आ सकते…? मैं… मैं…’ संजीव भावुक होने लगा.

‘नहीं संजीव, अब कुछ नहीं हो सकता…’ उसके चेहरे पर उदासी के बादल घिर आये, ‘मैं कल वापस मुम्बई जा रही हूं…’ उसने बताया.

‘निकहत…’ संजीव बेचैन हो उठा, ‘क्या तुम कुछ दिन और नहीं रुक सकतीं…?’

‘नहीं संजीव, मेरा जाना बहुत जरूरी है. तुम नहीं जानते, आज मेरे नाम पर लोगों का करोड़ों रुपया लगा हुआ है. यहां रुककर मैं उनका नुकसान नहीं कर सकती… मेरा हर दिन कीमती है….’

‘निकहत… मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगा… अब तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकतीं… निकहत… प्लीज…’ संजीव गिड़गिड़ाने लगा.

‘संजीव, मैं मजबूर हूं… हां, अगर तुम चाहो तो कुछ दिनों के लिए मेरे साथ मुम्बई चल सकते हो…’ निकहत ने उसे समझाना चाहा, ‘बोलो, चलोगे न…?’

‘हां निकहत… मैं तैयार हूं…’ उसने शीघ्रता से उसके साथ मुम्बई चलने का निमन्त्रण स्वीकार कर लिया.

‘तो ठीक है, कल सुबह 11 बजे एयरपोर्ट पर आ जाना…’ उसने घड़ी देखी, ‘अभी मैं चलती हूं… शो का टाइम हो रहा है…’ वह उठ खड़ी हुई.

घर के काम लड़कों को भी सीखना है जरूरी

‘‘जाओ, भैया को खाना परोस दो.’’

‘‘मैं पढ़ रही हूं, भैया खुद भी तो खाना ले कर खा सकते हैं न.’’

‘‘वह लड़का है. यह लड़कों का काम नहीं है.’’

अपने घर में, आसपड़ोस में या टीवी पर किसी मां द्वारा अपनी बेटी से यह डायलौग बोलते आप ने  सुना ही होगा. ‘लड़कों को ये काम शोभा नहीं देते,’ ‘लड़के यह सब नहीं करते,’ ‘लड़कियों को तो घर का काम आना ही चाहिए, लड़कों को न आए तो क्या,’ इस तरह की बातें हमारी सोसाइटी में आम हैं.

लड़कियां चाहे घर का काम करें या न करें लेकिन लड़के घर के काम नहीं करेंगे, यह तय है. तय क्यों है? अरे भई, यही तो हमारी परंपरा, प्रतिष्ठा और सम्मान है जो लड़कों के घर के काम कर लेने से या उन के कामों में हाथ बंटा देने से छोटी हो जाएगी, खत्म हो जाएगी.

और्गनाइजेशन फौर इकोनौमिक कोऔपरेशन ऐंड डैवलपमैंट की एक रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 64 साल के पुरुष व लड़के एक दिन में घर के कामों में केवल 0.9 घंटा व्यतीत करते हैं, वहीं महिलाएं व लड़कियां 5.9 घंटे घर के काम में बिताती हैं. जिस समय लड़कियां किचन और घर के दूसरे कामों में उलझी रहती हैं उस समय उन के भाई, पापा या पति टीवी के सामने बैठ कर क्रिकेट या फुटबौल का लुत्फ उठा रहे होते हैं.

मांएं बचपन से ही लड़कों को घर के काम से दूर रखती हैं. उन के हिस्से में कुछ काम आते भी हैं तो वे उन के मर्द होने पर ठप्पा लगाने वाले होते हैं, जैसे बाजार से राशन ले कर आना, सिलैंडर लगा कर देना, बिजली के काम करना या कुछ लेनदेन करना. लड़कियों के हिस्से में घिसेपिटे झाड़ूबरतन और कूड़ाकरकट के काम मढ़ दिए जाते हैं, बिना यह सोचे कि लड़कों को इन कामों से दूर रख मांएं उन्हें मुसीबत में डाल रही हैं, वे उन्हें घमंडी भी बना देती हैं.

काम न आना है मुसीबत

नीरज 18 साल की उम्र तक अपने घर में बड़े ही ऐश से रहा. घर का झाड़ूपोंछा, बरतन, खाना बनाना, सब्जी लाना बहुत दूर की बात है, उस ने आज तक अपने खुद के कमरे को साफ नहीं किया था. उस के बरतन या तो उस की मां धोतीं या बहन. बहन उस से बड़ी नहीं थी, बल्कि 4 साल छोटी थी, फिर भी मां ने उसे सब काम करने की आदत बचपन से ही डलवा दी थी. उन का कहना था कि लड़कियों को यह सब काम आने ही चाहिए. लेकिन नीरज को यह काम आने चाहिए या नहीं, यह उन्होंने कभी नहीं समझा.

अहमदाबाद में स्कूल खत्म कर नीरज का ऐडमिशन दिल्ली के एक नामी कालेज में कराया गया. नीरज को उस के मांपापा ने एक पीजी भी दिला दिया, जहां उस के साथ उस का एक रूममेट था. नीरज की मम्मी का तो रोना तब तक नहीं रुका जब तक वे गाड़ी में बैठ कर चली नहीं गईं. जातेजाते उन के आखिरी शब्द थे, ‘कैसे करेगा मेरा बेटा सब काम…’

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नीरज ने पहले 2 दिन तो कुछ नहीं किया. बस, नए कालेज की खुशी और घर से दूर रहने का गम ही मनाता रहा. लेकिन, तीसरे दिन से ही असलियत ने उस के मुंह पर तमाचा मारना शुरू कर दिया. उस के रूममेट ने उसे अच्छे से समझा दिया कि 3 दिन झाड़ूपोंछा नीरज को करना पड़ेगा, खाने का डब्बा बस सुबहशाम आएगा, आधी रात में भूख लगी तो खुद बना कर खाना होगा और दिन में बाहर खाना पड़ेगा. कपड़े खुद धोने हैं और अपने बरतन भी खुद ही मांजने हैं. सफाई नहीं रखी तो पीजी वाली आंटी रूम में घुसने नहीं देंगी.

यह सब सुन कर नीरज के स्वाभिमान को ठेस तो लगी पर बेचारा क्या करता. दिल्ली में एक महीना नहीं हुआ कि नीरज का सारा अहं पानी भरने लगा. सुबह जल्दीजल्दी तैयार हो कर कालेज जाता, दोपहर बाहर से खरीद कर कुछ खाता और हर दूसरे दिन पेटदर्द ले कर पड़ा रहता, खुद को कुछ बनाना जो नहीं आता था. हर हफ्ते बाल्टी भरभर कर अपने गंदे कपड़े धोता और अपने समय पर रोता. नीरज को यह नई जिंदगी शुरुआत में बड़ी मुश्किल तो लगी, लेकिन फिर धीरेधीरे उस ने आदत डाल ली, या कहें कि मजबूरी में उसे आदत डालनी ही पड़ी. हां, कभीकभी वह जरूर कहता कि काश, लड़की होता तो काम आसान हो जाता.

यह बदलाव क्यों नहीं

वर्तमान समय में यदि देखा जाए तो लड़कियां घर के कामों में इतनी मसरूफ नहीं होतीं जितनी कि पहले के समय में होती थीं. इस का स्पष्ट कारण है कि अब वे केवल घर की चारदीवारी में बंद नहीं रहतीं, बल्कि शिक्षित हो बड़े पदों पर कार्यरत भी हैं. लड़कियां अब कामकाजी हैं. वे डाक्टर हैं और इंजीनियर भी. बावजूद इस के, उन्हें घर के काम आते हैं.

घर के काम इसलिए नहीं कि उन्हें इतना पढ़लिख कर भी घर का चूल्हाचौका करना पड़े, बल्कि इसलिए कि वे सरवाइव कर सकें. घर के कामकाज आना सर्वाइवल का मुख्य भाग है. फिर भी केवल लड़कियों को ही इस सर्वाइवल के लिए तैयार किया जाता है. इस का मतलब तो यह हुआ कि लड़कों के सर्वाइवल का जिम्मा भी लड़कियों के सिर है. ऐसे में सवाल है कि अगर लड़कियां हर तरह से खुद को मजबूत बना कर घर और बाहर के कामकाज कर सकती हैं तो फिर लड़कों को भी दोनों ही कामों के लिए सक्षम क्यों न बनाया जाए?

काम सिखाने के फायदे

यूनिसेफ की एक स्टडी के अनुसार, घर के कामों में बीतने वाला समय लड़कों के मुकाबले लड़कियों के जीवन और भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है. हर घंटा जो लड़कियां घर के कामों में बिताती हैं, उस घंटे में वे दोस्त नहीं बना पातीं, स्कूल का काम नहीं कर पातीं और खेल नहीं पातीं.

मतलब साफ है कि लड़कों का घर के कामों में हाथ न बंटाना लड़कियों के जीवन को कई तरीकों से प्रभावित करता है. यानी, लड़कों के घर के काम में हाथ बंटाने से वे लड़कियों के जीवन को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. इस के अलावा, खुद लड़कों के पक्ष में भी घर के काम करना कई तरीकों से फायदेमंद है.

सर्वाइवल के लिए

घर के कामकाज, जैसे खाना पकाना, कपड़ेबरतन धोना, बचीखुची चीजों से कुछ नया बना लेना, सफाई करना आदि ह्यूमन सर्वाइवल का मुख्य आधार हैं. कभी घर में कोई महिला नहीं हुई तो लड़कों को होटलों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे, न ही गंदगी में रहना पड़ेगा. उन्हें कामकाज की आदत होगी तो पीजी या होस्टल में रहते हुए उन की हालत खस्ता नहीं होगी.

आलस कम, चुस्ती ज्यादा

मेरे पड़ोस में एक लड़का रहता है जिस के घर में उस के अलावा कोई और फीमेल नहीं है. वह 16 साल का है और उसे घर का सभी काम भलीभांति आता है. इस के पीछे मुख्य कारण है कि पिछले 3 वर्षों से उस की मम्मी की तबीयत कुछ ठीक नहीं रहती और कामवाली आएदिन छुट्टी ले कर बैठ जाती है.

वह कामवाली के न होने पर स्कूल से आ कर खुशीखुशी घर के काम में मम्मी की मदद करता है. उसे न इस में कोई शर्म महसूस होती है, न अपने लड़के होने पर कोई शक. इस में दोराय नहीं है कि वह चुस्तदुरुस्त लड़का है और आलस का साया भी कभी उस के चेहरे पर नहीं दिखता.

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निर्भरता खत्म होना

यह बात नकारना बेहद मुश्किल है कि हम में से ज्यादातर घरों में हमारे पापा और भाई हमेशा से ही घर की औरतों पर निर्भर रहे हैं. कमरे की सफाई हो या शर्ट प्रैस करना और धोना, बैड के नीचे पड़ा कूड़ा हटाना हो या अलमारी में कपड़े लगाना, भाईपापा हर काम के लिए निर्भर ही रहते आए हैं. हालत तो ऐसी है कि जेब में पैसे न हों और घर में कोई खाना बना कर देने वाला न हो तो वे दिनभर भूखे ही रहें. इस निर्भरता को खत्म करना बेहद जरूरी है, और यह खत्म तब होगी जब लड़कों को शुरू से ही काम करने की आदत डलवाई जाए.

संबंधों का बेहतर होना

जब लड़के और लड़कियां दोनों ही घर के कामों में बराबर हाथ बंटाएंगे तो जाहिर सी बात है कि उन के संबंध कहीं ज्यादा बेहतर होंगे, चाहे वे भाईबहन हों, पतिपत्नी हों या लिवइन पार्टनर्स. मेरे बचपन में भैया और मेरे बीच हमेशा एक जंग छिड़ी रहती थी, जिस का मुख्य कारण था उन का जानबूझ कर मम्मीपापा के सामने मुझ से अपने काम करवाना, जिन के लिए मैं मना नहीं कर पाती थी. बड़े होने पर वे इतना समझ गए कि घर के काम करना कोई बोझ नहीं है, बल्कि दिनचर्या का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. अब वे खुद का कमरा साफ करते हैं तो कभीकभी मेरा भी कर ही देते हैं.

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