धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-1

धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-2

धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-3

धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-4

धारावाहिक कहानी: इन्तकाम भाग-5

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निकहत को निक्की के रूप में देखकर संजीव की दशा बड़ी अजीब सी हो रही थी. उसके लिए अब होटल ताज के इस हौल में एक पल भी रुकना भारी हो रहा था. उसका जी चाह रहा था कि यहां से भाग जाए. उसने निकहत की तेज नजरें अपने अन्दर तक उतरते महसूस की थीं. स्टेज पर दूसरा गाना शुरू हो चुका था. संजीव उठ खड़ा हुआ. मोनिका उसे रोक पाती, इससे पहले ही वह तेजी से दरवाजे की ओर बढ़ गया. पार्किंग से कार निकालकर वह सीधा घर आ गया. उसका मन अजीब सा हो रहा था, जैसे उसने कोई भयानक चीज देख ली हो. व्हिस्की का एक लार्ज पेग लेने के बाद ही उसे कुछ राहत मिली. वह चुपचाप सोफे पर पड़ गया. उसे बार-बार निकहत का ख्याल आ रहा था. वह शत-प्रतिशत निकहत थी. इतना ज्यादा परिवर्तन, सचमुच हैरत की बात थी. निकहत इतनी खूबसूरत भी हो सकती है, इसकी तो वह कभी कल्पना ही नहीं कर सकता था. न जाने कब तक वह अपने विचारों में गुम रहा.

रात काफी बीत चुकी थी कि अचानक दरवाजा खुलने की आवाज ने उसे चौंका दिया. मोनिका बड़बड़ाती हुई अन्दर दाखिल हुई.

‘वाट अ स्टूपिड फेलो यू आर…’ संजीव को सामने देखकर वह गुस्से से बोली, ‘मुझे वहां छोड़कर तुम कार लेकर चले आए, तुमको फ़ोन कर कर के थक गई मगर फोन भी नहीं उठाया… अरे! कहीं तो मेरी इज़्जत रख लिया करो, जानते हो मुझे दूसरों से लिफ्ट मांगनी पड़ी….’ उसकी आवाज तेज हो गयी.

‘आई एम वेरी सौरी डार्लिंग…’ संजीव ने सोफे से उठते हुए कहा, ‘वो अचानक मेरी तबियत ठीक नहीं लग रही थी, सिर घूम रहा था, सो मैं चला आया… प्रोग्राम कैसा रहा…?’ उसने बहाना बनाते हुए पूछा.

मोनिका उसकी तबियत का सुनकर कुछ शान्त हो गयी, ‘प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा… मगर तुम मुझे बता तो देते… ऐसे कैसे मुझे छोड़ के चले आये … ?’

‘मैं तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था, बेकार में तुम्हारा मूड खराब होता…’ वह बड़े प्यार से उसके गालों को छूता हुआ बोला.

‘ओके… ओके… मुझे बड़ी जोर की नींद आ रही है…’ कहते हुए वह उंगलियों में पर्स घुमाती बेडरूम की ओर बढ़ गयी. संजीव पुन: सोफे पर पसर गया. आज तो जैसे नींद उसकी आंखों से कोसों दूर भाग गयी थी.

दूसरे दिन …

संजीव पिछले डेढ़ घण्टे से होटल ताज के बाररूम में बैठा था. बियर की दो बोतलें वह खाली कर चुका था. न जाने उसके मन की कौन सी भावना उसे यहां तक खींच लायी थी. शायद एक नजर निकहत को फिर से देख लेने की चाहत थी. उसकी खूबसूरती उसकी आंखों में गड़ गयी थी. आज सुबह के अखबार में उसने बीती रात के प्रोग्राम की तारीफ पढ़ी थी. निकहत के कई फोटो पेज-3 पर थे. अखबार से ही संजीव को पता चला था कि निकहत का यहां दो दिन का प्रोग्राम है. लंच के तुरंत बाद ही वह होटल ताज पहुंच गया था. उसकी नजरें लगातार बाररूम के काले शीशों के पार हौल में टिकी हुई थीं. निकहत के कुछ साथी कलाकार वहां मौजूद थे. एक गिटारिस्ट अपने गिटार पर धुन बजाता हुआ कुछ गाने में मशगूल था, मगर निकहत उसे कहीं भी नजर नहीं आयी. समय काफी गुजर चुका था. वह उठकर काउंटर की ओर बढ़ गया. पेमेंट करके वह हौल के अन्दर जाने के लिए मुड़ा ही था कि एक मध्यम और मधुर आवाज ने उसे चौंका दिया.

‘हेलो संजीव…’

वह तेजी से पलटा तो निकहत उसके सामने मौजूद थी. लाल और गोल्डेन कलर की पाश्चात्य ड्रेस में वह बिल्कुल दहकता हुआ शोला नजर आ रही थी. उसके सुन्दर मुखड़े पर अनोखा तेज था. सुन्दर घुंघराले बाल उसके माथे पर बिखरे हुए थे. छरहरी उत्तेजक काया और ऊंची हील में वह संजीव से भी लम्बी प्रतीत हो रही थी. उसे इस तरह अपने करीब देखकर एक पल को तो संजीव हड़बड़ा गया, समझ में न आया कि क्या कहे…

‘कैसे हो संजीव…?’ आखिरकार निकहत ने ही पूछा.

‘निकहत… तुम…?’ संजीव की जुबान लड़खड़ा गयी.

‘अरे! तुम तो मुझे ऐसे देख रहे हो, जैसे पहचानते ही नहीं…? अरे बाबा, मैं निकहत ही हूं… वही निकहत जिसने कभी तुमसे बेपनाह मोहब्बत की थी…’ वह मीठी हंसी हंसते हुए धीरे से बोली.

‘कैसी हो निकहत…?’ संजीव बड़ी मुश्किल से पूछ सका.

‘मैं तो अच्छी हूं, तुम अपनी सुनाओ…?’

‘मैं भी ठीक हूं…’ उसने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

‘आओ, बाहर लौन में बैठते हैं…’ निकहत ने बड़े प्यार से उसका हाथ थाम लिया.

संजीव हैरान था निकहत के व्यवहार से. उसे देखकर तो लगता था जैसे उसे पुरानी कोई भी बात याद नहीं थी. वह दुत्कार… वह अपमान… वह बेवफाई… शायद वह सबकुछ भूल चुकी थी. संजीव उसके साथ खिंचता हुआ लौन में आ गया.

‘निकहत… कितना बदल गयी हो तुम…?’ संजीव ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा.

‘हां संजीव… जिन्दगी के उतार-चढ़ाव इन्सान को बदलने पर मजबूर कर देते हैं…’ वह उदास सी हो गयी, ‘तुम भी तो अचानक कितना बदल गये थे…’ वह उसकी आंखों में देखने लगी.

‘निकहत… मुझे माफ कर दो, मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा सलूक किया, निकहत… मैं बहुत शर्मिन्दा हूं…’ संजीव की आवाज भर्रा गयी.

‘नहीं संजीव, नहीं…प्लीज…’ उसने उसका हाथ थाम लिया, ‘ऐसा मत सोचो… एक तुम्हीं तो हो जिसकी वजह से आज मैं इस मुकाम पर पहुंची हूं… अगर उस रोज तुमने मुझे दुत्कारा न दिया होता तो क्या तुम्हारी निकहत आज दौलत और शोहरत की इन बुलन्दियों को छू सकती थी? कभी नहीं…’ उसने प्यार से उसका हाथ अपनी आंखों से लगा लिया, ‘मैं आज भी तुम्हें उतना ही प्यार करती हूं संजीव… बल्कि उससे भी कहीं ज्याद…’ उसने धीरे से कहकर चेहरा झुका लिया.

संजीव को यकीन नहीं हो रहा था कि जो कुछ उसने सुना है वह सच है.

‘निकहत…!’ वह उसके प्रेमाकर्षण में बंध गया, ‘क्या सचमुच तुम…?’

‘हां संजीव… तुम्हारे सिवा मेरी जिन्दगी में कभी कोई नहीं आ सकता… मेरे दिल में आज भी तुम्हारी ही धड़कने बसी हुई हैं संजीव…’ वह उसके और निकट आ गयी.

‘मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूं निकहत… तुम नहीं जानतीं, उस वक्त मैं कितना मजबूर था, तुम्हें खोकर मैं एक दिन भी सुकून से नहीं जी सका हूं निकहत… निकहत… क्या हमारी जिन्दगी के वह हंसीन लम्हे फिर से वापस नहीं आ सकते…? मैं… मैं…’ संजीव भावुक होने लगा.

‘नहीं संजीव, अब कुछ नहीं हो सकता…’ उसके चेहरे पर उदासी के बादल घिर आये, ‘मैं कल वापस मुम्बई जा रही हूं…’ उसने बताया.

‘निकहत…’ संजीव बेचैन हो उठा, ‘क्या तुम कुछ दिन और नहीं रुक सकतीं…?’

‘नहीं संजीव, मेरा जाना बहुत जरूरी है. तुम नहीं जानते, आज मेरे नाम पर लोगों का करोड़ों रुपया लगा हुआ है. यहां रुककर मैं उनका नुकसान नहीं कर सकती… मेरा हर दिन कीमती है….’

‘निकहत… मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगा… अब तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकतीं… निकहत… प्लीज…’ संजीव गिड़गिड़ाने लगा.

‘संजीव, मैं मजबूर हूं… हां, अगर तुम चाहो तो कुछ दिनों के लिए मेरे साथ मुम्बई चल सकते हो…’ निकहत ने उसे समझाना चाहा, ‘बोलो, चलोगे न…?’

‘हां निकहत… मैं तैयार हूं…’ उसने शीघ्रता से उसके साथ मुम्बई चलने का निमन्त्रण स्वीकार कर लिया.

‘तो ठीक है, कल सुबह 11 बजे एयरपोर्ट पर आ जाना…’ उसने घड़ी देखी, ‘अभी मैं चलती हूं… शो का टाइम हो रहा है…’ वह उठ खड़ी हुई.

(धारावाहिक के सातवें भाग में पढ़िये कि निकहत के साथ मुम्बई पहुंच कर संजीव ने क्या गुल खिलाए और उसका अन्जाम क्या हुआ.)

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