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बैंक और कर्ज संबंधी बातें

बैंक शब्द की उत्पत्ति इटैलियन शब्द बेंको से हुई. बेंको का मतलब बैंच होता है, जिस पर बैठ कर रुपएपैसे के लेनदेन की बात की जाती है. यानी, आजकल के सेठ लोगों की गद्दी या गल्ला.

कर्ज लेने के लिए बैंक लोन एक बेहतरीन तरीका है अपने जीवन में वह सब खरीदने, बनाने, और पाने का, जिस के आप ने सपने देखे हों. आप बैंक ऋ ण लेते हैं क्योंकि हर महीने आप के पास छोटी रकम तो होती है पर एकमुश्त बड़ी रकम नहीं होती.

रिटेल ऋण

आप ने हर बैंक में लगा यह इश्तिहार जरूर देखा होगा – ‘लोन लीजिए, सपने पूरे कीजिए.’

यह इश्तिहार रिटेल लोन यानी घरगृहस्थी से जुड़े लोन के लिए होता है. सभी बैंकों के व्यापार का आधार उस का व्यापक जनाधार होता है. बड़े कर्जों के लिए बैंकों की रणनीति बिलकुल अलग होती है और विशेष शाखाएं भी.

जितना ज्यादा लोन पोर्टफोलियो का आधार बड़ा होगा, उतना ही बैंकों का जोखिम, बंट कर कम हो जाएगा. सीधे शब्दों में कहें तो, एक व्यक्ति को एक करोड़ रुपए का लोन देने से अच्छा है 10 लोगों को 10-10 लाख रुपए दिए जाएं. अब दसों लोग एकसाथ डिफौल्ट तो नहीं होंगे. रिस्क बंट गया और बैंक ज्यादा सुरक्षित महसूस करने लगे.

निजी बैंकों का फंडा

कर्ज के कारोबार में निजी बैंक खूब आए, जैसे आईसीआईसीआई बैंक, सिटी बैंक, एचडीएफसी बैंक आदि.

क्रैडिट कार्ड को इन्होंने ही बाजार में उतारा और लोग जाल में फंसते चले गए. यह भी एक तरह का क्लीन लोन ही था. लोगों ने इसे फ्रीफंड का पैसा समझ कर खूब उड़ाया और निजी बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा. क्रैडिट कार्ड का प्रचलन कम हुआ और डैबिट कार्ड सब के हाथों में आ गया.

शुरू में इन बैंकों की शाखाएं महानगरों तक ही सीमित थीं. शहर, कसबा, देहात में ये नहीं उतरे थे. इन के पास आईटी का बेस अच्छा रहा. युवा स्टाफ और सब से महत्त्वपूर्ण इन का ग्राहकवर्ग उच्चमिडिल और उच्च श्रेणी का था. शाखाओं में भीड़ न के बराबर थी. इसलिए सेवाएं उच्चस्तरीय और निर्णय तुरंत होते थे. यहां लालफीताशाही और हरामखोरी बेहद कम थी.

फंड मैनेजमैंट बढि़या होने से ये डिपौजिट्स पर ब्याजदर राष्ट्रीयकृत बैंकों से थोड़ी ज्यादा रख कर ग्राहकों को लुभाते और होम सर्विस भी देते रहे.

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बैंकों की बदलती कर्ज नीति

धीरेधीरे सरकारी बैंकों ने भी अपने उच्चतम स्तर पर रिटेल लोन के अलग विभाग खोले और विज्ञापन पर जम कर खर्च किया जाने लगा. बैंकों में रिटेल मेगामार्ट जैसा शुरू हो चुका था.

होम लोन, कार लोन ये 2 क्षेत्र बैंकों और ग्राहकों के सर्वप्रिय थे और आज भी हैं. बैंकों ने बिल्डर्स और कार निर्माताओं से टाईअप किया ताकि दोनों को फायदा हो सके.

आइए, सस्ती और मनमाफिक किस्तों पर लोन लीजिए और आप भी मुसकराइए.

बैंक लोन और मिडिल क्लास

पहले बैंक रिटेल लोन देने में आनाकानी करते थे. उन के लोन कृषि, लघु उद्योग, छोटे व्यवसाय और ट्रक, लारी, टैंपो, टैक्सी, बस, आदि खरीदवाने के लिए दिए जाते थे. शायद देश और समय की यही मांग थी. वह 70 का दशक था, बैंक सोशल बैंकिंग सीख रहे थे.

शुरू में बैंक मिडिल क्लास घरों में घुसने से भी कतराते थे. उस समय इस तबके पर बैंकों का विश्वास कम था. इस का मुख्य कारण कम तनख्वाह थी. किस्त जमा करेंगे या नहीं, यह सवाल भी था.

यानी बैंकों के अनुसार, रिपेमैंट कल्चर शायद उस समय मिडिल क्लास में नहीं था. पर बात वही थी, पहले मुर्गा आया या अंडा. लोन दोगे तभी तो रिपेमैंट की बात आएगी. धीरेधीरे यह मिथ भी टूट गया और सारे बैंक बड़े पैमाने पर समाज के हर तबके व व्यवसाय के लिए अलगअलग प्रोडक्ट ले कर बाजार में उतर आए.

आजीवन कर्जदार

कर्ज लेना आसान है पर अदायगी मुश्किल. यह कड़वा सच है. कर्ज लेने वाले के मन में अपने समीकरण चलते हैं, जो बैंक के नियमों से मेल नहीं खाते.

पहला समीकरण कि हाउसिंग लोन के प्रोजैक्ट में घर का एक रुपया न लगे, यानी पूरा खर्चा बैंकलोन में एडजस्ट हो जाए. दूसरा समीकरण, बाइक भी इसी लोन से निकल आए, तो मजा ही आ जाए. तीसरा समीकरण, कुछ कैश भी हाथ में आ जाए.

यानी कि लोन के दुरुपयोग की नींव कर्जदार ने खुद ही डाल दी. यानी, जरूरत से ज्यादा लोन लेना. अब इस में बैंक की गलती क्या है? नीयत में खोट कर्जदार की हुई कि नहीं? चलिए अब लोन मिल गया तो अदायगी मय ब्याज के शुरू होनी है. ईएमआई यानी इक्वेटेड मंथली इंस्टौलमैंट जिस में मूल और ब्याज दोनों शामिल होते हैं, अगर सैलरी से काट लिया जा रहा है, तब तो मजबूरी है, पर अगर खुद से देना हो तो समीकरण फिर बदल जाता है.

अदायगी की रकम आ जाएगी खर्चों की लिस्ट में सब से आखिरी पायदान पर. कभी मेहमानों का खर्चा तो कभी हारीबीमारी, कभी बच्चों को ऐडमिशन तो कभी डोनेशन. कुछ नहीं, तो सैरसपाटे. यानी, बैंक महोदय खड़े रहेंगे सब से पीछे.

आप ही बताइए, इस में बैंक की कोई गलती है क्या? आप भूलना चाहते हैं, पर बैंक तो आजीवन आप को नहीं भूलेगा बेचारा. नौकरी उस की भी है.

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पहले बैंकसाहब दाता थे, अब याचक बन कर किस्त की गुहार लगा रहे हैं. भीख मांग रहे हैं. याद रखिए, बैंक न छोड़ता है और न ही भूलता है.

यह शुद्ध आय नहीं

बहुत से लोग बैंक लोन ले कर छोटेमोटे रोजगार खोलते हैं, कुछ चालू व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए लोन लेते हैं. नए युवा उद्यमी एक गलती कर जाते हैं. दुकान के टोटल कलैक्शन को आय मान बैठते हैं, जो कि गलत है. बिजली, पानी, मजदूरी, तनख्वाह, दुकान का भाड़ा, टेबलकुरसी, कंप्यूटर लाइटफिटिंग, मरम्मत, रखरखाव, कच्चे माल, इंक, पैट्रोल खर्च, स्टेशनरी, इनकम टैक्स, डैप्रिसिएशन और सब से बड़ी बात बैंक की ईएमआई को वे खर्चा ही नहीं मानते.

यहीं पर वह धोखा हो जाता है और सारी इकोनौमिक्स फेल हो जाती है. महीनेभर में हुई कुल प्राप्ति में से इन मदों पर हुए खर्च को घटाने के बाद जो बचे, वह आप की शुद्ध आय होगी. दुकान पर जितने नोट मिलें, वे प्रौफिट नहीं होते.

एनपीए

नौन परफौर्मिंग एसेट्स यानी जिस ऋ ण खाते में पिछले 3 महीने से न ब्याज जमा किया गया और न ही मूल या दोनों में से कोई एक डिफौल्ट किया गया, तो ऋ ण खाता एनपीए हो जाएगा. यानी अगर ईएमआई एक हजार रुपए महीने की है तो 3 हजार रुपए जमा न करने पर लोन की पूरी बकाया रकम, जो हो सकता है 3 लाख रुपए हो, एनपीए हो जाएगी. 3 हजार रुपए के डिफौल्ट पर 3 लाख रुपए का एनपीए बैंक को दर्ज करना पड़ेगा.

अब आप समझ गए होंगे कि एनपीए की पूरी राशि डिफौल्ट नहीं होती. बस, कुछ किस्तें न दिए जाने के कारण एनपीए का पोर्टफोलियो करोड़ोंअरबों तक चला जाता है.

बैंक अब चाह कर भी आप के ऋ ण खाते को हैल्दी कैटेगरी में नहीं रख पाते. कंप्यूटर हर तिमाही एक लिस्ट निकाल कर बैंक को आप के कर्ज की सेहत बताता रहेगा.

आप का ऋ ण एनपीए हो गया है तो अब बैंक अपनी नजरें टेढ़ी कर लेगा. सिबिल में आप का नाम आ जाएगा जो बाकी के बैंकों में भी पहुंच जाएगा, ताकि आप की करतूत वे भी देख लें. यानी, लोन के दरवाजे आप के लिए बंद. मतलब यह है कि लेने के देने पड़ने वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी.

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एनपीए होने के कारण

एक तो वह कारण है जिस की चर्चा विस्तार से ऊपर की गई. यानी ऋण लेने वाले की नीयत में खोट यानी विलफुल डिफौल्टर. दूसरा कारण, प्राकृतिक आपदा, बाजार में उतारचढ़ाव, राजनीतिक या सामाजिक उथलपुथल अर्थात वे सभी कारण जिन पर कर्जदार का वश नहीं होता, अर्थात नौन विलफुल डिफौल्टर.

दूसरी परिस्थिति में सरकार या बैंक कर्जदारों को किस्तों में छूट, समय आगे बढ़ाना, ब्याज में छूट आदि मदद करने के लिए आगे आते हैं ताकि कर्जदार को राहत दी जा सके और वह फिर से यथावत अपना धंधा कर सके.

ओटीएस

वन टाइम सैटलमैंट के अंतर्गत कर्जदार और बैंक अधिकारी बैठ कर एक समझौता करते हैं जो दोनों को मान्य

होता है. इस के अंतर्गत, नियमानुसार अनअप्लाइड ब्याज को बैंक छोड़ देता है. कर्जदार या जमानती या वारिस दूसरे स्रोतों से पैसे जमा कर के एनपीए खाते में पैसा डाल कर उसे बंद कर के नजात पा जाता है. ऐसा अकसर ऋ णी की मृत्यु की हालत में या दूसरे नौन विलफुल डिफौल्ट की हालत में किया जाता है ताकि बैंक और कर्जदार दोनों ही इस त्रासदी से मुक्ति पा सकें. बैंक की रिकवरी पौलिसी में इस संबंध में स्पष्ट दिशानिर्देश दिए हुए होते हैं.

बैंकिंग का मूल तत्त्व

अब आप ही बताइए, बैंक ने आप पर विश्वास किया, लोन दिया, आप ने लोन वापस नहीं किया, फिर बैंक ने वापसी का नोटिस भेजा, तो बैंक अधिकारी भ्रष्ट कैसे हो गए? यह सच है कि एनपीए होने में कर्जदार की नीयत का बहुत बड़ा हाथ होता है.

बैंक हो या कोई और आर्र्थिक संस्थान, चलता तो ईमानदार और कर्मठ कर्मचारियों से ही है. बुरे, भ्रष्ट लोग न हों, तो सोने पे सुहागा.

बैंकिंग का मूल तत्त्व ही है विश्वास, भरोसा, ट्रस्ट. इसे दोनों को ही नहीं तोड़ना है. बैंक आप के डिपौजिट्स के साथ धोखा नहीं करता, आप बैंक के कर्ज के साथ न करें. बस, बन गई बात.

ये जरूर करें

अकसर लोग बैंक से लोन लेने के बाद बैंक से नाता तोड़ लेते हैं, जो कि एकदम गलत है. बैंक आप के बिजनैस का सीनियर फाइनैंशियल पार्टनर होता है.

उसे समयसमय पर बिजनैस की स्थिति की जानकारी देते रहें. चाहे अच्छी खबर हो या बुरी, बैंक को बताते रहें. ऐसा करने पर बैंक को एक तरह की कम्फर्ट फीलिंग आती है कि आप अपने लोन और अदायगी को ले कर संजीदा हैं.

बैंक जो भी वांछित सूचना जैसे बीमा, स्टौक स्टेटमैंट आदि मांगे तो तुरंत दें.

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अपने स्तर पर बिजनैस संबंधी खाते जरूर रखें जिन में खरीदबिक्री को दिनवार दर्ज करें. लेनदेन पारदर्शी रखें. इस से आप को ही मदद मिलेगी.

सब से अहम बात, देय तारीख पर किस्त जरूर जमा करें, यदि देर हो रही है तो व्यक्तिगत रूप से बैंक को सूचित अवश्य करें, गायब तो बिलकुल भी न हों. ऐसा करने से आप को फायदा ही होगा.

अगर बिजनैस में कोई बड़ी रुकावट आ गई हो तो उस की लिखित सूचना प्रूफ के साथ बैंक को तुरंत दें ताकि उसे यदि कोई मदद करनी हो तो वह कर सके या आप की सूचना आप की फाइल में मौजूद रहे और वक्तजरूरत काम आए.

स्टेशन पर चलता था सेक्स रैकेट : भाग 1

विजय बद्री बेशक दिव्यांग था लेकिन वह था बहुत शातिर. कम उम्र की लड़कियों से वह न सिर्फ भीख मंगवाता था, बल्कि जवान दिखने के लिए वह उन्हें हारमोंस के इंजेक्शन भी लगाता था ताकि उन से जिस्मफरोशी करा कर मोटी कमाई हो सके. लेकिन पुलिस ने…   गोरखपुर पूर्वोत्तर रेलवे मंडल के मंडल सुरक्षा आयुक्त अमित कुमार मिश्रा के निर्देश पर मंडल के सभी रेलवे स्टेशनों एवं ट्रेनों में सघन जांच का अभियान चलाया जा रहा था. दरअसल, अमित कुमार मिश्रा को सूचना मिली थी कि कुछ ऐसे गैंग सक्रिय हैं, जो कम उम्र की लड़कियों को अपने जाल में फांस कर जिस्मफरोशी का धंधा कराते हैं. उन के निर्देश पर बादशाह नगर रेलवे सुरक्षा बल के एसआई वंशबहादुर यादव 25 सितंबर, 2019 की सुबह आनेजाने वाली ट्रेनों की जांच कर रहे थे. ट्रेनों की जांच करने के बाद उन की नजर प्लेटफार्म नंबर-1 पर बैठे बालकों पर पड़ी.

एक पेड़ के निकट रुक कर वह उन को निहारने लगे. वहां 2 किशोरों के साथ 2 किशोरियां थीं. उन्हें देख कर पहले उन्होंने सोचा कि शायद ये ट्रेन में भीख मांग कर गुजारा करने वाले खानाबदोश या बंगलादेशियों के बच्चे होंगे और सामान एकत्रित कर के अपने गंतव्य स्थान पर कुछ देर में चले जाएंगे, किंतु पेड़ की आड़ में छिप कर देखने के बाद उन्हें उन की गतिविधियां कुछ संदिग्ध लगीं.

तब उन के नजदीक जा कर उन्होंने उन से पूछा, ‘‘तुम लोग कौन हो? सुबहसुबह यहां प्लेटफार्म पर क्या कर रहे हो?’’

पुलिस वाले को अपने पास देख कर वे चारों सहम गए और सुबकने लगे. उन चारों को सुबकते देख एसआई वंशबहादुर यादव को मामला कुछ संदिग्ध लगा. उन्होंने सहानुभूति दिखाते हुए उन चारों को चाय पिला कर ढांढस बंधाते हुए पूछा, ‘‘आखिर बात क्या है, बताओ. तुम इस तरह रो क्यों रहे हो? कुछ तो बताओ, तभी तो मैं तुम्हारे लिए कुछ करूंगा.’’

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कुछ देर खामोश रहने के बाद किशोरों के साथ बैठी दोनों किशोरियों ने अपनी आपबीती एसआई वंशबहादुर को सुनाई. उन्होंने बताया कि एक दिव्यांग व्यक्ति ने उन्हें अपने कब्जे में कर रखा था और वह उन से जिस्मफरोशी का धंधा कराता था. किसी तरह वे उस के चंगुल से निकल कर आई हैं.

उन की व्यथा सुन कर एसआई आश्चर्य में पड़ गए. उन का दिल करुणा से भर आया. उन दोनों किशोरियों ने अपने नाम गुंजा व मंजुला खातून और किशोरों ने विजय व आनंद बताए. किशोरियों ने बताया कि यहां से वे वैशाली एक्सप्रैस से अपनी रिश्तेदारी में बहराईच जाने के लिए प्लेटफार्म पर बैठी हुई ट्रेन का इंतजार कर रही थीं.

एसआई वंशबहादुर यादव ने उन की व्यथा सुनने के बाद यह जानकारी ऐशबाद रेलवे स्टेशन पर स्थित आरपीएफ के थानाप्रभारी एम.के. खान को फोन द्वरा दे दी.

चूंकि मामला गंभीर था इसलिए उस दिव्यांग व्यक्ति को तलाशने के लिए उन्होंने सिपाही उमाकांत दुबे, धर्मेंद्र चौरसिया, महिला सिपाही अंजनी सिंह व अर्चना सिंह को एसआई वंशबहादुर के पास भेज दिया. इस के बाद वंशबहादुर पुलिस टीम के साथ उस दिव्यांग की तलाश में मुंशी पुलिया के पास उस के अड्डे पर गए, लेकिन वह वहां नहीं मिला.

उन किशोरियों ने बताया था कि वह दिव्यांग व्यक्ति उन दोनों को ही ढूंढ रहा होगा. वह उन्हें ढूंढता हुआ बादशाह नगर प्लेटफार्म तक जरूर आएगा. इस के बाद पुलिस टीम इधरउधर छिप कर उस के आने का इंतजार करने लगी. कुछ देर बाद करीब 11 बजे के वक्त वह दिव्यांग व्यक्ति बादशाह नगर रेलवे स्टेशन पर आता हुआ दिखाई दिया. किशोरियों ने उसे पहचान लिया.

उन्होंने बताया कि वह करीब एक साल से इसी व्यक्ति के चंगुल में थीं. पुलिस टीम ने उस दिव्यांग को हिरासत में ले लिया और उसे बादशाह नगर रेलवे पुलिस चौकी ले आए.

पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने उन दोनों किशोरियों एवं किशोरों को पहचानते हुए यह स्वीकार किया कि इन लड़कियों से अनैतिक कार्य और किशोरों से भीख मांगने का धंधा कराता था. रेलवे पुलिस को यह भी पता चला कि मुंशी पुलिया के निकट यह दिव्यांग व्यक्ति पुलिस चौकी के पीछे झोपड़ी में रहता था. उस ने अपना नाम विजय बद्री उर्फ बंगाली बताया. वह पश्चिमी बंगाल का निवासी था.

आरोपी की गिरफ्तारी की सूचना पर रेलवे सुरक्षा बल ऐशबाद के थानाप्रभारी एम.के. खान भी बादशाह नगर रेलवे पुलिस चौकी पर पहुंच गए.

चूंकि मामला सिविल पुलिस का था, इसलिए थानाप्रभारी के निर्देश पर एसआई वंशबहादुर मेमो डिटेल बना कर उन दोनों किशोरों विजय व आनंद और दोनों किशोरियों गुंजा और मंजुला खातून को साथ ले कर थाना गाजीपुर पहुंचे.

उन्होंने गाजीपुर थानाप्रभारी राजदेव मिश्रा को पूरी बात बताई तो उन्होंने विजय बद्री के खिलाफ भादंवि की धारा 365, 370, 370ए के अंतर्गत 25 सितंबर, 2019 को मुकदमा दर्ज कर लिया.

गाजीपुर थाने में मुकदमा दर्ज हाने के बाद थानाप्रभारी ने उक्त प्रकरण की जांच विकास नगर पुलिस चौकी के इंचार्ज एसआई दुर्गाप्रसाद यादव को सौंप दी. जांच मिलते ही दुर्गाप्रसाद ने आरोपी दिव्यांग विजय बद्री से पूछताछ की तो उस ने अन्य आरोपियों सुमेर व शमीम के नाम भी बताए. पुलिस ने अन्य आरोपियों की खोजबीन शुरू कर दी.

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एसआई दुर्गाप्रसाद यादव ने दोनों किशोरियों से पूछताछ की तो पता चला कि उन में से एक असम व एक बिहार की रहने वाली थी. उन के पिता लखनऊ शहर आ कर रिक्शा चलाते थे. उन के घर की हालत खस्ता थी. किसी तरह से केवल पेट भरने लायक रोटी मिल पाती थी.

मंजुला खातून विकासनगर के पास स्थित गांव चांदन में अपने पिता के साथ रहती थी. वहीं से वह कामधंधे की तलाश में निकली तो वह मुंशी पुलिया के पास झुग्गी में रहने वाले दिव्यांग विजय बद्री के संपर्क में आई. कुछ दिनों तक बद्री ने मंजुला की काफी मेहमाननवाजी की.

विजय बद्री के पास कुछ औरतें आती थीं. उस ने मंजुला को उन औरतों से मिलवाया. उन महिलाओं ने मंजुला को गोमतीनगर, इंदिरानगर और विकास नगर की पौश कालोनियों में भीख मांगने के काम पर लगा दिया.

इसी बीच गुंजा भी विजय बद्री के संपर्क में आ गई. गुंजा को भी उस ने मंजुला के साथ भीख मांगने के काम पर लगा दिया. बाद में उन दोनों को बादशाह नगर चौराहे व रेलवे स्टेशन के आसपास भेजा जाने लगा. वे ट्रेन में भी भीख मांगने लगीं. अधिकांशत: गुंजा व मंजुला खातून बादशाह नगर स्टेशन से ट्रेन में सवार हो कर काफी दूर तक भीख मांगने निकल जाया करती थीं.

शाम को वह अपने अड्डे पर जब वापस नहीं पहुंचतीं तो विजय बद्री खुद उन की तलाश में निकल पड़ता था. धीरेधीरे उस के यहां काम करने के दौरान गुडंबा निवासी विजय व आनंद से उन का संपर्क हुआ. ये दोनों किशोर भी भीख मांगने का धंधा किया करते थे. ये चारों दिन भर में लगभग एकएक हजार रुपए कमा कर लाते थे. विजय बद्री इस काम के लिए उन्हें रोजाना 200 रुपए दिया करता था.

गुंजा व मंजुला दोनों किशोरियों ने जांच के दौरान पुलिस को बताया कि विजय बद्री ने मुंशी पुलिया पुलिस चौकी के पीछे गोल्फ चौराहे पर ठहरने का अड्डा बना रखा था. जांच में पता चला कि विजय बद्री पश्चिमी बंगाल से आ कर उत्तर प्रदेश में बस गया था.

सर्दियों में सौफ्ट स्किन के लिए अपनाएं ये खास टिप्स

सर्दी का मौसम अर्थात् शुष्क त्वचा. सर्दी का मौसम हमारी कोमल त्वचा पर गहरा प्रभाव डालता है. ठंडी, सर्द, बर्फीली हवाओं का हमारी त्वचा पर कुछ ज्यादा ही असर पड़ता है. त्वचा सूखकर फटने लगती है और शुष्क होने के बाद त्वचा पर खुजली भी होने लगती है. सर्दियों में धूप में बैठना हर किसी को अच्छा लगता है मगर थोड़ी सी लापरवाही से धूप से भी त्वचा झुलसकर सांवली पड़ जाती है. इस मौसम में हमें अपनी त्वचा की सामान्य देखभाल तो करनी ही चाहिए, साथ ही चेहरे और शरीर के कुछ भागों, जैसे होंठ, कोहनी, एड़ियां इत्यादि पर भी विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए. चंद सावधानियों से आप पा सकती हैं सर्दी के मौसम में भी कमनीय, कोमल और सुंदर त्वचा. तो इन्हें आजमाए और कोमल व दमकते हुए त्वचा पाये –

* एक बड़ा चम्मच जौ के आटे में चुटकी भर हल्दी तथा थोड़ा सा तिल का तेल मिलाकर उबटन बनाएं. इसे त्वचा पर 10 मिनट तक लगा रहने दें. उसके बाद गुनगुने पानी से धो लें. आपकी सूखी त्वचा भी कोमल बन जाएगी.

*  संतरे की फांकों को दो बड़े चम्मच पानी में उबालकर ठंडा कर छान लें और इसे अपनी त्वचा पर 10 मिनट तक लगा रहने दें. अब गुनगुने पानी से स्नानं  कर लें.

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*  चीकू के गूदे को 20 मिनट तक त्वचा पर मलकर रखें. फिर गुनगुने पानी से धो लें. त्वचा अनोखी आभा से खिल उठेगी.

* नींबू का रस, ग्लिसरीन तथा गुलाब जल को बराबर मात्रा में मिलाकर शरीर के खुले भागों पर लगाएं. इससे त्वचा चमक उठेगी और त्वचा का फटना भी रूक जाएगा.

* सर्दियों में हमेशा गुनगुने पानी का प्रयोग करें क्योंकि ठंडा पानी त्वचा तक आक्सीजन को पहुंचने में बाधा उत्पन्न करता है.

*  त्वचा की खुश्की दूर करने के लिए गुलाब जल में जैतून के तेल की कुछ बूंदें और थोड़ा सा कच्चा दूध मिलाएं. इसे हल्के हाथों से त्वचा पर मलें. 10 मिनट बाद गुनगुने पानी से स्नान कर लें.

*  गाजर और टमाटर का रस निकालकर चेहरे पर लगाएं. सूख जाने के बाद गुनगुने पानी से चेहरा धो लें.

*   होंठों की त्वचा बहुत पतली होती है और चिकनाहट देने वाली ग्रंथियों की कमी होती है, इसलिए होंठ बहुत जल्दी सूख जाते हैं और फटने लगता है. क्लीजिंग के बाद बादाम युक्त क्रीम होंठों पर लगाएं और पूरी रात लगी रहने दें. यह त्वचा को कोमल बनाती है.

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* घरेलू उपचार के रूप में त्वचा को कोमल एवं कमनीय बनाने के लिए बादाम का तेल या दूध की मलाई भी प्रयोग की जा सकती है.

* स्नान से पहले हल्दी व नींबू युक्त क्रीम का इस्तेमाल करना चाहिए. इससे त्वचा कोमल हो जाती है.

*  सर्दियों में कोहनी पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है. इस भाग की त्वचा बहुत रूखी और कड़ी होती है क्योंकि यहां तैलीय ग्रंथियां नहीं होती. नींबू के दो भाग करके कोहनियों पर रगड़ें. इससे कोहनियों का रंग साफ हो जाता है.

* स्नान करने के बाद कोहनियों पर मौइश्चराइजर क्रीम अवश्य लगाएं.

विवाह के समय तुनकमिजाजी अब दूर की बात

उज्जैन के राजीव ने अपनी बेटी की शादी ग्वालियर के एक इंजीनियर लड़के से तय की. दोनों परिवारों ने आपसी सहमति से सारी बातें तय कीं. शादी से एक दिन पहले संगीत के कार्यक्रम में वधू की बहन ने डांस परफौर्म करने के लिए वर पक्ष से एक गाना बजाने की डिमांड की. वधू की बहन के बारबार कहने पर भी जब गाना नहीं बजाया गया तो बात बड़ों तक पहुंची और बात बढ़तेबढ़ते इतनी बढ़ गई कि लड़की वालों ने शादी करने से इनकार कर दिया.

लड़की वालों का कहना था कि इतनी छोटी सी बात पर हमारा मान नहीं रखे जाने का मतलब है कि हमें ताउम्र नीचा दिखाया जाएगा. ऐसे परिवार में हम अपनी बेटी नहीं दे सकते, क्योंकि जिस घरपरिवार में अभी हमारी ही इज्जत नहीं वहां हमारी बेटी का भविष्य सुखद कैसे हो सकता है?

समाज में धीरेधीरे अपने पैर फैला रही सामाजिक क्रांति के इस दौर में लड़की देखने से ले कर विवाह के संपन्न होने तक अब समाज में लड़के वालों की तुनकमिजाजी असहनीय है. फिर चाहे बात दहेज की हो अथवा लड़की और लड़के के नजरिए में भिन्नता की, बेटी के परिवार के मानसम्मान अथवा शादी के अवसर पर होने वाली रस्मों की, अब मातापिता विवाह जैसे महत्त्वपूर्ण निर्णय में बेटी की राय और निर्णय को प्राथमिकता देने लगे हैं. अब जोरजबरदस्ती से नहीं, बल्कि बेटी की हां पर ही अभिभावक उस का विवाह तय करते हैं.

सम्मान को प्राथमिकता

आज की सदी की बेटियां केवल उसी परिवार में विवाह करने को प्राथमिकता दे रही हैं जहां उन के मातापिता और उन का उचित सम्मान हो. 18 साल पहले जब मैं ने बेटी को जन्म दिया तो हमारे कितने ही शुभचिंतकों ने हमें बेटी के लिए दहेज की सलाह दी थी. परंतु अब यह मिथक टूट रहा है. आज कितने ही अभिभावक इकलौती बेटी को ही संतान के रूप में पा कर खुश हैं.

आधुनिक मातापिता अपनी बेटियों को महज स्नातक या स्नातकोत्तर की डिगरी दिला कर विवाह करने की अपेक्षा उच्चशिक्षित कर आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं. ऐसे में वरपक्ष की किसी भी प्रकार की तुनकमिजाजी को वधूपक्ष स्वीकार नहीं करता और करे भी क्यों? आज समानता का युग है, बेटियां किसी भी मामले में बेटों से कम नहीं हैं. वे जीवन की हर चुनौती को खुशीखुशी स्वीकार कर रही हैं.

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बदलाव के कारण

सीमित परिवार : वर्तमान समय में परिवार का आकार एक अथवा अधिक से अधिक दो बच्चों तक सीमित हो कर रह गया है. कमरतोड़ महंगाई और महंगी शिक्षा के कारण आज अधिकांश दंपती

एक अथवा दो बच्चों वाले छोटे परिवार को ही प्राथमिकता देने लगे हैं. फिर चाहे वे एक या दो बेटियां ही क्यों न हों. ऐसे में प्रत्येक मातापिता अपनी बेटियों को पढ़ालिखा कर आत्मनिर्भर बनाना चाहता है. उन के लिए आज बेटे और बेटी में कोई फर्क नहीं है.

आत्मनिर्भर होती बेटियां : आज बेटियों को भी बेटों के ही समान प्रत्येक क्षेत्र में नौकरियों के समान अवसर प्राप्त हैं. बोर्ड परीक्षा परिणाम आने पर बेटियां प्रत्येक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं. निर्मला सीतारमण, हिमा दास, मिताली राज, इरा सिंघल, पी टी उषा, मैरी कौम जैसी अनेक हस्तियां आज विभिन्न क्षेत्रों में अपनी काबिलीयत का लोहा मनवा रही हैं. ऐसे उदाहरण समाज की लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत का काम करते हैं. आज बेटियां केवल शादी कर के घर बसाना नहीं, बल्कि अपने कैरियर को भी प्राथमिकता दे रही हैं, साथ ही, अभिभावक भी बेटियों को आत्मनिर्भर बना कर ही उन्हें विवाहबंधन में बांधना चाहते हैं.

बेटियां नहीं हैं पराई : कुछ समय पहले तक कहा जाता था कि बेटियां पराई होती हैं, उन्हें पढ़ालिखा कर बड़ा करो और फिर दूसरे परिवार में विदा कर दो. इस की अपेक्षा आज बेटियां मातापिता का अभिमान हैं. उन के बुढ़ापे की लाठी हैं. कितने ही मातापिता आज अपनी बेटियों के परिवार के साथ रहते हैं. अपने मातापिता के लिए आज की शिक्षित, आत्मनिर्भर बेटी कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहती है. बेटे द्वारा दी गई मुखाग्नि से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है, यह मिथक अब टूट रहा है और बेटियां अपने मातापिता की अर्थी को कंधा देने से ले कर उन की चिता को मुखाग्नि तक दे रही हैं. सो, बेटियां अब किसी भी कीमत पर पराई नहीं रहीं.

अंतर्जातीय विवाह : लड़के वालों की तुनकमिजाजी को न सहने का सर्वप्रमुख कारण अंतर्जातीय विवाह है. पहले जहां दूसरी जाति में विवाह करने वाले लड़केलड़की को समाज से निष्कासित कर दिया जाता था और उन के मातापिता को हेय दृष्टि से देखा जाता था वहीं अब इस सामाजिक बदलाव को खुलेआम स्वीकार किया जाने लगा है. अब मातापिता स्वयं अपने बच्चों का अंतर्जातीय विवाह कर रहे हैं. वे अब जाति की अपेक्षा शिक्षा, नौकरी और परिवार को प्राथमिकता देने लगे हैं.

भावनात्मक जुड़ाव : 3 बेटों और एक बेटी की मां अविका मिश्रा कहती हैं, ‘‘3 बेटों की अपेक्षा हमारी बेटी हमें और हमारी जरूरतों को बहुत अच्छी तरह सम झती है.’’

वास्तव में बेटियों को अपने मातापिता से अत्यधिक भावनात्मक लगाव होता है. यदि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो बेटियां अपने मातापिता की बेटों से अधिक चिंता और देखभाल करती हैं. मातापिता भी बेटों की अपेक्षा अपने बेटियों से अधिक खुल कर बातचीत कर पाते हैं.

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वास्तव में आज की बेटियां किसी भी मामले में बेटों से कम नहीं हैं. आज बेटे और बेटी के पालनपोषण में किसी प्रकार का भेद नहीं किया जाता है. उन की शिक्षा पर होने वाला खर्च समान है. वे अपने मातापिता की देखभाल करने में पूरी तरह सक्षम हैं. फिर क्यों लड़के वालों को उच्चतर सम झा जाए और क्यों लड़की को रिजैक्ट और ऐक्सैप्ट करने का अधिकार केवल उन्हें ही दिया जाए? क्यों शुरू में ही उन की बेबुनियादी बातों को माना जाए और क्यों उन की तुनकमिजाजी को स्वीकार किया जाए.

विवाह संबंध केवल वरवधू का ही नहीं, बल्कि 2 परिवारों का भी मिलन होता है, जिसे आपसी सुखद व्यवहार और मेलमिलाप से आदर्श बनाया जाना चाहिए. आज आवश्यकता इस बात की है कि लड़के के मातापिता और लड़का दोनों ही लड़की के मातापिता को उचित सम्मान दें और लड़का उन की भी अपने मातापिता की ही भांति देखभाल करें. तभी लड़की भी अपनी ससुराल वालों को उचित सम्मान दे पाएगी, क्योंकि लड़के के मातापिता की ही भांति उस के मातापिता भी उस की ही जिम्मेदारी हैं.

‘‘मैं हाई प्रोफाइल इंसान नहीं हूं’’: अक्षय खन्ना

कई हिट फिल्में देने वाले अक्षय खन्ना बड़े परदे पर सिर्फ पौजिटिव ही नहीं बल्कि नैगेटिव किरदार भी उम्दा तरीके से निभा रहे हैं. वे कौमेडी, ऐक्शन, थ्रिलर के साथसाथ रोमांटिक फिल्मों में काम कर चुके हैं. इन दिनों वे फिल्म ‘सब कुशल मंगल’ को लेकर चर्चा में हैं.

फिल्म ‘हिमालय पुत्र’ से हिंदी फिल्म में डैब्यू करने वाले अभिनेता अक्षय खन्ना, 70 और 80 के दशकों के मशहूर अभिनेता विनोद खन्ना के बेटे हैं. इस फिल्म को उन के पिता ने ही प्रोड्यूस किया था. इस के बाद अक्षय ने कई फिल्में कीं. उन्होंने कौमेडी से ले कर रोमांटिक और नैगेटिव हर तरीके की फिल्मों में काम किया है. वे आज भी अकेले हैं और अकेले ही जीवन बिताना पसंद करते हैं. उन्होंने आज तक जो भी काम किया उस को सफल मानते हैं. वे बोलते कम हैं और अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीना पसंद करते हैं. उन की फिल्म ‘सब कुशल मंगल’ रिलीज पर है. इस में वे अपनी अलग भूमिका को ले कर बहुत खुश हैं.

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उन से बातचीत के दौरान पूछने पर कि आप के जीवन का कुशल मंगल क्या है, तो वे बोले, ‘‘मुझे आज भी काम करने का मौका मिलना ही मेरे जीवन का कुशल मंगल है. अच्छीअच्छी स्क्रिप्ट्स मुझे आज मिल रही हैं.’’

फिल्म ‘सब कुशल मंगल’ को करने की खास वजह क्या रही? इस सवाल पर अक्षय खन्ना बताते हैं, ‘‘इस की कहानी बहुत अलग है. इस तरह की भूमिका मैं ने पहले कभी की नहीं है. 2 नए कलाकार मेरे साथ डैब्यू कर रहे हैं. ये सब मेरे लिए खास और नया है. जो मैं हर फिल्म में खोजता हूं वह इस में मिल रहा था, इसलिए न कहने की कोई गुंजाइश नहीं थी.’’

आप अपने अभिनय की जर्नी को कैसे देखते हैं, कोई मलाल अभी भी रह गया है क्या? इस पर अक्षय कहते हैं, ‘‘मुझे लगता है मैं अगर 20 साल और भी काम करूं तो भी मुझे संतुष्टि नहीं मिलेगी. कलाकार का सफर कभी खुदबखुद समाप्त नहीं होता. इस में उतारचढ़ाव तो आते रहते हैं, जो जिंदगी का एक पहलू है. इसे मैं अधिक सीरियसली नहीं लेता. नकारात्मक बातों पर अधिक फोकस नहीं करता क्योंकि उस से कोई फायदा नहीं होता.’’

नए कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? इस पर वे यों बताते हैं, ‘‘मैं इन के लिए बहुत प्रोटैक्टिव रहता हूं और चाहता हूं कि इन के साथ कुछ गलत न हो. फिल्म सफल हो, उन का काम सब को पसंद आए, ताकि उन की जर्नी आगे अच्छी हो. बस, यही अनुभव रहा है.’’

किसी फिल्म के लिए कितनी तैयारी करनी पड़ती है? इस पर वे अपना मत यों जाहिर करते हैं, ‘‘आज भी तैयारी और मेहनत करनी पड़ती है. हर निर्देशक की कहानी अलग होती है और मुझे उस के मुताबिक काम करने की जरूरत होती है. अभिनय के साथसाथ यह एक व्यवसाय भी होता है, जिस का ध्यान मैं हमेशा रखता हूं. निर्देशक के अनुसार काम करने का डर अभी भी रहता है. सैट पर मैं कई बार नर्वस भी हो जाता हूं. मैं कभी अपने निर्देशक को निराश नहीं देखना चाहता.’’

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इस फिल्म में निर्देशक से ले कर कलाकार सभी नए हैं, ऐसे में आप उन्हें कितनी सहजता प्रदान करते हैं ताकि उन्हें आप को निर्देश देने में कोई प्रैशर महसूस न हो? इस सवाल पर अक्षय मुसकराते हैं, बोलते हैं, ‘‘क्रिएटिव फील्ड में किसी का किसी के ऊपर प्रैशर होने पर काम करना मुश्किल होता है. प्रैशर को घर पर छोड़ कर आना पड़ता है.’’

आजकल फिल्मों से मनोरंजन गायब होता जा रहा है, इस की जगह समाज की डार्क साइड या  किसी अप्रत्याशित व डरावनी घटनाएं ले रही हैं, इस की क्या वजह मानते हैं? हमारे इस प्रश्न पर वे थोड़ा गंभीर हुए, फिर बोले, ‘‘फील गुड वाली फिल्में आज भी बन रही हैं, लेकिन रियलिस्टिक फिल्में पहले भी बनती थीं. इसे दिखाना और समझना दर्शकों के लिए आवश्यक है. इस से बच कर हम कही नहीं जा सकते. समाज को हर तरह से देखने की जरूरत है.’’

आप ने बीच में थोड़ा ब्रेक लिया और फिर काम शुरू किया, इस की वजह क्या रही? हमारी इस बात पर भी वे मुसकराए, फिर बोले, ‘‘मैं ने हमेशा अच्छी फिल्मों की स्क्रिप्ट चाही है, कभी मिलती है तो कभी नहीं. इसे मिलने में कई बार सालों लग जाते हैं. इस से मेरा काम कम हो जाता है. जो मुझे औफर मिलता है उस में से कुछ अच्छा खोज लेता हूं.’’

आप के हमेशा लो प्रोफाइल रहने की वजह क्या है? इस पर वे कुछ सोचते हुए बोले, ‘‘मैं अपनी जिंदगी लो प्रोफाइल तरीके से ही जीना चाहता हूं. मैं हाई प्रोफाइल इंसान नहीं हूं. मुझे उसी में कंफर्ट फील होता है और यह ब्लडप्रैशर के लिए भी अच्छा होता है.’’

आप की फिटनैस का राज क्या है? इस पर वे हंसे और बताया, ‘‘सही समय पर खाना, सोना, उठना, व्यायाम करना आदि करता हूं. इस के लिए मैं मेहनत बहुत करता हूं.’’

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आप अपने पिता की किस सीख को अपने जीवन में उतारते हैं? मेरे यह कहने पर वे तुरंत बोले, ‘‘मेरे पिता कभी ज्ञान नहीं बांटते थे. वे जियो और जीने दो पर विश्वास करते थे. वे नौन जजमैंटल इंसान थे. वे कभी किसी की आलोचना नहीं करते थे. जो ठीक लगे, उसे करने की  सलाह देते थे. उन्होंने अपनी जिंदगी को उसी तरह से जिया है.’’

बिग बौस 13 : कंटेस्टेंट्स के लिए एक नया टास्क लेकर आईं एक्स कंटेस्टेंट हिना खान

कलर्स टीवी पर प्रसारित होने वाला शो रिएलिटी शो ‘बिग बौस13’ में कंटेस्टेंट्स के लिए चैलैजिंग टास्क पेश किया जाएगा. जी हां, ये टास्क अभिनेत्री अभिनेत्री हिना खान ने दी. हिना इस शो की एक्स कंटेंस्टेंट रह चुकी हैं. इस सीजन में फिर से बिग बौस के घर पर नजर आई. हिना की वापसी एक मजेदार टास्क कराने के लिए हुईं. ‘बिग बौस 13’ में हिना तीसरी बार घर में वापसी की.

आपको बता दें, हिना टौप-10 कंटेस्टेंट्स के लिए एक मजेदार ‘एलीट क्लब’ की चुनौती को पेश की. टास्क के हिस्से के रूप में हिना विभिन्न पहलुओं को देखते हुए यह तय  कि कौन सा प्रतियोगी ‘एलीट क्लब’ का हिस्सा बनने के लिए बेहतर था.

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खबरों के अनुसार, लोग हिना को बिग बौस शो की सबसे मजबूत महिला कंटेस्टेंट्स में से एक के रूप में याद करते हैं. उन्होंने अपने ‘शेरखान’ व्यक्तित्व के साथ वास्तव में यह साबित किया कि सीजन-11 में उनके जैसा कोई नहीं था.” सूत्र ने कहा कि कोई भी ऐसा नहीं है जो ‘एलीट क्लब’ प्रणाली को उनसे बेहतर समझ सकता है. इसलिए हिना के आने से सभी  कंटेंस्टेंट रोमांचित हुए.

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सिरकटी लाश का रहस्य

राजिंदर कुमार रोजाना की तरह सुबह 9 बजे काम पर जाने के लिए घर से निकला था. उस की मां बिशनो ने उसे दोपहर के खाने का टिफिन तैयार कर के दिया था. 20 वर्षीय राजिंदर मेनबाजार बटाला में रेडीमेड कपड़ों की दुकान पर काम करता था.

वह ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था. कुछ साल पहले उस के पिता शिंदरपाल की मृत्यु हो गई थी. पिता की मौत के बाद रिश्तेदारों ने भी परिवार का साथ छोड़ दिया था. किसी से सहायता की उम्मीद नहीं थी. घर के आर्थिक हालात ऐसे नहीं बचे थे कि राजिंदर पढ़ाई आगे जारी रख पाता. इसलिए उस ने पढ़ाई बीच में छोड़ कर काम करना शुरू कर दिया था.

राजिंदर के परिवार में उस की मां बिशनो के अलावा एक बहन नीलम थी. वह जो कमाता था, उस से जैसेतैसे घर खर्च चल पाता था. 19 सिंतबर, 2019 की सुबह राजिंदर काम पर गया. शाम को वह अपने समय पर घर नहीं लौटा तो मां को चिंता हुई. क्योंकि इस से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था. वह ठीक साढ़े 8 बजे काम से घर लौट आता था.

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राजिंदर का इंतजार करतेकरते जब रात के 10 बज गए तो मां बिशनो और बहन नीलम कुछ पड़ोसियों के साथ उसे ढूंढने निकलीं. सब से पहले वे उस दुकान पर गईं, जहां राजिंदर काम करता था. उस समय दुकान बंद हो चुकी थी.

दुकान मालिक के घर जा कर पूछने पर पता चला कि राजिंदर अपने समय से पहले ही 7 बजे छुट्टी ले कर चला गया था. घर वालों ने राजिंदर के खास दोस्तों से पूछताछ की. इस के अलावा हर संभावित ठिकाने पर उस की तलाश की गई, लेकिन उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

अंत में हार कर पड़ोसियों की सलाह पर बिशनो ने बेटे राजिंदर के लापता होने की रिपोर्ट थाना सिविल लाइंस बटाला की पुलिस चौकी सिंबल में दर्ज करवा दी.

चौकी इंचार्ज एसआई बलविंदर सिंह ने उन्हें राजिंदर को जल्द तलाशने का आश्वासन दिया. राजिंदर का फोटो ले कर उन्होंने जिले के सभी थानों में भिजवा दिया और अस्पतालों में भी उस की तलाश करवाई गई. पर राजिंदर का कहीं कोई पता नहीं चला.

बिशनो ने बेटे के लापता होने में अपनी ही कालोनी गांधी कैंप निवासी अशोक प्रीतम दास पर शक जताया था. अशोक उसी मोहल्ले में रहता था और उस का बिशनो के घर काफी आनाजाना लगा रहता था.

करीब एक महीना पहले अशोक की पत्नी की रहस्यमयी हालात में मृत्यु हो गई थी. अशोक का बेडि़यां बाजार में अपना खुद का हेयरकटिंग सैलून था.

राजिंदर अशोक का अपने घर आने का विरोध करता था. उस की कई बार अशोक से झड़प भी हो चुकी थी. इस बात को ले कर राजिंदर की अपनी मां से भी कई बार कहासुनी हुई थी. उस ने मां से भी कह दिया था कि वह अशोक को अपने घर आने से रोके.

एसआई बलविंदर ने अशोक को थाने बुला कर उस से पूछताछ की. अशोक ने बताया कि उसे राजिंदर से मिले एक महीना हो गया है और कई दिनों से वह उस के घर भी नहीं गया. बातचीत में अशोक बेकसूर लगा तो एसआई बलविंदर सिंह ने उसे घर भेज दिया और राजिंदर की तलाश जारी रखी.

22 सितंबर, 2019 को सेंट फ्रांसिस स्कूल के पीछे मोहल्ला भट्ठा इंदरजीत में रहने वालों ने प्रधान अमरीक सिंह को बताया कि उन के घर के सामने वाले हंसली नाले से बड़ी भयानक दुर्गंध आ रही है.

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अमरीक सिंह कुछ लोगों को साथ ले कर नाले के पास पहुंचे. उन्होंने देखा कि वहां बोरी में बंद किसी आदमी की लाश पड़ी थी. लाश की टांगें बोरे से बाहर थीं. अमरीक सिंह ने तुरंत इस बात की सूचना पुलिस चौकी सिंबल के इंचार्ज एसआई बलबीर सिंह को दी.

सूचना मिलते ही बलबीर सिंह मौके के लिए रवाना हो गए और यह जानकारी थाना सिविल लाइंस बटाला के एसएचओ मुख्तियार सिंह को दे दी. थानाप्रभारी भी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस ने मौके पर पहुंच कर लाश को नाले से बाहर निकलवाया. बोरी में मृतक का सिर नहीं था. हां, धड़ जरूर था. कंधों से बाजू कटे हुए थे. कपड़ों के नाम पर मृतक के शरीर पर केवल अंडरवियर था.

कई दिनों से लाश नाले के पानी में पड़ी रहने से बुरी तरह से गल चुकी थी, जिस की पहचान मुश्किल थी. वैसे भी बिना सिर के मृतक की शिनाख्त करना असंभव काम था.

पहचान के लिए मृतक के शरीर पर ऐसा कोई निशान नहीं था, जिस के सहारे पुलिस उस की शिनाख्त कराती. सिर और बाजू कटी लाश मिलने से पूरे शहर में सनसनी फैल गई थी, दहशत का माहौल बन गया था.

क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम बुलवा कर पंचनामे की कारवाई की गई. थानाप्रभारी ने लाश मिलने की जानकारी अपने आला अधिकारियों को दे दी थी. इस के कुछ देर बाद एसएसपी उपिंदरजीत सिंह घुम्मन, एसपी (इनवैस्टीगेशन) सूबा सिंह और डीएसपी (सिटी) बालकिशन सिंगला भी मौकाएवारदात पर पहुंच गए थे.

पुलिस ने नाले में आसपास मृतक के कटे हुए अंग तलाशने की मुहिम शुरू कर दी. पुलिस को यह पता नहीं था कि हत्यारे ने मृतक के शेष अंग वहीं फेंके थे या उन्हें किसी दूसरी जगह ठिकाने लगाया था.

काफी खोजने के बाद भी कटे हुए अंग नहीं मिले. मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने अज्ञात युवक की लाश 72 घंटों के लिए सिविल अस्पताल की मोर्चरी में रखवा दी और अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

अपनी तफ्तीश के पहले चरण में चौकी इंचार्ज बलबीर सिंह ने पिछले दिनों शहर से लापता हुए लोगों की लिस्ट चैक की. लिस्ट में राजिंदर का नाम भी था. चौकी इंचार्ज बलबीर सिंह ने 23 सितंबर को राजिंदर के परिवार वालों को बुलवा कर जब लाश दिखाई तो उस की मां बिशनो और बहन नीलम ने शरीर की बनावट और अंडरवियर से लाश की शिनाख्त राजिंदर के रूप में की.

राजिंदर 19 सितंबर, 2019 को लापता हुआ था और 22 सितंबर को उस की लाश नाले से मिली. चूंकि मां बिशनो ने मोहल्ले के ही अशोक पर शक जताया था, जिस से एक बार पुलिस पूछताछ भी कर चुकी थी. अब लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद चौकी इंचार्ज उसी दिन अशोक को पूछताछ के लिए दोबारा थाने ले आए. इस बार भी वह अपने पहले बयान पर अड़ा रहा. पर जब उस से सख्ती की गई तो उस ने राजिंदर की हत्या करने का अपराध स्वीकार कर लिया.

अगले दिन अशोक को अदालत में पेश कर उस का 4 दिनों का पुलिस रिमांड लिया गया. रिमांड के दौरान सब से पहले उस से पूछा गया कि राजिंदर के शरीर के बाकी अंग उस ने कहां फेंके थे.

24 सितंबर को अशोक की निशानदेही पर पुलिस और नायब तहसीलदार जसकरण सिंह के नेतृत्व वाली टीम ने नाले से मृतक राजिंदर का सिर और बाजू ढूंढ निकाले. इन हिस्सों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया गया और पोस्टमार्टम के बाद लाश उस के घर वालों को सौंप दी गई.

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रिमांड के दौरान अशोक कुमार ने पुलिस को बताया कि बिशनो के पति की मृत्यु के बाद राजिंदर कुमार की मां बिशनो के साथ उस का करीब 7 साल से प्रेम प्रसंग चल रहा था. वह बिशनो से मिलने रोज उस के घर जाया करता था. उस समय राजिंदर और उस की बहन छोटे थे. सो उन्हें कोई रोकनेटोकने वाला नहीं था. जब बच्चे बड़े हुए तो राजिंदर उसे और मां को संदेह की नजरों से देखने लगा था.

वह उस के वहां आने का विरोध करता था. बिशनो के संबंधों का पता अशोक की पत्नी को भी था. इस बात को ले कर वह भी घर में क्लेश करती थी. तब अशोक गुस्से में उस की पिटाई कर देता था. दूसरी ओर राजिंदर के विरोध से अशोक भी काफी परेशान था. वह उसे अपने रास्ते का कांटा समझने लगा था. इस कांटे को रास्ते से हटाने के लिए अशोक कुमार ने राजिंदर की हत्या करने की एक खौफनाक साजिश रच ली.

अपनी योजना के अनुसार, 19 सितंबर की शाम वह राजिंदर से मिला और कोई जरूरी बात करने के बहाने उसे अपने घर ले गया. घर ले जा कर अशोक ने राजिंदर को चाय पिलाई, जिस में नशे की दवा मिली हुई थी. चाय पीते ही राजिंदर एक ओर लुढ़क गया.

राजिंदर के लुढ़कते ही अशोक ने पहले गला दबा कर उस की हत्या की और उस के बाद दातर (हंसिया) से बड़े आराम से उस का सिर काट कर धड़ से अलग किया. फिर दोनों बाजू काटे. यह सब करने के बाद अशोक ने राजिंदर के शव को बोरी में डाल कर बांधा और अपनी साइकिल पर रख कर रात के अंधेरे में हंसली नाले में फेंक आया.

रिमांड के दौरान पुलिस ने अशोक की निशानदेही पर दातर, साइकिल, अपने और राजिंदर के जलाए हुए कपड़ों की राख भी बरामद कर ली. रिमांड अवधि के दौरान पुलिस इस मामले में मृतक की मां बिशनो की भूमिका की भी जांच कर रही है. हालांकि पुलिस ने इस बारे में अभी स्पष्ट खुलासा नहीं किया है.

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राजिंदर की बहन पर भी अशोक बुरी नजर रखता था. अब पुलिस इस बारे में भी जांच कर रही है. अगर कोई बात सामने आती है तो मृतक की मां बिशनो पर भी काररवाई की जाएगी. एक माह पहले अशोक की पत्नी की रहस्यमयी तरीके से मौत हो गई थी. पुलिस इस बात की जांच भी कर रही है कि बिशनो के चक्कर में कहीं अशोक ने ही तो अपनी पत्नी को कोई जहरीली चीज दे कर मारा था.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

40 की उम्र में भी दिखें 20 की

महिलाएं 40 की हों या 20 की, कोशिश करती हैं कि वे हमेशा खूबसूरत दिखें. 20 से 30 की उम्र में तो महिलाएं अपनी खूबसूरती का बखूबी ध्यान रखती हैं. लेकिन 30 के बाद त्वचा और शरीर में बदलाव आने शुरू हो जाते हैं, जैसे चेहरे पर झुर्रियां, आंखों के नीचे डार्क सर्कल्स, चेहरे के रंगों में बदलाव आदि. बहुत सी महिलाएं बढ़ती उम्र की निशानियों को छिपाने के लिए बाहरी कौस्मैटिक्स व सर्जरी का इस्तेमाल करती हैं, जिस से उन की त्वचा पर हानिकारक प्रभाव भी पड़ने शुरू हो जाते हैं. ऐसे में महिलाएं करें तो क्या?

बढ़ती उम्र के साथ बदलाव को तो नहीं रोक सकते लेकिन चेहरे और शरीर पर हो रहे बदलाव को कम करने का प्रयास जरूर कर सकते हैं.

आइए, जानते हैं कुछ ऐसे नुस्खे जो आप की खूबसूरती को 40 में भी बरकरार रखेंगे. आज के समय के अनुसार फैशन और ब्यूटी दोनों ही बहुत जरूरी हैं. हर कोई अपनेआप को बैस्ट दिखाना चाहता है. ऐसे में त्वचा पर झुर्रियां, काले घेरे जैसी समस्या का होना आप की पर्सनैलिटी पर दाग लगा सकता है. इस से नजात पाने के लिए जरूरी नहीं कि आप महंगे ट्रीटमैंट्स या कौस्मैटिक्स का सहारा लें. कुछ घरेलू नुस्खों से इन्हें ठीक किया जा सकता है. मसलन :

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जब हो जाएं झुर्रियां

झुर्रियां बढ़ती उम्र की निशानी होती हैं. यदि आप की उम्र 40 के आसपास है, तो आप को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि कहीं आप के चेहरे पर झुर्रियों की शुरुआत तो नहीं हो रही. चेहरे पर झुर्रियां या झांइयां न पड़ें, इस के लिए विशेष ध्यान रखना जरूरी है. घर से निकलने से पहले सनस्क्रीन लोशन या क्रीम जरूर लगा कर निकलें.

कई बार ज्यादा सन एक्स्पोजर भी झुर्रियों का कारण बन जाता है. त्वचा में नमी का न होना भी झुर्रियों जैसी समस्या पैदा कर देता है. इसलिए समयसमय पर चेहरे को मौइस्चराइज करते रहना चाहिए. कई महिलाओं से इतना सबकुछ मैनेज नहीं हो पाता. उन के लिए बेहतर औप्शन है रसोई. रसोई में कई ऐसी चीजें उपलब्ध होती हैं जो हमारी त्वचा के लिए लाभदायक होती है. अगर आप को झुर्रियों से बचना है तो दूध की मलाई में शहद मिला कर पेस्ट बनाएं, फिर उसे चेहरे पर लगाएं.

जब चेहरे को निखारना हो

चेहरे को निखारने के लिए कई महिलाएं तरहतरह के फेशियल व ब्लीच का इस्तेमाल करती हैं. पर इन के इस्तेमाल से चेहरे पर निखार कुछ ही दिनों के लिए रहता है. पहले के समय में उबटन का इस्तेमाल बहुत किया जाता था. उबटन त्वचा को कोमल और चमकदार बनाने में मददगार होता है. आप घर में उबटन बना कर अपनी त्वचा पर इस्तेमाल कर सकती हैं.

बेसन हर घर की रसोई में प्रयोग होने वाला उत्पाद है. दूध की विशेषताओं को कौन नहीं जानता. दूध ऐसा पदार्थ है जो शरीर के लिए बहुत लाभदायक माना जाता है. बढ़ती उम्र की निशानियों को कम करने और त्वचा पर प्राकृतिक निखार लाने के लिए इन दोनों का प्रयोग अधिक किया जाता है. जहां एक ओर बेसन आप की त्वचा में कसाव लाने का काम करता है, वहीं दूध उसे साफ करने में मदद करता है. यदि आप के चेहरे पर भी बढ़ती उम्र की निशानियां दिखने लगी हैं तो बेसन और दूध के उबटन का प्रयोग करना शुरू कर दें. यह आप की स्किन को जवान दिखाने में भी मदद करेगा.

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डार्क सर्कल्स में टमाटर है मददगार

टमाटर में मौजूद विटामिन सी त्वचा की रंगत निखारने में मदद करता है. इस में मौजूद गुण आप के चहरे से झुर्रियां और डार्क सर्कल्स को खत्म करने में भी मदद करते हैं. 40 के बाद अकसर महिलाओं की आंखों के नीचे डार्क सर्कल्स आने लगते हैं. जो न केवल आप की पर्सनैलिटी पर प्रभाव डालते हैं, आप की उम्र को बढ़ाने में सहयोग भी करते हैं. यदि आप की आंखों के नीचे भी डार्क सर्कल्स हैं और चेहरे पर दागधब्बे आने लगे हैं तो अपने चेहरे पर टमाटर का प्रयोग करना शुरू कर दें. ये आप की स्किन और आप की हैल्थ दोनों के लिए बहुत लाभकारी रहेगा. बेहतर होगा आप इसे अपने खाने मे भी शामिल करना शुरू कर दें.

ब्लैकहैड्स से पाएं नजात

चेहरे पर दागधब्बे बहुत बेकार लगते हैं, खासकर नाक और लिप्स के आसपास जब ब्लैकहैड्स और व्हाइटहैड्स जैसी समस्या हो जाए. ब्लैकहैड्स के लिए अंडे का इस्तेमाल सब से बेहतर उपाय है.

ब्लैकहैड्स को हटाने के लिए आप अंडे के सफेद हिस्से को एक मास्क की तरह इस्तेमाल कर सकती हैं. यह त्वचा को बिना नुकसान पहुंचाए ब्लैकहैड्स निकालने में मदद करता है और त्वचा को मुलायम बनाता है.

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ब्रैंडेड हों ब्यूटी प्रोडक्ट्स

महिलाओं को ब्यूटी प्रोडक्ट्स से अधिक प्यार होता है. महिलाएं चाहे कितने भी घरेलू नुस्खे अपना लें, ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करना बंद नहीं करतीं. कोई न कोई ऐसा ब्यूटी प्रोडक्ट होता ही है जिस का इस्तेमाल महिलाएं हमेशा करती हैं. ब्यूटी प्रोडक्ट्स हमेशा ब्रैंडेड ही खरीदें. कई बार महिलाएं पैसा बचाने के चक्कर में सस्ते के फेर में फंस जाती हैं और लोकल ब्यूटी प्रोडक्ट्स खरीद लेती हैं. ऐसे में चेहरे पर तमाम तरह की त्वचा से संबंधित परेशानियां शुरू हो जाती हैं. आप को खूबसूरत दिखना हो या सौंदर्य उपचार करना हो, हमेशा ब्रैंडेड प्रोडक्ट्स का ही इस्तेमाल करें.

खेती के लिए खास जीवाणु खाद

आज के समय में खेती  की पैदावार बढ़ाने के लिए कैमिकल खादों और दवाओं का जम कर इस्तेमाल किया जाता है, जिस से दिनप्रतिदिन खेत की मिट्टी की सेहत खराब हो रही है और पर्यावरण को भी अच्छाखासा नुकसान पहुंच रहा है.

दवाओं और कैमिकल खादों के इस्तेमाल से आबोहवा को जहरीली होने से बचाने के लिए सुरक्षित और स्वस्थ भोजन की बढ़ती मांग को ध्यान में रखते हुए जैविक खेती एक खास विकल्प के रूप में उभरी है.

ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत की केवल 30 फीसदी खेती लायक जमीन में, जहां सिंचाई के साधन मुहैया हैं, कैमिकल खादों का उपयोग होता है और बाकी 70 फीसदी जमीन में जो कि बारिश पर निर्भर है, बहुत कम मात्रा में कैमिकल खाद उपयोग की जाती है.

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इन इलाकों में किसान जैविक खादों का उपयोग करते हैं, जो कि उन के अपने खेत या अपने घरेलू संसाधनों से मिलते हैं या उन के इलाकों में मौजूद होते हैं.

जीवाणु खाद जैविक खेती का एक अहम हिस्सा है. जीवाणु खाद एक विशेष या लाभदायक जीवाणुओं के समूह की बड़ी आबादी है, लाखों की तादाद में इन को एक खास तरीके में मिलाया जाता है, जिन्हें पौधों की जड़ों पर या मिट्टी में डालने से इन की क्रियाओं द्वारा पोषक तत्त्व पौधों को आसानी से मिल जाते हैं और जमीन में जरूरी जीवाणुओं की तादाद बढ़ती है. इस से जमीन की सेहत में सुधार होता है और खेती के लिए अनेक फायदेमंद जरूरी तत्त्वों में सुधार करता है.

खेती में पौधों की पैदावार बढ़ाने में यह सहायक होता है. इस के अलावा माइकोराजा, फास्फेट, जिंक और तांबे की उपलब्धता और शोषित करने में सुधार करती है.

कहने का मतलब यह है कि खेत को यह उपजाऊ बनाता?है और जो खेती को नुकसान पहुंचाने वाले तत्त्व हैं, उन का सफाया करता है.

पोषक तत्त्वों की मौजूदगी के मुताबिक ही जीवाणु खाद को 3 कैटीगरी में बांटा गया?है. जैसे कि नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम.

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अघुलनशील जिंक को घुलनशील जिंक में बदलने वाले जीवाणुओं को भी जीवाणु खाद की कैटीगरी में रखा गया है. जीवाणु जो कि जीवाणु खाद या?टीके के?रूप में इस्तेमाल किए जाते?हैं, एक विशेष माध्यम में मिलाए जाते?हैं और जीवाणु खाद/टीका, पाउडर या तरल अवस्था में होती है. पाउडर जीवाणु खाद के लिए अधिकतर लिग्नाइट, कोयला पाउडर या पीट माध्यम का उपयोग किया जाता है. तरल जीवाणु खाद हमेशा निलंबित माध्यम में होती?है, जो कि जीवाणुरहित प्लास्टिक बोतलों में पैक की जाती?है.

टीके की मात्रा : 10 किलोग्राम बीज के लिए एक टीका (50 मिलीलिटर) काफी है. यदि 1 एकड़ जमीन में बीज की मात्रा 10 किलोग्राम है तो प्रति 10 किलोग्राम बीज के लिए एक टीके का इस्तेमाल करें और यदि बीज की मात्रा 1 एकड़ के लिए 10 किलोग्राम से कम है, तब भी एक टीका लगाना चाहिए.

गेहूं के लिए 4-5, धान के लिए 5 और आलू जैसी फसलों के लिए 10 एजोटीका की जरूरत होती है. फास्फोटीका की जरूरत भी इसी मात्रा में होती है.

इसी प्रकार दलहनी फसलों में बीज की मात्रा के मुताबिक जितने राइजोटीका की जरूरत होती है, उतने ही फास्फोटीका की जरूरत होती है.

यदि गेहूं में मोल्या रोग की शिकायत है, तो इस में फास्फोटीका के साथ बायोटीका (एजोटोबैक्टर एचटी 54) लगाना जरूरी है. इस में अलग से एजोटीका लगाने की जरूरत नहीं है.

यदि कपास में जड़ गांठ रोग है, तो इस में एजोटीका और फास्फोटीका के साथ बायोटीका (ग्लूकोनोअसिटोबैक्टर 35-47) लगाना जरूरी है.

टीका उपचारित करने का तरीका : बीजोपचार के लिए 50 ग्राम गुड़ को 250 मिलीलिटर पानी में घोल कर बीजों पर डालें और बीजों को चिपचिपा कर लें. अब टीके की बोतल खोल कर बीजों पर डालें और बीजों को अच्छे से मिलाएं. इन उपचारित बीजों को छाया में सुखा कर बीजाई कर दें.

अगर किसी कीटनाशक दवा का इस्तेमाल करना हो तो उस दवा को 12 से ले कर 24 घंटे पहले इस्तेमाल कर के बीजों को टीके से उपचार करें. जिन फसलों की रोपाई की जाती है, उन की रोपाई करने से पहले पौधों की जड़ों को टीके में डुबो कर उपचारित किया जा सकता है.

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जीवाणु खाद/टीके के लाभ

* जीवाणु खाद या टीका लगाने से पौधे स्वस्थ रहते?हैं और 5-15 फीसदी तक पैदावार में बढ़ोतरी होती है.

* एजोटीका के लगाने से 20-25 फीसदी तक यूरिया की बचत की जा सकती?है.

* एजोटीका के जीवाणु जड़ों द्वारा फैलने वाले फफूंदी जैसे पादपीय रोगों को फैलने से रोकते हैं.

* टीका उपचारित करने से बीजों की अंकुरण क्षमता तेज हो जाती है.

* प्राकृतिक रूप से क्षारीय मिट्टी में फास्फोटीका और फास्फेट के संयुक्त उपचार से फसल पर लाभकारी असर होता है.

सावधानियां

जीवाणु खाद या टीका प्रयोग करते समय इन सावधानियों का ध्यान रखना चाहिए:

* टीके को धूप में नहीं रखना चाहिए.

* टीके को अगर ज्यादा समय तक रखना हो तो?फ्रिज में या?ठंडी जगह पर रखें.

* टीका खरीदते समय यह ध्यान रखें कि यह 2 या 3 महीने से ज्यादा पुराना न हो.

* टीका उसी फसल के लिए प्रयोग करें, जो टीके की बोतल पर लिखी हो.

* उपचारित बीज को छाया में सुखा कर शीघ्र बीजाई कर दें. टीका उसी दिन लगाएं, जिस दिन बीजाई करनी हो.

ज्यादा जानकारी के लिए किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों से भी सलाह ले सकते हैं.

(यह जानकारी हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय से मिली जानकारी के अनुसार दी गई है.) 

धर्म की कैद में स्त्रियां

हिंदुओं के आदर्श कृष्ण की अर्धांगिनी सत्यभामा ने एक बार द्रौपदी से सवाल किया, ‘‘हे द्रौपदी, कैसे तुम अति बलशाली पांडुपुत्रों पर शासन करती हो? वे कैसे तुम्हारे आज्ञाकारी हैं तथा तुम से कभी नाराज नहीं होते? तुम्हारी इच्छाओं के पालन हेतु सदैव तत्पर रहते हैं? मु झे इस का कारण बताओ.’’

द्रौपदी ने उत्तर दिया, ‘‘हे सत्यभामा, पांडुपुत्रों के प्रति मेरे व्यवहार को सुनो. मैं अपनी इच्छा, वासना तथा अहंकार को वश में कर अति श्रद्धा व भक्ति से उन की सेवा करती हूं. मैं किसी अहंकार भावना से उन के साथ व्यवहार नहीं करती. मैं बुरा और असत्य भाषण नहीं करती. मेरा हृदय कभी किसी सुंदर युवक, धनवान या आकर्षक पर मोहित नहीं होता. मैं कभी स्नान नहीं करती, खाती अथवा सोती हूं जब तक कि मेरे पति स्नान नहीं कर लेते, खा लेते अथवा सो जाते हैं. जब कभी भी मेरे पति क्षेत्र से, वन से या नगर से लौटते हैं, तो मैं उसी समय उठ जाती हूं, उन का स्वागत करती हूं और जलपान कराती हूं.

‘‘मैं अपने घर के सामान तथा भोजन को हमेशा साफ व क्रम से रखती हूं. सावधानी से भोजन बनाती हूं और ठीक समय पर परोसती हूं. मैं कभी भी कठोर शब्द नहीं बोलती. कभी भी बुरी स्त्रियों का अनुसरण नहीं करती. मैं वही करती हूं जो मेरे पतियों को रुचिकर और सुखकर लगता है. कभी भी आलस्य या सुस्ती नहीं दिखाती. बिना विनोदावसर के नहीं हंसती. मैं दरवाजे पर बैठ कर समय बरबाद नहीं करती. मैं क्रीड़ा उद्यान में व्यर्थ नहीं ठहरती. मु झे अन्य काम करने होते हैं. जोरजोर से हंसना, भावुकता तथा अन्य इसी प्रकार की अप्रिय लगने वाली वस्तुओं से अपनेआप को बचाती हूं और पतिसेवा में रत रहती हूं.

‘‘पतिविछोह मु झे कभी नहीं सुहाता. जब कभी मेरे पति मु झे छोड़ कर बाहर जाते हैं, तो मैं सुगंधित पुष्पों तथा अंगराग का प्रयोग न कर कठोर तपस्या में जीवन बिताती हूं. मेरी रुचिअरुचि, मेरे पति की रुचिअरुचि ही है और उन्हीं की आवश्यकतानुसार अपना समायोग करती हूं. मैं तनमन से अपने पति की भलाई चाहती हूं. मैं उन वक्तव्यों का हूबहू पालन करती हूं जो कि मेरी सास ने संबंधियों, अतिथियों, दान आदि के बारे में बतलाए थे.’’

द्रौपदी के अनुसार, ‘‘नारी का सर्वोतम गुण है पति व सास की सेवा और उन की सभी आज्ञाओं का पालन करना और उस के बदले कुछ पाने की इच्छा न रखना. पति स्त्री का ईश्वर है. वही उस का एकमात्र शरणालय है. पति के अलावा स्त्री के लिए और कहीं शरण नहीं है. ऐसी दशा में एक पत्नी वह कार्य कैसे कर सकती है जो उस के पति को अप्रिय व अरुचिकर लगे. वह अपने गुरु की भी सेवा बहुत ही नम्रता से करती है और इसलिए उस के पति उस से बहुत प्रसन्न रहते हैं. वह सुबह सब से पहले उठती है और सब से बाद में सोती है.’’

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हिंदू धर्म के अनुसार, हरेक नारी को ऐसे ही जीवन बिताना चाहिए. स्त्रियों को भौतिक प्रभाव से दूर रहना चाहिए. एक व्यसनी, विलासी नारी सच्ची स्वाधीनता को नहीं सम झती. यत्रतत्र घूमना, कर्तव्यहीन बनना, मनचाहा सबकुछ करना, सबकुछ खानापीना, मोटर दौड़ाना अथवा पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करना आजादी नहीं है. सतीत्व, स्त्री का सर्वोत्तम अलंकार है. सतीत्व की सीमा पार करने, पुरुषों की तरह व्यवहार करने से नारी अपनी कोमलता, बुद्धिमता, प्रताप तथा सुंदरता का नाश कर देती है. इस का यह मतलब कि एक औरत को हर प्रकार से अपने पति की आज्ञाकारी होना ही चाहिए, धर्म पर चलना चाहिए, तभी उस का प्रताप, तेज तथा पतिव्रतधर्म और ज्यादा उज्ज्वल होगा.

यहां सारे धर्म स्त्री के लिए बतलाए गए हैं. पुरुष के लिए एक भी धर्म का जिक्र नहीं हुआ है. यहां यह नहीं बतलाया गया कि एक ब्याहता पुरुष को किस मर्यादा में रहना चाहिए. क्या सारी मर्यादाएं, संस्कार सिर्फ औरतों के लिए ही हैं?

गीता प्रैस, गोरखपुर ने भी नारी धर्म, स्त्री के लिए कर्तव्य दीक्षा, भक्ति नारी, नारी शिक्षा, दांपत्य जीवन के आदर्श, गृहस्थी में कैसे रहें जैसे विषयों पर अपनी पुस्तिका का एक पूरा अंक छापा था. उस में स्त्रियों की पवित्रता पर जोर दिया गया है. उस में बतलाया गया है कि दांपत्य जीवन में क्या करना चाहिए. शादी के वक्त क्या करना चाहिए, आभूषण पहनना चाहिए या नहीं, पति के साथ कब संभोग करना चाहिए, गर्भावस्था के दौरान महिलाओं का व्यवहार कैसा होना चाहिए, विधवाओं का व्यवहार कैसा होना चाहिए. महिलाओं का सब से महत्त्वपूर्ण धर्म है अपने पति के प्रति वफादार रहना. महिला की जिंदगी का मकसद होना चाहिए कि पति खुश रहे. यह पुस्तिका लाखों घरों तक पहुंची थी और लोगों की सोच पर व्यापक असर भी हुआ था.

1920 के दशक में सनातन धर्म की मुख्य सोच थी कि हिंदू धर्म खतरे में है और यह खतरा इसलाम और अंगरेजों के आने से शुरू हुआ, नहीं तो हिंदू धर्म हर क्षेत्र में अव्वल था. सोच है कि इसलाम और अंगरेजों के भारत आने के बाद हिंदू सभ्यता भ्रष्ट हो गई और जरूरत है उसी पुराने समय में जाने की जब हिंदू समाज चरम पर था. यानी पुरुष का काम है बाहर जा कर शिक्षा ग्रहण करना, पैसे कमाना और औरतों का काम है घर में रह कर बच्चे पैदा करना, पति व सासससुर की सेवा करना. जब पति घर लौटे तो स्त्री का कर्तव्य है धर्मग्रंथों के माध्यम से उस के चित्त को पवित्र करना. स्त्री को भीतरी दुनिया की रानी बताया गया है जो बेहद कठिन और निराशाजनक व चुनौतियों से भरी हुई थी.

महिला कैद, पुरुष आजाद

गीता प्रैस के प्रकाशन ‘कल्याण’ के विशेषांकों को पढ़ें, तो साफ है कि महिला से जुड़े हर मुद्दे पर पुरुष की सोच हावी दिखती है. वह क्या खाएगी, क्या पहनेगी, कहां जाएगी, कितना हंसेगी, किस से बात करेगी, किस से नहीं, मासिकधर्म के वक्त औरतों को कैसे रहना चाहिए, आदि. चाहे पति अत्याचारी हो या किसी दूसरी महिला का बलात्कार करता हो, पत्नी को वह एक बुरा सपना सम झ कर भूल जाना चाहिए. नारी धर्म को ले कर गीता प्रैस में छपा वह अंक आज भी कहीं न कहीं लोगों की नजरों में दिखता है.

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उस अंक के लेखों को ले कर महिला अधिकारी, कार्यकर्ता, कविता कृष्णन कहती हैं, ‘‘चाहे वह हिंदू स्त्री हो या मुसलिम, पुरुष के बीच का प्रेम या दोस्ती हो, या भारतीय महिलाओं की मां और पत्नी को ले कर सोच हो, घरेलू हिंसा का मामला हो, आज भी उन में यह दिखता है. इस में कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि गीता प्रैस ने हिटलर की उस अपील को भी छापा जिस में स्त्री को पत्नी और मां की भूमिका तक ही सीमित रखने की बात कही गईर् थी. हिटलर के युग में औरतों को मां और पत्नी के रूप में ही रखा गया था. उन्हें पार्टी में पद नहीं दिए गए. वे बच्चे पैदा करने के लिए ही थीं. ऐसी नाजी पार्टी की सोच थी.

हम सभी जानते हैं कि द्रौपदी के5 पति थे और एकएक वर्ष के अंतराल से उस ने पांचों पांडवों के एकएक पुत्र को जन्म दिया. उस ने पत्नी होने के हर धर्म को निभाया. लेकिन फिर भी पांडुपुत्रों ने दूसरा ब्याह किया द्रौपदी के होते हुए भी. तो फिर उन का धर्म कहां गया? जब एक पति होते हुए पत्नी परपुरुष की ओर आकर्षित नहीं हो सकती, फिर पुरुष क्यों? क्या उन का कोई धर्म नहीं है अपनी पत्नी के प्रति?

स्त्रियों से उम्मीद की जाती है कि वे पतिपरायण बनी रहें. न चाहते हुए भी पति के परिवार की लंबी उम्र के लिए व्रतउपवास करें. उन के हर अच्छेबुरे व्यवहार को बरदाश्त करें, साथ ही, परपुरुषों के आकर्षण से दूर रहें. लेकिन पुरुषों के लिए ऐसा कोई उपदेश क्यों नहीं है?

सदियों से स्त्री को कोमलांगी मान कर उसे दोयम दर्जे की सम झा जाता रहा है. यही वजह है कि प्राचीन काल से ले कर आज 21वीं सदी में भी उस पर अत्याचार कम नहीं हुए हैं. उस पर अत्याचार का सब से घिनौना रूप है उस के स्वाभिमान को कुचल कर उसे धर्म के अंधकार में धकेल देना ताकि वह पुरुष की आजादी में हस्तक्षेप न करे. आज स्थिति यह है कि महिला उस धर्म में कैद हो कर रह गई है. वह उस से निकलना चाहती है, पर समाज व परिवार की सोच ने उस की सोच पर मिट्टी डाल रखी है. अशिक्षित ही नहीं, आज पढ़ीलिखी महिलाएं भी धर्म के जंजाल से निकल नहीं पा रही हैं. सच कहें तो सीता, द्रौपदी, अनुसूया, सावित्री आदि पतिपरायण नारियां, आज की स्त्रियों का कोई भला नहीं कर गईं, उलटे, उन्हें कैदभरा रूढि़गत जीवन ही प्रदान किया है, उन की विचारक्षमता को गुलाम बनाया है.

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लड़कियों की बेचारगी

वंशिका पढ़ीलिखी, सुंदर और आत्मनिर्भर लड़की है और एक मल्टीनैशनल कंपनी में बड़ी पोस्ट पर कार्यरत है. शादी उस की अपनी पसंद के लड़के से होने जा रही है. लेकिन यह सुन कर मु झे हैरानी हुई कि आज की सोच रखने वाली वंशिका व्रतउपवास में भी विश्वास रखती हैं. उस ने अपने होने वाले पति के लिए पूरे दिन भूखीप्यासी रह कर करवाचौथ का व्रत रखा, शाम को चांद और होने वाले पति का मुखड़ा देखने के बाद ही उस ने अन्नजल ग्रहण किया.

पूछने पर कि वह तो पढ़ीलिखी, आज की सोच रखने वाली लड़की है, तो फिर इन सब पर कैसे विश्वास करती है, वह बोली, ‘‘पति की सलामती और उन की लंबी आयु के लिए सारी औरतें व्रत रखती हैं मेरी ससुराल में, तो मु झे भी रखना पड़ा, और वैसे भी, शादी के बाद तो रखना ही है.’’

‘रखना पड़ा?’ यानी कि उस की अपनी मरजी नहीं है, फिर भी करना पड़ा? सच में लड़कियों को वही करना पड़ता है जिस में लोगों की खुशी हो. पर अपनी खुशी का क्या? आखिर क्यों वह अतार्किक विधिविधानों को चुपचाप सह रही है? एक तरफ तो उस ने औरतों के लिए बनाए बंधनों को तोड़ कर घर की दहलीज लांघ, बाहर रह कर ऊंची पढ़ाई की और आज एक बड़ी कंपनी में अच्छी पोस्ट पर है. शादी भी वह अपनी पसंद के ही लड़के से करने जा रही है. फिर वह पूजापाठ, व्रतउपवास जैसे बंधनों में क्यों बंध गई? क्या यह सब वह अपनी मरजी से कर रही है या सामाजिक दबाव उस पर इतना ज्यादा है कि अनेक स्तरों पर आजाद और पौजिटिव सोच रखने वाली महिला इस से बाहर नहीं निकल पा रही है?

खुद को जकड़न में डालना

प्रज्ञान की पत्नी को डाक्टर ने सख्ततौर पर व्रतउपवास करने को मना किया है, क्योंकि वह बीपी की समस्या के साथसाथ गैस की समस्या से भी ग्रस्त है. लेकिन वह किसी की नहीं सुनती. उसी तरह व्रतपूजापाठ में लगी रहती है. कभी तीज, कभी एकादशी, कभी पूर्णिमा जैसे व्रत होते ही रहते हैं उस के. उस का मानना है कि अगर वह पूजापाठ, व्रतउपवास करना छोड़ देगी, तो उस के भगवान नाराज हो जाएंगे और उस के परिवार पर दुख के काले बादल मंडराने लगेंगे. सवाल है कि क्या ऐसा भगवान, यदि कहीं हो तो, ने खुद कहा आ कर उस से कि अगर वह पूजाउपवास नहीं करेगी, तो वे उस से नाराज हो कर उस के पतिबच्चे को गायब कर देंगे?

धर्म ऐसी अफीम है जिसे महिलाओं को बचपन से ही चटाया जाता है. कौन नहीं जानता कि आज धर्म के नाम पर महिलाओं का कितना शोषण हो रहा है, लेकिन फिर भी वे उस में फंसती जाती हैं. पुरुषों को नहीं पता होता कि आखिर उन के शास्त्रों में क्या वर्णित है और क्या नहीं. महिलाएं जो अपने गुरुबाबाओं से सुनती हैं, उसे ही धर्म मान कर उस का अनुसरण करने लगती हैं.

समाज औरतों के लिए हमेशा से ही पक्षपाती रहा है. औरतों की आजादी से डराघबराया पितृसत्तात्मक समाज औरतों को अपने नियंत्रण से बाहर जाने नहीं देना चाहता है. इसलिए उस पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए वह धर्म का बखूबी इस्तेमाल करता है. औरतों को डराए रखने के लिए धर्म ही सब से मजबूत व आसान जरिया है. जब सवाल औरतों की नैतिकता, उन की शारीरिक इच्छा का हो, तो नियंत्रण और अधिक बढ़ जाता है. पितृसत्तात्मक समाज में इस की शुरुआत कब हुई, इस के बारे में ठीक तरह से तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन महिलाओं के व्रत रखने का कारण उस के हमेशा आश्रय में रहने की स्थिति को बयां करता है.

वशिष्ठ धर्मसूत्र में लिखा है- ‘पिता रक्षति कौमारे, भ्राता रक्षति यौवने, रक्षति स्थविरे पुत्रा, न स्त्री स्वातंत्रमहर्ति.’ इस का अर्थ है कि कुमारी अवस्था में नारी की रक्षा पिता करेंगे, यौवन में पति और बुढ़ापे में पुत्र. नारी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है. पिता, पति, बेटा आश्रय के रूप में बदलते हैं. औरत को शुरू से ही बतलाया गया है कि उसे किसी के सहारे ही अपना जीवन व्यतीत करना है. और उन के सहारे की भी जिम्मेदारी स्त्री की है, इसलिए वह अपने पति, पुत्र की लंबी उम्र की कामना भगवान से करती है. पितृसत्तात्मक सोच ने यहां महिलाओं को यह सम झाया है कि वे भले ही व्रत उन के लिए करती हैं लेकिन असल में स्वार्थ उन का ही है क्योंकि वे खुद बेसहारा नहीं होना चाहती हैं.

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डर के घेरे में

तीज, करवाचौथ, छठ, सप्तमी आदि सारे व्रत महिलाएं पति और बेटे की सलामती व उन की लंबी आयु के लिए रखती हैं. एक व्रत तो ऐसा भी है जिस में औरतें रुई के गद्दे पर नहीं सो सकतीं, वरना महापाप लग जाएगा. नवरात्र में कन्यापूजन का विधान है. माना जाता है कि वह देवी का रूप है. मगर आज उसी देवीरूपी कन्या के साथ क्याक्या हो रहा है, यह सभी जानते हैं. दिल्ली, कठुआ, उन्नाव, अलवर, हैदराबाद, बक्सर और अलीगढ़ जैसी बलात्कार की घटनाएं इस बात की गवाह हैं कि देवी समान महिलाएं आज किसी भी उम्र में सुरक्षित नहीं हैं. हैवानियतभरा कृत्य कर आज उसी देवीरूपी जिस्म की हत्या कर दी जा रही है.

और तो और, महिलाओं के मनमस्तिष्क में यह भर दिया जाता है कि अगर गलती से भी उस ने तीज या करवाचौथ के दिन पानी पी लिया तो पाप हो जाएगा. उसे अगले जन्म में इस की सजा भुगतनी पड़ेगी. जैसे, दूध पी लिया तो नागिन बन जाएगी, पानी पी लिया तो जोंक, मिठाई खा ली तो चींटी, दही खा लिया तो बिल्ली, फल खाया तो बंदरिया, और अगर कहीं गलती से नींद आ गई, तो अजगर तो बनेगी ही बनेगी. फिल्मों और टीवी सीरियल्स में भी पति की लंबी उम्र के लिए रखे जाने वाले व्रतों को खूब दर्शाया जाता है और इतना कि एक व्रत को पूरा होतेहोते 2-3 एपिसोड्स निकल जाते हैं.

करवाचौथ या तीज जैसे व्रत रखने से क्या वाकई पति की उम्र लंबी हो जाती है? अगर ऐसा है तो फिर पत्नी की लंबी उम्र के लिए पति क्यों नहीं रखते व्रत? क्या उन्हें पूरी जिंदगी अपनी पत्नी का साथ नहीं चाहिए? लेकिन दुख की बात तो यह है कि इन कर्मकांडों में महिलाएं भी बढ़चढ़ कर भाग लेती हैं. अगर कुछ सम झाओ, तो कहेंगी, ‘‘चुप रहो, ज्यादा नास्तिक मत बनो. अब क्या हम अपने संस्कार भी भूल जाएं?’’ ऐसा कह कर वे सामने वाले को ही चुप करा देती हैं.

औरतों के साथ अगर अन्याय भी होता है तो वे अन्याय करने वाले को नहीं, बल्कि अपने प्रति होने वाले अन्याय को भी वे भगवान की पूजा और श्रद्धा में अपनी कमी या खामी मान कर खुद को जिम्मेदार ठहरा लेती हैं. उन्हें लगता है शायद उन की पूजा में ही कोई त्रुटि रह गई होगी और इसलिए उन्हें इतना दुख भोगना पड़ रहा है. घरपरिवार में शुरू से ही महिलाओं की स्थिति दूसरे दर्जें की और पुरुष की श्रेष्ठ रही है. औरतें खुद पति को अपना मालिक मानती हैं, जबकि पतिपत्नी का रिश्ता बराबरी का होता है. चाहे पति कितना भी मारेपीटे, कष्ट दे, चाहे पति जीवन को नर्क सा ही क्यों न बना दे, पर वह देवता है, उस की मांग का ताज है.

पति का मारना धर्म, पत्नी का सहना धर्म

मनुस्मृति में लिखा है, ‘जहां स्त्रियों का आदर किया जाता है, वहां देवता रमण करते हैं और जहां इन का अनादर होता है, वहां सब कार्य निष्फल होते हैं.’ यह बात आज नहीं, सदियों पहले वैदिककाल में कही गई थी. तब से आज तक मानव समाज के सांस्कृतिक और बौद्धिक स्तर में काफी विकास हुआ है. लेकिन नारी की स्थिति में कुछ खास अंतर नहीं आया. इस का अंदाजा इस से भी लगाया जा सकता है. कि आज भी मां सरस्वती, दुर्गा, काली, लक्ष्मी आदि देवी मां की आराधना धूमधाम से की जाती है. लेकिन, महिलाओं के प्रति संकीर्ण मानसिकता रखने वाले लोगों की सोच उन की जबान पर कभीकभी आती ही रहती है.

हिंदू धर्म में औरत को देवी का दर्जा दिया गया है. लेकिन आज कितनी ऐसी देवियां हैं जो रोज अपने पति के हाथों पिटती हैं, जलील होती हैं, पर उफ्फ तक नहीं करतीं, क्योंकि पति का मारनापीटना धर्म है और उनका सहना.

मीनाक्षी का पति आएदिन शराब पी कर उसे मारतापीटता है, जलील करता है. एक बार तो उस ने उसे जलाने की भी कोशिश की थी. पड़ोसी सब जानते हैं, पर कुछ नहीं कहते और न ही मार खाते हुए मीनाक्षी को बचाने जाते हैं, क्योंकि मीनाक्षी का कहना है कि वह उस का पति है, चाहे जो करे. लोगों को बीच में पड़ने की कोई जरूरत नहीं है. और अगर वह पति के हाथों मर भी गई, तो भी उस का जीवन सफल ही होगा.

गौशाला में सोने को मजबूर

कुल्लूमनाली ऐसी जगह है जहां दुनियाभर के पर्यटक आते हैं और वहां की खूबसूरत वादियों का मजा लेते हैं. लेकिन कुल्लू की एक दूसरी तसवीर भी है. कुल्लू के पहाड़ों में बसे गांव में बहुत सी औरतें मासिकधर्म के दौरान गौशाला में सोती हैं. उसी गांव की रहने वाली बिमला देवी एक बच्चे की मां है. वह कहती है कि मासिकधर्म के वक्त वह अपने घर के भीतर कदम भी नहीं रख सकती. बच्चे और पति से अलग, घर के बाहर गौशाला में सोती है. जबकि परिवार से अलग गोबर की गंध के  बीच उसे सोना पसंद नहीं है, लेकिन उस के पास दूसरा चारा नहीं है. वह बताती है कि मासिकधर्म के समय वह किसी को छू भी नहीं सकती, क्योंकि उन दिनों औरतों को गंदा माना जाता है. अकेले रहना पड़ता है तो अजीब लगता है. वहीं, बीए पास प्रीता को भी इस प्रथा का सामना करना पड़ा था. वह कहती है, ‘‘ये पुराने रीतिरिवाज हैं जिन का पालन करना ही पड़ेगा, वरना देवता गुस्सा हो जाएंगे.’’ कुछ लोगों का विश्वास है कि उन दिनों अगर औरत घर के अंदर चली गई तो देवता रुष्ट हो जाएंगे और वे अपने देवता को नाराज नहीं करना चाहती हैं. यह सब औरतों के साथ अन्याय नहीं, तो और क्या है?

प्रकृति ने जब सभी प्राणियों को एकसमान और स्वतंत्र बनाया है, तो फिर स्त्रियां ही धर्मसंस्कारों में कैद क्यों हैं? न तो वे अपनी मरजी से खुली हवा में सांस ले सकती हैं और न ही सामाजिक बंधनों को तोड़ सकती हैं. ऐसे में फिर शिक्षा का क्या फायदा? महिलाओं की भावनाएं समाज के अंधविश्वासों व मान्यताओं के बो झ तले दब जाती हैं और उन का मस्तिष्क कई तरह के ज्ञानविज्ञान से वंचित रह जाता है.

धर्मरूपी जेल

पुराने समय में पुरुष के साथ चलने वाली नारियां, मध्यकाल में पुरुष की संपत्ति की तरह सम झी जाने लगीं. इसी सोच के चलते नारियों की स्वतंत्रता खत्म हो गई. नए काल में जन्मे तथाकथित धर्मों ने नारी को धार्मिक तौर पर दबाना और उन का शोषण करना शुरू कर दिया. धर्म और समाज के जंगली कानून ने नारी को पुरुष से नीचा और निम्न घोषित कर उसे उपभोग की वस्तु बना कर रख दिया. वैदिक युग की नारी धीरेधीरे अपने दैवीय पद से नीचे खिसक कर मध्यकाल के सामंतवादी युग में दुर्बल हो कर शोषण का शिकार होने लगी.

तथाकथित मध्यकालीन धर्म द्वारा नारी को पुरुषों पर निर्भर बनाने के लिए उसे सामूहिक रूप से पतित अनाधिकारी बताया गया. उस के मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लगा कर पुरुषों को हर जगह बेहतर बता कर नारी की अवचेतना शक्तिविहीन होने का एहसास जगाया जिस से उसे आसानी से विधाहीन, साहसहीन कर दिया जाए. ताकि, वह अपने जीवनयापन, इज्जत और आत्मरक्षा के लिए पुरुष पर निर्भर हो जाए.

लेकिन, क्या एक औरत को सम्मान से अपने अनुसार जीने का हक नहीं है? क्यों हमेशा उन पर अपनी मरजी थोपी जाती है? कभी धर्म के नाम पर, कभी बेटा पैदा करने के लिए, तो कभी दहेज के लिए उसे शोषित किया जाता है. कहते हैं, औरत घर की लक्ष्मी होती है. लेकिन दूसरी तरफ परंपराओं के नाम पर, धर्म के नाम पर, मानमर्यादाओं के नाम पर औरत के अस्तित्व को घर के अंदर कैद कर लिया गया है.

एक औरत को अपने पति की सेवा, जिसे उस का परमेश्वर कहा जाता है, निस्वार्थ भाव से करनी चाहिए, तभी उसे तथाकथित स्वर्ग मिलता है. पर जब बात नारी के सम्मान की आती है, तब ‘वह तो नारी का कर्तव्य है’ कह कर बात खत्म कर दी जाती है. डर है समाज को कि कहीं औरतें अधिक आगे बढ़ गईं, तो पुरुषों का क्या होगा? इसलिए वे उसे धर्मरूपी जेल में कैद कर के रखना चाहते हैं.

व्रतउपवास, पूजापाठ, धर्मकर्म करने के लिए साधुबाबा महिलाओं का ब्रेनवाश करते हैं. महिलाओं से भेदभाव किया जाता है. केरल के सब से प्रसिद्ध और विवादित सबरीमाला मंदिर में औरतों को प्रवेश की अनुमति मिल तो गई लेकिन भारत का यह एकलौता मंदिर नहीं था जहां महिलाओं का जाना वर्जित है, बल्कि और भी ऐसे द्वार हैं जहां महिलाओं के साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाता है.

मध्य प्रदेश राज्य के गुना शहर स्थित जैन धर्म के प्रसिद्ध तीर्थस्थल ‘मुक्तागिरी’ तीर्थ में कोई भी महिला पाश्चात्य परिधान पहन कर प्रवेश नहीं कर सकती. राजस्थान के प्रसिद्ध तीर्थस्थल पुष्कर में स्थित कार्तिकेय मंदिर में महिलाओं का जाना मना है.

दक्षिण दिल्ली में स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया का मकबरा सूफी काल की एक पवित्र दरगाह है. इस दरगाह में औरतों का प्रवेश निषेध है. दिल्ली की जामा मसजिद भारत की सब से बड़ी मसजिदों में से एक है. इस मसजिद में सूर्यास्त के बाद महिलाएं नहीं जा सकतीं.

यहां तक कि  हिन्दू महिलाएं बजरंगबली को छू तक नहीं सकतीं. शिवजी पर जल नहीं चढ़ा सकतीं. लेकिन पुरुष चाहे जिस देवी की पूजा कर सकता है. उन से बलताकत मांग सकता है, ताकि वही ताकत वह अपनी घर की देवी पर उतार सके.

भले ही समाज में औरतों को देवी का दर्जा मिला है पर आज कितनी ही ऐसी देवियां हैं जो रोज अपने पति के हाथों पिटती हैं. समाज शुरू से ही अपनी सहूलियत के हिसाब से औरतों को धर्म की जकड़न में रखता है. मगर औरतें यह बात सम झ नहीं पाईं.

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खुद भी जिम्मेदार

कभीकभी तो लगता है औरतें खुद अपनी त्रासदी के लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि वे अपने हर अधिकार के लिए लड़ तो सकती हैं पर धर्म जैसे अंधविश्वास से बाहर नहीं निकल सकतीं. वे डरी हुई हैं. आज भी धर्म की आड़ में ही महिलाओं का शोषण हो रहा है. आज भी धर्म के नाम पर ही महिलाओं की आबरू लूटी जा रही है. आसाराम, रामरहीम जैसे कितने ऐसे बाबा हैं जिन्होंने धर्म के नाम पर महिलाओं का शोषण किया. कभी इलाज के नाम पर तो कभी पुत्रप्राप्ति के नाम पर महिलाएं बाबाओं के जाल में फंसती आई हैं. लेकिन हैरानी तो इस बात की होती है कि आएदिन बाबाओं की करतूतें सुनने के बाद भी महिलाएं उन के छलावे में आ जाती हैं.

धर्म के नाम पर मासूम बच्चियों को नर्क में धकेलने की प्रथा आज भी कायम है. देवदासी प्रथा की शुरुआत 6ठी और 7वीं शताब्दी के आसपास हुई थी. इस प्रथा का प्रचलन मुख्यरूप से कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र में बढ़ा. दक्षिण भारत में खासतौर पर चोल, चेला और पांडयाओं के शासनकाल में यह प्रथा खूब फलीफूली. लेकिन आज भी कई प्रदेशों में देवदासी की प्रथा का चलन जारी है.

हमारे आधुनिक समाज में छोटीछोटी बच्चियों को धर्म के नाम पर देवदासी बनने पर मजबूर किया जाता है. इस के पीछे अंधविश्वास तो है ही, गरीबी भी एक बड़ी वजह है. कम उम्र में लड़कियों को उन के मातापिता ही देवदासी बनने के लिए मजबूर करते हैं.

बता दें कि आजादी से पहले और बाद भी सरकार ने देवदासी प्रथा पर पाबंदी लगाने के लिए कानून बनाए. पिछले 20 सालों से पूरे देश में इस प्रथा का प्रचालन बंद हो चुका था. कर्नाटक सरकार ने 1982 में और अांध्र प्रदेश सरकार ने 1988 में इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया था, लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2013 में बताया था कि अभी भी देश में लगभग 4,50,000 देवदासियां हैं. एक आंकड़े के मुताबिक, सिर्फ तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में लगभग 80,000 देवदासियां हैं.

धर्म और अधर्म, आस्था और अंधविश्वास, श्रद्धा और पाखंड में स्पष्ट अंतर है. इसे हमें सम झना चाहिए. हमें मिल कर अंधविश्वासी, पाखंडी और अधर्मी लोगों का बहिष्कार करना चाहिए जोकि इस देश और स्त्री की गरिमा को दीमक की तरह चाट रहे हैं.

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