Download App

अपना अपना क्षितिज : भाग 3

कभी सत्यव्रत पुरानी बातें ले कर बैठ जाते, ‘मुझ से प्रशांत जरूर नाराज रहता होगा. प्रभावती, मैं ने उसे बहुत बुराभला कहा था इस लिखनेपढ़ने के कारण.’

अब वह खोजखोज कर प्रशांत की रचनाएं पढ़ते.

प्रभावती खुश रहने लगीं. देर से ही, पर सत्यव्रत प्रशांत की सड़ीगली किताबों के ढेर से प्रीत तो कर सके. कभीकभी मन करता कि सत्यव्रत से पूछ लें, ‘लिख दूं प्रशांत को, यहीं आ जाए. कितना सूना लगता है मेरा घर. बच्चों के आने से रौनक हो जाएगी. सुशांत की चिट्ठियां आती हैं तो उन से यही लगता है कि शेर के मुंह खून लग गया है. वह उस पराए देश का गुणगान ही करता रहता है. ऐसा लगता है जैसे वह वहीं बस जाएगा.’

पर कह कहां पातीं. डर लगता कि सत्यव्रत बुरा न मान जाएं. ऐसा न समझें कि वह उन्हें प्रशांत से पराजित करना चाहती है. शायद किसी दिन स्वयं ही कह दें, ‘प्रभा, प्रशांत को बुला लो. वह भी तो हमारा बेटा है. मैं ने उसे बहुत उपेक्षित किया. अब उस का प्रायश्चित्त करूंगा.’

पर सत्यव्रत खुद कभी न बोले. अंदर से कई बार वह उबलतेउफनते प्रशांत से मिलने के लिए उतावले हो उठते पर उसे बुला लेने की बात होंठों पर न लाते.

साल भर तो जैसेतैसे निकला. पर इस के बाद सत्यव्रत के अंदर का तनाव रोग बन कर फूट पड़ा. वह रक्तचाप के साथसाथ दमे की भी गिरफ्त में आ गए.

डाक्टरों ने उन से बहुत अधिक न सोचने, व्यर्थ परेशान न होने की ताकीद कर दी. बारबार प्रभावती को भी हिदायतें मिलीं कि वह अपने पति को व्यस्त रखें और दिमागी तौर पर प्रसन्न रखें. तब प्रभावती स्वयं को रोक न पाईं. वह समझ गईं कि बुढ़ापे के इस अकेलेपन में वह प्रशांत के लिए परेशान हैं. पुत्र को देखनेमिलने के लिए वह तड़प रहे हैं. पर अंदर के संकोच व पिता होने के अभिमान ने उन का मुंह सी रखा है.

तब प्रभावती ने प्रशांत को सब समझा कर पत्र लिख ही दिया. पत्र मिलने में 4-5 दिन लगे होंगे और अब प्रशांत उन की सेवा में वैसे ही उपस्थित हो गया, जैसे आज से पहले कुछ हुआ ही न हो. दमे से खांसते सत्यव्रत से प्रशांत ने उन का हालचाल पूछा तो उन की हालत देखने लायक हो गई. आंखों के दोनों कोर भीग गए. कैसे सिसकी भर कर रो पड़े.

प्रशांत ने उन्हें सहारा दे कर उठाया, ‘‘छि:, पिताजी, रोते नहीं. लीजिए, अपने पोते से मिलिए.’’

सत्यव्रत ने प्रकाश को बड़ी जोर से अपनी छाती से भींच कर आंखें मूंद लीं. थोड़ी देर बाद रजनी ने उन के पैरों का स्पर्श किया तो वह स्वयं को संभाल कर आंखें पोंछने लगे. कुछ मुसकरा कर उसे आशीर्वाद दिया. प्रभावती सत्यव्रत की ओर बढ़ीं और वह प्रकाश को दुलार कर पूछने लगे, ‘‘कौन सी कक्षा में पढ़ते हो?’’

ये भी पढ़ें- मां, पराई हुई देहरी तेरी : भाग 1

प्रकाश ने हंस कर बताया, ‘‘तीसरी में.’’

‘‘खूब, और क्याक्या करते हो?’’

‘‘मन लगा कर सितार बजाता हूं. मैं बहुत अच्छा सितारवादक बनूंगा, दादाजी.’’

प्रभावती सन्न रह गईं, कहीं सत्यव्रत बिदक न पड़ें. अभी प्रशांत के प्रति जो थोड़ाबहुत पिघलाव शुरू हुआ है वह फिर हिम न हो जाए. ऐसा हुआ तो वह कभी प्रशांत के साथ रहना पसंद नहीं करेंगे. वह कुछ कहतीं, उस से पहले ही प्रशांत ने थोड़ा झेंप कर सफाई दी, ‘‘क्या कहूं, पिताजी, बहुत चाहता हूं कि यह पढ़ाई ज्यादा करे और शौक कम पूरे करे, पर यह मानता ही नहीं. सोचता हूं कि इसे डाक्टर बना कर अपने डाक्टर न होने की आप की शिकायत दूर कर दूंगा.’’

‘‘कोईर् बात नहीं,’’ सत्यव्रत ने सब की इच्छा के विपरीत प्रभावती से कहा, ‘‘तुम तो अच्छा सितार बजाती हो, प्रभा, तुम इस की मदद करना. यह भी प्रशांत की तरह हमारा नाम रोशन करेगा.’’

प्रभावती की आंखें भर आईं. प्रशांत ने चकित हो कर पूछा, ‘‘मगर सितार बजाने भर से यह क्या कर लेगा, पिताजी?’’

सत्यव्रत ने बहुत दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘यह सोचना तुम्हारा काम नहीं है. इस के पंख काट कर इस की उड़ान मत रोको. प्रशांत, जो गलती कल मैं करता रहा, उसे आज तुम मत दोहराओ. मन के सुर जिस प्रकार बजना चाहते हैं उन्हें उसी प्रकार बजने दो. यह मत समझो कि यह डाक्टर- इंजीनियर नहीं बन सका तो इस की उड़ान खत्म हो गई. नहीं बेटे, नहीं. यह सोचना बड़ी भूल है.

ये भी पढ़ें- लाली : भाग 1

‘‘मुझे अफसोस है कि मैं तुम्हारी कला को कोई विकास नहीं दे सका. अगर मैं ने तुम्हारी कोई मदद की होती तो आज तुम वहां होते, जहां 20 साल बाद होगे. हम अपनी इच्छा मनवाने के चक्कर में भूल जाते हैं कि जिसे ऊपर उठना होता है, वह अपना क्षितिज स्वयं ही ढूंढ़ लेता है. तुम्हीं बोलो, सूरज को आकाश में कौन चढ़ाता है? कोई भी तो नहीं. वह खुद ही ऊंचाइयों की तरफ उठता चला जाता है.

अपना अपना क्षितिज : भाग 2

सत्यव्रत उसे देखदेख कर निहाल होते रहते थे. पड़ोसियों में बखान करते और दोस्तों से तारीफ करते न अघाते. सुशांत से तुलना कर के वह प्रशांत को नीचा दिखाते रहते. सुशांत प्रशांत से सिर्फ 1 साल ही छोटा था. पर दोनों एक ही कक्षा में थे. दोनों ने एकसाथ ही मेडिकल में दाखिले के लिए तैयारियां की थीं और साथ ही परीक्षाएं दी थीं. नतीजा निकला तो प्रशांत असफल था और सुशांत सफल. सुशांत आगे की पढ़ाई के लिए मुजफ्फरपुर रवाना हो गया. प्रशांत अपनी असफलता के साथसाथ पिता के व्यंग्य बाणों से घायल अपने कमरे में बंद हो गया.

प्रभावती चीख कर बोली थीं, ‘इसीलिए तो कहा था, इसे जो राह पसंद है उसी पर चलने दो. जिस पढ़ाईर् में इस की रुचि नहीं है उस में धक्के दे कर मत चलाओ.’

‘इस की अपनी कोई राह नहीं है. मेहनत से जी चुराने की सजा इस ने पाईर् है. पूरे समाज में इस ने मेरी नाक कटवा दी है. तुम्हें कुछ पता है कि क्या करेगा यह आगे? कलम घिसेगा कलम, बस.’

‘कौन जानता है, कलम घिसते- घिसते यह कहां से कहां पहुंच जाए. सुशांत ने अगर तुम्हारी डाक्टरी की लाइन पकड़ ही ली है तो क्या हुआ. प्रशांत भी मनचाहे क्षेत्र में कहीं ज्यादा सफल हो. तुम साहित्यकारों, कवियों के महत्त्व को नकारते क्यों हो?’

ऐसी बहसों से सत्यव्रत प्रभावती की ओर से बेटे को मिलने वाली तरफदारी समझते. वह कहते, ‘मैं उसे राह दिखाता हूं तो तुम्हें बुरा लगता है. क्या मेरा बेटा नहीं है वह? किसी भी पौधे के विकास के लिए उस की काटछांट जरूरी है. वही काम मैं भी कर रहा हूं.’

प्रभावती को कहना ही पड़ता, ‘पर काटछांट इतनी अधिक न करें कि पौधे का विकास ही न होने पाए.’

ये भी पढ़ें- घर लौट जा माधुरी 

पर अपनी जिद पर अडे़ सत्यव्रत ने प्रशांत से फिर डाक्टरी में प्रवेश की तैयारी कराई, पर नतीजा फिर वही निकला. तीसरी बार प्रशांत ने जबरदस्ती तैयारी नहीं की. मन में पिता के प्रति एक विद्रोह, एक क्रोध लिए प्रशांत उन दिनों  भटकने लगा था. न वह ढंग  से खातापीता था न सोता था और न घर में रहता था. देर रात तक वह घर से बाहर रहता. यहां तक कि घर के सदस्यों से उस की बातचीत भी बंद हो जाती. पिता की तो वह सूरत भी नहीं देखना चाहता था.

जब सत्यव्रत ने प्रशांत का यह रूप देखा तो धीरेधीरे उस के प्रति उन का रुख बदलता गया. अब वह केवल सुशांत की देखरेख में खोए रहने लगे. प्रशांत की ओर से उन का मन खट्टा हो गया. अपने बेटे के रूप में मात्र कलम घिस्सू की कल्पना न उन से होती थी और न ही किसी के पूछने पर उन से यह परिचय ही दिया जाता था.

कई बार तो वह मित्रों में बस, सुशांत की चर्चा करते. प्रशांत की बात गोल कर जाते. कोई बहुत जोर दे कर प्रशांत से मिलने की चर्चा करता तो उस की मुलाकात सुशांत से करवा कर झट से बहाना बना देते, ‘प्रशांत घर पर नहीं है.’

प्रभावती का मन चूरचूर हो जाता और प्रशांत पंख कटे पंछी सा छटपटाता  रह जाता. सत्यव्रत अब जैसे सुशांत के लिए ही जी रहे थे. जब तक सुशांत  घर में रहता, वह उस के लिए एकएक चीज का ध्यान रखते.

प्रशांत यह सब देखदेख कर कटता रहता, फिर भी वह पिता की किसी बात का विरोध न करता. भले ही सत्यव्रत उस की रुचि को जिद का नाम दे कर अपने और पुत्र के मध्य निरर्थक विवादों को जन्म दे बैठते.

यह केवल प्रभावती ही समझ सकती थीं कि प्रशांत की रुचि किस चीज में है. ऐसे में वह सदा ही अपने पति को दबा कर रखतीं और प्रशांत के लिए वह सब करतीं जो सत्यव्रत सुशांत के लिए किया करते और चाहतीं कि प्रशांत यही जाने कि पिता ने उस के लिए वह सब किया है.

ऊंची आकांक्षाआें के बीच तनाव की कंटीली दूरियां तय करतेकरते दिन भागते गए. प्रशांत साहित्यकार के रूप में स्थापित हो चुका था और सुशांत डाक्टर बन चुका था. अब दोनों घर पर ही मौजूद रहते. इस का नतीजा यह हुआ कि दोनों भाइयों में मतभेद पैदा होने लगे. गांव और महल्ले वाले भी सत्यव्रत की देखादेखी प्रशांत और सुशांत की तुलना कर उन में नीचे और ऊपर की सीमा खींचने लगे थे.

असल में खींचातानी तो तब शुरू हुई जब सुशांत अपनी डाक्टर पत्नी लाया और प्रशांत अपने ही साहित्य की प्रशंसिका ब्याह लाया. घर में प्रशांत का कम मानसम्मान और सुशांत की अधिक इज्जत प्रशांत की पत्नी को हिलाने लगी थी. स्वयं सुशांत और उस की पत्नी पूनम को भी प्रशांत का यह कह कर परिचय देना कि साहित्यकार है, अच्छा न लगता.

ये भी पढ़ें- घर लौट जा माधुरी : भाग 2

रोजरोज के इस मानअपमान ने प्रशांत को इतना परेशान कर दिया कि एक दिन उस ने घर ही छोड़ दिया. तब रजनी की गोद में 9 महीने का प्रकाश था. प्रभावती के चरण छू कर उस ने कहा था, ‘मां, जब भी तुम्हें मेरी जरूरत हो, मुझे बुला लेना.’

प्रशांत के जाने के 1 वर्ष बाद ही  सत्यव्रत सेवानिवृत्त हो गए थे. कुछ सालों तक घर आसानी से चलता रहा था. सुशांत और पूनम के हंसीठहाके, सत्यव्रत की परम संतोषी मुद्रा, इन सब के बीच अपने एक पुत्र के विछोह के क्लेश को मौन रूप से झेलती प्रभावती बस, जीती थीं, एक पत्थर की तरह. कभीकभार पत्रपत्रिकाओं में अपने पुत्र की प्रशंसा देखपढ़ कर पलभर के लिए उन्हें सुकून मिल जाता था.

धीरेधीरे समय ने करवट बदली. सुशांत को अपने विषय में शोध के लिए 3 वर्ष अमेरिका जाने का अवसर मिला. वह मांबाप को आश्वासन देता हुआ पूनम के साथ चला गया.

अब घर में केवल सत्यव्रत और प्रभावती के साथ अकेलापन रह गया.

सत्यव्रत किताबें पढ़ कर वक्त काटने लगे थे. घर में जितनी किताबें थीं, सब प्रशांत की सहेजीसंजोई हुई थीं. प्रशांत द्वारा अलगअलग पन्नों पर खींची गई लकीरों को देख और कुछ अपनी ओर से लिखी गई टिप्पणियों को पढ़ कर सत्यव्रत मुसकराते. प्रभावती मन ही मन डरतीं कि ऐसा न हो कि वह पुन: इन पुस्तकों को पढ़ कर प्रशांत का मजाक उड़ाने लगें. पर ऐसा नहीं हुआ. किताबों के साथ वक्त काटने के चक्कर में वह किताबों के दोस्त होते गए. दिन ही नहीं रात में भी कईकई घंटे वह आंखों पर चश्मा चढ़ाए किताबें पढ़ते रहते. कई बार वह चकित हो कर कह उठते, ‘अरे, इन किताबों में तो बहुत कुछ है. मत पूछो क्या मिल रहा है इन में मुझे. मैं तो सोचा करता था कि लोगों का वक्त बेकार करने के लिए इन पुस्तकों में केवल ऊलजलूल बातें भरी रहती हैं.’

प्रभावती चकित हो कर उन्हें सुनतीं, फिर रो पड़तीं. अब कभीकभी वह उस से पूछने भी लगे थे, ‘प्रशांत की कोई रचना अब देखने को नहीं मिलती. कहीं ऐसा तो नहीं कि उस ने लिखना बंद कर दिया हो. उस से कहो, वह कुछ लिखे. ऐसी ही कोई शानदार चीज जैसी मैं पढ़ रहा हूं.’

ये भी पढ़ें- पारिवारिक सुगंध : भाग 1

कभीकभी तो सत्यव्रत आधी रात को पत्नी को उठा कर कहते, ‘परसों प्रशांत की एक कहानी पढ़ी थी. एक प्रशंसापत्र उसे अवश्य डाल देना अपनी ओर से. इस से हौसला बढ़ता है.’

आगले भाग में पढ़ें- सूरज को आकाश में कौन चढ़ाता है?

अपना अपना क्षितिज : भाग 1

सत्यव्रत ने अपने सपनों को बेटे प्रशांत पर थोपने का प्रयास कर बापबेटे के रिश्तों में कड़वाहट भर ली थी. बरसों बाद प्रशांत भी अपने मासूम बेटे पर अपने पिता के सपने को थोपने लगा तो सत्यव्रत तड़प उठे…

प्रशांत को देखते ही प्रभावती की जान में जान आ गई. प्रशांत ने भी जैसे ही मां को देखा दौड़ कर उन के गले लग गया, ‘‘मां, यह कैसी हालत हो गई है तुम्हारी.’’

प्रभावती के गले से आवाज ही न निकली. बहुत जोर से हिचकी ले कर वह फूटफूट कर रो पड़ीं. प्रशांत ने उन्हें रोकने की कोई चेष्टा नहीं की. इस रोने में प्रभावती को विशेष आनंद मिल रहा था. बरसों से इकट्ठे दुख का अंबार जैसे किसी ने धो कर बहा दिया हो.

थोड़ी देर बाद धीरे से  प्रशांत स्वयं हटा और उन्हें बैठाते हुए पूछा, ‘‘मां, पिताजी कहां हैं?’’

‘‘अंदर,’’ वह बड़ी कठिनाई  से बोलीं. एक क्षण को मन हुआ कि कह दें, पिताजी हैं ही कहां. पर जीभ को दांतों से दबा कर खुद को बोलने से रोक लिया. सच बात तो यह थी कि वह अपने जिस पिता के बारे में पूछ रहा था वह तो कब के विदा हो चुके थे. अवकाश ग्रहण के 2 माह बाद ही या एक तरह से सुशांत के पैरों पर खड़ा होते ही उन की देह भर रह गई थी और जैसे सबकुछ उड़ गया था.

अपनी आवाज की एक कड़क से, अपनी भौंहों के एक इशारे से पिताजी का जो व्यक्तित्व इस्पात की तरह सब के सामने  बिना आए ही खड़ा हो जाता था, वह पिताजी अब उसे कहां मिलेंगे.

प्रशांत दूसरे कमरे की ओर बढ़ा तो तुरंत प्रभावती के पैरों पर रजनी आ कर झुक गई और साथ ही 7 बरस का नन्हा प्रकाश. उन्होंने पोते को भींच कर छाती से लगा लिया. मेले में बिछुड़ गए परिवार की तरह वह सब से मिल रही थीं. पूरे 7 साल बाद प्रशांत और रजनी से भेंट हो रही थी. वह प्रकाश को तो चलते हुए पहली बार देख रही थीं. उस की डगमग चाल, तुतलाती बोली, कच्ची दूधिया हंसी, यह सब वह देखसुन नहीं सकी थीं. साल दर साल केवल उस के जन्मदिन पर उन के पास प्रकाश का एक सुंदर सा फोटो आ जाता था औैर उन्हें इतने से ही संतोष कर लेना पड़ता था कि अब मेरा प्रकाश ऐसे दिखाई देने लगा है.

ये भी पढ़ें- घुटन : भाग 2

7 साल पहले जब वह कुल 9 माह का था, तभी प्रशांत घर छोड़ कर अपने परिवार को ले कर वहां से दूर बंगलौर चला गया था. इस अलगाव  के पीछे मुख्य कारण था प्रशांत और सुशांत की आपसी नासमझी और उन के पिता द्वारा बोया गया विषैला बीज. सुशांत डाक्टर था और प्रशांत कालिज में शिक्षक. बस, यही अंतर दोनों के मध्य उन के पिता के कारण बड़ा होता चला गया और इतना बड़ा कि फिर पाटा न जा सका.

उन के पिता सत्यव्रत शुरू से ही चाहते थे कि दोनों बच्चे डाक्टर बनें. इस के लिए उन्होंने अपनी सीमित आय की कभी परवा नहीं की. उन का बराबर यही प्रयत्न रहा कि उन के बच्चों को कभी किसी चीज का अभाव न खटके.

सत्यव्रत दफ्तर से लौटने के बाद बच्चों की पढ़ाई  पर ध्यान देते. उन का पाठ सुनते, उन्हें समझाते, उन की गलतियां सुधारते, उन्हें स्वयं नाश्ता परोसते, उन के कपड़े बदलते, बत्ती जलाते, मसहरी लगाते पुस्तकें खोल कर रखते. बच्चे पढ़तेपढ़ते सोने लगते तो पंखा चला देते. दूध का गिलास थमाते. कभी अपने हिस्से का दूध भी दोनों के गिलास में उडे़ल देते. सोचते, ‘बहुत पढ़ते हैं दोनों. गिलास भर दूध से इन का क्या होगा.’

भविष्य के दर्पण में उन्हें 2 डाक्टर बेटों का अक्स दिखाई पड़ता और वह दोगुनेचौगुने गर्व से झूम उठते. अपने इस सपने को बुनने में बस, इसी बात का कोई ध्यान नहीं रखा कि असल में उन के बेटे क्या चाहते हैं. उन की रुचि किस बात में है, डाक्टर बनने में या इंजीनियर अथवा कुछ और बनने में.

सत्यव्रत इस मामले में एक तानाशाह की तरह थे. जो सोच लिया वह बच्चों को पूरा करना ही है. वह सदा यही सोच कर चलते थे, पर ऐसा हो कहां सका. बड़े लड़के प्रशांत को डाक्टर बनने में कोई रुचि  नहीं थी. उस का कविताओं, कहानियों, पेंटिंग, साहित्य में खूब मन लगता था. कई बार वह पढ़ाई  के ही मध्य में आड़ीतिरछी लकीरें खींचता पकड़ा जाता था. कभी रेखागणित की आकृतियां बनातेबनाते पन्ने पर कविता लिखने लगता था.

सत्यव्रत की नजर उस पर पड़ जाती तो जैसे आग में घी पड़ जाता. खूब कस कर धुनाई होती उस की. खाना बंद कर दिया जाता. उसे सोने नहीं दिया जाता. यहां तक कि प्यास से उस का कंठ सूखने लगता, पर वह नल में मुंह नहीं लगा सकता था.

वह अकसर कहा करते, ‘साहित्य, पेंटिंग, कविता भी कोई विषय हैं?’

प्रभावती सन्न रह जातीं. हाथ जोड़ कर कहतीं, ‘मेरे बेटे को इतना मत सताओ.  उस की तो तारीफ होनी चाहिए कि वह इतनी बढि़या कहानियां लिखता है. तुम्हें कब अक्ल आएगी पता नहीं.’

‘कविता, कहानी से पेट नहीं भरता,’ वह चीख कर कहते, ‘जानती हो न कि कितने कवि और लेखक भूखों मरते हैं?’

वह इतने से ही बस न करते. कहते, ‘मैं जानता हूं, तुम्हीं प्रशांत का दिमाग बिगाड़ रही हो. पर अच्छी तरह समझ लो इसे कवि या शिक्षक नहीं, डाक्टर बनना है. इस का भोजन अभी तो एक दिन ही बंद हुआ है, कभी हफ्ते भर भी बंद किया जा सकता है.’

डर से प्रभावती के हाथ फूल जाते, क्या कहें बेटे को. हर व्यक्ति एक ही बात को आसानी से नहीं सीख सकता. किसी के लिए हिसाब आसान है तो किसी के लिए इतिहास. प्रकृति ने सब की समझ का पैमाना एक कहां रखा है? पर वह यह भेद अपने पति को न समझा पातीं. उन्हें  तमाशाई  बन कर चुपचाप सबकुछ देखना, सहना पड़ता.

ये भी पढ़ें-  दरार

सब से बुरी हालत तो प्रशांत की हो गईर्र्  थी. अपनी और पिता की इच्छाओं के मध्य वह झूलता रहता था. न वह कविता लिखना छोड़ सकता था न पिता की तमन्ना पूरी करने से पीछे हटना चाहता था. दिनरात किताब उस की आंखों के आगे लगी रहती थी. इस चक्कर में आंखों पर मोटे फे्रम का चश्मा चढ़ गया था. चेहरे की चमक खो गई थी. वह किसी से कुछ कहता नहीं था. बस, भीतर ही भीतर छटपटाता रहता था.

इस के विपरीत सुशांत की आंखोंं के आगे बस, एक ही सपना तैरता रहता था, डाक्टर बनने का. उस के लिए उसे न पिता से मदद लेने की जरूरत थी न मां से. प्रशांत को बड़ी तेजी से पीछे छोड़ता हुआ सुशांत अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा था.

अगले भाग में पढ़ें-  इसे जो राह पसंद है उसी पर चलने दो

शुभारंभ: राजा-रानी के बीच बढ़ती गलतफहमियाँ, क्या तोड़ देंगी दोनों के बीच शादी के बंधन को

कलर्स के शो, ‘शुभारंभ’ में राजा-रानी के रिश्ते में गलतफहमियों का दौर एक बार फिर शुरू हो गया है. कीर्तिदा की राजा-रानी को अलग करने की कोशिश कामयाब होती दिखाई दे रही है. वहीं उत्सव की एक गलती रानी की शादीशुदा जिंदगी के लिए मुसीबत बन गई है. आइए आपको बताते हैं क्या होगा आगे…

उत्सव ने खोला आशा का राज़

अब तक आपने देखा कि राजा के उत्सव के चोरी करने के मामले को शांत करने के बावजूद मेहुल और हितांक, रानी और उसके परिवार को बेइज्जत करना बंद नही करते. वहीं उत्सव 50 लाख की लौटरी का राज़ खोलते हुए कहता है कि राजा की माँ, आशा ने राजा और रानी की शादी लौटरी के पैसों के लिए करवाई थी.

asha

ये भी पढ़ें- शुभारंभ: क्या उत्सव की एक गलती बन जाएगी राजा-रानी के बीच गलतफहमी

rani

राजा-रानी ने उठाया एक कदम

उत्सव को पकड़वाने के लिए रेशमिया परिवार पुलिस बुलाता हैं, लेकिन रानी अपने भाई का इल्ज़ाम अपने सिर लेते हुए कहती है कि चोरी के प्लान में वो भी शामिल थी. साथ ही रानी ये भी कहती है कि उसने राजा से शादी पैसों के लिए की है.वहीं आशा के मुंह से शादी का सच सुनने के बाद राजा भी झूठ कहता है कि उसने रानी से शादी लौटरी के पैसों के लिए की है. ताकि दोनों अपने परिवार को बेइज्जती से बचा सकें. लेकिन इन सब चीजों के कारण राजा-रानी के बीच गलतफहमियों का सिलसिला फिर से शुरू हो जाता है.

utsav

आशा पर भड़केगा राजा

आज के एपिसोड में आप देखेंगे कि कीर्तिदा को तिजोरी की चाबियाँ सौंप कर रानी राजा का घर छोड़ देगी. दूसरी ओर, राजा, आशा पर भड़कते हुए कहेगा कि उसने ऐसा क्यों किया, जबकि आशा बताएगी कि उसने ऐसा राजा की आर्थिक सुरक्षा के लिए किया.

ये भी पढ़ें- शुभारंभ: क्या रानी की खुशियों के लिए उसके ही ससुराल में चोरी करेगा उत्सव?

कीर्तिदा चलेगी नई चाल

raja

राजा और रानी के अलग होने के बाद जहाँ गुणवंत और कीर्तिदा खुशी मनाते हैं तो वहीं आगे राजा-रानी का रिश्ता पूरी तरह खत्म करने के लिए नई प्लानिंग भी करते हैं.

अब देखना ये है कि क्या शादी के बाद, राजा और रानी के बीच बढ़ती गलतफहमियाँ बन जाएंगी दोनों की शादी के टूटने का कारण.  जानने के लिए देखते रहिए शुभारंभ, सोमवार से शुक्रवार रात 9 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

लंबे और खूबसूरत नाखून पाने लिए अपनाएं ये 5 उपाय

हाथों की खूबसूरती लंबे नाखूनों से बढ़ती है. पर इसके लिए नाखून का मजबूत और शेप में होना बेहद जरूरी है. लंबे नाखूनों को आप तरह-तरह के नेल आर्ट भी बनाकर सजा सकती हैं.लेकिन बहुत-सी लड़कीयों की शिकायत रहती है कि उनके नाखून बढ़ने के साथ ही टूट जाते हैं. ऐसे में कभी भी उन्हें परफेक्ट शेप मिल ही नहीं पाती जिसकी उम्मीद होती है.

पर क्या आपने कभी ये सोचा है कि नाखून टूटते क्यों हैं? कई बार हार्मोनल कारणों की वजह से भी नाखून टूट जाते हैं. आइए आपको बताते हैं कि आप खूबसूरत नाखून पाने के लिए क्या कर सकती हैं.

ये भी पढ़ें- बालों को गरमी से बचाने के लिए अपनाएं ये 7 टिप्स

  1. संतरे का रस और अंडे की सफेदी

अंडे के सफेद हिस्से को एक कटोरी में निकाल लें. इसमें दो चम्मच संतरे का रस मिला लें. इस घोल को अपने नाखूनों पर 5 मिनट तक लगा कर छोड़ दें. इसमें विटामिन सी होता है जो कोलजिन का प्रोडक्‍शन करता है जिससे नाखून मजबूत बनते हैं.

ये भी पढ़ें- गर्मियों में 7 तरीकों से खुद को रखें तरोताजा

2. एप्‍पल साइडर वेनिगर

एक चम्‍मच घिसा लहसुन लें और उसमें एक चम्‍मच एप्‍पल साइडर वेनिगर मिलाएं. इसे अपने नाखूनों पर लगाकर 10 मिनट के लिए छोड़ दें. इसके बाद हाथों को साफ पानी से धो लें.

3. औलिव औयल से करें मसाज

अपने नाखूनों पर जैतून का तेल लगा कर मालिश करें. इसमें विटामिन ई होता है जो नाखूनों को पोषण प्रदान करता है जिससे नाखून तेजी से बढ़ते हैं.

ये भी पढ़ें- स्किन के लिए फायदेमंद है माइक्रोकरंट फेशियल

4. लहसुन के इस्तेमाल से

लहसुन की एक कली लें. उसके छिलके उतार दें. कली को बीच में से काट ले और इसे अपने नाखूनों पर 10 मिनट तक रगड़ें. ऐसा करने के 10 दिन के भीतर ही आपको रिजल्ट दिखने लगेगा.

5. नारियल का तेल

नारियल तेल में फैटी एसिड तथा अन्‍य पोषण तत्व पाए जाते हैं, जिससे नाखूनों की मसाज करने पर फायदा होता है.

ये भी पढ़ें- 8 टिप्स: नेल पालिश को ऐसे सूखने से बचाएं

‘बंकर’ : नेक इरादे, मगर मकसद से परे

रेटिंग : दो स्टार

निर्माताः गौरव गुप्ता

निर्देशकः जुगल राजा

कलाकारः अभिजीत सिंह, अरिंधिता कालिता, अरनव तिमसीनिया, देव रोंसा और बेबी यशवी वारिया

अवधिः एक घंटा 38 मिनट  

फिल्मकार जुगल राज अपनी फिल्म ‘‘बंकर’’ देश की सुरक्षा के लिए सीमा पर तैनात सशस्त्र सैनिकों पर केंद्रित है. हर सैनिक अपनी भावनाओं पर लगाम लगाकर युद्ध के मैदान पर डटा रहता है. जबकि उसके पास कहने को बहुत कुछ होता है. जुगल राज का मकसद लाखों सैनिकों की अनसुनी कहानियों को जन जन तक पहुंचाना है. वह अपनी इस फिल्म को ‘‘युद्ध विरोधी @एंटी वार फिल्म के रूप में प्रचारित करते आए हैं, मगर फिल्म में काफी विरोधाभास है.

कहानीः

फिल्म की कहानी पुंछ (कश्मीर) पर भारतीय सेना की बटालियन नंबर 42 के बंकर पर रात के अंधेरे में घुसपैठियों @आतंकवादियों द्वारा युद्धविराम समझौते का उल्लंघन कर हमला किया जाता है और इनका मकसद इस बंकर पर कब्जा करना है. इस हमले का मुंह तोड़ जवाब देते हुए सुबेदार सुखराम (अरनव तिमसिना) व एक अन्य सैनिक शहीद हो जाता है. जबकि  लेफ्टिनेंट विक्रम सिंह (अभिजीत सिंह) अकेले जीवित बचते हैं, मगर वह गंभीर रूप से घायल हैं. एक पैर बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया है. वह दोनों आंखों से देख नहीं पा रहे हैं तथा उनके पैर में एक जीवित शेल से बंधा हुआ है. वह अपने दिल, आत्मा और पराक्रम से लड़ते हैं. एक तरफ वह अपने तरीके से जावेद नामक एक आतंकवादी के बंकर के अंदर घुसने पर उसे मौत की नींद सुला देते हैं, तो दूसरी तरफ वह बार बार अपने उच्च अधिकारियों से फोन पर सैन्य मदद मांगते रहते है. सैन्य मदद निकली है, मगर वह आतंकवादियों का मुकाबला करते हुए धीरे धीरे आगे बढ़ रही है. बीच बीच में विक्रम सिंह को अपनी पत्नी स्वरा सिंह (अरिंधिता कलीता) व चार साल की बेटी गुड़िया की याद आती है. उनसे हुई पिछली बातें याद आती हैं. वह अपनी पत्नी व बेटी से आठ माह से नहीं मिले हैं.

ये भी पढ़ें- BIRTHDAY SPECIAL: सिद्धार्थ मल्होत्रा की फिल्म ‘शेरशाह’ का फर्स्ट लुक

लेखन व निर्देशनः

फिल्म की गति अति धीमी है और ऐसा लगता है कि फिल्मकार ने एक नेक विचार के साथ फिल्म बना डाली, मगर उसको ठीक से प्रस्तुत करने के लिए आवश्यक शोधकार्य कर एक रोचक विस्तृत कहानी नहीं जुटा पाए. फिल्मकार युद्ध की निरर्थकता को सामने लाने का दावा करते हैं, मगर यह पूरी फिल्म आतंकवादियों से मुठभेड़ और इस मुठभेड़ में कई सैनिकों के मारे जाने की कहानी है. फिल्म में युद्धग्रस्त क्षेत्र के नतीजों पर चर्चा करने के लिए कभी नहीं मिलते हैं. दूसरी बात फिल्मकार का मकसद शत्रुतापूर्ण माहौल में सीमा पर डटे रहने वाले सैनिकों के मानसिक स्वास्थ्य व भावनात्मक स्थितियों को उजागर करना है, मगर फिल्म इस तरफ दर्शकों का ध्यान खींचने में असफल रहती है. बहादुर सैनिकों के परिवारों को अपने प्रियजनों को खोने का दर्द व सीमा पर तैनाती के समय कई माह तक न मिल पाने के दर्द व अन्य मानवीय भावनाओं व संवेदनाओं को भी यह फिल्म सही अंदाज में उकेरने में विफल रहती है. इतना ही नही लेफ्टीनेट विक्रम सिंह के चेहरे पर इतना खून वगैरह जमा हुआ लगातार दिखाया गया है कि दर्शक उससे अपना मुंह फेर लेता है. पटकथा काफी कमजोर है.

अभिनयः

लेफ्टीनेंट विक्रम सिंह के किरदार अभिजीत सिंह ने बहुत ज्यादा प्रभावित करने वाला अभिनय नहीं किया है. वह किरदार की तीव्रता और उस स्थिति की भयावहता के साथ न्याय नहीं कर पाए. अन्य कलाकारों के चरित्र ठीक से उभरे ही नहीं.

फिल्म में रेखा भारद्वाज द्वारा स्वरबद्ध  गीत ‘लौट के घर जाना है’’ जरुर दिल को छू लेता है.

ये भी पढ़ें- विद्या बालन बनेंगी ह्यूमन कंप्यूटर  

BIRTHDAY SPECIAL: सिद्धार्थ मल्होत्रा की फिल्म ‘शेरशाह’ का फर्स्ट लुक जारी, देखें यहां

बर्थडे स्पेशल बौलीवुड के स्पोर्टी और फिट बौडी वाले हैंडसम एक्टर सिद्धार्थ मल्होत्रा  का 16 जनवरी यानी आज अपना 35वां बर्थडे मना रहे हैं. इस खास मौके पर उनकी अपकमिंग फिल्म ‘शेरशाह’ का फर्स्ट लुक भी रिलीज कर दिया गया है. जिसमे वह जांबाज आर्मी कैप्टन विक्रम बत्रा के फौजी लुक में नजर आ रहे हैं.

सिद्धार्थ मल्होत्रा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेरशाह का फर्स्ट लुक शेयर किया है. सिद्धार्थ ने लुक शेयर करते हुए कैप्टन विक्रम बत्रा को श्रद्धांजलि दी है. उन्होंने लिखा, ‘बहादुरी और शहादत के अलग-अलग रंगों को बड़े स्क्रीन पर उकेरना मेरे लिए सम्मान की बात है. कैप्टन विक्रम बत्रा की जीवन यात्रा को श्रद्धांजलि और उनकी अनकही कहानी को सभी के सामने ला रहे हैं.’

ये भी पढ़ें- छोटी सरदारनी: परम की बीमारी का सच जानने के बाद क्या होगा मेहर का अगला

फिल्म ‘शेरशाह’ का फर्स्ट लुक करण जौहर ने भी अपने ऑफिशल ट्विटर हैंडल से शेयर किया है. फर्स्ट लुक में करण ने फिल्म के दो पोस्टर्स शेयर करते हुए लिखा, ‘करगिल युद्ध के हीरो और हम इस फिल्म के जरिए हमारी श्रद्धा और सम्मान अर्प‍ित करते हैं.’

फिल्म ‘शेरशाह’ 1999 में भारत-पाकिस्तान के बीच लड़ी गई करग‍िल युद्ध के वीर जवान शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की जिंदगी पर आधारित है.इस फिल्म में  सिद्धार्थ मल्होत्रा कैप्टन विक्रम बत्रा और उनके भाई विशाल बत्रा के डबल रोल में नजर आएंगे. फिल्म में कियारा आडवाणी उनकी मंगेतर डिंपल चीमा का किरदार निभा रही हैं.

 

View this post on Instagram

 

Eyeing my next goal like ?

A post shared by Sidharth Malhotra (@sidmalhotra) on

इसके अलावा जावेद जाफरी, हिमांशु मल्होत्रा और परेश रावल भी नजर आएंगे. परेश रावल भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के रूप में नजर आएंगे.  विष्णु वर्धन के निर्देशन में बनीं शेरशाह 3 जुलाई को रिलीज हो रही है. फिल्म को करण जौहर, हीरू जौहर, अपूर्वा मेहता, शब्बीर बॉक्सवाला, अजय शाह और हिमांशु गांधी ने प्रोड्यूस किया है.

ये भी पढ़ें- शुभारंभ: क्या उत्सव की एक गलती बन जाएगी राजा-रानी के बीच गलतफहमी

छोटी सरदारनी: परम की बीमारी का सच जानने के बाद क्या होगा मेहर का अगला कदम?

कलर्स के शो छोटी सरदारनी में सरब हर तरह से कोशिश कर रहा कि मेहर को परम की बीमारी का सच पता ना लग पाए, लेकिन मेहर को आखिरकार परम का सच पता चल गया है. परम के बारे में जानने के बाद क्या होगा मेहर का अगला कदम आइए आपको बताते हैं….

मेहर को पता चलता है परम की बीमारी का सच

अब तक आपने देखा कि डौक्टर संजना डोनर के साथ-साथ परिवार के किसी भी सदस्य का ब्लड टैस्ट परम के साथ मैच नही होने की बात बताती है, जिससे सरब और ज्यादा घबरा जाता है. वहीं मेहर, सरब के चेहरे को देखकर समझ जाती है कि वह कुछ छिपा रहा है. आखिर में मेहर सच का पता लगाने के लिए अपना भेष बदलकर सरब का पीछा करती है. वहीं सरब उसे परम का डोनर समझकर परम की हालत बयां कर देता है.

meher

ये भी पढ़ें- छोटी सरदारनी: क्या परम की बीमारी की सच्चाई मेहर से छिपा पाएगा सरब?

मेहर करेगी परम के लिए ये फैसला

param

आज के एपिसोड में आप देखेंगे कि परम की बीमारी का सच जानने के बाद मेहर डौक्टर से कहेगी कि वह अपना लीवर परम को देने के लिए तैयार है क्योंकि परम का खून उसके खून से मिलता है. वहीं डौक्टर मेहर की प्रेग्नेंसी की हालत देखकर, उसे परम का डोनर मानने से इंकार कर देगी.

पिकनिक पर जाने की जिद करेगा परम

harleen

डोनर ढूंढने में लगे मेहर और सरब, परम को हर तरह से खुश रखने की कोशिश कर रहे हैं. इसी बीच परम अपने स्कूल पिकनिक पर जाने की बात कहेगा, लेकिन सरब इस बात को पूरी तरह इंकार कर देगा, जिससे परम दुखी हो जाएगा. वहीं परम को दुखी देखकर मेहर उसे पिकनिक पर ले जाने का वादा करेगी.

ये भी पढ़ें- छोटी सरदारनी: परदे के पीछे ऐसे लोहड़ी मना रहे हैं मेहर, सरब और परम

अब देखना ये है कि क्या मेहर डौक्टर के मना करने के बावजूद परम को अपना लीवर देगी? जानने के लिए देखते रहिए ‘छोटी सरदारनी’, सोमवार से शनिवाररात 7:30 बजेसिर्फ कलर्स पर.

घर पर बनाएं मसाला पराठा

मसाला पराठा, सादे पराठे का ही एक अलग रूप है, जो खाने में काफी टेस्‍टी लगता है. जिस दिन आपका मन पराठे खाने का करें, उस दिन आटा सानते वक्‍त उसमें कुछ मसाले मिक्‍स कर दें और मसाला पराठा बनाएं.

सामग्री-

2 कप गेहूं का आटा

1 चम्मच तेल

¼ चम्मच जीरा

¼ चम्मच अजवाइन

¼ चम्मच कुटी हुई काली मिर्च

¼ चम्मच लाल मिर्च पाउडर

¼ चम्मच हल्दी पाउडर

आधा चम्मच गरम मसाला पाउडर

आधा चम्मच अमचूर पाउडर

¾ 1 कप पानी

घी या तेल

ये भी पढ़ें- ऐसे बनाएं कड़ाही सब्जी पास्ता

बनाने की विधि- 

2 कप आटा लें, उसमें सभी मसाले मिक्‍स करें. फिर उसमें 1 चम्‍मच तेल और आधा कप पानी डाल कर साने.

आटा सानते वक्‍त जितने पानी की जरुरत हो, उतना मिलाएं.

आटे को गीले कपड़े से ढंक कर 30 मिनट के लिये रख दें.

फिर इससे लोई ले कर पराठे बनाएं और तवे पर घी या तेल लगा कर दोंनो ओर सेंके.

जब पराठे गोल्‍डन हो जाएं तब गैस बंद कर दें. इसी तरह से सारे पराठे बना लें.

फिर इन्‍हें सब्‍जी या आम के अंचार के साथ सर्व करें. मसाला पराठा, सादे पराठे का ही एक अलग रूप है, जो खाने में काफी टेस्‍टी लगता है.

ये भी पढ़ें- ब्रेकफास्ट में बनाएं पैनकेक डिप ट्रैंगल्स

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें