कट्टरवादी हिन्दू नेता रहे विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने की भाजपाई मंशा की अब अधिकृत घोषणा होना ही बाकी है. जो कभी भी हो सकती है लेकिन उन्हें देश का यह सर्वोच्च खिताब देने पर जिन कांग्रेसियों के पेट में मरोड़ें उठ रही हैं. वे शायद ही इस सवाल का जबाव दे पाएं कि इसी साल जब यह खिताब उसके वरिष्ठ नेता और पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को दिया गया था. तब उन्हें ऐसा क्यों नहीं लगा था कि प्रणव मुखर्जी को एक कट्टरवादी और सांप्रदायिक सरकार के हाथों यह सम्मान नहीं लेना चाहिए. जिसकी विचारधारा एकदम कांग्रेस के प्रतिकूल है.

इसमें कोई शक नहीं कि मौजूदा सरकार सरकारी पुरस्कारों के मामले में भी मनमानी पर उतारू हो आई है और चुनचुन कर उन हस्तियों को खिताबों से जानबूझकर नवाज रही है. जो हिन्दुत्व के पालक पोषक और वर्ण व्यवस्था के पेरोकार रहे हैं. सावरकर इसके अपवाद नहीं हैं. कांग्रेसी एक और आधार पर भाजपाई मंशा का विरोध कर रहे हैं कि सावरकर गांधी की हत्या के आरोपियों में से एक थे. हालांकि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत न होने के कारण अदालत ने उन्हें दोष मुक्त कर दिया था.

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लेकिन यह भारत रत्न देने या न देने का पैमाना नहीं माना जा सकता हालांकि सरकारी खिताबों के दिये जाने का कोई तयशुदा पैमाना है भी नहीं, अगर होता तो क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर और हिंदूवादी नानाजी देशमुख जैसे लोग तो कतई भारत रत्न के फ्रेम में फिट नहीं होते. इन्हें तो मोदी सरकार ने एक तरह से बख्शीश दी है और कांग्रेस भी ऐसा ही करती रही थी.

इसमें भी कोई शक नहीं कि गांधी और सावरकर की विचारधाराएं दो ऐसी समानान्तर रेखाएं हैं, जो कहीं जाकर नहीं मिलती. बहुत संक्षेप और सार रूप में देखें तो सावरकर अंग्रेजों से तो आजादी चाहते थे लेकिन उन्हें देश के दलित, पिछड़ों, आदिवासियों और मुसलमानों की दयनीय हालत से कोई सरोकार नहीं था.  उनकी नजर में ये तबके भी जन्मना आधार पर हिन्दू थे लेकिन उलट उसके गांधी जी को लग रहा था कि अगर इन वर्गों को सवर्णों के दबदबे से मुक्ति नहीं मिली तो अंग्रेजों से आजादी के कोई माने नहीं रह जाएंगे क्योंकि ये वर्ग तो उन सवर्णों की गुलामी ढोते रहेंगे. जो खुद के अलावा किसी और को हिन्दू मानते ही नहीं और मानते भी हैं तो बाकियों को निचले पायदान पर रखने की शर्त पर जिससे गांधी सहमत नहीं थे.

मुद्दे की बात यह है कि क्या सावरकर को भारत रत्न दिया जाना चाहिए तो इसका जबाब बड़े निराशाजनक तरीके से हां में भी निकलता है और न में भी. हां में इसलिए कि अब सत्ता उन हिंदुओं के हाथ में है, जो खुलेआम देश को हिन्दू राष्ट्र कहते किसी धर्म जाति संप्रदाय पंथ या विचारधारा की परवाह या लिहाज नहीं कर रहे हैं. इसलिए वे सावरकर को भारत रत्न देने पर उतारू हो आए हैं. पंजाब में तो सिक्ख समुदाय के लोग आरएसएस प्रमुख मोहन भगवत के उस बयान के खिलाफ सड़कों पर हैं. जिसमें उन्होंने सभी भारतीयों को हिन्दू कहा था.

योग्यता, योगदान या राष्ट्र निर्माण के लिहाज से देखें तो किसी तेंदुलकर देशमुख या मुखर्जी की तरह सावरकर ने उल्लेखनीय कुछ नहीं किया है. हां उनमें आजादी के लिए एक जुनून जरूर था. लेकिन चूंकि वह सिर्फ जुनून ही था इसलिए उसमें सामाजिक विवेक और समझ का सर्वथा अभाव था. कोई भी उदारवादी हिन्दू सावरकर को भारत रत्न देने की जिद से इत्तफाक नहीं रख सकता. दरअसल में सावरकर एक रोमांटिक से क्रांतिकारी थे और गांधी एक परिपक्व नेता थे. सावरकर की पहचान सबूत की मोहताज है लेकिन गांधी की नहीं. सावरकर ने सजा से बचने कोई छह बार अंग्रेजों से लिखित में माफी मांगी. लेकिन गांधी वह शख्सियत थे जिनके सत्याग्रहों और आंदोलनो से अंग्रेज़ थर्राते थे. अगर गांधी की व्यक्तिगत कमजोरियों को छोड़ दें तो वे एक सर्वमान्य नेता थे खास तौर से दलितों और मुसलमानों के भी.

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हिंदूवादियों के पास कभी कोई ऐसा चेहरा नहीं रहा जो सभी को स्वीकार्य हो इसलिए 2014 से सत्ता हासिल करने के बाद से वह दीनदायाल उपाध्याय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी बगैरह के बाद बल्लभ भाई पटेल को यह रुतबा देने की पूरी कोशिश कर चुकी है. लेकिन देश का आम आदमी उनसे इत्तफाक नहीं रख रहा. और यह आम आदमी वे 80-85 करोड़ लोग होते हैं, जो दलित आदिवासी और मुसलमानों सहित दूसरे अल्पसंख्यक धर्मों के अनुयायी हैं. 10-15 करोड़ लोग आंख बंद कर सरकार के हर जायज नाजायज फैसले से इत्तफाक रखते हैं तो उन्हें मुख्यधारा या संविधान की प्रस्तावना में वर्णित हम भारतीय नहीं बल्कि हम हिन्दू माना जा सकता है जिनकी इन दिनों तूती बोल रही है.

ऐसे में सावरकर को भारत रत्न दे देना कोई हैरत की बात नहीं होगी लेकिन कांग्रेस की वैचारिक हार जरूर होगी. जिसमें प्रणव मुखर्जी का भारत रत्न ले लेना एक बड़ा फैक्टर है. अगर सचमुच कांग्रेस सावरकर को भारत रत्न देने की विरोधी कुछ सटीक तर्कों के साथ है तो उसे प्रणव मुखर्जी पर दबाव बनाना चाहिए कि वे भी पुरुस्कार वापसी गैंग में शामिल हो जाएं. यह जरूर भाजपा सरकार और हिंदूवादियों की करारी शिकस्त होगी लेकिन प्रणव मुखर्जी पानी से राजतिलक करवाने के बाद लंका छोड़ेंगे ऐसा लग नहीं रहा.

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