साल 1991 में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को अपनाते समय देश के लोगों को यह विश्वास दिलाया गया था कि यह देशहित में होगा. आज 29 साल बाद पूंजीवाद के प्रभावों की दोबारा से समीक्षा की जानी चाहिए. उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों से इस देश में सब से ज्यादा प्रभावित तबका किसान और मजदूर तबका रहा है.

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