साध्वी कम नेत्री ज्यादा उमा भारती के बारे में अगले बहुत दिनों तक भी किसी को कोई खबर नहीं रहेगी क्योंकि वे हिमालय की तरफ प्रस्थान कर गई हैं. इस मिथ्या, पापी संसार और मोहमाया से कुछ दिनों तक उमा के दूर कथित एकांत में रहने के फैसले का असली मकसद क्या है, यह तो उन के पुन: प्रकट होने के बाद पता चलेगा, लेकिन अंदाजा यह लगाया जा रहा है कि वे भोले शंकर की घनघोर अल्पकालिक तपस्या कर कोई हाहाकारी वरदान ले कर ही लौटेंगी. उन के वर्तमान राम और हनुमान उन्हें पसंद नहीं करते और उन्होंने उमा भारती का ऐसे ही त्याग कर दिया है जैसे कभी पौराणिक कथा के अनुसार सीता को त्यागा गया था.

अमरिंदर बाहुबली

2014 के लोकसभा चुनाव में अमृतसर लोकसभा सीट से भाजपाई दिग्गज अरुण जेटली को मोदी लहर में धूल चटा देने वाले अमरिंदर इन दिनों कई मोरचों पर एकसाथ जू झ रहे हैं. पहले तो लंगर में जीएसटी के मुद्दे पर अपनी सियासी दुश्मन नंबर वन केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर को उन्होंने मूर्ख  कहते धूल चटाई, फिर अपनी ही पार्टी के नवजोत सिंह सिद्धू क

विवाद तकनीकी तौर पर सुल झाया और जब बारी करतारपुर कौरिडोर के उद्घाटन की आई तो उन्होंने खुद के पाकिस्तान जाने से साफ इनकार कर हाट लूट ली.

अब इस कौरिडोर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे. इस बीच, पंजाब के भाजपाई सिख और सहयोगी आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के इस बयान से खफा हैं कि देश के सभी लोग हिंदू हैं. इस विवाद का बचपना ही पंजाब में हाहाकार मचा रहा है तो उस की जवानी तो तय है

और कहर ढाएगी, जिस का सियासी फायदा लेने से अमरिंदर चूकेंगे, ऐसा लगता नहीं.

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कल के जोगी और…

क्रिकेटर से पूर्वी दिल्ली के भाजपा सांसद बन गए गौतम गंभीर अब दिल्ली का मुख्यमंत्री बन जाने का भी ख्वाब देखते दार्शनिकों जैसे अंदाज में कहने लगे हैं कि यह एक सपना मुकम्मल होने जैसी बात होगी.

राजनीति का ककहरा पढ़ रहे इस अतिउत्साही युवा को शायद ही सम झ आए कि दिल्ली यों ही दिल्ली नहीं कही जाती, और भाजपा पूरे देश में कहीं खुद को असहज महसूस कर रही है तो वह दिल्ली ही है जहां के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तोड़ वह नहीं ढूंढ़ पा रही.

जैसे ही दिल में दिल्ली के तख्तेताउस का खयाल आया तो गौतम को केजरीवाल के कामकाज में खामियां नजर आने लगीं और वे इन्हें गिना भी रहे हैं. लेकिन, उन के सपने के आड़े केजरीवाल की लोकप्रियता और जमीनी कामों से ज्यादा दिल्ली भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष के मनोज तिवारी आ रहे हैं जो इसे देखने में उन से कहीं सीनियर हैं. देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली की सियासी पिच पर गौतम कितने टिक पाएंगे.

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डायपर में हिंदी

दक्षिणी राज्यों में हिंदी की स्थिति समोसे सरीखी ही है जो बड़े शहरों में मिल तो जाता है लेकिन उस का स्वाद उत्तर भारत सा नहीं होता. जैसे ही अमित शाह ने ‘एक देश, एक भाषा’ का फ्लौप राग अलापा तो अभिनेता से नेता बनने की प्रक्रिया से गुजर रहे नवोदित पार्टी मक्कल निधि माइम के मुखिया कमल हासन सब से पहले भड़क कर बाजी मार ले गए, जिन की नजर में हिंदी डायपर में छोटा बच्चा है.

यह मानव कल्पना से परे तुलना है जिस का मकसद और मैसेज यह है कि दक्षिण में भाजपा का हिंदुत्व नहीं चलने वाला और भाषा के संवेदनशील मसले पर रजनीकांत और कमल हासन सरीखे नेता एनटीआर, एमजीआर और करुणानिधि वगैरह के डिजिटल संस्करण हैं.

दलितों और गरीबों की राजनीति कर रहे कमल हासन तय है कि वे हिंदी थोपने की भाजपाई मंशा को चुनावी मुद्दा बनाएंगे. भले ही फिर पूरी भाजपा लुंगी पहन कर खुद को साउथ इंडियन दिखाने का टोटका आजमा ले, वहां के वोटर का ध्यान तेजी से लोकप्रिय हो रहे कमल हासन से हटाना उस के लिए टेढ़ी खीर ही साबित होगा.

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