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नींद में प्रशासन, फरार डॉक्टर और बेहाल जनता

गुजरे रविवार यानी 15 मार्च 2020 को उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह ने कहा कि राज्य में लापता 700 सरकारी डॉक्टर जल्द ही बर्खास्त किए जाएंगे. गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में ऐसे 700 चिकित्सक चिन्हित किए गए हैं,जो सरकारी अस्पतालों में नियुक्ति लेने के बाद या तो कहीं दूसरी जगह चले गए हैं या बगैर बताए उच्च शिक्षा लेनी शुरू कर दी है अथवा चुपचाप अपना निजी नर्सिंग होम चला रहे हैं.

सरकार या प्रशासन को इनके बारे में कुछ भी पता नहीं है. उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री के मुताबिक़ ऐसे डॉक्टरों की बर्खास्तगी की प्रक्रिया शुरू हो गई है और एक डेढ़ महीने में इन सभी की सेवाएं समाप्त कर दी जाएंगी.

ये कहानी न तो आज की है और न ही अकेले उत्तर प्रदेश की है. देश के सभी राज्यों में सरकारी डॉक्टरों की यही कहानी है. अब उत्तराखंड को ही लें. उत्तराखंड में पिछले पांच सालों से 48 सरकारी डॉक्टर ड्यूटी से गायब हैं. जिन्हें पिछले साल बर्खास्त किये जाने की बात सरकार द्वारा कही गयी थी. जिस समय इन 48 को बर्खास्त किये जाने की खबर आयी थी, उसी समय यह बात भी पता चली थी कि उत्तराखंड में इनके अलावा 150 अन्य डॉक्टर हैं, जो पिछले 6 महीनों से गायब हैं. यह स्थिति तब थी जबकि प्रदेश की कुल 2109 स्वास्थ्य यूनिटों में मौजूद डॉक्टरों के 2715 पदों में से पहले ही केवल 1104 डॉक्टर थे.

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लेकिन किसी एक या दो प्रदेशों को क्यों रोएं जब सबकी यही कहानी हो? देश में कोई भी ऐसा प्रदेश या महानगर नहीं है, जहां रजिस्टरों के हिसाब से ड्यूटी में मौजूद कुछ डॉ. लापता न हों. मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पास वर्ष 2017 तक कुल 10.41 लाख डॉक्टर पंजीकृत थे. इनमें से सरकारी अस्पतालों में 1.2 लाख डॉक्टर थे. शेष डॉक्टर निजी अस्पतालों में कार्यरत थे अथवा अपनी निजी प्रैक्टिस कर रहे थे.लेकिन कागजों में देशभरके सरकारी अस्पतालों में जितने डॉक्टर थे,हकीकत में इससे करीब 25% कम थे.न जाने डॉक्टर कहां गायब हो जाते हैं.लेकिन हैरानी की बात यह है कि इनके गुमशुदा होने की कहीं कोई रिपोर्ट भी नहीं लिखाई जाती. लगता है इनके घर वालों को भी इनकी चिंता नहीं होती.

विश्व स्वास्थ्य संगठन को आधार मानें तो देश में पहले से ही 600,000 डॉक्टरों और 20 लाख नर्सों की कमी है. डब्लूएचओ के मुताबिक़ हर 1000 की आबादी में औसतन 1 डॉक्टर होना चाहिए. लेकिन हिन्दुस्तान में 11,082 की आबादी पर महज एक डॉक्टर है. इस तरह देखें तो यह अनुपात तय मानकों के मुकाबले 11 गुना कम है.हद तो यह है कि यह अनुपात भी सभी प्रान्तों में नहीं है. बिहार में तो 28,391 लोगों की आबादी पर एक एलोपैथिक डॉक्टर उपलब्ध है. उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की हालत भी इससे कोई बेहतर नहीं है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साल 2016  में एक और डराने वाली तस्वीर दिखाई थी. इसके मुताबिक़ भारत में एलोपैथिक डॉक्टर के तौरपर उस समय प्रैक्टिस कर रहे  एक तिहाई डॉक्टरों के पास मेडिकल डिग्री ही नहीं थी. भारत में स्वास्थ्य के मद में होने वाले खर्च का 67.78 प्रतिशत लोगों की जेब से ही निकलता है,जबकि इस मामले में वैश्विक औसत महज 17.3 प्रतिशत है.ये आंकड़े बताते हैं कि हमारी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी बदहाल है.

बदहाल सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था और घोर गरीबी का कॉकटेल आधे से ज्यादा भारतीयों को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित करता है.

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विश्व स्वास्थ्य सांख्यिकी रिपोर्ट 2018 के अनुसार,भारत में लगभग 23 करोड़ लोगों को 2007 से 2015 के दौरान अपनी आय का 10 फीसदी से अधिक पैसा इलाज पर खर्च करना पड़ा. यह संख्या ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की संयुक्त आबादी से भी अधिक है. भारत की तुलना में इलाज पर अपनी आय का दस प्रतिशत से अधिक खर्च करने वाले लोगों का प्रतिशत श्रीलंका में 2.9 फीसदी, ब्रिटेन में 1.6 फीसदी, अमेरिका में 4.8 फीसदी और चीन में 17.7 फीसदी है.डब्लूएचओ के महानिदेशक ट्रेडोस एडहानोम गेबेरियस के मुताबिक़, ‘ भारत में बड़े पैमाने पर लोग उन बीमारियों से मर रहे हैं,जिनका इलाज मौजूद है और जिसे बड़ी आसानी से रोका जा सकता है.’ यही नहीं बहुत से लोग केवल इलाज पर अपनी कमाई खर्च करने के कारण गरीबी में उलझ जाते हैं.

हिन्दुस्तान में कुल आबादी के 3.9 प्रतिशत यानी 5.1 करोड़ लोग अपने घरेलू बजट का एक चौथाई से ज्यादा इलाज पर ही खर्च कर देते हैं. जबकि श्रीलंका में ऐसी आबादी महज 0.1 प्रतिशत है,ब्रिटेन में 0.5 फीसदी, अमेरिका में 0.8 फीसदी और चीन में 4.8 फीसदी है.रोटी, कपड़ा और मकान इंसान की बुनियादी जरूरतें भले ही हैं, लेकिन अच्छा स्वास्थ्य और उसे बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है और उसके लिए डाक्टरों की कमी को दूर करना समय की पहली जरूरत है.

यही वजह है कि अमरीका जैसे देश में भी रोगी को उच्च-चिकित्सा सुविधा बिलकुल मुफ्त मिलती है.जबकि भारत में इस वजह से करीब 65 प्रतिशत लोग उच्च-चिकित्सा की सुविधा की सोचे बिना मर जाते हैं.यही नहीं उच्च-चिकित्सा से 5.7 करोड़ लोग गरीबी की रेखा में सिमट जाते हैं.

बड़े पैमाने पर देश में एंटीबायोटिक-उपचार योग्य मौतें हो रही हैं.कहने का मतलब ऐसी मौतें जिन्हें एंटीबायोटिक के उपयोग से बचाया जा सकता था. लेकिन हिन्दुस्तान में बड़ी संख्या में ऐसे मरीज होते हैं जिनके पास एंटीबायोटिक खरीद पाने की क्षमता ही नहीं है. लेकिन भारत में मेडिकल विद्रूपताएं सिर्फ एक जैसी नहीं हैं.कुछ दूसरी तरह की भी समस्याएं हैं जो मेडिकल शिक्षा के बाजारीकरण से पैदा हुई है.

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मसलन देश में एलोपैथी के डॉक्टरों में से करीब 46 फीसदी यानी 5.3 लाख डॉक्टर सिर्फ चार राज्यों में रजिस्टर्ड हैं. 31 जनवरी, 2019 तक अद्यतन किये गए आंकड़ों के मुताबिक, देश में एलोपैथिक डॉक्टरों की संख्या 11.57 लाख हो गयी. जिन चार राज्यों में देश के आधे डॉक्टर रजिस्टर्ड हैं वे हैं-आंध्र प्रदेश (1,00,587), कर्नाटक (1,22,875), महाराष्ट्र (1,73,384) और तमिलनाडु (1,33,918) हैं.

ऐसा नहीं है यह बात सरकार को नहीं पता यह आंकड़ा सरकार का ही है. मगर सवाल है इस असंतुलन को दूर करने के लिए क्या सरकार कुछ करेगी? एकेडमी ऑफ फैमिली फिजीशियंस ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट डॉ.रमन कुमार कहते हैं, ‘ चार राज्यों में इतने डॉक्टरों का रजिस्ट्रेशन मेडिकल शिक्षा के बाजारीकरण का एक नमूना है. महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के मेडिकल कॉलेजों में में तीन चौथाई सीटें हैं.’ यह भी एक बीमारी है.

भ्रष्टमेव जयते

शासकीय सेवा में मैं ने 35 वर्ष गुजारे हैं और इतने लंबे कार्यकाल के अनुभव के बाद यही समझ में आया कि सफलता की कुंजी हमेशा परिश्रम, लगन और निष्ठा नहीं है, बल्कि खुराफाती दिमाग, स्कीमिंग में माहिर, चाटुकारिता में पीएचडी हासिल हो तो वही आज रेस का अपराजित घोड़ा बन सकता है. वैसे भी हमारा समाज नेताओं और नौकरशाहों के आसरे चलता है, पर अभी मैं उच्चतर सेवा की बात कर रहा हूं. आईसीएस का नाम बहुत था और गोरी सरकार के योजनाकार यह बखूबी जानते थे कि हिंदुस्तान में राज करने के लिए सेवा में ऐसे भारतीय चुने जाएं जो पश्चिमी सभ्यता से खासे प्रभावित रहते हों, फिर वे चाहे मध्यवर्गीय परिवार के ही क्यों न हों. घर में ‘बाबूजी’, ‘अम्माजी’ में कम आत्मीयता बल्कि ‘मम्मी’, ‘डैडी’ संबोधन में अधिक निकटता पाते हों.

वर्ष 1970 तक यह आईसीएस ब्रीड खत्म होने लगी और आला अधिकारी का चयन यूपीएससी के द्वारा होने लगा. पर चयनकर्ता भी पुराने आईसीएस से खासे प्रभावित थे, इसलिए प्रारंभ में ऐसे अधिकारी चुने गए जो न तो पूरी तरह भारतीय परिवेश में ढले थे, न ही अंगरेज अफसरों की तरह अनुशासित ही थे. पर हां, वे चयनित अधिकारी अकसर निष्ठावान व ईमानदार थे. वे न तो कानून व नियमों की अनदेखी करते थे और न ही मंत्री महोदय के गलत फैसले में साथ देने में कोई रुचि रखते थे. ऐसे अफसर यह समझते थे कि राजनीतिक दखल, बल्कि कहें स्वार्थपूर्ण दखल, को नजरअंदाज करने पर अधिक से अधिक उन का स्थानांतरण अन्यत्र कर दिया जाएगा.

 

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समय ने करवट बदली और लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल के बाद इंदिरा गांधी का दौर आया, जहां नौकरशाही और कौर्पोरेट सैक्टर के कंपनी मालिकों को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा. कौर्पोरेट जगत का भी सोचना था कि यदि उन के हित की पालिसी बनती है और शासनतंत्र उस में अघोषित भागीदारी धन के लालच में, सहज में करने को तैयार है तो फिर सब आसान ही होता है.

मंत्रीगण और नौकरशाह जुट गए कि कैसे होशियारी से शासन को चूना लगाया जा सकता है. इस दौड़ में जो बाधाएं आईं, उन्हें निबटाया गया, कुछ अर्थ लालच से, कुछ अपने प्रभाव से, रास्ते आसान हो गए. मानसिकता इतनी बदली कि सही और गलत में कोई सीमारेखा नहीं बची जो लांघी न गई हो.

मुझे याद है, एक बड़े अधिकारी द्विवेदीजी थे जो वर्ष 1975 के आसपास सेवा में आए थे. उन का काम करने का तरीका अलग था. अधिकतर फाइल की नोटिंग में लिख देते थे, ‘कृपया चर्चा करें’ अथवा ‘इस नस्ती पर चर्चा की जाए जब मैं अपेक्षाकृत कम व्यस्त रहूं’. एक ऐसी फाइल जिसे अपर सचिव महत्त्वपूर्ण मानते थे पर चर्चा करने के लिए समय लेने हेतु वे 2-3 माह तक साहब के पीए और गंगाराम (चहेता चपरासी) को चाय व कोल्डडिं्रक पिलाते रहते यह पता करने के लिए कि साहब कब कम व्यस्त रहेंगे. किंतु मुहूर्त नहीं आया और द्विवेदीजी का ट्रांसफर किसी अन्य मलाईदार महकमे में हो गया.

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ऐसा नहीं था कि द्विवेदीजी सभी नस्तियों पर ऐसा नोट लिख देते थे. कुछ पर विशेष कृपा भी होती है. उदाहरण के लिए उन के खास परिचित के फोन आने के बाद ऐसी नस्ती प्राथमिकता की श्रेणी में आ जाती थी. अथवा मंत्री महोदय के कोड वर्ड के कारण ‘अर्जेंट’ हो जाती थी, और फिर ऐसी फाइलें 2-3 घंटे में ही निबट जाती थीं.

द्विवेदीजी की बिदाई हो गई. उन के एक नजदीकी मित्र टहलते हुए मिल गए. पूछने पर पता चला कि द्विवेदीजी के काम करने का यही ढंग था. वे दिनभर औफिस में या तो फोन पर बतियाते रहते थे या रंगीन उपन्यास पढ़ते रहते थे. फाइल में टीप देना कि ‘व्यस्त’ हैं, उन के गुरु का गुरुमंत्र था.

उन के ही बैच के एक अन्य आला अधिकारी थे मीणाजी. वे राजस्थान के सुदूर अंचल से आते हैं. बचपन में ही विवाह हो गया था, किंतु उच्च सेवा में आने के बाद ‘राम प्यारी’ उन्हें रास नहीं आती थी. एक दूसरा विवाह कर लिया जिस का कोई रिकौर्ड नहीं था. घर पर 8-10 विदेशी कुत्ते थे जिन की सेवाटहल के लिए 4-5 चपरासी लगे रहते थे. पहली पत्नी से 2 लड़के आस्टे्रलिया में पढ़ रहे थे. मीणाजी बहुत समय ‘खनिज विभाग’ में थे. नीचे वालों पर रोब गांठना उन का प्रिय काम था. अपने साथ आचारसंहिता की पुस्तक रखते थे. कोई कर्मचारी नेता यदि पान चबाते हुए जोरजोर से बतिया रहा हो या दांत निपोर रहा हो तो फौरन ‘अनुशासनात्मक कार्यवाही’ हेतु सिफारिश कर देते थे.

3 साल पहले वे रिटायर हुए. पहली पत्नी गांव में रहती है. दोनों बेटे विदेश में अध्ययन करने के बाद माइनिंग विभाग (खनिज) का बड़ा ठेका लेते हैं. परंतु पिताजी से बेटों की आएदिन गालीगलौज होती है. महल्ले में उन्हें कोई नमस्कार नहीं करता. न तो अब विलायती कुत्तों की आवाज आती है और न ही आचारसंहिता का भय बेटों को अनुशासन में बांधता है.

यह आज का राज दरबारी है- ‘भ्रष्टमेव जयते’.

गुरु: पार्ट 3

लेखक- डा. प्रणव भारतीय

वाशबेसिन के सामने ही रसोईघर था जहां से पकवान बनने की मधुर सुगंध वातावरण में पसर रही थी. अनु ने एक बार उस ओर दृष्टि डाली और हाथ में पकड़े नैपकिन को गीला कर के बच्चों के मुंहहाथ साफ करने लगी.

‘‘ओहो, आज कहां चले गए थे गुरुदेव? और गले में यह हार कहां से पहन आए?’’ रसोईघर के दरवाजे से आवाज आ रही थी, मानो कोई बहुत करीबी व्यक्ति अधिकारपूर्वक छेड़खानी सी कर रहा था. अनु ने मुड़ कर देखा, सुंदर व्यक्तित्व वाला वह व्यक्ति रसोईघर के द्वार पर खड़ा हुआ था, गले में पड़ी हुई रेशमी फुनगों की रंगबिरंगी माला पर भी अनु की दृष्टि गई.

‘‘शुक्रताल की तरफ चला गया था, वहीं किसी भक्त ने यह गले में डाल दी,’’ उस के मुख पर आत्माभिमान देख कर अनु को धक्का सा लगा, जैसे अचानक सुंदरता की इमेज भरभरा कर गिरने लगी हो. इस से भी गजब तब हुआ जब उन तथाकथित गुरुजी ने अपनी लंबी श्वेत गरदन से माला निकाल कर रसोईघर के भीतर खड़ी हुई उस महिला की ओर उछाल दी जो उन से कुछ चुहल सी कर रही थी. माला महिला के चरणों में जा गिरी, जिसे उठा कर, चूम कर हाथों में एक बहुमूल्य जेवर की भांति कैद कर लिया गया.

अनु का मूड खराब हो गया. क्या आदमी है? किसी की संवेदनाओं को किस बेरहमी से किसी परस्त्री के चरणों में फेंक दिया था. अनु ने उन महापुरुष की विद्वत्ता के बारे में बहुतकुछ सुन रखा था, ऊपर से उन का सुदर्शन व्यक्तित्व देख कर वह जिस प्रकार अचानक प्रभावित हुई थी, उतनी ही शीघ्रता से वह व्यक्ति उस की नजरों से गिरने लगा. उन के इस कृत्य से वह असहज हो उठी. जब तक स्त्रियों की भीड़ में वह आ कर बैठी, गुरुजी भी फिर अपनी आरामकुरसी पर आ कर झूलने लगे थे.

कुछ देर गुरुजी अपनी भक्तिनों से बातचीत करते रहे. उन्होंने अनु की ओर इशारे कर के उस के बारे में कई बातें जानने का प्रयत्न किया किंतु अब अनु का मन उन से बात करने का कतई नहीं था. कुछ ही देर पूर्व का उस का उन की ओर का आकर्षण न जाने कहां लुप्त हो चुका था. उस के लिए पूछे गए प्रश्नों का उत्तर और बहुत थे देने वाले. कुछ देर में उन का आराम करने का समय हो गया और सामने वाले एक कमरे में 2 स्त्रियों के साथ प्रवेश कर गए. शायद वे उन की सेवा करने के लिए उन के साथ भीतर कमरे में बंद हो गई थीं. जातेजाते वे सब के सिरों पर शुभाशीष का हाथ फिराते हुए गए, सब मानो कृतज्ञ हो गईं.

अनु को लगा किसी लिजलिजी छिपकली ने उसे छू लिया हो. उस में यह बहुत बड़ा अवगुण था कि वह कुछ जल्दी ही निर्णय के शिखर पर जा खड़ी होती थी. जितनी जल्दी वह किसी से प्रभावित होती, उतनी ही शीघ्रता से किसी बेहूदगी को महसूस कर के वह धम्म से नीचे आ गिरती.

खैर, गुरुदेव जी अपने शयनकक्ष में जा चुके थे. रसोईघर से उन का नाश्ता कमरे में भेजा जा रहा था. उपस्थित सभी लोगों को भी उन के भोग लगाने के बाद प्रसाद रूप में नाश्ता करने का अनुरोध किया गया था.

वह उखड़ चुकी थी और बच्चों ने तो वैसे ही चिल्लपौं मचा रखी थी. मगर दीदी प्रसाद लिए बिना बिलकुल भी उठने के मूड में दिखाई नहीं दे रही थीं. स्त्रियों में न जाने कहांकहां की बेसिरपैर की बातें होने लगी थीं. कुछ जेवरों की, कुछ डिजाइनर साडि़यों की…और हां, कुछ यह कि गुरुजी ने इस बार किसकिस के यहां भोजन करना स्वीकार किया है. अनु के दिमाग में गुरुजी द्वारा किसी अन्य स्त्री के पैर?ों में फेंकी गई माला का दृश्य निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था, जो उसे बेचैन कर रहा था.

बड़ी मुश्किल से उस का समय बीत रहा था. सामने मेज पर स्वादिष्ठ नाश्ते की प्लेटें सजा दी गई थीं. गुरुजी के नाश्ता ग्रहण करने के बाद प्रसादस्वरूप नाश्ता सामने था. भूख का समय था. सब स्त्रियां नाश्ते की ओर बढ़ चलीं.

‘‘आ जाओ बच्चो,’’ दीदी बड़े प्यार से बच्चों के लिए प्लेट सजा रही थीं कि अंदर से उन के लिए बुलावा आया.‘‘अनुप्रिया, लो तुम बच्चों को नाश्ता कराओ और तुम भी ले लो, मैं अभी अंदर जा कर आती हूं,’’ दीदी के पैरों में पंख लग गए थे.लगभग 10 मिनट बाद दीदी खिले फूल सी वापस आ गईं.

‘‘अनुप्रिया, तेरा तो समय खुल गया. गुरुजी ने खुद ही तेरे घर खाना खाने की बात की है,’’ दीदी के मुख से जैसे शब्द उछलउछल कर बाहर कूदने के लिए आतुर हो रहे थे.अनु को कुछ समझ में नहीं आ रहा था, उस ने कब गुरुजी को अपने घर भोजन का निमंत्रण दिया था? नाश्ता करती हुई महिलाओं में फिर फुसफुसाहट शुरू हो गई थी.

‘‘और वह भी बिना किसी दक्षिणा के,’’ दीदी के मुख की रौनक देखने वाली थी. गुरुजी किसी के निवास पर भोजन ग्रहण करने के लिए कम से कम 5 हजार रुपए दक्षिणा में लेते थे, दीदी न जाने कितनी बार उस के और मां के सामने यह जता चुकी थीं. अनुप्रिया का मन और भी खराब हो गया. ‘तू कौन? मैं खामखां’ उस ने कब गुरुजी को भोजन कराने की इच्छा प्रकट की थी? मन ही मन वह भन्नाई.

अब तो महिलाओं के चेहरे देखते ही बनते थे. ईर्ष्या से उन के मुखड़े लाल होने लगे थे. स्वादिष्ठ नाश्ता जैसे उन्हें अचानक ही कड़वा लगने लगा था. न जाने उन्होंने कितनीकितनी दक्षिणा का प्रलोभन दे कर गुरुजी को अपने घरों में भोजन के लिए आमंत्रित किया था, किंतु गुरुजी के पास समय ही नहीं होता था. अब कैसे उन्होंने समय निकाल लिया? प्रश्न थे कि महिलाओं के मस्तिष्क में उमड़े पड़ रहे थे. वे अनुप्रिया की ओर ऐसे देखने लगी थीं मानो उस ने गुरुजी पर कुछ जादू कर दिया हो.

अनुप्रिया का मन उद्विग्न हो उठा. वह अब जल्दी घर लौटना चाहती थी. कुछ ही देर में उस ने उक्त गुरु के बंटेछंटे चरित्र को अपने मन में परिभाषित कर लिया था. दीदी मन ही मन झूम रही थीं जबकि अनु ने खूब पक्का निश्चय कर लिया था कि बेशक गुरुजी नामक यह प्राणी उसे पैसे दे कर भी उस के घर भोजन करने आना चाहे तो भी वह उन्हें कभी आमंत्रित नहीं करेगी.

गुरु: पार्ट 2

लेखक- डा. प्रणव भारतीय

आगे बढ़ कर उस ने बच्चों के बालों में प्यार से उंगलियां फिरानी शुरू कर दीं. मां रसोईघर में नाश्ते की तैयारी के लिए चली गई थीं.

ठीक पौने 9 बजे दीदी की गाड़ी घर के सामने आ कर थम गई. अनु ने देखा, श्वेत धवल वस्त्रों, श्वेत मोतियों की माला व कर्णाभूषण में सुसज्जित दीदी के सुंदर मुख पर रोशनी दमक रही थी. आगे बढ़ कर उस ने दीदी के चरण स्पर्श किए और उन से अंदर आने का अनुरोध किया.

‘तैयार नहीं हुईं अभी तक? और बच्चे कहां हैं?’’ उन के चेहरे पर उस के तैयार होने को ले कर शंका उभरी थी, उन्होंने बच्चों के लिए लाए हुए फलों का थैला अनु को पकड़ाते हुए मानो बहुत बेचैनी से पूछा. उन की सुंदर गोलगोल बड़ी आंखें बच्चों को खोजती हुई रसोईघर के सामने के बरामदे में पड़ी खाने की मेज पर जा चिपकीं और उन के मुख पर अपने प्यारे, सुंदर भतीजीभतीजे को देख कर प्यारी सी मुसकान खिल उठी.

‘‘चलोचलो, जल्दी खत्म करो, गुरुजी तुम्हें आशीर्वाद देने के लिए बुला रहे हैं.’’ 3-4 साल के बच्चों की समझ में कुछ आया या नहीं, हां, उन्हें इस तरह जल्दीजल्दी कौर्नफ्लैक्स खाने से छुट्टी जरूर मिल गई थी और वे खानापीना छोड़ कर बूआ से आ चिपटे थे. मां बेचारी नाश्ते के लिए कहती रह गईं, किंतु उस समय दीदी की बौडी लैंग्वेज से जो प्रकाश अवतरित हो रहा था, उस को तो प्रकृति भी क्षीण करने में समर्थ न होती.

दीदी के कंधे पर एक बड़ा सा पर्स था. उन्होंने दोनों हाथों में बच्चों की उंगलियां कस कर पकड़ ली थीं और बाहर की ओर बढ़ चली थीं. उन के पीछेपीछे अनु भी बेचारगी के डग भरती किसी ऐसी पतंग की डोर के समान खिंची चली जा रही थी जिसे पवन ने इतना ऊंचा उड़ा दिया हो कि जिस के कटने की कोई संभावना ही न हो. घर से बाहर निकल कर उन्होंने अपनी गाड़ी में बच्चों को बारीबारी से चढ़ा दिया और फिर अनु को बैठने का इशारा किया.

दीदी के गुरुजी जिस घर में ठहरे हुए थे, वहां की सजावट का तो कहना ही क्या था. रंगबिरंगे फूलों की तोरण और बंदनवार से बंगले का कोनाकोना महक रहा था. बिजली की लडि़यों की रंगबिरंगी कतारें भी थीं, किंतु उन का उपयोग तो रात को ही हो सकता था. रोशनी से सजे हुए बंगले के रात्रिसौंदर्य की कल्पना की अनु ने मन ही मन और उस के मन में आह से वाह हो गया. दीदी सब को अपने साथ बड़े उत्साह से भीतर ले गईं.

सब एक सुंदर व भव्य सजे हुए सिटिंगरूम में से निकल कर बाहर विशाल बरामदे में जा पहुंचे थे जिस में कई सुंदर गलीचे बिछे हुए थे जिन पर कई सजीसंवरी युवा व प्रौढ़ महिलाएं दमकते हुए मुखड़ों पर गुरुजी के दर्शन की चिंता ओढ़े बैठी थीं. दीदी के पहुंचते ही उन के साथ अनु व बच्चों को देख कर महिलाओं में हो रही खुसुरफुसुर का रुख उन की ओर मुड़ गया.

अनु उन में से कुछ महिलाओं से पहले कभी मिल चुकी थी. सभ्यतावश उस ने सब के समक्ष विनम्र हो नमस्कार की मुद्रा में अपने हाथ जोड़ दिए. उसे आशीर्वाद भी मिले. जो महिलाएं अनु से परिचित थीं, वे आधिकारिक रूप में उसे अपने पास बैठने का आग्रह करने लगीं. उसे तो दीदी के साथ ही बैठना था. वह दीदी के पीछे जा कर बैठ गई. बच्चे कुछ असुविधा सी महसूस करने लगे थे. दीदी ने उन को अपने पास बैठा कर उन के हाथ में एकएक चौकलेट पकड़ा दी थी. उन दोनों के कुछ सैकंड्स पहले फूले हुए मुंह अचानक बड़ीबड़ी चौकलेट्स देख कर खिल उठे थे और वे अपनी स्वाभाविक चंचल मुद्रा में चौकलेट्स के रैपर खोलने लगे थे.

‘‘कब आई हो? कब तक रहोगी?’’ जैसे कुछ सवाल परिचित स्त्रियों की ओर से उस की ओर उछाले गए, जिन का उत्तर उस ने धीरेधीरे दे दिया. अचानक एक धीमा शोर सा स्त्रियों के बीच में पसरने लगा.

गुरुजी आ गए. ‘जय महाराजजी की’ कहते हुए सारी स्त्रियां खड़ी होने लगी थीं और गुरुदेव की अगवानी में उन के मुखों पर गुलाब खिलने लगे थे. अचानक अनु को अलसुबह की आकाशगंगा की स्मृति हो आई जो सूर्य के आकाशीय प्रांगण में प्रवेश करते ही गुलाबी हो उठती थी.

पधारने वाले गुरुदेव लंबेचौड़े, बला के सुंदर व्यक्तित्व के धनी थे. उन के गोरे चेहरे पर जैसे लालिमा फूटी पड़ रही थी. वे स्त्रियों के सामने रखी, सजी हुई आरामकुरसी पर बैठ कर झूला सा खाने लगे थे. अपने गोरे, सुडौल हाथ के इशारे से उन्होंने सब को नीचे बैठने का आदेश दे दिया था, जिस का तुरतफुरत पालन हुआ. भक्तिनें दोनों हाथों से ताली बजाबजा कर गुरुगुण गाने लगीं और गुरुदेव की आंखें चारों ओर का निरीक्षण करती हुई गोलगोल घूमने लगीं. जिस मुख पर वे पलभर के लिए अपनी खूबसूरत दृष्टि चिपकाते, उन गालों पर जैसे गुलाब खिल उठते.

गुरुजी के खूबसूरत व्यक्तित्व से अनु प्रभावित हुए बिना न रह सकी. हृदय की धड़कन एकाएक दु्रत गति से मानो मेघमल्हार गाने लगीं. प्रकृति भी कितने खूबसूरत व्यक्तित्व गढ़ती है, अनु ने मन ही मन सोचा. वह कैसे और क्यों प्रभावित होने लगी, मन में कुछ ऊहापोह भी हुई किंतु इस में कुछ भी असत्य न था कि दीदीजी के गुरुजी में बला का आकर्षण था. वह जैसे उन के मुख पर दृष्टि गड़ाए किसी सोच में पड़ गई थी. झटका लगा तब, जब नन्हे बेटे ने पानी पीने की इच्छा जाहिर की.

अनु का ध्यान बच्चों पर गया. दोनों ने चौकलेट से अपने चेहरे पोत लिए थे. कपड़ों पर भी इधरउधर चौकलेट चिपक गई थी. अनु को बच्चों को पानी पिलाने और साफ करने के लिए उठना पड़ा. बच्चों को वह वौशबेसिन की ओर ले चली जो बरामदे के सामने ही था. उस के उठने में दिव्य गुरुगुणगान करती कुछ महिलाओं को खिसकना पड़ा जिस से उन के ध्यान में व्यवधान होना स्वाभाविक था.

‘‘अच्छा, यह सत्संग में नई जुड़ी है?’’ गुरुजी का ध्यान उस की व बच्चों की ओर गया.

‘‘जी, ये रोडवेज वाली की भाभी हैं, मुंबई से आई हैं,’’ परोसे गए प्रश्न का उत्तर कई मुखों से निकला, उस के बोलने की कोई जरूरत ही नहीं थी. वैसे भी किस ने पूछा था उस के लिए वह कहां से आई थी. वह स्वयं भी तो उत्तर दे सकती थी अपने लिए पूछे गए प्रश्न का. इस बहाने इस सौंदर्यपूर्ण व्यक्तित्व से उस की बात हो जाती. उस के मन में क्षणभर को यह आया, पर वह चुपचाप बच्चों को ले कर बेसिन पर पहुंच गई व उन के मुंहहाथ व कपड़े साफ करने लगी.

गुरु: पार्ट 1

लेखक- डा. प्रणव भारतीय

भोर की सुनहरी रुपहली किरणें अनु के मन में एक नया संदेश प्रसारित करती हैं. बड़ा भला लगता है उसे अलसुबह के सूरज से कानाफूसी करना. बचपन से ही मांपापा सूरज के निकलने से पहले ही आवाजें लगाना शुरू कर देते थे. उन दिनों मीठी, प्यारी नींद में से जागना कितना खराब लगता था. मुंह बना कर कई बार करवटें लेते हुए, ‘थोड़ी देर सोने दो न’ कई बार दोहराया जाता. किंतु उस की मां उसे उठाने के दूसरे गुर भी तो जानती थीं.

घर में एक ग्रामोफोन हुआ करता था जिस की ड्राअर में ‘हिज मास्टर्स वौयस’ के न जाने कितने काले रंग के बड़ेबड़े तवे यानी रिकौर्ड्स रखे रहते, साइड में एक छोटी सी और ड्राअर थी जिस में रखी रहतीं छोटीछोटी सूइयां जो तवे पर फिसलती रहतीं और काले तवे में से सुरीले सुर वातावरण में पसर जाते. यह ग्रामोफोन अनु की मां को उन के पिता ने उपहार में दिया था. उन के पास उस जमाने के लगभग सभी फिल्मी, गैरफिल्मी गीत, गजल रहते थे. तवों में हर माह इजाफा होता रहता. कई आवाजें देने पर भी जब अनु के कानों पर जूं तक न रेंगती, मां उसे ग्रामोफोन पर रिकौर्ड लगा देतीं और हाथ से चाबी भरते हुए उसे आवाज देती रहतीं.

‘जागो मोहन प्यारे हमारे…’ गीत की मधुर ध्वनि और मां का उसे उठाने के लिए आवाज देना, दोनों में कोई तालमेल ही नहीं बैठता था. उस की भुनभुन तो चलती ही रहती और जब रिकौर्ड बजतेबजते बिसुरने लगता, तब कहीं उस की कर्कश आवाज से उसे उठना ही पड़ता, मजबूरी जो होती थी.

बड़े होतेहोते धीरेधीरे सुबह की बेला में उठना उसे जाने कैसे अच्छा लगने लगा, शायद घर के सभी सदस्यों के सुबह जल्दी उठने की आदत ने उस में भी धीरेधीरे परिवर्तन ला दिया था. अब न मां के आवाज देने की जरूरत होती थी और न ही ग्रामोफोन बजाने की. बीए में आतेआते अनुप्रिया की नींद अंधेरे में ही खुलने लगी. बस, वह जो आदत पड़ी, उस ने उस की आदतों व सोच में गजब का परिवर्तन करना शुरू कर दिया.

अब उस का विवाह हो चुका था. प्यारे से 2 बच्चों के साथ उस का मातृत्व निखर आया था. ससुराल में सब जब नींद की आगोश में झूम रहे होते, वह उठ कर कमरे की खिड़की खोल कर गुलाबी आसमान को निहार कर सूरज के स्वागत में खड़ी हो जाती. कुछ दिनों में ही वह पति के साथ उन की नौकरी के कारण मुंबई आ गई. यहां उसे लंबीऊंची इमारतों में से कहीं भी आकाश झांकता नजर न आता. लेकिन जब मां के पास मेरठ आती, तब फिर से उस की और सूरज की आंखमिचौनी शुरू हो जाती और वह पहले वाली अनुप्रिया में परिवर्तित हो जाती.

मां कहतीं, जब तक बच्चे छोटे हैं तब तक ही जल्दीजल्दी कहीं आनाजाना मुमकिन है, बच्चों के बड़े होने के बाद तो उन की पढ़ाई आदि के कारण उसे जल्दी से मां के घर आने में भी मुश्किल होगी. अभी तो हर तीसरे माह दोनों बच्चों की उंगलियां पकड़े वह अपने पीहर पहुंच जाती. इसी शहर में उस की एक बड़ी ननद भी रहती थीं. 15 दिन कहां व्यतीत हो जाते, कुछ पता भी न चलता.

दीदी कई दिनों से उस के पीछे पड़ी थीं कि वह उन के गुरुजी से मिले जो उन दिनों शहर में आए हुए थे. न जाने क्यों अनु इन गुरुजी लोगों से दूरी ही बनाए रखती. दीदी तो उस के विवाह से पूर्व ही उसे अपने गुरुजी से मिलाने की बात कर रही थीं. वह ही थी जो न जाने कैसेकैसे दीदी को टालती जा रही थी.

दीदी बड़ी थीं. उन को नकारने के लिए खासी हिम्मत जुटानी पड़ती. फिर भी वह कई दिनों से कुछ न कुछ कह कर उन्हें फंकी दिए जा रही थी. बारबार मन उसे झिंझोड़ता, क्यों आखिर? क्यों मिले वह उन के गुरु से जब भीतर से कोई श्रद्धा, कोई आकर्षण, कोई इच्छा ही न हो तो. लेकिन दीदी थीं और वे भी पति की. मां भी कई बार कह चुकी थीं कि आखिर एक बार जाने में हर्ज ही क्या है, आखिर वे बड़ी ननद हैं.

‘‘अनुप्रिया, सुन भी रही हो मैं ने क्या कहा?’’ दीदी उधर से बोले जा रही थीं न जाने क्याक्या और उस का मन बाहर भाग जाने को हो रहा था.

‘‘अनुप्रिया, तैयार रहना, मैं 9 बजे तक पहुंच जाऊंगी,’’ कुछ रुक कर वे फिर बोलीं, ‘‘और हां, बच्चों को भी तैयार कर लेना, उन्हें भी गुरुजी का आशीर्वाद मिल जाएगा,’’ इतना कह कर दीदी ने फोन रख दिया.

अनु बेमन से इधर से उधर ही देखती रह गई. पूरी बात तो सुनी नहीं थी उस ने. बस, आखिरी बात पर झुंझला कर उस ने फोन रख दिया और फिर से बाहर आ कर खड़ी हो गई. जब से उसे जीवन के प्रति कुछ समझ आने लगी थी, उसे यह प्रकृति बेहद अच्छी गुरु लगने लगी थी. जो हर पल झोली भरती है. उस के लिए न कोई छोटा है, न बड़ा, न अमीर, न गरीब. सब में समानरूप से बांटना है इसे.

कैसा चक्र है इस प्रकृति का जो सारे काम समय पर करती है. ऋतुएं समय पर आती हैं. सांझ समय पर गीत गुनगुनाने उतरती है. सुबह हर रोज मानव को अपनी ऊर्जा से रोशन करने सूर्य के रथ पर सवार हो खिलखिलाती चली आती है. प्रकृति सारे काम अपने समय पर करती है. भला, सूरज से अनुशासित कौन गुरु हो सकता है. जिस प्रकृति से हम सीख सकते हैं, उस से न सीख कर बाहर के गुरुओं के पास भटकने की आखिर आवश्यकता ही क्या है? सूर्य की ओर दृष्टिपात करते हुए वह दीदी के गुरुजी से मन ही मन प्रकृति की तुलना करने लगी. रसोई के कपड़े से अपने हाथ पोंछती मां उस के पास आ कर खड़ी हो गई थीं.

‘‘रेनू का फोन था?’’ मां की मुसकराहट ने जैसे उसे चिढ़ा दिया, ‘‘वही कह रही होंगी, गुरुजी के पास ले जाने के लिए तुझे,’’ मां ने अपने विश्वास पर मुहर लगाई, फिर बोलीं, ‘‘ऐसी भी क्या जिद है, अनु. चली जा न एक बार. कोई भूत नहीं चिपट जाएंगे तेरे. आखिर बड़ी हैं, तेरा कुछ गलत तो चाहेंगी नहीं.’’

‘‘जाना तो होगा ही, बच्चों को भी उठा कर तैयार करना होगा. उन की बूआ उन्हें भी आशीर्वाद दिलाने ले जाना चाहती हैं. इस प्रकृति के समान परोपकारी व आशीर्वाद देने वाला गुरु और कौन होगा भला? बेकार ही हम इन तथाकथित गुरुओं के चक्कर में अपना समय, ऊर्जा और धन बरबाद करते रहते हैं,’’ भुनभुनाते हुए अनु ने मां के सामने अपनी नाराजगी प्रदर्शित कर दी और बच्चों को जगाने कमरे की ओर बढ़ गई. पता ही नहीं चला कब 7 बज गए थे और बच्चों को जगाना क्या कोई खेल था? उसे अपने बचपन की नींद याद आ गई और एकाएक उस के चेहरे पर एक मुसकान की परत चढ़ गई.

जैविक खादें गुणवत्ता से भरपूर

अधिक से अधिक पैदावार लेने के चक्कर में ज्यादातर किसान जैविक खादों के इस्तेमाल में जरा भी दिलचस्पी नहीं लेते, जिस का नतीजा यह होता है कि खेतों की मिट्टी की सेहत खराब होती जा रही है. इस बात को ध्यान में रख कर हर किसान को अपने खेतों में ज्यादा से ज्यादा जैविक खादों का इस्तेमाल करना चाहिए.

जैविक खादों का खेती में बहुत ही अहम रोल है. जैविक खाद खेतों को लंबे समय तक उपजाऊ बनाए रखती है. साथ ही, उत्पाद की क्वालिटी भी अच्छी होती है. खेती में बढ़ते खर्चों को कम करने के लिए भी जैविक खादों का इस्तेमाल फायदे का सौदा साबित होता है.

आइए जानें, कुछ जैविक खाद बनाने के तरीके :

काऊ पैट पिट

दुधारू गाय के गोबर से एक तय आकार के गड्ढे में बनाई जाने वाली खाद काऊ पैट पिट यानी सीपीपी कहलाती है.

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जरूरी चीजें : जमीन में 100 सैंटीमीटर लंबा, 60 सैंटीमीटर चौड़ा व 45 सैंटीमीटर गहरा ईंट का गड्ढा. दुधारू गाय का ताजा गोबर25 किलोग्राम. लगभग 50-60 ईंट या लकड़ी का डेढ़ फुट चौड़ा व 3 फुट लंबा 2 पटरा वडेढ़ फुट चौड़ा व 2 फुट लंबा 2 पटरा. 200

बोर स्वायल या बेसाल्ट या बेनटोनाइट. बायोडायनेमिक प्रिप्रेशन 502-507. हर एक की एकएक ग्राम मात्रा. 250 ग्राम अंडे के छिलके. 100 ग्राम गुड़ का घोल. चटाई या लोहे की टिन. टाट या जूट का बोरा. एक बालटी पानी .बनाने का तरीका : जमीन में 100 सैंटीमीटर लंबा, 60 सैंटीमीटर चौड़ा व

45 सैंटीमीटर गहरा गड्ढा खोद लें. गड्ढे की भीतरी दीवारों पर ईंटों से दीवार बना लें. तैयार गड्ढे की दीवारों व नीचे के हिस्से को गाय के गोबर से लीप दें. गाय के ताजा गोबर में अंडे के छिलके का पाउडर व बोर स्वायल या बेसाल्ट मिला कर अच्छी तरह पानी डाल कर तब तक फेंटें, जब तक मिश्रण में लस न आ जाए.तैयार गोबर के मिश्रण को गड्ढे में 6 से9 इंच मोटा भर दिया जाए. गोबर में अंगूठे की मदद से छेद कर के बीडी प्रिप्रेशन 502 से 506 को चारों कोनों और बीच में डाल करबंद कर दिया जाए. बीडी प्रिप्रेशन 507 को 350 मिलीलिटर पानी में गुड़ के साथ अच्छी तरह मिला कर 10 मिनट तक घड़ी की दिशा व विपरीत दिशा में भंवर बनाते हुए डंडी से हिला कर गोबर की सतह और दीवारों पर छिड़क देना चाहिए.

 

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जूट के बोरे को गीला कर गड्ढे को ढक दें. बारिश व धूप से बचाने के लिए फूस के छप्पर से गड्ढे को ढक दें. एक महीने बाद गड्ढे की खाद को ऊपरनीचे पलट दिया जाए. यदि नमी कम हो तो पानी का छिड़काव किया जाए. खाद 2-3 महीने में तैयार हो जाती है. अच्छी खाद में मीठी खुशबू होती है.

तैयार खाद स्टोर करना : मिट्टी के बरतन में भर कर इसे छायादार जगह पर स्टोर करें. बरतन के मुंह पर पतला कपड़ा बांधें. नमी कम होने पर बीचबीच में पानी के छींटों से नमी बनाए रखें.पोषक तत्त्व की कूवत : नाइट्रोजन 1.3-1.55 फीसदी, फास्फोरस 0.3-0.5 फीसदी और पोटाश 0.5-0.65 फीसदी.

इस्तेमाल का तरीका : इस की एक किलोग्राम खाद प्रति एकड़ खेत के लिए काफी होती है. एक किलोग्राम खाद को 45 लिटर साफ पानी में रातभर भिगोएं. सुबह 10 मिनट तक घड़ी की दिशा व विपरीत दिशा में डंडी से भंवर बनाते हुए हिलाएं, तब मिश्रण का छिड़काव करें.

आखिरी जुताई के समय खेत की बोआई या रोपाई से पहले मिट्टी में कूची या ब्रश की मदद से छिड़काव करें. एक किलोग्राम खाद को 40 लिटर पानी में मिला कर ट्री पेस्ट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. इस का इस्तेमाल ग्राफ्टिंग, कलम बनाने व जड़ों को मजबूती देने वगैरह के लिए किया जा सकता है. फलों व सब्जियों के लिए 250 ग्राम खाद में 500 ग्राम प्रति एकड़ फफूंदीनाशक दवा को मिला कर इस्तेमाल किया जा सकता है.

मटका खाद

मटका खाद एक लिक्विड खाद है, जिसे छिड़काव के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. यह खाद मिट्टी के घड़े में दुधारू गाय के गोबर व पेशाब द्वारा तैयार की जाती है.जरूरी चीजें : मिट्टी का घड़ा. दुधारू गाय का ताजा गोबर. दुधारू गाय का पेशाब. पानी, गुड़, कपड़ा या टाट का टुकड़ा वगैरह.

बनाने का तरीका : मिट्टी के घड़े में दुधारू गाय का 15 किलोग्राम ताजा गोबर, गाय का ताजा 15 लिटर पेशाब व 15 लिटर पानी डाल कर घोल लें. इस में आधा किलोग्राम गुड़ मिला दें. इस घोल को मिट्टी के बरतन में डाल कर ऊपर से कपड़ा या टाट का टुकड़ा व मिट्टी से पैक कर दें. 10-12 दिन बाद यह तैयार हो जाती है.

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इस्तेमाल का तरीका : तैयार खाद में 200-250 लिटर पानी मिला कर एक एकड़ खेत में समान रूप से छिड़क दें. यह छिड़काव फसल बोने के 15 दिन बाद करें. फिर 7-7 दिन बाद दोहराते रहें.मटका खाद के फायदे : यह सस्ता व जल्दी तैयार हो जाता है. बाहर से कोई सामान नहीं लाना पड़ता है. नाइट्रोजन की पूर्ति करता है.

वर्मी कंपोस्ट

केंचुआ किसान का एक अच्छा दोस्त है. केंचुआ व दूसरे कार्बनिक पदार्थों, जैसे घरेलू कचरा, बाहरी कचरा, फसल के अवशेष, खरपतवार, पशुओं का गोबर, छिलके, जो गल सकें वगैरह के मिश्रण के बाद केंचुओं द्वारा छोड़े गए पदार्थ को वर्मी कंपोस्ट कहते हैं.

वर्मी कंपोस्ट सिर्फ केंचुओं द्वारा नहीं, बल्कि कई बैक्टीरिया द्वारा बनता है, जो फसलों, सब्जियों, पौधों व पेड़ों की बढ़वार और बीमारी से हिफाजत के लिए पूरी तरह से कुदरती व संतुलित खाद है.वर्मी कंपोस्ट में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश के अलावा पौधों की बढ़वार व विकास में मददगार अनेक फायदेमंद सूक्ष्म तत्त्व व बैक्टीरिया, हार्मोंस और अनेक एंजाइम भी मौजूद होते हैं.

वर्मी कंपोस्ट तैयार करने के लिए सतही केंचुए, जो मिट्टी कम व कार्बनिक पदार्थ ज्यादा खाते हैं, इस्तेमाल किए जाते हैं. इन्हें एपीगीज के नाम से भी जाना जाता है. ये 2 तरह के होते हैं. एपिजाइक यानी सतह पर पाए जाने वाले केंचुए व एनिसिक यानी सतह के अंदर पाए जाने वाले केंचुए.

खूबियां : वर्मी कंपोस्ट में गोबर खाद के मुकाबले सवा गुना ज्यादा पोषक तत्त्व मौजूद रहते हैं. इस में मिलने वाला ह्यूमिक एसिड, मिट्टी के पीएच मान को संतुलित रखता है. यह वानस्पतिक पदार्थों को 40-45 दिन में ही खाद में बदल देता है. मिट्टी की भौतिक, रासायनिक और जैविक क्वालिटी में और बंजर मिट्टी में सुधार आता है.मछलीपालन और नर्सरी में भी वर्मी कंपोस्ट फायदेमंद है. इस तरह से तैयार खाद में दीमक का हमला नहीं होता है. इस के इस्तेमाल से मिट्टी की पानी लेने की कूवत में भी बढ़वार होती है.

साथ ही, इस में अनेक तत्त्व ऐसे होते हैं, जो पौधों को बीमारी से बचाते हैं और फसल का उत्पादन बढ़ाते हैं. मिट्टी की संरचना व हवा संचार में सुधार हो जाता है. जलकुंभी की समस्या से पूरी तरह नजात मिलती है. इस के इस्तेमाल से नाइट्रोजन तत्त्व की मिट्टी में लीचिंग नहीं होती है.बनाने का तरीका : वर्मी कंपोस्ट बनाने का काम गड्ढे, लकड़ी की पेटी, प्लास्टिक क्रेट या कंटेनर में किया जा सकता है. पेटी की गहराई एक मीटर से कम रखें. लकड़ी या प्लास्टिक की पेटी में नीचे 8 से 10 छेद पानी निकालने के

लिए बनाएं. 10 फुट लंबा, 2.5 फुट चौड़ा,

1.5 से 2.0 फुट गहरा गड्ढा ऊंची व छायादार जगह पर बना लें. सब से निचली सतह पर 3-3.5 सैंटीमीटर मोटी ईंट या पत्थर गिट्टी बिछाएं.  इस के ऊपर 3-3.5 सैंटीमीटर मौरंग या बालू बिछाएं. बालू की परत के ऊपर 15 सैंटीमीटर अच्छी दोमट मिट्टी की परत बनाएं.इस के बाद 1 किलोग्राम केंचुए बराबर की संख्या में डाल दें. नम मिट्टी के ऊपर गोबर का ढेर बना कर रख दें. गोबर के ऊपर 5-10 सैंटीमीटर पुआल या सूखी पत्तियां डाल दें. इस इकाई में बराबर 20-25 दिन तक पानी का छिड़काव करें. 26 दिन मेें हर हफ्ते में 2 बार 5-10 सैंटीमीटर कचरे की तह बनाएं व गोबर का ढेर बना कर रख दें. यह प्रक्रिया तब तक दोहराते रहें, जब तक कि गड्ढा भर न जाए. इसे हफ्ते में एक बार पलटते रहें और रोज पानी का छिड़काव करें.

जब गड्ढा भर जाए, तो कचरा डालना बंद कर दें. 40-45 दिन बाद जब वर्मी कंपोस्ट बन जाए, तो 2 से 3 दिन तक पानी का छिड़काव बंद कर दें. उस के बाद इसे गड्ढे से निकाल कर छाया में ढेर लगा दें और हलका सूखने के बाद 2 मिलीमीटर छन्ने से छान लें. इस तैयार खाद में 20-25 फीसदी नमी होनी चाहिए.निकालने का तरीका : खाद निकालने के 2-3 दिन पहले पानी का छिड़काव बंद कर दें. इस से केंचुए गड्ढे की तली में चले जाएंगे. ऊपर से खाद को 1-2 दिन बाद हाथ से अलग कर लें या मौरंग चलाने वाली छलनी से छान लें व फर्श में नीचे पड़े केंचुओं को दोबारा गड्ढे में डाल दें. छनी खाद को प्लास्टिक के थैलों में भर कर रखें.

इस्तेमाल करने का तरीका : वर्मी कंपोस्ट को फसलों की बोआई या रोपाई से पहले और खड़ी फसल में डाल सकते हैं. खाद्यान्न फसलों में 5-6 टन प्रति हेक्टेयर

मध्यप्रदेश का ड्रामा- किसको कितना नफा, कितना नुकसान

मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है, उम्मीद की जा रही है कि फैसला यही आएगा कि कमलनाथ सरकार सदन में बहुमत साबित करे .  उधर सरकार की कोशिश यही होगी कि जितना हो सके विवाद को टरकाया जाए . दिग्गज कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया होली के दिन कांग्रेस छोडकर भाजपा में गए तो उनके साथ 22 विधायकों ने भी इस्तीफा दे दिया था जिससे मध्य प्रदेश सरकार अल्पमत में आ गई .  यह और बात है कि वह आसानी से हार मानने बाली नहीं .

पिक्चर भी अब हालांकि साफ है लेकिन 22 विधायकों के बाबत कांग्रेस का आरोप यह है कि उन्हें बेंगलुरु में बंधक बनाकर रखा गया है इसलिए उनकी रिहाई तक फ्लोर टेस्ट के कोई माने नहीं . भाजपा कह रही है कि इन विधायकों की दिख रही गुमशुदगी से उसका कोई लेना देना नहीं वे तो अपनी मर्जी से वहाँ डेरा डाले पड़े हैं . हाल फिलहाल कमलनाथ फ्लोर टेस्ट से फ़ौरीतौर पर मुक्ति पा गए हैं पर यह स्थायी नहीं है . राज्यपाल लालजी टंडन खफा हैं कि सरकार ने फ्लोर टेस्ट का उनका निर्देश नहीं माना और सरकार कह रही है कि विधानसभा अध्यक्ष जो कहेंगे उसे ही ब्रह्मा का लेख माना जाएगा .

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यानि विवाद और फसाद अब संवैधानिक और कानूनी पेचीदगियों में उलझ गया है जिनकी कई धाराएँ उप धाराएं और नियम हैं जिनमे आपस में विकट का विरोधाभास है .

फायदे में भाजपा

राजनीति के इस दिलचस्प लेकिन घटिया खेल में अब हर कोई नफा नुकसान का आकलन करने लगा है . जो कुछ भी गया है वह कांग्रेस का गया है और जो भी मिला है वह भाजपा को मिला है इसलिए वह फ़ायदे में है . भाजपा को बैठे बिठाये एक कद्दाबर नेता मिल गया है वह भी कोई ऐरा गैरा नहीं बल्कि ग्वालियर राजघराने का श्रीमंत है .

यह ठीक है कि सिंधिया को ले लेने से राष्ट्रीय स्तर पर उसे कोई खास फायदा नहीं होने बाला लेकिन मध्यप्रदेश में उसे जबरजस्त फायदा हो रहा है . अगर कमलनाथ बहुमत साबित नहीं कर पाये तो भाजपा सरकार बनाने का दावा ठोकेगी इसके लिए उसके पास पर्याप्त संख्या बल है 107 तो खुद उसके विधायक हैं ही और सिंधिया खेमे के पूरे 22 नहीं आधे यानि 11 भी साथ आ गए तो वह सरकार बना ले जाएगी लेकिन यह जोखिम भरा काम होगा .  सबसे बड़ी मुश्किल सिंधिया समर्थकों को एडजेस्ट करने की पेश आएगी इसलिए वह मध्यावधि चुनाव को प्राथमिकता में रखेगी . वैसे भी अल्पमत बाली सरकार का हश्र वह देख ही रही है इसलिए इससे सबक ले सकती है .

चुनाव यदि हुये तो कौन सा दल कितने फ़ायदे में रहेगा यह हिसाब किताब भी आम और खास लोग लगाने लगे हैं . 2018 के चुनाव में भाजपा को सबसे बड़ा झटका ग्वालियर – चंबल इलाके से ही लगा था यहाँ की 34 सीटों में से उसे महज 7 पर तसल्ली करना पड़ी थी जबकि 2013 में उसे 20 सीटें मिली थीं .  उलट इसके कांग्रेस ने अपनी सीटें 12 से बढ़ाकर 26 कर लीं थीं . भाजपा की नजरें इन्हीं सीटों पर हैं जो केवल सिंधिया उसे दिला सकते हैं क्योंकि उनका प्रभाव सभी वर्गों के लोगों पर है . इस इलाके में कोई वजनदार नेता भी उसके पास नहीं है .

बसपा अपने इस गढ़ से निर्णायक प्रभाव खो चुकी है और दलित वोट फिर से  सिंधिया के जरिये कांग्रेस की झोली में इस इलाके में गया है जो हाल फिलहाल पाला बदलने बाला नहीं वैसे भी अनुभव कहता है कि दलित वोट आसानी से किसी की तरफ झुकता नहीं और आसानी से किसी से टूटता भी नहीं . सिंधिया ने इस तबके में गहरी पैठ बना रखी है जिसे भाजपा भुनाने से चूकेगी नहीं . अपने कोटे से सिंधिया ने 3 दलित विधायकों को मंत्री बनबाया था जिसका फायदा उन्हें और भाजपा को मिलेगा .

घाटे में बसपा और कांग्रेस

सवा साल के कार्यकाल में कमलनाथ कोई खास करिश्मा नहीं कर पाये हैं वे बस एक बेबस सरकार जैसे तैसे चला रहे थे .  शुरुआती दौर में जरूर उनके आक्रामक तेवर देख लोगों को उनसे उम्मीदें बंधी थीं लेकिन जैसे जैसे दिग्विजय सिंह और उनके गुट का दखल सरकार में बढ़ता गया वैसे वैसे लोग उनसे नाउम्मीद भी होने लगे . उदाहरण कर्मचारियों का ही लें तो कमलनाथ के कार्यकाल में मंहगाई भत्ता उन्हें मिला ही नहीं . 15 मार्च को जब सरकार अब गिरी कि तब गिरी के कयास लगाए जा रहे थे तब सरकार को होश आया और उसने आनन फानन में मंहगाई भत्ते में 5 फीसदी बढ़ोतरी की घोषणा कर दी जिस पर तात्कालिक प्रतिक्रिया यही रही कि आ गया ऊंट पहाड़ के नीचे , अब मुसीबत सर पर मंडराने लगी तो कर्मचारियों की याद आई . इस मंहगाई भत्ते को लेकर भी कर्मचारी आश्वस्त नहीं हैं कि कमलनाथ सरकार उन्हें वक्त पर  दे पाएगी .

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यही हाल किसानों की कर्ज माफी और युवाओं के लिए रोजगार का है जिनके बाबत सरकार दावे तो बढ़ चढ़ कर करती रही लेकिन वे सरकारी विज्ञापनों में ही दिखे जमीनी तौर पर कुछ हुआ होता तो सिंधिया को कांग्रेस छोडने के पहले हजार बार सोचना पड़ता .  जब उन्होने देख लिया कि हो जा कुछ नहीं रहा है और न ही ऐसी उम्मीद दिख रही तो हिम्मत जुटाते उन्होने कांग्रेस से जयराम जी की कर ली .

अब अगर चुनाव हुये और कांग्रेस ने अपनी सरकार की काल्पनिक उपलब्धियों के आधार पर वोट मांगने की गलती की तो उसे लेने के देने पड़ जाएंगे दूसरी दिक्कत दिग्विजय सिंह की बिगड़ी इमेज है जो लोगों को कतई रास कभी नहीं आई यही वजह थी कि पिछले चुनाव में उन्हें राहुल गांधी ने प्रचार से दूर रखा था . कमलनाथ और सिंधिया को आगे रखकर ही वह 114 का आंकड़ा 230 विधानसभा सीटों बाले इस राज्य में छू पाई थी . अब सिंधिया के भाजपा में चले जाने से दिखना उन्हीं दिग्विजय सिंह को है जिनके नाम से ही लोगों के मुंह बिगड़ जाते हैं .

नुकसान बसपा का भी है जो गिरते पड़ते 2018 में 2 सीटें जीत पाई थी . मायावती की साख मध्यप्रदेश में भी गिर रही है दूसरे प्रदेश में कोई जमीनी नेता अब बसपा में नहीं बचा है जिससे उसका संगठनात्मक ढांचा चरमरा गया है . समाजवादी पार्टी भी कहने भर को बची है जिसके यादव वोट भाजपा की तरफ ज्यादा झुकते दिख रहे हैं .

अब यह सुप्रीम कोर्ट के रुख और फैसले के बाद तय होगा कि मध्यप्रदेश में क्या होगा .  भाजपा सरकार बनाएगी या चुनाव होंगे हालांकि एक क्षीण उम्मीद जिसे सद्भावना भी कहा जा सकता है  कुछ लोगों को यह भी है कि जुगाड़ तुगाड़ में माहिर दिग्विजय –  कमलनाथ की जोड़ी बहुमत सिद्ध कर देगी लेकिन इसके लिए उसे सिंधिया गुट के बचे 16 विधायकों का समर्थन चाहिए होगा .  6 के इस्तीफे तो मंजूर हो ही चुके हैं यानि अब औपचारिक तौर पर सदन में कांग्रेस के विधायकों की संख्या 108 और अनौपचारिक तौर पर 92 है .  निर्दलीय और बसपा के 2 विधायक उसका साथ देते ही रहेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं . राज्य में जो अफरा तफरी मची हुई है उससे निर्दलियो को भी समझ आ रहा है कि जाना वहीं फ़ायदे का सौदा रहेगा जहां से कुछ मिलने की उम्मीद हो .

सिंधिया समर्थक सभी विधायक तो कमलनाथ का साथ देने से रहे 2 – 4 का दिल कांग्रेस के  नाम पर पलट सकता है जो फ्लोर पर बहुमत साबित करने के लिए नाकाफी होगा .

सिर्फ बेटी ही नहीं बेटों की परवरिश पर भी दे खास ध्यान

बदलते समय के साथ माता पिता को बेटी के साथ बेटों को संस्कार सिखाये जाने की पहल शुरू कर देनी चाहिए. वजह अब चाहे बेटा हो या बेटी, सबको समान शिक्षा, फिर नौकरी और जीवन की भागदौड़ करनी पड़ती है. जहां परिवार में बेटा-बेटी, बहू-दामाद सभी को बाहर के साथ घर के भी काम करने पड़ते हैं और अगर ये बचपन से ही सीखा दिए जाए तो खुद उनके लिए और उनके लाइफ पार्टनर के सुकून भरा होता है.

बचपन में जो भी सीखा दिया जाता है वो जिंदगी भर साथ देता है. खुद घर में पुरुष को भी कुछ न कुछ घर के काम में हाथ बंटाना चाहिए तो बेटे स्वतः ही सीखने लग जाएंगे. केवल घर के काम ही नहीं बल्कि घर में बड़ों की इज्जत करना, बहनों के साथ प्यार से पेश आना और महिलाओं के प्रति संवेदनशील और गरिमामयी सोच रखना भी सिखाये.

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महिला अपराध की एक बड़ी वजह भी यही है कि पुरुष महिलाओं के लिए न तो अच्छी सोच रखते हैं और न ही संवेदनशील होते हैं. उन्हें कई बार तो आभास तक नहीं होता है कि उनकी किसी भी हरकत जो मजे, मस्ती के लिए की गई है. वो लड़कियों के मन पर कितना बुरा प्रभाव डालती है. कई बार छोटी ही उम्र में किसी बुरे अनुभव से गुजरने के बाद लड़कियां जिंदगी भर उस तकलीफ से मुक्त नहीं हो पाती है. केवल किसी भी छेड़छाड़ या अपराध की सजा दे देने भर से अपराध नहीं थमने वाला है. इसके लिए परवरिश पर भी ध्यान देना होगा.

लड़कों को स्कूल से ही लड़कियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाए, ये बताया जाना चाहिए और साथ ही घर में माता पिता को महिलाओं के प्रति संवेदनशील होना, उनसे अच्छा व्यवहार करना सिखाया जाना चाहिए. ये शिक्षा हर दिन के साथ दी जानी चाहिए. समाज में अच्छा-बुरा जो भी दिख रहा हो उसे उदाहरण के तौर पर पेश करते हुए चर्चा करनी चाहिए.

अब लड़कों को भी लड़कियों की तरह घर के काम में हाथ बटाना सिखाया जाना चाहिए. घर में केवल बेटियों से ही काम न कराकर बेटे बेटियों दोनों को काम बांट दें. आगे चलकर जब बच्चे बाहर जाएंगे तो ये काम करने की आदत और काम करने का तरीका पता होने से खुद उनके लिए भी सुकून भरा होगा, क्योंकि हर समय हम मेड के सहारे नहीं रह सकते हैं.

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बेटों को अपने महिला मित्र, बहन से बात करते वक़्त जरूर ध्यान दे कि उनका लहजा और व्यवहार का तरीका कैसा है? कुछ ठीक न लगे तो उसी वक़्त टोककर समझाये.

खुद माता पिता को भी ये ध्यान रखना चाहिए कि आपस में उनका व्यवहार और बातचीत करने का तरीका अच्छा होना चाहिए क्यू कि घर में जो भी कुछ अच्छा/बुरा होता है बच्चे भी वही सीखते हैं.

देखा गया है कि जिस घर में घरेलू हिंसा और महिलाओं के साथ बुरा बर्ताव होता है वहाँ लड़के भी वही सोच के साथ बड़े होते हैं वही आगे चलकर अपनी बहन /पत्नी या अन्य महिलाओं के साथ बुरा बर्ताव और हिंसा करते हैं.

लड़कों में महिलाओं के प्रति संवेदना का पाठ पढ़ाया जाना जरूरी है. उन्हें पता होना चाहिए कि कोई भी महिला गलत सहने और बर्दाश्त करने के लिए नहीं होती है और उनके पास ठीक वैसी ही भावनाएं और इच्छाएं है जैसी लड़कों के पास हैं. अब वो भी बाहर निकलना, घूमना, फिरना चाहती है जो उनका हक है. तो ऐसे में रात में भी और सुनसान जगहों पर भी लड़कियां दिखेंगी जिसे देखकर उन्हें ये नहीं सोचना है कि रात में लड़की आखिर कर क्या रही है?

लड़कियों के लिए असुरक्षित माहौल में हम बेटियों को निडर रहना, आत्मरक्षा के तरीके तो सीखा रहे हैं लेकिन केवल इससे ही लड़कियां सुरक्षित नहीं रह सकती है, लड़कों को भी उनकी सीमा और लड़कियों के साथ मर्यादा में रहकर बातचीत का तरीका सिखाया जाना चाहिए. अगर हम अपने अपने घर के लड़कों/पुरुषों को महिलाओं के साथ कैसे पेश आया जाए ये सिखा दें तो अपराध में खुद ही कमी आएगी और बेटियों के लिए माहौल सुरक्षित हो जाएगा.

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Naagin 4 के सेट पर Coronavirus का टेस्ट करवाती दिखीं Rashami, फैंस ने किए ये कमेंट

बिग बॉस कंटेस्टेंट रश्मि देसाई इन दिनों टीवी सीरियल नागिन 4 में नजर आ रही हैं. रश्मि का नाम बिग बॉस के टॉप फाइव कंटेस्टेंट में शामिल था. भले ही रश्मि बिग बॉस की विनर नहीं बन पाई थी, बावजूद इसके रश्मि के चाहने वालों की कमी नहीं थी.

कोरोना वायरस का टेस्ट करवाती दिखीं रश्मि…

बिग बॉस खत्म होने के बाद रश्मि ने अपने काम से कुछ दिनों का ब्रेक लिया था. अब एक बार फिर रश्मि नागिन 4 में नए लुक के साथ नजर आ रही हैं. इसी दौरान रश्मि का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें रश्मि सेट पर जाने से पहले कोरोना वायरस का टेस्ट करवाती नजर आ रही हैं. रश्मि के इस वीडियो को देख उनके फैंस परेशान नजर आ रहे हैं.

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फैंस ने किए ये कमेंट…

फैंस रश्मि को सावधान रहने की सलाह दे रहे हैं, इतना ही नहीं लोग रश्मि को घर से बाहर नहीं निकलने की भी कह रहे हैं. बात करें इस वीडियो की तो इसमें रश्मि मस्ती की अंदाज में नजर आ रही हैं. टेस्ट करवाते समय रश्मि के चेहरे पर हल्की सी स्माइल नजर आ रही है. फैंस इस वीडियो पर लगातार कमेंट कर रहे हैं.

बिग बॉस में हुए थे ये खुलासे…

बिग बॉस के घर में रश्मि के निजी जीवन के बारे में कई खुलासे हुए जिससे कई बार रश्मि के आसूं भी छलके, हालांकि रश्मि कभी अपने आप को कमजोर दिखाने की कोशिश नहीं की. रश्मि हर परिस्थति का सामना समझदारी से किया. शो के दौरान रश्मि की मां भी उनका सपोर्ट करती नजर आई थी. रश्मि नन्दीश संधू के साथ शादी के बंधन में बंधी थीं, लेकिन यह शादी ज्यादा दिनों तक चली नहीं थी. शादी के कुछ समय बाद ही दोनों अलग हो गए थें.

बता दें कोरोना के डर से लोग घर से बाहर नहीं नकलना चाहते हैं. ऐसे में 19 मार्च से लेकर 31 मार्च तक सभी शो की शूटिंग रोक दी गई है.

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