श्रीलंका ब्रौडकास्टिंग कौर्पोरेशन लिमिटेड यानी एसएलबीसी के विदेश विभाग से जुड़े रहे 3 वरिष्ठ उद्घोषकों मनोहर महाजन, विजयलक्ष्मी डिसेरम और रिपुसूदन कुमार ऐलावादी का शुमार प्रसारण जगत की शीर्ष हस्तियों में किया जाता है. इन उद्घोषकों ने लोकप्रियता का वह दौर भी देखा और भोगा है जब इन के पीछे करोड़ों श्रोताओं की जमात होती थी. इसे एक सुखद संयोग कह सकते हैं कि इन तीनों हस्तियों से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मिलने का मौका मिला. इसी मुलाकात में उन्होंने रेडियो के उन सुनहरे पलों को याद कर कई ऐसी बातें बताईं जिन्हें सुन कर उस दौर की यादें ताजा हो जाती हैं. 13 फरवरी ‘वर्ल्ड रेडियो डे’ के रूप में मनाया जाता है. तो आइए, हम आप को उन सुनहरे पलों की यादों के सफर में ले चलते हैं.
मनोहर महाजन जब भी रेडियो पर अपनी आवाज बिखेरते थे तो श्रोता सारा कामधाम छोड़ कर उन की आवाज सुनने लगते थे. जब उन से रेडियो सीलोन की बात शुरू की तो वे अपने पुराने साथियों के बारे में बताते हुए कहते हैं, ‘‘मेरे गुरु अमीन सयानी, उन के बड़े भाई हमीद सयानी, दलबीर सिंह परमार, ज्योति परमार, पद्मिनी, परेरा, विजयलक्ष्मी, सुभाषिनी, नलिनी परेरा, विमल धर्म, मेरे बौस जामलडीन, गोपाल शर्मा, ब्रज किशोर दुबे, कुमार और सरदार प्रीतपाल सिंह सहित ढेर सारे नाम हैं. वाकई वह बहुत यादगार दौर था.’’
अमीन सयानी बनने का ख्वाब
रेडियो की दुनिया के शुरुआती सफर को याद करते हुए मनोहर बताते हैं, ‘‘मैं प्रसारण की दुनिया में बाइचांस आया. बचपन से मैं सांस्कृतिक रुझान वाला हूं. पोस्टगे्रजुएशन पूरा कर मैं सूचना व प्रसारण मंत्रालय के संगीत व नाटक प्रभाग से जुड़ गया. तभी रेडियो सीलोन में 2 उद्घोषकों की आवश्यकता का एक विज्ञापन दिल्ली के अखबारों में आया. रेडियो सीलोन की उस जमाने में तूती बोलती थी. आलम यह था कि लोग रेडियो खरीदते थे तो पहले देखते थे कि सीलोन साफ पकड़ता है कि नहीं. फिर अमीन सयानी साहब को सुनतेसुनते हम लोग सोचते थे कि यार, अगर वहां पहुंच जाएंगे तो स्टार बन जाएंगे. ऐसे बहुत से ख्वाब लिए मैं ने अपना आवेदनपत्र भेज दिया और उस के बाद दिल्ली में इंटरव्यू हुआ जिस की एक लंबी कहानी है. मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा यह जानकर कि मैं सैलेक्ट हो गया था. खुशी की बात यह थी कि मुझे अमीन सयानी साहब ने 1 माह प्रशिक्षित किया और फिर मैं कोलंबो जा कर रेडियो सीलोन से जुड़ गया.
स्टारडम का दौर
मनोहर बताते हैं, ‘‘उस दौर में रेडियो सीलोन के उद्घोषक लोकप्रियता के मामले में किसी भी बड़े फिल्मी कलाकार से कम नहीं थे. हम लोगों के लिए फ्लाइटें तक रुक जाती थीं. तब कस्टम क्लियरेंस बेहद सख्त था. उन दिनों शर्ट और अंगूठी तक की पासपोर्ट में एंट्री होती थी. ऐसे सख्ती वाले दौर में जब हम लोग जाते थे और उन्हें जैसे ही पता चलता था कि हम रेडियो सीलोन के अनाउंसर हैं तो हमारा कस्टम क्लियरेंस नहीं होता था. ऐसा ही हाल रेलवे का था. अगर पता लग जाए कि हम लोग फलां ट्रेन से जा रहे हैं तो रेलवे स्टेशन पर हुजूम लग जाता था.’’
एक दिलचस्प घटना को याद करते हुए वे बताते हैं, ‘‘मुझे याद है, मैं कलकत्ता मेल से अपने नेटिवप्लेस जा रहा था. ऐसे में परमार साहब (स्व. दलबीर सिंह) ने रेडियो सीलोन के एक कार्यक्रम में इस बाबत उद्घोषणा कर दी. इस के बाद तो पूछिए मत, लोग मुझे चेहरे से जानते नहीं थे लेकिन हर स्टेशन पर हुजूम उमड़ पड़ा. हर स्टेशन पर मेल रोकी गई. लोगों का रिस्पौंस देख कर मेरे कंपार्टमैंट वाले भी मुझे बाहर कर देते थे कि जाइए, जल्दी मिलिए ताकि टे्रन आगे बढ़े. ऐसा सिर्फ मेरा ही तजरबा नहीं था बल्कि मेरे जितने साथी थे, सभी ने यह स्टारडम पाया है.’’
नया करने की हसरत
रेडियो सीलोन पहुंचने के बाद मनोहर को लगा कि क्या वे सिर्फ मोहम्मद रफी को सुनिए, लता मंगेशकर को सुनिए, इस फिल्म में किशोर कुमार को सुनिए, इस की फरमाइश यह है आदि सब के लिए आए हैं? उन्हें तो ब्रौडकास्टिंग में और कुछ करना था. इसी हसरत के साथ उन्होंने बहुत से प्रयोग किए. मनोहर के अनुसार, ‘‘मैं पहला उद्घोषक था, जिस ने ‘रेडियो पत्रिका’ निकाली. प्रकाशित पत्रिका की तरह मेरी औडियो पत्रिका थी वह जिस में संपादकीय, संदेश गीत, हफ्ते के श्रोता और हफ्ते के विचार सहित बहुत कुछ होता था. मेरा यह प्रयोग इतना लोकप्रिय हुआ कि जब मेरी रेडियो पत्रिका का 100वां और 200वां अंक आता था, उस को हम स्पैशल करते थे और श्रोता सुन कर उस को लिखते थे और उस को छपवा कर उस की प्रति देशभर में रेडियो श्रोता संघों को भेजते थे.’’
भूलेबिसरे गीतों का प्रयोग
रेडियो सीलोन के दौरान मनोहर ने एक अनूठा प्रयोग किया. वे बताते हैं, ‘‘उन दिनों रेडियो सीलोन में गीतों की लाइबे्ररी में मैं ने देखा कि ढेर सारे ग्रामोफोन रिकौर्ड्स गट्ठरों में बंधे रखे हुए थे. मुझे बड़ी तकलीफ हुई. उन में ज्यादातर 1931 से 1945 तक के दौर के थे. उन में ऐसे रिकौर्ड्स भी मिले जिन के लेबल पर कोई जानकारी नहीं थी. तब कोई इंटरनैट नहीं, इलैक्ट्रौनिक मीडिया नहीं, तो कैसे उन के बारे में जानकारी हासिल करता. मैं ने एक प्रयोग किया, उन रिकौर्ड्स को भूलेबिसरे गीत कार्यक्रम के तहत बजाना शुरू किया. उस कार्यक्रम में मैं ने श्रोताओं को आमंत्रित करना शुरू किया कि आप के पास इस गीत के बारे में अगर जानकारी हो तो हमें जरूर बताइए. उन की जो जानकारी आती थी उसे बहुमत के आधार पर मैं उस रिकौर्ड पर लिखवा देता था. इस तरह मैं ने उस नायाब खजाने को पहचान देने की दिशा में एक अनोखा काम किया.’’
बहरहाल, उन्होंने 1967 में रेडियो सीलोन में अपनी सेवा शुरू की थी और 1974 में, 32 साल की उम्र में वहां की नौकरी छोड़ दी. उस के बाद कहीं नौकरी नहीं की. वे मुंबई आ गए और देश के पहले फ्रीलांस ब्रौडकास्टर बन गए. उस दौर में विविध भारती पर बहुत से कार्यक्रम शुरू हुए. उन्होंने विविध भारती पर प्रसारण के लिए अलगअलग पार्टियों के कार्यक्रम स्वतंत्र रूप से प्रोड्यूस किए.
फिल्म पब्लिसिटी और रेडियो
मुंबई आने के बाद उन्होंने फिल्मों की रेडियो पब्लिसिटी के क्षेत्र में भी काम शुरू किया. वे कहते हैं, ‘‘तब अमीन सयानी साहब इस क्षेत्र में स्थापित हो चुके थे. उन के बाद मैं और प्रदीप शुक्ला. इस तरह हम 3 के अलावा प्रोड्यूसर और किसी से काम कराना नहीं चाहते थे. अमीन साहब ने बहुत सी फिल्में मुझे दिलवाईं और बड़े बजट की ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘कुर्बानी’, ‘क्रांति’, ‘शोले’, ‘दीवार’, ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ सहित उस दौर की तमाम बड़ी फिल्में उन के साथ कीं. इन फिल्मों में मुझे ‘शोले’ की याद आ रही है. वह फिल्म इतनी हिट होगी, इस का पब्लिसिटी प्रोग्राम बनाते वक्त हम लोगों को बिलकुल भी अंदाजा नहीं था.
‘‘वैसे तो मैं ने बहुत से यादगार रेडियो प्रोग्राम किए लेकिन कमाल अमरोही साहब की ‘रजिया सुल्तान’ का तजरबा सब से अलग रहा. दरअसल, कमाल साहब को इस फिल्म के रेडियो प्रोग्राम के लिए रैगुलर आवाज के बजाय नई आवाज चाहिए थी. उस के लिए देशभर में विज्ञापन दिए गए थे. लोग आए भी लेकिन कमाल साहब को 2 माह से कोई भी आवाज पसंद नहीं आ रही थी. एक दिन इलाहाबाद से एक सज्जन आए. बहुत अच्छी थी उन की आवाज, लेकिन वे शुद्ध हिंदी वाले थे. खुद के परिचय का जो अनाउंसमैंट पहले करना पड़ता था वह वे नहीं कर पा रहे थे. ऐसे में प्रोड्यूसर जगमोहन मट्टूजी ने मुझ से कहा कि मनोहर, यह अनाउंसमैंट तुम कर दो. मैं ने कहा, ‘ठीक है, सर’. इस तरह मैं ने वह ओपनिंग अनाउंसमैंट किया कि ये सज्जन इलाहाबाद के हैं, इन का नाम यह है और ये ‘रजिया सुल्तान’ का डायलौग रिकौर्ड कर रहे हैं, ट्रैक फालोज. इस तरह मैं ने बोल दिया.
‘‘इस टेप को कमाल साहब ने सुना और उस आवाज को तो रिजैक्ट कर दिया लेकिन ओपनिंग आवाज को ले कर कहने लगे, ‘यह किस की आवाज है, आई वांट दिस वौयस.’ इस तरह कमाल साहब ने रजिया सुल्तान के लिए मुझे चयनित किया और रजिया सुल्तान के जो प्रोग्राम थे वे ब्रौडकास्टिंग के माइलस्टोन थे. क्योंकि उस में खालिस उर्दू बोली गई थी. मुझे मालूम है 15 मिनट का रेडियो प्रोग्राम करने में मुझे 8-8 घंटे लगते थे. क्योंकि कमाल साहब एक भी गलत उच्चारण, एक भी गलत पौज जाने नहीं देते, तुरंत रिजैक्ट कर देते थे. इसलिए पहली बार मैं ने अपनी लाइफ में नफीस उर्दू, सिर्फ उर्दू बोली है. उस प्रोग्राम की मेरे पास एक कौपी है, लोग सुनते हैं तो दीवाने हो जाते हैं.
मेरी आवाज ही पहचान है
मनोहर बताना जारी रखते हैं, ‘‘रेडियो और स्टेज ने जो मुझे दिया उस का नतीजा है कि सीनियर सिटिजन हो जाने के बाद भी स्टिल, आई एम सैलिंग माई वौयस. हां, यह है, जरूर है कि अब मेरी आवाज पहले से मैच्यौर हो गई है, क्योंकि मैं यंग साउंड नहीं करता हूं. अगर कोई मुझे कहे कि आप पुराने तरीके से ही कार्यक्रम पेश करो तो दैट इज नौट पौसिबल. हालांकि मैं तब तक रिटायर नहीं होऊंगा जब तक सेहत और मेरे सामने के दांत मुझे इजाजत नहीं देते. मैं प्रसारण के अलगअलग क्षेत्रों में सक्रिय हूं. डिस्कवरी चैनल पर मेरे खयाल से 1,200 से ज्यादा कहानियों में मेरी आवाज है. ऐसे ही नैशनल ज्योग्राफिक में 350 घंटे से ज्यादा का मैं ने नेरेशन किया हुआ है. म्यूजिक के तो हजारों प्रोग्राम किए. अब मैं मुंबई में अपना टे्रनिंग इंस्टिट्यूट चला रहा हूं, जिस में नौजवान बच्चों को वौयस कल्चर में ट्रैंड करता हूं. मेरी एक किताब ‘यादें रेडियो सीलोन की’ भी रिलीज हुई है.
‘‘अपने कैरियर में मुझे खुद को ले कर तो नहीं लेकिन अमीन साहब को ले कर एक खलिश जरूर होती है. मुझे लगता है अभी तक उन के काम का समाज ने सही मूल्यांकन नहीं किया. उन्हें ‘पद्मश्री’ भी दिया गया तो इस उम्र में कि वे उस को सही से एंजौय भी न कर सके. खैर, बातें तो बहुत सी हैं. मैं आज भी अपने श्रोताओं और अपने चाहने वालों के करीब रहता हूं.’’
मनोहर महाजन की तरह ही रेडियो की बेमिसाल आवाज विजयलक्ष्मी डिसेरम भी रेडियो से जुड़ी ढेरों यादें बांटती हैं. वे कहती हैं, ‘‘वर्ष 1967 में मैं शादी कर लखनऊ से श्रीलंका गई थी. वहां पर मुझे रेडियो सीलोन के अलावा कुछ भी नहीं मालूम था और यहां मैं गोपाल शर्मा और अमीन सयानी की आवाज से ही परिचित थी. आज के एफएम रेडियो की तरह उस जमाने में श्रीलंका में रेडियो फ्यूजन सर्विस हुआ करती थी. इस का कनैक्शन रेडियो सीलोन के स्टूडियो से होता था. यह एक ऐसा जरिया था कि हर आदमी उस पर हिंदी के अलावा तमिल, मलयालम, अंगरेजी और सिंघली के कार्यक्रम सुन सकता था. मैं ने वहां पर गोपाल शर्मा को सुना तो बड़ी प्रभावित हुई. परिस्थितिवश रेडियो सीलोन जाना हुआ तो वहां लाइबे्ररी में शिव कुमार सरोज और गोपाल शर्मा से मुलाकात हुई. उन्होंने मुझे औफर किया कि तुम चाहो तो ट्राई कर सकती हो. पढ़ीलिखी हो, यहां पर काम सीख सकती हो. इस तरह मेरी रेडियो श्रीलंका में शुरुआत हो गई. यहां मेरी टे्रनिंग शुरू हो गई और थोड़े समय के प्रसारण से मैं सीधे जुड़ गई. वह जमाना आज से बिलकुल जुदा था. तब हमें अपने सीनियर से ही सीखना होता था. धीरेधीरे मैं माहिर होती गई और मुझे खुशी है कि श्रोता मुझे बहुत पसंद करते थे.’’
अलग आवाज, अलग पहचान
रेडियो में विविधता और कार्यक्रमों की लोकप्रियता के सवाल पर विजयलक्ष्मी कहती हैं, ‘‘उस दौर के प्रोग्राम की बातें करूं तो मेरी समझ में सभी प्रोग्राम यादगार थे. हम सभी के प्रोग्राम में विविधता रहती थी. मुझे याद आ रहा है एक प्रोग्राम जो ‘आप के अनुरोध पर’ नाम से हुआ करता था. हालांकि श्रोताओं की पसंद पर होता था लेकिन हर उद्घोषक जब भी प्रस्तुत करता था, अपने ढंग से प्रस्तुत करता था. दलबीर सिंह परमार अपने इस प्रोग्राम में जोहरा बाई अंबाले वाली और शमशाद बेगम आदि के गीत ज्यादा सुनवाते थे. मनोहर महाजन मिलेजुले गीत पसंद करते थे. चूंकि मैं छोटी थी तो मुझे रफी की आवाज, लता की आवाज या ओ पी नैयर के जोशोखरोश वाले गाने पसंद आते थे, मैं उन्हें पेश करती थी. हम लोगों के प्रस्तुतीकरण के ये विविध रूप श्रोताओं ने खूब पसंद किए.’’
गृहयुद्ध से बिगड़े हालात
उसी दौरान श्रीलंका गृहयुद्ध के संकट से घिरा. तब के मुश्किल हालात पर विजयलक्ष्मी कुछ यों कहती हैं, ‘‘शुरुआती टे्रनिंग के बाद रेडियो सीलोन में मैं ने 1970 से 1985 तक का अरसा गुजारा. 1983 में श्रीलंका में गृहयुद्ध की वजह से हालात बिगड़ने लगे. हालत यह हो गई कि कुछ लोग हमारा घर जलाने के लिए आ गए थे. तब श्रीलंका ही एक ऐसा देश था जहां सब से ज्यादा नेता और जर्नलिस्ट मारे गए थे. ऐसे माहौल में मुझे लगा कि मुझे यहां से निकल जाना चाहिए. इस दौरान मुझे तत्काल वाश्ंिगटन में वौयस औफ अमेरिका में जौब मिल गया.’’
हिंदुस्तानी संगीत का जनून
अपनी आगे की योजना को ले कर वे कहती हैं, ‘‘वाश्ंिगटन में मैं बौलीवुड सिने म्यूजिक रिसर्च सैंटर शुरू करना चाहती हूं. वहां रह रहे हमारे देश के लोगों में हिंदुस्तानी संगीत को ले कर एक जनून सा है. जब से ए आर रहमान को औस्कर मिला है तब से हिंदी फिल्म म्यूजिक के लिए यह जनून कुछ ज्यादा बढ़ सा गया है. मेरी तैयारी है कि हिंदी फिल्म म्यूजिक की संपूर्ण जानकारी किसी एक वैबसाइट में डाल सकूं ताकि लोगों को हमारे संगीत के बारे में सही जानकारी मिल सके.’’
रिपुसूदन कुमार ऐलावादी बचपन से रेडियो की दुनिया में हैं. विजयलक्ष्मी और मनोहर की तरह वे भी रेडियो सीलोन के स्वर्णिम दिनों को दिल में संजोए हैं. वे बताते हैं, ‘‘मैं बेसिकली भोपाल का रहने वाला हूं. तब आकाशवाणी भोपाल पर एक प्रोग्राम ‘मलयालम सीखिए’ नाम से आता था. उस में एक गुरुजी 2 बच्चों को मलयालम सिखाते थे. उन में एक बच्चा मैं था. तब हमें एक प्रोग्राम के 5 रुपए मिलते थे. इस से रेडियो की तरफ मेरा स्वाभाविक रुझान बढ़ा. भोपाल के माहौल का कुछ असर था कि हमारी हिंदी और उर्दू अच्छी थी.
‘‘कालेज की पढ़ाई के दौरान आकाशवाणी भोपाल से ‘युववाणी’ कार्यक्रम प्रस्तुत करने का मौका मिलने लगा. तब मैं ने कुमार के नाम से रेडियो पर बोलना शुरू किया था. उन दिनों रेडियो पर आवाज आना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी. लिहाजा, अंदर से आत्मविश्वास जगा कि रेडियो पर हम और बेहतर बोल सकते हैं. आकाशवाणी भोपाल से मैं डेढ़ साल तक जुड़ा रहा, फिर 19 साल की उम्र तक पहुंचतेपहुंचते वहां न्यूज सैक्शन में सह संपादक हो गया. रेडियो पर तब मैं सब से कम उम्र का सह संपादक था.
‘‘इसी दौरान रेडियो सीलोन में उद्घोषक की जरूरत के लिए अखबारों में इश्तिहार निकला. मैं ने भी आवेदन कर दिया. 9 हजार लोगों में हम 20 लोगों को चुना गया. फिर नई दिल्ली के श्रीलंका हाई कमीशन में 2 दिन तक अलगअलग टैस्ट ले कर हम लोगों को छांटा गया. इस के बाद मैं घर आ गया. अचानक एक दिन एसएलबीसी की चिट्ठी आई तो मैं हैरान रह गया क्योंकि 9 हजार लोगों में मुझ अकेले को चुना गया था. इस के बाद परिस्थितिवश करीब डेढ़ साल के बाद मैं ने घर वालों की मरजी के खिलाफ कोलंबो जा कर एसएलबीसी जौइन किया. वहां पर भी रेडियो सीलोन के इतिहास में मैं सब से कम उम्र (21 साल) का उद्घोषक था.
‘‘मैं रेडियो सीलोन में नियमित उद्घोषक के तौर पर गाने तो पेश करता ही था लेकिन मैं ज्यादातर रात 9.30 बजे का एशिया बुलेटिन पढ़ता था. मैं खुद ही एडिटिंग करता था. वहां दिनभर के न्यूज की कौपी हम लोगों को दे दी जाती थी. फिर हम उस में हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बंगलादेश की रुचि के मुताबिक न्यूज आइटम छांट कर अलग कर लेते थे और अपने बुलेटिन में समावेश करते थे.’’
जान पर बन आई थी मेरी
विजयलक्ष्मी की तरह रिपुसूदन ने भी श्रीलंका के बिगड़े हालात के दिन देखे हैं. उन्हें याद करते हुए वे बताते हैं, ‘‘80 के दशक में श्रीलंका के हालात बहुत बिगड़ गए थे. कई बार तो वहां मेरी जान पर बन आई थी. मुझे याद है, कर्फ्यू लगा हुआ था और रात का न्यूज बुलेटिन मुझे पढ़ना था. रात में एसएलबीसी से गाड़ी लेने नहीं आई मुझे. मैं दुविधा में था कि अब क्या करूं? अगर नहीं जाता हूं तो न्यूज प्रसारित नहीं होगी. ऐसे में रेडियो सीलोन को ले कर एक गलत संदेश जाता कि इस देश के हालात इतने बुरे हैं कि इन के यहां न्यूज भी नहीं जा पाती है. ऐसे में मैं अपने घर से नीचे उतरा, अपने दांतों से अपना आईडैंटिटी कार्ड दबाया और दोनों हाथ ऊपर कर सड़क पर चलना शुरू किया. चारों तरफ मिलिट्री और पुलिस लगी हुई थी. इतने में भागते हुए कुछ जवान आए और मुझ से हैंड्सअप कहा. मैं ने कहा, ‘मैं तो पहले से ही हैंड्सअप किए हुए हूं.’ मैं ने उन को अपना कार्ड दिखाया और अंगरेजी में बोला कि मैं यहां पर अनाउंसर हूं, न्यूज रीडर हूं. अगर न्यूज नहीं पढ़ूंगा तो यह गलत होगा. फिर उन्होंने अपनी मिलिट्री की गाड़ी में मुझे छोड़ा, तब मैं ने जा कर न्यूज पढ़ी. इस तरह मुझे लगा कि यहां रहना ठीक नहीं है. लिहाजा मैं वापस आ गया.’’
रिपुसूदन 1970 से 1980 तक रेडियो सीलोन में रहे. न्यूज बुलेटिन के अलावा ‘बालसखा’ कार्यक्रम उन का बहुत पौपुलर हुआ. वे पाकिस्तानी फिल्मी गीतों का एक प्रोग्राम भी पेश करते थे. उन्हें नातिया कव्वाली का प्रोग्राम पेश करने को कहा जाता था क्योंकि उन की उर्दू अच्छी थी.
रेडियो सीलोन छोड़ कर हिंदुस्तान लौटने के बाद उन्होंने फिल्म प्रभाग के साथ काम किया. मुंबई दूरदर्शन पर समाचार भी पढ़ा. फिल्म डिवीजन की डौक्युमैंट्री में आवाज भी दी. इस के अलावा अमीन सयानी और मनोहर के साथ बहुत से स्पौंसर्ड प्रोग्राम किए. अब वे पूरी तरह फ्रीलांसिंग में बिजी हैं. जिन्हें उन की आवाज की जरूरत होती है वे उन्हें बुलाते हैं.
रेडियो सीलोन का वह सुहाना दौर तो वे आज भी नहीं भूलते.
चिंता मानव जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है. चिंता किसे नहीं होती और कब नहीं थी? पहले चिंता के क्षेत्र और दायरे कम थे. अब चिंता की परिधि व प्रकार बढ़े हैं. पर चिंतित होने की कोई बात नहीं है. आज बेहतर समाधान भी हाजिर हैं. ये समाधान तकनीकी विकास से संबंधित हैं और विशेषज्ञ सेवाओं से संबंधित भी. आवश्यकता होने पर चिंता के समाधान के लिए व्यावसायिक सेवाएं भी ली जा सकती हैं. जीवन के हर पल को बेहतर बनाने का प्रयास करना हमारा कर्तव्य है, फिर भी जकड़ ही लेती है कोई न कोई चिंता.
तो आइए, चिंता को चिंता की तरह न लें बल्कि एक चुनौती और अवसर की तरह लें, जो आप के जीवन को बेहतर बनाने आई है, अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर के. मात्र पहचान करने की आवश्यकता है कि चिंता का वास्तविक केंद्र बिंदु क्या है?
कार्यालय संबंधी चिंताएं
कार्यालय का वातावरण एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण कारक होता है. देखें, क्या यह वातावरण आप को अच्छा लगता है? यदि नहीं, तो क्या आप निर्लिप्त हो कर कार्य कर सकते हैं? यदि यह भी संभव नहीं लगे और कोई विशेष विवशता न हो तो आप कार्यालय परिवर्तन के बारे में सोच सकते हैं. स्थानांतरण या कोई दूसरा काम भी ढूंढ़ सकते हैं जिस से आप की मानसिक दशा पर घातक प्रभाव न पड़े. शोध अध्ययनों के अनुसार अपने कार्य से संतुष्टि भी मानसिक दशा को प्रभावित करती है.
इस पर भी ध्यान दें कि कार्य करने में आप को आनंद आता है या मात्र धनलाभ के लिए आप कार्यरत हैं? यदि आप ने कार्य का चयन अपनी रुचिव क्षमता के अनुसार किया है तो आप संतुष्ट व सुखी होंगे. इस के लिए आप अपना कोई व्यवसाय भी आरंभ कर सकते हैं जिस में आप अपनी क्षमताओं का उपयोग कर सकें.
पतिपत्नी दोनों ही कामकाजी हों तब भी समस्याएं स्थायी चिंता का विषय बन जाती हैं. समय से कार्यालय पहुंचना, किसी काम के लिए छुट्टी लेना, बच्चों व परिवार की देखभाल आदि पर मतभेद
हो सकता है. इस तरह के परिवारों का अध्ययन बताता है कि यदि परिवार आर्थिक रूप से समर्थ है तो ‘कामकाज’ यानी नौकरी न करने वाली पत्नी के होने पर सामंजस्य ठीक रहा किंतु जिन परिवारों में पति की आय कम थी वहां भी पूर्णकालिक नौकरी की अपेक्षा अंशकालिक नौकरी करने वाली पत्नियों का परिवार अधिक सुखी था.
यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि ये परिणाम हर पतिपत्नी पर लागू हों, आवश्यक नहीं. ये नतीजे ‘औसत व अधिकांशत:’ के आधार पर हैं. आगे आप के विचार, व्यक्तित्व व सामंजस्य क्षमता पर ही सब निर्भर है.
इस के अलावा यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि कार्य का आप के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ रहा है. यदि कार्य प्रतिकूल है तो आप को अपने कार्य के बारे में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है. अस्वस्थता से कई समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं जो पारिवारिक सुखशांति में बाधक हो सकती हैं. आप की अस्वस्थता का आप के कार्य पर नकारात्मक असर न पड़े, इस के लिए भी खुद को शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रखना आप का कर्तव्य है.
सामाजिक व आर्थिक चिंताएं
सम्मानित जीवन जीने का सब को अधिकार है. सवाल यह है कि सम्मान कैसे प्राप्त करें? समाज में किन मूल्यों या कारकों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है? यहीं से जन्म लेती है द्विविधा और अनिर्णय की स्थिति, जैसे ईमानदारी को अधिक महत्त्व दिया जाए या भौतिक संसाधनों (कार वगैरह) की प्राप्ति को? इन में से किसी एक को चुनना तब और भी कठिन हो जाता है जब यह भी पता हो कि घोषित व पोषित मूल्यों में अंतर है. दोनों को मापने की कसौटियों में भी विचलन है. ऐसे में क्या करें?
आप अपने व्यवहार, आचरण, रचनात्मकता, सामाजिक चेतना, योग्यता, व्यक्तित्व व विशिष्टता से पहचान बनाएं यह स्थायी और सुंदर भी हैं. अपने समूह व समाज में उन्हीं गुणों व मूल्यों को महत्त्व दें जिन्हें आप महत्त्वपूर्ण और वांछित समझते हैं.
दूसरों से अधिक धनी होना, जीवनयापन का व्यय बढ़ना, धन को ही स्टेटस का पैमाना मानना, दूसरों से अच्छा पद व व्यवसाय आदि के बारे में सोचते रहना चिंताओं को न्योता देना है, जिस का कोई समाधान नहीं है क्योंकि इस की कोई सीमा नहीं है.
यहां एक उच्चाधिकारी के घर की घटना का उदाहरण लेते हैं. उन के यहां कोई अतिथि आने वाले थे. उन की बेटी घर संवार रही थी. वह बाहर के कमरे यानी बैठक से रैक अंदर ले जाने लगी तो उस के पिताजी ने टोका, ‘‘कहां ले जा रही हो? यहीं रहने दो इसे.’’
‘‘नहीं, इस का परदा अच्छा नहीं लगता, साड़ी का है,’’ वह बोली तो उच्चाधिकारी महोदय ने समझाया, ‘‘इस में संकोच की क्या बात है? हम छोटे हो जाएंगे क्या? यह तो सम्मान का ‘तमगा’ है. हां, कीमती चीज होती तो अवश्य मेरे ईमानदार आचरण को कोई ठेस पहुंचा सकता था, मन ही मन सोच कर कि बहुत बेईमान रहे होंगे.
इस तरह स्वयं मूल्यस्पष्टता के साथ ही अपने बच्चों को भी सही दिशा दे सकते हैं ताकि उन का ध्यान भी खोखली चीजों में न उलझ कर सार्थक दिशा में लगे. दिखाने की प्रवृत्ति त्याग कर अपनी आवश्यकता के अनुरूप जीवनशैली अपनाएं व सुखी रहें.
दरअसल, आप के ही वश में होता है इस तरह की चिंताओं को अलविदा कहना.
दांपत्य संबंधी चिंताएं
यदि आप अविवाहित हैं तो विवाह की चिंता (व्यक्ति, स्थान, व्यवसाय, स्तर, व्यक्तित्व आदि) होगी. यदि ‘अकेले रह गए’ विवाहित हैं तो पुनर्विवाह की भी चिंता हो सकती है, पर यह ध्यान रहे कि पुनर्विवाह बहुधा उच्च आर्थिक स्तर के परिवारों में ही सफल रहे हैं. वैसे बहुत कुछ आप के हाथ में है.
सब से महत्त्वपूर्ण पहलू है सामंजस्य, जो प्रत्येक दंपती के जीवन को प्रभावित करता है. सामंजस्य संबंधी चिंता होनी स्वाभाविक है किंतु दांपत्य में प्रवेश के बाद समायोजन बनाए रखना अनिवार्य है यह भी समझना होगा. आप को लग रहा होगा कि इस ‘लचीलेपन’ के युग में ‘अनिवार्य’ शब्द का प्रयोग एकपक्षीय बात है, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है. जरा ध्यान से सोचिए.
आज पतिपत्नी की भूमिका में बदलाव आया है. अंतर्जातीय व विदेशी विवाहों की संख्या बढ़ी है. शैक्षिक योग्यताओं, व्यवसायों में बदलाव आया है. दांपत्य को सार्थक बनाने के लिए पहले से अधिक सहनशक्ति और दूसरे को स्वीकार करने की क्षमता होना आवश्यक है. संक्षेप में, पतिपत्नी में से जो दूसरे को अधिक खुश रख सके वही अधिक योग्य व बुद्धिमान है.
आप प्रश्न कर सकते हैं कि यह व्यक्तिवाद का युग है. पतिपत्नी दोनों को अपनी तरह से जीने का अधिकार है. सत्य है, अपनी तरह जीने का अर्थ एकदूसरे का विरोध नहीं बल्कि सम्मान व स्वीकृति है.
आज विवाहों का विच्छेद सहज ही स्वीकार कर लिया जाता है, कारण चाहे कुछ भी हो. यहां यह जान लें कि आज विवाहों को अटूट बनाए रखना पहले से अधिक आवश्यक है. मौजूदा समय में जबकि अधिकतर परिवार संयुक्त नहीं हैं, पतिपत्नी नौकरी के कारण अलग नगरों में हैं, सगेसंबंधी पहले की तरह संबंध नहीं निभा पा रहे हैं, परिचितों व मित्रों पर भी पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता, ऐसे में जीवनसाथी का मानसिक संबल ही आप को ऐसा साथ दे सकता है जो जीवन की हर तरह की राहों में आप को शक्तिसंपन्न रखेगा. एकदूसरे के भावनात्मक सहयोग व संबल से कठिनतम क्षण भी सहने योग्य हो जाएंगे. इसलिए और भी मजबूती से थामिए इस संबल को जो आप का ही है.
मातापिता संबंधी चिंताएं
स्वयं मातापिता होने के कारण चिंताएं या अपने मातापिता से संबंधित चिंताएं. अपने बच्चों के उत्तम लालनपालन संबंधी चिंताएं या द्विविधात्मक चिंताएं, जैसे भारतीय संस्कार दें या विदेशी चलन की छूट दें. अपने मातापिता की देखभाल, स्वास्थ्य, इच्छाओं संबंधी चिंताएं. बड़ों की अपेक्षाएं पूरी करें. बच्चों की इच्छाएं पूरी करें. ऐसी कई बातें आप सोचते होंगे.
इन सभी प्रश्नों में दरअसल ‘अपेक्षाएं व छूट’ ही विचारणीय हैं. यथासंभव मातापिता की अपेक्षाएं पूरी करें. कुछ न भी कर पाएं तो उन्हें बताएं कि उन से प्राप्त आदर व प्यार सब अभावपूर्ण कर देगा. बच्चों के लिए एक ही मंत्र है ‘नियंत्रित छूट’. अनुशासन और उस की स्वतंत्रता का सम्मान भी. इस से बालक का स्वतंत्र विकास होगा.
बच्चों को अपना समय अवश्य दें. कई चिंताएं जन्म ही नहीं लेंगी. यह सूत्र व्यस्ततम मातापिता के लिए भी समान रूप से लागू है. अपने मातापिता को अपने साथ ही रखें तो उत्तम होगा. उन के लिए, आप के लिए और आप के बच्चों की खुशी के लिए भी. इस से आप के बच्चों को उदाहरण भी मिलेगा अपने मातापिता के लिए. यदि आप के मातापिता दूर रहते हैं तो भी मिलने जाते रहें, उन की आवश्यकताओं का ध्यान रखें, आर्थिक ही नहीं, भावनात्मक भी. पत्र, टैलीफोन या फिर ईमेल द्वारा उन से जुड़े रहें.
चिंता कैसी भी हो, उसे पहचानें, संभव विकल्पों की सूची बनाएं. फिर उस पर विचार कर के सब से अच्छा और संभव विकल्प चुनें. यही तो जीवन है. जीने के ढंग से इसे और भी सुंदर बनाएं.