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#Coronavirus: रश्मि देसाई ने गाया ‘गो कोरोना गो’, वायरल हुआ VIDEO

एक्स बिग बॉस कंटेस्सटें और नागिन एक्ट्रेस रश्मि देसाई की फैन फॉलोइंग काफी जबरदस्त है. फैन्स ने उनके नाम के कई इंस्टाग्राम अकाउंट्स बनाए हुए हैं. अब हाल ही में एक वीडियो सामने आया है जिसे रश्मि के फैन्स ने शेयर किया है. इस वीडियो में रश्मि गो कोरोना गो गा रही हैं. रश्मि का ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. फैंस को रश्मि का ये अंदाज काफी पसंद आ रहा है.


इससे पहले मास्क पहनकर गई थी सब्जी लेने…

कुछ दिनों पहले रश्मि सड़क पर सब्ज़ी खरीदते हुए दिखी थीं. रश्मि मास्क पहनकर सब्ज़ी खरीदते हुए दिखी थीं.

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बिग बॉस को लेकर हाल ही में दिया ये बयान…

रश्मि ने बिग बॉस ख़त्म होने के बाद कुछ दिनों पहले ही शो को लेकर बात की है. रश्मि ने कहा था, इस शो ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है. शो ने कई चीजों के प्रति मेरा नजरिया बदल दिया. मैं एक स्ट्रॉंग महिला बन गई हूं. मैंने अब चीजों को पॉजिटिव तरीके से लेना शुरू कर दिया है. मेरा पेशन्स लैवल बढ़ गया है. इसमें कोई शक नहीं कि मैंने वहां मुश्किल दिनों का सामना किया, लेकिन इसके साथ ही मैंने वहां खूबसूरत यादें भी बनाई.’

रश्मि ने ये भी बताया था, ‘मैं वो कंटेस्टेंट हूं जो घर में सबसे मुश्किल दौर से गुजरी हूं. मेरी पर्सनल लाइफ पूरी तरह से खुलकर सामने आ गई थी. उन सिचुएशन्स को मेरे लिए संभालना आसान नहीं था, लेकिन फिर भी मैंने किया.’

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बता दें कि शो में रश्मि अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर खूब सुर्खियों में रही थीं. घर से आने के बाद वह उन्होंने घर में सभी सद्स्यों के बारें में खुल बात की. बता दें कि इस बार शो में सिद्धार्थ शुक्ला ने बिग बॉस की ट्रॉफी जीती.

वहीं असीम रियाज फर्स्ट रनरअप और शहनाज गिल सेकेंड रनरअप रहीं. वहीं शो की सबसे चहेती और स्ट्रॉन्ग कंटेस्टेंट कही जाने वाली टीवी एक्ट्रेस रश्मि देसाई चौथे नंबर थीं.

#coronavirus: चीन पर गहराता शक

आज कोरोना के कारण पूरा विश्व लॉक डाउन है.भारत, अमेरिका, योरोप, श्रीलंका, चेक रिपब्लिक, इटली, ईरान सब जगह लोग अपने अपने घरों में कैद हो कर रह गए हैं मगर चीन के सभी शहर खुले हुए हैं. और अब तो आठ अप्रैल से चीन का वो शहर भी खुल जाएगा जिस जगह से तबाही का ये वायरस बाहर निकला था. जी हाँ, चीन सरकार ने आठ अप्रैल से वुहान शहर को खोलने की घोषणा कर दी है.यही नहीं चीन का मुख्य पर्यटक स्थल ग्रेट वाल ऑफ़ चीन भी पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है और वहां टिकट्स की बुकिंग भी शुरू हो गई है.

उल्लेखनीय दुनियाभर में कोरोना वायरस का प्रकोप लगातार बढ़ जा रहा है.इनमें यूरोपीय देश इटली, स्पेन, ईरान, फ्रांस और जर्मनी और अमेरिकी देश शामिल है जबकि उसके उलट चीन में कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में न केवल कमी आई है बल्कि संक्रमित मरीजों की रिकवरी का औसत भी दूसरे देशों की तुलना में काफी बेहतर देखने को मिला है.

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चीन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य आयोग की रिपोर्ट के अनुसार चीन में लगभग 89 फीसदी कोरोना वायरस मामलों में लोग ठीक होकर अस्पताल से छूट चुके हैं. पिछले साल दिसंबर में प्रकोप की शुरुआत के बाद से देश में दर्ज किए गए 81,093 मामलों में से 72,703 ठीक हो चुके हैं, जबकि इस समय अस्पतालों में केवल 5,120 मरीज अपना इलाज करा रहे हैं.

इस बीच चीन में कोरोना वायरस के कोई घरेलू मामले सामने नहीं आ रहे हैं.जबकि कोरोना संक्रमण के मामले में इटली और ईरान की दशा बेहद खराब और डरावनी हैं.आश्चर्यजनक बात है कि चीन में किसी भी नेता, किसी भी मिलिट्री लीडर या किसी भी बड़े बिजनेसमैन को कोरोना वायरस ने नहीं पकड़ा.कोरोना वायरस ने दुनिया भर के अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर दिया, लाखों की नौकरी रोज़गार ख़तम कर दिए, हज़ारों की जान ले ली, लाखों को बीमार कर दिया, अनगिनत लोगो को उनके घरों में कैद कर दिया, तमाम देशों को लॉक डाउन की स्थिति में पहुंचा दिया, जिसमे भारत भी एक है जहाँ अर्थव्यवस्था उस स्थिति में पहुंच गई है जिसका संभल पाना आगे आने वाले कई सालों में बहुत मुश्किल होगा मगर चीन की अर्थव्यवस्था को कोई ज़्यादा नुक्सान होता नज़र नहीं आ रहा है.

आश्चर्य की बात तो यह है कि वुहान जहाँ से इस खतरनाक वायरस की उत्पत्ति हुई उसी वुहान से सटी चीन की राजधानी बीजिंग और चीन की आर्थिक राजधानी शंघाई तक ये वायरस अपनी ख़ास पहुंच नहीं बना पाया? इन दोनों शहरों में नाममात्र के केस ही सामने आये हैं. बीजिंग में तो मात्र दो आम नागरिकों के मरने की सूचना भर है.

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आज सारी दुनिया बंद है। पेरिस बंद है, न्यूयोर्क बंद है, बर्लिन, रोम, दिल्ली, मुंबई, टोक्यो सब बंद हैं.दुनिया के प्रमुख आर्थिक और राजनितिक केंद्र बंद हैं मगर चीन के बीजिंग और शंघाई खुले हुए हैं. वह उस दौरान भी खुले हुए थे जब कोरोना वहां तबाही के चरम पर था.कोरोना का कोई ख़ास असर शंघाई और बीजिंग में दिखाई नहीं देता है.गौरतलब है कि बीजिंग वो शहर है जहाँ चीन के टॉप मोस्ट नेता, आर्मी कमांडर, मिलिट्री लीडर और चीन की सत्ता सँभालने वाले पावरफुल लोग रहते हैं.

इस बीजिंग में कोरोना का कोई असर नहीं है इसलिए वहां कोई लॉक डाउन नहीं है.दूसरी तरफ शंघाई वो शहर है जो चीन की अर्थव्यवस्था को चलाता है, शंघाई चीन की आर्थिक राजधानी है, यहाँ चीन के सबसे अमीर लोग बसते हैं. यहाँ पूंजीपति, कारोबारी, उद्योगपति रहते हैं.शंघाई में भी कोरोना का कोई असर नहीं है और ना ही यहाँ कोई लॉक डाउन है.तो क्या इस बात का शक नहीं उठता कि कोरोना चीन का ईजाद किया और पाला हुआ वायरस है जिससे कहा गया है कि तुम सारी दुनिया में तबाही मचाओ, चीन में भी माध्यम और गरीब तबके की जानें लो मगर बीजिंग और शंघाई के अमीरों से दूर रहो. आखिर क्या वजह है कि जब दुनिया के तमाम ताकतवर और विकसित देश कोरोना को नहीं रोक सके तो बीजिंग और शंघाई इसकी चपेट में आने से बच गए जो वुहान से बिलकुल सटे हुए हैं? आखिर कोरोना बीजिंग और शंघाई तक क्यों नहीं पहुंचा?

आज पूरा भारत लॉक डाउन में है. हमारी अर्थव्यवस्था ठप्प हो चुकी है.गरीबों मजदूरों के पास अगले चार दिन बाद शायद खाने तक का जुगाड़ नहीं होगा.शहर के शहर बंद हो गए हैं. मगर चीन के सभी प्रमुख शहर खुले हुए हैं.चीन में अब कोरोना वायरस से पीड़ित नए केस भी सामने नहीं आ रहे हैं.गौर करने वाली बात ये है कि दुनिया भर का शेयर मार्किट लगभग आधा गिर चुका है.भारत में भी निफ्टी बारह हज़ार से सात हज़ार पर पहुंच गया है पर चीन का शेयर मार्किट तीन हज़ार पर था और अभी भी 2700 पर है. उसमे कोई ज़्याद गिरावट दर्ज नहीं की गई है। हैरानी की बात है की दुनिया भर को कोरोना का वायरस देने वाले चीन की अर्थव्यवस्था पर कोरोना का कहर तारी नहीं हुआ.

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यह तमाम बाते क्या इस बात की ओर इशारा नहीं करतीं की कोरोना चीन का बनाया हुआ एक जैविक हथियार है जिसने दुनिया भर में तबाही मचा दी और दुनिया भर की इकॉनमी को ठप्प कर दिया. चीन ने इस जैविक हथियार से अपने यहाँ भी लोगों को मरवाया मगर मरने वालों मे कोई पावरफुल आदमी नहीं था. कोई राजनितिक जान का नुक्सान चीन को नहीं हुआ. और अब चीन ने इस वायरस पर कण्ट्रोल भी कर लिया है. हो सकता है इस वायरस का वैक्सीन उसके पास हो या इसकी दवा उसके पास हो जिसे उसने बाकी दुनिया से शेयर नहीं किया.

दुनिया के अनेक देशों में कोरोना ने बड़ी बड़ी हस्तियों को अपनी चपेट में लिया है. हॉलीवुड स्टार, ऑस्ट्रेलिया के गृहमंत्री, ब्रिटेन के स्वास्थ मंत्री, स्पेन के प्रधानमंत्री की पत्नी और अब तो ब्रिटेन के शाही घराने के प्रिंस चार्ल्स को भी कोरोना ने जकड लिया है पर चीन के किसी नेता, किसी मिलिट्री अफसर को कोरोना ने छुआ तक नहीं ? क्या ये आश्चर्य की बात नहीं है ?

खबरदार जो पैर छुए

प्यारे बंधुओ, वर्षों से पैर छूने की कला में पारंगत अपने सांसद सदमे में आ गए हैं. प्रधानमंत्रीजी ने सार्वजनिक रूप से नसीहत देते हुए कह दिया है कि कोई भी उन के न तो पैर छुए और न ही चापलूसी करे. प्रधानमंत्रीजी ने अपने भाषण के दौरान कहा, ‘‘जब कोई मेरे पैर छूता है तो मुझे गुस्सा आता है. मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आया हूं. संघ के सरसंघचालक गुरुजी कहते थे कि एक बार पैर छूने पर उन की उम्र एक दिन घट जाती है.’’

प्रधानमंत्रीजी ने यह भी कहा, ‘‘सभी सांसद जनता से सीधे संवाद करें. सदन में ज्यादा से ज्यादा मौजूद रहें. प्रवक्ता की तरह न बोलें. बहस में ज्यादा हिस्सा लें. संसदीय क्षेत्र की बात करें. क्षेत्र के विकास की चिंता करें. मुद्दे उठाने का होमवर्क करें, किसी भी सीनियर नेता के पांव न छुएं, संसद के सभी सत्रों में मौजूद रहें और सदन में बोलने से पहले पूरी तैयारी कर के आएं. प्रत्येक सांसद अपना काम पूरी ईमानदारी और लगन से करे. यही उन का सच्चे तौर पर पैर छूना समझा जाएगा.’’ जी हां, प्रधानमंत्रीजी ने सच ही तो कहा है, भला इस में बुरा भी क्या है? आप यदि बुरा न मानें तो मैं यहां पर पूरी तरह से अपने प्रधानमंत्रीजी के साथ हूं और मैं भी अपने भारतवासियों से कहना चाहूंगा कि अपने भारत के सभी नागरिक यदि उन की इन बातों पर अमल करें तो भावी पीढ़ी पैर छूने का सच्चा अर्थ भूल कर बस अपना काम से काम रखना सीख जाएगी. परिणामस्वरूप वह बातबात पर केवल अपना उल्लू ही सीधा करती हुई नजर आएगी.

मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि पिछले दिनों मुझे दिल्ली के रजिस्ट्रार कार्यालय में अपने एक 75 वर्षीय सेवानिवृत्त आला अधिकारी के फ्लैट की रजिस्ट्री के लिए उन के गवाह के रूप में पेश होना पड़ा. तो उन से मिलने पर जैसे ही मैं पूरे सम्मान के साथ उन के पैर छूने हेतु झुका, उन्होंने तुरंत मेरे कंधों को स्नेह से पकड़ कर मुझे उठा लिया और बोले, ‘‘अरे सक्सेना साहब, यह क्या कर रहे हैं? आज आप का वक्त है, आप हमारे काम के लिए अपने कीमती सरकारी समय में से समय निकाल कर यहां आए हैं. इसलिए आज हम आप के आभारी हुए, आप नहीं. आज मैं आप का साहब नहीं, आप हमारे साहब हैं. वैसे भी तो अब मैं रिटायर हो चुका हूं. पैर छू कर आप ने तो मुझे भावुक कर दिया. मुद्दत हो गई किसी ने पैर नहीं छुए. शासन में था तो रोजाना ही कोई न कोई पैर छुए बिना मानता ही नहीं था. अब तो अपना सगा बेटा भी पैर नहीं छूता है. हैलो, हाय, डैड कह कर काम चलाता है. धन्य हैं आप के संस्कार जो आप ने निसंकोच हो कर पैर छूने के आचरण को अभी तक अपने जीवन में बनाए रखा.’’

उन की स्नेहिल बातें सुन कर मैं मन ही मन गौरवान्वित और धन्य महसूस करने लगा और सोचने लगा कि यहां आ कर हम ने इन पर भला कौन सा एहसान कर दिया? कौन सा हम पैदल चल कर यहां आए हैं? अपने निदेशालय के वर्तमान कार्यरत आला अधिकारी से पहली बार सम्मान के साथ इजाजत और सरकारी वाहन पर सवार हो कर शान से इन के काम के लिए निकले हैं. वैसे भी हमें तो आला अधिकारियों के कामकाज के लिए अपने सरकारी समय में से समय चुराने की पुरानी आदत है. इस परमसुख कार्य का हमें बहुत अभ्यास भी है. इसलिए दिक्कत नहीं आती है. इस बार फर्क सिर्फ इतना था कि अब की बार जिन सेवानिवृत्त आला अधिकारी की मदद करने हेतु हम अपने सरकारी कार्यालय से बाहर निकले थे वे हमारे वर्तमान कार्यरत आला अधिकारी के समकक्ष आला अधिकारी थे.

एक आला अधिकारी दूसरे आला अधिकारी की मदद न करे, यह तो हो ही नहीं सकता. वह आला अधिकारी ही क्या जो अपने और अपने सगेसंबंधियों व परिचितों के निजी कामकाज के लिए अपने अधीनस्थों का जम कर प्रयोग ही न कर पाए. भला भाईचारा भी कोई चीज होती है. वे भी भूतपूर्व आला अधिकारी थे इसलिए वर्तमान आला अधिकारी ने हमें अपने सरकारी समय में ही उन का जरूरी निजी कामकाज निबटा देने हेतु बिना नाकभौं सिकोड़े हुए अपनी सहमति के साथसाथ हमारे जाने और आने हेतु ससम्मान अपनी सरकारी गाड़ी भी प्रदान करा दी थी. सरकारी कार्यालय के सरकारी समय में कार्यालय में रहते हुए फाइलों पर कामकाज करो या आला अधिकारियों के निजी कामकाज हेतु कार्यालय से बाहर निकल जाओ, ये दोनों ही कार्य दफ्तरी संस्कृति में सरकारी कार्यकुशलता के दायरे में आते हैं. इन दोनों कार्यों में पारंगत होने वाला सरकारी अधिकारी हो या कर्मचारी या फिर चपरासी, तीनों ही उत्कृष्टता का खिताब पाते हैं.

बंधु, आप ने यह भी सुना ही होगा कि अब आजकल पैर न छुए जाने की नई कला की बदौलत अपना इंडिया ‘स्कैम इंडिया’ नहीं, बल्कि ‘स्किल इंडिया’ बनने जा रहा है. सरकारी दफ्तरी संस्कृति में आला अधिकारियों के पैर छूना चमचागीरी का परिचायक माना जाता है, तो वहीं यह बात अलग है कि अपने से बड़ों के पैर छूना हमारी परंपरा भी है, जो व्यक्तिगत सम्मानसूचक है.खैर, फिलहाल लगता है कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए पैर छूने की वर्षों पुरानी परंपरागत कला के दिन अब खत्म होने वाले हैं. जल्दी ही यह कला विलुप्त हो जाएगी. वैसे भी, वर्तमान में आधुनिक युवा पैर कम, थोड़ा सा झुक कर घुटने छू ने में ज्यादा विश्वास रखते हैं. अपने देश के कुछेक सांसदों को छोड़ कर, युवाओं को तो पैर छूना फजीहत का काम ही लगता है. वे तो मौकापरस्ती का फायदा उठाने के लिए ही पैर छूने में विश्वास रखते हैं, इस से अधिक कुछ नहीं.

अरेअरे बंधु, यह सब पढ़ कर आप किस सोच में पड़ गए? क्या आप को लगता है कि भविष्य में पैर छूना भी घोटालों यानी कि स्कैम में शामिल कर लिया जाएगा? या फिर भविष्य में यदि कोई भी सांसद पैर छूता हुआ दिखाई दे गया या फिर गुप्तरूप में प्रयास भी करता हुआ पाया गया तो उस को 2 साल की जेल या फिर 1 लाख रुपए जुर्मानारूपी सजा हो सकती है? नहींनहीं, ऐसा कुछ भी नहीं होगा परंतु यदि यही हाल रहा तो मेरा विश्वास है कि अपने देश में अब एक नया पैर न छुओ नियंत्रण बोर्ड अवश्य बन सकता है. इस के लिए ट्रैफिक नियंत्रण इंस्पैक्टर और अधिकारियों की तरह पैर नियंत्रण इंस्पैक्टरों व अधिकारियों की भरती की जाएगी. इन इंस्पैक्टरों और अधिकारियों पर नियंत्रण रखने के लिए पैर नियंत्रण महानिदेशालय खोला जाएगा. इन इंस्पैक्टरों और अधिकारियों की पोस्ंिटग संसद भवन और संसदीय कार्यालयों में की जाएगी.

पैर नियंत्रण महानिदेशालय ऐसे बेरोजगार शिक्षित युवाओं की भरती पर विशेष ध्यान देगा जिन्होंने अपनी शिक्षा के दौरान एक भी अध्यापक व प्रवक्ता के कभी भी पैर न छुए हों. इस बात की पुख्ता पहचान के लिए कोई विशेष सर्टिफिकेट तो अभी तक नहीं बना है मगर भरती हेतु चयनित हुए युवाओं को नंगा कर के उन्हें साष्टांग दंडवत होने हेतु कहा जाएगा जो जितनी जल्दी साष्टांग दंडवत हो जाएगा, बस, वह पैर नियंत्रण इंस्पैक्टर के टैस्ट में फेल कर दिया जाएगा अर्थात स्पष्ट शब्दों में कहूं तो इस परीक्षा में फेल हो जाने के बाद में लाख बार पैर पकड़ने पर भी उस का देश के इस नए पद यानी पैर नियंत्रण इंस्पैक्टर हेतु चयन नहीं होगा.

पैर नियंत्रण इंस्पैक्टर के बाद आप की इस संबंध में अगली आवश्यक जानकारी के लिए बता दूं कि पैर नियंत्रण अधिकारी हेतु नए पदों की भरती की निस्वार्थ चयन प्रक्रिया में 2 टैस्ट होंगे.

पहला, सामान्य प्रयोगात्मक टैस्ट व दूसरा मैडिकल द्वारा रीढ़ की हड्डी और दोनों हाथों की कोहनियों व पंजों की जांच. पहले सामान्य प्रयोगात्मक टैस्ट में केवल साष्टांग दंडवत प्रणाम प्रदर्शन द्वारा जांच कर ली जाएगी कि किस अभ्यार्थी का पैर छूने का किस प्रकार का अभ्यास है और अभ्यास है भी या नहीं. दूसरे टैस्ट में सीटी स्कैन और एमआरआई के द्वारा उस की रीढ़ की हड्डी और दोनों हाथों की कोहनियों व पंजों के बारबार मुड़ने की कोणीय टैंडेंसी तथा सैंसिटिविटी को परखा जाएगा. यहां भरती होने के चक्कर में भी यदि किसी युवा ने एक भी बार किसी वरिष्ठ चिकित्सक या फिर परीक्षाभवन में उपस्थित पर्यवेक्षक के पैर छूने की कोशिश की या छूता हुआ दिखाई दिया तो वह अगले ही पल अपने पैरों को सिर पर रख कर भागता हुआ ही नजर आएगा क्योंकि परीक्षा भवन और आसपास गैलरी आदि में लगे हुए खुफिया कैमरे उस पर अपनी पारखी नजर बनाए रखेंगे.

कैमरा नियंत्रण कक्ष में उपस्थित सीनियर अफसर ऐसे अभ्यर्थी को परीक्षा में बैठने से वंचित करार दे कर परीक्षा भवन से बाहर कर देने का धक्कारूपी अधिकार रख कर भगा भी सकते हैं. किसी के भी पैर छूना या फिर परीक्षा भवन या कक्ष में अपने पैरों के आसपास मंडराते मच्छर, मक्खियों को हटाने हेतु भी झुकने पर उसे पैर छूने का अभ्यासकर्म मान कर परीक्षा नियमों का उल्लंघन ही माना जाएगा. जो युवा अपनी परीक्षा देने भवन में अंदर जाते समय भी यदि बाहर खड़े अपने पिताजी, चाचाजी, ताऊजी इत्यादि बड़े बुजुर्गों के पैर छूते हुए दिखाई दिए तो उन के भी भरती न होने के प्रतिशत की दर बढ़ सकती है.

अब आप सोच रहे होंगे कि पैर छूना तो भारतीय परंपरा का हिस्सा है. अपने यहां तो भारतीय परंपरा में हर मौके पर ही पैर छुए जाते हैं. अपने देश में स्त्री के आंसू और पुरुष का पैरों पड़ना कठिन से कठिन काम भी आसान बना देता है. दरअसल, अपने देश में बिना मौके आंसू निकालना और पैर पड़ना दोनों ही सामाजिक कला के पारंपरिक उत्कृष्ट नमूने हैं. इन उत्कृष्ट कलाओं में पारंगत होने वाले को ही अब तक अपने देश में महान पद हासिल हुआ करते थे, जो शायद अब आसानी से नहीं मिलेंगे. अपने यहां एक कहावत है कि ‘अफसर के अगाड़ी और घोड़े के पिछाड़ी कभी नहीं आना चाहिए.’ तो बंधु, यहां भी कला आड़े आ गई और प्रधानमंत्रीजी के आगे भरी सभा में पैरी पौना हुए सांसद वर्षों की पारंपरिक कला का उपयोग करने से वंचित हो गए. उन्हें आशीर्वाद का वह लड्डू नहीं मिल पाया जिस की उन्होंने तमन्ना की थी. उन का पैर छूने का संपूर्ण हुनरमंद फार्मूला, आत्मविश्वास व अभ्यासकर्म इस बार पहली बार सब फेल हो गया.

आप भी यदि अपने बड़े होते हुए, राजनीति में हुनरमंद बच्चों को सांसद बनाना चाहते हैं तो आप को उन की बेहतरीन सफलता के लिए चुनाव के दौरान ही जम कर प्रशिक्षण देना होगा कि वे आप के और अपने महल्ले के समस्त बड़ेबुजुर्गों के पैर छूना तुरंत बंद कर दें. यदि उन्हें भारतीय परंपरा के अंतर्गत पैर छूने की लत लगी हुई हो तो उन्हें किसी पहलवान के अखाडे़ में भेज कर शारीरिक मल्लयुद्ध का अभ्यास करवाएं ताकि वे तमाम बार परास्त हो कर भी अपनी जीत और आशीर्वाद के लिए कभी भी किसी के पैर न छुएं. बातबात पर पैर छूना उन के भविष्य के राजनीतिक कैरियर को समाप्त कर सकता है. सो, पैर छूने से बचें. पैर से जा लगना, पैर पर सिर रखना, पैरा हुआ होना, पैरों में पर लगना, पैरों में बेडि़यां डालना, पैरों में मेहंदी लगा कर बैठना, पैरों चलना आदि के वास्तविक मूल अर्थ को भुला कर अब अपना इंडिया स्कैम नहीं स्किल इंडिया बनने जा रहा है. जहां पर प्रधानमंत्रीजी और सीनियरों के पैर छूना मना है. आप भी अपना संयम बनाए रख कर, देश की तरक्की में अपना योगदान दें और यदि आप पैर छूने का विकल्प ढूंढ़ रहे हों तो आप की जानकारी के लिए मैं ने आप के लिए अपना शोधकार्य पहले ही पूरा कर लिया है.

मेरे शोधकार्य का निष्कर्ष जनहित में जारी किया जा रहा है, ‘‘भाइयो, जहां पर पैर छूना मना हो वहां अपने चेहरे की बनावटी हंसी व गरदन हिलाने यानी हिनहिनाने के अभ्यासोपरांत आसानी से काम चलाया जा सकता है.’’ इसलिए पैर छूने के चक्कर में न पड़ कर आज से ही अपने चेहरे पर बनावटी हंसी व गरदन हिलाने का अभ्यास शुरू कर दें. इस अभ्यास से भविष्य में अवश्य लाभ होगा. तो बंधु, अब टैंशन किस बात की है, जो पैरों में अपनी आंखें गड़ाए बैठे हो. उठिए और मुसकराइए. बेझिझक हो कर विश्वास के साथ आगे बढ़ जाइए. मेरा विश्वास है कि आप को पैर छू कर मिलने वाले लाभ से ज्यादा स्नेहिल और मनचाही सफलता अवश्य हाथ लगेगी. आखिर अपने प्रधानमंत्रीजी द्वारा मिली नई जानकारी के तहत एक बार पैर छूने पर पैर पूजे जाने वाले की उम्र 1 दिन घट जाती है. आप को इस बात का खयाल भी तो अवश्य रखना ही होगा ना. तभी तो आप को उन के पैरों पर पड़ने की जगह, उन के सीने से लगने का लंबा मौका मिलेगा.                   

#coronavirus: कोरोना के बंद ने खोल दिए मन के बंद द्वार

आज पूरा विश्व एक महामारी की गिरफ्त में हैं , सबकी शिकायत भरी नजर चीन पर उठ रही है, यूँ तो मानव स्वभाव है शिकायत करना. शिकायत तो सभी की होती है एक दूसरे से, पत्नी को शिकायत पति से ;घर पर समय नहीं देते , पति को शिकायत दफ्तर के काम से मुक्ति नहीं मिलती, बच्चों को शिकायत कालेज, कोचिंग के बीच खुद के लिए समय ही नहीं निकाल पा रहे .किसने सोचा था कोरोना जैसा गम्भीर, असाध्य रोग इन शिकायतों का हल बनेगा. जी हाँ ! आज कोरोना से पूरी दुनिया थम गई है.‘जो जहाँ है, जिस हाल में है …बस वहीं रहे’ घोषणा हर तरफ सुनाई दे रही है . टेलीविजन पर माननीय प्रधानमन्त्री के भाषण के बाद तो मेट को छुट्टी देना हमारा नागरिक कर्तव्य हो गया था, चिंता में थी कैसे होगा …सफाई , कपड़े, खाना … उस पर सभी की फुल टाइम घर में मौजूदगी .

श्रीमान जी ने मन की बात भाप ली, बोले नो टेंशन, उन्होंने भी प्रधानमन्त्री की तर्ज पर अपने रियासत में एलान कर दिया,

“मौसम है ख़राब  घर से बाहर न निकला जाय  घर पर रहकर ही  माँ के काम में  हाथ बटाया जाय ” फार्मूला काम कर गया. सबसे बड़ी बात ‘बेटे के एमबीए फाइनल का एक्जाम कर्फ्यू के दो दिन पहले ही समाप्त हुआ था . उसे जॉब के लिए पन्द्रह दिन बाद ही निकलना था, सो फरमाइश थी, ‘माँ  मुझे कुछ रसोई का काम सिखला दो ताकि जहाँ रहूँ कम से कम भूखा तो न रहूँ .तो सबसे पहले तो मैंने किचन की कार्यशाला लगाईं . जिसमे सभी की हिस्सेदारी रही .सब्जी काटने ,छोंका लगाने, आटा, कुकर लगाने, रोटियाँ बेलने का काम बारी-बारी सबके हिस्से आया सुखद यह था कि सभी ने अपना काम ईमानदारी से निभाया.उस पर प्याज काटते हुए जब बेटे के मुख से यह वाक्य निकले ,

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‘माँ  कैसे काटती हैं आप प्याज़ , उफ़ ! कितना लगता है आँखों को ” वहीं रोटियाँ बेलते हुए पतिदेव को हैरान , परेशान हो यह कहते सुना ,

“सुमि ! कैसे बेल लेती हो तुम गोल-गोल रोटियाँ …यहाँ तो कभी चीन ,कभी जापान का नक्शा ही बनकर रह जाता है .” सच क्या कहूँ ये वाक्य किसी मन्त्र से सुकून दे रहे थे , मन आसमान की ऊंचाइयाँ छू गया .बहरहाल प्रतिस्पर्धा सी हो गई आज किसने अपना काम कौशल के साथ किया, अच्छा ऐसा …! मैं कल इससे अच्छा कर दिखाऊंगा.

अक्सर बेटे से शिकायत करती थी , ‘

‘कालेज जाते हो या धूल में लौटकर आते हो …! कपड़े ही इतने गंदे रहते है.” बड़ी आसानी से जवाब देता , “मशीन है ना माँ..फिर क्या चिंता ” अब उसे कौन समझाये मशीन के बाद भी मेहनत लगती है .अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे  बेटे के हिस्से आये जब कपडे,

“आप सच कहती हैं माँ, मेरे कपडे कुछ ज्यादा ही धूल से दोस्ती कर लेते हैं ना …देखिये कोशिश तो की है मगर आपकी तरह नहीं हो पाया न ” मुग्ध हो गई, लगा जीत गई मेरे भीतर की औरत, मगर एक माँ दिल हार गई ,

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“चल रहने दे मैं कर देती हूँ ”“ओके, तब तक मैं आप सबको बढ़िया अदरक वाली चाय बनाकर पिलाता हूँ ” लगा अंतिम पलों में किसी ने स्वर्ग की सैर करा दी.क्या कहूँ अब तक तो सुबह जल्द उठने के बाद भी कभी बच्चों के टिफिन, चाय ,नाश्ते, फिर श्रीमान के दफ्तर के लिए टिफिन …यानि सुबह से जो दौड़ शुरू होती फिर नहाकर ,कपड़े पूजा करने के बाद बमुश्किल नाश्ते के लिए समय मिलता था.

जबकि मेट झाड़ू पोंछा कर जाती थी, किन्तु अब तो सभी फ्री हैं सो सुबह भी देर से होती है . सभी लोग साथ बैठ चाय नाश्ते का आनन्द लेते हैं. फिर बिना कहे सभी अपने-अपने मोर्चे पर तैनात हो जाते हैं. अपने हाथ के टेस्ट से बोर हो गई थी , अब अपनों के हाथों का बना चखती हूँ एक अलग अनुभूति हो रही है. समय ही समय है पास; सो सदुपयोग तो होना ही है. अमूमन बच्चों की अंग्रेजी फ़िल्में मैं नहीं देखती मगर आज जब उन्होंने जिद की तो उनकी पसंद की फिल्म वायरस देखी.लगा हमें देखनी चाहिए इस तरह की फ़िल्में ..काफी ज्ञानवर्धक लगी. बच्चों की पसंद पर फक्र हुआ तो बच्चों ने भी मेरा मन रखने के लिए मेरी मनपसन्द फिल्म माँग भरो सजना लगाईं.  रात में फ्री होकर अब हर रोज कोई न कोई फिल्म देखते , दिन में कभी तम्बोला, कभी अन्त्याक्षरी ,तो कभी कोई माइंड  गेम. दिमाग फ्री था , काम का भूत जो जाने – अनजाने कहीं मन में गया था , हवा हो गया. साथ ही कोरोना का खौंफ हमारे ठहाकों के बीच दबगया , सो खूब मन लगा.

इस बीच चावल और साबूदाने के पापड़ , मंगोड़ी भी मेरी आजकल पर टल रही थी, क्योंकि सबको विदा करते करते आधा दिन जा चुका होता; सोचती अब क्या कल करूंगी …वह कल अब आया.खाना बनाने से मुझे मुक्त दे पतिदेव ने कहा तुम अपना वह काम कर लो , बच्चे भी मेरे संग छत पर आ गए उनमें चावल के पापड़ गोल-गोल बनाने की होड़ लगी और मेरा काम आसान हुआ साथ ही मेरी रसोई का संग्रहण भी हो गया. अब से पहले रविवार का दिन मेरे लिए और भी तनाव भरा रहता था .एक दिन पहले प्लानिंग जो करनी पड़ती थी, कल सुबह नाश्ते में क्या , खाने में स्पेशल क्या बनाऊँ वरना यही सुनाने को मिलेगा एक दिन तो घर रहते हैं.फिर शाम का नाश्ता …मगर अब इस तनाव से हमेशा -हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई. सबको यूट्यूब पर रिसिपी का चस्का लगा दिया , एक्सपेरिमेंट जारी है.फुर्सत के पलों में कुछ बच्चों के शौक जाने/समझे , कुछ अपने कहे , उन्हीं में एक शौक जो कहीं दब  सा गया था पेंटिंग का , बच्चों को सुनकर आश्चर्य हुआ मेरे भीतर एक कलाकार भी है ,

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“जीवन की आपाधापी में / कब वक्त मिला कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं तुझमें भी हुनर है किसी से कह सकूं ”

अब तक मैं एक रसोइया के रूप में जो देखी गई .बस फिर क्या था बेटे की रिजेक्ट ड्राइंग शीट और पेन्सिल आ गई मेरे सामने  मेरी कला को सराहना ही नहीं मिली भविष्य में इस शौक को प्रचारित –प्रसारित करने का वादा भी मिला.

कोरोना का यह कर्फ्यू मन में बरसों के बंद द्वार खोल गया . सच हम कभी -कभी अपने को स्वयं वक्त नहीं देकर अपने भीतर के भावों को कुचल देते हैं और जाने-अनजाने किसी कुंठा से ग्रस्त हो जाते हैं. जो परिवार को हानि पहुंचाता है.यूँ एक दूसरे के करीब आकर एक दूसरे को जानने के अवसरों से हम वंचित रह जाते हैं. कोरोना के 21 दिनों के इस सुखद वनवास ने मेरी अयोध्या को गुलजार कर दिया.

 

#coronavirus: दिल में लगा न कर्फ्यू

दुनिया भर में तहलका मचा था .कोरोना नाम की महामारी की वजह  से दुनिया का हर शहर, हर गली , हर घर लौक डाउन हो रहा था .

टीवी लगातार चल रहा था, मासूम निकहत की मां लगातार न्यूज पर नजर गड़ाए थी .जैसे कि न्यूज देखने से उनकी मुसीबत कुछ कम हो जाय .

निकहत पांचवीं में थी. स्कूल बंद था. अब्बा पुलिस में थे तो ‘वर्क फ्रॉम होम ‘ का सवाल ही नहीं था , जैसा कि अन्य विभागों में सरकार की ओर से लागू किया गया था . आसपास के सारे माहौल पर बंद का सन्नाटा छाया था. निकहत की मां बीच बीच में अपना फोन चेक कर रही थी , और कुछेक घंटों में कहीं कौल कर रही थी.

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एक क़ौल आया , निकहत की मां ने दौड़कर फोन उठाया. शायद वह इस फोन के इन्तजार में थी.

“क्या हुआ भैया ? कुछ इंतजाम हुआ ?चार दिन से लगातार कोशिश कर रही हूं कि कहीं से ब्लड मिल जाय ,लेकिन कहीं कोई राह नहीं .ब्लड कहीं उपलब्ध ही नहीं है ,कोई डोनर नहीं मिला क्या भैया ?”अनिश्चित आशंका से आखरी शब्द गले में ही लड़खड़ा गए थे निकहत की अम्मी के.

“दीदी हमने भी बहुतों से पूछने की कोशिश की , कई परिचितों से तो संपर्क ही नहीं हो पा रहा है. अपने ही शहर में अकेले ऐसे बच्चों के ही केस डेढ़ सौ से ऊपर हैं ,और आप तो जानती हैं उन्हें कितनी खून की जरूरत पड़ती है.”

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‘भैया पिछली ही बार मैंने अपने पति को अपना ब्लड दिया था जब वे सरकारी काम में भीड़ के साथ मुठभेड़ में जख्मी हुए थे. मुझमे अभी प्लेटलेट्स और हीमोग्लोबिन की कमी है ,मेरा खून अभी काम न आ सकेगा ,कोई उपाय देखो भैया .” उसके करुण स्वर ने उस तरफ के व्यक्ति को भी आद्र कर दिया.

“देखता हूं दीदी  कर्फ्यू और कोरोना के डर से तो कोई किसी काम में हाथ डालने को तैयार नहीं .कोशिश करता हूं.” बातचीत खत्म होने पर निकहत की अम्मी पहले से ज्यादा परेशान हो गई.

निकहत जब छोटी सी थी अचानक एक बार बुखार आया था.फिर तो वह ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही थी.टेस्ट पर टेस्ट के बाद आखिर जब पता चला तो नन्ही निकहत को लेकर सारे घरवाले परेशान हो गए.

छोटी सी उसकी जान को थैलेसीमिया था यानी ब्लड कैंसर .हर पंद्रह दिन में उसके शरीर का रक्त कण शेष हो जाता है. कैंसर की वजह से इन बच्चों में खून बनाने की क्षमता नहीं होती .

प्राणों में अथाह जीने की इच्छा और अपनों की स्नेह सिंचित व्यथा भी उन्हें बचा नहीं सकती अगर पंद्रह दिन में उन्हें स्वस्थ खून न मिले.

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निकहत की अम्मी का यह अंतहीन सिलसिला शुरू हो चुका था.और ऐसे में आया था यह कोरोना का कह.

शहरों की तालाबंदी से रोजमर्रा की जिंदगी जहां बाधित होने लगी है, जहां जीने की होड़ में लोग मृत्यु से रोजाना भिड़ रहे हैं, वहां पहले से ही जीवन पर काल बनी बीमारियों का सामना कैसे करें. जिनके घर के बच्चे पहले से ही असाध्य बीमारियों से जूझ रहे ,उनका उपाय इस लौक डाउन शहर की कानी गूंगी गलियों में कैसे होगा?

जब देश में अचानक फैली इस महामारी से लड़कर जीतने के लिए न तो पर्याप्त मेडिकल स्टाफ हैं, न वेंटिलेटर, न हाइजीन के लिए पर्याप्त सामान और न इस रोग की जांच के लिए अधिक हौस्पिटल .

रक्त की बीमारी से जूझते बच्चों की तो ऐसे भी इम्यून शक्ति खराब होती है.कैसे बचाए प्यारी सी निकहत को उसकी अम्मी.

अचानक पड़ोस के कल्याण ने निकहत के घर का दरवाजा खटखटाया.

अब कोई भी घटना निकहत की अम्मी को अच्छी नहीं लग रही है. खास कर लोगों से बोलना बतियाना.तीस साल की उम्र में ही उसने अपने मन को बांध कर रखना सीख लिया है. और अभी तो निकहत को लेकर उसका मन बहुत ही आशंकित है! बाहर आकर देखा बाजू में रहने वाला कल्याण है,एमटेक का स्टूडेंट. वह और भी घबरा गई. अभी अभी इसका इसके पिता से जोरदार कहा सुनी हो रही थी,पता नहीं क्या हुआ था!और अब यह यहां! निकहत में खून की जबरदस्त कमी हो रही है, उसका किसी बाहरी से मिलना जुलना ठीक नहीं.कोरोना वाइरस की वजह से चेतावनी है कि लोग दूसरे के घरों में न जाएं! सभी ओर कर्फ्यू तो इसी वजह लगा है, फिर यह यहां क्यों?

परेशान सी निकहत की अम्मी ने कल्याण पर प्रश्नसुचक निगाहें डाली.

भाभी ! अभी न्यूज पेपर में पढ़ा थैलेसीमिया के बच्चों को समय पर खून नहीं मिल पा रहा है, इससे उनकी जिंदगी पर खतरा बढ़ गया है. लौक डाउन की वजह से कोई खून देने वाला नहीं मिल पा रहा है, उपर से रक्त की कालाबाजारी भी तो होने लगती है,ऐसी आपदा में! क्या निकहत का इंतजाम हो गया है?”

नहीं भाई! शुक्रिया तुम्हे याद रहा निकहत का!”

“तो आप राजी हो तो चलिए मेरे साथ निकहत को लेकर,कालोनी के बाहर जो ब्लड बैंक है वहां मैंने फोन से पूछ रखा है ,वे चढ़ा देंगे मेरा खून निकहत को.”

निकहत की अम्मी को लगा जैसे कल्याण को वह दौड़कर गले लगा ले.तेईस वर्ष का यह नौजवान कितना संवेदनशील और समझदार है.

बात तो सभी कर लेते हैं,लेकिन विपत्ति में पूछने वाले मिल जाएं तो दूर रहकर भी साथ यह दुख झेला जा सकता है.

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“भाई बड़े मुसीबत में थी,इसके अब्बू ड्यूटी में हैं,कौन इंतजाम करे.इस करम का शुक्रिया अदा कर दूं,इतनी औकात नहीं मेरी, हां दुआ करती हूं परवरदिगार तुम्हे हजार नियामत बख्शे.भाई बुरा न मानो ,एक बात पूछना चाहती हूं, अभी कुछ देर पहले तुम्हारे घर से तुम्हारे पिताजी के चीखने की आवाजें आ रहीं थीं, सब खैरियत तो है? ”

“अरे बाबूजी को डर था कि खून देने गया तो मुझे भी कोरोना हो जाएगा. बिना समझे न डरें वही बता रहा था. जब पूरे हाइजीन का ख्याल रखा जाएगा,तो यह क्यों होगा.और बच्चों की जिंदगी भी तो बचानी है.”

निकहत की मां कल्याण के साथ ब्लड बैंक जाती है,और औपचारिकताएं पूरी कर ब्लड दी जाती है.

खून के कतरों के साथ प्यार,विश्वास,और कोरोना नहीं, करुणा की धार स्थानांतरित होती रही बच्ची में.

निकहत की अम्मी सोच रही थी,-शहर में कितने ही कर्फ्यू लगे हो, दिल में न लगे कर्फ्यू तो विपत्ति की घड़ी निकल ही जाती है.

#coronavirus: कोरोना संकट- मुश्किल की घड़ी में समझदारी

कोरोना महामारी के कारण बंद की स्थिति में बहुत सी जटिल समस्याएं जन्म ले रही है. जिंदगी जटिल होने लगी है, संकट से उबरने के लिए घर में बंद रहना बहुत जरूरी है लेकिन पेट का क्या है, भूख कभी समय देख कर नही आती है. जनता कर्फ्यू के बाद से ही लोगों ने जमाखोरी शुरू कर दी थी. लेकिन लाक डाउन होते ही समस्या गंभीर होने लगी . लोगों बाहर जाकर ज्यादा सामान भरना शुरू कर दिया . जिससे आम आदमी के लिए परेशानियाँ उत्पन्न हो रही हैं, एेसे में दुकानदार सामानों के दाम भी मनमाफिक ले रहें है.

मेरे घर में खाने का कुछ जरूरी सामान लाना जरूरी था यही सोच के साथ हम बाहर गए लेकिन बाजार में सामान लेने गए तो देखा भीड उमड रही थी . सामान दुकानों पर खत्म हो रहा गया . पहले दिन तो वापिस अा गए, घर में आटा नही था , अगले दिन सोचा जाकर लेकर आएगें . लेकिन भीड आज भी वही थी. जितनी भीड़ बड़ेगी उतनी महामारी बढेगी. जमाखोरी के कारण बाजार में सामान बाजार में कम आ रहा है . मुश्किल से थोड़ा उपयोग करने का सामान बिस्किट ही लेकर हम वापस आ गए कि जब जरूरी होगा तब ही बाहर जायेगें. जागरूक नागरिक होने की जिम्मेदारी निभाना भी जरूरी है . लेकिन जीवन का क्या है . जीवन में भूख समय देखकर नही आती है. खाने पीने का सामान धीरे-धीरे घर में कम हो रहा है .

आजकल एटीएम के जमाने में घर में पैसे रखने की आदत लोगों में कम हो गई थी . पहले दिन किसी तरह एटीएम से जाकर पैसा तो लेकर आए . कुछ विशेष वर्ग द्वारा अनाज तेजी से भरा रहा है . कही ऐसी हालत ना हो जाय कि जेब में पैसा तो है पर बाजार में सामान ना मिले . पहले के जमाने में बहुत बचत से लोग सामान का उपयोग करते थे यह सीखने वाली बात है . बेहतर है कि हमारे पास जो सामान है उसी में अच्छी तरह बचत करके यदि घर चलाया जाए तब समस्या नहीं होगी गरीबों के लिए व अन्य लोगों के लिए बाजार में सामान उपलब्ध होगा. कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो समस्या का निदान हो सकता है

अमीरों के घर में जमाखोरी हो सकती है लेकिन मध्यमवर्गीय आम आदमी के जीवन में मुश्किलें दोहरा संकट लेकर आती है एेसी स्थिति से निपटने के लिए हम कुछ उपाय कर सकते हैं .

1 नाश्ता व लंच दोनों की जगह ब्रंच लिया जा सकता है , यानि एक बार में पेट भर कर खाअो
2 पूरी थाली की जगह छोटी प्लेट में भी खाना खा सकते हैं, कहतें है ना प्लेट जैसी होगी भूख भी वैसी होगी . जरूरी नहीं है कि दो सब्जियां ,दाल ,चावल ,रोटी सलाद सभी चीजें अधिक मात्रा में हों. दो की जगह एक सब्जी बना लें .

3 सूखे अनाजों को भीगा कर , उगा कर खाने से शरीर को पौष्टिकता भी मिलेगी व पेट भरेगा.

4 घर सामान के अनुसार अपना साप्ताहिक चार्ट बना लें कि किस दिन हमें क्या बनाना है और कितना सामान शेष है . इसका भी अंदाजा आपको हो जाएगा. वस्तु के अनुसार अपना मेनू तैयार करें कि कब क्या बनाना है, अकारण ज्यादा भोजन ना पकाया जाए जिससे वह बर्बाद हो.

5 मन को शांत रखकर रूपरेखा तैयार की जाए. पहले भी लोग पिज्जा या फास्ट फूड की जगह सादा भौजन करते थे. इससे बच्चे भी सब खाना सीख जायेगें

6 पैसे की कमी ना हो इसलिए घर में थोड़ा पैसा इमरजेंसी के लिए बचा कर रखें, वह कब हमें काम आयेगा कह नही सकते इसिलिए जब तक अति जरूरी ना हो हाथ ना लगाएं.

7 पानी पीते रहे जिससे शरीर में पानी की कमी नही होगी. भोजन में फाइबर की मात्रा के उपयोग करने से पेट अच्छे से भरता है व भूख कम लगती है .

8 फाइबर व प्रोटीन खाने से सेहत अच्छी रहेगी . घर में सूखे चने, मूंग ,सूखे अनाज जिन्हें रात भर पानी में भिगोकर उगाया जाता है और यह चीजें जल्दी खराब नहीं होती हैं .इसका उपयोग करने से शरीर को ना केवल पौष्टिकता प्राप्त होती है अपितु यह चीजें एेसे वक्त में खूब काम आती है.

9 केवल चावल खाने से भूख जल्दी लगती है, इसिलिए सब चीजें भले कम खाए पर खाए जरूर . जब शरीर में हाइड्रेट रहेगा तब भूख कम लगेगी.

छोटी छोटी-छोटी बचत हमारे मुश्किल भरे समय नहीं हमारे बहुत काम आती है. ऐसे कठिन समय में घबराए नहीं अपितु खूब संयम से काम ले, मुश्किल वक्त निकल जाएगा. जान है तो जहान है.

 

#coronavirus: लॉक डाउन में घर में स्वच्छ रहें, स्वस्थ रहें

पुरे देश में 21 दिन का लॉक डाउन का दौर शुरू हो चुका है , घर में रह कर कोरोना को हराना है. छह तरीके जिनसे आपके आसपास का वातावरण स्वच्छ रहेगा और आप खुद भी स्वस्थ रहेंगे. स्वच्छ रहना स्वस्थ रहने के लिहाज से बहुत अहम है.

1 घर के हर हिस्से को साफ करे – बाहर का खतरा अंदर न आये , इसलिए सफाई पर विशेष ध्यान दे.इस बात का विशेष ध्यान रखे कि आप दिन भर में कितनी सारी चीजों को अपने और आपके घर के लोग किन-किन चीजों को हाथ लगाते हैं.जैसे कि दरवाजे के हैंडल, खिड़की का हैंडल , किचन का सामान, बाथरूम का बोर्ड , पावर स्विच, कंप्यूटर की-बोर्ड, मोबाईल चार्जर और सबसे अधिक रिमोट कंट्रोल. इन चीजों की हमेशा ध्यानपूर्वक सफाई करते रहे , क्योंकि ऐसा करके आप घर के सदस्यों की सेहत की रक्षा करेंगे.

2 अपने हाथ बार-बार धोते रहे – आप घर पर है तो ऐसी नहीं है कि आपको हाथ नहीं धोना है , आप अपने हाथ बार-बार धोते रहे। इस दौरान इस बात का अवश्य ध्यान रखे कि साबुन के झाग में अपने हाथ को मलें, कम से कम 20 सेकंड तक तो हाथ जरूर मले. तभी सही मायने में आपका हाथ धोना स्वस्थप्रद होगा.

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3 सिंक को साथ करते रहे – क्या आपको पत्ता है , रात को गंदे बर्तनों को साफ करने के बावजूद सिंक में कितने सारे जीवाणु रह जाते हैं. जो जीवाणु आपके सिंक में पैदा होते हैं, वे आपके हाथों, बर्तन साफ करने वाले स्पंज या स्कर्ब और इससे भी बदतर आपके भोजन के संपर्क में आ सकते हैं. इसलिए दिन में एक बार अपने सिंक को ब्लीच या गर्म पानी से अच्छी तरह से धोएं और उसे सूखने दें। इससे जीवाणु भी खत्म हो जाएंगे.

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4 टूथब्रश का विशेष रख रखाव करे – दैनिक जीवन में सफाई के लिए टूथब्रश का अपना अहम् स्थान है. हर रोज इस्तेमाल के बाद अपने टूथब्रश को न सिर्फ सूखा रखने की जरूरत है.टूथ्रब्रश को रखने की सबसे बढि़या जगह है आलमारी, अगर आप बहार ही रखते है तो इसे अच्छे से ऊचे स्थान पर रखें, वहां यह सूख पाएगी और जीवाणुओं से सुरक्षित रहेगी.

5 वॉशरूम को बिल्कुल स्वच्छ रखे – परिवार के सभी लोग इस लॉक डाउन में घर पर ही होंगे , इसलिए वॉशरूम का उपयोग भी अधिक होगा , आप वॉशरूम को भी बिल्कुल स्वच्छ रखना है. यह सामान्य-सी बात लग सकती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब आप टॉयलेट को फ्लश करते हैं, तो इसके दो घंटे बाद तक पूरे वॉशरूम में जीवाणु तैरते रहते हैं आपको इसकी सफाई पर विशेष ध्यान रखना है.

6 ठहरा हुआ कही न रहने दे – गर्मियों का मौसम आने वाला है , लेकिन इस मौसम में भी आये दिनों वर्षा हो रहा है , आपको यह ध्यान रखना होगा कि घर के किसी हिस्से में वर्षा का पानी इकट्ठा न हो पाए.साथ ही घर के भीतर अनेक जगहों पर रखे फूलदानों, पालतू जानवरों के पानी रखने के बर्तनों या फिर मछलीघर के बर्तनों के पानी को सप्ताह में एक बार ज़रूर बदलना चाहिए और उन्हें अच्छी तरह से साफ करना चाहिए, ताकि रोगों की गिरफ्त में आने से बचा जा सके.

#coronavirus: सिर्फ हुकूमत नहीं ज़िम्मेदारी भी

जैसे ही लॉक-डाउन की खबर सुनी, सभी महिलाओं के मन में एक ही ख़याल आया उफ़ ! अब घर का काम कैसे होगा .काम वाली भी तो नहीं आ सकती अब .

घर का बर्तन, कपड़ा, झाड़ू, पौंछा आदि सब तो वही करती है .

अक्सर सभी वाटसैप समूहों से ऐसे ही सन्देश फॉरवर्ड होने लगे .

जैसे पति घर पर बैठे हुकुम चला रहे हैं .

एक वीडिओ आया जिसमें पत्नी रसोई में जल्दी-जल्दी काम कर रही है और पति टी.वी. के सामने बैठ कर हुकुम चला रहे हैं . ऐसे में पत्नी परेशान हो कर आयी और तौलिये से अपने पति का चेहरा सर समेत ढक देती है और नाराज़गी भी दिखाती है .

वहीं सोशल मीडिया पर कुछ पुरुष  चाहे वे रोज काम करें न करें रसोई में काम करते दिखाई दिए .अच्छी डिशेज़ बना कर सर्व करते हुए वे गर्व का अनुभव कर रहे थे .

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एक महाशय ने तो सोशल मीडिया पर चौक में पड़े झूंठे बर्तनों के साथ फोटो खिंचवा कर चंद पंक्तियाँ भी लिखीं जिसमें पत्नी के सहयोग की बात थी .

इससे साफ़ समझ आता है कि लॉक डाउन के समय घर की महिलाओं पर काम का अतिरिक्त बोझ पड़ गया है

. बच्चे, पति और कहीं-कहीं तो संयुक्त परिवार जिसमें सास-ससुर, देवर-नन्द सभी हैं .घर काम में मुख्य भूमिका निभाने वाली महिलाओं का तो कचूमर ही निकल जाएगा .

जो पुरुष एवं बच्चे सुबह एक बार दफ्तर और स्कूल चले जाते हैं और महिलायें उनके जाने के बाद घर का सारा काम निबटाती हैं अब वे सब घर पर हैं .

पुरुष व बच्चों का स्वयं का कोई रूटीन नहीं, चाहे वे देर से उठें रात देर तक जाग कर फ़िल्में या स्पोर्ट्स चैनल देखें लेकिन महिलाओं के लिए तो डबल ड्यूटी हो ही गयी .

कई महिलाएं कामकाजी है जिनके घर में कुक व हाउस मेड लाइफलाइन की तरह होती हैं . उनकी तो जैसे सांस ही अटक गयी क्यूंकि कईयों को तो “वर्क फ्रॉम होम” भी दिया गया है .

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माना कि बहुत से पुरुषों के लिए भी वर्क फ्रॉम होम है पर हर हाल में घर के काम का बोझ तो महिलाओं पर ही है .

क्यूंकि अब महिलाएं घर से बाहर तो निकल नहीं सकतीं, अपने मन की भड़ास एक दूसरे को वाटसैप कॉल करके ही निकालनी पड़ी .

गृहणी भी है कामकाजी

अब क्यूंकि पति घर पर हैं पर आदतें तो पुरानी . जैसे छुट्टी का एक दिन आया करता था सप्ताह में एक बार . अच्छा खाना, साफ़-सुथरा घर, रात को देर तक फिल्म वो भी अकेले नहीं पत्नी भी साथ दे .

इस पर ऋचा का कहना है दो दिन तो चलाया कैसे भी, फिर शरीर में थकान हो गयी . रात को देर तक जागो सुबह से वही काम एवं सिफारिशों की झड़ी . सच में सर में दर्द हो गया . बच्चे भी रात को देर तक जाग रहे हैं, सुबह देर से उठते हैं . घर का कचरा लेने अब कोई आ नहीं रहा . बाहर जा कर दो तभी वेस्ट क्लीयर होगा . मैं सुबह घर साफ़ करूँ, रसोई सम्भालूँ, क्या-क्या करूँ ?

मैं ने कह दिया अब समझ आया घर में कितने काम होते हैं मैं तुम्हारे साथ बैठ कर रात को देर तक फिल्म नहीं देखूंगी तो पति नाराज़ हो गए .

कामकाजी महिला की शामत

सॉफ्टवेयर में कार्यरत हेमा कहती हैं घर का काम तो है ही अब दफ्तर का भी “वर्क फ्रॉम होम” . सप्ताह में एक छुट्टी हो तो ठीक है पर हर दिन सबकी छुट्टी और मुझे वर्क फ्रॉम होम भी तो कैसे चलेगा ? मैं ने अपने पति से कहा “देखिये हम दोनों एक ही घर में रहते हैं, कमाते भी दोनों हैं, जितना काम तुम करते हो उतना ही मेरे भी पास है” अब घर का काम भी साथ-साथ करना होगा तभी चलेगा . बच्चों को भी समझाना होगा .

कुल मिला कर घरेलू और कामकाजी महिला सभी काम के दबाव में हैं .

लेकिन जिन पुरुषों की परवरिश ऐसे माहौल में हुई है जहां पुरुष घर के काम में हाथ नहीं बंटाते वहां समस्या थोड़ी ज्यादा है .

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तो सीधी सी बात है यह लॉक-डाउन सभी के लिए है इसलिए इसका फायदा और नुकसान भी सभी उठायें . पुरुष सिर्फ घर बैठ कर टी.वी. लैपटॉप और सोशल मीडिया का आनद उठायें और महिलाएं पिसें गृहस्थी की चक्की में . तो ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है . लॉक-डाउन ब्रेक-अप में तब्दील होने में देर नहीं .

ऐसा कोई जरूरी नहीं कि ब्रेक-अप कागजों में ही होता है . ब्रेक-अप एक ही घर में रहकर मन ही मन  भी हो सकता है . एक बार यदि मन में गाँठ पड़ी तो सारी ज़िंदगी जाने वाली नहीं .

संयुक्त परिवार और तानाशाही

संयुक्त परिवार में रहने वाली संध्या कहने लगी “अब तो माँ-बेटा दोनों ही हुक्म चलाने लगे, पहले कम से कम यह तो था कि पति दफ्तर गए तो सास की सिफारिशें झेलनी पड़ती थीं . अब दोनों माँ-बेटा साथ में बैठते हैं और सिर्फ इधर-उधर की और अपने पुराने दिनों की बातें करते हैं . एक बार एक को पानी का गिलास थमाओ तो दूसरे को दूध-छाछ याद आ जाता है . इधर मिक्सी के जार धोती हूँ तो ससुर का चाय का हुकुम आ जाता है . यदि ज़रा देर हो तो पति का स्वर तेज हो जाता है कि माँ कब से बोल रही हैं तुमने इन्हें दिया क्यूँ नहीं ?

जी करता है कह दूं कि बैठ कर सारे दिन गप्पे हांकते हो तो अपने माता-पिता का ख्याल भी तुम रख लो . उन्हें चाय, दूध, छाछ तुम ही क्यूँ नहीं बना देते . ये छोटे-छोटे काम तो कर सकते हैं न वे . वो तो करते नहीं अब झींकने वाले एक से दो हो गए .

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यहाँ  सोचने वाली बात यह है महिलाओं को सहायिका की मदद तो मिल नहीं रही . लेकिन काम का बोझ बढ़ गया तो पति जो संयुक्त परिवार में माता-पिता को साथ रखते हैं उनकी जिम्मेदारी क्या सिर्फ महिला की ही है ? क्या पति की स्वयं अपने माता-पिता के लिए कोई जिम्मेदारी नहीं ? आखिर उन्होंने पाल-पोस कर बेटे को बड़ा किया है, बहु को नहीं .

इसलिए ऐसे समय में बहु से उम्मीद भी कम ही रखें तो ठीक वरना संतुलन में चलती गाड़ी डगमगा भी सकती है .

मुखिया जी आगे आयें

ऊपर दिए गए उदाहरणों में आम घरों की समस्या है कि जब पति-बच्चों समेत पूरा परिवार घर पर हो और छुट्टी का सा माहौल हो तब पति आखिर क्यूँ न करे पत्नी की मदद ?

घर का मुखिया कहलाने वाला पति जब युद्ध का समय आये तो पीछे क्यूँ हट जाए ?

आप महाराज बन कर हुकुम तो हर दिन करें और युद्ध के समय पीठ दिखा कर भाग जाएँ या कलह-कलेश करें . यह तो उचित नहीं न, इस समय तो मुखिया की जिम्मेदारी ज्यादा है . कैसे अपनी गृहस्थी को कम संसाधनों में संतुलित रखना है इसमें तो मुखिया की भूमिका भी मुख्य होनी चाहिए और इसे संतुलित रखने में पत्नी की हर संभव मदद करनी चाहिए . चाहे रसोई के बर्तन , कपडे, साफ़-सफाई या कुकिंग क्यूंकि घर तो दोनों का ही है .

ऐसे में वे पुरुष धन्यवाद के पात्र हैं जो सोशल मीडिया पर खाना बनाते, रसोई साफ़ करते , जूठे बर्तन धोते और कपड़ा सुखाते नज़र आ  रहे हैं . चाहे उन्होंने मसखरी या टाइम पास  के लिए ही यह सब  किया किन्तु सन्देश भी दिया कि पुरुष भी घर की कार्यों में स्ट्रे के मदद करे .

 

Coronavirus Lockdown: बच्चों की खातिर घर लौटी एक्स वाइफ सुजैन तो ऋतिक रोशन ने लिखा ये इमोशनल पोस्ट

पूरी दुनिया में कोरोना वायरस का कहर छाया हुआ है. ऐसे में सभी लोग अपने- अपने परिवार का साथ दे रहे है. एक-दूसरे का का खास ख्याल रख रहे हैं. इसका सबसे अच्छा उदाहरण है ऋतिक रौशन की पूर्व पत्नी सुजैन खान उन्होंने इस मुसीबत के पल में अपने बच्चों और पूर्व पति के पास वापस लौट आई हैं. इस मुश्किल के समय में अपने बच्चों केयर कर रही हैं.

 

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. It is unimaginable for me, as a parent, to think of having to be separated from my children at a time when the country is practicing lockdowns. . It is heartwarming to see the world come together as one in this time of deep uncertainty and possibility of months of social distancing and potential lockdowns for several weeks perhaps . . While the world talks about humanity coming together, I think it represents more than just an idea especially for parents sharing custody of their kids. How to keep their kids close to them without infringing on the right of the other who also has an equal right to be with his/her children. . This is a picture of dear Sussanne (my ex wife) , who has graciously volunteered to temporarily move out of her home so that our children are not disconnected indefinitely from either one of us. . Thank you Sussanne for being so supportive and understanding in our journey of co-parenting. . Our children will tell the story we create for them. . I hope and pray that in order to safeguard the health of ourselves and our loved ones, we all find our way to express love, empathy, courage, strength with an open heart ❤️. . #beopen #bekind #bebrave #responsibility #coexist #empathy #strength #courage #oneworld #humanity #wecanfighththis #loveoverfear

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इस बात की जानकारी ऋतिक रौशन ने अपने सोशल मीडिया के जरिए दिए है. जिसमें उन्होंने अपनी पूर्व पत्नी का धन्यवाद देते हुए कहा है सुजैन आपने जो कदम उठाएं है बेहद ही सराहनीय है. हम दोनों जो कहानी अपने बच्चों को बताएंगे वहीं उन्हें वही पता चलेगा. इस वक्त हमदोनों की उन्हें बहुत जरुरत है.

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ऋतिक रौशन एक्स वाइफ के आने के बाद बेहद खुश नजर आ रहे हैं. वहीं ऋतिक ने इंस्टा पर एक तस्वीर शेयर करते हुए लिखा है- लॉकडाउन के समय में बच्चों को अपने माता- पिता के साथ न रहने के बारे में सोचना भी पाप है. ऐसे में हमें अपने बच्चों के साथ समय बीताना सबसे खूबसूरत होता है.

 

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. Couldn’t ask for a better view. . Or a more suited book . . #Coexist #doglovers

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आगे उन्होंने ने कहा सुजैन ने यह फैसला  इसलिए लिया है ताकि हमारे बच्चे हमसे डिस्कनेंट न रहें.

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यह समय देश के लिए बेहद ही संवेदनशील है. घर के अंदर बंद रहना ही सबसे अच्छा उपाय है. इसलिए आप अपने परिवार के साथ घर के अंदर ही लॉकडाउन रहे. उम्मीद है यह मुश्किल का समय जल्द ही खत्म हो जाएगा. फिर हम अपने पुराने दिनचर्या में वापस आ जाएंगे.

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एक्ट्रेस और सांसद नुसरत जहां कोरोना से बचाव के लिए गरीबों के बीच मास्क बांट रही हैं. नुसरत जहां ने अपनी तस्वीर को अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर किया है. जिसमें वह एक गरीब महिला को मास्क देती नजर आ रही हैं.

बाजार में मास्क बांटते समय नुसरत जहां ने गरीबों को कोरोना से बचने के उपाय भी बताया है कि इस खतरनाक वायरस से कैसे बचा जा सकता है.

नुसरत जहां जिस बाजार में मास्क बांट रही थी वहां लोग संयम बनाए लाइन में खड़े थे. नुसरत एक-एक कर सभी लोगों को मास्क दे रही थीं.

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वह खुद भी बचाव के सभी नियमों का पालन करती दिखीं, बाजार में मास्क लगाए हुए लोगों के बीच में नजर आई.नुसरत ने मुंह में मास्क के साथ-साथ हाथ में ग्लब्स भी पहनी हुई थीं. ताकी यह बीमारी किसी और की तरफ ट्रांसफर न हो.

 

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Keep Calm & Add Dum to your Biriyani ♥️ #quarantining

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नुसरत  जिन गरीबों को मास्क दे रही थीं सभी उन्हें दुआ दे रहे थें. नुसरत की इस पहल के बाद लोग उनकी सोशल मीडिया पर जमकर तारीफ कर रहे हैं.

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इस मुश्किल के समय में वह गरीबों की मदद कर रही हैं इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है. नुसरत इस काम को करते हुए काफी खुश भी नजर आ रही थी.

मास्क बांटते समय नुसरत ने बहुत ही साधारण कपड़े पहने थे. ऐसा लग रहा था मानो उन्होंने अपने काम को देखते हुए कपड़ें का चुनाव किया था.

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इससे पहले भी नुसरत कई दफा अपने क्षेत्र के लोगों को मुश्किल समय में मदद करते देखा गया हैं. पिछले साल नुसरत शादी के बंधन में बंधी हैं. बता दें वह मुस्लिम परिवार से होने के बावजूद हिंदू लड़के से शादी किया है. इस पर कई तरह के विवाद भी हुए हैं.

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