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बिहार में लॉकडाउन की धज्जियां उड़ाते लोग

आँख तरेरती दोपहरी, भूख, प्यास, बदहवासी और बेवसी के बीच कोरोना के डर से पटना मीठापुर बस स्टैंड लोगों से पटा रहा. दिन के डेढ़ बज रहे हैं. बस स्टैंड खाली कराया जा रहा है. सैकड़ों की संख्या में दूसरे राज्यों से आए लोगों को पुलिस खदेड़ रही है. महिला-पुरुष और बच्चे बाइपस की तरफ भाग रहे हैं. तभी एक बस आती है और कुछ ही मिनटों में खचाखच भर जाती है. बसों के ऊपर भी बैठने की जगह नहीं है. मानों कोरोना के डर के आगे, ओवर लोडेड बसों में बैठकर जाना ही बेहतर है. लोग बसों में भेड़-बकरियों की तरह ठूँसे जा रहे हैं. अपनी जान की परवाह किए बगैर लोग सिर्फ अपने घर पहुँचने की आस में भीड़ का हिस्सा बनने को मजबूर दिख रहे हैं. न तो वहाँ पीने का पानी है और न ही बैठने की जगह. कुछ लोग बसों की इंतजार में धूप से बचने के लिए पुल के नीचे, पेड़ों की छाँव में अपनी-अपनी बसों के इंतजार में खड़े हैं. क्योंकि 2 बचे आने वाली बस, सुबह नौ बजे तक नहीं आई थी.बसों से जाने वाले अधिकतर लोग उत्तर बिहार के थे.जो कोरोना के कारण काम न मिलने पर अपने-अपने गाँव लौट रहे थे.

लॉकडाउन के बाद भी एक जगह इतने लोग कैसे ?

कोरोना वायरस की चपेट में दुनिया भर में साढ़े तीन लाख से ज्यादा नागरिक आ चुके हैं. भारत सहित विश्व के कई देशों ने बड़े हिस्सों में लॉकडाउन कर दिया है. इस वजह से करोड़ो लोग अपने घरों में कैद हो गए.  बढ़ते संक्रमन को देखते हुए बिहार सरकार ने भी तत्काल प्रभाव से बिहार के सभी शहरों को 31 मार्च तक के लिए लॉकडाउन करने का ऐलान कर दिया. इस दौरान इमरजेंसी सुविधाओं को छोड़कर सभी सार्वजनिक वाहनों के परिचालन पर रोक का निर्देश दिया गया था. लेकिन लॉकडाउन के पहले दिन सियासी नेताओं और शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों के आवास वाले राजधानी पटना में सरकारी निर्देश की धज्जियां उड़ती दिखी. सरकारी बसों का परिचालन तो बंद रहा लेकिन निजी बसों पर भारी संख्या में बस यात्री, दर्जनों यात्री तो बस की छतों पर बैठकर यात्रा करते नजर आएं. इतनी भीड़ की किसी का भी मन विचलित हो जाए. क्योंकि वहाँ सैकड़ों लोग खड़े थे वो भी बिना किसी सुरक्षा के. न उनके पास सैनिटाइजर की कोई व्यवस्था दिखी और न अलग-अलग खड़े रहने की जागरूकता. सब पहले की तरह ही, जैसे कुछ हुआ ही न हो. या उन्हें कुछ मालूम ही न हो.

लॉकडाउन के बावजूद सड़कों पर भारी भीड़

  • ऑटो व अन्य वाहनों का होता रहा परिचालक—-

हालांकि, बिहार के कुछ राज्यों में निजी बसों का परिचालन नहीं हुआ. लेकिन पटना के अलावा भी कुछ जिलों में, जैसे पूर्णिया, मुज्जफ़रपुर में निजी  बसें धड़ल्ले से चल रही है.  यहाँ तक की लॉकडाउन के पहले ही दिन किराना दुकानों पर भी राशन के लिए लोगों की काफी भीड़ दिखी. इस दौरान ऑटो और अन्य निजी वाहनें भी सामान्य दिनों की तरह चल रही है.  कई जगह पुलिस की तैनाती में भी निजी वाहनें चलती रही.

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बिहार राज्य के कुछ जिलों में लॉकडाउन के बाद भी चाय-पान की दुकानों व चौराहों पर बेवजह समूह में खड़े लोग अपनी-अपनी नसीहतें दे रहे थे. वहीं कुछ जगहों पर गृह निर्माण कार्य, प्रशासन ने बंद करवा दिया जिससे मजदूर बेकार हो गए.

  • काला बाजारी के डर से, जमकर हुई ख़रीदारी——

जानकारी के अनुसार, पटना में लॉकडाउन का कोई खास असर नहीं दिखा. किराना और सब्जी-भाजी की दुकान पर भी लोग ख़रीदारी करते ऐसे दिखें,  जैसे अब कल से कोई सामान मिलेगा ही नहीं. कहीं न कहीं  लोगों में यह डर समा गया है कि कोरोना वायरस के चलते दुकानों में सामान मिलना बंद हो जाएगा, इसलिए लोग भारी मात्र में ख़रीदारी करते दिखें. इस दौरान कई छोटे-मोटे किराना दुकानदारों ने तय कीमत से ज्यादा पर सामानों की बिक्री भी की. ऐसी स्थिति में अब लगता है की आने वाले एक-दो दिनों में कालाबाजारी शुरू ही जाएगी.

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बिहार में कोरोना से भले ही एक की मौत हुई. लेकिन बिहार सरकार ने भी वायरस संक्रमन को रोकने के लिए सभी एहतियाती कदम उठा रही है. बिहार सरकार ने सभी मॉल, शॉपिंग, पार्क, रेस्तरां, स्कूल, कॉलेज को बंद करावा दिये. लोगों की आवाजाही कम हो, लोग किसी संक्रमन का शिकार न हो जाएँ,  इस कारण भारतीय रेलवे प्रशासन भी अलर्ट हो गया. 20 मार्च से 31 मार्च तक भारतीय रेलवे ने 168 ट्रेनें रद्द कर दी. लोगों को ट्रेन से यात्रा करने से बचने की सलाह दी गई .

लेकिन इसका सबसे बड़ा प्रभाव उन गरीबों पर पड़ा जो दिहाड़ी मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का पेट पलाते हैं.

  • बिहार के नालंदा जिले के गिरियक थाना क्षेत्र के दुर्गानगर गाँव का रहने वाला मोहन दिहाड़ी मजदूर का काम करने पटना आया था, लेकिन अब काम नहीं मिलने के कारण अपने गाँव लौट रहा है. उसका कहना है कि होली के दौरान काम मंदा ही था और अब कोरोना वायरस के कारण सभी काम बंद है. पटना में करीब सभी कार्य बंद हैं . मजदूर रोज के काम की तलाश में इलाके के चौक पर जाते हैं, लेकिन कोई काम देने वाला नहीं आ रहा है.
  • पटना, कंकड़बाग की सड़कों पर काम की तलाश में निकले राजमिस्त्री विशम्भर कहते हैं कि वे काफी दोनों से पटना में रह रहे हैं. लेकिन बेरोजगारी की ऐसी स्थिति कभी नहीं देखी थी. लोग घर में चल रहे कामों को बंद करवा रहे हैं.
  • सामना ढोने वाले ठेला चालकों की भी स्थिति कमोबेश ऐसी है . पटना राजा बाजार के ठेला चालक रमेश कुमार कहते हैं कि सभी शॉपिंग मॉल बंद हैं. कुछ छोटी दुकानें खुली है, लेकिन उनके पास काम नहीं है.
  • पालीगंज के रहने वाले यदुनाथ सिंह पटना में रिक्शा चलाते हैं. उन्हें सवारी नहीं मिल रही है. वे कहते हैं कि ‘रिक्शा मालिक को प्रतिदिन के हिसाब से 250 रुपये देना है और कमा रहे हैं मुश्किल से 100 रुपये, तो बाकी पैसे कहाँ से लाए. हम लोग बड़ी मुसीबत में फंस गए हैं.
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कोरोना वायरस को लेकर सरकार की एडवयाजरी के कारण लोग बाहर कहीं निकल नहीं पा रहे हैं. जो जहां हैं वहीं ठहरे हुए हैं. लेकिन उन गरीबों का क्या जो रोज की कमाते है और खाते हैं ?

पटना रेलवे स्टेशन के आसपास काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों की हालत तो और खराब है. इन मजदूरों का रोजगार यात्रियों पर ही निर्भर रहता है. लेकिन कोरोना के कारण टट्रेनें बंद हो गई हैं या कम चल रही है जिससे यात्रियों की संख्या में कमी आ गई है, जिससे स्थानीय दिहाड़ी मजदूरों के सामने भी रोजगार की समस्या आन पड़ी है.

स्टेशन के बाहर कुली का काम करने वाला प्र्फ़ुल कहता है कि बहुत सी ट्रेनें बंद हो गई हैं. रेलवे खुद कह रहा है कि लोग इन दिनों अपनी यात्रा टाल रहे हैं. उनका कहना है कि यात्री आते थे तो वह रोजाना 1200 से 1300 सौ तक कमा लेते थे. लेकिन आजकल 100 रुपये ही मिल जाए तो भी बड़ी बात है.

मजदूरों पर कोरोना कहर बन कर टूट पड़ा है. सबसे अधिक मार प्रवासी मजदूरों को उठानी पड़ रही है. होली के बाद मजदूरी करने पहुंचे लोग अब अपने-अपने घर लौटने लगे हैं.

बिहार के धनबाद के सुदूर गाँवों से आने वाले मजदूरों को काम नहीं मिल रहा है. उसके घरों की स्थिति यह हो गई है कि बच्चों को खाना खिलाने के लिए पैसे नहीं है. सोमवर को बरटांड़ में आधा दर्जन से अधिक मजदूर दिन भर काम की तलाश में भटकते रहें. शाम में भी जब काम नहीं मिला तो थक-हार कर घर लौट आएं. कहते हैं टुंडी से मजदूरों का यह जत्था काम की तलाश में शहर आया था. दिहाड़ी मजदूरी का काम करने टुंडी से आए हेमलाल हांसदा कहते हैं कि यह लॉकडाउन क्या होता है उन्हें नहीं पता. लेकिन घर में खाना बनाने के लिए उनका हर दिन काम करना जरूरी है.

पिछले चार दिनों से वे लोग शहर में घूम-घूम कर काम ढूंढ रहे हैं लेकिन कहीं कोई काम नहीं मिल रहा है. अगले एक हफ्ते क्या खाएँगे इसका जवाब भी उनके पास नहीं है. अब रोजगार मिला नहीं तो 32 किलोमीटर पैदल ही अपने गाँव  निकल पड़े.

कोरोना की वजह से काम न मिलने के कारण मजदूर बसों में किसी तरह लटक-फटक कर अपने गाँव लौटने को मजबूर हैं, क्योंकि यहाँ रहने का अब कोई फायदा नहीं. लेकिन सरकार को यह नहीं चाहिए था कि ट्रेन बंद करने से पहले एक बार सोचें ?महामारी पहले भी आई, हजारों लोगों की जान पहले भी गई, पर ऐसी स्थिति शायद ही पहले आई हो. और क्या सरकार को यह बात पहले से नहीं पता थी कि देश में यह स्थिति आने वाली है ? फिर क्यों नहीं उन्होंने पहले से ही लोगों को इसके लिए सतर्क किया ?

लॉकडाउन सकारात्मक कदम है, लेकिन इसमें मारे तो जा रहे हैं गरीब तबके के लोग ही ज्यादा.

प्रधानमंत्री ने बताया कि इस आपदा की स्थिति में कैसे लोगों को गरीबों की मदद करनी चाहिए, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि वह क्या सोच रहे हैं.

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कल रात 12 बजे से मोदी जी पूरे 21 दिन का लॉकडाउन का फैसला सुना दिया है. लेकिन मोदी जी को बताना चाहिए था कि उन्होंने कोरोना वायरस की महामारी से स्वास्थयकर्मी की सुरक्षा जैसे होगी ? रोजी-रोटी के महासंकट का क्या हल होगा ? गरीब, मजदूर, किसान, दिहाड़ीदार के 21 दी कैसे कटेंगे ? गरीबों के घर चूल्हा कैसे जलेगा ?,मजदूर बच्चों का पेट कैसे भरेगा ? आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई कैसे होगी ? इसका कोई रोडमैप या खाका देश के सामने नहीं रखा. इसके ललवा मोदी जी ने यह भी नहीं बताया कि उनकी सरकार गरीबों , मजदूरों के चूल्हे की आंच के लिए क्या कदम उठा रही है. क्या गरीबों, मजदूरों, दिहाड़ी कमाई करने वालों, ठेलों-खोमचों लगाने वालों को कोई आर्थिक मदद दी जाएगी ? आखिर इस वर्ग के लोगों की भूख कैसे शांत होगी ?

राहुल गांधी ने कोरोना वायरस से निपटने के लिए सरकार की तैयारियों पर सवाल खड़ा किया. उनका कहना है कि इस वायरस के खतरे से पहले गंभीरता से क्यों नहीं लिया ? मुझे दुख हो रहा है कि इस स्थिति से बचा जा सकत था.  हमारे पास तैयारी का समय था.  हमें इस खतरे को ज्यादा गंभीरता से लेना चाहिए थे और बेहतर तैयारी होनी  चाहिए थी। ताली-थाली तो बाजवा दी मोदी जी ने जनता से, पर अब देश के रखावलों की रखबाली कैसे होगी ?

देश में इतिहास में पहला मौका है जब इस तरह आपदा आई है और उसके वजह से रेल यात्रा पर पाबंदी लगाई गई है . जहां मुंबई लोकल के एक दिन बंद होने से रेल प्रशासन हिल जाता हो, जिस कोलकाता में मेट्रो के बंद होने का मतलब कोलकाता बंद होना मान लिया जाता हो, वहाँ इतना बड़ा फैसला आखिर कब तक जारी रखा जा सकेगा ?

क्या केंद्र सरकार के इस फैसले से कोरोना के फैलने की रफ्तार पर लगाम लगाई जा सकती है ? अब लोगों के मन में यही सवाल उठ रहे हैं.सरकार ने जनता के लिए  क्या सोचा, इस बात की उन्होंने कोई जिक्र नहीं की.

#coronavirus: माननीय नेताओं का दोहरा चेहरा

दुनिया के लगभग सभी देशों में कोरोना की प्रतिछाया के दुष्परिणाम सामने हैं. आज दुनिया पर महामारी का प्रकोप है .कोरोना जिसका इलाज अभी वैज्ञानिकों के पास नहीं है,ऐसे में यह तो होना ही था की हमारी सरकार जनता कर्फ्यू, लाॅक डाउन और कर्फ्यू के रास्ते पर चल पड़े. मगर इस सब के बीच जो सार तथ्य निकलकर सामने आ रहे हैं उसके आधार पर यह कहना समीचीन होगा की जो अनुशासन, समझदारी और सौहार्द, मानवता दिखाई देना चाहिए वह समाज में दिखाई नहीं दे रही.

सरकार का जो दायित्व होता है उसे निभाने में कोताही दिखाई दे रही है. जनवरी 2020 में ही कोरोना की दस्तक सुनाई दी थी, मगर इसके बावजूद “सरकार” ने वही गलतियां की जो आम आदमी करता है. जिस सूझबूझ तत्परता की दरकार सरकार से थी उसमें केंद्र और राज्य सरकारों ने चूक की, ‘नमस्ते ट्रंप’ कार्यक्रम हो या वेंटिलेटर, चिकित्सा व्यवस्था में कसावट का मामला, सरकार हर जगह फ्लाप हुई है. अगरचे यही गलतियां कोई और करता तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसे कभी मुआफ नहीं करते और सारा देश सर पर उठा लेते, ऐसे में कोरोना संदर्भ में विपक्ष के रूप में कांग्रेस की भूमिका सराहनीय है.

मंत्री, नेता घरों में क्यूं है 

चाहे वे मंत्री हों या जनसेवा का चोला, व्रत धारण करने वाले हमारे नेता.आज “कोरोना वायरस” अटैक के दरम्यान घरों में कैद हो गए हैं. घर से बाईट, स्टेट मेंट जारी हो रहे है .हम तो यही कहेंगे अगर आप नेता हैं, मंत्री हैं तो आपने जनता जनार्दन की सेवा का व्रत लिया है, जनता ने आप को वोट दिया है. ऐसे में नेता, मंत्री गण का कर्तव्य है की सर्व-सुरक्षा के साथ जनता के बीच पहुंचे और उनकी समस्याओं को हल करने का दायित्व निर्वाहन करें.

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प्रधानमंत्री हो या मुख्यमंत्री!! आपका कर्तव्य यह नहीं है की कर्फ्यू, लाॅक डाउन करके आप चैन की बांसुरी बजाते रहे. चौराहे पर पुलिस लोगों को कंट्रोल करें, डंडे बरसाये. इससे समस्या का हल नहीं होगा.आवश्यकता, संवेदनशीलता के साथ लोगों को “अपना परिवार” मानते हुए इस भीषण विकट स्थिति में लोगों की मदद करना. मदद की उदात्त भावना नेता, मंत्रीगण, प्रशासन में दिखाई देनी चाहिए न ही किसी बैरी, शत्रु का भाव दिखाई पड़ता रहे .और यह भावना सद्सयता के दिखाई देनी चाहिए मगर दुर्भाग्य यह हममें नहीं है. मेडिकल स्टाफ डॉक्टर, नर्स जब इस पेशे में आते हैं तो यह भावना सेवा, समर्पण की होनी चाहिए नेता, मंत्री को ही देखिए मगर क्या आपको ऐसा दिखाई दे रहा है ? यह बेहद दुखद स्थितियां हैं .
पैसों से तोल रहे मंत्रीगण 

कोरोना महामारी के इस भीषण काल में कोई मंत्री एक महीने की तनख्वाह दे रहा है, तो कोई तीन महीने की. एक-एक लाख रुपये, तो कोई दस लाख रुपए. ठीक है पैसे की अहमियत है, पैसा बहुत कुछ है मगर यह मंत्रीगण, नेता जी भूल गए हैं की आप जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधि हैं आप घरों से निकलकर जनता के पास पहुंचे और उनके आंसू पोछो, लाखों दिहाड़ी कमाने वालों को क्या दो जून की रोटी नसीब हो रही है, क्या गरीब आम आदमी ने खाना खाया है. यह देखना भी आपका परम कर्तव्य है. अगर आप ऐसा नहीं करते तो आप सच्चे अर्थ में जनप्रतिनिधि या मंत्री नहीं है. अब चुनाव के समय आप कैसे घर घर जाते हैं,करोड़ों रुपये खर्चते हैं, शराब मुर्गा बांटते हैं. हाथ जोड़ते हैं… सच्चे अर्थ में हाथ जोड़ने गले लगाने का वक्त आज है.

‘ लूट ‘ को रोकना आपका दायित्व है

कोरोना महामारी की घबराहट फैलते ही बाजार बंद करा दिए गए, कर्फ्यू लागू है. अब चारों तरफ आवश्यक वस्तुओं में मानो लूट सी मच गई है. टमाटर 50 रुपए आलू 40 रुपए बिकने लगा है हर जरूरी सामान महंगा हो गया.यह अनायास महंगाई लूट का दूसरा स्वरूप है जिसे रोकने मे सरकार असहाय है. मास्क, सैनिटाइजर जरूरी सामान की कालाबाजारी शुरू हो गई, क्योंकि लोगों को यह लगता है की लूट सके तो लूट.

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अगरचे, हमारे प्रमुख नेता सदशयता दिखाये, स्वयं आगे आकर लोगों से मिले,कोरोना का भय त्याग कर समस्या देखें, हॉस्पिटल के हालात देखें, व्यवस्था करें तो कितना अच्छा हो .यह काम जिलाधीश, अफसरों पर छोड़ना आप कितना जायज मानते है.

कभी नहीं: भाग 2

‘‘वह मेरा बच्चा है. इस में संशय कैसा? मैं ने उसे अपने बच्चों से बढ़ कर समझा है. मैं उस की मां नहीं तो क्या हुआ, पाला तो मां बन कर है न?’’ ऐसा लगा, जैसे बहुत विशाल भवन भरभरा कर गिर गया हो. न जाने मां कितना कुछ कहती रहीं और रोती रहीं, सारी कथा गायत्री ने समझ ली. कांच की तरह सारी कहानी कानों में चुभने लगी. इस का मतलब है कि इसी वजह से परेशान था रवि और वह कुछ और ही समझ कर भाषणबाजी करती रही.

‘‘उसे समझा कर घर ले आ, बेटी. सूना घर उस के बिना काटने को दौड़ता है मुझे. उसे समझाना,’’ मां आंसू पोंछते हुए बोलीं.

‘‘जी,’’ रो पड़ी गायत्री स्वयं भी, सोचने लगी, कहां खोजेगी उसे अब? बेचारा बारबार बुलाता रहा. शायद इस सत्य की पीड़ा को उसे सुना कर कम करना चाहता होगा और वह अपनी ही जिद में उसे अनसुना करती रही.

मां आगे बोलीं, ‘‘मैं ने उसे जन्म नहीं दिया तो क्या मैं उस की मां नहीं हूं? 2 महीने का था तब, रातों को जागजाग कर उसे सुलाती रही हूं. कम मेहनत तो नहीं की. अब क्या वह घर ही छोड़ देगा? मैं इतनी बुरी हो गई?’’

‘‘वे आप से बहुत प्यार करते हैं मांजी. उन्हें यह बताया ही किस ने? क्या जरूरत थी यह सच कहने की?’’

‘‘पुरानी तसवीरें सामने पड़ गईं बेटी. पिता के साथ अपनी मां की तसवीरें दिखीं तो उस ने पिता से पूछ लिया, ‘आप के साथ यह औरत कौन है?’ वे बात संभाल नहीं पाए, झट से बोल पड़े, ‘तुम्हारी मां हैं.’

‘‘बहुत रोया तब. ये बता रहे थे. बारबार यही कहता रहा, ‘आप ने बताया क्यों? यही कह देते कि आप की पहली पत्नी थी. यह क्यों कहा कि मेरी मां भी थी.’

‘‘अब जो हो गया सो हो गया बेटी, इस तरह घर क्यों छोड़ दिया उस ने? जरा सोचो, पूछो उस से?’’

किसी तरह भावी सास को विदा तो कर दिया गायत्री ने परंतु मन में भीतर कहीं दूर तक अपराधबोध सालने लगा, कैसी पागल है वह और स्वार्थी भी, जो अपना प्रेमी तलाशती रही उस इंसान में जो अपना विश्वास टूट जाने पर उस के पास आया था.उसे महसूस हो रहा होगा कि उस की मां कहीं खो गई है. तभी तो पहली नजर से जीवनभर जुड़ने के नातों में विश्वास का विषय शुरू किया होगा. कुछ राहत चाही होगी उस से और उस ने उलटा जलीकटी सुना कर भेज दिया. मातापिता और दोनों छोटे भाई समीप सिमट आए. चंद शब्दों में गायत्री ने उन्हें सारी कहानी सुना दी.

‘‘तो इस में घर छोड़ देने वाली क्या बात है? अभी फोन आएगा तो उसे घर ही बुला लेना. हम सब मिल कर समझाएंगे उसे. यही तो दोष है आज की पीढ़ी में. जोश से काम लेंगे और होश का पता ही नहीं,’’ पिताजी गायत्री को समझाने लगे.

फिर आगे बोले, ‘‘कैसा कठोर है यह लड़का. अरे, जब मां ही बन कर पाला है तो नाराजगी कैसी? उसे भूखाप्यासा नहीं रखा न. उसे पढ़ायालिखाया है, अपने बच्चों जैसा ही प्यार दिया है. और देखो न, कैसे उसे ढूंढ़ती हुई यहां भी चली आईं. अरे भई, अपनी मां क्या करती है, यही सब न. अब और क्या करें वे बेचारी?

‘‘यह तो सरासर नाइंसाफी है रवि की. अरे भई, उस के कार्यालय का फोन नंबर है क्या? उस से बात करनी होगी,’’ पिता दफ्तर जाने तक बड़बड़ाते रहे.

छोटा भाई कालेज जाने से पहले धीरे से पूछने लगा, ‘‘क्या मैं रवि भैया के दफ्तर से होता जाऊं? रास्ते में ही तो पड़ता है. उन को घर आने को कह दूंगा.’’

गायत्री की चुप का भाई ने पता नहीं क्या अर्थ लिया होगा, वह दोपहर तक सोचती रही. क्या कहती वह भाई से? इतना आसान होगा क्या अब रवि को मनाना. कितनी बार तो वह उस से मिलने के लिए फोन करता रहा था और वह फोन पटकती रही थी. शाम को पता चला रवि इतने दिनों से अपने कार्यालय भी नहीं गया.

‘क्या हो गया उसे?’ गायत्री का सर्वांग कांप उठा.

मां और पिताजी भी रवि के घर चले गए पूरा हालचाल जानने. भावी दामाद गायब था, चिंता स्वाभाविक थी. बाद में भाई बोला, ‘‘वे अपने किसी दोस्त के पास रहते हैं आजकल, यहीं पास ही गांधीनगर में. तुम कहो तो पता करूं. मैं ने पहले बताया नहीं. मुझे शक है, तुम उन से नाराज हो. अगर तुम उन्हें पसंद नहीं करतीं तो मैं क्यों ढूंढ़ने जाऊं. मैं ने तुम्हें कई बार फोन पटकते देखा है.’’

‘‘ऐसा नहीं है, अजय,’’ हठात निकल गया होंठों से, ‘‘तुम उन्हें घर ले आओ, जाओ.’’

बहन के शब्दों पर भाई हैरान रह गया. फिर हंस पड़ा, ‘‘3-4 दिन से मैं तुम्हारा फोन पटकना देख रहा हूं. वह सब क्या था? अब उन की इतनी चिंता क्यों होने लगी? पहले समझाओ मुझे. देखो गायत्री, मैं तुम्हें समझौता नहीं करने दूंगा. ऐसा क्या था जिस वजह से तुम दोनों में अबोला हो गया?’’

‘‘नहीं अजय, उन में कोई दोष नहीं है.’’

‘‘तो फिर वह सब?’’

‘‘वह सब मेरी ही भूल थी. मुझे ही ऐसा नहीं करना चाहिए था. तुम पता कर के उन्हें घर ले आओ,’’ रो पड़ी गायत्री भाई के सामने अनुनयविनय करते हुए.

‘‘मगर बात क्या हुई थी, यह तो बताओ?’’

‘‘मैं ने कहा न, कुछ भी बात नहीं थी.’’ अजय भौचक्का रह गया.

‘‘अच्छा, तो मैं पता कर के आता हूं,’’ बहन को उस ने बहला दिया.

मगर लौटा खाली हाथ ही क्योंकि उसे रवि वहां भी नहीं मिला था. बोला, ‘‘पता चला कि सुबह ही वहां से चले गए रवि भैया. उन के पिता उन्हें आ कर साथ ले गए.’’

‘‘अच्छा,’’ गायत्री को तनिक संतोष हो गया.

‘‘उन की मां की तबीयत अच्छी नहीं थी, इसीलिए चले गए. पता चला, वे अस्पताल में हैं.’’चुप रही गायत्री. मां और पिताजी का इंतजार करने लगी. घर में इतनी आजादी और आधुनिकता नहीं थी कि खुल कर भावी पति के विषय में बातें करती रहे. और छोटे भाई से तो कदापि नहीं. जानती थी, भाई उस की परेशानी से अवगत होगा और सचमुच वह बारबार उस से कह भी रहा था, ‘‘उन के घर फोन कर के देखूं? तुम्हारी सास का हालचाल…’’

‘‘रहने दो. अभी मां आएंगी तो पता चल जाएगा.’’

‘‘तुम भी तो रवि भैया के विषय में पूछ लो न.’’

 

#coronavirus: कोरोना से परेशान आलू किसान

लखनऊ , उत्तर प्रदेश में लगातार मौसम खराब रहने से आलू की फसल प्रभावित हुई है. तैयार फसल को कोल्डस्टोरेज में रखने के लिए किसान परेशान है.यह समय आलू की खुदाई, धुलाई एवं भंडारण का है.कॅरोना संकट के कारण किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या लेबर एवं आलू की ढुलाई की है.

गांवों में आलू उत्पादकों के खेतों में मजदूरों को पुलिस इस समय भगा रही है. आलू से लदे ट्रक ट्रैक्टर को रास्ते में रोक लिया जाता है. इस कारण आलू का संकट भी खड़ा हो सकता है.

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इसी प्रकार राजकीय फार्म के आलू बीज भी कोल्डस्टोरेज मेरठ और लखनऊ पहुंचने में कठिनाई हो रही है.प्रदेश सरकार एवं भारत सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों में आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन परिवहन एवं भंडारण लॉकडाउन से मुक्त है.आलू आवश्यक वस्तु के अंतर्गत आती है यदि एक सप्ताह में कोल्डस्टोरेज में नहीं गया तो खेत में ही सड़ जाएगा.

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प्रदेश में सर्वाधिक आलू उत्पादन होता है. अभी तक कोल्डस्टोरेज में मात्र 40% आलू ही पहुंचा है .यदि यह बाहर रह गया तो आगे बड़ी समस्या आएगी. इस समय किसानों विशेष रूप से आलू किसानों की मदद की आवश्यकता है.

फेसबुक

रागिनी ने अपने पति सोमेश के हाथ में एक पैकेट सा देखा तो पूछ बैठी, ‘‘कोरियर वाला क्या दे कर गया है?’’

सोमेश थोड़ा सा मुसकराते हुए बोेले, ‘‘सुंदरम की शादी का कार्ड है.’’

रागिनी ने झट से लगभग लपकते हुए कार्ड ले लिया सोमेश के हाथों से और देखने लगी. कार्ड के ऊपर लिखा था, ‘सुंदरम वैड्स आंचल.’ रागिनी खिल सी पड़ी और बोली, ‘‘अरे, आंचल से शादी हो रही है उस की, चलो प्यार पा ही लिया उस ने अपना आखिरकार.’’

तभी फोन की घंटी घनघना उठी. दूसरी ओर सुंदरम बोल रहा था, ‘‘हे रागिनी, तुम शादी में जरूर आना. आई एम वेटिंग फौर यू ऐंड योर फैमिली.’’

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रागिनी हंस पड़ी और वादा किया कि वे सभी शादी में जरूर आएंगे.

सोमेश हंसते हुए बोले, ‘‘हां भई, अब तुम्हारा मित्र है तो जाना ही पड़ेगा.’’

रागिनी 53 साल की है और सुंदरम 28 वर्षीय. 53 वर्षीया रागिनी की 28 वर्षीय सुंदरम से मित्रता कैसे हो सकती है. लेकिन यह जो फेसबुक है, यहां पर यह संभव हो सकता है. फेसबुक कैसे अनजान लोगों को मिला कर उन को करीब ले आता है जैसे उन की बरसों से पहचान हो या कोई पुराने बिछड़े हुए मिले हों. लेकिन रागिनी तो बहुत सोचसमझ कर मित्रता करने वालों में से थी. सुंदरम से मित्रता कैसे हुई यह भी कम रोचक नहीं था. पति अपने बिजनैस में व्यस्त, छोटा बेटा अपनी पढ़ाई के सिलसिले में दूसरे शहर में और बड़ी बेटी भी पढ़ाई के बाद अपना बुटीक सैट करने में व्यस्त हो गई तो रागिनी अपना समय फेसबुक पर बिताने में व्यस्त हो गई.

एक दिन ऐसे ही फ्रैंड्स सर्च कर रही थी तो वह देख कर हैरान रह गई कि बहुत ही भद्दे और अश्लील नामों व चित्रों वाले लोग भी हैं जिन्होंने अपनी आईडी बना रखी है. फिर उस ने 1-2 नाम क्लिक किए और उन का प्रोफाइल्स खोल कर देखा तो सन्न रह गई. बहुत ही गंदे अंतरंग दृश्यों व घटिया वीडियो थे वहां पर. रागिनी का तो दिमाग ही घूम गया कि यह क्या है. एक बार तो उस ने सोचा कि इन को फ्रैंड्स रिक्वैस्ट भेजी जाए पर अगले ही पल वह घबरा गई कि यह तो बहुत गलत होगा यदि उन में से कोई उसे ही ऐसे फोटो भेज देगा तो उस की इज्जत क्या रह जाएगी.

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वह बहुत बेचैन रही कई दिन तक और सोचती रही कि फेसबुक की कोई काली दुनिया भी है, यह तो उस ने सोचा ही नहीं. उसे तो अभी तक सब अच्छा ही दिखा था, फिर एक दिन जब घर में कोई नहीं था, उस ने एक नकली नाम और शहर से अपनी कम उम्र लिखते हुए आईडी बना डाली और अपने जमाने की एक ग्लैमरस हीरोइन की फोटो भी लगा दी. फिर ऐसे टेढे़मेढ़े नाम वालों को रिक्वैस्ट भी भेज दी और सभी रागिनी के मित्र भी बन गए.

ऐसे ही एक अश्लील नाम वाले ने रागिनी से चैट शुरू की, ‘हे सैक्सी…’ और रागिनी के दिल की धड़कन बढ़ गई, ‘हा…इस उम्र में ये शब्द, उफ्फ.’ अगले ही पल वह धड़ाम से नीचे गिरी.

तभी फेसबुक पर उभरा, ‘‘हे आशिका डार्लिंग, हाउ आर यू?’’

रागिनी को धीरे से हंसी आ गई. ये शब्द 53 साल की रागिनी के लिए नहीं थे बल्कि ये तो 35 वर्षीया आशिका के लिए थे. अब थोड़ी सी संयत हुई और लिखा, ‘‘मुझे बहुत जोर से हंसी आ रही है. तुम्हारा यह नाम किस ने रखा है, तुम्हारे पापा ने या मम्मी ने?’’

दूसरी तरफ से लिखा हुआ आया, ‘‘यह उस का असली नाम नहीं, उस का नाम तो राजेश है.’’

‘‘तो फिर ऐसा नाम रखने का मतलब?’’ रागिनी ने फिर से टोका और कई बार उस की मां के बारे में भी कुछ बातें कीं तो शायद राजेश नाराज हो गया और बोला, ‘‘देखो आशिका, तुम्हें अगर मुझ से बात करने में कोई रुचि नहीं है तो मत करो पर बारबार मेरी मां का नाम लेने की जरूरत नहीं है. उस ने मुझे और मेरी बहन को बहुत मुश्किल से पाला है. मेरे पिता तो बहुत पहले इस दुनिया से जा चुके हैं.’’

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यह मालूम होने पर रागिनी को बहुत दुख पहुंचा और वह उसे डांटने लगी, ‘‘अच्छा, तो तुम अपनी मां की तपस्या का यह फल चुका रहे हो, बहुत अच्छे, शाबाश बेटे..’’ और भी बहुत कुछ लिख दिया उस ने.

बेटा सुनने के बाद शायद उस को बहुत शर्म महसूस हुई होगी और बोला, ‘‘प्लीज मैम, अब आगे कुछ मत बोलिए,’’ और राजेश ने उस को आउट कर दिया, शायद ब्लौक कर दिया, क्योंकि उस के बाद वह उस को नजर नहीं आया.

यह सोच कर रागिनी को अच्छा लगा कि उस की डांट का राजेश पर असर हुआ पर एक दिन उस ने अपनी असली आईडी से उसे देखा तो वह वहीं मौजूद था. रागिनी उस रात देर तक सो नहीं पाई और सोचती रही कि फेसबुक का नशा चढ़ जाता है पर ऐसा भी होता है. यह तो उस ने सोचा ही नहीं. फिर वह कांप उठी यह सोच कर कि क्या मालूम उस के बेटे ने भी ऐसी कोई प्रोफाइल बना रखी हो. और भी न जाने कितने ही बुरे खयालों में डूबतीउतराती रही वह.

सुबह बेटी की आवाज से ही आंख खुली, वह पुकार रही थी, ‘‘मम्मा, चाय… आप को भी फेसबुक की लत पूरी तरह चपेट में ले रही है. अगली बार से आप भी पापा के साथ जाया करो.’’

‘‘तुम्हारी शादी हो जाए फिर निश्ंिचत हो कर जाया करूंगी, और मुझे इस की कोई लत नहीं है. वह तो रात को नींद ही नहीं आई इसलिए उठ नहीं पाई,’’ रागिनी बेटी को आखिर क्या बताती.

दिन में वह काम तो करती रही पर मन बेचैन ही रहा कि हमारी नई पीढ़ी कहां जा रही है और पता ही नहीं चलता, कौन यहां लड़का है कौन लड़की. और क्या पता असली है या नकली? फिर उस ने सोचा मुझे क्या है, सभी की अपनीअपनी जिंदगी है, सब का अपना ढंग है. और तय किया कि वह उस आईडी को बंद कर देगी. रात को फेसबुक को खोलते ही उस का दिमाग चकरा गया. अरे, इतनी सारी फ्रैंडरिक्वेस्ट्स और घटिया मैसेज भरे पड़े थे. अब तो रागिनी को बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई कि क्या वह ऐसी घटिया है.

तभी उस की सोच को विराम लग गया क्योंकि मैसेज बौक्स में एक मैसेज उछल कर आया, ‘‘हे आशिका, हाउ आर यू डियर?’’

रागिनी का मन बहुत वितृष्णा से भरा हुआ था और लिख दिया, ‘‘नमस्ते.’’

‘‘हाहा, नमस्ते…आई ऐम हैंडसम, मीन, माय नेम इज हैंडसम. डू यू लाइक टू चैट मी. मुझे हिंदी थोड़ाथोड़ा ही आता है.’’

‘‘ओके, यस. बट, आर यू गर्ल और बौय?’’ रागिनी ने थोड़ा अनमने ढंग से बात की.

‘‘आय एम 28…बौय,’’ दूसरी तरफ से जवाब था, ‘‘और तुम?’’

अब तक रागिनी ने भी सब झूठ ही कहा क्योंकि यहां पर जो था सब झूठ की बुनियाद पर ही था. फिर बातें करते हुए रागिनी ने उस से उस का असली नाम पूछा और कहा कि तुम ये सब क्यों करते हो? तो उस ने अपना नाम सुंदरम बताया और कहा कि मेरी असली आई डी कोई और ही है. ये तो सब मुझे कुछ देर की राहत दिलाता है. उस ने रागिनी से भी पूछा कि वह तो शादीशुदा है फिर वह क्यों यहां है?

तो रागिनी से भी रहा नहीं गया और कहा, ‘‘मैं यहां देखने आई हूं, फेसबुक की काली दुनिया का रहस्य क्या है, लोग ऐसे क्यों कर रहे हैं?’’

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वह हंस पड़ा और बोला, ‘‘वह एक लड़की से प्यार करता है और वह उत्तर भारतीय है. उस ने तो अपने मांबाप को मना लिया है पर लड़की वाले नहीं मानते. इस वजह से वह लड़की तैयार नहीं है शादी के लिए. जब वह उसे बहुत मिस करता है तो वह यहां फेसबुक पर चला आता है. अभी उस की नौकरी भी नहीं. 2 महीने बाद ही जौइन करेगा. तब तक उसे यहां आना बहुत अच्छा लगता है.’’ रागिनी को अब लगने लगा था, वह ये सब क्या कर रही है, उसे क्या गरज है किसी को सुधारने की. मन ही मन वह बहुत अनमनी सी रहने लगी. क्या कोई भी नहीं है जो इस की शिकायत करे. इन फोटो और अश्लील वीडियो पर रोक लगाने वाला कोई नहीं है. हमारी नई पीढ़ी कहां जा रही है, जिस को देखो इंटरनैट पर, चाहे मोबाइल हो या कंप्यूटर या कोई अन्य साधन, हर समय व्यस्त नजर आता है. उसे लगा सारी दुनिया ही पागल हुई जा रही है.

जब सोमेश लौटे तो उस ने सबकुछ बताया तो वे भी नाराज से हुए और कहा, ‘‘तुम से भी रहा नहीं जाता. फिर से शुरू हो गईं समाज को सुधारने के लिए. तुम्हारे करने से क्या होगा?’’ पर रागिनी को सुंदरम की बातें बहुत प्रभावित करती थीं और उस को समझाने की कोशिश की कि वह कुछ और बातों व चीजों में ध्यान लगा सकता है.

ऐसे ही एक दिन बातें करते हुए उस ने सुंदरम को अपने बारे में सच बता दिया और कहा, ‘‘सुंदरम, मैं यह गलत और नकली आईडी बंद करने जा रही हूं और तुम भी यह बंद कर दो.’’ सुंदरम ने अपनी असली आईडी का लिंक देते हुए उस को बाय कहा कि अब असली पहचान के साथ ही मुलाकात होगी. फिर रागिनी के साथसाथ सोमेश ने भी राहत की सांस ली क्योंकि बहुत दिनों बाद रागिनी के चेहरे पर निश्चिंतता के भाव थे और वह मुसकरा भी रही थी.

एक दिन सुंदरम ने कहा, ‘‘मेरे घर वाले मेरे लिए लड़की देख रहे हैं और मैं तो तुम जैसी लड़की से शादी करना चाहता हूं पर तुम्हारी उम्र की से नहीं.’’

इस पर रागिनी को बहुत हंसी आई और बहुत लाड़ से कहा, ‘‘देखो सुंदरम, तुम मुझे मेरे बेटे जैसे ही लगते हो.’’

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वह भी सुन कर बहुत खुश हुआ पर बोला कि वह उसे रागिनी ही बोलेगा क्योंकि रागिनी उस की सब से अच्छी मित्र थी और उसी के कारण वह एक गंदी दुनिया व मानसिकता से बाहर निकला था.

फिर एक दिन उस ने कहा कि उस की शादी की बात आंचल से ही हो रही है और शायद बात बन जाए. उस का खड़ूस बाप मान ही जाए क्या मालूम.

और आज शादी का कार्ड सामने था. 15 दिन बाद शादी थी पर तैयारी तो अभी से शुरू करनी थी सो रागिनी बहुत उत्साह से जुट गई.

30 टिप्स: लॉक डाउन के दौरान सामान की किल्लत का कैसे करें मुकाबला

कोरोना वायरस का भारत सहित पूरा विश्व मुकाबला कर रहा है. बड़े शहरों से यह छोटे कस्बों और गांवों तक न फैले इसके लिए सरकार द्वारा भरसक प्रयास किए जा रहे हैं. देश के अधिकांश शहरों को लॉकडाउन किया जा चुका है. लॉकडाउन की प्रक्रिया अर्थात घर के अंदर ही रहना. लॉकडाउन कब कफ्र्यू में परिवर्तित हो जाएगा.यह सोचकर आम जनता ने दाल-चावल, शकर, तेल, सब्जी आदि का सटॉक करना प्रारंभ कर दिया है. जिससे किराना, फल और सब्जी की दुकानों पर सामान की किल्लत हो गयी है.

एक गृहिणी के लिए ये दिन बेहद मुश्किल भरे दिन हैं क्योंकि उसके सामने हर दिन नाश्ता, लंच और डिनर बनाने की समस्या तो है ही साथ ही बच्चे भी पूरे दिन घर पर हैं और उन्हें हर दिन कुछ न कुछ खाने की आवश्यकता होती है. यहां पर प्रस्तुत हैं कुछ उपयोगी टिप्स जो आपको इस किल्लत में भी कुछ राहत दे पाएगें-

1.सर्वप्रथम आप अपनी किचन में प्रतिदिन लगने वाली भोज्य सामग्री की उपलबधता को जांचे यदि कोई सामग्री कम है तो उसे बनाने से बचें, जैसे ही आपको बाहर निकलने का अवसर मिलता तो आवश्यक सामग्री अवश्य खरीदें.

2.अपने प्रतिदिन के भोजन को सीमित कर दें मसलन यदि आप दो सब्जियां बनातीं हैं तो एक ही बनाएं, दही का प्रयोग भी सीमित कर दें ताकि आवश्यकता पड़ने पर आप दही को मुख्य डिश के रूप में प्रयोग कर सकंे. इसके अतिरिक्त दूध की उपलब्धता यदि नियमित नहीं है तो भी दही का प्रयोग बंद कर दें.

3.जब भी दूध की उपलब्धता हो आप अतिरिक्त दूध खरीदें और पैकेट्स को डीप फ्रीजर में डाल दें फिर आवश्यकतानुसार प्रयोग करें.

4.भले ही आप अब प्रतिदिन दाल चावल बनातीं आयीं हैं पर अब इन्हें भी कम बनाएं ताकि आवश्यकता पड़ने पर आप पुलाव, खिचड़ी आदि बना सकें. पुलाव खिचड़ी को अधिक रुचिकर बनाने के लिए पापड़, अचार आदि को भी सर्व करें.

5.घर में यदि सब्जियां नहीं हैं तो बेसन गट्टे, पतोड़, दही के आलू, प्याज का बेसन, मूंग करायल, पापड़बड़ी और सेंवटमाटर की सब्जी, चने की सूखी दाल आदि विकल्पों का प्रयोग करें.

6.दूध का पाउडर घर में अवश्य ले आएं ताकि आवश्यकता पड़ने पर आप इसे भी दूध के विकल्प के रूप में प्रयोग कर सकें.

7.इन दिनों में ब्रेड की उपलब्धता भी नहीं हो पा रही है इनके स्थान पर आप मूंग, आटा, बेसन और सूजी के चीलो के अंदर प्याज, आलू की स्टफिंग करके ताजा और स्वादिष्ट नाश्ता बनाएं.

8.सब्जी के न होने पर भरवां प्याज, भरवां आलू, लहसुन प्याज की चटनी, टमाटर और खजूर आदि की चटनी बनाकर परांठा, रोटी अथवा पूरी के साथ सर्व करें.

9.गेहूं के आटे में बेसन तथा घर में उपलब्ध ज्वार, मक्का या बाजरा का आटा जो भी उपलब्ध हो उन्हें समान मात्रा में मिलाकर, इसमें हरा धनिया, बारीक कटा प्याज, बारीक कटी हरी मिर्च, हींग, अजवायन, नमक और 1 टेबल स्पून तेल अथवा मलाई डालकर आटा गूंथे और थालीपीठ बनाएं.

10.यदि टोमेटो सॉस समाप्त हो गया है तो 1 किलो टमाटर में 1 छोटी गांठ अदरक, 2 छोटी हरी मिर्च, 1@2 टी स्पून नमक और 1 टी स्पून गरम मसाला डालकर चार पांच सीटी ले लें, ठंडा होने पर छानकर 100 ग्राम शकर, 1 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर और एक नीबू का रस डालकर गाढा होने तक पकाएं. ताजा टोमेटो सॉस तैयार है.

11.यदि शकर कम है तो अभी से ही इसके विकल्प के तौर पर गुड़, शहद और ग्लूकोज का प्रयोग कर सकती हैं.

12.सब्जी न होने पर अचार में से तेल अलग कर दें, अब इस तेल में डालकर अचारी पुलाव और परांठे को बेलकर अचार का मसाला चाकू से मोटा मोटा लगाएं अचारी परांठा तैयार है. इसी प्रकार आप इमली, लेमन और कोकोनट राइस भी बनाए जा सकते हैं.

13.दूध से मोटी मोटी मलाई अलग निकाल लें अब आटे से दो गोल पतले परांठे बेलें उसमें तैयार एक परांठे के उपर इस मलाई को चाकू से लगाएं उपर से हल्की सी पिसी शकर बुरककर दूसरा परांठा रखकर चारों ओर से चिपका दें. घी लगाकर सुनहरा होने तक सेंके ये मलाई परांठा बच्चों बड़ों सभी को पसंद आएगा.

14.यदि घर में नीबू, अमचूर या इमली नहीं है तो आप दो चम्मच आम के अचार को गरम पानी से धो लें और मिक्सी में पीसकर प्रयोग करें, भोज्य पदार्थों में खटास के लिए आप साइट्रिक एसिड का भी प्रयोग कर सकतीं हैं.

15.घर में आटे की उपलब्धता कम है तो इडली, बड़ा सांभर, दाल ढोकली, डोसा सांभर और छोले भटूरे भी बना सकतीं हैं इससे आपका आटा अधिक समय तक चल सकेगा.

16.परमल अथवा स्टफ्ड राइस को 2 टी स्पून तेल मे मंदी आंच पर भूनें, अब इसमें भुनी मूंगफली दाना, चाट मसाला, नमक और मिर्च डालकर बच्चों के लिए छुटपुट नाश्ता तैयार करें.

17.आलू के चिप्स बनाकर तेल में डीप फ्राइ कर दें नमक मिर्च मिलाकर बच्चों को खाने को दें क्योंकि उन्हें तो पूरे दिन कुछ न कुछ खाने को चाहिए होता है.

18.घर में जो भी सब्जी उपलब्ध है अथवा रात की कोई सब्जी बच गयी है तो उसमें अपने बच्चों के टेस्ट के अनुसार मिर्च मसाला और सॉसेज डालकर तैयार कर लें अब रात की बची रोटी में इन्हें भरकर नीचे से फेाल्ड करके तवे पर मंदी आंच पर हल्का सा घी चुपड़कर सेंक लें. तैयार स्वादिष्ट फं्रेंकी को बच्चे बड़े ही स्वाद से खाएंगें.

19.यदि घर में चायनीज बनाने के लिए सामग्री नहीं है तो चिली सॉस के स्थान पर हरी मिर्च को तेल के साथ पीस लें, वेनेगर के स्थान पर नीबू का रस, और ताजा टोमेटो सॉस बनाकर प्रयोग करें. कार्नफ्लोर न होने पर मैदा का प्रयोग करें. नूडल्स के लिए सब्जियां न होने पर केवल प्याज का प्रयोग करें. आलू को चैकोर टुकड़ों में काटकर तेल में तल लें इन्हें मंचूरियन बॉल्स से रिप्लेस करें. नूडल्स और मैगी को घर मं उपलब्ध सेवइयों से रिप्लेस कर सकतीं हैं.

20.इटैलियन बनाने के लिए बटर के स्थान पर घी और मैदा न होने पर गेहूं के आटे को चाय की छलनी से छानकर प्रयोग करें. काली मिर्च के स्थान पर इस बार लाल मिर्च का प्रयोग करें. यदि सूखी बेसिल लीव्स के स्थान पर तुलसी की ताजी पत्तियों का प्रयोग करें.

21.मीठा खाने का मन है और कुछ नहीं है तो आटा, मूंग, सूजी और बेसन का हल्वा प्रयोग करें. यदि घर में कोई एसेंस और रंग है तो आप इसे बटरस्कॉच, रोज और स्ट्राबेरी जैसे फलेवर्ड हल्वे का टच भी दे सकतीं हैं. मीठे मं आप चावल, सूजी, साबूदाना और मूंग की खीर भी बना सकतीं हैं. दादी नानी के जमाने के मालपुए, गुड़ के गुलगुले और मीठी पूरी भी बना सकतीं हैं.

23.केक बनाने के लिए बटर के स्थान पर तेल, मैदा के स्थान पर चाय की छलनी से छना आटा, कंडेस्ड मिल्क के स्थान पर घर में उपलब्ध दूध को आधा रहने तक गाढा कर लें, शकर के स्थान पर गुड़ के गुनगुने पानी का प्रयोग करें.

कुछ अन्य सुझाव
इस समय सीमित सब्जियों को लंबे तक सुरक्षित रखना भी बहुत बड़ी समस्या है. सब्जियों को लंबे समय तक फ्रेश रखने के लिए हम निम्न उपाय अपना सकते हैं.

24.हरी मिर्च को धोकर साफ कपड़े से पोंछकर डंठल तोड़कर एक कांच के जार में रख लें.

25केले की जड़ को प्लास्टिक रैप से रैप कर दें केले काफी समय तक काले नहीं पड़ेंगे.

26.काफी समय तक रखने से आलू में अंकुर निकल आते हैं इससे बचने के लिए उनमें एक सेब रख दें.

27.धनिया सहित सभी हरी सब्जियों को साफ करके धोकर एक पेपर नैप्किन पर सुखा लें, फिर इसे जिप बैग में भरकर रख दें.

28.टमाटर के डंठल को नीचे की तरफ करके रखें टमाटर अधिक दिन तक चलेंगें.

29.नीबू के रस को निकालकर एक कांच के जार में भरकर रखें और आवश्यकतानुसार प्रयोग करें.

30. अपने फ्रिज को चेक करके जो सब्जी पहले आयी है उसे पहले बनाकर समाप्त करें फिर दूसरी सब्जियों पर आएं, इसके अतिरिक्त जितना भोजन एक बार में समाप्त हो जाए उतना ही बनाएं. बासे खाने से इस समय दूरी बनाकर रखना ही बेहतर है.

कभी नहीं: भाग 3

भाई ने छेड़ा या गंभीरता से कहा, वह समझ नहीं पाई. चुपचाप उठ कर अपने कमरे में चली गई. काफी रात गए मां और पिताजी घर लौटे. उस समय कुछ बात न हुई. परंतु सुबहसुबह मां ने जगा दिया, ‘‘कल रात ही रवि की माताजी को घर लाए, इसीलिए देर हो गई. उन की तबीयत बहुत खराब हो गई थी. खानापीना सब छोड़ रखा था उन्होंने. रवि मां के सामने आ ही नहीं रहा था. पता नहीं क्या हो गया इस लड़के को. बड़ी मुश्किल से सामने आया.‘‘क्या बताऊं, कैसे बुत बना टुकुरटुकुर देखता रहा. मां को घर तो ले गया है, परंतु कुछ बात नहीं करता. तुम्हें बुलाया है उस की मां ने. आज अजय के साथ चली जाना.’’

‘‘मैं?’’ हैरान रह गई गायत्री.

‘‘कोई बात नहीं. शादी से पहले पति के घर जाने का रिवाज हमारी बिरादरी में नहीं है, पर अब क्या किया जाए. उस घर का सुखदुख अब इस घर का भी तो है न.’’

गायत्री ने गरदन झुका ली. कालेज जाते हुए भाई उसे उस की ससुराल छोड़ता गया. पहली बार ससुराल की चौखट पर पैर रखा. ससुर सामने पड़ गए. बड़े स्नेह से भीतर ले गए. फिर ननद और देवर ने घेर लिया. रवि की मां तो उस के गले से लग जोरजोर से रोने लगीं. ‘‘बेटी, मैं सोचती थी मैं ने अपना परिवार एक गांठ में बांध कर रखा है. रवि को सगी मां से भी ज्यादा प्यार दिया है. मैं कभी सौतेली नहीं बनी. अब वह क्यों सौतेला हो गया? तुम पूछ कर बताओ. क्या पता तुम से बात करे. हम सब के साथ वह बात नहीं करता. मैं ने उस का क्या बिगाड़ दिया जो मेरे पास नहीं आता. उस से पूछ कर बताओ गायत्री.’’ विचित्र सी व्यथा उभरी हुई थी पूरे परिवार के चेहरे पर. जरा सा सच ऐसी पीड़ादायक अवस्था में ले आएगा, किस ने सोचा होगा.

‘‘भैया अपने कमरे में हैं, भाभी. आइए,’’ ननद ने पुकारा. फिर दौड़ कर कुछ फल ले आई, ‘‘ये उन्हें खिला देना, वे भूखे हैं.’’

गायत्री की आंखें भर आईं. जिस परिवार की जिम्मेदारी शादी के बाद संभालनी थी, उस ने समय से पूर्व ही उसे पुकार लिया था. कमरे का द्वार खोला तो हैरान रह गई. अस्तव्यस्त, बढ़ी दाढ़ी में कैसा लग रहा था रवि. आंखें मींचे चुपचाप पड़ा था. ऐसा प्रतीत हुआ मानो महीनों से बीमार हो. क्या कहे वह उस से? कैसे बात शुरू करे? नाराज हो कर उस का भी अपमान कर दिया तो क्या होगा? बड़ी मुश्किल से समीप बैठी और माथे पर हाथ रखा, ‘‘रवि.’’

आंखें सुर्ख हो गई थीं रवि की. गायत्री ने सोचा, क्या रोता रहता है अकेले में? मां ने कहा था वह पत्थर सा हो गया है.

‘‘रवि यह, यह क्या हो गया है तुम्हें?’’ अपनी भूल का आभास था उसे. बलात होंठों से निकल गया, ‘‘मुझे माफ कर दो. मुझे तुम्हारी बात सुननी चाहिए थी. मुझ से ऐसा क्या हो गया, यह नहीं होना चाहिए था,’’ सहसा स्वर घुट गया गायत्री का. वह रवि, जिस ने कभी उस का हाथ भी नहीं पकड़ा था, अचानक उस की गोद में सिर छिपा कर जोरजोर से रोने लगा. उसे दोनों बांहों में कस के बांध लिया. उसे इस व्यवहार की आशा कहां थी. पुरुष भी कभी इस तरह रोते हैं. गायत्री को बलिष्ठ बांहों का अधिकार निष्प्राण करने लगा. यह क्या हो गया रवि को? स्वयं को छुड़ाए भी तो कैसे? बालक के समान रोता ही जा रहा था.

‘‘रवि, रवि, बस…’’ हिम्मत कर के उस का चेहरा सामने किया.

‘‘ऐसा लगता है मैं अनाथ हो गया हूं. मेरी मां मर गई हैं गायत्री, मेरी मां मर गई हैं. उन के बिना कैसे जिंदा रहूं, कहां जाऊं, बताओ?’’

उस के शब्द सुन कर गायत्री भी रो पड़ी. स्वयं को छुड़ा नहीं पाई बल्कि धीरे से अपने हाथों से उस का चेहरा थपथपा दिया.

‘‘ऐसा लगता है, आज तक जितना जिया सब झूठ था. किसी ने मेरी छाती में से दिल ही खींच लिया है.’’

‘‘ऐसा मत सोचो, रवि. तुम्हारी मां जिंदा हैं. वे बीमार हैं. तुम कुछ नहीं खाते तो उन्होंने भी खानापीना छोड़ रखा है. उन के पास क्यों नहीं जाते? उन में तो तुम्हारे प्राण अटके हैं न? फिर क्यों उन्हें इस तरह सता रहे हो?’’

‘‘वे मेरी मां नहीं हैं, पिताजी ने बताया.’’

‘‘बताया, तो क्या जुर्म हो गया? एक सच बता देने से सारा जीवन मिथ्या कैसे हो गया?’’

‘‘क्या?’’ रवि टुकुरटुकुर उस का मुंह देखने लगा. क्षणभर को हाथों का दबाव गायत्री के शरीर पर कम हो गया.

‘‘वे मुझ बिन मां के बच्चे पर दया करती रहीं, अपने बचों के मुंह से छीन मुझे खिलाती रहीं, इतने साल मेरी परछाईं बनी रहीं. क्यों? दयावश ही न. वे मेरी सौतेली मां हैं.’’

‘‘दया इतने वर्षों तक नहीं निभाई जाती रवि, 2-4 दिन उन के साथ रहे हो क्या, जो ऐसा सोच रहे हो? वे बहुत प्यार करती हैं तुम से. अपने बच्चों से बढ़ कर हमेशा तुम्हें प्यार करती रहीं. क्या उस का मोल इस तरह सौतेला शब्द कह कर चुकाओगे? कैसे इंसान हो तुम?’’ एकाएक उसे परे हटा दिया गायत्री ने. बोली, ‘‘उन्हें सौतेला जान जो पीड़ा पहुंची थी, उस का इलाज उन्हीं की गोद में है रवि, जिन्होंने तुम्हें पालपोस कर बड़ा किया. मेरी गोद में नहीं जिस से तुम्हारी जानपहचान कुछ ही महीनों की है. तुम अपनी मां के नहीं हो पाए तो मेरे क्या होगे, कैसे निभाओगे मेरे साथ?’’

लपक कर उस का हाथ पकड़ लिया रवि ने, ‘‘मैं अपनी मां का नहीं हूं, तुम ने यह कैसे सोच लिया?’’

‘‘तो उन से बात क्यों नहीं करते? क्यों इतना रुला रहे हो उन्हें?’’

‘‘हिम्मत नहीं होती. उन्हें या भाईबहन को देखते ही कानों में सौतेला शब्द गूंजने लगता है. ऐसा लगता है मैं दया का पात्र हूं.’’

‘‘दया के पात्र तो वे सब बने पड़े हैं तुम्हारी वजह से. मन से यह वहम निकालो और मां के पास चलो. आओ मेरे साथ.’’

‘‘न,’’ रवि ने गरदन हिला दी इनकार में, ‘‘मां के पास नहीं जाऊंगा. मां के पास तो कभी नहीं…’’

‘‘इस की वजह क्या है, मुझे समझाओ? क्यों नहीं जाओगे उन के पास? क्या महसूस होता है उन के पास जाने से?’’ एकाएक स्वयं ही उस की बांह सहला दी गायत्री ने. निरीह, असहाय बालक सा वह अवरुद्ध कंठ और डबडबाए नेत्रों से उसे निहारने लगा.

‘‘तुम्हें 2 महीने का छोड़ा था तुम्हारी मां ने. उस के बाद इन्होंने ही पाला है न. तुम तो इन्हें अपना सर्वस्व मानते रहे हो. तुम ही कहते थे न, तुम्हारी मां जैसी मां किसी की भी नहीं हैं. जब वह सच सामने आ ही गया तो उस से मुंह छिपाने का क्या अर्थ? वर्तमान को भूत में क्यों मिला रहे हो? ‘‘अब तुम्हारा कर्तव्य शुरू होता है रवि, उन्हें अपनी सेवा से अभिभूत करना होगा. कल उन्होंने तुम्हें तनमन से चाहा, आज तुम चाहो. जब तुम निसहाय थे, उन्होंने तुम्हें गोद में ले लिया था. आज तुम यह प्रमाणित करो कि सौतेला शब्द गाली नहीं है. यह सदा गाली जैसा नहीं होता. बीमार मां को अपना सहारा दो रवि. सच को उस के स्वाभाविक रूप में स्वीकार करना सीखो, उस से मुंह मत छिपाओ.’’

‘‘मां मुझे इतना अधिक क्यों चाहती रहीं, गायत्री? मेरे मन में सदा यही भाव जागता रहा कि वे सिर्फ मेरी हैं. छोटे भाईबहन को भी उन के समीप नहीं फटकने दिया. मां ने कभी विरोध नहीं किया, ऐसा क्यों, गायत्री? कभी तो मुझे परे धकेलतीं, कभी तो कहतीं कुछ,’’ रवि फिर भावुक होने लगा.

‘‘हो सकता है वे स्वाभाविक रूप में ही तुम्हें ज्यादा स्नेह देती रही हों. तुम सदा से शांत रहने वाले इंसान रहे हो. उद्दंड होते तो जरूर डांटतीं किंतु बिना वजह तुम्हें परे क्यों धकेल देतीं.’’

‘‘गायत्री, मैं इतना बड़ा सच सह नहीं पा रहा हूं. मैं सोच भी नहीं सकता. ऐ लगता है, पैरों के नीचे से जमीन ही सरक गई हो.’’

‘‘क्या हो गया है तुम्हें, इतने कमजोर क्यों होते जा रहे हो?’’कुछ ऐसी स्थिति चली आई. शायद उस का यही इलाज भी था. स्नेह से गायत्री ने स्वयं ही अपने समीप खींच लिया रवि को. कोमल बाहुपाश में बांध लिया.भर्राए स्वर में गिला भी किया रवि ने, यही सब सुनाने तुम्हारे पास भी तो गया था. सोचा था, तुम से अच्छी कोई और मित्र कहां होगी, तुम ने सुना नहीं. मैं कितने दिन इधरउधर भटकता रहा. मैं कहां जाऊं, कुछ समझ नहीं पाता?’’

‘‘मां के पास चलो, आओ मेरे साथ. मैं जानती हूं, उन्हीं के पास जाने को छटपटा रहे हो. चलो, उठो.’’

रवि चुप रहा. भावी पत्नी की आंखों में कुछ ढूंढ़ने लगा.

गायत्री तनिक गुस्से से बोली, ‘‘जीवन में बहुतकुछ सहना पड़ता है. यह जरा सा सच नहीं सह पा रहे तो बड़ेबड़े सच कैसे सहोगे? आओ, मेरे साथ चलो?’’ रवि खामोशी से उसे घूरता रहा.

‘‘देखो, आज तुम्हारी मां इतनी मजबूर हो गई हैं कि मेरे सामने हाथ जोड़े हैं उन्होंने. तुम्हें समझाने के लिए मुझे बुला भेजा है. तुम तो जानते हो, हम लोगों में शादी से पहले एकदूसरे के घर नहीं जाते. परंतु मुझे बुलाया है उन्होंने, तुम्हें समझाने के लिए. अपनी मां का और मेरा मान रखना होगा तुम्हें. मेरे साथ अपनी मां और भाईबहन से मिलना होगा और बड़ा भाई बन कर उन से बात करनी होगी. उठो रवि, चलो, चलो न.’’ अपने अस्तित्व में समाए बालक समान सुबकते भावी पति को कितनी देर सहलाती रही गायत्री. आंचल से कई बार चेहरा भी पोंछा.

रवि उधेड़बुन में था, बोला, ‘‘मां मेरे पास क्यों नहीं आतीं, क्यों नहीं मुझे बुलातीं?’’

‘‘वे तुम्हारी मां हैं. तुम उन के बेटे हो. वे क्यों आएं तुम्हारे पास. तुम स्वयं ही रूठे हो, स्वयं ही मानना होगा तुम्हें.’’

‘‘पिताजी मां को मेरे कमरे में नहीं आने देना चाहते, मुझे पता है. मैं ने उन्हें मां को रोकते सुना है.’’

‘‘ठीक ही तो कर रहे हैं. उन की भी पत्नी के मानसम्मान का प्रश्न है. तुम उन के बच्चे हो तो बच्चे ही क्यों नहीं बनते. क्या यह जरूरी है कि सदा तुम ही अपना अधिकार प्रमाणित करते रहो? क्या उन्हें हक नहीं है?’’

बड़ी मुश्किल से गायत्री ने उसे अपने शरीर से अलग किया. प्रथम स्पर्श की मधुर अनुभूतियां एक अलग ही वातावरण और उलझे हुए वार्त्तालाप की भेंट चढ़ चुकी थीं. ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार उसे छुआ है. साधिकार उस का मस्तक चूम लिया गायत्री ने. गायत्री पर पूरी तरह आश्रित हो वह धीरे से उठा, ‘‘तुम भी साथ चलोगी न?’’

‘‘हां,’’ वह तनिक मुसकरा दी.

फिर उस का हाथ पकड़ सचमुच वह बीमार मां के समीप चला आया. अस्वस्थ और कमजोर मां को बांहों में बांध जोरजोर से रोने लगा.

‘‘मैं ने तुम से कितनी बार कहा है, तुम मुझे छोड़ कर कहीं मत जाया करो,’’ उसे गोद में ले कर चूमते हुए मां रोने लगीं. छोटी बहन और भाई शायद इस नई कहानी से पूरी तरह टूट से गए थे. परंतु अब फिर जुड़ गए थे. बडे़ भाई ने मां पर सदा से ही ज्यादा अधिकार रखा था, इस की उन्हें आदत थी. अब सभी प्रसन्न दिखाई दे रहे थे.

‘‘तुम कहीं खो सी गई थीं, मां. कहां चली गई थीं, बोलो?’’

पुत्र के प्रश्न पर मां धीरे से समझाने लगीं, ‘‘देखो रवि, सामने गायत्री खड़ी है, क्या सोचेगी? अब तुम बड़े हो गए हो.’’

‘‘तुम्हारे लिए भी बड़ा हो गया हूं क्या?’’

‘‘नहीं रे,’’ स्नेह से मां उस का माथा चूमने लगीं.

‘‘आजा बेटी, मेरे पास आजा,’’ मां ने गायत्री को पास बुलाया और स्नेह से गले लगा लिया. छोटा बेटा और बेटी भी मां की गोद में सिमट आए. पिताजी चश्मा उतार कर आंखें पोंछने लगे.गायत्री बारीबारी से सब का मुंह देखने लगी. वह सोच रही थी, ‘क्या शादी के बाद वह इस मां के स्नेह के प्रति कभी उदासीन हो पाएगी? क्या पति का स्नेह बंटते देख ईर्ष्या का भाव मन में लाएगी? शायद नहीं, कभी नहीं.’

 

#coronavirus: कोरोना के कहर में फंसा कारोबार

कोरोना से देश की जनता को बचाने के लिए केंद्र सरकार ने पूरे देश में 21 दिन का लोक डाउन कर दिया है। यह लोक डाउन 14 अप्रैल 2020 तक चलेगा.हालात को देखते हुए सरकार इस अवधि को आगे भी बढ़ा सकती है.ऐसे में सबसे बड़ी दिक्क्क्त कारोबार की है.जरूरी सामान तैयार करने वाली फैक्ट्रियों को वैसे तो बन्द नही किया गया है.पर वँहा मजदूर ही नही जा पा रहे है जिससे वँहा काम नही हो पा रहा है.

दूध, पनीर, खोया और मक्खन जैसी जरूरी उत्पाद करने वाली कम्पनी के डायरेक्टर राहुल पांडये कहते है “हमारी फैक्ट्री के अंदर ही मैनेजर से लेकर वर्कर और खुद हमारा परिवार रहता है. सरकार के नियमो के अनुसार हम फैक्ट्री चलाने को तैयार भी है पर सबसे अधिक दिक्क्क्त फैक्ट्री तक गांव गांव से दूध लाना है. इसके अलावा जलाने के लिए लकड़ी कोयला की जरूरत है.यह नही मिल रहा है। जनता में दूध की खपत तो है पर पनीर, खोया और मक्खन की क्या खपत होगी अंदाजा लगाना कठिन है. ऐसे में समझ नही आ रहा कि फैक्ट्री चलाये तो कैसे और अगर बन्द करते है तो मजदूरों को कैसे रोजगार दे”.

लखनऊ में जिम चलाने वाली आस्था मिश्रा कहती है “हमारे यँहा 20 लोग काम करते हैं. लोग अब जिम में आयेगे नहीं. ऐसे में हम अपने वर्कर को सेलिरी कैसे देगें ? हर बिजनेस को चलाने के लिए बैंक से लोन लिया गया है.उसकी किश्त कैसे भरेंगे। जगह का किराया कैसे देगें ? इसके साथ बिजली, पानी और इंटरनेट का किराया कैसे देगें. इस तरह की बहुत परेशानियां है.

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“काशवी फैशन स्टोर” की नेहा सिंह बताती है “नोटबन्दी, जीएसटी और फेस्टिवल सीजन में बिजनेस पूरी तरह से टूटा हुआ था. अब कॅरोना के कारण बाजारों के बन्द होने से बहुत खराब हालत हो गई है.कपड़े की सिलाई और कढ़ाई में लगे कारीगर घरो पर बैठ गए है. यह लोग मजदूर है इनके पास पैसा नहीं होता.ऐसे में यह एक माह में भुखमरी की कगार पर पहुँच गए है.

सरकार ने भले ही फैक्टरीयो के बंद करने का आदेश ना दिया हो पर हालात ऐसे हो गए है कि यँहा पूरी तरह से बंदी हो गई है. कुछ फैक्ट्रियों में “करोना” संकट का बहाना बना कर वर्कर को परेशान कर उसको जॉब से निकालने का काम भी किया जा रहा है. आजमगढ़ की एक चीनी मिल में काम करने वाला वर्कर अंजुमन कहता है कि एक तरफ पुलिस सड़कों पर चलने नही दे रही दूसरी तरफ चीनी मिल प्रशासन काम पर ना आने की धमकी दे कर लोगो को काम से निकालने की जुगत में लगा है.

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लोग भले ही करोना का शिकार होने के डर से घर मे कैद हो पर उनकी असल चिंता रोजीरोजगर की है.ज्यादातर निजी कर्मचारी अपने गांव घर से दूर रोटी रोजी की तलाश में दूसरे शहरों में रहने आये है. वो बिना वेतन के किराए के घर, खाने, दवा और अपनी

कभी नहीं: भाग 1

‘‘पहली नजर से जीवनभर जुड़ने के नातों पर विश्वास है तुम्हें?’’ सूखे पत्तों को पैरों के नीचे कुचलते हुए रवि ने पूछा.

कड़ककड़क कर पत्तों का टूटना देर तक विचित्र सा लगता रहा गायत्री को. बड़ीबड़ी नीली आंखें उठा कर उस ने भावी पति को देखा, ‘‘क्या तुम्हें विश्वास है?’’

गायत्री ने सोचा, उस के प्रेम में आकंठ डूब चुका युवा प्रेमी कहेगा, ‘है क्यों नहीं, तभी तो संसार की इतनी लंबीचौड़ी भीड़ में बस तुम मिलते ही इतनी अच्छी लगीं कि तुम्हारे बिना जीवन की कल्पना ही शून्य हो गई.’ चेहरे पर गुलाबी रंगत लिए वह कितना कुछ सोचती रही उत्तर की प्रतीक्षा में, परंतु जवाब न मिला.तनिक चौंकी गायत्री, चुप रवि असामान्य सा लगा उसे. सारी चुहलबाजी कहीं खो सी गई थी जैसे. हमेशा मस्त बना रहने वाला ऐसा चिंतित सा लगने लगा मानो पूरे संसार की पीड़ा उसी के मन में आ समाई हो.

उसे अपलक निहारने लगा. एकबारगी तो गायत्री शरमा गई. मन था, जो बारबार वही शब्द सुनना चाह रहा था. सोचने लगी, ‘इतनी मीठीमीठी बातों के लिए क्या रवि का तनाव उपयुक्त है? कहीं कुछ और बात तो नहीं?’ वह जानती थी रवि अपनी मां से बेहद प्यार करता है. उसी के शब्दों में, ‘उस की मां ही आज तक उस का आदर्श और सब से घनिष्ठ मित्र रही हैं. उस के उजले चरित्र के निर्माण की एकएक सीढ़ी में उस की मां का साथ रहा है.’एकाएक उस का हाथ पकड़ लिया गायत्री ने रोक कर वहीं बैठने का आग्रह किया. फिर बोली, ‘‘क्या मां अभी तक वापस नहीं आईं जो मुझ से ऐसा प्रश्न पूछ रहे हो? क्या बात है?’’

रवि उस का कहना मान वहीं सूखी घास पर बैठ गया. ऐसा लगा मानो अभी रो पड़ेगा. अपनी मां के वियोग में वह अकसर इसी तरह अवश हो जाया करता है, वह इस सत्य से अपरिचित नहीं थी.

‘‘क्या मां वापस नहीं आईं?’’ उस ने फिर पूछा.

रवि चुप रहा.‘‘कब तक मां की गोद से ही चिपके रहोगे? अच्छीखासी नौकरी करने लगे हो. कल को किसी और शहर में स्थानांतरण हो गया तब क्या करोगे? क्या मां को भी साथसाथ घसीटते फिरोगे? तुम्हारे छोटे भाईबहन दोनों की जिम्मेदारी है उन पर. तुम क्या चाहते हो, पूरी की पूरी मां बस तुम्हारी ही हों? तुम्हारे पिता और उन दोनों का भी तो अधिकार है उन पर. रवि, क्या हो गया है तुम्हें?’’

‘‘ऐसा लगता है, मेरा कुछ खो गया है. जी ही नहीं लगता गायत्री.  पता नहीं, मन में क्याक्या होता रहता है.’’

‘‘तो जा कर मां को ले आओ न. उन्हें भी तो पता है, तुम उन के बिना बीमार हो जाते हो. इतने दिन फिर वे क्यों रुक गईं?’’ अनायास हंस पड़ी गायत्री. धीरे से रवि का हाथ अपने हाथ में ले कर सहलाने लगी, ‘‘शादी के बाद क्या करोगे? तब मेरे हिस्से का प्यार क्या मुझे मिल पाएगा? अगर मुझे ही तुम्हारी मां से जलन होने लगी तो? हर चीज की एक सीमा होती है. अधिक मीठा भी कड़वा लगने लगता है, पता है तुम्हें?’’

रवि गायत्री की बड़ीबड़ी नीली आंखों को एकटक निहारने लगा.

‘‘मां तो वे तुम्हारी हैं ही, उन से तुम्हारा स्नेह भी स्वाभाविक ही है लेकिन वक्त के साथसाथ उस स्नेह में परिपक्वता आनी चाहिए. बच्चों की तरह मां का आंचल अभी तक पकड़े रहना अच्छा नहीं लगता. अपनेआप को बदलो.’’

‘‘मैं अब चलूं?’’ एकाएक वह उठ खड़ा हुआ और बोला, ‘‘कल मिलोगी न?’’

‘‘आज की तरह गरदन लटकाए ही मिलना है तो रहने दो. जब सचमुच मिलना चाहो, तभी मिलना वरना इस तरह मिलने का क्या अर्थ?’’ एकाएक गायत्री खीज उठी. वह कड़वा कुछ भी कहना तो नहीं चाहती थी पर व्याकुल प्रेमी की जगह उसे व्याकुल पुत्र तो नहीं चाहिए था न. हर नाते, हर रिश्ते की अपनीअपनी सीमा, अपनीअपनी मांग होती है.

‘‘नाराज क्यों हो रही हो, गायत्री? मेरी परेशानी तुम क्या समझो, अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊं?’’

‘‘क्या समझाना है मुझे, जरा बताओ? मेरी तो समझ से भी बाहर है तुम्हारा यह बचपना. सुनो, अब तभी मिलना जब मां आ जाएं. इस तरह 2 हिस्सों में बंट कर मेरे पास मत आना.’’गायत्री ने विदा ले ली. वह सोचने लगी, ‘रवि कैसा विचित्र सा हो गया है कुछ ही दिनों में. कहां उस से मिलने को हर पल व्याकुल रहता था. उस की आंखों में खो सा जाता था.’   भविष्य के सलोने सपनों में खोए भावी पति की जगह एक नादान बालक को वह कैसे सह सकती थी भला. उस की खीज और आक्रोश स्वाभाविक ही था. 2 दिन वह जानबूझ कर रवि से बचती रही. बारबार उस का फोन आता पर किसी न किसी तरह टालती रही. चाहती थी, इतना व्याकुल हो जाए कि स्वयं उस के घर चल कर आ जाए. तीसरे दिन सुबहसुबह द्वार पर रवि की मां को देख कर गायत्री हैरान रह गई. पूरा परिवार समधिन की आवभगत में जुट गया.

‘‘तुम से अकेले में कुछ बात करनी है,’’ उस के कमरे में आ कर धीरे से मां बोलीं तो कुछ संशय सा हुआ गायत्री को.

‘‘इतने दिन से रवि घर ही नहीं आया बेटी. मैं कल रात लौटी तो पता चला. क्या वह तुम से मिला था?’’ ‘‘जी?’’ वह अवाक् रह गई, ‘‘2 दिन पहले मिले थे. तब उदास थे आप की वजह से.’’

‘‘मेरी वजह से उसे क्या उदासी थी? अगर उसे पता चल गया कि मैं उस की सौतेली मां हूं तो इस में मेरा क्या कुसूर है. लेकिन इस से क्या फर्क पड़ता है?

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