बात घूमफिर कर फिर गरीबी पर आ गई है. जैसे बारह बरस में घूरे के दिन भी बहुरते हैं, वैसे ही गरीब और गरीबी के दिन बहुरे हैं. आज वे सभी पार्टियों के चहेते बन गए हैं, सत्ताधारी पार्टियों में भी और सत्ता से बेदखल कर दी गई पार्टियों के भी. गरीब आजकल सुर्खियों में हैं. उन की चहुंओर जयजयकार हो रही है. गरीब अपनी गरीबी पर इतराने लगे हैं. देश में गरीबी हटाओ नारे पर राजनीतिक पार्टियों का आधिपत्य सा रहा है. इन्हें गरीब जब भी याद आते हैं तो बहुत याद आते हैं, क्योंकि ये पार्टियां जानती हैं कि गरीबों की स्तुति करने से पार्टी की खुद की गरीबी अवश्य दूर हो सकती है.

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