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#coronavirus: अब कौवे से फैला बर्ड फ्लू

देश में कोरोना का कहर अभी थमा नहीं कि बर्ड फ्लू ने दस्तक दे दी. पटना के कंकड़बाग और कतरीसराय के इलाकों में बर्ड फ्लू के संक्रमण की जानकारी मिली है, बिहार के वैशाली जिले में 2 दर्जन कौवे मरे हुए मिले, ये खबर मिलते ही आसपास के लोग सकते में आ गए. जानकारी मिलते ही बीमारी की रोकथाम के लिए बिहार सरकार ने कदम उठाने शुरू कर दिए गए हैं . पोल्ट्री फार्म में मुर्गियों को मारा जाने लगा है और उन्हें जमीन के अंदर दबा दिया गया ,जिससे कि बीमारी न फैले .

इस काम में पशुपालन विभाग की टीम और और जिला प्रशासन के लोग लगे हुए हैं . मुर्गियों में बर्ड फ्लू संक्रमण की जानकारी मिलते ही केंद्र सरकार भी सतर्क हो गई है.पशु वैज्ञानिकों का कहना है कि आमतौर पर यह बीमारी दिसंबर जनवरी के ठंड वाले मौसम में होती है, लेकिन इस बार मौसम के बारबार बदलाव होने के कारण इस समय मुर्गियों में इस बीमारी का प्रकोप हो गया है . उनका यह भी कहना है कि सामान्य तौर पर जब मौसम गर्म होता है तो यह वायरस वाला खुद ही मर जाता है.

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बताया गया कि मार्च के इस महीने में बर्ड फ्लू के लक्षण एक कौवे में पाए गए और वहीं से यह बीमारी मुर्गियों में फैल गई उसके बाद यह बीमारी संक्रमित पशुओं पक्षियों द्वारा आम लोगों में फैल सकती है. इसलिए सरकार द्वारा तुरंत कदम उठा लिए गए .पटना के पशुपालन विभाग द्वारा बर्ड फ्लू को लेकर उससे बचाव के लिए अधिसूचना जारी कर दी गई है .लोगों को बीमार मुर्गियों के संपर्क में न आने की सलाह दी गई है .मुर्गियों में आम लोगों तक फैलने वाली इस बीमारी से बचने के लिए मुर्गी पालन को दस्ताने पहनने और साबुन और पानी से हाथ साफ करने की भी सलाह दी गई है .मरी हुई मुरगियों को जमीन में दबाने की भी सलाह दी गई है .

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कोरोना के चलते पोल्ट्री कारोबार खराब स्थिति से गुजर रहा था, देश के लोग भी भी चिकन खाने से डर रहे हैं उनको लग रहा है कि इनमें भी कोराना वायरस के कीटाणु हो सकते हैं और हम इसकी चपेट में आ सकते हैं. अनेक सोशल मीडिया पर भी इस तरह की खबरें आती रही हैं लेकिन वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन का कहना है कि मुर्गी में ऐसे वायरस के लक्षण नहीं है फिर भी अफवाहों का बाजार गर्म है जिसके कारण पोल्ट्री फार्म का धंधा धराशाई हुआ,और अब मुरगियों में बर्ड फ्लू की दस्तक ने.- भानु प्रकाश राणा

LOCKDOWN टिट बिट्स

पीता हूं गम भुलाने को

बॉलीवुड में कपूर खानदान का शराब से वही नाता रहा है जो अस्सी के दशक में टीवी का एंटीना से हुआ करता था जिसे ऊपर छत पर जाकर बार बार न घुमाओ तो नीचे स्क्रीन पर मच्छर आने लगते थे. मय से कुछ इसी तरह का मकसूद साबित करते हुये अभिनेता ऋषिकपूर ने लाक डाउन के इस नश्वर दौर में सुरा प्रेमियों का दिल यह कहते जीत लिया है कि कोरोना ने पूरी दुनिया में कोहराम मचा रखा है, हजारों लोग अपनी जान गवां चुके हैं और ये सिलसिला थमने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है हिंदुस्तान में भी तेजी से आंकड़े बदल रहे हैं….. बगैरह बगैरह…

नवरात्रि की उपासना के दिनों में ऋषि के इस फलाहारी प्रस्तावना या भूमिका कुछ भी कह लें का उत्तरार्ध बड़ा मदहोश कर देने बाला था कि सभी राज्य सरकारों को चाहिए कि वे शाम के वक्त शराब की दुकानें खोल दें. ज़िंदगी भर बिना नागा रोज शाम को गला तर करते रहने बाले इस प्रतिभाशाली हीरो ने दलीले भी दीं कि लाक डाउन के चलते लोग डिप्रेशन में आ रहे हैं जो एल्कोहल से ही दूर हो सकता है. दिन रात बैल की तरह काम में जुते डाकटरों और पुलिस बालों को भी तनाव मुक्त रखने यह उमर खैयामी पेय बड़ा कारगर साबित होगा और इतना ही नहीं सरकारों को भी राजस्व खूब मिलेगा जिससे वे कोरोना से लड़ सकती हैं .

इस पर उम्मीद के मुताबिक भक्त टाइप के लोग भड़के और सोशल मीडिया पर ऋषि को ट्रोल करने लगे लेकिन तीर कमान से निकल चुका था और पियक्कड़ इसकी मीठी चुभन सीने में महसूस करने लगे थे. यह आइडिया पीने बालों ने पसंद किया तो बात में दम इस लिहाज से भी था कि जब सरकार सालों पुरानी रामानन्द सागर कृत रामायण का अफीमी नशा फोकट में करा रही है तो पैसा उगलने बाली असली शराब को दुकानों से बेचने में कहां का पहाड़ टूट जाएगा और ऋषि कपूर यह भी गलत नहीं कह रहे कि आखिर शराब ब्लेक में तो बिक ही रही है.

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दारू के हिमायती इस अभिनेता के प्रशंसको को बरबस ही कुली फिल्म का उन्हीं पर फिल्माया  यह हिट गाना याद हो आया, मुझे पीने का शौक नहीं पीता हूं गम भुलाने को…. अब सरकार को चाहिए कि वह लोगों का लाक डाउनी गम दूर करने शाम को शराब बिकने दे और कथित नैतिकता के चलते ऐसा नहीं कर सकती तो रामायण का भी प्रसारण बंद करे जिससे सभी को डिप्रेशन बराबरी से महसूस हो , कम से कम यहां तो भेदभाव न हो.

बक़ौल एक भूतपूर्व पियक्कड़ सीएम

कभी गांधी परिवार के खासमखास रहे छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री की उपाधि से विभूषित अजीत जोगी ने शायद ही नहीं तय है ऋषि कपूर के बयान से इत्तफाक नहीं रखा इसलिए ट्वीट कर मध्यप्रदेश के चौथी बार ताजे ताजे मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह से गुजारिश की कि मध्यप्रदेश में लाक डाउन के बाबजूद भी शराब की दुकानें खुली हुई हैं और उनसे धड़ल्ले से शराब बिक भी रही है. इससे संकर्मण फैलने का खतरा है लिहाजा ये दुकानें छतीसगढ़ की तर्ज पर बंद की जाएं. अब आप सोचेंगे इसमें नया क्या है राजनीति में ऐसा तो होता ही रहता है कि नेता जनता की फिक्र का दिखावा करते रहते हैं.

इस मामले दो बातें निहायत ही गौरतलब हैं जिनमे से पहली यह है कि पानी तक नीट पीने बाले सात्विक प्रवृती के शिवराज सिंह ने फौरन जोगी के ट्वीट को नरेंद्र मोदी के हुक्म सा माना और शराब की दुकानों को बंद करने के आदेश दे दिये. इससे केवल शराबियों का ही दिल नहीं टूटा बल्कि कोरोना के कहर और लाक डाउन के डिप्रेशन को झेल रहे कई गैर- शराबियों को भी सदमा लगा. अजीत जोगी और शिवराज सिंह के सियासी ताल्लुक दो समानान्तर रेखाओं जैसे रहे हैं जो कभी मिली ही नहीं और न ही जिनके कभी मिलने की उम्मीद है फिर भी शिवराज ने  उनका मान यह जताने रखा कि मध्यप्रदेश में तो विपक्ष रहा नहीं इसलिए पड़ोसी राज्य के दिग्गज की सच्ची सलाह वे मान रहे हैं.

अब बात अजीत जोगी की, जिनकी प्रशासनिक क्षमता कभी किसी सबूत की मोहताज नहीं रही.  एक निर्धन आदिवासी परिवार के अजीत जोगी ने इंजीयरिंग की पढ़ाई के बाद आईपीएस और आइएएस बनकर एक मिसाल कायम कर दी थी लेकिन सियासी समझ में वे धोखा खा बैठे थे और उसी थाली में छेद करने लगे थे जिसमें उन्हें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद की डिश थाल में सजी मिली थी जो एक ब्राह्मण के हिस्से में जाना थी.

कांग्रेस से ससम्मान उनकी फैयरबेल हुई तो वे जोश जोश में नई पार्टी बना बैठे जिसे आदिवासी बाहुल्य इस राज्य ने नकार दिया . 2018 के विधानसभा चुनाव में बहिन मायावती से हाथ मिलाने के बाद भी भी बाजी कांग्रेस के हाथ चली गई जिससे साबित हो गया कि अब उनके पास कलेक्टरी और मुख्यमंत्रित्व काल के संस्मरण भर रह गए हैं.

इसी सियासी बेगारी के दौर में उन्होने शायद महात्मा गांधी की किताब सत्य के साथ मेरे प्रयोग कुछ ज्यादा ही पढ़ डाली लिहाजा जनवरी 2019 में उनके सर पर सच बोलने का भूत सवार हो गया और एक दिन उन्होने यह रहस्योद्घाटन (जो हर किसी को पहले से ही मालूम था) कर डाला कि वे भी खूब शराब पीते थे अपने गांव में भी और विदेश जाते थे तब भी छककर पीते थे .

अब यह और बात है कि लोगों ने इस पर भी उन्हें महान मानने से इंकार कर दिया बाबजूद उनके यह तक कहने कि शराब बहुत खराब चीज है इससे घर के घर बर्बाद हो जाते हैं, 200 एकड़ रकबे की जमीन बाला किसान भी फुटपाथ पर आ जाता है और उन्होने शराब कुछ बनने के लिए छोड़ी थी. अब लाक डाउन के बहाने मध्यप्रदेश में शराब की दुकाने बंद करवाने का श्रेय उन्हें मिल गया है फिर भले ही ये दुकाने दिखने को ही बंद हुई हों. अब यह पूछना शराब की हिमायत जैसी हिमाकत ही होगी कि जोगी जब तक पीते रहे तब तक तो कुछ न कुछ बने रहे लेकिन जैसे ही पीना छोड़ा तो जो थे वह भी न रहे.

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सरकार की अग्निपरीक्षा  –

हजारों की तादाद में दिल्ली सहित देश के कई बड़े शहरों से मजदूर जत्थे बनाकर किसी भी कीमत पर घर जाने आमादा हो आए हैं तो लाक डाउन की कथित सफलता मिट्टी में मिलती दिखाई दे रही है . दिल्ली का आनंद बिहार नाम का स्थान तो शाहीन बाग जैसा चर्चित हो रहा है जहां भूखे प्यासे लोगों के मुंह से बस यह निकलना ही बाकी रह गया है कि …. . भूखे पेट लाक डाउन के नियमों का पालन नहीं होता. उत्तरप्रदेश और बिहार के लोग अब किसी की सुनेंगे ऐसा लग नहीं रहा. ये न तो किसी आदित्यनाथ की सुन रहे हैं और न ही नीतीश कुमार की और न ही हेमंत सोरेन या अरविंद केजरीवाल की कि भैया रुक जाओ हम खाने पीने और ठहरने के मुकम्मल इंतजाम कर रहे हैं.

हुआ सिर्फ इतना है कि नोट बंदी की तरह लाक डाउन के निशाने पर भी इत्तफाक से ही सही  गरीब दलित और आदिवासी ही आए हैं. यही बात 19 मार्च को यूं ही कही गई थी तो भक्तगण गदा लेकर चढ़ाई करने आमादा हो आए थे कि आप निहायत ही नालायक और वामपंथी टाइप के जीव हैं, मोदी जी तो देश को कोरोना के कहर से बचा रहे हैं और आपको ठिठोली सूझ रही है.

अब जब सच सामने है तब भी भक्त इन दबे कुचलो को ही यह कहते कोस रहे हैं कि ये लोग तो पैदाइशी कमअक्ल और जाहिल हैं जो कोरोना की वीभत्सता और भयावहता नहीं समझ रहे.  उधर इन हजारों सुदामाओं को समझ आ गया है कि मक्खन मलाई तो कृष्ण लोग सोशल डिस्टेन्सिंग के नाम पर सूँतते अपना सूतक काल काट रहे हैं और हमे सूखे चने भी नसीब नहीं हो रहे तो मरने वतन ही चला जाये आगे जो होगा सो देखा जाएगा . और देखना हमे नहीं है बल्कि उन्हें देखना है जो मौत से हमसे ज्यादा भयभीत हैं.

अब जो होगा वह लगभग अप्रिय ही होगा लेकिन इस समूहिक पलायन से एक बात जरूर उजागर हो गई है कि संक्रामक बीमारियाँ आमतौर पर अमीरों को ही लगती हैं. प्लेग और चेचक जैसी बीमारियों का इतिहास इसका गवाह भी है. कोई बड़ी संक्रामक बीमारी या महामारी कभी स्लम्स से नहीं फैलती बल्कि पक्के मकानों में उसकी पैदाइश और परवरिश होती है फिर उसकी दवा और वेक्सीन ईजाद हो जाते हैं लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जाते जाते ये बीमारियाँ कई गरीबों को बदहाली से हमेशा के लिए मुक्ति दिला जाती हैं.

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क्या गरीब मजदूरों की इस भीड़ को यह बात समझ आ गई है , इस सवाल पर भले ही किसी शोध की जरूरत हालफिलहाल न पड़े लेकिन यह तय है कि ये लोग सरकार पर भरोसा नहीं कर रहे , यह जरूर सरकार की विफलता है.

ये लोग पूरी सब्जी के लालच में नहीं रुक रहे हैं तो साफ यह भी कि इनकी छठी इंद्रिय ने इन्हे आगाह कर दिया है कि कोरोना का कहर आखिरकार टूटेगा तो इन्हीं पर क्योंकि लाक डाउन यानि वैज्ञानिक छुआछूत के नाम पर इनका संपर्क समाज के उस वर्ग से तोड़ दिया गया है जिसके पास सालों साल का राशन पानी है . इन्हें तो अन्न देवता और लक्ष्मी देवी बचा लेंगे  लेकिन हमें बचाने कोई काली या हनुमान नहीं आने बाला, हमारी तरह हमारे देवी देवता भी इनके भगवानों के आगे असहाय हैं लिहाजा भागने में ही भलाई है.

हालात बेकाबू हैं और जरा सी भी ज़ोर जबरजस्ती इनके साथ की गई तो कहर कोरोना से कहीं ज्यादा बरपेगा. सरकार की असल अग्निपरीक्षा का वक्त तो अब शुरू हो रहा है देखना दिलचस्प होगा कि महमानव और अवतार करार दिये जा रहे नरेंद्र मोदी कौन सी ट्रिक से इससे निबटेंगे हालांकि उनके पास इकलौता रास्ता यही बचा है कि जैसे भी हो इस भीड़ को उसके घर तक पहुंचा दें.

ड्रामा अलीगढ़ का–

एक तरफ तो दिल्ली के मजदूर किसी भी कीमत पर रुकने तैयार नहीं तो दूसरी तरफ अलीगढ़ में देखते ही देखते कोई एक हजार गरीब लोग सरकारी इमदाद औए पैसा लेने लाक डाउन को धता बताते नगर निगम दफ्तर पहुँच गए इनके हाथों में राशन कार्ड आधार कार्ड और बेंक पासबुक जैसे दस्तावेज़ थे. दरअसल में अफवाह यह उडी थी कि प्रदेश सरकार ने तीन महीने का राशन और 1 हजार रु महीना आर्थिक सहायता देने की जो घोषणा की थी वह मिलने लगी है तो फिर लाक डाउन के नियम और कोरोना का डर भी लोगों को रोक नहीं पाया.

हल्ला मचा तो लोगों ने अपने मोबाईल पर आया नगर निगम का मेसेज मीडिया बालों को दिखाया जो झूठ नहीं था लेकिन अब कोई जबाब देने तैयार नहीं तो मायूस लोगों को समझ आ गया कि घोषणा सिर्फ घोषणा होती है उस पर अमल बड़े इतमीनान से किया जाता है मुमकिन है 3 महीने का राशन 3 महीने बाद देने की बात कही गई हो गलती हमारे सुनने और समझने में ही रही होगी अब इतने जल्दी तो राम राज आने से रहा और यह नगर निगम बालों का होली का मज़ाक ही क्यों न  समझ लिया जाये.

बात आई गई हो गई लेकिन भविष्य की झलक दिखला गई कि जब यह राहत कभी अगर वाकई बंटेगी तो लाक डाउन एक तरफ रखा रह जाएगा इसलिए सरकार को समझ लेना चाहिए कि 80 करोड़ की तादाद बेहद गैरमामूली होती है और राहतों पर अमल करने उसके पास पर्याप्त अमला नहीं है इसलिए मारामारी तो होगी ही और जल्द ही राशन और पैसा नहीं मिला तो लोगों की बैचेनी और ज्यादा बढ़ेगी यानि दो तो मुसीबत और न दो तो भी मुसीबत.

हाल-फिलहाल तो लोग लालच के चलते घरों में कैद रहने तैयार हो गए हैं वह भी इस उम्मीद के साथ कि 14 अप्रेल तक पैसा और अनाज मिल जाएगा.

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#coronavirus: भाजपा नेताओं के बिगड़ते बोल

लेखक-रोहित 

आज पूरा देश दो तरह के संकट से जूझ रहा है. एक, कोरोना संक्रमण जिस ने पुरे विश्व को अपने गिरफ्त में ले कर हजारों की जान ले ली है. वहीँ दूसरा, इस संक्रमण के कारण हुए लाकडाउन से करोडो लोगों के जीवन में हुए भारी आर्थिक नुकसान. हमारे देश के लिए यह दोनों संकट धीरेधीरे पैर पसारना शुरू करने लगे हैं खासकर 21 दिनों के एक लम्बे लाकडाउन से उपजा आर्थिक संकट अभी से अपनी बर्बरता दिखाना शुरू कर चुका है.

लगातार टीवी और सोशल मीडिया से गरीब मजदूरों के भयावह कर देने वाली पलायन की ख़बरें व तस्वीरें आ रही है. आनंद विहार में हजारों की संख्या में जमा मजदूर लोग इस समय पूरे देश के लिए गवाह बने है कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. लाखों बेसहारा मजदूर अपने परिवार के साथ अपने घरों के लिए सेकड़ों किलोमीटर की लम्बी दूरी तय करने निकल पड़े हैं.ऐसे में कुछ नेता ऐसे भी हैं जो अपने बिगडैल बोलों से बाज नहीं आ रहे. जिस में से एक भाजपा के नेता है बलबीर पुंज. जिनका कहना है कि “दिल्ली के मजदूर पैसा, भोजन आदि के चलते नहीं भाग रहें, बल्कि वह अपने परिवार के साथ छुट्टी मनाने के लिए जा रहे हैं.”

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बलबीर पुंज कोई भाजपा के नौसिखिया और ऐरागैरा नेता नहीं हों. वे भाजपा की तरफ से राज्यसभा सांसद रह चुके हैं. उन्होंने गरीबी महसूस नहीं की होगी किन्तु यहांवहां से सुनापढ़ा तो जरुर होगा कि भारत में अधिकतर लोग गरीब हैं. खुद को पत्रकार बताने वाले बलबीर पुंज क्या अपनी चाटुकारी पत्रिकारिता में इतना खोते चले गए कि सही गलत क्या होता है उसे समझना ही भूल गए. जाहिर है उन्होंने अपने बाल ऐसे ही भाजपा के लिए सफ़ेद नहीं किये होंगे. कुछ तो कीमत लगाई ही होगी अपने संवेदनशीलता को खोने के लिए.साथ ही यह भी हैरानी वाली बात है की उन की पार्टी के बड़े नेताओं ने इस मसले पर उन्हें किसी प्रकार की हिदायत नहीं दी. हो सकता है दिल्ली विधानसभा के चुनाव में गली गली परचा बाँट कर आला दर्जे के नेता इस समय थक गए हों. इसलिए न तो सामने प्रकट हो रहे है न देश में मचे इतने बड़े तांडव पर अपने नेताओं को समझा पा रहे है.

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ऐसी बात नहीं है कि यह नासमझी की वजह से दिया गया बयान हो. अपने 70 साल के जीवन में उन्होंने देश को कुछ तो जाना ही होगा, खासकर एक पत्रकार और राजनेता के तौर पर. यह उन की नादानी नहीं हो सकती बल्कि यह गरीबों के प्रति वह भड़ास है जिसे उन्होंने निकाली है. आज यह गरीब सरकार की कलह खोल रहे है. झूठ से भरे गुब्बारे की हवा निकाल रहे है. यह मजदूर नेताओं के द्वारा बनाई झूठी शान को जनता के सामने पेश कर रहे हैं. यह वह खीज है बलवीर पुंज की, जिसमें वह गरीबों को कीड़ेमकोड़ों से बढ़ कर नहीं देखते.ऐसे ही एक और भाजपा के नेता है नंदकिशोर गुर्जर. यह गाजियाबाद से एमएलए है. इन का कहना है “जो भी सड़कों में घूम रहे है उन की टांगो को तोड़ दो, अगर वे फिर भी न माने तो उनकी टांगो में गोली मार दो.” यह वह पुलिस प्रशासन से कह रहे है.

नंदकिशोर गुर्जर वही नेता है जिन्होंने कुछ दिन पहले कहा था कि ”कोरोना वायरस गाजियाबाद लोनी में घुस नहीं सकता क्योंकि हमारे यहां ज्यादा गाय है.” यह उन्ही नेता सरीकों की लिस्ट में आते हैं जिन का मानना था कि गौमूत्र और गोबर से कोरोना संक्रमण भगाया जा सकता है. और आज यही नेता गोली मारने की बात कर रहे हैं.गाजियाबाद में इस समय 5 कोरोना पॉजिटिव केस सामने आ चुके हैं. यही बात है कि लोग जान रहे है की जिस समय उन से संक्रमण से निपटने के उपाय मांगे जा रहे थे तब वह गोबर और गौमूत्र बंटवाने की सलाह दे रहे थे. इस समय लोग अपने नेताओं के कथन दोहराने लगे हैं. समझने लगे है यह सब हमें बेवकूफ बनाए रखने के तरीके हैं. यही खीज इस तरह के नेताओं को खाए जा रही है. यही कारण है की इन नेताओं के लिए हर चीज का इलाज गोली और बोली है.

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जाहिर सी बात है यह अनायास कहे जाने वाले कथन नहीं है. यह कथन पूरी तरह राजनितिक विचारों से ओतप्रोत हैं. यह विचार ऊपर के नेताओं से होकर नीचे की तरफ बह रहे हैं. यही बात है कि अपने कहे गए कथन में उन्हें किसी बात का डर महसूस नहीं होता. वे बेधड़क ऐसे कहते चले जाते है. यह लगातार एक तरफ से चलने वाली वह सीरीज है जिस से लगता है उन्हें या तो यही सिखाया जा रहा है या इसे वे फेमस होने के लिए सस्ता पब्लिसिटी स्टंट के तौर पर मानते है.

#coronavirus: हम दंगा पीड़ित बोझ नहीं, आप की जिम्मेदारी हैं

लेखक-रोहित 

दिसंबर माह से दिल्ली के लोगों ने लगातार दिल्ली में तनाव का माहौल झेला है. पहले चुनाव की सरगर्मी में गर्म होते नेताओं के तेवर व उस से उपजे भारी तनाव. फिर दंगों की आग, अफवाहों के साए और अब कोरोना के कारण एक लंबा लाकडाउन. यह सब इतने कम समय में इतनी तेजी से हुआ कि अगर लोगों का मनोस्तिथि का ब्यौरा लिया जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि काफी हद तक दिल्लीवासी अवसाद से गुजर रहे हैं. जाहिर है एक सभ्य समाज में उपजे इस तरह के तनाव आने वाली पीढ़ी के लिए मानसिक दुष्प्रभाव का कारण बनेंगे.

इन घटनाक्रमों में सब से ज्यादा प्रभावित वह लोग हुए जिन्होंने कुछ दिन पहले ही दिल्ली में हुए दंगों का दंश झेला. उन हजारों लोगों के लिए यह समय उस परिस्थिति से उभरने का था, लेकिन वे उभरने की जगह लाकडाउन की चपेट में जा घिरे. कितना मुश्किल होगा इस परिस्थिति को महसूस करना. आम तौर पर देश में जहां भी दंगे हुए वहां दंगों के बाद एक लंबा राहत का समय होता है. सरकार द्वारा राहत कैंप बनाए जाते हैं जिस में दंगा पीड़ितों को राहत मिलने तक रखा जाता है. फिर उन जगहों पर नेताओं और समाजसेवियों के आने का कभीकभार सिलसिला चलने लगता है. यही राहत का समय होता है जब दंगा पीड़ित लोग खुद को फिर से संतुलित करने के लिए संघर्ष करते है. यह संतुलन सिर्फ आर्थिक ही नहीं मानसिक तौर पर भी जरुरी होता है.

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23 फरवरी से शुरू हुए दंगों में 53 लोगों ने अपनी जान गंवाई तथा कई घायल हुए. कई लोगों ने अपने घरसंपत्ति को जल कर ख़ाक होते देखा. गरीब लोगों के लिए यह सब कुछ छीन लिए जाने के बराबर था. ऐसे में हजारों लोग बेघर हुए. उन में से कुछ अपने गांवों की तरफ वापस लौटे. लेकिन जिन के लिए गांव में भी कुछ बचा नहीं था वे वहीँ मुस्तफाबाद के ईदगाह में बने राहत कैंप में रहने को मजबूर हुए. लगभग 1000 की संख्या के आसपास लोग यहीं राहत केम्प में शरण लेने को मजबूर हुए. जो लोग सरकार द्वारा बनाए इन राहत कैंप की दरियादिली के कायल हैं वे यह जरुर समझ लें की यह मात्र खाना, कम्बल और टेंट है. किंतु दंगा पीड़ित इंसानी जीवन सिर्फ खाना, कम्बल या टेंट नहीं.

 

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24 तारीख को पूरे देश में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कोरोना के संक्रमण से बचाव के लिए लाकडाउन के निर्देश दिए गए. लोगों को सामाजिक दूरी बनाने को कहा गया. जाहिर सी बात है इस की चपेट में राहत कैंप में रह रहे लोगों का आना लाजमी था. और हुआ भी यही, सभी दंगा पीड़ित लोगों को बिना तैयारी तुरंत अगले दिन यानी गुरुवार को राहत कैंप से खाली कराया गया. उन्हें सरकार ने कोई वैकल्पिक रास्ते नहीं बताए. उन्हें उन के बदतर हाल में यूं ही छोड़ दिया गया. कई लोग वहीँ अपने रिश्तेदारों के यहां चले गए. कई आसपास की मस्जिदों में जाने को मजबूर हुए. तो कई लोग सड़कों में रहने को.

मुस्तफाबाद में रहने वाले 26 वर्षीय फैजान का कहना है “कैंप में दो तरह के लोग रह रहे थे. एक जिन के अपने मकान थे किन्तु वह मकान दंगों में बुरी तरह जल गए थे. दूसरा, जले हुए मकानों के किराए में रहने वाले किरायदार लोग. जिन के अपने मकान थे वह वापस जले हुए मकानों में चले गए हैं, जहां सिर्फ काली जली दीवारें, राख और टूटे हुए खिड़की दरवाजे हैं. जो किराए पर थे वह उन्ही इलाकों में मकानमालिकों के आपसी सहयोग से रह रहे हैं. जब सरकार के सहयोग की जरुरत है तो तुम कौन मैं कौन वाला रवैया वे किये हुए है.”

वहीँ करावल नगर के नजदीक शिव विहार में रहने वाले 22 वर्षीय अब्दुल बताते हैं “यह दंगा पीड़ितों के साथ सरासर सरकार द्वारा मजाक है. पहले बेघर लोगों को वहां (राहत कैंप) से भगा दो, और अगर वह सड़क पर दिखे तो उन्हें लाठियों से पीटो” यह एक डरावना एहसास ही है कि जिन मकानों में एक महीने पहले आप और आप के परिवार के लोगों के चीखने, रोने की आवाजें गूँज रही थी. मेहनत से बने मकान को अपने आंखों के सामने जलते देखा हो. और आज भी उस की दीवारें और बिखरा सामान आप को वही मंजर याद दिला रहे हों उस परिस्थिति में आप का वहां 21 दिनों तक खुद को कैद कर के रखना कितना मानसिक अघात पंहुचा सकता है.

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हालांकि शुक्रवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार को इस मसले पर निर्देश देते हुए कहा कि दंगा पीड़ितों को उचित राशन, मेडिकल सुविधा की व्यवस्था की जाए साथ ही बेघर पीड़ितों के लिए नाईट शेल्टर या सामुदायिक केन्द्रों में रहने की व्यवस्था की जाए. वहीँ साथ में द गवर्मेंट आफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी दिल्ली और ईडीएमसी को एकएक दंगा पीड़ितों की साफसफाई और उन के रहने के जगह की साफ़ सफाई के निर्देश दिए. लेकिन सवाल यह बनता है कि क्या सिर्फ राशन, सफाई और अस्थाई रहने की व्यवस्था से इन का जीवन पटरी पर लौट आएगा. आखिर यह कैसे अपने मनोस्तिथि को दोबारे से पहले जैसे पटरी पर ला पाएंगे?

इस बर्बर प्रकरण को देख कर लगता है कि सरकार और व्यवस्था के लिए यह दंगा पीड़ित जिम्मेदारी कम बोझ ज्यादा हैं. मानो व्यवस्था की सारी संवेदनशीलता मरती चली जा रही है. वह जैसे तेसे कर इन्हें अपने पल्ले से हटा लेना चाहती है. वरना इन्हें राहत कैंप से हटाने से पहले इन के लिए रहने की उचित व्यवस्था की जाती. आज जहां इन्हें सही मायनों में मनोवैज्ञानिक कंसल्टेंट की आवश्यकता थी वहां इन की जान इतनी सस्ती है कि यह भूखे रहने को मजबूर हैं.

#lockdown: पैदल चलने वाले राहगीरों ने खोली सरकारी व्यवस्था की पोल

“कोरोना वायरस” के संक्रमण से जनता को बचाने के लिए सरकार ने बड़े बड़े दावे किए. सच्चाई यह है कि गरीब वर्ग इस “लॉक डाउन” के समय सबसे अधिक परेशान हो रहा है. खाने पीने की कमी और परदेश में असुरक्षा की भावना के चलते वो बड़े शहरों से अपने गांव घर की तरफ पैदल ही पलायन करने लगी. सड़को पर देश की आजादी के समय बंटवारे की त्रासदी सा दृश्य दिखने लगा.

देश की हर सड़क पर ऐसे लोग दिख जायेगे जो पैदल एक जगह से दूसरी जगह जाते दिख जायेगे.  यह भले ही बहुत बड़े समूह में इधर से उधर ना जा रहे हो पर इनकी संख्या बहुत बड़ी है. यह सब 100-200 किलोमीटर ही नही इससे अधिक दूरी की यात्रा भी पैदल तय करने का साहस करके अपने घरों से बाहर सड़को पर निकल पड़े.

ऐसा आलम देश की जनता ने पहली बार देखा है. यह बात जरूर है कि ऐसे दृश्य फिल्मों में देखने को मिले थे जब देश के बंटवारे के समय भारत से पाकिस्तान की तरफ और पाकिस्तान से भारत की तरफ लग घर परिवार बीबी बच्चो के साथ पैदल सड़को ले रास्ते चल रहे थे. उस समय भी इनसे मारपीट और बदसलूकी की जाती थी.

आजाद भारत मे इसकी कल्पना मुश्किल थी. 22 मार्च को जब देश भर के शहरों को कॅरोना वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए “लोक डाउन” करने की घोषणा हुई तो एक बार फिर से 1947 के पलायन के दृश्य सड़को पर दिखने लगे.

शहरों के लोक डाउन होते ही एक शहर से दूसरे शहर जाने वाली सड़को को बंद कर दिया गया. बस, टैक्सी, रेल गाड़ियों का चलना बन्द कर दिया गया. ऐसे में बड़े बड़े शहरों में रह रहे लोगो मे भय और डर बैठ गया. यह लोग बड़े शहरों को छोड़ कर अपने गांव घर जाने के लिए पैदल ही निकल पड़े.

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पढ़ने वाले छात्रों की व्यथा :

सड़को पर पैदल चलने वालों में 2 तरह के लोग सबसे ज़्यादा दिखे. एक वह छात्र थे जो पढ़ने लिखने दिल्ली, नोयडा जैसे बड़े शहर में रह रहे थे. इनमे 200 से 300 किलोमीटर दूर के छात्रों की संख्या सबसे अधिक थी. यह नोयडा दिल्ली के कॉलेजों में पढ़ते थे और होस्टल की जगह पीजी होस्टल यानी किराए के कमरों में रहते थे. इनके पास खाना बनाने का कोई साधन नही होता है. यह 50 रुपये खर्च करके किसी कैंटीन में खना खाते थे. कॉलेज बन्द हो गए. तो इनको अपने घर जाने के लिए कह दिया गया. कुछ बच्चे समय से तब निकल आये जब लोक डाउन नही हुआ था. कुछ बच्चे फंस गए. ऐसे में इनको जब अपने घर आने का साधन नही मिला तो यह 2-4 के साथ पैदल ही अपने घरों के लिए निकल लिए.

नोयडा के एक कॉलेज में पढ़ने वाले 3 लड़के शिवम, प्रकाश दिनेश औऱ 2 लड़कियो रूपा और दिव्या  रुद्रपुर, बरेली और मुरादाबाद के रहने वाले थे. नोयडा के एक कॉलेज में पढ़ते थे. यह लोग अपनी पीठ पर लैपटॉप बैग लिए सड़कों के रास्ते अपने घर की दूरी तय कर रहे थे. रामपुर में इनको पुलिस ने रोका पहले तो पुलिस ने अपने अंदाज में गालियां दे कर बात की. पर जब बात पुलिस की बड़े अफसरों को पता चली तो उन लोगो ने इनको आगे घरो तक किसी तरह तक पहुचने का काम किया. इन बच्चो ने पहली बार इतना बड़ी दूरी पैदल तय की. बच्चो ने बताया कि रास्ते मे वो पुलिस से बचते बचाते चल रहे थे. पुलिस और दूसरे लोग उनकी मजबूरी समझने की जगह पर हिक़ारत की नजर से देखते थे जैसे कि करोना वायरस फैलाने के सबसे अधिक काम उन सबने ही किया था.

बेबस मजदूर :

सड़को के रास्ते पैदल अपने गांवों को जाने वालों में सबसे बड़ी संख्या दिहाड़ी मजदूरों की है. जो 5 सौ से 6 सौ किलोमीटर दूर दिल्ली जैसे शहरों में फंस गए थे. “जनता कर्फ्यू” के दिन से ही काम मिलना बंद हो गया था यह लोग अपने घर परिवार के साथ वापस अपने गाँव के लिए पैदल ही चल पड़े क्योकि कोई बस, ट्रेन या कोई अन्य साधन नही था.

इनके छोटे छोटे बच्चों ने भी अपने कंधों पर झोले लाद रखे थे. कई कई दिन पैदल चलते हुए यह अपनी दूरी तय कर रहे थे.

मीडिया में यह आने के बाद रास्ते मे पड़ने वाली कुछ जगहों पर उनको खाने पीने का सामान कुछ लोगो ने दिया . यह रास्ते मे थक जाने पर किसी पेड़ के नीचे या किसी जगह पर रुक कर सुस्ता लेते थे फिर आगे बढ़ जाते थे. इनको धीरे धीरे अपने घरों तक पहुँच जाने की उम्मीद थी.

संक्रमण रोकने के नाम पर रोक गया इनको :

बड़े शहरों से अपने गांव घर को जाने वालो को सरकार ने भेजने का काम तो किया ही नही जगह जगह पर पुलिस ने उनको रोकने का काम भी किया.

बड़े शहरों से जाने वालों को रोकने से कोई लाभ नहीं. अगर वे संक्रमण लेकर गांव भी पहुंचे तो भी जोखिम लेना सही है क्योंकि शहरों में वे बिल्कुल अकेले हैं. सरकार जोखिम से बचना चाहती है तो एक तरफा चलने वाली ट्रेनों में बिना टिकट इन लोगो को ले जाना चाहिए.

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#coronavirus: कैदियों के साथ न्याय कोरोना करेगा…?

कोरोना का कहर इस कदर गहराता जा रहा है कि दुनिया के तकरीबन 200 देश इस की चपेट में है. इस संक्रमण का दायरा भी एशिया, यूरोप से होता हुआ अफ्रीका तक पहुंच गया है. अमेरिका भी इस से अछूता नहीं रहा. वहीं यह भारत में भी अपने पैर पसार रहा है.

अमेरिका में कोरोना मरीजों की तादाद 1 लाख से ऊपर पहुंच चुकी है, वहीं चीन 81 हजार का आंकड़ा पार कर चुका है. इटली में भी 86 हजार के करीब कोरोना से संक्रमित है और  9000 से अधिक मौतें हुई हैं.

पूरी दुनिया में 6 लाख के करीब कोरोना से संक्रमित हैं और 27 हजार से अधिक मौतें. वहीं भारत में भी 800 से अधिक मरीज संक्रमित हैं और 20 से अधिक मौतें.

अमेरिका में हर रोज कोरोना संक्रमित मरीजों और मौतों का आंकड़ा डरा रहा है. एक दिन में ही कभी वहां 16 हजार नए संदिग्ध कोरोना की चपेट में आ जाते हैं तो कभी 18 हजार से अधिक. इसी तरह मौतों का सिलसिला भी कभी एक दिन में 263 तो कभी 345 या इस से अधिक. इस बीमारी के चलते न्यूयॉर्क की स्वास्थ्य सेवा बुरी तरह चरमरा गई है.वहां के आम नागरिक ही नहीं, जेलों में बंद कैदी भी इस बीमारी की चपेट में आ गए हैं. यही वजह है कि अमेरिकी कैदियों को छोड़ा जा रहा है क्योंकि वहां कोरोना वायरस अधिक फैल रहा है. वहां की जेलें कोरोना की वजह से असुरक्षित हैं.

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24 मार्च को न्यूयॉर्क सिटी के मेयर बिल डी ब्लासियो ने ऐलान किया कि उन्हें रिहा करने का अधिकार है. कोरोना वायरस अधिक फैलने के चलते 1000 से अधिक चुनिंदा कैदियों को वे रिहा करेंगे. उन्होंने कहा कि शहर में 5000 से अधिक कैदियों को रखा गया है जो ज्यादातर रिकर्स में रखे गए हैं.

उन्होंने कहा कि अनुमानित 300 रिकर्स द्वीप कैदियों को वे जल्द रिहा  करेंगे. यदि उन  की सेवा में एक वर्ष से कम का समय बचा है.

जेल के नियमों के तहत ही कैदियों को रिहा किया जाएगा. न्यूयॉर्क सिटी के मेयर बिल डी ब्लासियो सब से पहले 70 साल से अधिक उम्र के कैदियों को  रिहा करना चाहते हैं. वहीं जिन कैदियों की 5 स्वास्थ्य के प्रति ऐसी स्थितियां हैं, जो उन्हें कमजोर बनाती हैं यानी उन की सेहत इस बीमारी की जद में आ सकती हैं, को भी जल्द रिहा करना चाहते हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि घरेलू हिंसा या यौन आरोप जैसे हिंसक कैदियों को रिहा नहीं किया जाएगा क्योंकि इन से शहर में माहौल बिगड़ने का खतरा है.

वहीं लॉस एंजिलिस और क्लीवलैंड में भी सैकड़ों कैदियों को मुक्त कर दिया गया है.

दूसरी ओर अमेरिका ने ईरान से भी आग्रह किया है कि वह अमेरिकी कैदियों को जल्द छोड़ दे. ईरान भी इस घातक वायरस की चपेट में हैं. ईरानी जेलों में भी कोरोना वायरस फैल चुका है.

कोरोना वायरस के प्रकोप का सामना करने के लिए ईरान ने अपने विशिष्ट बल रिवोल्यूशनरी गार्डों को मैदान में उतारा है. वहां भी बीते दिनों में 70 हजार से अधिक कैदियों को अस्थायी तौर पर रिहा कर दिया गया, लेकिन यह नहीं बताया कि इन कैदियों की वापसी कब होगी.

पाकिस्तान भी कैदियों को छोड़ने का मन बना रहा है, वहीं भारत भी ऐसे कैदियों को पैरोल पर छोड़ने की योजना बना रहा है, जो बूढ़े हैं या जिन की सजा 7 साल या उस से कम है.

हालांकि भारत में अभी कैदियों में कोरोना के लक्षण नहीं पाए गए हैं, परंतु इस महामारी की गंभीरता को देखते हुए कैदियों की रिहाई पर विचार किया जा रहा है.

शीर्ष अदालत के चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने कहा कि सरकार ने वायरस को फैलने से रोकने के लिए सामाजिक तौर पर दूरी रखने की सलाह दी है. लेकिन जेलों में क्षमता से अधिक कैदी हैं, जिस से दूरी बनाए रखना मुश्किल है.

महाराष्ट्र में भी कोरोना मरीजों की तादाद दिनोंदिन बढ़ रही है. जेलों में  कोरोना वायरस न पसरे, इस के लिए महाराष्ट्र सरकार राज्य की 60 जेलों में बंद तकरीबन 11,000 कैदी, जिन्हें 7 साल या उस से कम की सजा मिली हुई है, उन्हें पैरोल पर रिहा करने पर विचार कर रही है, वहीं पंजाब सरकार भी 6,000 कैदियों को पैरोल पर छोड़ने का मन बना रही है.

हालांकि वे कैदी रिहा नहीं किए जाएंगे, जिस से शहर का माहौल बिगड़ने की आशंका है.

वैसे भी पंजाब की जेलों में बंद कैदियों में ज्यादातर नशेड़ी हैं, जिन्हें नशीले पदार्थों के साथ पकड़े जाने के चलते सजा हुई है. नशे के आदी लोग शारीरिक तौर पर बहुत कमजोर होते हैं. साथ ही, इन्हें बीमारी भी जल्दी घेर लेती है.

वहीं दिल्ली में स्थित तिहाड़ जेल प्रशासन भी करीब 3,000 कैदियों को छोड़े जाने पर विचार कर रहा है और हरियाणा सरकार भी जेल में बंद कैदियों को पैरोल पर भेजने का मन बना रही है. जो कैदी अभी पैरोल या फरलो पर हैं, उन का समय बढ़ाने पर सोच रही है.

हालांकि इन में से ज्यादातर कैदियों को सजा भी नहीं हुई है. भले ही यह फैसला महीनों पहले लिया गया है, पर इस का अभी कोई सबूत नहीं है.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि कैदियों को छोड़ने की आखिर मंशा क्या है? क्या वाकई इन कैदियों को इसलिए छोड़ा जा रहा है कि इन कैदियों का न्याय कोरोना करेगा?

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जैसे अमेरिका ने अपनी जिम्मेदारी से किनारा करते हुए, सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए कैदियों को कोरोना से बचने के लिए हिदायत दे कर उन्हें उन के हाल पर छोड दिया, वहीं इन कैदियों में भी कोरोना को लेकर असुरक्षा है .

अमेरिका ने तो अपने कैदियों को इसलिए छोड़ा क्योंकि उन जेलों में कोरोना वायरस फैल चुका था. पर

कैदियों को उन के हाल पर छोड़ना, यह कहां का न्याय है, कहीं यह कोरोना न्याय तो नहीं.

#coronavirus: खाने से अपनी इम्युनिटी बढ़ाएं बुज़ुर्ग

कोरोना वायरस बच्चों और 60 साल से अधिक उम्र के लोगों को पकड़ रहा है क्योंकि शरीर की इम्यूनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण इनका शरीर संक्रमण से फाइट नहीं कर पाता और संक्रमण उनके शरीर को जल्दी जकड लेता है। साठ के उम्र पार करने के बाद पाचन तंत्र बहुत धीमा हो जाता है, इस कारण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो जाती है. इम्युनिटी बढ़ाने के लिए अगर कुछ ख़ास खाद्य पदार्थ भोजन में शामिल कर लिए जाएँ तो कोरोना जैसे संक्रमण को शरीर पर हावी होने से रोका जा सकता है.

खूब फल खाएं
साठ साल की उम्र के बाद पाचन क्षमता कमजोर पड़ने लगती है.पेट अनाज आदि को ठीक से डाइजेस्ट नहीं कर पाता. इस बात को ध्यान में रखते हुए बुजुर्गों को फलों का सेवन सबसे अधिक करना चाहिए.फल आसानी से पचने वाले होते हैं. इम्युनिटी बढ़ाने वाले फलों में स्ट्रॉबेरी, ब्लू बेरीज और चेरीज खास हैं। ये सभी ऐंटिऑक्सीडेंट्स से भरपूर होती हैं। विटमिन-सी इनमें अच्छी मात्रा में होता है और इनकी ऐंटिइंफ्लामेट्री क्वालिटी वायरल, हर्ट डिजीज और हाई बीपी से भी सुरक्षा प्रदान करती है.

सब्ज़ियां जो बढ़ाएं इम्युनिटी
ब्रोकली, शिमला मिर्च, टमाटर, मशरूम और ब्रूसेल्स स्प्राउट्स (एक तरह की पत्ता गोभी) का सेवन इस वक़्त बढ़ा दें क्योंकि इन सभी सब्जियों में पाए जानेवाले पोषक तत्व 60 साल और इससे अधिक उम्र में होनेवाली शरीर की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करते हैं. ये सब्जियां फाइबर से भरपूर होती हैं, इस कारण इनका पाचन आसान होता है और कब्ज की समस्या नहीं होती. ये सभी सब्ज़ियां रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाती हैं.

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कुछ ख़ास अनाज खाएं
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए अधिक उम्र के लोगो को कुछ ख़ास दालों और अनाज का उपयोग करना चाहिए जो प्राकृतिक तौर पर हल्की और सुपाच्य होती हैं. जैसे मूंग की दाल, मूंग-मसूर की मिश्रित दाल, उड़द की छिलका दाल और मूंग धुली दाल. साथ ही बाजरा, ओट्स और खिचड़ी। ये सभी चीजें संपूर्ण सेहत को मजबूत बनाती हैं और इम्युनिटी पावर बढ़ाती हैं.

दलिया है सबसे बेस्ट
गेहूं का महीन कुटा और भुना दलिया बहुत अधिक सुपाच्य होता है. यानी इसे पचाने में डायजेस्टिव सिस्टम पर प्रेशर नहीं पड़ता और फाइबर से भरपूर होने के कारण यह पेट को साफ रखने में भी मदद करता है.इसलिए बड़ी उम्र के लोगों के लिए यह एक अच्छा भोजन है. इसे नाश्ते में या डिनर में आराम से लिया जा सकता है.ये शरीर की ताकत को बढ़ाता है। दूध के साथ इसको बनाएं और खाएं.

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अलसी के बीज, हल्दी और मुलेठी
ये तीनो ऐसी चीजे हैं जो शरीर की गर्माहट को तो बरकरार रखती ही हैं, जीवाणुओं-विषाणुओं को भी मार भगाती हैं. असली के बीज में ओमेगा-3 फैटी एसिड पाया जाता है. यह हमारी बॉडी में श्वेत रक्त कोशिकाएं बढ़ाने और उन्हें हेल्दी बनाने में मदद करता है.श्वेत रक्त कणिकाएं ही हमारे शरीर में पहुंचे वायरस को खत्म करने का काम करती हैं. साथ ही ब्रेन को हेल्थी रखने में भी ओमेगा-3 फैटी एसिड मदद करता है.

वहीँ खांसी और फ्लू जैसे लक्षणों में हल्दी का सेवन बहुत अधिक लाभकारी होता है. क्योंकि हल्दी शरीर में किसी भी तरह के बैक्टीरिया और वायरस को नहीं पनपने देती.अगर मौसम के अनुसार और सही मात्रा में नियमित रूप से हल्दी का सेवन किया जाए तो डायबीटीज, ऑर्थराटिस और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों से भी जीवनभर बचा जा सकता है. इसी के साथ मुलेठी का सेवन भी कोरोना जैसे वायरस से लड़ने में कारगर है. मुलेठी प्राकृतिक रूप से कफ विरोधी गुणों से भरपूर होती है.यह शरीर में वायरस और बैक्टीरिया को पनपने से रोकती है क्योंकि इसमें ऐंटिऑक्सीडेंट और ऐंटिइंफ्लामेट्री प्रॉपर्टीज होती हैं.सामान्य सर्दी-जुकाम और गीली खांसी में मुलेठी का सेवन लाभदायक रहता है. यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाती है.

#coronavirus: सोशल डिस्टेंसिंग ने बूस्टर शॉट दिया

कोरोना की महामारी से दहशत का माहौल है. इस खतरनाक वायरस से निपटने के लिए दुनिया की करीब एक तिहाई आबादी अपने घरों में कैद हो चुकी है.अभी तक इस बीमारी का कोई पक्का इलाज नहीं मिल पाया है. मगर इस बीच नोबेल पुरस्कार विजेता माइकल लेविट की एक भविष्यवाणी लोगों को कुछ राहत दे सकती है.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के बायोफिजिसिस्ट और नोबेल पुरस्कार विजेता माइकल लेविट ने कहा है कि सोशल डिस्टेंसिंग ने दुनिया को एक बूस्टर शॉट दिया है जो इस समय महामारी से लड़ने के लिए जरूरी है.इसलिए कोविड-19 का कहर जल्द ही खत्म हो जाएगा.मरने वालों की संख्या में वृद्धि की दर अगले सप्ताह और भी धीमी हो जाएगी.

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रसायन विज्ञान में 2013 का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले लेविट ने इससे पहले चीन में महामारी के बारे में भविष्यवाणी की थी.उन्होंने कहा था कि चीन में यह महामारी विनाशकारी प्रकोप लेकर आएगी.माइकल ने कई अन्य विशेषज्ञों से पहले ही इसकी भविष्यवाणी की थी.माइकल लेविट वही हैं, जिन्होंने भविष्यावाणी की थी कि चीन में कोरोना से सवा तीन हजार लोग मरेंगे.

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माइकल लेविट ने ‘द लॉस एंजिल्स टाइम्स’ को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि हमें कोरोना के बढ़ते प्रकोप को रोकने के लिए जो करना चाहिए, वो हम कर रहे हैं। हम सब ठीक होने जा रहे हैं. अब परिस्थिति उतनी भयावह नहीं है, जितना कि चेताया जा रहा है.भले ही कोरोना के बढ़ते मामलों की संख्या परेशान करने वाली है, मगर धीमी वृद्धि से इस बात के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग के कारण इस वायरस को बढ़ने और फैलने का रास्ता नहीं मिल रहा है. गौरतलब है कि कोरोना वायरस से दुनियाभर में अब तक साढ़े चार लाख से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और करीब 17 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.

नीलाम होते गांव: भाग 3

लेखक-श्री धरण सिंह

एक शाम जब विश्वासनाथ आरामकुरसी में सुस्ता रहे थे, तभी पास बैठी सौदामिनी बोल उठी, ‘देखिए जी, अब मकान बन गया है. दोनों बच्चों की शादी भी हो गई है. नरेन कहता है कि वह अभी ब्याह नहीं करेगा. वह व्यापार करना चाहता है.’

‘व्यापार? माने किस चीज का व्यापार?’ विश्वास दा ने पूछा.

‘वह ड्राइविंग सीख रहा है न. उसे सैलानियों को घुमाने के लिए टूरिस्ट गाड़ी चाहिए. वह कहता है कि 5 लाख रुपए तो चाहिए ही होंगे.’

‘हूं,’ उन्होंने सिर हिलाया.

‘तो क्यों न बचे हुए रुपए हम बच्चों में बांट दें. इतने रुपयों का हम क्या करेंगे. पता नहीं, कब ऊपर से बुलावा आ जाए,’ उस ने एक लंबी सांस खींची. तभी खांसी का एक दौरा उठा जो उसे निढाल कर गया.

‘ऐसे नहीं बोलो सौदामिनी, चलो, भीतर जा कर लेट जाओ,’ विश्वास दा ने कहा. तभी बहू ने मांजी की अलमारी से ‘इन्हेलर’ मशीन ला कर दी जो सौदामिनी के शहर के एक डाक्टर ने दी थी. थोड़ी दवा लेने के बाद वह अब पलंग पर लेट गई थी.

अगले सप्ताह पत्नी के कहने पर हीरेन, नरेन के अकाउंट खुलवा कर विश्वासनाथ ने 30 लाख रुपए हर एक के खाते में डलवा दिए. दामाद को भी 30 लाख रुपए नकदी देने का फैसला किया गया.

बड़े बेटे की बहू चूंकि शहर की थी, उस ने धीरेधीरे हीरेन को शहर जाने के लिए मना लिया था. दोनों ने शहर जा कर एक नया बनाबनाया मकान ले लिया था. छोटे बेटे नरेन ने 2 टूरिस्ट गाडि़यां और्डर दे कर मंगवा ली थीं, जो देशीविदेशी टूरिस्टों को पूरे हैवलौक द्वीप में घुमाती थीं. गाडि़यों से अच्छी आय होने लगी थी. लेकिन सैलानियों को घुमातेघुमाते उस की आदतें अब कुछ बिगड़ने लगी थीं.

कुछ यारदोस्तों की संगति में उसे शराब की बुरी लत लग गई थी. कुछ विदेशी लोग भी उसे शराब की बोतलें बतौर तोहफे दे जाते थे.

इस बीच, अभिलाष को बेंगलुरु में होटल मैनेजमैंट की पढ़ाई के लिए सीट मिल गई थी. कृष्णानगर में सब्जियों की पैदावार से उन्हें कोई अच्छी आय नहीं हो रही थी. उस के पिता ने उस की पढ़ाई के खर्चे के लिए विश्वासनाथ से कुछ रुपए मांगे थे. सौदामिनी के मन में भी उस लड़के के लिए जगह थी. उस ने ही तो उन्हें ये दिन दिखलाए थे. सौदामिनी की सहमति से विश्वासनाथ ने उसे 3 लाख रुपए दिए थे. अभिलाष सब का सहयोग पा कर अपनी पढ़ाई करने चला गया इस बीच, होली के एक दिन राधानगर सागरतट से नरेन अपनी मोटरसाइकिल से दोस्तों की टोलियों के साथ वापस लौट रहा था. उस की मोटरसाइकिल एक पेड़ से टकरा कर दुर्घटनाग्रस्त हो गई. दुर्घटनास्थल पर ही नरेन की मृत्यु हो गई. दोस्त उस के शव को घर लाए. सौदामिनी ने ज्यों ही अपने मृत बेटे का शव देखा, दहाड़ मार कर रोने लगी. विश्वासनाथ का भी बुरा हाल था. शव को शाम तक घर में रखा गया. शाम तक सभी रिश्तेदार पहुंच गए थे. विजयनगर के समुद्रतट के पास उस के शव का अंतिम संस्कार किया गया.

नरेन की मृत्यु के बाद सौदामिनी की तबीयत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी. विश्वासनाथ उसे शहर के डाक्टर को दिखाने ले गए. हीरेन भी साथ था. डाक्टर ने विश्वासनाथ को अलग से बताया कि मांजी को फेफड़ों का रोग है. विश्वासनाथ के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई. डाक्टर ने कुछ महंगी दवाएं दीं. दवा ले कर वे लौट आए. अब बहू अनुराधा अपनी सासू मां को ज्यादा कामकाज न करने देती थी. वह उन का खयाल रखती थी. मांजी का खानापीना, दवा, बिस्तर, सब सही ढंग से करती थी. जैसे फिर उसे यह मौका मिले, न मिले. सौदामिनी को जबतब खांसी का दौरा पड़ता रहता.

दिसंबर के उमस भरे दिन आ गए थे और रातें थीं कि कड़ाकेदार ठंडी. सौदामिनी की सेहत इन्हीं दिनों डांवांडोल होने लगी. एक रात अचानक उस को जोर की खांसी उठी. सांसें उल्टी चलने लगीं. और पलभर में उस की सांसें रुक गई थीं. उस रात सभी उस के पास थे. ‘हम को अकेला छोड़ कर चली गई रे, अब मैं कैसे जिऊंगा…’ विश्वासनाथ पत्नी को सीने में समेट कर रोने लगे. पता नहीं नियति ने वश्वासनाथ के साथ कैसी लीला रची है, पहले बेटा गया अब पत्नी. दीपशिखा और जमाई को फोन द्वारा सूचित कर दिया गया. गांव के लोग भी आ जुटे थे.

दोपहर के बाद दीपशिखा और दामाद आ गए थे. दीपशिखा के ब्याह को अभी बरसभर ही तो हुआ था, अपनी मां के शव पर वह दहाड़ मार कर रो रही थी. शाम होतेहोते उसी जगह, जहां पर 10 महीने पहले बेटे के शव को जलाया गया था, बड़े बेटे हीरेन ने अपनी मां को वहीं विदाई दी. अब किसी को भी उस गांव में अच्छा नहीं लग रहा था, जैसे कोई शापित गांव हो. 1 महीने के बाद हीरेन और बहू अनुराधा ने बाबूजी को पोर्टब्लेयर शहर आने को कहा, जहां पर उन्होंने मकान ले लिया था. दीपशिखा और जमाई ने भी उन्हें न्योता दिया था उन के साथ आ कर रहने के लिए. विश्वासनाथ ने उन से माफी मांगी और कहा, ‘बच्चो, इसी गांव में हमारी जिंदगी बदली. यहीं हम ने सबकुछ पाया और यहीं हम ने अपना सबकुछ खोया. मेरे बेटे की यादें यहीं बसी हैं. तुम्हारी मां की यादें भी इस जगह बसी हुई हैं. हम कहीं नहीं जाएंगे, बेटे,’ फिर लक्ष्मण से कहा, ‘भाई, तेरे लिए मैं कुछ नहीं कर सका.’

‘नहीं दादा, मैं कुछ नहीं चाहता. बस, आप के साथ रहना चाहता हूं,’ कहते हुए वह रोने लगा.

इतने बड़े मकान में विश्वासनाथ कैसे अकेले रह सकते थे. सो, बहूबेटे, दामाद के कहने पर उन्होंने वह मकान भी बेच दिया. किसी रिसोर्ट के मालिक ने उसे खरीद लिया जहां गोताखोरी की ट्रेनिंग का केंद्र बनाया गया. वहां से सागर तट बहुत नजदीक पड़ता था. इस से मिली रकम को बड़े बेटे और बेटी के नाम बैंक में उन्होंने डलवा दिए. लक्ष्मण को भी उस ने जेटी में एक बढि़या ढाबा खुलवा दिया. वह अब अपना जीवन सुधार ही लेगा, इस विश्वास से. हीरेन ने आखिरी बार अपने बापू को अपने साथ चलने को कहा था लेकिन उन की प्रतिज्ञा को अब कोई भी तोड़ नहीं सकता था. एक वह दिन था, एक यह दिन है. यही है वह अभिलाष जो रिसोर्ट का मैनेजर बन गया है, जिस पर विश्वासनाथ के कितने एहसान हैं. अभिलाष ही उस के एकाकी दिनों में उन का अभयदाता बना हुआ है.

फरवरी महीने का एक सुहाना दिन था. हर दिन की तरह विश्वासनाथ होटल के लौन में फूलों के पौधों को सींच रहे थे. वे अलबत्ता कुछ खांस भी रहे थे, ‘‘दादा, मैं जरा इन्हें राधानगर बीच दिखा लाऊं,’’ यह अभिलाष की आवाज थी.

दादा ने घूम कर देखा, एक युवा जोड़ा सामने खड़ा था.

‘‘बेटा, शाम तक आ जाओगे न?’’ दादा ने पूछा.

‘‘हां, हां, जल्दी आ जाऊंगा,’’ अभिलाष ने कहा.

वे अब जीप में बैठ चुके थे. वास्तव में अभिलाष ने ही उन दोनों को ‘हैवलौक’ देखने के लिए न्योता दिया था. युवक का नाम समीर था. बेंगलुरु में कालेज के दिनों में उन की दोस्ती हुई थी. साथ में उस की पत्नी नेहा थी.

शाम 6 बजे तक वे होटल लौट आए थे. तभी अभिलाष से किसी ने कहा कि विश्वासनाथ की तबीयत कुछ ठीक नहीं है. उन्हें चक्कर आए हैं और शारीरिक कमजोरी भी है. अभिलाष तुरंत उन के आउटहाउस वाले कमरे में पहुंचा. उस ने देखा, दादा एकदम निढाल पड़े हैं. उस ने सोचा कि मित्रों को ले कर वह राधानगर गया ही क्यों. पर अब क्या किया जाए, तुरंत उस ने गांव के डाक्टर को दिखाने का फैसला किया. उस ने होटल के ड्राइवर को शीघ्र बुलवाया. गाड़ी निकाली और डाक्टर को दिखला लाया. डाक्टर ने जांच कर बताया कि उन्हें बेहद कमजोरी थी, रक्तचाप भी बढ़ चुका था. डाक्टर ने उन्हें शहर ले जाने के लिए कहा, साथ ही ताकत की कुछ दवा दे दी थी. विश्वासनाथ को कुछ खाने का मन ही नहीं था. अभिलाष के कहने पर बड़ी मुश्किल से उन्होंने 2 निवाले पेट में डाले. अभिलाष ने उन्हें डाक्टर की दी हुई गोली खिलाई. उन्होंने तुरंत अभिलाष के हाथों को अपने बूढ़े हाथों में लिया. आंसू का एक गरम कतरा अभिलाष के हाथों पर गिर पड़ा.

‘‘दादा, आप फिक्र न करें. मैं हूं न. सुबह हम शहर चलेंगे. आप आराम कीजिए, ठीक है?’’ अभिलाष ने उन्हें सांत्वना दी. उस ने दादा को चादर ओढ़ा दी और कमरे से बाहर चला गया.

वह रात अभिलाष पर भारी गुजरी. अगली सुबह जागते ही वह विश्वासनाथ के कमरे की ओर बढ़ा. ज्यों ही कमरे में पहुंचा, वह अवाक् रह गया. बिस्तर पर विश्वासनाथ का सिर एक ओर लुढ़का हुआ था. उन के शरीर को हाथों से हिलाया, ‘‘दादा, दादा, उठिए, शहर नहीं जाना है क्या?’’ अभिलाष ने जोर से पुकारा, पर वे कहां उठते.

तभी उस ने बाहर जा कर होटल के एक कारिंदे को बुलाया जिस ने आ कर अपनी हथेली उन की नाक पर रखी. उन के प्राण पखेरू उड़ चुके थे. कारिंदे ने उन की पलकों को बंद किया फिर उन के शरीर को पलंग पर सीधे लिटा दिया और अभिलाष को इशारे से बताया.

अभिलाष के आंसू निकल आए. वह सिसकसिसक कर रोने लगा जैसे वह उन का सगा बेटा हो. होटल में हड़बड़ी मच गई. सभी कर्मचारी और अन्य लोग आ जुटे. समीर और नेहा भी आ गए. वे रोते हुए अभिलाष को ढाढ़स देने लगे. एक घंटे बाद विश्वासनाथ का भाई लक्ष्मण भी जेटी से आ पहुंचा. अपने भैया के सिरहाने बैठ कर वह फूटफूट कर रोने लगा. किसी तरह से सब लोगों को खबर दी गई. शाम होने से पहले शव का क्रियाकर्म किया जाना था. सभी आखिरी स्टीमर के आने तक राह देखते रहे, शायद शहर से बेटा आ जाए या दूर द्वीप से जंवाई बेटी आ जाएं. पर तब तक कोई नहीं पहुंच पाया, पता नहीं क्यों.

तब लक्ष्मण ने अभिलाष से कहा, ‘‘अब हम प्रतीक्षा नहीं कर सकते.’’

कभी करोड़पति रहे विश्वासनाथ का पूरे हैवलौक में कहां ठिकाना था. अभिलाष ने सारा इंतजाम कर लिया था. शव को राधानगर ले जाया गया. सागरतट से दूर बादाम और महुए के पेड़ों के झुरमुट में एक खाली जगह पर उन के शव को ले जाया गया. शव जलाने की लकडि़यां रखी थीं. उन का छोटा भाई लक्ष्मण के चेहरे पर अकथनीय दुख की छाया थी. अभिलाष भी लक्ष्मण की तरह धोती पहने शव के पास खड़ा था चेहरे पर कर्तव्यनिष्ठ भाव लिए. हैवलौक के पश्चिमी किनारे पर सूर्य डूब रहा था पर आज के सूर्य की 0किरणें सिंदूरी आभा लिए नहीं थीं, उन का रंग शायद खूनी लाल था. लक्ष्मण जैसा छोटा भाई शायद कहीं भी न हो, अभिलाष जैसा बेटा इस युग में ढूंढ़े से भी न मिले पर विश्वासनाथ जैसे विस्थापित जिंदगी जीने वाले और भी होंगे, शायद.

 

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