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सिंगल पेरैंट डेटिंग टिप्स

सिंगल पेरैंट डेटिंग टिप्स  पिछले रिश्ते से निकलने के बाद कुछ समय इंतजार करें. आप को अकेलापन महसूस हो सकता है, पर नए रिश्ते में जल्दबाजी न करें. आप एक असफल रिश्ते से बाहर आए हैं. सो, यह मनन जरूर करें कि कहां क्या गलत हुआ, आप का इस में कितना योगदान था. वरना आप ये इश्यूज नए रिश्ते में भी ले कर चल सकते हैं. और आप के सामने फिर वही स्थिति आ सकती है और फिर तनाव ?झेलना पड़ सकता है

यदि आप में आत्मविश्वास की कमी हो तो किसी थेरैपिस्ट से मिलने में कोई बुराई नहीं. द्य यह स्वीकार कर लें कि आप की फैमिली लाइफ पर डेटिंग के बाद असर पड़ेगा. कोई अपराधबोध न पालें. आप के जीवन में इस से खुशी आ सकती है, तो जरूर आगे बढ़ें. द्य अच्छी तरह सोच लें कि आप को नए पार्टनर से क्या चाहिए. देख लें कि उस में कितना पेशंस है, क्योंकि आप सिंगल पेरैंट हैं. आप को अपने बच्चे के साथ उस का व्यवहार कैसा है, यह भी देखना होगा.  बच्चा आप की डेटिंग पर क्या रिऐक्शन देगा,

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यह चिंता स्वाभाविक है. पर यह डर अपने ऊपर हावी न होने दें. बच्चों से बात करते रहिए, इसे राज बना कर न रखें. उन्हें उन के मन की बात कहने दें. आप के बच्चे यंग हैं, तो उन्हें आराम से सम?ाइए कि डेटिंग है क्या. उन्हें बताएं कि एडल्ट्स के लिए आपस में मिलना, दोस्त बनना नैचुरल है.

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फर्स्ट डेट पर आप को अपने जीवन की पूरी स्टोरी सुनाने की जरूरत नहीं है. पर यदि आप मां या पिता हैं, तो जल्दी से जल्दी बता दें. आप का पार्टनर सही होगा, तो वह आप की हर भावना का सम्मान करेगा. द्य हो सकता है बच्चा आप के नए पार्टनर को तुरंत स्वीकार न करे. उसे कुछ समय दें. पार्टनर को भी बच्चे का व्यवहार बताएं कि उसे क्या पसंद है, क्या नहीं.

 

 

 

सिर्फ मोबाइल ही नहीं दूसरी डिवाइस भी हैं सेहत के लिए खतरनाक

शोधकर्ताओं का मानना है कि सिर्फ मोबाइल ही नहीं बल्कि स्मार्टफोन की ही तरह के दूसरे डिवाइस भी इसी तरह का असर दे रहे हैं. ये मानव स्वरूप को बदल रहे हैं. शोधकर्ताओं का दावा है कि टैक्नोलौजी के मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव की यह अपनी तरह की पहली रिसर्च है.

बच्चे भी हो रहे हैं शिकार

साल 2018 में दूसरे पेपर में 4 टीनएजर्स की केस स्टडी को सामने रखा गया था जिन के सिर पर सींग उग आए थे. शोधकर्ताओं ने दावा किया कि इन बच्चों के सिर पर जो सींग आए हैं वे गरदन के दबाव के कारण हैं. उन्हें शोधकर्ताओं ने आनुवंशिक मानने से इनकार कर दिया.

इससे पहले प्रकाशित की गई शोध रिपोर्ट में 18 साल से ले कर 86 साल तक के 1,200 लोगों के एक्सरे को शामिल किया गया जिस में शोधकर्ताओं ने पाया कि 33 फीसदी लोगों में सींग जैसी हड्डी विकसित हो गई थी.

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अगर आप भी मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसे समय और जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करें और इन बातों का ध्यान रखें…

  1. रात को सोते वक्त मोबाइल को खुद से दूर रखें.
  2. जहां तक हो सके बच्चों को मोबाइल से दूर रखें, क्योंकि बच्चों में इस के दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे हैं.
  3. बच्चे के शारीरिक विकास में रुकावट, मोटापा, याद्दाश्त में कमी, मानसिक विकार, चिड़चिड़ापन, आक्रामक होना, आंखों पर बुरा असर, यहां तक कि कैंसर आदि तमाम लक्षण बच्चों में देखने को मिल रहे हैं.
  4. सिर्फ बच्चे ही नहीं, बड़े भी मोबाइल के ज्यादा इस्तेमाल से कई बीमारियों से घिर रहे हैं. कई शोध कहते हैं कि फोन से निकलने वाला रेडिएशन शरीर पर नकारात्मक असर डालता है.
  5. 2013 का शोध कहता है कि फोन के प्रयोग से रक्तचाप बढ़ जाता है. ऐसे में दिल को कई बीमारियां घेर लेती हैं.

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  1. फोन की एल्कोट्रोमैग्रेट किरणें कई खतरों को बुलावा देती हैं.
  2. बहुत देर तक फोन पर बात करना खतरनाक हो सकता है. यह सुनने की क्षमता पर सीधे असर डालता है.
  3. अगर आप अपने फोन को खुद से चिपका कर सोते हैं तो नपुंसकता का भी खतरा बन सकता है.
  4. शोधकर्ताओं ने चेताया है कि पैंट की जेब में स्मार्टफोन रखने से पुरुषों में न सिर्फ शुक्राणुओं की कमी होती है, बल्कि अंडाणुओं को निषेचित करने की उन की क्षमता भी कमजोर पड़ने लगती है.

बेसमेंट में छिपा राज : भाग 1

कभीकभी अपनी इज्जत की खातिर इंसान अविवेक में ऐसा खतरनाक कदम उठा लेता है, जिस के लिए उसे पूरी उम्र पछताना पड़ता है. कानून की पढ़ाई करने वाले छात्र पंकज कुमार सिंह की हत्या के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ.

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के थाना चितबड़ा के अंतर्गत फिरोजपुर गांव के रहने वाले नरेंद्र कुमार सिंह पेशे से डाक्टर हैं.  नरेंद्र सिंह चितबड़ा में ही अपना क्लिनिक चलाते हैं. उन के परिवार में उन की पत्नी आशा सिंह के अलावा 3 बेटे हैं.

सब से बड़े बेटे मनीष कुमार सिंह ने ग्रैजुएशन की और वह दिल्ली आ गया. दिल्ली आ कर मनीष ने ट्रांसपोर्ट का काम शुरू कर दिया. वह टैक्सियां किराए पर चलवाने लगा. मनीष शादीशुदा है. मंझला बेटा पंकज 4 साल पहले गाजियाबाद आया और यहां जीटी रोड पर स्थित इंस्टीट्यूट औफ मैनेजमेंट एजुकेशन में एलएलबी में दाखिला ले लिया.

पंकज का एक छोटा भाई भी है, जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद बंगलुरु की एक निजी कंपनी में नौकरी कर रहा है. नरेंद्र सिंह की जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन इस साल अक्तूबर महीने में अचानक ही उन की जिंदगी में भूचाल आ गया.

10 अक्तूबर, 2019 की सुबह करीब 10 बजे का वक्त था. पंकज का भाई मनीष साहिबाबाद थाने पहुंचा. उस वक्त ड्यूटी औफिसर के रूप में एसआई जितेंद्र कुमार मौजूद थे. मनीष ने उन्हें बताया कि उस का छोटा भाई पंकज गिरधर एनक्लेव स्थित नवीन त्यागी के मकान नंबर 109 में किराए पर रहता है. वह 9 अक्तूबर की सुबह करीब 10 बजे से लापता है.

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मनीष ने एसआई जितेंद्र कुमार को बताया कि 8 अक्तूबर की शाम को उस की पंकज से फोन पर बात हुई थी, तब तक वह ठीक था. अगले दिन यानी 9 अक्तूबर को जब उस ने पंकज को दोपहर 12 बजे फोन किया तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला.

मनीष ने बताया कि उस ने सोचा या तो पंकज के फोन की बैटरी खत्म हो गई होगी या वह क्लास में होगा. यही सोच कर उस ने ज्यादा परवाह नहीं की. लेकिन दोपहर बाद जब 3 बजे से रात 8 बजे तक कई बार फोन करने पर भी पंकज का फोन स्विच्ड औफ मिला तो उसे घबराहट होने लगी.

मनीष ने बताया कि पंकज नवीन त्यागी के जिस फ्लैट में रहता था, उस में उस का एक रूम पार्टनर संजय भी था. संजय भी पंकज के साथ इंस्टीट्यूट औफ मैनेजमेंट एजुकेशन से एलएलबी की पढ़ाई कर रहा था. उस ने संजय से अपने भाई पंकज के बारे में पूछा कि वह कहां है और उस का फोन क्यों नहीं लग रहा?

तब संजय ने बताया कि पंकज 9 अक्तूबर की सुबह करीब पौने 10 बजे उस से यह कह कर फ्लैट से निकला था कि वह अपने साइबर कैफे जा रहा है. दोपहर में जब वह कालेज के लिए निकले तो उसे वहीं पर मिले. पंकज ने एक साइबर कैफे भी खोल रखा था. संजय ने बताया कि जब वह साढ़े 12 बजे साइबर कैफे पहुंचा तो वहां ताला लटका हुआ मिला.

संजय को आसपड़ोस के लोगों ने बताया कि आज तो कैफे खुला ही नहीं.

संजय को समझ नहीं आया कि दुकान खोलने के लिए आया पंकज उसे बिना बताए कहां चला गया. यही जानने के लिए उस ने पंकज को फोन किया तो उस का मोबाइल स्विच्ड औफ मिला.

चूंकि संजय को कालेज पहुंचना था इसलिए उस ने उस वक्त यही सोचा कि शायद पंकज को कोई मिल गया होगा और वह उसे बिना बताए कहीं चला गया होगा. यह सोच कर वह कालेज चला गया.

शाम को 5 बजे वह जब कालेज से लौटा तो उस ने पाया कि पंकज का साइबर कैफे तब भी बंद था.

फ्लैट पर पहुंचने के बाद संजय ने खाना बनाया और पंकज का इंतजार करने लगा. इस दौरान उस ने कई बार पंकज के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन हर बार मोबाइल स्विच्ड औफ मिला.

अब संजय को भी पंकज की चिंता होने लगी थी. वह सोच ही रहा था कि क्या करे, इसी बीच पंकज के भाई मनीष का फोन आ गया तो उस ने सारी बात मनीष को बता दी. क्योंकि रात हो चुकी थी. इसलिए मनीष को यह नहीं सूझा कि वह क्या करे.

मनीष ने रात में ही पंकज के लापता होने की बात अपने पिता डा. नरेंद्र कुमार सिंह को बताई तो वे भी चिंतित हो उठे. पिता ने अनिष्ट की आशंका जताते हुए मनीष से अगली सुबह थाने जा कर इस संबंध में रिपोर्ट दर्ज कराने को कहा.

इस के बाद अगली सुबह यानी 10 अक्तूबर को मनीष थाना साहिबाबाद पहुंचा और ड्यूटी पर तैनात एसआई जितेंद्र कुमार को अपने भाई पंकज के लापता होने की सारी बात विस्तार से बता दी.

इस के बाद मनीष की तहरीर पर पुलिस ने भादंसं की धारा 365 के अंतर्गत अज्ञात अपराधियों के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत कर लिया.

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साहिबाबाद थाने के थानाप्रभारी जे.के. सिंह के निर्देश पर एसआई जितेंद्र कुमार ने ही जांच का काम शुरू कर दिया.

अपहरण के ऐसे मामलों में पुलिस अकसर पीडि़त के मोबाइल फोन की काल डिटेल से ही उस तक पहुंचने का प्रयास करती है. एसआई जितेंद्र कुमार ने पंकज के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा ली. उन्होंने कांस्टेबल संजीव, विपिन और प्रवेश को ऐसे लोगों की सूची तैयार करने के काम पर लगा दिया, जिन से पंकज की सब से ज्यादा बातचीत होती थी और अंतिम बार उस ने किन लोगों के साथ बातचीत की.

2 दिन गुजर गए और पुलिस की अब तक की जांच बेनतीजा रही.

इधर मनीष के पिता डा. नरेंद्र सिंह भी बलिया से उस के पास दिल्ली आ गए थे. मनीष के कुछ परिजन और रिश्तेदार भी पंकज के लापता होने की जानकारी मिलने पर गाजियाबाद पहुंच गए. सभी लोग अपनेअपने तरीके से पंकज की तलाश में जुटे थे.

इसी सिलसिले में मनीष 12 अक्तूबर की सुबह एक बार फिर गिरधर एनक्लेव पहुंचा जहां पंकज रहता था. मनीष के दिमाग में न जाने क्यों कल से यह बात आ रही थी कि उसे मुन्ना से पंकज के बारे में जानकारी करने के लिए मिलना चाहिए.

दरअसल, 3 महीने पहले पंकज 15 दिन के लिए गिरधर कालोनी के ही मकान नंबर 51 के मालिक मुन्ना के घर में किराए पर रहा था.

मुन्ना से पंकज के काफी अच्छे संबंध थे. क्योंकि पंकज मुन्ना के 2 बेटों और 2 बेटियों को ट्यूशन पढ़ाता था. इन्हीं संबंधों के नाते मुन्ना ने पंकज को अपना फ्लैट कुछ दिन के लिए रहने को दे दिया था. मुन्ना के मकान में पंकज 15 दिन ही रहा था. उस ने उस का मकान खाली कर दिया और नवीन त्यागी के मकान में जा कर रहने लगा. वहां उस ने साथ में पढ़ने वाले एक दोस्त  पंकज को भी पार्टनर के रूप में साथ रख लिया था.

मनीष को पता था कि मुन्ना और उस के परिवार से पंकज के काफी अच्छे संबंध थे. उस ने सोचा कि क्यों न एक बार मुन्ना और उस के परिवार से मिल कर पता कर ले. हालांकि जिस दिन मनीष ने पंकज के अपहरण का मुकदमा दर्ज कराया था, उस दिन भी वह मुन्ना से मिला था. मुन्ना ने पंकज के इस तरह लापता होने पर काफी आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था कि वह तो बेहद शरीफ और अच्छा लड़का है.

लेकिन 12 तारीख की सुबह जब मनीष मुन्ना के घर पहुंचा तो वहां ताला लटका मिला. मुन्ना के मकान में जो किराएदार रहते थे, उन के परिवार की महिलाएं तो मिलीं, लेकिन पुरुष सदस्य काम पर जा चुके थे. पूछने पर महिलाओं ने मनीष को बताया कि मकान मालिक मुन्ना तो अपने परिवार के साथ 11 अक्तूबर  की सुबह से ही वहां नहीं है.

मुन्ना के 3 मंजिला मकान में ग्राउंड फ्लोर पर वह खुद रहता था, जबकि पहली और दूसरी मंजिल पर किराएदार रहते थे. चौथी मंजिल पर भी एक कमरा बना था जो खाली था. पंकज उसी कमरे में कुछ दिन रहा था.

जब मनीष ने मुन्ना के फ्लैट पर ताला लटका देखा तो वह असमंजस में पड़ गया कि आखिर पूरा परिवार कहां चला गया.

मनीष समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे, क्या न करे. इसी दौरान उस की नजर ग्राउंड फ्लोर पर उस हिस्से पर पड़ी, जहां से बेसमेंट की तरफ सीढि़यां उतर रही थीं. सीढि़यों से उतरते हुए मनीष बेसमेंट में पहुंच गया. वहां काफी अंधेरा था. अचानक उसे एक अजीब सी गंध का एहसास हुआ.

मनीष ने अपने मोबाइल की टौर्च जला कर देखा तो वहां कई जगह इधरउधर सीमेंट बिखरा था और कबाड़ भी फैला था. ऐसा लग रहा था था कि वहां कुछ रोज पहले ही राजमिस्त्री ने कोई काम किया है.

उसे जो गंध आ रही थी, ऐसी गंध हमेशा किसी जानवर या मरे हुए इंसान से उठती है. लेकिन कमरे में ऐसा कुछ नहीं दिख रहा था. मनीष ने जांच अधिकारी जितेंद्र कुमार को फोन कर के सारी बात बता दी.

एसआई जितेंद्र कुमार, हैडकांस्टेबल कृष्णवीर और रविंद्र को ले कर कुछ ही देर में मुन्ना के मकान पर पहुंच गए.

पुलिस जब बेसमेंट में पहुंची तो बदबू का अहसास उन्हें भी हुआ. मोबाइल टौर्च से पर्याप्त उजाला होने पर एक सिपाही ने कमरे में लगा बिजली का बोर्ड तलाश कर बंद पड़ी लाइटेंजला दीं, जिस से कमरा प्रकाश से भर गया. अब उस हालनुमा कमरे में सब कुछ साफसाफ दिखाई पड़ रहा था. कमरे के बीचोबीच ढेर सारा कबाड़ पड़ा था. कमरे में जहांतहां सीमेंट और बदरपुर फैला हुआ था.

जांच अधिकारी जितेंद्र कुमार ने सब से पहले अपने सहयोगी सिपाहियों की मदद से मकान में रहने वाले किराएदारों की मौजूदगी में बेसमेंट में बने दोनों कमरों के ताले तोड़े. लेकिन दोनों कमरों में ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जिस से पता चलता कि बदबू कहां से आ रही है.

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पुलिस ने हाल के बीचोबीच पड़ा कबाड़ का सामान हटाया तो देखा उन के नीचे फूस बिछी हुई थी. जब वहां से फूस को हटाया गया तो नीचे टाट की बोरियां बिछी मिलीं.

पुलिस टीम ने टाट की इन बोरियों को भी हटाया, तो उस के नीचे काफी बड़े क्षेत्र में फर्श के ताजा प्लास्टर होने के निशान साफ दिख रहे थे. टाट की बोरियां हटाने के बाद कमरे में आ रही दुर्गंध और भी ज्यादा तेज हो गई थी.

जितेंद्र कुमार को लगने लगा कि हो न हो, इस फर्श के नीचे ऐसा कुछ जरूर दबा है जिस की वजह से वहां बदबू फैली हुई है.

जितेंद्र कुमार ने बेसमेंट से बाहर आ कर थानाप्रभारी जे.के. सिंह को फोन पर मुन्ना के मकान में इस संदिग्ध गतिविधि के बारे में बताया तो थानाप्रभारी भी कुछ अन्य पुलिसकर्मियों के साथ गिरधर एनक्लेव में मुन्ना के मकान पर पहुंच गए. तब तक जितेंद्र कुमार ने अपने एक सिपाही को भेज कर 2-3 मजदूर बुलवा लिए थे.

थानाप्रभारी जे.के. सिंह ने निरीक्षण किया तो संदेह की सब से बड़ी बात यह मिली कि जिस स्थान पर प्लास्टर किया गया था, वहां दबाने पर जमीन दब रही थी. ऐसा लग रहा था कि यह प्लास्टर 2-3 दिन पहले ही किया गया हो और इस का भराव ठीक से नहीं किया गया था.

बहरहाल, थानाप्रभारी जे.के. सिंह को भी मामला संदिग्ध लगा. सीओ डा. राकेश कुमार मिश्रा और एसडीएम को सारी बात बता कर मौके पर आने का अनुरोध किया.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

विद्रोह: भाग-3

अब वह आंखें बंद कर के सोचने लगी, ‘काश, मेरी बहू रीता जैसी होती, कितनी अच्छी है, कितना खयाल रखती है अपनी सासू मां का, जितनी बार भी इस की सास मुझ से मिली हैं, हमेशा अपनी बहू की तारीफों के पुल ही बांधती रही हैं, लेकिन मुझे दुष्ट बहू मिली. अरे बहू का क्या दोष है, नालायक तो अपना बेटा है. यदि बेटा ठीक होता तो बहू की क्या मजाल कि गलत काम करे?’

ज्योंज्यों कानपुर नजदीक आ रहा था, कुसुम घबरा रही थी कि भैयाभाभी पता नहीं क्या सोचेंगे. सोचें तो सोचें, उस के पास उस रास्ते के सिवा कोई रास्ता नहीं था. वह बोझ नहीं बनेगी भैयाभाभी पर, कुछ ही दिनों में अलग छोटा सा मकान ले कर रहेगी, एक नौकरानी रखेगी. एक विचार की लहर बारबार उठ रही थी कि घर छोड़ कर मैं ने गलत काम तो नहीं किया.

फिर दिमाग ने कहा, तो फिर क्या करती, हर रोज मार खाती. और वह मारता रहता जब तक जायदाद पूरी अपने नाम न लिखवा लेता. एक बार, दो बार, तीन बार…उस ने अपनी दोबारा बनाई वसीयत पढ़ी, जिस की एक प्रति उसे अपनी बेटी के पास भी भेजनी पड़ेगी, वकील के पास तो एक कौपी रख आई थी.

कुसुम अब सोचने लगी, ‘आज मैं ने जो कुछ भी किया वह पहले ही कर लेना चाहिए था. छि:छि:, मां बेटे से मार खाए, इस से अच्छा मर न जाए. मैं अकेली पड़ गई थी, वे दोनों पतिपत्नी एक हो गए थे. शुक्र है कि रीता जैसी पड़ोसिन मिल गई, जिस ने मेरी मृतप्राय जिंदगी को सांसें दे दीं. रीता न होती तो मैं वसीयत भी न बदल पाती और घर से भाग भी नहीं पाती.’

इन्हीं विचारों का तानाबाना बुनते हुए कानपुर आ गया. हड़बड़ाते हुए कुसुम ने अटैची और पर्स पकड़ा, फिर स्वरूपनगर के लिए रिकशा कर के चल दी.

कुसुम निश्चय कर के अपने भाई देवेंद्र के घर पहुंच गई. दरवाजे पर लगी कौल बैल बजाई. थोड़ी देर में एक भोलीभाली, सुंदर सी बालिका ने दरवाजा खोला.

‘‘आप कौन, किस से मिलना है?’’ मीठी आवाज में बच्ची ने पूछा.

‘‘बेटी, मैं लखनऊ से आई हूं. तुम्हारे पापाजी की बहन हूं. मेरा नाम कुसुम है.’’

‘‘अंदर आइए, दादीजी, अंदर आइए.’’

बच्ची के पीछेपीछे कुसुम अपना पर्स और अटैची संभालती हुई चल दी. बरामदे के साथ जुड़ा हुआ ही ड्राइंगरूम था. उस घर में कुसुम 5 वर्षों बाद आई थी. पिछली बार अपने पति के साथ कुसुम कार से आई थी. घरपरिवार वालों ने खूब इज्जत, मानसम्मान दिया था. भैयाभाभी ने तो आंखों पर ही बिठा लिया था.

कुसुम के भाई के घर का वातावरण उस समय भी शांत था और अब भी लगता है सुखमय और शांत है. कुसुम की विचारतंद्रा उस के भाई ने ही तोड़ी, ‘‘अरे कुसुम, तू इस समय अकेली कैसे? कु़छ फोन वगैरह तो कर देती?’’

‘‘वह भैया, बस आना पड़ा,’’ सूखा चेहरा, मरियल आवाज में दिए उत्तर से भाई सशंकित हो गया.

‘‘आना पड़ा, मैं समझा नहीं. खैर, चल पहले चाय पी ले, कुछ खा ले फिर बताना.’’

कुसुम की आवाज सुन कर बरामदे में ही सब्जी काटती हुई भाभी दौड़ कर आईं, पांव छुए फिर बैठ गईं. थोड़ी देर बाद चायनाश्ता भी आ गया.

‘‘दीदी, आप तो बहुत दुबली हो गई हैं. 5 साल में चेहरा ही बदल गया. क्या हो गया है आप को?’’ कुसुम के पास आ कर भाभी ने आलिंगन किया और आश्चर्यचकित नजरों से उस की ओर देखती रहीं.

कुसुम बारबार बांहों पर, गरदन पर पड़े जख्मों के निशान छिपा रही थी. लेकिन मेज पर रखी हुई चाय की प्याली उठाते समय गरदन से शाल हट गई और बांह का स्वेटर ऊपर को हो गया, देखते ही भैया दौड़ कर पास आए, घबरा कर पूछा, ‘‘यह सब क्या है, कुसुम? तुम्हारे शरीर पर ये जख्म कैसे हैं?’’

‘‘वह…वह भैया, रवि मारता था. पीटता था. एक बार तो उस ने इतनी जोर से मारा कि दांत तक टूट गया. बस, ये सब उसी के निशान हैं.’’

‘‘इतना सब होता रहा और तुम ने बताया तक नहीं. अरे हम कोई गैर हैं क्या? कभी फोन ही कर देतीं या कोई खत ही डाल देती. पता नहीं तुम ने कितने दुख झेले हैं जीजाजी की मृत्यु के बाद. छि:छि:, इतना कू्रर, बिगड़ा रवि बेटा हो जाएगा. सपने में भी नहीं सोचा था. खैर, कुसुम, तुम ने अच्छा किया जो आ गईं.’’

‘‘वह तो मुझे भूखा तक रखता था. बाहर दरवाजे पर ताला, टैलीफोन पर ताला, फ्रिज और सभी अलमारियों में ताला लगा रहता था. भैया, ऐसी दुर्दशा तो किसी कैदी की भी नहीं होगी जो उस ने मेरी की थी,’’ कहते ही कुसुम फूटफूट कर रोने लगी.

भैयाभाभी घबरा गए. आंसू पोंछे भाभी ने फिर कुसुम से वसीयत की योजना पूछी. थोड़ी देर बाद स्वयं पर काबू पा कर कुसुम ने अपनी नई वसीयत उन दोनों को दिखा दी. भैयाभाभी खुश हुए. बहन को भाई ने खूब प्यार कर के कहा, ‘‘बहन, घबराओ मत. जैसा तुम चाहती हो वैसे ही होगा. वैसे तो अलग रहने की जरूरत नहीं है, लेकिन अगर तुम चाहोगी तो स्वरूपनगर में ही तुम्हें अच्छा मकान मिल जाएगा. अभी तुम आराम करो, चिंता मत करो.’’

‘‘अच्छा भैया,’’ कह कर कुसुम सोफे पर ही लेट गई.

उधर, शाम को जब रवि औफिस से लौटा, पल्लवी ने रोनी सी सूरत ले कर दरवाजा खोला और वह वृक्ष से टूटी हुई डाली सी धम्म से सोफे पर बैठ गई. रवि ने उसे झकझोर कर पूछा, ‘‘क्यों, क्या बात है? सब ठीक तो है.’’

पल्लवी चीख पड़ी, ‘‘कुछ ठीक नहीं है, तुम्हारी मां धोखा दे कर भाग गईं और…’’

‘‘और क्या?’’

‘‘यह देखो, अपने पलंग पर यह चिट्ठी रख गई हैं. लिखा है : ‘मैं जा रही हूं. कुछ भी नहीं मिलेगा तुम्हें जायदाद में से. मैं ने वसीयत बदल दी है. आधी जायदाद बेटी मोनिका और आधी विकलांगों की संस्था के नाम कर दी है. मैं कपूत बेटे से विद्रोह करती हूं. जिस बेटे को पालपोस कर बड़ा किया वह मां पर हाथ उठाता है, वह भी जायदाद के लिए. मेरा सबकुछ तेरा ही तो था. लेकिन तू ने मांबेटे के रिश्ते का कोई लिहाज नहीं किया. तुझ से रिश्ता तोड़ने का मुझे कोई गम नहीं.’’’

कागज का टुकड़ा पढ़ कर रवि पागलों की तरह चिल्लाने लगा. कभी इधर कभी उधर चक्कर लगाने लगा. उधर पत्नी पल्लवी क्रोध में बड़बड़ाने लगी, ‘मैं ने पहले ही कहा था कि मांजी को मत सताओ, मत मारोपीटो, प्यार से उन्हें अपने वश में करो लेकिन तुम ने मेरी एक न सुनी. अब भुगतो. यह घर भी खाली करना पड़ेगा.’

विद्रोह भाग-2

हक्कीबक्की बावली सी कुसुम डायनिंग चेयर पर बैठ गई. एक प्लेट में हलवा रखा था, दूसरी प्लेट में गोभी के गरम परांठे. नाश्ता देते समय शहद सी मीठी बोली में बहू बोली, ‘‘पहले इन कागजों पर साइन कर दीजिए. फिर नाश्ता कर लीजिएगा.’’

‘‘न…न, मैं नहीं करूंगी साइन.’’

‘अच्छा, तो यह आदर, यह प्यार इस लालच में किया जा रहा था. छि:छि:, तुम दोनों ने तो रिश्तों को नीलाम कर दिया है. मैं चाहे मर जाऊं, चाहे मुझे कुछ भी हो जाए, मैं साइन नहीं करूंगी,’ कुसुम बड़बड़ाती रही.

‘‘जाइएजाइए, लीजिए सूखी ब्रैड और चाय, मत करिए साइन. और जब ये आ जाएं तब खाइएगा इन की मार.’’

बहू के शब्द तीरों से भी ज्यादा घायल कर गए कुसुम को. वह बाहर से अंदर तक लहूलुहान हो गई.

मरती क्या न करती. भूखी थी सूखी ब्रैड चाय में डुबो कर खाई, रोती रही. सोचती रही, ‘लानत है ऐसी जिंदगी पर. गाजर का हलवा, भरवां परांठे खा कर क्या मैं तेरी गुलाम बन जाऊं. न…न, मैं अपाहिज नहीं बनना चाहती. मैं अपना सबकुछ तुझे दे दूं और मैं अपाहिज बन जाऊं, यह नहीं हो सकता,’ बुदबुदाती हुई कुसुम, ब्रैड और चाय से ही संतुष्ट हो गई. मन ने कहा, ‘जाए भाड़ में तेरा हलवा और परांठे. मैं अपने जमाने में बचा हुआ हलवा, परांठेऔर पूरी मेहरी तक को खाने के लिए देती थी.’

कुसुम बहू की क्रियाएं आंखें फाड़फाड़ कर देख रही थी. सास की पीड़ा, दुख, व्यथा से बहू अनजान सी अपने कामों में व्यस्त थी. चायनाश्ता कर के उस ने अपना लंच बौक्स तैयार किया, फिर गुनगुनाती हुई पिं्रटैड सिल्क की साड़ी और उसी रंग की मैच करती माला पहन कर कालेज चली गई. बाहर से घर में ताला लगा दिया.

बाहर ताला बंद कर वह हर रोज ही कालेज जाती रही. और तो और टैलीफोन भी लौक कर दिया जाता था. लेकिन उस दिन वह टैलीफोन लौक करना भूल गई. कुसुम ने हर रोज की तरह पूरा घर देखा. हर चीज लौक थी. यहां तक कि फ्रिज में भी ताला लगा हुआ था.

हां, बहू कुसुम के लिए डायनिंग टेबल पर 4 सूखी रोटी और अरहर की दाल बना कर रख गई थी. अनलौक टैलीफोन देख कर कुसुम के दिल में खुशी का खेत लहराने लगा. अब तो पड़ोसिन को फोन कर दूंगी. वह मुझे बाहर भागने में सहायता कर देगी.

उस समय कुसुम में हजार हाथियों की ताकत ने जन्म ले लिया. देह का दर्द भी कपूर सा उड़ गया. आंखों में हीरे सी चमक उत्पन्न हो गई. सब से पहले तो उस ने पड़ोसिन को फोन किया, ‘‘हैलो, कौन बोल रहा है?’’

‘‘मैं बोल रही हूं आंटी, रीता, लेकिन आप फोन कैसे कर रही हैं? क्या आज आप का फोन लौक नहीं है?’’

मुक्ति की खुशी में झूमती हुई कुसुम बोली, ‘‘हांहां बेटी, लौक नहीं है. सुनो, तुम इस समय बाहर का ताला तोड़ कर आ जाओ. तब तक मैं तैयारी करती हूं.’’

‘‘कैसी तैयारी, आंटी?’’ सुन कर रीता को आश्चर्य हुआ.

‘‘बेटी, तुम्हीं ने तो उस दिन कहा था कि आप यहां से भाग जाओ आंटी, किसी और शहर या बेटी के पास.’’

‘‘हांहां, कहा तो था. लेकिन आंटी, आप कहां जाएंगी?’’

‘‘मैं कानपुर अपने भाई के पास जाऊंगी. वह बस स्टेशन पर लेने आ जाएगा, फिर सब ठीक हो जाएगा. बेटी, अगर मैं नहीं गई तो यह मुझ से जबरदस्ती मारपीट कर, नशा पिला कर साइन करवा लेगा और…और…’’ कुसुम फूटफूट कर रोने लगी.

‘‘और क्या आंटी… बताओ न…’’

‘‘और फिर मुझे दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर फेंक देगा,’’ बोलते हुए कुसुम की आवाज कांप रही थी. पूरी की पूरी देह ही कंपकंपाने लगी थी. उस की देह जवाब दे रही थी. लेकिन फोन रख कर उस की हिम्मत सांस लेने लगी. आशा जीवित होने लगी.

जल्दीजल्दी अलमारी खोल कर अपने कपड़े, रुपए और वसीयत के कागज निकाले, पर्स लिया. ढंग से सिल्क की साड़ी पहन कर दरवाजे के पास अटैची ले कर खड़ी हो गई.

पत्थर से ताला नहीं टूटा तो रीता ने हथौड़ी से ताला तोड़ा. कुसुम दरवाजे के पास ही खड़ी थी.

एक ओर जेल से छूटे कैदी सी खुशी कुसुम के दिल में थी तो दूसरी ओर अपना घर, अपना घोंसला छोड़ने का दुख उसे खाए जा रहा था. वह घर, जिस में उस ने रानी सा जीवन व्यतीत किया, जहां उस ने सोने से दिन और चांदी सी रातें काटीं, जहां उस के आंगन में किलकारियां गूंजती थीं, प्यार का सूरज सदा उगता था, जहां उस के पति ने उसे संपूर्ण ब्रह्मांड का सुख दिया था, जहां वह घंटों पति के साथ प्रेम क्रीड़ाएं करती थी, जो घर खुशियों के फूलों से महकता था, वक्त ने ऐसी करवट बदली कि कुसुम आज उसे छोड़ कर जाने पर विवश हो गई. क्या करती वह? कोई अन्य उपाय नहीं था.

रीता ने अपनी कार में कुसुम को बिठा लिया, उस का सूटकेस उठाते समय रीता भी रोने लगी आंटी के बिछोह पर. रोंआसी रीता ने आंटी से उन के भाई का फोन नंबर ले लिया. और बस पर चढ़ाते समय यह वादा कर लिया कि वह हफ्ते में 2 बार फोन पर उन का हालचाल पता लगाती रहेगी.

जितना दुख कुसुम को अपना घर छोड़ने का था उस से कुछ ही कम दुख रीता से बिछुड़ने का था. ज्यादा देर वह रीता को बस के पास रोकना नहीं चाह रही थी. वह सरहद पर तैनात सिपाही सी सतर्क थी, सावधान थी कि कहीं खोजते हुए उस की बहू या बेटा न आ जाएं. वह उस घर में वापस जाना नहीं चाहती थी, जहां तालाब में मगरमच्छ सा उस का बेटा रहता था, जहां उस की जिंदगी मुहताज हो गई थी.

बस चल पड़ी. वह खिड़की से बाहर आंसूभरी आंखों से रीता को तब तक देखती रही जब तक उस की आकृति ने बिंदु का रूप नहीं ले लिया.

ज्योंज्यों बस आगे बढ़ रही थी उस का अपना शहर दूर होता जा रहा था, वह शहर जहां वह सोलहशृंगार कर के अपने सुहाग के साथ आई थी. उसे लगा उस की जिंदगी एक नदी है जिस ने अपना रास्ता बदल लिया है और वह एक गांव है जो पीछे छूट गया है. बस जितना आगे बढ़ रही थी उस का दिल उतनी ही जोरों से धड़क रहा था. काफी देर बाद उस ने स्वयं को सामान्य स्थिति में पाया.

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विद्रोह भाग-1

वैसे तो रवि आएदिन मां को मारता रहता है लेकिन उस रात पता नहीं उसे क्या हो गया कि इतनी जोर का घूंसा मारा कि दांत तक टूट गया. बीच में आई पत्नी को भी खूब मारा. पड़ोसी लोग घबरा गए, उन्हें लगा कि कहीं विस्फोट हुआ और उस की किरचें जमीन को भेद रही हैं. खिड़कियां खोल कर वे बाहर झांकने लगे. लेकिन किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि रवि के घर का दरवाजा खटखटा कर शोर मचने का कारण पूछ ले. मार तो क्या एक थप्पड़ तक कुसुम के पति ने उस की रेशमी देह पर नहीं मारा था, बेटा तो एकदम कसाई हो गया है. हर वक्त सजीधजी रहने वाली, हीरोइन सी लगने वाली कुसुम अब तो अर्धविक्षिप्त सी हो गई है. फटेगंदे कपड़े, सूखामुरझाया चेहरा, गहरी, हजारों अनसुलझे प्रश्नों की भीड़ वाली आंखें, कुछ कहने को लालायित सूखे होंठ, सबकुछ उस की दयनीय जिंदगी को व्यक्त करने लगे.

उस रात कुसुम बरामदे में ही पड़ी एक कंबल में ठिठुरती रही. टांगों में इतनी शक्ति भी नहीं बची कि वह अपने छोटे से कमरे में, जो पहले स्टोर था, चली जाए. केवल एक ही वाक्य कहा था कुसुम ने अपनी बहू से : ‘पल्लवी, तुम ने यह साड़ी मुझ से बिना पूछे क्यों पहन ली, यह तो मेरी शादी की सिल्वर जुबली की थी.’

बस, बेटा मां को रुई की तरह धुनने लगा और बकने लगा, ‘‘तेरी यह हिम्मत कि मेरी बीवी से साड़ी के लिए पूछती है.’’

कुसुम बेचारी चुप हो गई, जैसे उसे सांप सूंघ गया, फिर भी बेटे ने मारा. पहले थप्पड़ों से, फिर घूंसों से.

ठंडी हवा का तेज झोंका उस की घायल देह से छू रहा था. उस का अंगअंग दर्द करने लगा था. वह कराह उठी थी. आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. चलचित्र की तरह घटनाएं, बीते दिन सूनी आंखों के आगे घूमने लगे.

‘इस साड़ी में कुसुम तू बहुत सुंदर लगती है और आज तो गजब ही ढा रही है. आज रात को…’ पति पराग ने कहा था.

‘धत्’ कह कर कुसुम शरमा गई थी नई दुलहन सी, फिर रात को उस के साथ उस के पति एक स्वर एक ताल एक लय हुए थे. खिड़की से झांकता हुआ चांद भी उन दोनों को देख कर शरमा गया था. वह पल याद कर के उस का दिल पानी से बाहर निकली मछली सा तड़पने लगा. जब भी खाने की किसी चीज की कुसुम फरमाइश करती थी तुरंत उस के पति ला कर दे देते थे. बातबात पर कुसुम से कहते थे, ‘तू चिंता मत कर. मैं ने तो यह घर तेरे नाम ही लिया है और बैंक में 5 लाख रुपए फिक्स्ड डिपौजिट भी तेरे नाम से कर दिया है. अगर मुझे कुछ हो भी जाएगा तब भी तू ठाट से रहेगी.’

हंस देती थी कुसुम. बहुत खुश थी कि उसे इतना अच्छा पति और लायक बेटी, बेटा दिए हैं. अपने इसी बेटे को उस ने बेटी से सौ गुना ज्यादा प्यार दिया, लेकिन यह क्या हो गया…एकदम से उस की चलती नाव में कैसे छेद हो गया. पानी भरने लगा और नाव डूबने लगी. सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की जिंदगी कगार पर पड़ी चट्टान सी हो जाएगी कि पता नहीं कब उस चट्टान को समुद्र निगल ले.

वह बीते पलों को याद कर पिंजड़े में कैद पंछी सी फड़फड़ाने लगी. उस रात वह सो नहीं पाई.

सुबह उठते ही धीरेधीरे मरियल चूहे सी चल कर दैनिक कार्यों से निवृत्त हो कर, अपने लिए एक कप चाय बना कर, अपनी कोठरी में ले आई और पड़ोसिन के दिए हुए बिस्कुट के पैकेट में से बिस्कुट ले कर खाने लगी. बिस्कुट खाते हुए दिमाग में विचार आकाश में उड़ती पतंग से उड़ने लगे.

‘इस कू्रर, निर्दयी बेटेबहू से तो पड़ोसिनें ही अच्छी हैं जो गाहेबगाहे खानेपीने की चीजें चोरी से दे जाती हैं. तो क्यों न उन की सहायता ले कर अपनी इस मुसीबत से छुटकारा पा लूं.’ एक बार एक और विचार बिजली सा कौंधा.

‘क्यों न अपनी बेटी को सबकुछ बता दूं और वह मेरी मदद करे, लेकिन वह लालची दामाद कभी भी बेटी को मेरी मदद नहीं करने देगा. बेटी को तो फोन भी नहीं कर सकती, हमेशा लौक रहता है. घर से भाग भी नहीं सकती, दोनों पतिपत्नी ताला लगा कर नौकरी पर जाते हैं.’

बस, इन्हीं सब विचारों की पगडंडी पर चलते हुए ही कुसुम ने कराहते हुए स्नान कर लिया और दर्द से तड़पते हुए हाथों से ही उलटीसीधी चोटी गूंथ ली. बेटेबहू की हंसीमजाक, ठिठोली की आवाजें गरम पिघलते शीशे सी कानों में पड़ रही थीं. कहां वह सजेसजाए, साफसुथरे, कालीन बिछे बैडरूम में सोती थी और कहां अब बदबूदार स्टोर में फोल्ंिडग चारपाई पर? छि:छि: इतना सफेद हो जाएगा रवि का खून, उस ने कभी सोचा न था. महंगे से महंगा कपड़ा पहनाया उसे, बढि़या से बढि़या खाने की चीजें खिलाईं. हर जिद, हर चाहत रवि की कुसुम और पराग ने पूरी की. शहर के महंगे इंगलिश कौन्वेंट स्कूल से, फिर विश्वविद्यालय से रवि ने शिक्षा ग्रहण की.

कितनी मेहनत से, कितनी लगन से पराग ने इसे बैंक की नौकरी की परीक्षाएं दिलवाईं. जब यह पास हो गया तो दोनों खुशी के मारे फूले नहीं समाए, खोजबीन कर के जानपहचान निकाली तब जा कर इस की नौकरी लगी.

और पराग के मरने के बाद यह सबकुछ भूल गया. काश, यह जन्म ही न लेता. मैं निपूती ही सुखी थी. इस के जन्म लेने के बाद मेरे मना करने पर भी 150 लोगों की पार्टी पराग ने खूब धूमधाम से की थी. बड़ा शरीफ, सीधासादा और संस्कारों वाला लड़का था यह. लेकिन पता नहीं इस ने क्या खा लिया, इस की बुद्धि भ्रष्ट हो गई, जो राक्षसों जैसा बरताव करता है. अब तो इस के पंख निकल आए हैं. प्यार, त्याग, दया, मान, सम्मान की भावनाएं तो इस के दिल से गायब ही हो गई हैं, जैसे अंधेरे में से परछाईं.

रसोई से आ रही मीठीमीठी सुगंध से कुसुम बच्ची सी मनचली हो गई. हिम्मत की सीढ़ी चढ़ कर धीरेधीरे बहू के पास आई, ‘‘बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है, बेटी क्या बनाया है?’’ पता नहीं कैसे दुनिया का नया आश्चर्य लगा कुसुम को बहू के उत्तर देने के ढंग से, ‘‘मांजी, गाजर का हलवा बनाया है. खाएंगी? आइए, बैठिए.’’

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इंडिया के बाद न्यूयॉर्क में भी चला अनुपम खेर का जादू, देखें PHOTOS

अनुपम खेर एक ऐसा नाम है जो न सिर्फ अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीतते हैं बल्कि अन्य कार्यों से भी दर्शकों को खुद से जोड़ने की कला जो उनके अंदर है वह किसी और में नही है. अपनी अभिनय की कला से उन्होंने सिर्फ बॉलीवुड में ही राज नहीं किया, बल्कि दुनियाभर के थिएटर्स और स्टेज पर दमदार परफॉरमेंस देने वाले इस अभिनेता की कला को हर किसी ने देखा है.न्यूयॉर्क के भी थिएटर प्रेमियों ने हाल ही में अनुपम खेर का ‘कुछ भी हो सकता है’ प्ले देखा.

ये सिर्फ एक प्रदर्शन ही नही था बल्कि दिग्गज अभिनेता की जर्नी पर आधारित एक नाटक था. पहले ही सीन से अनुपम खेर ने अपनी परफॉरमेंस से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया.

शहर के crème de la crème में एक शाम की मेजबानी की गई, जिसमें 120 मेहमान शामिल हुए जिसकी वजह से यह पूरा भर गया. एक सहज कलाकार के तौर पर पहचाने जाने वाले अनुपम खेर जल्द ही दर्शकों से काफी घुलमिल गए, जिसके बाद वह उन्हें चुटकुले सुनाते हुए नज़र आए.

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यह स्पष्ट था कि चाहे हज़ारों दर्शक हो या फिर प्ले देखने वाले 120 लोग अनुपम खेर दर्शकों का ध्यान कैसे अपनी तरफ खींचना है यह बखूबी जानते हैं.

अनुपम खेर जिस तरह से अपना परफॉरमेंस दे रहे थे उसे देखकर दर्शक भी तुरंत अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर कर रहे थे. एक ऐसी प्रतिभा जिसके लिए किसी भी कलाकार को सालों की मेहनत की जरूरत होती है. पूरा हॉल दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था.

परफॉरमेंस के बाद, भारत के राजदूत और संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि, सैयद अकबरुद्दीन ने कहा, “मुझे कभी भी रंगमंच मेइन दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन मैंने जो आज देखा वह इससे पहले कभी नही देखा. अनुपम खेर अपने हम सभी को कर्जदार बना दिया है क्योंकि दर्शकों को खुद से इतने लंबे समय तक जोड़े रखना किसी आम व्यक्ति के बस भी बात नही है. ”

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दर्शकों से मिली प्रतिक्रिया पर अपनी ख़ुशी व्यक्त करते हुए अनुपम खेर ने कहा, “दर्शकों को ये बहुत ही अच्छा लगा, खासकर उन्हें वो हिस्सा पसंद आया जिसमें मैंने अपनी असफलताओं के बारे में बताया| मैं एक ऐसा नाटक करना चाहता था जोकि मेरी आत्मकथा हो. उस स्टूडियों में 130 लोग फिट होते हैं और एक हाथ की दूरी पर बैठे दर्शकों के सामने प्ले करने में बहुत मज़ा आया. यह काफी शानदार अनुभव था. मैं एक दिन बाद यानि की शनिवार की शाम को प्ले कर रहा हूं. यहां पर ज़्यादातर भारतीय दर्शक थे, इसके अलावा अमेरिकी और चीनी ऑडियंस भी मौजूद थी. उन्होंने महसूस किया कि यह एक ऐसा जीवन है जो बहुत प्रेरणादायक हो सकता है. ”

अनुपम खेर हाल ही में न्यूयॉर्क में एक अतिथि वक्ता के रूप में पहुंचे थे, जहां उन्होंने सिनेमा के लिए अपने प्यार के बारे में बात की. अनुपम खेर ने अब तक 500 फिल्मों से ज़्यादा में अभिनय किया है और वह अपनी अविश्वसनीय प्रतिभा के साथ अंतर्राष्ट्रीय प्लेटफार्मों पर भारत को गौरवान्वित करा रहे हैं.

अनुपम खेर अभी अपने अमेरिकी मेडिकल शो न्यू एम्स्टर्डम की शूटिंग कर रहे हैं , जिसमें वह डॉक्टर विजय कपूर की भूमिका निभा रहे हैं.

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चार दिनों से सुलगती आग में जल रही है दिलवालों की दिल्ली

दिल्ली महज देश की राजधानी नहीं है बल्कि भारतीय संस्कृति का अद्भुत संगम भी है. दिल्ली को आप लघु भारत भी कह सकते हैं. फर्राटा भरती मेट्रो, सड़कों पर दौड़ते वाहन, चांदनी चौक के पराठे, पुरानी दिल्ली की सकरी गलियां, गालिब का शहर, भारत का भविष्य तय करती संसद, शूरवीरों की गाथा सुनाता इंडिया गेट, कनॉट प्लेस में लंबी गाड़ियों वाले लोगों की जमात और वहीं पर इश्क लड़ाते नौजवान…

अभी भी बहुत कम बताया है दिल्ली के बारे में…दरअसल दिल्ली को लफ्जों या अल्फ़ाजों में बयां करना बेहद मुश्किल काम है. यहां की तासीर इतनी खूबसूरत है कि हवा में जहर घुले होने के बावजूद इस खुशबू से दूर जाने का दिल नहीं करता. कमोबेश आज मेरी दिल्ली सुलग रही है. हालात यहां तक बिगड़ चुके हैं कि लोग घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं.

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उत्तर पूर्वी दिल्ली में पिछले चार दिनों से फैली हिंसा के कारण दहशत का माहौल है. लोग अब भी घरों से निकलने में डर रहे हैं. सीलमपुर, जाफराबाद, मौजपुर, कबीरनगर, विजयपार्क आदि इलाकों में ऐसा ही माहौल है. लोग काम धंधों पर जाना बंद कर चुके हैं. हालांकि, तीसरे दिन स्थिति तनावपूर्ण मगर नियंत्रण में है. कई दुकानों में हुई लूट के कारण लोग अब अपनी दुकानें और घर बचाने के लिए रतजगा करने को मजबूर हैं.

विजय पार्क में रहने वाले विजेंद्र कुमार ने बताया, “सोमवार की रात मोहल्ले में उपद्रवियों के हमले के बाद से लोगों में डर और दहशत का माहौल है. हम मारकाट नहीं चाहते, लेकिन रात-रात भर जागकर डंडा लेकर घरों की रखवाली करने को मजबूर हो गए हैं. क्योंकि कब कौन आकर के घरों और दुकानों पर हमला कर दे कुछ कहा नहीं जा सकता. डंडे थाम कर हम भले ही उपद्रवी की तरह दिखते हो सच पूछिए तो हमारे लिए मजबूरी हो गई है डंडे थामना. अपना सिर्फ घर बचाना चाहते हैं.”

मोहल्ले के ही राहुल ने कहा कि वो कॉल सेंटर में जॉब करते हैं. नाइट ड्यूटी करते हैं। लेकिन डर के मारे जाना बंद कर चुके हैं. अपने बॉस को मेल कर घर से ही काम करने की इजाजत मांग चुके हैं.

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जाफराबाद के इरशाद हिंसा के कारण रोजी रोटी पर असर पड़ने की बात कहते हैं. जूस की दुकान चलाने वाले इरशाद ने कहा कि रविवार से ही उनकी दुकान बंद चल रही है. हर रोज कम से कम वह हजार रुपए कमा लेते थे, मगर यह मामूली सी कमाई भी अब नहीं हो रही है दुकान में ताला डालना मजबूरी हो गई. हमारे जैसे तमाम दुकानदारों का भी यही हाल है.

सीलमपुर रेड लाइट पर दो दर्जन से अधिक दुकानें हैं लेकिन इसमें सिर्फ एक दुकान खुली है चाय और पकौड़ी की. चाय पकौड़ी की दुकान पर भी खरीददारों की संख्या बड़ी कम है. आज के लिए मीडियाकर्मी इस दुकान के लिए कस्टमर बने हैं. दुकानदार का कहना है कि तनाव पैदा होने के बाद से राहगीरों ने सीलमपुर से जाफराबाद मौजपुर वाले रोड पर आना जाना कम कर दिया है.

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प्रधानमंत्री के निर्देश पर मंगलवार की रात से लेकर बुधवार को 16 घंटे का ऑपरेशन चलाकर अजित डोभाल ने उत्तरी-पूर्वी दिल्ली के बेकाबू होते हालात को काबू में किया. मंगलवार की रात साढ़े 11 बजे और बुधवार को साढ़े तीन बजे दो बार वह उत्तरी-पूर्वी डीसीपी दफ्तर पहुंचे. इन 16 घंटों में डोभाल ने पुलिस, अर्धसैनिक बलों की ठीक संख्या में तैनाती, दोनों पक्षों के प्रभावशाली लोगों और धर्मगुरुओं से शांति की अपीलें से लेकर हर वो रणनीति अपनाई जिससे सड़कों पर भीड़ आने से रोका जा सके.

भारत भूमि युगे युगे: इन से भी न हुआ

जब मंचीय कवि कुमार विश्वास आम आदमी पार्टी से जुड़े थे तो उन्हें अपने मित्र अरविंद केजरीवाल से बड़ी उम्मीदें थीं कि लोकसभा चुनाव हारने के एवज में वे उन्हें राज्यसभा भेज देंगे, लेकिन हुआ उलटा कि उन्हें आप से ही बाहर कर दिया गया. यह कसक अक्सर कुमार विश्वास को सालती रहती है और वे हर कहीं अपने भूतपूर्व यार को दगाबाज वगैरह कविताओं के जरिए बताते रहते हैं.

चुनाव प्रचार के दिनों में शाहीनबाग मसले पर उन्होंने केजरीवाल को गुंडे सप्लाई करने वाला बताया था. अभी तक जिन लोगों को यह समझ नहीं आ रहा कि केजरीवाल ने कुमार को अपने विश्वास से बाहर क्यों किया था, उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले वे वीडियो देखने चाहिए जिन में कुमार विश्वास रामकथा बांच रहे हैं और वर्णव्यवस्था की पूरी धूर्त निष्ठा से हिमायत करते नजर आ रहे हैं.

दरअसल, केजरीवाल ने मायावती के अंजाम से सबक लिया है कि पंडित सतीश मिश्रा जैसा मनुवादी असिस्टैंट कैसे नैया डुबोता है.

दत्तक ठाकरे

दूसरे करोड़ों लोगों की तरह मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने भी सोचा यही होगा कि कुछ भी हो जाए, उन के कजिन व शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार नहीं बनाएंगे. लेकिन जब ऐसा हो ही गया तो उन्हें पहली बार समझ आया कि असल नादान और अपरिपक्व तो वे खुद हैं जो चाचा बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी अपने को मानते और समझते रहे थे.

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साबित हो गया कि घुटना पेट की तरफ ही मुड़ता है, इस के बाद भी राज, उद्धव नाम के घुटने के टूटने का उबाऊ इंतजार करते रहे. अब खुद पूरी तरह टूट चुके राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना यानी मनसे के झंडे को पूरी तरह भगवा कर मैसेज दे दिया है कि अमित शाह अगर चाहें तो वे भाजपा की गोद में जाने के लिए तैयार हैं. लेकिन पहले से ही अपने दर्जनभर कमजोर दत्तक पुत्रों की नालायकी से परेशान भाजपा किसी नए राजदुलारे के पालनपोषण का जोखिम उठाएगी, फिलहाल ऐसा लग नहीं रहा.

धनुषबाण हो साथ

इन दिनों सब से सुखी राजनीतिक पिता कोई अगर है तो वे गुरुजी के नाम से मशहूर शिबू सोरेन हैं जिन के बेटे हेमंत सोरेन ने झारखंड की सत्ता सफलतापूर्वक संभाल ली है. झारखंड मुक्ति मोरचा के जनक शिबू सोरेन ने आदिवासियों को नया मंत्र यह दिया है कि वे बाजार में हों या ससुराल में, अपनी संस्कृति के चिह्न तीरधनुष को वैसे ही हमेशा साथ रखें जैसे सिख समुदाय के लोग पगड़ी पहनते और कृपाण साथ में रखते हैं.

कहना तो वे यह चाह रहे थे कि जैसे पंडेपुजारी चुटिया रखते हैं, तिलक लगाते हैं, रुद्राक्ष की माला पहन कर अपनी संस्कृति व दुकान की नुमाइश करते हैं वैसा ही आदिवासियों को भी करना चाहिए जिस से कोई उन्हें जबरिया हिंदू बनाने की जुर्रत न करे.

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अच्छा तो यह होगा कि खुद गुरुजी इस की पहल करें जिन्हें झारखंड का गार्जियन कहा जाने लगा है. लेकिन यह भी वे सोच लें कि हिंदूवादी फिर कहेंगे कि इन वनवासियों को धनुषबाण चलाना सिखाया तो हमारे रामजी ने ही था, इसलिए वे हिंदू ही हैं.

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डाक्टर डेंग बनाम खेरू

अनुपम खेर और नसीरुद्दीन शाह दोनों सुभाष घई की हिट फिल्म ‘कर्मा’ में एकसाथ नजर आए थे जिस में अनुपम डाक्टर डेंग नाम के खूंखार आतंकवादी के रोल में थे जबकि नसीद्दीन आतंकवादियों के खेरू नाम के मामूली प्यादे बने थे जिसे जेल से दादा ठाकुर यानी दिलीप कुमार निकाल कर लाए थे और डेंग को मारने में उस का इस्तेमाल किया था. नेकी और बदी की इस राष्ट्रीय लड़ाई में मारा खेरू भी गया था वह भी डेंग के गुर्गों के हाथों.

हालिया विवाद जिस में नसीरुद्दीन ने अनुपम को चाटुकार और अनुपम ने उन्हें नशेड़ी कहा, वह भी खूब हिट रहा. इस अहिंसक शाब्दिक युद्ध का फिल्म ‘कर्मा’ से कोई लेनादेना नहीं है क्योंकि वह फिल्म थी और यह इन बुढ़ाते कलाकारों का छिछोरापन, कुंठा और हकीकत है. कल्पना ही की जा सकती है कि दादा ठाकुर के रोल में अब कौन फिट बैठेगा जो खेरू को सुधारे और डेंग को गूंज वाला थप्पड़ मार पाए.

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