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समय मूल्यवान है, हर पल करें इसका उपयोग

समय मूल्यवान है, आप भी सोच रहे होगे कि इसमें कौन सी नई बात है , यह तो आप हम सभी बचपन से सुनते आ रहे है. लेकिन क्या आप ने कभी सोच है कि हम सभी इस मूल्यवान समय को किस कदर बर्बाद करते है. छोटे-छोटे खाली समय में हम बहुत कुछ सीख सकते है. जब आपका जॉब चला जाता है या जब आपका कोर्स ख़त्म हो जाता है या जब आप बिलकुल अकेले होते है या जब समय कटना मुश्किल होता है, तब आप क्या करते है, जनाब  सोचिए …! अगर कुछ खास नही करते तो किया कीजेये. उन हर पलो को यादगार सफ़र में बदलते चलिए .

किसी ने क्या खूब कहा है – ‘मुझे यह बता दीजिए कि अमुक व्यक्ति अपने खाली समय को बिताता किस प्रकार है, मैं यह बता दूँगा कि वह किस तरह का व्यक्ति है.’ बर्षो पुरानी यह लाईन आज भी हम सभी पर लागु होती है,  तो हम सभी को नित्य समय का उपयोग करते हुए , सुनहरे कल का निर्माण करना चाहिए.

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मनोवैज्ञानिको का एक बड़ा समूह एवं समय प्रबंधन के कई जानकारों का मानना है, कि अगर हम चाह जाये तो हर समय का उपयोग कर जीवन के इस सफ़र में काफी आगे जा सकते है,लेकिन हमसे अधिकतर लोग इस बात को एक किनारे कर अपने दैनिक जीवन में इस तरह मस्त रहते है, जैसे मानो जिन्दगी की गाड़ी का रफ्तार अब बढ़ने वाला ही नही है.दैनिक जीवन में हर पल का सदुपयोग करते हुए, खाली समय का भी पूरा उपयोग करे ताकि आप जीवन के इस सफ़र में काफी ऊपर जा सके.अपने खाली समय का उपयोग करने के लिए आप निम्न विकल्पों का सहारा ले सकते है:-

*  खाली समय में पुस्तक पढ़ना काफी बेहतर विकल्प है.

* आप अपने रूचि के अनुसार कुछ नई नया कर सकते है.

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* खाली  समय में आप समाज सेवा के विभिन्न कार्यो को कर सकते है, जिससे समाज में आपका अलग प्रभाव बनेगा.
* अगर आप शहर में रहते है तो खाली समय में ग्रामीण जीवन का समझाने के लिए अपने या  अपने मित्र/रिश्तेदार के गाँव जा सकते है.

* खाली समयों में आप अपनी कमजोरी को सुधार कर जीवन में आगे बढ़ सकते है.

* आप उन कार्यो कार्यो को कर सकते है- जिनको अपने समय के कमी के कारण पूरा नही किया.

अनाम कसबे का एंग्री ओल्डमैन

सामयिक घटनाओं पर ओजपूर्ण और क्रांतिकारी कमैंट्री करने वाले नागो दादा ने जब बासमती चावल का भाव सुना तो उन्हें क्रांति के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा. लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि उन्होंने राजनीतिक कमैंट्री तो जारी रखी लेकिन क्रांति की बात करनी छोड़ दी और हिंसक विचारों का पूरी तरह परित्याग कर दिया.

‘‘एक राउंड और चाय पिला  दो,’’ अखबार को मोड़ कर बगल की कुरसी पर लुढ़कते हुए नागो दादा ने कहा तो उन की पत्नी नीलिमा भड़क उठीं.

‘‘सुबह से खाली पेट 5 कप चाय पी चुके हैं. अल्सर हो जाएगा तो डाक्टर और अस्पताल का चक्कर लगाते रहिएगा. डायबिटीज तो हो ही चुकी है और क्याक्या बीमारी पालिएगा. मेरा तो जीवन बरबाद हो गया समझो. घर वालों ने किस के पल्ले बांध दिया है,’’ बड़बड़ाती हुई नीलिमा अंदर जाने लगीं.

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‘‘कभी तो अच्छा बोला करो. चाय पिए बिना प्रैशर बनता ही नहीं, क्या करें.’’

‘‘प्रैशर, हुंह, शरीर न हुआ स्टीम इंजन हो गया…’’

‘‘जाने दो, तुम को तकलीफ है तो हम खुद ही बना लेते हैं. नहीं तो शनि को बोल दो, बना देगी.’’

‘‘उस को पढ़नेलिखने दीजिएगा या नहीं. दिनरात आप ही की सेवा में लगी रहेगी तो कंपीटिशन की तैयारी क्या खाक करेगी. हमारी जिंदगी का तो जो हाल किया सो किया, उस को तो चैन से रहने दीजिए. चाय बना देती हूं लेकिन इस के बाद 3-4 घंटे चाय तो चाय, उस की पत्ती भी देखने को नहीं मिलेगी.’’

‘‘ठीक है भई, अभी तो दो.’’

यह रोज की दिनचर्या थी. नागो दादा दिन के एकडेढ़ बजे तक चाय पर चाय पीते जाते और 2-3 बजे तक तैयार हो कर खाना खाते. फिर अपनी बाइक ले कर निकल जाते.

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60 के लपेटे में पहुंचे नागो दादा अपने आधेअधूरे ज्ञान के बावजूद अंधों में काना राजा बने हुए थे. उन्हें कसबे के लोग बहुत बड़ा चिंतक और विद्वान समझते थे. उन की वाक्कला अद्भुत थी. कोई भी बात इतनी लच्छेदार भाषा में इतने तरीके से कहते कि अच्छेअच्छे लोग दंग रह जाते. कम पढ़ेलिखे लोग तो उन के सामने नतमस्तक रह जाते. इसीलिए उन्हें नागो दादा कहा जाने लगा. उन का असली नाम क्या है, कोई नहीं जानता.

आदिवासियों की बहुलता वाले उस इलाके में नागो दादा की पूछ का एक और बड़ा कारण था उन का हिंदी और अंगरेजी का ज्ञान, जिस के तहत वे प्रखंड या अनुमंडल कार्यालय में जरूरतमंदों के लिए आवेदन लिख देते थे. इस के एवज में कुछ नकद प्राप्ति भी हो जाती थी. उन्हें मांगना नहीं पड़ता था. लोग जातेजाते खुद ही उन की जेब में डाल जाया करते थे. वे थोड़ा नानुकर करते, फिर रख लेते.

उन की बाइक सब से पहले कल्लू चायवाले की दुकान पर रुकती थी, जहां उपस्थित लोगों के बीच वे सामयिक घटनाओं पर अपनी मौखिक टिप्पणी पेश किया करते. उन की टिप्पणियां बहुत ओजपूर्ण और क्रांतिकारी हुआ करतीं.

उन की कमैंट्री राष्ट्रीय स्तर से शुरू हो कर पंचायत स्तर तक आती थी. अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों को आमतौर पर नहीं छूते थे क्योंकि वे उन की समझ के बाहर होते थे. कुछ सतही बातें जरूर कभीकभार कह जाते थे. चीन को वे भारत का सब से बड़ा दुश्मन समझते थे और आतंकवादियों का असली संरक्षक उसी को बताते थे.

उन की बुरी आदतों से लोग परिचित थे. उन्हें पता था कि वे शाम को थोड़ी सी मदिरा पीना पसंद करते थे. इसलिए कोई न कोई उन की शाम की व्यवस्था का जिम्मा उठा ही लेता था. वे जब पीने बैठते और अपनी राजनीतिक कमैंट्री शुरू करते तो कितनी पी गए, यह ध्यान न रहता. अकसर उन्हें उन की बाइक सहित घर पहुंचाना पड़ता. जिस दिन ऐसा होता, नीलिमा देवी इतनी खरीखोटी सुनातीं कि उन का सारा नशा काफूर हो जाता.

सप्ताह में ऐसा दिन आ ही जाता. उन्होंने कई बार कोशिश की कि नीलिमा भी मदिरा का स्वाद चख ले. इस में वे कामयाब भी हुए लेकिन इस के बाद उन की जबान, जो आमतौर पर कैंची की तरह चलती है, एके-47 की तरह गोलियां बरसाने लगी. बस, फिर उन्होंने ऐसी कोशिशों को तिलांजलि दे दी.

नागो दादा मूल रूप से बिहार के रहने वाले थे. 20-25 साल पहले उन्होंने झारखंड के एक इलाके में आ कर क्रेशर मशीन लगाई थी. इसी इलाके के स्लीपर कारखाने को स्टोन चिप्स की सप्लाई करते थे. लेकिन आदतें वही थीं जो आज हैं. दिन के 2-3 बजे तक वर्कशौप पहुंचते थे. इस बीच कितना पत्थर टूटा, कितना माल भेजा गया, इस की देखभाल के लिए एक सुपरवाइजर नियुक्त था.

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वे कहा करते थे कि टाटा, बिड़ला अपने कारखानों में कभी जाते हैं भला. मैं तो फिर भी रोज चला आता हूं. उन के पहुंचने के बाद फिर वही जमघट. मजदूर थोड़ा रिलैक्स नहीं करेंगे तो बढि़या रिजल्ट कैसे देंगे, उन का मानना था. वे सबकुछ करते थे लेकिन पत्थर तोड़े जाने से उड़ने वाली धूल से अपने श्वसन तंत्र की रक्षा का कोई उपाय नहीं करते थे.

नतीजतन, 4-5 वर्षों तक के्रशर चलाने के बाद उन्हें हंफनी की शिकायत होने लगी. के्रशर को ठेके पर दे कर उन्होंने किसी तरह अपनी जान छुड़ाई.

के्रशर से तो जान छूटी लेकिन हंफनी की बीमारी ने 30 वर्ष गुजर चुकने के बाद भी उन की जान नहीं छोड़ी. अभी भी वे टे्रन या बस की सीट पर बैठ कर यात्रा नहीं कर पाते. वे अमूमन तो कहीं आनाजाना पसंद नहीं करते. जाना ही पड़े तो गेट पर खड़े रह कर आवागमन करते हैं.

क्रेशर का धंधा छोड़ने के बाद नागो दादा ने कई तरह के पापड़ बेले. कभी पत्ताप्लेट बनाने का काम किया, कभी हाफडाला पुराना ट्रक खरीद कर लोकल माल ढुलाई का काम करने लगे तो कभी बंगला भट्ठा लगा कर ईंट निर्माण का धंधा किया.

अपनी कार्यशैली के कारण वे किसी धंधे का सही ढंग से संचालन नहीं कर सके. हर धंधे में घाटा लगता गया. इस की क्षतिपूर्ति के लिए वे बिहार में ननिहाल से मिले खेत बेचते गए. इस चक्कर में अपने बड़े भाई से मनमुटाव कर बैठे. यहां तक कि किसी प्रकार का लेनदेन, आनाजाना भी बंद कर चुके हैं.

नागो दादा के इलाके के काफी लोग स्लीपर फैक्टरी में काम करते हैं. उन से उन की बातचीत भी है लेकिन उन में से किसी से उन की पटती नहीं क्योंकि वे उन का प्रवचन नहीं सुनते. दूसरे सीधेसादे ग्रामीणों के सामने वे कुछ भी शेखी बघार सकते हैं, वे आपत्ति नहीं करते. मध्य बिहार के लोग तुरंत बात काट कर थीसिस का ऐंटी थीसिस प्रस्तुत करने लगते हैं. दादा अपनी बातों से किसी तरह की असहमति बरदाश्त नहीं कर पाते. उन का सामाजिक दायरा भोलेभाले आदिवासियों से शुरू हो कर उन्हीं पर खत्म हो जाता है.

इलाके में तमाम आर्थिक उठापटक के बाद भी नागो दादा ने अपनी 2 बेटियों और 1 बेटे को बेहतर परवरिश और शिक्षा प्रदान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. बेटे को कंप्यूटर इंजीनियरिंग का कोर्स कराने के लिए हैदराबाद भेजा. अब उन्हें क्या पता था कि उस कालेज की मान्यता संदिग्ध है और उस में प्लेसमैंट की संभावना नहीं के बराबर है. इन बातों की जानकारी खुद विद्यार्थी को रखनी चाहिए. उन्होंने तो अपना कर्तव्य निभाया. उस ने जबजब जितने पैसे की मांग की, वे कहीं से भी इंतजाम कर के भेजते गए.

झारखंड के एक छोटे से कसबे में बैठ कर वे कैसे जान सकते थे कि उन के बेटे ने शराब पीने और खानेपीने के अलावा कई तरह के रईसाना शौक पाल लिए हैं. उसे लैपटौप की जरूरत थी, उन्होंने खरीद दिया. अब नागो दादा कैसे जान सकते थे कि वह लैपटौप पर पढ़ाई करता है या फिर फिल्म

डाउनलोड कर के देखता है या फिर फेसबुक पर मित्र बनाने, चैटिंग करने में ज्यादा समय बरबाद करता है.

नागो दादा के जमाने में कंप्यूटर और लैपटौप कहां थे इसीलिए जब बेटा घर आता और रातरात भर लैपटौप पर व्यस्त रहता तो उन की छाती फूल जाती कि बेटे का पढ़ाई में कितना मन लगता है. बेचारा ठीक से सो भी नहीं पाता. जरूर उन का नाम ऊंचा करेगा. अब वे क्या जानते थे कि रातभर वह लैपटौप पर करता क्या है.

बहरहाल, समय बीतते देर ही क्या लगती है. 4 वर्ष का समय गुजर गया. उस की पढ़ाई पूरी हो गई. उस ने बताया कि कई कंपनियों ने इंटरव्यू लिया है. कौललैटर आता ही होगा. लेकिन इस बीच उसे बेंगलुरु में रहना होगा, वहां आईटी का जबरदस्त स्कोप है.

नागो दादा ने उसे कमरा खोजने के लिए कहा. वह हैदराबाद से बेंगलुरु आ गया. एक बार वह इंटरव्यू के लिए चेन्नई गया हुआ था. नागो दादा ने मोबाइल पर पूछा कि पैसे हैं या नहीं? उस ने अपने एक मित्र के खाते में 1 हजार रुपए भेजने को कहा. नागो दादा ने पुत्रमोह से ग्रसित हो कर उदारतापूर्वक 2 हजार रुपए भेज दिए. तीसरे दिन फोन आया कि बेंगलुरु लौटने का किराया नहीं है, कुछ और पैसे भेज दीजिए. नागो दादा ने पूछा कि2 हजार रुपए का क्या हुआ? उस ने बताया कि उस का सैलैक्शन हो गया तो दोस्तों को पार्टी देनी पड़ गई. उन्होंने पूछा कि कौललैटर कब तक आएगा?

तो उस ने बताया कि एकडेढ़ महीने में आ जाएगा.

6 महीने बीतने के बाद भी जब कौललैटर नहीं आया और किसी कंपनी ने याद नहीं किया तो नागो दादा ने उसे अपने पास लौट आने और यहीं रह कर कंपीटिशन की तैयारी करने को कहा. मन मसोस कर वह वापस तो लौट आया लेकिन इंटरव्यू और परीक्षा के बहाने कभी कोलकाता तो कभी चेन्नई का चक्कर लगाने का जुगाड़ करता रहा.

बाद में नागो दादा ने अपने उन बड़े भाई, जिन से सारे संबंध तोड़ चुके थे, के बेटे यानी अपने भतीजे से कह कर उस के लिए दिल्ली में छोटीमोटी नौकरी की व्यवस्था करा दी.

नागो दादा की छोटी बेटी पढ़ने में तेज थी. उस ने कई प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने के बाद एक बहुराष्ट्रीय बैंक में अच्छी नौकरी प्राप्त कर ली. बड़ी बेटी को भी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए हर सहूलियत दी लेकिन अभी तक उसे सफलता नहीं मिली. उस के लिए नागो दादा को चिंता लगी रहती थी. लेकिन अपनी दिनचर्या में चिंतित होने का वक्त उन्हें बहुत कम मिलता था.

वे भूतकाल में खूब विचरण करते थे. कोई सुनने वाला मिल जाए तो संस्मरणों की बौछार कर देते थे. बढ़ती महंगाई की उन्हें ज्यादा चिंता नहीं होती थी क्योंकि उन के दिमाग में जो अंतिम मूल्यतालिका थी वह 1970 के आसपास की थी. आमतौर पर खरीदारी नीलिमा देवी और शनि ही करती थीं.

एक बार नागो दादा चावल खरीदने गए. दुकानदार से पूछा, ‘बासमती क्या भाव है?’ दुकानदार ने बतलाया,

‘55 रुपए किलो, कितना दूं?’ तो नागो दादा भड़क उठे, ‘लूट मचा रखी है तुम ने. हम ने 7 रुपए किलो बासमती खाया है. इतना दाम कहीं बढ़ता है.’ दुकानदार ने मुसकराते हुए पूछा, ‘किस जमाने की बात कर रहे हैं, दादा?’

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‘जमाने की, 77-78 तक तो यही भाव था.’

‘यह 2014 है, दादा. जाने दीजिए. भाभीजी को भेज दीजिएगा, वही चावल ले जाएंगी.’

नागो दादा बड़बड़ाते हुए दुकान के बाहर निकल आए.

‘अब इस देश के लोगों को हथियार उठाना होगा. क्रांति के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है. मंत्रियों को शूट करना होगा. दहशत फैलानी होगी तभी वे रास्ते पर आएंगे.’

उस दिन शाम को नागो दादा लोगों को समझा रहे थे. एक माओवादी युवक उन की बातें गौर से सुन रहा था.

अगले दिन वह ऐन उस वक्त उन के सामने उपस्थित हुआ जब वे अपने घर से बाहर निकलने के लिए बाइक स्टार्ट कर रहे थे.

‘दादा, कल आप की बात से काफी प्रभावित हुआ हूं. क्या आप हम लोगों के बीच चल कर अपनी बात रखना चाहेंगे?’

‘कहां?’

‘जंगल में. वहां कैडर भी मिलेंगे और हथियार भी.’

‘तुम माओवादी हो क्या?’

‘वही समझ लीजिए.’

‘माफ करना, भाई, अभी कुछ काम है, बाद में बात करेंगे.’

‘फिर कब आऊं?’

‘तुम्हारे आने की जरूरत नहीं है. मैं खुद ही बात कर लूंगा.’

युवक मुसकराते हुए चल दिया.

नागो दादा ने उस दिन से क्रांति की बात करनी छोड़ दी. राजनीतिक कमैंट्री जरूर जारी रही लेकिन उन्होंने हिंसक विचारों का पूरी तरह परित्याग कर दिया.

मैं रेप की सजा भुगत चुका हूं. अब जिससे शादी करना चाहता हूं, उसे बताऊं या नहीं.

सवाल

मैं 37 वर्षीय अविवाहित डाक्टर हूं, एक सरकारी अस्पताल में कौंट्रैक्ट बेसिस पर कार्यरत हूं. मैं एक लड़की से विवाह करना चाहता हूं. समस्या यह है कि इस से पहले मैं रेप के अपराध में 5 साल की जेल की सजा भुगत चुका हूं. मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं जिस लड़की से विवाह करना चाहता हूं उसे इस बारे में बताऊं या नहीं. हालांकि वह और उस का परिवार अगर जांच पड़ताल करेंगे, भी तो इस बारे में उन्हें कुछ पता नहीं चल पाएगा. पर मुझे क्या करना चाहिए, उन्हें सब कुछ बता देना चाहिए या नहीं?

जवाब

आप का परेशान होना जायज है लेकिन इस मामले में हमारी आप को यही सलाह होगी कि जिस लड़की के साथ आप अपनी आने वाली जिंदगी गुजारना चाहते हैं, उसे अपने अतीत से अवश्य वाकिफ कराएं, फिर उस के बाद वह लड़की जो निर्णय ले, उसे आप मंजूर करें. आप उसे पूरी बात विस्तार से बताएं और वर्तमान स्थिति से भी अवगत कराएं क्योंकि यह जानना उस का हक भी है. जहां तक आप का यह समझना कि लड़की और उस के परिवार वालों को आप के अतीत के बारे में पता नहीं चलेगा, इस गलतफहमी में न रहें. ऐसी बातें छिपाए नहीं छिपतीं, इसलिए उसे यह बात कहीं और से पता चले और उस का असर आप की आने वाली जिंदगी पर पड़े, इस से बेहतर है उसे आप सबकुछ सचसच बता दें. इसी में आप की भलाई है.

 

मैं एक लड़के से बहुत प्यार करती हूं. पर मम्मी पापा नहीं मानेंगे. हम क्या करें.

मैं गांव के एक लड़के से बहुत प्यार करती हूं. वह आईटीआई कर रहा है और बहुत अच्छा है. हम दोनों शादी करना चाहते हैं, पर हम दोनों एक ही गांव के हैं, लिहाजा हमारे मम्मी पापा नहीं मानेंगे. हम क्या करें?

जवाब

पहले कुछ गांवों में ऐसा रिवाज था, पर आजकल ऐसी बातें फुजूल मानी जाती हैं. आप दोनों मिल कर अपने घर वालों को समझाएं, तो वे मान सकते हैं. बात न बने तो शहर में जा कर कोर्ट मैरिज की जा सकती है, पर लड़के को गुजारा करने लायक पैसा कमाना चाहिए.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

 

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गुड़ के हैं अनेको लाभ

गुड़  का नाम सुनते ही मुंह में पानी और मन में मिठास आ जाती है, मन-मस्तिष्क को भाने वाला गुड सेहत के लिए फायदेमंद है. आयुर्वेद में गुड़ को अत्यन्त गुणवान, आयु को बढ़ाने वाला और शरीर को निरोग तथा यौवन को स्थिर रखने वाला कहा गया है. आयुर्वेद के अनुसार गुड़ क्षारीय, भारी, सि्ग्ध होता है. ठंड के दिनों में शक्तिवर्ध्दक है, और मूत्र की रुकावटों को दूर करता है. गुड़ जितना पुराना हो उतना अधिक गुणों से युक्त होता है.गुड़ में पाया जाने वाला क्षारीय गुण रक्त की अम्लता को दूर करता है। मेहनतकश एवं खिलाड़ियों के लिये तो यह किसी वरदान से कम नहीं है.

” गुड़ का उपयोग मूलतः दक्षिण एशिया में किया जाता है. भारत के ग्रामीण इलाकों मे गुड़ का उपयोग चीनी के स्थान पर किया जाता है. गुड़ लोहतत्व का एक प्रमुख स्रोत है और रक्ताल्पता (एनीमिया) के शिकार व्यक्ति को चीनी के स्थान पर इसके सेवन की सलाह दी जाती है.गुड़ के एक अन्य हिन्दी शब्द जागरी का प्रयोग अंग्रेजी में किया जाता है. ”

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शक्कर के अधिक सेवन करने से कई प्रकार की बीमारियां हो जाती हैं, जबकि गुड़ के प्रयोग से कुछ नहीं होता.गुड़ में कई पौष्टिक तत्व विद्यमान रहते हैं.रासायनिक विश्लेषणों से यह बात सामने आयी है कि अनेक खाद्योपयोगी घटक तथा लोहा, कैल्शियम, गंधक, पोटेशियम एवं विटामिन आदि गुड़ में भरपूर मात्रा में उपलब्ध है. गुड़ में पैनथीनिक एसिड, नायसिन, थियासिन, रीबोप्लेविन, पायरिडोक्सिन, बायोटिन, फालिक एसिड तथा आइनोसिटल इतनी मात्रा में पाए जाते हैं कि यह एक प्रमुख सामग्री के रूप में गिना जाता है.गुड़ के प्रत्येक 100 ग्राम भाग में प्रोटीन 0.4 ग्राम, वसा 0.1 ग्राम, खनिज 0.6 ग्राम, कैल्शियम 80 मि.ग्रा, फास्फोरस 40 मि.ग्रा, लोहा 11.4 मि.ग्रा आदि पोषक तत्व होते हैं. हमारे भोजन में मक्का, ज्वार, बाजरे की रोटी के साथ गुड़ खाया जाता है.आजकल तो शादियों में बड़े-बड़े भोज आयोजित किये जाते हैं तथा वहां पर भी मक्का, बाजरे की रोटी के साथ गुड़ का स्टाल लगाया जाता है.हृदय विशेषज्ञ नीरज सिन्हा का मानना है कि गुड़ की पपड़ी या गुड़ की चीज खाने से हृदय मजबूत होता है.

गुड़ में कैल्शियम, मैंगनीज और मेगनीशियम होने के कारण उसका औषधीय महत्व भी बहुत है.तो आईये जानते है, इसके महत्वपूर्ण गुणों के बारे में …

* प्रसव के पश्चात स्त्रियों को गुड़ देना प्राचीनकाल से चला आ रहा है.शिशु जन्म के बाद गर्भाशय की पूर्ण रूप से सफाई न होने पर अनेक विकार होने की संभावना बनी रहती है.

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* शिशु के जन्म के 3 दिन तक प्रसूता को गुड़ के पानी के साथ सौंठ दी जाती है. गुड़ ग्लूकोज के समान ही एक पौष्टिक आहार है.इसमें कैलोरी भी भरपूर मात्रा में पायी जाती है.

* वैज्ञानिकों एवं चिकित्सकों का कहना है कि यौवन क्षमता बनाए रखने तथा दीर्वजीवन के लिये गुड़ का प्रयोग अच्छा रहता है.

*जो बच्चे रिकेट दांत के क्षय या कैल्शियमहीनता की दूसरी बीमारियों से पीड़ित हो उनको हमेशा चीनी की जगह पर्याप्त गुड़ देना चाहिये.

* बढ़ते हुए बच्चों के लिये यह एक अत्यन्त उत्तम खाद्य है.

* यदि बच्चों को उचित मात्रा में दूध न मिले तो उन्हें कुछ मात्रा में गुड़ देना चाहिए .

* पतले दस्त लगने पर एवं तेज बुखार के कारण शरीर में पानी की कमी हो जाने पर गुड़ के पानी में नींबू का रस मिलाकर देने से तत्काल राहत मिलती है क्योंकि गुड़ ग्लूकोज के समान कार्य करता है.

* भोजन के साथ गुड़ खाने से थकान दूर होती है.

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* गुड़ और काले तिल के लड्डू बच्चों को देने से बच्चों का बिस्तर में पेशाब करना दूर हो जाता है.

* भोजन के बाद गुड़ खाने से गैस नहीं बनती है। सर्दी, जुकाम या कफ बहुत बनता हो तो अदरक व गुड़ बराबर मात्रा में दिन में तीन बार लेने से आराम मिलता है.

* दुधारु पशुओं को गुड़ के साथ हिमालिया बत्तीसा देने से  वह स्वस्थ रहते हैं। पाचन क्रिया ठीक रहती है, तथा दूध में भी बढ़ोत्तरी होती है.इसके अलावा पशुओं को पानी पिलाते समय तगारी या बाल्टी में थोड़ा आटा व थोड़ा सा गुड़ व मामूली नमक डालकर पिलायें, पशु बहुत ही रूचि से पानी पीता है.

काश ऐसा हो पाता भाग-4

सुमन के मम्मीपापा को इस में आपत्ति नहीं थी मगर उन्होंने इस के पूर्व सुधाकर से मिलने की इच्छा जताई.

सुधाकर मथुरा जा कर सुमन के मम्मीपापा से मिल आया. सुमन के पापा तब तक नहीं जान पाए थे कि सुधाकर उन्हीं के मित्र विमल शर्मा का पुत्र है, जिन को लोग उन के शत्रु के रूप में जानते हैं. उन्हें अपनी बेटी के लिए एक सुयोग्य वर की तलाश थी, जो घरबैठे पूर्ण हो रही थी.

यह राज तो तब खुला जब सुधाकर के मम्मीपापा अपने बेटे के विवाह के लिए औपचारिक रस्म निभाने मथुरा आए.

थोड़ी देर के लिए तो वे दोनों अवाक् रह गए कि वे क्या देखसुन रहे हैं. और उन्हें क्या और कैसे बात करनी है.

‘मुझे माफ कर दो, विमल,’ आखिरकार सुमन के पापा रुंधे कंठ से बोले, ‘15 साल पहले की गई गलती का एहसास मुझे समय रहते हो गया था. मगर समय को वापस लौटाना कहां संभव है. अगर वह हादसा हो जाता जिसे करने की मैं ने कोशिश की थी, तो दोनों ही परिवार बरबाद हो जाते.’

‘अब उस बात को जाने भी दो.’

‘मैं सुमन का विवाह सुधाकर से करूं, यही मेरा प्रायश्चित्त होगा.’

‘अरे, यह प्रायश्चित्त की नहीं, प्रसन्नता की बात है. मैं अपने बेटे के लिए तुम्हारी बेटी का हाथ मांगने आया हूं,’ विमल शर्मा उन्हें गले लगाते हुए बोले, ‘उस दुस्वप्न को तो मैं कब का भूल चुका हूं.’

विवाह की रस्म पूर्ण होने के कुछ दिन बाद वह सुधाकर के घर चली आई थी.

‘‘अरे सुमन, कहां खो गईं,’’ सुधाकर बोला तो उस की तंद्रा टूटी, ‘‘जरा बाहर का नजारा तो देखो, कितना खूबसूरत है.’’

वह शीघ्रतापूर्वक संभल कर चैतन्य हुई. गाड़ी के शीशे से वह बाहर प्रकृति का नजारा देखने लगी. रास्ते की ढलान पर गाड़ी मंथर गति से आगे बढ़ रही थी. जरा सी फिसलन हुई नहीं, जरा सा चूके नहीं कि सैकड़ों फुट गहरी खाई में गिरने का खतरा था.

जैसा कि भय था, वही हुआ. बारिश अब बर्फबारी में बदल चुकी थी. रूई के फाहे के समान बर्फ के झोंके गिर रहे थे. देखते ही देखते पहाड़ों और घाटियों की हरियाली बर्फ की सफेद चादर से ढक गई थी. चारों तरफ दूरदूर तक निशब्द सन्नाटा था. वातावरण पर जैसे एक ही सफेद रंग पुत सा गया था. बर्फ की परत जमी कंक्रीट की सड़क पर गाडि़यों का काफिला बैलगाड़ी की गति से आगे बढ़ रहा था. जैसे किसी आसन्न खतरे का आभास हो, वैसी चुप्पी सब के चेहरे पर चस्पां थी. चूंकि गाडि़यों के ड्राइवर स्थानीय थे और एक्सपर्ट थे, यही एक बात आश्वस्त करने वाली थी कि दिक्कत नहीं आएगी.

रास्ते में कहींकहीं कुछ अर्द्धवृत्ताकार टिन के घर दिखे, जिन के बाहर सन्नाटा पसरा था. वहीं कहीं कुछ धर्मचक्र घुमाते बौद्ध भिक्षु दिखे. मंत्र लिखित सफेद पताकाओं की शृंखलाएं भी पहाड़ों और घाटियों के बीच दिख जाती थीं, जो हवाओं से लहराते हुए रहस्यमय वातावरण का सृजन करती प्रतीत होती थीं.

रास्ते में छोटेनाटे, मगर हृष्टपुष्ट कदकाठी के स्थानीय स्त्रीपुरुष दिखे, जो सड़क के निर्माण कार्य में व्यस्त थे. रबर के गमबूट और दस्ताने पहने, पत्थर तोड़ते और बिछाते हुए स्थानीय लोग. कभी खाली हाथ तो कभी बेलचोंकांटों की मदद से काम करते. भीमकाय डोजरक्रशर आदि कहीं पत्थरों में छेद करते तो कहीं काटतेतोड़ते, कहीं हटाते और डंपरों में भरते अथवा खाली करते थे.

जीवन में रोमांच क्या होता है और हजारों फुट ऊपर बर्फ से ढके पहाड़ों का जीवन कितना कठिन होता होगा, यह उसे अब समझ में आने लगा था. रास्ते के किनारे पैरों में गमबूट और हाथों में रबर के दस्ताने पहने रास्ते को ठीक करने वाले स्थानीय मजदूर इस जोखिम भरे मौसम में भी काम कर रहे थे.

सड़क के कार्यरत स्थल पर पहाड़ी कुत्ते रास्ते की बर्फ में ही कुलेल कर रहे थे. एक स्थान पर भैंसे समान याक पर सामान लादे कुछ स्थानीय लोग उधर से गुजर गए.

ओ, तो यही याक है. इसे देखना भी एक सुखद संयोग था.

बादलों के बीच सूर्य पता नहीं कहां छिप गया था. बर्फबारी रुकने का नाम नहीं ले रही थी. रास्ते की फिसलन बढ़ती जा रही थी. एक स्थान पर गाडि़यों का काफिला रुका तो सभी गाडि़यों के ड्राइवर गाड़ी के पिछले पहियों में लोहे की जंजीर पहनाने लगे ताकि फिसलन का दबाव कम हो. यह भी एक अलग रोमांचक अनुभव था.

लगभग 9 बजे रात में गाड़ी ने जब गंगटोक शहर की सीमा में प्रवेश किया तो सभी की जान में जान आई. इधर हिमपात के बजाय वर्षा हो रही थी. गाडि़यों की गति में अब तीव्रता आ गई थी. एक खतरनाक अनुभव से गुजर कर अब सभी जैसे चैन की सांस ले रहे थे.

होटल पहुंच कर उन्होंने कपड़े बदले. होटल का नौकर खाना लगाने लगा.

‘‘बहुत दिक्कत हुआ न साहेब,’’ वह बोला, ‘‘अचानक ही मौसम खराब

हो गया. यहां अकसर ही ऐसा हो

जाता है.’’

‘‘हां भई, बड़ी मुश्किल से जान बची,’’ सुधाकर बोला, ‘‘बर्फ भरे रास्ते पर गाड़ी का चलना बहुत मुश्किल था. मुझे लगा कि अब हमें वहीं सड़क के किनारे रात काटनी होगी. अगर ऐसा होता तो हमारी तो कुल्फी ही जम जाती.’’

वह चुपचाप बाहर का दृश्य देख रही थी. बारिश बंद हो चुकी थी और सितारों से सजे आकाश के नीचे गंगटोक शहर  कृत्रिम रोशनी में झिलमिला रहा था. वैसे भी पहाड़ी शहर होते ही ऐसे हैं कि हमेशा वहां दीवाली सी रोशनी का आभास होता है. मगर वहां का नजारा ही कुछ अलग था. वहां के ऊंचेऊंचे दरख्त हरियाली से भरे पड़े थे.

‘‘अरे, तुम कुछ बोलो भी,’’ सुधाकर बोला, ‘‘लगता है तुम काफी डर गई हो.’’

‘‘डर तो गई ही थी, सुधाकर,’’ वह बोली, ‘‘फिलहाल मैं नाथुला की सीमाओं के बारे में सोच रही हूं, जहां भारतीय और चीनी सैनिक आमनेसामने खड़े थे. हम तो वहां से सुरक्षित निकल कर यहां आ गए. मगर उस बर्फबारी में भी वे अपनी सीमाओं पर डटे होंगे. मैं यह सोच रही हूं कि इस परिस्थिति में भी क्या उन्हें अपने परिवार की याद नहीं आती होगी, जैसे कि हमें आई थी?’’

‘‘क्यों नहीं याद आती होगी, सुमन,’’ सुधाकर गंभीर स्वर में बोला, ‘‘तमाम प्रशिक्षण के बावजूद आखिर वे भी मनुष्य हैं. उन के सीने में भी दिल धड़कते हैं. और उन के मन में भी मानवीय विचार अंगड़ाई लेते होंगे. उन के हृदय में भी भावनाएं हैं. मगर कर्तव्य सर्वोपरि होता है, इस का एहसास उन्हें है. इसी कारण हम यहां सुरक्षित हैं. देश और समाज इसी तरह आगे बढ़ता और सुरक्षित रहता है. तुम्हारे एक चाचाजी भी तो इसी प्रकार के सैनिक थे.’’

सुमन का मन एक गहरी टीस से

भर गया.

‘‘हमारे और तुम्हारे परिवार के बीच में भी एक खटास थी, जो हम ने खत्म कर दी. क्या इसी प्रकार राष्ट्रों के बीच की यह खटास खत्म नहीं हो सकती?’’

‘‘क्यों नहीं हो सकती,’’ वह बोला, ‘‘स्वार्थ और संघर्ष की व्यर्थता का एहसास होते ही दूरियां खत्म होने लगती हैं,’’ सुधाकर उस की बगल में आ कर खड़ा हो गया था, ‘‘काश ऐसा हो पाता, जैसा कि तुम सोच रही हो.’’

बाहर बारिश थम गई थी. बादल छंट गए थे और आकाश सितारों से सज गया था. धुला हुआ गंगटोक शहर अब कृत्रिम प्रकाश से और चमक उठा था.

काश ऐसा हो पाता

क्यों सुलग रही है दिल्ली?

बीती 23 फरवरी से राजधानी दिल्ली में शुरू हुई हिंसा में इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय तक 22 लोगों की मौत हो चुकी थी और 250 लोग जख्मी हैं. जहां तक मौतों का सवाल है, अब तक जीटीबी अस्पताल में 21 और जेपी अस्पताल में 1 मौत हुई है. अब हालात काबू में करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल पर है. गृहमंत्री अमित शाह दिल्ली के हालात पर जल्द ही रिपोर्ट पेश करेंगे.

मगर मूल सवाल यह है कि दिल्ली में किसी भी संकट से निपटने के लिए मौजूद तमाम संसाधनों के बावजूद आखिर इस कदर हिंसा हुई कैसे? क्या इसके लिए सिर्फ कपिल मिश्रा जैसे छुटभैय्ये नेता और उनके उकसाऊ भाषण जिम्मेदार हैं या इसके लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक की घोर लापरवाही जिम्मेदार है? या फिर हिंसक उग्रता को जांचने परखने के लिए दिल्ली को एक मॉडल की तरह इस्तेमाल किये जाने की यह देन है?

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इसमें कोई दो राय नहीं है कि दिल्ली में जनसंख्या के अनुपात में पुलिसबलों की संख्या काफी कम हैलेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि महज 1484 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले दिल्ली शहर में 84,000 से ज्यादा पुलिसबल हैजिसमें करीब 50,000 पुलिसबल हमेशा सक्रिय और सेवा में रहता है. क्या इतने बड़े पुलिस दल को भी 5 से 6 कालोनियों में भड़की दंगों को काबू में करना मुश्किल थावह भी तब जब उत्तर पूर्व दिल्ली की इन चार पांच कालोनियों को छोड़कर पूरी दिल्ली में शांतिपूर्ण माहौल था.

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीआईजी पुलिस तथा चर्चित विचारक विभूति नारायण राय ने बहुत साल पहले एक बात कही थी कि अगर सरकार और पुलिस न चाहे तो दंगे भड़क तो सकते हैंलेकिन वो फैल नहीं सकते.

दिल्ली में पिछले करीब 3 महीनों से जिस तरह की स्थितियां धीरे-धीरे करके गढ़ी गई हैं,उससे तो लगता है कि यहां साम्प्रदायिक तनाव विस्तारित नहीं हुआ बल्कि एक तरह से उसे पूरी मेहनतमशक्कत के साथ जमीन में बोया गया है, जिसकी अब जहरीली फसल तैयार हो चुकी है. दिल्ली में पिछले तीन दिनों में देखते ही देखते जिस तरह स्थितियां काबू से बाहर हुईंवह दंगों के फैलने और बढ़ने का एक क्लासिक उदाहरण है. शायद देश के इतिहास में यह पहला मौका होगा जब थोड़े से इलाके में साम्प्रदायिक तनाव के चलते दो समुदायों के बीच रह-रहकर एक हजार राउंड से भी ज्यादा गोलियां चलायी गई हैं. याद रखिए यह आंकड़ा बहुत खतरनाक इसलिए भी है क्योंकि इतनी गोलियां महज 48 घंटे के अंदर चलीं. ऐसा अब के पहले कभी नहीं हुआ मुंबई जैसे भयानक दंगों के समय भी.

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लगता है दिल्ली की इस अराजक हिंसा के बाद अब दंगाइयों का गोली चलाना आम हो जाएगा.आखिर ये स्थितियां क्यों और कैसे बनीं ? इसके पीछे किसकी सुनियोजित साजिश या लापरवाही थीक्या यह हिंसा और बेकाबू में हुई स्थितियां राजनीतिक फायदा उठाने के लिए एक तयशुदा योजना के साथ घटित हुईंदिल्ली में जैसा कि हम सभी जानते हैं कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी केंद्रीय गृह मंत्री की है.गृह मंत्रालय के अधीन देश के अंदर और देश के बाहर सक्रिय रहने वाली खुफिया एजेंसियां हैं तथा और भी जबरदस्त नेटवर्क हैं. इसके बाद भी यह किसकी चूक थी कि एक मामूली सा तनाव देखते ही देखते इतना उग्र हो गया.

अगर सारी स्थिति को क्रमिकता के नजरिये से देखें तो साफ पता चलता है कि दिल्ली में जो खौफनाक स्थितियां पैदा हुईंवह स्वतःस्फूर्त नहीं थींउन्हें कोशिशन पैदा किया गया था और इसमें हर राजनीतिक पार्टी की अपने-अपने स्तर की भूमिका थी. केंद्रीय गृह मंत्रालय जिसके अंतर्गत दिल्ली की पुलिस तथा कानून व्यवस्था आती हैवह केंद्र सरकार अगर पहले से इस भयावह स्थिति का सही आंकलन कर पाती तो इस तरह की स्थितियां नहीं बनतीं. लेकिन सिर्फ केंद्रीय गृह मंत्रालय और अमित शाह को ही इस पूरी घटना का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

आखिर दिल्ली के अब तक के सर्वाधिक लोकप्रिय और जनता के लिए उनके हितैशी के रूप में मशहूर केजरीवाल ने इन दंगों को इस स्थिति तक न पहुंचने देने के लिए क्या कियामाना कि उनके पास पुलिस की बागडोर नहीं हैलेकिन पुलिस से ज्यादा कारगर दंगों के समय राजनेताओं का जमीन में उतरना होता है.

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क्या मुख्यमंत्री केजरीवाल अपने विधायकोंमंत्रियों के साथ तनाव वाली सड़कों में उतर नहीं सकते थे? अगर वह वाकई ऐसा करते क्या तब भी स्थितियां ऐसी होतीं? अगर कांग्रेस तथा दूसरी विपक्षी पार्टियों के लोग भी इस तनावपूर्ण स्थिति की संवेदना को समझते हुए लोगों के बीच पहुंचते तो क्या दंगाई मनमानी कर पाते? हकीकत तो यह है कि जिन इलाकों में पुलिस को स्थिति काबू में करनी थी, वहां कई जगहों पर पुलिस ने अपनी घिनौनी हरकतों से खुद साम्प्रदायिक उन्माद का हिस्सा बनी हुई थी.

दीपिका के बाद तापसी भी हुईं ट्रोलिंग का शिकार, रिलीज से पहले ही शुरू हुआ ‘थप्पड़’ का बॉयकॉट

दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘छपाक’ 10 जनवरी को पर्दे पर आई थी. इस फिल्म की कहानी एसिड पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन पर आधारित थी. फिल्म की कहानी बेहद ही शानदार थी सभी को उम्मीद थी यह फिल्म पर्दे पर शानदार प्रर्दशन करेगी, लेकिन दीपिका जेएनयू में हो रहे प्रोटेस्ट का हिस्सा बनी जिसका असर उनके फिल्म पर दिखा,लोगों ने इस फिल्म का बॉयकॉट करना शुरू कर दिया. यहीं कारण था जिस वजह से फिल्म पर्दे पर फ्लॉप हो गई. कुछ ऐसा ही हुआ तापसी पन्नू की फिल्म ‘थप्पड़’ के साथ भी

दरअसल, तापसी की फिल्म ‘थप्पड़’ 28 फरवरी को पर्दे पर रिलीज हुई जबकी इससे पहले ही लोग इस फिल्म के खिलाफ कई तरह के सवाल करने लगे थें. इस फिल्म के खिलाफ बॉयकॉट के नारे लगाने शुरू हो गए थे. इसके पीछे की वजह थी तापसी का प्रोटेस्ट में जाना.

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मुंबई में हुए प्रोटेस्ट में तापसी ने हिस्सा लिया था जिसके बाद लोग उनके खिलाफ हो  गए थें. तापसी ने प्रोटेस्ट के दौरान कहा था मैं CAA के बारे में ज्यादा नहीं जानती थी क्योंकि इसके बारे में मैं ज्यादा पढ़ी नहीं थी लेकिन जेएनयू में जो लड़ाई का वीडियो देखा था वह बहुत ही शर्मनाक था.

 

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A heart laugh! Our most common expression lately! #Thappad

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इस बात से तापसी लाइमलाइट में आ गई थीं. लोग उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिए थे. वहीं तापसी ने इस बात पर सफाई देते हुए कहा है ‘व्यक्तिगत राय औऱ प्रोफेशनल लाइफ दोनों अलग-अलग चीज है. दोनों की तुलना करना गलत है. आगे उन्होंने कहा किसी भी हैशटैग  को  ट्रेंड  करने के लिए 1000-2000 ट्वीट्स  से अगर किसीको लगता है वाकई किसी फिल्म पर फर्क पड़ता है तो यह गलत है. इससे मेरे फिल्म पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. जिसे मेरी फिल्म देखनी होगी वह जाकर जरूर देखेंगे. फिल्म को राजनीतिक विचारधारा पर तय करना गलत है.’

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तापसी अपने बेबाक अंदाज की वजह से आए दिन ट्रोलर्स का सामना करती हैं. दिल्ली इलेक्शन के दौरान भी उन्हें कुछ ट्रोलर्स का सामना करना पड़ा था हालांकि तापसी बहुत स्मार्ट तरीके से उनका जवाब देती हैं. अगर काम की बात करें तो तापसी कई अळग-अलग प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हैं.

Film Review: जानें कैसी है फिल्म ‘दूरदर्शन’, यहां पढ़ें रिव्यू

रेटिंग: डेढ़ स्टार

निर्माताः रितु आर्या व संध्या आर्या

निर्देशकः गगन पुरी

कलाकारः माही गिल,मुनरिषि चड्ढा,डौली अहलूवालिया, सुप्रिया शुक्ला

अवधिःदो घंटे दस मिनट

फिल्मकार गगनपुरी ने आधुनिक रिश्तों को तीस वर्ष पहले के दूरदर्शन व उस पर प्र्रसारित होने वाले कार्र्यक्रमों के साथ जोड़कर हास्य के साथ रिश्तों के ताने-बाने चित्रित करने जैसा बेहतरीन विषय चुना है.जहां अत्याधुनिक परिवार के  सभी सदस्य,जो कि अश्लील साहित्य में डूबे रहते हैं,वह भी तीस वर्ष बाद कोमा से अपनी दादी के जागने पर खुद को उसी माहौल में ढ़ालते हैं.मगर कमजोर पटकथा के चलते वह एक बेहतरीन फिल्म बनाने से पूरी तरह चूक गए.

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कहानीः

यह कहानी सुनील (मनु ऋषि चड्ढा)के परिवार की है.सुनील की पत्नी प्रिया(माही गिल)उनसे अलग रहती है और तलाक लेना चाहती है.सुनील अपने किशोर वय के बेटे सनी (शार्दुल राणा)व बेटी के साथ रहते हैं.सनी को अपने पिता के मित्र व पड़ोसी(राजेश शर्मा)की बेटी ट्विंकल( महक मनवानी)से प्यार करता है.तो वहीं सनी अपने मित्र बंटी के साथ अश्लील साहित्य पढ़ता रहता है.सुनील की मां दर्शन कौर (डॉली अहलूवालिया) तीस साल से कोमा में हैं.एक दिन घर के अंदर सुनील की मां दर्शन कौर के कमरे में बैठकर बंटी,सनी को अश्लील कहानी पढ़कर सुनाता है.विमला की कहानी सुनकर तीस वर्षों से कोमा में पड़ी दादी दर्शन कौर (डॉली अहलूवालिया)कोमा से उठ खड़ी होती है.इतने वर्षों से कोमा में पड़ा रहने की जानकारी पाकर कोई सदमा ना लगे,इसके डर से उनका बेटा सुनील (मनु ऋषि चड्ढा) और उसकी पत्नी प्रिया (माही गिल) उनके इर्द-गिर्द 90 के दशक का माहौल बनाते हैं.सुनील का बेटा सनी व बेटी आपसी मतभेद भुलाकर दादी की सेवा में जुट जाते हैं.अपने कमरे में ज्यादातर समय बिताने वाली दादी अपने जमाने वाले दूरदर्शन लगाने की बात करती हैं. दादी एक एक करके चित्रहार से लेकर दूसरे कार्यक्रम देखने की फरमाइश करती हैं.सभी मिलकर दादी के लिए खुद शूटिंग करके उस जमाने के कार्यक्रम तैयार करते हैं. सिर्फ टीवी ही नहीं बल्कि उनके परिवार के लोगों को खुद को भी तीस वर्ष पहले के जमाने के अनुसार ढलना पड़ता है.परिणामतः पोते पोती घर के नौकर,तो सुनील और प्रिया स्कूल जाने वाले विद्यार्थी के रूप में पेश आते हैं,जिनकी जल्द शादी होने वाली है.पर एक दिन दादी के सामने सच आ ही जाता है.

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लेखन व निर्देशनः

फिल्मकार ने हास्यप्रद फिल्म के लिए एक बेहतरीन विषय को चुना,मगर वह इसके साथ न्याय नहीं कर पाए.जबकि वह इस विषय पर बेहतरीन फिल्म बना सकते थे.मगर फिल्म की शुरूआत अश्लील दृश्यों व अश्लील किताबों के साथ शुरू कर उन्होेने फिल्म को मटियामेट कर डाला.फिल्म की गति बहुत धीमी है,शायद उन्होने इसे नब्बे के दशक की फिल्म के रूप में धीमी गति प्रदान की है.वह रोचक किरदारों को भी सही ढंग से चित्रित नही कर पाए.फिल्मकार चाहते तो नब्बे के दशक के माहौल को और ज्यादा कॉमिक ढंग से दर्शा सकते थे.फिल्म में जितनी तेज तर्रार दादी हैं,उसे देखते हुए सुनील और प्रिया का स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थी के रूप में ख्ुाद को पेश करना गले से नहीं उतरता.फिल्म के कुछ दृश्य जरुर चेहरे पर स्निग्ध मुस्कान लाते हैं.फिल्म का क्लायमेक्स तो बहुत ही ज्यादा गड़बड़ है.

अभिनयः

सुनील के किरदार में मनु ऋषि चड्ढा और उनके दोस्त के किरदार में राजेश शर्मा ने बेहतरीन अभिनय किया है.मां के लिए कुछ भी करने को तत्पर बेटे के रूप में मनु ऋषि चड्ढा काफी कन्विंसिंग लगे हैं. दादी के किरदार में डौली अहलूवालिया बेहद चार्मिंग नजर आयी.प्रिया के किरदार में माही गिल ठीक ठाक हैं.अन्य कलाकारों ने प्रभावित करने वाला अभिनय नहीं किया है.

मेरे पति के एक रिश्तेदार अजीब नजरों से मुझे देखते हैं और छूने का प्रयास भी करते हैं, मुझे क्या करना चाहिए

सवाल
मेरे पति के एक दूर के रिश्तेदार का हमारे घर में काफी आनाजाना है. वे मेरे पति के काफी करीब हैं. और वक्तबेवक्त कभी भी आ धमकते हैं. कई बार मुझे उन का रवैया सही नहीं लगता. वे कुछ अजीब नजरों से मेरी तरफ देखते हैं और कई दफा जबरन मुझे स्पर्श करने का प्रयास भी करते हैं. मैं पति से कुछ कह नहीं पाती यह सोच कर कि पता नहीं वे क्या सोचेंगे. 1-2 बार तो ऐसा मौका भी आया जब वे उस वक्त आ पहुंचे जब पति औफिस में और ससुरजी बाहर होते हैं, मैं घर में अकेली होती हूं. मुझे बहुत डर लगता है.

जवाब
डरने या घबराने की कोई बात नहीं है. आप को सब से पहले अपने पति से ये सारी बातें शेयर करनी चाहिए. पति से कहें कि वे उस रिश्तेदार को ताकीद कर दें कि फोन करने के बाद ही वे आप के घर आया करें. पति घर में न हों तो आप स्वयं कोई बहाना बना कर उन्हें दरवाजे से ही वापस भेज सकती हैं. उस रिश्तेदार से किसी भी तरह दूरी बढ़ा लें ताकि वह अकसर आ कर आप को परेशान न करे. सिर्फ पति से ही नहीं, अपने ससुर से भी इस बारे में चर्चा जरूर करें.

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एक दिन का बौयफ्रैंड

‘‘क्या तुम मेरे एक दिन के बौयफ्रैंड बनोगे?’’ उस लड़की के कहे ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे. मैं हक्काबक्का सा उस की तरफ देखने लगा. काली, लंबी जुल्फों और मुसकराते चेहरे के बीच चमकती उस की 2 आंखें मेरे दिल को धड़का गईं. एक अजनबी लड़की के मुंह से इस तरह का प्रस्ताव सुन कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मुझ पर क्या बीत रही होगी.

मैं अच्छे घर का होनहार लड़का हूं. प्यार और शादी को ले कर मेरे विचार बिलकुल स्पष्ट हैं. बहुत पहले एक बार प्यार में पड़ा था पर हमारी लव स्टोरी अधिक दिनों तक नहीं चल सकी. लड़की बेवफा निकली. वह न सिर्फ मुझे, बल्कि दुनिया छोड़ कर गई और मैं अकेला रह गया.

लाख चाह कर भी मैं उसे भुला नहीं सका. सोच लिया था कि अब अरेंज्ड मैरिज करूंगा. घर वाले जिसे पसंद करेंगे, उसे ही अपना जीवनसाथी मान लूंगा.

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अगले महीने मेरी सगाई है. लड़की को मैं ने देखा नहीं है पर घर वालों को वह बहुत पसंद आई है. फिलहाल मैं अपने मामा के घर छुट्टियां बिताने आया हूं. मेरे घर पहुंचते ही सगाई की तैयारियां शुरू हो जाएंगी.

‘‘बोलो न, क्या तुम मेरे साथ..,’’ उस ने फिर अपना सवाल दोहराया.

‘‘मैं तो आप को जानता भी नहीं, फिर कैसे…’’ में उलझन में था.

‘‘जानते नहीं तभी तो एक दिन के लिए बना रही हूं, हमेशा के लिए नहीं,’’ लड़की ने अपनी बड़ीबड़ी आंखों को नचाया. ‘‘दरअसल,

2-4 महीनों में मेरी शादी हो जाएगी. मेरे घर

वाले बहुत रूढि़वादी हैं. बौयफ्रैंड तो दूर कभी मुझे किसी लड़के से दोस्ती भी नहीं करने दी. मैं ने अपनी जिंदगी से समझौता कर लिया है. घर

वाले मेरे लिए जिसे ढूंढ़ेंगे उस से आंखें बंद कर शादी कर लूंगी. मगर मेरी सहेलियां कहती हैं कि शादी का मजा तो लव मैरिज में है, किसी को बौयफ्रैंड बना कर जिंदगी ऐंजौय करने में है. मेरी सभी सहेलियों के बौयफ्रैंड हैं. केवल मेरा ही कोई नहीं है.

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‘‘यह भी सच है कि मैं बहुत संवेदनशील लड़की हूं. किसी से प्यार करूंगी तो बहुत गहराई से करूंगी. इसी वजह से इन मामलों में फंसने से डर लगता है. मैं जानती हूं कि मैं तुम्हें आजकल की लड़कियों जैसी बिलकुल नहीं लग रही होऊंगी. बट बिलीव मी, ऐसी ही हूं मैं. फिलहाल मुझे यह महसूस करना है कि बौयफ्रैंड के होने से जिंदगी कैसा रुख बदलती है, कैसा लगता है सब कुछ, बस यही देखना है मुझे. क्या तुम इस में मेरी मदद नहीं कर सकते?’’

‘‘ओके, पर कहीं मेरे मन में तुम्हारे लिए फीलिंग्स आ गईं तो?’’

‘‘तो क्या है, वन नाइट स्टैंड की तरह हमें एक दिन के इस अफेयर को भूल जाना है. यह सोच कर ही मेरे साथ आना. बस एक दिन खूब मस्ती करेंगे, घूमेंगेफिरेंगे. बोलो क्या कहते हो? वैसे भी मैं तुम से 5 साल बड़ी हूं. मैं ने तुम्हारे ड्राइविंग लाइसैंस में तुम्हारी उम्र देख ली है. यह लो. रास्ते में तुम से गिर गया था. यही लौटाने आई थी. तुम्हें देखा तो लगा कि तुम एक शरीफ लड़के हो. मेरा गलत फायदा नहीं उठाओगे, इसीलिए यह प्रस्ताव रखा है.’’

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मैं मुसकराया. एक अजीब सा उत्साह था मेरे मन में. चेहरे पर मुसकराहट की रेखा गहरी होती गई. मैं इनकार नहीं कर सका. तुरंत हामी भरता हुआ बोला, ‘‘ठीक है, परसों सुबह 8 बजे इसी जगह आ जाना. उस दिन मैं पूरी तरह तुम्हारा बौयफ्रैंड हूं.’’

‘‘ओके थैंक्यू,’’ कह कर मुसकराती हुई वह चली गई.

घर आ कर भी मैं सारा समय उस के बारे में सोचता रहा.

2 दिन बाद तय समय पर उसी जगह पहुंचा तो देखा वह बेसब्री से मेरा इंतजार कर रही थी.

‘‘हाय डियर,’’ कहते हुए वह करीब आ गई.

‘‘हाय,’’ मैं थोड़ा सकुचाया.

मगर उस लड़की ने झट से मेरा हाथ थाम लिया और बोली, ‘‘चलो, अब से तुम मेरे बौयफ्रैंड हुए. कोई हिचकिचाहट नहीं, खुल कर मिलो यार.’’

मैं ने खुद को समझाया, बस एक दिन. फिर कहां मैं, कहां यह. फिर हम 2 अजनबियों ने हमसफर बन कर उस एक दिन के खूबसूरत सफर की शुरुआत की. प्रिया नाम था उस का. मैं गाड़ी ड्राइव कर रहा था और वह मेरी बगल में बैठी थी. उस की जुल्फें हौलेहौले उस के कंधों पर लहरा रही थीं. भीनीभीनी सी उस की खुशबू मुझे आगोश में लेने लगी थी. एक अजीब सा एहसास था, जो मेरे जिस्म को महका रहा था. मैं एक गीत गुनगुनाने लगा. वह एकटक मुझे निहारती हुई बोली, ‘‘तुम तो बहुत अच्छा गाते हो.’’

‘‘हां थोड़ाबहुत गा लेता हूं… जब दिल को कोई अच्छा लगता है तो गीत खुद ब खुद होंठों पर आ जाता है.’’

मैं ने डायलौग मारा तो वह खिलखिला कर हंस पड़ी. दूधिया चांदनी सी छिटक कर उस की हंसी मेरी सांसों को छूने लगी. यह क्या हो रहा है मुझे. मैं मन ही मन सोचने लगा.

तभी उस ने मेरे कंधे पर अपना सिर रख दिया, ‘‘माई प्रिंस चार्मिंग, हम जा कहां रहे हैं?’’

‘‘जहां तुम कहो. वैसे मैं यहां की सब से रोमांटिक जगह जानता हूं, शायद तुम भी जाना चाहोगी,’’ मेरी आवाज में भी शोखी उतर आई थी.

‘‘श्योर, जहां तुम चाहो ले चलो. मैं ने तुम पर शतप्रतिशत विश्वास किया है.’’

‘‘पर इतने विश्वास की वजह?’’

‘‘किसीकिसी की आंखों में लिखा होता है कि वह शतप्रतिशत विश्वास के योग्य है. तभी तो पूरी दुनिया में एक तुम्हें ही चुना मैं ने अपना बौयफ्रैंड बनाने को.’’

‘‘देखो तुम मुझ से इमोशनली जुड़ने की कोशिश मत करो. बाद में दर्द होगा.’’

‘‘किसे? तुम्हें या मुझे?’’

‘‘शायद दोनों को.’’

‘‘नहीं, मैं प्रैक्टिकल हूं. मैं बस 1 दिन के लिए ही तुम से जुड़ रही हूं, क्योंकि मैं जानती हूं हमारे रिश्ते को सिर्फ इतने समय की ही मंजूरी मिली है.’’

‘‘हां, वह तो है. मैं अपने घर वालों के खिलाफ नहीं जा सकता.’’

‘‘अरे यार, खिलाफ जाने को किस ने कहा? मैं तो खुद पापा के वचन में बंधी हूं. उन के दोस्त के बेटे से शादी करने वाली हूं. 6-7 महीनों में वह इंडिया आ जाएगा और फिर चट मंगनी पट विवाह. हो सकता है मैं हमेशा के लिए पैरिस चली जाऊं,’’ उस ने सहजता से कहा.

‘‘तो क्या तुम भी ‘कुछकुछ होता है’ मूवी की सिमरन की तरह किसी अजनबी से शादी करने वाली हो, जिसे तुम ने कभी देखा भी नहीं है?’’ कहते हुए मैं ने उस की आंखों में झांका. वह हंसती हुई बोली, ‘‘हां, ऐसा ही कुछ है. पर चिंता न करो. मैं तुम्हें शाहरुख यानी राज की तरह अपनी जिंदगी में नहीं आने दूंगी. शादी तो मैं उसी से करूंगी जिस से पापा चाहते हैं.’’

‘‘तो फिर यह सब क्यों? मेरे इमोशंस के साथ क्यों खेल रही हो?’’

‘‘अरे यार, मैं कहां खेल रही हूं? फर्स्ट मीटिंग में ही मैं ने साफ कह दिया था कि हम केवल 1 दिन के रिश्ते में हैं.’’

‘‘हां वह तो है. ओके बाबा, आई ऐम सौरी. चलो आ गई हमारी मंजिल.’’

‘‘वैरी नाइस. बहुत सुंदर व्यू है,’’ कहते हुए उस के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई.

थोड़ा घूमने के बाद वह मेरे पास आती हुई बोली, ‘‘लो अब मुझे अपनी बांहों में भरो जैसे फिल्मों में करते हैं.’’

वह मेरे और करीब आ गई. उस की जुल्फें मेरे कंधों पर लहराने लगीं. लग रहा था जैसे मेरी पुरानी गर्लफ्रैंड बिंदु ही मेरे पास खड़ी है. अजीब सा आकर्षण महसूस होने लगा. मैं अलग हो गया, ‘‘नहीं, यह नहीं होगा मुझ से. किसी गैर लड़की को मैं करीब क्यों आने दूं?’’

‘‘क्यों, तुम्हें डर लग रहा है कि मैं यह वीडियो बना कर वायरल न कर दूं?’’ वह शरारत से खिलखिलाई. मैं ने मुंह बनाया, ‘‘बना लो. मुझे क्या करना है? वैसे भी मैं लड़का हूं. मेरी इज्जत थोड़े ही जा रही है.’’

‘‘वही तो मैं तुम्हें समझा रही हूं. तुम्हें क्या फर्क पड़ता है, तुम तो लड़के हो,’’ वह फिर से मुसकराई, ‘‘वैसे तुम आजकल के लड़कों जैसे बिलकुल नहीं.’’

‘‘आजकल के लड़कों से क्या मतलब है? सब एकजैसे नहीं होते.’’

‘‘वही तो बात है. इसीलिए तो तुम्हें चुना है मैं ने, क्योंकि मुझे पता था तुम मेरा गलत फायदा नहीं उठाओगे वरना किसी और लड़के को ऐसा मौका मिलता तो उसे लगता जैसे लौटरी लग गई हो.’’

‘‘तुम मेरे बारे में इतनी श्योर कैसे हो कि वाकई मैं शरीफ ही हूं? तुम कैसे जानती हो कि मैं कैसा हूं और कैसा नहीं हूं?’’

‘‘तुम्हारी आंखों ने सब बता दिया मेरी जान, शराफत आंखों पर लिखी होती है. तुम नहीं जानते?’’

इस लड़की की बातें पलपल मेरे दिल को धड़काने लगी थीं. बहुत अलग सी थी वह. काफी देर तक हम इधरउधर घूमते रहे. बातें करते रहे.

एक बार फिर वह मेरे करीब आती हुई बोली, ‘‘अपनी गर्लफ्रैंड को हग भी नहीं करोगे?’’ वह मेरे सीने से लग गई. लगा जैसे वह पल वहीं ठहर गया हो. कुछ देर तक हम ऐसे ही खड़े रहे. मेरी बढ़ी हुई धड़कनें शायद वह भी महसूस कर रही थी. मैं ने भी उसे आगोश में ले लिया. उस पल को ऐसा लगा जैसे आकाश और धरती एकदूसरे से मिल गए हों. कुछ पल बाद उस ने खुद को अलग किया और दूर जा कर खड़ी हो गई.

‘‘बस, कुछ और हुआ तो हमारे कदम बहक जाएंगे. चलो वापस चलते हैं,’’ वह बोली. मैं अपनेआप को संभालता हुआ बिना कुछ कहे उस के पीछेपीछे चलने लगा. मेरी सांसें रुक रही थीं. गला सूख रहा था. गाड़ी में बैठ कर मैं ने पानी की पूरी बोतल खाली कर दी.

सहसा वह हंस पड़ी, ‘‘जनाब, ऐसा लग रहा था जैसे शराब की बोतल एक बार में ही हलक के नीचे उतार रहे हो.’’

उस के बोलने का अंदाज कुछ ऐसा था कि मुझे हंसी आ गई. ‘‘सच, बहुत अच्छी हो तुम. मुझे डर है कहीं तुम से प्यार न हो जाए,’’ मैं ने कहा.

‘‘छोड़ो भी यार. मैं बड़ी हूं तुम से, इस तरह की बातें सोचना भी मत.’’

‘‘मगर मैं क्या करूं? मेरा दिल कुछ और कह रहा है और दिमाग कुछ और.’’

‘‘चलता है. तुम बस आज की सोचो और यह बताओ कि हम लंच कहां करने वाले हैं?’’

‘‘एक बेहतरीन जगह है मेरे दिमाग में. बिंदु के साथ आया था एक बार. चलो वहीं चलते हैं,’’ मैं ने वृंदावन रैस्टोरैंट की तरफ गाड़ी मोड़ते हुए कहा, ‘‘घर के खाने जैसा बढि़या स्वाद होता है यहां के खाने का और अरेंजमैंट देखो तो लगेगा ही नहीं कि रैस्टोरैंट आए हैं. गार्डन में बेंत की टेबलकुरसियां रखी हुई हैं.’’

रैस्टोरैंट पहुंच कर उत्साहित होती हुई प्रिया बोली, ‘‘सच कह रहे थे तुम. वाकई लग रहा है जैसे पार्क में बैठ कर खाना खाने वाले हैं हम… हर तरफ ग्रीनरी. सो नाइस. सजावटी पौधों के बीच बेंत की बनी डिजाइनर टेबलकुरसियों पर स्वादिष्ठ खाना, मन को बहुत सुकून देता होगा.

है न?’’

मैं खामोशी से उस का चेहरा निहारता रहा. लंच के बाद हम 2-1 जगह और गए. जी भर कर मस्ती की. अब तक हम दोनों एकदूसरे से खुल गए थे. बातें करने में भी मजा आ रहा था. दोनों ने ही एकदूसरे की कंपनी बहुत ऐंजौय की थी, एकदूसरे की पसंदनापसंद, घरपरिवार, स्कूलकालेज की कितनी ही बातें हुईं.

थोड़ीबहुत प्यार भरी बातें भी हुईं. धीरेधीरे शाम हो गई और उस के जाने का समय आ गया. मुझे लगा जैसे मेरी रूह मुझ से जुदा हो रही है, हमेशा के लिए.

‘‘कैसे रह पाऊंगा मैं तुम से मिले बिना? नहीं प्रिया, तुम्हें अपना नंबर देना होगा मुझे,’’ मैं ने व्यथित स्वर में कहा.

‘‘आर यू सीरियस?’’

‘‘यस आई ऐम सीरियस,’’ मैं ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मुझे नहीं लगता कि अब मैं तुम्हें भूल सकूंगा. नो प्रिया, आई थिंक आई लाइक यू वैरी मच.’’

‘‘वह डील न भूलो मयंक,’’ प्रिया ने याद दिलाया.

‘‘मगर दोस्त बन कर तो रह सकते हैं न?’’

‘‘नो, मैं कमजोर पड़ गई तो? यह रिस्क मैं नहीं उठा सकती.’’

‘‘तो ठीक है. आई विल मैरी यू,’’ मैं ने जल्दी से कहा. उस से जुदा होने के खयाल से ही मेरी आंखें भर आई थीं. एक दिन में ही जाने कैसा बंधन जोड़ लिया था उस ने कि दिल कर रहा था हमेशा के लिए वह मेरी जिंदगी में आ जाए.

वह मुझ से दूर जाती हुई बोली, ‘‘गुडबाय मयंक, मैं शादी वहीं करूंगी जहां पापा चाहते हैं. तुम्हारा कोई चांस नहीं. भूल जाना मुझे.’’ वह चली गई और मैं पत्थर की मूर्त बना उसे जाते देखता रहा. दिल भर आया था मेरा. ड्राइविंग सीट पर अकेला बैठा अचानक फफकफफक कर रो पड़ा. लगा जैसे एक बार फिर से बिंदु मुझे अकेला छोड़ कर चली गई है. जाना ही था तो फिर जरूरत क्या थी मेरी जिंदगी में आने की. किसी तरह खुद को संभालता हुआ घर लौटा. दिन का चैन, रात की नींद सब लुट चुकी थी. जाने कहां से आई थी वह और कहां चली गई थी? पर एक दिन में मेरी दुनिया पूरी तरह बदल गई थी. देवदास बन गया था मैं. इधर घर वाले मेरी सगाई की तैयारियों में लगे थे. वे मुझे उस लड़की से मिलवाने ले जाना चाहते थे, जिसे उन्होंने पसंद किया था. पर मैं ने साफ इनकार कर दिया.

‘‘मैं शादी नहीं करूंगा,’’ मेरा इतना कहना था कि घर में कुहराम मच गया.

‘‘क्यों, कोई और पसंद आ गई?’’ मां ने अलग ले जा कर पूछा.

‘‘हां.’’ मैं ने सीधा जवाब दिया.

‘‘तो ठीक है, उसी से बात करते हैं. पता और फोन नंबर दो.’’

‘‘मेरे पास कुछ नहीं है.’’

‘‘कुछ नहीं, यह कैसा प्यार है?’’ मां ने कहा.

‘‘क्या पता मां, वह क्या चाहती थी? अपना दीवाना बना लिया और अपना कोई अतापता भी नहीं दिया.’’

फिर मैं ने उन्हें सारी कहानी सुनाई तो वे खामोश रह गईं. 6 माह बीत गए. आखिर घर वालों की जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा. लड़की वाले हमारे घर आए. मुझे जबरन लड़की के पास भेजा गया. उस कमरे में कोई और नहीं था. लड़की दूसरी तरफ चेहरा किए बैठी थी. मैं बहुत अजीब महसूस कर रहा था.

लड़की की तरफ देखे बगैर मैं ने कहना शुरू किया, ‘‘मैं आप को किसी भ्रम में नहीं रखना चाहता. दरअसल मैं किसी और से प्यार करने लगा हूं और अब उस के अलावा किसी से शादी का खयाल भी मुझे रास नहीं आ रहा. आई एम सौरी. आप इस रिश्ते के लिए न कह दीजिए.’’

‘‘सच में न कह दूं?’’ लड़की के स्वर मेरे कानों से टकराए तो मैं हैरान रह गया. यह तो प्रिया के स्वर थे. मैं ने लड़की की तरफ देखा तो दिल खुशी से झूम उठा. यह वाकई प्रिया ही थी.

‘‘तुम?’’

‘‘हां मैं, कोई शक?’’ वह मुसकराई.

‘‘पर वह सब क्या था प्रिया?’’

‘‘दरअसल, मैं अरेंज्ड नहीं, लव मैरिज करना चाहती थी. अत: पहले तुम से प्यार का इजहार कराया, फिर इस शादी के लिए रजामंदी दी. बताओ कैसा लगा मेरा सरप्राइज.’’

‘‘बहुत खूबसूरत,’’ मैं ने पल भर भी देर नहीं की कहने में और फिर उसे बांहों में भर लिया.

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