3 अक्तूबर, 2017 की बात है. सुबह पहाड़ों की ओट से सूरज ने झांका तो कविता की आंखें खुल गईं. उस ने घड़ी की ओर देखा, 6 बज चुके थे. सुबह उठते ही उसे चाय पीने की तलब लग जाती थी. मन में आया कि कोई चाय बना कर पिला दे. उस ने कमरे में पड़े पलंग की ओर देखा तो बेटा विनय अभी सो रहा था. जेठानी संतोष भी सोई हुई थी.

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