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Happy Diwali : खुशियोंभरी दीवाली

लेखक – रेणु लैसी फ्रांसिस

विमला का मन आज सुबह से ही बेचैन था. उन की बेटी अंजू ठीक एक साल बाद उन से मिलने आ रही थी. अंजू इंजीनियर थी, कंपनी की तरफ से एक साल की ट्रेनिंग के लिए जरमनी गई थी. विमला हर थोड़ी देर में अपने पति नितिन से कह रही थी, ‘जल्दी घर से निकल जाओ अंजू को लाने के लिए, रास्ते में ट्रैफिक ज्यादा होता है, तुम समय पर नहीं पहुंच पाओगे तो अंजू परेशान हो जाएगी.’

नितिन उन से हर बार यही कहते, ‘मुझे याद है अंजू आ रही है, लेकिन उस के आने में अभी कई घंटे हैं. मैं अभी से वहां जा कर क्या करूंगा. जैसे ही आने का समय होगा, मैं आधे घंटे पहले पहुंच जाऊंगा.’

नितिन समय से एयरपोर्ट पहुंच गए और अंजू के आने की खबर विमला को दे दी. जब से अंजू की आने की खबर मिली, विमला वहीं गेट पर बैठ गईं. उन्हें एकएक पल मानो एकएक साल जितना लंबा लग रहा था. अंजू को आए तो एक घंटा हो चुका था लेकिन अंजू और नितिन दोनों घर नहीं आए थे. विमला दोनों को फोन लगा रही थी. दोनों के फोन नैटवर्क क्षेत्र से बाहर आ रहे थे. विमला के पड़ोसी भी विमला के साथ थे. सभी परेशान हो रहे थे कि नितिन और अंजू अभी तक क्यों नहीं आए. अचानक विमला के मोबाइल में नितिन का फोन आया कि वे सिटी अस्पताल आ जाएं, उन दोनों का ऐक्सिडैंट हो गया है.

विमला और उन के पड़ोसी सिटी अस्पताल पहुंचे तो देखा अंजू का शव औपरेशन थिएटर से बाहर आ रहा था. डाक्टर साहब नितिन से कह रहे थे, ‘सौरी, हम आप की बेटी को नहीं बचा सके.’ तब नितिन ने कहा, ‘सर, मैं अपनी बेटी की आंखों को दान करना चाहता हूं ताकि मेरी बेटी की आंखें जिंदा रहें. आप किसी बहुत जरूरतमंद को ये आंखें दे दीजिए ताकि वह मेरी बेटी की आंखों से दुनिया देख सके. विमला ने इस बात पर एतराज किया तो नितिन और डाक्टर ने विमला को सम?ाया कि उस व्यक्ति के बारे में सोचो जिस ने हमेशा अपने आसपास अंधेरा ही पाया है. आप उस की जिंदगी में रोशनी दे रही हैं. उस समय तो विमला ने कुछ न कहा लेकिन वे अब भी नाराज ही थीं. अंजू की आंखों को दान क्यों किया इस बात को ले कर.

आज अंजू की पुण्यतिथि थी. विमला का मन उदास था तब नितिन ने आ कर उन से कहा, ‘‘आज हमारे घर एक खास मेहमान आने वाले हैं. तुम उस से अच्छा व्यवहार करना.’’ विमला कुछ पूछतीं, उस से पहले नितिन वहां से जा चुके थे.

थोड़ी देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई. नितिन ने दरवाजा खोला तो सामने एक 35 साल का युवक खड़ा था और उस के साथ ही उस की पत्नी और 2 साल का बेटा खड़ा था. नितिन ने उन्हें अंदर बुलाया. उस ने नितिन के पैर छुए. नितिन ने उसे आशीर्वाद दिया और अपने सीने से लगा लिया और कहा, ‘‘तुम हमेशा मेरे  कलेजे का टुकड़ा रहोगे’’ और उन की आंखों में आंसू आ गए.

उस युवक ने कहा, ‘पापा, मैं आप का बेटा हूं और आप हमेशा मेरे पापा रहोगे.’

नितिन उस की आंखों में ही देखता रहा. इन की आवाजें सुन कर विमला भी वहां आ गईं. तब उस युवक ने विमला के पैर छूने चाहे तो विमला दूसरे कमरे में चली गईं. तब नितिन ने कहा, ‘‘हम दोनों मिल कर तुम्हारी मम्मी को मना लेंगे.’’

नितिन उन लोगों को ले कर विमला के पास आए तब उस युवक ने कहा. ‘‘मैं आप का और अंकल का हमेशा शुक्रगुजार रहूंगा. आप ने एक नहीं, 3 लोगों की जान बचाई है.’’ उस युवक ने आगे कहा, ‘‘मेरा नाम राकेश है. मैं अपने मम्मीपापा की इकलौती संतान था. हमारा जनरल स्टोर था. अच्छीखासी कमाई थी. मेरी शादी रीना से हुई. रीना भी अपने मम्मीपापा की इकलौती संतान थी. देखने में जितनी सुंदर, व्यवहार में उतनी ही अच्छी. उस के आने से घर में हमेशा रौनक रहने लगी.

‘‘एक बार दीवाली के समय मेरा और रीना का परिवार हरिद्वार जा रहा था तब अचानक हमारी गाड़ी के ऊपर एक बडा़ सा पटाखा आ कर गिरा और हमारी गाड़ी का ऐक्सिडैंट हो गया. मेरे और रीना के मम्मीपापा ऐक्सिडैंट में मारे गए थे. मेरी आंखों में बारूद और कांच के टुकड़े जाने से मेरी आंखों की रोशनी चली गई. हमारा बेटा भी छोटा था. सारी जिम्मेदारी रीना पर आ गई. रीना बच्चे को भी देखती और जनरल स्टोर भी संभालती. मैं उस के साथ जनरल स्टोर में आ कर बैठ जाता था. मेरे दोस्त, जिन्हें मैं अपना भाई जैसा मानता था और उन पर दिल खोल कर खर्च करता था, उन्होंने अपना रास्ता बदल लिया था.

‘‘जैसेतैसे जीवन की गाड़ी चल रही थी कि अब लफंगे लड़के और फालतू आदमी लोग ज्यादा ही स्टोर पर आने लगे थे. सामान एक लेते और कीमतें दस सामान की पूछते रहते. रीना को मजबूरी में सारे सामान के दाम बताने पड़ते. वे लोग ज्यादा समय स्टोर में रुकने के बहाने ढूंढ़ते थे. एक दिन तो हद हो गई.

2 लड़के आए और सामान लेने के बहाने रीना का हाथ पकड़ लिया.

‘‘रीना ने जब उसे चिल्लाया तो मैं ने उसे धक्का दिया. वे मेरे साथ मारपीट करने लगे. इतने में अंकलजी स्टोर पर कुछ सामान खरीदने आए. उन्होंने उस लड़के को धमकाया कि यदि उस ने आइंदा स्टोर पर आ कर ऐसी हरकतें कीं तो वे पुलिस में उसे दे देंगे. उस समय तो वे लड़के चले गए लेकिन उस घटना के बाद रीना बीमार पड़ गई.

‘‘तब अंकलजी ने मु?ा से कहा कि तुम कोई आदमी रख लो स्टोर पर काम करने के लिए. फिर अंकलजी ने कहा, मेरे मित्र आंखों के डाक्टर हैं. मैं उन से बात करूंगा कि वे तुम्हारी आंखों के लिए ऐसे व्यक्ति की तलाश करें जो मृत्यु के बाद अपनी आंखें दान करना चाहता हो ताकि दान की हुई आंखें वे तुम्हें लगा सकें.

‘‘इस बीच, मैं ने एक आदमी स्टोर के काम के लिए रख लिया था लेकिन उस ने भी हमारे साथ बेईमानी की. सारा सामान बेच कर स्टोर में ताला लगा कर भाग गया.

‘‘तब रीना ने एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर ली. बहुत मुश्किल से गुजर हो रही थी कि थोड़े दिनों पहले मेरे बेटे की तबीयत भी खराब हो गई थी. अंजू का ऐक्सिडैंट हुआ तब मेरा बेटा वहीं एडमिट था. वहीं अंकल ने मु?ो देखा और अंजू की आंखों को मु?ो देने का वादा किया.

‘‘आज मैं अंजू की आंखों से ही अपने बेटे और बीवी को देख पाया और उन्हें सुरक्षित जीवन दे पा रहा हूं.’’ इतना कह कर राकेश ने विमला के पैर पकड़ लिए और कहने लगा, ‘‘मां, एक बार मेरी तरफ देखो, मैं भी आप का बेटा हूं.’’

राकेश के आंसू विमला के पैर पर गिरे तो विमला ने राकेश को उठाया और जब उस की तरफ देखा तो उन्हें लगा वे अंजू को ही देख रही हैं. उन्होंने राकेश को गले से लगा लिया. इतने में रीना भी विमला के पास आ गई और बोली, ‘‘मां, आप राकेश की ही नहीं, मेरी भी मां हो.’’ तब पीछे से रीना का बेटा आ गया और बोला, ‘‘आप मेरे मम्मीपापा की मां हो तो मेरी कौन हो?’’ तब पीछे से नितिन ने आ कर कहा, ‘ये तुम्हारी दादीमां हैं.’’

विमला ने उन तीनों को गले लगा लिया और कहा, ‘‘मु?ो तुम लोगों ने मां कहा है तो मेरी एक बात मानोगे तब रीना ने कहा, ‘‘मां, आप आज्ञा तो दो, हम आप के लिए जान तक दे सकते हैं.’’

विमला ने कहा, ‘‘जान देना नहीं है, बस, मेरी जान बन कर मेरे साथ मेरे घर में आ कर रहो. अंजू हमेशा कहती थी कि वह हम दोनों को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी, इसलिए ही प्रकृति ने तुम्हें मेरे पास भेज दिया.’’

रीना ने कहा, ‘‘ठीक है, मां. हम लोग कभी भी आप को छोड़ कर नहीं जाएंगे. मेरा तो मायका भी यहीं है और ससुराल भी यहीं.’’

यह सुन कर विमला ने अंजू की तसवीर के सामने खड़े हो कर कहा, ‘‘बेटी, तू ने तो मेरी ?ाली खुशियों से भर दी. आज मुझे बेटे के साथ बहू और पोता भी मिल गया. अब मैं भी डाक्टर के पास जा कर अपनी आंखों को दान करने वाला फौर्म भर कर आऊंगी.’’

तब नितिन ने कहा, ‘‘तुम अकेली नहीं, हम सभी जाएंगे ताकि हमारे मरने के बाद हमारी आंखें जिंदा रहें.’’

सब को खुश देख कर विमला ने कहा कि यह दीवाली तो मेरे लिए हजारों खुशियां ले कर आई. Happy Diwali

Indian Society: तलाक की प्रक्रिया आसान हो तो दहेज हत्याएं रुक जाएं

Indian Society, सीतापुर, उत्तर प्रदेश – फंदे से लटका शव, दहेज हत्या का आरोप

सीतापुर जिले के पिसावां थाना क्षेत्र के सैदापुर गांव में एक विवाहिता 23 वर्षीय सरस्वती का शव कमरे में फंदे से लटका पाया गया. मृतका की शादी 5 महीने पहले मुनेश्वर उर्फ़ गोलू के साथ हुई थी. मायके वालों ने आरोप लगाया कि उन्होंने अपनी हैसियत के अनुसार दहेज दिया था पर ससुराल वालों ने बाइक और सोने की चेन की अतिरिक्त मांग की, मांग पूरी न होने पर उन की बेटी के साथ प्रताड़ना की गई और हत्या करने के बाद शव को फांसी पर लटका दिया गया. (हिंदुस्तान/12 अक्तूबर 2025)

दिल्ली – ससुर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज, दहेज हत्या आरोप

दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 वर्षीय बहू की दहेज के लिए हत्या के आरोप में ससुर सुनील कुमार सिंह की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण मामला है, जिस में एक युवती दहेज की लालच की शिकार हुई है. पीड़िता सोनम ने मरने से पहले बयान दिया था कि उसे जबरन एसिड पिलाया गया था. (आजतक/9 अक्तूबर 2025)

मुंबई – दहेज-प्रताड़ना के मामले बढ़े

मुंबई में इस वर्ष पहले 10 महीनों में महिला विरुद्ध शारीरिक एवं मानसिक छेड़छाड़ / दहेज प्रताड़ना के 300 से अधिक मुकदमे दर्ज किए गए. (महाराष्ट्र टाइम्स)

लखनऊ – महिला ने दहेज-प्रताड़ना की शिकायत दर्ज कराई

लखनऊ की एक महिला ने अपने पति और ससुराल वालों पर दहेज की मांग, शारीरिक हिंसा, और हस्तक्षेप जैसे आरोप लगाए हैं. उस ने दावा किया कि जब उस ने विरोध किया तो उसे परिवार ने छोड़ दिया. (द टाइम्स औफ इंडिया)

लखनऊ/सरोजनीनगर – विवाहिता ने दहेज उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज कराई – पति समेत 7 ससुरालियों पर 40 लाख रुपए और कार मांगने का आरोप

सरोजनीनगर की अवध विहार कालोनी निवासी आयशा खातून का प्रेम विवाह जैद खान से 30 जनवरी 2023 को हुआ था. शादी के बाद जैद के परिजनों ने उन्हें अपने घर में रखने से इनकार कर दिया, जिस के बाद आयशा और जैद मायके में रहने लगे. कुछ महीने पहले जैद परिजनों ने जैद पर दबाव बनाया कि वह आयशा और अपनी 10 माह की बेटी अनायजा को छोड़ दे, या फिर ससुराल वालों को 40 लाख रुपए और एक कार दे. आयशा द्वारा इस मांग का विरोध करने पर जैद ने कई बार उस के साथ मारपीट की. 21 मई 2025 को जैद उसे और बेटी को पीट कर घर में छोड़ कर चला गया. (दैनिक भास्कर/13 अक्तूबर 2025)

कर्नाटक / बेलगावी – पत्नी की हत्या, शव छिपाया गया

कर्नाटक के बेलगावी जिले में एक व्यक्ति आकाश कंबर ने अपनी 20 वर्षीय पत्नी साक्षी कंबर की हत्या कर उस का शरीर पलंग के नीचे छुपाया और भाग गया. इस घटना का खुलासा तब हुआ जब तीन दिन बाद आरोपी की मां को बिस्तर के नीचे बहू का शव मिला. पुलिस आरोपी की तलाश कर रही है. लड़की के परिवार का कहना है कि यह दहेज प्रताड़ना से जुड़ा मामला है. (एनडीटीवी)

ये मात्र 7 दिनों की चंद ख़बरें हैं जो बताने के लिए काफी हैं कि लालची पति और क्रूर ससुरालियों के हाथों मासूम लड़कियां किस तरह मारीपीटी जा रही हैं, जलील की जा रही हैं और गाजर मूली की तरह काटी जा रही हैं. 2024 में नैशनल कमीशन फोर वीमेन के पास दहेज प्रताड़ना के 25473 मामले और दहेज हत्या के 292 मामले आए थे. अदालतों में दहेज हत्या के करीब 70 हजार मामले चल रहे हैं. जिन में अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है. महिलाओं के साथ शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के इन मामलों में न सिर्फ दहेज की मांग शामिल है, बल्कि महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से बुरी तरह परेशान किया गया और कइयों की हत्या कर दी गई.

दहेज लेने और देने के खिलाफ देश में सैकड़ों कानून बने, आंदोलन हुए, पोस्टर लगे, नारे गूंजे – लेकिन दहेज का दानव कभी मरा ही नहीं. वह अनेक रूप धर कर औरत को खा रहा है. कभी दहेज खुले पैसों यानी कैश में मांगा जाता है, तो कभी “तोहफे” के नाम पर, कभी कार और मकान की मांग में, तो कभी लड़की के “स्टेटस” की अपेक्षा में. हर साल सैकड़ों बेटियां इस दानव के पेट में समा जाती हैं – कभी जला कर, कभी फांसी पर चढ़ा कर, तो कभी समाज की चुप्पी में दम तोड़ कर.

यह दानव मरेगा नहीं क्योंकि यह हमारे सोचने के ढंग में बैठा है, हमारे धार और हमारे रिवाजों में छिपा है, और हमारे “सम्मान” की झूठी परिभाषा में पल रहा है. जब तक लड़की को “बोझ” और दहेज को “सामाजिक प्रतिष्ठा” माना जाएगा, तब तक यह दानव हर पीढ़ी में पुनर्जन्म लेता रहेगा.

नंदिनी की शादी को 13 साल हो चुके हैं. वह शादी से पहले से नौकरी में है. शादी से पहले उस की सैलरी पर सिर्फ उस का हक था. वह अपनी मर्जी से जैसा चाहती थी वैसा खर्च करती थी. उस के मातापिता या भाई उस से कभी नहीं पूछते थे कि वह अपनी सैलरी का क्या करती है. उसे अच्छी किताबें पढ़ने, अच्छी फिल्में देखने, नईनई जगहें घूमने और अच्छे कपड़े पहनने का शौक था तो उस की सैलरी का अधिकांश हिस्सा इस पर खर्च हो जाता था और बचे हुए पैसे वह बैंक में डाल देती थी. कभी उन पैसों से मां के लिए साड़ी या पापा और भाई के लिए कोई गिफ्ट ले आती थी. मगर शादी के बाद उस की सैलरी पर उस के पति राहुल ने पूरा कब्जा कर लिया. बेहतर भविष्य बनाने के सपने तानतान कर उस ने बचत के नाम पर नंदिनी के अपने तमाम सपने मार दिए. वह अपनी मर्जी से एक पिन तक नहीं खरीद सकती थी. राहुल कहता, ‘जो चाहिए मुझ से बोलो. मैं ला कर दूंगा.’

13 साल से नंदिनी अपनी पूरी सैलरी राहुल के हाथ पर रखने के लिए मजबूर है. इन 13 सालों में वह करीब 80 लाख रुपए कमा कर राहुल को दे चुकी है. उस की सैलरी से उस की सास ने सोने के टौप्स खरीदे. राहुल ने नया कंप्यूटर लिया. घर में नया फ्रिज और नया टीवी आया. राहुल की नई कार की किश्तें उस की सैलरी से भरी गईं. हाल ही में उस ने नई बाइक उस के पैसे से खरीदी. नंदिनी से कहा गया है कि अब तुम इस घर की हो तो तुम्हारी कमाई पर इस घर का हक है. वैसे भी शादी में तुम्हारे घर वालों ने दिया ही क्या? हम ने भी शराफत में कुछ नहीं मांगा. तीज त्योहार पर भी तुम्हारे वहां से कुछ नहीं आता. ऐसे ताने मारते समय राहुल और उस के घर वाले यह भूल जाते हैं कि उस के मांबाप ने उन्हें चलता फिरता रोबोट-कम-एटीएम दिया है, जो हर महीने न सिर्फ हजारों रुपए देता है, बल्कि घर बाहर के सारे काम भी करता है.

उस की अपनी मां की भी यही राय है कि अब तुम उस घर की हो तो वहां की रवायत के अनुसार चलो. दामादजी कुछ गलत नहीं कह रहे हैं. मैं ने भी शादी के बाद अपने पति और सासससुर की सुनी, तभी घर बना रहा. स्पष्ट है कि मां नहीं चाहती कि नंदिनी लड़भिड़ कर मायके आए. उन्होंने इशारों में यह संकेत दे दिया कि इस घर के दरवाजे तुम्हारे लिए बंद हैं. मेहमान के तौर पर दोएक दिन के लिए आना चाहो तो अपने पति की आज्ञा ले कर आओ.

आज नंदिनी का जीवन एक बंधुवा मजदूर के जीवन के सामान है. शादी के नाम पर उस के पैरों में गुलामी की जंजीर डाल दी गई है. नंदिनी सुबह औफिस जाने से पहले घर का पूरा काम करती है. सुबह सब के लिए नाश्ता बनाना, बच्चे को तैयार कर स्कूल भेजना, दोपहर तक का खाना बनाना, रसोई साफ करना, कपड़े धोने के अलावा अनेकों काम हैं जो वह औफिस जाने से पहले निपटाती है. दिन भर औफिस में खटती है और औफिस से घर पहुंच कर फिर रसोई में घुस जाती है. उस के घर लौटने पर कोई उस को एक ग्लास पानी तक के लिए नहीं पूछता. उलटे वही सब के लिए जल्दीजल्दी चाय नाश्ता बनाती है. इस सब के बावजूद उस को आज भी दहेज का ताना मारा जाता है. राहुल अपने रिश्तेदारों के सामने यह कहने से नहीं चूकता कि हम तो अपनी शराफत में मारे गए. हम ने मुंह नहीं खोला तो दहेज में एक धेला नहीं मिला. अब बेटे की शादी में कसर पूरी करूंगा.

नंदिनी की कहानी उन तमाम महिलाओं की कहानी है जो नौकरीपेशा होने के बावजूद, हर महीने एक मोटी रकम ससुरालियों के मुंह में ठूंसने के बावजूद दहेज के तानों के तीर खा रही हैं. जो महिलाएं नौकरीपेशा नहीं हैं उन का जीवन तो और ज्यादा नारकीय है. वे सिर्फ ताने ही नहीं, मारपीट और गालीगलौच का भी सामना कर रही हैं. जो औरतें अपने प्रति हो रही क्रूरता के खिलाफ जरा भी बोलती हैं उन को या तो घर से बाहर निकल दिया जाता है या उन की हत्या कर दी जाती है.

औरत चाहे पढ़ीलिखी हो, या अनपढ़, नौकरीपेशा हो या गृहणी, दहेज के तानों और प्रताड़ना का शिकार है. कुछ हर दिन इस क्रूरता का सामना कर रही हैं तो कुछ मौके बेमौके. औरत के पास निकल भागने के रास्ते नहीं हैं. उन के पास जीवन को अपने मुताबिक जीने का विकल्प ही नहीं है. तनाव और हिंसा से बचने के लिए वे तलाक भी नहीं ले पातीं क्योंकि तलाक की प्रक्रिया आसान नहीं है. जो ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं हैं वे तो इस बारे में सोच भी नहीं पातीं हैं. पढ़ीलिखी औरतें भी कोर्ट-कानून की पेंचीदगियों से डरती हैं.

भारत में औरत के लिए तलाक लेना आज भी कानूनी रूप से संभव तो है, लेकिन सामाजिक, आर्थिक और मानसिक रूप से बेहद कठिन प्रक्रिया बनी हुई है. यह कठिनाई सिर्फ अदालतों या कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज, परिवार और परंपराओं में गहराई तक जमी मानसिकताओं से भी जुड़ी है.

सामाजिक कलंक

तलाकशुदा औरत को समाज अब भी ‘अधूरी’ या ‘गलत’ मानने की प्रवृत्ति रखता है. रिश्तेदारों, पड़ोसियों और यहां तक कि अपने परिवार से भी उसे ताने सुनने पड़ते हैं.

आर्थिक निर्भरता

ज्यादातर महिलाएं आज भी आर्थिक रूप से पति या ससुराल पर निर्भर हैं. तलाक के बाद नौकरी, घर या आर्थिक सुरक्षा न होना उन्हें फैसला लेने से रोकता है.

लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया

भारतीय न्याय प्रणाली में तलाक के मामलों को निपटाने में वर्षों लग जाते हैं. लगातार पेशियां, वकीलों की लम्बीचौड़ी फीस और मानसिक थकान औरत को झकझोर देती है.

कानूनी असमानताएं

हालांकि कानून समानता की बात करता है, लेकिन वास्तविकता में पुरुषों के पास अधिक आर्थिक ताकत और कानूनी साधन होते हैं, जिस से महिला को न्याय पाने में मुश्किल आती है.

परिवार का दबाव

मातापिता और रिश्तेदार अकसर कहते हैं, ‘थोड़ा समझौता कर लो, घर मत टूटने दो. कहां जाओगी? कोई पूछेगा नहीं’. यह भावनात्मक दबाव महिला की आजादी और आत्मसम्मान को कुचल देता है.

बच्चों की जिम्मेदारी

तलाक के बाद बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी अकसर मां पर ही आ जाती है. कोर्ट में कस्टडी की लड़ाई और आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है. अकेले बच्चा पालना, उस को पढानालिखाना आसान नहीं है. इस के लिए पैसा चाहिए.

समाज का घटिया नजरिया

तलाकशुदा औरत के प्रति समाज का नजरिया ठीक नहीं है. समाज ऐसी औरत की इज्जत नहीं करता. उसे ऐसी नजर से देखता है मानो सारा दोष उसी का हो. कभीकभी तो उस को बदचलन ठहरा दिया जाता है. उस के अपने मांबाप उसे वापस अपने घर में नहीं रखना चाहते. मांबाप न रहें तो भाई भाभी को तो वह फूटी आंख नहीं सुहाती. कहीं अकेले कमरा ले कर रहने लगे तो पूरा महल्ला उसे अपनी प्रौपर्टी समझने लगता है.

इस देश में तलाक की प्रक्रिया आसान हो जाए तो औरतों की आज़ादी और आत्मसम्मान बचा रहे. वह दहेज-दानव का शिकार होने से भी बच जाएं. भारत में करोड़ों महिलाएं असंतोषजनक और अपमानजनक वैवाहिक जीवन जीने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि तलाक की प्रक्रिया लंबी, जटिल और सामाजिक रूप से कलंकित मानी जाती है. परिणामस्वरूप औरतें जीवन भर हिंसा और मानसिक प्रताड़ना झेलती रहती हैं. अगर कानून उन्हें जल्दी और सम्मानजनक तरीके से अलग होने का अधिकार दे, तो वे दहेज के दानव और उत्पीड़न के चक्र से मुक्त हो सकती हैं. स्त्री की असली स्वतंत्रता तभी संभव है, जब उस के पास “न” कहने और अपने जीवन की दिशा स्वयं तय करने का अधिकार भी समान रूप से सुरक्षित हो. Indian Society

Bihar Politics: नीतीश कुमार को क्यों याद रखे बिहार

Bihar Politics: किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री के रूप में एक नेता के 20 साल का सफर कम नहीं होता है. 20 साल में पूरी पीढ़ी बदल जाती है. 18 साल में देश में वोट डालने का अधिकार मिल जाता है. नीतीश कुमार 2005 से ले कर 2014 तक लगातार बिहार के मुख्यमंत्री रहे. इस के बाद बीचबीच में कुछ अंतराल को छोड़ दें तो 20 साल वह बिहार के मुख्यमंत्री रहे हैं. बात 20 साल की जगह अगर केवल 5 साल की भी की जाए तो क्या काम नीतीश कुमार ने किया जिस को याद रखा जाए ?

मसलन लालू प्रसाद यादव की बात की जाए तो बिहार का एक बड़ा तबका कहता है कि दलित पिछड़ी जातियों को सम्मान जनक जीने का अधिकार दिलाया. उस के पहले बिहार में बाबू साहब का राज होता था. बिहार में कई लोकगीत लालू प्रसाद यादव के उपर बने हैं. जिन में यह गा कर बताया जाता है कि आज दलित और पिछड़े जो मूंछ रख कर घूम रहे हैं उस के पीछे लालू प्रसाद की मेहनत है. वरना दलित पिछड़ों को सम्मान से जीने का अधिकार नहीं था.

क्या पिछले 5 साल में नीतीश कुमार की इस तरह की कोई उपलब्धि है, जिस की वजह से उन को याद किया जा सके ? 5 साल की क्यों नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप में बिहार में लंबे समय तक काम करने का मौका मिला है. पहली बार वह 3 मार्च 2000 से 10 मार्च 2000 तक मुख्यमंत्री रहे. दूसरी बार 24 नवबंर 2005 से 25 नवबंर 2010 तक, तीसरी बार 26 नवबंर 2010 से 19 मई 2014 तक, चौथी बार 22 फरवरी 2015 से 19 नवम्बर 2015 तक, पाचंवी बार 20 नवबंर 2015 से 26 जुलाई 2017 तक, छठी बार 27 जुलाई 2017 से 15 नवबंर 2020 तक, सातवी बार 16 नवबंर 2020 से 9 अगस्त 2022 तक और आठवी बार 10 अगस्त 2023 से अब तक मुख्यमंत्री है.

इन को जोड़ कर देखें तो करीब 18 साल से अधिक समय तक नीतीश कुमार बिहार की कुर्सी पर बैठे रहे हैं. नीतीश कुमार ने श्रीकृष्ण सिंह का रिकौर्ड तोड़ दिया. वह 14 साल 314 दिन तक मुख्यमंत्री रहे थे. श्रीकृष्ण सिंह कायस्थ बिरादरी के सिन्हा वर्ग से आते थे. नीतीश कुमार के ही नाम सब से कम समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकौर्ड भी रहा है. उन का पहला कार्यकाल मार्च 2000 में केवल 7 दिन का भी रहा है. सब से लंबा कार्यकाल 8 साल 239 दिन भी नीतीश कुमार के नाम रहा. जब वह 2005 से 2014 तक मुख्यमंत्री रहे.

बिहार रहा बदहाल

बचपन में जिस नीतीश कुमार को लोग ‘मुन्ना‘ के नाम से पुकारते थे मुख्यमंत्री बनने के बाद उन को ‘सुशासन बाबू‘ के नाम से जानने लगे. सुशासन बाबू के कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार का नाम तीसरे मोर्चे के प्रधानमंत्री के रूप में लिया जाने लगा था. भारतीय जनता पार्टी को बहुमत मिलने के बाद जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो नीतीश कुमार ने राजनीति की गति को समझा और धीरेधीरे वह ‘मोदी मय‘ होते गए. ऐसे में नीतीश कुमार भले ही 15 साल मुख्यमंत्री बन पाए हो पर बिहार का विकास नहीं हो सका.

नीतीश कुमार केवल बिहार का विकास ही नहीं कर पाए यहां की सामाजिक सरंचना को भी नहीं बचा पाए. जिस समाजवादी विचारधारा के नेता जय प्रकाश नारायण के साथ नीतीश ने अपनी राजनीति शुरू की थी बाद में वह कांग्रेस के विरोध के नाम पर भाजपा की धर्मवादी सोच का हिस्सा बन गए. मोदी के प्रखर धर्म और राष्ट्रवाद आने के बाद नीतीश कुमार उस का हिस्सा बनते गए. नीतीश कुमार ने धर्म की आड़ में गरीब पिछड़ों की आवाज को दबा दिया. नीतीश के शासन में बिहार की हालत पहले से भी बद से बदत्तर होती गई. बिहार में बेकारी, बदहाली, अपराध, स्वास्थ्य और षिक्षा का बुरा हाल है.

बिहार की पोल कोविड काल में पूरे देश ने देखी. 2019 में कोरोना काल के दौरान प्रवासी मजदूरों के पलायन सब ने देखा. आंकड़े बताते हैं कि बिहार से करीब 90 लाख लोगों ने रोजीरोटी के लिए बिहार छोड़ा था. इन में से कोरोना के दौरान 40 लाख लोग इस भ्रम में वापस बिहार आए कि उन को अब यहां काम मिल जाएगा तो मनरेगा के तहत भी उन को पूरा काम नहीं मिला. बिहार में कुल मजदूरों की संख्या 2 करोड़ 43 लाख है. जिन लोगों ने मनरेगा के तहत काम के लिए आवेदन किया था. उन में से केवल 65 लाख को ही जौब कार्ड बन सका.

बिहार में सब से प्रमुख नेता प्रतिपक्ष और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा कि टैक्नोलौजी, उदारीकरण और एआई के दौर के बाद भी विगत 20 सालों में बिहार की प्रति व्यक्ति आय सब से गरीब अफ्रीकी देशों युगांडा और रवांडा से भी कम है. बिहार के 8 करोड़ युवाओं को नौकरी की तलाश है. तेजस्वी यादव को विरोधी भले ही 9वीं फेल कह कर उपहास उड़ाते हों पर तेजस्वी बात खरीखरी कहते हैं. तेजस्वी यादव ने 20 सवाल किए. जिन के जरीए बिहार की हालत का पता किया जा सकता है. उन का कहना था ’बिहार में केला, मकई, मखाना, चावल, गन्ना, आलू, लीची, आम इत्यादि अनेक विश्व प्रसिद्ध अनाज, फल, सब्जियों का इतना उत्पादन होता है, लेकिन इन सभी से संबंधित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग 20 वर्षों से बिहार में क्यों नहीं लगाए गए ?

तेजस्वी यादव ने ट्वीट करते हुए पूछा बिहार बेरोजगारी का मुख्य केंद्र क्यों है? 20 वर्षों की एनडीए सरकार बताए कि बिहार में आईटी कंपनियां क्यों नहीं बुलाई गई ? क्यों नहीं आई और क्यों नहीं आ सकती ? बिहार में आईटी पार्क क्यों नहीं बन सकते ? बिहार दूसरे प्रदेशों से मछली खरीदता है ? बिहार में मछली उत्पादन संबंधित तमाम संसाधन होने के बावजूद यहां ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं कर सकते ? बिहार में मछली उत्पादन को बढ़ावा दे कर, यहां जिलावार मछली बाजार लगाकर मछुआरों की आमदनी और उत्पादन क्यों नहीं बढ़ा सकते ?

बिहार में डेयरी प्रौडक्ट्स यानी दुग्ध उत्पादन संबंधित बड़े उद्योग क्यों नहीं लगाए जा सकते ? बिहार का दूध, घी, मक्खन, चीज, पनीर, खोया इत्यादि दूसरे प्रदेशों और देशों में क्यों नहीं भेजा जा सकता ? बिहार में इंडस्ट्री स्पेसिफिक क्लस्टर या उद्योग-विशिष्ट क्लस्टर क्यों नहीं लगाए जा सकते ? यहां बुन कर उद्योग, लघु उद्योग और हथकरघा उद्योग के लिए क्या किया ? इन के शासन में बड़े पैमाने पर इन उद्योगों को बढ़ावा क्यों नहीं दिया गया ? बिहार को अब तक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित क्यों नहीं किया ? बिहार में पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं.

सरकार नियुक्ति, भर्ती परीक्षा और प्रक्रिया को पारदर्शी तथा नियमित क्यों नहीं करती ? इस बात की जानकारी देनी चाहिए कि बिहार से कुल कितना पलायन हुआ ? बिहार में अप्रत्याशित दर से पलायन क्यों बढ़ रहा है ? पहले से चालू कितने चीनी मिल, जूट मिल, पेपर मिल एवं कुल कितने उद्योग-धंधे और कल-कारखाने बंद हुए तथा उस से बिहार को कुल कितने राजस्व व रोजगार के अवसरों की हानि हुई ? बिहार का कुल कितने लाख करोड़ रुपए शिक्षा और चिकित्सा के नाम पर दूसरे प्रदेशों में गया ? बिहार के मानव संसाधन का कुल कितने प्रतिशत बिहार में और कितने प्रतिशत दूसरे प्रदेशों में कार्यरत है ?

बिहार में 60 लाख ग्रेजुएट हैं. इन में से आधे बेरोजगार हैं. जिस आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि हर दूसरा आदमी बेरोजगार हैं. कारोबारी और किसानों की हालत भी बेहद खराब है. बिहार में 2005 में मंडी सिस्टम बंद कर के उस के समांतर निजी खरीददारों की व्यवस्था है. प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से देखें तो बिहार का देश में चौथा स्थान है. बिहार की प्रति व्यक्ति आय 6 हजार रुपए मासिक यानी करीब 2 सौ रुपए रोज है.

क्या है शराब बंदी का सच ?

नीतीश कुमार के कामों को सोचें तो कोई खास काम सामने नहीं दिखते हैं. एक बात की सब से ज्यादा चर्चा होती है कि उन के राज में शराब बंदी हुई. शराब बंदी का असर तक होता जब लोगों ने शराब पीना छोड़ दिया होता. शराब बंदी का असर गरीब और पिछड़ी जातियो के लोगों पर हुआ जिन को पुलिस ने शराब बेचने के आरोप में बंद कर दिया. तेजस्वी यादव ने आंकड़ों के जरिए शराब बंदी के सच को समझाते हुए पूरा गणित समझाया.

बिहार में शराबबंदी का कड़वा व काला सच 99 फीसदी गरीब, दलित, पिछड़े और अतिपिछड़े वर्गों के लोगों को पकड़ा गया. शराबबंदी कानून के तहत अब तक 9 लाख 36 हजार 949 मुकदमें दर्ज किए गए. जिस के तहत 14 लाख 32 हजार 837 लोगों को गिरफ्तार किया गया. इन में से लगभग 14 लाख 20 हजार 700 से अधिक गिरफ्तार लोग गरीब, दलित, पिछड़े और अतिपिछड़े वर्गों के हैं. बाकी बचे एक प्रतिशत से भी कम गिरफ्तार लोगों में गैर दलित, गैर पिछड़ा गैर अति पिछड़ा और अन्य राज्यों के लोग है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार बिहार में 3 करोड़ 86 लाख 96 हजार 570 लीटर शराब बरामद की गई. इस में 2 करोड़ 10 लाख 64 हजार 584 लीटर विदेशी तथा एक करोड़ 76 लाख 31 हजार 986 लीटर देशी शराब शामिल है. इस का मतलब हुआ कि बिहार में विदेशी शराब की खपत अधिक है. अब गरीब लोग तो 2 करोड़ 10 लाख लीटर विदेशी शराब पिएंगे नहीं ? फिर बिहार में विदेशी शराब कौन पीता है? उत्तर है अमीर लोग- जिन्हें ये भ्रष्ट सरकार और पुलिस गिरफ्तार नहीं करती ?

तेजस्वी यादव सवाल पूछते हैं ‘सरकार बताए कि 9 लाख, 36 हजार 949 मुकदमे दर्ज होने और 14 लाख 32 हजार 837 लोगों को गिरफ्तार करने के बाद भी बिहार में 3 करोड़ 86 लाख 96 हजार 570 लीटर शराब कहां से आ रही है ? शराब किस की मिलीभगत से आ रही है ? सप्लाई कौन कर रहा है ? बिहार पुलिस और बिहार सरकार ने शराबबंदी को अवैध उगाही, तस्करी और भ्रष्टाचार का एक सशक्त उपकरण बना लिया है. क्या यह सच नहीं है कि शराबबंदी के नाम पर बिहार में 40 हजार करोड़ से अधिक के अवैध कारोबार की समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही है.

नीतीश कुमार में क्या था खास

सवाल उठता है कि नीतीश कुमार में ऐसी क्या खास बात थी कि वह इतने लंबे समय तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे ? दूसरी तरफ उन के 5 साल के कार्यकाल में एक भी ऐसा काम नजर नहीं आ रहा जिस की वजह से बिहार उन को याद रखे ? बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव को सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले नेता के रूप में देखा जाएगा तो नीतीश कुमार को पिछड़ा वर्ग के वोटबैंक में सेंधमारी करने वाले अवसरवादी नेता के रूप में याद किया जाएगा.

देश में मंडल कमीशन के बाद पिछड़ी जातियों ने अपने हक और अधिकार की जो लड़ाई शुरू उसे उपजातियों में बांट कर अपने लाभ के लिए खत्म कर दिया गया. 1990 के बाद हाशिए पर पहुंची सवर्ण राजनीति को पिछड़ा वर्ग में बंटवारे का लाभ मिला. इस वजह से 2025 में सवर्णवादी राजनीति बिहार में वापस कायम होती दिख रही है. नीतीश ने अपना राजनीतिक सफर जयप्रकाश नारायण के साथ शुरू कर के जनता पार्टी, लोकदल, जनतादल, समता पार्टी और फिर जनता दल यूनाइटेड तक तय किया. समय के हिसाब से वह पाला बदलते रहे. इस कारण ही वह लंबे समय तक बिहार के मुख्यमंत्री बने रह सके.

जदयू के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कहते हैं कि ‘मुझे लोकनायक जयप्रकाश नारायण, छोटे साहब सत्येंद्र नारायण सिन्हा और जननायक कर्पूरी ठाकुर के चरणों में जानने और सीखने का मौका मिला है.‘ नीतीश कुमार के राजनीतिक कैरियर को देखें तो उन्होंने पिछड़ा वर्ग में सेंधमारी कर के उसे कमजोर किया. जिस सवर्णवादी राजनीति को बिहार ने नकार दिया था नीतीश कुमार ने पिछड़े वर्ग के वोटों का सौदा कर के उसी सवर्णवादी सोच को बिहार की सत्ता में स्थापित होने का मौका दिया.

90 के दशक में जब बिहार में सवर्णवादी राजनीति हाशिए पर पहुंच रही थी. लालू प्रसाद यादव ने पिछड़ी जातियों को बिहार की मुख्यधारा में स्थापित करने का काम किया. इस वजह से उन को सामाजिक न्याय के नेता के रूप में स्वीकार किया जाता है. लालू प्रसाद यादव को कमजोर करने के लिए नीतीश कुमार ने पहले पिछड़ी जातियों में सेंधमारी फिर सवर्णवादी राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी के साथ समझौता कर के बिहार में उन के जनाधार को बढ़ाने का काम किया.

पिछड़ी जातियों में सेंधमारी के लिए नीतीश कुमार ने जातियों के वर्ग के बीच उपवर्ग और जातियों की श्रेणियों को तैयार किया. पिछड़ा वर्ग को सब से अधिक नुकसान मोस्ट ओबीसी के अलग होने से हुआ. नीतीश कुमार ने पिछड़ा वर्ग से 22 फीसदी मोस्ट ओबीसी, 12 फीसदी कोइरी, कुर्मी और कुशवाहा, 8 फीसदी महादलित को अलग कर के अपना एक नया वोट बैंक तैयार किया. इस वर्ग ने 16 फीसदी अगड़ों का साथ दे कर पिछड़ा वर्ग की राजनीति को बिहार से उखाड़ कर फेंक दिया.

नीतीश कुमार की सफलता का श्रेय उन के पलटीमार दांव को दिया जा सकता है. जय प्रकाश की समाजवादी विचारधारा से राजनीति शुरू की. पिछड़ों की अगुवाई करने वाले लालू प्रसाद यादव को हाशिए पर ढकेलने के लिए ऊंची जातियों ने नीतीश कुमार का प्रयोग किया. कांग्रेस की विचारधारा का विरोध करने वाले नीतीश कुमार भारतीय जनता पार्टी के साथ मिल कर पिछड़े वर्ग को कमजोर करने का काम किया. ऊंची जातियों ने पिछड़ों के नेता लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार को आमने सामने कर के लालू यादव की ताकत को बिहार में खत्म कर दिया.

समाजवाद को भूल दक्षिणापंथी बने नीतीश कुमार

नीतीश कुमार ने नौकरी छोड़ कर 1975 में राजनीति में प्रवेश किया और जय प्रकाश नारायण के आंदोलन से जुड़ गए. इंदिरा सरकार को गिराने में अहम भूमिका निभाई. नीतीश कुमार ने 1977 में विधानसभा चुनाव लड़ा और चुनाव हार गए. इस के बाद भी नीतीश ने हार नहीं मानी. इस के बाद 1980 में विधानसभा चुनाव लड़ने का मौका मिला लेकिन इस में भी उन को हार मिली. भले ही ये लगातार चुनावों में हार रहे थे. लेकिन इन पर हार का कोई विशेष प्रभाव नहीं था पड़ा.

1985 में पहली बार नीतीश कुमार को जीत मिली. इस के बाद युवा लोकदल के अध्यक्ष और बाद में जनता दल के प्रदेश सचिव बन गए.

1990 में केन्द्र की चन्द्रशेखर सरकार वह पहली बार केन्द्रीय मंत्रीमंडल में कृषि राज्यमंत्री बने. 1991 में वह एक बार फिर लोकसभा के लिए चुने गए. इस साल ही जनता दल का राष्ट्रीय सचिव भी चुना गया. इस के संसद में वह जनता दल के उपनेता भी बने. 1989 और 2000 में वह बाढ़ लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. 1989-1999 में वह केन्द्रीय रेल एवं भूतल परिवहन मंत्री भी रहे. अगस्त 1999 में गैसाल में हुई रेल दुर्घटना के बाद उन्होंने मंत्रीपद से अपना इस्तीफा दे दिया. जौर्ज फर्नांडिस की समता पार्टी के साथ काम किया. साल 2000 में इन को कृषि मंत्री बना दिया गया और 2001 में फिर से रेल मंत्री बना दिया गया.

2005 में बिहार में चुनाव हुए इस समय तक नीतीश कुमार ने जनता दल यूनाइटेड नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली थी. लालू यादव के जंगलराज और परिवारवाद के खिलाफ जनता को विकास का वादा कर के चुनाव जीतने में सफल रहे. भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन के साथ बिहार के मुख्यमंत्री बन गए. 2010 में फिर मुख्यमंत्री के चुनाव हुए. इस में नीतीश को भारी जीत मिली. अब तक नीतीश को भाजपा की जरूरत खत्म हो गई थी तो वह भाजपा से अलग हो गए. इस समय तक भाजपा में नरेंद्र मोदी का उदय शुरू हो चुका था. नीतीश नरेंद्र मोदी की आलोचना करने लगे थे. 2014 के लोकसभा चुनावों में नीतीश को तीसरे मोर्चे का नेता मान प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी माना जा रहा था. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह सारे कयास धरे के धरे रह गए.

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश ने भाजपा से नाता तोड़ कर राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ महागठबंधन कर लिया. इस चुनाव में नीतीश की पार्टी जदयू बिहार में तीसरे नम्बर पर थी इन को 17 फीसदी वोट और 71 सीटें मिलीं, राजद को 18 फीसदी वोट और 80 सीटें मिलीं और भाजपा को 24 फीसदी वोट और 50 सीटें मिलीं. कांग्रेस को 7 फीसदी वोट और 27 सीटें मिलीं. इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहने के बाद भी नीतीश कुमार मुख्यमंत्री और राजद नेता लालू प्रसाद यादव के बेटे और तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बन गए.

बिहार में फैली धर्म की राजनीति

नीतीश और तेजस्वी यादव के बीच संबंधों की खींचतान के कारण महागठबंधन में विवाद शुरू हुआ था. 26 जुलाई 2017 को सीबीआई द्वारा एफआईआर में उपमुख्यमंत्री और लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव के नाम आने के बाद नीतीश कुमार ने गठबंधन सहयोगी राजद के बीच मतभेद के चलते इस्तीफा दे दिया था. 20 महीने पुरानी महागठबंधन सरकार गिर गई तो नीतीश कुमार पाला बदल कर वापस भाजपा की तरफ आ गए. वह एनडीए गठबंधन में शामिल हुए और मुख्यमंत्री पद की पुनः शपथ ली. भाजपा के सहयोग से सरकार चलाने लगे.

बिहार में जाति की राजनीति का असर था कि यहां धर्म की राजनीति कभी पनप नहीं पाई. नीतीश कुमार का साथ ले कर भाजपा ने अपना उल्लू सीधा करना शुरू किया. 2000 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरी. अब 2025 में भाजपा का पूरा प्रयास होगा कि बिहार में पहली बार वह अपना मुख्यमंत्री बना सके. इस में नीतीश कुमार का सब से बड़ा सहयोग रहेगा. एक बार धर्म का प्रभाव फैला तो फिर अगड़ी जातियों के प्रभाव को खत्म करना मुश्किल हो जाएगा. नीतीश कुमार ने हर कदम भाजपा का साथ दिया है. उम्र में बराबर होने के बाद भी वह प्रधानमंत्री का पैर मंच पर छूने से नहीं चूकते हैं.

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद जब भाजपा अपने बल पर केन्द्र में सरकार नहीं बना पा रही थी तो नीतीश कुमार ने बैशाखी का काम किया. कहने को नीतीश कुमार की राजनीति पिछड़े वर्ग की रही असल में वह अगड़ी जातियों के हित में काम करते रहे. वह भाजपा की पाखंडवादी राजनीति का हिस्सा बन गए. जब अयोध्या में राम मंदिर बना तो भाजपा ने बिहार के सीतामढ़ी में सीता मंदिर बनाने की योजना बनाई तब नीतीश सरकार ने इस काम को पूरा किया.

बिहार के सीतामढ़ी स्थित पुनौराधाम में सीता मंदिर परिसर का शिलान्यास 8 अगस्त को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया. 67 एकड़ में बनने वाले इस भव्य मंदिर का निर्माण 882 करोड़ की लागत से मात्र 11 महीने में पूरा करने की योजना है. पुनौराधाम को सीता के जन्मस्थल के रूप में माना जाता है. नीतीश कुमार के 20 साल की तुलना करें या 5 साल की बिहार को कुछ ऐसा नहीं हासिल हुआ जिस के कारण उन को याद किया जा सके. नीतीश कुमार के सहारे भाजपा ने बिहार पर कुंडली मार ली है. धर्म की जकडन से बिहार को निकालना सरल नहीं है. Bihar Politics

Hindi Story : अम्मा शहर में

Hindi Story : भोपाल की वह पौश कालोनी थी जहां दादी के बेटे मानव का फ्लैट था. नया फ्लैट था. मानव और उस की पत्नी मीनल एक प्राइवेट कंपनी में जौब करते थे. मानव ने मां को महीनेभर पहले ही बोल दिया था, ‘अम्मा, हम दोनों कंपनी के काम से बाहर जाएंगे तो कुछ दिनों तक तुम को यहां आना है. तुम्हारे आने से हम निश्ंिचत हो कर जा सकेंगे. मानसी को भी आप के साथ ज्यादा समय मिल जाएगा.’

बेटेबहू के प्यारभरे बुलावे को कैसे टाल देती, रीना. पोती मानसी के साथ रहने की कल्पना से ही खुश हो उठी थी वह. मानसी 10 साल की थी. दादी सरकारी स्कूल में टीचर थीं. कुछ समय पहले ही रिटायर हुई थी. कुछ समय तो नहीं कह सकते क्योंकि वह 11-12 साल पहले रिटायर हुई थीं. गांव बीरमपुर में बड़े बेटे के साथ रहती थीं वे. गांव की शुद्ध ताजी हवा, पौष्टिक खानपान और फिजिकली रूप से सक्रिय दादी की चुस्तीफुरती देखते ही बनती थी. वे बढ़ती उम्र को सिर्फ नंबर मानती थीं क्योंकि उन्हें हर समय छोटीछोटी समस्याओं पर रोनाधोना, काम से जी चुराना पसंद नहीं था.

दूसरी आम महिलाओं की तरह मंदिरों में भजनकीर्तन में समय गंवाना भी पसंद नहीं था उन्हें. वे कर्म में विश्वास रखती थीं, जो सोचती थीं वही बोलती थीं. कर्म ही सब से बड़ा धर्म है, कर्म से बढ़ कर कुछ नहीं है. बेटे भी मां पर गर्व महसूस करते थे. लेकिन बहुएं कभीकभी चिढ़ जाती थीं और बोल देती थीं, ‘अम्मा आराम से घर में बैठो, गरम रोटी दे रहे हैं खाने को. आप आराम किया करो.’

लेकिन अम्मा कहां सुनतीं. वे तो गांव में भी बच्चों को फ्री ट्यूशन देने बैठ जातीं. आएदिन बच्चों का मजमा लगा लेतीं. कोई बच्चे को पढ़ने को न भेजता तो उस के घर जा कर उसे डांट पिला देतीं. गांव में बड़ी बहू खुश थी. चलो अम्मा, अब छोटे देवर के पास कुछ दिन रहेंगी तो गांव में बच्चों की भीड़ घर पर नहीं लगेगी. वैसे, अम्मा जाती रहती थीं भोपाल लेकिन कुछ दिन रह कर वापस आ जाती थीं. इस बार महीनेभर के लिए जा रही हैं. दोनों पतिपत्नी कंपनी के काम से बेंगलुरु जाएंगे तो अम्मा को वहीं रहना होगा.

भोपाल स्टेशन पर मानव आ गया था अम्मा को लिवाने. कार की डिक्की में अम्मा का सामान रखते हुए मानव ने पूछा, ‘‘अम्मा सब ठीक रहा सफर में, कोई तकलीफ तो नहीं हुई?’’

अम्मा चुप रहीं. मानव ने कार स्टार्ट कर दी.

‘‘अम्मा, तुम जवाब नहीं दे रही हो, क्या हुआ?’’ मानव ने सवाल किया.

‘‘तकलीफ की बात पूछी तू ने, इस पर चुप हूं,’’ अम्मा बोलीं.

‘‘क्यों?’’ मानव आश्चर्य से बोला.

‘‘अरे, ट्रेन में पब्लिक हो तो तकलीफ होगी न. पब्लिक ही नहीं तो काहे की तकलीफ,’’ अम्मा ने खुलासा किया.

‘‘क्या कह रही हो, कंपार्टमैंट में पैसेंजर नहीं थे? तुम अकेली थीं?’’ मानव ने कार रोक दी.

‘‘अरे नहींनहीं, लोग थे पर एसी में पैसेंजर बातचीत कहां करते हैं? परदे खींच कर अपनीअपनी सीटों पर पसरे रहते हैं, मोबाइल चलाते हैं या फिर लैपटौप खोल कर बैठ जाते हैं.’’

मानव जोरजोर से हंसने लगा और उस ने कार स्टार्ट कर दी. लगभग 40 मिनट में वे अपनी कालोनी में पहुंच गए. बड़े अपार्टमैंट के सामने कार रुकी. मानव ने हौर्न बजाया. गार्ड दौड़ता हुआ आया और उस ने गेट खोल दिया. कार को पार्किंग में खड़ा कर मानव लिफ्ट से 5वें माले पर पहुंच कर फ्लैट के सामने पहुंचा ही था कि गेट खुल गया. दरवाजे पर बहू मीनल, पोती मानसी खड़ी थीं. मानसी दादी को देखते ही उन से लिपट गई तो जैसे दादी की सफर की थकान उतर गई हो.

फ्लैट नया था. दीवारों और दरवाजे पर नए किए गए पेंट की गंध पूरे घर में थी. मानसी दादी का हाथ पकड़ कर उसे नया घर दिखाने में व्यस्त थी. बड़ेबड़े 3 बैडरूम, डाइनिंग हौल, खूबसूरत किचन, ड्राइंगरूम सबकुछ बढि़या था. दोदो बालकनी जहां से पूरे भोपाल शहर को देखा जा सकता था.

‘‘मानसी, अब दादी को फ्रैश होने दो, थकी होंगी दादी,’’ बहू मीनल ने कहा.

‘‘अरे बहू, तू चिंता मत कर. मैं न थकती, मेरी थकान तो पोती का मुंह देखते ही उतर गई है,’’ कहती हुई दादी ने मानसी को गले लगा लिया.

बहू ने चाय टेबल पर रख दी थी. बहू जानती थी कि शाम को अम्मा चाय पीती हैं, वह भी खालिस दूध की, चायपत्ती नामभर की डलती है.

दादी बाथरूम से आई तो फ्रैश महसूस कर रही थीं. उन्होंने साड़ी बदल ली थीं. हलकी रेशमी साड़ी थी सफेद रंग की, ब्लाउज रंगीन था. मठरी के साथ दादी ने चाय का घूंट भरा, फिर बोलीं, ‘‘मठरी घर में बनी है क्या?’’

‘‘नहीं अम्मा, बाहर की है. घर में समय नहीं मिल पाता.’’

‘‘अच्छा,’’ फिर बोलीं, ‘‘चाय अच्छी बनाई है, बहू.’’

मीनल मुसकरा दी.

‘‘तुम लोग कब जाओगे बेंगलुरु?’’ अम्मा ने सवाल किया.

‘‘कल शाम को,’’ मानव ने कमरे में आतेआते कहा, ‘‘अम्मा, हम लोग भी अभी नएनए आए हैं फ्लैट में, कुछ लोगों को जानते हैं, अच्छे लोग हैं. 5वें माले पर जितने भी लोग हैं उन से परिचय हो गया है हमारा. ज्यादा परेशान मत होना किसी बात के लिए. दरवाजा एकदम से मत खोलना. पहले देख लेना कौन है- दूध वाला, अखबार वाला, धोबी होगा, यही लोग ही आते हैं. बिल्ंिडग के नीचे मार्केट है, मानसी के साथ जा कर सब्जी वगैरह ले लेना. गार्डन नजदीक है.’’

‘‘अरे, बसबस. मैं क्या दूध पीती बच्ची हूं जो सम झा रहा है.’’

‘‘ये,’’ दादी ने पापा की बोलती बंद कर दी तो मानसी खुश हो गई.

मानव चुप हो गया.

‘‘मानसी है, वह सम झा देगी.’’ दादी ने कहा तो मानसी मुसकरा दी.

दूसरे दिन शाम को मानव और मीनल बेंगलुरु के लिए रवाना हो गए थे. मानसी दादी के साथ बहुत खुश थी, कभी बुक्स की बातें करती तो कभी टीवी पर कार्टून फिल्म लगा लेती.

‘‘दादी डिनर में क्या खाएंगे?’’ मानसी ने लाड़ जताया.

‘‘जो मानसी बोलेगी, दादी बना देगी.’’

‘‘चावल और मखनी मिक्स दाल,’’ मानसी बोली.

‘‘किचन में चलो,’’ दादी बोलीं.

दोनों डिनर की तैयारी में लग गईं. दाल में हींग, लहसुन, जीरे व प्याज का तड़का लगा. मानसी की भूख तेज हो गई. गरमगरम दालचावल, आलू और मूंग के पापड़ के साथ खाने का स्वाद बढ़ गया. दादी के हाथों का खाना खा कर मानसी खुश थी. दादी भी सोच रही थीं कि यह सुख सब को नहीं मिलता. उन दोनों ने खाना खाया और बालकनी में आ कर बैठ गईं. पूरा भोपाल शहर जगमग कर रहा था.

‘‘दादी, देखो चांद कितना सुंदर लगता है,’’ मानसी बोली.

‘‘हां बेटा, मानसी भी तो सुंदर है,’’ दादी बोलीं.

‘‘दादी, आप के बाल लंबे और सुंदर हैं. मेरे बाल लंबे क्यों नहीं करती मौम?’’ मानसी ने मां की शिकायत की.

‘‘बेटा, उस के पीछे वजह है. लंबे बाल, स्वस्थ बालों के लिए उन की देखभाल भी करनी होती है. मौम जौब में है, तुम छोटी हो, इसलिए समय नहीं निकल पाता होगा. बाल तो बढ़ जाएंगे, कौन सी बड़ी बात है,’’ दादी ने कहा, फिर बोलीं, ‘‘तुम्हारे छोटे कटे हुए बाल भी सुंदर हैं.’’

‘‘अच्छा, दादी,’’ मानसी बोली.

‘‘बिलकुल, चलो, तुम बैठो. मैं तुम्हारे लिए हलदी वाला दूध लाती हूं.’’

‘‘दादी, चौकलेट वाला दूध,’’ मानसी बोली.

‘‘एक बार आज हलदी वाला दूध पियो, कल चौकलेट वाला.’’

‘‘ठीक है,’’ मानसी मान गई.

दादी गरम दूध हलदी डाल कर ले आईं. मानसी को उस का स्वाद अच्छा लगा.

‘‘चल, अब सो जाते हैं,’’ दादी ने मानसी से कहा.

‘‘ठीक है, दादी,’’ कह कर मानसी ने दादी को प्यार किया और दादी के साथ ही सो गई. दूसरे दिन दादी सुबह जल्दी ही उठ गई थीं. उन्हें आदत थीं जल्दी उठने की. फ्रैश  हो कर बालकनी में बैठ गई. ठंडीठंडी हवा भली लग रही थी. पूरा शहर रोशनी से  झिलमिला रहा था. अपार्टमैंट खामोशी में डूबा था. नाइट शिफ्ट का गार्ड जरूर घर जाने की तैयारी में था. दोपहर वाली शिफ्ट का गार्ड आ गया था.

दादी सोच रही थीं, गांव में होतीं तो अब तक मौर्निंग वौक पर निकल जाती पर यहां अनजान हूं, रास्तों से. इसलिए वे बालकनी में ही बैठी रहीं. लगभग घंटेभर बाद दरवाजे के बाहर रखा अखबार ले कर पढ़ने लगीं. इस बीच कमरे में मानसी को देख आई थी. वह सो रही थी. अखबार में वही खबरें- चोरी, साइबर क्राइम, रेप. वे सोचने लगीं, तरक्की ने जीवन को आसान तो बनाया है लेकिन बदमाशों ने उस का भी फायदा उठा लिया. अब साइबर क्राइम बढ़ने लगे.

मोबाइल जैसी छोटी चीज जीवन को सरल बना देती है लेकिन सावधानी न बरतने पर खतरे बढ़ा देती है. दादी मोबाइल चलाती थीं लेकिन उस का इस्तेमाल कम करती थीं. पढ़ने के लिए प्रिंट मीडिया को ही वह अच्छा सम झती थीं.

‘‘दादी, दादी, कब उठीं आप?’’ इतने में मानसी बालकनी में चली आई.

दादी ने देखा, सुबह के सवा सात बज रहे हैं. मानसी को प्यार करती हुई किचन में ले आई. उस के लिए उन्होंने दूध गरम किया. मानसी ने दूध पिया, फ्रैश हो कर दादी से बोली, ‘‘चलो दादी, गार्डन में चलते हैं.’’ दादी को मालूम था कि मानसी के एग्जाम खत्म हो गए हैं. छुट्टियां चल रही हैं. स्कूल अप्रैल में खुलेगा. इस बीच डोरबेल बजी, दादी ने गेट खोला.

‘‘गुडमौर्निंग मैडम, दूध ले लो.’’

मानसी दूध लेने के लिए बरतन ले आई थी. दूध देख कर दादी ने उस में उंगली डाल कर निकाली और जोर से बोलीं, ‘‘यह दूध है कि चूने का पानी? दूध उंगली पर ठहरा ही नहीं. अच्छा लूटते हो. हमारे गांव आना, दूध उंगली से ही चिपक जाएगा इतना गाढ़ा दूध होता है.’’

दूध वाला हंसता हुआ चला गया.

‘‘दादी, अब गार्डन में चलते हैं.’’

‘‘ठीक है, चलोचलो,’’ कहते हुए दरवाजे को लौक किया और लिफ्ट से ग्राउंडफ्लोर पर उतर कर सड़क पर आ गईं वे दोनों.

‘‘मेड साढे़ दस बजे से पहले नहीं आएगी, अभी 8 बज रहे हैं, इस वक्त मौर्निंग वौक वाले मिलेंगे? दादी ने सवाल किया.

‘‘हां दादी, अपने फ्लोर वाली आंटियां इसी समय जाती हैं. वे लेट उठती हैं न, इसलिए. कुछ बच्चे भी होंगे, बाकी के फ्लोर वालों को मैं नहीं जानती,’’ मानसी ने दादी को जानकारी दी.

गार्डन में पहुंचते ही जोरजोर से हंसीठहाकों की आवाज कानों में पड़ने लगी. कहीं से जोर से तालियों की आवाज. बहुत सी महिलाएं लोअर और टीशर्ट में वौक कर रही थीं. शरीर जैसे शर्ट फाड़ कर बाहर आना चाहता हो. भोंडापन  झलक रहा था. कहीं महिलाएं मैदान में बैठीबैठी ऐक्सरसाइज कर रही थीं तो कहीं बतियाने में लगी थीं.

‘‘अरे, इतनी धीरेधीरे दौड़ोगी तो चरबी न पिघलेगी, जोर से दौड़ो.’’ वौक करती महिलाएं रुक गईं दादी की आवाज सुन कर. फिर जब मानसी पर उन की नजर पड़ी तो बोलीं, ‘‘मानसी, कौन हैं ये?’’

‘‘दादी हैं मेरी, मानसी ने जवाब दिया और फिर दादी से बोली, ‘‘अपने फ्लोर की

आंटियां हैं.’’

‘‘तेजतेज घूमो, नहीं तो खूब खेलो. पसीना आने दो,’’ दादी ने सब को सम झाया.

‘‘इस उम्र में क्या खेलना.’’

‘‘ठीक है, कल सुबह तैयार रहना, हम खेल खिलाएंगे,’’ दादी बोलीं.

‘‘वाह, क्या बात है, तालियां दादी के लिए.’’ मानसी खुश हो गई.

फिर दादीपोती पहुंच गईं हंसने वाले ग्रुप में. सब देखने लगे.

‘‘क्यों, घर में हंसने को नहीं मिलता जो यहां हाहा करते रहते हो, नकली हंसी हंसते हो.’’

हंसतेहंसते सब चुप हो गए एकदम से.

‘‘हंसोहंसो, नकली हंसी हंस लो. चलो मानसी, घर चलें.’’

फिर मार्केट से ताजा सब्जी ले कर दोनों घर आ गईं.

सुबह साढे़ दस बजे मेड आ गई थी. आते ही वह मोबाइल ले कर बालकनी में

चली गई. काफी देर हो गई तो दादी चिल्लाईं, ‘‘बाई, पहले घर का  झाड़ूपोंछा

कर लो, डस्ंिटग कर लो, फिर मोबाइल पर बतियाना.’’

‘‘बाई, कौन बाई?’’ मेड, जिस का नाम रजनी था, एकदम से भड़क

गई. मोबाइल दूर कर दादी से बोली, ‘‘मेरा नाम रजनी है, बाई नहीं है. बाई

गलत चीज है. बाई नाचनेगाने वाली और गलत काम करने वाली औरतों को

कहते हैं.’’

‘‘पर हमारे गांव में तो  झाड़ूपोंछा करने वाली को बाई कहते हैं,’’ दादी बोलीं.

फिर भी रजनी का मुंह चढ़ा रहा गुस्से से.

‘‘दादी, उस को बाई मत बोलो, मेड बोलते हैं यहां,’’ मानसी बोली.

‘‘अच्छा, ठीक है. चल, जल्दी से नहा ले, फिर मैं नाश्ता तैयार करूंगी,’’ दादी बोलीं.

‘‘नाश्ते का नहाने से क्या काम?’’ मानसी बोली.

‘‘बिना नहाए नाश्ता करेगी? दादी ने पूछा.

हां, मौमडैड भी तो छुट्टी वाले दिन यही करते हैं. लंच तक नहा लेते हैं,’’ मानसी ने बताया.

‘‘बेटा, नहा कर नाश्ता करना अच्छा होता है. बाद में फिर आलस आने लगता है.’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर मानसी खुशीखुशी नहाने चली गई.

दादी ने गरमगरम पनीर परांठे बना दिए थे. रजनी  झाड़ूपोंछा कर के बालकनी में बैठी थी फुरसत में क्योंकि उस को नाश्ता बनाने और खाना बनाने से फुरसत मिल गई थी.

किचन में दादी काम कर रही थीं. जब तक मानसी नाश्ता कर रही थी, दादी नहा कर आ गईं. दादी के कमर तक बाल खुले थे.

‘‘वाह, इतने सुंदर बाल,’’ मानसी नाश्ता भूल कर दादी के बाल देखने लगी.

दादी मुसकराती हुई बोलीं, ‘‘मानसी के भी इतने लंबे बाल हो जाएंगे.

‘‘मौम ने छोटे रखवा दिए, बोलती है, केयर करनी होती है, टाइम वेस्ट होता है.’’

‘‘कोई बात नहीं. जब तुम बड़ी होगी तो रखना लंबे बाल,’’ दादी ने अपना नाश्ता प्लेट में लिया.

‘‘दादी, परसों संडे है, अपने फ्लोर के हाल में किटी पार्टी होगी. मौम नहीं है तो तुम को जाना होगा.’’

‘‘मतलब, तुम नहीं चलोगी? दादी ने पूछा.

‘‘नहीं मैडमजी, वहां बच्चों का क्या काम? लेडीज की पार्टी होती है,’’ रजनी ने नाश्ते की जूठी प्लेट समेटते कहा.

‘‘अच्छा, ठीक है. चली जाऊंगी,’’ दादी बोलीं.

‘‘मैं घर पर वीडियो गेम खेलूंगी,’’ मानसी ने बताया.

दूसरे दिन सुबह मानसी दादी से पहले ही उठ गई और दादी को उठाती हुई बोली, ‘‘दादी, जल्दी से फ्रैश हो जाओ, हमें गार्डन चलना है. आप ने आंटियों को भी जल्दी आने को कहा था.’’

‘‘बेटा, अभी सुबह के 6 बजे हैं. हम ने उन को 7 बजे का कहा था.’’

‘‘उन को गेम्स का भी कहा था,’’ मानसी बोली.

‘‘हां, हम जल्दी चलते हैं, वे भी आ जाएंगी, ठीक है,’’ दादी ने पोती की बात मानी और फ्रैश हो कर दोनों गार्डन में आ गईं. ठंडी हवा सुकून दे रही थी. पेड़पौधे, हरियाली, चिडि़यों की आवाज भली लग रही थी.

मानसी की नजर एक छोटे से लड़के पर पड़ी जो फूल तोड़ रहा था और एक थैले में जमा कर रहा था. ‘‘देखोदेखो, फूल चुरा रहा है,’’ मानसी चिल्लाई. मानसी के चिल्लाते ही वह छोटा लड़का भागने लगा.

‘‘बेटा, डर मत, इधर आ,’’ दादी बोलीं.

वह डरतेडरते आया. दादी ने देखा, उस का थैला फूलों से भरा है. गुलाब, गेंदे के फूल.

‘‘बेटा, ये फूल क्यों तोड़े हैं, माली ने कभी देखा तो गुस्सा होगा?’’ दादी बोलीं.

‘‘मैं सुबह जल्दी आता हूं, इसलिए वह नहीं देख सकता,’’ बच्चा मासूमियत से बोला.

‘‘लेकिन क्यों तोड़ते हो?’’ दादी ने सवाल किया.

‘‘अपने दादू के लिए, वे फूल बेचते हैं,’’ बच्चा बोला.

‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’ मानसी ने पूछा.

‘‘राजा बेटा. दादू मु झे इसी नाम से बुलाते हैं.’’

‘‘अच्छा, तुम हमें दादू से मिलवाने ले चलोगे?’’ दादी बोलीं.

‘‘चलिए,’’ राजा बोला. दादी उस के साथ उस के घर की तरफ चल दीं. लगभग

10 मिनट के रास्ते पर थोड़े कच्चेपक्के मकान थे. सड़क के उस पार एक कच्चे से मकान के सामने जा कर राजा बोला, ‘‘यहीं रहता हूं. दादू यहीं अंदर हैं.’’

दादी ने देखा कच्चे से मकान में थोड़ा सामान था. एक पलंग था, एक वृद्ध व्यक्ति बैठा था.

दादी को देख कर वह उठ गया.

‘‘बच्चे से सुबहसुबह बगीचे से फूल को तुड़वाते हो किसी ने चोरी करते देखा लिया तो?’’

‘‘फूल बेच कर थोड़ेबहुत पैसे आ जाते हैं. सो, गुजारा हो जाता है. मजदूरी नहीं होती मु झ से.’’

‘‘यह आप का पोता है, इस को पढ़ाओलिखाओ.’’

‘‘इस के मांबाप कोरोना में गुजर गए थे. मु झे मर जाना था पर मेरा बेटा और बहू चले गए,’’ वृद्ध रो पड़ा.

‘‘चिंता मत करो, मेरे घर भेज दिया करो, मैं पढ़ा दिया करूंगी. इस की स्कूल की जरूरत मैं पूरी करूंगी,’’ दादी आंसुओं को छिपाती बोली.

वृद्ध पैरों पर गिर पड़ा.

दादी दूर हट गईं. पास में कुछ दुकानें खुली थीं. दूध, बिस्कुट, मक्खन ला कर दादी ने राजा को दिए. कुछ रुपए उन्होंने वृद्ध को दिए और कहा, ‘‘राजा फूल नहीं चुराएगा, आप फूल खरीद कर बेचो.’’ राजा के सिर पर हाथ रख कर मानसी के साथ वे वापस गार्डन आ गईं.

गार्डन में सभी आंटियां दादी का इंतजार कर रही थीं. दादी ने उन को गेम्स खिलाए- रस्सी कूदना, सितोलिया वगैरह.

उन के चेहरे चमक उठे. लगभग घंटेभर बाद वे सब दादी को घेर कर बैठी थीं.

‘‘आप मीनल की सासुमां ही नहीं, हमारी भी मां हो. आप ने एक नई दिशा दी हैं. अब हम हफ्ते में कम से कम से कम दोतीन बार ये गेम खेलेंगे.’’

मानसी खुशी से तालियां बजाने लगी. वह दादी के गले लग गई.

जब घर पहुंची तो मानसी बहुत खुश थी, बोली, ‘‘दादी, मैं आज नाश्ता बनाऊं आप के लिए?’’

‘‘ठीक है, बनाओ, क्या बनाओगी?’’

‘‘चीज पास्ता,’’ मानसी बोली.

‘‘ठीक है,’’ दादी बोलीं.

मानसी का बनाया पास्ता दादी को पसंद आया. उन्होंने खूब तारीफ की.

संडे आते ही मानसी और मेड रजनी ने याद दिलाया कि 12 बजे किटी पार्टी में पहुंचना है.

दादी किटी पार्टी के लिए साड़ी ढूंढ़ने लगीं, कौन सी साड़ी पहनें.

बेबी पिंक कलर की साड़ी उन्होंने पहनने के लिए निकाली. बालों की लंबी चोटी बनाई.

जब पार्टी में पहुंचीं तो महिलाएं इकट्ठी थीं. स्टार्टर का दौर शुरू होने वाला था. खाने की खुशबू हवा में तैर रही थी. दादी को देख कर कुछ महिलाएं तो उन के नजदीक आ गईं. कुछ सुबह गार्डन में मिली थीं, कुछ अपरिचित थीं. कुछ चर्चा चल रही थी किसी मिसेज रायकुंवर के बारे में. पता चला कि वे नहीं आईं, उन की बहू नर्सिंग होम में एडमिट है, डिलीवरी होने वाली है.

दादी ने पूछा, ‘‘डिलीवरी हो गई या होने वाली है?’’

‘‘पता नहीं दोतीन दिन पहले एडमिट कराया गया था,’’ एक महिला बोली.

‘‘मोबाइल पर पूछ लेते हैं,’’ दादी बोलीं.

‘‘पहले लंच कर लेते हैं,’’ एक मौडर्न महिला बोली.

जींसटौप में वह महिला खूबसूरत लग रही थी.

‘‘पहले पूछ लेते हैं,’’ दादी बोलीं, ‘‘क्या आप भी?’’

‘‘चलिए, ठीक है,’’ उस महिला ने खुद फोन न कर के दादी को नंबर दिया.

दादी जब तक फोन करतीं, उस के पहले दूसरी महिला ने फोन कर दिया था दादी की बात सुन कर. ‘‘हैलो रायकुंवरजी, बहू कैसी है? तबीयत ठीक है? अच्छाअच्छा, बधाई हो,’’ कहते हुए उस ने फोन काट दिया था.

‘‘क्या हुआ?’’ दूसरी महिलाएं और दादी ने एकसाथ सवाल किया.

‘‘बेटी हुई है, बहू भी अच्छी है.’’

‘‘तो अच्छी बात है, बधाई देने चलते हैं,’’ दादी बोलीं.

‘‘अरे, आंटीजी आप भी, वह घर आएगी तो देख लेंगे. बहू को भी बच्ची को भी,’’ एक महिला बोली.

‘‘हां, बिलकुल सही बात है,’’ मौडर्न महिला बोली.

‘‘आप सम झिए बात को, नर्सिंग होम जाएंगे तो बच्चे के हाथ में भी कुछ रखना होगा, फिर कुछ फंक्शन रखेगी या नामकरण करेगी, फिर गिफ्ट दो. इसलिए अभी नहीं जाएंगे.’’

दादी ने मानसी को फोन लगाया और कहा, ‘‘रजनी को ले कर किटी पार्टी वाले हौल में आ जाओ.’’

‘‘अरे, दादी क्या हुआ, हम क्या करेंगे आ कर?’’

‘‘तुम आओ तो.’’

मानसी रजनी को ले कर हौल में पहुंच गई.

‘‘गेट वन नर्सिंगहोम चलना है,’’ दादी ने कहा.

‘‘ठीक है, चलिए, नजदीक है,’’ रजनी ने कहा. मानसी और रजनी के साथ दादी नर्सिंगहोम पहुंच गईं. मिसेज रायकुंवर मानसी को जानती थी. मानसी ने दादी का परिचय भी करवाया.

दादी फूलों का बुके, फल आदि ले कर गई थीं. रायकुंवर खुश हो गई. उस की बहू भी मुसकरा दी. नवजात नन्ही बच्ची को देख कर मानसी खुश हो गई. उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरने लगी. बहुत देर तक दादी मिसेज रायकुंवर से बात करती रहीं. रजनी भी आश्चर्य में थी. वह सोच रही थी, लोगों के घर मेहमान आते हैं, उन्हें पड़ोसियों से बात करने की फुरसत नहीं होती, कहां मानसी की दादी इतना घुलमिल गई हैं, परायापन नहीं लगता.

जब दादी मानसी के साथ बाहर निकल रही थीं तो किटी पार्टी वाली महिलाएं नर्सिंगहोम आ रही थीं. उन को देख कर एक क्षण दादी रुकीं, फिर बोलीं, ‘‘बेटियो, मौडर्न कपड़े पहनना जरूरी नहीं है, मौडर्न सोच रखना जरूरी है.’’ उन का भोपाल आना सार्थक हो गया था. Hindi Story

 

Diwali 2025 : युवाओं की पार्टी में शामिल हों बुजुर्ग भी

Diwali 2025 : ‘विवेक, दीवाली एकदम करीब आ गई है, तुम ने पार्टी का लेआउट एकदम तैयार नहीं किया है. कैसे होगा काम मेरी समझ में नहीं आ रहा.’ नेहा और उस का दोस्त विवेक इस दीवाली एक पार्टी प्लान कर रहे थे जिस में उस के 10-12 दोस्त आने वाले थे.

‘नेहा, सब प्लान कर लिया है. बस, एक परेशानी सूरज ने फंसा दी तो अब रमेश, संदीप और आनंद भी उसी समस्या की बात कर रहे हैं,’ विवेक ने कहा.

‘क्या समस्या आ रही है? हमें बताओ, हम हल निकालते हैं,’ नेहा बोली.

‘जो समस्या है उस को समस्या कहना ठीक नहीं है. बात हमारे पेरैंट्स की है. उन को घर छोड़ो तो बहुत दिक्कत होती है. साथ पार्टी में ले जाओ तो सहज अनुभव नहीं होता है. रमेश, संदीप और आनंद इस को ले कर परेशान हैं. बताओ, क्या करें?’ विवेक ने उस को पूरी बात सम?ाई.

‘यह कोई परेशानी नहीं है. यह काम मैं संभाल लूंगी. तुम लोग पार्टी की तैयारी करो,’ नेहा बोली.

‘अरे यार, पहले बताओ क्या करना है?’

‘सिंपल है. इस दीवाली पार्टी में हमारे बुजुर्ग भी पार्टी में हिस्सा लेंगे. हम लोग उन के लिए अलग से व्यवस्था कर देंगे. अगर वे पूरी पार्टी में नहीं भी रहना चाहते तो उन का मन करेगा तो उन को जल्दी घर भेज देंगे.’ नेहा की इस बात को विवेक ने दूसरे दोस्तों को बताया. पूरे ग्रुप ने कहा, ‘आइडिया’ अच्छा है.

अब जिम्मेदारी उन लोगों पर थी जिन के घर में बुजुर्ग थे. कुल मिला कर कर 5 लोग हो रहे थे. इन में 3 महिलाएं और 2 पुरुष थे. वे लोग भी खुशीखुशी पार्टी में आने के लिए तैयार हो गए. अब पार्टी में शामिल होने वालों की कुल संख्या

17 हो गई. होटल बुक हो गया. पार्टी में बुजुर्गों के लिए खाने का मेन्यू उन के अनुसार था. नेहा, विवेक और उस के साथी देर तक पार्टी करने वाले थे. उन लोगों ने बुजुर्गों के मनमुताबिक उन को पहले घर भेज दिया. इस तरह से पार्टी हिट रही.

बुजुर्गों का रखें खयाल

युवाओं द्वारा दीवाली की पार्टी का जब आयोजन किया जाए तो उस में घर के बड़ेबुजुर्गों को भी शामिल किया जाए. वैसे, दोनों के बीच उम्र का अंतर होता है. ऐसे में सामंजस्य बैठाना आसान नहीं होता. भारत में बुजुर्गों की संख्या बढ़ती जा रही है. राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के अनुसार बुजुर्गों की हिस्सेदारी 2011 में लगभग 9 फीसदी थी जो वर्ष 2036 तक 18 फीसदी तक पहुंच सकती है. 1940 के दशक में भारत में औसत आयु लगभग 32 साल थी जो अब बढ़ कर 70 साल हो गई है.

इस दौरान प्रजनन दर प्रति महिला लगभग 6 बच्चों से घट कर केवल 2 रह गई है. इस से महिलाओं को बारबार प्रसव से गुजरने और बच्चे की देखभाल करने की परेशानियों से काफी हद तक राहत मिल गई है. परिवार का स्वरूप बदल गया है. पहले गांव से लोग शहर केवल कमाई करने आते थे. वे अपना परिवार गांव में रखते थे. जब रिटायर होते तब वे वापस गांव परिवार के पास चले जाते थे. औसत आयु कम होने से बुजुर्गों को अकेलापन कम सहन करना पड़ता था.

अब मुद्दा बदल गया है. लोग शहर में रहने भी लगे हैं. परिवार में 3 पीढि़यां एकसाथ रह रही हैं. पिता, बेटा और पोता एकसाथ रह रहे हैं. इसी वजह से अब ज्यादातर लोग 3 कमरों वाला मकान या फ्लैट खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं. ऐसे में कई बार बुजुर्गों में शक्तिहीनता, अकेलापन, बेकारी और अलगाव की भावना बढ़ने लगती है. बच्चे भी अपना जीवन सही से जी नहीं पाते हैं. इस समस्या का समाधान यह है कि युवा बुजुर्गों को भी अपनी पार्टी का हिस्सा बनाएं.

‘हेल्पएज इंडिया’ द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण से उजागर हुआ कि कम से कम 47 फीसदी बुजुर्ग अपनी आय के लिए अपने परिवारों पर निर्भर हैं. 34 फीसदी पैंशन व सरकारी सुविधाओं पर निर्भर हैं. 40 फीसदी लोगों ने कहा, ‘जब तक संभव हो तब तक कार्य करते रहना चाहिए.’ हमारे समाज की सब से बड़ी समस्या यह है कि हमें बुजुर्गों को मैनेज करना नहीं आता. देश में बुजुर्गों के अस्पताल न के बराबर हैं. हमारे ओल्डएज होम भी अच्छे नहीं हैं. अकेले रहने से बुजुर्गों में कई बीमारियां पैदा होने लगती हैं.

एक सर्वे में पता चला कि 30 से 50 फीसदी बुजुर्गों में ऐसे लक्षण मौजूद थे जो उन्हें अवसाद का शिकार बनाते हैं. अकेले रहने को विवश बुजुर्गों में महिलाओं की संख्या अधिक है. अवसाद का गरीबी, खराब स्वास्थ्य और अकेलेपन से गहरा संबंध देखा गया. सामाजिक कल्याण की ज्यादातर योजनाएं आर्थिक आधार पर बनती हैं. गरीबी रेखा से नीचे के परिवार इस में शामिल होते हैं. वृद्धावस्था पैंशन सभी को नहीं मिल पाती है.

पार्टियों का बनाएं हिस्सा

ऐसे में यह जरूरी है कि अपने बुजुर्गों का खयाल रखें. उन का अकेलापन दूर करने के लिए ज्यादा से ज्यादा समय साथ बिताएं. उन को इस बात का एहसास न होने दें कि उन की उपेक्षा हो रही है. उन को अपने दोस्तों और परिवार के लोगों से हमेशा नहीं मिलवा सकते हैं क्योंकि कई बार बुजुर्ग इस के लिए शारीरिक व मानसिक रूप से तैयार नहीं होते. समयसमय पर युवा अपनी पार्टियों में उन को साथ ले जाएं जैसे शादियों में ले जाते हैं. पार्टी में वे अपने हमउम्र लोगों से मिल सके तो उन को अच्छा लगेगा. वे अपने को बेहतर अनुभव करेंगे.

पार्टी में मेन्यू उन की पसंद के अनुसार का हो. उन की पसंद और सु?ाव के अनुसार कुछ गेम्स या फिर डांसम्यूजिक का प्रबंध करें. पार्टी में उन के हमउम्र लोगों को बुलाएं. जितना समय वे पार्टी में रहना पसंद करें उन को वहां रहने दें. अगर वे घर जल्दी वापस आना चाहें तो उन को भेज दें. आजकल ओला व उबर जैसी सुविधाएं हैं. जब पार्टी में बुजुर्ग शामिल होंगे तब युवाओं के मन में यह बो?ा नहीं रह जाएगा कि वे पार्टी कर रहे हैं और उन के बुजुर्ग घर में कैद हैं.

डांस, म्यूजिक, खाना और अपने मनपसंद लोगों का साथ अपनेआप में अलग अनुभव देता है. बुजुर्गों के करीब आने से परिवारों में घनिष्ठता आएगी और युवाओं में बुजुर्गों के प्रति जिम्मेदारी की भावना का विकास हो सकेगा. इस दीवाली बुजुर्गों के साथ पार्टी मनाएं.

घरों में ही नहीं दिलों में भी खुशी के दीये जलाएं. यह कर के देखिए, Diwali 2025

अच्छा लगेगा.      –

Diwali Celebration: दीवाली को कुछ ऐसे करें सैलिब्रेट

Diwali Celebration: भारत को त्योहारों का देश माना जाता है. हर महीने या यों कहें कि हर हफ्ते छोटाबड़ा कोई न कोई त्योहार आ ही जाता है. भारत एक सैकुलर देश है जहां कई धर्म और संप्रदाय के लोग एकसाथ रहते हैं. दुर्गा पूजा, मुहर्रम, रामनवमी और गणेश चतुर्थी जैसे धार्मिक त्योहारों की बात छोड़ दी जाए तो कई त्योहार ऐसे भी हैं जो भारत की पंथनिरपेक्षता की छवि को मजबूत तो करते ही हैं, साथ ही, भारत की विविधता में एकता के सिद्धांत को खूबसूरती से व्यक्त भी करते हैं.  दीवाली भी एक ऐसा ही त्योहार है जो अब धर्म, जाति और संप्रदाय की संकीर्ण दीवारों में कैद नहीं ह गया है बल्कि यह त्योहार विश्व पटल पर भारत की सांस्कृतिक विरासत की सुंदर व्याख्या करता हुआ नजर आ रहा है. कई मुल्कों में इस की रोशनी फैल चुकी है.

अमेरिका का वाइट हाउस हो या ब्रिटेन की संसद, आज विश्वभर में दीवाली को सैलिब्रेट किया जा रहा है. भारत का रहने वाला हिंदू हो ईसाई हो सिख हो या मुसलमान, यह त्योहार पूरे भारतीयों के गौरव का महान पर्व बन चुका है, इसलिए इस त्योहार को जाति, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठ कर सैलिब्रेट करना चाहिए और प्रकाश के इस पर्व में मन के अंधकार को मिटा कर सभी को गले लगाना चाहिए.

दीवाली को बनाएं यादगार 

महिलाएं अपने मायके वालों को घर बुलाएं. पुरानी सहेलियों को इन्वाइट करें. फैमिली गैदरिंग करें. छोटीमोटी पार्टी का आयोजन करें. पड़ोसियों के घर जाएं, उन्हें घर पर बुलाएं. इन छोटीछोटी बातों से उत्सव यादगार बन जाएगा.

दीवाली पर उन दोस्तों को न भूलें जो आप के बहुत करीब हैं और उन दोस्तों को भी जरूर याद करें जो आप से दूर हैं. दूर के दोस्तों को सिर्फ मोबाइल पर हैप्पी दीवाली की ग्रीटिंग भेज कर अपना फर्ज पूरा न करें बल्कि उन्हें कौल करें और घर बुलाएं. दोस्तों के साथ छोटी पार्टी या गेट-टु-गैदर आयोजित करें. घर को खुद से सजाएं,  झालर लगाएं और इस काम में पड़ोसियों की भी मदद करें. दीवाली की पारंपरिक मिठाइयां जैसे लड्डू, बर्फी और गु िझया घर पर बनाएं तो ज्यादा बेहतर है लेकिन कई बार घर में पकवान बनाने के चक्कर में घर की औरतों का काम बढ़ जाता है जिस से वे त्योहारों को सैलिब्रेट करने में पीछे रह जाती हैं. घर की औरतों को भी दीवाली को सैलिब्रेट करने का पूरा मौका दें. इस के लिए उन के घरेलू कामों में उन की मदद करने में पीछे न हटें.

औरतें सिर्फ रसोई के लिए नहीं

औरतें सिर्फ रसोई के लिए नहीं होतीं. त्योहारों को सैलिब्रेट करने में उन्हें भी बराबरी का अधिकार मिलना चाहिए. दीवाली के वक्त तो औरतों का काम इतना बढ़ जाता है कि उन्हें सांस लेने की भी फुरसत नहीं मिल पाती. घर की साफसफाई और मेहमानों के लिए चायनाश्ता बनातेबनाते दीवाली बीत जाती है. दीवाली के लिए तैयार होने का वक्त जब मिलता है तब तक उत्सव फीका पड़ चुका होता है.

किचन के काम को हलका करने के लिए जरूरी चीजें पहले ही घर में ला कर रख देनी चाहिए ताकि किसी सामान की कमी के कारण औरतों का वक्त बरबाद न हो. दीवाली के दिन घर में काम करने वाली कामवाली को गिफ्ट दे कर छुट्टी कर दें ताकि वह भी दीवाली को सैलिब्रेट कर सके. किचन के वे काम जो मर्द कर सकते हैं उन्हें करने में शर्म या हिचक बिलकुल न करें. दीवाली के दिन  झाड़ूपोंछा, बरतनों की सफाई, घर की सफाई आदि काम मर्दों को करने चाहिए, इस से घर की औरतों का बहुत समय बच जाएगा.

दीवाली पर रखें पर्यावरण का खयाल

दीवाली खुशियों का त्योहार है लेकिन पर्यावरण को प्रदूषित करने से खुशियों का यह त्योहार एक डिजास्टर बन जाता है. वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण के अलावा इतना कचरा सड़कों पर इकट्ठा हो जाता है कि उसे हटाने में म्युनिसिपल वालों को कई दिन लग जाते हैं. दीवाली के बाद शहरों की हालत खराब हो जाती है. प्रदूषण स्तर बढ़ जाता है. सांस लेने में परेशानियां होने लगती हैं. कचरे के कारण नालियां जाम हो जाती हैं. कचरे का पहाड़ लग जाता है. यह सब हमारी लापरवाही के कारण होता है.

दीवाली खुशियों का त्योहार है लेकिन इन खुशियों के लिए पटाखे जरूरी नहीं, इसलिए पटाखों का उपयोग कम से कम करें. पौलीथिन बैग्स और डिस्पोजल वस्तुओं का प्रयोग भी कम करें. बिलकुल इकोफ्रैंडली दीवाली मनाएं. मिट्टी के दीये और प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें. सामुदायिक दीवाली उत्सव में भाग लें. उत्सव के खास पलों को कैमरे में कैद करें. परिवार और दोस्तों के साथ मिल कर पुरानी दीवाली की यादें ताजा करें. इन छोटेछोटे प्रयासों से दीवाली को खुशहाल, सुरक्षित और यादगार बनाया जा सकता है.

दीवाली में सब से जरूरी काम

उत्सव सब के लिए होते हैं. इस दिन कोई छोटा या बड़ा नहीं होता. अगर आप गांवकसबों में रहते हैं तो इस बात का खयाल रखें कि कोई घर उजाले से वंचित न रह जाए. कई ऐसे घर भी होते हैं जो आर्थिक तंगी से लाचार होते हैं. यदि आप सक्षम हैं तो ऐसे परिवार भी उत्सव मना सकें, इस बात की जिम्मेदारी तय करें. गांव के बुजुर्गों से मिलें. बच्चों से बात करें.

दीवाली के दिन लोग मंदिरों और घरों की साफसफाई तो बड़े चाव से करते हैं लेकिन वे सरकारी स्कूलों को भूल जाते हैं. जबकि, गांव के सरकारी स्कूल मंदिरमसजिद से ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं. इन्हीं स्कूलों से निकल कर बच्चे देश की व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं. सो, युवाओं की टीम बनाएं और सरकारी स्कूलों की साफसफाई में जुट जाएं. स्कूलों में भी  झालर और दीये लगाएं.

मर्दऔरत मिल कर सैलिब्रेट करें

त्योहारों के दिन मर्दों के पास खूब वक्त होता है लेकिन वे बिजी होने का बहाना करते हैं. मर्दों की इस बहानेबाजी को औरतें सम झें और उन्हें खाली न रहने दें. जरूरत पड़े तो उन्हें आलू छीलने, प्याज काटने या मसाला पीसने जैसे कामों में लगाएं. पति मोबाइल पर रील देखें और औरतें किचन में काम करें, यह ठीक नहीं है.

घर में मर्द और औरतें साथ बैठ कर खाना खाएं. फैमिली गैदरिंग में औरतों को शामिल करें और उन्हें बोलने का मौका दें. किसी टौपिक पर डिबेट रखें और सब को अपनी राय रखने का मौका दें. Diwali Celebration

Diwali Tips: दीवाली पर घर न जाएं तो करें ये उपाय

Diwali Tips: फैस्टिवल का पूरा आनंद अपने घरपरिवार और नातेरिश्तेदारों के बीच होने पर मिलता है. ऐसे में घरों से दूर काम कर रहे युवाओं का पहला प्रयास यह होता है कि वे अपने घरपरिवार के बीच पहुंच जाएं. इस कारण से बड़ी संख्या में लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं. खासतौर पर बड़े शहरों से छोटे शहरों की तरफ जाने वालों की संख्या अधिक होती है.

पटना के रहने वाले औचित्य प्रताप सिंह गुड़गांव की रियल एस्टेट कंपनी में काम करते हैं. वे कहते हैं, ‘हम हर होली और दीवाली ट्रेन में 2 महीने पहले टिकट बुक कराने की कोशिश करते हैं. कई बार टिकट वेटिंग का मिलता है. अकसर यात्रा वाले दिन तक कन्फर्म नहीं होता. पिछली दीवाली रेल का टिकट नहीं कन्फर्म हुआ, हवाई जहाज में टिकट बहुत महंगा हो गया था. तब मैं घर नहीं पहुंच पाया था.’

औचित्य जैसे हालात का सामना कई युवाओं को करना पड़ता है. केवल लड़कों ही नहीं, लड़कियों के सामने भी यह परेशानी आती है. नेहा कुमार मुंबई में काम करती हैं. वे कहती हैं, ‘मैं दीवाली से 2 दिन पहले ही छुट्टी ले लेती हूं. 2 दिन पहले टिकट मिल जाता है. इस के लिए मैं पूरे साल अपनी छुट्टियां मैनेज करती हूं. जब नहीं जा पाती तो अफसोस नहीं करती, फिर मुंबई में ही दीवाली मनाती हूं.

नौकरी, मजदूरी, छोटे कारोबार करने के लिए लाखों प्रवासी लोग देश के कोनेकोने में फैले हैं. पूरे साल ये मेहनत, मजदूरी कर हर साल दीवाली पर घर जाते हैं. परेशानी की बात यह है कि इन को घर जाने के साधन नहीं मिलते. दीवाली पर घर जाने के लिए ट्रेन में टिकट उपलब्ध नहीं होते हैं. रेलवे की ओर से स्पैशल ट्रेन जो चलाई जाती है लेकिन वह काफी नहीं होती. ट्रेन में टिकट उपलब्ध न होने का फायदा प्राइवेट बस और हवाई जहाज कंपनियां जम कर उठाती हैं. बस से ले कर प्लेन टिकट में 4 से 6 गुना की बढ़ोतरी हो जाती है, जो तमाम लोगों के बजट से बाहर साबित होती है.

आमतौर पर दिल्ली से पटना का किराया आम दिनों में 3,000 रुपए से ले कर 4,500 रुपए के बीच रहता है. आसानी से इस रेट में टिकट मिल जाता है लेकिन अगर आप दीवाली के समय का टिकट बुक कर रहें हैं तो टिकट का रेट देख कर आप के होश उड़ जाएंगे. 21 अक्तूबर से ले कर 5 नवंबर तक किसी भी दिन का किराया 12,000 रुपए से कम नहीं है. कई प्लेन में यह किराया 45 हजार रुपए तक है. दिल्ली ही नहीं, मुंबई से पटना, दरभंगा, बेंगलुरु से दरभंगा या किसी और शहर के लिए फ्लाइट लेते हैं तो महंगा टिकट लेना पड़ता है.

बस और ट्रेन में टिकट मिलता ही नहीं है. ऐसे में कई बार रिजर्वेशन वाले डब्बों में जनरल डब्बों वाली भीड़ दिखती है. भूसे की तरह भर कर लोग यात्रा करने को मजबूर हो जाते हैं. बस और प्राइवेट टैक्सी वाले पीछे नहीं रहते हैं, वे भी दिल्ली से बिहार के कई शहरों के लिए मनमाना किराया वसूलते हैं. आम दिनों में दिल्ली से बिहार का किराया 1,600 रुपए से 2,000 रुपए के बीच होता है. दीवाली को देखते हुए यह बढ़ कर 3,500 रुपए से ले कर 5,000 रुपए तक हो जाता है.

मजबूर यात्री किसी भी सूरत में घर जाना चाहता है. ऐसे में उसे सम झ नहीं आता क्या करे. सीमित संख्या में ट्रेनों की उपलब्धता के कारण हवाई जहाज और प्राइवेट लग्जरी बसों की मनमानी बढ़ जाती है. यात्रियों से मनमाना किराया वसूला जाता है. किराए में असमान रूप से बढ़ोतरी से यात्री परेशान होते हैं. उन्हें सम झ में नहीं आता कि वह घर जाएं तो कैसे. अगर इतना महंगा टिकट खरीद कर जाते हैं तो उन का पूरा बजट ही बिगड़ जाता है. बात केवल भारत की ही नहीं है, दूसरे देशों में जहां अनुमान से अधिक लोग सड़कों पर आ जाते हैं वहां अव्यवस्था हो जाती है.

चीन में लग गया सड़क

पर जाम

गेटी इमेजेज चीन के हेनान प्रांत के कैफेंग में 9 नवंबर, 2024 की रात  झेंग् झौ से कालेज के छात्र 50 किलोमीटर दूर कैफेंग तक साइकिल चलाते हैं. साइकिल चालकों की तादाद बढ़ जाने के चलते मध्य चीन के 2 शहरों के बीच यातायात जाम हो गया. हजारों लोग पास के  झेंग झो से रात में किराए की साइकिल चलाने लगे. दोनों शहरों के बीच 6 लेन वाला एक्सप्रैसवे साइकिल सवारों से भर गया. इस की शुरुआत विश्वविद्यालय के 4 छात्रों से हुई, जिन्होंने जून में गुआनतांगबाओ (एक प्रकार का सूप) खाने के लिए  झेंग झोउ से कैफेंग तक 50 किलोमीटर साइकिल से यात्रा की थी.

इन लोगों ने मीडिया को बताया था, ‘युवावस्था में आप को दूसरा मौका नहीं मिलता, इसलिए आप को दोस्तों के साथ अचानक यात्रा पर निकल जाना चाहिए.’ यह संदेश 12.6 मिलियन की आबादी वाले शहर के युवाओं के दिलों में घर कर गया. इस प्रकार ‘नाइट राइड टू कैफेंग’ का जन्म हुआ. जिबो शहर में लाखों लोग ‘बारबेक्यू’ का स्वाद चखने आए. युवाओं के उत्साह को देखते हुए लग रहा था कि जैसे हर कोई उत्साह से भरपूर था और अपने आसपास के लोगों से बातचीत कर रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने कालेज के दिनों में वापस आ गया हो.’

युवाओं का उत्साह तब फीका पड़ गया जब उन्होंने देखा कि जब  झेंग् झौ की सड़कें हजारों बाइकों से भर गईं. उस रास्ते पर जहां आमतौर पर एक घंटा लगता था, उसे 3 घंटे लग गए. कुछ लोगों को अपनी बाइक से उतर कर भीड़ के बीच से निकलने के लिए मजबूर होना पड़ा. सड़क पर साइकिलों की संख्या का कोई अनुमान नहीं था. यह संख्या एक लाख से दो लाख के बीच थी. जो लोग कैफेंग पहुंचे, उन में से कई लोगों को यह अनुभव अच्छा नहीं लगा.

शंघाई में पुलिस ने हैलोवीन के जश्न पर रोक लगा दी थी क्योंकि उसे डर था कि इन मौजमस्ती का इस्तेमाल करने वाले हालात को खराब कर सकते हैं. आजकल लोग काम के दबाव में बहुत तनाव में रहते हैं. वे त्योहारों पर अपने घर जाने की जल्दी में रहते हैं ताकि वे घरपरिवार और दोस्तों के साथ रह कर तनाव को कम कर सकें. इस वजह से पूरी दुनिया में कभीकभी ऐसे अवसर आ जाते हैं जब लोगों को आनेजाने के साधन नहीं मिलते. ऐसे में सरकार को तो व्यवस्था करनी ही चाहिए लेकिन आनेजाने वालों को भी संयम से काम लेना चाहिए.

घर जाने के उत्साह में न भूलें कामकाज

घर जाने का उत्साह अपनी जगह ठीक है. देखा यह जाता है कि घर जाने की जल्दी में लोग कामकाज बंद कर देते हैं. दीवाली के 2 दिन पहले से ही औफिस सूने हो जाते हैं. इस तरह के उत्साह से कामकाज प्रभावित होता है. देखा जाए तो तमाम लोग इस के बाद भी अपने काम करते रहते हैं, जैसे ट्रेन, हवाई जहाज, बस, बिजली, पानी, अस्पताल और मोबाइल कंपनियों के लोग अपनी ड्यूटी पर रहते हैं. पुलिस और सेना के जवान भी अपनी ड्यूटी पर तैनात रहते हैं. जिस तरह से दूसरे लोगों को घर जाने की जल्दी रहती है उसी तरह से इन लोगों को भी जल्दी रहती है. इस के बाद भी ये अपनी खुशियों की जगह पर दूसरों की खुशियों को तरजीह देते हैं.

इन के काम को सलाम करना चाहिए. इन को देख कर सोचना चाहिए कि ये लोग भी अपने घर जाना चाहते होंगे पर दूसरों की असुविधा को ध्यान में रख कर ड्यूटी निभाते हैं. कई महिलाएं अपने बच्चों को अकेला छोड़ कर ड्यूटी निभाती हैं. सेना और पुलिस के जवान भी इसी तरह से ड्यूटी निभाते हैं. इन के भी घरपरिवार होते हैं. ये भी त्योहार के समय अपनों के बीच रहना चाहते हैं. इन के भी पत्नी, बच्चे और मांबाप इन का इंतजार करते हैं. इस के बाद भी ये लोग अपनी खुशियों की जगह अपनी ड्यूटी को प्राथमिकता देते हैं.

आम लोगों को भी अपने मन में यही सोच बनानी चाहिए जिस से अगर टिकट नहीं है, टिकट बजट से बाहर है तो ज्यादा परेशान न हों. बहुत सारे ऐसे लोग होते हैं जो अपने घरपरिवार के बीच नहीं पहुंच पाते. इन को देख कर प्रेरणा लेनी चाहिए और सोचना चाहिए कि अगली बार दीवाली घर पर मनाएंगे. यह भी हो सकता है कि दीवाली के कुछ दिनों बाद जब बाकी लोग काम पर आ जाएं तब चले जाएंगे. एकसाथ पूरा देश दीवाली मनाए लेकिन अगर पूरा देश एकसाथ छुट्टी पर चला जाएगा और देश ठप हो जाएगा. तो, दीवाली की खुशियां कोई नहीं मना पाएगा. ऐसे में जरूरी है कि अपनी ड्यूटी की प्राथमिकता को देखते हुए काम करें जिस से दीवाली हंसीखुशी के साथ गुजरे. Diwali Tips

 

 

 

Wastewater Management: हर घर पानी तो पंहुच जाएगा, कैसे होगी पानी की निकासी ?

Wastewater Management: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 40 किलोमीटर दूर रामदासपुर गांव में जल जीवन मिशन के तहत बनने वाली पानी की टंकी नंदौली गांव में पिछले 5 साल से बन ही रही है. बिना पानी की टंकी बने ही बोरिंग से पानी पाइप के द्वारा घरो तक पहुंचा दिया गया है. नलों में लगी टोटियां अच्छी क्वालिटी की नहीं है. जिस से पानी बहता रहता है. कई जगह पर पानी का पाइप टूटाफूटा है जहां से पानी लीक करता रहता है.

गांव में कई परिवारों की शिकायत है कि उन के घरों तक पानी नहीं पंहुचा है. जिन घरों में नल लगे हैं वहां टोटी की क्वालिटी अच्छी न होने के कारण या नल में टोटी न लगे होने के कारण पानी बहता रहता है. जो पानी की बरबादी के अलावा रास्ते में कीचड़ और जल भराव की परेशानियों को बढ़ावा दे रहा है. जल जीवन मिशन के तहत पानी तो घरों तक पहुंच रहा है पर पानी के निकास का बेहतर साधन नहीं होने से परेशानियां बढ़ रही हैं.

ज्यादातर दलित परिवारों के रहने वाली जगह पर दिक्कतें हैं. यह मसला किसी एक गांव का नहीं है. हर गांव में नल के जरीए घरों तक पहुंचने वाला पानी परेशानी का कारण बन रहा है. यह सरकार की योजना में खामी की तरह से है. यह खामी पहले शौचालय बनाते समय भी सामने आई थी. शौचालय तो बना दिए गए पर सीवर सिस्टम नहीं दिया गया. जब शौचालय वाले गढ्ढे भर जाएंगे तो इन की सफाई बड़ी समस्या होगी. इन को साफ करने के लिए दलित जाति के लोगों को गढ्ढे में जान जोखिम में डाल कर उतरना होगा.

हमारे देश में सीवर साफ करने के लिए अभी भी टैक्नोलौजी और स्किल का प्रयोग नहीं किया जाता. जिस वजह से गड्ढों में जहरीली गैस का शिकार वह आदमी हो जाता है जो गढ्ढे की सफाई करने उस के भीतर घुसता है. पूरे देश में इस तरह की तमाम घटनाएं घट चुकी हैं. मैनुअल स्कैवेजिंग यानी हाथ के द्वारा मानव मल, सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई को 1993 से गैरकानूनी माना जाता है. 2013 से इस पर सख्ती से अमल किया जा रहा है. इस के बाद भी यह काम हो रहा है.

राष्ट्रीय सफाई आयोग के अनुसार 2017 से 2022 के दौरान 1268 लोगों की जान इस में जा चुकी है. 116 मौतें सीवर सफाई की वजह से हुई. इंटरनैशनल लेबर और्गेनाइजेशन के अनुसार सीवर सफाई के काम में अभी भी 1.2 मिलियन लोग शामिल हैं. अब नल का पानी इस को और भी खतरनाक बनाएगा. नल का पानी जमा होगा तो कई मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां पैदा होंगी. जिन में मलेरिया, डेंगू और फाइलेरिया सब से प्रमुख है.

क्या है हर घर नल योजना ?

अगस्त 2019 में भारत सरकार ने राज्यों के साथ साझेदारी कर के जल जीवन मिशन योजना तैयार की. इस योजना के तहत 2024 तक प्रत्येक ग्रामीण परिवार को नल से जल आपूर्ति करने का लक्ष्य रखा गया था. 2025 तक अभी यह योजना पूरी तरह से तैयार नहीं हुई है. जल राज्य का विषय है. इसलिए घरों तक नल से जल पहुंचाने हेतु पाइप जलापूर्ति योजनाओं की योजना बनाने और उन्हें लागू करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की है. भारत सरकार तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान कर के राज्यों के प्रयासों में सहयोग करती है.

इस के तहत देश के 19.42 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से 12.65 करोड़ परिवारों को नल जल आपूर्ति का प्रावधान किया गया है. प्रति व्यक्ति प्रति दिन 55 लीटर पानी खर्च का औसत रख कर इस योजना को तैयार किया गया है. इस के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर पानी की टंकी बनाई गई है. इस को चलाने के लिए सोलर सिस्टम रखा गया है. यहां गांव के ही कर्मचारी को डयूटी दी गई है. जिस को 7 हजार रुपया प्रतिमाह का मानदेय दिया जाता है. पानी की टंकी से हर घर तक पाइप लाइन बिछाई गई है. हर घर में एक नल दिया जा रहा है. इस में नल बंद करने वाली एक टोटी लगी होती है.

पानी की टंकी की गुणवत्ता का हाल यह है कि उत्तर प्रदेश में जून 2025 में कानपुर, लखीमपुर, सीतापुर और कासगंज में करोड़ों की लागत से बनीं कई टंकियां ढह गईं. जिस से निर्माण की गुणवत्ता और भ्रष्टाचार पर सवाल उठ रहे हैं. कासगंज जून 2025 मे 14 करोड़ की एक पानी की टंकी ढह गई. अधिकारियों ने इस के गिरने का कारण सामग्री की निम्न गुणवत्ता बताया. सीतापुर में मई 2025 में जल जीवन मिशन के तहत बनी 5.31 करोड़ की एक टंकी कुछ ही महीनों के बाद गिर गई. लखीमपुर में अप्रैल 2025 में, 3 करोड़ की एक पानी की टंकी परीक्षण के दौरान ढह गई.

इन घटनाओं ने ‘जल जीवन मिशन’ जैसी सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में भ्रष्टाचार और खराब गुणवत्ता वाली निर्माण सामग्री के उपयोग को उजागर किया है. संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार जल जीवन मिशन के तहत स्वीकृत फंड का 30 फीसदी ही 2024-25 तक खर्च हो पाया है. इसलिए इस मिशन को 2028 तक बढा दिया गया है. फरवरी 2025 तक जल जीवन मिशन के तहत 15.44 करोड़ से अधिक ग्रामीण घरों में नल का पानी कनेक्शन पंहुचा दिया गया है. पहले यह लक्ष्य 3.23 करोड़ परिवारों तक सीमित था.

गांवों में नहीं है बेहतर पानी का निकास:
हर घर नल योजना के तहत घरों तक पानी तो पंहुच गया है लेकिन अब सब से बड़ा सवाल यह कि पानी का निकास कैसे होगा ? पहले गावों में घर इस तरह से बनते थे कि बरसात का पानी निकल कर नालों के जरिए तालाब में चला जाता था. घरों में पानी इतना प्रयोग ही नहीं होता था कि वह घर के बाहर निकल कर जमा हो सके. अब नलों के जरीए ज्यादा पानी आ रहा है तो जल भराव की समस्या खड़ी होगी. सरकार को हर जल योजना बनाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि पानी का निकास कैसे होगा ?

बड़े शहरों के अनुभव को देखें तो पता चलता है कि बरसात के दिनों में जल निकासी अच्छी न होने के कारण लोगों के घरों में पानी भर गया था. जब शहरों का यह हाल है तो गांवों में पानी निकासी की व्यवस्था को समझ जाना चाहिए वह कैसी होगी ? यह समस्या दलित बस्तियों में अधिक होगी. गांव में भी अब अमीर लोगों के घर पक्के बन गए हैं. वहां बिजली, पानी की सुविधा है. जिस से पानी का प्रयोग बढ गया है. यह जल भराव का भी बडा कारण बन गया है. गांव में पंचायत विभाग की तरफ से गलियों में खंडजा लगाया गया है. साथ में नालियां बनी है. इन को कही ऐसी जगह से जोड़ा नहीं गया है जिस से पानी सही से निकल सके.

जिस तरह से हर घर नल योजना में पानी निकासी की व्यवस्था का ध्यान नहीं रखा गया उस तरह से घरों में शौचालय बनाते समय सीवर सिस्टम नहीं बनाया गया. शौचालय के नीचे गढ्ढा बनाया गया है. जो कुछ सालों में भर जाता है. सवाल उठता है कि जब यह गढ्ढा भर जाएगा तो इस की सफाई कैसे होगी ? शहरों में जो शौचालय बने हैं वह सीवर सिस्टम से जुड़े हैं. कोई भी शौचालय तभी सफल होगा जब वह सीवर सिस्टम से जुड़ सके. गांव में जो दलित बस्तियां हैं वहां तक जाने का सही रास्ता नहीं होता है. जिस की वजह से कोई सीवर साफ करने वाली मशीन वहां तक पंहुच नहीं पाती है.

चाहे हर घर नल योजना हो या गांव में घर घर शौचालय बनाने का काम, इन योजनाओं को बनाते समय इस बात पर विचार ही नहीं किया गया कि इन की सफाई कैसे होगी. गांव में सरकार ने सफाई कर्मचारी नौकरी पर रखे हैं. इन की संख्या बेहद कम है. जिस की वजह से यह बेमतलब है. ऐसे में शौचालय और नाली की सफाई करने वाले लोगों को इस काम से जोड़े रखने का प्रयास है. जिस की वजह से इस काम में लगे लोग अब भी वहीं काम करेंगे. मशीनों से काम जल्दी और सुविधापूवर्क हो जाता है पर इन की संख्या कम है. यह महंगी पड़ती है. ऐसे में आदमियों के द्वारा गढ्ढों की सफाई सस्ती पड़ती है. यह पूरी जाति व्यवस्था को बनाए रहने का प्रयास है.

विदेशों में सीवर और गढ्ढों की सफाई का काम मशीनों के द्वारा होता है. जिस से नाली गड्ढे और सीवर सभी कुछ साफ होते हैं. हमारे देश में सफाई करने वाले इन लोगों के लिये साधारण सुरक्षा के उपाए भी नहीं किए जाते हैं. जिस की वजह से सीवर सफाई में लोगों के मरने की घटनाए होती है. कई बार सरकार दिखावे के लिए मरने वालों के घर वालों को पैसे दे कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेती है. अगर सीवर, गड्ढे, नाली की सफाई मशीनों से हो तो किसी को इस काम में उतरने की जरूरत ही नहीं होगी. जाति की व्यवस्था पूरी तरह से खत्म हो जाएगी. Wastewater Management

Stories Hindi : गली नंबर 10 – उसने लड़की देखेने के बाद खुद को कितना बदला

Stories Hindi : चेहरे पर ओढ़ी खामोशी, आंखों का आकर्षण बरबस मुझे उस की ओर खींच ले गया था. उस से मिलने की चाह में एकएक पल बिताना मुश्किल हो रहा था. लेकिन यह कैसी बेबसी थी कि उस की आंखों का दर्द देख कर भी मैं सिर्फ महसूस करता रह गया, बेबस सा.

उस के व्यक्तित्व ने मुझे ऐसा प्रभावित कर रखा था कि घंटों तो क्या, अगर पूरे दिन भी इंतजार करना पड़ता तो भी मैं कुछ बुरा महसूस नहीं करता. एक अजीब रूमानी आकर्षण ने मुझे अपने पाश में ऐसा जकड़ लिया था कि मैं अपने खुद के अस्तित्व से भी उदासीन रहने लगा था. हर ‘क्यों’ का उत्तर अगर मिल जाता तो दुनिया ही रुक गई होती. पर पार्क की बैंच पर बैठ कर किसी की प्रतीक्षा करने का अनोखा आनंद तो वही जान सकता है जो ऐसे पलों से गुजरा हो.

पिछले जमाने की रहस्यमयी फिल्मों की नायिका सी यह लड़की मुझे शहर की एक सड़क पर दिखी थी. पता नहीं क्यों, पहली नजर में ही मैं उस के प्रति आकर्षित हो गया था और यह स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं कि मैं ने उस के बाद, उस रास्ते के अनगिनत चक्कर काटे थे. मन में पक्की उम्मीद थी कि एक न एक दिन तो वह फिर मिलेगी और ऐसा ही हुआ. एकदो बार फिर आमनासामना हुआ और पता नहीं कैसे, उसे भी यह एहसास हो गया कि मैं वहां उसी के लिए चक्कर काटा करता हूं. शायद इसीलिए उस ने, थोड़ी चोरी से, मेरी और देखना शुरू कर दिया था. बस, कहानी यहीं से शुरू हुई थी.

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बातचीत की हालत में पहुंचने में काफी समय लगा और जब मिलने के वादे तक पहुंचे तो वह भी हफ्ते में सिर्फ एक दिन, मंगलवार और समय दोपहर का. मुझे लगा कि शायद उसे उस दिन घर से निकलने में आसानी होती होगी. वैसे, मंगलवार को मेरी भी सिर्फ 2 ही क्लास होती थीं, इसलिए कालेज से जल्दी निकल पाना आसान था. जगह तय हुई यही पार्क…मैं तो कालेज से निकल कर, तेजतेज कदमों से सीधा पार्क जा पहुंचता और पहले से तय बैंच पर जा कर बैठ जाता. वह देर से आए या जल्दी, मेरी आंखें पार्क के गेट पर टिकी रहतीं. उस का वह गेट से घुसना, धरती पर नजर बिछाए हौलेहौले चलना और फिर निकट आ कर आधा इंच मुसकराना, मुझे बहुत मोहक लगता था.

हम एक ही बैंच पर पासपास बैठे होते पर उस की ओर से कोई ऐसी क्रिया होती नहीं लगती थी जो प्यार का संदेश दे सके. वह कम बोलती थी, मैं ही बकबक करता रहता था. मैं ने अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य की योजनाएं तक सबकुछ उस को बता डाली थीं. पर उस के बारे में मैं अब तक कुछ जान पाने में सफल नहीं हो सका था. मैं जब भी उस से उस के बारे में कोई प्रश्न करता तो वह अनजान सी आसमान की तरफ देखने लगती. उस के चेहरे पर छाया सांध्यकालीन शून्य और रहस्यमय हो जाता.

अपने इस तथाकथित ‘अचीवमैंट’ को निकट मित्रों से साझा कर डालना स्वाभाविक था. पर जब मैं ने उन्हें यह बताया कि मेरे प्यार का सफर एक बिंदु पर ही अटका हुआ है तो वे सब के सब सलाहकार बन गए.

एक ने कहा –

‘अगर वह प्यार न करती होती तो चल कर पार्क तक आती ही क्यों.’

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बात ठीक लगी.

दूसरे ने कहा –

‘अच्छे संस्कारों वाली होगी. शी वोंट कम रनिंग ऐंड ले डाउन विद यू.’

यह बात अनजाने ही मन को सुख का एहसास करा गई.

तीसरे ने कहा-

‘ऐसा करो, एक दिन पार्क में तुम देर से जाओ. अगर वह बैठ कर तुम्हारी प्रतीक्षा करती रही तो पक्का है कि वह तुम्हें प्यार करती है. और अगर उठ कर वापस चली गई, तो समझ लेना कि यह सब खेल था.’

यह बात सब को जम गई. सब की सहमति से आने वाले मंगलवार को ही यह निर्णायक प्रयोग करने का निर्णय ले लिया गया.

गिनगिन कर दिन काटे. आखिर, मंगलवार आया. क्लास में क्या पढ़ाया जा रहा था, मुझे कोई ज्ञान नहीं. देर करनी थी, सो, बैठा रहा. जैसे ही निर्णायक घड़ी आई, मैं भारीभारी पैर उठाता पार्क की ओर चल दिया. मित्रों ने मुझे ऐसे विदा किया जैसे मैं श्मशान घाट जा रहा हूं.

मुझे नहीं मालूम था कि दिल इतनी तेज भी धड़क सकता है. पार्क के गेट की ओर बढ़ते हुए मेरे हाथपैर लगभग कांप रहे थे पर, जैसे ही मेरी दृष्टि ने पार्क के भीतर प्रवेश किया, दिल बल्लियों उछल पड़ा. वह पार्क की उसी बैंच पर बैठी अपने पैर के अंगूठे से जमीन पर कुछ रेखाचित्र बना रही थी.

मेरी गति में अचानक तेजी आ गई. मैं लगभग भागता हुआ बैंच तक जा पहुंचा. वह मुसकराई और एक ओर खिसक कर मेरे बैठने के लिए ज्यादा जगह बना दी.

मन के भीतर अब तक पनपते अपनेपन की जगह अब अधिकार भाव ने ले ली थी. इसलिए बैंच पर बैठते ही मैं ने उस का हाथ अपने दोनों हाथों के बीच दबा लिया. वह सकुचाई जरूर, पर प्रतिरोध नहीं किया.

मेरे मन का विश्वास अब चरम पर था. मैं ने बिना किसी हिचकिचाहट के सीधेसीधे उस से प्रश्न कर दिया, ‘‘शादी करोगी मुझ से?’’

वह कुछ बोली नहीं. सिर झुकाए बैठी पैर के अंगूठे से जमीन पर रेखाचित्र बनाती रही.

मैं उतावला हो रहा था. मैं ने अपना प्रश्न दोहराया, ‘‘बोलो, शादी करोगी मुझ से?’’

वह सिर झुकाएझुकाए ही धीरे से बोली, ‘‘इस के लिए आप को हमारी मम्मी से मिलना होगा.’’

मेरा मन बेकाबू हो उठा था, ‘‘हां…हां, क्यों नहीं. बोलो, कब, कहां?’’

वह थोड़ी देर कुछ सोचती रही, फिर बोली, ‘‘पूछ कर बताऊंगी.’’

इतना कह कर वह एकदम उठी और चल दी. गेट के पास पहुंच कर उस ने एक बार मुड़ कर मेरी ओर देखा और बाहर चली गई.

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अब मेरा एकएक दिन मुश्किल से कट रहा था, अगले मंगलवार के इंतजार में.

आखिर वह दिन आया. अब समस्या थी कि दोपहर तक का समय कैसे काटा जाए. कालेज जाने का कोईर् फायदा लग नहीं रहा था. सो, सड़कों के चक्कर काटकाट कर सूरज के चढ़ने को निहारता रहा.

समय होते ही मैं पार्क की ओर भागा.

मैं जब पार्क में पहुंचा तो यह देख कर थोड़ी निराशा हुई कि बैंच अभी खाली पड़ी थी. खैर, मैं अपनी उसी जगह जा कर बैठ गया जहां मैं अकसर बैठा करता था. मेरी नजर गेट पर ही टिकी रही.

जैसेजैसे समय बीत रहा था, एक अनजान सा डर मुझे परेशान किए था. तभी एक गरीब सा दिखने वाला आदमी मेरी ओर बढ़ने लगा. वह जैसे ही पास आया उस ने एक मुड़ा हुआ कागज मेरी ओर बढ़ाया. कंपकंपाते हाथों से वह कागज मैं ने उस से लिया और जल्दी से खोल कर पढ़ा. उस में लिखा था –

‘आप इन के साथ चले आएं. ये आप को पहुंचा देंगे.’

जो कुछ हो रहा था उस ने मुझे सारी हालत पर विचार करने को मजबूर कर दिया था. पहले मैं ने उस आदमी को गौर से देखा. यह वही आदमी था जिस के रिकशे पर वह पार्क आयाजाया करती थी. तब मैं ने उस आदमी को आगे चलने का इशारा किया और मैं उस के पीछे हो लिया.

मैं इस सड़क पर कभी बहुत आगे तक गया नहीं था, इसलिए मुझे पता नहीं था कि यह सड़क आगे जा कर एक पतली गली जैसी हो जाती है. छोटीछोटी ढेरों दुकानें, खुली नालियां

और एकदूसरे को धकियाती भीड़. मुझे लगा कि शायद सफाई कर्मचारियों को

इस रास्ते का पता मालूम नहीं होगा.

थोड़ा आगे जा कर रिकशा रुक गया. रिकशे वाले ने एक गहरी सांस ली और बोला, ‘‘बाबू साहब, रिकशा इस के आगे न जा पाएगा. दस कदम आगे चल कर बाईं ओर की गली नंबर 10 में मुड़ जाइएगा. 2 कोठियां छोड़ कर एक जीना ऊपर जाता दिखेगा. बस, उस में चढ़ जाइएगा, मैडम मिल जाएंगी.’’

मैं ने उसे पैसे देने की कोशिश की, पर उस ने लिए नहीं. जहां कहीं मैं इस समय था वह जगह ऐसी लग रही थी जैसे यह शहर का हिस्सा है ही नहीं. जगहजगह टूटे प्लास्टर वाले रंगबिरंगे मकान लगभग वैसे ही लग रहे थे जैसे माचिस की ढेर सारी डब्बियां एकदूसरे के ऊपर रख दी गई हों. हर मकान के बाहर, धूप में सूखते मैलेकुचैले कपड़े और दीवारों पर चिपकी पान की पीक के अलावा जगहजगह पी हुई बीड़ीसिगरेटों के बचे टुकड़े बिखरे पड़े थे.

अब मुझे डर लगने लगा था, पर फिर भी, पैर अनजाने ही आगे बढ़ते चले जा रहे थे. तभी सामने की दीवार पर एक जंग खाई टीन की पट्टी लगी दिखाई दी, जिस पर लगभग मिटता हुआ सा लिखा था- ‘गली नंबर-10.’ मैं उस ओर मुड़ गया.

गली के मुहाने पर ही पड़ी प्लास्टिक की कुरसी पर एक पुलिसमैन बैठा दिखाई दिया. उसे पुलिसमैन मानने में तनिक शंका हो रही थी. पैंट से बाहर निकली मुड़ीतुड़ी कमीज, मुंह में भरी पान की पीक, बिना धुला सा चेहरा. पर हां, हाथ में डंडा जरूर था.

वह मेरी ओर देख कर मुसकराया. मैं ने भी मुसकरा कर मुसकराहट का उत्तर दे दिया. मुझे मुसकराते देख वह इतनी जोर से हंसा कि उस के मुंह में भरी पीक उछल कर उस की कमीज पर आ गिरी. मुझे यह सब देख उबकाई सी आने लगी, इसलिए मैं तेजी से आगे बढ़ गया.

रिकशे वाले द्वारा बताई सीढ़ी सामने थी. एकदम पतला सा जीना था और जीने की दीवारें बहुत ही ज्यादा गंदी थीं. छोटीछोटी सीढि़यों पर पैर तो मैं ने रख दिए पर मन में ‘आगे जाऊं या पीछे’ की उलझन और बढ़ गई. सोच रहा था ‘नर्क में भी अप्सराएं रहती हैं, ऐसा तो कभी किसी ने बताया नहीं. या कहीं, मेरे साथ कोई उपहास प्रायोजित तो नहीं किया गया है.’ अपनी सुरक्षा का डर भी जोर पकड़ने लगा था. तभी सामने एक दरवाजा आ गया. दरवाजे के बाजू में लिखा था ‘नं.-3.’

मेरा हाथ दरवाजा खटखटाने को आगे बढ़ गया. भीतर से किसी महिला की आवाज आई, ‘‘खुला है, तशरीफ ले आइए.’’

पसोपेश की हालत में होते हुए भी पैर आगे बढ़ ही गए. अब मैं एक बड़े कमरे में खड़ा था. कमरे में कई दरवाजे खुल रहे थे जिन पर परदे पड़े हुए थे. सामने वाली दीवार के साथ एक तख्त बिछा हुआ था जिस पर गहरे रंग की चादर बिछी थी और इधरउधर 2-3 मसनद जैसे तकिए भी लगे थे. मसनदों का रंग भी चादर की तरह सुर्ख था.

तख्त पर एक अधेड़ उम्र की महिला बैठी थी जिस के दोनों हाथ किसी कड़ी चीज को काटने में व्यस्त थे और आंखें मेरे ऊपर गड़ी हुई थीं. वे बहुत धीरे से बोलीं, ‘‘बैठिए.’’

मैं ने इधरउधर देखा. बेंत से बनी कई कुरसियां पड़ी थीं. मैं ने एक कुरसी खींची और उस पर बैठ गया.

मेरी नजर महिला पर कम, इधरउधर के वातावरण पर ज्यादा थी. मैल की आगोश में लिपटी दीवारें, कमरों के दरवाजों पर झूलते सिल्की परदों से मेल नहीं खा रही थीं.

मन घबराने लगा था. तभी वे महिला जो शायद उस की मम्मी ही रही होंगी, धीरे से बोलीं, ‘‘क्या सोच रहे हो, हम ने आप को यहां क्यों बुलाया. किसी बेहतर जगह भी तो बुला सकते थे. पर…पर वह हमारी नजर में आप के साथ धोखा होता.’’

इस के बाद वे थोड़ी देर चुप रहीं. फिर कुछ बैठी सी आवाज में बोलीं, ‘‘धोखा दे कर, बाद में उस का अंजाम भुगतना अब हमारे बूते का नहीं रह गया है बरखुरदार.’’

यह कहतेकहते शायद उन का गला भर आया था, इसलिए वे चुप हो गईं. ऐसा लग रहा था जैसे कुछ पुरानी यादें उन के जेहन में उतर आई थीं.

मैं चुप ही रहा.

सुपारी काटने में व्यस्त उन के हाथों

की गति पहले से तेज हो गई थी.

शायद वे अपने मन के आवेश को कड़ी सुपाड़ी के ऊपर उतारने की कोशिश कर रही थीं. वे अचानक फिर से बोलीं, ‘‘आंखें बूढ़ी हो गईं एक ऐसे मर्द का दीदार करने की ख्वाहिश में जिस में इतनी हिम्मत हो कि वह औरत के जिस्म के सौदागरों को चुनौती दे सके.’’ उन की तकलीफ मुझे झकझोरने लगी थी.

वे शायद अपने आंसू रोकने की कोशिश कर रही थीं. थोड़ी देर चुप रहीं. फिर वे बोलीं, ‘‘यहां तक आने की हिम्मत दिखाई है तुम ने. तो सुनो, गौर से सुनो, यहां रह रही सैकड़ों लड़कियों की कराहती आवाजें जो चीखचीख कर पूछ रही हैं कि इन का क्या कुसूर था. कुसूर तो कमबख्त वक्त का था जिस ने इन्हें बदनाम कोख में ला पटका.’’

मेरे चिंतन पर प्रश्नचिह्न लग गया था.

मेरे कानों में सैकड़ों कराहते नारी स्वर गूंजने लगे थे. मेरी आंखें गीली हो आई थीं.

वे फिर बोलीं. इस बार उन की आवाज में कुछ उत्तेजना सी थी, ‘‘साहबजादे, अगर एक मासूम को इस नरक से निकालने का हौसला रखते हो तो जाओ अपने मांबाप, घरखानदान वालों से पूछो कि क्या वे गली नंबर-10 के कोठे नंबर-3 की एक लड़की को अपने घर की बहू बनाने को तैयार हैं.’’

मैं खामोश था.

वे चुप थीं.

थोड़ी देर चुप रह कर वे तनिक धीमी आवाज में बोलीं, ‘‘अगर वे हां कर दें तो हमें खबर कर देना. हम बेटी को दुलहन बना कर खुद छोड़ने आ जाएंगे.’’

वे थोड़ा सा चुप हुईं और फिर कराहती सी आवाज में बोलीं, ‘‘और अगर ‘न’ कर दें तो तुम फिर कभी इस ओर मत आना. ये बदनाम गलियां हैं. बेकार में बदनाम हो जाओगे.’’

वे बहुत थकी सी लगने लगी थीं. वे धीरेधीरे उठीं और बिना मेरी ओर देखे पीछे के कमरे के अंदर चली गईं.

अब एकदम सन्नाटा हो गया था.

मैं कुरसी पर बैठा अपनी चेतना लौटने का इंतजार करता रहा. फिर मैं भी कुरसी से उठा और धीरेधीरे बाहर की ओर चल दिया.

मुझे लग रहा था कि कमरे के दरवाजे पर पड़े परदे के पीछे से याचनाभरी

2 आंखें मेरा पीछा कर रही हैं.

मैं कितनी ही कोशिशें करने के बाद  घर वालों से कुछ न कह सका और न कभी फिर वह लड़की ही मिली. दिनदहाड़े आगरा घूमनेफिरने के बाद टैक्सी वाला तारीफों के पुल बांधते हुए हमें एक दुकान में यह कह कर ले गया कि यहां आगरा की प्रसिद्ध वस्तुएं फिक्स रेट पर मिलती हैं. दुकान के पहले छोर में हैंडीक्राफ्ट के आइटम रखे थे, जिन के दाम और क्वालिटी पहली नजर में हमें बाजार की अपेक्षा उचित लगे. हम ने कुछ आइटम खरीद लिए.

दुकान पर हमारा भरोसा जमता देख, दुकानदार आग्रह कर के हमें दुकान के दूसरे छोर में ले गया जहां हैंडलूम के आइटम थे.

हमारे लाख मना करने के बाद कि हमारे पास खरीदारी के लिए पैसे ही नहीं हैं, वह बोला, ‘‘अरे साहब, पैसे कौन मांग रहा है. आप आइटम तो पसंद कीजिए. जितने का भी सामान हो उस का सिर्फ 40 फीसदी दे जाइए, हम सामान पार्सल से आप के घर भेज देंगे. डाक का खर्च हमारा रहेगा, बाकी पैसे दे कर पार्सल छुड़ा लेना.’’

हमारे नानुकुर करने के बाद भी वह एक साड़ी मेरी मिसेज को दिखाते हुए बोला, ‘‘बहनजी, यह बांस (बैंबू)

की साड़ी आगरा की प्रसिद्ध साड़ी

है, इसे जरूर ले जाइए, कीमत मात्र 1,200 रुपए.’’

मैं ने पत्नी को एकदो साड़ी खरीदने की सहमति दे डाली. फिर क्या था, मोहतरमा ने 6 साडि़यां पैक करा डालीं.

दुकानदार ने प्रत्येक साड़ी के कोने में हमारे हस्ताक्षर करा लिए ताकि साडि़यों के बदले जाने की गुंजाइश न रहे. दुकानदारी के तरीके से प्रभावित हो कर हम इतने निश्ंिचत हो गए कि बिल की काउंटरफाइल में लिखी शर्तों को पढ़े  बगैर हम ने उन की शर्तों पर साइन कर दिए. सारी जेबें खंगालने के बाद 3 हजार रुपए अदा कर के हम अपने घर को विदा हो लिए.

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घर पहुंचने के एक हफ्ते के अंदर पार्सल भी पहुंच गया. डाकिया बाकी के 3 हजार रुपए के अलावा 125 रुपए डाकखर्च भी मांगने लगा. हमारे यह कहने पर कि डाकखर्च तो दुकानदार ने दे दिया होगा, वह बोला, ‘‘नहीं, बकाया डाकखर्च देने पर ही मैं पार्सल आप को दे सकता हूं.’’ 125 रुपए के पीछे 3 हजार फंसते देख हम ने पार्सल छुड़ा लिया.

हम ने पार्सल खोला. हस्ताक्षरयुक्त साडि़यां पा कर तसल्ली हुई. आगरा की निशानी के नाम पर बड़े उत्साह से पहनने के बाद एक ही धुलाई में साडि़यों का सारा आकर्षण भी धुल गया. इस ठगी की कटु याद आज भी मुझे कचोटती है. Stories Hindi

सुबोध मिश्र

Kahani in Hindi : खैरू की बलि – छोटी बहन के जन्म से घर में सन्नाटा क्यों छा गया

Kahani in Hindi : दादी का भुनभुनाना जारी था, ‘अरे, लड़कियां तो निखालिस भूसा होती हैं, हवा लगते ही फुर्र से उड़ जाएंगी, पर वजनदार अनाज की तरह परिवार का रखवाला तो लड़का ही होता है. बेटे वाले घर की तो बात ही कुछ और है.’

यह सुनने के हम अब आदी हो गए थे. मुझ से 2 बड़ी और 3 छोटी बहनें थीं. मैं तीसरे नंबर की बड़ी चंचल व भावुक थी. मुझ से 2 बड़ी बहनें अकसर गुमसुम रहतीं.

मेरी सब से छोटी बहन का जब जन्म हुआ तो घर में मातम सा छा गया. ऐसा सन्नाटा शायद हम सभी बहनों के जन्म के समय भी रहा होगा. छोटी के जन्म पर पड़ोसी भी ‘हे राम, फिर लड़की ही हुई’ जैसे शब्द बोल कर अपने पड़ोसी होने का धर्म निभा जाते. पापा को 2 लाइन लिख दी जातीं कि इस बार भी घर में बेटी पैदा हुई है.

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छोटी के जन्म के बाद पापा 1 साल में घर आए थे. 2 महीने की छुट्टियां चुटकियों में बीत गईं. वापस ड्यूटी पर जाते हुए पापा ने दादी के पांव छुए. हम सभी लड़कियों को अच्छे नंबरों से पास होने की हिदायत दे कर उन्होंने संकरी पगडंडियों की तरफ धीरेधीरे अपने कदम बढ़ाए तो घुटनेनुमा पहाड़ पर चढ़ते हुए पापा की पदचाप हम सभी महसूस करते रहे.

जितने दिन पापा घर में रहे हर दिन त्योहार की तरह बीता. चूल्हे की आग से तपती कंचनवर्णा मां के चेहरे पर जरा भी शिकन न दिखाई देती. वह बड़ी फुर्ती से पापा की पसंद के व्यंजन बनाती रहतीं. दोपहर के 2-3 बजे पापा गांव से दूर घूमने निकल पड़ते. कभी हम बहनें भी उन के साथ चल देतीं. गोल, चमकीले, चौकोर पत्थरों के ऊपर जब कभी हम सुस्ताने बैठतीं तो पापा भी बैठ जाते. पापा ध्यान दिलाते, ‘देखो बच्चो, कितना सुंदर लग रहा है यह सब. खूबसूरत पहाड़, स्लेटी रंग के पत्थरों से ढकी छतें कितनी प्यारी हैं.’

तब जा कर कहीं हमें पहाड़ों की सुंदरता का एहसास होता. पहाड़ी खेतों के बीच चलतेचलते सांझ हो जाती और फिर अंधेरा छाने लगता. मैं पापा को याद दिलाती कि अब हमें वापस चलना चाहिए. तारों की छांव में हम वापस मुड़ते. पहाड़ी ढलान पर चलना सहज नहीं होता, ऊपर तारों की चादर फैली हुई और नीचे कलकल करती पहाड़ी नदी. पापा बिना कठिनाई के कदम बढ़ाते साथ ही हमें ऊंचीनीची, संकरी जगहों पर हाथ पकड़ कर रास्ता तय करवाते.

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पापा के जाने के बाद उदासी सी छा गई. सारे घर में दादी समयअसमय साड़ी के पल्लू से अपनी आंखें पोंछा करतीं और सारा गुस्सा हम बहनों पर ही उतारतीं. उन के सामने कोई जवाब देने की हिम्मत न करता. दादीजी का रौब और दबदबा सारे गांव में मशहूर था.

अंगरेजी सरकार द्वारा सम्मानित जागीरदारों के उच्च कुल में जन्मी 7 भाइयों की अकेली बहन थीं हमारी दादी. सुना है, उस जमाने में दादाजी की बरात में 500 बराती गए थे. जबकि मेरी मां साधारण परिवार की, कम पढ़ीलिखी लड़की थीं. पापा नायब सूबेदार थे. एन.डी.ए. की लिखित परीक्षा में 2 बार निकलने पर एस.एस.बी. में असफल रहे. इस असफलता का गम पापा को अंदर तक झकझोर गया. वह गम पापा कभी भुला नहीं पाते कि पढ़ाई में उन से फिसड्डी लड़के आगे निकल गए थे और वह रह गए. फिर भी फौज में जाने की उन की दिली इच्छा थी इसलिए जो पद मिला स्वीकार कर लिया.

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दादी को सख्त अफसोस होता कि मेरा बेटा दीपू मेजर का बेटा होते हुए भी पीछे क्यों रह गया जबकि वह पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहा था. मेजर का इकलौता वारिस होने के कारण बड़ेबड़े घरों से रिश्ते आए थे लेकिन वह खूबसूरती पर मर मिटा. दानदहेज फूटी कौड़ी भी न मिली और आगे से देखो लड़कियों की फौज खड़ी है. दादी कुछ न कुछ बोलती ही रहतीं. कभी हमें कोसतीं और कभी पापा की किस्मत को दोषी ठहरातीं.

दादी चालीसा अभी खत्म भी नहीं हो पाई थी कि पूर्वा भागीभागी आई और बोली, ‘‘दादी, पार गांव से संतू आया है. साथ में बकरी का छोटा सा एक बच्चा भी लाया है.’’

‘‘संतू बकरी का बच्चा ले आया,’’ दादी खुश होते हुए बोलीं, ‘‘बड़ी खुशामद से मंगवाया है.’’

हम    बहनें प्रश्नभरी नजरों से दादी को देखने लगीं तो वह बोलीं, ‘‘बच्चो, तुम्हारी समझ में अभी ये बातें नहीं आएंगी. समय आने पर तुम खुद ही समझ जाओगी.’’

मैं उत्सुकता से भरी आंगन की तरफ भागी तो देखा सामने दूध की तरह सफेद बकरी का बच्चा भयभीत नजरों से टुकरटुकर मुझे देख रहा था. मैं उसे गोद में लेने को आगे बढ़ी तो वह कुलांचें भरता हुआ भाग निकला.

संतू को चाय और रोटी, बकरी के बच्चे को दानापानी खिलापिला कर दादी ने राहत की सांस ली थी और फिर दालान में बैठ कर वह आगे की रूपरेखा बनाने में जुट गईं.

दादी ने गांव के एक लड़के को सब कुछ समझा कर पुरोहित के घर जल्दी आने का बुलावा भेजा. पंडित ठीक समय पर पहुंच गया. उस ने संकल्प के लिए परिवार के सभी लोगों को पूजाघर में जमा किया और फिर सब की हथेली में पानी और तिल रखते हुए संकल्प छोड़ने को कहा. पंडित मंत्रोच्चारण कर रहा था और परिवार के लोग बकरी पर तेल छिड़क रहे थे. अंत में पंडित ने कहा, ‘‘हे देवी, अगर घर में बेटा हुआ तो यह बकरी तुझे भेंटस्वरूप देंगे.’’

पंडित के कहे अंतिम शब्द मुझे विष वाण से लग रहे थे.

इत्तफाक ही कहिए कि 6 बहनों के बाद घर में बेटे का जन्म हो गया. नामकरण संस्कार बड़े धूमधाम से मनाया गया तो घर में बधाई देने वालों का तांता लग गया. गांव की रस्म के अनुसार भरपूर दक्षिणा दी गई. भाई का नाम दादी की इच्छानुसार तथा पंडित की सहमति से कालीचरण रख दिया गया.

मैं बकरी के छौने को चारापानी देने गई. लाड़ से मैं ने उसे सहलाया तो वह मैं…मैं करता हुआ मेरे आसपास उछलने- कूदने लगा. मैं ने प्यार से उसे खैरू कह कर पुकारा तो वह मेरे पास आ गया. मैं उछलती हुई अपनी छोटीबड़ी बहनों को बताने गई, ‘‘देखो, कल से बकरी के बच्चे को खैरू कह कर बुलाना, यह नाम मैं ने रखा है. कैसा लगा तुम्हें?’’

‘‘अच्छा है,’’ मेरे से 2 साल बड़ी बहन जो बोलने में बड़ी कंजूस थी, अपने शब्दों को खर्च करती हुई मुझे समझाते हुए बोली, ‘‘नन्हे छौने को इतना प्यार न किया कर प्रिया, क्योंकि इस की जुदाई तू सह नहीं पाएगी. खैरू की खैरियत नहीं, वह देवी मां को चढ़ेगा.’’

पलक झपकते ही साल निकल गया. खैरू अब खापी कर जवान बकरा बन चुका था. इस साल पापा जब घर आए तो दादी फुरसत के क्षणों में पापा को अपने पास बिठाते हुए बोलीं, ‘‘दीपक, आने वाले दशहरे पर तुझे छुट्टी लेनी पड़ेगी. अष्टमी को काली मंदिर में बकरा भेंट करना है.’’

खीजते हुए पापा बोले, ‘‘तुम तो जानती हो मां कि फौज में छुट्टियां कम ही मिलती हैं. तुम्हारी इसी बेटे की झक के कारण इतनी बड़ी गृहस्थी जुड़ गई. जानती हो मां अब वह जमाना आ गया है कि बेटे और बेटी में कोई फर्क नहीं माना जाता.’’

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पापा का इतना कहना था कि दादी भभक कर बोलीं, ‘‘अगर उपाय न होता तो जिद कर के मैं ने बकरा न मंगवाया होता. तुम ने तो वंश का नामोनिशान ही मिटादिया होता. पुरखे बिना तर्पण के निराश हो कर भूखेप्यासे ही लौट जाते. बेटियों के हाथ से पितरों को पानी चढ़वाता क्या? 2 गांवों की जायदाद दूसरे वंश को ऐसे ही सौंप देते? अब कुल में नाम लेने वाला हो गया है तो काली को पूजा तो देनी ही होगी.’’

दादी का अंधविश्वास ही हमें अखरता था, वरना तो उन का व्यक्तित्व हम सब के लिए गर्व करने लायक था. दादाजी फौज में बड़े ओहदेदार थे. उन की मौत के समय पापा बहुत छोटे थे, सो दादी ने ही मायके और ससुराल दोनों जगह को संभाला और पापा को पालपोस कर बड़ा किया. हर साल शहीद दिवस पर सफेद सिल्क की साड़ी में दादी को जब सम्मानित किया जाता तो वह क्षण हम बहनों के लिए फख्र करने का होता था. अब सब से कहतीं फिरती हैं कि काली मां के खुश होने से ही उन के घर में पोता पैदा हुआ.

गांव भर में दादी को अपनी मन्नत पूरी होने का ढिंढोरा पीटते देख एक उन की हमउम्र बुढि़या से नहीं रहा गया तो उन्होंने पूछ लिया, ‘‘क्यों दीपक की मां, पहले कालीमां की याद नहीं आई जो 6 लड़कियां हो जाने के बाद मन्नत मानी.’’

दादी लड़कियों को कितना भी डांटें लेकिन दूसरों का इस तरह कहना उन्हें कहां बरदाश्त होता. फौरन बोलीं, ‘‘तुम्हें मेरी पोतियों की फिक्र क्यों हो रही है? सब पढ़ रही हैं. सुंदर हैं, कितने ही अच्छे घरों के राजकुमार मेरी देहरी चढ़ेंगे.’’

खैरू अब खूब सुंदर दिखने लगा था. सफेद लंबे झबरीले बालों में वह लंबातगड़ा लगता. जानपहचान वाले लोग उस की हड्डीपसली पर निगाह रखते, उस की खाल को खींच कर अनुमान लगाते कि प्रसाद के रूप में उन्हें कितनी बोटियां मिलेंगी. ताजे गोश्त के स्वाद को याद करते हुए वे थूक निगलते.

दशहरा शुरू हो गया. पापा छुट्टी ले कर घर आ गए, नजदीकी रिश्तेदार जमा होने लगे. इस तरह का जो भी मेहमान आता वह एक नजर खैरू पर डाल कर दूसरे मेहमानों से यही कहता, ‘‘बकरा बड़ा जोरदार है.’’

आखिर खैरू की जुदाई का दिन भी आ गया. सप्तमी के दिन खैरू को मंदिर ले जाना था. मंदिर गांव से काफी दूर है. मैं उस से लिपटती और आंसुओं को उसी के शरीर से रगड़ती, पोंछती लेकिन आंसू हैं कि थमने का नाम ही नहीं लेते. पापा गुस्सा होते हुए मुझे झिड़की देते, ‘‘क्यों बकरे को परेशान करती हो. इधरउधर खेलती क्यों नहीं?’’

ऐसे समय दादी मुझे गोद में बैठा कर कहतीं, ‘‘रहने दे, बेटा, इसी के साथ हिला है. दानापानी भी इसी के हाथ से खाता है. जिस समय बकरे को ले जाएंगे इस की नजर बचा कर ही ले जाना होगा वरना यह तूफान खड़ा कर देगी.’’

सप्तमी के दिन सुबह ही गेंदे के सुगंधित फूलों की माला खैरू के गले में डाल दी गई. रोली और अक्षत से उस का माथा सजाया गया. मुलायम घास की पत्तियां, भीगे चने और आटे की मीठी रोटी उस को खाने के लिए दी गई लेकिन उस ने छुआ तक नहीं. खैरू मैं…मैं… कर रहा था. मांस के भूखे लोग उसे धकियाते हुए ले जा रहे थे. कतारबद्ध वे पहाड़ी रास्ते पर ढलान व चढ़ाई लांघते हुए उत्साह से, तेज कदमों से चले जा रहे थे. लेकिन खैरू धीमी चाल से चलता हुआ पीछे मुड़मुड़ कर कभी घर की ओर तो कभी मुझे देख रहा था.

मिमियाता हुआ निरीह प्राणी कितना बेबस था. मैं उस को लाख कोशिशों के बावजूद नहीं बचा सकती थी. बड़ा विश्वास था उस का मुझ पर, मैं क्या करती. देखते ही देखते वे लोग पहाड़ की दूसरी तरफ आंखों से ओझल हो गए और मैं थके पैरोंसे वापस घर की ओर मुड़ी और बिना खाएपीए बिस्तर में घुसी रही. घर में हर कोई देवीपूजन की बात करता कि पूजन कैसा रहा, कितने बकरे आए थे, बलि के लिए उन में खैरू सब से अच्छा था आदि. और मैं चुपचाप रोती, अपने गुस्से को अंदर ही अंदर दबाने की कोशिश करती रही रात भर.

कालीचरण 4 साल का हो गया लेकिन वह न बोलता और न ही सुन सकता था. दादी को गहरा धक्का लगा. उन्होंने सिर पीट लिया. इनसान की इच्छाएं कितनी अधिक हैं लेकिन जीतेजी किस की इच्छा पूरी होती है. दादी की पोते की इच्छा तोपूरी हुई लेकिन प्रकृति ने तो बड़े ही क्रूर ढंग से बदला चुकाया. धीरेधीरे कालीचरण बड़ा होने लगा. पापा रिटायर हो गए. उन्हें बेटे की स्कूल की फिक्र होने लगी. मूकबधिरों के हमारे यहां बहुत कम स्कूल हैं. किसी तरह एक स्कूल में दाखिला करवाया.

मुझ से बड़ी बहन जो ज्यादातर चुप रहती थी आज एक नामी डाक्टर है. कोई शिक्षिका तो कोई निजी फर्म में जनरल मैनेजर का पद संभाले हुए है. हम बहनोंके लिए पापा को वर ढूंढ़ने में अधिक परेशानी नहीं हुई, क्योंकि सभी तो अच्छे पदों पर कार्यरत थीं. बहुत गर्व की अनुभूति होती थी पापा को हम बहनों के बारे में बोलतेहुए.

कई महीनों बाद मैं इस बार पापा से मिलने मायके आई तो कुशलक्षेम, प्रणाम और आशीर्वाद के बाद मैं कुरसी पर बैठी ही थी कि कालीचरण नमस्ते करता हुआ मेरे सामने खड़ा था. मैं प्रश्नसूचक नेत्रों से पापा को देखने लगी. वे सजल आंखों से मेरी ओर देखते हुए बोले, ‘‘क्या करूं बेटा, मैं ने इस का एडमिशन जितने भी विकलांग स्कूल हैं, सभी में करवा दिया लेकिन यह मारपीट करता है. इस कारण इस का नाम काट दिया जाता है. आखिरी स्कूल था वहां से भी निकाल दिया गया. कभी सोचता हूं यह या तो पैदा ही न होता और होना ही था तो तुम्हारी तरह लड़की होता.’’

मैं मम्मीपापा को दुखी देख कर परेशान सी आंगन में टहलने लगी. आंगन से मैं चौक में उतर आई. मेरे पीछेपीछे मां भी आ गईं. खैरू का खूंटा वहीं गड़ा हुआ था. मैं निर्जीव खूंटे को बैठ कर सहलाने लगी. मां मेरी पीठ पर हाथ रखते हुए बोलीं, ‘‘क्या करें प्रिया बेटा, खैरू की बलि हम भी नहीं भूले हैं.’’

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मेरे कानों में 5 वर्ष पहले दादी के कहे शब्द गूंजने लगे. बेटा तो वजनदार अनाज की तरह परिवार का रक्षक होता है. बकरा मंगवा लिया तो हो गई न काली मां प्रसन्न. Kahani in Hindi

 शशि ध्यानी        

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