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Hindi Story : रंग प्यार के – ढलती उम्र में भी चटख

Hindi Story : आज रमेशजी के रिटायरमैंट के दिन औफिस में पार्टी थी. इस अवसर पर उन का बेटा वरुण बहू सीता और बेटी रोमी अपने पति के साथ आई हुई थी. सभी खुश थे. उन की पत्नी उर्वशी की खुशी आज देखते ही बनती थी. रमेशजी की फरमाइश पर वह आज ब्यूटीपार्लर से सज कर आई थी. उन्हें देख कर कोई उन की उम्र का अंदाजा भी नहीं लगा सकता था. वह बहुत सुंदर लग रही थी.

विदाई के क्षणों में औफिस के सभी कर्मचारी भावुक हो रहे थे. यहां रमेशजी ने पूरे 30 बरस तक नौकरी की थी. वे हर कर्मचारी के सुखदुख से परिचित थे. यह उन के कुशल व्यवहार का परिणाम था कि वे औफिस के हर कर्मचारी के परिवार के साथ पूरी तरह जुड़े हुए थे. उन्होंने हरेक के सुखदुख में पूरा साथ दिया था. जैसाकि हरेक के साथ होता है, इस अवसर पर सब उन की तारीफ कर रहे थे लेकिन अंतर इतना था कि उन की तारीफ झूठी नहीं थी. कहने वालों की आंखें बता रही थीं कि उन्हें रमेशजी की रिटायरमैंट पर कितना दुख हो रहा है.

हर कोई उन के बारे में कुछ न कुछ अपना अनुभव बांट रहा था. यह देख कर उर्वशी की आंखें फिर नम हो गई थीं. रमेशजी ने उन्हें कभी इतना कुछ नहीं बताया था जितना आज औफिस के कर्मचारी बता रहे थे. उन के साथ काम करने वाली आया फफकफफक कर रो पड़ी, ‘‘बाबूजी, आज लगता है जैसे मेरा यहां कोई नहीं रहा.’’

‘‘ऐसा नहीं कहते शांति. यहां पर इतने लोग हैं.’’

‘‘आप मेरे पिता समान हैं. आप के रहते मुढे लगता था मेरे ऊपर कोई परेशानी नहीं आएगी. आप सब संभाल लेंगे. अब क्या होगा?’’

‘‘तुम ऐसा क्यों सोचती हो?’’ रमेशजी उसे समझाते हुए बोले.

ढेर सारे उपहारों के साथ देर रात तक बच्चों के साथ वे घर लौट आए थे. सभी थके हुए थे. कुछ देर बाद वे सो गए. उर्वशी को भी नींद आ रही थी. उसे सुबह जल्दी उठना था. रोज सुबह 5 बजे उठ कर वह सब से पहले रमेशजी को चाय थमाती और उस के बाद घर के और कामों में लग जाती. आज जैसे ही अलार्म बजा, उर्वशी ने देखा रमेशजी उस के लिए चाय ले कर खड़े थे.

‘‘तुम कब उठे?’’

‘‘अभी थोड़ी देर पहले उठा हूं.’’

‘‘चाय बनाने की क्या जरूरत थी?’’

‘‘यह तुम नहीं समझोगी उर्वशी. मेरे दिल में बड़ी तमन्ना थी रिटायरमैंट के बाद मैं भी तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं.’’

‘‘आज सुबह चाय पिला कर तुम ने मेरा पूरा रूटीन खराब कर दिया.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘मेरे दिन की शुरुआत तुम्हारे लिए कुछ कर के होती थी.’’

‘‘अब छोड़ो इस बात को और मेरे साथ बैठ कर आराम से चाय का आनंद लो. अभी बच्चे सो रहे हैं. तब तक हमतुम बातें करते हैं.’’

‘‘बातों के लिए सारा दिन पड़ा है.’’

‘‘अच्छा, बताओ चाय कैसी बनी है? मुझे एक ही काम आता है. इस के अलावा तुम ने मुझे कभी कुछ करने नहीं दिया.’’

‘‘तुम्हारे पास इन सब के लिए फुरसत कहां थी? सुबह से ले कर शाम तक परिवार के लिए काम करते रहते थे.’’

‘‘यह सब तुम्हारे सहयोग के कारण ही संभव हो सका उर्वशी, वरना मेरे बस का कुछ नहीं था.’’

‘‘कैसी बातें करते हो? आज तुम्हारी मेहनत की बदौलत दोनों बच्चे अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं. यह सब तुम्हारे कारण संभव हुआ है.’’

‘‘उर्वशी मैं ने जीवन में केवल काम पर ध्यान दिया. मेरी कमाई का सही उपयोग तुम ने किया. तुम्हीं ने बच्चों और उन की पढ़ाई पर ध्यान दिया. मुझे कभी इन बातों का एहसास भी नहीं होने दिया.’’

‘‘अब सुबह से मेरी ही तारीफ करते रहोगे या मुझे काम भी करने दोगे?’’

‘‘मेरा बड़ा मन था रिटायरमैंट के बाद तुम्हारे साथ काम में हाथ बंटाऊं.’’

‘‘रहने दो, तुम्हारे साथ काम करने में मुझे घंटों लग जाएंगे. घर पर बच्चे आए हैं. मुझे जल्दी से सारा काम निबटाना है.’’

‘‘जैसी तुम्हारी मरजी,’’ कह कर रमेशजी व्यायाम करने लगे और उर्वशी अपने काम पर लग गई.

उन्होंने सोच लिया था कि वे पत्नी को हर प्रकार का सुख देने का प्रयास करेंगे. नौकरी करते हुए उन्होंने कभी परिवार की जिम्मेदारी नहीं उठाई. वे एक ईमानदार और मेहनती इंसान थे. छुट्टी के एवज में काम करने के उन्हें रुपए मिलते थे इसीलिए उन्होंने कभी बेवजह छुट्टी तक नहीं ली. वे उर्वशी तथा बच्चों को घुमाने भी न ले जाते. उन की आय के साधन इतने नहीं थे कि वे बच्चों और पत्नी को आलीशान जिंदगी दे सकें. यह बात उन्हें बहुत खटकती थी लेकिन मजबूर थे.

इस उम्र में आ कर उन के पास समय और थोड़ेबहुत रुपए भी थे जो उन्हें रिटायरमैंट पर मिले थे. वे इस से उर्वशी की उन इच्छाओं को पूरा करना चाहते थे जिसे वे नौकरी में तवज्जो न दे सके थे. कुछ देर बाद बच्चे सो कर उठ गए. वे अभी तक कल की पार्टी की ही चर्चा कर रहे थे. 2 दिनों बाद वरुण और सीता को जाना था.

वरुण बोला, ‘‘पापा, आप दोनों हमारे साथ चलिए.’’

‘‘कुछ दिन हमें घर पर सुकून से समय गुजारने दो बेटा.’’

‘‘मेरा घर भी आप का ही घर है.’’

‘‘यह बात तो है लेकिन इस घर पर इतने साल गुजारे हैं लेकिन कभी इसे इतना समय नहीं दे सका जितना देना चाहिए था.’’

‘‘आप यह बात दिमाग से निकाल दीजिए. आप ने जो किया वह अपनी क्षमताओं से बढ़ कर किया और हमें इस पद तक पहुंचाया.’’

‘‘इस में मेरा नहीं तुम्हारी मम्मी का योगदान ज्यादा है.’’

‘‘मम्मी आप की अर्धांगिनी हैं. उन्होंने हर सुखदुख में आप का पूरा साथ दिया है.’’

‘‘मैं चाहता हूं अब रिटायरमैंट के बाद उसे पहले कहीं घुमाने ले चलूं.’’

‘‘अच्छा सैकंड हनीमून मनाना चाहते हैं.’’

‘‘आजकल के जमाने में शायद बच्चे इसे यही कहते हैं लेकिन हम ने कभी परिवार के साथ रह कर अपना पहला हनीमून भी नहीं मनाया. घरगृहस्थी में ऐसे फंसे रहे कि इस बारे में सोचने की न तो फुरसत थी और न ही कोई आकांक्षा. तुम्हारी मम्मी ने अपनी ओर से कभी कुछ नहीं मांगा. मैं अब उसे वह सब देना चाहता हूं जिस की वह हकदार थी.’’

‘‘ठीक है पापा, आप जो करना चाहें वह करें और जब फुरसत मिल जाए तब प्लीज हमारे पास चले आना. हम भी मम्मी को कुछ दिन के लिए आराम देना चाहते हैं.’’

2 दिन मम्मीपापा के साथ घर पर बिता कर वरुण और सीता वापस चले गए थे. अगले दिन रोमी भी चली गई. उर्वशी और रमेशजी को घर सूनासूना लग रहा था.

‘‘उदास मत हो, उर्वशी. हम दोनों भी कहीं घूमने चलते हैं.’’

‘‘मुझे तो घर पर ही अच्छा लगता है.’’

‘‘अपना घर तो अपना होता है लेकिन बदलाव के लिए कभीकभी घर से बाहर घूमने भी जाना चाहिए. दुनिया बहुत बड़ी है. उस का अनुभव भी लेना चाहिए.’’

‘‘अब इस उम्र में अनुभव ले कर क्या करेंगे?’’

‘‘सीखने की कोई उम्र थोड़े ही होती है? अपना सामान पैक कर लो. मैं ने घूमने के लिए 2 हवाई टिकट पहले ही बुक करा दी हैं.’’

‘‘मुझ से पूछे बगैर ही?’’

‘‘जानता था तुम इस के लिए राजी नहीं होगी इसलिए पूछने की जरूरत नहीं समझी.’’

‘‘हम कहां जा रहे हैं?’’

‘‘कश्मीर घूमेंगे. कुछ दिन ठंडी वादियों का मजा उठाएंगे. दिल में गुलमर्ग घूमने की बड़ी तमन्ना थी. अब जा कर पूरी होगी.’’

उन के कहने पर उर्वशी ने अपनी तैयारी शुरू कर दी. यह उस की पहली हवाई यात्रा थी. उसे हवाई जहाज में बैठने में डर लग रहा था, यह बात रमेशजी महसूस कर रहे थे.

‘‘डरो नहीं. मैं हूं न तुम्हारे साथ.’’

‘‘इतने रुपए खर्च करने की क्या जरूरत थी?’’

‘‘बस हर समय एक ही बात बोलती हो. अब रुपए बचाने की जरूरत क्या है? अपना घर है. बच्चे अच्छी नौकरी कर रहे हैं. हमारे पास जो कुछ है उसे घूमनेफिरने पर खर्च करेंगे.’’

‘‘मुझे फुजूलखर्ची पसंद नहीं.’’

‘‘ऐसा मत कहो उर्वशी. घूमनाफिरना कभी बेकार नहीं जाता. तुम यहां की सुंदर वादियों में घूम कर अपनेआप को तरोताजा महसूस करोगी.’’

रमेशजी की बात सच थी. उर्वशी के मन में भी कब से कश्मीर देखने की इच्छा थी लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर आतेआते वह मुरझा गई थी.

रमेशजी के उत्साह ने उसे हवा दी तो वह फिर से तरोताजा हो गई. हफ्तेभर तक दोनों कश्मीर की वादियों में घूमते रहे. रमेशजी उन की हर इच्छा का सम्मान कर रहे थे. लगता ही नहीं था कि वे 60 बरस के हो गए हैं. वे दोनों अपनेआप को उम्र के इस पड़ाव पर भी युवा महसूस कर रहे थे.

एक हफ्ते बाद वे अपने साथ कश्मीर की ढेर सारी यादें ले कर वापस लौट आए थे. रमेशजी बोले, ‘‘मेरी एक इच्छा तो पूरी हो गई.’’

‘‘और भी कोई इच्छा पूरी करना चाहते हो?’’

‘‘इच्छाओं का क्या है. एक पूरी होती है 10 सिर उठा लेती हैं. मैं तुम्हारे लिए बहुतकुछ करना चाहता हूं, उर्वशी.

‘‘अब हमारेतुम्हारे पास समय ही समय है. जब जी चाहेगा उन्हें पूरा कर लेंगे. काम को कभी टालना नहीं चाहिए. मौका मिलते ही उसे प्राथमिकता दे कर पूरा कर लेना चाहिए,’’ रमेशजी बोले.

अब वे उर्वशी की हर तरह से मदद करने के लिए तत्पर रहते. यह बात उर्वशी भी अच्छी तरह जानती थी. रिटायरमैंट के 2 महीने कब बीत गए पता ही नहीं चला. वरुण बारबार फोन कर के उन्हें अपने पास बुला रहा था और रमेशजी इसे टाले जा रहे थे.

‘‘एक बार वरुण और सीता के पास हो कर आ जाते हैं. उसे भी अच्छा लगेगा. कितना कह रहा है.’’

‘‘तुम जानती हो उस के पास जा कर क्या होगा? वह हमें ड्राइंगरूम में सजे शोपीस की तरह एक जगह पर बैठा देगा और कुछ नहीं करने देगा. मैं ऐसी जिंदगी नहीं जीना चाहता.’’

‘‘आजकल के जमाने में ऐसी औलाद कहां मिलती है जो मम्मी और पापा का इतना खयाल रखे.’’

‘‘जानता हूं फिर भी मैं अपने को उस माहौल में ढाल नहीं पाता. मैं ने इतने बरस बड़े बाबू की नौकरी की है. काम में मेरा दिल लगता है. खाली बैठे समय ही नहीं कटता. यह बात उसे कैसे समझाऊं?’’ रमेशजी बोले तो उर्वशी चुप हो गई.

वह जानती थी वरुण उन का बहुत खयाल रखता है. इसी कारण रमेशजी का समय काटे नहीं कटता था.

‘‘तुम उसे समझा दो. हम कुछ समय बाद आएंगे.’’

‘‘ठीक है, कह दूंगी. एक बार उस की इच्छा का भी मान रख लो.’’

रिटायरमैंट के बाद रमेशजी सही माने में जीवन का मजा ले रहे थे. एक शाम वे शहर के मशहूर लच्छू हलवाई से उर्वशी के लिए समोसे ले कर आ रहे थे. तभी वह घट गया जिस की उन्होंने कल्पना तक नहीं थी. एक तेज मोटरसाइकिल सवार ने उन्हें टक्कर मार दी. वे इस टक्कर से दूर गिर पड़े. उन के दिमाग पर चोट आई थी और मोटरसाइकिल का पहिया पैर पर चढ़ गया था.

एक्सीडैंट की बात सुन कर उर्वशी धक रह गई. उस ने तुरंत वरुण और रोमी को खबर की. दूसरे दिन ही वे घर पहुंच गए. रमेशजी को अभी होश नहीं आया था. उर्वशी का रोरो कर बुरा हाल था. तीसरे दिन रमेशजी को होश आया.

‘‘डाक्टर, पापा बोल क्यों नहीं रहे?’’

‘‘सिर पर चोट के कारण इन के दिमाग में खून का थक्का जम गया है. इस के कारण इन्हें पैरालिसिस अटैक पड़ा है. इसी वजह से ये जबान नहीं चला पा रहे हैं.’’

‘‘यह क्या कह रहे हैं डाक्टर?’’

‘‘वही जो मरीज की हालत बता रही है. इन का बायां हाथ और पैर भी काम नहीं कर रहा है और उसी पैर की हड्डियां भी टूट गईं जिस पर प्लास्टर चढ़ाना है.’’

‘‘ऐसा मत कहिए, डाक्टर. इन्हें चलने में कितने दिन लगेंगे?’’ वरुण ने पूछा.

‘‘अभी कुछ कहना मुश्किल है. कुछ दिन इंतजार कीजिए. उस के बाद ही सही स्थिति सामने आ पाएगी.’’

उर्वशी के लिए एकएक पल बिताना मुश्किल हो रहा था. वरुण और रोमी मम्मी को ढाढ़स बंधा रहे थे.

‘‘हिम्मत रखिए मम्मी, पापा ठीक हो जाएंगे.’’

‘‘कभी सोचा नहीं था कि ऐसी नौबत आएगी.’’

‘‘आप ही टूट जाएंगी तो पापा का क्या होगा?’’ रोमी बोली.

उर्वशी कुछ देर के लिए शांत हो गई लेकिन पति की हालत देख कर उसे रोना आ रहा था. एक हफ्ते बाद भी रमेशजी बोलने की स्थिति में नहीं थे. उन का मुंह थोड़ा तिरछा हो गया था और जबान नहीं चल रही थी. डाक्टर ने पैर पर प्लास्टर चढ़ा दिया था.

होश आने पर उर्वशी को देख कर रमेशजी की आंखों में आंसू बहने लगे. उर्वशी ने झट से उन्हें पोंछ दिया.

‘‘मैं आप की आंखों में आंसू नहीं देख सकती. आप जल्दी ठीक हो जाएंगे. हिम्मत रखिए.’’ रमेशजी ने कुछ बोलना चाहा लेकिन जबान ने साथ नहीं दिया. दाएं हाथ के इशारे से उन्होंने कुछ कहा. उर्वशी ने उन का हाथ अपने हाथों में ले लिया और उन्हें हिम्मत बंधाने लगी. 2 हफ्ते हौस्पिटल में रहने के बाद वे घर आ गए थे. वरुण ने उन के लिए नर्स का इंतजाम कर दिया था. डाक्टर ने पहले ही बता दिया कि उन की स्थिति में सुधार बहुत धीरेधीरे होगा. किसी चमत्कार की उम्मीद मत रखिएगा.

डाक्टर की बात सही थी. एक महीने बाद उन की जबान थोड़ीबहुत चलने लगी और वह हकलाते हुए अपनी बात कहने लगे. पापा की हालत में सुधार देख कर वरुण उन्हें अपने साथ ले जाना चाहता था लेकिन उर्वशी ने मना कर दिया.

‘‘तुम चिंता मत करो, बेटा. यहां पर मैं हूं और हमारे बहुत सारे रिश्तेदार भी हैं. सब से बड़ी बात डाक्टर यहीं पर हैं जो उन्हें देख रहे हैं. कोई ऐसी बात होगी तो मैं तुम्हें इत्तिला कर दूंगी. तुम वापस काम पर जाओ. कब तक यहां रहोगे?’’

‘‘आप अकेले इतना सबकुछ कैसे संभालेंगी मम्मी?’’

‘‘तुम मेरी हिम्मत हो, बेटा. मेरी चिंता मत करना मैं उन्हें देख लूंगी,’’ कहते हुए उर्वशी की आंखें भर आई थीं.

वह जानती थी कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी उस ने जीवन में कभी नहीं उठाई. पहली बार किसी तरह हिम्मत जुटा कर उसे करने के लिए तैयार हो गई थी. भारी मन से वरुण काम पर चला गया. रोमी कुछ दिन पहले चली गई थी. अब घर पर रमेशजी और उर्वशी रह गए. डेढ़ महीने बाद पैर से प्लास्टर कट गया था लेकिन वे चलने की स्थिति में नहीं थे. उन के दाहिने हाथों और पैरों ने काम करना बंद कर दिया था.

नर्स उन के सारे काम कर रही थी. रमेशजी उस के साथ अपने को असहज महसूस करते. जीवन में उन्होंने कभी किसी पराई स्त्री को छुआ नहीं था. यह बात उन्होंने उर्वशी को बता दी. उन की भावनाओं का खयाल करते हुए वह नर्स की जगह खुद ही उन के काम करने लगी. शुरू में बड़ी परेशानी हुई लेकिन धीरेधीरे आदत पड़ गई. वह व्हीलचेयर पर बैठा कर उन्हें बाथरूम तक ले जाती. उन्हें नहलाधुला कर बरामदे में बैठा देती. आतेजाते लोगों को देख कर रमेशजी का मन लगा रहता. उन की स्थिति बिलकुल एक छोटे बच्चे की तरह हो गई थी.

दिमाग में चोट आने की वजह से अकसर वे चुप ही रहते. मिलने आने वाले उन्हें अपने तरीके से समझाने की कोशिश करते. यह बात उन्हें बड़ी अखरती थी. वे खुद भी एक पढ़ेलिखे और जिम्मेदार इंसान थे. वे जानते थे कि इस उम्र में उन के लिए ऐसी हालत में क्या उचित है और क्या अनुचित. लेकिन जब शरीर का कोई अंग काम करना बंद कर दे तो वे क्या कर सकते थे. हर एक का नसीहत देना उन्हें चिड़चिड़ा बना रहा था. यह बात उर्वशी भी महसूस कर रही थी लेकिन वह किसी को कुछ कहने से रोक नहीं सकती थी.

एक दिन रमेशजी बोले, ‘‘उर्वशी, लोग मुझ से मिलने क्यों चले आते हैं?’’

‘‘तुम्हारा हालचाल पता करने आते हैं.’’

‘‘मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता. मुझे हुआ क्या है? मैं तुम्हारे अलावा किसी पर बोझ नहीं हूं फिर लोगों को मुझ से इतनी सहानुभूति क्यों है?’’
‘‘सब का बात करने का अपना तरीका होता है. आप उन की बात का बुरा मत माना करो.’’

‘‘एक ही बात सब लोग कहें तो बुरी लगती है. मुझे यह सब पसंद नहीं. तुम उन्हें यहां आने से मना कर दिया करो.’’

‘‘बात समझने की कोशिश कीजिए. हम दुनिया से कट कर नहीं रह सकते,’’ उर्वशी ने अपनी असमर्थता जाहिर की तो रमेशजी को अच्छा नहीं लगा.

ऐसी हालत में उन्हें किसी से सहानुभूति नहीं हिम्मत चाहिए थी.

ऐसी हालत में हरकोई उन्हें सहानुभूति के साथ 2-4 बातें भी सुना रहा था. यह बात वे सहन नहीं कर पा रहे थे. एक झटके में उन के सारे सपने बिखर गए थे. क्या सोचा था और क्या हो गया? ऊपर से दुनियाभर की बातें यह सब उन के लिए असहनीय हो रहा था. उर्वशी भी मजबूर थी. हफ्ते में एक दिन डाक्टर घर आ कर देख जाते. दोपहर में एक नर्सिंग असिस्टैंट आ कर जरूरी काम कर चला जाता. इस के अलावा उन की सारी जरूरतें उर्वशी पूरी कर रही थी.

वह महसूस कर रही थी कि रमेशजी दिनप्रतिदिन चिड़चिड़े होते जा रहे हैं. आज तक उन्होंने किसी से ऊंची आवाज में बात नहीं की थी. अपशब्दों का इस्तेमाल करना तो दूर की बात थी. अब जरा सी भी मन की बात न होती तो वे अपना आपा खो देते और उर्वशी के लिए कुछकुछ बोलने लगते.

एक दिन तो हद ही हो गई. उर्वशी किचन में काम कर रही थी.

रमेशजी ने उन्हें आवाज लगाई. शायद वह सुन न सकी. कुछ देर बाद जब वह उन के पास आई तो उन्होंने सामने मेज पर रखा हुआ खाली गिलास उठा कर उस पर दे मारा. संयोग था कि उर्वशी ने हाथ से गिलास रोक दिया वरना उस से उसे चोट लग सकती थी.

‘‘यह क्या कर रहे हो?’’

‘‘कब से आवाज दे रहा हूं तुझे सुनाई नहीं देता. अब तुम्हारे लिए भी मैं एक बेकार की चीज हो गया?’’

‘‘कैसी बातें करते हो? मैं किचन में खाना बना रही थी. कुकर की सीटी में मुझे आप की आवाज नहीं सुनाई दी.’’

‘‘मैं तुम जैसी औरतों से तंग आ गया हूं. मैं तुम्हारा चेहरा भी नहीं देखना चाहता. तुम मुझे छोड़ कर चली क्यों नहीं जातीं’’

उन की कर्कश बात सुन कर उर्वशी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ. उसे बहुत बुरा लगा फिर भी उन की तबीयत को ध्यान में रख कर उस ने इसे दिमाग से निकाल दिया और उन की खिदमत में लगी रही. उर्वशी का ठंडा व्यवहार रमेशजी को रास नहीं आया. उस दिन से वे हर समय उसे उकसाने की बात करते रहते. उर्वशी भी पता नहीं किस मिट्टी की बनी थी जो उन की बातों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखा रही थी.

एक हफ्ते बाद डाक्टर गुप्ता से उर्वशी ने उन के बदले हुए व्यवहार की चर्चा की. वे बोले, ‘‘जैसा कि इन की रिपोर्ट बता रही है. इन की तबीयत में पहले से कोई गिरावट नहीं आई है.’’

‘‘फिर यह ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं?’’

‘‘यह बात मेरी समझ से परे है. दिमाग की सूजन भी धीरेधीरे कम हो रही है.’’

‘‘पता नहीं यह हर समय गुस्से में क्यों रहते हैं? मुझे अपने नजदीक बिलकुल सह नहीं पाते. ऐसीऐसी बात कहते हैं कि कई बार झेलना मुश्किल हो जाता है. वे मेरे पति हैं इसीलिए मैं उन्हें अनसुना करने की कोशिश करती हूं लेकिन मैं भी इंसान हूं. दिल पर उन की बातों का बहुत समय तक असर रहता है.’’

‘‘आप चिंता मत करें. मैं 2-3 दिनों में किसी मनोचिकित्सक को अपने साथ ले कर आऊंगा. वहीं उन से बातोंबातों में जानने की कोशिश करेंगे आखिर इन्हें हुआ क्या है? घर में कोई ऐसीवैसी बात तो नहीं हुई जिस से उन का अहम आहत हो गया हो?’’

‘‘नहीं डाक्टर, यहां हम दोनों के अलावा कोई है भी नहीं. कभीकभी मिलने के लिए रिश्तेदार आ जाते हैं. इन्हें उन से भी बात करना पसंद नहीं आता.’’

‘‘रमेशजी के साथ जबरदस्ती न किया करें.’’

‘‘मिलने आने वालों को मैं नहीं रोक सकती लेकिन इन से दूर बैठाने की कोशिश जरूर करूंगी. इन के बदले व्यवहार से मैं बहुत आहत हो जाती हूं. प्लीज, कुछ कीजिए.’’

2 दिन बाद डाक्टर गुप्ता अपने साथ मनोचिकित्सक विपिन को ले कर आ गए थे. उन्हें देख कर रमेशजी ने पूछा, ‘‘यह कौन है?’’

‘‘मरीजों को देखने मेरे साथ कभीकभी विपिनजी भी चले आते हैं. मैं उन का दवाई से इलाज करता हूं और यह बातों से. यह भी हमारे इलाज का एक हिस्सा है.’’ यह सुन कर रमेशजी ने उन के लिए हाथ जोड़ दिए.

‘‘आप कैसे हैं?’’

‘‘एक अपाहिज आदमी कैसा हो सकता है?’’

‘‘मानता हूं तकलीफ आप के शरीर पर है. उसे मन पर मत लगने दीजिए. मन स्वस्थ हो तो शरीर भी स्वस्थ होने लगता है.’’

‘‘मेरी हालत अब मेरे जाने के बाद ही सुधरेगी.’’

‘‘आप अपनी सोच बदलने की कोशिश कीजिए रमेशजी.’’

‘‘यह कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल होता है,’’ रमेशजी बोले.

डाक्टर विपिन ने उन्हें अपनी बातों में उलझा दिया था. तभी वहां उर्वशी पानी ले कर आ गई. रमेशजी के चेहरे के भाव देख कर उन्हें समझते देर न लगी कि वे पत्नी को ले कर परेशान हैं.

‘‘लगता है, घर वाले आप पर ध्यान नहीं दे रहे.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है, उर्वशी मेरा जरूरत से ज्यादा खयाल रखती है. यही बात मैं पचा नहीं पा रहा हूं. इस औरत ने जीवनभर मेरे लिए इतना कुछ किया. अब जब मेरे करने का वक्त आया तो मेरी ऐसी हालत हो गई. मुझ से यह सब सहन नहीं होता.’’

‘‘क्या वे आप को ले कर परेशान रहती हैं?’’

‘‘कुदरत का धन्यवाद कि मुझे उर्वशी जैसी पत्नी मिली है. उस ने मेरी हालत को अपना भाग्य समझ कर स्वीकार कर लिया है. जरा सोचिए, पति के रूप में उसे इस ढलती उम्र में क्या मिला? मैं अब उसे जीवन का कोई सुख नहीं दे सकता.’’

‘‘क्या वे आप से कुछ खास अपेक्षा रखती हैं?’’

‘‘वह आज भी मेरे लिए पूरी तरह समर्पित है. यही सोच कर मैं परेशान हूं. मेरे जीवन का अंत हो जाता तो कम से कम उर्वशी को कष्टों से मुक्ति
मिल जाती.’’

‘‘ऐसा नहीं सोचते. कभी उस की नजरों से देखने की कोशिश कीजिए कि उन के लिए आप क्या हैं? उन्होंने आप से दिलोजान से प्रेम किया है. आप का भी फर्ज बनता है उस के प्यार का मान रखें.’’

‘‘प्यार एकतरफा हो तो उस से क्या हासिल हो जाएगा? मैं ने उस के मन में बहुत सारी उम्मीदें जगाई थीं. मुझे क्या पता था मेरी ऐसी हालत हो जाएगी. अब मैं उन्हें पूरा नहीं कर सकता. यह सोच कर मुझे बहुत कष्ट होता है. मैं चाहता हूं कि वह मुझे छोड़ कर चली जाए. तब उस के सारे कष्ट खत्म हो जाएंगे. मेरा क्या है? मैं ऐसी हालत में किसी अस्पताल के कोने में भी पड़ा रह सकता हूं.’’

‘‘यह आप की सोच है उस की नहीं.’’

दरवाजे पर खड़ी उर्वशी सबकुछ सुन रही थी. उस के लिए भी अपने को रोकना मुश्किल हो रहा था. किसी तरह मुंह में रूमाल ठूंस कर उस ने अपनी हिचकियां रोकीं. वह समझ गई रमेशजी उस से क्या चाहते हैं? ऐसी हालत में भी उन्हें अपने से ज्यादा पत्नी की चिंता खाए जा रही थी.

डाक्टर के समझाने का रमेशजी पर अच्छा असर पड़ा था. कुछ देर बाद डा. गुप्ता विपिन को साथ ले कर चले गए.

उन के जाते ही उर्वशी उन के लिए पानी ले कर आ गई. डाक्टर के साथ बात कर के उन का गला सूख गया था. उस ने हौले से पानी का गिलास उठा कर उन के मुंह से लगाया तो रमेशजी अपनेआप को न रोक सके. उन्होंने उर्वशी का हाथ पकड़ लिया और फूटफूट कर रोने लगे. उर्वशी भी उन के गले लग कर रो पड़ी. कुछ देर बाद अपने को संयत कर रमेशजी बोले, ‘‘मुझे माफ कर दो उर्वशी, मैं स्वार्थी हो गया था.’’

‘‘माफी तो मुझे मांगनी चाहिए जो आप की भावनाओं को समझ न सकी.’’

‘‘तुम्हें मेरे कारण इस उम्र में कितनी परेशानियां उठानी पड़ रही हैं.’’

‘‘ऐसा नहीं कहते. तुम्हारे अलावा मैं कुछ और सोच भी नहीं सकती. आइंदा कभी दूर जाने की बात मत कहना,’’ उर्वशी बोली तो रमेशजी ने उस का हाथ कस कर पकड़ लिया और बोले, ‘‘तुम ही मेरी दुनिया हो. मुझ से दूर मत जाना उर्वशी वरना मैं जी नहीं पाऊंगा.’’

उर्वशी ने बड़े प्यार से उन के माथे पर हाथ फेरा. एक बच्चे की तरह रमेशजी ने उस का हाथ पकड़ कर चूम लिया. रमेशजी को लगा जैसे उर्वशी के रूप में उन की दिवंगत मां उसे सहला रही हैं. उम्र के इस पड़ाव पर स्त्री के अनेक रूप में से उन्हें उर्वशी का वात्सल्य रूप स्पष्ट नजर आ रहा था.

Emotional Story : जिंदगी जीने दो – मां के लिए क्या निर्णय लिया अनामिका ने

Emotional Story : अनामिका को पिता ने बेटी नहीं बेटा समझ कर पढ़ायालिखाया. इतना काबिल बनाया कि आज वह पूर्णरूप से आत्मनिर्भर थी. पिता के न रहने पर वह मां का आत्मसम्मान कम नहीं होने देना चाहती थी.
पर कैसे?

‘‘तुम्हारे पापा नहीं रहे, अनामिका’’ उस के फोन उठाते ही मां ने कहा और फफकफफक कर रो पड़ीं.
‘‘क्या कह रही हैं आप? कल ही तो मैं ने उन से बात की थी. अचानक ऐसा क्या हुआ?’’ अनामिका ने खुद को संभालते हुए कहा.
‘‘बेटा, रात में जब वे सोए थे तब तो ठीक थे. सुबह अपने समय पर नहीं उठे तो मैं ने सोचा शायद रात में ठीक से नींद न आई होगी. 7 बजे जब मैं नीबू पानी ले कर उन्हें जगाने गई तो देखा…’’ वाक्य अधूरा छोड़ कर वे फिर फफक पड़ीं.
‘‘मां, संभालो खुद को, मैं आती हूं,’’ कह कर उस ने फोन रख दिया.

उस ने राजीव अंकल, जो उन के पड़ोसी व पापा के अच्छे मित्र थे, को फोन मिलाया. उन्होंने तुरंत फोन उठा लिया. वह कुछ कहने ही वाली थी कि उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, तुम चिंता मत करना, मैं और तुम्हारी आंटी तुम्हारी मां के पास ही हैं.’’
‘‘अंकल, मैं शाम तक ही पहुंच पाऊंगी, चाहती हूं कि पापा का अंतिम संस्कार मेरे सामने हो.’’
‘‘ठीक है बेटा, मैं दिनेश के पार्थिव शरीर को बर्फ की सिल्ली पर रखवा देता हूं.’’
‘‘थैंक यू अंकल.’’

अनामिका फ्लाइट का टिकट बुक करा कर पैकिंग करने लगी. 3 घंटे बाद उस की फ्लाइट थी. बेंगलुरु का ट्रैफिक, 2 घंटे उसे एयरपोर्ट पहुंचने में लगने थे. वह तो गनीमत थी कि बेंगलुरु से लखनऊ के लिए डायरैक्ट फ्लाइट मिल गई थी वरना समय पर पहुंचना मुश्किल हो जाता. टैक्सी में बैठते ही उस ने छुट्टी के लिए मेल कर अपने बचपन के मित्र पल्लव, जो सीतापुर में रहता था, को फोन कर के पिता के बारे में बताया. उस की बात सुन कर वह स्तब्ध रह गया. कुछ देर बाद उस ने कहा, ‘‘मैं तुरंत सीमा के साथ आंटीजी के पास जाता हूं. तुम परेशान न होना, धैर्य रखना.’’ उस से बात कर उस ने अपने टीममेट अभिजीत को फोन कर वस्तुस्थिति से अवगत कराया. उस ने उसे सांत्वना देते हुए कहा कि वह यहां की चिंता न करे, काम का क्या, वह तो चलता ही रहेगा.

‘काम का क्या, वह तो चलता ही रहेगा’ अभिजीत के शब्द उस के कानों में गूंज रहे थे लेकिन इसी काम के लिए वह पिछले 2 वर्षों से घर नहीं जा पाई है. मां बारबार उस से आने के लिए कहतीं पर उस पर काम का प्रैशर बहुत अधिक था या वही अपना सर्वश्रेष्ठ परफौर्मैंस देने के लिए घर जाना टालती रही. माना आईटी क्षेत्र के जौब में पैसा अधिक है पर यह व्यक्ति का खून भी चूस लेता है. न खाने का कोई समय, न घूमने का, ऊपर से सिर पर छंटनी की तलवार अलग लटकी रहती है.

10 वर्ष हो गए उस को यह जौब करते हुए. मम्मीपापा चाहते थे कि वह विवाह कर ले. विभव उसे चाहता है व उस से विवाह भी करना चाहता है लेकिन अपने औफिस में काम करने वाली अपनी सखियों नमिता और सुहाना की स्थिति देख कर उसे विवाह से डर लगने लगा है. परिवार बढ़ाने के लिए उन का नित्य अपने पतियों से झगड़े की बात सुन कर उसे लगने लगा था कि यदि वह अपने काम के साथ घरपरिवार को समय नहीं दे पाई तो उस के साथ भी यही होगा. वह 2 नावों की सवारी एकसाथ नहीं कर सकती. उस के लिए उस का कैरियर मुख्य है. यह सब सोचतेसोचते वह 32 वर्ष की हो गई लेकिन अपनी मनोस्थिति के कारण वह कोई भी फैसला लेने में खुद को असमर्थ पा रही है. अब तो पापा भी नहीं रहे. मां की जिम्मेदारी भी अब उस पर है. क्या विभव उस की मां की जिम्मेदारी लेने को तैयार होगा? वह विचारों के भंवर में डूबी ही थी कि एयरपोर्ट आ गया. उस ने जल्दी से टैक्सी का पैसा चुकाया और एयरपोर्ट के अंदर गई. बोर्डिंग पास ले कर, सिक्योरिटी चैक के बाद वह वेटिंग लाउंज में जा कर बैठी ही थी कि विभव का फोन आ गया.

‘‘तुम ने बताया नहीं कि अंकल नहीं रहे,’’ विभव ने कहा.
वह समझ नहीं पा रही थी कि उस के प्रश्न का क्या उत्तर दे, तभी उस ने फिर कहा, ‘‘तुम कुछ कह क्यों नहीं रही हो, तुम ठीक तो हो न? बुरा न मानना यार, मुझे अभी पल्लव से पता चला तो मुझे लगा कि तुम ने उसे तो बता दिया पर मुझे नहीं.’’

‘‘विभव, मैं अभी बात करने के मूड में नहीं हूं. वैसे भी, बोर्डिंग शुरू हो गई है,’’ कहते हुए अनामिका ने फोन काट दिया. विभव की यही बात उसे अच्छी नहीं लगती थी. हमेशा शिकायतें ही शिकायतें और समय तो ठीक है पर आज ऐसे समय में भी वह यह नहीं सोच पा रहा है कि मैं कितनी परेशान हूं. सांत्वना के दो शब्द कहने के बजाय आज भी सिर्फ शिकायत.

जिस्म एयरपोर्ट पर था लेकिन मन घर पहुंच गया था. पापा के पार्थिव शरीर को पकड़ कर मां के फफकफफक कर रोने की छवि आंखों के सामने आते ही उस की आंखों से आंसू निकल पड़े. उसे सदा से ही आंसू कमजोरी की निशानी लगते थे किंतु आज उस ने उन्हें बहने दिया.

आज उसे लग रहा था कि ये आंसू ही तो हैं जो इंसान के दर्द को कम करने में सहायक होते हैं. मां अब पापा के बिना कैसे अकेली रहेंगी? वे तो दो जिस्म एक जान रहे हैं. कभी काम से पापा के बाहर जाने की बात यदि छोड़ दें तो मम्मीपापा कभी अलग नहीं रहे. बोर्डिंग का एनाउंसमैंट होते ही उस ने बरसती आंखों को पोंछा व सब से पहले बोर्डिंग गेट पर जा कर खड़ी हो गई. मानो उस के बैठते ही प्लेन चल पड़ेगा. सच, कभीकभी मन तो तुरंत पहुंचना चाहता है और शायद पहुंच भी जाता है पर तन को बहुत सारे बंधनों व नियमों को मानना ही पड़ता है, बहुत सारी बाधाओं को झेलना पड़ता है.

आखिर प्लेन ने उड़ान भर ही ली. उस ने आंखें बंद कर लीं. बंद आंखों में अतीत के पल चलचित्र की तरह मंडराने लगे. उसे वह दिन याद आया जब उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ शहर में उस का दाखिला होने के बाद पापा उसे होस्टल छोड़ने गए थे.

पापा के जाने के बाद उस की आंखें बरसने को आतुर थीं लेकिन आंसुओं को आंखों में ही रोक कर वह अपने कमरे में आ कर निशब्द एक ही जगह बैठी रह गई थी. मन में द्वंद्व चल रहा था. आखिर वह दुखी क्यों है? उस की ही इच्छा तो उस के पापा ने उस की मां के विरुद्ध जा कर पूरी की है. उस के मन के प्रश्न का उस के पास कोई उत्तर ही न था. वह एक छोटे कसबे से आई थी. जहां यहां आने से पहले वह खुश थी वहीं अब यहां आ कर न जाने क्यों मन में द्वंद्व था, चिंताएं थीं, आशंका थी कि क्या वह इस बड़े शहर में खुद को एडजस्ट भी कर पाएगी.

पापा की कपड़े की दुकान थी. वे खुद तो अधिक पढ़ेलिखे नहीं थे लेकिन मनमस्तिष्क से आधुनिक विचारधारा के पोषक थे. वे चाहते थे उन की बेटी इतनी सक्षम बने कि अगर कभी जीवन में कोई कठिनाई आए तो वह उस का सामना कर सके पर उस की मां उस के दूर जाने की आशंका मात्र से ही परेशान थीं. उन्हें लगता था कि उन की भोलीभाली बेटी शहर में अकेली कैसे रह पाएगी.

मां की आशंका गलत भी नहीं थी. पापा के विपरीत उन्होंने शुरू से ही दुनिया की कुत्सित नजरों से बचाने के लिए उसे इतने बंधनों में रखा था कि वह किसी से भी बात करने या अकेले कहीं भी जाने में डरने लगी थी. स्कूल भेजना तो मां की मजबूरी थी. घर से स्कूल, स्कूल से घर ही उस की दुनिया थी. मां का अनुशासन या कहें रोकटोक उसे कोई स्वप्न देखने का अधिकार ही नहीं देती थी.

एक बार वह बूआ के घर गई. सीमा दीदी, बूआ की बेटी, जो उस समय डाक्टरी की पढ़ाई कर रही थी, को देख कर उस के नन्हे मन में भी एक नन्हा सपना तिर आया था. उस ने सुना था कि डाक्टर बनने के लिए बहुत अच्छे नंबर आने चाहिए. उस ने मन लगा कर पढ़ना शुरू कर दिया था.

मैट्रिक में उस के 95 प्रतिशत अंक आए तो उस की बूआ ने पापा से उस का शहर के अच्छे कालेज में दाखिला करवाने के लिए कहा. पापा को भी अपनी बहन की बात अच्छी लगी. सो, पापा ने इस शहर के अच्छे कालेज में दाखिला करवा कर, स्कूल के पास स्थित महिला होस्टल में उस के रहने की व्यवस्था कर दी है. पापा के जाते समय वह फूटफूट कर रोने लगी थी.

‘बेटा, रो मत. तेरे भविष्य के लिए ही तुझे यहां छोड़ रहे हैं. बस, अपना खयाल रखना. तुझे तो पता है तेरी मां तुझे ले कर कितनी पजेसिव है,’ कहते हुए पापा ने उस के सिर पर हाथ फेरा था व बिना उस की ओर देखे चले गए.

अपने आंसुओं को रोक कर वह अपने कमरे में आ गई पर उसे बारबार ऐसा लग रहा था कि उसे छोड़ कर जाते हुए पापा की आंखों में भी आंसू थे जिस की वजह से उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. यह विचार आते ही वह और उदास हो गई.
‘मैं अंजलि, और तुम?’ अंजलि ने कमरे में प्रवेश करते ही कहा.
‘मैं अनामिका,’ अपने विचारों के कवच से बाहर निकलते हुए उस ने कहा.
‘बहुत प्यारा नाम है, क्या करने आई हो?’
‘मैं ने यहां जयपुरिया कालेज में 11वीं में एडमिशन लिया है.’
‘जयपुरिया, उस में तो मैं भी पढ़ रही हूं.’
‘क्या 11वीं में?’
‘नहीं, 12वीं में.’
‘ओह,’ कहते हुए अनामिका के चेहरे पर उदासी झलक आई.
‘क्यों, क्या हुआ? अरे क्लास एक नहीं है तो क्या हुआ, हमारा आनाजाना तो साथ होगा,’ अंजलि ने उस के चेहरे की उदासी देख कर कहा.
‘वह बात नहीं, मम्मीपापा की याद आ गई,’ अनामिका ने रोंआसी आवाज में कहा.

‘मैं तुम्हारा दर्द समझ सकती हूं. जब भी कोई पहली बार घर छोड़ता है, उस की मनोदशा तुम्हारी तरह ही होती है पर धीरेधीरे सब ठीक हो जाता है. आखिर, हम अपना कैरियर बनाने के लिए यहां आए हैं. अच्छा, बेसन के लड्डू खाओ. मैं भी कल ही आई हूं, मां ने साथ में रख दिए थे,’ अंजलि ने अनामिका का मूड ठीक करने का प्रयास करते हुए कहा.
‘बहुत अच्छे बने हैं,’ अनामिका ने लड्डू खाते हुए कहा.
‘अच्छे तो होंगे ही, इन में मां का प्यार जो मिला है. अच्छा, अब मैं चलती हूं. थोड़ा फ्रैश हो लूं. अपने कमरे में जा रही थी, यह कमरा खुला देख कर तुम्हारी ओर नजर गई तो सोचा मिल लूं अपनी नई आई सखी से. मेरा कमरा तुम्हारे कमरे के बगल वाला है रूम नंबर 205. रात में 8 बजे खाने का समय है, तैयार रहना और हां, अपना यह बिखरा सामान आज ही समेट लेना, कल से तो कालेज जाना है,’ अंजलि ने कहा.

अंजलि के जाते ही अनामिका अपना सामान अलमारी में लगाने लगी कि तभी मोबाइल की घंटी बज उठी. फोन मां का था.
‘बेटा, तू ठीक है न? सच तेरे बिना यहां हमें अच्छा नहीं लग रहा है. बहुत याद आ रही है तेरी.’
‘मां, मुझे भी,’ कह कर वह रोने लगी.
‘तू लौट आ,’ मां ने रोते हुए कहा.
‘अनामिका, क्या हुआ? अगर तू ऐसे कमजोर पड़ेगी तो पढ़ेगी कैसे? बेटा, रोते नहीं हैं. तेरी मां तो ऐसे ही कह रही है. अगर तुझे नहीं पढ़ना तो आ जा, मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं लेकिन कोई भी फैसला लेने से पहले यह मत भूलना कि पढ़ाई के बिना जीवन बेकार है. चाहे लड़का हो या लड़की, जीवन के रणसंग्राम में खुद को स्थापित करने के लिए शिक्षा बेहद आवश्यक है. क्षणिक निर्णय सदा आत्मघाती होते हैं बेटा. सो, जो भी निर्णय लेना सोचसमझ कर लेना क्योंकि इंसान का सिर्फ एक निर्णय उस के जीवन को बना भी सकता है और बिगाड़ भी,’ पापा ने मां के हाथ से फोन ले कर कहा.

‘अरे, तुम अभी बात ही कर रही हो, खाना खाने नहीं चलना,’ अंजलि ने कमरे में आ कर कहा.
‘पापा, मैं खाना खाने जा रही हूं, आ कर बात करती हूं.’

वह अंजलि के साथ मेस में गई. वहां उस की तरह ही लगभग 15 लड़कियां थीं. सभी ने उस का बेहद अपनेपन से स्वागत किया. सब से परिचय करते हुए उस ने खाना खाया. रेखा और बबीता नौकरी कर रही थीं जबकि अन्य लड़कियां पढ़ रही हैं. खाना घर जैसा तो नहीं लेकिन ठीकठाक लगा.

खाना खा कर जब वह अपने कमरे में जाने लगी तो उस के साथ चलती रेखा ने उस के पास आ कर कहा, ‘अनामिका, तुम नईनई आई हो, इसलिए कह रही हूं, हम सब यहां एक परिवार की तरह रहते हैं. तुम खुद को अकेला मत समझना. कभी मन घबराए या अकेलापन महसूस हो तो मेरे पास आ जाना. मेरे कमरे का नंबर 208 है.’

रेखा की बात सुन कर एकाएक उसे लगा कि जब ये लोग रह सकती हैं तो वह क्यों नहीं. मन में चलता द्वंद्व ठहर गया था. अंजलि ने बताया था कि सुबह 8 बजे नाश्ते का समय है. अपने कमरे में आ कर अब वह काफी व्यवस्थित हो गई थी. मां का फोन आते ही उस ने सारी घटनाओं के बारे में बताते हुए कहा, ‘मां, चिंता मत करो, मैं ठीक हूं, यहां सब लोग अच्छे हैं.’

‘ठीक है बेटा, ध्यान से रहना. आज के जमाने में किसी पर भरोसा करना ठीक नहीं है. कल तेरा स्कूल का पहला दिन है, अपना खयाल रखना. स्कूल से सीधे होस्टल आना और मुझे फोन करना.’
‘जी मां.’

ढेरों ताकीदें दे कर मां ने फोन रख दिया था. मां उस के लिए चिंतित जरूर रहती थीं लेकिन उन्होंने उसे कभी किसी ढोंग या ढकोसले, रूढि़यों, बेडि़यों व परंपराओं में नहीं बांधा था.

समय पंख लगा कर उड़ता गया, पता ही नहीं चला. हायर सैकंडरी के साथ उस ने इंजीनियरिंग की कोचिंग शुरू कर दी. उस की खुशी की सीमा न रही जब वह जेईई मेंस में क्लियर हो गई. आईआईटी में दाखिले के लिए उसे जेईई एडवांस की परीक्षा देनी थी. उस की मेहनत का परिणाम था कि वह प्रथम बार में ही इस में भी सफल हो गई.

आखिरकार, उसे आईआईटी कानपुर में दाखिला मिल गया. मम्मीपापा की खुशी का ठिकाना न था. उन के परिवार में वह लड़के, लड़कियों में पहली थी जो इंजीनियरिंग पढ़ेगी. उस के बाद उस ने मुड़ कर नहीं देखा. मां कभी विवाह के लिए कहतीं तो वह कह देती ‘मुझे समय नहीं है’ या ‘जौब के साथ घरपरिवार’ मुझ से न हो पाएगा. वैसे भी, उसे कभी लगा ही नहीं कि उसे विवाह करना चाहिए. पिछले 10 वर्षों में वह कई लोगों के संपर्क में आई. कुछ लोगों ने उस से विवाह की इच्छा जताई पर वह आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि कुछ ही दिनों में उस पर उन की पुरुषवादी मानसिकता प्रभावी होने लगती और उसे अपने आगे बढ़े कदमों को पीछे खींचना पड़ता. इस के साथ ही उसे यह भी लगता कि वह अपने मातापिता की अकेली लड़की है, अगर कभी उन्हें उस की आवश्यकता पड़ी तो क्या उस से विवाह करने वाला पुरुष उस की भावनाओं को समझेगा.

जब वह छोटी थी तो अकसर मम्मीपापा के हितैषी उन से परिवार के वारिस की बात करते तो पापा कहते कि मेरी अनामिका मेरे लिए पुत्र और पुत्री दोनों है. आजकल न पुत्र पास में रहता है और न पुत्री. फिर किसी से आस क्यों? माना मम्मीपापा उस से आस नहीं करते हैं और न ही कभी करेंगे लेकिन उम्र की भी तो अपनी बंदिशें होती हैं.

‘‘अब हम लखनऊ के चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट पर उतर रहे हैं’’ की आवाज ने उसे अतीत से वर्तमान में ला दिया. प्लेन की खिड़की से उसे नजर आते छोटेछोटे घरों, पेड़पौधों तथा पतली धार में दिखती गोमती नदी को देखना बहुत अच्छा लगता था पर आज उस को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था. प्लेन के लैंड करते ही उस ने मोबाइल औन कर मां को फोन मिलाया. फोन चाचाजी ने उठाया. उस की बात सुन कर उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, सब तेरा ही इंतजार कर रहे हैं.’’

उस ने प्लेन में बैठेबैठे ही कैब बुक करवा दी जिस से बाहर निकलते ही वह चल सके. जैसे ही वह एयरपोर्ट से बाहर निकली, कैब मिल गई और वह तुरंत चल पड़ी. वह कुछ तो मिस कर रही थी, शायद पापा को. दरअसल जब भी वह घर आती थी, पापा का न जाने कितनी बार फोन आ जाता था, ‘बेटा, तू कहां तक पहुंची है, अभी आने में कितना समय और लगेगा.’

जब वह घर पहुंचती, मम्मीपापा गेट के पास खड़े उस का इंतजार करते मिलते. उस के पहुंचते ही गरमागरम जलेबियां और खस्ता कचौरियां मिल जाती थीं क्योंकि उसे जलेबियां बहुत पसंद थीं. आज इस समय वह सब से अधिक पापा के फोन को मिस कर रही थी.

लगभग डेढ़ घंटे में वह सीतापुर अपने घर पहुंची. सभी उस का इंतजार कर रहे थे. पल्लव और सीमा भी वहां उपस्थित थे. अंतिम क्रिया की सारी तैयारियां हो चुकी थीं. उस के घर पहुंचते ही परिवार के सदस्यों ने पिताजी के पार्थिव शरीर को श्मशान घाट ले जाने की तैयारी शुरू कर दी. उन को उठाने को चार लोग बढ़े तो उस ने कहा, ‘‘पिताजी को कंधा मैं भी दूंगी.’’

‘‘यह कैसी बात कर रही है बिटिया? हमारे घर की लड़कियां शवयात्रा में सम्मिलित नहीं होतीं. तेरा भाई अमित है न, वह बेटे की जिम्मेदारी निभाएगा,’’ उस के चाचा अविनाश ने उसे रोकते हुए कहा.
‘‘बेटा, तेरे चाचा ठीक कह रहे हैं. अमित और रोमेश तो हैं ही,’’ उस के मामा जितेंद्र ने कहा. उन के पीछे खड़ा उन का पुत्र रोमेश भी उन का समर्थन करता प्रतीत हो रहा था.
‘‘चाचाजी, प्लीज मुझे पापा के प्रति अपना कर्तव्य निभाने दीजिए,’’ उस ने मामा की बात को अनसुना करते हुए चाचाजी से कहा.
‘‘बेटा, लेकिन…’’
‘‘राकेशजी, प्लीज, अनामिका ठीक कह रही है. दिनेशजी के लिए वह बेटी नहीं, बेटा ही थी. उन्होंने इसे उसी तरह काबिल और आत्मनिर्भर बनाया जैसा वे अपने बेटे को बनाते. इसे अपने पिता के प्रति कर्तव्य निभाने दीजिए.’’ राजीव अंकल का सहयोग मिलते ही उपस्थित सभी लोगों के सुर धीमे पड़ गए. उस ने शुरू से अंत तक सारे कर्तव्य निभाए. उस का बचपन का मित्र पल्लव और उस की पत्नी सीमा भी लगातार उसे सहयोग देते रहे. चाचाजी को उस की छोटी जाति के कारण उस का आना बिलकुल पसंद नहीं था लेकिन वे चुप ही रहे क्योंकि वे जानते थे कि उन के कहने का अनामिका पर कोई असर नहीं होगा. भाभी को तो होश ही नहीं है.

मां की स्थिति देख कर अनामिका सोच रही थी कि सच एक स्त्री का सारा मानसम्मान, साजशृंगार पति ही होता है. पति के बिना उस की जिंदगी अधूरी है. पापा थे भी ऐसे, उन्होंने सदा अपनी पत्नी के मानसम्मान को सर्वोपरि रखा था. उस ने कभी उन दोनों को झगड़ते नहीं देखा, न ही अपनी इच्छा को दूसरे पर थोपते देखा था. उस की नजरों में वे आदर्श पतिपत्नी थे.

मां की हालत देख कर उस ने छुट्टी बढ़ा ली. साथ ही, उसे वर्क फ्रौम होम की इजाजत मिल गई थी. लेकिन ऐसा कब तक चलेगा, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? नौकरी उस का पैशन है जबकि मां जिम्मेदारी. एक दिन उसे लैपटौप पर काम करते देख कर उस की मां ने कहा, ‘‘बेटा, तेरे काम में हर्जा हो रहा होगा. अब तू अपने काम पर लौट जा, मेरी चिंता मत कर. मैं अब ठीक हूं.’’
‘‘नहीं मां, आप की खुशी से ज्यादा मेरा काम नहीं है. मैं आप के लिए अपना जौब छोड़ सकती हूं पर आप को अकेले छोड़ कर नहीं जा सकती.’’
‘‘बेटा, मैं इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती हूं कि अपनी खुशी के लिए तेरी खुशियां छीन लूं. माना तेरे पापा के जाने के कारण मैं दुखी हूं लेकिन अब मुझे उन के बिना जीने की आदत डालनी ही होगी. बेटा, हम सब इस दुनिया में अपनेअपने किरदार निभा रहे हैं. जब किसी किरदार का रोल खत्म हो जाता है तो उसे जाना ही पड़ता है. बेटा, तेरे पिता का इस संसार में किरदार खत्म हो गया था, इसलिए उन्हें जाना पड़ा. अब मुझे अपना और तुझे अपना किरदार निभाना है,’’ मां ने उस की ओर देखते हुए कहा.
‘‘किरदार, आप क्या कह रही हैं मां? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है?’’ अनामिका ने कहा.
‘‘बेटा, अब हमें अपनेअपने किरदार अर्थात अपने कर्तव्य निभाने होंगे. मुझे तेरे पापा की दुकान को संभालना होगा और तुझे अपना काम फिर जौइन करना होगा जिस के लिए तू ने इतनी मेहनत की है.’’
‘‘मां, दुकान आप संभालोगी?’’ अनामिका ने आश्चर्य से पूछा.
‘‘क्यों, क्या हुआ? जब तुम बाहर जा कर काम कर सकती हो तो मैं क्यों नहीं? वैसे भी, तुम्हारे पापा मुझे से दुकान की हर बात शेयर करते रहे हैं. मुझे विश्वास है मैं सब संभाल लूंगी. वैसे, भोला तो है ही, तुम्हारे पापा के कहीं जाने पर वही दुकान संभालता था. तेरे पापा को उस पर बहुत विश्वास था. कल जब तू सो रही थी तब वह आया था. वह कह रहा था कि मालकिन, जो होना था वह तो हो गया पर आप इस दुकान को बंद मत कीजिएगा. सदा मालिक का नमक खाया है. छोटा मुंह बड़ी बात मालकिन, मैं झुठ नहीं बोलूंगा. आप तो जानती ही हैं मालकिन कि इस दुकान में मालिक की यादें हैं.

‘‘बेटा, मुझे उस की बात ठीक लगी. वह छोटा था, तभी तेरे पापा उसे गांव से ले कर आए थे. उस का विवाह भी हम ने ही करवाया था. अब इस उम्र में वह बालबच्चों को ले कर कहां जाएगा. तेरे पापा द्वारा छोड़ी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना अब मेरा कर्तव्य ही नहीं, दायित्व भी है,’’ कहते हुए मां की आंखें भर आई थीं.
‘‘आप का सोचना ठीक है मां, पर मां, आप अकेली कैसे रहोगी?’’ अनामिका की आंखों में चिंता झलक रही थी.
‘‘मैं अकेली कहां हूं बेटा, मेरे साथ तेरे पापा की यादें हैं, अड़ोसीपड़ोसी हैं, भोला है. फिर, जब चाहूं, तुम से बात कर सकती हूं. इस मोबाइल की वजह से दुनिया बहुत छोटी हो गई है. बस, एक रिक्वैस्ट है, तू अब विवाह कर ले. देख, कोई बहाना मत करना. मातापिता के जीवन की यही सब से बड़ी खुशी है कि उन की संतान अपने घरपरिवार में खुश रहे,’’ मां ने चेहरे पर मुसकान लाते हुए, उसे समझते हुए कहा.
‘‘मां, विवाह करना आसान नहीं है. लेकिन आप को विश्वास दिलाती हूं कि जब भी मुझे समझने वाला लड़का मिल जाएगा, उसे आप से जरूर मिलवाऊंगी.’’
‘‘ठीक है बेटा, मेरी चिंता छोड़ कर अब तू अपने काम पर जा. तेरी खुशी ही मेरी खुशी है.’’

आखिर मां की जिद के आगे अनामिका को हथियार डालने ही पड़े. वह बेंगलुरु लौटते हुए सोच रही थी कि उस की मां समय के साथ चलने का जज्बा ही नहीं रखतीं, बहादुर भी हैं.
अभी उसे बेंगलुरु आए हुए महीनाभर ही हुआ था कि भोला का फोन आया.
‘‘दीदी, अब हम क्या कहें, कहने में अच्छा तो नहीं लग रहा है लेकिन अगर हम नहीं कहेंगे तो हम मालिक के प्रति अपना फर्ज नहीं निभा पाएंगे.’’
‘‘क्या हुआ भोला, खुल कर कहो?’’
‘‘दीदी, आप के आने के बाद रोमेश भैया दुकान पर आ कर बैठने लगे हैं. कभीकभी मामाजी भी आ जाते हैं. हिसाबकिताब के 2 रजिस्टर बना लिए हैं. मालिक का तो एक ही रजिस्टर था. हमें उन की नीयत ठीक नहीं लग रही है.’’
‘‘क्या, और मां?’’
‘‘रोमेश भैया के यहां आने के बाद उन्होंने दुकान पर आना बंद कर दिया है.’’
‘‘वे रहते कहां हैं?’’
‘‘मालकिन के घर में ही सब आ गए हैं.’’
‘‘अच्छा किया जो तुम ने हमें बता दिया. हम देखते हैं.’’
‘‘दीदी, मालकिन को न बताइएगा कि हम ने आप को बताया है वरना अगर मामाजी को पता चल गया तो वे हमें नौकरी से निकाल देंगे.’’
‘‘हम किसी को कुछ नहीं बताएंगे, तुम निश्चिंत रहो.’’

रोमेश दुकान पर बैठने लगा है, सुन कर वह अचंभित थी. मामाजी अपने कार्य के प्रति कभी समर्पित नहीं रहे. पिता से विरासत में मिले व्यवसाय को उन्होंने सुरासुंदरी में गंवा दिया. मामीजी ने उन्हें उन के दुर्व्यसन से मुक्ति दिलवाने की बहुत कोशिश की लेकिन वे उन की हर कोशिश को अपने शक्ति बल से नाकाम कर देते थे. मामी यह सब सह नहीं पाईं. आखिरकार, एक दिन उन्होंने मौत को गले लगा लिया. मामाजी तब भी नहीं सुधरे. मां ने उन्हें समझने की कोशिश की तो वे उन के साथ भी अभद्र व्यवहार करने लगे. पापा ने उन से दूरी बना ली थी. उन के स्वभाव के कारण मां भी उन से कतराने लगीं. मां को दुख था कि

10 वर्षीय रोमेश उचित देखभाल न होने के कारण आवारा लड़कों की संगत में पड़ कर बिगड़ता जा रहा है.

उसे कुछ समझ नहीं आया तो उस ने मां को फोन मिलाया. फोन उठाते ही मां ने कहा, ‘‘बेटा, तुम मेरी चिंता न किया करो. तेरे मामाजी और रोमेश मेरे पास आ गए हैं. रोमेश ने सब संभाल लिया है.’’
‘‘लेकिन मां…’’
‘‘वे सब भूलीबिसरी बातें हैं. मैं भूल चुकी हूं, तू भी भूल जा. वे दोनों मेरा बहुत खयाल रखते हैं.’’

मां की बात सुन कर वह क्या कहती. उस ने फोन रख दिया. मां की बातों से उसे लगा, भोला सच कह रहा है. मामाजी ने मां को अपने मोहजाल में फंसा लिया है. फोन से उन्हें सम?ाना संभव नहीं है, क्योंकि यह बात इस समय वे समझ ही नहीं पाएंगी. अब उसे ही उन के इस तिलिस्म को तोड़ना पड़ेगा.

उस ने छुट्टी के लिए अप्लाई कर, टिकट बुक करवाया. जैसे भी वह लखनऊ पहुंची, अपने मित्र पल्लव को सारी बातें बताते हुए, उस से दुकान पहुंचने का आग्रह किया. दरअसल, वस्तुस्थिति का पता लगाने के लिए उस ने घर न जा कर, सीधे दुकान जाना उचित समझा तब तक पल्लव भी वहां पहुंच चुका था.

दुकान में प्रवेश करते ही उस ने देखा कि रोमेश दुकान में अपने मित्र के साथ शराब पीते हुए ताश खेल रहा है. दुकान के अन्य कर्मचारी उन की खातिरदारी में लगे हैं. बस, भोला ही कस्टमर को अटैंड कर रहा है. उसे देख कर एक खरीदार ने कहा, ‘‘हम तो वर्षों से यहीं से खरीदते आ रहे हैं. अब न वैसा सामान है न वैसा माहौल. अब कोई दूसरी दुकान ढूंढ़नी पड़ेगी.’’
‘‘चलो जी, शराब की महक के कारण यहां बैठना भी मुश्किल हो रहा है,’’ उसी समय खरीदारी करने आई महिला ने उठते हुए अपने पति से कहा.
भोला उसे देख कर चौंक गया जबकि अपने खेल में मस्त रोमेश को उस के आने का पता ही नहीं चला.
‘‘भोला, यहां क्या हो रहा है. तुम तो पुराने कर्मचारी हो, तुम ने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?’’

उस की कड़क आवाज सुन कर रोमेश उठ खड़ा हुआ, बोला,
‘‘दीदी, आप अचानक, यहां कैसे?’’
‘‘मैं अचानक यहां आई, तभी तो तुम्हारी करतूतों का पता चला. अभी यहां से 2 ग्राहक असंतुष्ट हो कर गए हैं. तुम तो अपनी हरकतों से पापा का नाम डुबोने में लगे हो.’’
‘‘सौरी दीदी, अब ऐसा नहीं होगा.’’
‘‘तुम ठीक कह रहे हो, अब ऐसा नहीं होगा. चाबी मुझे दो और निकल जाओ दुकान से और तुम लोग ग्राहकों की सेवा के लिए नियुक्त किए गए हो न कि इन की सेवा के लिए. अब से भोला इस दुकान को संभालेगा तथा तुम सब को उस की बात माननी होगी,’’ अनामिका ने कड़क आवाज में रोमेश की ओर देखते हुए अन्य कर्मचारियों से कहा.

रोमेश उसे चाबी दे कर चला गया. अनामिका ने चाबी पल्लव को पकड़ाई तो वह झिझका लेकिन जब अनामिका ने कहा कि पापा के बाद इस शहर में वह सिर्फ उस पर ही भरोसा कर सकती है, तब उस ने चाबी ले ली. इस के बाद उस ने कहा, ‘‘भोला, तुम इन का मोबाइल नंबर नोट कर लो. अगर तुम्हें कोई परेशानी हो तो इन्हें फोन कर लेना. दुकान की एक चाबी तुम रखो तथा एक इन के पास रहेगी.’’

वह पल्लव से फिर मिलने की बात कह कर अपने घर पहुंची. उसे देख कर मां चौंकीं, बोलीं, ‘‘बेटी, तू अचानक, सब ठीक तो है न.’’
‘‘सब ठीक है. मामा, आप यहां कैसे?’’ उस ने चौंकते हुए कहा.
‘‘बेटी, तेरे भाई रोमेश ने दुकान का काम अच्छे से संभाल लिया है. तेरे मामा उसे गाइड करते रहते हैं.’’
‘‘मां, तुम्हें मामा और रोमेश के बारे में सब पता है, फिर भी…’’
‘‘अब वे बहुत बदल गए है,’’ मां ने अपने भाई की ओर देखते हुए कहा.
‘‘मां, कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती,’’ कहते हुए उस ने मामा की ओर देखते हुए दुकान पर घटित सारी घटना उन्हें बताई तथा यह भी कि दुकान के इस माहौल के कारण ग्राहक भी असंतुष्ट हैं.

मामा जब तक कुछ कहते, रोमेश आ गया. रोमेश की हालत देख कर मामा कुछ कह नहीं पाए.
‘‘मामा, आप मां के भाई हैं. मेरा आप को कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है लेकिन क्या आप चाहते हैं कि मां भी आप की तरह बरबाद हो जाए. मेरी आप से विनती है कि आप मां को सम्मान से जीने दीजिए. उन से उन के अधिकार मत छीनिए,’’ कह कर वह अपने कमरे में चली गई.

वह अपने कमरे से बाहर तभी आई जब उसे महसूस हुआ कि मामा चले गए हैं. मां को उदास बैठा देख कर उस ने कहा, ‘‘मां, तुम मुझ से नाराज होंगी लेकिन मैं क्या करती? भोला ने मुझे फोन कर के बताया. वह बेहद चिंतित था. मैं सीधे घर न आ कर पहले दुकान इसीलिए गई थी जिस से कि वास्तविक स्थिति का पता लगा सकूं. जैसा कि मैं ने आप को बताया, स्थिति सचमुच भयावह थी. अगर कुछ दिन और ऐसा चलता तो दुकान ही बंद करवानी पड़ जाती. तुम भोला पर विश्वास कर सकती हो तो ठीक है, वरना हम दुकान को बेच देते हैं. तुम मेरे साथ में रहो.’’
‘‘नहीं बेटी, मैं तेरे पापा की अमानत को अपने जीतेजी नहीं बेचने दूंगी. तेरे मामा पर विश्वास कर मैं ने गलत किया. अब मैं खुद दुकान पर बैठूंगी.’’
‘‘ठीक है मां, जैसी तुम्हारी इच्छा. दुकान की एक चाबी तो भोला के पास है, दूसरी चाबी मैं ने पल्लव को दे दी है. मैं तो हूं ही, फिर भी अगर कभी कोई समस्या हो तो पल्लव या सीमा से बात कर लेना. बहुत ही भले हैं दोनों. तुम उन पर विश्वास कर सकती हो,’’ मन की कशमकश को विराम देते हुए अनामिका ने उन की गोद में लेटते हुए कहा.

वे उस का सिर सहलाते हुए सोच रही थीं कि अनामिका के बाहर जाते ही दिनेशजी ने कहा था, सावित्री हर इंसान को समर्थ होना चाहिए जिस से वक्तजरूरत पर उसे किसी के सहारे की आवश्यकता न पड़े. अब वह किसी पर अंधविश्वास नहीं करेगी. वह खुद अपनी जिम्मेदारी उठाएगी. अपनी बेटी को व्यर्थ परेशान न करो, उसे अपनी जिंदगी जीने दो.

Romantic Story : मरीचिका – मधु के साथ उस रात आखिर क्या हुआ

Romantic Story : मधु अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में किसी अपराधी की तरह सिर झुकाए बुत बनी बैठी थी. पता ही नहीं चला कि वह कितनी देर से ऐसे ही बैठी थी. एकएक पल कईकई साल की तरह बीत रहा था. उसे रहरह कर पिछले कुछ महीनों की उथलपुथल भरी घटनाएं भुलाए नहीं भूल रही थीं.

मधु की नौकरी जब शहर की एक बड़ी कंपनी में लगी थी, तो घर में खुशी का माहौल था. लेकिन साथ ही मम्मीपापा को यह चिंता भी थी कि अपने शहर से दूर उस अनजान बड़े शहर में बेटी को कैसे भेजें? आखिर वह वहां कैसे रहेगी?

फिर उस ने ही मम्मीपापा का हौसला बढ़ाया था और कहा था कि शहर भेज रहे हैं या जंगल में? लाखों लोगों में आप की बेटी अकेले कैसे रहेगी? उस जैसी और भी बेटियां वहां होंगी या नहीं?

जब वे लोग शहर पहुंचे, तो मम्मीपापा उसे नौकरी जौइन करा कर और उस की ही जैसी 3 और लड़कियों के गु्रप में छोड़ कर घर लौट आए. थोड़े ही दिनों के बाद उन में से 2 लड़कियों के रहने का इंतजाम उन के साथियों ने कर दिया.

मधु और एक दूसरी लड़की, जिस का नाम प्रीति था, भी इसी कोशिश में लगी थीं कि रहने का कुछ ठीक से इंतजाम हो जाए, तो जिंदगी ढर्रे पर आ जाए.

एक दिन मधु और प्रीति कंपनी में कैंटीन से लौट रही थीं, तो स्मोकिंग जोन से एक लड़की ने मधु का नाम ले कर आवाज लगाई. वह ठिठक गई कि यहां कौन है, जो उसे नाम ले कर आवाज लगा रहा है?

मधु ने उधर देखा तो एक स्मार्ट सी दिखने वाली लड़की, जिस के हाथ में सिगरेट थी, उसे बुला रही थी. वे दोनों बिना कुछ सोचे उस के पास चली गईं.

‘‘मैं श्वेता हूं. सुना है कि तुम रहने की जगह देख रही हो? मेरे पास जगह है,’’ उस लड़की ने सिगरेट के धुएं का छल्ला छोड़ते हुए कहा.

‘‘हां, लेकिन आप…’’ मधु को कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह क्या बोले.

‘‘ऐसी ही हूं मैं. कल मैं इसी समय इधर ही मिलूंगी. सोचो और फैसला लो,’’ उस लड़की ने सिगरेट का आखिरी कश जोर से खींचा और वहां से चली गई.

वे दोनों उसे देखती रह गईं. उन्होंने श्वेता के बारे में पता किया, तो पता चला कि वह खुली सोच वाली लड़की है, पर है दिल की साफ. साथ ही यह भी कि वह तलाकशुदा मातापिता की एकलौती औलाद है, इसीलिए इतनी बिंदास है. उस के पास अपना फ्लैट भी है, जिसे वह नए आने वालों से शेयर करती है.

मधु और प्रीति को तो जैसे मनचाही मुराद मिल गई. उन्होंने फ्लैट देखा और पसंद आने पर उस के साथ रहने लगीं.

एक दिन श्वेता की तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए वह उस दिन दफ्तर नहीं गई. जब शाम को मधु और प्रीति घर लौटीं, तो उन्होंने श्वेता के साथ एक लड़के को बैठे देखा.

श्वेता ने बताया कि वह लड़का उस का दूर का भाई है और अब उन के साथ ही रहेगा.

यह सुन कर मधु और प्रीति उस पर काफी नाराज हुईं, लेकिन श्वेता इस बात पर अड़ी रही कि वह उस के साथ ही रहेगा. उस ने तो यहां तक कह दिया कि वे चाहें तो अपने रहने का इंतजाम दूसरी जगह कर सकती हैं. यह सुन कर वे सन्न रह गईं.

इस के बाद मधु और प्रीति डरीसहमी उन के साथ रहने लगीं. उन्होंने देखा कि श्वेता का वह दूर का भाई कुछ दिन तो बालकनी में सोता था, लेकिन बाद में वह उस के बैडरूम में ही शिफ्ट हो गया.

जब उन्होंने एतराज किया, तो श्वेता बोली, ‘‘मेरा रिश्तेदार है और मेरा ही फ्लैट है. तुम्हें क्या दिक्कत है?’’

श्वेता का यह रूप देख कर मधु को उस से नफरत हो गई. वैसे, मधु के सीधेसहज स्वभाव के चलते श्वेता उस से उतनी नहीं खुली थी, लेकिन प्रीति से वह खुली हुई थी. वह उस को अपने दैहिक सुख के किस्से सुनाती रहती थी. कई बार मधु को भी यही सबकुछ दिखातीसुनाती, मधु थोड़ी असहज हो जाती.

एक दिन मधु प्रीति और श्वेता दोनों पर इन बातों के लिए खासा नाराज हुई. आखिर में किसी तरह प्रीति ने ही बात संभाली.

मधु ने उसी समय यह तय किया कि वह अब इन लोगों के साथ नहीं रहेगी. वह अगले दिन दफ्तर में पापा की तबीयत खराब होने का बहाना कर के अपने शहर चली गई थी.

घर के लोग मधु के तय समय से 15 दिन पहले ही अचानक आ जाने से खुश तो बहुत थे, पर समझ नहीं सके थे कि वह इतने दिन पहले कैसे आई थी. लेकिन उस ने उस समय घर वालों को यह नहीं बताया कि वह किस वजह से आई थी.

कुछ दिन वहां रुक कर मधु वापस आ गई. उस ने प्रीति को रेलवे स्टेशन से ही फोन लगाया. उस ने बताया, ‘तेरे जाने के बाद अगले दिन ही मैं भी अपने शहर चली गई थी, क्योंकि श्वेता और उस के भाई के साथ रहना मुझे बहुत भारी पड़ रहा था. मेरे घर वाले मुझे नौकरी पर नहीं जाने दे रहे हैं.’

यह सुन कर तो मधु के पैरों तले जमीन खिसक गई. उसे कुछ भी सूझ नहीं रहा था कि क्या करे, क्या न करे. एक मन कर रहा था कि ट्रेन में बैठ कर घर लौट जाए, लेकिन वह नहीं गई.

मधु ने असीम को फोन लगाया. वह उस के साथ दफ्तर में काम करता था. मधु ने रोंआसा होते हुए बात की, तो उस ने हिम्मत दी, फिर रेलवे स्टेशन आ गया.

असीम ने मधु को समझाबुझा कर श्वेता के फ्लैट पर रहने के लिए राजी किया. वह उसे वहां ले कर भी गया. श्वेता और उस का ‘भाई’, जिस का नाम कुणाल था, उन को देख कर हैरान रह गए. फिर सहज होते हुए श्वेता ने मधु को गले लगा लिया.

‘अरे वाह, तू भी. वैलडन,’  श्वेता ने असीम की ओर देख कर उसे एक आंख मारते हुए कहा.

‘‘तू जैसा समझ रही है, वैसा कुछ भी नहीं है,’’ मधु एकदम सकपका गई.

‘‘कोई बात नहीं यार. शुरू में थोड़ा अटपटा लगता है, फिर मजे ही मजे,’’ श्वेता बोली.

‘‘तू गलत समझ रही है,’’ मधु ने उसे फिर समझाने की कोशिश की, लेकिन उस ने उसे मुंह पर उंगली रख कर चुप रहने का इशारा किया और फ्रिज से कोल्डड्रिंक निकाल कर सब को देने लगी.

असीम कुछ समझ नहीं पा रहा था या समझ कर भी अनजान बन रहा था, कहना मुश्किल था. फिर बातों ही बातों में श्वेता ने अपने और कुणाल के बारे में सबकुछ बेबाकी से बताया. मधु की उम्मीद के उलट कुणाल ने उन सब को बड़ी सहजता से लिया. जब असीम वापस जाने लगा, तो उस ने कहा कि वह मधु के रहने का दूसरा इंतजाम करेगा और यह भी कि तब तक वह बारबार आता रहेगा. मधु किसी तरह मन मार कर वहीं रहने लगी.

‘हमारी कोई शादी नहीं हुई तो क्या फर्क पड़ता है, देखेंगे… जब जरूरत लगेगी, तब कर लेंगे. ऐसे रहने में क्या बुराई है?’

श्वेता अकसर मधु से बातें करते हुए कहती थी. मधु को कई बार यह भी लगता था कि वह सच ही तो कह रही है.

एक दिन मधु शाम को दफ्तर से घर लौटी, तो पाया कि श्वेता और कुणाल ब्लू फिल्म देख रहे थे.

मधु को लगा, जैसे वह उन दोनों का बैडरूम ही हो. उन के कपड़े यहांवहां बिखरे पड़े थे. शराब की बोतल मेज पर खुली रखी थी. वे दोनों उस फिल्म में पूरी तरह डूबे हुए थे.

अजीब सी आवाजों ने मधु को असहज कर दिया था. वह जल्दी से अपने कमरे की ओर बढ़ी, तो श्वेता ने उस से कहा, ‘‘हमारे साथ बैठो और जिंदगी का मजा लो.’’

मधु ने उसे अनसुना कर के खुद को कमरे में बंद कर लिया. फिर यह सिलसिला चलने लगा. असीम भी अकसर वहीं आ जाता था. मधु आखिर कब तक अपने को बचा पाती. उस पर भी उस माहौल का असर होने लगा था. अब वह भी यह सब देखनेसुनने में मजा लेने लगी थी.

एक शनिवार को असीम ने कहीं पिकनिक पर जाने का प्रोग्राम बनाया, तो मधु मना नहीं कर सकी. वह सारा दिन मजे और मस्ती में बीत गया.

रात होतेहोते बादल घिरने लगे. थोड़ी ही देर में तेज बारिश होने लगी और वे अपने शहर की ओर चल दिए.

मधु के मना करने के बावजूद असीम उसे घर तक छोड़ने आया था और आते ही सोफे पर पसर गया था. थोड़ी ही देर में उसे गहरी नींद आ गई थी.

मधु ने असीम को थोड़ी देर सोने दिया, फिर उसे जगा कर वहां से जाने को कहा.

इतने में टैलीविजन पर उन के फ्लैट के पास वाले मौल में बम धमाका होने की खबर आई. पुलिस हरकत में आती, तब तक वहां दंगा शुरू हो गया था.

श्वेता और कुणाल खुश हो रहे थे कि दंगा होने से कंपनी से छुट्टी मिलेगी और वे मजे करेंगे. असीम वहां से न जा पाने के चलते बेचैन था और मधु  उस से भी ज्यादा परेशान थी कि आखिर रात को वह कहां रुकेगा?

असीम ने जाने की कोशिश की और मधु ने उसे भेजने की, पर पुलिस ने शहर के हालात का हवाला दे कर उस की एक नहीं सुनी. उसे वहीं रुकना पड़ा.

मधु न जाने क्यों मन ही मन डर रही थी. श्वेता और कुणाल सोने चले गए थे. मधु ने असीम को चादरतकिया दे कर सोफे पर सोने को कहा, फिर वह भी सोने चली गई.

अचानक मधु की नींद खुली, तो देखा कि असीम उस के जिस्म से खेल रहा था. वह चीख पड़ी और जोर से चिल्लाई. असीम ने उसे चुप रहने को कहा और उस से जबरदस्ती करने लगा.

मधु किसी कातर चिडि़या की तरह तड़पती ही रह गई और असीम एक कामयाब शिकारी जैसा लग रहा था.

मधु चिल्लाते हुए ड्राइंगरूम में और उस के बाद उस ने श्वेता के बैडरूम का दरवाजा जोर से बजाया.

श्वेता और कुणाल तकरीबन अधनंगे से बाहर आए. वह उन्हें देख कर असहज हो गई और सबकुछ बताया.

‘‘तुम जरा सी बात के लिए इतना चीख रही हो?’’ श्वेता बोली, फिर उस ने कुणाल के कंधे पर सिर रखा और बोली, ‘‘चलो, अपना अधूरा काम पूरा करते हैं.’’

वे दोनों अपने बैडरूम में चले गए.

मधु नीचे फर्श पर बैठी रो रही थी. वहां कोई नहीं था, जिस पर वह भरोसा करती और जो उसे दिलासा देता. फिर वह अपनेआप को किसी तरह संभालने की कोशिश कर रही थी कि उस ने  अपने माथे पर किसी का हाथ महसूस किया. देखा तो असीम था. उस ने उस का हाथ झटक दिया और उसे बेतहाशा पीटने लगी.

असीम उस की मार सहता हुआ थोड़ी देर तक खड़ा रहा. मधु थकहार कर निढाल हो कर बैठ गई.

‘‘लो, पानी पी लो,’’ असीम पानी का गिलास लिए खड़ा था.

मधु ने जोर से झटक कर गिलास फेंक दिया.

‘‘लो, पानी पी लो,’’ असीम फिर से गिलास में पानी भर कर लाया था.

मधु ने जलती आंखों से उसे देखा, तो एक पल के लिए वह सहम गया. फिर उस ने मधु के मुंह से गिलास लगा दिया.

मधु ने पानी पी कर उस से पूछा, ‘‘तुम ने ऐसा क्यों किया?’’

असीम ने उसे बड़े प्यार से समझाते हुए कहा, ‘‘क्या मुझ से शादी करोगी?’’

‘‘मुझे नहीं करनी किसी फरेबी से शादी. मैं पुलिस के पास जा रही हूं.’’

मधु हिम्मत कर के उठी.

‘‘शौक से जाओ,’’ कह कर असीम ने फ्लैट का दरवाजा खोल दिया.

मधु बिल्डिंग के बाहर आई. उसे देख कर दरबान चिल्लाया, ‘‘मेम साहब, अंदर जाइए. पुलिस को देखते ही गोली मार देने का आदेश है.’’

तब मधु को उस से पता चला कि शहर के हालात कितने खराब हो गए थे. वह थकहार कर वापस आ गई.

मधु कुछ दिनों तक गुमसुम रही, लेकिन श्वेता के कहने पर वह असीम के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगी.

मधु ने एक दिन पूछा, तो पता चला कि श्वेता पेट से है और कुणाल, जो कल तक दिनरात शादी की बात करता था, शादी से मुकर रहा था.

जब श्वेता उस से शादी के लिए बारबार कहने लगी, तो वह उसे मारनेपीटने लगा.

यह देख कर मधु दौड़ी और उस ने कुणाल को रोका. उस ने उन दोनों को समझाने की कोशिश की, पर वे अपनीअपनी बात पर अड़े हुए थे.

जब श्वेता कुणाल पर ज्यादा दबाव डालने लगी, तो वह शादी करने से एकदम मुकर गया और कभी शादी न करने की बात कह कर वहां से चला गया.

मधु और श्वेता उसे रोकती रह गईं. श्वेता किसी घायल पक्षी की तरह तड़पती रह गई. मधु को उस की यह हालत देख कर दया भी आई और गुस्सा भी.

श्वेता की इस अनचाही खबर के कुछ दिन बाद ही मधु को भी यह एहसास हुआ कि वह भी पेट से है. तब उस के पैरों तले जमीन खिसक गई. उस ने असीम से यह ‘खुशखबरी’ कही, तो उस ने लापरवाही से कहा, ‘‘ठीक है, देखते हैं कि क्या हो सकता है.’’

‘‘मतलब? हम जल्दी ही शादी कर लेते हैं,’’ मधु ने खुशी से कहा.

‘‘अभी हम शादी कैसे कर सकते हैं? अभी तो मेरा प्रोजैक्ट चल रहा है. वह पूरा होने में एकाध साल लगेगा, उस के बाद देखा जाएगा,’’ असीम बोला.

‘‘फिर हमारा बच्चा?’’ मधु ने पूछा.

‘‘हमारा नहीं तुम्हारा. वह तुम्हारा सिरदर्द है, मेरा नहीं,’’ असीम बेशर्मी से बोला, तो मधु उस के बदले रूप को देखती रह गई.

मधु जब असीम से शादी करने के लिए बारबार कहने लगी, तो एक दिन वह भाग गया. पता करने पर

मालूम हुआ कि वह तो कंपनी के एक प्रोजैक्ट के सिलसिले में विदेश जा चुका है. साथ ही, यह भी कि उस का विदेश जाने का तो पहले से ही प्रोग्राम तय था, लेकिन उस ने मधु को इस बारे में हवा तक नहीं लगने दी.

मधु हाथ मलती रह गई. अब वह और श्वेता एक ही दुख की दुखियारी थीं. श्वेता और मधु ने बारीबारी से बच्चा गिराने का फैसला लिया. डाक्टर ने भी भरपूर फायदा उठाया और उन से मोटी रकम ऐंठी.

आज श्वेता की बच्चा गिराने की बारी थी और मधु उस की देखभाल के लिए साथ आई थी. कल को उसे भी तो इसी दौर से गुजरना है.

अचानक दरवाजे पर हुई हलचल ने मधु का ध्यान तोड़ा. नर्सिंग स्टाफ श्वेता को बेसुध हाल में बिस्तर पर लिटा गया.

मधु खुद को श्वेता की जगह रख कर ठगी सी बैठी थी. उन्होंने जिस सुख को अपनी जिंदगी मान लिया था, वह मरीचिका की तरह सिर्फ छलावा साबित हुआ था.

Best Hindi Story : जब खुलेगी खिड़की पूरब की ओर – धर्मकर्म में डूबी स्त्री की दुर्दशा

Best Hindi Story : पंडितजी के पूजापाठ, टोटकों में पूरी तरह उलझ चुकी थी बरखा. हर समस्या का उसे एक ही उपाय दिखता, वे थे पंडितजी. लेकिन पंडितजी ने ही उस की नैया डुबो दी.

बरखा आज कुछ ज्यादा ही व्यस्त थी. अपने बगीचे से फूल, बेलपत्तियां तोड़, आरती की थाल सजा कर पूजापाठ करने के बाद बेटी वैदेही को आवाज दे रही थीं. आज तरहतरह के पकवान बनाने थे, विशेष पूजा जो थी. खानदानी पुरोहित विश्वकर्मा कुछ ही देर में बरखा के घर में पधारने वाले थे.

ब्राह्मण भोजन एवं दान, पंडितजी को नकद 51,000 रुपए के साथ मसलिन सिल्क की धोती और कोसा सिल्क का कुरता, साथ में अनाज फलादि तो हैं ही. ड्राइफ्रूट और मिठाई के डब्बे न दें तो पंडितजी की खातिरदारी अधूरी रह जाए. बरखा की भक्ति के क्या कहने. तभी तो उन्होंने अपने पति वल्लभ से छिपा कर एक पुरानी सोने की अंगूठी भी विश्वकर्मा के लिए निकाल रखी है. ये पंडितजी खानदानी गुरु हैं. उन की कृपा से पति वल्लभ का व्यवसाय और फलेगाफूलेगा.

पति ने एक एजेंसी ले रखी है, अच्छी नहीं चल रही. उन का बेटा 12वीं में है, उस का पढ़ाई में मन नहीं लगता. बेटी का स्नातक के बाद एमटैक इंजीनियर अरुण से शादी की बात जम जाए तो सोने की एक अंगूठी क्या चीज है.
बरखा की इस घर में तूती बोलती है. उन को कुछ कोई कहे, मजाल क्या.
पति वल्लभ कुछ आलसी किस्म के हैं, अपने में ही मस्त. महंगी शराब के शौकीन और नए गैजेटों के दीवाने.
वल्लभ के शौक ऐसे थे कि उन की आय से ज्यादा पैसे उन में व्यय हो जाते.
बरखा के लिए पंडितजी रामबाण थे.
पति में समझदारी आए, बेटे का पढ़ने में मन लगे और बेटी को अच्छा वर मिले, इन्हीं आशाओं में बरखा पंडितजी के बताए टोटके अपनाती रहती. कभीकभार पति या बेटे में कुछ परिवर्तन देख वह उत्साहित हो जाती, कि हो न हो यह पंडितजी के बताए उपायों का ही कमाल है.

बरखा को पूरा विश्वास था कि पंडितजी की कृपा के कारण ही पति को बैंक से लोन मिल गया और ऊपर 2 कमरे, रसोई, बाथरूम, बालकनी आदि बनवा कर किराए पर दिया जा सका. इस से थोड़ी सहूलियत हो गई, वरना पति के इस एजेंसी के भरोसे तो कुछ नहीं होने को था. अब बरखा ने पंडितजी से एक और कृपा करने की प्रार्थना की है. किसी तरह उन्हीं के ही घर में किराए पर रहने वाले इंजीनियर लड़के से उस की बेटी वैदेही की जोड़ी जमा दें.

पहले तो पंडितजी राजी नहीं थे, लड़का लड़की से छोटी जाति का है, हां, उन के पास हर पाप, हर मुसीबत की काट तो है, लेकिन इस के लिए जुगत करनी पड़ती है.

बरखा को पंडितजी ने अलग से अपने घर बुलवा कर कुछ उपाय बताए, कहा, ‘आप किसी मंदिर या ब्राह्मण को 5 बोरी अनाज, 5 लिटर गाय का घी, 5-5 किलो काजूकिशमिश दान करें और किसी ब्राह्मण वंश की नईनवेली दुलहन को लाल बनारसी साड़ी दान में दें तो मैं एक अनुष्ठान द्वारा लड़के पर से छोटी जाति का साया हटा दूंगा. फिर आप की बेटी की शादी उस लड़के से आसानी से हो जाएगी.’
‘जी, पंडितजी. पर बाहर कहां मंदिर या ब्राह्मण ढूंढ़ूं, आप तो हैं न.’
‘सो, आप की जैसी मरजी.’
बरखा को यह लड़का बेहद पसंद था. बिल्डर पिता का इकलौता वारिस, खुद का भी महीने का 70 हजार रुपए का पैकेज. 3 साल की नौकरी में ही काफी दमखम रखने लगा है यह लड़का अरुण. अपनी सामान्य सी बेटी के लिए यह लड़का किसी हीरे से कम नहीं था. बरखा ने पंडितजी को ही सारा सामान देदिला कर कर्तव्य खत्म कर लिया. पंडित ने सामान तो रखा ही, अपने बेटे की नई शादी से घर आई दुलहन को अपनी तरफ से लाल बनारसी दान दे दी.

हां, पंडितजी बरखा से यह कहना न भूले कि बरखा को ज्यादा पुण्य का भाग मिले, इसलिए उन की दी हुई साड़ी खुद की बहू को उन्होंने दे दी.

बरखा पंडितजी की इस दयादृष्टि पर फूली नहीं समाई. अब तो जरूर ही बरखा की मनोरथ पूरी होगी. पंडितजी की सलाह पर बरखा अपनी बेटी को अरुण के कमरे में टिफिन ले कर भेजने लगी थी. अरुण ज्यादा घूमनेफिरने का शौकीन नहीं था. 8 बजे औफिस से आ कर वह घर पर ही शांति से विश्राम करता, पढ़ता या कंप्यूटर पर काम करता. ऐसे में समय काटने के लिए वैसे ही वैदेही का उस के पास आना उसे अच्छा लगने लगा था.

अपनी मां की शह और परामर्श से वैदेही अरुण के परिवार और उस की रुचि की जानकारी लेती हुई उस के करीब होती गई. 28 साल का अरुण उस के इस तरह खुद से करीब आने पर अपने पर काबू न रख पाया. एक उम्र का दौर, एक जरूरत चाहतों की, वे दोनों सीमाओं की लकीरें लांघते रहे.

एक दिन वैदेही ने पिता वल्लभ को मां से कहते सुना.
‘बेटी को जबतब उस लड़के के पास भेज रही हो, उस का पिता धनी है. वे भला हम से क्यों रिश्ता जोड़ेंगे? और फिर तुम्हें तो जाति की भी पड़ी रहती है, अब तो लड़का हम से कम है जाति में, फिर?’

‘अजी, जाति तब मानती हूं जब सामने वाला इतना धनी न हो. सोचो जरा, एक तो इकलौता लड़का, खुद ही इतना कमाता है, ऊपर से बिल्डर पिता का इतने करोड़ों का कारोबार. जाति के पीछे क्यों मरूं?’

‘ठीक है, माना जाति गई लालच की दुकान पर तेल लेने, लेकिन शादी होगी कैसे? उस के परिवार को राजी करना जरूरी नहीं?’

‘क्यों न होंगे वे राजी? पंडितजी किसलिए हैं? इतने टोटके करवाते हैं मुझ से?’
‘हां, तभी तो सारा दिन तेलसिंदूर पोत कर कभी पीपल, कभी वट के पेड़ में धागे बांधती रहती हो. गाय को तिलगुड़, कुत्ते को रोटी और कौए को चावल खिलाती हो. पेड़पौधों पर मंत्र पढ़पढ़ कर पानी छिड़कती रहती हो. तरहतरह के मंदिरों में जाजा कर नारियल चढ़ाती रहती हो.’
‘तो तुम कौन से दूध के धुले हो, शराब में पैसे नहीं उड़ाते?’
‘हां उड़ाता हूं, शौक करता हूं, तुम्हारी तरह खुद को धोखे में नहीं रखता कि शराब पीने से मैं अमीर हो जाऊंगा या मेरी बेटी की उस अमीर लड़के से शादी हो जाएगी.
‘तुम्हें गाय को या कुत्ते को या जानवरों को खिलाने का शौक है तो खिलाओ. उन की भूख मिटाने के लिए खिलाओ. अपने फायदे की सोच कर वह भी यह कि ऐसा करने से तुम्हारी बेटी को वह मिल जाएगा. यह तो दिमागी बीमारी है.’
‘तो क्या तुम्हारी एजेंसी अब पहले से अच्छी नहीं चल रही?’
‘चल रही है, एक नया होनहार लड़का आया है, इसलिए. तुम्हारे टोटके से बिलकुल भी नहीं. अब हम और ग्राहकों को ढूंढ़ने लगे हैं. होम सर्विस देने लगे हैं.’
‘और यह लड़का आया कहां से?’
‘विज्ञापन से.’
‘विज्ञापन देने से नहीं, तुम्हारे विज्ञापन से नहीं, पंडितजी ने मुझे लाल कपड़े में
3 चांदी के सिक्के बांध नदी में बहाने को कहा था, इसलिए.’
‘नदी में? यहां कौन सी नदी है नजदीक?’
‘पंडितजी के घर के सामने बने पोखर में, पंडितजी ने ही कहा, कहां बेचारी नदी ढूंढ़ने जाओगी, मेरे घर के सामने का पोखर बहुत ही पवित्र है.
‘कितना खयाल रखते हैं, पंडितजी.’
‘वह पोखर कहां? पानी का गड्ढा है जिस में पंडितजी फूलपत्तियां फेंकते हैं.’
‘हां वहीं, वहीं, डाले मैं ने चांदी के सिक्के.’
‘समझ. मेरी जमापूंजी खाली कर के मुझे धनी बनाने में लगी हो. रोना लिखा है आगे.’
‘रोएं मेरे दुश्मन.’
वैदेही अब तक चुपचाप सब सुन रही थी. मां के इस पुख्ता विश्वास ने बेटी को बड़ा मनोबल दिया. वह भी टोटकों के सहारे अपने ऊंचे सपनों को पूरा कर लेने का नया सपना संजोने लगी.
वैदेही नाम के ‘खिलौने’ से खेलते अरुण के दिन अच्छे ही कट रहे थे. साल बीत कर दूसरा साल लगा तो एक दिन अचानक वैदेही की तबीयत बिगड़ी.

जांच से खबर लगी कि वैदेही प्रैग्नैंट है. बरखा पहले तो घबराई, लेकिन बाद में उसे एक नई राह मिल गई, सोचा, ‘बेटी के अबौर्शन को रोक कर लड़के के घरवालों पर शादी के लिए दबाव बनाया जाए. बेटे को फंसता देख उन के पैसे की अकड़ काम नहीं आएगी और लड़की की इज्जत से खेलने की कीमत शादी कर के चुकानी पड़ेगी.’

अभिशाप में छिपे वर को पहचान बरखा ने बेटी को अबौर्शन के लिए बिलकुल मना कर दिया. उसे अच्छी तरह यह भी समझ दिया कि वह बच्चे की दुहाई दे कर अरुण पर तुरंत शादी का दबाव बनाए.

बरखा अबौर्शन के लिए वल्लभ की बात अनसुनी कर सीधे पंडितजी के पास पहुंच गई. पंडितजी को आगे की इन बातों का सरसरी तौर पर अंदेशा था ही, आखिर उस का तकाजा और बड़ों की शह पर ये नजदीकियां. उन्होंने बरखा को सुझाव दिया, ‘‘आप लड़के पर लड़की के द्वारा इस चार्ज पर केस करवाओ कि शादी के झांसे में लड़का सालभर से लड़की का शारीरिक शोषण करता रहा. अब शादी से मुकर रहा है.’’
‘‘पर पंडितजी, इस में लड़का कुछ कह नहीं सकता. उस के परिवार वाले तो धमका रहे हैं हमें.’’
‘‘अरे, केस तो करो. फिर देखना कोर्ट से आदेश मिलते ही कैसे आते हैं वे शादी करवाने और नहीं भी हुई शादी तो गर्भवती कर छोड़ने के लिए लाखों का मुआवजा तो मिलेगा ही.’’
‘‘जी पंडितजी, आप कितना सोचते हैं.’’
‘‘मैं खुद इस बार जोरदार यज्ञ करूंगा. आप इस यज्ञ के लिए बस 51 हजार रुपए और दे देना और कुछ देने की जरूरत नहीं.’’
‘‘पंडितजी अभी तो हाथ बहुत खाली हैं, कुछ कम कर दें तो…’’
‘‘अरे, आप इतनी कुलीन, शालीन और भक्त स्त्री हैं, फिर भी पैसे के लिए सौदेबाजी कर रही हैं. हम तो भक्त की नीतिश्रद्धा को देखते हुए ईश्वर तक आप की बात पहुंचाते हैं. आप की श्रद्धा कम होगी तो ईश्वर तक बात पहुंचेगी ही नहीं. फिर बेटी आप की महलों की रानी बनेगी, आप भी दूध में नहाओगी. आप अभी गरीब पंडित का हिस्सा कम कर रही हो?’’
‘‘नहींनहीं पंडितजी. आप दुखी और क्रोधित मत होना. ठीक है, मैं वल्लभजी के साथ जौइंट अकाउंट से कुछ निकालने की कोशिश करूंगी. आप थोड़ा मंत्र पढ़ देना. उन्हें ध्यान न रहे, पता न चले.’’
‘‘खुश रहो देवी. मैं तुम्हारे लिए अवश्य ही मंत्रोच्चार करता रहूंगा.’’
साल बीतते बरखा के घर का हाल बिलकुल बदल चुका था. वैदेही ने एक बेटी को जन्म दिया था. बरखा ही उसे संभाल रही थी.

अरुण के पिता को जब बरखा का बेटी की शादी को ले कर पत्र मिला तो वे रायपुर से सीधे उन के घर आ धमके. साथ में, कई अन्य लोग भी थे. बेटे को तो सामान सहित कुछ दिनों की छुट्टी ले कर साथ लिवा ले ही गए, बरखा को चेतावनी दी कि अब वे इस केस का नतीजा भुगतने के लिए तैयार रहें.

जब शादी का झांसा दे कर रेप करने का चार्ज लगा, केस फाइल कर दिया गया था, वैदेही के लिए हर पल डरावना था जैसे कि मगरमच्छ के खुले जबड़े के सामने उसे तैरने के लिए छोड़ दिया गया हो.

इधर पंडित विश्वकर्माजी से जबजब बरखा अपनी परेशानी बताती, वे पूजापाठ अंगूठी, जड़ीबूटी आदि के नाम पर खूब पैसे मांगते. बरखा भी क्या करे. पहले लालच का फंदा, फिर लालच से निकलने का फंदा. गले की हड्डी बन गई थी पंडित का लालच.

वैदेही इन महीनों में टूट सी गई. उसे अपनेआप पर बड़ा तरस आता. उस की सहेलियां दिमाग की दुरुस्त थीं. कुछ नौकरियां कर रही थीं, कुछ पोस्ट ग्रेजुएशन. आज वे कितनी चैन से थीं और वैदेही कोर्ट के चक्कर लगालगा कर एडि़यां घिस रही थी. बीए में भी बहुत कम अंक आए थे क्योंकि वह तो अरुण के प्रेमजाल में डूबी थी.

पंडित विश्वकर्मा के बारे में अरुण के बिल्डर पिता को जैसे ही पता चला, वे पहुंच गए उन के घर. एक लाख का चैक दे कर कहा, ‘‘बरखा और उस के परिवार की बुद्धि ऐसी भ्रष्ट कर दो कि उन का सारा आत्मविश्वास खत्म हो जाए. वे पूरी तरह टूट जाएं और केस में उलटासीधा दांव चलें.’’ विश्वकर्माजी के टोटकों और चोंचलों का तो बस एक ही मकसद था, वह था धन. जब वह अरुण के पिता से आ रहा तो बरखा के 20-30 हजार को कौन पूछे. बस, तब से बरखा के टोटकों की गति धीमी पड़ गई है. उधर पंडितजी के उलटे परामर्श से कई बार बरखा ने केस के मामले में गलत बयान भी दे डाले.

वैदेही के पिता ने एक सीनियर वकील ढूंढ़ा तो था लेकिन उन की फीस ज्यादा थी. उन्होंने वल्लभजी को कुंदन के पास भेजा. 30 साल का यह युवक बड़ा ही मेधावी और तार्किक था. सीनियर वकील ने ही वल्लभजी से कहा कि वे कुंदन से मदद लें भले ही 4 साल ही हुए हैं उस की प्रैक्टिस में लेकिन वह किसी अनुभवी वकील से कम नहीं.’’ फीस कम थी उस की. सो, कुंदन ही इन का केस देख रहा था.

उस रोज कोर्ट में वर्डिक्ट आने के बाद वैदेही टूट सी गई थी. कुंदन ने उसे अपने औफिस में बुला कर बैठाया, कहा, ‘‘तुम ने केस फाइल करने से पहले यह नहीं सोचा कि यह कितना कमजोर केस है. मुंबई हाईकोर्ट के नवीनतम आदेश के अनुसार कोई भी लड़की, जो बालिग है और अपनी मरजी से संबंध बनाया हो, शादी के दबाव में लड़के पर रेप का चार्ज नहीं लगा सकती. एक लड़की को भी इस संबंध की जिम्मेदारी उठानी चाहिए. जहां धोखे से संबंध बनाए गए हों, तब बात अलग है.

‘‘एक तो तुम 22 साल की पूर्ण वयस्क, स्नातक पढ़ी, तिस पर लड़का तुम्हारे घर का किराएदार, जहां तुम अपने मातापिता के साथ रहती हो, शादी का ?ांसा दे कर रेप कर रहा है. यह तो साफ केस है उस के पिता के रुतबे और उस के पैसे को देख शादी के लिए फांसने का. कानून अंधा तो होता है पर इसलिए कि अमीरगरीब, स्त्रीपुरुष, ऐसे किसी भेदभाव को न देखे, ऐसा अंधा नहीं कि अन्याय का चेहरा न देख सके. मेरे सीनियर ने कहा था, इसलिए यह केस लिया था मैं ने.’’
‘‘मुझ से गलती हो गई पर जज साहब उसे मुआवजे को तो बोल सकते थे. मुझे ही समझाइश देने लगे.’’
‘‘क्यों देगा वह मुआवजा? आनंद दोनों ने मिल कर उठाया.’’
अचानक कुंदन थम गया. उसे एहसास हुआ कि उसे लड़की को प्रत्यक्ष जलील नहीं करना चाहिए.

वैदेही ने सिर झुका लिया. दो बूंद आंसू उस की गोद में ढुलक पड़े. सामने बैठे कुंदन को यह दिखा तो वह अपनी कुरसी से उठ वैदेही के पीछे आ खड़ा हुआ. उस की पीठ पर सहानुभूति का छोटा सा स्पर्श रखा और पूछा.
‘‘तुम इस राह पर कैसे चल पड़ीं?’’
‘‘मेरी मां की अति महत्त्वाकांक्षा, धन के प्रति लालसा और इन सब को हासिल करने का आसान उपाय टोनेटोटके में विश्वास.’’
‘‘तुम्हें क्या जरूरत थी इन सब के पीछे पड़ने की, पढ़ीलिखी हो?’’
‘‘मां हर वक्त पंडितजी की जादुई ताकत का वर्णन करती कि उन के बताए उपायों से हम जो चाहे पा सकते हैं. मां इसी वजह से उन की हर डिमांड पूरी करती. ज्यादा पाने की होड़ में जो अपना था वह भी गंवा दिया. मैं मां की अंधश्रद्धा पर पूरा विश्वास रखती थी. अब सोचती हूं मां का या घर की पत्नी का बौद्धिक, तार्किक और विवेकी होना कितना जरूरी है.’’
‘‘तो तुम लोग हारे कैसे? टोटके ने काम नहीं किया? दरअसल टोटका नहीं, जो मनोबल पहले तुम्हें पंडितजी से मिलता था, उसे बाद में अरुण के पिता ने उन से काफी रुपयों के एवज में खरीद लिया. अब पंडित ने तुम्हें मनोवैज्ञानिक तौर पर तोड़ दिया, ऐसी बातें कहता कि तुम्हारी शक्ति क्षीण होने लगी. तुम लोगों ने केस में काफी गलत बयान भी दिए और यह सब उस पंडितजी के कहने पर. ऐसे भी मैं टोटका नियंत्रित नहीं हूं. टोटकों का मु?ा पर असर न हो सका और तुम हारे.’’ कुंदन ने हलका सा मजाक किया. दुखी होते हुए भी वैदेही मुसकराए बिना नहीं रह सकी.

कुंदन ने कुछ समझने के अंदाज में कहना जारी रखा, ‘‘दरअसल वैदेही, जिस घर की जड़ में अंधविश्वास फैला है वहां लालच, भय, बदला जैसे नकारात्मक शत्रु पैदा हो ही जाते हैं. ऐसे में बच्चों की सही परवरिश तो क्या, परिवार की जड़ें ही खोखली हो जाती हैं. ये अंधी आस्थाएं कमजोर दिलों में अमरबेल की तरह फैलती जाती हैं. ऐसे में उस व्यक्ति या परिवार का समूल नाश होना तय है.

‘‘तुम्हारे घर में तुम्हें लगता होगा कि तुम्हारी मां सब से शक्तिशाली हैं, मगर वही सब से कमजोर थीं. दिल की सच्ची रहो, बेकार का लालच न करो तो किसी टोटके और कर्मकांड की जरूरत नहीं पड़ती. सीधे रास्ते पर कोई पेंच नहीं, समझीं’’

इतने दिनों से वैदेही का कुंदन के साथ उठनाबैठना था, वह अधिकार सहित उस पर डांटडपट कर भी देता तो वैदेही उस की बातों का बुरा न मानती, बल्कि उस की बातों का अनुसरण करती. कुंदन के दिल में इन सब वजहों से वैदेही के प्रति एक अनजानी सी सहानुभूति थी.

माहौल बहुत भारी हो गया था. कुंदन ने वैदेही की ओर देख मुसकराते हुए कहा, ‘‘चलो, आज हमारी बाइक की सवारी करो, कौफी हाउस चलते हैं.’’

कुछ इधरउधर की बातों के बाद कौफी पीते हुए कुंदन ने कहा, ‘‘आगे क्या करना चाहती हो? उन्हीं माताजी की छत्रछाया में दिमागी दिवालिए के इंतजार में?

‘‘मेरी सलाह मानो, तुम्हें अपनी बच्ची की सही परवरिश के लिए आत्मनिर्भर होना जरूरी है, बच्ची को अब उन के भरोसे न छोड़ो. एक के बाद एक जेनरेशन अंधी श्रद्धा के चंगुल में फंसी रह जाएगी वरना.’’

वैदेही कुंदन के प्रति झुकाव सा महसूस करने लगी थी. इस मझधार का एक किनारा सा था कुंदन.

फिर भी वैदेही ने संभाला खुद को, पुरानी गलतियों ने उसे संभल कर व्यवहार करने का इशारा किया था.
उस ने कहा, ‘‘मैं नौकरी की तलाश करना चाहती हूं लेकिन मात्र स्नातक से आजकल क्या होता है?’’
‘‘मैं तुम्हारी मदद करूंगा. अगर आगे भी तुम मेरे साथ बनी रही तो आगे कभी भी अतार्किक बातों में न उलझोगी, ईमानदारी से मेहनत का वादा करो तो हो सकता है मैं आगे तुम्हारे और करीब हो जाऊं.’’

वैदेही कृतज्ञता से भर उठी, कहा, ‘‘मेरी परवरिश गलत हाथों में हुई. लेकिन इन महीनों में आप से नया दृष्टिकोण मिला. मैं केस भले ही हार गई लेकिन जिंदगी की जंग जीत रही हूं.’’
‘‘ठीक है, मैं कुछ दिनों में ही औफिस खोलूंगा. शाम को 3 घंटे वहां प्राइवेट प्रैक्टिस करूंगा. तुम मेरी पर्सनल असिस्टैंट के तौर पर काम करो. आगे लौ में डिप्लोमा कर लो, मैं इंतजाम कर दूंगा.’’

वेतन अभी ज्यादा तो दे नहीं पाऊंगा मगर इतना तो जरूर करूंगा कि तुम पढ़ाई और आनेजाने के खर्चे आसानी से निकाल लो. कुछ महीने अभी मां के पास रह कर मेरे पास काम शुरू करो. और हां, फालतू के सपने कभी न देखना. मेरी गर्लफ्रैंड है, हम विवाह का फैसला कर चुके हैं. यह बता दूं, हम ने कभी बिस्तर पर शाम नहीं बिताई है.

वैदेही को इस खुशी के इजहार का सही शब्द न मिला, सिर्फ चेहरे पर कुछ भाव ऐसे आएगए कि कुंदन ने अपना हाथ आगे बढ़ा टेबल पर रखे वैदेही के हाथ को थाम कर धीरे से दबाया.
एक दोस्त के भरोसे की छुअन थी. एक उम्मीदों की चहचहाहट थी जिस ने पूरब की खिड़की खोल दी थी. अब सूरज दिखने लगा था.

Supreme Court ने तय कर दी राज्यपाल की टाइमलाइन

Supreme Court : यह कोई ढकीछुपी बात नहीं है कि अलगअलग राज्यों में राज्यपाल यदि विरोधी दल का है तो वह राज्य के कई कामों में रोड़े अटकाता है. इस का माकूल इलाज सुप्रीम कोर्ट ने 3 महीने की जवाबदेही समयसीमा लगा कर तो दिया है मगर इस पर अमल हो पाएगा, यह बड़ा सवाल है?

केजरीवाल सरकार के समय दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना के पास बस एक ही काम था कि किसी भी तरह केजरीवाल सरकार के काम में बाधा उत्पन्न करते रहो और जनकल्याण के उन के कार्यों की योजनाओं को मटियामेट करने के लिए किसी फाइल पर अपनी अनुमति की चिड़िया न बिठाओ. मगर जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार दिल्ली के सिंहासन पर विराजमान हुई है, एलजी साहब को बड़ी राहत मिली है, काम का एक बड़ा बोझ

सब जानते हैं कि उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने केजरीवाल सरकार को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई पर सब से ज्यादा काम किया. तमाम सरकारी स्कूलों का नक्शा बदल कर रख दिया.

कहींकहीं तो सरकारी स्कूलों के आगे बड़ेबड़े प्राइवेट स्कूल भी फीके दिखने लगे थे. केजरीवाल सरकार टीचर्स को ट्रेनिंग लेने के लिए फिनलैंड भेजना चाहती थी ताकि बच्चों को और अच्छी शिक्षा मिल सके मगर उपराज्यपाल सक्सेना ने टीचरों को ट्रेनिंग के लिए जाने से रोक दिया.

केजरीवाल और विनय कुमार सक्सेना के बीच आए दिन तूतूमैंमैं होती थी. सरकार विधानसभा में कोई विधेयक पास कर लागू करने की अनुमति के लिए फाइल एलजी के पास भेजती तो एलजी उस फाइल को महीनों दबा कर बैठ जाते. जनकल्याण की कई योजनाएं इसी के चलते लागू नहीं हुई और नुकसान दिल्ली की जनता का हुआ.

विनय कुमार सक्सेना ने केजरीवाल को हैरान परेशान करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी और केजरीवाल के कार्यकाल में दिल्ली युद्धक्षेत्र बना रहा. केजरीवाल आरोप लगाते थे कि उपराज्यपाल का रवैया ब्रिटिश वायसराय जैसा है, उन की नजर में हम गंवार हैं.

केजरीवाल कहते कि मुझे जनता ने चुना है तो एलजी बोलते- मुझे प्रेसिडेंट ने चुना है. सक्सेना ने दिल्ली प्रशासन से ‘आप’ कार्यकर्ताओं को बाहर निकालने की मुहिम को आगे बढ़ाया. दिल्ली सरकार में ‘साथियों’ और ‘सलाहकारों’ की बर्खास्तगी एलजी और सीएम के बीच विवाद का बड़ा मुद्दा बनी.

दिल्ली की जनता यही सोचती रहती थी कि केजरीवाल और एलजी सक्सेना के बीच चल रही ‘खत्म करने की लड़ाई’ का नतीजा क्या होगा. आखिरकार केजरीवाल सरकार यह कहतेकहते सत्ता से बाहर चली गई कि भारतीय जनता पार्टी विपक्ष शासित राज्यों में अपने राज्यपालों के माध्यम से सरकार चलाने की कोशिश करती है और जनता की चुनी हुई सरकार जनता के हित में पूरी ताकत से काम नहीं कर पाती.

पुडुचेरी की उपराज्यपाल रही किरण बेदी और मुख्यमंत्री नारायणसामी के बीच भी हमेशा सरकार चलाने को ले कर खींचतान चलती रही. नारायणसामी का भी वही आरोप था कि बतौर भाजपा की राज्यपाल बेदी एक चुनी हुई सरकार को काम करने नहीं दे रही हैं. वह कल्याणकारी योजनाओं को बाधित करती हैं.

नारायणसामी के कई सरकारी आदेशों और विधानसभा के प्रस्तावों को किरण बेदी द्वारा रद्द कर दिए जाने से सरकार को जन कल्याणकारी कार्यों को लागू करने से पीछे हटना पड़ा. यहां तक कि बेदी ने पोंगल उत्सव के दौरान इस केंद्रशासित प्रदेश के हर परिवार को साड़ी और चावल उपहार में देने के मुख्यमंत्री के फैसले पर भी रोक लगा दी थी, जो कि पुडुचेरी में सरकारी परंपरा है और इसे अत्यधिक प्रतीकात्मक सांस्कृतिक संकेत के रूप में देखा जाता है. इस के बदले बेदी ने आदेश जारी किया कि हर खाते में नकदी हस्तांतरित की जाए. बेदी ने कांग्रेस व डीएमके गठबंधन के सामाजिक कल्याण के उपायों को लागू करना मुश्किल कर दिया था. वहां दलबदल और इस्तीफे काफी हद तक इस निराशा से उपजे थे कि बेदी ने सरकारी कामकाज को बुरी तरह ठप कर दिया था.

हाल ही में गैरभाजपा शासित तीन दक्षिणी राज्यों में राज्यपालों और सत्तारूढ़ सरकार के बीच टकराव काफी बढ़ गया है. तमिलनाडु ने तो राज्यपाल आरएन रवि को वापस बुलाने की मांग तक कर डाली थी. केरल ने राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति पद पर राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की जगह शिक्षाविदों को नियुक्त करने के लिए अध्यादेश मार्ग प्रस्तावित किया तो तमिलिसाई सुंदरराजन ने संदेह जताया कि तेलंगाना में उन का फोन टैप किया जा रहा है.

तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, दिल्ली और पश्चिम बंगाल, इन सभी राज्यों में गैरभाजपा सरकार है और इन सभी राज्यों में एक बात कौमन है. वो बात है राज्य सरकार का राज्यपाल के साथ विवाद. बीते कुछ समय से पांचों राज्यों में राज्यपाल बनाम राज्य सरकार देखने को मिल रहा है. इन सभी राज्यों में राज्यपाल भारतीय जनता पार्टी के एजेंट की तरह काम कर रहे हैं. सभी राज्यों में सरकारों और राज्यपालों के बीच बयानबाजी और छींटाकशी का दौर रहा और एकदूसरे के कामकाज में रोड़े अटकाए जाने का आरोप लगाया जाता रहा.

मगर अब सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते राज्यपालों की मनमानी पर कड़ा आघात किया है. हालांकि यह फैसला तमिलनाडु सरकार की याचिका पर दिया गया है मगर इस फैसले के मद्देनजर अब भाजपा के इशारे पर काम करने वाले राज्यपालों को एक सबक जरूर मिलेगा.

8 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में विधानमंडल से पारित विधेयकों पर राज्यपाल की कार्रवाई के लिए समय सीमा तय कर दी है. कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि को 10 विधेयकों को रोक कर रखने के लिए फटकार भी लगाई है. कोर्ट ने कहा कि यह संविधान के उल्ट, गैरकानूनी और मनमानी कार्रवाई है, इसलिए रद्द की जाती है. ये सभी 10 विधेयक उस तारिख से पारित माने जाएंगे, जब इन्हें राज्यपाल के सामने दोबारा पेश किया गया था.

कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के कर्तव्यों के निर्वहन के लिए स्पष्ट समय सीमा तय नहीं है, फिर भी इसे इस प्रकार नहीं पढ़ा जा सकता कि राज्यपाल बिल पर कार्रवाई ही न करें और राज्य में कानून बनाने की प्रक्रिया बाधित कर दें. उन के पास विवेकाधिकार नहीं होता. उन्हें मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करना होता है.

कोर्ट ने नसीहत दी कि राज्यपाल को एक दोस्त, दार्शनिक और राह दिखाने वाला होना चाहिए. जो राजनीति से प्रेरित न हो. राज्यपाल को उत्प्रेरक बनना चाहिए, अवरोधक नहीं.

गौरतलब है कि तमिलनाडु में राज्यपाल द्वारा सहमति देने में देरी पर राज्य सरकार ने 2023 में शीर्ष अदालत का रुख किया था, जिस में दावा किया गया था कि 2020 से ले कर अबतक कुल 12 विधेयक राज्यपाल के पास लंबित हैं. 13 नवंबर, 2023 को राज्यपाल ने 10 विधेयकों पर सहमति रोकने की घोषणा की थी, जिस के बाद 18 नवंबर, 2023 को विधानसभा ने विशेष सत्र बुला कर वही विधेयक फिर से पारित किए. राज्यपाल ने 28 नवंबर, 2023 को उन विधेयकों में से कुछ को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखा था.

इस मामले में कोर्ट ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण बातें कहीं हैं. कोर्ट ने कहा-

– विधायकों को जनता ने चुना है. वे राज्य की भलाई के लिए अधिक उपयुक्त हैं. उन के द्वारा बनाए गए विधेयकों पर राज्यपाल द्वारा कार्रवाई न करना और उन को रोक कर रखना उन्हें मात्र कागज का टुकड़ा बना देता है.

– अगर राज्यपाल मंत्रिपरिषद द्वारा भेजे गए बिल को राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखने का निर्णय लेते हैं तो अधिकतम समय एक महीना होगा.

– मंत्रिपरिषद द्वारा भेजे गए विधेयक पर राज्यपाल सहमति नहीं देते तो ऐसे विधेयकों को विधानसभा को 3 महीने के भीतर वापस किया जाना चाहिए.

– राज्य विधानसभा उस विधेयक को अगर पुनर्विचार के बाद राज्यपाल के सामने पेश करती है तो उस पर एक महीने के भीतर राज्यपाल को सहमति देनी होगी.

– सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर राज्यपाल समय सीमा का पालन नहीं करते, तो उन की निष्क्रियता को न्यायिक समीक्षा के अधीन माना जाएगा.

– सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को राजनीतिक विचारधाराओं से प्रभावित नहीं होना चाहिए. संघर्ष के समय में, उन्हें सहमति और समाधान का अग्रदूत होना चाहिए, राज्य मशीनरी के कामकाज को अपनी बुद्धिमत्ता और विवेक से सहज बनाना चाहिए, न कि उसे ठप कर देना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हम राज्यपाल के पद का अपमान नहीं कर रहे हैं. राज्यपाल के पद को कमतर नहीं कर रहे हैं. केवल इतना कह रहे हैं कि राज्यपाल को संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं का सम्मान करना चाहिए और निर्वाचित सरकार की सलाह के अनुरूप कार्य करना चाहिए. राज्यपाल किसी राजनीतिक स्वार्थ से नहीं, बल्कि अपने संवैधानिक पद की गरिमा के अनुरूप कार्य करें. वे टकराव में नहीं, समाधान के वाहक बनें.

राज्यपाल को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे जनता की चुनी हुई विधानसभा को बाधित न करें. विधायकों को जनता ने चुना है और वे राज्य की भलाई सुनिश्चित करने के लिए अधिक उपयुक्त हैं. संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को संविधान के मूल्यों द्वारा ही निर्देशित होना चाहिए जो वर्षों के संघर्ष और बलिदान से अर्जित हुए हैं.

फैसले से सरकार को राहत

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देश में सभी राज्य सरकारों की जीत बताया है. अपने सोशल मीडिया पास में स्टालिन ने लिखा, ‘फैसले में विपक्षी शासन वाले राज्यों में केंद्र से मनोनीत राज्यपालों के द्वारा विधायी सुधारों को रोकने की प्रवृत्ति पर विराम लगाया गया है.’

स्टालिन ने कहा कि संविधान के अनुसार राज्यपाल को दूसरी बार पारित विधेयक को स्वीकृति देना अनिवार्य है, लेकिन तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि ने ऐसा नहीं किया, बल्कि वह देरी भी कर रहे थे. इसीलिए राज्य सरकार इस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई. कोर्ट के फैसले से प्रगतिशील विधायी सुधारों को रोकने की प्रवृत्ति, जो राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण हैं, पर विराम लगेगा.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आगे के लिए नजीर

राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच जारी खींचतान का मसला काफी पुराना है. केंद्र राज्य संबंध के तमाम मसलों पर परीक्षण के लिए 1983 में सरकारिया आयोग का गठन भी हुआ था. इस का मकसद, केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों की समीक्षा करना और संविधान में बदलाव के सुझाव देना था. इस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज न्यायमूर्ति राजेंद्र सिंह सरकारिया ने की थी.

केंद्र और राज्य सरकार के संबंधों और राज्यों में संवैधानिक मशीनरी ठप होने की स्थितियों में समीक्षा के लिए सरकारिया आयोग ने अपनी सिफारिशें भी दी थी. मगर उस का कोई फायदा नहीं हुआ, और न ही उन पर कोई अमल हुआ.

अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत के संघीय ढांचे में राज्यपाल का दायित्व राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक होता है. वे राज्य सरकार के साथ सहयोग कर राज्य की प्रगति और जनकल्याण सुनिश्चित करें, न कि उसे बाधित करें.

यह निर्णय न केवल तमिलनाडु के मामले में मार्गदर्शक है, बल्कि सभी राज्यों के लिए एक संवैधानिक चेतावनी भी है कि राज्यपालों को लोकतंत्र के पहरेदार की भूमिका में रहना चाहिए. यह फैसला भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए एक नजीर है.

B. R. Ambedkar की पूजा नहीं, संविधान को मानने की जरूरत

B. R. Ambedkar : अंबेडकर और संविधान की पूजा तब तक किसी मतलब की नहीं है जबतक संविधान और कानून में लिखी बातों को न माना जाए.

डाक्टर भीमराव अंबेडकर का नाम संविधान से जोड़ कर देखा जाता है. ऐसे में अंबेडकर की पूजा करना और उन के बताए रास्ते पर चलना दो अलगअलग बातें होती है. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंबेडकर जयंती के अवसर पर डाक्टर भीमराव अंबेडकर की जिस मूर्ति की पूजा कर रहे थे उस पर फूलमाला चढ़ा रहे थे उस मूर्ति के हाथ में संविधान है. इस का अर्थ यह होता है कि अंबेडकर के साथ ही साथ हम संविधान की भी पूजा कर रहे हैं. नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार जब संसद में जा रहे थे तो संसद की सीढ़ियों के सामने लेट कर नतमस्तक हुए थे.

इस के बाद संविधान के प्रति अपनी आस्था को दिखाने के लिए संविधान दिवस भी मनाना शुरू किया. 2024 के लोकसभा चुनाव के जब परिणाम आए तो यह साफ संकेत मिल गया था कि संविधान के मुददे पर ही भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था. इस के बाद वह संविधान और डाक्टर अंबेडकर को ले कर सचेत हो गई. 11 जनवरी से 26 जनवरी के बीच संविधान गौरव अभियान चलाया.

कांग्रेस भी इसी तरह का अभियान चला रही थी. कांग्रेस के मुकाबले भाजपा का संगठन मजबूत है, ऐसे में वह मुखर हो कर अपनी बात कह लेते हैं.

कांग्रेस ने ‘जय बापू, जय भीम, जय संविधान’ नाम से अभियान चलाया. इस का व्यापक प्रचारप्रसार नहीं हो सका. भाजपा ने अपने अभियान को अधिक मारक क्षमता वाला बनाया. भाजपा के ‘संविधान गौरव अभियान’ का उद्देश्य पार्टी को एक राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करना था. जो वास्तव में संविधान के महत्व को समझती है. इस के उलट विपक्षी दल लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि भाजपा ने संविधान के मूल्यों को कमजोर करने का प्रयास करती है.

भाजपा के 3 राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े, तरुण चुघ और दुष्यंत कुमार गौतम इस अभियान के अगुवा थे. विनोद तावड़े को इस का संयोजक बनाया गया था. भाजपा ने सभी राज्यों की राजधानियों सहित कम से कम 50 शहरों में कार्यक्रम आयोजित किए. दूसरी तरफ विपक्ष भाजपा को संविधान और अंबेडकर के मुददे पर घेरता रहा. संसद में अमित शाह ने अंबेडकर को ले कर विवादित बयान दिया. इस के बाद कांग्रेस को मौका मिल गया. अब भाजपा की मजबूरी है कि वह अंबेडकर का नाम इतनी बार जपे कि उस के गुनाह माफ हो जाए.

अदालत उठा रही सवाल

अंबेडकर जयंती पर इसी रणनीति के तहत बढ़ी संख्या में कार्यक्रम भाजपा आयोजित कर रही है. सवाल उठता है कि क्या केवल पूजा और सम्मान से बात बन जाएगी ? भाजपा सरकार संविधान विरोधी काम कर रही है. अदालतें इस पर टिप्पणी कर रही हैं. राज्यपाल केंद्र सरकार का प्रतिनिधि होता है. ऐसे में उस की भूमिका पर हमेशा सवाल उठते रहते हैं जब केंद्र और राज्य में अलगअलग पार्टियों की सरकारें होती हैं.

ताजा मामला तमिलनाडु का है. सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में राज्यपाल की भूमिका पर सख्त टिप्पणी करते हुए विधेयकों को मंजूरी देने में देरी पर चिंता जताई है. अदालत ने राज्यपाल के लिए समय सीमा तय करते हुए कहा कि उन्हें निर्वाचित सरकार की सलाह के अनुसार काम करना चाहिए और ‘पाकेट वीटो’ का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा विधेयक को मंजूरी देने में देरी के कारण राज्य सरकार ने 2023 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. 21 मार्च, 2024 को कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल के कंडक्ट के बारे में गंभीर चिंता जताई थी. इस से पहले 10 नवंबर, 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘संसदीय लोकतंत्र में शक्ति चुने हुए प्रतिनिधि के पास है’. सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली बेंच ने कहा था कि गवर्नर आग से खेल रहे हैं.

फिर 29 नवंबर, 2023 को केरल सरकार की अर्जी पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया था कि आखिर गवर्नर दो साल से विधेयक पर क्यों बैठे हुए हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल आर. एन. रवि को 10 विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखने को संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध बताया है. अदालत ने समय सीमा तय कर दी है. अब अगर राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखने का निर्णय लेते हैं, तो अधिकतम समय एक महीना होगा. अदालत ने जजमेंट के पैरा 391 में कहा कि राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचारार्थ भेजे गए विधेयकों पर पावती से 3 माह के अंदर फैसला लेना होगा. देर हुई तो वजह दर्ज करनी होगी और राज्य को भी बतानी होगी. अगर राज्य विधानसभा विधेयक को पुनर्विचार कर के फिर भेजती है, तो राज्यपाल को एक महीने में उस पर सहमति देनी होगी. अगर वह समय सीमा का पालन नहीं करते, तो उन की निष्क्रियता को न्यायिक समीक्षा के अधीन माना जाएगा.

अदालत ने कहा कि राज्यपाल विधेयकों पर चुप बैठ कर ‘पूर्ण वीटो’ या ‘पाकेट वीटो’ की अवधारणा नहीं अपना सकते. ‘पाकेट वीटो’ यानी राज्यपाल विधेयकों पर हस्ताक्षर किए बिना उन्हें रोके रखते हैं. बेंच ने कहा कि राज्यपाल द्वारा विधानसभा से पारित और प्रस्तुत विधेयकों पर कोई कार्रवाई न करना उन्हें मात्र ‘कागज का टुकड़ा’ और ‘बिना मांस का हड्डियों का ढांचा’ बना देता है. राज्यपाल को उत्प्रेरक होना चाहिए, अवरोधक नहीं.

राज्यपाल को संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं का सम्मान करना चाहिए और निर्वाचित सरकार की सलाह के अनुरूप कार्य करना चाहिए. वह किसी राजनीतिक स्वार्थ से नहीं, बल्कि संवैधानिक पद की गरिमा के अनुरूप कार्य करें. राज्यपाल को यह ध्यान रखना चाहिए कि वह जनता की चुनी विधानसभा को बाधित न करें. विधायकों को जनता ने चुना है और वे राज्य की भलाई सुनिश्चित करने के लिए अधिक उपयुक्त हैं. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को संविधान के मूल्यों की ओर से ही निर्देशित होना चाहिए, जो वर्षों के संघर्ष और बलिदान से अर्जित हुए हैं.

केंद्र और राज्य के बीच समन्वय बनाने को ले कर 1983 में जस्टिस रणजीत सिंह सरकारिया की अगुआई में तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया गया था. आयोग ने 1987 में रिपोर्ट दी. उस रिपोर्ट की कई सिफारिशों को स्वीकार कर लिया गया. सरकारिया आयोग ने 1600 पेज की अपनी सिफारिश में कहा था कि केंद्र और राज्य के बीच संबंध को ले कर संविधान के प्रावधान में कोई बदलाव न किया जाए. देश की एकता और अखंडता के लिए जरूरी है कि केंद्र मजबूत हो. राज्यपाल की नियुक्ति 5 साल के लिए होनी चाहिए और राष्ट्रपति शासन आखिरी विकल्प होना चाहिए.

संविधान बनाते वक्त देश की जो परिस्थितियां थीं, उसे ध्यान में रख कर फैडरल सिस्टम बनाया गया. केंद्र को भी मजबूत रखा गया और स्थानीय प्रशासन राज्यों के हाथ दे कर सत्ता का विकेंद्रीकरण भी किया गया. इस उद्देश्य यह था कि केंद्र और राज्य मिलकर चलें. लेकिन अब अगर कभी टकराव होता है तो उसे सुप्रीम कोर्ट दुरुस्त करता रहा है. डा. अंबेडकर ने कहा था कि भले ही संविधान कितना ही अच्छा हो, उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं हैं, तो वह भी बुरा साबित हो सकता है. अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल तमिलनाडु, बल्कि सभी राज्यों के लिए एक संवैधानिक चेतावनी भी है कि राज्यपालों को लोकतंत्र के पहरेदार की भूमिका में रहना चाहिए.

केंद्र सरकार को अंबेडकर की पूजा करने से बेहतर है कि वह उन के बनाए संविधान पर चले. संविधान और डाक्टर अंबेडकर जैसी ही हालत में महिलाएं पहुंच गई है. उन को लक्ष्मी बता कर पूजा किया जाता है. अधिकार उन को नहीं दिए जाते हैं. संविधान ने लड़कियों को पिता की संपत्ति में बराबर का हक दिया है.

देश के कितने परिवारों ने इस हक को दिया. क्या सरकार ने कोई पहल की. आज भी लड़कियों को पिता की संपत्ति अधिकार नहीं दिया जाता है. घर की मालकिन उस का कहा जाता है पर मकान और बिजनैस पर नाम पुरूष के अधिकार में होता है स्टांप डयूटी बचाने के लिए महिला के नाम रजिस्ट्री भले हो जाए पर जमीन मकान पर असल अधिकार आदमी का ही होता है.

जिस तरह से लक्ष्मी के रूप में औरतों को पूजा तो जाता है उसी तरह से अंबेडकर और संविधान की पूजा तो होती है लेकिन उस के बताए रास्तें पर चलते नहीं हैं. समाज में दलितों की हालत अभी भी बहुत सोचने वाली है. उन को घोडी पर चढ़ने से रोका जाता है. मूछें नहीं रखने दी जाती हैं. बारबार मनुस्मृति का हवाला दिया जाता है. दलित इस समाज का हिस्सा नहीं है यह जताने की कोशिश होती है. वह अंबेडकर की पूजा कर सकते हैं लेकिन मंदिर में मूर्ति की पूजा करने से रोका जाता है.

राष्ट्रपति को राममंदिर के शिलान्यास और संसद के उद्घाटन समारोह में दूर रखा जाता है. देश का सब से बडा संवैधनिक पद होने के बाद उन की उपेक्षा की गई. विपक्ष लगातार इस बात को उठाता रहा इस के बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ. यह मनुवादी मानसिकता को दिखाता है जहां घर की औरत को या कोई नेता उस के अधिकार कुछ नहीं है. दलित भी इसी कड़ी में आते हैं. उन के नाम पर बड़ीबड़ी बातें होती हैं लेकिन उन को बराबरी का हक नहीं मिलता है.

एससी के खिलाफ कानून के तहत 2022 में दर्ज किए गए 51,656 मामलों में से उत्तर प्रदेश में 12,287 मामलें सामने आए. जो सब से अधिक है. दलितों के खिलाफ अत्याचार के मामलों में भाजपा शासित राज्य यूपी, एमपी, राजस्थान और बिहार सब से ऊपर है. अनुसूचित जाति के खिलाफ 2022 में अत्याचार के सभी मामलों में से लगभग 97.7 प्रतिशत मामले 13 राज्यों में दर्ज किए गए, जिन में उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में ऐसे सब से अधिक अपराध दर्ज किए गए.

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत नवीनतम सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जनजाति (एसटी) के खिलाफ अधिकांश अत्याचार भी इन 13 राज्यों में केंद्रित थे, जहां 2022 में सभी मामलों में से 98.91 प्रतिशत मामले सामने आए. उत्तर प्रदेश, राजस्थान, और मध्य प्रदेश में सब से अधिक मामले सामने आए.

अनुसूचित जाति (एससी) के खिलाफ कानून के तहत 2022 में दर्ज किए गए 51,656 मामलों में से, उत्तर प्रदेश में 12,287 के साथ कुल मामलों का 23.78 प्रतिशत हिस्सा था, इस के बाद राजस्थान में 8,651 (16.75 प्रतिशत) और मध्य प्रदेश में 7,732 (14.97 प्रतिशत) थे. अनुसूचित जाति के खिलाफ अत्याचार के मामलों की ज्यादा संख्या वाले अन्य राज्यों में बिहार 6,799 (13.16 प्रतिशत), ओडिशा 3,576 (6.93 प्रतिशत), और महाराष्ट्र 2,706 (5.24 प्रतिशत) थे. इन 6 राज्यों में कुल मामलों का लगभग 81 प्रतिशत हिस्सा है.

2022 के दौरान भारतीय दंड संहिता के साथसाथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत पंजीकृत अनुसूचित जाति के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार के अपराधों से संबंधित कुल मामलों (52,866) में से 97.7 प्रतिशत (51,656) मामले 13 राज्यों में हैं.

इसी तरह, एसटी के खिलाफ अत्याचार के अधिकांश मामले 13 राज्यों में केंद्रित थे. इस के तहत दर्ज 9,735 मामलों में से, मध्य प्रदेश में सब से अधिक 2,979 (30.61 प्रतिशत) मामले दर्ज किए गए. राजस्थान में 2,498 (25.66 प्रतिशत) के साथ दूसरे सब से अधिक मामले थे, जबकि ओडिशा में 773 (7.94 प्रतिशत) दर्ज किए गए. ज्यादा संख्या में मामलों वाले अन्य राज्यों में 691 (7.10 प्रतिशत) के साथ महाराष्ट्र और 499 (5.13 प्रतिशत) के साथ आंध्र प्रदेश भी शामिल हैं.

कोर्ट से ले कर अपराध के आंकड़ें तक बता रहे हैं कि कानून और संविधान का कितना पालन हो रहा है. ऐसे में केवल दिखावे के लिए डाक्टर अंबेडकर की मूर्ति पूजा से बदलाव नहीं आएगा. देश में बदलाव आए. दलित हो या औरतें उन को सही तरह से अधिकार दिए जाएं. घरों में लड़कियों को आज भी खराब स्कूल में पढ़ने भेजा जाता है. उन के कैरियर को बढ़ाने के लिए पैसे खर्च करते समय घर वाले कई बार सोचते हैं.

शादीविवाह के मसलों में भी लड़कियों के अधिकार न के बराबर हैं. महिला कितने बच्चे पैदा करेंगी यह तय करने का काम पुरूष करता है. संविधान महिलाओं को पूरी आजादी देता है. समाज अभी भी संकीर्ण मानसिकता का परिचय देता है. संविधान निर्माता डाक्टर अंबेडकर को सच्ची श्रद्वांजलि वह होगी जब सरकार उन के बनाएं संविधान पर चले. उन की मूर्ति पर फूल चढ़ाने के लाभ नहीं होने वाला है.

Romantic Story : अनुभव – परेश के साथ आखिर उस रात क्या हुआ

Romantic Story : पहाड़ियों पर कार सरपट भागी जा रही थी. ड्राइवर को शायद घर पहुंचने की ज्यादा जल्दी थी, वरना सांप जैसे टेढ़ेमेढ़े रास्तों पर इस तरह कौन खतरा मोल लेता है?

सूरज तेजी से डूबने वाला था. परेश का मन भी शायद सूरज की तरह ही बैठा हुआ था, लेकिन पहाड़ों की जिंदगी उसे बहुत सुकून देती आई थी. जब भी छुट्टी मिलती वह भागा चला जाता था.

परेश की जिंदगी बहुत अजीब थी. नाम, पैसा, शोहरत सब था लेकिन मन के अकेलेपन को दूर करने वाला साथी कोई नहीं था.

पहाड़ों पर सूरज छिपते ही अंधेरा तेजी से पसरने लगता है. जल्दी ही रात जैसा माहौल छाने लगता है. अचानक एक मोड़ पर जैसे ही कार तेजी से घूमी, परेश की नजर घाटी की एक चट्टान पर पड़ी. एक लड़की वहां खड़ी थी. इस मौसम में अकेली लड़की की यह हालत परेश को खटक गई.

उस ने ड्राइवर को कार रोकने को कहा. ड्राइवर ने फौरन कार रोक दी. ‘चर्र… चर्र…’ की तेज आवाज पहाड़ों के शांत माहौल को चीर गई.

ड्राइवर ने हैरानी से परेश की ओर देखा और पूछा, ‘‘क्या हुआ साहबजी?’’

परेश ने बिना कोई जवाब दिए कार का दरवाजा खोला और बिजली की रफ्तार से उस ओर भागा जहां वह लड़की खड़ी दिखी थी.

परेश ज्यों ही वहां पहुंचा लड़की ने नीचे छलांग लगा दी. लेकिन परेश ने गजब की फुरती दिखाते हुए उसे नीचे गिरने से पहले ही पकड़ लिया.

परेश ने फौरन उस लड़की को पीछे खींचा. वह पलटी तो परेश की ओर अजीब सी नजरों से देखने लगी.

‘‘क्या कर रही थी?’’ परेश ने उस लड़की का हाथ पकड़े हुए पूछा.

‘‘कुछ नहीं…’’ लड़की बोली.

‘‘कहां जाना है? इस वक्त सुनसान इलाके में इतनी खतरनाक जगह… क्या करना चाहती थी?’’ परेश ने फिर गुस्से से पूछा.

‘‘अरे, मैं तो सैरसपाटे के लिए… बस यों ही… पैर फिसल गया शायद…’’ कहते हुए लड़की ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया.

परेश उस लड़की को अपनी कार की ओर ले आया. लड़की ने कोई विरोध भी नहीं किया. ड्राइवर उस लड़की को शक भरी नजरों से घूरने लगा. परेश की पूछताछ अभी भी जारी थी. थोड़ी देर बाद वह लड़की अपने मन का गुबार निकालने लगी.

परेश यह जान कर हैरान हुआ कि वह घर से भागी हुई थी और किसी भी कीमत पर वापस लौटने को तैयार नहीं थी. उस के अशांत मन का गुस्सा साफ झलक रहा था.

‘‘अब कहां ठहरी हो आप?’’ परेश ने पूछा.

‘‘मैं… अरे, मुझे मरना है, जीना ही नहीं, इसलिए ठहरने की क्या बात आई?’’ इतना कह कर वह लड़की खिलखिला कर हंस पड़ी.

‘‘यह क्या बात हुई. आप को पता है कि आप के मातापिता कितना परेशान होंगे…’’ परेश ने शांत लहजे में उसे समझाते हुए कहा.

‘‘मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ वह लड़की बेतकल्लुफ अंदाज से बोली.

‘‘मैं परेश… लेखक. यहां किताब पूरी करने आया हूं.’’

‘‘अच्छा, आप लेखक हैं? फिर तो मेरी कहानी भी जरूर लिखना… एक पागल लड़की, जिस ने किसी की खातिर खुद को मिटा दिया.’’

‘‘आप ऐसी बातें न करें. जिंदगी बेशकीमती है, इसे खत्म करने का हक किसी को नहीं,’’ परेश ने कहा.

‘‘मेरा नाम है गरिमा सिंह… एक हिम्मती लड़की जिसे कोई नहीं हरा सकता, पर नकार जरूर दिया.’’

‘‘आप ऐसा मत कहिए…’’ परेश अपनी बात पूरी करता उस से पहले ही गरिमा ने उस की बात काट दी, ‘‘आप मुझे यहीं उतार दीजिए…’’

‘‘मैं आप को अब कहीं नहीं जाने दूंगा. क्या आप मेरे साथ रहेंगी?’’

गरिमा ने पहले परेश की तरफ देखा, फिर अचकचा कर हंस पड़ी, ‘‘देख लीजिए, कोई नई कहानी न बन जाए?’’

परेश को शायद ऐसे सवाल की उम्मीद न थी. उस की सोच अचानक बदल गई. आखिर था तो वह भी मर्द ही. जोश को दबाते हुए वह बोला, ‘‘कोई नहीं जो कहानी बने, लेकिन अब अपने साथ और खिलवाड़ मत कीजिए.’’

‘‘मरने वाला कभी किसी चीज से डरा है क्या सर…?’’ इस बार गरिमा की आवाज में गंभीरता झलक रही थी.

अचानक ड्राइवर ने कार रोकी. दोनों ने सवालिया नजरों से उसे देखा. कार में कोई खराबी आ गई थी जिसे वह ठीक करने में जुटा था.

अब रात होने लगी थी. तभी ड्राइवर ने परेश को आवाज लगाई, ‘‘साहब, बाहर आइए.’’

परेश हैरानी से कार से बाहर निकला. ड्राइवर बोनट खोले इंजन को दुरुस्त करने में बिजी था. उस ने गरदन ऊपर उठाई और परेश के कान में फुसफुसा कर कहा, ‘‘साहबजी, कार को कुछ नहीं हुआ है. आप को एक बात बतानी थी, इसलिए यह ड्रामा किया.’’

‘‘क्या?’’ परेश ने पूछा.

‘‘साहबजी, यह लड़की मुझे सही नहीं लग रही. आजकल पहाड़ों में… मुझे डर है कि कहीं आप के साथ कुछ गलत न हो जाए.’’

‘‘अरे, तुम चिंता मत करो… मैं सब समझता हूं.’’

‘‘ठीक है साहब, आप की जैसी मरजी,’’ ड्राइवर ने लाचारी से कहा.

‘‘अच्छा, हमें ऐसी जगह ले चलो जहां भीड़भाड़ न हो,’’ परेश ने कहा.

सीजन नहीं होने से भीड़भाड़ नहीं थी. शहर से थोड़ा दूर एक बढि़या लोकेशन पर उन्हें ठहरने की शानदार जगह मिल गई. ड्राइवर उन्हें होटल में छोड़ कर वापस चला गया.

कमरे में आते ही गरिमा का अल्हड़पन दिखने लगा था. अब ऐसा कुछ नहीं था जिस से लगे कि वह थोड़ी देर पहले जान देने जा रही थी.

रात के 9 बज रहे थे. डिनर आ गया था. गरिमा बाथरूम में थी. थोड़ी देर बाद परेश की ड्रैस पहन कर वह बाहर निकली तो एकदम तरोताजा लग रही थी. उस की खूबसूरती परेश को मदहोश करने लगी.

डिनर निबट गया. एक बैड पर लेटे दोनों उस मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे जिस की वजह से गरिमा इतनी परेशान थी.

गरिमा की कहानी बड़ी अजीब थी. कालेज के बाद उस ने जिस कंपनी में काम शुरू किया वहीं उस के बौस ने उसे प्यार के जाल में ऐसा फंसाया कि वह अभी तक उस भरम से बाहर नहीं निकल पा रही थी. अधेड़ उम्र का बौस उसे सब्जबाग दिखाता रहा और उस से खेलता रहा.

जब गरिमा के मम्मीपापा को इस बात की भनक लगी तो उन्होंने उसे बहुत समझाया. सख्ती भी की लेकिन एक बार तीर कमान से निकल जाए तो फिर उसे वापस कमान में लौटाना मुमकिन नहीं होता. कुछ परवरिश में भी कमी रही. न पापा को फुरसत और न मम्मी को.

गरिमा को पुलिस का डर नहीं था. वह पहले भी 4 बार ऐसा कर चुकी थी, इसलिए उस के मातापिता अब पुलिस में शिकायत करा कर अपनी फजीहत नहीं कराना चाहते थे.

गरिमा सो चुकी थी. परेश उस के बेहद करीब था. उस की सांसों की उठापटक एक अजीब सा नशा दे रही थी. आहिस्ता से उस का हाथ गरिमा की छाती पर चला गया. कोई विरोध नहीं हुआ. कुछ पल ऐसे ही बीत गए.

परेश कुछ और करता, उस से पहले ही गरिमा ने अचानक अपनी आंखें खोल दीं, ‘‘आप की क्या उम्र है सर?’’

‘‘यही कोई 40 साल…’’ परेश ने जवाब दिया.

‘‘गुड, मैच्योर्ड पर्सन… अच्छा, एक बात बताओ… मैं कैसी लग रही हूं?’’ मुसकराते हुए गरिमा ने पूछा.

‘‘बहुत ज्यादा खूबसूरत,’’ परेश ने जोश में कहा.

इस में कोई शक नहीं था कि गरिमा की अल्हड़ जवानी, मासूमियत से लबरेज खूबसूरती सच में बड़ी दिलकश लग रही थी.

‘‘सच में…?’’

‘‘सच में आप बहुत खूबसूरत हैं,’’ परेश ने अपनी बात दोहराई.

‘‘लेकिन मैं खूबसूरत ही होती तो वह मुझे क्यों छोड़ता… दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर किया उस ने…’’

‘‘प्लीज गरिमा, आप हकीकत को मान क्यों नहीं लेतीं? जो हुआ सही हुआ. पूरी जिंदगी पड़ी है आप की. वहां उस के साथ क्या फ्यूचर था, यह भी सोचो?’’

‘‘इतना आसान नहीं है सर, किसी को भुला देना. प्यार किया है मैं ने…’’

‘‘मान लिया लेकिन तुम में समझ ही होती तो क्या ऐसे प्यार को अपनाती?’’

‘‘सर, यह सही है कि हम में थोड़ा उम्र का फर्क था लेकिन उस के बीवीबच्चे थे, यह मुझे अब पता चला… धोखा किया उस ने मेरे साथ…’’

‘‘तो फिर तुम उसे अब क्यों याद कर रही हो? बुरा सपना बीत गया. अब तो वर्तमान में लौट आओ?’’

गरिमा ने कोई जवाब नहीं दिया. वह परेश के बहुत करीब लेटी थी. सच तो यह था कि परेश अब बहुत दुविधा में था.

गरिमा का हाथ परेश की छाती पर था. उस का इस तरह लिपटना उसे असहज कर रहा था. उस के अंदर शांत पड़ा मर्द जागने लगा. गरिमा के मासूम चेहरे पर कोई भाव नहीं थे.

‘‘क्या तुम्हें मुझ से डर नहीं लगता?’’ परेश ने पूछा.

‘‘नहीं, मुझे आप पर भरोसा है,’’ गरिमा ने शांत आवाज में जवाब दिया.

‘‘क्यों… मैं भी मर्द हूं… फिर?’’ परेश ने पूछा.

‘‘कोई नहीं सर… अब मैं इनसान और जानवर में फर्क करना सीख गई हूं.’’

गरिमा के जवाब से परेश को ग्लानि महसूस हुई. वह फौरन संभल गया. गरिमा क्या सोचेगी… हद है मर्द कितना नीचे गिर सकता है? परेश का मन उसे कचोटने लगा.

लेकिन गरिमा का अलसाया बदन परेश में भूचाल ला रहा था. गरिमा का खुलापन अजीब राज बन रहा था. वह समझ नहीं पा रहा था कि इस इम्तिहान में कैसे पास हो…

गरिमा अब भी उस से लिपटी हुई थी. उस की आंखों में नींद की खुमारी झलक रही थी.

परेश सोच रहा था कि गरिमा का ऐसा बरताव उस के लिए न्योता था या अपनेपन में खोजता विश्वास…

परेश की दुविधा ज्यादा देर नहीं चली. उस की हालत को समझ कर गरिमा बोली, ‘‘अगर आप इस समय मुझ से कुछ चाहते हैं तो मैं इनकार नहीं करूंगी… आप की मैं इज्जत करती हूं… आप ने मुझे आज नई जिंदगी दी है.’’

‘‘अरे नहीं, प्लीज… ऐसा कुछ भी नहीं… तुम दोस्त बन गई हो… बस यही बड़ा गिफ्ट है मेरे लिए,’’ सकपकाए परेश ने जवाब दिया.

‘‘उम्र में छोटी हूं सर लेकिन एक बात कहूंगी… शरीर का मिलन इनसान को दूर करता है और मन का मिलन हमेशा नजदीक, इसलिए फैसला आप पर है…’’

परेश को महसूस हुआ, सच में समझ उम्र की मुहताज नहीं होती. छोटे भी बड़ी बात कह और समझ सकते हैं. 2 दिन सैरसपाटे में बीत गए. परेश की किताब का काम शुरू ही न हो पाया, लेकिन गरिमा अब बिलकुल ठीक थी. वह वापस अपने घर लौटने को राजी हो गई थी.

परेश ने फोन नंबर ले कर उस के पापा से बात की. घर से गुम हुई जवान लड़की की खबर पा कर गरिमा के मम्मीपापा ने सुकून की सांस ली.

परेश और गरिमा अब दोस्त बन गए थे. पक्के दोस्त, जिन में उम्र का फर्क  तो था लेकिन आपसी समझ कहीं ज्यादा थी. परेश की मेहनत रंग लाई और गरिमा अपने घर वापस लौट गई. कुछ दिन बाद उस की शादी भी हो गई. अब वह अपनी गृहस्थी में खुश थी.

परेश के लिए यह सुकून की बात थी. अकसर उस का फोन आ जाता, वही बिंदास, अल्हड़पन लेकिन अब सच में उस ने जिंदगी जीनी सीख ली थी. दिखावा नहीं बल्कि औरत की सच्ची गरिमा का अहसास और जिम्मेदारी उस में आ गई थी.

परेश सोचता था कि गरिमा को उस ने जीना सिखाया या गरिमा ने उसे? लेकिन यह सच था कि गरिमा जैसी अनोखी दोस्त परेश को औरत के मन की गहराइयों का अहसास करा गई.

Online Hindi Story : पतरसुटकी – समाज के दोगलेपन को दर्शाती कहानी

Online Hindi Story : 6 फुट 2 इंच का कद, ऊंचा माथा, सांवला रंग, इतालवी मुखकृति, तिरछी मुसकराहट, नए स्टाइल का चश्मा, कनपुरिया टशन और बातों में विनोदभाव आदि सबकुछ तो है सक्सेनाजी के पास जो महिलाओं को उन से निकटता बढ़ाने को मजबूर कर देता है. उम्र भले ही 50 वर्ष के करीब हो पर कदकाठी से अभी 10 साल कम ही लगते हैं और चेहरा भले ही हिंदी फिल्मों के नायक जैसा न हो पर उस में बसी सचाई सब को यह बता देती है कि सक्सेनाजी किसी का बुरा नहीं चाहते हैं.

आजकल सक्सेनाजी नौकरी में स्थानांतरण के चलते धामपुर में रहने लगे हैं. भई, धामपुर ठहरा एक छोटा सा कसबा और जैसा कि छोटे कसबों में होता है, यहां की जिंदगी भी बड़ी सरल है. जल्दी सुबह लोगों का जग जाना, पुरुषों का अपनी आजीविका में जुट जाना, शाम सूरज की तपिश कम होते ही महल्ले की महिलाओं का अपनी छत पर आ कर पड़ोसिनों से खाने में क्या बनाया के साथसाथ पूरे महल्ले की खबरें चटकारों के साथ साथ करना और आखिरकार रात के 9 बजते ही सड़क पर सन्नाटा हो जाना, बस यही जिंदगी है धामपुर की.

सक्सेनाजी तो बोरियत में समय काट रहे थे, वह तो भला हो धर्मपत्नीजी का जो साथ रहने और गृहस्थी सैट करने धामपुर आ गईं. तब जा कर धर्मपत्नी के माध्यम से सक्सेनाजी को पता चला कि सामने के मकान वाली घर में बिना काम के बोर होती रहती हैं और पीछे वाले घर की जो 2 चचेरी नवयौवना बहनें हैं, एकदम बिलरिया माफिक हैं और जब तक सड़क के चार चक्कर न मार लें, उन का खाना नहीं पचता है और मिसेज वर्मा थोड़ी सी दिलफेंक हैं वगैरहवगैरह. मकान मालकिन ने आते ही घर में लगे आम के पेड़ से एक डलिया आम दिए और साथसाथ यह भी बता दिया कि सामने किराने की दुकान वाली का पंडित से और बगल में ढेर सारे कुत्ते पालने वाली शुक्लाइन का अपने किराएदार से चक्कर चल रहा है. सक्सेनाजी तो भौचक रह गए कि कैसे इतना छोटा कसबा इतना जीवंत हो सकता है और फिर चेहरे पर उन के एक मुसकान तैर गई.

अब वैवाहिक जीवन के इतने वर्षों बाद उन्हें यह समझ आ पाया कि आप ने भले ही देशदुनिया की तमाम खबरें याद कर के प्रतियोगी परीक्षाएं पास कर ली हों पर ये धर्मपत्नियां ही हैं जो महल्ले की सूचनाओं से पुरुषों को अपडेट रख सकती हैं. सक्सेनाजी को मुसकराते हुए देख धर्मपत्नीजी ने अपनी बड़ीबड़ी गोल आंखों को नचा कर नसीहत दी कि, ‘‘अपने काम से काम रखना और महल्ले की लड़कियों व भाभियों से दूर ही रहना वरना तिल का ताड़ बनते यहां देर नहीं लगेगी. वैसे भी, मिसेज वर्मा आप को बड़े स्टाइल से देखती हैं और मुझ ही से कह रही थीं कि अच्छा हुआ आप आ गईं वरना भाईसाहब को तो बहुत बोरियत होती होगी जैसे बोरियत मिटाने को वे ही उत्सुक हों.’’

धर्मपत्नी के आने से अब सक्सेनाजी की जिंदगी भी आसान हो गई. होटलों के खाने से मुक्ति मिल कर घर का भोजन मिलने लगा उन्हें और शाम को पत्नी से अपने पैर दबवातेदबवाते, टैलीविजन देखते हुए सोने का सुख. धामपुर जैसे छोटे कसबे में इस से बढ़ कर जिंदगी और कितनी आसान हो सकती थी कि सुबह उठने के बाद बालकनी में बैठ अपने जीवनसाथी के साथ कड़क चाय की चुस्कियां लेने का समय मिल जाए.
बालकनी के सामने सड़क पार गन्ना समिति का कार्यालय है जो पेड़पौधों से भरपूर होने की वजह से आंखों को प्रकृति का महत्त्व समझते हुए एक अलग ही सुकून देता है. एक मिनी जंगल ही कह लीजिए, इतने पेड़ हैं यहां और इन पेड़ों पर पक्षियों की चहचहाहट, कोयल की कूक, तितलियों की मटरगश्ती, चील के एक परिवार की गुंडागर्दी करती आवाजें सबकुछ तो था यहां जो प्रकृति से आप को जोड़ कर रख सकता है.

अजी साहब, कानपुर में तो यह सब देखने के लिए टिकट ले कर चिडि़याघर ही जाना पड़ जाता पर प्रकृति से इतना जुड़ाव महसूस तब भी नहीं हो पाता. उस के ऊपर सुबह की चाय के समय बालकनी में बैठ कर महल्ले वालों से नमस्कार भी हो जाता है. कुछ लोग तो सुबह के रैगुलर ही हैं जैसे सामने वाली मोना की मम्मी, परचून वाले ताऊ, दूध वाला बनवारी और कूड़ा बिनने वाली एक हड्डी की मैलाकुचैला कपड़ा पहने एक अनाम किशोरी जिस को सक्सेनाजी की धर्मपत्नी ने पतरसुटकी नाम दिया है. कानपुर में रह कर तो रविवार को बालकनी में साथ बैठ चाय ही पी लें, यह भी कम ही संभव हो पाता था.

बहरहाल सक्सेनाजी की गृहस्थी सज गई और धर्मपत्नी का धामपुर प्रवास समाप्त होने का समय आ गया. सरकारी विद्यालय में धर्मपत्नीजी प्रधानाचार्या हैं, अवकाश खत्म हो गया तो विरह की बेला भी आ गई. ट्रेन में बैठ कर धर्मपत्नीजी की आंखों की कोर गीली हो चली थीं, सक्सेनाजी का भी गला रूंधा था और वे ट्रेन की चाल के साथ यथासंभव पदचाल कर, रेंगती ट्रेन में बैठी पत्नी को जाता हुआ देख विदा कर घर वापस पहुंच गए. घर में अब फिर से एक बार सन्नाटा पसर चुका है और पायलों की रुनझुन गायब है. शादी के बाद से यह पहला मौका है जब अपनी धर्मपत्नी से सक्सेनाजी को दूर रहना पड़ रहा है तो जनाब दुख तो बनता है. एक बार फिर से शाम अकेली और सुबह आलसी हो चली है.

हां, सुबह बालकनी में बैठ कर चाय की चुस्कियां लेते हुए नाश्ता करने की ऐसी आदत पड़ी है कि यही एक काम ऐसा बचा है जिस को सक्सेनाजी अभी भी तत्परता से करते हैं. भला हो व्हाट्सऐप का कि चाय के साथ वीडियोकौल चल रही होती है और दूसरी तरफ धर्मपत्नीजी फोन पर मुसकराते हुए गुडमौर्निंग कर लेती हैं. अंडे उबालते हैं सक्सेनाजी नाश्ते में ब्रैड के साथ खाने के लिए तो धर्मपत्नीजी हर बार याद दिलाती हैं कि अंडे की सिर्फ सफेदी खानी है, बीच का पीला हिस्सा नहीं वरना कोलैस्ट्रौल की शिकायत जो थोड़ीथोड़ी शुरू हो चुकी है, घर जमा लेगी शरीर में.

सक्सेनाजी स्वयं भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हैं, सो अंडे में से पीला हिस्सा निकाल कर प्रोटीन वाला सफेद हिस्सा ही नमक व पिसी कालीमिर्च डाल कर खाते हैं और साथ में नीचे गली से गुजरने वाले लोगों से नमस्कार भी होता रहता है. गली के कुत्ते शुक्र मनाते हैं मुए कोलैस्ट्रौल का कि अब उन को रोज ही अंडे का पीला हिस्सा मिलता है खाने को और वह भी उबला हुआ.

वहीं, कूड़ा बीनने वाली किशोरी पतरसुटकी अपनी दुर्बल काया पर कूड़े की एक बड़ी सी गठरी लिए कूड़ा बीनती है और रोज की तरह कूड़ा बीनने के बाद ताऊ की दुकान से 5 रुपए वाला एक बन खरीद कमर में खोंस लेती है. फिर फुटपाथ पर गठरी रख सुस्ताते हुए बन खा कर सड़क के हैंडपंप से पानी पीती और अपनी राह चल देती. पता नहीं गली के कुत्तों को इन कूड़ा बीनने वालियों से क्या दुश्मनी होती है कि उन को देखते ही ये ऐसे भूंकने लगते हैं जैसे पिछले सात जन्मों की दुश्मनी हो. एकबारगी अपने जानी दुश्मन बिल्लियों को ये माफ कर दें पर बंदरों और कूड़ा बीनने वालों को तो गली के बाहर पहुंचा कर ही ये दम लेते हैं. इसलिए जब तक ये कुत्ते अंडे का पीला हिस्सा खाने के लालच में मुंह उठा कर सक्सेनाजी को घूरते रहने में व्यस्त रहते हैं, कूड़ा बीनने वाली पतरसुटकी शांति से गली पार कर लेती है. बस, अब यही रूटीन बचा है सक्सेनाजी की सुबह का.

आज लेकिन एक अचंभे वाली बात हो गई, बालकनी पर सक्सेनाजी अंडे का नाश्ता कर रहे हैं, परचून वाले ताऊ ने अपनी दुकान खोल ली है, बनवारी साइकिल में दूध के पीपे बांध दूध देने आ गया है, पतरसुटकी कूड़ा बीन रही है पर रोज समय के पाबंद कुत्ते आज गली में कहीं नहीं दिख रहे हैं. लगता है आज उन को अंडे के पीले हिस्से से ज्यादा लजीज नाश्ता कहीं मिल गया है. सक्सेनाजी को अंडे के पीले हिस्से को देख बुरा लग रहा है कि आज ये बेकार ही जाएंगे, इस से तो कुत्ते आ जाते तो कम से कम किसी के पेट में जाते. यह सोचतेसोचते सक्सेनाजी सीढि़यों से नीचे उतरे और अंडों के पीले हिस्से को एक दोने में गेट के बाहर रख आए ताकि जब भी कुत्ते आएं उन को पीले हिस्से खाने को मिल जाएं.

वापस बालकनी में पहुंचे ही थे कि देखा, पतरसुटकी ने आ कर पीतक को बन के बीच में लगा कर बर्गर बनाया और खाने लगी. उस की मिचमिची सी आंखों में सादे बन की जगह अंडे वाला बर्गर खाने की खुशी साफ दिख रही थी.

सक्सेनाजी ने पतरसुटकी से कहा, ‘‘क्यों री, तू तो देखती ही होगी कि मै अंडे का पीला हिस्सा नहीं खाता हूं, तू ने कभी अपने लिए क्यों नहीं मांगा? जानवर के पेट में तो जाने से अच्छा है कि वह तुम्हें मिल जाता.’’

पतरसुटकी ने सकुचाते हुए बताया, ‘‘मुझे कुत्तों से डर लगता है और मांगने में शर्म आती है, इसलिए कभी कहने की हिम्मत नहीं हुई.’’
‘‘कोई बात नहीं, अब तुम कल से जीने में आ कर मुझ से अंडा ले लिया करना, कुत्ते परेशान नहीं करेंगे,’’ यह कह कर सक्सेनाजी अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गए और पतरसुटकी भी अपने रास्ते पर बढ़ गई.

तो अब अगले दिन से रूटीन बदल गया. सक्सेनाजी पतरसुटकी के ‘साहब’ आवाज लगाते ही जीने पर आते और अंडे का पीला हिस्सा अब कुत्तों की जगह पतरसुटकी को मिलने लगा. सक्सेनाजी रात का बचा भोजन भी अब पतरसुटकी को ही देने लगे. एक सुकून अब उन के दिल में था कि चलो अन्न बरबाद नहीं हो रहा है. अब किसी इंसान का भला हो जाएगा. ऐसे तो अन्न खराब नहीं होता, किसी न किसी का ग्रास बनता ही है, फिर चाहे वह मनुष्य हो या कोई सूक्ष्म जीव लेकिन किसी इंसान के पेट में चला जाए तो अन्न उगाने वाले किसान की मेहनत सफल रहती है.

जैसे सूखी धरती पर बारिश का पानी पड़ते ही मिट्टी के नीचे दबे बीजों में कोंपलें फूट पड़ती हैं वैसे ही पतरसुटकी के कुपोषित शरीर में अंडा और भोजन जाते ही निखार आने लगा था. मिचमिचाई सी आंखें सक्सेनाजी के प्रति कृतज्ञता के भाव में अब बड़ी दिखने लगी थीं और पिचके हुए गाल अब फूलने लगे थे. चेहरे पर भरे हुए पेट का सुकून झलकने लगा था.

जैसा कि धामपुर जैसे छोटे कसबों में होता है, यह खबर भी बाकी अन्य खबरों की तरह महल्ले में फैल गई. समय बीता तो धीरेधीरे तिल का ताड़ और राई का पहाड़ भी बनने लगा. अब महल्ले में बात यह नहीं हो रही थी कि कुत्तों की जगह पतरसुटकी को अंडा मिलता है बल्कि चर्चा का केंद्र इस बात पर था कि पतरसुटकी अंडा लेने जाते समय जीने में कितनी देर रुकती है, सक्सेनाजी और उस के बीच इतनी देर में क्याक्या होता और हो पाता होगा. और सब से बड़ी बात यह कि सक्सेनाजी का इस दरियादिली के पीछे का छिपा वाला मकसद क्या हो सकता है.

मिसेज वर्मा ने महल्ले में अपने गुप्त सूत्रों के माध्यम से पता कर के बताया कि शरीफों के इस महल्ले में बाहर से आने वाले सक्सेनाजी जरूर पत्नी न होने के चलते चक्कर चलाने की कोशिश कर रहे हैं. ‘‘पता नहीं इस कूड़ा बीनने वाली में क्या है जो सक्सेनाजी इस के पीछे पड़े हैं,’’ मिसेज वर्मा द्वारा बालों को पीछे करते हुए महल्ले की महिलाओं से प्रश्न दागा गया.

उत्तर में परचून वाले ताऊ की ताई ने मुंह से पल्लू निकाल कर अपने अनुभवों का निचोड़ सांझ किया कि, ‘‘मर्द होते ही ऐसे हैं, इन के जब आग लगती है तो ये शक्ल और उम्र नहीं देखते.’’

मौका देख शुक्लाइन ने अपने पशुप्रेम को जाहिर किया कि ‘‘इस से तो कुत्तों को ही अंडा मिल जाता, इंसान तो अपनी खुराक का इंतजाम कहीं न कहीं से कर ही लेता है पर बेजबान क्या करे.’’

‘‘हायहाय अब तो इस महल्ले में शरीफों का सांस लेना दूभर हो जाएगा,’’ एक आंख दबा कर मिसेज वर्मा ने जो यह कहा तो बाकी औरतें हंस पड़ीं.

ऐसे तो कोई बात नहीं थी पर सक्सेनाजी की मकान मालकिन को यह चुभ गई, आखिरकार सक्सेनाजी रहते तो उन्हीं के मकान में हैं. वह कहते हैं न कि बात फैली है तो दूर तलक जाएगी तो साहब यह बात भी दूर तक चलतेचलते मोबाइल के माध्यम से सक्सेनाजी की श्रीमती तक पहुंच ही गई. मकान मालकिन ने श्रीमती सक्सेना की शुभचिंतक होने के नाते महल्ले की बातों को हमराज किया और सलाह दी कि पतियों को टाइट रखने की जरूरत होती है. फिर क्या था, ट्रिंगट्रिंगट्रिंग आखिरकार सक्सेनाजी के फोन की घंटी बज ही गई.

‘‘समझया था न कि महल्ले की लड़कियों से दूर रहो. परोपकार करना था तो क्या वही पतरसुटकी मिली आप को. अब देखो, पीठपीछे क्याक्या बातें चल रही हैं महल्ले में. मैं आप को जानती हूं तो मुझे आप पर विश्वास है पर वह कहते हैं न कि बद अच्छा और बदनाम बुरा तो मुफ्त की बदनामी मोल क्यों ले रहे हो?’’ श्रीमतीजी का पारा सातवें आसमान पर था और बिना सांस लिए धाराप्रवाह में उन्होंने सक्सेनाजी को फोन पर ही अच्छे से दुनियादारी की हकीकत समझ दी.

सक्सेनाजी अपनी सफाई में सिर्फ इतना बोल पाए, ‘‘मैं तो पतरसुटकी का असली नाम तक नहीं जानता, बाकी तो बहुत दूर की बातें हैं.’’ लेकिन श्रीमतीजी की बात में भी दम था, ‘आखिर जहां रहना है वहां के मिजाज से ही रहना चाहिए’ जो बात सक्सेनाजी के दिल में तो न घुसी पर दिमाग में उस ने घर बना लिया.

अगले दिन ही सक्सेनाजी ने जीने में पूरी बात सम?ाते हुए पतरसुटकी से बड़ी झिझक के साथ अपनी मजबूरी को साझ किया. पतरसुटकी बदन से भले कमजोर थी पर दिमाग की सही थी, रोज कूड़ा बीनने के बाद भी दिमाग में कूड़ा नहीं भरा था उस के. बात का सार समझ गई और भरी आंखों से उस के मुंह से बस यह निकला कि, ‘‘कोई बात नहीं.’’

अचानक उस ने आगे बढ़ कर सक्सेनाजी के पैर छू लिए और अब सक्सेनाजी भी भरी आंखों से सिर्फ इतना कह पाए कि ‘‘खुश रहो.’’

शायद कलियुग में निस्वार्थ अबोध रिश्तों का अंजाम भरी आंखों पर ही होता है. बहरहाल, महल्ले में शराफत फिर से जिंदा हो गई है, कुत्तों को भरपेट भोजन मिलने लगा है और बहूबेटियां भी अब खुल कर सांस ले पा रही हैं. ताऊ दुकान खोल चुके हैं, मोना घर के बाहर झाड़ू लगा रही है, दूधवाला आ चुका है, पतरसुटकी आज भी 5 रुपए वाला बन कमर में खोंसे कूड़ा बिन रही है. बस, सक्सेनाजी अब छज्जे पर बैठ कर नाश्ता नहीं कर पा रहे हैं. पतरसुट्की, जिस का सही नाम उन को आज भी नहीं पता, से निगाह मिलने का डर जो है कि कैसे किसी कुपोषित इंसान के सामने अंडे की सफेदी का नाश्ता कर पाने की विलासिता को वे जी पाएंगे.

लेखिका – एकता सक्सेना

Hindi Kahani : तुम बिन जीया जाए कैसे – क्या अमन और अपर्णा फिर से एक हो सके

Hindi Kahani : जबसे अपर्णा अमन से लड़झगड़ कर अपने मायके चली गई थी तब से अमन खुद को दुनिया का सब से खुशहाल इनसान समझने लगा था. अब घर में न तो उसे कोई कुछ कहने वाला था और न ही हुक्म चलाने वाला. औफिस से आते ही आराम से सोफे पर पसर जाता. फिर कुछ देर बाद कपड़े उतार कर दरवाजे या डाइनिंग टेबल की कुरसी पर ही टांग देता. जूतों को भी उन के स्टैंड पर न रख कर डाइनिंग टेबल के नीचे सरका देता. खाना बनाने की तो कोई फिक्र ही नहीं थी. सुबह दूधब्रैड खा कर औफिस चला जाता और दोपहर का खाना औफिस की कैंटीन में खा लेता. रात के खाने की भी कोई चिंता नहीं थी. कभी बाहर से मंगवा लेता तो कभी एकाध दोस्त को भी अपने घर बुला लेता अथवा कभी किसी दोस्त के घर जा कर खा लेता था.

हमेशा की तरह आज अमन ने अपने दोस्त प्रेम को फोन कर के अपने घर बुलाया ताकि आराम से गप्पे मार सके. अपर्णा के जाने के बाद अमन की दिनचर्या कुछ ऐसी ही हो चुकी थी. बड़ा मजा आ रहा था उसे अपने मनमुताबिक जीने में. अपर्णा के रहते तो रोज किसी न किसी बात को ले कर घर में कलह होती रहती थी. मजाल जो अमन टीवी का रिमोट छू ले, क्योंकि अमन के औफिस से घर आने के समय अपर्णा का मनपसंद धारावाहिक चल रहा होता था. चिढ़ उठता था वह. उसे लगता जैसे यह घर सिर्फ अपर्णा का ही है और अपर्णा इस बात से चिढ़ उठती कि आते ही अमन अपने जूतेकपड़े खोल कर यहांवहां फैला देता.

‘‘यह क्या है अमन… देखो, तुम ने अपने कपड़े कहां लटका रखे हैं… तुम से कितनी बार कहा है कि इस तरह कपड़े, जूते यहांवहां न रखा करो. पर तुम्हें समझाने का कोई फायदा नहीं,’’ कह अपर्णा ने अमन के जूते उठा कर जूता स्टैंड पर दे मारे.

‘‘अच्छा ठीक है कल से याद रखूंगा,’’ अमन अजीब सा मुंह बनाते हुए बोला.

‘‘तुम कभी याद नहीं रखोगे, क्योंकि तुम्हारी आदत बन चुकी है यह. अरे, कपड़े हैंगर में लगा कर रख दोगे तो क्या बिगड़ जाएगा… मोजे भी कभी दोनों नहीं मिलते… तंग आ गई हूं मैं तुम से… बीवी नहीं एक नौकरानी बना कर रख छोड़ा है तुम ने मुझे,’’ बड़बड़ाते हुए अपर्णा किचन में चली गई.

‘‘तो मैं क्या तुम्हारा नौकर हूं जो दिनरात तुम्हारी सुखसुविधा के लिए खटता हूं? अरे, मैं भी तो थक जाता हूं औफिस में… आ कर इसीलिए थोड़ा सुस्ताने लगता हूं. तुम्हारी तरह घर में आराम नहीं फरमाता हूं, समझी?’’ अमन भी गुस्से से बोला.

अपर्णा चाय के कप को लगभग टेबल पर पटकते हुए बोली, ‘‘क्या कहा तुम ने मैं घर में आराम फरमाती हूं? घर का काम क्या कोई और कर जाता है? तुम मर्दों को तो हमेशा यही लगता है कि औरतें घर में या तो टीवी देखती रहती हैं या फिर आराम. कभी एक रूमाल भी धोया है खुद? बस और्डर किया और सब हाजिर मिल जाता है… कितना भी खटो पर कोई कद्र नहीं है हमारी,’’ अपर्णा बोली.

अमन भी चुप रहने वाला नहीं था. बोला, ‘‘तो क्या घरबाहर सब मैं ही करूं? पता नहीं अपनेआप को क्या समझती है… जब देखो हुक्म चलाती रहती है. औफिस में बौस की सुनो और घर में बीवी की. सोचता हूं घर में चैन मिलेगा, पर वह भी मेरे हिस्से में नहीं है… इस से तो अच्छा है घर ही न आया करूं.’’

यह इन का रोज का झगड़ा था. प्रेम विवाह किया था दोनों ने. जीवन भर साथ जीनेमरने का वादा किया था. पर प्रेम तो कहीं दिख ही नहीं रहा था. बस विवाह किसी तरह निभ रहा था.

इन का झगड़ा पासपड़ोस में चर्चा का विषय बन चुका था. हां, अमन था भी बेफिक्र इनसान. अपनी मस्ती में जीने वाला और उस की इसी बेफिक्री पर तो मरमिटी थी अपर्णा. तो आज क्यों उसे अमन की इस आदत से नफरत होने लगी? वैसे भी इनसान में सारी अच्छाइयां नहीं हो सकतीं न? अपर्णा को भी तो समझना चाहिए कि आखिर किस के लिए वह इतनी मेहनत करता… अपने परिवार के लिए ही न? क्या कभी किसी बात की कमी होने दी उस ने अपर्णा को? बस जबान से निकली नहीं और खरीद लाता… कभीकभी तो वह इस बात के लिए भी अमन से झगड़ पड़ती थी कि क्या जरूरत थी इतने पैसे खर्च करने की? तब अमन कहता कि कमाता किस के लिए हूं, तुम्हीं सब के लिए ही न?

मगर अपर्णा को इस बात का जरा भी एहसास नहीं था. जराजरा सी बात पर चिड़चिड़ा उठती थी. बेचारा अमन औफिस से थकाहारा यह सोच कर घर आता कि थोड़ा रिलैक्स करेगा पर सब बेकार. अपर्णा के तानाशाह व्यवहार के कारण उसे लगने लगा था कि या तो अपर्णा कहीं चली जाए या फिर वह खुद अपर्णा से दूर हो जाए. वह हमेशा उस वक्त को कोसता रहता था जब उस ने अपर्णा से शादी करने का फैसला किया था.

तभी दरवाजे की घंटी बज उठी. उसे लगा जैसे किसी अंधेरी गली से बाहर निकल आया हो.

‘‘आओआओ प्रेम, बड़ी देर लगा दी?’’ अमन ने कहा.

घर के अंदर कदम रखते ही प्रेम ने एक नजर अमन के पूरे घर पर दौड़ाई और फिर बोला, ‘‘सच में अमन तुम्हारा घर, घर नहीं कबाड़खाना लग रहा… क्या यार कैसे रह लेते हो इस घर में? छोड़ो गुस्सावुस्सा और जाओ जा कर भाभी और संजू को ले आओ… भाभी के लिए न सही पर संजू के लिए ही अपना गुस्सा थूक दो.’’

‘अकेले हैं तो क्या गम है…’ गाना गाते हुए अमन हंस पड़ा. फिर कहने लगा, ‘‘हां, सही कह रहा है तू… संजू के बिना मन कभीकभी बेचैन हो उठता है, पर अपर्णा… पागल हो गया है क्या? भले ही घर कबाड़खाना लगे पर मेरे मन को कितना सुकून मिल रहा है यह तू क्या जाने… बहुत घमंड था उसे कि उस के बिना मैं 1 दिन भी नहीं रह पाऊंगा… अरे जरा उसे भी तो पता चले कि उस के बिना भी मैं अच्छी तरह जी सकता हूं. चल, छोड़ ये सब… बता तेरा कैसा चल रहा है?’’

प्रेम बोला, ‘‘मैं तो ठीक हूं पर तू कितनी अच्छी तरह जी रहा है वह मैं देख रहा हूं. पतिपत्नी में नोकझोंक चलती रहती है. इस का यह मतलब थोड़े न है कि दोनों अपनेअपने रास्ते बदल लें. अब भी कहता हूं जा कर भाभी को ले आओ.’’

थोड़ी देर बैठने के बाद प्रेम यह कह कर वहां से चला गया कि उस की पत्नी उस का इंतजार कर रही होगी.

रात को अमन को नींद नहीं आ रही थी. वह सोच रहा था कि क्या उस ने अपर्णा को मायके जाने को मजबूर किया या वह खुद अपनी मरजी से गई? और संजू, वह बेचारा क्यों पिस रहा है उन के बीच? उस का कभी मन होता कि जा कर अपर्णा को मना कर ले आए, फिर मन कहता नहीं बिलकुल नहीं, खुद गई है तो खुद ही वापस आएगी. उसे फिर अपर्णा की जलीकटी बातें याद आने लगीं…

‘‘जब तुम्हारे औफिस में मीटिंग थी और डिनर भी वहीं था तो मुझे बताया क्यों नहीं? कब से भूखीप्यासी तुम्हारे इंतजार में बैठी हूं… और अभी आ कर बोल रहे हो कि खा कर आया हूं. आखिर समझते क्या हो अपनेआप को? क्या तुम मालिक हो और मैं तुम्हारी नौकरानी?’’

अमन के औफिस से आते ही चिल्लाते हुए अपर्णा ने कहा.

‘‘ऐसी बात नहीं है अपर्णा, मुझे तो पता भी नहीं था कि आज औफिस में डिनर का भी प्रोग्राम है. जब मुझे पता चला तो मैं तुम्हें फोन करने ही जा रहा था, पर नमनजी मुझे खींच कर खाने के लिए ले गए और फिर मेरे दिमाग से बात निकल गई,’’ अमन ने सफाई देते हुए कहा.

मगर अपर्णा कहां सुनने वाली थी. कहने लगी, ‘‘नहीं अमन, बात वह नहीं है. बात यह है कि तुम कमा कर लाते हो न इसलिए अपनी मन की करते हो… जानबूझ कर मुझे सताते हो… जानते हो जाएगी कहां?’’

‘‘अरे, मैं कह रहा हूं न कि मुझे पता नहीं था कि वहां डिनर का भी प्रोग्राम है. कब से दिमाग खराब किए जा रही हो… जाओ जो समझना है समझो,’’ अमन ने खीजते हुए कहा.

‘‘इस में समझना और समझाना क्या है? देखना, एक दिन मैं तुम्हें और इस घर को छोड़ कर चली जाऊंगी. तब तुम्हें पता चलेगा… तुम यह न समझना कि मेरा कोई ठिकाना नहीं है… क्योंकि अभी भी मेरा मायका है जहां मैं जब चाहूं जा कर रह सकती हूं,’’ अपर्णा गुस्से से बोली.

आखिर सहन करने की भी एक सीमा होती है. अब अमन का गुस्सा 7वें आसमान पर पहुंच चुका था. अत: बोला, ‘‘जाओ, मैं भी तो देखूं, मेरे अलावा कौन तुम्हारे नखरे उठाता है… मेरी भी जान छूटेगी… तंग आ गया हूं मैं तुम्हारे रोजरोज के झगड़ों से.’’

अपर्णा यह सुन कर अवाक रह गई, ‘‘क्या कहा तुम ने जान छूटेगी तुम्हारी मुझ से? तो फिर ठीक है, मैं कल ही जा रही हूं अपनी मां के घर और तब तक नहीं आऊंगी जब तक तुम खुद लेने नहीं आओगे.’’

‘‘मैं लेने आऊंगा, भूल जाओ… खुद ही जा रही हो तो खुद ही आना… न आना हो तो मत आना,’’ अमन ने दोटूक शब्दों में कहा.

‘‘क्या तुम मुझे चैलेंज कर रहे हो?’’

‘‘यही समझ लो.’’

‘‘तो फिर ठीक है, अब मैं इस घर में तभी पांव रखूंगी जब तुम मुझे लेने आओगे,’’ कह वह दूसरी तरफ मुंह कर सो गई. पूरी रात दोनों दूसरी तरफ मुंह किए सोए रहे. सुबह भी दोनों ने एकदूसरे से बात नहीं की. अमन के औफिस जाते वक्त अपर्णा ने सिर्फ इतना कहा कि घर की दूसरी चाबी लेते जाना.

आज अपर्णा और संजू को गए 2 महीने हो चुके थे पर न तो अपर्णा की आने की कोई उम्मीद दिख रही थी और न ही अमन की उसे बुलाने की… पर तड़प दोनों रहे थे. और बेचारा संजू… उसे किस गलती की सजा मिल रही थी…

शाम को औफिस से आते ही अमन ने हमेशा की तरह अपने दोस्त को फोन लगाया, ‘‘हैलो विकास, क्या कर रहा है यार? अगर फुरसत हो तो आ जा… बाहर से ही कुछ खाना और्डर कर देंगे.’’

‘‘ठीक है, देखता हूं,’’ विकास बोला.

विकास ने भी आते ही यही बात दोहराई कि अपर्णा के न रहने से उस का घर घर नहीं लग रहा है.

थोड़ी देर बैठने के बाद वह भी जाने लगा तो अमन बोला, ‘‘अरे बैठ न यार… क्या जल्दी है… मैं ने पिज्जा और्डर किया है खा कर जाना.’’

तो विकास कहने लगा, ‘‘नहीं रुक पाऊंगा यार… तुम्हें तो पता है मेरी बेटी मेरे बगैर सोती नहीं है और पिज्जा तो मैं खाता ही नहीं हूं… चल गुडनाइट,’’ कह वह चला गया.

‘यही सब दोस्त, कभी घंटों मेरे घर में गुजार देते थे और आज एक पल भी रुकना इन्हें भारी पड़ने लगा है,’ किसी तरह पिज्जे का 1 टुकड़ा अपने मुंह में डाला, पर खाया नहीं गया. कितने प्यार से उस ने पिज्जा और्डर किया था पर अब खाने का मन नहीं कर रहा था. तभी उसे याद आ गया कि कैसे संजू पिज्जा खाने के लिए बेचैन हो उठता था.

बड़ी मुश्किल से देर रात गए अमन को नींद आई. सुबह वक्त का पता ही नहीं चला कि कब घड़ी ने 8 बजा दिए. जल्दी से तैयार हो कर बिना कुछ खाएपिए औफिस चल दिया. जातेजाते पलट कर एक बार पूरे घर को देखा और फिर कुछ सोचने लगा… शायद उसे भी अब यह एहसास होने लगा था कि अपर्णा के बिना यह घर कबाड़खाना बन चुका है. धिक्कार रहा था वह खुद को. शाम को जब वापस घर आया तो और दिनों के मुकाबले आज मन बिलकुल बुझाबुझा सा लग रहा था. न तो टीवी देखने का मन हो रहा था और नही कुछ और करने का. आज उसे अपर्णा और संजू की बहुत कमी खल रही थी. घर काटने को दौड़ रहा था. सोचा दोस्तों से ही बातें कर ले पर किसी का फोन नहीं लग रहा था, तो कोई फोन नहीं उठा रहा था. वह समझ गया, भले ही लोग बीवीबच्चों से परेशान हो जाते हों पर अगर वे न हों तो फिर जिंदगी बेमानी बन कर रह जाती है.

उधर अपर्णा भी कहां खुश थी. कहने को तो वह अपने मायके आई थी, पर यहां भी रोज किसी न किसी बात को ले कर उस की भाभी सुमन बखेड़ा खड़ा कर देती थी. बातबात पर यह कह कर उसे ताना मारती, ‘‘पता नहीं कैसे लोग लड़झगड़ कर मायके पहुंच जाते हैं… भूल जाते हैं कि यह उन का अपना घर नहीं है.’’

अपर्णा अपने पर झल्ला उठती कि आखिर वह यहां आई ही क्यों?

एक शाम अपर्णा पड़ोस की एक औरत से बातें कर रही थी. तभी सुमन बड़बड़ाती हुई आई और कहने लगी, ‘‘दीदीदीदी देखिए तो जरा, कैसे आप के संजू ने मेरे बबलू का खिलौना तोड़ दिया.’’

अपर्णा ने गुस्से से अपने बेटे की तरफ देखा और फिर उसे डांटते हुए बोली, ‘‘क्यों संजू, तुम ने बबलू का खिलौना क्यों तोड़ा? यह तुम्हारा छोटा भाई है न? चलो सौरी बोलो.’’

‘‘मम्मी, मैं ने इस का खिलौना नहीं तोड़ा. मैं ने तो सिर्फ खिलौना देखने के लिए मांगा था और इस ने गुस्से से फेंक दिया… मैं तो खिलौना उठा कर उसे दे रहा था, पर मामी को लगा कि मैं ने इस का खिलौना तोड़ा है,’’ संजू रोते हुए बोला.

‘‘देखो कैसे झूठ बोल रहा है आप का बेटा… मैं बता रही हूं दीदी, संभाल लो इसे नहीं तो बड़ा हो कर और कितना झूठ बोलेगा और क्याक्या करेगा पता नहीं… अब क्या बबलू अपने घर में अपने खिलौने से भी नहीं खेल सकता? यह तो समझना चाहिए लोगों को.’’

सुमन की व्यंग्य भरी बातें सुन कर अपर्णा को लगा जैसे उस के दिल में किसी ने तीर चुभो दिया हो. जब उस ने अपनी मां की तरफ देखा, तो वे भी कहने लगीं, ‘‘सच में अपर्णा, तुम्हारा संजू बड़ा ही जिद्दी हो गया है… जरा संभालो इसे, बेटा.’’

अपर्णा स्तब्ध रह गई. बोली, ‘‘पर मां, आप ने देखेसुने बिना ही कैसे संजू को गलत बोल दिया?’’ उस की समझ में नहीं आ रहा था कि मां अचानक नातेपोते में इतना भेद क्यों करने लगीं.

अपर्णा संजू को ले कर अपने कमरे में जाने  ही लगी थी कि तभी सुमन ने फिर एक व्यंग्यबाण छोड़ा, ‘‘अब जब मांबाप ही आपस में झगड़ेंगे तो बच्चा तो झूठा ही निकलेगा न.’’

सुन कर अपर्णा अपने कमरे में आ कर रो पड़ी. फिर सोचने लगी कि सुमन भाभी ने इतनी बड़ी बात कह दी और मां चुप बैठी रहीं. कल तक मां मेरा संजू मेरा संजू कहते नहीं थकती थीं और आज वही संजू सब की आंखों में खटकने लगा? आज मेरी वजह से मेरे बच्चे को सुनना पड़ रहा है. फिर वह खुद को कोसती रही. संजू कितनी देर तक पापापापा कह कर रोता रहा और फिर बिना खाएपीए ही सो गया.

अपर्णा के आंसू बहे जा रहे थे. सच में कितने घमंड के साथ वह यहां आई थी और कहा था जब तक लेने नहीं आओगे, नहीं आऊंगी. पर अब किस मुंह से वह अपने पति के घर जाएगी… अमन तो यही कहेगा न कि लो निकल गई सारी हेकड़ी… ‘जो भी सुनना पड़े पर जाना तो पड़ेगा यहां से,’ सोच उस ने मन ही मन फैसला कर लिया.

बड़ी हिम्मत जुटा कर अपर्णा की मां उस के कमरे में उसे खाने के लिए बुलाने आईं और कहने लगीं, ‘‘अपर्णा, मुझे माफ कर देना… मैं भी क्या करूं… आखिर रहना तो मुझे इन लोगों के साथ ही है न… बेटा, मेरी बात को दिल से न लगाना,’’ और वे रो पड़ीं.

अपर्णा को अपनी मां की बेबसी पर दया आ गई. कहने लगी, ‘‘मां, आप शर्मिंदा न हों. मैं सब समझती हूं, पर गलती तो मेरी है, जो आज भी मायके को अपना घर समझ कर बड़ी शान से यहां रहने आ गई. सोचती हूं अब किस मुंह से जाऊंगी, पर जाना तो पड़ेगा.’’

रात भर यह सोच कर अपर्णा सिसकती रही कि आखिर क्यों लड़की का अपना कोई घर नहीं होता? आज अपर्णा अपनेआप को बड़ा छोटा महसूस कर रही थी. फिर सोचने लगी कि जो भी हो पर अब वही मेरा अपना घर है. यहां सब की बेइज्जती सहने से तो अच्छा है अपने पति की चार बातें सुन ली जाएं. फिर कहां गलत थे अमन? आखिर वे भी तो मेहनत करते हैं. हमारी सारी सुखसुविधाओं का पूरा खयाल रखते हैं और मैं पागल, बेवजह बातबात पर उन से झगड़ती रहती थी.

सच में बहुत कड़वा बोलती हूं मैं… बहुत बुरी हूं मैं… न जाने खुद से क्याक्या बातें करती रही. फिर संजू की तरफ देखते हुए बड़बड़ाई कि बेटा मुझे माफ कर देना. अपने घमंड में मैं ने यह भी न सोचा कि तुम अपने पापा के बगैर कैसे रहोगे… पर अब हम अपने घर जरूर जाएंगे बेटा.

सुबह भी अपर्णा काफी देर तक अपने कमरे में ही पड़ी रही. शाम को ट्रेन से जाना था उन्हें. अपना सारा सामान पैक कर रही थी कि तभी उस की मां आ कर कहने लगीं, ‘‘बेटा, मैं चाह कर भी यह नहीं कह सकती कि बेटा और कुछ दिन रुक जाओ.’’

अपर्णा मां को गले लगाते हुए बोली, ‘‘आप मेरी मां हैं और यही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है. रही जाने की बात, तो आज नहीं तो कल मुझे जाना ही था. आप अपने को दोषी न मानें.’’

दोनों बात कर ही रही थीं कि उधर से संजू, पापापापा कहते हुए दौड़ता हुआ आया.

‘‘क्या हुआ संजू? पापापापा चिल्लाता हुआ क्यों दौड़ा आ रहा..’’

अपर्णा अपनी बात पूरी कर पाती उस से पहले ही उस की नजर सामने से आते अमन पर पड़ी तो वह चौंक उठी. बोली, ‘‘अमन आप?’’

अमन को देख अपर्णा के दिल में उस के लिए फिर वही पहले वाला प्यार उमड़ पड़ा. उस की आंखों से आंसू बह निकले. कहने लगी, ‘‘अमन, हम तो खुद ही आ रहे थे आप के पास.’’

अपर्णा का हाथ अपने हाथों में कस कर दबाते हुए अमन बोला, ‘‘अपर्णा, मुझे माफ कर दो और चलो अपने घर… तुम्हारे बिना हमारा घर घर नहीं लगता… तुम्हारे न होने से मेरे सारे दोस्त भी मुझ से किनारा करने लगे हैं. नहीं अब नहीं जीया जाता तुम बिन… हां मैं बहुत अव्यवस्थित किस्म का इनसान हूं पर जैसा भी हूं… अब तुम ही मुझे संभाल सकती हो. अपर्णा मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं,’’ कहतेकहते अमन की आंखों में आंसू आ गए.

‘‘अमन, गलत आप नहीं मैं…’’

‘‘नहीं,’’ अमन ने अपना हाथ अपर्णा के होंठों पर रखते हुए कहा, ‘‘कोई गलत नहीं था, बस वक्त गलत था. जितना लड़नाझगड़ना था लड़झगड़ लिए, अब और नहीं,’’ कह कर अमन ने अपर्णा को अपने सीने से लगा लिया.

अपर्णा भी पति की बांहों के घेरे में सिमटते हुए बोली, ‘‘मैं भी तुम बिन नहीं जी सकती.’’

Hindi Story : उतरन – जिंदगी भर का बदला

Hindi Story : शोभा के मातापिता की मृत्यु एक सड़क दुर्घटना में हो जाने के बाद उसे उस के मामा अपने साथ ले आए. उस के परिवार में कोई नहीं था जो उस की देखभाल कर सके. उस के दादादादी की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी और पिता अपने मातापिता की इकलौती संतान थे. मामा के अतिरिक्त उस का और कोई ठिकाना नहीं था.

सात वर्ष की शोभा को देख कर मामी नाकभौंह सिकोड़ती बोलीं– “कैसी अभागी है, मांबाप को खा गई और अब हमारे सिर पर बोझ बन कर आ गई है. हम अपने बच्चों को देखें या इसे.”

शोभा, जिसे अभागी का अर्थ भी पता नहीं था, मामी के मुंह से ऐसी फटकार सुन कर घबरा गई. यही मामी जब वह अपने मम्मीपापा के साथ आती थी तब कितना प्यार दिखाती थी. मामामामी के एक बेटा और एक बेटी थे. मिनी शोभा से छोटी थी, वह 4 वर्ष की थी और छोटा दीपू अभी मात्र एक वर्ष का ही था.

मामी के नहीं चाहने पर भी शोभा मामा जी के दबाव के कारण उस घर में रह रही थी. धीरेधीरे मामी ने शोभा से घरेलू काम लेना प्रारंभ किया.

समय आदमी को सबकुछ सिखा देता है. शोभा समय से पहले समझदार हो गई. वह धीरेधीरे घर के सभी काम सीख गई और मामी के अधिकतर काम वह कर देती. उन की अपनी बेटी मिनी तो नाजों पली थी, वह उन की प्यारी दुलारी थी. उसे कुछ भी न कहतीं और सारा काम शोभा से करवातीं. शोभा को घर में पढ़ाई का बहुत कम अवसर मिलता था. वह तो मामाजी के कारण उस के स्कूल और कालेज की पढ़ाई चल रही थी वरना मामी तो उसे पढ़ाने के पक्ष में बिलकुल न थीं. मामा के आगे उन की एक नहीं चली.

लेकिन एक मामले में मामा जी ने भी आंखें बंद कर लीं, आखिर वे मामी से कितना विरोध करते. मामी ने कभी भी शोभा को नए कपड़े नहीं दिए. वह हमेशा मिनी की उतरन ही पहनती. मिनी भरेपूरे शरीर की मल्लिका थी जबकि शोभा बहुत दुबलीपतली. उसे भरपूर पौष्टिक भोजन नहीं मिलता था, इसलिए उस का शारीरिक विकास अधिक नहीं हो पाया था. सो, मिनी के कपड़े उसे आ जाते.

तीनों बच्चे बड़े हुए. शोभा जहां शांत और गंभीर थी वहीं मिनी और दीपू बहुत अधिक चंचल और कुछ जिद्दी भी थे. उन्हें अपनी पसंद की हर वस्तु मांग करने के साथ मिल जाती, कभीकभी तो मांगने की भी आवश्यकता न होती थी. वहीं शोभा को स्कूल की कौपीकिताबों के लिए भी मामी की मिन्नतें करनी पड़तीं. जब मामी से मिन्नत कर के थक जाती और न मिलता तब वह मामाजी से कहती थी.

मामाजी उस की आवश्यकता की वस्तुएं ला तो देते थे लेकिन उस के बाद मामी और मामा में बहुत अधिक लड़ाई होती थी. सलिए शोभा का प्रयास होता था कि वह मामा तक बहुत मजबूरी होने पर ही अपनी आवश्यकता ले कर पहुंचे.

शोभा हर क्लास में फर्स्ट आती रही. उस ने मैट्रिक और इंटर में भी अपने विद्यालय में टौप ही किया था, इसलिए उसे प्रत्येक वर्ग में छात्रवृत्ति मिलती थी. इस कारण भी मामी उस की पढ़ाई रोक पाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थीं.

जिस समय वह स्नातक में पढ़ रही थी उसी समय से रवि, जो स्नातकोत्तर का विद्यार्थी था, उस से बहुत प्रभावित था. उस की पारिवारिक पृष्ठभूमि को भी वह जानता था क्योंकि वह उसी की कालोनी में रहता था.

वह शोभा को पढ़ाई में भी सहायता करता. धीरेधीरे उन का आपस का सामान्य सा संबंध कब अमिट प्यार में बदल गया, उन दोनों को ही पता नहीं चला. एक दिन अवसर देख कर रवि ने उस के सामने अपना प्रेम प्रकट भी कर दिया और कहा- “मेरा लक्ष्य यूपीएससी करना है, मैं उस की तैयारी भी कर रहा हूं. तुम तब तक मेरी प्रतीक्षा करना. कहीं विवाह मत कर लेना. मैं तुम से ही विवाह करूंगा. दोनों का प्रेम बहुत शालीन था. उन्होंने अपने प्रेम की पवित्रता बनाए रखा. रवि ने कभी शोभा को छूने का भी प्रयास नहीं किया. उन दोनों का प्रेम आत्मिक था.

समय बीतता रहा. शोभा स्नातकोत्तर कर नेट परीक्षा पास कर चुकी थी. जेआरएफ मिला था, इसलिए उस की पीएचडी में भी कोई अड़चन नहीं आने वाली थी. उस की पीएचडी के लिए शोधकार्य प्रारंभ हो गया था.

रवि प्रथम प्रयास में चयनित नहीं हो पाया था. उस ने पीटी. और मुख्य परीक्षा पास की परंतु साक्षात्कार में नहीं पास हो पाया था. दूसरी बार उस ने पूरी शक्ति से तैयारी की. दीनदुनिया भुला कर बस दिनरात पढ़ाई में लगा रहा और इस बार वह चयनित हो गया था. उसे प्रशासनिक सेवा मिली थी. रिजल्ट आने के बाद रवि ने शोभा को मिठाई खिलाते हुए कहा- “मैं अपनी मां को तुम्हारे घर भेजूंगा तुम्हारे मामामामी से तुम्हें मांगने के लिए. मैं चाहता हूं प्रशिक्षण के लिए जाने से पहले हमारी शादी हो जाए. मैं प्रशिक्षण प्राप्त करूंगा और तुम अपनी पीएचडी पूरी करना.”

दोनों हाथों में हाथ डाल सपने संजो रहे थे. उन्हें पता नहीं था भविष्य में क्या होना है. उन के प्रेम के विषय में शोभा के घर में मिनी सबकुछ जानती थी. उस ने एकदो बार कालेज में शोभा को रवि के साथ अकेले बैठे बात करते देख लिया था. एकदो बार बाहर भी वह दोनों को साथसाथ देख चुकी थी. फिर तो उस ने जोड़घटावगुणाभाग सब कर दिया और शोभा के पीछे पूरे साजोसामान के साथ पिल पड़ी थी. पहले तो शोभा ने बात को टालना चाहा कि वह पढ़ाई में मदद ले रही थी रवि से कह कर, परंतु मिनी कहां मानने वाली थी. आखिर उस ने शोभा से उन दोनों के आपसी प्रेम की बात स्वीकार करवा ही ली. पहले तो उस ने शोभा का बहुत मजाक उड़ाया-

“क्या दीदी, तुम्हें पूरी दुनिया में सिर्फ वही मिला था. अरे, उस का घर देखा है? दो कमरे का कितना साधारण सा घर है. सुना है उस पर भी कर्जा लिया हुआ है उन लोगों ने महाजन से. उस के पिता भी नहीं हैं. दोदो सयानी बहनें. रुपए के अभाव में उन की शादी नहीं हो रही है. रवि ने तो अच्छा तुम्हें फंसाया. उसे पता है तुम पढ़ने में बहुत तेज हो, तुम अवश्य कोई अच्छी नौकरी करोगी और फिर उस का घर चलाने में उस की सहायता करोगी. तुम जिंदगीभर कमा कर उस के घरवालों का पेट भरती रहना.”

शोभा ने उसे आगे कुछ भी कहने से रोक दिया और अभी यह बात घर में किसी को नहीं बताने का वचन मांगने लगी-

“देख मिनी, हम ने तय किया है, पढ़ाई समाप्त होने के बाद मेरी भी नौकरी हो जाएगी और वह भी नौकरी करने लगेगा. तब हम विवाह करेंगे. रवि यूपीएससी की तैयारी कर रहा है. यूपीएससी में वह यदि चयनित हो जाता है तो उस की अच्छी नौकरी हो जाएगी और मेरी नौकरी कालेज में नहीं भी हुई तो स्कूल में तो हो ही जाएगी.”

मिनी बोली, “हांहां, सपने देखो तुम दिन में. तुम्हारी नौकरी तो अवश्य हो जाएगी स्कूल में, इस की मैं गारंटी लेती हूं. यदि ऐसे नहीं भी होगी तो पापा ही कहीं तुम्हारी नौकरी अवश्य लगवा देंगे. हां, तुम पापा से कहोगी तो वे उसे भी कहीं न कहीं सेट करवा ही देंगे. जहां तक यूपीएससी की बात है, बड़ेबड़े लगे रह जाते हैं तैयारी करते हुए, यूपीएससी क्रैक नहीं कर पाते. इस के पास तो कोई साधन भी नहीं है. कोचिंग के लिए कहां से इतने पैसे खर्च करेगा. अभी तक तो मैं ने जितने लोगों का भी सुना है, सभी ने दिल्ली में रह कर बड़ेबड़े कोचिंग संस्थान में जा कर तैयारी की थी. बड़ेबड़े कोचिंग संस्थान में जा कर तैयारी करने के बाद भी सभी कहां निकाल पाते हैं यूपीएससी. उन में से कुछ ही निकाल पाते हैं. फिर रवि बिना साधन के कहां क्रैक कर पाएगा.”

शोभा ने उस से बहस करना उचित नहीं समझा और कहा- “अच्छा, जाने दो छोड़ो इस बात को. तुम मुझे वचन दो कि घर में किसी को नहीं बताओगी रवि के विषय में.”

“चलो, तुम कहती हो तो मैं वचन देती हूं, जब तक तुम स्वयं नहीं कहोगी मैं किसी को नहीं बताऊंगी.”

मिनी ने उसे वचन दिया. बात आईगई हो गई थी.

शोभा ने मिनी द्वारा ही अपना प्रेम मामामामी तक पहुंचाने की सोचा था. जब घर पहुंची तो देखा, रवि की मां निकल कर जा रही थीं. उन्हें देखते ही उन के कदमों में झुक गई शोभा. बहुत श्रद्धा से उन का चरण स्पर्श किया. उन्होंने भी बहुत प्रेम से उसे आशीर्वाद देते हुए कहा- “सुखी रहो बिटिया. आओ कभी हमारे घर भी. अब तो तुम हमारी संबंधी बनने वाली हो.”

सिर झुकाए उन का आशीर्वाद लेती उन की बातें सुनती रही. तभी पीछे खड़ी मामी ने रवि की मां को गले लगा कर उन्हें विदाई दी- “हम ने पिछले जन्म में अवश्य मोती दान किए होंगे जो हमें घर बैठे इतना अच्छा लड़का और ऐसा परिवार मिला. मैं तो कभी सोच भी नहीं सकती थी हमारी बेटी के लिए घर बैठे ही हमें इतना अच्छा रिश्ता मिल जाएगा. आप तो जाने के लिए इतना हड़बड़ा गई हैं, मिनी के पापा अभी आते ही होंगे, उन से मिल कर जातीं तो अच्छा होता.”

“अगले दिन कभी उन से बात कर लूंगी, अभी बहुत आवश्यक काम है, इसलिए जा रही हूं. अब आप तो हमारे संबंधी हो गए, आनाजाना लगा ही रहेगा.” कहती हुई रवि की मां वहां से चली गईं. कुछ देर तक शोभा दरवाजे पर विमूढ़ सी खड़ी रह गई. एक बात उस की समझ में नहीं आ रही थी, उन्होंने ऐसा क्यों कहा, ‘तुम तो हमारी संबंधी बनने वाली हो.’ वह संबंधी कहां, उन के परिवार की सदस्य होने जा रही है. तभी मामी ने उसे आवाज दी- “शोभा, अब बाहर क्यों खड़ी हो, किस का इंतजार कर रही हो, कोई आने वाला है क्या. क्या अच्छी लड़कियों के यही लक्षण हैं, भीतर आ जाओ.”

मामी की तीखी आवाज से वह चौंक गई और चुपचाप भीतर आ गई. उसे कुछ अनहोनी की आशंका होने लगी थी. मामी ने उसी तीखे स्वर में फिर कहा- “ऐसा न हो तुम्हारे इन लक्षणों के कारण हमारा परिवार बदनाम हो जाए और मिनी की लगीलगाई बात में कुछ अड़चन आ जाए.”
“मैं समझी नहीं, मामी. आप कहना क्या चाहती हैं, मिनी की किस बात में मेरे कारण अड़चन आएगी, मैं ने क्या किया?”

“यों ही, सुबह की निकली हुई शाम ढले तक घर आती हो. ऐसे बाहर खड़ी रहोगी, बाहर किसकिस से मिलती हो, इस से बदनामी होगी कि नहीं?” मामी ने उस पर कटाक्ष करते हुए कहा.

“मामी, मैं अपनी रिसर्च के लिए जाती हूं. अधिकतर लाइब्रेरी में बैठ कर पढ़ाई करती हूं या विभाग में रहती हूं. कहीं जाती भी हूं तो रिसर्च के काम से और फिर वापस घर आती हूं. मैं कहीं व्यर्थ इधरउधर नहीं घूमती, इसलिए मेरे कारण आप की बदनामी होने की बात सोचना निराधार है. निश्चिंत रहिए, मेरे कारण आप की किसी तरह की कोई बदनामी नहीं होगी.”

उस का मूड खराब हो गया था, दिल में कड़वाहट भर गई थी. कहां तो सोच रही थी आज मिनी को मनाएगी अपने और रवि के विषय में मामामामी से बात करने के लिए. उस का सिर इतना अधिक दर्द करने लगा था कि अब उसे कुछ भी इच्छा नहीं हो रही थी. वह कमरे में आ कर कपड़े निकाल कर बाथरूम में जाने लगी फ्रैश होने के लिए, तभी मिनी ने उसे घेर लिया- “देखो दीदी यह लौकेट, बताओ कैसा है, मुझे कहां से मिला?”

“क्या मामी ने नया बनवाया तुम्हारे लिए?” न चाहते हुए भी उसे मिनी की बातों का जवाब देना पड़ा.

“नहीं, मेरी ससुराल से, रवि की माताजी ले कर आई थीं.”

“क्या, तुम्हारी ससुराल, रवि की माताजी. मैं कुछ समझी नहीं. तुम्हारी ससुराल से रवि की माताजी का क्या संबंध, और तुम्हारी शादी कब तय हुई?”

“दीदी, तुम्हें नहीं पता, आज दिन में पापा और मम्मी रवि के घर गए थे. वे रवि का रोका कर आए. अभी कुछ देर पहले रवि की मां यहां आ कर मुझे यह पहना कर गईं.”

यह सुन कर शोभा तो सन्न रह गई. यह क्या हो गया! रवि ने तो अपनी मां को उस के लिए बात करने के लिए भेजने की बात कही थी, फिर उस ने अपना रोका मिनी के साथ कैसे करवा लिया, क्या उस ने धोखे से रोका करवाया?

“दीदी, क्या तुम्हें सुन कर खुशी नहीं हुई, क्या सोचने लगीं तुम?” मिनी ने उस के चेहरे के समक्ष चुटकी बजाई.

“मिनी, तुम जानती थी न मेरा और रवि का संबंध, फिर भी…”

शोभा की बात अधूरी रह गई, मिनी ने बीच में ही कहा, “मुझे कुछ कहने का अवसर ही नहीं मिला, पापा और मम्मी रवि का रोका कर के आ गए थे. रवि की मां आईं और यह लौकेट पहना कर मेरा रोका कर दिया. छेका, तिलक, रिंग सेरामनी और विवाह सब का दिन तय हो चुका है. अब मैं क्या कर सकती थी?”

“परंतु मिनी, तुम्हें पता है रवि का मुझ से प्यार है, क्या वह तुम्हें प्यार दे पाएगा, तुम उस के साथ सुखी जीवन बिता पाओगी? तुम्हें तो रवि और उस का परिवार अपने स्तर का नहीं लगता था?”

शोभा को अभी भी उम्मीद थी, मिनी शायद इस विवाह से इनकार कर दे और उन दोनों के प्यार की बात घर में सब को बता दे.

“अरे दीदी, वह तो तब की बात थी, अब तो उच्च श्रेणी का सरकारी अधिकारी बनने पर उस के परिवार की स्थिति ऐसे ही सुधर जाएगी. और उस का कौन सा बड़ा परिवार है, उस की बहनों की शादियां तो हमारी शादी के पहले ही हो जाएंगी. पापा उन दोनों की शादी अपने खर्चे पर करवा रहे हैं. अब घर में सिर्फ उस की मां ही तो रहेंगी और रह जाएगी शानशौकत वाली जिंदगी. दीदी, फिर सुखी जीवन क्यों नहीं रहेगा?”

मामी और मिनी की बात तो वह समझ सकती थी. वे सिर्फ अपने लिए सोचती थीं. मामी ने तो ऐसे भी शोभा को कभी अपने परिवार का हिस्सा माना ही नहीं, परंतु मामा ने कैसे ऐसा किया? माना उन्हें शोभा और रवि के आपसी संबंध की जानकारी नहीं थी परंतु मिनी से 4 वर्ष बड़ी होने के कारण उन्हें पहले उस के विवाह के लिए सोचना चाहिए था.

“दीदीदीदी,” दीपू की आवाज सुन कर वह सजग हुई. इतनी देर में उस ने कपड़े भी नहीं बदले थे, ऐसे ही बैठी हुई थी.

“दीदी, मां कब से बुला रही हैं आप को खाना खाने के लिए. क्या सोच रही हैं?”

“तू चल, मैं आ रही हूं.”

कपड़े ले कर बाथरूम में चली गई. देर तक पानी के छींटे आंखों पर डालती रही और कपड़े बदल कर भोजनकक्ष में आ गई. आज उस ने रसोई का कोई काम नहीं किया था, इसलिए वह अपने को तैयार कर के आई थी मामी की जलीकटी सुनने के लिए. लेकिन मामी आज अत्यंत प्रसन्न थीं, इसलिए या फिर हो सकता है सामने मामा थे इसलिए भी उन्होंने कुछ भी नहीं कहा और प्लेट में रखी हुई मिठाई से एक टुकड़ा उठा कर उस के मुंह में डाल दिया और कहा- “शुभ समाचार है, मिनी की शादी तय हो गई है. अगले महीने ही विवाह होगा. समय बहुत कम बचा है. इस बीच छेका, तिलक, रिंग सेरामनी और विवाह सभी की तैयारियां करनी है. तुम कुछ दिन रिसर्च के काम से अवकाश ले लो.”

उस ने खामोशी से सिर उठा कर मामी और मामा की ओर देखा. मामा की नजरें झुकी हुई थीं-

“हम तो चाहते थे पहले तेरी डोली उठती यहां से, परंतु तेरा पीएचडी प्रारंभ हुआ है. मिनी बीए की परीक्षा दे ही चुकी है. उस की आगे पढ़ाई में कोई रुचि नहीं है, इसलिए हम ने पहले उस का विवाह तय किया.”

अपने दिल पर पत्थर रख कर उस ने मामी और मामा के साथ ही मिनी को भी शुभकामनाएं दीं. जानती थी, इस घर के एहसान का बदला उसे चुकाना होगा. लेकिन रवि ने कैसे स्वीकार किया, यह नहीं समझ पा रही थी. क्या उस ने कहा नहीं कि वह मुझ से प्यार करता है, वह सोच रही थी.

उस ने सोचा, वह रवि से मिल कर उस से अवश्य पूछेगी इस संबंध में, परंतु इस की नौबत ही नहीं आई. बड़बोली मिनी ने स्वयं ही उजागर कर दिया. रवि तो इस विवाह के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था. उस ने अपने घर में भी शोभा के विषय में ही कहा था. मामामामी से भी वह शोभा से विवाह करने की बात ही कह रहा था. परंतु मिनी से विवाह करने पर उस की दोनों बहनों के विवाह की जिम्मेदारी मामामामी ने अपने ऊपर ले ली. इस बात ने रवि को झुकने पर मजबूर कर दिया. वह अपनी बहनों के सुनहरे भविष्य के लिए बिक गया था मामामामी के हाथों.

मामा ने अपने परिचय क्षेत्र में अच्छे लड़कों से उन का विवाह करवा दिया और उन के द्वारा मांगी गई दहेज की राशि स्वयं दे दी. उसे यह भी पता चला मामा कि तो रवि का विवाह शोभा से करने के लिए तैयार थे परंतु मिनी और मामी के आगे उन की एक न चली और मिनी का विवाह रवि से तय करना पड़ा.

विवाह के दिन जयमाला और विवाह की सभी रस्मों की वह गवाह रही. रवि की दृष्टि तो झुकी हुई थी लेकिन मिनी, वह तो गर्व से उसे ऐसे निहार रही थी जैसे कह रही हो- ‘देख, अपनी औकात. मैं ने तो तुम्हारा प्रेम भी छीन लिया. मुझ में इतनी शक्ति है.’

विवाह के बाद विदाई के पहले जब दूल्हादुलहन सभी बड़ों को प्रणाम कर रहे थे, उस के पास आ कर रवि ठिठक गया. वह किनारे हो गई, लेकिन मिनी ने आगे बढ़ कर उसे प्रणाम किया और कहा- “दीदी, आशीर्वाद दो. आशीर्वाद के रूप में तुम मुझे क्या उपहार दे रही हो? सभी कुछ न कुछ उपहार दे रहे हैं, तुम भी तो दो.”

“मैं तो तुम्हें पहले ही उपहार दे चुकी. वैसे सच कहूं तो मेरे देने की नौबत ही नहीं आई. मेरा सबकुछ तो तुम ने स्वयं ही छीन लिया. अब मैं तुम्हें क्या दूं? रवि को ही मेरी ओर से दिया उपहार समझ लो. जिंदगीभर मैं तुम्हारी उतरन पहनती रही और अब से पूरी जिंदगी तुम मेरी उतरन के साथ अपना जीवन व्यतीत करना. मेरी शुभकामना है रवि का साथ तो तुम्हें मिल गया, उस का दिल से प्रेम भी तुम्हें मिल जाए.”

शोभा गर्व से सिर उठा कर वहां से आगे बढ़ गई और मिनी आंखों में क्षोभ और क्रोध भरे उसे देखती रह गई.

लेखिका – निर्मला कर्ण

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